कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 53 से 81 · कालांश — 11 (10 पढ़ाने के, 1 मूल्यांकन का), हर एक 40–45 मिनट
इस्तेमाल कैसे करें — हर कालांश की पूरी तैयारी उसके अपने कार्ड में है: किताब के पृष्ठ, स्लाइड, इंटरैक्टिव अध्याय, प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड। पहले “एक नज़र में” वाला चित्र और तालिका देखिए, फिर आज के कालांश का कार्ड खोलिए। कार्ड के हिस्से और शब्द, जैसे निकास-पर्ची, “तैयारी” वाली तालिका में समझाए गए हैं।
अध्याय का बड़ा विचार — यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी तक के आरंभिक समाज की बात करता है: परिवार और विवाह, वर्ण और जाति, संपत्ति और प्रतिष्ठा। हर हिस्से में किताब दो चीज़ें आमने-सामने रखती है: संस्कृत के ब्राह्मणीय ग्रंथों में तय किए गए मानदंड, और अभिलेख, बौद्ध और तमिल ग्रंथ, चीनी यात्रियों के विवरण और महाभारत की कहानियाँ, जो दिखाती हैं कि लोग असल में क्या करते थे। किताब शुरू में ही कहती है: “अत: यह याद रखना ज़रूरी हो जाता है कि ये ग्रंथ किसने लिखे, क्या लिखा गया और किनके लिए इनकी रचना हुई” (पृष्ठ 53)।
हमारी ओर से पूरे अध्याय के लिए एक सवाल: कोई ग्रंथ लिख दे कि समाज में ऐसा होना चाहिए, तो क्या हम मान लें कि लोग सचमुच वैसा ही करते थे? पहले दिन बच्चे इस पर दो पंक्तियाँ पर्ची पर लिखेंगे और पर्चियाँ आपके पास रहेंगी; कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वही पर्चियाँ लौटाकर परखी जाएँगी।
एक नज़र में — ग्यारह कालांश और उनकी सामग्री
हर तीर पर लिखा है कि अगला कालांश पिछले से क्यों निकलता है।
ग्यारह कालांश, एक कहानी
सामग्री के पन्ने: स्लाइड का पाठ · स्लाइड शो · प्रश्न बैंक · फ़्लैशकार्ड · इंटरैक्टिव अध्याय · रिवीजन नोट्स · क्विज़
| कालांश और टॉपिक | पृष्ठ | स्लाइड | इंटरैक्टिव | प्रश्न बैंक | फ़्लैशकार्ड |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 · शुरुआत और समालोचनात्मक संस्करण | 53–54 | शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 | शुरुआत, 1. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण | क1, क2 · ग1 · घ1 | 1–12 |
| 2 · परिवार और पितृवंशिक व्यवस्था | 55–57 | भाग 2 का पहला हिस्सा | 2. बंधुता एवं विवाह | क3 · ख1, ख2 · घ2 | 13–25 |
| 3 · विवाह के नियम, स्त्री का गोत्र, माताएँ | 57–60 | भाग 2 का दूसरा हिस्सा | 2. बंधुता एवं विवाह | क4–क8 · ख3–ख5 · ग2 · घ3 · ङ1 · च1 · छ1 | 26–52 |
| 4 · ‘उचित’ जीविका, अक्षत्रिय राजा, जाति | 61–64 | भाग 3 का पहला हिस्सा | 3. सामाजिक विषमताएँ | क9–क13 · ख6 · ग3, ग4 · घ4, घ5 · ङ2 · च2 | 53–80 |
| 5 · चार वर्णों के परे | 64–67 | भाग 3 का दूसरा हिस्सा | 3. सामाजिक विषमताएँ | क14, क15 · ख7, ख8 · घ6 · च3 | 81–97 |
| 6 · संसाधन और प्रतिष्ठा | 68–71 | भाग 4 | 4. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा | क16 · ग5–ग7 · ङ3 · च5 · छ2, छ3 | 98–115 |
| 7 · सामाजिक अनुबंध; भाषा और विषयवस्तु | 72–73 | भाग 5, और भाग 6 का पहला हिस्सा | 5. सामाजिक विषमताओं की व्याख्या, 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल | क17, क18 · ख9 · घ7 · ङ4, ङ5 | 116–128 |
| 8 · लेखक और तिथियाँ, हस्तिनापुर | 74–77 | भाग 6 का दूसरा हिस्सा | 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल | क19 · ख10 · ग8 · घ8 · च4, च6 · छ4 | 129–150 |
| 9 · एक गतिशील ग्रंथ | 77–78 | भाग 7 | 7. एक गतिशील ग्रंथ | क20 · ङ6 | 151–156 |
| 10 · कालरेखा और मानचित्र कार्य | 79–80 (और 56 का मानचित्र) | कालरेखा वाला भाग | सार और काल-रेखा, मानचित्र | क1, क5 दोबारा | 157–162 |
| 11 · मूल्यांकन | 80–81 | आख़िरी भाग | हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न | तीन नमूना परीक्षा-पत्र | पूरा सेट |
प्रश्न बैंक के कोड ऐसे पढ़िए: क1 मतलब खण्ड क (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) का प्रश्न 1। ख रिक्त स्थान है, ग सही/ग़लत, घ अति लघूत्तरीय (2 अंक), ङ लघूत्तरीय (3 अंक), च दीर्घ उत्तरीय (5 अंक) और छ स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक)। फ़्लैशकार्ड के अंक कार्ड के नंबर हैं।
पढ़ाने से पहले
तैयारी — कार्ड में क्या-क्या है और उसे कैसे तैयार करें
हर कालांश का कार्ड इसी क्रम में चलता है। पहली बार पढ़ा रहे हैं तो यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।
| हिस्सा या औज़ार | यह क्या है | कैसे तैयार करें |
|---|---|---|
| किताब | कालांश के पृष्ठ, भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 में | पढ़ाने से एक दिन पहले वे पृष्ठ ख़ुद पढ़िए, स्रोत वाले बॉक्स और किनारे के प्रश्न भी। |
| स्लाइड | स्लाइड शो का वह भाग जो इस कालांश का है | प्रोजेक्टर हो तो एक बार चलाकर देख लीजिए। न हो तो स्लाइड का पाठ हाथ में रखिए; हर स्लाइड की बात बोर्ड-कार्य में भी है। |
| इंटरैक्टिव अध्याय | अध्याय का वह पड़ाव जो बच्चे फ़ोन या कंप्यूटर पर ख़ुद पढ़ सकते हैं | कक्षा में पर्दे पर चलाना ज़रूरी नहीं। गृहकार्य के साथ बच्चों को उसका लिंक दीजिए। |
| लक्ष्य | कालांश के अंत तक हर बच्चा क्या कर पाएगा | निकास-पर्ची इसी लक्ष्य को जाँचती है, इसलिए पहले लक्ष्य पढ़िए, फिर पर्ची। |
| साथ ले जाइए | कक्षा में जो चीज़ हाथ में चाहिए | एक दिन पहले जुटा लीजिए: चार्ट पेपर, पर्चियाँ, मानचित्र। |
| 40 मिनट | कालांश के चरण, मिनट के हिसाब से | 45 मिनट का कालांश हो तो बचे पाँच मिनट चर्चा वाले चरण को दीजिए। समय कम पड़े तो किनारे का एक प्रश्न गृहकार्य में डाल दीजिए, निकास-पर्ची मत छोड़िए। |
| चित्र | बोर्ड पर बनाने लायक़ एक सादा आरेख | कक्षा से पहले कॉपी में एक बार बनाकर देखिए। बोर्ड पर उसे बच्चों के जवाबों के साथ-साथ बनाइए। |
| बोर्ड-कार्य | कालांश के अंत तक बोर्ड पर बनने वाली तालिका | बच्चे इसे कॉपी में उतारें; यही उनका दोहराने का पन्ना है। बोर्ड सबका है, इसलिए जो चीज़ कई दिन चाहिए, वह चार्ट पेपर पर बनाइए। |
| यहाँ बच्चे अटकेंगे | आम उलझनें और उनसे निकलने का तरीका | पढ़ाते समय इन जगहों पर रुककर एक सवाल पूछिए। |
| निकास-पर्ची | कालांश के आख़िरी चार मिनट में दो छोटे सवाल, पर्ची पर | पर्चियाँ इकट्ठी कीजिए। अगले कालांश के पहले पाँच मिनट उन्हीं की ग़लतियों पर। |
| प्रश्न बैंक | प्रश्न बैंक के कोड, जैसे क1 या घ3 | गृहकार्य यहीं से है। उत्तर उसी पन्ने पर खुलते हैं, इसलिए कॉपी जाँचते समय मिलाइए। |
| फ़्लैशकार्ड | फ़्लैशकार्ड के कार्ड नंबर | दोहराने के लिए। जोड़ियों में एक बच्चा पूछे, दूसरा बताए। |
हर कालांश से पहले:
- कार्ड के पृष्ठ किताब में पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाला बॉक्स।
- पिछली निकास-पर्चियाँ छाँटिए: कितनों ने सही लिखा, सबसे ज़्यादा कौन-सी भूल हुई।
- “चित्र” वाला आरेख कॉपी में एक बार बनाइए।
- गृहकार्य के कोड प्रश्न बैंक में खोलकर देख लीजिए कि उत्तर कितने लंबे हैं।
पढ़ाने का क्रम: पहले मानदंड, फिर व्यवहार
किताब का हर भाग एक ही ढंग से चलता है। पहले वह बताती है कि धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र और मनुस्मृति जैसे संस्कृत ग्रंथ क्या तय करते थे; फिर वह अभिलेख, पालि और तमिल ग्रंथ, चीनी यात्रियों के विवरण या महाभारत की कोई कहानी सामने रखती है, जो दिखाती है कि व्यवहार कितना अलग था। कालांश 1 में बच्चे वे सवाल सीखते हैं जो हर ग्रंथ से पूछने हैं: किसने लिखा, क्या लिखा और किनके लिए। कालांश 2 से 6 तक यही सवाल परिवार, विवाह, वर्ण, जाति और संपत्ति पर लगते हैं। कालांश 7 से 9 में वही सवाल महाभारत पर लौटते हैं: इसकी भाषा क्या है, इसे किसने और कब लिखा, और यह ग्रंथ सदियों तक बदलता क्यों रहा।
इसलिए हर कालांश के बोर्ड-कार्य में दो खाने बनते हैं: एक में “ग्रंथों के अनुसार”, दूसरे में “दूसरे साक्ष्य”। कालांश 10 में यही दो खाने पहले दिन की पर्चियों का जवाब बनते हैं। इस क्रम को मत तोड़िए। पहले कहानी सुना दी और स्रोत बाद में दिखाया, तो बच्चे ग्रंथ के नियम को ही इतिहास मान लेंगे, और अध्याय की पूरी बात खो जाएगी।
सामग्री — यह जुटा लीजिए
| # | क्या | किस कालांश में |
|---|---|---|
| 1 | हर बच्चे के लिए एक पर्ची, और पर्चियाँ रखने के लिए एक लिफ़ाफ़ा | 1 और 10 |
| 2 | चार्ट पेपर: “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य”; हर कालांश में साथ ले जाइए | 2 से 9 |
| 3 | चार्ट पेपर: “स्रोत 1 से 16”, हर स्रोत के आगे उसका ग्रंथ या अभिलेख और भाषा | 2 से 10 |
| 4 | किताब का मानचित्र 1 (पृष्ठ 56) और अध्याय 2 का मानचित्र 1 | 10 |
| 5 | कालरेखा 1 और 2 (पृष्ठ 79) के लिए चार्ट पेपर की एक लंबी पट्टी | 10 |
| 6 | प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1, हर बच्चे के लिए (या बोर्ड पर लिखा हुआ) | 11 |
कक्षा-व्यवस्था
- चार-पाँच बच्चों के समूह हाज़िरी के क्रम से बनाइए, और हर कालांश में वही समूह रखिए। समूह किसी और आधार पर मत बनाइए।
- “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट हर कालांश में साथ ले जाइए; कालांश के अंत में उसमें एक-दो पंक्तियाँ जुड़ें। बच्चे यही दो खाने अपनी कॉपी में भी रखें।
- हर बच्चा कॉपी का पहला पन्ना “स्रोतों की सूची” के लिए छोड़े: स्रोत का नंबर, ग्रंथ या अभिलेख का नाम, भाषा, पृष्ठ।
- बोर्ड हर कालांश में नया बनता है; जो चीज़ अगले दिन भी चाहिए, वह चार्ट पेपर पर जाती है।
अधिगम प्रतिफल
| # | प्रतिफल | कालांश | जाँच |
|---|---|---|---|
| 1 | किसी ग्रंथ को स्रोत बनाने से पहले के तीन सवाल बताता है, और महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण कैसे बना, यह समझाता है | 1 | निकास-पर्ची 1, घ1 |
| 2 | पितृवंशिकता का अर्थ बताता है और स्रोत 1 और 2 से समझाता है कि विशिष्ट परिवारों में यह क्यों अहम थी | 2, 3 | निकास-पर्ची 2, च1 |
| 3 | गोत्र के दो नियम बताता है और सातवाहन रानियों के उदाहरण से दिखाता है कि वे सर्वत्र नहीं माने गए | 3 | निकास-पर्ची 3, घ3, ङ1 |
| 4 | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में बताई गई चार वर्णों की ‘जीविका’ बताता है, और अक्षत्रिय राजाओं, श्रेणियों और वणिकों के उदाहरण से व्यवहार का अंतर दिखाता है | 4 | निकास-पर्ची 4, च2 |
| 5 | द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं की तुलना करता है, और चाण्डालों के बारे में ब्राह्मणीय और अब्राह्मणीय स्रोतों का अंतर बताता है | 5 | निकास-पर्ची 5, च3 |
| 6 | स्त्री और पुरुष के संपत्ति अधिकारों की तुलना करता है, और बौद्ध और तमिल स्रोतों से प्रतिष्ठा के दूसरे आधार बताता है | 6 | निकास-पर्ची 6, च5 |
| 7 | सुत्तपिटक के मिथक से राजा और ‘कर’ की बात समझाता है, और ग्रंथ परखने के सवाल महाभारत पर लगाता है | 7 | निकास-पर्ची 7, ङ4, घ7 |
| 8 | महाभारत की रचना के चरण बताता है और हस्तिनापुर के उत्खनन को स्रोत 15 से मिलाता है | 8 | निकास-पर्ची 8, च4, घ8 |
| 9 | “कुंती ओ निषादी” के उदाहरण से बताता है कि महाभारत को गतिशील ग्रंथ क्यों कहते हैं | 9 | निकास-पर्ची 9, ङ6 |
| 10 | दोनों कालरेखाएँ और मानचित्र 1 पढ़ता है, और पहले दिन के सवाल का उत्तर अध्याय के साक्ष्यों से देता है | 10, 11 | पहले दिन की पर्ची, नमूना पत्र 1 |
कालांश-दर-कालांश
कालांश 1 — शुरुआत: आरंभिक समाज (लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी); 1. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण
किताब — पृष्ठ 53–54 · स्लाइड — शुरू की तीन स्लाइड और भाग 1 · इंटरैक्टिव — शुरुआत, 1. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता पाएगा कि किसी ग्रंथ को इतिहास का स्रोत बनाने से पहले कौन-से तीन सवाल पूछे जाते हैं, और महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण कैसे बना और उससे कौन-सी दो बातें उभरीं।
साथ ले जाइए — हर बच्चे के लिए एक पर्ची और एक लिफ़ाफ़ा; “स्रोत 1 से 16” वाला ख़ाली चार्ट पेपर।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पहले दिन की पर्ची। बोर्ड पर लिखिए: “कोई ग्रंथ लिख दे कि समाज में ऐसा होना चाहिए, तो क्या हम मान लें कि लोग सचमुच वैसा ही करते थे?” बच्चे दो पंक्तियाँ और अपना नाम लिखें। पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में रखिए; कालांश 10 में यही लौटेंगी। अभी सही-ग़लत मत बताइए।
- 5–12 मिनट · ग्रंथ और समाज। पृष्ठ 53 से बताइए: यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी तक के समाज का है। कुछ ग्रंथ सामाजिक व्यवहार के मानदंड तय करते थे, और कुछ समाज का चित्रण करते थे। किताब के अनुसार हर ग्रंथ, और हर अभिलेख भी, किसी समुदाय विशेष के दृष्टिकोण से लिखा जाता था। इसलिए तीन सवाल: किसने लिखा, क्या लिखा गया, किनके लिए लिखा गया। साथ में दो और बातें: किस भाषा में, और प्रचार-प्रसार कैसे हुआ। बोर्ड पर “चित्र” बनाइए।
- 12–20 मिनट · महाभारत, एक बहुत बड़ा ग्रंथ। पृष्ठ 53 से: महाभारत अपने वर्तमान रूप में एक लाख श्लोकों से अधिक का महाकाव्य है, जिसकी रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक होती रही। इसकी मुख्य कथा दो परिवारों के बीच युद्ध की है, और इसके कुछ भाग अलग-अलग सामाजिक समुदायों के आचार-व्यवहार के मानदंड तय करते हैं। फिर बच्चों से पूछिए: इतने लंबे समय में, अलग-अलग जगह हाथ से लिखी प्रतियों में, क्या हर प्रति एक जैसी रही होगी? (नहीं; अगला चरण यही दिखाता है।)
- 20–30 मिनट · समालोचनात्मक संस्करण कैसे बना। पहले हमारी ओर से एक उदाहरण: मान लीजिए किसी कविता की चार हाथ से लिखी प्रतियाँ हैं और हर प्रति में एक-दो पंक्तियाँ अलग हैं। समूह दो मिनट सोचें कि “मुख्य” पाठ कैसे तय करेंगे। फिर पृष्ठ 54 से असली तरीका: 1919 में संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में विद्वानों ने देश के विभिन्न भागों से, विभिन्न लिपियों में लिखी संस्कृत पांडुलिपियाँ इकट्ठी कीं, सबके श्लोक मिलाए और वे श्लोक चुने जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले। नतीजा: 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंड, और सैंतालीस वर्ष का काम।
- 30–36 मिनट · दो बातें जो उभरीं। पहली: उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की पांडुलिपियों के अनेक अंशों में समानता। दूसरी: अनेक क्षेत्रीय प्रभेद, जो पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए; 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठ इन्हीं का ब्योरा हैं। किताब इन प्रभेदों में “द्वंद्व और मतैक्य” दोनों देखती है। फिर स्रोतों की सीमा: हमारी समझ ज़्यादातर उन ग्रंथों पर टिकी है “जो संस्कृत में ब्राह्मणों द्वारा उन्हीं के लिए लिखे गए”; पालि, प्राकृत और तमिल ग्रंथ बताते हैं कि इन आदर्शों पर प्रश्न भी उठते थे और “यदा-कदा इनकी अवहेलना भी की जाती थी”।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) किसी ग्रंथ को इतिहास का स्रोत बनाने से पहले कौन-से तीन सवाल पूछेंगे? (2) समालोचनात्मक संस्करण में क्षेत्रीय प्रभेदों का क्या किया गया?
