डीप डाइव · भूगोल
भूकंप: धरती क्यों काँपती है, और हम कैसे बचें
जिस ज़मीन पर हम चलते हैं, वह हमें पक्की और स्थिर लगती है। पर कभी-कभी कुछ सेकंड के लिए वही ज़मीन हिलने लगती है: बर्तन खड़खड़ाते हैं, पंखे झूलते हैं और लोग घबराकर बाहर भागते हैं। यही भूकंप (Earthquake) है। यहाँ आप धरती को काटकर उसके भीतर झाँकिए, दुनिया भर में इसी हफ़्ते आए भूकंप नक़्शे पर देखिए, सिम्युलेटर में ख़ुद भूकंप पैदा करके देखिए कि 5 और 7 के भूकंप में कितना बड़ा फ़र्क़ है, और जानिए कि भूकंप आए तो अपने को और अपनों को कैसे बचाएँ।

इसके बाद आप समझा पाएँगे
- धरती के भीतर कौन-कौन सी परतें हैं, और वैज्ञानिकों ने बिना खोदे उन्हें कैसे पहचाना।
- प्लेटें क्या हैं, और ज़्यादातर भूकंप उनकी सीमाओं पर ही क्यों आते हैं।
- भूकंप का उद्गम केंद्र (Focus) और अधिकेंद्र (Epicentre) क्या हैं।
- P, S और धरातलीय तरंगें कैसे चलती हैं, और तीन स्टेशनों से भूकंप की जगह कैसे निकालते हैं।
- भूकंपीय तीव्रता (Magnitude) 6 और 7 वाले भूकंपों में कितना फ़र्क़ है, और आघात की तीव्रता (Intensity) उससे अलग क्यों है।
- भारत और राजस्थान में भूकंप का ख़तरा कहाँ कितना है।
- सुनामी कैसे बनती है, और समुद्र में इतनी तेज़ क्यों दौड़ती है।
- भूकंप के समय और उसके बाद क्या करें, और क्या न करें।
आपकी प्रगति सिर्फ़ इसी ब्राउज़र में रहती है। कहीं भेजी नहीं जाती।
1धरती के भीतर: परत-दर-परत
धरती एक प्याज़ की तरह परतों से बनी है। सबसे ऊपर पतली-सी भूपर्पटी (Crust) है, जिस पर हम रहते हैं। उसके नीचे बहुत मोटी मैंटल (Mantle) है, और सबसे भीतर लोहे और निकल का क्रोड (Core), जिसका बाहरी हिस्सा तरल है और भीतरी हिस्सा ठोस। धरती के केंद्र तक की दूरी लगभग 6,371 किलोमीटर है।
इतना गहरा किसी ने खोदकर नहीं देखा। इंसान का सबसे गहरा गड्ढा रूस का कोला सुपरडीप बोरहोल (Kola Superdeep Borehole) है, जो लगभग 12 किलोमीटर तक ही पहुँचा। यानी केंद्र तक के रास्ते का पाँच सौवाँ हिस्सा भी नहीं। फिर वैज्ञानिकों को भीतर का हाल कैसे पता चला? भूकंप की तरंगों से। हर बड़ा भूकंप तरंगें पूरी धरती के आर-पार भेजता है। दुनिया भर के स्टेशनों पर ये तरंगें कब, कितनी तेज़ और कौन-सी पहुँचती हैं, इससे भीतर की परतें पहचानी गईं, ठीक वैसे ही जैसे डॉक्टर एक्स-रे से शरीर के भीतर देखते हैं।
छाया क्षेत्र (Shadow zone)
भूकंप से 104° से 140° की दूरी पर, धरती के दूसरी ओर एक पट्टी में, सीधी P तरंगें दर्ज नहीं होतीं। तरंगें तरल बाह्य क्रोड में घुसकर मुड़ जाती हैं, और यह पट्टी छूट जाती है। S तरंगें 104° से आगे कहीं नहीं पहुँचतीं, क्योंकि S तरंग तरल में चल ही नहीं सकती। इसी से पता चला कि बाह्य क्रोड तरल है।
मोहो असांतत्य (Moho discontinuity)
भूपर्पटी और मैंटल के बीच की सीमा पर तरंगों की चाल अचानक बढ़ जाती है। इसे 1909 में क्रोएशिया के वैज्ञानिक आंद्रिया मोहोरोविचिच ने एक भूकंप की तरंगें पढ़कर पहचाना, इसलिए इसे मोहो असांतत्य कहते हैं। असांतत्य का मतलब है वह जगह जहाँ एक परत ख़त्म होकर दूसरी शुरू होती है।
ठोस आंतरिक क्रोड
तरल क्रोड के भीतर एक ठोस गोला भी है, यह 1936 में डेनमार्क की वैज्ञानिक इंगे लेहमन ने बताया। उन्होंने देखा कि P तरंगों की हल्की गूँज छाया क्षेत्र में भी पहुँच रही थी, जो भीतर किसी ठोस परत से टकराकर ही आ सकती थी।
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1धरती की कौन-सी परत तरल है?
S तरंगें बाह्य क्रोड से होकर नहीं जातीं, और S तरंग तरल में नहीं चलती। इसी से पता चला कि बाह्य क्रोड तरल है।
2वैज्ञानिकों ने धरती के भीतर की परतें कैसे पहचानीं?
सबसे गहरा गड्ढा भी लगभग 12 किलोमीटर तक ही गया है। परतें भूकंपीय तरंगों की चाल और रास्ते से पहचानी गईं।
3आंतरिक क्रोड बहुत गर्म है, फिर भी ठोस क्यों है?
