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कक्षा 12 · इतिहास

विचारक, विश्वास और इमारतें

अध्याय 4

भरत चौधरी और वनिता कुमारी ने बनाया · marushala.com

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अध्याय 4 — विचारक, विश्वास और इमारतें · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 · कक्षा 12

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 82 से 113

यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के बाद एक लिखी हैं, हर एक के नीचे शिक्षक के लिए एक टिप्पणी के साथ। उद्धरण-चिह्न में सिर्फ़ किताब के शब्द हैं; जहाँ “हमारी ओर से” लिखा है, वह बात हमारी अपनी है। प्रोजेक्टर न हो तो यही पाठ पढ़कर, बोर्ड और चार्ट पेपर से कक्षा चल सकती है; हर कालांश का पूरा क्रम पाठ योजना में है।

बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।

कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:

पहले यह पढ़िए — ग्रंथ न बचे, तो?

पृष्ठ 82

?

हमारी ओर से: जिस विचार का अपना कोई ग्रंथ न बचा हो, उसके बारे में हम कैसे जान सकते हैं? यह सवाल पूरे अध्याय में साथ चलेगा।

किताब पृष्ठ 82 पर ही बताती है कि इतिहासकार ग्रंथों के अलावा इमारतों और अभिलेखों जैसे भौतिक साक्ष्य भी इस्तेमाल करते हैं। पहले दिन बच्चे इस सवाल पर अपनी समझ से दो पंक्तियाँ लिखेंगे।

जिस विचार का अपना कोई ग्रंथ न बचा हो, उसके बारे में हम कैसे जान सकते हैं? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।

अध्याय का नक्शा

पृष्ठ 82 से 113 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से

  • पहले साँची का स्तूप: एक इमारत, जो उन्नीसवीं सदी में भी अपनी जगह बची रही
  • फिर विचार: यज्ञ, उपनिषदों के प्रश्न, और उस युग की बहसें
  • फिर दो मार्ग: महावीर और बुद्ध, बुद्ध की शिक्षाएँ और उनके अनुयायी
  • फिर पत्थर: स्तूप कैसे बने, उनकी ‘खोज’, और मूर्तियाँ क्या कहती हैं
  • फिर नयी परंपराएँ: महायान, वैष्णव और शैव, मंदिर और कृत्रिम गुफाएँ
  • आख़िर में किताब का सवाल: क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?

हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वे लौटाई जाएँगी।

1 | शुरुआत: सांस्कृतिक विकास (ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक); 1. साँची की एक झलक

किसी पुरानी इमारत का सबसे सुंदर द्वार कोई विदेशी अपने देश ले जाना चाहे, तो उसे कौन रोक सकता है?

दो तरह के स्रोत

पृष्ठ 82

ग्रंथ

  • बौद्ध ग्रंथ
  • जैन ग्रंथ
  • ब्राह्मण ग्रंथ

भौतिक साक्ष्य

  • इमारतें
  • अभिलेख

किताब के अनुसार इतिहासकार ये दोनों तरह के स्रोत इस्तेमाल करते हैं, और “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।”

शाहजहाँ बेगम का वर्णन

“भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत साँची कनखेड़ा की इमारतें हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 82

भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) ने अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल में साँची का वर्णन किया; 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने इसका अनुवाद किया। बेगम ने वहाँ पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ और एक प्राचीन तोरणद्वार देखा।

साँची अपनी जगह क्यों रहा

पृष्ठ 83

कारणकिताब में
प्रतिकृतियाँफ्रांसीसी, और कुछ समय अंग्रेज़ भी, पूर्वी तोरणद्वार ले जाना चाहते थे, पर दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए
बेगमों का धनशाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया
शायद भाग्य“शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी”

पृष्ठ 84 की चर्चा पूछिए: “शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वर्णन की तुलना चित्र 3 से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?”