एक ग्रंथ से इतिहास: पहले तीन सवाल (चरण 2)
एक ग्रंथ से इतिहास: पहले तीन सवाल
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अध्याय का काल | लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी | 53 |
| हर ग्रंथ से तीन सवाल | किसने लिखा, क्या लिखा गया, किनके लिए; साथ में भाषा और प्रचार-प्रसार | 53 |
| महाभारत | एक लाख श्लोकों से अधिक; रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक | 53 |
| समालोचनात्मक संस्करण | 1919 से, वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में; पांडुलिपियाँ इकट्ठी कीं, श्लोकों की तुलना की, साझा श्लोक चुने | 54 |
| नतीजा | 13,000 पृष्ठ, सैंतालीस वर्ष | 54 |
| पहली बात | कश्मीर और नेपाल से केरल और तमिलनाडु तक समानता | 54 |
| दूसरी बात | क्षेत्रीय प्रभेद, पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में; आधे से अधिक पृष्ठ इन्हीं के | 54 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “समालोचनात्मक” मतलब ग्रंथ की बुराई करना? नहीं। यहाँ इसका मतलब है देश भर की पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना करके तैयार किया गया पाठ (पृष्ठ 54)।
- “क्षेत्रीय पाठ हटा दिए गए।” नहीं। प्रभेद पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए, और 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठ उन्हीं के ब्योरे हैं।
- “1919 में महाभारत का यह संस्करण छप गया।” 1919 में काम शुरू हुआ; परियोजना पूरी होने में सैंतालीस वर्ष लगे। कालरेखा 2 (पृष्ठ 79) में यही 1919-66 लिखा है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 1. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण खोलिए, और 13,000 पृष्ठों वाली बात से पहले रुककर पूछिए कि इतने पृष्ठ क्यों लगे होंगे।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए तीन सवाल (किसने, क्या, किनके लिए) और तीन आँकड़े (1919, 13,000 पृष्ठ, सैंतालीस वर्ष) काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: कोई श्लोक सिर्फ़ एक क्षेत्र की पांडुलिपियों में मिला, तो वह समालोचनात्मक संस्करण में कहाँ गया होगा? (मुख्य पाठ में नहीं, क्योंकि चुने वही श्लोक गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले; ऐसे प्रभेद पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में गए।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) किसी ग्रंथ को स्रोत बनाने से पहले के तीन सवाल; (2) क्षेत्रीय प्रभेदों का क्या किया गया।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) ग्रंथ किसने लिखा, क्या लिखा गया, और किनके लिए उसकी रचना हुई। (2) उन्हें मुख्य पाठ में नहीं लिया गया, पर हटाया भी नहीं गया: वे पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1, क2, ग1 और घ1। कॉपी के पहले पन्ने पर “स्रोतों की सूची” का खाका बनाइए।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 1–12।
कालांश 2 — 2. बंधुता एवं विवाह: परिवार और पितृवंशिक व्यवस्था (2.1-2.2)
किताब — पृष्ठ 55–57 · स्लाइड — भाग 2 का पहला हिस्सा · इंटरैक्टिव — 2. बंधुता एवं विवाह
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी पितृवंशिकता और मातृवंशिकता का अर्थ बता पाएगा, और स्रोत 1 और 2 से दिखा पाएगा कि ग्रंथ पुत्र और पिता से पुत्र को मिलने वाली विरासत पर कितना ज़ोर देते हैं।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट (आज पहली बार), और “स्रोत 1 से 16” वाला चार्ट।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 1 की पर्चियों की सबसे आम भूल बोर्ड पर लिखिए, अक्सर “प्रभेद हटा दिए गए”। एक बच्चे से सही बात कहलवाइए: पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए।
- 5–12 मिनट · परिवार और बंधुता (2.1)। पृष्ठ 55 से: परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं, जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं, पर इनकी परिभाषा हर समाज में अलग है: कुछ समाजों में चचेरे, मौसेरे भाई-बहन से खून का रिश्ता माना जाता है, कुछ में नहीं। विशिष्ट परिवारों की जानकारी आसानी से मिलती है, सामान्य लोगों की नहीं। फिर शब्द-बॉक्स: कुल (परिवार), ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह), वंश (पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज)।
- 12–20 मिनट · पितृवंशिक व्यवस्था (2.2)। पृष्ठ 55 से: एक स्तर पर महाभारत बंधुता के रिश्तों में बदलाव की कहानी है। कुरु वंश के बांधवों के दो दल, कौरव और पांडव, भूमि और सत्ता के लिए लड़े; पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया। पितृवंशिकता महाकाव्य से पहले भी थी; महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इसे और सुदृढ़ किया। अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से इसी पर चलते थे, पर अपवाद भी थे: पुत्र न होने पर कभी भाई, कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली।
- 20–28 मिनट · स्रोत 1, ऋग्वेद का मंत्र। पहले जानकारी (पृष्ठ 56): यह मंत्र संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में ऋग्वेद में जोड़ा गया; विवाह संस्कार में पुरोहित इसे पढ़ता था, और आज भी अनेक हिंदू विवाह संस्कारों में इसका प्रयोग होता है। इसमें कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”; ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ से मतलब पिता और पति के घर से है। फिर किताब के किनारे का प्रश्न समूहों में: विवाह का वधू के लिए क्या अर्थ है, और वर के लिए क्या? उत्तर नीचे “नमूना उत्तर” में है।
- 28–36 मिनट · स्रोत 2, गद्दी किसकी? पहले जानकारी (पृष्ठ 57), “चित्र” बनाते हुए: धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए उनके अनुज पांडु सिंहासन पर बैठे; पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सब राजकुमार अल्पवयस्क थे; हस्तिनापुर के नागरिक पांडवों को चाहते थे; और दुर्योधन कहता है कि पांडवों को विरासत मिली तो “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”। फिर किनारे का प्रश्न: राजा बनने के कौन-कौन से आधार दिखते हैं, और कुल में जन्म कितना ज़रूरी था? किताब यह भी कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि ग्रंथ लिखने वाले क्या सोचते थे।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) पितृवंशिकता का अर्थ क्या है? (2) स्रोत 2 में दुर्योधन को किस बात का डर है?
स्रोत 2: गद्दी किसकी? (चरण 5)
स्रोत 2: गद्दी किसकी?
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| शब्द या बात | मतलब | पृष्ठ |
|---|---|---|
| कुल | संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए शब्द | 55 |
| ज्ञाति | बांधवों का बड़ा समूह | 55 |
| वंश | पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज, जो इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं | 55 |
| पितृवंशिकता | पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलने वाली वंश परंपरा | 55 |
| मातृवंशिकता | माँ से जुड़ी वंश परंपरा | 55 |
| महाभारत की कथा | कुरु वंश के दो दल, कौरव और पांडव; पांडव जीते, फिर पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित | 55 |
| चलन और अपवाद | अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से पितृवंशिक; कभी भाई, कभी बंधु-बांधव, कभी प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ | 55 |
| स्रोत 1 | ऋग्वेद का विवाह मंत्र, संभवत: लगभग 1000 ई.पू.; “उत्तम पुत्र” की कामना | 56 |
| स्रोत 2 | महाभारत का आदिपर्वन्; दुर्योधन को डर कि गद्दी पांडवों के पुत्र-पौत्रों को जाएगी | 57 |
हिंदी किताब के बॉक्स में यहाँ ‘जाति’ छपा है; यह शब्द ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह) है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं।
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “पितृवंशिकता महाभारत से शुरू हुई।” नहीं। यह महाकाव्य की रचना से पहले भी थी; महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया (पृष्ठ 55)।
- ज्ञाति और जाति। शब्द-बॉक्स का शब्द बांधवों के बड़े समूह के लिए है। वर्ण व्यवस्था वाली जाति भाग 3 (कालांश 4) में आएगी; दोनों को एक मत होने दीजिए।
- “स्रोत 2 की बातचीत सचमुच ऐसे ही हुई थी।” किताब ख़ुद कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि ग्रंथ लिखने वाले क्या सोचते थे; कभी-कभी इनमें परस्पर विरोधी विचार भी मिलते हैं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. बंधुता एवं विवाह खोलिए, और स्रोत 2 से पहले रुककर पूछिए कि राजा बनने के लिए क्या-क्या चाहिए होगा।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए पितृवंशिकता की परिभाषा और स्रोत 1 की एक बात (“उत्तम पुत्र” की कामना) काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पितृवंशिक राजवंश में पुत्र न हो, तो किताब के अनुसार गद्दी किन-किन रास्तों से आगे गई? (कभी एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बना, कभी बंधु-बांधवों ने सिंहासन पर अधिकार जमाया, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) पितृवंशिकता का अर्थ; (2) स्रोत 2 में दुर्योधन का डर।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है। (2) कि पांडवों को पांडु से विरासत मिली, तो उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र उस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे, और दुर्योधन का पक्ष गद्दी से बाहर रहेगा।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क3, ख1, ख2 और घ2।
- पृष्ठ 56–57 के सवालों के नमूना उत्तर —
-
पृष्ठ 56 (मंत्र में विवाह का वधू और वर के लिए अभिप्राय): दोनों के लिए अर्थ अलग है।
- वधू के लिए: उसे ‘यहाँ’ (पिता के घर) से मुक्त करके ‘वहाँ’ (पति के घर) मज़बूती से स्थापित किया जाता है; यानी पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना। उसके लिए यह कामना भी है कि उसे पति के प्रेम का सौभाग्य मिले।
- वर के लिए: कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के उत्तम पुत्र हों, यानी वर का वंश आगे बढ़े।
दोनों अभिप्राय समान नहीं: वधू का घर और जीवन बदलता है, जबकि वर के लिए विवाह पुत्र और वंश से जुड़ा है।
-
पृष्ठ 57 (राजा बनने के मूल तत्व, और कुल में जन्म का महत्व): स्रोत 2 में ये आधार दिखते हैं।
- शारीरिक पूर्णता: धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए अनुज पांडु सिंहासन पर बैठे; दुर्योधन भी पिता की “अपूर्णता” की बात करता है।
- उम्र: पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सब राजकुमार अल्पवयस्क थे।
- योग्यता और जनता का समर्थन: नागरिक पांडवों को चाहते थे, क्योंकि वे “अधिक योग्य और सदाचारी” थे।
- पिता से विरासत: दुर्योधन का तर्क कि गद्दी पिता से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र को जाती है।
सारे दावेदार कुरु वंश के हैं, इसलिए उस कुल में जन्म पहली शर्त थी; झगड़ा इस पर है कि कुल की कौन-सी शाखा राज करे। कौन-सा आधार उचित या अनुचित लगता है, यह बच्चे कारण के साथ ख़ुद लिखें; जैसे योग्यता और जनता का समर्थन उचित लग सकता है, और नेत्रहीन होने के कारण किसी को गद्दी से हटाना अनुचित।
-
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 13–25।
कालांश 3 — 2. बंधुता एवं विवाह: विवाह के नियम, स्त्री का गोत्र, माताएँ (2.3-2.5)
किताब — पृष्ठ 57–60 · स्लाइड — भाग 2 का दूसरा हिस्सा · इंटरैक्टिव — 2. बंधुता एवं विवाह
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बहिर्विवाह, अंतर्विवाह, बहुपत्नी और बहुपति प्रथा का अर्थ बता पाएगा, गोत्र के दो नियम लिख पाएगा, और सातवाहन रानियों के उदाहरण से दिखा पाएगा कि ये नियम हर जगह नहीं माने गए।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट; बोर्ड पर पहले से लिखी स्रोत 4 की सात नामों वाली सूची (किताब के पृष्ठ 59 से)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 2 की पर्चियों में अक्सर पितृवंशिकता और मातृवंशिकता उलट जाती हैं। “पितृ” यानी पिता, “मातृ” यानी माता: एक बच्चा दोनों शब्द बोर्ड पर लिखे।
- 5–12 मिनट · विवाह के नियम (2.3)। पृष्ठ 57–58 से: पितृवंश आगे बढ़ाने के लिए पुत्र अहम थे, और पुत्रियों का विवाह अपने गोत्र से बाहर करना अपेक्षित था (बहिर्विवाह)। इसलिए ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कन्याओं का जीवन सावधानी से नियमित होता था, ताकि ‘उचित’ समय पर ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह हो; कन्यादान पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया। नए नगरों से सामाजिक जीवन जटिल हुआ, तो ब्राह्मणों ने आचार संहिताएँ बनाईं: लगभग 500 ई.पू. से धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र, और इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति, जिसका संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच हुआ। ब्राह्मण लेखक अपने दृष्टिकोण को सार्वभौमिक मानते थे, पर उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”। फिर पृष्ठ 57 का शब्द-बॉक्स: अंतर्विवाह, बहिर्विवाह, बहुपत्नी प्रथा, बहुपति प्रथा।
- 12–20 मिनट · स्रोत 3, विवाह के प्रकार। पहले जानकारी (पृष्ठ 58): धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ और बाकी निंदित माने गए। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियम नहीं मानते थे। स्रोत 3 की चार पद्धतियाँ बोर्ड पर लिखिए, फिर किनारे का प्रश्न समूहों में: हर पद्धति में विवाह का निर्णय किसने लिया? जवाबों के साथ “चित्र” बनाइए।
- 20–28 मिनट · स्त्री का गोत्र (2.4)। पृष्ठ 58 से: लगभग 1000 ई.पू. के बाद से लोगों को, ख़ासकर ब्राह्मणों को, गोत्रों में बाँटने की ब्राह्मणीय पद्धति चली; हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर था। दो नियम: विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी, और एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। फिर सातवाहन: लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों के शासक। बोर्ड की सात नामों वाली सूची से किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 59): कितने गोतमी–पुत्त, कितने वसिथि–पुत्त? बच्चे गिनें, फिर नीचे के नमूना उत्तर वाली बात बताइए।
- 28–36 मिनट · रानियाँ और माताएँ (2.4–2.5)। पृष्ठ 60 से: रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; यानी उन्होंने विवाह के बाद पति का गोत्र नहीं अपनाया। कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था: यह अंतर्विवाह का उदाहरण है, जिसका प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में है। फिर माताएँ: सातवाहन राजा मातृनाम से पहचाने जाते थे, पर सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था। स्रोत 5: गांधारी ने दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की, “युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता”; दुर्योधन नहीं माना, लड़ा और हार गया। किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 60) पूरी कक्षा से।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) ब्राह्मणीय गोत्र पद्धति के दो नियम लिखिए। (2) सातवाहन रानियों ने इनमें से कौन-सा नियम नहीं माना, और कैसे पता चलता है?