दबाव बढ़ने पर किसी चीज़ को पिघलने के लिए और ज़्यादा गर्मी चाहिए। धरती के केंद्र पर दबाव इतना है कि लोहा गर्म होकर भी ठोस रहता है।
2प्लेटें: धरती की टूटी हुई खोल
धरती की सबसे ऊपरी सख़्त परत, यानी भूपर्पटी और उसके ठीक नीचे मैंटल का ठंडा, सख़्त हिस्सा, मिलकर स्थलमंडल (Lithosphere) कहलाते हैं। यह परत एक साबुत खोल नहीं है। टूटे हुए अंडे के छिलके की तरह यह कई बड़े-छोटे टुकड़ों में बँटी है, जिन्हें विवर्तनिक प्लेटें (Tectonic plates) कहते हैं। सात बड़ी प्लेटें हैं और बहुत-सी छोटी।
ये प्लेटें नीचे की गर्म, धीरे बहती मैंटल पर तैरती-सी चलती हैं, साल में कुछ सेंटीमीटर, लगभग उतना जितना हमारे नाख़ून बढ़ते हैं। कहीं दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं (अपसारी सीमा), कहीं टकराती हैं (अभिसरण सीमा), और कहीं एक-दूसरे के बग़ल से रगड़ती हुई निकलती हैं (रूपांतर सीमा)। जहाँ प्लेटें मिलती हैं, वहीं चट्टानों पर सबसे ज़्यादा ज़ोर पड़ता है, और इसीलिए दुनिया के ज़्यादातर भूकंप इन्हीं सीमाओं पर आते हैं।
अपसारी सीमा (Divergent)
जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहाँ बीच की दरार से पिघली चट्टान ऊपर आकर नई परत बनाती है। ज़्यादातर ऐसी सीमाएँ समुद्र के बीच हैं, जैसे अटलांटिक महासागर के बीच की लंबी पर्वतमाला। यहाँ के भूकंप अक्सर छोटे और कम गहरे होते हैं।
अभिसरण सीमा (Convergent)
जहाँ प्लेटें टकराती हैं, वहाँ एक प्लेट दूसरी के नीचे धँस सकती है, या दोनों सिकुड़कर पहाड़ खड़े कर देती हैं। दुनिया के सबसे बड़े भूकंप ऐसी ही सीमाओं पर आते हैं। प्रशांत महासागर के चारों ओर ऐसी सीमाओं का घेरा है, जिसे रिंग ऑफ़ फ़ायर (Ring of Fire), यानी आग का घेरा, कहते हैं, क्योंकि वहाँ ज्वालामुखी भी बहुत हैं।
रूपांतर सीमा (Transform)
जहाँ दो प्लेटें एक-दूसरे के बग़ल से उलटी दिशाओं में खिसकती हैं, वहाँ चट्टानें अटक-अटककर चलती हैं। अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया का सैन एंड्रियास भ्रंश ऐसी ही सीमा है।
भारत की प्लेट उत्तर की ओर
भारत जिस प्लेट पर है, वह करोड़ों सालों से उत्तर की ओर बढ़ रही है और यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही है। इसी टक्कर ने हिमालय खड़ा किया, और यह टक्कर आज भी जारी है। इसीलिए हिमालय के पूरे इलाक़े में बड़े भूकंपों का ख़तरा है।
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1दुनिया के ज़्यादातर भूकंप कहाँ आते हैं?
प्लेटें जहाँ मिलती हैं, वहीं चट्टानों पर सबसे ज़्यादा ज़ोर पड़ता है। नक़्शे पर इसी हफ़्ते के भूकंप भी इन्हीं सीमाओं के साथ जमा दिखते हैं।
2हिमालय किन प्लेटों की टक्कर से बना?
भारत की प्लेट उत्तर की ओर बढ़कर यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही है, और यह टक्कर आज भी जारी है।
3प्लेटें लगभग कितनी तेज़ी से खिसकती हैं?
लगभग उतना जितना हमारे नाख़ून एक साल में बढ़ते हैं। पर करोड़ों सालों में यही धीमी चाल महाद्वीपों को हज़ारों किलोमीटर खिसका देती है।
3भूकंप आता कैसे है
चट्टानें पूरी तरह सख़्त नहीं होतीं; ज़ोर लगे तो वे रबर की तरह थोड़ी मुड़ती और खिंचती हैं। प्लेटें चलती रहती हैं, पर जहाँ दो चट्टानी खंड मिलते हैं, वहाँ रगड़ के कारण वे अटके रहते हैं। सालों-साल ज़ोर जमा होता जाता है, जैसे धनुष की डोरी खिंचती जाती है। एक दिन ज़ोर रगड़ से बड़ा हो जाता है, चट्टान एक दरार पर अचानक खिसक जाती है, और जमा ऊर्जा तरंगों के रूप में चारों ओर फैल जाती है। यही भूकंप है। 1906 के सैन फ़्रांसिस्को भूकंप के बाद हैरी फ़ील्डिंग रीड ने यह बात समझाई, जिसे प्रत्यास्थ पुनश्चलन सिद्धांत (Elastic rebound theory) कहते हैं।
जिस दरार पर चट्टानें खिसकती हैं, उसे भ्रंश (Fault) कहते हैं। धरती के भीतर जिस जगह से खिसकना शुरू होता है, वह उद्गम केंद्र (Focus या Hypocentre) है। उसके ठीक ऊपर सतह पर जो जगह है, वह अधिकेंद्र (Epicentre) है। समाचार में जो जगह बताई जाती है, वह अधिकेंद्र ही होती है।

नेवादा (अमेरिका), 1954: 16 दिसंबर 1954 के भूकंप में फ़ेयरव्यू पीक के पास भ्रंश पर ज़मीन खिसकी और यह खड़ी दीवार बन गई। इसे भ्रंश कगार (Fault scarp) कहते हैं। नीचे खड़े व्यक्ति से इसकी ऊँचाई का अंदाज़ा लगाइए।
Photo H. Benioff; USGS Earthquake Information Bulletin, vol. 6, no. 6 (1974). Public domain. Image: Wikimedia Commons.

वॉलेस क्रीक, कैलिफ़ोर्निया: यह नाला सैन एंड्रियास भ्रंश (San Andreas Fault) को पार करता है, और जहाँ भ्रंश से मिलता है वहाँ अचानक मुड़ जाता है। भ्रंश के दोनों ओर की ज़मीन बग़ल-बग़ल खिसकती रही, और नाले का अगला हिस्सा भी उसके साथ खिसक गया। लगभग 3,700 साल में यह खिसकाव क़रीब 130 मीटर हो चुका है, एक भूकंप में नहीं, कई भूकंपों में।
USGS. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

अलास्का, 1964: 1964 के अलास्का भूकंप में प्रिंस विलियम साउंड का तट ऊपर उठ गया। चट्टान का एक समतल चबूतरा, जो पहले समुद्र के नीचे था, अब पानी से ऊपर निकल आया है।
USGS. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
कितना गहरा?
