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पृथ्वी की गतियाँ: दिन-रात और ऋतुएँ
हम जिस धरती पर खड़े हैं, वह एक पल को भी नहीं रुकती। वह लट्टू की तरह अपने अक्ष (Axis) पर घूमती है, और साथ-साथ सूरज का चक्कर भी लगाती है। पहली गति से दिन और रात बनते हैं, दूसरी से ऋतुएँ और साल। यहाँ आप पृथ्वी को ख़ुद घुमाकर, झुकाकर और सूरज के चारों ओर चलाकर देखेंगे कि यह सब होता कैसे है।

इसके बाद आप समझा पाएँगे
- दिन और रात क्यों होते हैं, और अरुणाचल में सुबह गुजरात से पहले क्यों होती है
- पृथ्वी का झुकाव ऋतुएँ कैसे बनाता है, और सूरज से दूरी इसकी वजह क्यों नहीं है
- जून में दिन लंबे और दिसंबर में छोटे क्यों होते हैं, और ध्रुवों पर छह महीने का दिन कैसे होता है
- झुकाव या घूमने की दिशा बदल जाए तो क्या होगा
- हर चौथे साल फ़रवरी में 29 तारीख़ क्यों आती है, और हर सौवें साल क्यों नहीं
आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।
1घूर्णन: दिन और रात
पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है, और एक चक्कर में लगभग 24 घंटे लगते हैं। इसी को घूर्णन (Rotation) कहते हैं। सूरज की रोशनी एक बार में पृथ्वी के आधे हिस्से पर ही पड़ सकती है: उस आधे में दिन होता है, बाक़ी आधे में रात। पृथ्वी घूमती रहती है, इसलिए हर जगह बारी-बारी से उजाले में आती है और फिर अँधेरे में चली जाती है।
23½° और 66½°: एक ही झुकाव, दो नाम
पृथ्वी का अक्ष सीधा खड़ा नहीं है। अपनी कक्षा के समतल पर खड़ी लंब रेखा (Perpendicular) से वह 23½° झुका हुआ है, यानी कक्षीय समतल (Orbital plane) से 66½° का कोण बनाता है। दोनों मिलकर 90° होते हैं, इसलिए दोनों बातें एक ही हैं। ऊपर "कोण और रेखाएँ" चालू करके देखिए। आज के सटीक माप में यह झुकाव 23.44° है।
प्रदीप्ति वृत्त
ग्लोब पर दिन और रात को बाँटने वाला घेरा प्रदीप्ति वृत्त (Circle of illumination) कहलाता है। ध्यान दीजिए, यह अक्ष के साथ-साथ नहीं चलता। अक्ष झुका हुआ है, पर उजाले की सीमा हमेशा सूरज की किरणों के आर-पार सीधी रहती है। इसी वजह से जून में उत्तर के इलाक़ों का ज़्यादा हिस्सा उजाले में रहता है और वहाँ दिन लंबे होते हैं।
15° = 1 घंटा: भारत का मानक समय
पृथ्वी 24 घंटे में 360° घूमती है, यानी हर घंटे 15° और हर 4 मिनट में 1°। इसलिए पूरब की जगहों पर सूरज पहले उगता है और पश्चिम की जगहों पर बाद में।
भारत पश्चिम में गुजरात के 68°7′ पूर्व से लेकर पूरब में अरुणाचल प्रदेश के 97°25′ पूर्व तक फैला है। लगभग 29° का यह फ़ासला सूरज के समय में क़रीब दो घंटे का फ़र्क़ बनाता है: अरुणाचल के पूर्वी छोर पर सुबह गुजरात के पश्चिमी छोर से लगभग दो घंटे पहले हो जाती है।
अपने राजस्थान में ही देखिए: जयपुर और जैसलमेर लगभग एक ही अक्षांश (Latitude) पर हैं, पर जैसलमेर क़रीब 5° पश्चिम में है। वहाँ दोपहर का सूरज जयपुर से लगभग 20 मिनट बाद सबसे ऊँचा होता है।
हर शहर अपना अलग समय चलाए तो रेल और दफ़्तरों का काम उलझ जाए। इसलिए पूरा देश एक ही समय मानता है, जो उत्तर प्रदेश में मिर्ज़ापुर के पास से गुज़रने वाली 82°30′ पूर्व देशांतर (Longitude) रेखा से तय होता है। यही भारतीय मानक समय (Indian Standard Time) है, जो ग्रीनविच के समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे रहता है।
इतनी तेज़ी, फिर भी पता क्यों नहीं चलता?