स्रोत 3: विवाह का निर्णय कौन लेता है? (चरण 3)
स्रोत 3: विवाह का निर्णय कौन लेता है?
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। इसकी पंक्तियाँ “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाले चार्ट में भी जोड़िए।
| बात | ग्रंथों के अनुसार | दूसरे साक्ष्य | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| विवाह के प्रकार | आठ प्रकार; पहले चार ‘उत्तम’, बाकी निंदित | निंदित पद्धतियाँ संभवत: उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियम नहीं मानते थे | 58 |
| विवाह के बाद गोत्र | स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी | सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र नाम (गौतम, वसिष्ठ) रखा | 58, 60 |
| किससे विवाह | एक ही गोत्र में विवाह नहीं (बहिर्विवाह) | कुछ सातवाहन रानियाँ एक ही गोत्र की थीं (अंतर्विवाह) | 58, 60 |
| माताएँ | सातवाहन राजा मातृनाम से, जैसे गोतमी–पुत्त | फिर भी सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक | 60 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “मातृनाम है, तो उत्तराधिकार भी माँ की ओर से चलता होगा।” नहीं। सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे, फिर भी उनके यहाँ सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था (पृष्ठ 60)।
- गिनती में गड़बड़। छपी हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है। सही गिनती: गोतमी–पुत्त 3, वसिथि (वसथि)–पुत्त 2।
- बहुपत्नी और बहुपति। बहुपत्नी प्रथा में एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ (कुछ सातवाहन राजा), बहुपति प्रथा में एक स्त्री के अनेक पति (द्रौपदी, कालांश 8)।
- “ब्राह्मणीय नियम सब मानते थे।” नहीं। किताब के शब्दों में ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”, और सातवाहन रानियाँ इसका उदाहरण हैं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. बंधुता एवं विवाह खोलिए, और सातवाहन रानियों वाली बात से पहले रुककर पूछिए कि गोत्र का पहला नियम माना गया होगा या नहीं।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए गोत्र के दो नियम और एक उदाहरण (रानियों ने पिता का गोत्र रखा) काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: सातवाहन रानियों के नाम ही गोत्र के दोनों नियमों को कैसे तोड़ते दिखते हैं? (नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे, यानी विवाह के बाद पति का गोत्र नहीं अपनाया; और कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) गोत्र के दो नियम; (2) सातवाहन रानियों ने कौन-सा नियम नहीं माना।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) विवाह के बाद स्त्री को पिता के नहीं, पति के गोत्र का माना जाता था; और एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। (2) पहला नियम: रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे। (कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की भी थीं, जो दूसरे नियम के भी विरुद्ध था।)
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क4–क8, ख3–ख5, ग2, घ3, ङ1 और छ1; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 1 (विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी; यही प्रश्न बैंक का च1 है) कॉपी में।
- पृष्ठ 60 की चर्चा, गृहकार्य के रूप में — “आजकल बच्चों का नामकरण किस भाँति होता है?” यह कक्षा में नहीं, घर पर कीजिए: हर बच्चा अपने ही परिवार के पाँच-छह नाम कॉपी में देखे कि उनमें पिता का नाम है, माता का नाम है या कोई और आधार। फिर इनकी तुलना सातवाहन नामों से करे, जिनमें राजा की पदवी के बाद माता के नाम से बना शब्द आता है (जैसे गोतमी–पुत्त, यानी गोतमी का पुत्र), और लिखे कि आज के नाम मिलते-जुलते हैं या भिन्न। उपनाम, गोत्र या किसी समुदाय का नाम बोर्ड पर मत लिखवाइए; यह सावधानी हमारी ओर से है।
- पृष्ठ 58–60 के सवालों के नमूना उत्तर —
-
पृष्ठ 58 (हर विवाह पद्धति में निर्णय किसने लिया): स्रोत 3 की चारों पद्धतियाँ देखिए।
- पहली: वधू का पिता; वह स्वयं वेदज्ञ वर को आमंत्रित करके कन्या का दान करता है।
- चौथी: वधू का पिता; वह वर-वधू को संबोधित करके और वर का सम्मान करके कन्या का दान करता है।
- पाँचवीं: वर; वह वधू के बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन देकर वधू प्राप्त करता है। धन वधू के बांधवों (अन्य लोग) को भी जाता है, इसलिए वे भी इसमें शामिल हैं।
- छठी: वधू और वर दोनों; यह स्त्री और पुरुष का अपनी इच्छा से संयोग है।
किसी भी पद्धति में वर के पिता का नाम नहीं आता।
-
पृष्ठ 59 (कितने गोतमी–पुत्त, कितने वसिथि–पुत्त): गोतमी–पुत्त 3 हैं (पहली, तीसरी और सातवीं पंक्ति) और वसिथि/वसथि–पुत्त 2 (दूसरी और पाँचवीं पंक्ति)।
- नामों का अर्थ: ये नाम माता के नाम से बने हैं; गोतमी–पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं; ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं।
छपी हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है।
-
पृष्ठ 60 (क्या यह उद्धरण बताता है कि माँ को किस दृष्टि से देखा जाता था): कुछ हद तक।
- माँ की सलाह: स्रोत 5 में गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह देती है, और कहती है कि संधि करके वह पिता, माता और शुभेच्छुकों का सम्मान करेगा। यहाँ माँ एक समझदार सलाहकार के रूप में दिखती है।
- निर्णय पुत्र का: दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, युद्ध लड़ा और हार गया।
- सावधानी: सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे, फिर भी उनके यहाँ उत्तराधिकार पितृवंशिक था।
यानी माँ की बात का आदर था, पर अंतिम निर्णय पुत्र का ही रहा; एक उद्धरण से निष्कर्ष सावधानी से निकालिए।
-
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 26–52।
कालांश 4 — 3. सामाजिक विषमताएँ: ‘उचित’ जीविका, अक्षत्रिय राजा, जाति और सामाजिक गतिशीलता (3.1-3.3)
किताब — पृष्ठ 61–64 · स्लाइड — भाग 3 का पहला हिस्सा · इंटरैक्टिव — 3. सामाजिक विषमताएँ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में बताई गई चार वर्णों की ‘जीविका’ लिख पाएगा, और अक्षत्रिय राजाओं, रेशम बुनकरों की श्रेणी और वणिकों के उदाहरणों से दिखा पाएगा कि व्यवहार इन नियमों से कहाँ अलग था।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट; “स्रोत 1 से 16” वाला चार्ट (आज इसमें स्रोत 6, 7 और 8 जुड़ेंगे)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 3 की पर्चियों में अक्सर गोत्र के दो नियमों में से एक ही लिखा होता है। एक बच्चा दोनों नियम बोर्ड पर लिखे, और दूसरा बताए कि सातवाहन रानियों ने कौन-सा नियम नहीं माना।
- 5–13 मिनट · ‘उचित’ जीविका (3.1)। पृष्ठ 61 से। पहले किताब की शुरुआती बात, जैसी किताब में है: धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक व्यवस्था का उल्लेख है, जिसमें वर्णों को उनकी योग्यता, कार्य और व्यवसाय, क्षमताओं और रुचियों के आधार पर निर्धारित किया गया था। फिर चारों वर्णों की ‘जीविका’ बोर्ड पर, शीर्षक “ग्रंथों के अनुसार” के नीचे: ब्राह्मण वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, दान देना और ग्रहण करना; क्षत्रिय युद्ध करना, लोगों की रक्षा और न्याय संचालन, साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना; वैश्य कृषि, पशुपालन और व्यापार, साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ करना और कराना, दान देना; शूद्र समाज के सुचारु संचालन में बाकी तीन वर्णों की सहायता। फिर किताब की अगली बात: श्रीमद्भगवद् गीता जैसे ग्रंथ भी संकेत करते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था “गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य” पर आधारित थी, जन्म से तय कोई कठोर व्यवस्था नहीं। ऐसे उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी मिलते हैं।
- 13–20 मिनट · स्रोत 6 और 7। पहले जानकारी। स्रोत 6 (पृष्ठ 61): प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यवसायों में लचीलापन दिखता है; ऋग्वेद के एक सूक्त का वक्ता कहता है कि वह स्वयं कवि है, उसके पिता वैद्य हैं और माता अन्न पीसने का काम करती हैं। स्रोत 7 (पृष्ठ 62, महाभारत का आदिपर्वन्) क्रम से सुनाइए: ब्राह्मण द्रोण, जो कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाते थे, ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना किया; एकलव्य ने मिट्टी की द्रोण-प्रतिमा को गुरु मानकर अभ्यास किया और तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया; अर्जुन ने द्रोण को उनका प्रण याद दिलाया; द्रोण ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया; और अंत में “कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।” फिर किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 62) समूहों में। उत्तर नीचे “नमूना उत्तर” में है।
- 20–28 मिनट · अक्षत्रिय राजा (3.2)। पृष्ठ 62–63 से, “चित्र” बनाते हुए। शास्त्रों के अनुसार “केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे”, पर अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले। मौर्यों के उद्भव पर बहस होती रही है: बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं। मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और कण्व ब्राह्मण थे। मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे, फिर भी संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन है। सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया और चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाने का दावा किया, फिर भी रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए। किताब का निष्कर्ष बोर्ड पर लिखिए: राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके, और राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”।
- 28–36 मिनट · जाति, श्रेणी और वणिक (3.3)। पृष्ठ 63–64 से: वर्ण केवल चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी; नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियों की संख्या बढ़ती रही, और एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं। मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी: रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी, जो मूलतः लाट (गुजरात) की निवासी थी, मंदसौर गई, जिसे उस समय दशपुर कहा जाता था; सबने मिलकर शिल्प से कमाया धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया। स्रोत 8 की जीविकाएँ पढ़िए: संगीत, जीवनियाँ और कथाएँ, धार्मिक व्याख्यान, धार्मिक अनुष्ठान, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध। फिर वणिकों वाला बॉक्स: शास्त्र व्यापार को वैश्यों की जीविका बताते हैं, पर शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त ब्राह्मण–वणिक है, और पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में मंदिर के लिए धन देने वाले दो भाई क्षत्रिय–वणिक कहे गए हैं। किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 64) पूरी कक्षा से।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार वैश्यों की जीविका क्या थी? (2) किन्हीं दो ऐसे राजवंशों के नाम लिखिए जो क्षत्रिय नहीं थे, और बताइए कि वे किस वर्ण के थे या ग्रंथ उन्हें क्या मानते थे।
राजा कौन बने: शास्त्र और व्यवहार (चरण 4)
राजा कौन बने: शास्त्र और व्यवहार
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। इसकी पंक्तियाँ “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाले चार्ट में भी जोड़िए।
| बात | ग्रंथों के अनुसार | दूसरे साक्ष्य | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| जीविका | हर वर्ण की अलग ‘जीविका’: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र | स्रोत 6: एक ही परिवार में कवि, वैद्य पिता और अन्न पीसने वाली माता | 61 |
| धनुर्विद्या | युद्ध क्षत्रियों का कार्य; निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना (स्रोत 7) | ब्राह्मण द्रोण स्वयं धनुर्विद्या सिखाते थे | 61–62 |
| राजा | केवल क्षत्रिय | मौर्य (बहस), शुंग और कण्व (ब्राह्मण), शक, सातवाहन | 62–63 |
| विवाह | सिरी-सातकनि का दावा: चार वर्णों के बीच विवाह पर रोक | उसी ने रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए | 63 |
| जीविका और श्रेणी | व्यापार वैश्यों की जीविका; श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर | रेशम बुनकरों की अनेक जीविकाएँ (स्रोत 8); ब्राह्मण–वणिक चारुदत्त, क्षत्रिय–वणिक भाई | 63–64 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “वर्ण और जाति एक ही चीज़ हैं।” नहीं। वर्ण केवल चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी; नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों के संपर्क से जातियों की संख्या बढ़ती रही (पृष्ठ 63)।
- “राजा हमेशा क्षत्रिय होते थे।” नहीं। यह शास्त्रों का नियम था। शुंग और कण्व ब्राह्मण थे, मौर्यों के उद्भव पर बहस है, और सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण बताते थे (पृष्ठ 62–63)।
- “वर्ण तो हमेशा से जन्म से तय था।” किताब (पृष्ठ 61) ग्रंथों के अनुसार वर्ण को योग्यता और कार्य से जोड़ती है, और स्रोत 6 आरंभिक वैदिक समाज में व्यवसायों का लचीलापन दिखाता है। जन्म कब जुड़ा, यह क्रम बताइए: ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल पुरुषसूक्त में आते हैं, और यह सूक्त ऋग्वेद के सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था (IGNOU, इकाई 4)। ब्राह्मण स्वयं को “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” और सबसे श्रेष्ठ बताते थे (स्रोत 13, पृष्ठ 70); लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।
- ग्रंथ का नियम, इतिहास नहीं। बच्चे जीविका की सूची को “उस समय सब ऐसा ही करते थे” मान लेते हैं। हर बार “ग्रंथों के अनुसार” बोलिए और लिखवाइए, और बोर्ड के दूसरे खाने की ओर इशारा कीजिए। कक्षा में किसी बच्चे से उसकी जाति या समुदाय मत पूछिए, और समूह किसी ऐसे आधार पर मत बनाइए; तुलना हमेशा स्रोतों की हो। यह सावधानी हमारी ओर से है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 3. सामाजिक विषमताएँ खोलिए, और अक्षत्रिय राजाओं वाली बात से पहले रुककर पूछिए कि शास्त्रों का “केवल क्षत्रिय” वाला नियम माना गया होगा या नहीं।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए चार वर्णों की ‘जीविका’ (ग्रंथों के अनुसार) और एक अक्षत्रिय राजवंश (शुंग या कण्व, जो ब्राह्मण थे) काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि के दावों और उसके अपने व्यवहार में कौन-सी उलटी बातें दिखती हैं? (उसने चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाने का दावा किया, फिर भी रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए, जबकि शकों को ब्राह्मण मलेच्छ मानते थे; और सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण बताते थे, जबकि शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) वैश्यों की जीविका, ग्रंथों के अनुसार; (2) दो अक्षत्रिय राजवंश।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के अनुसार वैश्य कृषि, पशुपालन और व्यापार करते थे; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ करना और कराना, और दान देना। (2) शुंग और कण्व, जो ब्राह्मण थे; या सातवाहन, जो स्वयं को ब्राह्मण बताते थे; या शक, जिन्हें ब्राह्मण मलेच्छ मानते थे। मौर्य भी लिखे जा सकते हैं, इस बात के साथ कि बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं और ब्राह्मणीय शास्त्र ‘निम्न’ कुल का।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क9–क13, ख6, ग3, ग4, घ4, घ5 और ङ2; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 2 (क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे; यही प्रश्न बैंक का च2 है) कॉपी में।
- परियोजना, आज बताइए और कालांश 11 में जमा कराइए — प्रश्नावली का प्रश्न 12: एकलव्य की कथा अपने दृष्टिकोण से लिखिए। तरीका: स्रोत 7 दोबारा पढ़िए (द्रोण का मना करना, मिट्टी की प्रतिमा, सात तीर, अर्जुन का याद दिलाना, गुरु दक्षिणा में अँगूठा); कथा कहने वाला चुनिए (एकलव्य, द्रोण, अर्जुन, एकलव्य की माँ, या वह कुत्ता भी); घटनाएँ वही रखिए और उस पात्र के मन की बात, डर और प्रश्न लिखिए; लगभग एक पन्ने की कहानी, शीर्षक के साथ, और अंत में दो-तीन पंक्तियों में बताइए कि यह नज़रिया क्यों चुना। यह लिखने का काम है, कक्षा में अभिनय नहीं; यह बात हमारी ओर से है।
- पृष्ठ 62 और 64 के सवालों के नमूना उत्तर —
-
पृष्ठ 62 (निषादों और क्षत्रियों को क्या संदेश मिला; क्या द्रोण धर्मसूत्र का अनुसरण कर रहे थे): स्रोत 7 की कथा से ये संदेश निकलते दिखते हैं।
- निषादों के लिए: कुरु राजकुमारों के गुरु द्रोण ने एकलव्य को शिष्य बनाने से ही मना कर दिया था; संदेश यह है कि राजकुमारों वाली विद्या निषादों के लिए नहीं है, और अपने अभ्यास से महारत पा लें, तब भी वह छीनी जा सकती है, जैसे एकलव्य का अँगूठा।
- क्षत्रियों के लिए: उनका स्थान सुरक्षित रखा जाएगा; द्रोण ने अर्जुन को दिया वचन निभाया और “कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।”
- द्रोण और धर्मसूत्र: धर्मसूत्रों में ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना-कराना और दान देना-लेना है, जबकि युद्ध करना क्षत्रियों का कार्य है। इस हिसाब से लगता है कि धनुर्विद्या सिखाकर द्रोण स्वयं उस नियम से बाहर जा रहे थे जिसे वे एकलव्य पर लागू कर रहे थे।
यानी कथा ग्रंथों में बताए वर्ण-कर्तव्य को एकलव्य पर सख्ती से लागू करती है, जबकि स्वयं द्रोण उससे बाहर थे।