उद्गम केंद्र 70 किलोमीटर से कम गहरा हो तो भूकंप उथला (Shallow) कहलाता है, 70 से 300 किलोमीटर पर मध्यम गहराई वाला, और 300 से लगभग 700 किलोमीटर तक गहरा (Deep)। उथले भूकंप सतह के पास होते हैं, इसलिए उतनी ही भूकंपीय तीव्रता वाले गहरे भूकंप से ज़्यादा नुक़सान करते हैं।
एक भूकंप, कई झटके
बड़े भूकंप के बाद आसपास की चट्टानें फिर से जमती हैं, और दिनों, हफ़्तों, कभी-कभी महीनों तक छोटे झटके आते रहते हैं। इन्हें पश्चात्-आघात (Aftershock) कहते हैं। कभी-कभी बड़े भूकंप से पहले भी छोटे झटके आते हैं, पर उस समय कोई नहीं बता सकता कि बड़ा आने वाला है।
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1अधिकेंद्र (Epicentre) क्या है?
भीतर की जगह उद्गम केंद्र (Focus) है। अधिकेंद्र उसके ठीक ऊपर सतह पर होता है।
2हिमालय में किस तरह के भ्रंश ज़्यादा मिलते हैं?
टक्कर में चट्टानों पर दबाव (Compression) पड़ता है, और ऊपर वाला खंड भ्रंश तल पर ऊपर चढ़ता है।
3एक ही भूकंपीय तीव्रता वाले दो भूकंपों में सतह पर ज़्यादा नुक़सान किससे होगा?
उथला भूकंप सतह के पास होता है। गहरे भूकंप की तरंगें सतह तक आते-आते कमज़ोर पड़ जाती हैं।
4भूकंपीय तरंगें
भूकंप की ऊर्जा तरंगों के रूप में फैलती है, जैसे तालाब में पत्थर फेंकने पर लहरें। ये भूकंपीय तरंगें (Seismic waves) दो तरह की हैं। कुछ धरती के भीतर से होकर चलती हैं, ये भूगर्भिक तरंगें (Body waves) हैं: P और S। और कुछ सिर्फ़ सतह पर चलती हैं, ये धरातलीय तरंगें (Surface waves) हैं।
P तरंग, यानी प्राथमिक तरंग (Primary wave), सबसे तेज़ है और सबसे पहले पहुँचती है। यह चट्टान को आगे-पीछे दबाती और खींचती चलती है, जैसे स्प्रिंग में दबाव की लहर। यह ठोस, तरल और गैस, तीनों में चल सकती है। S तरंग, यानी द्वितीयक तरंग (Secondary wave), उसके बाद आती है। यह चट्टान को ऊपर-नीचे या दाएँ-बाएँ हिलाती है, जैसे रस्सी को झटका देने पर लहर। यह सिर्फ़ ठोस में चलती है। धरातलीय तरंगें सबसे धीमी हैं, पर ज़मीन को सबसे ज़्यादा हिलाती हैं, इसलिए सबसे ज़्यादा नुक़सान इन्हीं से होता है।
P पहले, S बाद में
P तरंग S से लगभग 1.7 गुना तेज़ चलती है। इसलिए भूकंप जितना दूर हो, दोनों के पहुँचने में उतना ज़्यादा अंतर होता है। एक स्टेशन से सिर्फ़ दूरी पता चलती है, दिशा नहीं; इसलिए जगह निकालने के लिए कम से कम तीन स्टेशन चाहिए।
भूकंपलेखी (Seismograph)
ज़मीन के हिलने को दर्ज करने वाली मशीन भूकंपलेखी या भूकंपमापी यंत्र (Seismograph) है, और उसकी बनाई टेढ़ी-मेढ़ी रेखा भूकंपलेख (Seismogram)। पुरानी मशीनों में एक भारी लटकन स्थिर रहती थी और ज़मीन के साथ हिलते काग़ज़ पर कलम लकीर खींचती थी। आज यह काम इलेक्ट्रॉनिक सेंसर करते हैं।
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1किसी स्टेशन पर सबसे पहले कौन-सी तरंग पहुँचती है?
P तरंग सबसे तेज़ है, भूपर्पटी में लगभग 5 से 7 किलोमीटर प्रति सेकंड। इसीलिए उसे प्राथमिक (Primary), यानी पहली, तरंग कहते हैं।
2S तरंग बाह्य क्रोड से होकर क्यों नहीं जाती?
S तरंग चट्टान को आर-पार हिलाती है, और तरल में ऐसी हरकत आगे नहीं बढ़ती।
3किसी स्टेशन पर S−P अंतर 20 सेकंड है। भूकंप लगभग कितनी दूर है?