भूमध्य रेखा (Equator) पर खड़ा आदमी पृथ्वी के साथ लगभग 1,670 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से घूम रहा है, और जयपुर में बैठा आदमी लगभग 1,490 की रफ़्तार से। फिर भी हमें कुछ महसूस नहीं होता, क्योंकि यह रफ़्तार एक-सी रहती है और हवा, पानी, घर, सब कुछ हमारे साथ ही चल रहा है। चिकनी पटरी पर बराबर रफ़्तार से चलती रेल में खिड़की से बाहर न देखें, तो पता ही नहीं चलता कि रेल चल रही है या खड़ी है।
घूमने का सबूत आसमान में दिखता है: सूरज, चाँद और तारे पूरब से उगकर पश्चिम में डूबते दिखते हैं। 1851 में पेरिस में लेओं फ़ूको ने एक लंबा लोलक लटकाकर दिखाया कि उसके झूलने की दिशा घंटे-दर-घंटे धीरे-धीरे घूमती जाती है, क्योंकि उसके नीचे ज़मीन घूम रही है।
दिन 24 घंटे का, पर चक्कर थोड़ा छोटा
तारों के हिसाब से पृथ्वी अपना एक पूरा चक्कर 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड में ही लगा लेती है। पर इस बीच वह सूरज के चारों ओर भी लगभग 1° आगे खिसक जाती है, इसलिए सूरज को फिर से ठीक उसी जगह लाने के लिए उसे लगभग 4 मिनट और घूमना पड़ता है। हमारी घड़ी का 24 घंटे का दिन इसी सौर दिन (Solar day) का औसत है, और घूर्णन की इस अवधि को पृथ्वी दिन भी कहते हैं।
अगर पृथ्वी घूमना बंद कर दे?
अक्सर कहा जाता है कि तब आधी पृथ्वी पर हमेशा दिन रहेगा और आधी पर हमेशा रात। ऐसा तभी होगा जब पृथ्वी का एक ही चेहरा हमेशा सूरज की ओर रहे, जैसे चाँद का एक ही चेहरा हमेशा हमारी ओर रहता है। अगर पृथ्वी सच में बिल्कुल न घूमे, तो सूरज का चक्कर लगाते-लगाते हर जगह धीरे-धीरे उजाले से अँधेरे में जाएगी, और एक दिन पूरे साल का होगा: लगभग छह महीने उजाला, छह महीने रात। दोनों ही हालात में एक तरफ़ भयंकर गर्मी होगी और दूसरी तरफ़ कड़ाके की ठंड, और जीवन बहुत मुश्किल हो जाएगा।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1पृथ्वी किस दिशा में घूमती है?
पृथ्वी पश्चिम से पूर्व घूमती है, इसीलिए सूरज पूरब में उगता और पश्चिम में डूबता दिखता है।
2अरुणाचल प्रदेश के पूर्वी छोर और गुजरात के पश्चिमी छोर के बीच सूरज के समय में लगभग कितना फ़र्क़ है?
दोनों छोरों के बीच लगभग 29° का फ़ासला है। 1° यानी 4 मिनट, तो 29° यानी क़रीब दो घंटे।
3प्रदीप्ति वृत्त क्या है?