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पृष्ठ 64 (क्या रेशम के बुनकर शास्त्रों में तय जीविका का पालन कर रहे थे): पूरी तरह नहीं।
- अभिलेख: मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी (स्रोत 8)। ये बुनकर लाट (गुजरात) से दशपुर (मंदसौर) जाकर बसे और उन्होंने मिलकर सूर्य देवता का मंदिर बनवाया।
- दूसरी जीविकाएँ: इस श्रेणी के सदस्य संगीत, जीवनियों और कथाओं, धार्मिक व्याख्यानों, अनुष्ठानों, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध में भी लगे थे।
- श्रेणी की सदस्यता: यह शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य अन्य जीविका भी अपना लेते थे।
इसलिए ये बुनकर केवल एक तय जीविका तक सीमित नहीं थे।
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- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 53–80।
कालांश 5 — 3. सामाजिक विषमताएँ: चार वर्णों के परे, एकीकरण, अधीनता और संघर्ष (3.4-3.5)
किताब — पृष्ठ 64–67 · स्लाइड — भाग 3 का दूसरा हिस्सा · इंटरैक्टिव — 3. सामाजिक विषमताएँ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं की तुलना कर पाएगा, और बता पाएगा कि चाण्डालों के बारे में मनुस्मृति, चीन से आए यात्री और पालि की मातंग जातक क्या-क्या कहते हैं।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट; “स्रोत 1 से 16” वाला चार्ट (आज स्रोत 9 और 10)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 4 की पर्चियों में अक्सर “राजा हमेशा क्षत्रिय होते थे” वाली बात लौट आती है। एक बच्चा शुंग और कण्व का उदाहरण दे, दूसरा सिरी-सातकनि का।
- 5–12 मिनट · एकीकरण (3.4)। पृष्ठ 64–65 से: उपमहाद्वीप में हमेशा से ऐसे समुदाय रहे जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा, और संस्कृत साहित्य उन्हें कई बार “विचित्र, असभ्य और पशुवत” चित्रित करता है। तीन उदाहरण बोर्ड पर: वन में रहने वाले लोग, जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह जीवन-निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन था, जैसे निषाद, जिनसे एकलव्य जुड़ा माना जाता था; यायावर पशुपालक, जो बसे हुए कृषिकर्मियों के साँचे में नहीं ढलते थे; और असंस्कृत भाषा बोलने वाले लोग, जिन्हें कभी-कभी मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था। फिर भी इन लोगों के बीच विचारों और मतों का आदान-प्रदान होता था, जिसका पता महाभारत की कथाओं से चलता है।
- 12–20 मिनट · स्रोत 9, हिडिम्बा। पहले जानकारी (पृष्ठ 65, आदिपर्वन्): नरभक्षी राक्षस की बहन हिडिम्बा ने भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा; युधिष्ठिर इस शर्त पर माने कि भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहें और रात को लौट आएँ; उनका पुत्र घटोत्कच हुआ, जिसने प्रण किया कि पांडवों को ज़रूरत होगी तो वह आ जाएगा। किताब कुछ इतिहासकारों का मत भी देती है: राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से भिन्न थे। फिर किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 65) समूहों में।
- 20–28 मिनट · अधीनता और संघर्ष (3.5)। पृष्ठ 65–66 से, ग्रंथों के अनुसार: कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था के बाहर माना गया और ‘अस्पृश्य’ के रूप में वर्गीकृत किया गया, जिससे सामाजिक भेदभाव और गहरा हुआ। शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा गया और वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा गया। मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची है: गाँव के बाहर रहना; फेंके हुए बर्तन, मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण; रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना; संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि और वधिक का काम। फिर चीन से आए दो यात्री: बौद्ध भिक्षु फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी; श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर से बाहर रहते थे। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: ग्रंथ का विधान, और यात्रियों ने क्या देखा।
- 28–36 मिनट · स्रोत 10, मातंग जातक। पहले किताब का सवाल (पृष्ठ 66): क्या चाण्डालों ने शास्त्रों में निर्धारित अपना हीन जीवन स्वीकार कर लिया था? अब्राह्मणीय ग्रंथों में चाण्डालों का चित्रण कभी ब्राह्मणीय ग्रंथों जैसा है, पर कभी एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का संकेत देता है। फिर कथा क्रम से (पृष्ठ 67, पालि): बोधिसत्त ने बनारस के बाहर एक चाण्डाल के पुत्र मातंग के रूप में जन्म लिया; व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक उन्हें देखकर चिल्लाई, “मैंने कुछ अशुभ देख लिया है।” और उसके सेवकों ने मातंग को पीटा; मातंग विरोध में उसके घर के बाहर लेट गए, और सातवें रोज़ घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया; बाद में उनका पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़कर रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था, पर भिक्षा माँगने आए पिता को उसने लौटा दिया; मातंग का उत्तर था: “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।” फिर किनारे का प्रश्न और चर्चा (दोनों पृष्ठ 67) पूरी कक्षा से, “चित्र” बनाते हुए।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) मनुस्मृति के अनुसार चाण्डालों के कोई दो ‘कर्तव्य’ लिखिए। (2) द्रोण, हिडिम्बा और मातंग में से किसकी कथा वर्ण और जन्म के मानदंड को नकारती है, और कैसे?
तीन कथाएँ, एक मानदंड (चरण 5)
तीन कथाएँ, एक मानदंड
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। इसकी पंक्तियाँ “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाले चार्ट में भी जोड़िए।
| स्रोत | किसका लिखा या कहा | क्या दिखता है | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| संस्कृत साहित्य | ब्राह्मणीय ग्रंथ | जिन समुदायों पर ब्राह्मणीय विचारों का प्रभाव नहीं पड़ा (जैसे वन के लोग), वे कई बार “विचित्र, असभ्य और पशुवत”; यायावर पशुपालक “शंका की दृष्टि” से, और मलेच्छ “हेय दृष्टि” से | 64–65 |
| स्रोत 9, हिडिम्बा | महाभारत (आदिपर्वन्) | राक्षस स्त्री से विवाह, शर्तों के साथ स्वीकार | 65 |
| चाण्डालों के ‘कर्तव्य’ | मनुस्मृति | गाँव के बाहर रहना, रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना, आदि | 66 |
| यात्रियों के विवरण | फा-शिएन, श्वैन-त्सांग | अस्पृश्यों को करताल बजानी पड़ती थी; वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर के बाहर | 66 |
| स्रोत 10, मातंग | पालि की मातंग जातक | चाण्डाल का पुत्र नायक और बोधिसत्त; जन्म के गर्व को चुनौती | 67 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “चाण्डालों ने शास्त्रों में लिखा जीवन चुपचाप मान लिया।” किताब यही सवाल पूछती है। अब्राह्मणीय ग्रंथों में कभी ब्राह्मणीय ग्रंथों जैसा चित्रण है, पर कभी एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का संकेत, जैसे स्रोत 10 में मातंग का विरोध (पृष्ठ 66–67)।
- “राक्षस सचमुच नरभक्षी जीव थे।” किताब कुछ इतिहासकारों का मत बताती है: राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से भिन्न थे (पृष्ठ 65)।
- यह भाग कैसे पढ़ाएँ। अस्पृश्यता और चाण्डालों वाला अंश किताब के स्रोतों का विवरण है, ग्रंथों के अनुसार। कोई अभिनय, खेल या ऐसा समूह मत बनाइए जिसमें किसी बच्चे को किसी वर्ण, जाति या चाण्डाल की भूमिका मिले; तुलना हमेशा स्रोतों की हो, कक्षा के लोगों की नहीं। कोई बच्चा आज की जाति की बात छेड़े, तो साफ़ बताइए: भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध करता है। फिर बात किताब के स्रोतों पर लौटाइए। यह सावधानी हमारी ओर से है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 3. सामाजिक विषमताएँ खोलिए, और मातंग की कथा के अंत से पहले रुककर पूछिए कि मातंग अपने पुत्र को क्या उत्तर देंगे।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए आज के “चित्र” की तीन पंक्तियाँ काफ़ी हैं: द्रोण = लागू, हिडिम्बा = समझौता, मातंग = नकार।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: मनुस्मृति की सूची और चीन से आए यात्रियों के विवरण में क्या मेल है? (दोनों में ये लोग बाकी लोगों से अलग रखे गए दिखते हैं: मनुस्मृति उन्हें गाँव के बाहर रहने और रात में गाँव-नगर में न घूमने को कहती है; फा-शिएन लिखते हैं कि अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी; और श्वैन-त्सांग लिखते हैं कि वधिक और सफ़ाई करने वालों को नगर से बाहर रहना पड़ता था। यानी यहाँ ग्रंथ और दूसरा साक्ष्य मिलते हैं।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) चाण्डालों के दो ‘कर्तव्य’, मनुस्मृति के अनुसार; (2) कौन-सी कथा मानदंड को नकारती है।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) इनमें से कोई दो: गाँव के बाहर रहना; फेंके हुए बर्तनों का इस्तेमाल, मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण; रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना; संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि करना और वधिक का काम। (2) मातंग की कथा: चाण्डाल के पुत्र के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग नायक हैं, और वे कहते हैं, “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।” यानी जन्म पर टिके मानदंड को ही चुनौती दी गई है।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क14, क15, ख7, ख8 और घ6; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 3 (द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना; यही प्रश्न बैंक का च3 है) कॉपी में। आज का “चित्र” इसमें काम आएगा।
- पृष्ठ 65 और 67 के सवालों के नमूना उत्तर —
-
पृष्ठ 65 (स्रोत 9 में कौन-से व्यवहार अब्राह्मणीय लगते हैं): स्रोत 9 में ये व्यवहार ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग दिखते हैं।
- स्त्री का प्रस्ताव: हिडिम्बा ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव किया और अपना पति स्वयं चुना; स्रोत 3 की पहली और चौथी पद्धति में यह निर्णय वधू का पिता लेता है।
- धर्म और बांधवों का त्याग: उसने कहा कि उसने मित्र, बांधव और अपने धर्म का भी परित्याग कर दिया है।
- शर्त वाला विवाह: भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहते और रात में पांडवों के पास लौट आते।
- संतान माँ के साथ: पुत्र घटोत्कच के जन्म के बाद माँ और पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए।
- नरभक्षी राक्षस: हिडिम्बा का भाई मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बताया गया है।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि ‘राक्षस’ उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों में चित्रित मानदंडों से भिन्न थे।
-
पृष्ठ 67 (कथा के कौन-से तत्व दिखाते हैं कि वह मातंग के नज़रिए से लिखी गई): स्रोत 10 (मातंग जातक, पालि) का नायक चाण्डाल मातंग है।
- नायक बोधिसत्त: चाण्डाल के रूप में जन्मे मातंग ही बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) हैं।
- विरोध की जीत: पिटाई के बाद मातंग दरवाज़े के बाहर लेट गए, और सातवें दिन घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया।
- नैतिक बात मातंग के मुँह से: “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो लोग दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं।”
- अलौकिक शक्ति: संसार त्यागकर मातंग अलौकिक शक्ति पाते हैं, और बेटे के घर से निकाले जाने पर आकाश में जाकर अदृश्य हो जाते हैं।
- उलटा क्रम: दिथ्थ माफ़ी माँगने आती है, और मातंग कहते हैं कि उनके भिक्षा पात्र में बचे भोजन का कुछ अंश माण्डव्य और ब्राह्मणों को दिया जाए।
कथा में जीत, नैतिक बात और अलौकिक शक्ति, तीनों मातंग की हैं; इसलिए यह उन्हीं के नज़रिए से कही लगती है।
-
पृष्ठ 67 की चर्चा (किन स्रोतों में लोग ब्राह्मणों की बताई जीविका मानते दिखते हैं, और किनमें अलग संभावनाएँ): भाग 3 (पृष्ठ 61–67) के स्रोतों को दो खानों में रखिए।
- नियम मानने के संकेत: स्रोत 7 (एकलव्य से अँगूठा माँगकर क्षत्रिय अर्जुन का स्थान बचाया गया); मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची, और फा-शिएन और श्वैन-त्सांग के वृत्तांत कि अस्पृश्यों को करताल बजानी पड़ती थी और वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर के बाहर रहते थे।
- अलग संभावनाएँ: स्रोत 6 (ऋग्वेद के सूक्त में कवि, वैद्य पिता और अन्न पीसने वाली माता); स्रोत 8 (रेशम बुनकरों की अनेक जीविकाएँ); वणिकों वाला बॉक्स (ब्राह्मण–वणिक चारुदत्त, क्षत्रिय–वणिक भाई); भाग 3.2 के अक्षत्रिय राजा; स्रोत 9 (हिडिम्बा); स्रोत 10 (मातंग का पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़ता है)। स्वयं ब्राह्मण द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना भी इसी खाने में जाता है।
दूसरा खाना भी लंबा बनता है: किताब के कई स्रोत दिखाते हैं कि ग्रंथों के नियम हर जगह नहीं माने गए।
-
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 81–97।
कालांश 6 — 4. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा (4.1-4.3)
किताब — पृष्ठ 68–71 · स्लाइड — भाग 4 · इंटरैक्टिव — 4. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी स्त्री और पुरुष के संपत्ति अधिकारों की तुलना कर पाएगा (स्रोत 11 और 12, स्त्रीधन), और बौद्ध (स्रोत 13) और तमिल (स्रोत 14) स्रोतों से बता पाएगा कि प्रतिष्ठा के आधार और भी थे।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट; “स्रोत 1 से 16” वाला चार्ट (आज स्रोत 11 से 14)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 5 की पर्चियों में अक्सर तीन कथाओं का अंतर गड़बड़ाता है। एक बच्चा बोर्ड पर लिखे: द्रोण = लागू, हिडिम्बा = समझौता, मातंग = नकार।
- 5–13 मिनट · संपत्ति पर स्त्री और पुरुष (4.1), स्रोत 11। पृष्ठ 68 से: दास, भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, शिकारी, मछुआरे, पशुपालक, किसान, ग्राममुखिया, शिल्पकार, वणिक और राजा, सबका सामाजिक स्थान इस पर निर्भर करता था कि आर्थिक संसाधनों पर उनका कितना नियंत्रण है। फिर द्यूत का प्रकरण: धोखे के कारण युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अपने अनुजों और फिर स्वयं को भी हार गए, और फिर द्रौपदी को भी दाँव पर लगाकर हार गए। स्रोत 11: माना जाता है कि द्रौपदी ने पूछा कि क्या युधिष्ठिर उसे दाँव पर लगाने से पहले स्वयं को हार चुके थे; दो मत सामने आए, कोई निष्कर्ष नहीं निकला, और अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी की निजी स्वतंत्रता लौटा दी। किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 68) समूहों में।
- 13–20 मिनट · स्त्रीधन और स्रोत 12। पृष्ठ 68–69 से: स्मृति परंपरा के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति संतानों में बराबर बाँटी जाती थी, और ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था। विवाह के समय मिले उपहारों (स्त्रीधन) पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था; फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति या अपने बहुमूल्य धन का गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी देती है। वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनाढ्य थीं, पर अधिकतर साक्ष्य बताते हैं कि सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था, और इससे स्त्री और पुरुष की सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”। फिर स्रोत 12 (मनुस्मृति) बोर्ड पर दो खानों में, और किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 69) पूरी कक्षा से।
- 20–28 मिनट · वर्ण और संपत्ति (4.2), स्रोत 13। पृष्ठ 69–70 से: ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार संपत्ति के अधिकार का एक और आधार वर्ण था; शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ सेवा थी, जिसमें हमेशा उनकी इच्छा शामिल नहीं होती थी, जबकि तीन उच्च वर्णों के पुरुषों के लिए कई जीविकाओं की संभावना थी। साहित्यिक परंपरा में राजा अधिकतर धनी और पुरोहित भी सामान्यत: धनी दिखाए जाते हैं, पर कभी-कभी निर्धन ब्राह्मण का चित्रण भी मिलता है। वर्ण व्यवस्था की सबसे जानी-मानी आलोचनाएँ प्रारंभिक बौद्ध धर्म (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) में विकसित हुईं: बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया। फिर स्रोत 13 (मज्झिमनिकाय, पालि) दो बच्चों से पढ़वाइए, एक अवन्तिपुत्र और एक कच्चन की पंक्तियाँ, और कच्चन का अंतिम प्रश्न बोर्ड पर: “यदि ऐसा है, तो क्या फिर यह चारों वर्ण एकदम समान नहीं हैं?” किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 70) समूहों में।
- 28–36 मिनट · संपत्ति में भागीदारी (4.3), स्रोत 14, चित्र 3.7। पृष्ठ 70–71 से: कुछ समाजों में दानशील आदमी का सम्मान होता था, और कंजूस या अपने लिए संपत्ति जमा करने वाला घृणा का पात्र। प्राचीन तमिलकम् ऐसा ही क्षेत्र था, जहाँ 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियाँ थीं; सरदार अपनी प्रशंसा गाने वाले चारणों और कवियों के आश्रयदाता थे। स्रोत 14 (पुरनानूरु, तमिल संगम साहित्य, लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) पढ़िए, फिर पृष्ठ 71 के दोनों किनारे के प्रश्न: पहला स्रोत 14 पर, दूसरा चित्र 3.7 (अमरावती, आंध्र प्रदेश, लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) पर। आख़िर में “चित्र” बनाइए।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) स्त्रीधन क्या था, और उस पर किसका अधिकार था? (2) बौद्धों ने समाज की विषमता के बारे में क्या कहा?