मोटा नियम: अंतर के हर सेकंड के लिए लगभग 8 किलोमीटर। 20 × 8 = 160 किलोमीटर।
5भूकंप सिम्युलेटर: दो तरह की तीव्रता
भूकंप को दो तरह से मापा जाता है, और दोनों अलग बातें बताते हैं। भूकंपीय तीव्रता (Magnitude) बताती है कि भूकंप ने अपने उद्गम पर कितनी ऊर्जा छोड़ी; इसे परिमाण भी कहते हैं। एक भूकंप की भूकंपीय तीव्रता एक ही होती है, चाहे आप कहीं भी हों। आघात की तीव्रता (Intensity) बताती है कि किसी एक जगह पर ज़मीन कितनी ज़ोर से हिली और वहाँ क्या नुक़सान हुआ। एक ही भूकंप में आघात की तीव्रता अधिकेंद्र के पास ज़्यादा और दूर कम होती है। दोनों नामों में "तीव्रता" है, इसलिए साथ वाला शब्द ध्यान से देखिए। इसे बल्ब से समझिए: बल्ब कितने वाट का है, यह भूकंपीय तीव्रता है; आपकी मेज़ पर कितनी रोशनी पड़ती है, यह आघात की तीव्रता।
भूकंपीय तीव्रता की मापनी सीधी नहीं, लघुगणकीय (Logarithmic) है। एक अंक बढ़ने पर भूकंपलेख पर लहर की ऊँचाई 10 गुना हो जाती है, और छूटी हुई ऊर्जा लगभग 32 गुना। यानी 7 का भूकंप 5 वाले से 100 गुना ऊँची लहर बनाता है, पर लगभग 1,000 गुना ज़्यादा ऊर्जा छोड़ता है। नीचे के सिम्युलेटर में ख़ुद आज़माइए।

वीखर्ट का भूकंपलेखी: जर्मन वैज्ञानिक एमिल वीखर्ट (Emil Wiechert) का डिज़ाइन किया भूकंपलेखी (Seismograph), 1914 की एक किताब के चित्र में। बीच का भारी द्रव्यमान (Mass) अपनी जगह टिका रहना चाहता है, जबकि ढाँचा ज़मीन के साथ हिलता है। दोनों के बीच का अंतर लीवर बड़ा करते हैं और वह काग़ज़ पर लकीर बनकर दर्ज होता है।
Drawing in B. Galitzin, Vorlesungen über Seismometrie (1914). Public domain. Image: Wikimedia Commons.
रिक्टर स्केल का क्या हुआ?
चार्ल्स रिक्टर ने 1935 में कैलिफ़ोर्निया के भूकंपों के लिए भूकंपीय तीव्रता का एक माप बनाया था, स्थानीय परिमाण (Local magnitude, ML)। बहुत बड़े भूकंपों को यह ठीक से नहीं माप पाता। आज वैज्ञानिक आघूर्ण परिमाण (Moment magnitude, Mw) इस्तेमाल करते हैं, जो इस पर टिका है कि भ्रंश कितना बड़ा था और कितना खिसका। मध्यम भूकंपों के लिए दोनों के अंक लगभग बराबर आते हैं, इसलिए समाचार में अब भी "रिक्टर स्केल" सुनाई देता है।
मापनी की कोई ऊपरी हद नहीं
भूकंपीय तीव्रता की मापनी में "10 में से" जैसी कोई तय सीमा नहीं है। पर चट्टानें एक हद से ज़्यादा ज़ोर नहीं सह पातीं, और भ्रंश अनगिनत लंबे नहीं होते, इसलिए बहुत बड़े भूकंप बहुत कम आते हैं। अब तक दर्ज सबसे बड़ा भूकंप 22 मई 1960 को चिली में आया था, भूकंपीय तीव्रता 9.5।
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1भूकंपीय तीव्रता एक अंक बढ़ने पर (जैसे 6 से 7) छूटी ऊर्जा लगभग कितनी गुना हो जाती है?
भूकंपलेख पर लहर 10 गुना ऊँची होती है, पर ऊर्जा लगभग 32 गुना। दो अंक बढ़ें तो ऊर्जा लगभग 1,000 गुना।
2भूकंपीय तीव्रता (Magnitude) और आघात की तीव्रता (Intensity) में क्या फ़र्क़ है?
बल्ब कितने वाट का है, यह भूकंपीय तीव्रता है; आपकी मेज़ पर कितनी रोशनी पड़ती है, यह आघात की तीव्रता।
3एक ही भूकंप में आपके यहाँ ज़मीन सबसे ज़्यादा कब हिलेगी?
दूरी के साथ कंपन घटता है, और नरम मिट्टी कंपन को बढ़ा देती है।
6भारत में भूकंप
भारत की प्लेट उत्तर में यूरेशियाई प्लेट से टकरा रही है, इसलिए हिमालय की पूरी पट्टी, कश्मीर से पूर्वोत्तर तक, देश का सबसे ज़्यादा भूकंप वाला इलाक़ा है। पर ख़तरा सिर्फ़ वहीं नहीं: गुजरात का कच्छ, अंडमान-निकोबार के द्वीप और प्लेट के भीतर की पुरानी दरारें भी बड़े भूकंप दे चुकी हैं।
भारतीय मानक ब्यूरो (Bureau of Indian Standards, BIS) ने देश को चार भूकंपीय क्षेत्रों (Seismic zones) में बाँटा है, जिन्हें ज़ोन II, III, IV और V कहते हैं। ज़ोन V में सबसे ज़्यादा ख़तरा है और ज़ोन II में सबसे कम। यह नक़्शा भवन-निर्माण के नियम IS 1893 (भाग 1) में है, और आज भी इसका 2016 वाला रूप लागू है। ज़ोन यह नहीं बताता कि वहाँ भूकंप कब आएगा; वह बताता है कि वहाँ मकान कितने मज़बूत बनाने चाहिए।
| ज़ोन | ख़तरा | आघात की संभावित तीव्रता (MSK) | कहाँ, कुछ उदाहरण |
|---|---|---|---|
| V | बहुत ऊँचा | IX या ज़्यादा | ज़्यादातर पूर्वोत्तर, गुजरात का कच्छ, अंडमान-निकोबार, और हिमालय के कुछ हिस्से |
| IV | ऊँचा | VIII | दिल्ली, और हिमालय के बाक़ी ज़्यादातर इलाक़े |
| III | मध्यम | VII | मुंबई, चेन्नई और कोलकाता समेत देश का बड़ा हिस्सा |
| II | कम | VI या कम | दक्षिण के पठार के कई हिस्से, जैसे बेंगलुरु और हैदराबाद |
