यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं।
यह अध्याय लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक उपमहाद्वीप में आए यात्रियों के वृत्तांतों से हमारे अतीत को समझने की कोशिश है। किताब तीन लोगों के वृत्तांतों पर टिकती है: ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) से आए अल–बिरूनी (ग्यारहवीं शताब्दी), मोरक्को के इब्न बतूता (चौदहवीं शताब्दी) और फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर (सत्रहवीं शताब्दी)। पूरे अध्याय में दो बातें साथ चलती हैं। पहली: बाहर से आया लेखक रोज़ की वे बातें दर्ज करता है जिन्हें यहाँ के लेखक सामान्य मानकर छोड़ देते थे। दूसरी: हर यात्री का अपना नज़रिया, जैसे अल–बिरूनी की तुलना और समझने की कोशिश, इब्न बतूता का अचरज, और बर्नियर की यूरोप से तुलना, तय करता है कि वह क्या देखता है और कैसे लिखता है। किताब यह भी याद दिलाती है कि महिलाओं के छोड़े वृत्तांत लगभग न के बराबर हैं, हालाँकि वे भी यात्राएँ करती थीं।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 138–139) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
तीन यात्री, तीन नज़रिए
- संस्कृत ग्रंथ पढ़कर समझा
- अध्याय के अंत में अक्सर दूसरी संस्कृतियों से तुलना
- घूमकर देखा, किताबों से ज़्यादा अनुभव पर भरोसा
- अनजानी चीज़ों पर अचरज
- भारत की यूरोप से तुलना
- भारत को यूरोप का उलटा दिखाया
- काल: लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक।
- स्रोत: यात्रियों के वृत्तांत। किताब कहती है कि बिलकुल अलग सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण ये लेखक रोज़ की गतिविधियों और प्रथाओं पर ज़्यादा ध्यान देते थे: “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।” नज़रिए का यही फ़र्क यात्रा–वृत्तांतों को रोचक बनाता है।
- दूसरे वृत्तांत: कुछ वृत्तांत दरबार की गतिविधियों पर हैं, कुछ धार्मिक विषयों या स्थापत्य और स्मारकों पर। जैसे पंद्रहवीं शताब्दी में विजयनगर शहर का एक सबसे महत्त्वपूर्ण विवरण हेरात से आए राजनयिक अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी से मिलता है। मुग़ल साम्राज्य के कुछ प्रशासनिक अधिकारी भी साम्राज्य के भीतर घूमकर अपनी टिप्पणियाँ दर्ज करते थे।
2. ज़रूरी शब्द★
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बंधक | ज़बरदस्ती साथ ले जाकर रोका गया व्यक्ति; सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद अल–बिरूनी इसी रूप में ग़ज़नी आया | 116 |
| किताब–उल–हिन्द | अल–बिरूनी की अरबी में लिखी कृति; धर्म, दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कानून जैसे विषयों पर अस्सी अध्याय | 117 |
| संस्कृतवादी परंपरा | संस्कृत में रचे ग्रंथों की ज्ञान–परंपरा; अल–बिरूनी के वर्णन इन्हीं ग्रंथों पर टिके रहे | 117, 124 |
| रिह्ला | इब्न बतूता का अरबी में लिखा यात्रा वृत्तांत | 118 |
| शरिया | इस्लामी कानून; इब्न बतूता का परिवार इसकी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था | 118 |
| क़ाज़ी | न्यायाधीश; सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने इब्न बतूता को दिल्ली का क़ाज़ी बनाया | 118 |
| अवरोध | समझने के रास्ते की बाधा; अल–बिरूनी ने तीन गिनाए: भाषा, धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता, और अभिमान | 124 |
| अपवित्रता | जाति व्यवस्था में सन्निहित यह मान्यता कि कुछ लोग या वस्तुएँ अशुद्ध हैं; अल–बिरूनी ने इसे प्रकृति के नियमों के विरुद्ध माना | 124–125 |
| वर्ण | ग्रंथों में बताए गए समाज के चार वर्ग; अल–बिरूनी ने इनका क्रम और उत्पत्ति स्रोत 5 में लिखी | 125 |
| अंत्यज | शाब्दिक अर्थ “व्यवस्था से परे”; वर्ण व्यवस्था से बाहर मानी गई श्रेणियाँ | 125 |
| देहली | दिल्ली का वह नाम जो इब्न बतूता के समय (चौदहवीं शताब्दी) के ग्रंथों में अक्सर मिलता है | 127 |
| ताराबबाद | दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार | 128 |
| इक़त | एक बुनाई शैली; इसकी अभिरचनाएँ उपमहाद्वीप और दक्षिण–पूर्व एशिया के कई तटीय उत्पादन केंद्रों में अपनाई गईं | 128 |
| सराय | व्यापारिक मार्गों पर बने ठहरने के स्थान; राज्य ने व्यापारियों को प्रोत्साहन देने के लिए इन्हें बनवाया | 129 |
| अश्व डाक (उलुक) | हर चार मील पर रखे राजकीय घोड़ों से चलने वाली डाक | 129 |
| पैदल डाक (दावा) | दौड़ते संदेशवाहकों की डाक, प्रति मील तीन अवस्थान; अश्व डाक से तेज़ | 129 |
| द्वि–विपरीतता | दो चीज़ों को एक–दूसरे के उलटे के रूप में दिखाना; बर्नियर ने भारत को यूरोप का प्रतिलोम दिखाया | 130 |
| निजी भूस्वामित्व | ज़मीन पर व्यक्तियों का अपना मालिकाना हक़; बर्नियर के अनुसार भारत में इसका अभाव था | 130 |
| राजत्व का पारिश्रमिक | अबुल फ़ज़्ल के शब्द: भूमि राजस्व, जो राजा प्रजा को सुरक्षा देने के बदले माँगता प्रतीत होता था | 132 |
| प्राच्य निरंकुशवाद | मॉन्टेस्क्यू का सिद्धांत: एशिया में शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे | 132 |
| एशियाई उत्पादन शैली | कार्ल मार्क्स का सिद्धांत: उपनिवेशवाद से पहले भारत (और अन्य एशियाई देशों) में अधिशेष राज्य ले लेता था | 132 |
| बलाहार | “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक | 132 |
| शिविर नगर | बर्नियर का शब्द: ऐसे नगर जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे | 134 |
| महाजन, सेठ, नगर सेठ | पश्चिमी भारत में व्यापारियों के समूह (महाजन), उनका मुखिया (सेठ), और अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का मुखिया (नगर सेठ) | 134 |
| कारखाना | शिल्पकारों की कार्यशाला; बर्नियर ने इनके बड़े कक्षों का वर्णन किया | 134 |
3. अल–बिरूनी: ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी और पंजाब तक★★
किताब का भाग 1 (अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द), पृष्ठ 116–117 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 6
ख़्वारिज़्म से पंजाब तक (भाग 1.1)
- जन्म और शिक्षा: अल–बिरूनी का जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आधुनिक उज़्बेकिस्तान में है। ख़्वारिज़्म शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था, और अल–बिरूनी ने उस समय की सबसे अच्छी शिक्षा पाई।
- भाषाएँ: वह सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत समेत कई भाषाएँ जानता था। यूनानी भाषा नहीं जानता था, फिर भी प्लेटो और दूसरे यूनानी दार्शनिकों के काम उसने अरबी अनुवादों के ज़रिए पढ़े थे।
- ग़ज़नी कैसे पहुँचा: सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद वहाँ के कई विद्वानों और कवियों को अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया। अल–बिरूनी भी बंधक के रूप में ग़ज़नी आया, पर धीरे–धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा, और सत्तर वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक वह वहीं रहा।
- भारत में रुचि: ग़ज़नी में ही अल–बिरूनी की भारत में रुचि जागी। यह असामान्य बात नहीं थी:
- आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में लिखे खगोल–विज्ञान, गणित और चिकित्सा के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद होने लगा था।
- पंजाब के ग़ज़नवी साम्राज्य का हिस्सा बनने के बाद स्थानीय लोगों से हुए संपर्कों ने आपसी विश्वास और समझ का माहौल बनाया।
- अल–बिरूनी ने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर संस्कृत, धर्म और दर्शन का ज्ञान पाया।
- यात्राएँ: उसका यात्रा–कार्यक्रम साफ़ नहीं है, फिर भी लगता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी।