प्रदीप्ति वृत्त उजाले वाले आधे को अँधेरे वाले आधे से अलग करता है। अक्ष झुका है, इसलिए यह घेरा अक्ष के साथ-साथ नहीं चलता।
4भारतीय मानक समय किस देशांतर से तय होता है?
मिर्ज़ापुर के पास से गुज़रने वाली 82°30′ पूर्व रेखा का समय पूरे देश की घड़ियों में चलता है। यह ग्रीनविच से 5 घंटे 30 मिनट आगे है।
2परिक्रमण और ऋतुएँ
घूमते-घूमते पृथ्वी एक तय रास्ते पर सूरज का चक्कर भी लगाती है। इसे परिक्रमण (Revolution) कहते हैं, और इस रास्ते को कक्षा (Orbit)। एक चक्कर में 365 दिन और लगभग 6 घंटे लगते हैं। पूरे सफ़र में अक्ष एक ही दिशा में झुका रहता है, उत्तरी ध्रुव हमेशा ध्रुव तारे की ओर। इसलिए साल के एक हिस्से में उत्तरी गोलार्ध (Northern Hemisphere) सूरज की ओर झुका होता है और दूसरे हिस्से में दक्षिणी (Southern Hemisphere)। ऋतुएँ इसी से बनती हैं।
परीक्षा में आम तौर पर विषुव (Equinox) 21 मार्च और 23 सितंबर को, और अयनांत (Solstice) 21 जून और 22 दिसंबर को लिखे जाते हैं। असल पल हर साल कुछ घंटे खिसकता है। 2026 में ये पल भारतीय समय से इस तरह पड़ते हैं: 20 मार्च रात 8:16, 21 जून दोपहर 1:55, 23 सितंबर सुबह 5:36 और 22 दिसंबर तड़के 2:20।
सर्दी इसलिए नहीं होती कि सूरज दूर है
बहुत लोग सोचते हैं कि गर्मी तब होती है जब पृथ्वी सूरज के पास होती है। पर पृथ्वी सूरज के सबसे पास जनवरी की शुरुआत में होती है (2026 में 3 जनवरी, लगभग 14.71 करोड़ किमी) और सबसे दूर जुलाई की शुरुआत में (6 जुलाई, लगभग 15.21 करोड़ किमी)। यानी हमारी कड़ाके की सर्दी के समय सूरज सबसे पास होता है! दूरी में बस 3% का फ़र्क़ आता है। ऋतुओं की असली वजह झुकाव है: जिस गोलार्ध पर किरणें सीधी पड़ती हैं और दिन लंबे होते हैं, वहाँ गर्मी होती है।
सीधी धूप ज़्यादा क्यों तपाती है
दोपहर की धूप सुबह की धूप से तेज़ क्यों लगती है? टॉर्च को दीवार पर सीधा डालिए तो छोटा, चमकीला गोला बनता है; तिरछा डालिए तो वही रोशनी बड़े, फीके धब्बे में फैल जाती है। सूरज की किरणों के साथ भी यही होता है। सीधी किरणें कम जगह पर ज़्यादा गर्मी देती हैं और हवा की कम मोटी परत पार करती हैं, जबकि तिरछी किरणें वही गर्मी बड़ी जगह पर बाँट देती हैं।
उत्तर का गर्मी वाला आधा साल लंबा है
जुलाई के आसपास पृथ्वी सूरज से सबसे दूर होती है और तब कक्षा में थोड़ा धीमे चलती है (लगभग 29.3 किमी प्रति सेकंड), जबकि जनवरी के आसपास सबसे तेज़ (लगभग 30.3)। इसलिए मार्च के विषुव से सितंबर के विषुव तक, जब उत्तरी गोलार्ध सूरज की ओर झुका रहता है, लगभग 186 दिन लगते हैं, और बाक़ी आधे में सिर्फ़ 179 के आसपास।