नमूना उत्तर — यहाँ चित्र 3 का मतलब इसी अध्याय का चित्र 4.3 है। बेगम का वर्णन और चित्र 4.3 एक ही स्थल के हैं, पर अलग समय के।

  • समानताएँ: दोनों में पहाड़ी, पत्थर का गुंबदनुमा ढाँचा और तोरणद्वार है।
  • असमानताएँ: बेगम उन्नीसवीं सदी का हाल बताती हैं; चित्र 4.3 आज का स्तूप दिखाता है, जिसे किताब भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” कहती है।

2 | 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद (2.1-2.3)

अगर कोई कहे कि हवा का बहना भी एक यज्ञ है, तो यज्ञ का अर्थ क्या रह जाता है?

यज्ञों की परंपरा

पृष्ठ 84

  • ऋग्वेद 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित हुआ: अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुतियाँ
  • शुरू में यज्ञ सामूहिक होते थे
  • बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे
  • राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे, और इनके लिए वे ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर थे

क्रम बच्चों से बनवाइए: सामूहिक यज्ञ, घर के यज्ञ, फिर राजाओं के जटिल यज्ञ।

यज्ञ का नया अर्थ

“निश्चय ही एक यज्ञ है”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 85 (स्रोत 2)

छांदोग्य उपनिषद का यह अंश बहते हुए पवन के बारे में है, जो बहते-बहते सबको पवित्र करता है। किताब के अनुसार उपनिषदों में लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे। पूछिए: यहाँ यज्ञ का अर्थ कैसे बदल गया?

बहस कैसे चलती थी

पृष्ठ 85

क्याकिताब में
कहाँकुटागारशाला, यानी नुकीली छत वाली झोपड़ी, या वे उपवन जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे
कैसेशिक्षक एक-दूसरे से और आम लोगों से तर्क-वितर्क करते थे
नतीजाहारा हुआ प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ जीतने वाले का शिष्य बन जाता
असरकिसी भी संप्रदाय का समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था

यह तालिका चार्ट पेपर पर भी बनाइए; कालांश 10 में यह फिर काम आएगी।

स्रोत 3: दो उपदेशक

पृष्ठ 87

मक्खलि गोसाल (आजीविक)

  • “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।”
  • इन्हें अक्सर नियतिवादी कहा जाता है

अजीत केसकंबलिन् (लोकायत)

  • “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।”
  • “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”
  • इन्हें सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है

सुत्त पिटक के इस दृष्टांत में मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल की बातें बताते हैं, और उसी स्रोत में अजीत केसकंबलिन् का उपदेश भी है। इन दोनों परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं; उनके बारे में हमें दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से ही पता चलता है।

बौद्ध ग्रंथ कैसे बने

पृष्ठ 86

बातकिताब में
जीवन काल मेंबुद्ध का कोई भी संभाषण उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया
मृत्यु के बादपाँचवीं-चौथी सदी ई.पू. में वेसली की सभा में शिक्षाओं का संकलन हुआ
नामये संग्रह त्रिपिटक कहलाए, यानी “तीन टोकरियाँ”

पृष्ठ 87 की चर्चा पूछिए, अपने शब्दों में: जब लिखित सामग्री न हो या बच न पाई हो, तब विचारों और मान्यताओं का इतिहास फिर से बनाने में क्या समस्याएँ आती हैं?

नमूना उत्तर — कई समस्याएँ आती हैं।

  • दूसरों के ग्रंथों पर निर्भरता: आजीविक और लोकायत परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके विचार दूसरी परंपराओं से मिलते हैं, जो उन्हें अधूरा या अपने ढंग से बता सकती हैं।
  • देर से लिखा जाना: बुद्ध की शिक्षाएँ उनके जीवन काल में लिखी नहीं गईं; उनका संकलन बाद में हुआ।

3 | 3. लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश; 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज

अगर पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाए, तो रोज़ के जीवन में क्या-क्या बदल जाएगा?