- अनुवादक (बॉक्स, पृष्ठ 116): कई भाषाएँ जानने से वह भाषाओं की तुलना और ग्रंथों का अनुवाद कर सका। उसने पतंजलि के व्याकरण के ग्रंथ समेत कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, और अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए यूक्लिड (एक यूनानी गणितज्ञ) के कार्यों का संस्कृत में।
- यात्रा वृत्तांत की परंपरा: उसके लिखने के समय यात्रा वृत्तांत अरबी साहित्य का एक मान्य हिस्सा बन चुके थे। ये वृत्तांत पश्चिम में सहारा रेगिस्तान से उत्तर में वोल्गा नदी तक के क्षेत्रों के बारे में थे। फिर भी “1500 ई. से पहले भारत में अल–बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा”, जबकि भारत से बाहर कई लोग शायद पढ़ चुके थे।
- स्रोत 1 (अल–बिरूनी के उद्देश्य): अल–बिरूनी ने अपने कार्य को बताया: “उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं।”
किताब–उल–हिन्द (भाग 1.2)
- भाषा और आकार: अल–बिरूनी की यह कृति अरबी में है, और इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। यह एक विस्तृत ग्रंथ है, जो अस्सी अध्यायों में बँटा है।
- विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि। (मापतंत्र विज्ञान मापने के विज्ञान से जुड़ा है।)
- हर अध्याय की शैली: सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) हर अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। आज के कुछ विद्वान मानते हैं कि इस “लगभग ज्यामितीय संरचना” का एक मुख्य कारण अल–बिरूनी का गणित की ओर झुकाव था। यह संरचना अपनी स्पष्टता और पूर्वानुमेयता के लिए जानी जाती है।
- किसके लिए लिखा: अरबी में लिखने वाले अल–बिरूनी ने शायद अपनी कृतियाँ उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं।
- अनुवादों पर उसकी राय: वह संस्कृत, पाली और प्राकृत ग्रंथों के अरबी अनुवादों और रूपांतरणों से परिचित था, जिनमें दंतकथाओं से लेकर खगोल–विज्ञान और चिकित्सा तक की कृतियाँ थीं। पर इन ग्रंथों की लेखन शैली पर उसका नज़रिया आलोचनात्मक था, और वह उन्हें बेहतर बनाना चाहता था।
- “हिंदू” शब्द (बॉक्स, पृष्ठ 117): यह लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला, जो सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए था।
- अरबों ने इस क्षेत्र को “अल–हिंद” और यहाँ के निवासियों को “हिंदी” कहा।
- बाद में तुर्कों ने सिंधु के पूर्व में रहने वालों को “हिंदू”, उनके क्षेत्र को “हिंदुस्तान” और उनकी भाषा को “हिंदवी” कहा।
- किताब कहती है: “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।” धार्मिक अर्थ में इसका प्रयोग बहुत बाद की बात है।
किताब–उल–हिन्द के एक अध्याय की सामान्य बनावट
4. इब्न बतूता: एक आरंभिक विश्व–यात्री★★
किताब का भाग 2 (इब्न बतूता का रिह्ला), पृष्ठ 118–121 · प्रश्नावली में: प्रश्न 7, 10, 2
एक आरंभिक विश्व–यात्री (भाग 2.1)
- रिह्ला: इब्न बतूता का अरबी में लिखा यात्रा वृत्तांत, जो चौदहवीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के बारे में बहुत भरपूर और रोचक जानकारी देता है।
- परिवार: मोरक्को के इस यात्री का जन्म तैंजियर के सबसे सम्मानित और शिक्षित परिवारों में से एक में हुआ, जो इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था। परिवार की परंपरा के अनुसार उसने कम उम्र में साहित्यिक और शास्त्ररूढ़ शिक्षा पाई।
- किताब से ज़्यादा अनुभव: अपनी श्रेणी के दूसरे लोगों से अलग, इब्न बतूता पुस्तकों की जगह यात्राओं से मिले अनुभव को ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था।
- भारत आने से पहले: 1332–33 में भारत के लिए निकलने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ, और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।
- दिल्ली में: मध्य एशिया के रास्ते वह सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा।
- दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक की, कला और साहित्य के दयाशील संरक्षक के रूप में ख्याति से खिंचकर वह मुल्तान और उच्छ के रास्ते दिल्ली गया।
- सुल्तान ने उसकी विद्वता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का क़ाज़ी या न्यायाधीश बनाया। वह कई वर्ष इस पद पर रहा, फिर सुल्तान का विश्वास खो बैठा और कारागार में डाला गया।
- ग़लतफ़हमी दूर होने पर उसे फिर राजकीय सेवा में लिया गया, और 1342 ई. में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया।
- चीन तक का रास्ता: मध्य भारत होकर मालाबार तट; वहाँ से मालद्वीप, जहाँ वह अठारह महीने क़ाज़ी रहा; अंततः उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया। फिर एक बार मालाबार तट और मालद्वीप, फिर बंगाल और असम। जहाज़ से सुमात्रा, और वहाँ से दूसरे जहाज़ से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन (आज क्वानझू)।
- चीन में: वह चीन में ख़ूब घूमा और बीजिंग तक गया, पर वहाँ ज़्यादा दिन नहीं रुका। 1347 में उसने घर लौटने का निश्चय किया। चीन के बारे में उसके वृत्तांत की तुलना मार्को पोलो के वृत्तांत से की जाती है, जिसने तेरहवीं शताब्दी के अंत में वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) यात्रा की थी।
- स्रोत 2 (घोंसले से निकलता पक्षी): वह तैंजियर से गुरुवार को अकेला निकला, बिना किसी साथी या कारवाँ के, पुण्यस्थानों को देखने की इच्छा से: “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।” किताब जोड़ती है: “इब्न बतूता 1354 में घर वापस पहुँचा, अपनी यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद।”
- यात्रा कितनी कठिन थी: चौदहवीं शताब्दी में यात्रा आज से कहीं ज़्यादा कठिन और जोखिम भरी थी। इब्न बतूता के अनुसार मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में चालीस दिन और सिंध से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन लगे। दौलताबाद से दिल्ली चालीस दिन, और ग्वालियर से दिल्ली दस दिन में पहुँचा जा सकता था।
- एकाकी यात्री (बॉक्स, पृष्ठ 119): लुटेरे ही अकेला ख़तरा नहीं थे; यात्री को घर की याद सता सकती थी और वह बीमार पड़ सकता था। रिह्ला में इब्न बतूता लिखता है कि उसे बुखार ने जकड़ लिया था, और कमज़ोरी के कारण गिरने से बचने के लिए उसने पगड़ी का कपड़ा ज़ीन से बाँध लिया। ट्यूनिस शहर पहुँचने पर कोई उसे पहचानता नहीं था, किसी ने उसका अभिवादन नहीं किया, और वह अकेलेपन से इतना उदास हुआ कि “बहुत रोया”। फिर एक तीर्थयात्री ने पास आकर उसका अभिवादन किया।
इब्न बतूता की यात्रा, किताब के क्रम में
- मक्का की तीर्थ यात्राएँ
- सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान, पूर्वी अफ्रीका के तटीय बंदरगाह
- मध्य भारत होकर मालाबार तट
- मालद्वीप (अठारह महीने क़ाज़ी); फिर श्रीलंका जाने का निश्चय
- फिर मालाबार और मालद्वीप; बंगाल और असम
- जहाज़ से सुमात्रा, फिर जायतुन (आज क्वानझू); बीजिंग तक
- रास्ते के डाकू: यात्रा असुरक्षित भी थी; इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के समूहों के हमले झेले। वह साथियों के साथ कारवाँ में चलना पसंद करता था, फिर भी राजमार्गों के लुटेरे नहीं रुके। मुल्तान से दिल्ली जाते हुए उसके कारवाँ पर हमला हुआ: कई साथी यात्री मारे गए, और जो बचे, जिनमें इब्न बतूता भी था, बुरी तरह घायल हुए।
- अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब में इब्न बतूता की देखी जगहें: लाहरी, ऊजा, मुल्तान, अजुदाहन, अबुहर, सरसती, हंसी और देहली। कई नाम उसी तरह लिखे गए हैं जैसे इब्न बतूता उन्हें जानता होगा, जैसे देहली और ग़जना।
जिज्ञासाओं का उपभोग (भाग 2.2)