प्रतिष्ठा किस पर टिकी? (चरण 5)
प्रतिष्ठा किस पर टिकी?
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। इसकी पंक्तियाँ “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाले चार्ट में भी जोड़िए।
| स्रोत | क्या कहता है | अधिकार या प्रतिष्ठा किस पर टिकी | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| स्रोत 11 (महाभारत) | द्यूत में द्रौपदी को दाँव पर लगाया; दो मत, कोई निष्कर्ष नहीं | पति का पत्नी पर नियंत्रण? इस पर विवाद था | 68 |
| स्मृति परंपरा, स्त्रीधन | पैतृक संपत्ति संतानों में बराबर, ज्येष्ठ पुत्र को विशेष भाग; विवाह के उपहार स्त्री के | लिंग | 68 |
| स्रोत 12 (मनुस्मृति) | पुरुष के सात तरीके; स्त्री के छ:, सब भेंट या उपहार | लिंग | 69 |
| ब्राह्मणीय ग्रंथ | शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ सेवा | वर्ण | 69 |
| स्रोत 13 (मज्झिमनिकाय, पालि) | धनी शूद्र किसी भी वर्ण के व्यक्ति को सेवक बना सकता था | धन | 70 |
| स्रोत 14 (पुरनानूरु, तमिल) | निर्धन होकर भी दानी सरदार, “चारणों की क्षुधा का शत्रु” | दान | 71 |
किताब में इस संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है।
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “स्त्रीधन पर पति का भी हक़ था।” नहीं। विवाह के उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था (पृष्ठ 68)।
- “स्रोत 11 से तय हो गया कि पत्नी पति की संपत्ति थी।” नहीं। दो मत सामने आए और कोई निष्कर्ष नहीं निकला; अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी की निजी स्वतंत्रता लौटा दी।
- “बौद्धों ने कहा कि समाज में कोई विषमता नहीं थी।” नहीं। उन्होंने विषमता मानी, पर कहा कि ये भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”, और जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।
- स्रोत 13 को सच्ची घटना मानना। किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दिखाती है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 4. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा खोलिए, और स्रोत 11 के दो मतों से पहले रुककर पूछिए कि सभा में कौन-कौन से मत आए होंगे।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए स्त्रीधन का अर्थ और स्रोत 12 का एक अंतर (स्त्रियों के सारे तरीके भेंट या उपहार) काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 13 और स्रोत 14 में प्रतिष्ठा किस पर टिकी है, और यह ब्राह्मणीय ग्रंथों से कैसे अलग है? (स्रोत 13 में धन पर: धनी शूद्र किसी भी वर्ण के व्यक्ति को सेवक बना सकता था; स्रोत 14 में दान पर: निर्धन होकर भी दानी सरदार की प्रशंसा होती है। ब्राह्मणीय ग्रंथों में संपत्ति के अधिकार लिंग और वर्ण पर टिके हैं।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
-
निकास-पर्ची (चरण 6): (1) स्त्रीधन और उस पर अधिकार; (2) विषमता के बारे में बौद्धों का मत।
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निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) विवाह के समय मिले उपहार; इन पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था, उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी, और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था। (2) बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
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गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क16, ग5–ग7, ङ3, छ2 और छ3; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 8 (आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्वपूर्ण रही होंगी; यही प्रश्न बैंक का च5 है) कॉपी में। इसके लिए कालांश 2, 3 और 6 के बोर्ड-कार्य काम आएँगे।
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पृष्ठ 71 की चर्चा, गृहकार्य के रूप में — “वर्तमान समाजों में सामाजिक रिश्ते किस तरह परिचालित होते हैं? क्या यह अतीत के सामाजिक रिश्तों से मिलते-जुलते हैं, अथवा भिन्न हैं?” नमूना उत्तर: इसके लिए आज के समाज को स्वयं देखिए और बड़ों से पूछिए।
- रिश्ते चुनिए: अध्याय के तीन-चार रिश्ते, जैसे आश्रयदाता और चारण (स्रोत 14), धनी स्वामी और सेवक (स्रोत 13), पिता से पुत्र को विरासत, और विवाह का निर्णय कौन ले (स्रोत 3)।
- आज से मिलाइए: हर रिश्ते के लिए लिखिए कि आज वह कैसे चलता है।
फिर बताइए कि हर रिश्ता अतीत जैसा है या अलग। किसी परिवार का नाम, जाति या समुदाय लिखने की ज़रूरत नहीं; यह बात हमारी ओर से है।
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पृष्ठ 68–71 के सवालों के नमूना उत्तर —
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पृष्ठ 68 (क्या यह प्रकरण बताता है कि पत्नियों को पतियों की निजी संपत्ति माना जाए): यह प्रकरण बताता है कि ऐसा विचार मौजूद था, पर उस पर विवाद भी था।
- हाँ की ओर: द्यूत में युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अनुजों और स्वयं को हारने के बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाकर हार गए, मानो वह भी इन्हीं चीज़ों जैसी संपत्ति हो; और एक मत यह था कि ऐसा करना अनुचित नहीं “क्योंकि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है।”
- नहीं की ओर: दूसरा मत था कि दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता; माना जाता है कि द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया; इन मुद्दों का कोई निष्कर्ष नहीं निकला, और अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्रता लौटा दी।
यानी ग्रंथ में दोनों मत हैं; किसी एक को अंतिम सच मत बनाइए।
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पृष्ठ 69 (स्त्री और पुरुष किस प्रकार धन प्राप्त कर सकते थे, तुलना और अंतर): स्रोत 12 (मनुस्मृति) के अनुसार।
- पुरुष (सात तरीके): विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा, और सज्जनों की दी गई भेंट स्वीकार करके।
- स्त्री (छ: तरीके): वैवाहिक अग्नि के सामने मिली भेंट; वधूगमन के समय मिली भेंट; स्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट; भ्राता, माता और पिता के उपहार; परवर्ती काल में मिली भेंट; और “अनुरागी” पति से मिला सब कुछ।
अंतर: पुरुष विरासत और अपनी मेहनत, खरीद, निवेश या विजय से धन पा सकते थे; स्त्रियों के सारे तरीके भेंट और उपहार हैं, यानी दूसरों के दिए धन पर टिके हैं।
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पृष्ठ 70 (अवन्तिपुत्र के पहले वक्तव्य में ब्राह्मणीय विचार, उनका स्रोत, और असमानता का स्पष्टीकरण): स्रोत 13 पालि के बौद्ध ग्रंथ मज्झिमनिकाय से है।
- ब्राह्मणीय विचार: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न; ब्राह्मण का वर्ण शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली; केवल ब्राह्मण पवित्र हैं; ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं, “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं”, उनसे रचित हैं और उनके वंशज हैं।
- स्रोत की पहचान: “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” वाली बात ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (मंडल 10, सूक्त 90) से मिलती-जुलती है, जिसके मंत्र 12 में ब्राह्मण को आदि-पुरुष का मुख कहा गया है। प्रश्नावली का प्रश्न 4 भी ब्राह्मणीय दृष्टिकोण को इसी सूक्त पर आधारित बताता है।
- असमानता का स्पष्टीकरण: इस कथा में असमानता धन से आती है, जन्म से नहीं। धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी अपना आज्ञाकारी सेवक बना सकता था; इसलिए अवन्तिपुत्र मान लेते हैं कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं।
किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों का वर्ण संबंधी रवैया दिखाती है।
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पृष्ठ 71, पहला (चारण के दाँव-पेंच, और सरदार धन कैसे जुटाता था): स्रोत 14 तमिल संगम साहित्य की पद्यावली पुरनानूरु (लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) से है।
- चारण के दाँव-पेंच: वह मान लेता है कि सरदार के पास रोज़ खर्च करने को धन नहीं, फिर कहता है कि वह इतना ओछा नहीं कि मना कर दे; उसे “दानप्रिय” और “चारणों की क्षुधा का शत्रु” बताता है; दूसरे चारणों को साथ चलने बुलाता है; और कहता है कि भूख से क्षीण पसलियाँ देखकर सरदार लोहार से युद्ध के लिए लंबा भाला बनवाएगा।
- सरदार का धन: भाले वाली बात से लगता है कि सरदार युद्ध करके धन लाता था, ताकि उसका अंश चारणों को दे सके।
प्राचीन तमिलकम् में दानशील व्यक्ति का सम्मान होता था और कृपण घृणा का पात्र था; चारण इसी आदर्श से सरदार की प्रशंसा करता है।
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पृष्ठ 71, दूसरा (मूर्तिकार ने सरदार और अनुयायी का अंतर कैसे दिखाया): चित्र 3.7 (पत्थर की मूर्ति, अमरावती, आंध्र प्रदेश, लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) में अंतर आकार, सजावट और मुद्रा से दिखाया गया है।
- आकार: सरदार बहुत बड़ा बनाया गया है; अनुयायी उससे बहुत छोटा है, लगभग उसकी कमर तक।
- सजावट: सरदार के सिर पर ऊँची पगड़ी, गले में कई हार और कमर पर सजा हुआ वस्त्र है; अनुयायी के वस्त्र और गहने कम हैं।
- मुद्रा: सरदार का एक हाथ ऊपर उठा है और दूसरा हाथ अनुयायी के सिर पर रखा है।
इनसे दिखता है कि सरदार ऊँचे पद पर है और अनुयायी उसके अधीन।
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दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 98–115।
कालांश 7 — 5. सामाजिक विषमताओं की व्याख्या; 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल: भाषा एवं विषयवस्तु (6.1)
किताब — पृष्ठ 72–73 · स्लाइड — भाग 5, और भाग 6 का पहला हिस्सा · इंटरैक्टिव — 5. सामाजिक विषमताओं की व्याख्या और 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी सुत्तपिटक के मिथक से बता पाएगा कि बौद्ध परंपरा में राजा और ‘कर’ कैसे समझाए गए, और किसी ग्रंथ को परखने के सवाल (भाषा, प्रकार, लेखक और श्रोता, रचना काल और रचनाभूमि) महाभारत पर लगा पाएगा।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट; किताब का पृष्ठ 80 (प्रश्नावली का प्रश्न 5, युधिष्ठिर का संदेश)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 6 की पर्चियों में अक्सर लिखा मिलता है कि स्त्रीधन पर पति का भी हक़ था। एक बच्चा सही बात बोले: स्त्रीधन पर स्त्री का स्वामित्व था, उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी, और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था।
- 5–14 मिनट · सुत्तपिटक का मिथक (भाग 5)। पृष्ठ 72 से, पहले कथा: शुरू में मनुष्य और वनस्पति जगत पूरी तरह विकसित नहीं थे; सभी जीव शांति से रहते थे और प्रकृति से उतना ही लेते थे जितना एक समय के भोजन के लिए चाहिए। यह व्यवस्था धीरे-धीरे बिगड़ी, और मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए। तब लोगों ने सोचा: “क्या हम एक ऐसे मनुष्य का चयन करें जो उचित बात पर क्रोधित हो, जिसकी प्रताड़ना की जानी चाहिए उसको प्रताड़ित करे और जिसे निष्कासित किया जाना हो उसे निष्कासित करे?” बदले में उसे चावल का अंश मिलेगा, और “सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि प्राप्त होगी।” फिर कक्षा से पूछिए: इस कथा में ‘कर’ किस चीज़ का मूल्य है? (वह मूल्य जो लोग राजा की इस सेवा के बदले देते थे।)
- 14–20 मिनट · दो दृष्टिकोण। बोर्ड पर तालिका बनाइए (नीचे “बोर्ड-कार्य”)। एक ओर ब्राह्मणीय दृष्टिकोण: ब्राह्मणों का दावा कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (स्रोत 13, पृष्ठ 70), और शास्त्रों का नियम कि केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे (पृष्ठ 62)। दूसरी ओर सुत्तपिटक: व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी, राजा सबका चुना हुआ, और यदि मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में वे उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे। यही प्रश्नावली का प्रश्न 4 है; आज का गृहकार्य।
- 20–28 मिनट · ग्रंथ को परखने के सवाल (भाग 6 और 6.1)। पृष्ठ 72–73 से। इतिहासकार किसी ग्रंथ के बारे में ये बातें पूछते हैं: भाषा (पालि, प्राकृत या तमिल, जो आम लोग बोलते थे, या संस्कृत, जो खासकर पुरोहितों और खास वर्ग के प्रयोग की भाषा थी); प्रकार (‘मंत्र’ या ‘कथा’); लेखक और श्रोता; और ग्रंथ का संभावित संकलन या रचना काल और उसकी रचनाभूमि। फिर महाभारत पर: इसकी संस्कृत वेदों या प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है, इसलिए संभव है कि इसे व्यापक स्तर पर समझा जाता था। विषयवस्तु के दो भाग हैं, आख्यान (कहानियाँ) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड), पर यह बँटवारा पूरी तरह अलग-अलग खानों वाला नहीं। किताब की बात बोर्ड पर: “अधिकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि महाभारत वस्तुत: एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।” सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है (चित्र 3.8, अठारहवीं शताब्दी का चित्र)। आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था।’; पर क्या सचमुच कोई युद्ध हुआ था, यह निश्चित नहीं।
- 28–36 मिनट · प्रश्नावली का प्रश्न 5, समूहों में। पहले पृष्ठ 80 का अवतरण एक बच्चा धीरे-धीरे पढ़े: युधिष्ठिर दूत संजय से कहते हैं कि धृतराष्ट्र के घर के ब्राह्मणों, पुरोहित, गुरुओं, बड़ों, भाइयों, स्त्रियों, दासियों और असहाय जनों तक, किसे कैसे नमस्कार पहुँचाना है। हर समूह एक आधार ले (उम्र, लिंग, भेद, बंधुत्व; भेद को यहाँ वर्ण और हैसियत का भेद मानिए) और अवतरण से उसका उदाहरण निकाले; एक समूह “कोई और आधार” खोजे। उत्तर नीचे “नमूना उत्तर” में है।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) सुत्तपिटक के मिथक में महासम्मत्त कौन था, और ‘कर’ किस चीज़ का मूल्य था? (2) इतिहासकार महाभारत की विषयवस्तु को किन दो भागों में रखते हैं?
