यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं।
यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी तक के आरंभिक समाज की बात करता है: परिवार और विवाह, वर्ण और जाति, संपत्ति और प्रतिष्ठा। हर हिस्से में दो बातें आमने-सामने रखी गई हैं: संस्कृत के ब्राह्मणीय ग्रंथों (धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र, मनुस्मृति) में तय किए गए मानदंड, और दूसरे साक्ष्य (अभिलेख, बौद्ध ग्रंथ, तमिल संगम कविताएँ, चीन से आए यात्रियों के विवरण, महाभारत की अपनी कहानियाँ), जो दिखाते हैं कि लोग असल में क्या करते थे। दूसरी कड़ी यह है कि इतिहासकार एक बड़े ग्रंथ, महाभारत, को कैसे पढ़ते हैं। किताब शुरू में ही याद दिलाती है कि हर ग्रंथ के बारे में पूछिए कि ये ग्रंथ “किसने लिखे, क्या लिखा गया और किनके लिए इनकी रचना हुई”।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 80–81) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
अध्याय की दो कड़ियाँ
- मानदंड: लगभग 500 ई.पू. से ब्राह्मणों ने धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र नाम के संस्कृत ग्रंथों में समाज के लिए आचार संहिताएँ संकलित कीं। इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति थी, जिसका संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच हुआ।
- व्यवहार: अभिलेख, पालि और तमिल ग्रंथ, चीनी यात्रियों के विवरण और महाभारत की कहानियाँ दिखाती हैं कि इन नियमों का पालन हर जगह नहीं होता था। किताब के शब्दों में ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”।
- महाभारत: अपने वर्तमान रूप में एक लाख श्लोकों से अधिक का महाकाव्य, जिसकी रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक होती रही। इतिहासकार इसे इसकी भाषा, विषयवस्तु, लेखकों, तिथियों और पुरातत्व के साक्ष्य के साथ मिलाकर पढ़ते हैं।
2. ज़रूरी शब्द★
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| कुल | संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए शब्द | 55 |
| ज्ञाति | बांधवों का बड़ा समूह | 55 |
| वंश | किसी कुल के पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज, जो इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं | 55 |
| पितृवंशिकता | वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है | 55 |
| मातृवंशिकता | वह वंश परंपरा जो माँ से जुड़ी होती है | 55 |
| बहिर्विवाह | गोत्र से बाहर विवाह | 57 |
| अंतर्विवाह | समूह के भीतर ही विवाह; यह समूह एक गोत्र, कुल, जाति या एक ही स्थान पर बसने वालों का हो सकता है | 57 |
| बहुपत्नी प्रथा | एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ होने की परिपाटी | 57 |
| बहुपति प्रथा | एक स्त्री के अनेक पति होने की पद्धति | 57 |
| कन्यादान | विवाह में कन्या की भेंट; इसे पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया | 57 |
| धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र | संस्कृत ग्रंथ जिनमें लगभग 500 ई.पू. से ब्राह्मणों के बनाए सामाजिक मानदंड संकलित किए गए | 58 |
| मनुस्मृति | धर्मशास्त्रों में सबसे महत्वपूर्ण; संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच | 58 |
| गोत्र | लगभग 1000 ई.पू. के बाद से चली ब्राह्मणीय पद्धति; हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था और उसके सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे | 58 |
| मातृनाम | माता के नाम से बना नाम, जैसे गोतमी–पुत्त यानी ‘गोतमी का पुत्र’ | 59–60 |
| वर्ण | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में बताई गई चार वर्गों वाली व्यवस्था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र | 61 |
| जाति | समाज के वर्गीकरण का दूसरा शब्द; वर्ण चार ही थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी | 63 |
| मलेच्छ | ब्राह्मण जिन्हें बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे, जैसे मध्य एशिया से आए शक; कभी-कभी असंस्कृत भाषा बोलने वाले लोगों को भी मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था | 62, 65 |
| श्रेणी | एक ही जीविका या व्यवसाय वाली जातियों का संगठन | 63 |
| वणिक | संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में व्यापारी के लिए शब्द | 64 |
| निषाद | वन में रहने वाला शिकारी समुदाय; एकलव्य इसी से जुड़ा माना जाता था | 62, 64 |
| अस्पृश्य | वर्ण व्यवस्था के बाहर माने गए लोग, जिनसे अपने को ‘पवित्र’ मानने वाले भोजन तक नहीं लेते थे | 65–66 |
| चाण्डाल | शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वाले; वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखे गए | 66 |
| स्त्रीधन | विवाह के समय मिले उपहार, जिन पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; संतान इन्हें विरासत में पा सकती थी, पति का इन पर अधिकार नहीं था | 68 |
| महासम्मत्त | बौद्ध मिथक में सब लोगों द्वारा चुने गए मनुष्य की उपाधि | 72 |
| समालोचनात्मक संस्करण | देश भर की पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना करके तैयार किया गया महाभारत का पाठ (काम 1919 में शुरू हुआ) | 54 |
| आख्यान | महाभारत का कहानियों वाला भाग | 73 |
| उपदेशात्मक | निर्देश या शिक्षा देने वाला भाग; इसमें सामाजिक आचार-विचार के मानदंड हैं | 73 |
| सूत | भाट सारथी, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे; संभवत: महाभारत की मूल कथा के रचयिता यही थे | 74 |
| इतिहास | आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत की श्रेणी; इस शब्द का अर्थ है ‘ऐसा ही था’ | 74 |
हिंदी किताब के बॉक्स में यहाँ ‘जाति’ छपा है; यह शब्द ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह) है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं।
3. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण★★
किताब का भाग 1, पृष्ठ 54 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 7
- कब और किसने: 1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में अनेक विद्वानों ने मिलकर महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का ज़िम्मा उठाया।
- कैसे: देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी महाभारत की संस्कृत पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं। सभी पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना की गई, और वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले।
- नतीजा: 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंड; परियोजना पूरी होने में सैंतालीस वर्ष लगे।
- पहली बात जो उभरी: उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की सभी पांडुलिपियों के अनेक अंशों में समानता थी।
- दूसरी बात: कुछ शताब्दियों में महाभारत के प्रेषण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेद (अलग-अलग पाठ) उभरे। इन्हें मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखा गया; 13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक इन्हीं प्रभेदों का ब्योरा देते हैं।
- प्रभेदों का अर्थ: ये प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार और आचरण के बीच संवाद दिखाते हैं, जिसमें “द्वंद्व और मतैक्य” दोनों हैं।
- स्रोतों की सीमा: इन प्रक्रियाओं की हमारी समझ मुख्यत: उन ग्रंथों पर टिकी है “जो संस्कृत में ब्राह्मणों द्वारा उन्हीं के लिए लिखे गए”। उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के इतिहासकारों ने पहले मान लिया कि जो लिखा है, वैसा ही व्यवहार में होता होगा। बाद में पालि, प्राकृत और तमिल ग्रंथों के अध्ययन से पता चला कि इन आदर्शों पर प्रश्न भी उठते थे और “यदा-कदा इनकी अवहेलना भी की जाती थी”।
समालोचनात्मक संस्करण कैसे बना (1919 से)
4. परिवार, बंधुता और विवाह: नियम और व्यवहार★★
किताब का भाग 2 (2.1–2.5), पृष्ठ 55–60 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 8, 9
परिवारों के बारे में जानकारी (2.1)
- परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं, पर इनकी परिभाषा हर समाज में अलग है: कुछ समाजों में चचेरे, मौसेरे भाई-बहन से खून का रिश्ता माना जाता है, कुछ में नहीं।
- आरंभिक समाजों में विशिष्ट परिवारों की जानकारी आसानी से मिल जाती है, पर सामान्य लोगों के पारिवारिक संबंधों को पुनर्निर्मित करना मुश्किल है। इतिहासकार परिवार और बंधुता के विचारों का भी अध्ययन करते हैं, क्योंकि इनसे लोगों की सोच का पता चलता है।
पितृवंशिक व्यवस्था के आदर्श (2.2)
- एक स्तर पर महाभारत बंधुता के रिश्तों में बदलाव की कहानी है: कुरु वंश के बांधवों के दो दल, कौरव और पांडव, भूमि और सत्ता के लिए लड़े। युद्ध में पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया।
- पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी थी, पर महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया। इसमें पुत्र पिता की मृत्यु के बाद उनके संसाधनों पर (राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी) अधिकार जमा सकते थे।
- अधिकतर राजवंश (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे, पर इसमें विभिन्नता थी: पुत्र न होने पर कभी एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बनता, कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अधिकार जमाते, और कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं।
- यह झुकाव केवल शासक परिवारों का नहीं था: ऋग्वेद जैसे कर्मकांडीय ग्रंथ के मंत्रों में भी यह दिखता है, और संभव है कि धनी वर्ग के पुरुष भी यही दृष्टिकोण रखते थे।
- स्रोत 1 (ऋग्वेद का मंत्र, संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में जोड़ा गया): विवाह संस्कार में पुरोहित यह मंत्र पढ़ता था, और आज भी अनेक हिंदू विवाह संस्कारों में इसका प्रयोग होता है। इसमें कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”; ‘यहाँ’ और ‘वहाँ’ से मतलब पिता और पति के घर से है।
- स्रोत 2 (महाभारत का आदिपर्वन्): दुर्योधन ने अपने पिता धृतराष्ट्र से कहा कि यदि पांडव पांडु से विरासत पाते हैं तो “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”। किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि ग्रंथ लिखने वाले क्या सोचते थे; कभी-कभी इनमें परस्पर विरोधी विचार भी मिलते हैं।
विवाह के नियम (2.3)
- पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्वपूर्ण थे। पुत्रियों का विवाह अपने गोत्र से बाहर करना अपेक्षित था; इसे बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं।
- इसलिए ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था, ताकि ‘उचित’ समय पर ‘उचित’ व्यक्ति से उनका विवाह हो। कन्यादान को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
- नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन जटिल हुआ और विचारों का आदान-प्रदान बढ़ा; संभवत: इस वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्न उठे। जवाब में ब्राह्मणों ने विस्तृत आचार संहिताएँ बनाईं: लगभग 500 ई.पू. से धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र, और इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति (लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच संकलित)।
- ब्राह्मण लेखक मानते थे कि उनका दृष्टिकोण सार्वभौमिक है, पर वास्तविक सामाजिक संबंध कहीं अधिक जटिल थे। क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”।
- धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ माने गए और बाकी निंदित। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियमों को नहीं मानते थे।
- स्रोत 3 (मनुस्मृति की चार पद्धतियाँ): पहली में पिता बहुमूल्य वस्त्रों और अलंकारों से सजी कन्या का दान उस वेदज्ञ वर को करता है जिसे उसने स्वयं बुलाया हो; चौथी में पिता वर-वधू को साथ मिलकर दायित्व निभाने को कहकर कन्या का दान करता है; पाँचवीं में वर, वधू के बांधवों को और वधू को यथेष्ट धन देकर वधू पाता है; छठी में स्त्री और पुरुष अपनी इच्छा से मिलते हैं।
विवाह के आठ प्रकार
स्त्री का गोत्र (2.4)
- लगभग 1000 ई.पू. के बाद से लोगों को (खासतौर से ब्राह्मणों को) गोत्रों में बाँटने की ब्राह्मणीय पद्धति चली। हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर था और उसके सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे।
- दो नियम: विवाह के बाद स्त्री पिता के नहीं, पति के गोत्र की मानी जाती थी; और एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।
- सातवाहन: ये पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों के शासक थे (लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक)। इनके कई अभिलेखों से इतिहासकारों ने पारिवारिक और वैवाहिक रिश्तों का खाका बनाया है।
- स्रोत 4: सातवाहन राजाओं के नामों में राजा की एक जैसी पदवी है, और अगला शब्द पुत्त (प्राकृत में ‘पुत्र’) पर खत्म होता है; गोतमी–पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं; ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं।
- सातवाहन रानियाँ: कुछ सातवाहन राजा बहुपत्नी प्रथा मानते थे। रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे। यानी विवाह के बाद भी उन्होंने पति कुल का गोत्र अपनाने के बजाय पिता का गोत्र नाम ही रखा। कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था।
- यह अंतर्विवाह (बंधुओं में विवाह) का उदाहरण है, जिसका प्रचलन दक्षिण भारत के कई समुदायों में (भी) है। ममेरे, चचेरे भाई-बहनों से विवाह के कारण एक सुगठित समुदाय उभर पाता था।
- उपमहाद्वीप के दूसरे भागों में भी संभवत: अन्य विविधताएँ थीं, पर उनके ब्योरे पुनर्निर्मित नहीं हो पाए हैं।
गोत्र के दो नियम और सातवाहन रानियाँ
क्या माताएँ महत्वपूर्ण थीं? (2.5)
- सातवाहन राजाओं को मातृनाम से पहचाना जाता था, जिससे लगता है कि माताएँ महत्वपूर्ण थीं। पर किताब सावधान करती है: सातवाहन राजाओं में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था।