- हठीला यात्री: उत्तर पश्चिमी अफ़्रीका में अपने घर मोरक्को लौटने से पहले इब्न बतूता ने कई वर्ष उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भागों (“हो सकता है वह रूस भी गया हो”), भारतीय उपमहाद्वीप और चीन की यात्रा की।
- कहानियाँ कैसे लिखी गईं: लौटने पर वहाँ के शासक ने आदेश दिया कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ।
- स्रोत 3 (शिक्षा तथा मनोरंजन): इब्न बतूता के बोले हुए वृत्तांत (श्रुतलेख) लिखने के लिए इब्न जुज़ाई नियुक्त हुआ। अपनी प्रस्तावना में वह बताता है कि राजा ने देखे गए शहरों, याद रह गई रोचक घटनाओं, मिले हुए शासकों, उनके महान साहित्यकारों और धर्मनिष्ठ संतों का वृत्तांत लिखवाने को कहा। ऐसा कथानक बना “जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी।” उसमें असाधारण चीज़ों के विवरण भी थे, जिनसे अभिरुचि जगी।
- इब्न बतूता के पदचिह्नों पर (बॉक्स, पृष्ठ 121): 1400 से 1800 के बीच भारत आए यात्रियों ने फ़ारसी में कई यात्रा वृत्तांत लिखे; भारत से मध्य एशिया, ईरान और ऑटोमन साम्राज्य जाने वालों ने भी कभी–कभी अपने अनुभव लिखे। ये लेखक अल–बिरूनी और इब्न बतूता के पदचिह्नों पर चले, और कुछ ने उन्हें पढ़ा भी था। सबसे प्रसिद्ध:
- अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी: 1440 के दशक में दक्षिण भारत की यात्रा की।
- महमूद वली बल्खी: 1620 के दशक में ख़ूब यात्राएँ कीं; भारत से इतना सम्मोहित हुआ कि कुछ समय के लिए संन्यासी भी बन गया।
- शेख़ अली हाज़िन: 1740 के दशक में उत्तर भारत आया; वह भारत से निराश हुआ, यहाँ तक कि घृणा भी करने लगा। ऐसे लेखक भारत में अपने लिए उत्सव जैसे स्वागत की आशा कर रहे थे।
- इनमें से ज़्यादातर ने भारत को “अचंभों के देश” के रूप में देखा।
5. फ्रांस्वा बर्नियर: तुलना करने वाला चिकित्सक★★
किताब का भाग 3 (फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक), पृष्ठ 122–123 · प्रश्नावली में: प्रश्न 2
- पुर्तगाली और दूसरे यूरोपीय: लगभग 1500 ई. में भारत में पुर्तगालियों के आने के बाद उनमें से कई ने भारतीय सामाजिक रीति–रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत लिखे।
- जेसुइट रॉबर्टो नोबिली जैसे कुछ लोगों ने भारतीय ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद भी किया।
- दुआर्ते बरबोसा ने दक्षिण भारत के व्यापार और समाज का विस्तृत विवरण लिखा।
- 1600 ई. के बाद: भारत आने वाले डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी।
- फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर कम से कम छह बार भारत आया। वह भारत की व्यापारिक स्थितियों से बहुत प्रभावित था, और उसने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की।
- इतालवी चिकित्सक मनूकी जैसे कई यात्री कभी यूरोप नहीं लौटे और भारत में ही बस गए।
- बर्नियर कौन था: फ्रांस का रहने वाला चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार, जो कई और लोगों की तरह मुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया।
- वह 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में रहा और मुग़ल दरबार से नज़दीकी से जुड़ा रहा।
- पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक रहा; बाद में मुग़ल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में।
“पूर्व” और “पश्चिम” की तुलना (भाग 3.1)
- तुलना का तरीका: बर्नियर ने देश के कई भागों की यात्रा की, और भारत में जो देखता था, उसकी तुलना सामान्यत: यूरोप की स्थिति से करता था।
- किसके लिए लिखा: उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित की, और उसके कई दूसरे कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को लिखे पत्रों के रूप में थे।
- नतीजा: किताब कहती है, “लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।” उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था, फिर भी छपने पर उसके वृत्तांत बहुत प्रसिद्ध हुए।
- स्रोत 4 (मुग़ल सेना के साथ यात्रा): बर्नियर ने कई बार मुग़ल सेना के साथ यात्रा की। सेना के कश्मीर कूच के विवरण में वह अपना सामान गिनाता है:
- दो अच्छे तुर्कमान घोड़े, एक फ़ारसी ऊँट और चालक, घोड़ों के लिए साईस, एक खानसामा, और पानी का पात्र लेकर आगे चलने वाला सेवक;
- औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश, खाना बनाने के सामान के झोले;
- पाँच या छह दिनों के लिए बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला। वह लिखता है: “इस देश में नींबू के शरबत और दही से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती।”
- छपाई और प्रसार: बर्नियर के कार्य फ्रांस में 1670–71 में छपे, और अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में अनुवादित हो गए। 1670 और 1725 के बीच फ्रांसीसी में आठ बार और 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार दोबारा छपे।
- अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों से उलटा: वे हस्तलिपियों के रूप में फैलते थे और 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे।
- भारत की छवि (बॉक्स, पृष्ठ 123): यूरोपीय यात्रियों की छपी किताबों ने यूरोप के लोगों के लिए भारत की एक छवि बनाई। 1750 के बाद जब शेख इतिसमुद्दीन और मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीय यूरोप गए, तो उन्हें इसी छवि का सामना करना पड़ा, और उन्होंने तथ्यों की अपनी व्याख्या से इसे बदलने की कोशिश की।
वृत्तांत पाठकों तक कैसे पहुँचे
- अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन, इतालवी अनुवाद
- 1670 से 1725 तक फ्रांसीसी में आठ बार
- 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार
- हाथ से लिखी प्रतियों में फैलते थे
- 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे
6. समझने की बाधाएँ और जाति व्यवस्था: अल–बिरूनी की नज़र★★
किताब का भाग 4 (एक अपरिचित संसार की समझ: अल–बिरूनी तथा संस्कृतवादी परंपरा), पृष्ठ 124–125 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 1
समझने में बाधाएँ और उन पर विजय (भाग 4.1)
- हर यात्री की अपनी विधि: यात्री उपमहाद्वीप में जो भी देखते थे, सामान्यत: उसकी तुलना उन प्रथाओं से करते थे जिनसे वे परिचित थे। अल–बिरूनी जानता था कि अपने लिए तय किए उद्देश्य में कौन–सी समस्याएँ छिपी हैं। उसने कई “अवरोधों” की चर्चा की, जो उसके अनुसार समझने में बाधक थे:
- पहला अवरोध, भाषा: संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों को एक भाषा से दूसरी में अनुवाद करना आसान नहीं था।
- दूसरा अवरोध: धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता।
- तीसरा अवरोध: अभिमान।
- फिर भी किन पर निर्भर रहा: इन समस्याओं को जानते हुए भी अल–बिरूनी लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा। भारतीय समाज को समझने के लिए उसने अकसर वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत किए।
- विशाल पहुँच वाली एक भाषा (बॉक्स, पृष्ठ 124): अल–बिरूनी के अनुसार संस्कृत सीखने की कठिनाई पार करना आसान नहीं, क्योंकि अरबी की तरह इसकी पहुँच शब्दों और विभक्तियों, दोनों में बहुत विस्तृत है। एक ही वस्तु के लिए कई शब्द होते हैं, और एक ही शब्द कई वस्तुओं के लिए आता है।
- ईश्वर ही जानता है! (बॉक्स, पृष्ठ 124): यात्री हमेशा सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करते थे। अल–बिरूनी ने लकड़ी की एक ऐसी मूर्ति की कहानी सुनी जो कथित रूप से 216,432 वर्षों तक बची रही। उसने पूछा कि ऐसी जगह, जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र होती है, लकड़ी इतने लंबे समय तक कैसे बची रही होगी: “ईश्वर ही जानता है!”