हर राज्य के ज़िलों का ज़ोन BMTPC के नक़्शों में देखिए
भारत और पड़ोस के बड़े भूकंप
| साल | कहाँ | तीव्रता (Mw) | क्या याद रखें |
|---|---|---|---|
| 1897 | शिलांग (मेघालय) | 8.1 | 12 जून। भूवैज्ञानिक आर. डी. ओल्डहैम ने इसकी जाँच की: ज़मीन में लंबी दरारें खुलीं, और एक भ्रंश ने नदी के तल को काट दिया। |
| 1905 | कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) | 7.9 | 4 अप्रैल। धर्मशाला और कांगड़ा घाटी में भारी तबाही हुई। |
| 1934 | बिहार-नेपाल | 8.0 | 15 जनवरी। उत्तर बिहार में गीली रेतीली ज़मीन पानी जैसी बहने लगी, और मकान उसमें धँस गए। यह मृदा द्रवण (Soil liquefaction) था। |
| 1950 | असम-तिब्बत | 8.6 | 15 अगस्त। अधिकेंद्र तिब्बत में, असम और अरुणाचल में भारी नुक़सान। ज़मीन पर आए सबसे बड़े दर्ज भूकंपों में से एक। |
| 1967 | कोयना (महाराष्ट्र) | 6.5 | 11 दिसंबर। कोयना बाँध के पास; बहुत से वैज्ञानिक इसे बाँध जनित भूकंप (Reservoir-induced earthquake) मानते हैं, यानी जलाशय के पानी ने इसे उकसाया। |
| 1993 | लातूर (महाराष्ट्र) | 6.2 | 30 सितंबर, भोर से पहले। उस इलाक़े को कम ख़तरे वाला माना जाता था; इसके बाद ज़ोन का नक़्शा बदला गया। |
| 2001 | भुज (गुजरात) | 7.7 | 26 जनवरी, गणतंत्र दिवस, सुबह 8:46 बजे; गहराई लगभग 16 किलोमीटर। |
| 2004 | सुमात्रा (इंडोनेशिया) | 9.1 | 26 दिसंबर, सुबह 6:28 बजे (भारतीय समय)। इसकी सुनामी भारत के पूर्वी तट और अंडमान-निकोबार तक पहुँची। |
| 2005 | कश्मीर | 7.6 | 8 अक्टूबर। अधिकेंद्र मुज़फ़्फ़राबाद के पास। |
| 2015 | गोरखा (नेपाल) | 7.8 | 25 अप्रैल। उत्तर भारत में दूर-दूर तक महसूस हुआ। |
| 2025 | म्यांमार | 7.7 | 28 मार्च। सागाइंग भ्रंश (Sagaing fault) पर, जो एक पार्श्व-सर्पी भ्रंश है। |
भूकंपीय तीव्रता आघूर्ण परिमाण (Mw) की मापनी पर है; तारीख़ें भूकंप वाली जगह के हिसाब से।

रोवमारी, 1897: 1897 के शिलांग भूकंप के बाद रोवमारी में ज़मीन फटकर लंबी दरार (Fissure) बन गई। यह तस्वीर इस भूकंप पर आर. डी. ओल्डहैम की 1899 की रिपोर्ट से है।
Photo T. D. La Touche; R. D. Oldham (1899), Memoirs of the Geological Survey of India, vol. 29, plate X. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

रोवमारी, 1897: रेत का मुँह (Sand vent)। झटकों से ज़मीन के नीचे की गीली रेत पानी की तरह बहने लगी, इसे मृदा द्रवण (Soil liquefaction) कहते हैं, और वह पानी के साथ ऊपर फूट आई। बीच में उथला गड्ढा है और उसके चारों ओर रेत की नीची मेड़ों के घेरे।
Photo T. D. La Touche; R. D. Oldham (1899), Memoirs of the Geological Survey of India, vol. 29, plate XI. Public domain. Image: Wikimedia Commons.

चेडरांग नदी, 1897: 1897 के भूकंप में चेडरांग भ्रंश (Fault) पर ज़मीन खिसकी और भ्रंश ने चेडरांग नदी की तली को काट दिया। बड़े भूकंप में भ्रंश धरती की सतह तक आ सकता है।
R. D. Oldham (1899), Memoirs of the Geological Survey of India, vol. 29, plate XV. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
भारत से निकली एक खोज
आर. डी. ओल्डहैम भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (Geological Survey of India) में काम करते थे। 1897 के शिलांग भूकंप के भूकंपलेखों को पढ़कर उन्होंने 1900 में दिखाया कि भूकंप की तरंगें तीन तरह की होती हैं, जिन्हें आज हम P, S और धरातलीय तरंगें कहते हैं। 1906 में उन्होंने इन्हीं तरंगों से बताया कि पृथ्वी के बीच में एक क्रोड है।
भूकंप पर नज़र कौन रखता है?
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (National Centre for Seismology, NCS) देश भर में 170 भूकंप-वेधशालाएँ चलाता है। कहीं भूकंप आए, तो उसकी जगह, गहराई और भूकंपीय तीव्रता निकालकर NCS की वेबसाइट और BhooKamp मोबाइल ऐप पर डाल दिए जाते हैं, और राज्यों के आपदा केंद्रों को भेजे जाते हैं।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1भारत में भूकंप का सबसे ज़्यादा ख़तरा किस ज़ोन में है?
ज़ोन V में सबसे तेज़ कंपन की आशंका है, जैसे पूर्वोत्तर, कच्छ और अंडमान-निकोबार। ज़ोन II में सबसे कम।
2भुज (गुजरात) का बड़ा भूकंप किस दिन आया था?
गणतंत्र दिवस की सुबह, भूकंपीय तीव्रता 7.7। 26 दिसंबर 2004 सुमात्रा भूकंप और सुनामी का दिन है, और 15 अगस्त 1950 असम-तिब्बत भूकंप का।
3भारत में भूकंपों पर नज़र रखने वाली राष्ट्रीय संस्था कौन-सी है?