महावीर का संदेश

पृष्ठ 88

  • जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे
  • जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है: “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।”
  • सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”; पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है
  • जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है

स्रोत 4 (उत्तराध्ययन सूत्र) में महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझा रही हैं। बच्चे उनके तर्क गिनें, फिर पृष्ठ 88 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तर्क आपको सबसे ज़्यादा युक्तियुक्त लगता है?”

नमूना उत्तर — कोई भी तर्क चुना जा सकता है; अंक इस बात के हैं कि चुनाव का कारण लिखा गया हो।

जैन धर्म का विस्तार

पृष्ठ 89

  • जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी कई भाषाओं में बहुत साहित्य रचा
  • इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सैकड़ों वर्षों से सुरक्षित हैं
  • धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थंकरों के उपासकों की बनवाई मूर्तियाँ हैं

पृष्ठ 89 की चर्चा पूछिए, जैसी छपी है: “क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?”

नमूना उत्तर — हाँ, और आज भी है।

  • किताब की बात: जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है।
  • बीसवीं सदी और आज (हमारी ओर से): झगड़े बातचीत से सुलझाना, किसी को चोट पहुँचाए बिना अपनी बात रखना, और जानवरों, पेड़-पौधों और पानी को बिना कारण नुकसान न पहुँचाना, ये सब अहिंसा के ही रूप हैं।

सिद्धार्थ बुद्ध कैसे बने

पृष्ठ 89–90

चरणकिताब में
बचपनशाक्य कबीले के सरदार के बेटे, महल के अंदर, जीवन के कटु यथार्थों से दूर
चार दृश्यरथकार के साथ शहर घूमते हुए वृद्ध, बीमार, लाश और संन्यासी को देखा
साधनामहल छोड़कर कई मार्ग आज़माए; शरीर को कष्ट देते-देते मरते-मरते बचे
ज्ञानअतिवादी तरीके छोड़कर कई दिन ध्यान किया; तब से बुद्ध, यानी ज्ञानी व्यक्ति

यह जानकारी चरित लेखन से आती है, और इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए। सैकड़ों वर्षों में बुद्ध के संदेश पूरे उपमहाद्वीप में, फिर मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।

4 | 5. बुद्ध की शिक्षाएँ; 6. बुद्ध के अनुयायी

जिस संघ में आते ही हर किसी को अपनी पुरानी पहचान छोड़नी पड़े, वहाँ कौन आना चाहेगा, और क्यों?

बुद्ध की शिक्षाएँ

पृष्ठ 91

  • शिक्षाएँ सुत्त पिटक की कहानियों से फिर से जोड़ी गई हैं
  • विश्व अनित्य है, और आत्माविहीन है, क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं
  • दुख इस संसार के मानव जीवन का अंतर्निहित तत्व है
  • मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ति पा सकता है

शोकमग्न माँ की कहानी सुनाइए: बुद्ध ने बच्चे को जीवित करने के बजाय उसे मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई।

सिगल को सलाह

पृष्ठ 91–92 (स्रोत 5)

  • बुद्ध ने सिगल नाम के एक धनी गृहपति को सलाह दी कि मालिक नौकरों और कर्मचारियों की देखभाल कैसे करे
  • सिगल को माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए

किनारे का प्रश्न पूछिए: “आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे।”

नमूना उत्तर — नीचे के सुझाव हमारी ओर से हैं, स्रोत 5 के ढंग पर।

  • माता-पिता के लिए: उनकी सेवा करना, उनका कहा काम पूरा करना, कुल की परंपरा बनाए रखना।
  • शिक्षकों के लिए: उनका आदर करना, उनके पास जाकर सीखना, सीखी बात ध्यान से याद रखना।
  • पत्नी के लिए: उसका सम्मान करना, उस पर भरोसा रखना, घर की ज़िम्मेदारी में उसे हिस्सा देना।

संघ

पृष्ठ 92–93

बातकिताब में
भिक्खु क्योंश्रमण दान पर निर्भर थे, इसलिए भिक्खु कहलाए
महिलाएँशुरू में सिर्फ़ पुरुष; बौद्ध ग्रंथों के अनुसार आनंद के समझाने पर महिलाएँ भी; महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं
कौन आएराजा, धनवान और गृहपति; कर्मकार, दास और शिल्पी
नियमसंघ में आने पर पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी, और सब बराबर माने जाते थे; बातचीत से एकमत की कोशिश, न हो तो मतदान

पृष्ठ 93 का स्रोत 6 (थेरीगाथा) पढ़वाइए: दासी पुन्ना और स्नान करने वाला ब्राह्मण। फिर किनारे का प्रश्न: “बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं?”