अल–बिरूनी के तीन अवरोध
- संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से बहुत भिन्न
- विचारों का अनुवाद आसान नहीं
जाति व्यवस्था का विवरण (भाग 4.2)
- दूसरे समाजों में मिलते–जुलते रूप: अल–बिरूनी ने दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजकर जाति व्यवस्था को समझने और समझाने का प्रयास किया।
- उसने लिखा कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी। किताब के शब्दों में: “घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार।”
- यानी वह दिखाना चाहता था कि ऐसे सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे।
- साथ ही उसने बताया कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था, और उनमें भिन्नताएँ केवल धार्मिकता के पालन में थीं।
- स्रोत 5 (वर्ण व्यवस्था): अल–बिरूनी हिंदुओं के ग्रंथों के आधार पर चार वर्ण गिनाता है:
- ब्राह्मण: सबसे ऊँची जाति, ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न; हिंदू इन्हें “मानव जाति में सबसे उत्तम” मानते हैं।
- क्षत्रिय: ब्रह्मन् के कंधों और हाथों से; दर्जा ब्राह्मणों से बहुत नीचे नहीं।
- वैश्य: ब्रह्मन् की जंघाओं से।
- शूद्र: चरणों से।
- अंतिम दो वर्गों में अधिक अंतर नहीं है। लेकिन इन वर्गों के बीच भिन्नता होने पर भी ये एक साथ एक ही शहरों और गाँवों में, समान घरों और आवासों में मिल–जुलकर रहते हैं।
- अपवित्रता की मान्यता अस्वीकार: जाति व्यवस्था के बारे में ब्राह्मणवादी व्याख्या मानने के बावजूद अल–बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता को नहीं माना।
- उसके अनुसार जो भी वस्तु अपवित्र होती है, वह अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है, और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है।
- अगर ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता। इसलिए जाति व्यवस्था में छिपी अपवित्रता की अवधारणा उसके अनुसार प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।
- विवरण की सीमा: जाति व्यवस्था का उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से गहराई से प्रभावित था, और इन ग्रंथों में नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे।
- वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी। उदाहरण: अंत्यज (शाब्दिक अर्थ, “व्यवस्था से परे”) कहलाने वाली श्रेणियों से सामान्यतया यह अपेक्षा की जाती थी कि वे किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम दें।
- यानी ये लोग अकसर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र में शामिल थे।
अल–बिरूनी ने जाति को कैसे समझा
- इस्लाम में सब समान, भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में
- प्रकृति के नियमों के विरुद्ध
- सूर्य हवा को, नमक समुद्र के पानी को स्वच्छ रखता है
- असल जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं
- अंत्यज: सस्ता श्रम, फिर भी आर्थिक तंत्र में
7. अनजाने को जानने की उत्कंठा: इब्न बतूता के शहर, बाज़ार और डाक★★
किताब का भाग 5 (इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा), पृष्ठ 126–129 · प्रश्नावली में: प्रश्न 7, 2
- एक जुड़ी हुई दुनिया: चौदहवीं शताब्दी में जब इब्न बतूता दिल्ली आया, तब तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था जो पूर्व में चीन से पश्चिम में उत्तर–पश्चिमी अफ़्रीका और यूरोप तक फैला था।
- शहरों की विश्ववादी संस्कृति: उसने पवित्र पूजास्थल देखे, विद्वानों और शासकों के साथ समय बिताया, कई बार क़ाज़ी रहा, और ऐसे शहरी केंद्रों की संस्कृति का आनंद लिया जहाँ अरबी, फ़ारसी, तुर्की और दूसरी भाषाएँ बोलने वाले लोग विचार, सूचनाएँ और उपाख्यान बाँटते थे।
- इन कहानियों में धर्मनिष्ठ लोगों, निर्दयी और दयावान दोनों तरह के राजाओं, और सामान्य पुरुषों और महिलाओं के जीवन की बातें होती थीं।
- जो कुछ अपरिचित होता, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता, ताकि सुनने या पढ़ने वाले दूर के, पर पहुँच में आने लायक देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हों।
नारियल तथा पान (भाग 5.1)
- अनजानी उपज का चित्रण: इब्न बतूता की वर्णन–विधि के कुछ बेहतरीन उदाहरण नारियल और पान के विवरण में मिलते हैं। ये दो ऐसी वानस्पतिक उपज थीं जिनसे उसके पाठक पूरी तरह अपरिचित थे।
- स्रोत 6 (मानव सिर जैसे गिरिदार फल), नारियल:
- ये वृक्ष हू–बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं; अंतर बस इतना कि एक से काष्ठफल मिलता है और दूसरे से खजूर।
- फल मानव सिर से मेल खाता है: मानो दो आँखें और एक मुख हों, अंदर का हरा भाग मस्तिष्क जैसा, और जुड़ा रेशा बालों जैसा।
- रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय इसी से जहाज़ सिले जाते हैं।
- स्रोत 7 (पान):
- पान अंगूर–लता की तरह उगाया जाता है; इसका कोई फल नहीं होता, इसे केवल पत्तियों के लिए उगाते हैं।
- खाने से पहले सुपारी ली जाती है, जो जायफल जैसी होती है; उसके छोटे–छोटे टुकड़े करके मुँह में रखकर चबाते हैं, फिर पान की पत्तियों के साथ।
- तरीका पहचानिए: अनजानी चीज़ को पाठक की जानी–पहचानी चीज़ से जोड़ना: खजूर का पेड़, मानव सिर, अंगूर–लता, जायफल।
इब्न बतूता और भारतीय शहर (भाग 5.2)
- अवसरों से भरे शहर: इब्न बतूता ने उपमहाद्वीप के शहरों को उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास ज़रूरी इच्छा, साधन और कौशल था।
- शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे; कभी–कभी युद्धों और अभियानों से विध्वंस होता था।
- ज़्यादातर शहरों में भीड़–भाड़ वाली सड़कें और चमक–दमक वाले, रंगीन बाज़ार थे, जो तरह–तरह की वस्तुओं से भरे रहते थे।
- दिल्ली और दौलताबाद: इब्न बतूता दिल्ली को बड़ा शहर, विशाल आबादी वाला और भारत में सबसे बड़ा बताता है। दौलताबाद (महाराष्ट्र में) भी कम नहीं था, आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।
- स्रोत 8 (देहली): तत्कालीन ग्रंथों में दिल्ली को अकसर “देहली” लिखा गया। इब्न बतूता का वर्णन:
- शहर के चारों ओर की प्राचीर अतुलनीय है; दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है (किताब का कोष्ठक: एक हाथ लगभग 20 इंच)।
- प्राचीर के भीतर रात के पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष हैं, और खाद्यसामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र और घेरेबंदी की मशीनें रखने के भंडारगृह।
- प्राचीर के भीतरी भाग में घुड़सवार और पैदल सैनिक शहर के एक छोर से दूसरे तक आते–जाते हैं; खिड़कियाँ शहर की ओर खुलती हैं।
- निचला भाग पत्थर का, ऊपरी भाग ईंटों का; पास–पास बनी कई मीनारें।
- शहर के अट्ठाईस द्वार हैं, जिन्हें दरवाज़ा कहते हैं: बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल; मांडवी दरवाज़े के भीतर अनाज मंडी; गुल दरवाज़े की बगल में फलों का बगीचा।
- एक बेहतरीन क़ब्रगाह, जहाँ क़ब्रों पर गुंबद या मेहराब हैं, और फूल सब मौसमों में खिले रहते हैं।
- बाज़ार, केवल लेन–देन की जगह नहीं: बाज़ार सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कम से कम कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जगह तय थी।
- स्रोत 9 (बाज़ार में संगीत), दौलताबाद:
- पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार, ताराबबाद, सबसे विशाल और सुंदर बाज़ारों में से एक। हर दुकान का एक दरवाज़ा मालिक के घर में खुलता है।
- दुकानें कालीनों से सजी हैं; बीच में झूला है जिस पर गायिका बैठती है, और सेविकाएँ उसे झुलाती हैं।
- बाज़ार के बीच एक विशाल गुंबद है, जहाँ हर गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख अपने सेवकों और दासों के साथ बैठते हैं, और गायिकाएँ झुंडों में आकर गाती और नाचती हैं।
- बाज़ार में इबादत के लिए मस्जिदें भी हैं। एक हिंदू शासक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतरता और गायिकाएँ उसके सामने गातीं; कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे।
- शहरों की समृद्धि गाँवों से: इब्न बतूता की रुचि शहरों की समृद्धि समझाने में अधिक नहीं थी, पर इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया है कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों का अधिशेष लेकर पाते थे।
- उसके अनुसार भारतीय कृषि इतनी उत्पादक इसलिए थी कि मिट्टी उपजाऊ थी, जिससे किसान वर्ष में दो फसलें उगा पाते थे।
- व्यापार का जाल: उपमहाद्वीप व्यापार और वाणिज्य के अंतर एशियाई तंत्रों से अच्छी तरह जुड़ा था।
- भारतीय माल की मध्य और दक्षिण–पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी, जिससे शिल्पकारों और व्यापारियों को भारी मुनाफ़ा होता था।
- भारतीय कपड़ों की, ख़ासकर सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की, बहुत माँग थी। महीन मलमल की कई किस्में इतनी महँगी थीं कि उन्हें केवल अमीर वर्ग और बहुत धनी लोग पहन पाते थे।
- इक़त बुनाई की अभिरचनाएँ उपमहाद्वीप और दक्षिण–पूर्व एशिया के कई तटीय उत्पादन केंद्रों में अपनाई गईं और निखारी गईं।
संचार की एक अनूठी प्रणाली (भाग 5.3)
- व्यापारियों के लिए राज्य के उपाय: राज्य व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष उपाय करता था। लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह बने थे।
- डाक से चकित: इब्न बतूता डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ।
- इससे व्यापारी लंबी दूरी तक सूचना भेज सकते थे, उधार प्रेषित कर सकते थे, और कम सूचना पर माल भी भेज सकते थे।
- सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, पर गुप्तचरों की ख़बरें डाक व्यवस्था से सुल्तान तक मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।
- स्रोत 10 (घोड़े पर और पैदल): भारत में दो प्रकार की डाक व्यवस्था है:
- अश्व डाक, उलुक: हर चार मील की दूरी पर रखे राजकीय घोड़ों से चलती है।
- पैदल डाक, दावा: प्रति मील तीन अवस्थान होते हैं; दावा एक मील का एक–तिहाई होता है।
- दौड़ कैसे चलती है: मंडपों में लोग तैयार बैठे रहते हैं। हर एक के पास दो हाथ लंबी छड़ होती है, जिसके ऊपर ताँबे की घंटियाँ लगी होती हैं। संदेशवाहक एक हाथ में पत्र और दूसरे में घंटियों वाली छड़ लेकर पूरी तेज़ी से दौड़ता है। घंटियों की आवाज़ सुनकर मंडप के लोग तैयार हो जाते हैं; उनमें से एक पत्र लेकर छड़ हिलाते हुए अगले दावा तक दौड़ता है। पत्र अपने गंतव्य तक पहुँचने तक यही क्रम चलता रहता है।
- पैदल डाक अश्व डाक से तेज़ होती है, और इसका प्रयोग अकसर खुरासान के फल ढोने में होता है, जो भारत में बहुत पसंद किए जाते हैं।
दो तरह की डाक
- हर चार मील पर राजकीय घोड़े
- प्रति मील तीन अवस्थान
- दो हाथ लंबी छड़, ऊपर ताँबे की घंटियाँ
- अश्व डाक से तेज़
- खुरासान के फल ढोने में काम आती
- एक विचित्र देश? (बॉक्स, पृष्ठ 129): 1440 के दशक में लिखा अब्दुर रज़्ज़ाक़ का यात्रा वृत्तांत भावनाओं और धारणाओं का रोचक मिश्रण है।
- केरल में कालीकट (आधुनिक कोज़ीकोड) बंदरगाह पर उसने जो देखा, उसकी प्रशंसा नहीं की: “यहाँ ऐसे लोग बसे हुए थे जिनकी कल्पना मैने कभी भी नहीं की थी।” इन लोगों को उसने एक ‘विचित्र देश’ बताया।
- आगे वह मंगलौर आया और पश्चिमी घाट पार किया। मंगलौर से नौ मील के भीतर उसने एक पूजा–स्थल देखा जिसे वह “पूरे विश्व में अतुलनीय” कहता है: वर्गाकार, हर भुजा लगभग दस गज, ऊँचाई पाँच गज़, चार द्वार–मंडप, पूरा ढले हुए काँसे से ढका।
- प्रवेश के द्वार–मंडप में सोने की आदमकद, मानव आकृति जैसी मूर्ति थी, जिसकी आँखों में माणिक इतनी चतुराई से लगे थे कि लगता था मूर्ति देख सकती है। वह लिखता है: “इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने!”