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का NCS देश भर की भूकंप-वेधशालाएँ चलाता है और हर भूकंप की जानकारी जारी करता है।
7राजस्थान और भूकंप
राजस्थान भारतीय प्लेट के पुराने, जमे हुए हिस्से पर है। अरावली दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमालाओं में गिनी जाती है। इसलिए यहाँ बड़े भूकंप हिमालय या कच्छ से बहुत कम आते हैं, और राज्य का कोई इलाक़ा ज़ोन V में नहीं है।
पर "कम" का मतलब "कभी नहीं" नहीं है। गुजरात से लगा दक्षिण-पश्चिमी कोना और अलवर की ओर के कुछ हिस्से ज़ोन IV में हैं। पड़ोस में कच्छ (ज़ोन V) है, और हिमालय के बड़े भूकंप दूर तक हिलाते हैं। एक बात और: राजस्थान के बहुत से पुराने मकान पत्थर की दीवारों पर पत्थर की भारी पट्टियाँ रखकर बने हैं। ऐसी छत ज़ोर से हिले, तो पट्टियाँ सरककर गिर सकती हैं। ज़्यादातर लोगों की जान भूकंप नहीं, गिरती छतें और दीवारें लेती हैं।
| ज़ोन | राजस्थान में कहाँ |
|---|---|
| IV | गुजरात की सीमा से लगा दक्षिण-पश्चिमी कोना (बाड़मेर-जालोर की ओर), और अलवर की ओर के उत्तरी-पूर्वी हिस्से |
| III | पश्चिम और दक्षिण-पश्चिम की एक चौड़ी पट्टी: जैसलमेर, बीकानेर का पश्चिमी हिस्सा, बाड़मेर, जालोर, सिरोही; और उत्तर-पूर्व में अलवर-भरतपुर के कुछ हिस्से |
| II | बाक़ी पूरा राज्य, जिसमें जयपुर, जोधपुर, अजमेर, कोटा और उदयपुर शहर आते हैं |
BMTPC का राजस्थान का भूकंप नक़्शा देखिए
भूकंप-पट्टा (Seismic band)
नया मकान बनवाएँ तो दीवारों पर कंक्रीट और सरिये का एक लगातार पट्टा डलवाइए: खिड़की-दरवाज़ों के ऊपर (लिंटल बैंड) और छत के ठीक नीचे। यह पट्टा सारी दीवारों को एक डिब्बे की तरह बाँध देता है, ताकि हिलने पर वे अलग-अलग न गिरें। ऐसे नियम भारतीय मानक IS 4326 में दिए गए हैं।
पत्थर की पट्टी वाली छत
पुरानी पट्टी वाली छत को पूरा तोड़ना ज़रूरी नहीं। पट्टियों के नीचे के गर्डर या शहतीर दीवारों में ठीक से टिके हों और आपस में बँधे हों, तो छत ज़्यादा सुरक्षित रहती है। काम शुरू करने से पहले किसी इंजीनियर से सलाह लीजिए।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1राजस्थान का कोई भी इलाक़ा किस ज़ोन में नहीं है?
राजस्थान ज़ोन II, III और IV में है। सबसे ज़्यादा ख़तरे वाला ज़ोन V यहाँ नहीं, पर पड़ोस के कच्छ में है।
2नए मकान में भूकंप-पट्टा (Seismic band) क्या करता है?
बिना पट्टे के दीवारें हिलने पर एक-दूसरे से अलग होकर गिर सकती हैं। पट्टा उन्हें साथ रखता है।
3भूकंप से पहले घर में कौन-सा काम सबसे ज़्यादा काम आएगा?
भूकंप में ज़्यादातर चोटें गिरती चीज़ों और टूटते काँच से लगती हैं।
8सुनामी
समुद्र के नीचे बड़ा भूकंप आए और समुद्र का तल अचानक ऊपर उठे या नीचे धँसे, तो ऊपर का सारा पानी भी हिल जाता है। इससे बनने वाली लहरों की लड़ी को सुनामी (Tsunami) कहते हैं; यह जापानी शब्द है, जिसका मतलब है "बंदरगाह की लहर"। ज़्यादातर सुनामी उन सीमाओं पर बनती हैं जहाँ एक प्लेट दूसरी के नीचे धँसती है।
गहरे समुद्र में सुनामी की लहर बस एक-आध मीटर ऊँची होती है, और जहाज़ पर बैठे लोगों को पता भी नहीं चलता। पर वह सैकड़ों किलोमीटर लंबी होती है और हवाई जहाज़ जितनी तेज़ चलती है। जैसे-जैसे तट पास आता है और पानी उथला होता है, लहर धीमी पड़ती है, और पीछे का पानी उस पर चढ़ता जाता है। इसलिए तट पर पहुँचकर वही लहर कई मीटर ऊँची दीवार बन जाती है।
26 दिसंबर 2004
सुमात्रा के पास 9.1 के भूकंप से उठी सुनामी हिंद महासागर के कई देशों तक पहुँची। भारत में अंडमान-निकोबार के द्वीपों के साथ तमिलनाडु, पुदुच्चेरी, आंध्र प्रदेश और केरल के तट पर भारी तबाही हुई।
भारत की सुनामी चेतावनी
हैदराबाद में भारतीय राष्ट्रीय महासागर सूचना सेवा केंद्र (INCOIS) में भारतीय सुनामी पूर्व-चेतावनी केंद्र (Indian Tsunami Early Warning Centre) है। समुद्र में बड़ा भूकंप आते ही यह हिसाब लगाता है कि सुनामी बनेगी या नहीं, और किस तट पर कब पहुँचेगी।
समुद्र पीछे हटे, तो भागिए
सुनामी से पहले कभी-कभी समुद्र तट से अचानक बहुत पीछे हट जाता है। उसे देखने मत जाइए; तुरंत किसी ऊँची जगह पर चले जाइए। सुनामी में एक नहीं, कई लहरें आती हैं, और पहली लहर सबसे बड़ी हो, यह ज़रूरी नहीं। तट पर तेज़ भूकंप महसूस हो, तो चेतावनी का इंतज़ार किए बिना ऊँचाई पर जाइए।
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1सुनामी ज़्यादातर किससे बनती है?
तल हिलता है तो ऊपर का सारा पानी हिल जाता है। आँधी की लहरें सिर्फ़ ऊपर का पानी हिलाती हैं, और चाँद से रोज़ के ज्वार-भाटे आते हैं।
24,000 मीटर गहरे समुद्र में सुनामी लगभग कितनी तेज़ चलती है?