नमूना उत्तर — दो शिक्षाएँ साफ़ दिखती हैं।

  • कर्म ही मायने रखते हैं: पानी में नहाने से बुरा करने वाला मुक्त नहीं होता; पुन्ना कहती है कि वे कर्म ही मत कीजिए जिनका डर पानी की ओर खींचता है।
  • तर्क से समझाना: “सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे” वाला उत्तर अनुष्ठान को तर्क से परखता है, जैसे बुद्ध विवेक और तर्क से समझाते थे।

5 | 7. स्तूप (7.1-7.3), मानचित्र 1

मिट्टी और पत्थर का एक टीला किसी धर्म का प्रतीक कैसे बन सकता है?

पवित्र स्थल और चैत्य

पृष्ठ 95

  • बहुत प्राचीन काल से लोग ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानों या प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों को पवित्र मानते थे
  • इनमें से कुछ पर एक छोटी वेदी होती थी, जिसे कभी-कभी चैत्य कहा जाता था
  • शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रखे जाते थे, और ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए

मानचित्र 1 पर बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहें बच्चों से ढूँढ़वाइए: लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर।

स्तूप क्यों बनाए जाते थे

पृष्ठ 95

बातकिताब में
अवशेषबुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया सामान, जहाँ गाड़े गए, वे टीले स्तूप कहलाए
प्रतीकपवित्र अवशेषों के कारण पूरा स्तूप बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया
असोकअशोकावदान के अनुसार असोक ने अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया
कब तकईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बन चुके थे

स्तूप के लिए दान

पृष्ठ 96

किसनेकिताब में
राजासातवाहन वंश जैसे राजा
श्रेणियाँशिल्पकार और व्यापारी; साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत के शिल्पकारों के दान से बना
आम लोगसैकड़ों महिलाएँ और पुरुष, जिनके अभिलेखों में गाँव, पेशे और रिश्तेदारों के नाम भी हैं
संघभिक्खु और भिक्खुनियाँ

यह जानकारी स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से आती है, और “ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं।”

स्तूप की संरचना

पृष्ठ 96–97

हिस्साकिताब में
अंडअर्ध गोलाकार मिट्टी का टीला
हर्मिकाअंड के ऊपर छज्जे जैसा ढाँचा, देवताओं के घर का प्रतीक
यष्टि और छत्रीहर्मिका से निकलने वाला मस्तूल, जिस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी
वेदिकाटीले के चारों ओर, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी
तोरणद्वारचारों दिशाओं में; उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे

परिक्रमा के बारे में किताब कहती है: “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों।” फिर पृष्ठ 97 का प्रश्न अपने शब्दों में पूछिए: चित्र 4.10 के मापचित्र और छायाचित्र में क्या एक-सा है, और क्या अलग?

नमूना उत्तर — दोनों एक ही इमारत के हैं, पर अलग ढंग से।

  • समानताएँ: दोनों साँची का महास्तूप दिखाते हैं: टीला, उसके चारों ओर का घेरा और तोरणद्वार।
  • फ़र्क: मापचित्र इमारत की योजना है, जिसमें पूरा घेरा और चारों दिशाओं के द्वार एक साथ दिखते हैं; छायाचित्र एक जगह से खींचा गया असली रूप है, जिसमें ऊँचाई, पत्थर और नक्काशी दिखती है, पर पीछे का हिस्सा छिप जाता है।

6 | 8. स्तूपों की ‘खोज’: अमरावती और साँची की नियति; कालरेखा 2

किसी पुरानी मूर्ति की सही जगह कौन-सी है: संग्रहालय, या वही जगह जहाँ वह मिली थी?

