अध्याय 4विचारक, विश्वास और इमारतें

पाठ योजना20 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 82 से 113 · कालांश — 11 (10 पढ़ाने के, 1 मूल्यांकन का), हर एक 40–45 मिनट

इस्तेमाल कैसे करें — हर कालांश की पूरी तैयारी उसके अपने कार्ड में है: किताब के पृष्ठ, स्लाइड, इंटरैक्टिव अध्याय, प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड। पहले एक नज़र में वाला चित्र और तालिका देखिए, फिर आज के कालांश का कार्ड खोलिए। कार्ड के हिस्से और शब्द, जैसे निकास-पर्ची, तैयारी वाली तालिका में समझाए गए हैं।

अध्याय का बड़ा विचार — किताब पृष्ठ 82 पर कहती है: “इन रोमांचक विचारों और विश्वासों की दुनिया के पुनर्निर्माण के लिए इतिहासकार जिन स्रोतों का इस्तेमाल करते हैं उनमें बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के अलावा इमारतों और अभिलेखों जैसे प्रभूत मात्रा में उपलब्ध भौतिक साक्ष्य भी शामिल हैं।” यानी इस अध्याय का हर विचार दो तरह के स्रोतों से पढ़ा जाएगा: ग्रंथ, और इमारतें, मूर्तियाँ और अभिलेख।

हमारी ओर से पूरे अध्याय के लिए एक सवाल: जिस विचार का अपना कोई ग्रंथ न बचा हो, उसके बारे में हम कैसे जान सकते हैं? पहले दिन बच्चे इस पर दो पंक्तियाँ पर्ची पर लिखेंगे और पर्चियाँ आपके पास रहेंगी; कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वही पर्चियाँ लौटाकर परखी जाएँगी।


एक नज़र में — ग्यारह कालांश और उनकी सामग्री

हर तीर पर लिखा है कि अगला कालांश पिछले से क्यों निकलता है।

ग्यारह कालांश, एक कहानी

कालांश 1साँची की एक झलकदो तरह के स्रोत; बेगमें और साँची (पृष्ठ 82–84)
कालांश 2यज्ञ और विवादवैदिक यज्ञ, उपनिषदों के प्रश्न, स्रोत 3 (पृष्ठ 84–87)
कालांश 3महावीर और बुद्धजैन दर्शन, स्रोत 4, सिद्धार्थ से बुद्ध तक (पृष्ठ 88–90)
कालांश 4शिक्षाएँ और संघस्रोत 5, 6 और 7; भिक्खु और भिक्खुनी (पृष्ठ 91–94)
कालांश 5स्तूपक्यों और कैसे बने; संरचना; मानचित्र 1 (पृष्ठ 95–97)
कालांश 6स्तूपों की 'खोज'अमरावती और साँची; कालरेखा 2 (पृष्ठ 98–99, 110)
कालांश 7मूर्तिकलाकथाएँ, प्रतीक और लोक परंपराएँ (पृष्ठ 99–103)
कालांश 8नयी धार्मिक परंपराएँमहायान, वैष्णव, शैव; मंदिर और गुफाएँ (पृष्ठ 103–107)
कालांश 9क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?यूनानी पैमाना; महाबलीपुरम की चट्टान (पृष्ठ 107–109)
कालांश 10कालरेखा और मानचित्रकालरेखा 1 और 2; प्रश्न 10; पहले दिन की पर्चियाँ (पृष्ठ 110, 113)
कालांश 11मूल्यांकनअभ्यास के 12 प्रश्न (पृष्ठ 111–113)
हर कालांश के पृष्ठ, स्लाइड और बाक़ी सामग्री नीचे की तालिका में।

सामग्री के पन्ने: स्लाइड का पाठ · स्लाइड शो · प्रश्न बैंक · फ़्लैशकार्ड · इंटरैक्टिव अध्याय · रिवीजन नोट्स · क्विज़

कालांश और टॉपिकपृष्ठस्लाइडइंटरैक्टिवप्रश्न बैंकफ़्लैशकार्ड
1 शुरुआत; 1. साँची की एक झलक82–84शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1शुरुआत, 1. साँची की एक झलकक1, क2 · ख1 · ग11–15
2 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद84–87भाग 22. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवादक3–क7 · ख2 · ग2, ग3 · घ2, घ4 · च1 · छ116–35, 53–57
3 3. महावीर का संदेश; 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज88–90भाग 33. लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश, 4. बुद्ध और ज्ञान की खोजक9, क10, क11 · ख3 · घ3 · च236–52
4 5. बुद्ध की शिक्षाएँ; 6. बुद्ध के अनुयायी91–94भाग 45. बुद्ध की शिक्षाएँ, 6. बुद्ध के अनुयायीक13 · ख4, ख5 · ग4, ग5 · ङ2, ङ3, ङ4 · छ2, छ458–77
5 7. स्तूप, मानचित्र 195–97भाग 57. स्तूपक8, क15 · ख6 · ग6 · घ1, घ8 · ङ5 · च3 · छ378–92
6 8. स्तूपों की ‘खोज’; कालरेखा 298–99, 110भाग 68. स्तूपों की ‘खोज’क16 · ख8, ख10 · ङ193–108
7 9. मूर्तिकला99–103भाग 79. मूर्तिकलाक17 · ख9 · ग7 · घ7 · च4109–123
8 10. नयी धार्मिक परंपराएँ103–107भाग 810. नयी धार्मिक परंपराएँक14, क18, क19 · ख7 · घ5, घ6 · च5, च6124–135
9 11. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?107–109भाग 911. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?क12, क20 · ग8 · ङ6136–145
10 कालरेखा 1-2; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)110, 113कालरेखा वाला भागसार और काल-रेखानमूना पत्र 1146–149, और 102–108
11 मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न111–113आख़िरी भागहर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्ननमूना पत्र 2 और 3पूरा सेट

प्रश्न बैंक के कोड ऐसे पढ़िए: क1 मतलब खण्ड क (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) का प्रश्न 1। ख रिक्त स्थान है, ग सही/ग़लत, घ अति लघूत्तरीय (2 अंक), ङ लघूत्तरीय (3 अंक), च दीर्घ उत्तरीय (5 अंक) और छ स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक)। फ़्लैशकार्ड के अंक कार्ड के नंबर हैं।

पढ़ाने से पहले

तैयारी — कार्ड में क्या-क्या है और उसे कैसे तैयार करें

हर कालांश का कार्ड इसी क्रम में चलता है। पहली बार पढ़ा रहे हैं तो यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।

हिस्सा या औज़ारयह क्या हैकैसे तैयार करें
किताबकार्ड के सबसे ऊपर लिखे पृष्ठ; बच्चे इन्हीं से पढ़ेंगेपृष्ठ एक दिन पहले पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाले बॉक्स और किनारे के प्रश्न
स्लाइडस्लाइड का पाठ का वह भाग जो इस कालांश का हैस्लाइड शो एक बार चलाकर देखिए; प्रोजेक्टर न हो तो स्लाइड का पाठ ही काफ़ी है
इंटरैक्टिव अध्यायकिताब के हर हिस्से का एक पड़ाव, जिसे बच्चे फ़ोन या कंप्यूटर पर ख़ुद पढ़ सकते हैंकार्ड में दिया पड़ाव खोलकर देखिए कि उसमें क्या है
लक्ष्यकालांश के अंत तक हर बच्चा क्या कर सकेनिकास-पर्ची इसी लक्ष्य को जाँचती है; दोनों साथ पढ़िए
साथ ले जाइएकिताब के अलावा जो चीज़ें कक्षा में चाहिएएक दिन पहले जुटा लीजिए; चार्ट पेपर पर चित्र पहले से बना लीजिए
40 मिनटकालांश के छह चरण, मिनट के हिसाब सेपहला चरण हमेशा पिछली पर्चियाँ है, आख़िरी हमेशा निकास-पर्ची; बीच के चरण किताब के क्रम में
चित्रउस कालांश का एक आरेख, किताब के एक पृष्ठ सेकॉपी में एक बार बना लीजिए, फिर बोर्ड पर बच्चों के जवाबों से बनवाइए
बोर्ड-कार्यकालांश के अंत तक बोर्ड पर बनने वाली तालिका, जिसे बच्चे कॉपी में उतारेंहर पंक्ति के साथ पृष्ठ लिखा है; बच्चे भी पृष्ठ लिखें
यहाँ बच्चे अटकेंगेवे बातें जहाँ बच्चे अक्सर भूल करते हैं, और कमज़ोर और तेज़ विद्यार्थी के लिए एक-एक कामकालांश से पहले पढ़ लीजिए, ताकि भूल होते ही रोक सकें
निकास-पर्चीआख़िरी कुछ मिनट में दो छोटे प्रश्न, जिनके उत्तर बच्चे काग़ज़ की पर्ची पर लिखकर देते हैंनमूना उत्तर कार्ड में हैं; पर्चियाँ अगले कालांश के पहले चरण में काम आती हैं
प्रश्न बैंकगृहकार्य के प्रश्न, कोड सेकोड ऊपर की तालिका के नीचे समझाए गए हैं
फ़्लैशकार्डदोहराने के लिए छोटे कार्ड, नंबर सेबच्चों को बता दीजिए कि आज कौन-से नंबर दोहराने हैं

हर कालांश से पहले:

  1. कार्ड के पृष्ठ किताब में पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाला बॉक्स।
  2. पिछली निकास-पर्चियाँ छाँटिए: कितनों ने सही लिखा, सबसे ज़्यादा कौन-सी भूल हुई।
  3. “चित्र” वाला आरेख कॉपी में एक बार बनाइए।
  4. गृहकार्य के कोड प्रश्न बैंक में खोलकर देख लीजिए कि उत्तर कितने लंबे हैं।

पढ़ाने का क्रम: ग्रंथ और भौतिक साक्ष्य साथ-साथ

किताब साँची के स्तूप से शुरू करती है, यानी एक इमारत से, और फिर उन विचारों तक जाती है जिनसे वह इमारत जुड़ी है: यज्ञ, उपनिषद, महावीर, बुद्ध और संघ। उसके बाद वह फिर इमारतों और पत्थरों पर लौटती है: स्तूप कैसे बने, उनकी ‘खोज’ कैसे हुई, मूर्तियाँ क्या कहती हैं, और मंदिर कैसे बने। आख़िर में वह पूछती है कि क्या हम यह सब पूरा समझ सकते हैं।

यह क्रम इसलिए है कि हर विचार को ग्रंथ और भौतिक साक्ष्य, दोनों से पढ़ा जा सके। कालांश 4 में संघ की बात ग्रंथों से आती है, तो कालांश 5 में दान के अभिलेख बताते हैं कि भिक्खु और भिक्खुनियाँ भी स्तूपों के लिए दान देते थे; कालांश 7 में मूर्तियाँ तभी खुलती हैं जब उन्हें जातक जैसे ग्रंथों से मिलाया जाए। अगर मूर्तियाँ पहले पढ़ा दी जाएँ, तो बच्चे वही भूल करेंगे जो जेम्स फर्गुसन ने की थी। इस क्रम को मत तोड़िए।

सामग्री — यह जुटा लीजिए

#क्याकिस कालांश में
1चार्ट पेपर की कम से कम छह शीट: बहस वाला चित्र, संघ, स्तूप का खाका, अमरावती के पत्थरों का सफ़र, मूर्ति पढ़ने के तीन तरीके, कालरेखा2, 4, 5, 6, 7, 10
2भारत का मानचित्र या एटलस1, 5, 6, 10
3विश्व के रेखांकित मानचित्र, हर विद्यार्थी के लिए एक10
4काग़ज़ की पर्चियाँ, और पहले दिन की पर्चियों के लिए एक लिफ़ाफ़ाहर कालांश; लिफ़ाफ़ा 1 और 10 में
5नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ, या बोर्ड पर लिखे प्रश्न11
6प्रोजेक्टर, हो तोस्लाइड और इंटरैक्टिव अध्याय के लिए; न हो तो चार्ट पेपर और बोर्ड काफ़ी हैं

कक्षा-व्यवस्था

  • जोड़ियाँ स्रोत पढ़ने के कामों के लिए: स्रोत 3 (कालांश 2), स्रोत 5, 6 और 7 (कालांश 4), और दान के अभिलेख (कालांश 5)।
  • दो समूह कालांश 9 में, महाबलीपुरम की चट्टान की दो व्याख्याओं के लिए। कोई समूह जीतता नहीं; दोनों अपना प्रमाण रखते हैं।
  • चार्ट पेपर कक्षा की दीवार पर एक जगह लगाइए। कालांश 10 और 11 में सब फिर काम आएँगे।
  • धर्म की बात इतिहास की तरह: कोई भी बच्चा अपनी आस्था के बारे में बोलने को बाध्य नहीं। हर गतिविधि स्रोतों की तुलना करती है, आस्थाओं की नहीं।
  • बिना प्रोजेक्टर भी हर कालांश चल जाता है: हर कार्ड का चित्र बोर्ड पर बन सकता है, और बच्चे अपनी किताब में चित्र देखते हैं।