ग्रंथ को परखने के सवाल (चरण 4)
ग्रंथ को परखने के सवाल
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | ब्राह्मणीय दृष्टिकोण | बौद्ध सुत्तपिटक | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| ऊँचा स्थान किस पर टिका | ब्राह्मणों का दावा: वे “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (स्रोत 13) | व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी | 70, 72 |
| राजा कौन | शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय | महासम्मत्त, सब लोगों द्वारा चुना गया | 62, 72 |
| ‘कर’ | — | राजा की सेवा के बदले लोगों का दिया मूल्य | 72 |
| विषमता | — | बौद्धों के अनुसार भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी” | 69 |
| बदलाव | — | मनुष्य व्यवस्था के ज़िम्मेदार थे, तो उसे बदल भी सकते थे | 72 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “महासम्मत्त जन्म से राजा था।” नहीं। कथा में लोग स्वयं उसका चयन करते हैं, और “सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण” उसे यह उपाधि मिलती है।
- “‘इतिहास’ श्रेणी में है, तो युद्ध सचमुच हुआ था।” नहीं। ‘इतिहास’ का अर्थ है ‘ऐसा ही था।’, पर युद्ध हुआ था या नहीं, यह निश्चित नहीं: कुछ इतिहासकार मुख्य कथानक को स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति मानते हैं, दूसरे कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती (पृष्ठ 74)।
- “आख्यान और उपदेशात्मक अंश बिल्कुल अलग हैं।” नहीं। उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ होती हैं, और बहुधा आख्यानों में समाज के लिए एक सबक होता है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 5. सामाजिक विषमताओं की व्याख्या खोलिए, और लोगों के चयन वाली बात से पहले रुककर पूछिए कि बिगड़ी व्यवस्था में लोग क्या करेंगे।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए दो बातें काफ़ी हैं: महासम्मत्त लोगों का चुना राजा था, और महाभारत में आख्यान और उपदेशात्मक, दो तरह की सामग्री है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: सुत्तपिटक के मिथक से भविष्य के बारे में क्या निष्कर्ष निकलता है? (यदि मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में वे उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) महासम्मत्त और ‘कर’; (2) महाभारत की विषयवस्तु के दो भाग।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) महासम्मत्त वह मनुष्य था जिसे सब लोगों ने चुना, ताकि वह उचित बात पर क्रोधित हो, दंड दे और निष्कासन करे; ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग उसकी इस सेवा के बदले देते थे (बदले में उसे चावल का अंश मिलता)। (2) आख्यान, यानी कहानियों का संग्रह, और उपदेशात्मक, यानी सामाजिक आचार-विचार के मानदंड।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क17, क18, ख9, घ7, ङ4 और ङ5; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 4 (सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से कैसे भिन्न थी) कॉपी में। आज का बोर्ड-कार्य इसमें काम आएगा।
- प्रश्नावली के प्रश्न 4 और 5 के नमूना उत्तर —
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प्रश्न 4 (बौद्ध सामाजिक अनुबंध और ‘पुरुषसूक्त’ वाला ब्राह्मणीय दृष्टिकोण): इस अध्याय में ब्राह्मणीय दृष्टिकोण ब्राह्मणों के इस दावे में दिखता है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (स्रोत 13), और धर्मसूत्रों-धर्मशास्त्रों के वर्ण नियमों में। बौद्ध सुत्तपिटक का मिथक समाज को बिल्कुल अलग ढंग से समझाता है।
- पुरुषसूक्त: ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) के इस सूक्त में चारों वर्ण एक ही आदि-पुरुष के अंगों से जोड़े गए हैं: ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य (क्षत्रिय) उसकी भुजाएँ बनाए गए, वैश्य उसकी जंघाएँ थे और पैरों से शूद्र जन्मा। इस तरह वर्णों का ऊँचा-नीचा क्रम सृष्टि की कथा का हिस्सा बन जाता है।
- समाज की उत्पत्ति: ब्राह्मणों के दावे में उनका ऊँचा स्थान ब्रह्मा से उत्पत्ति पर टिका है; बौद्ध मिथक में व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी, जब मनुष्य लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए और उन्होंने स्वयं एक व्यक्ति को चुना।
- राजा: शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे; बौद्ध मिथक में राजा महासम्मत्त है, यानी सब लोगों द्वारा चुना गया, और ‘कर’ उसकी सेवा के बदले दिया जाने वाला मूल्य है।
- विषमता: बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता है, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
- बदलाव: आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था; और यदि मनुष्य स्वयं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में उसे बदल भी सकते थे।
यानी ब्राह्मणीय दृष्टिकोण ऊँच-नीच को उत्पत्ति से जोड़ता है, और बौद्ध मिथक उसे मनुष्यों के बनाए और बदले जा सकने वाले समझौते से।
-
प्रश्न 5 (युधिष्ठिर के संदेश की सूची किन आधारों पर बनी): अवतरण में अभिवादन का क्रम ही बता देता है कि किसे कितना ऊँचा माना गया।
- भेद (वर्ण और हैसियत): सबसे पहले धृतराष्ट्र के घर के ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित आते हैं, और लगभग अंत में दासियाँ और उनकी संतानें।
- गुरु: ब्राह्मणों के ठीक बाद गुरु द्रोण और कृपाचार्य; युधिष्ठिर उनके सामने नतमस्तक होते हैं और चरण स्पर्श करते हैं।
- उम्र: कुरु वंश के प्रधान भीष्म और वृद्ध राजा धृतराष्ट्र, दुर्योधन और युवा कुरु योद्धाओं से पहले आते हैं; स्त्रियों में भी वृद्धा स्त्रियाँ, जिन्हें माता के रूप में जाना जाता है, पत्नियों और बेटियों से पहले।
- लिंग: पहले सारे पुरुष आते हैं, फिर स्त्रियाँ; पुरुषों को नमन और अभिनंदन मिलता है, जबकि पत्नियों के लिए बस कुशल-क्षेम का संदेश है।
- बंधुत्व: दुर्योधन और उसके अनुज, फिर “भाई, पुत्र और पौत्र” जैसे युवा कुरु योद्धा, फिर माताएँ, पत्नियाँ, कुलवधुएँ और पुत्रियाँ।
- अन्य आधार: दासी से जन्मे विदुर को “सर्वोपरि” नमस्कार मिलता है, और युधिष्ठिर उन्हें “महामति” और “हमारे पिता और माता के सदृश” कहते हैं, यानी यहाँ जन्म से ज़्यादा बुद्धि और स्नेह का मान दिखता है; गणिकाओं का अलग से उल्लेख व्यवसाय का आधार है; और अंत में वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को नमस्कार करुणा दिखाता है।
इस तरह यह सूची वर्ण, उम्र, लिंग और रिश्ते, चारों के मेल से बनी ऊँच-नीच दिखाती है।
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- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 116–128।
कालांश 8 — 6. इतिहासकार और महाभारत: लेखक और तिथियाँ, सदृशता की खोज (6.2-6.3)
किताब — पृष्ठ 74–77 · स्लाइड — भाग 6 का दूसरा हिस्सा · इंटरैक्टिव — 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी महाभारत की रचना के चरण क्रम से लिख पाएगा, हस्तिनापुर के उत्खनन को स्रोत 15 के वर्णन से मिला पाएगा, और द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण बता पाएगा।
साथ ले जाइए — “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट; “स्रोत 1 से 16” वाला चार्ट (आज स्रोत 15 और 16, यानी सूची पूरी)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 7 की पर्चियों में अक्सर महासम्मत्त को जन्म से राजा लिखा मिलता है। एक बच्चा कथा की वह पंक्ति पढ़े जिसमें लोग उसका चयन करते हैं।
- 5–13 मिनट · लेखक और तिथियाँ (6.2)। पृष्ठ 74–75 से, एक के नीचे एक: संभवत: मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे, जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था; वे क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते और उनकी विजय और उपलब्धियों पर कविताएँ लिखते थे, और ये रचनाएँ मौखिक रूप में आगे बढ़ीं। पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा; उस समय कुरु और पांचाल, जिनके इर्द-गिर्द कथा घूमती है, सरदारी से राजतंत्र बन रहे थे। लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच विष्णु की आराधना प्रभावी हो रही थी और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था; लगभग 200-400 ईसवी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए। नतीजा: जो ग्रंथ शुरू में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, वह बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को इसका रचयिता मानती है (चित्र 3.9, महाभारत के फारसी अनुवाद से, लगभग 1740-50)।
- 13–22 मिनट · हस्तिनापुर (6.3) और स्रोत 15। पृष्ठ 75–76 से, पहले जानकारी: 1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उत्तर प्रदेश) के हस्तिनापुर नाम के गाँव में उत्खनन किया। नामों की समानता संयोग हो सकती है, पर गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था, इस पुरास्थल का होना बताता है कि यह कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी। लाल को आबादी के पाँच स्तर मिले; दूसरा स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) और तीसरा स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) बोर्ड पर लिखिए। फिर स्रोत 15 (आदिपर्वन्): महाकाव्य में हस्तिनापुर समुद्र की भाँति भरा हुआ, सैकड़ों प्रासादों वाला और इंद्र की नगरी के समान नगर है। अब पृष्ठ 76 का पहला किनारे का प्रश्न समूहों में, “चित्र” देखते हुए।
- 22–30 मिनट · द्रौपदी का विवाह, स्रोत 16। पृष्ठ 76–77 से: द्रौपदी से पांडवों का विवाह बहुपति विवाह का उदाहरण है, और लेखक(कों) ने इसके कई स्पष्टीकरण दिए। तीनों स्पष्टीकरण क्रम से सुनाइए: (1) पांचाल नरेश द्रुपद के स्वयंवर में अर्जुन जीते, कुंती ने बिना देखे कहा कि लाई गई वस्तु आपस में बाँट लो, और उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी; (2) ऋषि व्यास ने द्रुपद को बताया कि पांडव इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था; (3) एक युवा स्त्री ने शिव की आराधना में एक के बजाय पाँच बार पति का वर माँग लिया था, और उसी ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया। फिर पृष्ठ 76 का दूसरा किनारे का प्रश्न पूरी कक्षा से।
- 30–36 मिनट · क्या महाभारत का एक ही रचयिता था? यह प्रश्नावली का प्रश्न 7 है। समूह आज के बोर्ड से तीन-तीन साक्ष्य निकालें (रचना के चरण, श्लोकों की संख्या का बढ़ना, द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण), और एक समूह बताए कि परंपरा किसका नाम लेती है।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) महाभारत की रचना के कोई दो चरण, उनके काल के साथ। (2) बी.बी. लाल को हस्तिनापुर के दूसरे स्तर पर क्या मिला?
हस्तिनापुर: महाकाव्य और उत्खनन (चरण 3)
हस्तिनापुर: महाकाव्य और उत्खनन
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। इसकी पंक्तियाँ “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाले चार्ट में भी जोड़िए।
| बात | महाकाव्य या परंपरा | इतिहासकार और पुरातत्व | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| रचयिता | ऋषि व्यास | पहले सूत, पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मण, फिर बाद के प्रकरण | 74–75 |
| आकार | एक लाख श्लोक | शुरू में संभवत: 10,000 से भी कम | 75 |
| हस्तिनापुर | समुद्र की भाँति भरा, सैकड़ों प्रासादों वाला नगर (स्रोत 15) | दूसरे स्तर पर घरों की कोई निश्चित योजना नहीं; उत्खनन सीमित क्षेत्र में | 75–76 |
| द्रौपदी का विवाह | तीन स्पष्टीकरण (स्रोत 16) | प्रथा संभवत: शासकों के विशिष्ट वर्ग में थी, और समय के साथ अमान्य होती गई | 76–77 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “हस्तिनापुर गाँव ही कुरुओं की राजधानी थी, यह पक्का है।” नहीं। किताब कहती है कि नामों की समानता संयोग हो सकती है; यह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी।
- “व्यास ने अकेले पूरा महाभारत लिखा।” परंपरा व्यास का नाम लेती है, पर किताब रचना के कई चरण बताती है, और स्वयं “लेखक(कों)” और “रचनाकार(रों)” लिखती है।
- “महाभारत में है, इसलिए बहुपति प्रथा उस समय आम थी।” नहीं। कुछ आरंभिक स्रोत बताते हैं कि बहुपति प्रथा न एकमात्र विवाह पद्धति थी, न सबसे अधिक प्रचलित; और “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल खोलिए, और हस्तिनापुर के स्तरों से पहले रुककर पूछिए कि सैकड़ों प्रासादों वाले नगर के अवशेष कैसे दिखने चाहिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए दो बातें काफ़ी हैं: महाभारत 10,000 से कम श्लोकों से एक लाख श्लोकों तक बढ़ा, और हस्तिनापुर का उत्खनन 1951-52 में बी.बी. लाल ने किया।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) की खोजें और किताब का सवाल, कि नगर का चित्रण ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात जोड़ा गया हो, आपस में कैसे जुड़ते हैं? (तीसरे स्तर के घर पक्की ईंटों के भी थे, और गंदे पानी के निकास के लिए शोषक-घट और ईंटों के नाले थे। इसलिए संभव है कि भव्य नगर का वर्णन तभी जोड़ा गया हो जब इस क्षेत्र में नगरों का विकास हुआ। पक्का कुछ नहीं; यह किताब का सवाल ही है।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) रचना के दो चरण; (2) दूसरे स्तर की खोजें।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) इनमें से कोई दो: संभवत: सूतों की मौखिक मूल कथा; पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों का इसे लिखना; लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जाना; लगभग 200-400 ईसवी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते उपदेशात्मक प्रकरण जुड़ना। (2) उत्खनन वाले सीमित क्षेत्र में घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, पर मिट्टी की दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें मिलीं; सरकंडे की छाप वाला पलस्तर बताता है कि कुछ घरों की दीवारें सरकंडों की थीं, जिन पर मिट्टी चढ़ाई जाती थी।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क19, ख10, ग8, घ8 और छ4; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 7 (क्या महाभारत का एक ही रचयिता था; यही प्रश्न बैंक का च4 है) और प्रश्न 9 (बंधुत्व और विवाह के ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था; यही प्रश्न बैंक का च6 है) कॉपी में। प्रश्न 9 के लिए कालांश 2 से 8 तक के बोर्ड-कार्य काम आएँगे।
- पृष्ठ 76 के सवालों के नमूना उत्तर —
-
पृष्ठ 76, पहला (क्या लाल की खोज और महाकाव्य के हस्तिनापुर में समानता है): बहुत कम।
- महाकाव्य में (स्रोत 15): नगर समुद्र की भाँति भरा है, सैकड़ों प्रासादों से संकुलित है, उसके सिंहद्वार, तोरण और कंगूरे बादलों की तरह घुमड़ते हैं, और वह इंद्र की नगरी के समान है।
- बी.बी. लाल की खोज (1951-52): दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) पर आवास गृहों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, बस मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें और सरकंडे की दीवारों पर मिट्टी का पलस्तर; तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) पर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, शोषक-घट, ईंटों के नाले और वलय-कूप।
लाल के विवरण में साधारण घर हैं, सैकड़ों प्रासादों वाला नगर नहीं; हाँ, उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। इसलिए किताब पूछती है कि क्या नगर का यह चित्रण बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात) जोड़ा गया, या यह कवियों की कल्पना थी।
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पृष्ठ 76, दूसरा (लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण क्यों दिए): स्रोत 16 में द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण हैं।
- कुंती की आज्ञा: कुंती ने बिना देखे “लाई गई वस्तु” बाँटने को कहा, और उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी।
- व्यास का कथन: पांडव इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था।
- शिव का वर: एक युवा स्त्री ने शिव से पाँच बार पति का वर माँगा था; वही द्रौपदी बनी।
- इतिहासकारों का सुझाव: बहुपति प्रथा संभवत: शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी, पर इतने स्पष्टीकरण बताते हैं कि समय के साथ यह प्रथा लोगों के बीच अमान्य होती चली गई। ब्राह्मणों की दृष्टि में भी यह अमान्य और अवांछित थी।
इसलिए लगता है कि लेखकों को इसे उचित ठहराने के लिए एक से अधिक कारण देने पड़े।
-
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 129–150।
कालांश 9 — 7. एक गतिशील ग्रंथ
किताब — पृष्ठ 77–78 · स्लाइड — भाग 7 · इंटरैक्टिव — 7. एक गतिशील ग्रंथ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता पाएगा कि महाभारत को गतिशील ग्रंथ क्यों कहते हैं, और लाक्षागृह के प्रसंग को संस्कृत पाठ और महाश्वेता देवी की कहानी “कुंती ओ निषादी”, दोनों से सुना पाएगा।
साथ ले जाइए — “स्रोत 1 से 16” वाला चार्ट (पृष्ठ 77 की चर्चा इसी से होगी)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 8 की पर्चियों में अक्सर रचना के चरण उलटे क्रम में लिखे मिलते हैं। एक बच्चा बोर्ड पर क्रम लिखे: सूत, ब्राह्मण (पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से), लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी, लगभग 200-400 ईसवी।
- 5–12 मिनट · गतिशील ग्रंथ। पृष्ठ 77 से: महाभारत का विकास संस्कृत पाठ के साथ खत्म नहीं हुआ। सदियों में इसके अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए, किसी क्षेत्र में जन्मी कहानियाँ इसमें जुड़ती गईं, और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं। इसके प्रसंग मूर्तिकला और चित्रों में दिखाए गए, और इसने नाटकों और नृत्य कलाओं को विषय-वस्तु दी। बच्चों से अध्याय में आए दो उदाहरण याद करवाइए: अहिच्छत्र की मिट्टी की मूर्ति (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी, पृष्ठ 60) और फारसी अनुवाद का चित्र (लगभग 1740-50, पृष्ठ 74)।
- 12–20 मिनट · लाक्षागृह, संस्कृत पाठ में। पहले जानकारी: संस्कृत पाठ में दुर्योधन पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मारना चाहता है; पांडव सुरंग खोदकर निकल जाते हैं। कुंती के भोज में आई एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ वहीं सो जाती है और पांडवों की लगाई आग में भस्म हो जाती है; उनके शव देखकर लोग समझते हैं कि पांडव मर गए। फिर पूछिए: इस प्रसंग में किसकी बात कही गई है, और किसकी नहीं? (पांडवों के बच निकलने की बात कही गई है। निषादी और उसके पाँच पुत्रों के बारे में संस्कृत पाठ मूक है: वे बस आग में भस्म हो जाते हैं, और उनके शव देखकर लोग पांडवों को मरा समझते हैं।)
- 20–28 मिनट · “कुंती ओ निषादी”। पृष्ठ 77–78 से: समसामयिक बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी, जो शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रसिद्ध हैं, ने उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ मूक है। उनकी कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ यह प्रसंग खत्म होता है: महाभारत के युद्ध के बाद कुंती एक वनप्रांतर में रहती हैं और पृथ्वी से बातें करते हुए अपनी त्रुटियाँ स्वीकार करती हैं। एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, उनसे कहती है कि अपने अतीत पर सोचते समय उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई। आग की लपटें पास आती हैं; निषादी बच निकलती है, कुंती वहीं रह जाती है। फिर “चित्र” बनाइए।
- 28–36 मिनट · पृष्ठ 77 की चर्चा, समूहों में। हर समूह अध्याय का महाभारत से लिया एक अंश ले (स्रोत 2, 5, 7, 9, 11, 15 या 16) और दो बातें लिखे: क्या इसकी पुष्टि किसी और साक्ष्य से होती है, और इससे लेखकों की सोच के बारे में क्या पता चलता है। उत्तर नीचे “नमूना उत्तर” में है।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) महाभारत को गतिशील ग्रंथ क्यों कहते हैं? दो कारण लिखिए। (2) “कुंती ओ निषादी” में निषादी कुंती को क्या याद दिलाती है?