- स्रोत 5 (गांधारी की सलाह): जब कौरवों और पांडवों के बीच युद्ध अवश्यंभावी हो गया, तब गांधारी ने अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की और कहा, “युद्ध में कुछ भी शुभ नहीं होता”। दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, वह युद्ध में लड़ा और हार गया।
5. वर्ण, जाति और वर्ण व्यवस्था के बाहर के लोग★★
किताब का भाग 3 (3.1–3.5), पृष्ठ 61–67 · प्रश्नावली में: प्रश्न 2, 3
‘उचित’ जीविका (3.1)
- धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक व्यवस्था का उल्लेख है, जिसमें वर्णों को उनकी योग्यता, कार्य और व्यवसाय, क्षमताओं और रुचियों के आधार पर निर्धारित किया गया था।
- ब्राह्मण: वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, दान देना और ग्रहण करना।
- क्षत्रिय: युद्ध करना, लोगों की रक्षा, न्याय संचालन; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना।
- वैश्य: कृषि, पशुपालन और व्यापार; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ करना और कराना, दान देना।
- शूद्र: समाज के सुचारु संचालन में बाकी तीन वर्णों की सहायता।
- अन्य ग्रंथ भी: श्रीमद्भगवद् गीता जैसे ग्रंथ भी संकेत करते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था “गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य” पर आधारित थी, जन्म से तय कोई कठोर व्यवस्था नहीं। ऐसे उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी मिलते हैं।
- स्रोत 6: प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यवसायों में लचीलापन दिखता है। ऋग्वेद के एक सूक्त का वक्ता कहता है कि वह स्वयं कवि है, उसके पिता वैद्य हैं और माता अन्न पीसने का काम करती हैं।
- समय के साथ बदलाव: ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल पुरुषसूक्त में आते हैं, और यह सूक्त ऋग्वेद के सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था (IGNOU, इकाई 4)। ब्राह्मण स्वयं को “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” और सबसे श्रेष्ठ बताते थे (स्रोत 13, पृष्ठ 70); लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।
- स्रोत 7 (एकलव्य, आदिपर्वन्): ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना किया। एकलव्य ने मिट्टी की द्रोण-प्रतिमा को गुरु मानकर अभ्यास किया और तीर चलाने में सिद्धहस्त हो गया। अर्जुन को दिया वचन निभाने के लिए द्रोण ने गुरु दक्षिणा में एकलव्य के दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया; अंत में “कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।”
धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में चार वर्णों की 'जीविका'
अक्षत्रिय राजा (3.2)
- शास्त्रों के अनुसार “केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे”, पर अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले।
- मौर्य: बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र उन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं; उनके उद्भव पर बहस होती रही है।
- शुंग और कण्व: मौर्यों के उत्तराधिकारी, जो ब्राह्मण थे।
- राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके। किताब के शब्दों में राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर “शायद ही निर्भर करता था”।
- शक: मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे। फिर भी संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन है, जिससे पता चलता है कि शक्तिशाली मलेच्छ संस्कृतीय परिपाटी से अवगत थे।
- सातवाहन: सातवाहन कुल के सबसे प्रसिद्ध शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया, और दावा किया कि उसने चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाई। फिर भी उसने रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए।
- सातवाहन स्वयं को ब्राह्मण बताते थे, जबकि शास्त्र के अनुसार राजा को क्षत्रिय होना चाहिए; वे वर्ण व्यवस्था की मर्यादा का दावा करते थे, पर उससे बाहर के लोगों से विवाह करते थे और अंतर्विवाह का पालन करते थे। किताब के शब्दों में जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना “बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी”।
जाति और सामाजिक गतिशीलता (3.3)
- वर्ण केवल चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी। नए सामाजिक समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियों की संख्या बढ़ती रही। एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं।
- मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी): इसमें रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का वर्णन है, जो मूलतः लाट (गुजरात) की निवासी थी और अपने बच्चों और बांधवों के साथ मंदसौर गई, जिसे उस समय दशपुर कहा जाता था। उन्होंने वहाँ के राजा की महानता के बारे में सुना था।
- श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य दूसरी जीविका भी अपना लेते थे। सबने मिलकर शिल्प से कमाया धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया।
- स्रोत 8 (‘रेशम बुनकरों ने क्या किया?’): संस्कृत अभिलेख के इस अंश में लोगों के अलग-अलग काम गिनाए गए हैं: संगीत, जीवनियाँ और कथाएँ, धार्मिक व्याख्यान, धार्मिक अनुष्ठान, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध।
- वणिक: शास्त्र व्यापार को वैश्यों की जीविका बताते हैं, पर दूसरे स्रोत अधिक जटिल तस्वीर दिखाते हैं। शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त को ब्राह्मण–वणिक बताया गया है, और पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में मंदिर के निर्माण के लिए धन देने वाले दो भाइयों को क्षत्रिय–वणिक कहा गया है।
चार वर्णों के परे: एकीकरण (3.4)
- उपमहाद्वीप में हमेशा से ऐसे समुदाय रहे जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। संस्कृत साहित्य उन्हें कई बार “विचित्र, असभ्य और पशुवत” चित्रित करता है। उदाहरण: वन में रहने वाले लोग, जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह जीवन-निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन था, जैसे निषाद, जिनसे एकलव्य जुड़ा माना जाता था।
- यायावर पशुपालकों को भी शंका से देखा जाता था, क्योंकि वे बसे हुए कृषिकर्मियों के साँचे में नहीं ढलते थे। कभी-कभी असंस्कृत भाषा बोलने वाले लोगों को मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था।
- फिर भी इन लोगों के बीच विचारों और मतों का आदान-प्रदान होता था, जिसका पता महाभारत की कथाओं से चलता है।
- स्रोत 9 (हिडिम्बा, आदिपर्वन्): नरभक्षी राक्षस की बहन हिडिम्बा ने भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा। युधिष्ठिर इस शर्त पर माने कि भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहें और रात को लौट आएँ। उनका पुत्र घटोत्कच हुआ, जिसने प्रण किया कि पांडवों को ज़रूरत होगी तो वह आ जाएगा। कुछ इतिहासकारों का मत है कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से भिन्न थे।
चार वर्णों के परे: अधीनता और संघर्ष (3.5)
- कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था के बाहर माना गया और ‘अस्पृश्य’ के रूप में वर्गीकृत किया गया, जिससे सामाजिक भेदभाव और गहरा हुआ। अनुष्ठानों से जुड़े कर्म ‘पवित्र’ माने जाते थे, और अपने को पवित्र मानने वाले अस्पृश्यों से भोजन नहीं लेते थे।
- शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा गया और वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा गया। स्वयं को सबसे ऊपर मानने वाले उनका स्पर्श, यहाँ तक कि उन्हें देखना भी, अपवित्रकारी मानते थे।
- मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्य’: गाँव के बाहर रहना; फेंके हुए बर्तन, मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण; रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना; संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि और वधिक का काम।
- चीन से आए यात्री: बौद्ध भिक्षु फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी। चीनी तीर्थयात्री श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर से बाहर रहते थे।
- अब्राह्मणीय ग्रंथों में चाण्डालों का चित्रण कभी ब्राह्मणीय ग्रंथों जैसा है, पर कभी एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का संकेत देता है।
- स्रोत 10 (मातंग जातक, पालि): बोधिसत्त ने बनारस के बाहर एक चाण्डाल के पुत्र मातंग के रूप में जन्म लिया। व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक उन्हें देखकर चिल्लाई, “मैंने कुछ अशुभ देख लिया है।” और उसके सेवकों ने मातंग को पीटा। मातंग विरोध में उसके घर के बाहर लेट गए; सातवें रोज़ घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया। बाद में उनका पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़कर रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था, पर भिक्षा माँगने आए पिता को उसने लौटा दिया। मातंग का उत्तर था: “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।”
6. संपत्ति और प्रतिष्ठा: जन्म के परे★★
किताब का भाग 4 (4.1–4.3), पृष्ठ 68–71 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 8
- दास, भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, शिकारी, मछुआरे, पशुपालक, किसान, ग्राममुखिया, शिल्पकार, वणिक और राजा, सबका सामाजिक स्थान इस बात पर निर्भर करता था कि आर्थिक संसाधनों पर उनका कितना नियंत्रण है।
संपत्ति पर स्त्री और पुरुष के भिन्न अधिकार (4.1)
- द्यूत का प्रकरण (महाभारत): दुर्योधन ने युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा के लिए बुलाया। धोखे के कारण युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अपने अनुज और फिर स्वयं को भी हार गए। इसके बाद उन्होंने पांडवों की सहपत्नी द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया और हार गए।
- स्रोत 11 (द्रौपदी के प्रश्न): माना जाता है कि द्रौपदी ने पूछा कि क्या युधिष्ठिर उसे दाँव पर लगाने से पहले स्वयं को हार चुके थे। दो मत सामने आए: पहला, पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है, इसलिए यह अनुचित नहीं; दूसरा, दासत्व स्वीकार कर चुका पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता। कोई निष्कर्ष नहीं निकला; अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी की निजी स्वतंत्रता लौटा दी।
- पैतृक संपत्ति: स्मृति परंपरा के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति संतानों में बराबर बाँटी जाती थी, और ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था।
- स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था। उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था। फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति या अपने बहुमूल्य धन का गुप्त संचय करने से रोकती है।
- असल स्थिति: वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनाढ्य थीं, और उच्च वर्ग की महिलाएँ संसाधनों पर पैठ रखती थीं; पर अधिकतर अभिलेखीय और साहित्यिक साक्ष्य बताते हैं कि सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था। दूसरे शब्दों में, संसाधनों पर नियंत्रण की भिन्नता के कारण स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”।
- स्रोत 12 (मनुस्मृति): पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात तरीके, और स्त्रियों के लिए संपत्ति अर्जन के छ: तरीके, जो सब भेंट या उपहार हैं।
मनुस्मृति: धन और संपत्ति कैसे अर्जित हो
वर्ण और संपत्ति के अधिकार (4.2)
- ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार संपत्ति के अधिकार का एक और आधार (लिंग के अलावा) वर्ण था। शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ सेवा थी, जिसमें हमेशा उनकी इच्छा शामिल नहीं होती थी; तीन उच्च वर्णों के पुरुषों के लिए कई जीविकाओं की संभावना थी।
- ये विधान सचमुच लागू होते तो ब्राह्मण और क्षत्रिय सबसे धनी होते, और यह बात कुछ हद तक सामाजिक वास्तविकता से मेल खाती थी। साहित्यिक परंपरा में राजा अधिकतर धनी और पुरोहित भी सामान्यत: धनी दिखाए जाते हैं, पर कभी-कभी निर्धन ब्राह्मण का चित्रण भी मिलता है।
- बौद्ध आलोचना: वर्ण व्यवस्था की सबसे जानी-मानी आलोचनाएँ प्रारंभिक बौद्ध धर्म (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) में विकसित हुईं। बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”। उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
- स्रोत 13 (एक धनाढ्य शूद्र, पालि ग्रंथ मज्झिमनिकाय): राजा अवन्तिपुत्र ने बुद्ध के अनुयायी कच्चन से ब्राह्मणों के इस दावे पर राय पूछी कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं। कच्चन के प्रश्नों पर अवन्तिपुत्र ने माना कि धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी, अपना सेवक बना सकता था। कच्चन ने पूछा, “यदि ऐसा है, तो क्या फिर यह चारों वर्ण एकदम समान नहीं हैं?” अवन्तिपुत्र ने स्वीकार किया कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं है। किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दिखाती है।
एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा: संपत्ति में भागीदारी (4.3)
- कुछ समाजों में दानशील आदमी का सम्मान होता था, और कंजूस या अपने लिए संपत्ति जमा करने वाला घृणा का पात्र। प्राचीन तमिलकम् ऐसा ही क्षेत्र था, जहाँ 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियाँ थीं। सरदार अपनी प्रशंसा गाने वाले चारणों और कवियों के आश्रयदाता थे।
- तमिल संगम साहित्य दिखाता है कि धनी और निर्धन में विषमता थी, पर संसाधनों पर नियंत्रण रखने वालों से अपेक्षा थी कि वे उन्हें मिल-बाँटकर इस्तेमाल करेंगे।
- स्रोत 14 (निर्धन दानी सरदार, पुरनानूरु, तमिल संगम साहित्य, लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी): एक चारण अपने आश्रयदाता के बारे में कहता है कि उसके पास रोज़ दूसरों पर खर्च करने को धन नहीं, फिर भी वह दान देने से मना नहीं करता। वह इरंतई में रहता है और “वह चारणों की क्षुधा का शत्रु है।” चारण कहता है कि यदि वे उससे प्रार्थना करें और भूख से क्षीण पसलियाँ दिखाएँ, तो वह अपने गाँव के लोहार से कहेगा: “मुझे युद्ध के लिए एक लंबा भाला तैयार कर दो, एक ऐसा भाला जिसका सीधा फलक हो!”