अधिगम प्रतिफल

#प्रतिफलकालांशजाँच
1बताता है कि इस अध्याय का इतिहास किन दो तरह के स्रोतों से बनता है, और हर एक का उदाहरण देता है1, 10पहले दिन की पर्ची, और कालांश 10 में उसका नया उत्तर
2वैदिक यज्ञ, उपनिषदों के प्रश्न और स्रोत 3 के नियतिवादी और भौतिकवादी विचारों में फ़र्क बताता है2निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 1
3जैन दर्शन की मुख्य अवधारणा और बुद्ध के ज्ञान तक पहुँचने की घटनाएँ लिखता है, और समझता है कि संतचरित्र की हर बात तथ्य नहीं3निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 2
4स्रोत 5, 6 और 7 से बुद्ध की शिक्षाएँ और संघ के नियम निकालता है4निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 5
5बताता है कि स्तूप क्यों और कैसे बने, दान किसने दिया, और स्तूप के हिस्से कौन-से हैं5निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 9
6अमरावती और साँची की नियति की तुलना करता है, और कालरेखा 2 पढ़ता है6निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 3
7किसी मूर्ति को कथा, प्रतीक या लोक परंपरा से जोड़कर पढ़ता है7निकास-पर्ची; अभ्यास के प्रश्न 6 और 7
8महायान, वैष्णव और शैव परंपराओं, और शुरू के मंदिरों और कृत्रिम गुफाओं की विशेषताएँ बताता है8निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 8
9एक ही मूर्ति की अलग-अलग व्याख्याएँ उनके प्रमाण के साथ लिखता है9निकास-पर्ची
10कालरेखा 1 पढ़ता है और बौद्ध धर्म के प्रसार का मानचित्र किताब के बताए इलाकों से बनाता है10मानचित्र; अभ्यास का प्रश्न 10

कालांश-दर-कालांश

कालांश 1 — शुरुआत: सांस्कृतिक विकास (ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक); 1. साँची की एक झलक

किताब — पृष्ठ 82–83 (चर्चा पृष्ठ 84) · स्लाइड — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 · इंटरैक्टिव — शुरुआत, 1. साँची की एक झलक

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि इस अध्याय का इतिहास किन दो तरह के स्रोतों से बनता है, और उन्नीसवीं सदी में साँची का स्तूप अपनी जगह पर क्यों बचा रहा, इसके भाग 1 में दिए कारण।

साथ ले जाइए — किताब, पहले दिन की पर्ची के लिए काग़ज़ के छोटे टुकड़े और एक लिफ़ाफ़ा, और भारत का दीवार-मानचित्र (भोपाल ढूँढ़ने के लिए)।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पहले दिन की पर्ची। बोर्ड पर अध्याय का नाम और उसका काल लिखिए, जैसा किताब छापती है: “ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक”। फिर ऊपर के बॉक्स वाला पूरे अध्याय का सवाल बोलिए। हर विद्यार्थी पर्ची पर दो पंक्तियाँ और अपना नाम लिखे। पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए; ये कालांश 10 में लौटेंगी।
  2. 5–12 मिनट · दो तरह के स्रोत। पृष्ठ 82 का पहला हिस्सा साथ पढ़िए। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: “ग्रंथ” और “भौतिक साक्ष्य”। बच्चों से भरवाइए: पहले में बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ; दूसरे में इमारतें और अभिलेख। फिर किताब का वाक्य पढ़िए: “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।”
  3. 12–20 मिनट · बेगम का वर्णन। पृष्ठ 82 का बॉक्स एक विद्यार्थी ज़ोर से पढ़े। पूछिए कि बेगम ने वहाँ क्या-क्या देखा। उत्तर बोर्ड पर: पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ और एक प्राचीन तोरणद्वार। साथ में लिखिए: शाहजहाँ बेगम, भोपाल की नवाब (शासनकाल 1868-1901); उनकी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल का अनुवाद 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने किया। मानचित्र पर भोपाल दिखाइए; बेगम के अनुसार साँची कनखेड़ा गाँव भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व में एक पहाड़ी की तलहटी में है।
  4. 20–30 मिनट · साँची अपनी जगह क्यों रहा। पृष्ठ 83 पढ़िए। बच्चे जोड़ियों में भाग 1 के कारण ढूँढ़ें और बोर्ड-कार्य की तालिका भरें: फ्रांसीसी, और कुछ समय अंग्रेज़ भी, पूर्वी तोरणद्वार ले जाना चाहते थे, पर दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए; शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया; और किताब के शब्दों में, “शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।”
  5. 30–36 मिनट · किताब के सवाल और पृष्ठ 84 की चर्चा। नीचे का चित्र बोर्ड पर बनाइए: किताब स्तूप को देखकर जो सवाल पूछती है, और उनके उत्तर जिन चार स्रोतों से मिलते हैं। फिर पृष्ठ 84 की चर्चा पूछिए, जैसी छपी है: “शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वर्णन की तुलना चित्र 3 से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?” नमूना उत्तर — यहाँ चित्र 3 का मतलब इसी अध्याय का चित्र 4.3 है। बेगम का वर्णन और चित्र 4.3 एक ही स्थल के हैं, पर अलग समय के।
    • समानताएँ: दोनों में पहाड़ी, पत्थर का गुंबदनुमा ढाँचा और तोरणद्वार है।
    • असमानताएँ: बेगम उन्नीसवीं सदी का हाल बताती हैं: पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ, एक प्राचीन तोरणद्वार और कनिंघम की खुदाई। चित्र 4.3 आज का स्तूप दिखाता है, जिसे किताब भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” कहती है।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) इस अध्याय का इतिहास किन दो तरह के स्रोतों से बनता है? (2) साँची के अपनी जगह बचे रहने के, भाग 1 में दिए, कोई दो कारण लिखिए।

एक स्तूप, कई सवाल (चरण 5)

एक स्तूप, कई सवाल

सवालटीला क्यों बना, और इसके अंदर क्या था? || [सवाल] चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों है? || [सवाल] इसे किसने बनवाया? || [सवाल] इसकी "खोज" कब हुई?
स्रोतग्रंथ || [स्रोत] मूर्तियाँ || [स्रोत] स्थापत्य कला || [स्रोत] अभिलेख
NCERT, पृष्ठ 84

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
स्रोतबौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ; इमारतें और अभिलेख जैसे भौतिक साक्ष्य82
साँची का स्तूपउस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित82
शाहजहाँ बेगमभोपाल की नवाब (शासनकाल 1868-1901); आत्मकथा में साँची का वर्णन82
पूर्वी तोरणद्वारफ्रांसीसी फ्रांस ले जाना चाहते थे; प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हुए83
बेगमों का अनुदानदोनों बेगमें: रख-रखाव; सुल्तानजहाँ बेगम: संग्रहालय, अतिथिशाला, जॉन मार्शल के ग्रंथों का प्रकाशन83
शायद भाग्यकिसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी83

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • बेगम ने साँची खोजा नहीं। किताब पृष्ठ 99 पर बताती है कि साँची की खोज 1818 में हुई। बेगम का वर्णन उनकी आत्मकथा से है; किताब उनका शासनकाल 1868-1901 बताती है। दोनों बातें बोर्ड पर अलग पंक्तियों में लिखिए।
  • “प्लास्टर प्रतिकृति” नया शब्द है। मतलब: असली पत्थर की जगह प्लास्टर से बनी नक़ल। नक़ल से फ्रांसीसी और अंग्रेज़ संतुष्ट हुए, और असली तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर रहा।
  • “शायद” को मत छोड़िए। रेल ठेकेदार वाली बात किताब पक्के कारण की तरह नहीं, “शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं” कहकर लिखती है। उत्तर में भी “शायद” रहना चाहिए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 1. साँची की एक झलक खोलिए, और बेगम वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: वर्णन किसका है, और किस सदी का?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली दो पंक्तियाँ और भाग 1 के दो कारण काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: बेगम की आत्मकथा ग्रंथ है या भौतिक साक्ष्य? (वह एक लिखित स्रोत है, जो एक भौतिक साक्ष्य, यानी स्तूप, का वर्णन करती है; दोनों साथ पढ़ने पर ज़्यादा बात समझ आती है।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ; और इमारतें और अभिलेख जैसे भौतिक साक्ष्य। (2) फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए; भोपाल की बेगमों ने रख-रखाव के लिए धन दिया; और शायद किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र इस स्तूप पर नहीं पड़ी। इनमें से कोई दो।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1, क2, ख1 और ग1।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 1–15।

कालांश 2 — 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद (2.1-2.3)

किताब — पृष्ठ 84–87 · स्लाइड — भाग 2 · इंटरैक्टिव — 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि जटिल यज्ञ कौन करते थे, उपनिषदों में कौन-से नए प्रश्न उठे, स्रोत 3 के दो शिक्षकों के विचारों में क्या अंतर है, और बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार हुए।

साथ ले जाइए — किताब, और एक चार्ट पेपर जिस पर बहस कैसे चलती थी का चित्र (नीचे) बना हो।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 1 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक पूरी सही, और एक जिसमें “शायद” छूट गया हो। कक्षा से सुधरवाइए।
  2. 5–12 मिनट · यज्ञों की परंपरा (2.1)। पृष्ठ 84 पढ़िए। बोर्ड पर लिखिए: ऋग्वेद 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित हुआ; यह अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुतियों का संग्रह है। फिर बच्चों से क्रम बनवाइए: शुरू में यज्ञ सामूहिक; बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे; राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे, और इनके लिए वे ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर थे। पृष्ठ 84 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए।” नमूना उत्तर — किताब और स्रोत 1 के अनुसार यज्ञ इन बातों के लिए होते थे:
    • आहुति देवताओं तक पहुँचाना;
    • खाद्य पदार्थ और प्रचुर धन पाना;
    • गाय और मवेशी, और वंश आगे बढ़ाने वाले बेटे पाना;
    • स्वास्थ्य और लंबी आयु पाना।
  3. 12–18 मिनट · नए प्रश्न (2.2)। पृष्ठ 84–85 पढ़िए। किताब के अनुसार उपनिषदों में लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे। स्रोत 2 (छांदोग्य उपनिषद) का दूसरा अंश ज़ोर से पढ़वाइए: बहता हुआ पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है”। पूछिए कि यहाँ यज्ञ का अर्थ कैसे बदल गया। (आग और आहुति की जगह वह पवन, जो बहते-बहते सबको पवित्र करता है।)
  4. 18–28 मिनट · वाद-विवाद और स्रोत 3 (2.3)। पृष्ठ 85 पढ़िए और चार्ट पेपर वाला चित्र दिखाइए। फिर पृष्ठ 87 का स्रोत 3 पढ़वाइए: सुत्त पिटक के इस दृष्टांत में मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल की बातें बताते हैं, और उसी स्रोत में अजीत केसकंबलिन् का उपदेश भी है। बोर्ड पर दो खाने बनवाइए और हर खाने में स्रोत के ही शब्द लिखवाइए: गोसाल, “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।”; अजीत, “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।” फिर पृष्ठ 87 का किनारे का प्रश्न: “क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?” नमूना उत्तर — उनकी बातों से ये नाम ठीक लगते हैं, पर एक सावधानी के साथ।
    • गोसाल: सुख-दुख पहले से माप कर दिए गए हैं, यानी सब कुछ पूर्व निर्धारित है; इसलिए नियतिवादी।
    • अजीत: मनुष्य चार तत्वों से बना है और “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”; इसलिए भौतिकवादी।
    • सावधानी: किताब कहती है कि उन्हें “अक्सर” और “सामान्यतः” ये नाम दिए जाते हैं; इन परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं और उनकी बात हमें दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से ही मिलती है।
  5. 28–36 मिनट · बौद्ध ग्रंथ कैसे बने (पृष्ठ 86 का बॉक्स) और पृष्ठ 87 की चर्चा। बॉक्स से तीन बातें बोर्ड पर: बुद्ध का कोई भी संभाषण उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया; उनकी मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) वेसली की सभा में शिक्षाओं का संकलन हुआ; संग्रह त्रिपिटक, यानी “तीन टोकरियाँ” कहलाए। फिर पृष्ठ 87 की चर्चा पूछिए: जब लिखित सामग्री न हो या बच न पाई हो, तब विचारों और मान्यताओं का इतिहास फिर से बनाने में क्या समस्याएँ आती हैं? नमूना उत्तर — कई समस्याएँ आती हैं।
    • आजीविक और लोकायत परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके विचार दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से मिलते हैं, जो उन्हें अधूरा या अपने ढंग से बता सकते हैं।
    • एक ही स्रोत हो, तो उसकी बात को किसी दूसरे स्रोत से मिलाकर परखना कठिन हो जाता है।
    • मूर्तियाँ और इमारतें बिना ग्रंथ के ठीक से समझना कठिन है; यह बात कालांश 7 और 9 में फिर आएगी।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ कौन करते थे, और इनके लिए वे किन पर निर्भर थे? (2) स्रोत 3 के आधार पर नियतिवादी और भौतिकवादी विचार की एक-एक बात लिखिए।

बहस कैसे चलती थी (चरण 4)

बहस कैसे चलती थी

कहाँकुटागारशाला या उपवननुकीली छत वाली झोपड़ी, या वे उपवन जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे
क्या होतातर्क-वितर्कशिक्षक एक-दूसरे से और आम लोगों से बहस करते थे
नतीजाहारने वाला शिष्य बनताहारा हुआ प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता
असरसमर्थन बढ़ता-घटताकिसी भी संप्रदाय का समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था
NCERT, पृष्ठ 85