लाक्षागृह: दो पाठ (चरण 4)
लाक्षागृह: दो पाठ
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| महाभारत कैसे आगे बढ़ा | उदाहरण | पृष्ठ |
|---|---|---|
| पाठान्तर | भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए | 77 |
| नई कहानियाँ | किसी क्षेत्र में जन्मी कहानियाँ इसमें जुड़ती गईं | 77 |
| मूर्तिकला और चित्र | अहिच्छत्र की मिट्टी की मूर्ति (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी); फारसी अनुवाद का चित्र (लगभग 1740-50) | 60, 74, 77 |
| नाटक और नृत्य | इसके प्रसंगों ने विषय-वस्तु दी | 77 |
| पुनर्व्याख्या | महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी” | 77–78 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “महाभारत का विकास संस्कृत पाठ पर पूरा हो गया।” नहीं। सदियों तक भिन्न-भिन्न भाषाओं में इसके पाठान्तर लिखे गए और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं।
- “‘कुंती ओ निषादी’ महाभारत का ही एक अंश है।” नहीं। यह समसामयिक बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी की कहानी है, जो वहाँ से शुरू होती है जहाँ लाक्षागृह का प्रसंग खत्म होता है।
- “छ: निर्दोष लोग” की गिनती। एक निषादी और उसके पाँच पुत्र, यानी छ:। बच्चे अक्सर पाँच लिख देते हैं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. एक गतिशील ग्रंथ खोलिए, और निषादी की बात से पहले रुककर पूछिए कि वह कुंती से क्या कहेगी।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए दो बातें काफ़ी हैं: महाभारत के पाठान्तर कई भाषाओं में लिखे गए, और “कुंती ओ निषादी” महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 10 की मातंग जातक और “कुंती ओ निषादी” में क्या समान है? (दोनों कथा को उस व्यक्ति के नज़रिए से रखती हैं जिसे मुख्य परंपरा में जगह कम मिली: एक में चाण्डाल मातंग, दूसरी में निषादी।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) गतिशील ग्रंथ के दो कारण; (2) निषादी की याद दिलाई बात।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) इनमें से कोई दो: इसके अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए; किसी क्षेत्र में जन्मी कहानियाँ इसमें जुड़ती गईं; मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं; इसके प्रसंग मूर्तिकला, चित्रों, नाटकों और नृत्य में आए। (2) कि अपने अतीत पर सोचते समय कुंती को लाक्षागृह में भस्म हुए उन छ: निर्दोष लोगों, यानी एक निषादी और उसके पाँच पुत्रों, की याद एक बार भी नहीं आई।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क20 और ङ6; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 6 (मौरिस विंटरविट्ज़ का कथन कि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है; लघु निबंध) कॉपी में।
- परियोजना, आज बताइए और कालांश 11 में जमा कराइए — प्रश्नावली का प्रश्न 11, उन बच्चों के लिए जिन्होंने कालांश 4 वाली एकलव्य की परियोजना (प्रश्न 12) नहीं चुनी: अध्याय के दो प्रसंग लीजिए, जैसे एकलव्य (स्रोत 7), हिडिम्बा (स्रोत 9), द्यूत और द्रौपदी के प्रश्न (स्रोत 11), द्रौपदी का विवाह (स्रोत 16) या लाक्षागृह; अपनी भाषा या किसी और भारतीय भाषा में इन प्रसंगों का कोई पाठ, लोककथा, नाटक या कहानी ढूँढ़िए; तुलना कीजिए कि कथा कौन कह रहा है, किसका नज़रिया सामने है, क्या जोड़ा या छोड़ा गया, और अंत कैसा है; और एक तालिका (प्रसंग, संस्कृत पाठ में, दूसरी भाषा के पाठ में, समानता, अंतर) के नीचे 200 से 300 शब्दों का सार लिखिए, हर पाठ का नाम, भाषा और लेखक साफ़ लिखकर।
- प्रश्न 6 और पृष्ठ 77 की चर्चा के नमूना उत्तर —
-
प्रश्न 6 (विंटरविट्ज़ का कथन): यह अध्याय विंटरविट्ज़ की बात को कई तरह से सही ठहराता है, क्योंकि महाभारत कई सदियों, कई लेखकों और पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ है। साथ ही अध्याय यह भी सिखाता है कि इसे सावधानी से पढ़ा जाए।
- अनेक प्रकार की सामग्री: इसकी विषयवस्तु आख्यान और उपदेशात्मक, दोनों है, और इसका सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है; इसमें युद्धों, वनों, राजमहलों और बस्तियों का जीवंत चित्रण है।
- कई सदियाँ, कई हाथ: इसकी रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक होती रही; मूल कथा संभवत: सूतों की थी, पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखा, और यह 10,000 से कम श्लोकों से बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला बना।
- पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ: समालोचनात्मक संस्करण के लिए उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की पांडुलिपियाँ मिलाई गईं; सबमें समानता मिली, और अनेक क्षेत्रीय प्रभेद भी।
- समाज के अनेक स्वर: राजाओं और योद्धाओं के साथ निषाद एकलव्य, राक्षस हिडिम्बा, युद्ध रोकने की सलाह देती गांधारी और प्रश्न पूछती द्रौपदी भी हैं; कभी-कभी परस्पर विरोधी विचार भी, जैसे द्रौपदी के प्रश्न पर दो मत।
- एक जीवित परंपरा: पाठान्तर, क्षेत्रीय कहानियाँ, मूर्तियाँ, चित्र, नाटक, नृत्य, और महाश्वेता देवी की “कुंती ओ निषादी”।
- सावधानी भी ज़रूरी: किताब (पृष्ठ 57) स्रोत 2 जैसे उद्धरणों के बारे में कहती है कि वे “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे; और “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”
महाभारत में सचमुच “बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीज़ें” हैं; पर इसे एक समाज का सीधा चित्र मानने के बजाय इतिहासकार इसकी भाषा, लेखक, श्रोता और काल को परखकर पढ़ते हैं।
-
पृष्ठ 77 की चर्चा (क्या महाभारत से उद्धृत अंश सत्य थे; वे रचयिताओं और श्रोताओं के बारे में क्या बताते हैं): हर अंश (स्रोत 2, 5, 7, 9, 11, 15, 16) के लिए दो बातें लिखिए: क्या इसकी पुष्टि किसी और साक्ष्य से होती है, और इससे लेखकों की सोच के बारे में क्या पता चलता है।
- सत्य के बारे में: किताब (पृष्ठ 57) स्रोत 2 जैसे उद्धरणों के बारे में कहती है कि वे “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे। कुछ इतिहासकार महाभारत के मुख्य कथानक को स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति मानते हैं, जबकि अन्य कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती। हस्तिनापुर के वर्णन (स्रोत 15) को बी.बी. लाल के उत्खनन से मिलाकर देखिए।
- लेखकों और श्रोताओं के बारे में: स्रोत 2 पितृवंशिक उत्तराधिकार को महत्व देता है, स्रोत 7 वर्ण के नियम लागू करता है, स्रोत 9 बताता है कि ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग लोगों को कैसे देखा जाता था, और स्रोत 16 बहुपति प्रथा को उचित ठहराने की कोशिश करता है।
याद रखिए कि “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”
-
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 151–156।
कालांश 10 — कालरेखा 1-2; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)
किताब — पृष्ठ 79–80, और पृष्ठ 56 का मानचित्र 1 · स्लाइड — कालरेखा वाला भाग · इंटरैक्टिव — सार और काल-रेखा और मानचित्र
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी कालरेखा 1 के ग्रंथों को उनकी भाषा के साथ क्रम से रख पाएगा, कालरेखा 2 के दोनों पड़ाव बता पाएगा, और इस अध्याय के मानचित्र 1 की अध्याय 2 के मानचित्र 1 से तुलना कर पाएगा।
साथ ले जाइए — चार्ट पेपर की लंबी पट्टी; किताब का मानचित्र 1 (पृष्ठ 56) और अध्याय 2 का मानचित्र 1; पहले दिन की पर्चियों वाला लिफ़ाफ़ा।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 9 की पर्चियों में अक्सर निर्दोष लोगों की गिनती पाँच लिखी मिलती है। एक बच्चा गिनती ठीक करे: एक निषादी और उसके पाँच पुत्र, यानी छ:।
- 5–16 मिनट · कालरेखा 1, प्रमुख साहित्यिक परंपराएँ। पृष्ठ 79 से। चार्ट की पट्टी पर बच्चे बारी-बारी से एक-एक पंक्ति लिखें (नीचे “बोर्ड-कार्य”)। हर पंक्ति के आगे भाषा भी लिखवाइए: संस्कृत, पालि, प्राकृत या तमिल। फिर “चित्र” बनाइए।
- 16–21 मिनट · कालरेखा 2। 1919-66: महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन; 1973: जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया, और 1979 में उनकी मृत्यु के बाद यह परियोजना अधूरी रह गई। किताब की कालरेखा में उनकी मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है। बच्चों को बताइए कि कॉपी में 1979 लिखें।
- 21–30 मिनट · मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)। पहले जानकारी: इस अध्याय का मानचित्र 1, “कुरु पांचाल क्षेत्र और निकटवर्ती स्थान” (पृष्ठ 56), और अध्याय 2 का मानचित्र 1 (महाजनपद) सामने रखिए। समूह दो खानों में नाम लिखें: जो दोनों मानचित्रों पर हैं, और जो केवल एक पर। फिर कुरु और पांचाल के ठीक आसपास के महाजनपद और नगर छाँटें। उत्तर नीचे “नमूना उत्तर” में है।
- 30–36 मिनट · पहले दिन की पर्चियाँ लौटाइए। हर बच्चा अपनी पर्ची पढ़े, जिस पर कालांश 1 का सवाल लिखा है: कोई ग्रंथ लिख दे कि समाज में ऐसा होना चाहिए, तो क्या हम मान लें कि लोग सचमुच वैसा ही करते थे? उसी पर्ची के पीछे अब दो पंक्तियाँ लिखें, अध्याय के कम से कम दो साक्ष्यों के साथ, जैसे सातवाहन रानियाँ, अक्षत्रिय राजा, रेशम बुनकरों की श्रेणी या मातंग जातक। दो-तीन बच्चे पढ़कर सुनाएँ।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) कालरेखा 1 से पालि में लिखे ग्रंथ और उनका काल लिखिए। (2) दो नगर लिखिए जो दोनों मानचित्रों पर हैं।
अध्याय के स्रोत, भाषा के हिसाब से (चरण 2)
अध्याय के स्रोत, भाषा के हिसाब से
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक चार्ट की पट्टी पर दोनों कालरेखाएँ पूरी हों, और बच्चे इन्हें कॉपी में उतारें।
| साल | क्या | भाषा | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| लगभग 500 ई.पू. | पाणिनि की अष्टाध्यायी, संस्कृत व्याकरण | संस्कृत | 79 |
| लगभग 500-200 ई.पू. | प्रमुख धर्मसूत्र | संस्कृत | 79 |
| लगभग 500-100 ई.पू. | आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित | पालि | 79 |
| लगभग 500 ई.पू.-400 ईसवी | रामायण और महाभारत | संस्कृत | 79 |
| लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवी | मनुस्मृति; तमिल संगम साहित्य की रचना और संकलन | संस्कृत; तमिल | 79 |
| लगभग 100 ईसवी | चरक और सुश्रुत संहिता, आयुर्वेद के ग्रंथ | संस्कृत | 79 |
| लगभग 200 ईसवी से | पुराणों का संकलन | संस्कृत | 79 |
| लगभग 300 ईसवी | भरतमुनि का नाट्यशास्त्र | संस्कृत | 79 |
| लगभग 300-600 ईसवी | अन्य धर्मशास्त्र | संस्कृत | 79 |
| लगभग 400-500 ईसवी | कालिदास के साहित्य सहित संस्कृत नाटक; आर्यभट्ट और वराहमिहिर के खगोल और गणित के ग्रंथ; जैन ग्रंथों का संग्रहण | संस्कृत; प्राकृत | 79 |
| 1919-66 | महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन | — | 79 |
| 1973 | जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया; 1979 में उनकी मृत्यु के बाद परियोजना अधूरी रह गई | — | 79 |
किताब की कालरेखा में उनकी मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है।
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “रामायण और महाभारत 500 ई.पू. में लिखे गए।” नहीं। कालरेखा में इनका काल लगभग 500 ई.पू. से 400 ईसवी है, यानी लंबी अवधि; और महाभारत की रचना के चरण पृष्ठ 74–75 पर हैं।
- “कालरेखा के साल पक्की तारीखें हैं।” नहीं। कालरेखा 1 की हर पंक्ति “लगभग” से शुरू होती है; कॉपी में भी “लगभग” लिखवाइए।