अमरावती के पत्थर कहाँ गए

पृष्ठ 98

कबकिताब में
1796मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले, और उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया
कुछ वर्षों बादअंग्रेज़ अधिकारी कॉलिन मेकेंज़ी ने कई मूर्तियों का चित्रांकन किया, पर उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं
1854गुंटूर के कमिश्नर कई मूर्तियाँ मद्रास ले गए; ये एलियट संगमरमर कहलाते हैं
1850 के दशकपत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक पहुँचे, और कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बागों में भी

पहले बोर्ड पर लिखिए: हर स्तूप के दो इतिहास हैं, एक यह कि वह कैसे बना, और दूसरा यह कि उसकी खोज कैसे हुई।

एच.एच. कोल की आवाज़

“इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 98

पूछिए कि कोल क्या चाहते थे। (संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ, और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें।)

साँची और अमरावती

पृष्ठ 99

साँची

  • 1818 में जब इसकी खोज हुई, तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे
  • चौथा वहीं गिरा हुआ था, और टीला अच्छी हालत में था
  • आज भी बना हुआ है

अमरावती

  • पत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक बिखर गए
  • “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।”

पृष्ठ 99 की चर्चा पूछिए: “खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया।” (खंड एक यानी किताब का भाग 1, “साँची की एक झलक”, पृष्ठ 82–83।)

नमूना उत्तर — भाग 1 और भाग 8 मिलाकर ये कारण बनते हैं।

  • प्रतिकृतियाँ: फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
  • बेगमों का अनुदान: शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया; सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए, और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए भी अनुदान दिया।
  • शायद भाग्य: किताब के शब्दों में, “शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।”

कालरेखा 2: साँची और संग्रहालय

पृष्ठ 110

कबकिताब में
1814इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता
1851गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास
1854अलेक्जैंडर कनिंघम की भिलसा टोप्स
1914मार्शल और फूसे की मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची
1955राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव
1989साँची विश्व कला दाय स्थान घोषित

बच्चे दो सूचियाँ बनाएँ: जिन पंक्तियों में साँची का नाम है, और जिनमें किसी संग्रहालय का।

7 | 9. मूर्तिकला (9.1-9.3, अतीत से प्राप्त चित्र)

एक ही तस्वीर को दो लोग अलग-अलग कहानी बताएँ, तो आप कैसे तय करेंगे कि किसकी बात के पीछे प्रमाण है?

पत्थर में कथाएँ

पृष्ठ 99

  • घुमक्कड़ कथावाचक कपड़े या कागज़ पर बने चारणचित्र दिखाते हुए कहानी कहते हैं
  • साँची की मूर्तियाँ भी पत्थर में कहानियाँ कहती हैं
  • चित्र 4.13 पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है
  • कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं

बच्चे पहले अपनी किताब में चित्र 4.13 देखें और बताएँ कि उन्हें क्या दिखता है; फिर जातक वाली बात बताइए।

उपासना के प्रतीक

पृष्ठ 100

  • कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई
  • चार प्रतीक: रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र और पेड़
  • किताब की चेतावनी: “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।”

बच्चे पृष्ठ 100 से हर प्रतीक के आगे लिखें कि वह किस बात का प्रतीक है।

लोक परंपराएँ

पृष्ठ 101–103

मूर्तिकिताब में
शालभंजिका (चित्र 4.17)संस्कृत में वर्णित; लोक परंपरा में माना जाता था कि इसके छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल लगने लगते थे
जानवरजैसे हाथी, जो शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे
कमल और हाथियों के बीच महिला (चित्र 4.19)इतिहासकार इसे बुद्ध की माँ माया से, या सौभाग्य की देवी गजलक्ष्मी से जोड़ते हैं, और यह भी कि शायद दोनों अर्थ लिए जाते थे
सर्प (चित्र 4.21)कई स्तंभों पर; ऐसी लोक परंपराओं से लिया लगता है “जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था”