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

टॉपिकमुख्य बातपृष्ठ
ऋग्वेद1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित; अग्नि, इंद्र, सोम आदि की स्तुतियाँ84
यज्ञ कौन करता थाशुरू में सामूहिक; बाद में कुछ घरों के मालिक; राजसूय और अश्वमेध: सरदार और राजा84
उपनिषदजीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन, पुनर्जन्म पर प्रश्न84–85
वाद-विवादबौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों का उल्लेख; कुटागारशाला85
नियतिवादीआजीविक परंपरा, जैसे मक्खलि गोसाल: सब कुछ पूर्व निर्धारित87
भौतिकवादीलोकायत परंपरा, जैसे अजीत केसकंबलिन्: मनुष्य चार तत्वों से बना87
त्रिपिटकविनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक; पहले मौखिक, बाद में लिखे गए86

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “नियतिवादी” और “भौतिकवादी” उनके अपने चुने नाम नहीं। किताब कहती है कि उन्हें “अक्सर” और “सामान्यतः” ऐसा कहा जाता है। इन परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो चुके हैं।
  • स्रोत 3 किस परंपरा का ग्रंथ है। यह दृष्टांत सुत्त पिटक का है, यानी एक बौद्ध ग्रंथ दूसरे शिक्षकों की बात बता रहा है। बच्चे इसे गोसाल का अपना ग्रंथ समझ लेते हैं।
  • बुद्ध ने त्रिपिटक नहीं लिखा। उनका कोई भी संभाषण उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया; संकलन उनकी मृत्यु के बाद वेसली की सभा में हुआ।
  • “संकलित” और “लिखा” एक नहीं। किताब ऋग्वेद के लिए “संकलित” लिखती है, और बताती है कि स्रोत 1 जैसे छंद पुरोहित परिवारों के लोगों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद खोलिए, और स्रोत 3 के बाद रुककर पूछिए: इस दृष्टांत में गोसाल की बातें बुद्ध को कौन बता रहा है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए यज्ञ कौन करता था, और नियतिवादी और भौतिकवादी के एक-एक वाक्य काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 2 का “निश्चय ही एक यज्ञ है” वाला विचार यज्ञ की पुरानी परंपरा से कैसे अलग है? (पुरानी परंपरा में यज्ञ एक अनुष्ठान था, जिसमें स्तुतियाँ पढ़ी जातीं और मवेशी, बेटे, लंबी आयु माँगी जाती; यहाँ यज्ञ वह है जो सबको पवित्र करे, यानी यज्ञ का अर्थ ही नए ढंग से सोचा जा रहा है।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) सरदार और राजा; वे इनके लिए ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर थे। (2) नियतिवादी (मक्खलि गोसाल): सुख और दुख पहले से माप कर दिए गए हैं, कोई कुछ नहीं बदल सकता। भौतिकवादी (अजीत केसकंबलिन्): मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क3, क4, क5, क6, क7, ख2, ग2, ग3, घ2 और घ4; जो आगे हैं, वे च1 और छ1 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 16–35 और 53–57।

कालांश 3 — 3. लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश; 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज

किताब — पृष्ठ 88–90 · स्लाइड — भाग 3 · इंटरैक्टिव — 3. लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश, 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी जैन दर्शन की मुख्य अवधारणा और पाँच व्रत बता सके, और यह समझा सके कि बुद्ध के जीवन की जानकारी किन ग्रंथों से मिलती है और वे ग्रंथ इतिहासकार के लिए क्यों काम के हैं।

साथ ले जाइए — किताब, और कालांश 2 वाला बहस कैसे चलती थी चार्ट (महावीर और बुद्ध भी उन्हीं घुमक्कड़ शिक्षकों में थे)।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 2 की पर्चियों में सबसे आम भूल बोर्ड पर लिखिए, अक्सर यह कि गोसाल और अजीत के विचार उनके अपने ग्रंथों से पता हैं। कक्षा से सुधरवाइए: उनके ग्रंथ नष्ट हो गए, जानकारी सुत्त पिटक जैसे दूसरे ग्रंथों से है।

  2. 5–14 मिनट · महावीर का संदेश (भाग 3)। पृष्ठ 88 पढ़िए। बोर्ड पर क्रम से लिखवाइए: जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे; जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है, यानी “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।” फिर जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”; इसी से अहिंसा, और कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या। अंत में पाँच व्रत गिनवाइए।

  3. 14–20 मिनट · स्रोत 4: महारानी कमलावती। पृष्ठ 88 का स्रोत 4 (उत्तराध्ययन सूत्र) एक विद्यार्थी पढ़े। महारानी अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझा रही हैं। बोर्ड पर उनके तर्क गिनवाइए, फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तर्क आपको सबसे ज़्यादा युक्तियुक्त लगता है?” नमूना उत्तर — कोई भी तर्क चुना जा सकता है; अंक इस बात के हैं कि चुनाव का कारण लिखा गया हो।

    • पहला तर्क: संपूर्ण विश्व के खज़ाने मिल जाएँ, तब भी संतोष नहीं होगा, और वे बचा भी नहीं पाएँगे।
    • दूसरा तर्क: मृत्यु पर सारा धन पीछे छूट जाएगा; तब सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा।
    • तीसरा तर्क: जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से नफ़रत करती हैं।

    उदाहरण के लिए, कोई दूसरा तर्क चुनकर कह सकता है कि मृत्यु पर धन साथ नहीं जाता, यह बात हर किसी के अनुभव से मेल खाती है।

  4. 20–25 मिनट · जैन धर्म का विस्तार और पृष्ठ 89 की चर्चा। पृष्ठ 89 पढ़िए: जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी कई भाषाओं में बहुत साहित्य रचा; इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सैकड़ों वर्षों से सुरक्षित हैं; और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थंकरों के उपासकों की बनवाई मूर्तियाँ हैं। फिर चर्चा पूछिए, जैसी छपी है: “क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?” नमूना उत्तर — हाँ, और आज भी है।

    • किताब की बात: जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है (पृष्ठ 88)।
    • बीसवीं सदी और आज (हमारी ओर से): झगड़े बातचीत से सुलझाना, किसी को चोट पहुँचाए बिना अपनी बात रखना, और जानवरों, पेड़-पौधों और पानी को बिना कारण नुकसान न पहुँचाना, ये सब अहिंसा के ही रूप हैं, और आज भी काम के हैं।

    उत्तर में अपना एक उदाहरण ज़रूर दीजिए, जैसे स्कूल में किसी झगड़े को बातचीत से सुलझाना।

  5. 25–36 मिनट · बुद्ध और ज्ञान की खोज (भाग 4)। पृष्ठ 89–90 पढ़िए। पहले स्रोत की बात: बुद्ध के जीवन की जानकारी चरित लेखन से मिलती है, और इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए। “संतचरित्र” का अर्थ बोर्ड पर लिखिए (नीचे यहाँ बच्चे अटकेंगे देखिए)। फिर नीचे का चित्र बच्चों के जवाबों से बनाइए। अंत में चित्र 4.7 (अमरावती की लगभग 200 ईसवी की मूर्ति, जिसमें बुद्ध को महल से जाते हुए दिखाया गया है) किताब में दिखाइए और पृष्ठ 90 की चर्चा पूछिए: “यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?” नमूना उत्तर — शायद पूरा नहीं।

    • मूर्ति में आकृतियाँ और कोई दृश्य तो दिखता, पर यह कि यह सिद्धार्थ का महल छोड़ना है, यह बात हम कहानी जानने से ही पहचानते हैं।
    • इसीलिए, जैसा किताब मूर्तिकला वाले भाग में बताती है, इतिहासकार अक्सर किसी मूर्ति की व्याख्या लिखित साक्ष्यों से तुलना करके करते हैं।

    यानी मूर्ति और ग्रंथ, दोनों साथ पढ़ने पर ही पूरी बात समझ आती है।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा क्या है? (2) संतचरित्र में लिखी हर बात तथ्य न हो, फिर भी वह इतिहासकार के काम का क्यों है?

सिद्धार्थ से बुद्ध तक (चरण 5)

सिद्धार्थ से बुद्ध तक

बचपनमहल के अंदरशाक्य कबीले के सरदार के बेटे, जीवन के कटु यथार्थों से दूर
चार दृश्यवृद्ध, बीमार, लाश, संन्यासीशरीर का क्षय और अंत निश्चित; संन्यासी शांत था
साधनाकई मार्ग आज़माएशरीर को कष्ट देते-देते मरते-मरते बचे
ज्ञानकई दिन ध्यान के बादतब से बुद्ध, यानी ज्ञानी व्यक्ति
NCERT, पृष्ठ 89–90

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

टॉपिकमुख्य बातपृष्ठ
तीर्थंकरमहावीर से पहले 23 शिक्षक; जीवन की नदी के पार पहुँचाने वाले88
जैन दर्शनसंपूर्ण विश्व प्राणवान है: पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन88
कर्म और मुक्तिकर्म से जन्म-पुनर्जन्म का चक्र; मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या88
पाँच व्रतहत्या, चोरी, झूठ न करना; ब्रह्मचर्य; धन संग्रह न करना88
जैन धर्म का विस्तारप्राकृत, संस्कृत, तमिल में साहित्य; मंदिरों के पुस्तकालयों में पांडुलिपियाँ89
बुद्ध के जीवन का स्रोतचरित लेखन; कई ग्रंथ लगभग सौ वर्षों बाद लिखे गए89
सिद्धार्थशाक्य कबीले के सरदार के बेटे; चार दृश्य; ज्ञान के बाद बुद्ध89–90

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • महावीर जैन धर्म के पहले शिक्षक नहीं। किताब के अनुसार जैनों के मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले ही प्रचलित थे, और जैन परंपरा उनसे पहले 23 तीर्थंकर मानती है।
  • “प्राणवान” का अर्थ। जैन दर्शन में पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है। अहिंसा इसी विचार से निकलती है, इसलिए दोनों को एक साथ पढ़ाइए।
  • संतचरित्र और इतिहास। संतचरित्र किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी है, जो उनकी उपलब्धियों का गुणगान करती है; वे बातें तथ्य के रूप में पूरी तरह सही नहीं होतीं, पर उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वास बताती हैं। बच्चे या तो हर बात को तथ्य मान लेते हैं, या पूरे ग्रंथ को बेकार।
  • “बुद्ध” नाम नहीं, उपाधि है। बचपन का नाम सिद्धार्थ था; ज्ञान मिलने के बाद वे बुद्ध, यानी ज्ञानी व्यक्ति, कहलाए।
  • कक्षा में अभिनय नहीं। महावीर या बुद्ध की भूमिका किसी विद्यार्थी से मत करवाइए। जो कहना है, स्रोत से पढ़कर कहिए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज खोलिए, और चार दृश्यों के बाद रुककर पूछिए: यह कहानी हमें किस तरह के ग्रंथ से मिली है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”, पाँच व्रत और चार दृश्य काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 4 और बुद्ध के चार दृश्य, दोनों में महल छोड़ने की बात है। दोनों कहानियाँ सुनने वाले को क्या समझाना चाहती हैं? (दोनों में राजसी सुख और धन को अस्थायी दिखाया गया है, और संन्यास को रास्ता; किताब कहती है कि ऐसी कहानियाँ आम लोगों को आकर्षित करती थीं।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”: पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन है। (2) क्योंकि संतचरित्र उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वास बताता है, और बुद्ध के जीवन की जानकारी हमें ऐसे ही ग्रंथों से मिलती है।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क9, क10, क11, ख3, घ3 और च2।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 36–52।

कालांश 4 — 5. बुद्ध की शिक्षाएँ; 6. बुद्ध के अनुयायी

किताब — पृष्ठ 91–94 · स्लाइड — भाग 4 · इंटरैक्टिव — 5. बुद्ध की शिक्षाएँ, 6. बुद्ध के अनुयायी

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बौद्ध दर्शन के मूल विचार अपने शब्दों में बता सके, और समझा सके कि संघ कैसे चलता था, उसमें कौन आया, और बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला।

साथ ले जाइए — किताब, और एक चार्ट पेपर जिस पर बौद्ध दर्शन के पाँच मूल विचार लिखे हों (कालांश 5 और 8 में भी काम आएगा)।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 3 की पर्चियों से दो उत्तर पढ़िए: एक जिसमें संतचरित्र को झूठी कहानी लिखा हो, और एक सही। कक्षा तय करे कि कौन-सा उत्तर किताब के ज़्यादा पास है।

  2. 5–14 मिनट · बुद्ध की शिक्षाएँ (भाग 5)। पृष्ठ 91–92 पढ़िए। पहले बताइए कि शिक्षाएँ सुत्त पिटक की कहानियों से फिर से जोड़ी गई हैं; शोकमग्न माँ वाली कहानी सुनाइए, जिसमें बुद्ध ने बच्चे को जीवित करने के बजाय मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई। फिर चार्ट पेपर से पाँच विचार: विश्व अनित्य है; आत्माविहीन है; दुख जीवन का अंतर्निहित तत्व है; मध्यम मार्ग से मुक्ति; प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था। अंत में निर्वाण का अर्थ, किताब के शब्दों में: “अहं और इच्छा का खत्म हो जाना” (पृष्ठ 92)।