किताब में इस संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है।
- सरदार और अनुयायी: अमरावती (आंध्र प्रदेश) की लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी की एक पत्थर की मूर्ति में एक सरदार और उसका अनुयायी हैं।
7. सामाजिक विषमताओं की बौद्ध व्याख्या: एक सामाजिक अनुबंध★★
किताब का भाग 5, पृष्ठ 72 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4
- सुत्तपिटक का मिथक: शुरू में मनुष्य और वनस्पति जगत पूरी तरह विकसित नहीं थे। सभी जीव शांति से रहते थे और प्रकृति से उतना ही लेते थे जितना एक समय के भोजन के लिए चाहिए।
- पतन: यह व्यवस्था धीरे-धीरे बिगड़ी; मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए।
- चयन: तब लोगों ने सोचा: “क्या हम एक ऐसे मनुष्य का चयन करें जो उचित बात पर क्रोधित हो, जिसकी प्रताड़ना की जानी चाहिए उसको प्रताड़ित करे और जिसे निष्कासित किया जाना हो उसे निष्कासित करे?” बदले में उसे चावल का अंश मिलेगा, और “सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि प्राप्त होगी।”
- इसके अर्थ: राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर था; ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले देते थे। आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मनुष्य के अपने कर्म का बड़ा हाथ था। और यदि मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में वे उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।
सुत्तपिटक का मिथक: राजा कैसे बना
8. इतिहासकार महाभारत को कैसे पढ़ते हैं★★
किताब का भाग 6 (6.1–6.3), पृष्ठ 72–77 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 7, 9
ग्रंथ से पूछे जाने वाले प्रश्न (6)
- भाषा: पालि, प्राकृत या तमिल, जो आम लोग बोलते थे, या संस्कृत, जो खासकर पुरोहितों और खास वर्ग के प्रयोग की भाषा थी।
- प्रकार: ‘मंत्र’, जो अनुष्ठान करने वाले पढ़ते और बोलते थे, या ‘कथा’, जिसे लोग पढ़ और सुन सकते थे और दिलचस्प होने पर दोबारा सुना सकते थे।
- लेखक और श्रोता: लेखकों के दृष्टिकोण ने ग्रंथ को रूप दिया; लेखकों ने श्रोताओं की रुचि का भी ध्यान रखा होगा।
- काल और स्थान: ग्रंथ का संभावित संकलन या रचना काल और उसकी रचनाभूमि। इन सबको परखने के बाद ही इतिहासकार ग्रंथ की विषयवस्तु को इतिहास के लिए इस्तेमाल करते हैं।
भाषा एवं विषयवस्तु (6.1)
- महाभारत का जो पाठ किताब इस्तेमाल करती है वह संस्कृत में है, पर उसकी संस्कृत वेदों या प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है; इसलिए संभव है कि इसे व्यापक स्तर पर समझा जाता था।
- विषयवस्तु के दो भाग: आख्यान (कहानियों का संग्रह) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड)। यह बँटवारा पूरी तरह अलग-अलग खानों वाला नहीं है: उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ होती हैं और बहुधा आख्यानों में समाज के लिए एक सबक होता है।
- “अधिकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि महाभारत वस्तुत: एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।”
- भगवद्गीता: महाभारत का सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है, जहाँ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं।
- ‘इतिहास’: आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था।’ क्या सचमुच कोई युद्ध हुआ था, यह निश्चित नहीं: कुछ इतिहासकार मानते हैं कि स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति ही मुख्य कथानक है; दूसरे कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती।
लेखक (एक या कई) और तिथियाँ (6.2)
- सूत: संभवत: मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे, जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था। वे क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते और उनकी विजय और उपलब्धियों पर कविताएँ लिखते थे। ये रचनाएँ मौखिक रूप में आगे बढ़ीं।
- ब्राह्मण: पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा। पाँचवीं शताब्दी ई.पू. में कुरु और पांचाल, जिनके इर्द-गिर्द कथा घूमती है, सरदारी से राजतंत्र बन रहे थे। संभव है कि नए राज्यों की उथल-पुथल में पुराने सामाजिक मूल्यों की जगह नए मानदंड आए, जिनका वर्णन कहानी के कुछ भागों में मिलता है।
- लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी: विष्णु की आराधना प्रभावी हो रही थी, और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था।
- लगभग 200-400 ईसवी: मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए।
- नतीजा: जो ग्रंथ शुरू में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, वह बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को इसका रचयिता मानती है; परंपरा के अनुसार व्यास ने श्रीगणेश को ग्रंथ लिखवाया; महाभारत के फारसी अनुवाद के एक चित्र (लगभग 1740-50) में यही दृश्य है।
महाभारत कैसे बढ़ा
सदृशता की खोज: हस्तिनापुर (6.3)
- 1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नाम के गाँव में उत्खनन किया। नामों की समानता संयोग हो सकती है, पर गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था, इस पुरास्थल का होना बताता है कि यह कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर हो सकती थी।
- लाल को आबादी के पाँच स्तर मिले। दूसरा स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.): उत्खनन वाले सीमित क्षेत्र में घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, पर मिट्टी की दीवारें और कच्ची मिट्टी की ईंटें मिलीं; सरकंडे की छाप वाला पलस्तर बताता है कि कुछ घरों की दीवारें सरकंडों की थीं, जिन पर मिट्टी चढ़ाई जाती थी। तीसरा स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.): घर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के थे; गंदे पानी के निकास के लिए शोषक-घट और ईंटों के नाले थे, और वलय-कूप कुओं और मल निकासी के गर्तों, दोनों रूपों में काम आते थे।
- स्रोत 15 (आदिपर्वन्): महाकाव्य में हस्तिनापुर समुद्र की भाँति भरा हुआ, सैकड़ों प्रासादों वाला और इंद्र की नगरी के समान नगर है। किताब पूछती है: क्या यह चित्रण बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात) जोड़ा गया, जब इस क्षेत्र में नगर बने, या यह कवियों की कल्पना थी?