- यानी एक ही यात्री एक जगह नापसंदगी और दूसरी जगह गहरी प्रशंसा, दोनों दर्ज करता है।
8. बर्नियर का “अपविकसित” पूर्व: ज़मीन, किसान, शहर और कारीगर★★
किताब का भाग 6 (बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व), पृष्ठ 130–134 · प्रश्नावली में: प्रश्न 8, 3, 9
- एक भिन्न बौद्धिक परंपरा: इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करना तय किया जिसने अपने अनूठेपन से उसे प्रभावित और उत्सुक किया। बर्नियर अलग बुद्धिजीवी परंपरा से था।
- वह भारत में देखी हर चीज़ की तुलना और भिन्नता सामान्य रूप से यूरोप और ख़ास तौर पर फ्रांस की स्थितियों से दिखाने में लगा रहता था, विशेषकर उन स्थितियों की जिन्हें उसने अवसादकारी पाया।
- उसका इरादा नीति–निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना था, ताकि वे ऐसे निर्णय लें जिन्हें वह “सही” मानता था।
- ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर: गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि और गहन चिंतन के लिए उल्लेखनीय ग्रंथ। इसमें मुग़लों के इतिहास को एक तरह के वैश्विक ढाँचे में रखने का प्रयास है।
- वह मुग़लकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा, और सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करता रहा।
- उसका चित्रण द्वि–विपरीतता पर टिका है: भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में दिखाया गया, या कुछ इतिहासकारों के शब्दों में यूरोप का “विपरीत”।
- जो भिन्नताएँ उसे दिखीं, उन्हें उसने पदानुक्रम में सजाया, जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का लगे।
भूमि स्वामित्व का प्रश्न (भाग 6.1)
- बर्नियर की मूल बात: उसके अनुसार भारत और यूरोप के बीच एक मूल भिन्नता थी, भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव।
- वह निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास रखता था, और भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य और उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक मानता था।
- उसे लगा कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था, जो उसे अपने अमीरों में बाँटता था, और इसके अर्थव्यवस्था और समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम होते थे।
- ऐसी धारणा केवल बर्नियर की नहीं थी; सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ज़्यादातर यात्रियों के वृत्तांतों में मिलती है।
- उसका तर्क, एक कड़ी से दूसरी तक: राजकीय भूस्वामित्व के कारण भूधारक अपनी भूमि बच्चों को नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन बनाए रखने और बढ़ाने के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे।
- निजी भूस्वामित्व न होने से पश्चिमी यूरोप जैसे “बेहतर” भूधारकों का वर्ग नहीं उभरा, जो भूमि के रखरखाव और उसे बेहतर बनाने के प्रति सजग रहता।
- नतीजा, उसके अनुसार: कृषि का एक–सा विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न, और शासक वर्ग को छोड़कर समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में लगातार पतन।
बर्नियर का तर्क: राजकीय भूस्वामित्व से पतन तक
- कृषि का विनाश
- किसानों का असीम उत्पीड़न
- जीवन स्तर में लगातार गिरावट
- व्यापक गरीबी (बॉक्स, पृष्ठ 130): सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आया डच यात्री पेलसर्ट भी बर्नियर की तरह लोगों की व्यापक गरीबी देखकर अचंभित था। राज्य को उत्तरदायी ठहराते हुए वह लिखता है: “कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।”
- स्रोत 11 (ग़रीब किसान):
- साम्राज्य के कई विशाल ग्रामीण अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत हैं; खेती अच्छी नहीं, आबादी कम।
- कृषियोग्य भूमि का बड़ा हिस्सा भी श्रमिकों के अभाव में बिना खेती के रह जाता है; कई श्रमिक गवर्नरों के बुरे व्यवहार से मर जाते हैं।
- लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न कर पाने पर गरीबों से जीविका के साधन छीन लिए जाते हैं, और उनके बच्चे दास बनाकर ले जाए जाते हैं। इस निरंकुशता से हताश होकर किसान गाँव छोड़ देते हैं।
- किताब बताती है कि यहाँ बर्नियर राज्य और समाज पर यूरोप में चल रहे विवादों में भाग ले रहा था। वह चाहता था कि उसका विवरण यूरोप में उन लोगों के लिए चेतावनी बने जो निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को नहीं मानते थे।
- बीच का वर्ग नहीं: बर्नियर भारतीय समाज को दरिद्र लोगों का एक–सा जनसमूह बताता है, जिसे एक बहुत अमीर और शक्तिशाली, पर अल्पसंख्यक, शासक वर्ग अपने अधीन रखता है। उसके अनुसार सबसे गरीब और सबसे अमीर के बीच नाम मात्र को भी कोई सामाजिक समूह नहीं था: “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।”
- धारणा और पक्की हुई: किताब के अनुसार उन्नीसवीं शताब्दी के कुछ चित्रों ने भी अपरिवर्तनशील ग्रामीण समाज की धारणा को और पक्का किया।
- मुग़ल साम्राज्य, बर्नियर की आँखों से: उसका राजा “भिखारियों और क्रूर लोगों” का राजा; शहर और नगर विनष्ट और “खराब हवा” से दूषित; खेत “झाड़ीदार” और “घातक दलदल” से भरे; और इन सबका एक ही कारण, राजकीय भूस्वामित्व।
- स्रोत 12 (यूरोप के लिए एक चेतावनी): बर्नियर चेताता है कि अगर यूरोपीय शासकों ने मुग़ल ढाँचा अपनाया, तो उनके अच्छी तरह जुते, बसे, समृद्ध और फलते–फूलते राज्य नहीं रहेंगे। वे रेगिस्तान और निर्जन स्थानों के, भिखारियों और क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे; बड़े शहर खराब हवा से रहने लायक नहीं रहेंगे, और खेत झाड़ियों और घातक दलदल से भर जाएँगे।
बर्नियर की बात कहाँ तक सही?