  3. 14–20 मिनट · स्रोत 5: सिगल को सलाह। पृष्ठ 91–92 का स्रोत 5 पढ़वाइए। बोर्ड पर लिखवाइए कि मालिक नौकरों और कर्मचारियों की देखभाल किन पाँच तरह से करे। फिर किनारे का प्रश्न: “आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे।” नमूना उत्तर — किताब सिर्फ़ इतना बताती है कि सिगल को इनके लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए। नीचे के सुझाव हमारी ओर से हैं, स्रोत 5 के ढंग पर:

    • माता-पिता के लिए: उनकी सेवा करना, उनका कहा काम पूरा करना, कुल की परंपरा बनाए रखना।
    • शिक्षकों के लिए: उनका आदर करना, उनके पास जाकर सीखना, सीखी बात ध्यान से याद रखना।
    • पत्नी के लिए: उसका सम्मान करना, उस पर भरोसा रखना, घर की ज़िम्मेदारी में उसे हिस्सा देना।

    कक्षा में बच्चों के सुझाव लीजिए; हर सुझाव में दोनों तरफ़ का कर्तव्य दिखे, जैसा स्रोत 5 में है।

  4. 20–28 मिनट · संघ (भाग 6)। पृष्ठ 92–93 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। बोर्ड पर: श्रमण दान पर निर्भर थे, इसलिए भिक्खु कहलाए; शुरू में सिर्फ़ पुरुष, फिर बौद्ध ग्रंथों के अनुसार आनंद के समझाने पर महिलाएँ भी; महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं; संघ में बातचीत से एकमत की कोशिश, न हो तो मतदान।

  5. 28–36 मिनट · स्रोत 6 और 7, और पृष्ठ 94 की चर्चा। पृष्ठ 93 का स्रोत 6 (थेरीगाथा) पढ़वाइए: दासी पुन्ना और स्नान करने वाला ब्राह्मण। पृष्ठ 93 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं?” नमूना उत्तर — दो शिक्षाएँ साफ़ दिखती हैं।

    • कर्म ही मायने रखते हैं: पानी में नहाने से बुरा करने वाला मुक्त नहीं होता; पुन्ना कहती है कि वे कर्म ही मत कीजिए जिनका डर पानी की ओर खींचता है।
    • तर्क से समझाना: “सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे” वाला उत्तर अनुष्ठान को तर्क से परखता है, जैसे बुद्ध विवेक और तर्क से समझाते थे।

    फिर पृष्ठ 94 का स्रोत 7 (विनय पिटक के नियम) पढ़वाइए और चर्चा पूछिए: “पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?” नमूना उत्तर — पुन्ना की रचना (स्रोत 6) और किताब की बातों से ये कारण बनते हैं:

    • कठिन जीवन: रचना में वह कहती है कि सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से उसे कितनी भी ठंड हो, पानी में उतरना ही है (पृष्ठ 93)।
    • बराबरी: संघ में आने पर पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी, और सब बराबर माने जाते थे (पृष्ठ 92)।
    • आचरण का महत्त्व: बौद्ध शिक्षाओं ने जन्म की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया (पृष्ठ 94), और संघ में आई कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ और थेरी बनीं (पृष्ठ 92)।

    इसलिए संघ उसे बराबरी और नया स्थान दे सकता था।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) बौद्ध दर्शन के अनुसार विश्व आत्माविहीन क्यों है? (2) संघ में आने पर सब बराबर क्यों माने जाते थे?

संघ में कौन आया (चरण 4)

संघ में कौन आया

अनुयायीहर वर्ग के लोग
  • राजा, धनवान और गृहपति
  • कर्मकार, दास और शिल्पी
  • महिलाएँ, बौद्ध ग्रंथों के अनुसार आनंद के समझाने पर
नियमपुरानी पहचान छोड़नी पड़तीभिक्खु और भिक्खुनी, सब बराबर
NCERT, पृष्ठ 92

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

टॉपिकमुख्य बातपृष्ठ
मूल विचारअनित्य, आत्माविहीन, दुख, मध्यम मार्ग; भगवान का प्रश्न अप्रासंगिक91
निर्वाणअहं और इच्छा का खत्म हो जाना92
स्रोत 5सिगल को सलाह: नौकरों, श्रमणों और ब्राह्मणों की देखभाल91–92
संघ और भिक्खुदान पर निर्भर श्रमण; बातचीत से एकमत, नहीं तो मतदान92
भिक्खुनीमहाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी; कई स्त्रियाँ थेरी बनीं92
स्रोत 6 और 7थेरीगाथा में पुन्ना; विनय पिटक के नियम93–94
तेज़ी से फैलावप्रथाओं से असंतोष; आचरण और मूल्यों पर ज़ोर; मित्रता और करुणा94

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “आत्माविहीन” का अर्थ। विश्व आत्माविहीन है, क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है। बच्चे किताब खोलें तो यह भी बताइए: छपी किताब में “आत्माविहीन” के आगे कोष्ठक में ‘आत्मा’ छपा है; अर्थ आत्माविहीन ही है।
  • “मध्यम मार्ग” किसके बीच। घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच। कालांश 3 का चित्र दिखाइए: सिद्धार्थ ने ख़ुद अतिवादी तरीके छोड़े थे।
  • “भिक्खु” का अर्थ। दान पर निर्भर रहने वाला श्रमण; दिन में एक बार भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा।
  • महिलाएँ शुरू से संघ में नहीं थीं। शुरू में सिर्फ़ पुरुष; अनुमति बाद में मिली। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार आनंद ने बुद्ध को समझाया था।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. बुद्ध के अनुयायी खोलिए, और स्रोत 7 के बाद रुककर पूछिए: ये नियम किस ग्रंथ के हैं?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए चार मूल विचार (अनित्य, आत्माविहीन, दुख, मध्यम मार्ग) और संघ में सब बराबर काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 7 के नियम, जैसे कंबल छह वर्ष चलाना या भोजन दूसरे भिक्खुओं से बाँटना, बौद्ध दर्शन के किस विचार से मेल खाते हैं? (सादा जीवन और ज़रूरत से ज़्यादा कुछ न रखना; किताब कहती है कि भिक्खुओं के पास जीवन के लिए बहुत ज़रूरी चीज़ों के अलावा कुछ नहीं होता था।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है। (2) क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर सबको अपनी पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क13, ख4, ख5, ग4, ग5, ङ2, ङ3 और ङ4; जो आगे हैं, वे छ2 और छ4 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 58–77।

कालांश 5 — 7. स्तूप (7.1-7.3), मानचित्र 1

किताब — पृष्ठ 95–97 · स्लाइड — भाग 5 · इंटरैक्टिव — 7. स्तूप

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि स्तूप क्यों बने, उन्हें बनाने के लिए दान किसने दिया, और स्तूप के मुख्य हिस्सों के नाम और काम।

साथ ले जाइए — किताब, भारत का दीवार-मानचित्र, और एक चार्ट पेपर जिस पर स्तूप का सादा खाका बना हो: टीला, उसके ऊपर छज्जा और मस्तूल, चारों ओर घेरा और चार द्वार; नाम अभी खाली।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 4 की पर्चियों से “आत्माविहीन” का एक सही और एक अधूरा उत्तर पढ़िए। कक्षा अधूरे उत्तर में “कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं” जोड़े।

  2. 5–12 मिनट · पवित्र स्थल और चैत्य। पृष्ठ 95 पढ़िए। बोर्ड पर: बहुत प्राचीन काल से लोग ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानों या प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों को पवित्र मानते थे; कुछ पर छोटी वेदी होती थी, जिसे कभी-कभी चैत्य कहा जाता था। पृष्ठ 95 का बॉक्स पढ़िए: शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रखे जाते थे, और ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए। फिर बुद्ध के जीवन से जुड़ी चार जगहें मानचित्र 1 में ढूँढ़वाइए: लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश), कुशीनगर (निब्बान)।

  3. 12–20 मिनट · स्तूप क्यों बनाए जाते थे (7.1)। बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया सामान, जहाँ गाड़े गए, वे टीले स्तूप कहलाए; पवित्र अवशेषों के कारण पूरा स्तूप बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया। अशोकावदान के अनुसार असोक ने अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया; ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बन चुके थे। फिर स्रोत 8 (महापरिनिब्बान सुत्त) पढ़वाइए: आनंद के विशेष आग्रह करने पर बुद्ध कहते हैं कि तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप बनाना चाहिए।

  4. 20–28 मिनट · स्तूप कैसे बने (7.2)। पृष्ठ 96 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। बताइए कि यह जानकारी स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेखों से आती है, और किताब के शब्दों में “ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं।”

  5. 28–36 मिनट · स्तूप की संरचना (7.3) और पृष्ठ 97 की चर्चा। चार्ट पेपर वाले खाके पर बच्चों से नाम लिखवाइए: अंड (गोलार्ध टीला), हर्मिका (छज्जे जैसा ढाँचा, देवताओं के घर का प्रतीक), यष्टि (मस्तूल), छत्री, वेदिका (पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी), और चार तोरणद्वार। फिर परिक्रमा: उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों।” अंत में पृष्ठ 97 की चर्चा पूछिए: “साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10 क) और छायाचित्र (चित्र 4.3) में क्या समानताएँ और फ़र्क हैं?” नमूना उत्तर — दोनों एक ही इमारत के हैं, पर अलग ढंग से।

    • समानताएँ: दोनों साँची का महास्तूप दिखाते हैं: टीला, उसके चारों ओर का घेरा और तोरणद्वार।
    • फ़र्क: मापचित्र इमारत की योजना है, यानी समतलीय परिप्रेक्ष्य, जिसमें पूरा घेरा और चारों दिशाओं के द्वार एक साथ दिखते हैं। छायाचित्र एक जगह से खींचा गया असली रूप है, जिसमें ऊँचाई, पत्थर और नक्काशी दिखती है, पर पीछे का हिस्सा छिप जाता है।

    इसलिए स्तूप समझने के लिए दोनों साथ देखने चाहिए।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) स्तूप को बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक क्यों माना गया? (2) स्तूप बनाने के लिए दान देने वाले कोई दो तरह के लोग लिखिए।

स्तूप के लिए दान किसने दिया (चरण 4)

स्तूप के लिए दान किसने दिया

राजासातवाहन वंश जैसे राजा
श्रेणियाँशिल्पकार और व्यापारीसाँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत के शिल्पकारों के दान से
आम लोगसैकड़ों महिलाएँ और पुरुषगाँव, पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी
संघभिक्खु और भिक्खुनियाँ
स्रोतवेदिकाओं और स्तंभों पर मिले दान के अभिलेख
NCERT, पृष्ठ 96

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

टॉपिकमुख्य बातपृष्ठ
चैत्यपवित्र जगह की छोटी वेदी; अवशेषों वाले टीले भी चैत्य कहलाए95
चार पवित्र स्थललुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर95
स्तूपबुद्ध से जुड़े अवशेषों वाले टीले; बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक95
अशोकावदानअसोक ने अवशेष बाँटकर स्तूप बनाने का आदेश दिया95
दानदाताराजा, श्रेणियाँ, सैकड़ों महिलाएँ और पुरुष, भिक्खु और भिक्खुनियाँ96
संरचनाअंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका, तोरणद्वार96–97
परिक्रमापूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश, दक्षिणावर्त97

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • स्तूप और मंदिर एक नहीं। स्तूप टीला है, जिसमें अवशेष रहते थे; मंदिर, जिसमें गर्भगृह होता है, कालांश 8 में आएँगे।
  • स्तूप की परंपरा। किताब कहती है कि स्तूप बनाने की परंपरा शायद बुद्ध से पहले की रही होगी, पर वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। “शायद” उत्तर में रहे।
  • हर्मिका और वेदिका उलझते हैं। हर्मिका ऊपर है, अंड के ऊपर; वेदिका नीचे, टीले के चारों ओर। खाके पर उँगली रखकर दोनों दिखाइए।
  • दानदाता सिर्फ़ राजा थे वाली भूल। अभिलेख बताते हैं कि सैकड़ों आम महिलाओं और पुरुषों ने भी दान दिया।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. स्तूप खोलिए, और स्तूप के हिस्सों वाले चित्र पर रुककर पूछिए: पवित्र जगह को बाहर की दुनिया से अलग कौन करता है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए स्तूप का अर्थ, अंड, वेदिका और तोरणद्वार, और दानदाताओं के दो प्रकार काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: दान के अभिलेखों में लोगों ने अपना गाँव, पेशा और रिश्तेदारों के नाम क्यों लिखवाए होंगे? (हमारा अनुमान: ताकि दान उनके और उनके परिवार के नाम से याद रहे; किताब इतना ही बताती है कि उन्होंने ये नाम लिखवाए।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) क्योंकि उसमें बुद्ध से जुड़े, पवित्र माने जाने वाले अवशेष रहते थे। (2) राजा (जैसे सातवाहन), शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ, सैकड़ों आम महिलाएँ और पुरुष, भिक्खु और भिक्खुनियाँ: इनमें से कोई दो।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क8, क15, ख6, ग6, घ1, घ8 और ङ5; जो आगे हैं, वे च3 और छ3 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 78–92।