द्रौपदी का विवाह: बहुपति प्रथा
- द्रौपदी से पांडवों का विवाह बहुपति विवाह का उदाहरण है, और लेखक(कों) ने इसके कई स्पष्टीकरण दिए।
- स्रोत 16, तीन स्पष्टीकरण: (1) पांचाल नरेश द्रुपद के स्वयंवर में अर्जुन जीते; कुंती ने बिना देखे कहा कि लाई गई वस्तु आपस में बाँट लो, उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी, इसलिए युधिष्ठिर ने निर्णय लिया कि द्रौपदी पाँचों की पत्नी होगी; (2) ऋषि व्यास ने द्रुपद को बताया कि पांडव इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था; (3) व्यास ने यह भी बताया कि एक युवा स्त्री ने शिव की आराधना में एक के बजाय पाँच बार पति का वर माँग लिया था, और उसी स्त्री ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया। इन कहानियों से संतुष्ट होकर द्रुपद ने विवाह की सहमति दी।
- इतिहासकारों की व्याख्या: संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी; पर अलग-अलग स्पष्टीकरण बताते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा लोगों में अमान्य होती गई। कुछ इतिहासकार ध्यान दिलाते हैं कि ब्राह्मणों की दृष्टि में यह अमान्य और अवांछित थी, फिर भी हिमालय क्षेत्र में यह प्रचलित थी (और आज भी है)। यह भी कहा जाता है कि युद्ध के समय स्त्रियों की कमी के कारण, यानी संकट की स्थिति में, इसे अपनाया गया।
- कुछ आरंभिक स्रोत बताते हैं कि बहुपति प्रथा न एकमात्र विवाह पद्धति थी, न सबसे अधिक प्रचलित। किताब याद दिलाती है: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”
9. एक गतिशील ग्रंथ★
किताब का भाग 7, पृष्ठ 77–78 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 11
- महाभारत का विकास संस्कृत पाठ के साथ खत्म नहीं हुआ। सदियों में इसके अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए, किसी क्षेत्र में जन्मी कहानियाँ इसमें जुड़ती गईं, और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं।
- इसके प्रसंग मूर्तिकला और चित्रों में दिखाए गए, और इसने नाटकों और नृत्य कलाओं को विषय-वस्तु दी।
- महाश्वेता देवी, “कुंती ओ निषादी”: समसामयिक बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी, जो शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रसिद्ध हैं, ने उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ मूक है। संस्कृत पाठ में दुर्योधन पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मारना चाहता है; पांडव सुरंग खोदकर निकल जाते हैं। कुंती के भोज में आई एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ वहीं सो जाती है और पांडवों की लगाई आग में भस्म हो जाती है; उनके शव देखकर लोग समझते हैं कि पांडव मर गए।
- “कुंती ओ निषादी” की कथा: महाश्वेता देवी की कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ यह प्रसंग खत्म होता है। महाभारत के युद्ध के बाद कुंती एक वनप्रांतर में रहती हैं और पृथ्वी से बातें करते हुए अपनी त्रुटियाँ स्वीकार करती हैं। एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, उनसे कहती है कि अपने अतीत पर सोचते समय उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई। आग की लपटें पास आती हैं; निषादी बच निकलती है, कुंती वहीं रह जाती है।
10. आँकड़े और साल एक जगह★
काल रेखा 1: प्रमुख साहित्यिक परंपराएँ
| साल | क्या हुआ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 500 ई.पू. | पाणिनि की अष्टाध्यायी, संस्कृत व्याकरण | 79 |
| लगभग 500-200 ई.पू. | प्रमुख धर्मसूत्र (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 500-100 ई.पू. | आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित (पालि में) | 79 |
| लगभग 500 ई.पू.-400 ईसवी | रामायण और महाभारत (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवी | मनुस्मृति (संस्कृत में); तमिल संगम साहित्य की रचना और संकलन | 79 |
| लगभग 100 ईसवी | चरक और सुश्रुत संहिता, आयुर्वेद के ग्रंथ (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 200 ईसवी से | पुराणों का संकलन (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 300 ईसवी | भरतमुनि का नाट्यशास्त्र (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 300-600 ईसवी | अन्य धर्मशास्त्र (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 400-500 ईसवी | कालिदास के साहित्य सहित संस्कृत नाटक; खगोल और गणित पर आर्यभट्ट और वराहमिहिर के ग्रंथ (संस्कृत में); जैन ग्रंथों का संग्रहण (प्राकृत में) | 79 |
काल रेखा 2: महाभारत के अध्ययन में प्रमुख कीर्तिमान (बीसवीं शताब्दी)
| साल | क्या हुआ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1919-66 | महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन | 79 |
| 1973 | जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया; 1979 में उनकी मृत्यु के बाद यह परियोजना अधूरी रह गई | 79 |
किताब की कालरेखा में उनकी मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है।
अध्याय के दूसरे आँकड़े
| आँकड़ा या समय | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी | अध्याय में देखा गया काल | 53 |
| एक लाख श्लोकों से अधिक | महाभारत अपने वर्तमान रूप में | 53 |
| लगभग 500 ई.पू. से, एक हज़ार वर्ष तक | महाभारत की रचना होती रही | 53 |
| 1919 | वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में समालोचनात्मक संस्करण का काम शुरू | 54 |
| 13,000 पृष्ठ; सैंतालीस वर्ष | समालोचनात्मक संस्करण का आकार और उसमें लगा समय | 54 |
| आधे से अधिक पृष्ठ | 13,000 में से इतने पृष्ठ क्षेत्रीय प्रभेदों का ब्योरा देते हैं | 54 |
| लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से | अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे | 55 |
| संभवत: लगभग 1000 ई.पू. | ऋग्वेद में विवाह का मंत्र (स्रोत 1) जोड़ा गया | 56 |
| लगभग 500 ई.पू. से | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में मानदंडों का संकलन | 58 |
| लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी | मनुस्मृति का संकलन | 58 |
| आठ, जिनमें पहले चार ‘उत्तम’ | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में विवाह के प्रकार | 58 |
| लगभग 1000 ई.पू. के बाद | गोत्रों में बाँटने की ब्राह्मणीय पद्धति | 58 |
| लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक | पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों पर सातवाहनों का शासन | 58 |
| 7 नाम | स्रोत 4 में सातवाहन राजाओं की सूची | 59 |
| लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी | अहिच्छत्र (उत्तर प्रदेश) के मंदिर की मिट्टी की मूर्ति, महाभारत के दृश्यों के सबसे प्राचीन मूर्ति चित्रणों में से एक | 60 |
| लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी | शक राजा रुद्रदामन, सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार | 63 |
| लगभग चौथी शताब्दी ईसवी | शक शासक का चाँदी का सिक्का | 63 |
| लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी | मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, रेशम के बुनकरों की श्रेणी | 63 |
| लगभग चौथी शताब्दी ईसवी | शूद्रक का नाटक मृच्छकटिकम् | 64 |
| पाँचवीं शताब्दी ईसवी | दो क्षत्रिय–वणिक भाइयों का अभिलेख | 64 |
| लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी | फा-शिएन | 66 |
| लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी | श्वैन-त्सांग | 66 |
| लगभग तीसरी शताब्दी ईसवी | गांधार की पत्थर की मूर्ति में एक भिक्षु | 66 |
| 16,000 | माण्डव्यकुमार रोज़ इतने ब्राह्मणों को भोजन कराता था (स्रोत 10) | 67 |
| सात और छ: | मनुस्मृति में पुरुषों और स्त्रियों के धन अर्जित करने के तरीके | 69 |
| लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से | प्रारंभिक बौद्ध धर्म | 69 |
| 2000 वर्ष पहले | तमिलकम् में अनेक सरदारियाँ | 70 |
| लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी | पुरनानूरु, तमिल संगम साहित्य | 71 |
| लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी | अमरावती (आंध्र प्रदेश) की मूर्ति: एक सरदार और उसका अनुयायी | 71 |
| अठारहवीं शताब्दी | श्रीकृष्ण को अर्जुन को उपदेश देते दिखाने वाला एक चित्र | 73 |
| पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से | ब्राह्मणों ने महाभारत की कथा परंपरा को लिखा | 74 |
| लगभग 1740-50 | महाभारत के फारसी अनुवाद का एक चित्र, जिसमें श्रीगणेश लिपिक के रूप में हैं | 74 |
| लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी | महाभारत की रचना का एक और चरण (विष्णु, श्रीकृष्ण) | 75 |
| लगभग 200-400 ईसवी | मनुस्मृति से मिलते-जुलते उपदेशात्मक प्रकरण जुड़े | 75 |
| 10,000 से कम से एक लाख | महाभारत के श्लोक, शुरू में और बाद में | 75 |
| 1951-52 | बी.बी. लाल का हस्तिनापुर (मेरठ ज़िला, उ.प्र.) में उत्खनन | 75 |
| पाँच स्तर | हस्तिनापुर में आबादी के स्तर | 75 |
| लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू. | हस्तिनापुर का दूसरा स्तर | 75 |
| लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू. | हस्तिनापुर का तीसरा स्तर | 75 |
| पाँच पुत्र; छ: निर्दोष लोग | लाक्षागृह में जली निषादी और उसके पुत्र | 78 |
11. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| महाभारत एक ही लेखक ने एक ही समय में लिखा | यह कई चरणों में बना: सूत, फिर पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मण, फिर लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवी और 200-400 ईसवी के जोड़; परंपरा व्यास को रचयिता मानती है | 74–75 |
| समालोचनात्मक संस्करण में क्षेत्रीय पाठ हटा दिए गए | प्रभेद पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए; 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठ उन्हीं के ब्योरे हैं | 54 |
| पितृवंशिकता महाभारत से शुरू हुई | पितृवंशिकता महाकाव्य से पहले भी थी; महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इसे और सुदृढ़ किया | 55 |
| ब्राह्मणीय नियम हर जगह माने जाते थे | ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”; सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र रखा | 58, 60 |
| सातवाहन राजाओं के मातृनाम का मतलब मातृवंशिक उत्तराधिकार | सातवाहनों में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था | 60 |
| राजा हमेशा क्षत्रिय होते थे | शुंग और कण्व ब्राह्मण थे, मौर्यों के उद्भव पर बहस है, ब्राह्मण शकों को मलेच्छ मानते थे, और सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताया | 62–63 |
| वर्णों की तरह जातियाँ भी चार थीं | वर्ण चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी | 63 |
| स्त्रीधन पर पति का अधिकार था | स्त्रीधन पर पति का कोई अधिकार नहीं था; संतान उसे विरासत में पा सकती थी | 68 |
| बौद्ध मानते थे कि समाज में कोई विषमता नहीं | बौद्धों ने विषमता मानी, पर उसे न नैसर्गिक माना न स्थायी; जन्म पर आधारित प्रतिष्ठा अस्वीकार की | 69 |
| महासम्मत्त को किसी देवता ने चुना | बौद्ध मिथक में उसे सब लोगों ने चुना, और ‘कर’ उसकी सेवा का मूल्य था | 72 |
| महाभारत की संस्कृत वेदों जितनी कठिन है | यह वेदों और प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है | 73 |
| हस्तिनापुर गाँव निश्चित रूप से महाभारत वाला हस्तिनापुर है | यह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी; नामों की समानता संयोग भी हो सकती है | 75 |
| आरंभिक भारत में बहुपति प्रथा सबसे प्रचलित विवाह पद्धति थी | यह न एकमात्र पद्धति थी, न सबसे अधिक प्रचलित | 77 |
12. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)
प्रश्न 1. स्पष्ट कीजिए कि विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी?