- मुग़ल दस्तावेज़ क्या कहते हैं: किताब के अनुसार एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।
- सोलहवीं शताब्दी में अकबर के सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताते हैं: प्रजा को सुरक्षा देने के बदले राजा की माँग, न कि अपनी भूमि पर लगान।
- संभव है कि यूरोपीय यात्री इसे लगान मानते रहे, क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी। असल में यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।
- पश्चिमी विचारकों पर असर: अठारहवीं शताब्दी से बर्नियर के विवरणों ने पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया।
- मॉन्टेस्क्यू (फ्रांसीसी दार्शनिक) ने उसके वृत्तांत से प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत विकसित किया: एशिया में शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे, और प्रजा दासता और गरीबी में रहती थी। आधार यह कि सारी भूमि राजा की थी और निजी संपत्ति थी ही नहीं; राजा और उसके अमीरों को छोड़ हर व्यक्ति मुश्किल से गुज़र–बसर करता था।
- उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने इसे एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया: उपनिवेशवाद से पहले भारत (और दूसरे एशियाई देशों) में अधिशेष राज्य लेता था; समाज बहुत–से स्वायत्त और (भीतर से) समतावादी ग्रामीण समुदायों से बना था, जिन पर दरबार का नियंत्रण था, और अधिशेष मिलता रहे तो उनकी स्वायत्तता का सम्मान होता था। इसे एक निष्क्रिय प्रणाली माना गया।
- ग्रामीण समाज की असली तस्वीर: किताब कहती है कि यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था:
- एक ओर भूमि पर उच्चाधिकार रखने वाले बड़े ज़मींदार;
- दूसरी ओर “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार);
- बीच में किराए का श्रम लगाने वाला और माल उत्पादन करने वाला बड़ा किसान, और मुश्किल से गुज़ारे लायक उपजाने वाले छोटे किसान।
एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई (भाग 6.3)
- उसके अपने विवरण में दरारें: मुग़ल राज्य को निरंकुश दिखाने की उसकी तन्मयता साफ़ है, फिर भी उसके विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।
- एक ओर वह कहता है कि शिल्पकारों को अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था; इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था।
- दूसरी ओर वह मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं, क्योंकि उत्पाद सोने और चाँदी के बदले निर्यात होते थे।
- वह लंबी दूरी के विनिमय में लगे एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के होने को भी रेखांकित करता है।
- स्रोत 13 (एक भिन्न सामाजिक–आर्थिक परिदृश्य):
- देश का ज़्यादातर भू–भाग अत्यधिक उपजाऊ है। बंगाल मिस्र से चावल, मकई और जीवन की दूसरी ज़रूरी वस्तुओं में ही नहीं, रेशम, कपास और नील जैसी वाणिज्यिक वस्तुओं में भी कहीं आगे है।
- भारत के कई भागों में जनसंख्या पर्याप्त है और खेती अच्छी होती है।
- शिल्पकार (जिसे बर्नियर “मूल रूप से आलसी” कहता है) ज़रूरत से गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र और तरह–तरह के रेशमी और सूती वस्त्र बनाता है, जो देश में भी काम आते हैं और विदेश भी जाते हैं।
- पूरे विश्व में घूमने के बाद सोना और चाँदी भारत में आकर कुछ हद तक खो जाता है।
- शिल्पकारों की दक्षता: पन्ने और माणिक जड़ा सोने का चम्मच मुग़लकालीन शिल्पकारों की ख़ास दक्षता का उदाहरण है।
- शहर, “शिविर नगर”? सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
- फिर भी बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है: ऐसे नगर जो राजकीय शिविर पर टिके थे, दरबार के आने पर बसते और उसके जाने पर तेज़ी से उजड़ते; जिनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यवहार्य नहीं थी और जो राजकीय प्रश्रय पर आश्रित थे।
- किताब के अनुसार यह भी भूस्वामित्व की तरह एक अतिसरलीकृत चित्रण था। असल में हर तरह के नगर थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान। इनका होना समृद्ध व्यापारिक समुदायों और व्यावसायिक वर्गों के होने का सूचक है।
- व्यापारी संगठित थे: व्यापारी अकसर मज़बूत सामुदायिक या बंधुत्व के संबंधों से जुड़े थे, और अपनी जाति और व्यावसायिक संस्थाओं के ज़रिए संगठित रहते थे।
- पश्चिमी भारत में ऐसे समूह महाजन कहलाते थे, और उनका मुखिया सेठ।
- अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय का मुखिया करता था, जिसे नगर सेठ कहते थे।
- दूसरे शहरी समूह: व्यावसायिक वर्ग, जैसे चिकित्सक (हकीम या वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक। कई राजकीय प्रश्रय पर निर्भर थे; कई दूसरे संरक्षकों की या भीड़–भाड़ वाले बाज़ार में आम लोगों की सेवा करके जीते थे।
- स्रोत 14 (राजकीय कारखाने): किताब के अनुसार संभवत: बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देता है।
- बड़े कक्ष, जिन्हें कारखाना या शिल्पकारों की कार्यशाला कहते हैं: एक में मास्टर की देखरेख में कसीदाकार; दूसरे में सुनार; तीसरे में चित्रकार; चौथे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले; पाँचवें में बढ़ई, खरादी, दर्जी और जूते बनाने वाले; छठे में रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले।
- शिल्पकार हर सुबह आते हैं, दिन भर काम करते हैं और शाम को घर लौटते हैं। बर्नियर के अनुसार इसी “निश्चेष्ट नियमित ढंग” से समय बीतता है, और कोई अपने जन्म की स्थितियों को बेहतर बनाना नहीं चाहता।
बर्नियर ने क्या कहा, किताब क्या दिखाती है
- सम्राट सारी भूमि का स्वामी
- दरिद्रों का एक–सा समाज, बीच का कोई वर्ग नहीं
- शहर केवल शिविर नगर
- उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख
- अबुल फ़ज़्ल: राजस्व राजत्व का पारिश्रमिक, उपज पर कर
- ज़मींदार, बड़े और छोटे किसान, बलाहार
- लगभग 15% लोग नगरों में; हर तरह के नगर; महाजन, सेठ, नगर सेठ
- बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं; समृद्ध व्यापारी
9. महिलाएँ: दासियाँ, सती और श्रमिक★★
किताब का भाग 7 (महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक), पृष्ठ 135–136 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 5
- किसकी नज़र से: लिखित वृत्तांत छोड़ने वाले यात्री सामान्यतया पुरुष थे, जिन्हें उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति रुचिकर और कभी–कभी जिज्ञासा भरी लगती थी। कभी–कभी वे सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” स्थिति मान लेते थे।
इब्न बतूता और दास प्रथा
- बाज़ार और भेंट: बाज़ारों में दास किसी भी दूसरी वस्तु की तरह खुले आम बिकते थे, और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे।
- सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक को भेंट देने के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे।
- मुल्तान पहुँचकर उसने गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा” भेंट किए।
- नसीरुद्दीन नाम के धर्मोपदेशक के प्रवचन से प्रसन्न होकर मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसे “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास” दिए।
- दासों में विभेद:
- सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; सुल्तान की बहन की शादी पर इब्न बतूता ने उनके प्रदर्शन का खूब आनंद लिया।
- सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था।
- दास सामान्यत: घरेलू श्रम में लगाए जाते थे; पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में इब्न बतूता ने उनकी सेवा ख़ास तौर पर अपरिहार्य पाई।
- दासों की, ख़ासकर घरेलू श्रम वाली दासियों की, कीमत बहुत कम होती थी; जो परिवार रख सकते थे, वे ज़्यादातर कम से कम एक या दो रखते थे।
- स्रोत 15 (दासियाँ): इब्न बतूता के अनुसार सम्राट हर बड़े–छोटे अमीर के साथ अपना एक दास रखता था, जो उस अमीर की मुखबिरी करता। वह महिला सफ़ाई कर्मचारियों को भी नियुक्त करता था जो बिना बताए घरों में चली जाती थीं, और दासियाँ अपनी जानकारी उन्हें दे देती थीं। ज़्यादातर दासियाँ हमलों और अभियानों में बलपूर्वक लाई जाती थीं।
बर्नियर और सती प्रथा
- क्यों चुना यह विषय: सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था। इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना।
- उसने क्या देखा: उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
- स्रोत 16 (सती बालिका): किताब इसे बर्नियर के वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है।
- लाहौर में उसने एक अल्पवयस्क विधवा की बलि देखी, जिसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी।
- बच्ची काँपते हुए बुरी तरह रो रही थी; तीन या चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत की मदद से, उस अनिच्छुक बच्ची को ज़बरदस्ती घातक स्थल की ओर ले गए, उसके हाथ–पैर बाँधे ताकि वह भाग न सके, और उसे ज़िंदा जला दिया गया।