कालांश 6 — 8. स्तूपों की ‘खोज’: अमरावती और साँची की नियति; कालरेखा 2

किताब — पृष्ठ 98–99, और कालरेखा 2 पृष्ठ 110 पर · स्लाइड — भाग 6 · इंटरैक्टिव — 8. स्तूपों की ‘खोज’

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि अमरावती के स्तूप के पत्थर किस क्रम में बिखरे, एच.एच. कोल क्या चाहते थे, और किताब के अनुसार साँची का स्तूप अपनी जगह पर क्यों बचा रहा।

साथ ले जाइए — किताब, भारत का दीवार-मानचित्र (अमरावती, मद्रास, कलकत्ता और भोपाल दिखाने के लिए), और एक चार्ट पेपर जिस पर अमरावती के पत्थरों का सफ़र का चित्र (नीचे) बना हो।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 5 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें दान देने वालों के दो तरह के लोग सही लिखे हों, और एक जिसमें स्तूप को बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक मानने का कारण छूट गया हो। कक्षा से सुधरवाइए।
  2. 5–15 मिनट · अमरावती: 1796 से 1854 तक। पृष्ठ 98 पढ़िए। पहले यह बात बोर्ड पर लिखिए: हर स्तूप के दो इतिहास हैं, एक यह कि वह कैसे बना, और दूसरा यह कि उसकी खोज कैसे हुई। फिर चार्ट पेपर वाला चित्र दिखाइए और हर डिब्बा बच्चों से किताब में ढूँढ़वाइए: 1796 में मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले, और उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया; कुछ वर्षों बाद कॉलिन मेकेंज़ी ने कई मूर्तियों का विस्तृत चित्रांकन किया, पर उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं; 1854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए। ये एलियट संगमरमर कहलाते हैं। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार भी खोज निकाला।
  3. 15–22 मिनट · 1850 के दशक का बिखराव, और कोल की आवाज़। मानचित्र पर दिखाइए: अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, मद्रास में इंडिया ऑफिस और लंदन तक पहुँचे, और कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बागों में भी। फिर एच.एच. कोल का वाक्य पढ़वाइए: “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” पूछिए कि कोल क्या चाहते थे। (संग्रहालयों में प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रहें, और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें।)
  4. 22–30 मिनट · साँची क्यों बचा, और पृष्ठ 99 की चर्चा। पृष्ठ 99 पढ़िए: 1818 में जब साँची की खोज हुई, उसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला अच्छी हालत में था। फिर पृष्ठ 99 की चर्चा पूछिए: “खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया।” (खंड एक यानी किताब का भाग 1, “साँची की एक झलक”, पृष्ठ 82–83।) नमूना उत्तर — भाग 1 और भाग 8 मिलाकर ये कारण बनते हैं।
    • फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की जगह प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
    • शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया; सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए, और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए भी अनुदान दिया।
    • किताब के शब्दों में, “शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।”
    • साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई; किताब के अनुसार शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब विद्वान यह नहीं समझ पाए थे कि अवशेषों को उनकी जगह पर संरक्षित करना कितना ज़रूरी है।
  5. 30–36 मिनट · कालरेखा 2 (पृष्ठ 110)। कालरेखा 2 की पंक्तियाँ साथ पढ़िए। बच्चे दो सूचियाँ बनाएँ: जिन पंक्तियों में साँची का नाम है (1854 में अलेक्जैंडर कनिंघम की भिलसा टोप्स, 1914 में मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची, 1989 में साँची विश्व कला दाय स्थान घोषित), और जिनमें किसी संग्रहालय का (1814 इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता; 1851 गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास; 1955 राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव)। यह भी दिखाइए कि 1880 में एच.एच. कोल प्राचीन इमारतों के संग्रहाध्यक्ष बनाए गए।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) एलियट संगमरमर किन्हें कहा जाता है? (2) एच.एच. कोल मूर्तियों के बारे में क्या चाहते थे?

अमरावती के पत्थरों का सफ़र (चरण 2)

अमरावती के पत्थरों का सफ़र

1796एक स्थानीय राजामंदिर बनाने के लिए स्तूप के पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय
अंग्रेज़ अधिकारीकॉलिन मेकेंज़ीकई मूर्तियों का चित्रांकन; रिपोर्टें कभी छपी नहीं
गुंटूर के कमिश्नरमूर्तियाँ मद्रास ले गएये एलियट संगमरमर कहलाते हैं
बिखरावकलकत्ता, मद्रास और लंदनऔर कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बाग़
NCERT, पृष्ठ 98

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

घटनाकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
1796एक स्थानीय राजा को अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले; उन्हें लगा कि संभवतः कोई खज़ाना छुपा हो98
कॉलिन मेकेंज़ीकई मूर्तियों का विस्तृत चित्रांकन; रिपोर्टें कभी छपी नहीं98
1854गुंटूर के कमिश्नर मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए (एलियट संगमरमर); पश्चिमी तोरणद्वार खोजा98
1850 के दशकपत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक; अधिकारियों के बागों में मूर्तियाँ98
एच.एच. कोलप्लास्टर प्रतिकृतियाँ संग्रहालय में, असली कृतियाँ खोज की जगह पर98
1818, साँचीतीन तोरणद्वार खड़े, चौथा वहीं गिरा हुआ; टीला अच्छी हालत में99
आजसाँची का स्तूप बना हुआ है; अमरावती का महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।”99

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • दो इतिहास मिला देना। स्तूप बहुत पहले बने थे (कालांश 5); इस भाग की ‘खोज’ उनके बारे में जानने और उनके पत्थरों के बिखरने की कहानी है। बोर्ड पर दोनों को अलग पंक्तियों में रखिए।
  • 1854 दो बार आता है। पृष्ठ 98 पर 1854 में गुंटूर के कमिश्नर मूर्तियाँ मद्रास ले गए; कालरेखा 2 में 1854 में अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी। ये दो अलग घटनाएँ हैं।
  • अनुमान के शब्द उत्तर में रहें। किताब लिखती है कि राजा को लगा कि संभवतः पहाड़ी में कोई खज़ाना छुपा हो (पृष्ठ 98), और यह कि शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी (पृष्ठ 99)। उत्तर में भी “संभवतः” और “शायद” रहें।
  • कोल अकेली आवाज़ जैसे थे। किताब उन्हें उन मुट्ठी भर लोगों में गिनती है जो अलग सोचते थे। उनकी बात अमरावती के लिए नहीं मानी गई, साँची के लिए मानी गई।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 8. स्तूपों की ‘खोज’ खोलिए, और 1854 वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: मूर्तियाँ कहाँ ले जाई गईं?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए चार्ट के चार डिब्बे क्रम से, और साँची के बचने के दो कारण काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: अगर कोल की बात अमरावती के लिए भी मान ली जाती, तो आज वहाँ क्या दिखता? (किताब के अनुसार कोल चाहते थे कि असली कृतियाँ खोज की जगह पर रहें; तब मूर्तियाँ कलकत्ता, मद्रास, लंदन और बागों में बिखरने के बजाय अमरावती में रहतीं, जैसे साँची में तोरणद्वार अपनी जगह पर हैं।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) 1854 में गुंटूर के कमिश्नर अमरावती से जो मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए, वे एलियट संगमरमर कहलाते हैं। (2) कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क16, ख8, ख10 और ङ1।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 93–108।

कालांश 7 — 9. मूर्तिकला (9.1-9.3, अतीत से प्राप्त चित्र)

किताब — पृष्ठ 99–103 · स्लाइड — भाग 7 · इंटरैक्टिव — 9. मूर्तिकला

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि इतिहासकार साँची की एक मूर्ति को किन तीन तरीकों से पढ़ते हैं (जातक की कथा से, बुद्ध के चरित से, और लोक परंपराओं से), और जेम्स फर्गुसन का निष्कर्ष क्यों अधूरा था।

साथ ले जाइए — किताब (बच्चे चित्र 4.13 से 4.21 अपनी किताब में देखेंगे), और एक चार्ट पेपर जिस पर नीचे का मूर्तियाँ पढ़ने के तीन तरीके वाला चित्र बना हो।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 6 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें एलियट संगमरमर ठीक समझाया गया हो, और एक जिसमें कोल की बात उलटी लिखी हो। कक्षा से सुधरवाइए।
  2. 5–12 मिनट · पत्थर में कथाएँ (9.1)। पृष्ठ 99 पढ़िए। पहले चारणचित्र की बात कीजिए: घुमक्कड़ कथावाचक कपड़े या कागज़ पर बने चित्र दिखाते हुए कहानी कहते हैं, और साँची की मूर्तियाँ भी पत्थर में कहानियाँ कहती हैं। फिर बच्चे अपनी किताब में चित्र 4.13 देखें और बताएँ कि उन्हें क्या दिखता है। फिर बताइए: पहली नज़र में यह फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं, यानी उस दानी राजकुमार की कहानी जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया। बोर्ड पर तरीका लिखिए: इतिहासकार मूर्ति को लिखित साक्ष्यों से मिलाकर पढ़ते हैं।
  3. 12–20 मिनट · उपासना के प्रतीक (9.2)। पृष्ठ 100 पढ़िए। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई। बच्चे किताब खोलकर बोर्ड-कार्य की प्रतीक वाली चार पंक्तियाँ भरें: रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र और पेड़। फिर किताब का वाक्य पढ़िए: “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।”
  4. 20–30 मिनट · लोक परंपराएँ (9.3)। पृष्ठ 101–103 पढ़िए। चार उदाहरण बोर्ड पर: शालभंजिका (चित्र 4.17), जिसका संस्कृत में वर्णन है और लोक परंपरा में माना जाता था कि इसके छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे; जानवर, जैसे हाथी, जो शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे; कमल और हाथियों के बीच एक महिला (चित्र 4.19); और कई स्तंभों पर सर्प (चित्र 4.21)। चित्र 4.19 पर पूछिए कि इतिहासकार इसे किससे जोड़ते हैं। नमूना उत्तर — किताब एक नहीं, तीन संभावनाएँ देती है।
    • कुछ इतिहासकार इस महिला को बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं।
    • दूसरे इसे सौभाग्य लाने वाली देवी गजलक्ष्मी मानते हैं, जो प्रायः हाथियों के साथ जोड़ी जाती हैं।
    • यह भी संभव है कि इन मूर्तियों को देखने वाले उपासक इसे माया और गजलक्ष्मी, दोनों से जोड़ते थे।
  5. 30–36 मिनट · जेम्स फर्गुसन, अजंता का बॉक्स और पृष्ठ 103 की चर्चा। पृष्ठ 103 पढ़िए: कला पर लिखने वाले शुरुआती आधुनिक इतिहासकारों में से एक, जेम्स फर्गुसन, ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना, क्योंकि वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे; तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था। फिर पृष्ठ 102 का बॉक्स: अजंता (महाराष्ट्र) की गुफाओं के चित्र जातकों की कथाएँ दिखाते हैं, और कलाकारों ने त्रिविम रूप देने के लिए आभाभेद तकनीक का प्रयोग किया। अंत में पृष्ठ 103 की चर्चा दीजिए: “मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्टी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।” नमूना उत्तर — यह बच्चों को ख़ुद पता करना है। तरीका बता दीजिए:
    • आसपास के कुम्हार, धातु का काम करने वाले कारीगर या किसी संग्रहालय से पूछिए: मूर्ति किस चीज़ की है, कैसे बनती है (गढ़कर, साँचे में ढालकर, पकाकर), और कितने समय टिकती है।
    • फिर सोचिए कि पत्थर की मूर्तियाँ ज़्यादा क्यों बची हैं: पृष्ठ 102 के बॉक्स के अनुसार पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक बचती हैं।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) चित्र 4.13 पहली नज़र में क्या लगता है, और कला इतिहासकार इसे क्या बताते हैं? (2) जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र क्यों माना?