- “पांचाल इस अध्याय के मानचित्र पर कहीं लिखा है।” नहीं। इस अध्याय के मानचित्र पर पांचाल का अलग नाम नहीं, केवल शीर्षक में है; पांचाल की जगह अध्याय 2 के मानचित्र पर देखिए।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो मानचित्र खोलिए, और नाम पढ़ने से पहले रुककर पूछिए कि स्रोत 15 में जिस नगर का वर्णन है, वह कौन-सा है और मानचित्र पर कहाँ मिलेगा। (हस्तिनापुर; कुरु वाले हिस्से में।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए कालरेखा 1 की तीन पंक्तियाँ (धर्मसूत्र, रामायण और महाभारत, मनुस्मृति) और मानचित्र के तीन नाम (कुरु, हस्तिनापुर, इंद्रप्रस्थ) काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: इस अध्याय के कौन-से स्रोत कालरेखा 1 के किस खाने में जाएँगे? (स्रोत 2, 5, 7, 9, 11, 15, 16 महाभारत से, यानी रामायण और महाभारत वाली पंक्ति; स्रोत 3 और 12 मनुस्मृति से; स्रोत 10 और 13 पालि बौद्ध ग्रंथों से; स्रोत 14 पुरनानूरु से, यानी तमिल संगम साहित्य।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
-
निकास-पर्ची (चरण 6): (1) पालि ग्रंथ और उनका काल; (2) दोनों मानचित्रों पर मिलने वाले दो नगर।
-
निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित, लगभग 500-100 ई.पू.। (2) इनमें से कोई दो: इंद्रप्रस्थ, मथुरा, उज्जयिनी, श्रावस्ती, कुशीनगर, वैशाली, कौशाम्बी, वाराणसी।
-
गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1 और क5 दोबारा; मानचित्र वाली सूची (प्रश्न 10) कॉपी में पूरी कीजिए। परियोजनाएँ (प्रश्न 11 या 12) अगले कालांश में जमा होंगी।
-
प्रश्न 10 का नमूना उत्तर — दोनों मानचित्रों पर छपे नाम ये हैं।
- दोनों मानचित्रों पर (क्षेत्र): कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति, वत्स, मल्ल, और कोसल (अध्याय 2 के मानचित्र पर “कोशल”)।
- दोनों मानचित्रों पर (नगर): इंद्रप्रस्थ (अध्याय 2 में “इन्द्रप्रस्थ”), मथुरा, उज्जयिनी, श्रावस्ती, कुशीनगर, वैशाली, कौशाम्बी, वाराणसी।
- केवल इस अध्याय के मानचित्र पर: क्षेत्र शाक्य; नगर हस्तिनापुर, विराट, अयोध्या, कपिलवस्तु, लुंबिनी, पावा, पाटलिपुत्र, सारनाथ, बोधगया।
- केवल अध्याय 2 के मानचित्र पर: महाजनपद कंबोज, गांधार, पांचाल, काशी, वज्जि (वृजि), मगध, अंग, वंग, चेदि, अश्मक; नगर पुष्कलावती, तक्षशिला, अहिच्छत्र, चंपा, राजगीर।
फिर दोनों मानचित्रों पर कुरु और पांचाल के ठीक आसपास जो महाजनपद और नगर दिखें, उनकी सूची बनाइए, और हर नाम के आगे लिखिए कि वह किस मानचित्र पर मिला।
-
दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 157–162।
कालांश 11 — मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न
किताब — पृष्ठ 80–81 · स्लाइड — आख़िरी भाग · इंटरैक्टिव — हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी नमूना पत्र 1 हल कर चुका होगा, अपना पत्र साथी के पत्र से जाँच चुका होगा, और अपनी परियोजना जमा कर चुका होगा।
साथ ले जाइए — प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1, हर बच्चे के लिए (या बोर्ड पर लिखा हुआ); दीवार वाला चार्ट।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · मानचित्र, झटपट। तीन बच्चे बिना किताब देखे बताएँ: कुरु के पास का एक नगर, दोनों मानचित्रों पर मिलने वाला एक क्षेत्र, और केवल इस अध्याय के मानचित्र पर मिलने वाला एक नगर। (जैसे: हस्तिनापुर या इंद्रप्रस्थ; कुरु, शूरसेन, मत्स्य या अवन्ति; हस्तिनापुर, विराट या अयोध्या।)
- 5–30 मिनट · लिखित परीक्षा। प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1, कुल 20 अंक, आठ प्रश्न: तीन एक-एक अंक के, दो दो-दो अंक के, एक तीन अंक का, और दो पाँच-पाँच अंक के (पितृवंशिकता, और महाभारत का एक रचयिता)।
- 30–37 मिनट · साथी से जाँच। बच्चे पत्र बदलें और प्रश्न बैंक के उत्तरों से जाँचें। पाँच अंक वाले उत्तर में देखें कि हर बिंदु के साथ स्रोत या उदाहरण है या नहीं।
- 37–40 मिनट · परियोजनाएँ और आख़िरी पर्ची। प्रश्न 11 या 12 की परियोजना जमा कराइए। आख़िरी पर्ची पर हर बच्चा एक पंक्ति लिखे: इस अध्याय में किस स्रोत ने उसकी सोच सबसे ज़्यादा बदली, और क्यों।
बोर्ड-कार्य
अभ्यास के बारह प्रश्न, कब दिए गए और उत्तर की मुख्य बात। यह तालिका बोर्ड पर रहे, ताकि बच्चे अपने उत्तर इससे मिला सकें।
| प्रश्न | कब दिया | उत्तर की मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1. विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता | कालांश 3 | विरासत और सिंहासन पुत्रों को; अधिकतर राजवंश इसी पर; लचीलापन भी, जैसे प्रभावती गुप्त |
| 2. क्या शासक क्षत्रिय ही होते थे | कालांश 4 | नहीं: मौर्य (बहस), शुंग और कण्व ब्राह्मण, शक, सातवाहन; राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था” |
| 3. द्रोण, हिडिम्बा और मातंग | कालांश 5 | मानदंड लागू, समझौता, नकार |
| 4. बौद्ध सामाजिक अनुबंध और ‘पुरुषसूक्त’ | कालांश 7 | उत्पत्ति ब्रह्मा से, या मनुष्यों के अपने कर्म से; राजा क्षत्रिय, या महासम्मत्त |
| 5. युधिष्ठिर के संदेश की सूची | कालांश 7 | भेद, गुरु, उम्र, लिंग, बंधुत्व; विदुर का “सर्वोपरि” स्थान |
| 6. विंटरविट्ज़ का कथन | कालांश 9 | अनेक प्रकार की सामग्री, कई सदियाँ और कई हाथ, पूरा उपमहाद्वीप; पर सावधानी से पढ़ें |
| 7. एक ही रचयिता? | कालांश 8 | परंपरा व्यास का नाम लेती है; रचना के चरण और 10,000 से कम से एक लाख श्लोक बताते हैं: नहीं |
| 8. स्त्री-पुरुष की विषमताएँ | कालांश 6 | वंश, विवाह और संपत्ति के नियम पुरुषों के पक्ष में; स्त्रीधन, द्रौपदी, प्रभावती गुप्त |
| 9. ब्राह्मणीय नियम सर्वत्र नहीं | कालांश 8 | सातवाहन रानियों के गोत्र, बहुपति प्रथा, हिडिम्बा, मातंग; प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था” |
| 10. मानचित्र | कालांश 10 | दोनों मानचित्रों पर कुरु, मत्स्य, शूरसेन; इंद्रप्रस्थ, मथुरा |
| 11. दूसरी भाषाओं में पुनर्व्याख्या | कालांश 9 (परियोजना) | दो प्रसंग, दो पाठ, समानता और अंतर की तालिका |
| 12. एकलव्य अपने दृष्टिकोण से | कालांश 4 (परियोजना) | घटनाएँ स्रोत 7 वाली, नज़रिया चुने हुए पात्र का |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- प्रश्न 2 में केवल “नहीं” लिख देना। हर राजवंश के साथ बताइए कि ग्रंथ उसे क्या मानते थे, और अंत में किताब का निष्कर्ष।
- प्रश्न 3 में कथाएँ दोहरा देना। अंक तुलना के हैं: लागू, समझौता, नकार, और यह कि तीसरी कथा पालि बौद्ध ग्रंथ से है।
- प्रश्न 8 में केवल एक पक्ष। विषमता के साक्ष्य के साथ दूसरा पहलू भी: द्रौपदी का प्रश्न, गांधारी की सलाह, प्रभावती गुप्त, सातवाहन रानियाँ।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- आख़िरी पर्ची: किस स्रोत ने सोच सबसे ज़्यादा बदली, और क्यों। इसका कोई एक सही उत्तर नहीं; देखिए कि बच्चा स्रोत का नाम और नंबर लिखता है या नहीं।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के नमूना पत्र 2 और 3; साथ में प्रश्नोत्तरी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड का पूरा सेट। माता-पिता के लिए अभिभावकों का पन्ना है, और बच्चे ख़ुद को परख पर जाँच सकते हैं।
पूरे अध्याय के लिए
अलग-अलग बच्चों के लिए
| किसके लिए | क्या कीजिए |
|---|---|
| जो बहुत पीछे हैं | हर कालांश में बस बोर्ड-कार्य की तालिका और “कमज़ोर विद्यार्थी” वाली बात; “ग्रंथों के अनुसार / दूसरे साक्ष्य” वाला चार्ट रोज़ दो मिनट उनके साथ पढ़िए। |
| औसत बच्चे | निकास-पर्ची, प्रश्न बैंक का गृहकार्य, और हर कालांश के फ़्लैशकार्ड। |
| तेज़ बच्चे | “तेज़ विद्यार्थी” वाले सवाल, प्रश्नावली के लघु निबंध (प्रश्न 6 से 9), और परियोजना प्रश्न 11। |
| जो बोलने में झिझकते हैं | समूह में उन्हें लिखने वाले की भूमिका दीजिए, और कथाएँ पढ़ने की बारी पहले से बता दीजिए; बोलने का मौका पर्ची पढ़ने से शुरू कीजिए। |
सतत मूल्यांकन
| साधन | कब | क्या देखिए |
|---|---|---|
| निकास-पर्ची | कालांश 1 से 10, हर कालांश के अंत में | ग्रंथ का नियम “ग्रंथों के अनुसार” लिखा या उसे सीधे इतिहास मान लिया |
| कॉपी की “स्रोतों की सूची” | कालांश 2 से 10 | हर स्रोत के आगे ग्रंथ या अभिलेख और उसकी भाषा |
| समूह की तालिका | कालांश 4, 5, 7, 9 | स्रोतों की तुलना, कक्षा के लोगों की नहीं |
| पहले दिन की पर्ची | कालांश 1 और 10 | दोनों उत्तरों में क्या बदला, और कितने साक्ष्य आए |
| परियोजना | कालांश 11 में जमा | प्रश्न 11 में पाठों के नाम, भाषा और लेखक; प्रश्न 12 में स्रोत 7 की घटनाएँ बिना बदले |
लिखित मूल्यांकन
अपनी इकाई-परीक्षा के लिए एक सुझाया हुआ ढाँचा; अंक अपनी ज़रूरत के हिसाब से बदल लीजिए।
| प्रकार | अंक | क्या पूछें |
|---|---|---|
| वस्तुनिष्ठ (बहुविकल्पी, रिक्त स्थान, सही या ग़लत) | 6 × 1 = 6 | साल, नाम और शब्द: 1919, मनुस्मृति का काल, महासम्मत्त, स्त्रीधन |
| अति लघूत्तरीय | 2 × 2 = 4 | गोत्र के दो नियम, चाण्डालों के ‘कर्तव्य’ |
| लघूत्तरीय | 2 × 3 = 6 | वर्ण और जाति का अंतर, तमिलकम् के सरदार और चारण |
| स्रोत पर आधारित | 1 × 4 = 4 | स्रोत 3, 11, 13 या 16 में से एक |
| दीर्घ उत्तरीय | 2 × 5 = 10 | प्रश्नावली के प्रश्न 1, 2, 3, 7, 8 या 9 में से दो |
| कुल | 30 |
अंक कैसे कटेंगे, यह पहले ही बता दीजिए
- ग्रंथ का नियम इतिहास की तरह लिखा, जैसे यह कि शूद्र केवल सेवा करते थे, बिना “ग्रंथों के अनुसार” या ग्रंथ का नाम लिखे: उस बिंदु का आधा अंक कटेगा।
- पाँच अंक के उत्तर में स्रोत या उदाहरण का नाम नहीं, जैसे स्रोत 7 या सातवाहन रानियाँ: हर ऐसे बिंदु पर अंक कटेगा।
- काल बिना “लगभग” के, या वर्ण और जाति को एक मान लेना: एक अंक कटेगा।
प्रोजेक्ट और गतिविधि
| # | प्रोजेक्ट | कैसे |
|---|---|---|
| 1 | एकलव्य की कथा अपने दृष्टिकोण से (प्रश्न 12) | कालांश 4 में बताइए, कालांश 11 में जमा; लगभग एक पन्ना, शीर्षक के साथ, और अंत में दो-तीन पंक्तियाँ कि यह नज़रिया क्यों चुना। लिखने का काम, कक्षा में अभिनय नहीं। |
| 2 | दूसरी भाषाओं में महाभारत (प्रश्न 11) | कालांश 9 में बताइए, कालांश 11 में जमा; दो प्रसंग, तुलना की तालिका और 200 से 300 शब्दों का सार। |
| 3 | “स्रोत 1 से 16” का चार्ट | कालांश 2 से 8 तक हर स्रोत जुड़ता है; कालांश 10 में हर स्रोत के आगे कालरेखा 1 का खाना भी। |
| 4 | दोनों कालरेखाओं की पट्टी | कालांश 10 में बनती है; आगे के कालांशों में साथ ले जाइए, और बच्चे इसे कॉपी में भी उतारें। |
शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ
- ग्रंथ का नियम, इतिहास नहीं। वर्ण, जीविका, विवाह और संपत्ति के नियम पढ़ाते समय हर बार “ग्रंथों के अनुसार” बोलिए, और उसी के साथ दूसरा साक्ष्य रखिए: अभिलेख, कथा या यात्री का विवरण। किताब का यही तरीका है।
- कक्षा में जाति। किसी बच्चे से उसकी जाति या समुदाय मत पूछिए; किसी वर्ण, जाति या चाण्डाल की भूमिका वाला अभिनय, खेल या समूह मत बनाइए; आज की किसी जाति या समुदाय का नाम मत लीजिए। तुलना हमेशा स्रोतों की हो। कोई बच्चा आज की जाति की बात छेड़े, तो साफ़ बताइए: भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और उसका किसी भी रूप में आचरण निषिद्ध करता है। यह सावधानी हमारी ओर से है।
- किताब की छपाई की भूलें। पृष्ठ 55 के बॉक्स में बांधवों के बड़े समूह के लिए जो शब्द है, वह ज्ञाति है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं। पृष्ठ 71 पर संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है। कालरेखा 2 में वैन बियुटेनेन की मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है। ये बच्चों को सीधे सही रूप में दीजिए।
- काल हमेशा “लगभग” के साथ। किताब के लगभग सारे काल अनुमानित हैं; महाभारत के काल और चरण उतने ही बताइए जितने पृष्ठ 74–75 पर हैं।
- कथा सत्य है या नहीं, यह बच्चों से तय मत करवाइए। किताब (पृष्ठ 57) स्रोत 2 जैसे उद्धरणों के बारे में कहती है कि वे “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे। सवाल यह रखिए कि कथा किसने, किसके लिए और क्यों कही।