ध्रुवों पर छह महीने का दिन
उत्तरी ध्रुव पर मार्च के विषुव के आसपास सूरज उगता है और सितंबर के विषुव तक डूबता ही नहीं; फिर लगभग छह महीने की रात आती है। दक्षिणी ध्रुव पर ठीक इसका उल्टा होता है। अंटार्कटिका में भारत के शोध केंद्र मैत्री और भारती ध्रुव से कुछ दूर हैं, इसलिए वहाँ यह लंबी रात छह महीने की नहीं होती। मैत्री में मई के आख़िर से जुलाई के आख़िर तक, लगभग दो महीने सूरज नहीं उगता। भारती उससे थोड़ा उत्तर में है, इसलिए वहाँ यह रात सात-आठ हफ़्ते की रहती है।
कर्क रेखा भारत के बीच से
कर्क रेखा भारत के आठ राज्यों से गुज़रती है: गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिज़ोरम। राजस्थान में यह दक्षिण के बाँसवाड़ा और डूंगरपुर ज़िलों से निकलती है। 21 जून के आसपास इस रेखा पर दोपहर का सूरज ठीक सिर के ऊपर होता है, और भारत में इसके दक्षिण की हर जगह पर साल में दो दिन ऐसा होता है।
मकर संक्रांति और 22 दिसंबर
दक्षिण अयनांत (Winter solstice) 21 या 22 दिसंबर को आता है। उस दिन सूरज की सीधी किरणें सबसे दक्षिण में, मकर रेखा पर होती हैं और उत्तरी गोलार्ध में साल का सबसे छोटा दिन होता है। मकर संक्रांति 14 या 15 जनवरी को मनाई जाती है; यह भारतीय पंचांग में सूरज के मकर राशि में आने का दिन है। दोनों अलग-अलग गिनतियाँ हैं, इसलिए तारीख़ें भी अलग हैं।
विषुव पर भी दिन थोड़ा लंबा
विषुव पर सीधी किरणें भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं और कोई ध्रुव सूरज की ओर नहीं झुका होता, इसलिए पूरी पृथ्वी पर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं। "लगभग" इसलिए कि हवा रोशनी को थोड़ा मोड़ देती है और सूरज का पूरा गोला डूबने में भी कुछ समय लगता है। इसीलिए विषुव के दिन भी उजाला 12 घंटे से कुछ मिनट ज़्यादा रहता है।
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1पृथ्वी सूरज के सबसे पास कब होती है?
सबसे पास जनवरी की शुरुआत में (2026 में 3 जनवरी), जब हमारे यहाँ सर्दी होती है। यानी ऋतुएँ दूरी से नहीं, झुकाव से बनती हैं।
221 जून को सूरज की सीधी किरणें कहाँ पड़ती हैं?
उत्तर अयनांत पर उत्तरी गोलार्ध सूरज की ओर सबसे ज़्यादा झुका होता है और सीधी किरणें कर्क रेखा पर पड़ती हैं, जो भारत के बीच से गुज़रती है।
3दिसंबर में ऑस्ट्रेलिया में गर्मी क्यों होती है?
दिसंबर में दक्षिणी गोलार्ध सूरज की ओर झुका होता है और सीधी किरणें मकर रेखा पर पड़ती हैं, जो ऑस्ट्रेलिया से होकर गुज़रती है। इसलिए वहाँ 25 दिसंबर गर्मियों में आता है।
3अगर ऐसा हो तो?