मूर्तियाँ पढ़ने के तीन तरीके (चरण 2–5)

मूर्तियाँ पढ़ने के तीन तरीके

कथाजातक से मिलाइएचित्र 4.13 ग्रामीण दृश्य लगता है, पर वेसान्तर जातक है
प्रतीकबुद्ध के चरित से मिलाइएरिक्त स्थान, स्तूप, चक्र, पेड़
लोक परंपरासाहित्य और लोक परंपराओं से मिलाइएशालभंजिका, कमल और हाथियों के बीच महिला, सर्प
जेम्स फर्गुसनसिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर निष्कर्षसाँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना
NCERT, पृष्ठ 99–103

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

मूर्ति या प्रतीककिताब क्या कहती हैपृष्ठ
चित्र 4.13पहली नज़र में ग्रामीण दृश्य; कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक बताते हैं99
रिक्त स्थानबुद्ध के ध्यान की दशा100
स्तूपमहापरिनिब्बान100
चक्रसारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश100
पेड़सिर्फ़ पेड़ नहीं, बुद्ध के जीवन की एक घटना100
शालभंजिकासंस्कृत में वर्णित; शुभ प्रतीक माना जाता था, इसलिए स्तूप के अलंकरण में आई101
कमल और हाथियों के बीच महिलामाया, या गजलक्ष्मी, या दोनों102–103
जेम्स फर्गुसनबौद्ध साहित्य जाने बिना साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना103
अजंताजातकों की कथाओं के चित्र; आभाभेद तकनीक102

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • प्रतीक का मतलब अक्षरशः नहीं। पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं, बुद्ध के जीवन की एक घटना है; रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा दिखाता है। ऐसे प्रतीक समझने के लिए मूर्तियाँ बनाने वालों की परंपराएँ जाननी पड़ती हैं।
  • हर मूर्ति बौद्ध ग्रंथ से नहीं खुलती। शालभंजिका और सर्प जैसी मूर्तियाँ शायद लोक परंपराओं से आईं। किताब कहती है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया।
  • चित्र 4.19 का एक “सही” नाम नहीं। किताब माया, गजलक्ष्मी और दोनों, ये तीन संभावनाएँ देती है। उत्तर में तीनों रहें।
  • फर्गुसन का कसूर। उन्होंने जो देखा, वही लिखा; कमी यह थी कि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था। इसे मज़ाक़ नहीं, स्रोत की कमी की तरह पढ़ाइए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 9. मूर्तिकला खोलिए, और प्रतीकों वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: चक्र किस घटना की याद दिलाता है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए चित्र 4.13 की दो बातें और प्रतीकों की चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: चित्र 4.13 और जेम्स फर्गुसन, दोनों से इतिहासकार के काम के बारे में कौन-सी एक ही बात निकलती है? (मूर्ति को लिखित साक्ष्य से मिलाए बिना उसका अर्थ ग़लत निकल सकता है: 4.13 ग्रामीण दृश्य भर लगता, और फर्गुसन ने ग्रंथ न जानने से साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य; कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं। (2) वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे, क्योंकि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था; उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर निष्कर्ष निकाला।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क17, ख9, ग7 और घ7; जो आगे हैं, वे च4 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 109–123।

कालांश 8 — 10. नयी धार्मिक परंपराएँ (10.1-10.3)

किताब — पृष्ठ 103–106, और कृत्रिम गुफाएँ पृष्ठ 107 पर · स्लाइड — भाग 8 · इंटरैक्टिव — 10. नयी धार्मिक परंपराएँ

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि महायान में कौन-से नए विचार आए, वैष्णव और शैव परंपराओं में भक्ति और मूर्तियों का क्या स्थान था, और शुरू के मंदिर कैसे बनते थे।

साथ ले जाइए — किताब (बच्चे चित्र 4.22 से 4.28 अपनी किताब में देखेंगे), और एक चार्ट पेपर जिस पर तीन परंपराएँ, एक साझी बात का चित्र (नीचे) बना हो।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 7 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें वेसान्तर जातक सही लिखा हो, और एक जिसमें फर्गुसन की भूल का कारण छूट गया हो। कक्षा से सुधरवाइए।
  2. 5–14 मिनट · महायान (10.1)। पृष्ठ 103 पढ़िए। किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” फिर बच्चों से दो खाने भरवाइए। पहले खाने में प्रारंभिक बौद्ध मत: निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास, और बुद्ध एक मनुष्य, जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान पाया। दूसरे खाने में नयी परंपरा: मुक्तिदाता की कल्पना, बोधिसत्त, और बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा (चित्र 4.22, मथुरा)। अंत में नाम: नयी परंपरा महायान; उसके मानने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा; पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे। बच्चे कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) में देखेंगे कि वहाँ महायान बौद्ध मत का विकास “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे” रखा गया है। दोनों बातें किताब की हैं: उत्तर में वही लिखवाइए जो प्रश्न पूछे, पृष्ठ के साथ।
  3. 14–24 मिनट · वैष्णव और शैव (10.2)। पृष्ठ 104–105 पढ़िए। बोर्ड पर: वैष्णव परंपरा में विष्णु सबसे महत्वपूर्ण देवता, शैव में शिव परमेश्वर; एक विशेष देवता की पूजा, जिसमें भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना गया, यानी भक्ति; वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना। फिर पुराणों की बात: कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में मिलती हैं; पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, और महिलाएँ और शूद्र भी इन्हें सुन सकते थे। फिर पृष्ठ 104 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फ़र्क से क्या बात समझ में आती है?” नमूना उत्तर — चित्र 4.23 (एहोल, कर्नाटक, लगभग छठी सदी) में यह दिखता है।
    • वराह अवतार की आकृति बहुत बड़ी है, और उनकी बाँह पर पृथ्वी देवी छोटी दिखती हैं।
    • हमारी ओर से: बड़ा आकार शायद देवता की शक्ति और महत्त्व दिखाता है: वे पृथ्वी को बचाने वाले हैं, इसलिए सबसे बड़े बनाए गए।
    • बच्चे अपनी किताब में चित्र देखकर नीचे की आकृतियों का आकार भी मिलाएँ।
  4. 24–32 मिनट · मूर्ति को पढ़ना, और पृष्ठ 105 का प्रश्न। किताब के अनुसार देवताओं की पहचान उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से होती है, और इन मूर्तियों का अर्थ समझने के लिए इतिहासकारों को उनकी कहानियाँ जाननी पड़ती हैं। फिर पृष्ठ 105 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए।” नमूना उत्तर — यह चित्र 4.24 है: महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की मूर्ति, छठी सदी।
    • गति देखने के लिए शरीरों का झुकाव, उठी हुई भुजाएँ और उनके आयुध, और आकृतियों की भीड़ पर ध्यान दीजिए।
    • कहानी की जानकारी बच्चों को ख़ुद इकट्ठी करनी है: पुराणों पर आधारित किसी पुस्तक से या आपसे पूछकर, क्योंकि किताब के अनुसार ऐसी मूर्तियाँ पुराणों की कहानियों से समझी जाती हैं।
  5. 32–36 मिनट · मंदिर और कृत्रिम गुफाएँ (10.3), और पृष्ठ 106 का प्रश्न। पृष्ठ 105–107 पढ़िए। बोर्ड पर क्रम: शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरा, यानी गर्भगृह, जिसमें एक दरवाज़ा होता था; धीरे-धीरे उसके ऊपर ऊँचा ढाँचा, यानी शिखर; बाद में विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण और जल आपूर्ति। कृत्रिम गुफाओं के लिए किताब का वाक्य पढ़िए: “सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।” इस परंपरा का सबसे विकसित रूप आठवीं सदी का कैलाशनाथ मंदिर (एलोरा) है। फिर पृष्ठ 106 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।” नमूना उत्तर — चित्र 4.25 देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का मंदिर है, पाँचवीं सदी का। सामने का दरवाज़ा गर्भगृह का प्रवेशद्वार है, जिससे उपासक मूर्ति तक जाता था; उसके ऊपर का टूटा हुआ ऊँचा भाग शिखर के अवशेष हैं।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) बोधिसत्त किन्हें माना गया? (2) शुरू के मंदिर में गर्भगृह और शिखर क्या थे?

तीन परंपराएँ, एक साझी बात (चरण 2–4)

तीन परंपराएँ, एक साझी बात

महायानबोधिसत्तपरम करुणामय जीव, जो सत्कार्यों से कमाया पुण्य दूसरों की सहायता में लगाते थे
वैष्णवविष्णुअवतारों के आसपास पूजा पद्धतियाँ
शैवशिवपरमेश्वर; प्रतीक लिंग
साझी बातमूर्तियाँ और पूजाबुद्ध और बोधिसत्तों की, और अवतारों और देवताओं की मूर्तियाँ
NCERT, पृष्ठ 103–104

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

टॉपिकमुख्य बातपृष्ठ
महायानईसा की प्रथम सदी के बाद बदलाव; मुक्तिदाता, बोधिसत्त, मूर्ति पूजा103
हीनयान और थेरवादीहीनयान: महायान वालों का दिया नाम; थेरवादी: पुरानी परंपरा के अनुयायियों का अपना नाम103
वैष्णव और शैवविष्णु सबसे महत्वपूर्ण देवता; शिव परमेश्वर; भक्ति104
अवतारवैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना104
पुराणब्राह्मणों के रचे; ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते; महिलाएँ और शूद्र भी सुन सकते थे104–105
गर्भगृह और शिखरचौकोर कमरा, एक दरवाज़ा; ऊपर ऊँचा ढाँचा105
कृत्रिम गुफाएँसबसे प्राचीन: ईसा पूर्व तीसरी सदी, आजीविक संतों के लिए; कैलाशनाथ, आठवीं सदी107

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “हीनयान” किसका दिया नाम है। यह नाम महायान को अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को दिया; पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे। उत्तर में यह बात साफ़ रहे।
  • बुद्ध मनुष्य से मुक्तिदाता तक। प्रारंभिक बौद्ध मत में बुद्ध एक मनुष्य थे, जिन्होंने अपने प्रयास से निब्बान पाया; महायान में मुक्तिदाता की कल्पना उभरी। दोनों खाने अलग लिखवाइए।
  • “मुक्तिदाता” सिर्फ़ बौद्ध धर्म में नहीं। किताब कहती है कि इसी तरह के विश्वास अलग ढंग से उन परंपराओं में भी विकसित हो रहे थे, जिन्हें आज हिंदू धर्म कहा जाता है।
  • “शायद” वाली बात। किताब के अनुसार शायद अलग-अलग अवतार देश के अलग-अलग हिस्सों में लोकप्रिय थे। इसे पक्की बात की तरह मत लिखवाइए।
  • धर्म इतिहास की तरह। इस कालांश में किसी परंपरा की तुलना ऊँच-नीच में मत कीजिए; बच्चे सिर्फ़ यह लिखें कि किताब किस स्रोत से क्या बताती है।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 10. नयी धार्मिक परंपराएँ खोलिए, और मंदिर वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: गर्भगृह के ऊपर का ऊँचा ढाँचा क्या कहलाता है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए महायान की दो बातें, भक्ति का अर्थ, और गर्भगृह और शिखर काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पुराणों को ऊँची आवाज़ में पढ़ने का क्या असर हुआ होगा? (किताब के अनुसार इससे कोई भी उन्हें सुन सकता था, महिलाएँ और शूद्र भी, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी; पुराणों की कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से भी बनती-फैलती रहीं।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) परम करुणामय जीव, जो सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे, पर उस पुण्य से दुनिया को दुखों में छोड़कर निब्बान नहीं पाते थे, बल्कि दूसरों की सहायता करते थे। (2) गर्भगृह: एक चौकोर कमरा, जिसमें एक दरवाज़ा होता था और भीतर मूर्ति रहती थी; शिखर: गर्भगृह के ऊपर बना ऊँचा ढाँचा।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क14, क18, क19, ख7, घ5 और घ6; जो आगे हैं, वे च5 और च6 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 124–135।

कालांश 9 — 11. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं? (11.1-11.2)

किताब — पृष्ठ 107–109 · स्लाइड — भाग 9 · इंटरैक्टिव — 11. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वान यहाँ की मूर्तियों को किस पैमाने से परखते थे, महाबलीपुरम की चट्टान की दो व्याख्याएँ क्या हैं, और किताब क्यों कहती है कि बहुत कुछ कभी दर्ज़ ही नहीं हुआ।

साथ ले जाइए — किताब (बच्चे चित्र 4.29 और 4.30 अपनी किताब में देखेंगे), और एक चार्ट पेपर जिस पर एक चट्टान, दो व्याख्याएँ का चित्र (नीचे) बना हो।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 8 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें बोधिसत्त का अर्थ पूरा हो, और एक जिसमें गर्भगृह और शिखर उलट गए हों। कक्षा से सुधरवाइए।
  2. 5–10 मिनट · किताब का सवाल। पृष्ठ 107 पढ़िए। हमारी दृश्य परंपराएँ ईंट और पत्थर के स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला के रूप में बची हैं, और समय के साथ बहुत कुछ नष्ट भी हुआ। बोर्ड पर किताब का प्रश्न अपने शब्दों में लिखिए: क्या हम इनका संदेश बिना दुविधा के समझ सकते हैं?
  3. 10–20 मिनट · अनजाने को समझने की कोशिश (11.1)। पृष्ठ 108 पढ़िए। उन्नीसवीं सदी में यूरोप के विद्वानों को कई सिरों और कई हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगती थीं; उन्होंने इनकी तुलना प्राचीन यूनान की कला से की। बुद्ध और बोधिसत्त की जो मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं, वे ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिली थीं, जहाँ ईसा से दो सौ साल पहले भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे। यूनानी मूर्तियों से मिलती-जुलती होने के कारण विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्तिकला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना (चित्र 4.29)। बोर्ड पर तरीका लिखिए: परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना बनाना।
  4. 20–30 मिनट · एक चट्टान, दो व्याख्याएँ (11.2)। पृष्ठ 108–109 पढ़िए। बच्चे अपनी किताब में चित्र 4.30 देखें। कक्षा को दो समूहों में बाँटिए। हर समूह किताब से अपनी व्याख्या का प्रमाण निकाले। पहला समूह: गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण की कथा, जिसमें चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है। दूसरा समूह: महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या, जिसके लिए विद्वान मूर्तियों के बीच एक साधु के केंद्र में होने को महत्त्व देते हैं। दोनों समूह अपना प्रमाण पढ़ें; किसी को “जीता” घोषित मत कीजिए। किताब के अनुसार इस पर कला इतिहासकारों में काफ़ी मतभेद हैं।
  5. 30–36 मिनट · जो दर्ज़ नहीं हुआ, और पृष्ठ 109 की चर्चा। पृष्ठ 109 पढ़िए: रोज़ के और ख़ास अवसरों के बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रों के रूप में स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए। फिर किताब का अंतिम विचार पढ़िए: इस अध्याय के उदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।” फिर पृष्ठ 109 की चर्चा दीजिए: “आपने कोई भी धार्मिक अनुष्ठान देखा हो तो उसका वर्णन कीजिए। क्या इसे किसी रूप में हमेशा के लिए दर्ज़ किया जाता है?” बच्चे वर्णन कॉपी में लिखें; जो सुनाना चाहे वही सुनाए, और किसी के अनुष्ठान पर टिप्पणी न हो। नमूना उत्तर — यह हर बच्चे के अपने अनुभव से बनेगा। ढाँचा बता दीजिए:
    • वर्णन: अनुष्ठान कहाँ और कब हुआ, कौन लोग थे, क्या बोला, गाया या चढ़ाया गया।
    • दर्ज़ होना: क्या वह किसी ग्रंथ, चित्र, मूर्ति, इमारत, फ़ोटो या वीडियो में दर्ज़ होता है, या सिर्फ़ लोगों की याद और परंपरा में रहता है।
    • किताब से जोड़: पृष्ठ 109 याद दिलाता है कि बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप में दर्ज़ नहीं हुए, फिर भी वे जीवित परंपरा रहे।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वान तक्षशिला और पेशावर की बुद्ध और बोधिसत्त मूर्तियों को सर्वश्रेष्ठ क्यों मानते थे? (2) महाबलीपुरम की चट्टान की दो व्याख्याएँ लिखिए।