- बर्नियर लिखता है कि वह अपनी भावनाएँ दबा नहीं पा रहा था।
महिलाएँ श्रमिक भी थीं
- सती से आगे का जीवन: महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था।
- उनका श्रम कृषि में और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था।
- व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में हिस्सा लेती थीं, और कभी–कभी वाणिज्यिक विवाद अदालत तक ले जाती थीं।
- इसलिए किताब के अनुसार यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को घरों के ख़ास हिस्सों तक सीमित रखा जाता था।
अध्याय का समापन
- वृत्तांतों की सीमा: यात्रा वृत्तांत इन शताब्दियों के पुरुषों और महिलाओं के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं, पर सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या एक ख़ास दृष्टिकोण से देखे जाते हैं। इन्हें पढ़ते हुए यह ध्यान रखना ज़रूरी है।
- अनकही यात्राएँ: उपमहाद्वीप के जिन पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) ने समुद्र और पर्वत पार करके बाहर के क्षेत्रों में यात्राएँ कीं, उनके अनुभव अपेक्षाकृत अज्ञात हैं: उन्होंने क्या देखा–सुना, दूर के लोगों से उनके संबंध कैसे बने, वे कौन–सी भाषाएँ बोलते थे। किताब उम्मीद करती है कि आने वाले वर्षों में इतिहासकार इन प्रश्नों पर ध्यान देंगे।
10. आँकड़े और साल एक जगह★
अध्याय के साल और संख्याएँ
| साल या संख्या | क्या | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सन् 973 | अल–बिरूनी का जन्म, ख़्वारिज़्म (आज का उज़्बेकिस्तान) में | 116 |
| आठवीं शताब्दी से | संस्कृत के खगोल–विज्ञान, गणित और चिकित्सा के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद होने लगा | 116 |
| 1017 ई. | सुल्तान महमूद के ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद अल–बिरूनी बंधक के रूप में ग़ज़नी आया | 116 |
| सत्तर वर्ष | पृष्ठ 116 के अनुसार मृत्यु के समय अल–बिरूनी की आयु; तब तक वह ग़ज़नी में ही रहा। पृष्ठ 137 की काल-रेखा उसके वर्ष 973–1048 देती है, जिससे आयु लगभग 75 वर्ष बनती है | 116, 137 |
| अस्सी | किताब–उल–हिन्द के अध्याय | 117 |
| 1500 ई. से पहले | भारत में अल–बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा | 117 |
| लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व | जिस प्राचीन फ़ारसी शब्द से “हिंदू” शब्द निकला, उसका समय | 117 |
| बाईस वर्ष | तैंजियर से निकलते समय इब्न बतूता की उम्र | 118 |
| 1332–33 | इब्न बतूता भारत के लिए निकला | 118 |
| 1333 | मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा | 118 |
| 1342 ई. | इब्न बतूता को सुल्तान (मुहम्मद बिन तुग़लक) के दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया गया | 118 |
| अठारह महीने | मालद्वीप में इब्न बतूता क़ाज़ी रहा | 118 |
| 1354 | इब्न बतूता घर लौटा, यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद | 118 |
| 1347 | इब्न बतूता ने चीन से घर लौटने का निश्चय किया | 119 |
| तेरहवीं शताब्दी का अंत | मार्को पोलो ने वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) यात्रा की | 119 |
| 40, लगभग 50, 40, 10 दिन | इब्न बतूता के अनुसार मुल्तान से दिल्ली, सिंध से दिल्ली, दौलताबाद से दिल्ली और ग्वालियर से दिल्ली की यात्रा | 119 |
| 1400 से 1800 | भारत आए यात्रियों ने फ़ारसी में कई यात्रा वृत्तांत लिखे | 121 |
| 1440, 1620 और 1740 के दशक | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी, महमूद वली बल्खी और शेख़ अली हाज़िन की यात्राएँ | 121 |
| लगभग 1500 ई. | पुर्तगाली भारत आए | 122 |
| 1600 ई. के बाद | डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी | 122 |
| कम से कम छह बार | ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर भारत आया | 122 |
| 1656 से 1668 (बारह वर्ष) | फ्रांस्वा बर्नियर भारत में रहा | 122 |
| 1670–71 | बर्नियर के कार्य फ्रांस में छपे; अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में अनुवाद | 123 |
| 1670 से 1725 तक आठ बार; 1684 तक तीन बार | बर्नियर के कार्य फ्रांसीसी में आठ बार और अंग्रेज़ी में तीन बार दोबारा छपे | 123 |
| 1800 से पहले | अरबी और फ़ारसी वृत्तांत सामान्यत: छपते नहीं थे | 123 |
| 1750 के बाद | शेख इतिसमुद्दीन और मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीय यूरोप गए | 123 |
| 216,432 वर्ष | लकड़ी की वह मूर्ति जिसके इतने समय तक बचे रहने की कहानी अल–बिरूनी ने सुनी | 124 |
| चार और चार | प्राचीन फ़ारस के चार सामाजिक वर्ग; अल–बिरूनी के गिनाए चार वर्ण | 124–125 |
| ग्यारह हाथ (एक हाथ लगभग 20 इंच) | इब्न बतूता के अनुसार दिल्ली की प्राचीर की दीवार की चौड़ाई | 127 |
| अट्ठाईस | दिल्ली शहर के द्वार (दरवाज़े) | 127 |
| दो | इब्न बतूता के अनुसार किसान वर्ष में इतनी फसलें उगाते थे | 128 |
| पचास दिन और पाँच दिन | सिंध से दिल्ली की यात्रा, और गुप्तचरों की ख़बरों का डाक से सुल्तान तक पहुँचना | 129 |
| हर चार मील | उलुक (अश्व डाक) के राजकीय घोड़े | 129 |
| प्रति मील तीन अवस्थान | दावा (पैदल डाक); दावा एक मील का एक–तिहाई होता है | 129 |
| दो हाथ | पैदल डाक के संदेशवाहक की छड़ की लंबाई | 129 |
| नौ मील; दस गज और पाँच गज़ | अब्दुर रज़्ज़ाक: मंगलौर से नौ मील के भीतर का पूजा–स्थल, हर भुजा लगभग दस गज, ऊँचाई पाँच गज़ | 129 |
| सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशक | डच यात्री पेलसर्ट उपमहाद्वीप आया | 130 |
| लगभग पंद्रह प्रतिशत | सत्रहवीं शताब्दी में नगरों में रहने वाली जनसंख्या; औसतन पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक | 134 |
| छह | स्रोत 14 में बर्नियर के गिनाए कारखाने के कक्ष | 134 |
| एक लाख टके और दो सौ दास | मुहम्मद बिन तुग़लक ने धर्मोपदेशक नसीरुद्दीन को दिए | 135 |
| बारह वर्ष से अधिक नहीं | लाहौर में बर्नियर की देखी सती बालिका की आयु, उसके विचार में | 135 |
काल-रेखा: कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े (पृष्ठ 137)
| शताब्दी | तिथि | यात्री (कहाँ से) |
|---|---|---|
| दसवीं–ग्यारहवीं | 973–1048 | अल–बिरूनी, पूरा नाम मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल–बिरूनी (उज़्बेकिस्तान से) |
| तेरहवीं | 1254–1323 | मार्को पोलो (इटली से) |
| चौदहवीं | 1304–77 | इब्न बतूता (मोरक्को से) |
| पंद्रहवीं | 1413–82 | अब्द अल–रज़्ज़ाक कमाल अल–दिन इब्न इस्हाक़ अल–समरक़ंदी (समरक़ंद से) |
| पंद्रहवीं | 1466–72 (भारत में बिताए वर्ष) | अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से) |
| सोलहवीं | 1518 (भारत की यात्रा) | दुआर्ते बरबोसा, मृत्यु 1521 (पुर्तगाल से) |
| सोलहवीं | 1562 (मृत्यु का वर्ष) | सयदी अली रेइस (तुर्की से) |
| सोलहवीं | 1536–1600 | अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से) |
| सत्रहवीं | 1626–31 (भारत में बिताए वर्ष) | महमूद वली बल्खी (बल्ख़ से) |
| सत्रहवीं | 1600–67 | पीटर मुंडी (इंग्लैंड से) |
| सत्रहवीं | 1605–89 | ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से) |
| सत्रहवीं | 1620–88 | फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से) |
जिस पंक्ति में तिथि के साथ कोष्ठक में कुछ और नहीं लिखा है, वहाँ तिथियाँ यात्री का जीवन काल बताती हैं, यानी जन्म से मृत्यु तक के वर्ष।
11. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अल–बिरूनी उज़्बेकिस्तान आया था (पृष्ठ 115 पर यही छपा है) | वह उज़्बेकिस्तान से आया था: उसका जन्म ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है | 115, 116 |
| अल–बिरूनी अपनी इच्छा से ग़ज़नी गया | 1017 ई. में सुल्तान महमूद के ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया; बाद में उसे यह शहर पसंद आने लगा | 116 |
| अल–बिरूनी यूनानी भाषा जानता था | वह यूनानी नहीं जानता था; प्लेटो और दूसरे यूनानी दार्शनिकों के काम उसने अरबी अनुवादों में पढ़े | 116 |
| किताब–उल–हिन्द संस्कृत या फ़ारसी में लिखी गई | यह अरबी में है, सरल और स्पष्ट भाषा में, और अस्सी अध्यायों में बँटी है | 117 |
| “हिंदू” शब्द शुरू से एक धर्म का नाम था | यह सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला; किताब के अनुसार इनमें से कोई भी शब्द धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था | 117 |
| अल–बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता भी मान ली | उसने ब्राह्मणवादी व्याख्या मानी, पर अपवित्रता की मान्यता को प्रकृति के नियमों के विरुद्ध बताकर नहीं माना | 124–125 |
| इब्न बतूता दिल्ली में हमेशा क़ाज़ी बना रहा | कई वर्ष क़ाज़ी रहा, फिर सुल्तान का विश्वास खोकर कारागार गया; सेवा में लौटकर 1342 ई. में सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश मिला | 118 |
| भारत से मोहित होकर संन्यासी बनने वाला शेख़ अली हाज़िन था | वह महमूद वली बल्खी था (1620 के दशक); हाज़िन (1740 के दशक) निराश हुआ और भारत से घृणा भी करने लगा | 121 |