उत्तर देखिए
उत्तर: शासक और धनी परिवारों में पितृवंशिकता से ही तय होता था कि संसाधन और सत्ता आगे किसके हाथ जाएँगे, इसलिए उनके लिए यह बहुत अहम रही होगी।
विरासत: पितृवंशिकता में पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।
राजवंशों का चलन: अधिकतर राजवंश (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) इसी प्रणाली पर चलते थे, और संभव है कि धनी वर्ग के पुरुष भी ऐसा ही दृष्टिकोण रखते थे।
पुत्र की कामना: ऋग्वेद के विवाह मंत्र (स्रोत 1) में कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”।
गद्दी का झगड़ा: महाभारत के आदिपर्वन् (स्रोत 2) में दुर्योधन को डर है कि पांडवों को विरासत मिली तो “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”।
बेटियों पर नियंत्रण: पितृवंश आगे बढ़ाने के लिए पुत्र अहम थे; ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कन्याओं का विवाह गोत्र से बाहर, ‘उचित’ समय और ‘उचित’ व्यक्ति से कराया जाता था, और कन्यादान पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।
नियम में लचीलापन भी था: पुत्र न होने पर कभी भाई और कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली। (पृष्ठ 55–57)
प्रश्न 2. क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: नहीं। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले।
मौर्य: इनके उद्भव पर बहस होती रही है। बाद के बौद्ध ग्रंथ इन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र इन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं।
शुंग और कण्व: मौर्यों के बाद आए ये दोनों वंश ब्राह्मण थे।
शक: मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ, बर्बर अथवा अन्यदेशीय मानते थे। फिर भी संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में प्रसिद्ध शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन है, जिससे पता चलता है कि शक्तिशाली मलेच्छ संस्कृत की परिपाटी से अवगत थे।
सातवाहन: सबसे प्रसिद्ध सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया; उसने चार वर्णों के बीच विवाह रोकने का दावा किया, पर स्वयं रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध जोड़ा।
किताब का निष्कर्ष: राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके; “राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था।” (पृष्ठ 62–63)
प्रश्न 3. द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना कीजिए व उनके अंतर को भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: तीनों कथाएँ वर्ण और जन्म के मानदंडों से जुड़ी हैं, पर तीनों में उनका निभाव अलग है।
द्रोण और एकलव्य (स्रोत 7, आदिपर्वन्): कुरु राजकुमारों को धनुर्विद्या सिखाने वाले, धर्म समझने वाले ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना कर दिया। एकलव्य ने अभ्यास से महारत पाई, तो अर्जुन के याद दिलाने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उसका दाहिना अँगूठा माँग लिया। यहाँ मानदंड पूरी सख्ती से लागू हुआ: निषाद का कौशल अर्जुन से आगे न जाए। यह भी देखिए कि धर्मसूत्रों में ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ और दान बताया गया है, जबकि युद्ध क्षत्रियों का कार्य था; फिर भी द्रोण धनुर्विद्या सिखा रहे थे।
हिडिम्बा (स्रोत 9, आदिपर्वन्): एक राक्षस स्त्री ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा और अपने बांधवों और धर्म का परित्याग किया। युधिष्ठिर ने शर्त के साथ विवाह मान लिया, पुत्र घटोत्कच हुआ, और माँ-बेटा पांडवों को छोड़कर वन में चले गए। यहाँ मानदंड से बाहर का रिश्ता शर्तों के साथ स्वीकार हुआ। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग थे।
मातंग (स्रोत 10, पालि की मातंग जातक): चाण्डाल के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग ने अपने ही पुत्र माण्डव्य से, जो रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था, भोजन माँगा और ठुकराए गए। मातंग ने कहा कि “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।” यहाँ जन्म पर टिके मानदंड को ही चुनौती दी गई है।
अंतर: द्रोण की कथा मानदंड को लागू करती है, हिडिम्बा की कथा उसमें समझौता दिखाती है, और मातंग की कथा उसे नकारती है। पहली दो संस्कृत महाभारत से हैं, तीसरी बौद्ध परंपरा के पालि ग्रंथ से और चाण्डाल के नज़रिए से कही गई है। (पृष्ठ 61–62, 65, 67)
प्रश्न 4. किन मायनों में सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा समाज के उस ब्राह्मणीय दृष्टिकोण से भिन्न थी जो ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित था।
उत्तर देखिए
उत्तर: इस अध्याय में ब्राह्मणीय दृष्टिकोण ब्राह्मणों के इस दावे में दिखता है कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (स्रोत 13), और धर्मसूत्रों-धर्मशास्त्रों के वर्ण नियमों में। बौद्ध सुत्तपिटक का मिथक समाज को बिल्कुल अलग ढंग से समझाता है।
पुरुषसूक्त: ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) के इस सूक्त में चारों वर्ण एक ही आदि-पुरुष के अंगों से जोड़े गए हैं: ब्राह्मण उसका मुख था, राजन्य (क्षत्रिय) उसकी भुजाएँ बनाए गए, वैश्य उसकी जंघाएँ थे और पैरों से शूद्र जन्मा (मूल पाठ, मंत्र 12)। इस तरह वर्णों का ऊँचा-नीचा क्रम सृष्टि की कथा का हिस्सा बन जाता है।
समाज की उत्पत्ति: ब्राह्मणों के दावे (स्रोत 13) में उनका ऊँचा स्थान ब्रह्मा से उत्पत्ति पर टिका है; बौद्ध मिथक में व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी, जब मनुष्य लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए और उन्होंने स्वयं एक व्यक्ति को चुना।
राजा: शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे; बौद्ध मिथक में राजा महासम्मत्त है, यानी सब लोगों द्वारा चुना गया, और ‘कर’ उसकी सेवा के बदले दिया जाने वाला मूल्य है।
विषमता: बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता है, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
बदलाव: यह मिथक बताता है कि आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था; और यदि मनुष्य स्वयं व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में उसे बदल भी सकते थे।
(पृष्ठ 62, 69, 70, 72)
प्रश्न 5. निम्नलिखित अवतरण महाभारत से है जिसमें ज्येष्ठ पांडव युधिष्ठिर दूत संजय को संबोधित कर रहे हैं :
संजय धृतराष्ट्र गृह के सभी ब्राह्मणों और मुख्य पुरोहित को मेरा विनीत अभिवादन दीजिएगा। मैं गुरु द्रोण के सामने नतमस्तक होता हूँ… मैं कृपाचार्य के चरण स्पर्श करता हूँ… (और) कुरु वंश के प्रधान भीष्म के। मैं वृद्ध राजा (धृतराष्ट्र) को नमन करता हूँ। मैं उनके पुत्र दुर्योधन और उनके अनुजों के स्वास्थ्य के बारे में पूछता हूँ तथा उनको शुभकामनाएँ देता हूँ… मैं उन सब युवा कुरु योद्धाओं का अभिनंदन करता हूँ जो हमारे भाई, पुत्र और पौत्र हैं… सर्वोपरि मैं उन महामति विदुर को (जिनका जन्म दासी से हुआ है) नमस्कार करता हूँ जो हमारे पिता और माता के सदृश हैं… मैं उन सभी वृद्धा स्त्रियों को प्रणाम करता हूँ जो हमारी माताओं के रूप में जानी जाती हैं। जो हमारी पत्नियाँ हैं उनसे यह कहिएगा कि, “मैं आशा करता हूँ कि वे सुरक्षित हैं”… मेरी ओर से उन कुलवधुओं का जो उत्तम परिवारों में जन्मी हैं और बच्चों की माताएँ हैं, अभिनंदन कीजिएगा तथा हमारी पुत्रियों का आलिंगन कीजिएगा… सुंदर, सुगंधित, सुवेशित गणिकाओं को शुभकामनाएँ दीजिएगा। दासियों और उनकी संतानों तथा वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को भी मेरी ओर से नमस्कार कीजिएगा…
इस सूची को बनाने के आधारों की पहचान कीजिए – उम्र, लिंग, भेद व बंधुत्व के संदर्भ में। क्या कोई अन्य आधार भी हैं? प्रत्येक श्रेणी के लिए स्पष्ट कीजिए कि सूची में उन्हें एक विशेष स्थान पर क्यों रखा गया है?
उत्तर देखिए
उत्तर: अवतरण में अभिवादन का क्रम ही बता देता है कि किसे कितना ऊँचा माना गया। ऐसा लगता है कि सूची इन आधारों पर बनी है:
भेद (वर्ण और हैसियत): सबसे पहले धृतराष्ट्र के घर के ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित आते हैं, और लगभग अंत में दासियाँ और उनकी संतानें। यानी ब्राह्मण सबसे ऊपर और दास-दासियाँ सबसे नीचे।
गुरु: ब्राह्मणों के ठीक बाद गुरु द्रोण और कृपाचार्य; युधिष्ठिर उनके सामने नतमस्तक होते हैं और चरण स्पर्श करते हैं, क्योंकि गुरु का स्थान बहुत ऊँचा है।
उम्र: कुरु वंश के प्रधान भीष्म और वृद्ध राजा धृतराष्ट्र, दुर्योधन और युवा कुरु योद्धाओं से पहले आते हैं; स्त्रियों में भी वृद्धा स्त्रियाँ, जिन्हें माता के रूप में जाना जाता है, पत्नियों और बेटियों से पहले।
लिंग: पहले सारे पुरुष आते हैं, फिर स्त्रियाँ; पुरुषों को नमन और अभिनंदन मिलता है, जबकि पत्नियों के लिए बस कुशल-क्षेम का संदेश है।
बंधुत्व: दुर्योधन और उसके अनुज, फिर “भाई, पुत्र और पौत्र” जैसे युवा कुरु योद्धा, फिर माताएँ, पत्नियाँ, कुलवधुएँ और पुत्रियाँ: पूरा परिवार रिश्ते के हिसाब से गिना गया है।
अन्य आधार: (1) गुण और आदर: दासी से जन्मे विदुर को “सर्वोपरि” नमस्कार मिलता है, क्योंकि वे “हमारे पिता और माता के सदृश” हैं; यहाँ जन्म से ज़्यादा बुद्धि और स्नेह का मान है। (2) व्यवसाय: गणिकाओं का अलग से उल्लेख है। (3) करुणा: अंत में वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को भी नमस्कार भेजा गया है।
इस तरह यह सूची वर्ण, उम्र, लिंग और रिश्ते, चारों के मेल से बनी ऊँच-नीच दिखाती है। (पृष्ठ 80)
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)
प्रश्न 6. भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध इतिहासकार मौरिस विंटरविट्ज़ ने महाभारत के बारे में लिखा था कि: “चूँकि महाभारत संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है… बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीज़ें इसमें निहित हैं… (वह) भारतीयों की आत्मा की अगाध गहराई को एक अंतर्दृष्टि प्रदान करता है।” चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह अध्याय विंटरविट्ज़ की बात को कई तरह से सही ठहराता है, क्योंकि महाभारत कई सदियों, कई लेखकों और पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ है। साथ ही अध्याय यह भी सिखाता है कि इसे सावधानी से पढ़ा जाए।
1. अनेक प्रकार की सामग्री
इतिहासकार इसकी विषयवस्तु को आख्यान (कहानियाँ) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड) में रखते हैं; इसका सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है।
इसमें युद्धों, वनों, राजमहलों और बस्तियों का अत्यंत जीवंत चित्रण है, और इसके कुछ भाग अलग-अलग सामाजिक समुदायों के आचार-व्यवहार के मानदंड तय करते हैं।
2. कई सदियाँ, कई हाथ
- इसकी रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक होती रही। मूल कथा संभवत: सूतों की थी, पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखा, और बाद के चरणों में यह 10,000 से कम श्लोकों से बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला ग्रंथ बना।
3. पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ
- समालोचनात्मक संस्करण के लिए उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की पांडुलिपियाँ मिलाई गईं, और सबमें समानता मिली। साथ ही अनेक क्षेत्रीय प्रभेद भी मिले, जिनका ब्योरा 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठों में है।
4. समाज के अनेक स्वर
- इसमें राजाओं और योद्धाओं के साथ निषाद एकलव्य, राक्षस हिडिम्बा, युद्ध रोकने की सलाह देती गांधारी और प्रश्न पूछती द्रौपदी भी हैं। कभी-कभी प्रकरणों में परस्पर विरोधी विचार भी मिलते हैं, जैसे द्रौपदी के प्रश्न पर दो मत, या द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण।
5. एक जीवित परंपरा
- इसके अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए, क्षेत्रीय कहानियाँ इसमें जुड़ीं, और इसके प्रसंग मूर्तियों (अहिच्छत्र की मिट्टी की मूर्ति, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी), चित्रों (फारसी अनुवाद, लगभग 1740-50), नाटकों और नृत्य में आए। बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी ने “कुंती ओ निषादी” में इसकी कथा को नए प्रश्नों के साथ फिर से लिखा।
6. सावधानी भी ज़रूरी
- किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण अक्षरश: सत्य न भी हों, तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे; और “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।” महाश्वेता देवी ने उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा जिन पर संस्कृत पाठ पूर्णतया मूक है, जैसे लाक्षागृह में भस्म हुए उन छ: निर्दोष लोगों की याद, यानी एक निषादी और उसके पाँच पुत्र।
निष्कर्ष: महाभारत में सचमुच “बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीज़ें” हैं और यह सदियों के अनेक समुदायों के विचार सामने रखता है। पर इसे एक समाज का सीधा चित्र मानने के बजाय इतिहासकार इसकी भाषा, लेखक, श्रोता और काल को परखकर पढ़ते हैं। (पृष्ठ 53–54, 60, 68, 73–78)
प्रश्न 7. क्या यह संभव है कि महाभारत का एक ही रचयिता था? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को इसका रचयिता मानती है, और परंपरा के अनुसार व्यास ने महाभारत श्रीगणेश को लिखवाया। पर अध्याय के साक्ष्य बताते हैं कि यह एक व्यक्ति की रचना नहीं हो सकती।
1. रचना के चरण
सूत: संभवत: मूल कथा भाट सारथियों, यानी ‘सूतों’, ने रची, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे; ये रचनाएँ मौखिक रूप में आगे बढ़ीं।
ब्राह्मण: पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा।
लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी: विष्णु की आराधना बढ़ी और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया गया।
लगभग 200-400 ईसवी: मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए।
2. आकार और समय
ग्रंथ संभवत: 10,000 से कम श्लोकों से बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हुआ, और इसकी रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक चली। इतने लंबे समय तक एक लेखक का होना संभव नहीं।
अधिकतर इतिहासकार मानते हैं कि महाभारत पहले एक नाटकीय कथानक था, जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।
3. भीतर के संकेत
किताब पूछती है कि क्या हस्तिनापुर नगर का भव्य चित्रण (स्रोत 15) मुख्य कथानक में बाद में, ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात, जोड़ा गया, जब इस क्षेत्र में नगरों का विकास हुआ।
द्रौपदी के विवाह के लिए एक ही प्रकरण के तीन स्पष्टीकरण मिलते हैं (स्रोत 16), और इतिहासकारों के अनुसार ये बताते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा लोगों के बीच अमान्य होती चली गई। किताब स्वयं “लेखक(कों)” और “रचनाकार(रों)” लिखती है।
समालोचनात्मक संस्करण में अनेक क्षेत्रीय प्रभेद मिले, और बाद में भिन्न-भिन्न भाषाओं में इसके पाठान्तर लिखे गए।
निष्कर्ष: परंपरा व्यास का नाम लेती है, पर इतिहास के साक्ष्य बताते हैं कि महाभारत सदियों तक अनेक सूतों, ब्राह्मणों और लेखकों के हाथों बढ़ा। इसलिए इसका एक ही रचयिता होना संभव नहीं लगता। (पृष्ठ 53–54, 73–77)
प्रश्न 8. आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष के संबंधों की विषमताएँ कितनी महत्वपूर्ण रही होंगी? कारण सहित उत्तर दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: ये विषमताएँ बहुत गहरी थीं, क्योंकि वंश, विवाह और संपत्ति, तीनों के नियम पुरुषों के पक्ष में बने थे। फिर भी कुछ स्त्रियों के उदाहरण बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं थी।
1. वंश और विवाह
पितृवंशिकता में पुत्र ही पिता के संसाधनों और सिंहासन के अधिकारी थे; ऋग्वेद के विवाह मंत्र में भी “उत्तम पुत्र” की कामना है।
बेटियों का विवाह गोत्र से बाहर कराया जाता था, कन्यादान पिता का धार्मिक कर्तव्य था, और गोत्र के नियम से विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी।
2. संपत्ति
मनुस्मृति पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात तरीके बताती है, पर स्त्रियों के छ: तरीके सब भेंट या उपहार हैं।
स्त्रीधन पर पति का अधिकार नहीं था, फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति या अपने बहुमूल्य धन के गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी देती है।
सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का नियंत्रण था, और इससे दोनों की सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”।
3. पत्नी, संपत्ति के रूप में?