साँची की बहुत-सी मूर्तियाँ शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं। शालभंजिका का अर्थ साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से खुला, पर सर्प जैसे कुछ प्रतीक लोक परंपराओं से आए लगते हैं।

जेम्स फर्गुसन की भूल

पृष्ठ 103

उन्होंने क्या माना

  • साँची वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र था

क्यों

  • वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे
  • तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था

जेम्स फर्गुसन कला पर लिखने वाले शुरुआती आधुनिक इतिहासकारों में से एक थे। सीख: मूर्ति को ग्रंथ से मिलाए बिना पढ़ना कठिन है।

8 | 10. नयी धार्मिक परंपराएँ (10.1-10.3)

किसी मूर्ति को देखकर आप कैसे पहचानेंगे कि वह किसकी है?

महायान: क्या बदला

पृष्ठ 103

प्रारंभिक बौद्ध मत

  • निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास
  • बुद्ध एक मनुष्य, जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान पाया

नयी परंपरा

  • मुक्तिदाता की कल्पना
  • बोधिसत्त: परम करुणामय जीव, जो सत्कार्यों से कमाया पुण्य दूसरों की सहायता में लगाते थे
  • बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा

किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) महायान बौद्ध मत का विकास “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे” रखती है। दोनों बातें किताब की हैं: उत्तर में वही लिखवाइए जो प्रश्न पूछे, पृष्ठ के साथ।

वैष्णव और शैव परंपराएँ

पृष्ठ 104

परंपराकिताब में
वैष्णवविष्णु सबसे महत्वपूर्ण देवता; दस अवतारों की कल्पना
शैवशिव परमेश्वर; उनका प्रतीक लिंग
भक्तिएक विशेष देवता की पूजा, जिसमें भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना गया
पुराणकई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में मिलती हैं; पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे

किताब के अनुसार देवताओं की पहचान उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों और बैठने की शैली से होती है, और इन मूर्तियों का अर्थ समझने के लिए इतिहासकारों को उनकी कहानियाँ जाननी पड़ती हैं।

मंदिर और कृत्रिम गुफाएँ

पृष्ठ 105–107

क्याकिताब में
गर्भगृहशुरू के मंदिर एक चौकोर कमरा, जिसमें एक दरवाज़ा होता था
शिखरधीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर बनाया जाने वाला ऊँचा ढाँचा
बाद मेंविशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण और जल आपूर्ति
कृत्रिम गुफाएँ“सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।”
कैलाशनाथ, एलोराआठवीं सदी का शिव मंदिर, जहाँ पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया

पृष्ठ 106 का प्रश्न पूछिए: “गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।”

नमूना उत्तर — चित्र 4.25 देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का मंदिर है, पाँचवीं सदी का। सामने का दरवाज़ा गर्भगृह का प्रवेशद्वार है, जिससे उपासक मूर्ति तक जाता था; उसके ऊपर का टूटा हुआ ऊँचा भाग शिखर के अवशेष हैं।

9 | 11. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं? (11.1-11.2)

किसी दूसरे देश की कला को अपने देश की कला के पैमाने से नापें, तो क्या छूट सकता है?

अनजाने को समझने की कोशिश

पृष्ठ 108

  • उन्नीसवीं सदी में यूरोप के विद्वानों को कई सिरों और कई हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगती थीं
  • उन्होंने इनकी तुलना प्राचीन यूनान की कला से की
  • यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियाँ ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिली थीं
  • वहाँ ईसा से दो सौ साल पहले भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे

पूछिए: जो पैमाना किसी और जगह की कला से बना हो, उससे यहाँ की मूर्तियाँ नापने में क्या कठिनाई है? यह सवाल हमारी ओर से है।