अब पृथ्वी के नियम ख़ुद बदलकर देखिए। झुकाव घटाइए-बढ़ाइए, पृथ्वी को कक्षा में किसी और जगह ले जाइए, या घूमने की दिशा ही उलट दीजिए, और देखिए कि दिन, रात और ऋतुओं पर क्या असर पड़ता है।
असली पृथ्वी और पड़ोसी ग्रह
- झुकाव भी धीरे-धीरे बदलता है
- आज पृथ्वी का झुकाव 23.44° है। लगभग 41,000 साल के चक्र में यह 22.1° और 24.5° के बीच ऊपर-नीचे होता रहता है, और इस समय धीरे-धीरे घट रहा है। इसलिए कर्क और मकर रेखाएँ भी बहुत धीरे-धीरे खिसकती हैं।
- यूरेनस: करवट लेकर लेटा ग्रह
- यूरेनस का अक्ष लगभग 98° झुका है, यानी वह लगभग लेटकर घूमता है। उसके ध्रुवों पर बारी-बारी से कई-कई साल लंबे दिन और रातें होती हैं।
- शुक्र: उल्टा घूमने वाला
- शुक्र ज़्यादातर ग्रहों से उल्टी दिशा में, और बहुत धीरे घूमता है। वहाँ सूरज पश्चिम में उगता है।
4लीप वर्ष
पृथ्वी को सूरज का एक चक्कर लगाने में 365 दिन और लगभग 6 घंटे लगते हैं। कैलेंडर में तो पूरे दिन ही गिने जा सकते हैं, इसलिए हर साल 365 दिन रखे जाते हैं और ये 6 घंटे बचते जाते हैं। चार साल में 6 × 4 = 24 घंटे, यानी पूरा एक दिन जमा हो जाता है। यही दिन हर चौथे साल फ़रवरी में 29 तारीख़ बनकर जुड़ता है, और उस साल को लीप वर्ष (Leap year) कहते हैं।
पर 6 घंटे पूरे नहीं होते
ठीक-ठीक नापें तो एक साल 365 दिन 5 घंटे 48 मिनट 45 सेकंड का होता है, यानी 6 घंटे से लगभग 11 मिनट कम। हर चौथे साल पूरा एक दिन जोड़ने से हम थोड़ा ज़्यादा जोड़ देते हैं, और सदियों में यह फ़र्क़ कई दिन बन जाता है। इसे ठीक रखने के लिए आज का कैलेंडर तीन नियम मानता है:
- जो साल 4 से पूरा बँटे, वह लीप वर्ष है, जैसे 2024 और 2028।
- पर सदी वाला साल, जो 100 से बँटता है, लीप वर्ष नहीं होता, जैसे 1900 और 2100।
- और जो 400 से भी बँट जाए, वह फिर लीप वर्ष है, जैसे 2000।
अगली 29 फ़रवरी 2028 में आएगी।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1हर चौथे साल एक दिन क्यों जोड़ा जाता है?
एक परिक्रमा 365 दिन और लगभग 6 घंटे की है। चार साल में 6 × 4 = 24 घंटे, यानी एक दिन, जुड़ जाता है।
2क्या 2100 लीप वर्ष होगा?
सदी वाला साल तभी लीप वर्ष होता है जब वह 400 से भी बँटे। 2000 लीप वर्ष था, पर 2100 नहीं होगा।
5आख़िरी जाँच
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1पृथ्वी का अक्ष कक्षीय समतल से कितने अंश का कोण बनाता है?
अक्ष लंब रेखा से 23½° झुका है, इसलिए कक्षीय समतल से 90° − 23½° = 66½° का कोण बनाता है।
2किन तारीख़ों के आसपास पूरी पृथ्वी पर दिन और रात लगभग बराबर होते हैं?
विषुव पर सीधी किरणें भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं और कोई ध्रुव सूरज की ओर नहीं झुका होता।
3सीधी किरणें तिरछी किरणों से ज़्यादा गर्मी क्यों देती हैं?
बराबर रोशनी सीधी पड़े तो कम जगह पर सिमटती है; तिरछी पड़े तो बड़ी जगह पर फैलकर हल्की हो जाती है।
421 जून को उत्तरी ध्रुव रेखा के पार क्या होता है?
तब उत्तरी गोलार्ध सूरज की ओर झुका होता है, इसलिए ध्रुव रेखा के पार का इलाक़ा घूमते हुए भी उजाले से बाहर नहीं जाता।
5पृथ्वी का अक्ष बिल्कुल सीधा होता (झुकाव 0°), तो क्या होता?