- युधिष्ठिर ने द्यूत में द्रौपदी को दाँव पर लगाया। एक मत यह था कि “पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है”।
4. दूसरा पहलू
माना जाता है कि द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया, और गांधारी ने दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह दी।
वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनी थीं और कुछ परिस्थितियों में सत्ता संभालती थीं; उच्च वर्ग की स्त्रियाँ संसाधनों पर पैठ रखती थीं।
सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र रखा, और सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे; फिर भी उनके यहाँ सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था।
निष्कर्ष: स्त्री-पुरुष की विषमता उस समाज की बुनियाद में थी: इससे तय होता था कि वंश किससे चलेगा, संपत्ति किसके पास रहेगी और निर्णय कौन लेगा। कुछ स्त्रियों ने इसके भीतर अपनी जगह बनाई, पर नियम पुरुषों के पक्ष में ही रहे। (पृष्ठ 55–60, 68–69)
प्रश्न 9. उन साक्ष्यों की चर्चा कीजिए जो यह दर्शाते हैं कि बंधुत्व और विवाह संबंधी ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था।
उत्तर देखिए
उत्तर: ब्राह्मण लेखक मानते थे कि उनके नियम सब पर लागू हों, पर क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”। ये साक्ष्य यही दिखाते हैं:
1. धर्मशास्त्रों की अपनी स्वीकृति
- धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकार मानते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ थे और बाकी निंदित। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियम नहीं मानते थे।
2. सातवाहन रानियाँ
रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्र से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; उन्होंने पति का गोत्र नहीं अपनाया।
कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था। यह अंतर्विवाह का उदाहरण है, जो दक्षिण भारत के कई समुदायों में प्रचलित है।
गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने वर्णों के बीच विवाह रोकने का दावा किया, फिर भी शक रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध जोड़ा।
3. बहुपति प्रथा
- द्रौपदी का पाँच पांडवों से विवाह बहुपति विवाह है। वर्तमान इतिहासकारों का सुझाव है कि संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी। कुछ इतिहासकार ध्यान दिलाते हैं कि ब्राह्मणों की दृष्टि में अमान्य होते हुए भी यह हिमालय क्षेत्र में प्रचलन में थी (और आज भी है)।
4. वर्ण और समुदाय से बाहर के विवाह
भीम का राक्षस स्त्री हिडिम्बा से विवाह, जिसका प्रस्ताव हिडिम्बा ने स्वयं रखा।
मातंग जातक में चाण्डाल मातंग का व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक से विवाह।
5. उत्तराधिकार में फेरबदल
- पुत्र न होने पर कभी भाई, कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली।
निष्कर्ष: ब्राह्मणीय नियम एक आदर्श थे; असल व्यवहार क्षेत्र, समुदाय और परिस्थिति के हिसाब से बदलता था। (पृष्ठ 56, 58, 60, 63, 65, 67, 76–77)
मानचित्र कार्य
प्रश्न 10. इस अध्याय के मानचित्र की अध्याय 2 के मानचित्र 1 से तुलना कीजिए। कुरु–पांचाल क्षेत्र के पास स्थित महाजनपदों और नगरों की सूची बनाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: इस अध्याय का मानचित्र 1, “कुरु पांचाल क्षेत्र और निकटवर्ती स्थान” (पृष्ठ 56), और अध्याय 2 का मानचित्र 1 (महाजनपद) सामने रखिए। दोनों पर छपे नाम ये हैं:
दोनों मानचित्रों पर (क्षेत्र): कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति, वत्स, मल्ल, और कोसल (अध्याय 2 के मानचित्र पर “कोशल”)।
दोनों मानचित्रों पर (नगर): इंद्रप्रस्थ (अध्याय 2 में “इन्द्रप्रस्थ”), मथुरा, उज्जयिनी, श्रावस्ती, कुशीनगर, वैशाली, कौशाम्बी, वाराणसी।
केवल इस अध्याय के मानचित्र पर: क्षेत्र शाक्य; नगर हस्तिनापुर, विराट, अयोध्या, कपिलवस्तु, लुंबिनी, पावा, पाटलिपुत्र, सारनाथ, बोधगया।
केवल अध्याय 2 के मानचित्र पर: महाजनपद कंबोज, गांधार, पांचाल, काशी, वज्जि (वृजि), मगध, अंग, वंग, चेदि, अश्मक; नगर पुष्कलावती, तक्षशिला, अहिच्छत्र, चंपा, राजगीर।
इस अध्याय के मानचित्र पर पांचाल का अलग नाम नहीं, केवल शीर्षक में है; पांचाल की जगह अध्याय 2 के मानचित्र पर देखिए। फिर दोनों मानचित्रों पर कुरु और पांचाल के ठीक आसपास जो महाजनपद और नगर दिखें, उनकी सूची बनाइए, और हर नाम के आगे लिखिए कि वह किस मानचित्र पर मिला। (इस अध्याय का पृष्ठ 56; अध्याय 2 का मानचित्र 1)
परियोजना कार्य (कोई एक)
प्रश्न 11. अन्य भाषाओं में महाभारत की पुनर्व्याख्या के बारे में जानिए। इस अध्याय में वर्णित महाभारत के किन्हीं दो प्रसंगों का इन भिन्न भाषा वाले ग्रंथों में किस तरह निरूपण हुआ है उनकी चर्चा कीजिए। जो भी समानता और विभिन्नता आप इन वृत्तांत में देखते हैं उन्हें स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
प्रसंग चुनिए: अध्याय के दो प्रसंग लीजिए, जैसे एकलव्य (स्रोत 7), हिडिम्बा (स्रोत 9), द्यूत और द्रौपदी के प्रश्न (स्रोत 11), द्रौपदी का विवाह (स्रोत 16) या लाक्षागृह।
दूसरी भाषा का पाठ खोजिए: अपनी भाषा या किसी और भारतीय भाषा में इन प्रसंगों का कोई पाठ, लोककथा, नाटक या कहानी ढूँढ़िए। किताब का उदाहरण है महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी”।
तुलना कीजिए: कथा कौन कह रहा है, किसका नज़रिया सामने है, क्या जोड़ा गया या छोड़ा गया, और अंत कैसा है।
प्रस्तुत कीजिए: एक तालिका (प्रसंग, संस्कृत पाठ में, दूसरी भाषा के पाठ में, समानता, अंतर) और नीचे 200 से 300 शब्दों का सार; हर पाठ का नाम, भाषा और लेखक साफ़ लिखिए।
(पृष्ठ 62, 65, 68, 76–78)
प्रश्न 12. कल्पना कीजिए कि आप एक लेखक हैं और एकलव्य की कथा को अपने दृष्टिकोण से लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपकी अपनी रचना होगी। तरीका:
मूल कथा दोबारा पढ़िए: स्रोत 7 (आदिपर्वन्): द्रोण का मना करना, मिट्टी की प्रतिमा, सात तीर, अर्जुन की याद दिलाना, गुरु दक्षिणा में अँगूठा।
कथा कहने वाला चुनिए: एकलव्य, द्रोण, अर्जुन, एकलव्य की माँ, या वह कुत्ता भी।
घटनाएँ वही रखिए, नज़रिया आपका: किताब की घटनाएँ बदले बिना उस पात्र के मन की बात, डर और प्रश्न लिखिए। किताब के किनारे के प्रश्न मदद करेंगे: निषादों को क्या संदेश मिला, क्षत्रियों को क्या, और क्या द्रोण धर्मसूत्र का पालन कर रहे थे।
प्रस्तुत कीजिए: लगभग एक पन्ने की कहानी, शीर्षक के साथ; अंत में दो-तीन पंक्तियों में बताइए कि आपने यह नज़रिया क्यों चुना।
(पृष्ठ 62)
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 56). इस मंत्र के संदर्भ में, विवाह का वधू और वर के लिए क्या अभिप्राय है? इसकी चर्चा कीजिए। क्या ये अभिप्राय समान हैं या फिर इनमें भिन्नताएँ हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: ऋग्वेद का यह मंत्र (स्रोत 1, संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में जोड़ा गया) विवाह संस्कार में पुरोहित पढ़ता था। दोनों के लिए इसका अर्थ अलग है।
वधू के लिए: उसे ‘यहाँ’ (पिता के घर) से मुक्त करके ‘वहाँ’ (पति के घर) मज़बूती से स्थापित किया जाता है; यानी विवाह का मतलब है पिता का घर छोड़कर पति के घर जाना। उसके लिए कामना यह भी है कि उसे पति के प्रेम का सौभाग्य मिले।
वर के लिए: कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के उत्तम पुत्र हों, यानी वर को पुत्र मिलें और उसका वंश आगे बढ़े।
दोनों अभिप्राय समान नहीं हैं: वधू का घर और जीवन बदलता है, जबकि वर के लिए विवाह पुत्र और वंश से जुड़ा है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 57). उद्धरण पढ़िए और उन सारे मूल तत्वों की सूची तैयार कीजिए जिनका राजा बनने के लिए प्रस्ताव किया गया है। एक विशेष कुल में जन्म लेना कितना महत्वपूर्ण था? इनमें से कौन-सा मूल तत्व सही लगता है? क्या ऐसा कोई तत्व है जो आपको अनुचित लगता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 2 (आदिपर्वन्) में राजा बनने के ये आधार दिखते हैं:
शारीरिक पूर्णता: धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए उनके अनुज पांडु सिंहासन पर बैठे; दुर्योधन भी पिता की “अपूर्णता” की बात करता है।
उम्र: पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सब राजकुमार अल्पवयस्क थे।
योग्यता और जनता का समर्थन: हस्तिनापुर के नागरिक पांडवों को चाहते थे, क्योंकि वे “अधिक योग्य और सदाचारी” थे।
पिता से विरासत: दुर्योधन का तर्क है कि गद्दी पिता से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र को जाती है।
सारे दावेदार कुरु वंश के ही हैं, इसलिए उस कुल में जन्म लेना पहली शर्त थी; झगड़ा बस इस पर है कि कुल की कौन-सी शाखा राज करे। कौन-सा आधार सही या अनुचित लगता है, यह आप स्वयं तय कीजिए और कारण लिखिए; जैसे, योग्यता और जनता का समर्थन आपको उचित लग सकता है, और नेत्रहीन होने के कारण किसी को गद्दी से हटाना अनुचित।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 58). इनमें से प्रत्येक विवाह पद्धति के विषय में चर्चा कीजिए कि विवाह का निर्णय किसके द्वारा लिया गया था : (क) वधू (ख) वर (ग) वधू का पिता (घ) वर का पिता (ङ) अन्य लोग
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 3 (मनुस्मृति) की चारों पद्धतियाँ देखिए:
पहली: वधू का पिता; वह स्वयं वेदज्ञ वर को आमंत्रित करके कन्या का दान करता है।
चौथी: वधू का पिता; वह वर-वधू को संबोधित करके और वर का सम्मान करके कन्या का दान करता है।
पाँचवीं: वर; वह वधू के बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन देकर वधू प्राप्त करता है। धन वधू के बांधवों (अन्य लोग) को भी जाता है, इसलिए वे भी इस सौदे में शामिल हैं।
छठी: वधू और वर दोनों; यह स्त्री और पुरुष का अपनी इच्छा से संयोग है।
इनमें से किसी भी पद्धति में वर के पिता का नाम नहीं आता।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 59). यहाँ कितने गोतमी–पुत्त तथा कितने वसिथि (वैकल्पिक वर्तनी वसथि) पुत्त हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 4 की सूची में गोतमी–पुत्त 3 हैं और वसिथि/वसथि–पुत्त 2।
गोतमी–पुत्त: पहली, तीसरी और सातवीं पंक्ति।
वसिथि/वसथि–पुत्त: दूसरी और पाँचवीं पंक्ति।
नामों का अर्थ: ये नाम माता के नाम से बने हैं: गोतमी–पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं; ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं।
हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में भूल से ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। इसीलिए हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 60). क्या यह उद्धरण आपको आरंभिक भारतीय समाज में माँ को किस दृष्टि से देखा जाता था इसका जायज़ा देता है।
उत्तर देखिए
उत्तर: कुछ हद तक।
माँ की सलाह: स्रोत 5 में गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह देती है, और कहती है कि संधि करके वह पिता, माता और शुभेच्छुकों का सम्मान करेगा। यहाँ माँ एक समझदार सलाहकार के रूप में दिखती है।
निर्णय पुत्र का: दुर्योधन ने माँ की सलाह नहीं मानी, युद्ध लड़ा और हार गया।
सावधानी: सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे, फिर भी उनके यहाँ उत्तराधिकार पितृवंशिक था।
यानी माँ की बात का आदर था, पर अंतिम निर्णय पुत्र का ही रहा; एक उद्धरण से निष्कर्ष सावधानी से निकालिए।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 60). आजकल बच्चों का नामकरण किस भाँति होता है? क्या ये नाम इस अंश में वर्णित नामों से मिलते-जुलते हैं अथवा भिन्न हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: इसके लिए अपने आसपास से जानकारी जुटाइए।
नाम जुटाइए: अपनी कक्षा या परिवार के आठ-दस नाम लिखिए।
आधार लिखिए: हर नाम के आगे लिखिए कि उसमें पिता का नाम या उपनाम है, माता का नाम है, गोत्र है या कोई और आधार।
मिलाइए: इनकी तुलना सातवाहन नामों से कीजिए, जिनमें राजा की पदवी के बाद माता के नाम से बना शब्द (जैसे गोतमी–पुत्त, यानी गोतमी का पुत्र) आता है।
फिर लिखिए कि आज के नाम उनसे मिलते-जुलते हैं या भिन्न।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 62). इस कहानी के द्वारा निषादों को कौन–सा संदेश दिया जा रहा था? क्षत्रियों को इससे क्या संदेश मिला होगा? क्या आपको लगता है कि एक ब्राह्मण के रूप में द्रोण धर्मसूत्र का अनुसरण कर रहे थे जब वे धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 7 की कथा से ये संदेश निकलते दिखते हैं:
निषादों के लिए: कुरु राजकुमारों के गुरु द्रोण ने एकलव्य को शिष्य बनाने से ही मना कर दिया था; संदेश यह है कि राजकुमारों वाली विद्या निषादों के लिए नहीं है; अपने अभ्यास से महारत पा लें, तब भी वह छीनी जा सकती है, जैसे एकलव्य का अँगूठा।
क्षत्रियों के लिए: उनका स्थान सुरक्षित रखा जाएगा; द्रोण ने अर्जुन को दिया वचन निभाया और “कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।”
द्रोण और धर्मसूत्र: धर्मसूत्रों में ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ करना-कराना और दान देना-लेना है, जबकि युद्ध करना क्षत्रियों का कार्य है। इस हिसाब से लगता है कि धनुर्विद्या सिखाकर द्रोण स्वयं उस नियम से बाहर जा रहे थे जिसे वे एकलव्य पर लागू कर रहे थे।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 64). क्या आपको लगता है कि रेशम के बुनकर उस जीविका का पालन कर रहे थे जो उनके लिए शास्त्रों ने तय की थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: पूरी तरह नहीं।
अभिलेख: मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी (स्रोत 8)। ये बुनकर लाट (गुजरात) से दशपुर (मंदसौर) जाकर बसे और उन्होंने मिलकर सूर्य देवता का मंदिर बनवाया।
दूसरी जीविकाएँ: इस श्रेणी के सदस्य संगीत, जीवनियों और कथाओं, धार्मिक व्याख्यानों, अनुष्ठानों, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध में भी लगे थे।
श्रेणी की सदस्यता: यह शिल्प में विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य अन्य जीविका भी अपना लेते थे।
इसलिए ये बुनकर केवल एक तय जीविका तक सीमित नहीं थे।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 65). इस सारांश में उन व्यवहारों को निर्दिष्ट कीजिए जो अब्राह्मणीय प्रतीत होते हैं।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 9 में ये व्यवहार ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग दिखते हैं:
स्त्री का प्रस्ताव: हिडिम्बा ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव किया और अपना पति स्वयं चुना; स्रोत 3 की पहली और चौथी पद्धति में यह निर्णय वधू का पिता लेता है।
धर्म और बांधवों का त्याग: उसने कहा कि उसने मित्र, बांधव और अपने धर्म का भी परित्याग कर दिया है।
शर्त वाला विवाह: भीम दिन भर हिडिम्बा के साथ रहते और रात में पांडवों के पास लौट आते।
संतान माँ के साथ: पुत्र घटोत्कच के जन्म के बाद माँ और पुत्र पांडवों को छोड़कर वन में चले गए।
नरभक्षी राक्षस: हिडिम्बा का भाई मनुष्यों को खाने वाला राक्षस बताया गया है।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि ‘राक्षस’ उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों में चित्रित मानदंडों से भिन्न थे। (पृष्ठ 65)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 67). इस कथा में उन तत्वों की ओर इंगित कीजिए जिनसे यह ज्ञात हो कि वह मातंग के नज़रिए से लिखे गए थे।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 10 (मातंग जातक, पालि) में कथा का नायक चाण्डाल मातंग है:
नायक बोधिसत्त: चाण्डाल के रूप में जन्मे मातंग ही बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) हैं।
विरोध की जीत: पिटाई के बाद मातंग दरवाज़े के बाहर लेट गए, और सातवें दिन घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया।
नैतिक बात मातंग के मुँह से: “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं। इसके विपरीत जो लोग दोषमुक्त हैं वे भेंट के योग्य हैं।”
अलौकिक शक्ति: संसार त्यागकर मातंग अलौकिक शक्ति पाते हैं, और बेटे के घर से निकाले जाने पर आकाश में जाकर अदृश्य हो जाते हैं।
उलटा क्रम: दिथ्थ माफ़ी माँगने आती है, और मातंग कहते हैं कि उनके भिक्षा पात्र में बचे भोजन का कुछ अंश माण्डव्य और ब्राह्मणों को दिया जाए।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 67). इस प्रकरण में कौन से स्रोत हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि लोग ब्राह्मणों द्वारा बताई गई जीविका का अनुसरण करते थे? कौन से स्रोत हैं जिनसे अलग संभावनाओं की जानकारी मिलती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: इस प्रकरण के स्रोतों को दो खानों में रखिए:
नियम मानने के संकेत: स्रोत 7 (एकलव्य से अँगूठा माँगकर क्षत्रिय अर्जुन का स्थान बचाया गया); मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची, और फा-शिएन और श्वैन-त्सांग के वृत्तांत कि अस्पृश्यों को करताल बजानी पड़ती थी और वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर के बाहर रहते थे।
अलग संभावनाएँ: स्रोत 6 (ऋग्वेद के सूक्त में कवि, वैद्य पिता और अन्न पीसने वाली माता); स्रोत 8 (रेशम बुनकरों की अनेक जीविकाएँ); वणिकों वाला बॉक्स (ब्राह्मण–वणिक चारुदत्त, क्षत्रिय–वणिक भाई); भाग 3.2 के अक्षत्रिय राजा; स्रोत 9 (हिडिम्बा); स्रोत 10 (चाण्डाल मातंग का पुत्र माण्डव्यकुमार तीन वेद पढ़ता है)। स्वयं ब्राह्मण द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना भी इसी खाने में जाता है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 68). क्या आपको ऐसा लगता है कि यह प्रकरण इस बात की ओर इंगित करता है कि पत्नियों को पतियों की निजी संपत्ति माना जाए?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह प्रकरण बताता है कि ऐसा विचार मौजूद था, पर उस पर विवाद भी था।
हाँ की ओर: द्यूत में युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अनुजों और स्वयं को हारने के बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाकर हार गए, मानो वह भी इन्हीं चीज़ों जैसी संपत्ति हो; और एक मत यह था कि ऐसा करना अनुचित नहीं “क्योंकि पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है।”
नहीं की ओर: दूसरा मत था कि दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता; माना जाता है कि द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया; इन मुद्दों का कोई निष्कर्ष नहीं निकला, और अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्रता लौटा दी।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 69). स्त्री और पुरुष किस प्रकार धन प्राप्त कर सकते थे इसकी तुलना कीजिए व अंतर भी स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 12 (मनुस्मृति) के अनुसार:
पुरुष (सात तरीके): विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा, और सज्जनों की दी गई भेंट स्वीकार करके।
स्त्री (छ: तरीके): वैवाहिक अग्नि के सामने मिली भेंट; वधूगमन के समय मिली भेंट; स्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट; भ्राता, माता और पिता के उपहार; परवर्ती काल में मिली भेंट; और “अनुरागी” पति से मिला सब कुछ।
अंतर: पुरुष विरासत और अपनी मेहनत, खरीद, निवेश या विजय से धन पा सकते थे; स्त्रियों के सारे तरीके भेंट और उपहार हैं, यानी दूसरों के दिए धन पर टिके हैं।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 70). अवन्तिपुत्र के पहले वक्तव्य को दुबारा पढ़िए। इसमें कौन से विचार ऐसे हैं जो ब्राह्मणीय ग्रंथों/ परंपराओं से लिए गए हैं? क्या आप इनमें से किसी विचार के स्रोत की पहचान कर सकते हैं? इस ग्रंथ के अनुसार सामाजिक असमानता के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 13 पालि के बौद्ध ग्रंथ मज्झिमनिकाय से है।
ब्राह्मणीय विचार: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं और अन्य जातियाँ निम्न; ब्राह्मण का वर्ण शुभ्र है और अन्य जातियाँ काली; केवल ब्राह्मण पवित्र हैं; ब्राह्मण ब्रह्मा के पुत्र हैं, “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं”, उनसे रचित हैं और उनके वंशज हैं।
स्रोत की पहचान: “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” वाली बात ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (मंडल 10, सूक्त 90) से मिलती-जुलती है, जिसके मंत्र 12 में ब्राह्मण को आदि-पुरुष का मुख कहा गया है। किताब भी ब्राह्मणीय दृष्टिकोण को इसी सूक्त पर आधारित बताती है।