महाबलीपुरम की चट्टान

पृष्ठ 108–109

पहली व्याख्या

  • गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण की कथा
  • चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है

दूसरी व्याख्या

  • महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या
  • मूर्तियों के बीच एक साधु केंद्र में है

कला इतिहासकारों में इस पर मतभेद है। कक्षा में दोनों व्याख्याएँ उनके प्रमाण के साथ लिखवाइए; किसी को जीतना नहीं है।

अध्याय की अंतिम बात

“एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 109

किताब के अनुसार इस अध्याय के उदाहरण बस इतने ही हैं। रोज़ के और ख़ास अवसरों के बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रों के रूप में स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए।

कालरेखा 1-2; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

अगर कालरेखा की हर तारीख के साथ “लगभग” लिखा हो, तो उससे हमें क्या पता चलता है?

कालरेखा 1

पृष्ठ 110

कबक्या
लगभग 1500-1000 ई. पू.प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ
लगभग 1000-500 ई. पू.उत्तर वैदिक परंपराएँ
लगभग छठी सदी ई. पू.प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म
लगभग तीसरी सदी ई. पू.आरंभिक स्तूप
लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगेमहायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ
लगभग तीसरी सदी ईसवीसबसे पुराने मंदिर

बच्चे हर पंक्ति के आगे वह कालांश लिखें जिसमें उसकी बात आई। “लगभग” कॉपी में भी रहे।

कालरेखा 2

पृष्ठ 110

कबक्या
1814इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता
1834रामराजा की पुस्तक; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की
1835-1842जेम्स फर्गुसन का सर्वेक्षण
1851गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास
1854कनिंघम की भिलसा टोप्स
1878राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक
1880एच.एच. कोल प्राचीन इमारतों के संग्रहाध्यक्ष बने
1888ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट; इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी
1914मार्शल और फूसे की मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची
1923मार्शल की कंजर्वेशन मैनुअल
1955नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी
1989साँची विश्व कला दाय स्थान घोषित

दो अलग 1854 याद रखिए: एलियट संगमरमर का मद्रास जाना (पृष्ठ 98), और कनिंघम की भिलसा टोप्स।

प्रश्न 10: मानचित्र कार्य

पृष्ठ 89, 95 और 113

क्या दिखाइएकैसे
उपमहाद्वीपबुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले; चाहें तो मानचित्र 1 के कुछ स्थल बिंदुओं से
स्थल मार्गमध्य एशिया होते हुए चीन तक ठोस रेखा; चीन, कोरिया और जापान पर निशान
जल मार्गश्रीलंका से समुद्र पार म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक बिंदुदार रेखा
संकेत सूचीठोस रेखा = स्थल मार्ग, बिंदुदार रेखा = जल मार्ग

प्रश्न, जैसा छपा है: “विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइए।” सिर्फ़ वही इलाके और मार्ग, जो किताब बताती है; अपनी ओर से रास्ते मत गढ़िए।

पूरा अध्याय, एक नज़र में

पृष्ठ 82 से 113 · सार हमारी ओर से

कालांशएक पंक्ति में
1दो तरह के स्रोत; साँची और भोपाल की बेगमें
2यज्ञ, उपनिषदों के प्रश्न, और स्रोत 3 की बहस
3महावीर का संदेश; सिद्धार्थ से बुद्ध तक
4बुद्ध की शिक्षाएँ; संघ में सब बराबर
5स्तूप: अवशेष, दान और संरचना
6अमरावती बिखरा, साँची बचा; कालरेखा 2
7मूर्ति पढ़ने के तीन तरीके; फर्गुसन की भूल
8महायान, वैष्णव, शैव; गर्भगृह और शिखर
9एक चट्टान, दो व्याख्याएँ; जो दर्ज़ नहीं हुआ
10कालरेखा 1 और 2; बौद्ध धर्म के प्रसार का मानचित्र
11अभ्यास के 12 प्रश्न

यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।

और अब पहले दिन की पर्चियाँ

पृष्ठ 82, 87

?