तब सीधी किरणें हमेशा भूमध्य रेखा पर पड़तीं और हर जगह साल भर 12 घंटे का दिन होता।
6तारों के हिसाब से पृथ्वी एक चक्कर कितने समय में पूरा करती है?
तारों के हिसाब से 23 घंटे 56 मिनट 4 सेकंड। सूरज के हिसाब से दिन औसतन 24 घंटे का है, क्योंकि इस बीच पृथ्वी कक्षा में थोड़ा आगे बढ़ जाती है।
शाबाश! पाँचों पड़ाव पूरे हुए। अब आप किसी को भी समझा सकते हैं कि दिन-रात और ऋतुएँ क्यों होती हैं।
शब्दकोश
- घूर्णन (Rotation)
- पृथ्वी का अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व घूमना। एक चक्कर लगभग 24 घंटे में होता है, और इससे दिन और रात बनते हैं।
- परिक्रमण (Revolution)
- पृथ्वी का अपनी कक्षा में सूरज के चारों ओर चक्कर लगाना। एक चक्कर 365¼ दिन में होता है, और झुकाव के साथ मिलकर इससे ऋतुएँ बनती हैं।
- अक्ष (Axis)
- पृथ्वी के बीच से उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव को जोड़ने वाली काल्पनिक रेखा, जिस पर वह घूमती है।
- कक्षा (Orbit) और कक्षीय समतल (Orbital plane)
- सूरज के चारों ओर पृथ्वी का रास्ता कक्षा है, और इस रास्ते से बनी सपाट सतह कक्षीय समतल। अक्ष इससे 66½° का कोण बनाता है।
- प्रदीप्ति वृत्त (Circle of illumination)
- ग्लोब पर दिन वाले आधे हिस्से को रात वाले आधे से अलग करने वाला घेरा।
- पृथ्वी दिन (Earth day)
- घूर्णन की अवधि, यानी एक दिन और एक रात।
- भूमध्य रेखा या विषुवत् वृत्त (Equator)
- 0° अक्षांश की रेखा, जो पृथ्वी को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में बाँटती है।
- कर्क रेखा (Tropic of Cancer) और मकर रेखा (Tropic of Capricorn)
- 23½° उत्तर और 23½° दक्षिण की अक्षांश रेखाएँ। दोपहर का सूरज ठीक सिर के ऊपर इन्हीं दोनों के बीच आ सकता है।
- उत्तरी ध्रुव रेखा (Arctic Circle) और दक्षिणी ध्रुव रेखा (Antarctic Circle)
- 66½° उत्तर और 66½° दक्षिण की रेखाएँ (दक्षिण वाली को अंटार्कटिक वृत्त भी कहते हैं)। इनके पार साल में कम से कम एक दिन 24 घंटे का उजाला और एक दिन 24 घंटे का अँधेरा होता है।
- उत्तर अयनांत (Summer solstice)
- 21 जून के आसपास का दिन, जब सीधी किरणें कर्क रेखा पर पड़ती हैं और उत्तरी गोलार्ध में सबसे लंबा दिन होता है।
- दक्षिण अयनांत (Winter solstice)
- 22 दिसंबर के आसपास का दिन, जब सीधी किरणें मकर रेखा पर पड़ती हैं और उत्तरी गोलार्ध में सबसे छोटा दिन होता है।
- विषुव (Equinox)
- 21 मार्च और 23 सितंबर के आसपास के दिन, जब सीधी किरणें भूमध्य रेखा पर पड़ती हैं और हर जगह दिन-रात लगभग बराबर होते हैं।
- उपसौर (Perihelion) और अपसौर (Aphelion)
- कक्षा में सूरज से सबसे पास (जनवरी की शुरुआत) और सबसे दूर (जुलाई की शुरुआत) वाली जगहें।
- लीप वर्ष (Leap year)
- 366 दिन का साल, जिसमें फ़रवरी 29 दिन की होती है।