चाल = √(9.8 × 4,000) ≈ 198 मीटर प्रति सेकंड, यानी लगभग 713 किलोमीटर प्रति घंटा: हवाई जहाज़ जितनी।
3तट पर समुद्र अचानक बहुत पीछे हट जाए, तो क्या करें?
यह आती सुनामी का निशान हो सकता है। लहरें कई आती हैं, इसलिए ऊँची जगह पर तब तक रहिए जब तक सरकारी सूचना न आए कि ख़तरा टल गया।
9भूकंप में बचाव
भूकंप को रोका नहीं जा सकता, और उसका दिन-समय पहले से कोई नहीं बता सकता। पर उससे होने वाला ज़्यादातर नुक़सान रोका जा सकता है। सबसे ज़्यादा लोग गिरती दीवारों, छतों, अलमारियों और काँच से घायल होते हैं। इसलिए दो बातें सबसे ज़रूरी हैं: मकान मज़बूत बने हों, और हिलते समय हम जानते हों कि क्या करना है।
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (National Disaster Management Authority, NDMA) की सीधी सलाह है: झुको, ढको, पकड़ो (Drop, cover and hold on)। इसे घर और स्कूल में अभ्यास करके याद कर लीजिए, ताकि घबराहट में भी शरीर अपने-आप सही काम करे।
1 झुको (Drop)
ज़मीन हिलते ही घुटनों के बल नीचे बैठ जाइए। खड़े रहेंगे तो गिर सकते हैं।
2 ढको (Cover)
किसी मज़बूत मेज़ या पलंग के नीचे चले जाइए। ऐसी कोई चीज़ पास न हो, तो भीतर की दीवार के कोने में बैठकर बाँहों से सिर और गर्दन ढक लीजिए। खिड़की, काँच और भारी अलमारियों से दूर रहिए।
3 पकड़ो (Hold on)
मेज़ का पाया पकड़े रहिए, और मेज़ खिसके तो उसके साथ खिसकिए। हिलना पूरी तरह रुकने तक वहीं रहिए। फिर सँभलकर बाहर खुली जगह पर जाइए, लिफ़्ट से नहीं।
क्या भूकंप की भविष्यवाणी हो सकती है?
नहीं। आज दुनिया में कोई भी, न कोई वैज्ञानिक और न कोई संस्था, किसी भूकंप का दिन, समय और जगह पहले से नहीं बता सकता। वैज्ञानिक बस इतना बता पाते हैं कि किसी इलाक़े में आने वाले दशकों में बड़े भूकंप की कितनी आशंका है। "फ़लाँ तारीख़ को भूकंप आएगा" वाले संदेश अफ़वाह होते हैं; उन्हें आगे मत भेजिए।
पूर्व-चेतावनी (Early warning) क्या है?
यह भविष्यवाणी नहीं है: इसमें भूकंप शुरू हो चुका होता है। अधिकेंद्र के पास के सेंसर सबसे पहले पहुँचने वाली P तरंग पकड़ते हैं, और कंप्यूटर तुरंत दूर के इलाक़ों को फ़ोन या सायरन से संदेश भेजता है। रेडियो संदेश तरंगों से कहीं तेज़ चलता है, इसलिए दूर के लोगों को धीमी, ज़्यादा नुक़सान वाली तरंगें पहुँचने से कुछ सेकंड पहले ख़बर मिल जाती है। अधिकेंद्र के ठीक पास के लोगों के लिए समय लगभग नहीं बचता।
दरवाज़े के नीचे खड़े होना?
पहले कहा जाता था कि भूकंप में दरवाज़े की चौखट के नीचे खड़े हो जाइए। चौखट का सहारा तभी लीजिए, जब वह बिल्कुल पास हो और आप पक्का जानते हों कि वह मज़बूत और भार उठाने वाली (Load-bearing) है। ज़्यादातर घरों में यह पता नहीं होता, और झूलता दरवाज़ा चोट भी दे सकता है। इसलिए पास में मज़बूत मेज़ या पलंग हो, तो उसके नीचे जाना बेहतर है।
जानवरों को पहले पता चलता है?
भूकंप से पहले जानवरों के अजीब बर्ताव की बहुत-सी कहानियाँ हैं। कुछ जानवर शायद पहली P तरंग को हमसे पहले महसूस कर लेते हैं, यानी तेज़ झटके से कुछ ही सेकंड पहले। पर अब तक कोई ऐसा तरीक़ा नहीं मिला जिससे जानवरों को देखकर भूकंप का पहले से भरोसेमंद अनुमान लगाया जा सके।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1घर के भीतर ज़मीन हिलने लगे, तो सबसे पहले क्या करें?
हिलते समय भागने में गिरने और गिरती चीज़ों से चोट का ख़तरा सबसे ज़्यादा है।
2भूकंप की पूर्व-चेतावनी (Early warning) कैसे काम करती है?
चेतावनी तभी जाती है जब भूकंप शुरू हो चुका हो। संदेश तरंगों से तेज़ चलता है, इसलिए दूर के लोगों को कुछ सेकंड मिल जाते हैं।
3मलबे में फँस जाएँ, तो क्या करें?
ठक-ठक से बचाने वाले आपको ढूँढ पाते हैं। माचिस से रिसती गैस में आग लग सकती है, और लगातार चिल्लाने से धूल साँस में जाती है।
10अपनी जाँच
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1भूकंपीय तरंगों से बाह्य क्रोड के बारे में क्या पता चला?
S तरंगें बाह्य क्रोड से होकर नहीं जातीं, और S तरंग तरल में नहीं चलती।
2भूकंपीय तीव्रता 5 और 7 वाले भूकंपों की ऊर्जा में लगभग कितना फ़र्क़ है?
हर अंक पर लगभग 32 गुना, तो दो अंकों पर 32 × 32 ≈ 1,000 गुना।
3अधिकेंद्र निकालने के लिए कम से कम कितने स्टेशन चाहिए?
एक स्टेशन से सिर्फ़ दूरी पता चलती है, यानी एक घेरा। तीन घेरे एक ही जगह मिलते हैं।
4भारत के भूकंपीय क्षेत्रों वाला नक़्शा क्या बताता है?