असमानता का स्पष्टीकरण: मज्झिमनिकाय की इस कथा में असमानता धन से आती है, जन्म से नहीं। धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी अपना आज्ञाकारी सेवक बना सकता था; इसलिए अवन्तिपुत्र मान लेते हैं कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं। किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों का वर्ण संबंधी रवैया दिखाती है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 71), 1. चारण ने सरदार को दानी बताने के लिए किस तरह के दाँव-पेंच अपनाए? धन अर्जित करने के लिए सरदार को क्या करना होता था जिससे वह उसका कुछ अंश चारण को दे सके?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 14 तमिल संगम साहित्य (लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) की पद्यावली पुरनानूरु से है।
चारण के दाँव-पेंच: वह मान लेता है कि सरदार के पास रोज़ खर्च करने को धन नहीं, फिर कहता है कि वह इतना ओछा नहीं कि मना कर दे; उसे “दानप्रिय” और “चारणों की क्षुधा का शत्रु” बताता है; दूसरे चारणों को साथ चलने बुलाता है; और कहता है कि भूख से क्षीण पसलियाँ देखकर सरदार लोहार से युद्ध के लिए लंबा भाला बनवाएगा।
सरदार का धन: भाले वाली बात से लगता है कि सरदार युद्ध करके धन लाता था, ताकि उसका अंश चारणों को दे सके। प्राचीन तमिलकम् में दानशील व्यक्ति का सम्मान होता था और कृपण घृणा का पात्र था।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 71). वर्तमान समाजों में सामाजिक रिश्ते किस तरह परिचालित होते हैं? क्या यह अतीत के सामाजिक रिश्तों से मिलते-जुलते हैं, अथवा भिन्न हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: इसके लिए आज के समाज को स्वयं देखिए और बड़ों से पूछिए।
रिश्ते चुनिए: अध्याय के तीन-चार रिश्ते, जैसे आश्रयदाता और चारण (स्रोत 14), धनी स्वामी और सेवक (स्रोत 13), पिता से पुत्र को विरासत, और विवाह का निर्णय कौन ले (स्रोत 3)।
आज से मिलाइए: हर रिश्ते के लिए लिखिए कि आज वह कैसे चलता है।
फिर बताइए कि हर रिश्ता अतीत जैसा है या अलग।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 71), 2. मूर्तिकार ने सरदार व उसके अनुयायी के बीच अंतर को कैसे दर्शाया है?
उत्तर देखिए
उत्तर: अमरावती (आंध्र प्रदेश) की लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी की इस पत्थर की मूर्ति में अंतर आकार, सजावट और मुद्रा से दिखाया गया है।
आकार: सरदार बहुत बड़ा बनाया गया है; अनुयायी उससे बहुत छोटा है, लगभग उसकी कमर तक।
सजावट: सरदार के सिर पर ऊँची पगड़ी, गले में कई हार और कमर पर सजा हुआ वस्त्र है; अनुयायी के वस्त्र और गहने कम हैं।
मुद्रा: सरदार का एक हाथ ऊपर उठा है और दूसरा हाथ अनुयायी के सिर पर रखा है।
इनसे दिखता है कि सरदार ऊँचे पद पर है और अनुयायी उसके अधीन।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 76), 1. क्या आपको लगता है कि लाल की खोज और महाकाव्य में वर्णित हस्तिनापुर में समानता है।
उत्तर देखिए
उत्तर: बहुत कम।
महाकाव्य में (स्रोत 15): नगर समुद्र की भाँति भरा है, सैकड़ों प्रासादों से संकुलित है, उसके सिंहद्वार, तोरण और कंगूरे बादलों की तरह घुमड़ते हैं, और वह इंद्र की नगरी के समान है।
बी.बी. लाल की खोज (1951-52): दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) पर आवास गृहों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, बस मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें और सरकंडे की दीवारों पर मिट्टी का पलस्तर; तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) पर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, शोषक-घट, ईंटों के नाले और वलय-कूप।
लाल के विवरण में साधारण घर हैं, सैकड़ों प्रासादों वाला नगर नहीं; हाँ, उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था। इसलिए किताब पूछती है कि क्या नगर का यह चित्रण बाद में (ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात) जोड़ा गया, या यह कवियों की कल्पना थी।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 76), 2. आपको क्यों लगता है कि लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 16 में द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण हैं।
कुंती की आज्ञा: कुंती ने बिना देखे “लाई गई वस्तु” बाँटने को कहा, और उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी।
व्यास का कथन: पांडव इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था।
शिव का वर: एक युवा स्त्री ने शिव से पाँच बार पति का वर माँगा था; वही द्रौपदी बनी।
इतिहासकारों का सुझाव: बहुपति प्रथा संभवत: शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी, पर इतने स्पष्टीकरण बताते हैं कि समय के साथ यह प्रथा लोगों के बीच अमान्य होती चली गई। ब्राह्मणों की दृष्टि में भी यह अमान्य और अवांछित थी।
इसलिए लगता है कि लेखकों को इसे उचित ठहराने के लिए एक से अधिक कारण देने पड़े। (पृष्ठ 76–77)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 77). इस अध्याय में महाभारत से उद्धृत अंशों को एक बार फिर पढ़िए। इनमें से प्रत्येक के विषय में यह चर्चा कीजिए कि क्या वे वास्तव में सत्य थे। ये उद्धरण हमें महाकाव्य के रचयिताओं, पाठकों या फिर श्रोताओं के विषय में क्या बताते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: हर अंश (स्रोत 2, 5, 7, 9, 11, 15, 16) के लिए दो बातें लिखिए: क्या इसकी पुष्टि किसी और साक्ष्य से होती है, और इससे लेखकों की सोच के बारे में क्या पता चलता है।
सत्य के बारे में: किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे। कुछ इतिहासकार महाभारत के मुख्य कथानक को स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति मानते हैं, जबकि अन्य कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती। हस्तिनापुर के वर्णन (स्रोत 15) को बी.बी. लाल के उत्खनन से मिलाकर भी देखिए।
लेखकों और श्रोताओं के बारे में: जैसे स्रोत 2 पितृवंशिक उत्तराधिकार को महत्व देता है, स्रोत 7 वर्ण के नियम लागू करता है, स्रोत 9 बताता है कि ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग लोगों को कैसे देखा जाता था, और स्रोत 16 बहुपति प्रथा को उचित ठहराने की कोशिश करता है। साथ ही याद रखिए कि “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”
झटपट दोहराइए
1. महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परियोजना कब और किसके नेतृत्व में शुरू हुई, और इसमें कितना समय लगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1919 में, संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में; इसे पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे और यह 13,000 पृष्ठों में छपा। (पृष्ठ 54)
2. पितृवंशिकता का क्या अर्थ है?
उत्तर देखिए
उत्तर: वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है। (पृष्ठ 55)
3. बहिर्विवाह पद्धति किसे कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पुत्रियों का विवाह उनके अपने गोत्र से बाहर कर देना। (पृष्ठ 57)
4. धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र में मानदंडों का संकलन कब से हुआ, और मनुस्मृति का संकलन कब हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग 500 ई.पू. से; मनुस्मृति का संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच हुआ। (पृष्ठ 58)
5. ब्राह्मणीय गोत्र पद्धति के दो महत्वपूर्ण नियम क्या थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: विवाह के बाद स्त्री को पिता के स्थान पर पति के गोत्र का माना जाता था, और एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे। (पृष्ठ 58)
6. सातवाहन रानियों के नाम गोत्र के नियमों के बारे में क्या बताते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: रानियों ने विवाह के बाद भी पिता का गोत्र नाम (गौतम, वसिष्ठ) रखा, और कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं; यह अंतर्विवाह, यानी बंधुओं में विवाह, का उदाहरण है। (पृष्ठ 60)
7. मौर्यों के उत्तराधिकारी कौन-से दो वंश ब्राह्मण थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: शुंग और कण्व। (पृष्ठ 62)
8. मंदसौर अभिलेख (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) किसका वर्णन करता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी का, जो लाट (गुजरात) से दशपुर (मंदसौर) जाकर बसी और जिसने सूर्य देवता का मंदिर बनवाया। (पृष्ठ 63–64)
9. मृच्छकटिकम् के नायक चारुदत्त को क्या बताया गया है?
उत्तर देखिए
उत्तर: ब्राह्मण–वणिक। यह शूद्रक का नाटक है (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी)। (पृष्ठ 64)
10. फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) ने अस्पृश्यों के बारे में क्या लिखा?
उत्तर देखिए
उत्तर: उन्हें सड़क पर चलते हुए करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी, जिससे अन्य जन उन्हें देखने के दोष से बच जाएँ। (पृष्ठ 66)
11. स्त्रीधन किसे कहते थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: विवाह के समय मिले उपहारों को, जिन पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; इसे उसकी संतान विरासत में पा सकती थी और इस पर पति का कोई अधिकार नहीं होता था। (पृष्ठ 68)
12. बौद्ध सुत्तपिटक के मिथक में राजा को महासम्मत्त क्यों कहा गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि वह सब लोगों द्वारा चुना गया था; ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग उसकी सेवा के बदले देते थे। (पृष्ठ 72)
13. इतिहासकार महाभारत की विषयवस्तु को किन दो शीर्षकों में रखते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: आख्यान (कहानियाँ) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड); सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है। (पृष्ठ 73)
14. ‘सूत’ कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: भाट सारथी, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे और उनकी विजय और उपलब्धियों के बारे में कविताएँ लिखते थे; संभवत: महाभारत की मूल कथा इन्होंने रची। (पृष्ठ 74)
15. हस्तिनापुर में उत्खनन किसने और कब किया, और “कुंती ओ निषादी” किसकी रचना है?
उत्तर देखिए
उत्तर: पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने 1951-52 में मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर गाँव में उत्खनन किया। “कुंती ओ निषादी” बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी की लघु कथा है। (पृष्ठ 75, 77–78)