हमारी ओर से: पहले दिन आपने लिखा था कि जिस विचार का अपना ग्रंथ न बचा हो, उसे कैसे जानें। अब अध्याय से एक उदाहरण जोड़िए।

लिफ़ाफ़ा खोलिए और हर बच्चे को उसकी पर्ची लौटाइए। अध्याय तीन रास्ते देता है: दूसरी परंपराओं के ग्रंथ, जैसे स्रोत 3; अभिलेख और इमारतें; और मूर्तियाँ। और एक सीमा भी: बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप में दर्ज़ ही नहीं हुए।

मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

इन बारह प्रश्नों में से कौन-सा आपको सबसे कठिन लगता है, और उसका उत्तर अध्याय के किस हिस्से में है?

अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात

पृष्ठ 111–113 · मुख्य बात हमारी ओर से

प्रश्नउत्तर की मुख्य बात
1. उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादीनियतिवादी: कोई कुछ नहीं बदल सकता; भौतिकवादी: मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता; उपनिषद पूछते थे, “क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों से होता है?”
2. जैन धर्म की शिक्षाएँसंपूर्ण विश्व प्राणवान; अहिंसा; पाँच व्रत
3. भोपाल की बेगमेंदोनों बेगमें: रख-रखाव के लिए धन; सुल्तानजहाँ बेगम: संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल के ग्रंथों के प्रकाशन के लिए अनुदान
4. धनवती का अभिलेखतारीख शासक के राज्य वर्ष से; मूर्ति शायद श्रद्धा से (बोधिसत्त की पूजा, पृष्ठ 103); रिश्तेदार: माता-पिता और मौसी बुद्धमिता; ग्रंथ: शायद त्रिपिटक; सीखा भिक्खु बल या मौसी बुद्धमिता से (वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है)
5. स्त्री-पुरुष संघ में क्योंसंघ में सब बराबर (पृष्ठ 92); जन्म नहीं, आचरण (पृष्ठ 94); मुक्ति का रास्ता हर व्यक्ति ख़ुद ढूँढ़े (पृष्ठ 92)
6. साँची की मूर्तिकला और बौद्ध साहित्यबहुत-सी मूर्तियों की कुंजी, पर हर मूर्ति उससे नहीं खुलती
7. चित्र 4.32 और 4.334.32 ग्रामीण परिदृश्य, 4.33 शहरी
8. वैष्णववाद, शैववाद, वास्तुकला और मूर्तिकलाभक्ति और अवतार; देवताओं की मूर्तियाँ; गर्भगृह से शिखर और बड़े मंदिर
9. स्तूप क्यों और कैसेअवशेषों पर बने टीले; दान से बने; अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका, तोरणद्वार
10. मानचित्रसिर्फ़ किताब के बताए इलाके और मार्ग
11. आसपास की परंपरादेखी हुई बातें; इमारत की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से
12. पाँच मूर्तियाँ और चित्रशीर्षक हटाकर दो लोगों के वर्णन, फिर उनकी तुलना

पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं।

अध्याय का बड़ा विचार

“इन रोमांचक विचारों और विश्वासों की दुनिया के पुनर्निर्माण के लिए इतिहासकार जिन स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं उनमें बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के अलावा इमारतों और अभिलेखों जैसे प्रभूत मात्रा में उपलब्ध भौतिक साक्ष्य भी शामिल हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 82

पहले कालांश में किताब ने यही कहा था। पूरे अध्याय में हमने हर विचार को ग्रंथ और भौतिक साक्ष्य, दोनों से पढ़ा।

मरुशाला की कहानी

दो शिक्षक, एक मरुशाला

  • भरत चौधरीभरत चौधरीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. जेठन्तरी · ब्लॉक समदड़ी, जिला बालोतरा
  • वनिता कुमारीवनिता कुमारीव्याख्यातारा.उ.मा.वि. रामसीन मूंगड़ा · ब्लॉक एवं जिला बालोतरा

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