ज़ोन बताता है कि वहाँ कितना तेज़ कंपन हो सकता है, ताकि मकान उसी हिसाब से बनें। भूकंप कब आएगा, यह कोई नहीं बता सकता।
5इनमें से कौन-सी बात सच है?
इसीलिए मज़बूत मकान और झुको, ढको, पकड़ो सबसे बड़े बचाव हैं। 7 के एक भूकंप जितनी ऊर्जा छोड़ने के लिए 5 के लगभग 1,000 भूकंप चाहिए, इसलिए छोटे भूकंप बड़े को नहीं रोकते।
शाबाश! दसों पड़ाव पूरे हुए। अब आप किसी को भी समझा सकते हैं कि भूकंप क्यों आता है, उसे कैसे मापते हैं, भारत और राजस्थान में ख़तरा कहाँ कितना है, और भूकंप आए तो क्या करना है।
शब्दकोश
- भूकंप (Earthquake)
- धरती के भीतर चट्टानों के अचानक खिसकने से ज़मीन का हिलना।
- भूपर्पटी (Crust)
- धरती की सबसे ऊपरी, पतली, ठोस परत, जिस पर हम रहते हैं।
- मैंटल (Mantle)
- भूपर्पटी के नीचे लगभग 2,900 किलोमीटर तक की मोटी, गर्म, ठोस पर धीरे बहने वाली परत।
- क्रोड (Core)
- धरती का सबसे भीतरी हिस्सा, लोहे और निकल का। बाह्य क्रोड तरल है, आंतरिक क्रोड ठोस।
- मोहो असांतत्य (Moho discontinuity)
- भूपर्पटी और मैंटल के बीच की सीमा, जहाँ भूकंपीय तरंगों की चाल अचानक बढ़ जाती है।
- स्थलमंडल (Lithosphere)
- भूपर्पटी और उसके नीचे मैंटल का ठंडा, सख़्त हिस्सा, जो मिलकर प्लेटें बनाते हैं।
- विवर्तनिक प्लेटें (Tectonic plates)
- स्थलमंडल के बड़े-छोटे टुकड़े, जो साल में कुछ सेंटीमीटर खिसकते हैं।
- रिंग ऑफ़ फ़ायर (Ring of Fire)
- आग का घेरा: प्रशांत महासागर के चारों ओर प्लेट-सीमाओं की पट्टी, जहाँ बहुत भूकंप आते हैं और बहुत ज्वालामुखी हैं।
- भ्रंश (Fault)
- चट्टानों की वह दरार जिसके दोनों ओर के खंड एक-दूसरे के मुक़ाबले खिसके हैं।
- उद्गम केंद्र (Focus या Hypocentre)
- धरती के भीतर वह जगह जहाँ से भूकंप में चट्टानों का खिसकना शुरू होता है।
- अधिकेंद्र (Epicentre)
- उद्गम केंद्र के ठीक ऊपर, धरती की सतह पर की जगह।
- प्रत्यास्थ पुनश्चलन (Elastic rebound)
- भ्रंश पर सालों तक ज़ोर जमा होना और फिर चट्टानों का अचानक खिसककर उसे छोड़ देना।
- भूकंपीय तरंगें (Seismic waves)
- भूकंप की ऊर्जा को चारों ओर ले जाने वाली तरंगें: भूगर्भिक तरंगें (P और S) और धरातलीय तरंगें।
- P या प्राथमिक तरंग (Primary wave)
- सबसे तेज़ भूकंपीय तरंग, जो चट्टान को अपनी दिशा में दबाती-खींचती है; ठोस, तरल और गैस तीनों में चलती है।
- S या द्वितीयक तरंग (Secondary wave)
- P के बाद पहुँचने वाली तरंग, जो चट्टान को अपनी दिशा के आर-पार हिलाती है; सिर्फ़ ठोस में चलती है।
- धरातलीय तरंगें (Surface waves)
- सतह पर चलने वाली सबसे धीमी तरंगें, लव और रैले, जो सबसे ज़्यादा नुक़सान करती हैं।
- छाया क्षेत्र (Shadow zone)
- भूकंप से 104° से 140° दूर की पट्टी, जहाँ सीधी P तरंगें दर्ज नहीं होतीं।
- भूकंपलेखी और भूकंपलेख (Seismograph, Seismogram)
- ज़मीन का हिलना दर्ज करने वाली मशीन (इसे भूकंपमापी यंत्र भी कहते हैं), और उसकी खींची लकीर।
- भूकंपीय तीव्रता (Magnitude)
- भूकंप ने अपने उद्गम पर कितनी ऊर्जा छोड़ी, उसका माप; इसे परिमाण भी कहते हैं। एक अंक बढ़ने पर ऊर्जा लगभग 32 गुना।
- आघात की तीव्रता (Intensity)
- किसी एक जगह पर ज़मीन कितनी ज़ोर से हिली और वहाँ क्या असर हुआ, उसका माप। इसकी एक जानी-मानी मापनी इटली के वैज्ञानिक मरकैली (Mercalli) के नाम पर है।
- पश्चात्-आघात (Aftershock)
- बड़े भूकंप के बाद उसी इलाक़े में आने वाले छोटे झटके।
- मृदा द्रवण (Soil liquefaction)
- तेज़ कंपन में पानी से भरी रेतीली ज़मीन का कुछ देर के लिए पानी जैसा बहने लगना।
- भूकंपीय क्षेत्र (Seismic zone)
- भवन-निर्माण के नियमों के लिए देश के इलाक़ों का बँटवारा, इस हिसाब से कि वहाँ कितना तेज़ कंपन हो सकता है।
- भूकंप-पट्टा (Seismic band)
- दीवारों पर कंक्रीट और सरिये का लगातार पट्टा, जो सारी दीवारों को एक साथ बाँधता है।
- सुनामी (Tsunami)
- समुद्र के तल के अचानक हिलने से बनी बहुत लंबी लहरों की लड़ी।
- पूर्व-चेतावनी (Early warning)
- भूकंप शुरू होते ही दूर के इलाक़ों को तेज़ झटका पहुँचने से कुछ सेकंड पहले भेजा गया संदेश।