एक चट्टान, दो व्याख्याएँ (चरण 4)

एक चट्टान, दो व्याख्याएँ

चित्र 4.30महाबलीपुरम की विशाल चट्टानकिसी कथा का सजीव चित्रण, पर कौन-सी कथा?
पहली व्याख्यागंगा का स्वर्ग से अवतरणबीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है
दूसरी व्याख्याअर्जुन की तपस्यामूर्तियों के बीच एक साधु केंद्र में है
NCERT, पृष्ठ 108–109

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

टॉपिकमुख्य बातपृष्ठ
जो बचा हैईंट और पत्थर का स्थापत्य, मूर्तिकला, चित्रकला; बहुत कुछ नष्ट भी हुआ107
यूरोप के विद्वानकई सिरों, कई हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगीं; प्राचीन यूनान की कला से तुलना108
तक्षशिला, पेशावरयूनानी प्रतिमानों से प्रभावित बुद्ध और बोधिसत्त मूर्तियाँ; इन्हें सर्वश्रेष्ठ माना108
महाबलीपुरम की चट्टानगंगा का अवतरण, या अर्जुन की तपस्या; मतभेद109
जो दर्ज़ नहीं हुआरोज़ के और ख़ास अवसरों के रीति-रिवाज109
किताब का निष्कर्षउदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”109

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “सर्वश्रेष्ठ” किसकी राय थी। गांधार जैसी मूर्तियों को सर्वश्रेष्ठ मानना उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों की राय थी, किताब की नहीं; वे यूनानी कला को पैमाना मानकर परख रहे थे।
  • “ज़्यादातर” मत छोड़िए। किताब कहती है कि ऐसी मूर्तियाँ ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे नगरों में मिलीं, सब वहीं नहीं।
  • दो व्याख्याओं में “सही” कौन। किताब कोई फ़ैसला नहीं देती; दोनों व्याख्याएँ उनके प्रमाण के साथ लिखना ही पूरा उत्तर है।
  • चर्चा धर्म की नहीं, दर्ज़ होने की है। पृष्ठ 109 का प्रश्न यह पूछता है कि अनुष्ठान दर्ज़ होता है या नहीं; किसी अनुष्ठान को अच्छा-बुरा कहने की जगह नहीं है।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 11. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं? खोलिए, और महाबलीपुरम वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: दरार किस व्याख्या का प्रमाण मानी जाती है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए यूनानी पैमाने वाली एक बात और महाबलीपुरम की दो व्याख्याएँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: कालांश 7 के जेम्स फर्गुसन और इस कालांश के यूरोपीय विद्वानों की भूल में क्या मेल है? (दोनों ने मूर्तियों को उनके अपने ग्रंथों और परंपराओं से नहीं, अपनी जानी-पहचानी चीज़ों या अधूरी जानकारी से परखा।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) क्योंकि वे यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं और यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं, और वे विद्वान प्राचीन यूनान की कला को पैमाना मानते थे। (2) कुछ विद्वान इसमें गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण मानते हैं; दूसरे महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क12, क20, ग8 और ङ6।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 136–145।

कालांश 10 — कालरेखा 1-2; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

किताब — पृष्ठ 89, 95, 110 और 113 · स्लाइड — कालरेखा वाला भाग · इंटरैक्टिव — सार और काल-रेखा, मानचित्र

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी कालरेखा 1 की पंक्तियाँ सही कालांश से जोड़ सके, प्रश्न 10 का मानचित्र सिर्फ़ किताब के बताए इलाकों और मार्गों से बना सके, और पहले दिन की अपनी पर्ची का उत्तर पूरे अध्याय के आधार पर सुधार सके।

साथ ले जाइए — किताब, विश्व के रेखांकित मानचित्र (हर विद्यार्थी के लिए एक), एटलस, पहले दिन की पर्चियों वाला लिफ़ाफ़ा, और पिछले कालांशों के चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 9 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें महाबलीपुरम की दोनों व्याख्याएँ हों, और एक जिसमें सिर्फ़ एक लिखी हो। कक्षा से सुधरवाइए।

  2. 5–14 मिनट · कालरेखा 1 (पृष्ठ 110)। कालरेखा 1 की पंक्तियाँ बोर्ड पर लिखिए, जैसी किताब में छपी हैं, और बच्चों से हर पंक्ति के आगे वह कालांश लिखवाइए जिसमें उसकी बात आई: लगभग 1500-1000 ई. पू. प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ (कालांश 2); लगभग 1000-500 ई. पू. उत्तर वैदिक परंपराएँ (कालांश 2); लगभग छठी सदी ई. पू. प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म (कालांश 2 और 3); लगभग तीसरी सदी ई. पू. आरंभिक स्तूप (कालांश 5); लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ (कालांश 8); लगभग तीसरी सदी ईसवी सबसे पुराने मंदिर (कालांश 8)।

  3. 14–18 मिनट · कालरेखा 2 दोबारा। कालांश 6 की सूची दिखाइए: कालरेखा 2 की जिन पंक्तियों में साँची का नाम है (1854, 1914, 1989)। पूछिए कि इनमें से कौन-सी पंक्ति किसी किताब की नहीं, साँची के सम्मान की है। (1989: साँची को विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया।)

  4. 18–30 मिनट · मानचित्र कार्य, प्रश्न 10 (पृष्ठ 113)। प्रश्न पढ़िए: “विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइए।” पहले जानकारी दीजिए, फिर बच्चे मानचित्र बनाएँ। नमूना उत्तर — किताब जिन इलाकों का नाम लेती है, सिर्फ़ उन्हीं पर निशान लगाइए, और मार्ग भी वही दिखाइए जो किताब बताती है।

    • उपमहाद्वीप: बुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले। चाहें तो मानचित्र 1 (पृष्ठ 95) के कुछ स्थल, जैसे लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर और साँची, छोटे बिंदुओं से दिखाइए।
    • स्थल मार्ग: उपमहाद्वीप से मध्य एशिया होते हुए चीन तक ठोस रेखा, और चीन, कोरिया और जापान पर निशान, क्योंकि किताब कहती है कि संदेश “मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान” तक फैले।
    • जल मार्ग: श्रीलंका पर निशान, और श्रीलंका से म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक समुद्र पार करती बिंदुदार रेखा, क्योंकि किताब कहती है “श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक”।
    • संकेत सूची: ठोस रेखा = स्थल मार्ग, बिंदुदार रेखा = जल मार्ग, छायांकित इलाका = बौद्ध धर्म का प्रसार।

    चीन से कोरिया और जापान तक, और उपमहाद्वीप से श्रीलंका तक, रास्ता अपनी ओर से मत गढ़िए; एटलस में देखकर ही जोड़िए।

  5. 30–37 मिनट · पहले दिन की पर्चियाँ लौटाइए। लिफ़ाफ़ा खोलिए और हर विद्यार्थी को उसकी पर्ची दीजिए। सवाल फिर बोलिए: जिस विचार का अपना कोई ग्रंथ न बचा हो, उसके बारे में हम कैसे जान सकते हैं? बच्चे अपनी पुरानी पंक्तियों के नीचे अध्याय से एक उदाहरण जोड़ें। नमूना उत्तर — अध्याय तीन रास्ते दिखाता है, और एक सीमा भी।

    • दूसरी परंपराओं के ग्रंथ: आजीविक और लोकायत परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए; उनकी बातें हमें स्रोत 3 जैसे बौद्ध ग्रंथों से मिलती हैं (कालांश 2)।
    • अभिलेख और इमारतें: स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर दान के अभिलेख बताते हैं कि राजा, श्रेणियाँ, आम लोग और भिक्खु-भिक्खुनियाँ भी दान देते थे (कालांश 5)।
    • मूर्तियाँ: साँची की बहुत-सी मूर्तियाँ, जैसे शालभंजिका, शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं; उनसे लोक परंपराओं की झलक मिलती है (कालांश 7)।
    • सीमा: मूर्ति को ग्रंथ के बिना पढ़ना कठिन है (जेम्स फर्गुसन, कालांश 7), और बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप में दर्ज़ ही नहीं हुए (कालांश 9)।
  6. 37–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) कालरेखा 1 के अनुसार आरंभिक स्तूप और सबसे पुराने मंदिर लगभग किस सदी के हैं? (2) किताब के अनुसार बुद्ध का संदेश समुद्र पार करके किन देशों तक पहुँचा?

बुद्ध का संदेश किन रास्तों से (चरण 4)

बुद्ध का संदेश किन रास्तों से

पहलेपूरा उपमहाद्वीपबुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले
स्थल मार्गमध्य एशिया होते हुएचीन, कोरिया और जापान
जल मार्गश्रीलंका से समुद्र पारम्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया
NCERT, पृष्ठ 89

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

कालरेखा 1 की पंक्तिकबकालांशपृष्ठ
प्रारंभिक वैदिक परंपराएँलगभग 1500-1000 ई. पू.2110
उत्तर वैदिक परंपराएँलगभग 1000-500 ई. पू.2110
प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्मलगभग छठी सदी ई. पू.2, 3110
आरंभिक स्तूपलगभग तीसरी सदी ई. पू.5110
महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँलगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे8110
सबसे पुराने मंदिरलगभग तीसरी सदी ईसवी8110

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “लगभग” हर पंक्ति में है। कालरेखा 1 की हर तारीख के साथ “लगभग” छपा है; बच्चे उसे छोड़ देते हैं। कॉपी में भी “लगभग” रहे।
  • “ई. पू.” की गिनती उलटी चलती है। लगभग 1500-1000 ई. पू. पहले आता है, लगभग 1000-500 ई. पू. बाद में। बोर्ड पर एक छोटी रेखा खींचकर दिखाइए।
  • मानचित्र पर अपनी ओर से देश जोड़ना। सिर्फ़ वही देश, जिनका नाम किताब लेती है: चीन, कोरिया, जापान, श्रीलंका, म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो सार और काल-रेखा खोलिए, और कालरेखा की पंक्तियाँ एक-एक करके दिखाइए।
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए कालरेखा 1 की तीन पंक्तियाँ और मानचित्र पर सात देश काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: कालरेखा 2 के 1888 वाले ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट को कोल की सोच के साथ रखकर पढ़िए; दोनों में क्या फ़र्क है? (एक्ट के अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी; कोल चाहते थे कि असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें। एक बात चीज़ों पर सरकार के अधिकार की है, दूसरी उन्हें उनकी जगह पर रखने की।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) आरंभिक स्तूप लगभग तीसरी सदी ई. पू. के, और सबसे पुराने मंदिर लगभग तीसरी सदी ईसवी के। (2) श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक।
  • गृहकार्य: मानचित्र पूरा कीजिए, और प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1 घर पर हल कीजिए।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 146–149, और 102–108।

कालांश 11 — मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

किताब — पृष्ठ 111–113 · स्लाइड — आख़िरी भाग · इंटरैक्टिव — हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी अभ्यास का प्रश्न 4 (धनवती का अभिलेख) स्रोत की तरह पढ़ सके, नमूना पत्र 2 हल करे, और जान ले कि अभ्यास के बाक़ी प्रश्न किस कालांश की किस बात से जुड़े हैं।

साथ ले जाइए — किताब, नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ या बोर्ड पर लिखे प्रश्न, और प्रश्न बैंक के उत्तर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 10 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें “लगभग” लिखा हो, और एक जिसमें छूट गया हो। कक्षा से सुधरवाइए।
  2. 5–12 मिनट · प्रश्न 4: धनवती का अभिलेख। प्रश्न 4 का अभिलेख ज़ोर से पढ़वाइए और उसके प्रश्न एक-एक करके पूछिए। नमूना उत्तर — पाँचों उत्तर अभिलेख से निकलते हैं; जहाँ अभिलेख सीधे नहीं बताता, वहाँ “शायद” लिखवाइए।
    • (क) तारीख: शासक के राज्य वर्ष और ऋतु के महीने-दिन से: कुषाण शासक महाराजा हुविष्क के तैंतीसवें साल में, गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन।
    • (ख) बोधिसत्त की मूर्ति क्यों: यह अनुमान है। महायान परंपरा में बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बन गई (पृष्ठ 103), और भिक्खु-भिक्खुनियाँ भी धार्मिक इमारतों के लिए दान देते थे (पृष्ठ 96); इसलिए धनवती ने शायद अपनी श्रद्धा दिखाने के लिए मूर्ति स्थापित की।
    • (ग) रिश्तेदार: उनके माता-पिता, जिनके नाम अभिलेख नहीं देता, और बुद्धमिता, जिनकी बहन की बेटी वे हैं। भिक्खु बल रिश्तेदार नहीं, गुरु हैं (धनवती के या बुद्धमिता के: वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है)।
    • (घ) कौन-से ग्रंथ: अभिलेख बल और बुद्धमिता को “त्रिपिटक जानने वाले” बताता है, इसलिए माना जा सकता है कि धनवती भी त्रिपिटक जानती थीं (पृष्ठ 86)।
    • (ङ) किससे सीखे: भिक्खु बल से, या अपनी मौसी बुद्धमिता से, क्योंकि “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी।
  3. 12–32 मिनट · लिखित परख। प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक) बीस मिनट में हल करवाइए। किताब बंद रहे।
  4. 32–36 मिनट · जोड़ियों में जाँच। बच्चे कॉपियाँ बदलें और नीचे के अंक कैसे कटेंगे वाले तीन नियमों से एक-दूसरे का उत्तर जाँचें। फिर प्रश्न बैंक के उत्तर से मिलाएँ।
  5. 36–38 मिनट · अभ्यास के 12 प्रश्न। बोर्ड-कार्य की तालिका दिखाइए। बच्चे अपनी कॉपी में देखें कि किस प्रश्न का उत्तर उनके पास है, और जो छूटे हैं उन पर निशान लगाएँ।
  6. 38–40 मिनट · आख़िरी पर्ची। इस अध्याय में आपको कौन-सा स्रोत सबसे काम का लगा: ग्रंथ, अभिलेख, मूर्ति या इमारत? एक उदाहरण के साथ लिखिए। यह सवाल हमारी ओर से है।

बोर्ड-कार्य

यह तालिका बोर्ड पर या चार्ट पेपर पर रहे; उत्तर की मुख्य बात से आगे पूरा उत्तर रिवीजन नोट्स में है।

प्रश्नकब दियाउत्तर की मुख्य बात
1. उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादीकालांश 2नियतिवादी: कोई कुछ नहीं बदल सकता; भौतिकवादी: मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता; उपनिषद पूछते थे, “क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों से होता है?”
2. जैन धर्म की शिक्षाएँकालांश 3संपूर्ण विश्व प्राणवान; अहिंसा; पाँच व्रत
3. भोपाल की बेगमेंकालांश 1, 6दोनों बेगमें: रख-रखाव के लिए धन; सुल्तानजहाँ बेगम: संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल के ग्रंथों के प्रकाशन के लिए अनुदान
4. धनवती का अभिलेखकालांश 11तारीख शासक के राज्य वर्ष से; मूर्ति शायद श्रद्धा से (बोधिसत्त की पूजा, पृष्ठ 103); रिश्तेदार: माता-पिता और मौसी बुद्धमिता; ग्रंथ: शायद त्रिपिटक; सीखा भिक्खु बल या मौसी बुद्धमिता से (वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है)
5. स्त्री-पुरुष संघ में क्योंकालांश 4संघ में सब बराबर (पृष्ठ 92); जन्म नहीं, आचरण (पृष्ठ 94); मुक्ति का रास्ता हर व्यक्ति ख़ुद ढूँढ़े (पृष्ठ 92)
6. साँची की मूर्तिकला और बौद्ध साहित्यकालांश 7बहुत-सी मूर्तियों की कुंजी, पर हर मूर्ति उससे नहीं खुलती
7. चित्र 4.32 और 4.33कालांश 74.32 ग्रामीण परिदृश्य, 4.33 शहरी
8. वैष्णववाद, शैववाद, वास्तुकला और मूर्तिकलाकालांश 8भक्ति और अवतार; देवताओं की मूर्तियाँ; गर्भगृह से शिखर और बड़े मंदिर
9. स्तूप क्यों और कैसेकालांश 5अवशेषों पर बने टीले; दान से बने; अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका, तोरणद्वार
10. मानचित्र कार्यकालांश 10सिर्फ़ किताब के बताए इलाके और मार्ग
11. परियोजना: आसपास की परंपराघर परदेखी हुई बातें लिखिए; इमारत की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से
12. परियोजना: पाँच मूर्तियाँ और चित्रघर परशीर्षक हटाकर दो लोगों के वर्णन लीजिए और उनकी तुलना कीजिए

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • प्रश्न 4 में गुरु-शिष्य का रिश्ता। “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी। इसलिए “पाठ किससे सीखे” के उत्तर में बल या बुद्धमिता, दोनों ठीक हैं, अगर बच्चा कारण लिखे; बल रिश्तेदार नहीं हैं।
  • प्रश्न 7 में चित्र किताब के हैं। उत्तर किताब के चित्र 4.32 और 4.33 देखकर लिखना है; प्रश्न चार बातें देखने को कहता है: वास्तुकला, पेड़-पौधे, जानवर, और लोगों के काम-धंधे।
  • प्रश्न 11 धर्म पर राय नहीं माँगता। बच्चे सिर्फ़ यह लिखें कि उन्होंने क्या देखा: कौन-से ग्रंथ, कैसी मूर्तियाँ, कैसी इमारत; किसी परंपरा को अच्छा-बुरा न कहें।
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए नमूना पत्र 2 के वस्तुनिष्ठ और अति लघूत्तरीय प्रश्न पहले, फिर बाक़ी।
  • तेज़ विद्यार्थी को प्रश्न 6 या 9 का पूरा निबंध घर पर लिखने दीजिए, और रिवीजन नोट्स के उत्तर से मिलाने दीजिए।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): आख़िरी पर्ची, ऊपर का प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — कोई भी एक स्रोत, सही उदाहरण के साथ। जैसे: अभिलेख, क्योंकि साँची के दान के अभिलेखों से पता चलता है कि आम लोग और श्रेणियाँ भी स्तूप बनवाने में दान देते थे; या ग्रंथ, क्योंकि वेसान्तर जातक के बिना चित्र 4.13 ग्रामीण दृश्य भर लगता।
  • गृहकार्य: क्विज़ हल कीजिए, और परख के प्रश्न देखिए। घर पर बात करने के लिए अभिभावकों का पन्ना है।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड का पूरा सेट।

पूरे अध्याय के लिए

अलग-अलग बच्चों के लिए

किसके लिएक्या कीजिए
कमज़ोर विद्यार्थीहर कालांश के बोर्ड-कार्य की पहली तीन पंक्तियाँ और निकास-पर्ची का पहला प्रश्न; फ़्लैशकार्ड रोज़ दस
तेज़ विद्यार्थीहर कार्ड का तेज़ विद्यार्थी वाला प्रश्न, और अभ्यास के प्रश्न 6 से 9 के निबंध
जो कुछ कालांश नहीं आ पाएइंटरैक्टिव अध्याय का वही पड़ाव, और किसी साथी की बोर्ड-कार्य वाली कॉपी
जिनके घर इनमें से कोई परंपरा मानी जाती हैउन्हें अपनी आस्था के बारे में बोलने को मत कहिए; कक्षा में हर परंपरा किताब के स्रोतों से ही पढ़ी जाए

सतत मूल्यांकन

साधनकबक्या देखिए
निकास-पर्चीहर कालांश“शायद”, “लगभग”, “अक्सर” बचे या नहीं; दो बातें मिलीं या नहीं
पहले दिन की पर्चीकालांश 1 और 10पहली और आख़िरी पंक्तियों में क्या जुड़ा
बोर्ड-कार्य की कॉपीहर हफ़्तेतालिका पूरी है, और पृष्ठ लिखे हैं
स्रोत पढ़नाकालांश 2, 4, 5, 11किताब के शब्द और अपनी बात अलग रखी या नहीं
मानचित्रकालांश 10सिर्फ़ किताब के बताए देश और मार्ग; संकेत सूची

लिखित मूल्यांकन

अपनी इकाई-परीक्षा के लिए एक सुझाया हुआ ढाँचा; प्रश्न प्रश्न बैंक से चुनिए। कुल 30 अंक।

प्रकारअंकक्या पूछें
वस्तुनिष्ठ, रिक्त स्थान, सही/ग़लत6 × 1 = 6साँची, त्रिपिटक, स्तूप के हिस्से, महायान
अति लघूत्तरीय3 × 2 = 6यज्ञ, स्तूप के दानदाता, गर्भगृह
लघूत्तरीय2 × 3 = 6एलियट संगमरमर और कोल; महाबलीपुरम की दो व्याख्याएँ
स्रोत पर आधारित1 × 4 = 4किताब के किसी एक स्रोत
दीर्घ उत्तरीय1 × 5 = 5स्तूप क्यों और कैसे, या साँची की मूर्तिकला
मानचित्र1 × 3 = 3प्रश्न 10 के इलाके और मार्ग

अंक कैसे कटेंगे, यह पहले ही बता दीजिए

  1. “शायद”, “लगभग” और “अक्सर” छोड़ने पर। किताब जहाँ पक्की बात नहीं कहती, वहाँ उत्तर भी पक्का नहीं होना चाहिए।
  2. दो घटनाएँ मिला देने पर। जैसे 1818 में साँची की खोज और शाहजहाँ बेगम का शासनकाल (1868-1901), या 1854 की दो अलग घटनाएँ।
  3. स्रोत की बात को अपनी राय बना देने पर। स्रोत में जो लिखा है, उसे स्रोत का नाम लेकर लिखिए; अपनी बात अलग वाक्य में।

प्रोजेक्ट और गतिविधि

#प्रोजेक्टकैसे
1अभ्यास का प्रश्न 12: पाँच मूर्तियाँ और चित्रअलग-अलग काल और इलाकों की तसवीरें इकट्ठी कीजिए, शीर्षक हटाकर दो लोगों को दिखाइए, उनके वर्णन लिखिए और तुलना कीजिए
2अभ्यास का प्रश्न 11: आसपास की इमारतकिसी धार्मिक इमारत का बाहर से वर्णन कीजिए और उसकी तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए: आकार, हिस्से, सजावट
3कक्षा की स्रोतों की सूचीहर कालांश के बाद चार्ट पेपर पर एक पंक्ति: कौन-सा स्रोत (ग्रंथ, अभिलेख, मूर्ति, इमारत), किस पृष्ठ पर, उससे क्या पता चला। यह गतिविधि हमारी ओर से है
4कालरेखा चार्टकालरेखा 1 और 2 की पंक्तियाँ एक लंबी पट्टी पर, हर पंक्ति के साथ उसका कालांश

शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ

  1. धर्म को इतिहास की तरह पढ़ाइए। किसी परंपरा की तुलना ऊँच-नीच में मत कीजिए; बुद्ध, महावीर या किसी देवता का अभिनय नहीं, किसी जीवित आस्था के पक्ष-विपक्ष में बहस नहीं। गतिविधियाँ स्रोतों की तुलना करती हैं, आस्थाओं की नहीं।
  2. “शायद”, “लगभग” और “अक्सर” बचाइए। इस अध्याय की कई बातें किताब सावधानी के शब्दों के साथ कहती है, जैसे साँची के बचने के कारणों में “शायद” (पृष्ठ 83), कालरेखा की हर तारीख के साथ “लगभग”, नियतिवादी और भौतिकवादी नामों के साथ “अक्सर” और “सामान्यतः”, और चित्र 4.30 की दरार के “शायद” नदी होने में। आपके बोलने में भी ये शब्द रहें।
  3. किताब से बाहर की तारीखें मत जोड़िए। हर तारीख किताब की, उसके “लगभग” के साथ। बच्चे बाहर की तारीख लाएँ, तो पूछिए कि किताब का कौन-सा पृष्ठ उसे बताता है।
  4. हर मूर्ति की एक ही व्याख्या नहीं। चित्र 4.19 और महाबलीपुरम की चट्टान पर किताब एक से ज़्यादा व्याख्याएँ देती है। “सही” उत्तर वही है जो सारी व्याख्याएँ उनके प्रमाण के साथ लिखे।
  5. चार्ट पेपर सँभालिए। बोर्ड हर कालांश मिट जाता है; जो चित्र और सूचियाँ कालांश 10 और 11 में फिर लगेंगी, वे चार्ट पेपर पर रहें।