| बर्नियर के वृत्तांत 1800 के बाद छपे | वे फ्रांस में 1670–71 में छपे; 1800 से पहले सामान्यत: न छपने वाले वृत्तांत अरबी और फ़ारसी के थे | 123 |
| ताराबबाद दिल्ली का बाज़ार था | ताराबबाद दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार था | 128 |
| उलुक पैदल डाक है और दावा अश्व डाक | उलुक अश्व डाक है (हर चार मील पर राजकीय घोड़े); दावा पैदल डाक है (प्रति मील तीन अवस्थान), और पैदल डाक अश्व डाक से तेज़ होती है | 129 |
| मुग़ल दस्तावेज़ बताते हैं कि राज्य ही सारी भूमि का स्वामी था | एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा नहीं बताता; अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ कहते हैं | 132 |
| भूमि राजस्व एक तरह का लगान या भूमिकर था | किताब के अनुसार यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था | 132 |
| प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया | यह मॉन्टेस्क्यू ने दिया; मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी में एशियाई उत्पादन शैली का सिद्धांत दिया | 132 |
| मुग़ल शहर सचमुच केवल “शिविर नगर” थे | यह बर्नियर का कहना है, जिसे किताब अतिसरलीकृत मानती है; उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थान, सभी तरह के नगर थे | 134 |
| सत्रहवीं शताब्दी में भारत में नगरों में रहने वालों का अनुपात पश्चिमी यूरोप से कम था | लगभग पंद्रह प्रतिशत लोग नगरों में रहते थे, जो औसतन पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक था | 134 |
| बर्नियर के अनुसार सभी महिलाएँ अपनी इच्छा से सती होती थीं | उसके अनुसार कुछ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगाती थीं, पर दूसरों को बाध्य किया जाता था | 135 |
12. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
किताब की प्रश्नावली, पृष्ठ 138–139
उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)
प्रश्न 1. किताब–उल–हिन्द पर एक लेख लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब–उल–हिन्द ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) में जन्मे अल–बिरूनी की कृति है, जो ग्यारहवीं शताब्दी के उपमहाद्वीप के बारे में बताती है।
भाषा और आकार: यह अरबी में है, इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है, और यह अस्सी अध्यायों में बँटा एक विस्तृत ग्रंथ है।
विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून और मापतंत्र विज्ञान।
बनावट: सामान्यत: (हमेशा नहीं) हर अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। कुछ विद्वान इस “लगभग ज्यामितीय संरचना” का एक मुख्य कारण उसके गणित की ओर झुकाव को मानते हैं।
जानकारी कहाँ से: ब्राह्मण विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर सीखी संस्कृत, और वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियाँ और मनुस्मृति।
किसके लिए: शायद उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों के लोगों के लिए; स्रोत 1 के अनुसार हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता के लिए।
इसकी एक सीमा भी है: जाति व्यवस्था का विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे नियामक संस्कृत ग्रंथों पर टिका है। (पृष्ठ 116–117, 124–125)
प्रश्न 2. इब्न बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर बताइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों बाहर से आए थे, पर चौदहवीं शताब्दी का इब्न बतूता अचरज से नई चीज़ें दर्ज करता है, जबकि सत्रहवीं शताब्दी का बर्नियर हर चीज़ को यूरोप से तौलकर परखता है।
इब्न बतूता: वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था। जो अनूठा लगा, उसका वर्णन किया: नारियल, पान, दिल्ली की प्राचीर, संगीत का बाज़ार, डाक व्यवस्था। उस समय के शहरी केंद्रों की कहानियों में अपरिचित बातें इसलिए विशेष रूप से रेखांकित की जाती थीं कि पढ़ने–सुनने वाले प्रभावित हों।
बर्नियर: वह भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था। भारत में देखी हर चीज़ की तुलना यूरोप, ख़ासकर फ्रांस से करता, और लगभग हर दृष्टांत में भारत की स्थिति दयनीय बताता। उसने भारत को यूरोप का “विपरीत” दिखाया (द्वि–विपरीतता)।
उद्देश्य का अंतर: इब्न बतूता की कहानियाँ शासक के आदेश पर इब्न जुज़ाई ने लिखीं, ताकि पाठकों का मनोरंजन और ज्ञान दोनों हों; बर्नियर नीति–निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करना चाहता था।
यानी एक वर्णन करता है, दूसरा भिन्नताओं को ऊँच–नीच के क्रम में रखकर निष्कर्ष निकालता है। (पृष्ठ 118–123, 126–130)
प्रश्न 3. बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केंद्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है, पर किताब के साक्ष्य, और उसके अपने कुछ विवरण, एक भरी–पूरी शहरी दुनिया दिखाते हैं।
बर्नियर का चित्र: ऐसे नगर जो राजकीय शिविर पर टिके थे, दरबार के आने पर बसते और जाने पर तेज़ी से उजड़ते; जिनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यवहार्य नहीं थी। उसके अनुसार शहर विनष्ट और “खराब हवा” से दूषित थे।
किताब का आकलन: यह अतिसरलीकृत चित्रण है। सत्रहवीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोग नगरों में रहते थे, जो औसतन पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक था।
हर तरह के नगर: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थान।
शहरी समाज: महाजन और उनके मुखिया सेठ, अहमदाबाद जैसे शहरों में नगर सेठ; चिकित्सक, अध्यापक, अधिवक्ता, चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक; और बर्नियर के बताए राजकीय कारखाने (स्रोत 14)।
इसलिए बर्नियर के वृत्तांत से शहरों का चित्र अधूरा उभरता है, जिसे दूसरे साक्ष्यों से जाँचना पड़ता है। (पृष्ठ 132–134)
प्रश्न 4. इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: इब्न बतूता के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में दास बाज़ारों में किसी भी दूसरी वस्तु की तरह खुले आम बिकते थे, और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे।
भेंट के रूप में: सिंध पहुँचकर उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे; मुल्तान के गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा” दिया। सुल्तान ने धर्मोपदेशक नसीरुद्दीन को “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास” दिए।
दासों में विभेद: कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; कुछ से सुल्तान अपने अमीरों की जासूसी करवाता था (स्रोत 15)।
घरेलू श्रम: दास सामान्यत: घरेलू काम करते थे, और पालकी या डोला ढोते थे। दासों की, ख़ासकर घरेलू श्रम वाली दासियों की, कीमत बहुत कम होती थी; जो परिवार उन्हें रख सकते थे, उनमें से ज़्यादातर कम से कम एक या दो रखते थे।
कहाँ से आते थे: ज़्यादातर दासियाँ हमलों और अभियानों में बलपूर्वक लाई जाती थीं।
इन साक्ष्यों से पता चलता है कि दास प्रथा आम थी और दासों के बीच काफ़ी विभेद था। (पृष्ठ 135)
प्रश्न 5. सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
उत्तर देखिए
उत्तर: बर्नियर जैसे यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था, इसलिए उसने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना।
इच्छा या ज़बरदस्ती: उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
विधवा की कम उम्र: लाहौर में उसने जिस विधवा की बलि देखी, उसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी (स्रोत 16)।
डर और विवशता: बच्ची काँपते हुए बुरी तरह रो रही थी; तीन या चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत की मदद से, उसे ज़बरदस्ती घातक स्थल की ओर ले गए और लकड़ियों पर बैठाया।
क्रूरता: उसके हाथ–पैर बाँध दिए गए ताकि वह भाग न सके, और उसे ज़िंदा जला दिया गया। बर्नियर लिखता है कि वह अपनी भावनाएँ दबा नहीं पा रहा था।
किताब इस विवरण को बर्नियर के वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है। (पृष्ठ 135)
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)
प्रश्न 6. जाति व्यवस्था के संबंध में अल–बिरूनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: ग्यारहवीं शताब्दी के विद्वान अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था को तीन तरह से समझाया: दूसरे समाजों से तुलना करके, संस्कृत ग्रंथों के वर्ण–विवरण के सहारे, और अपवित्रता की मान्यता पर सवाल उठाकर।
1. दूसरे समाजों से तुलना
उसने दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजे। उसने लिखा कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी: “घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार।”
इस तुलना से वह दिखाना चाहता था कि ऐसे सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे। साथ ही उसने बताया कि इस्लाम में सभी लोग समान माने जाते थे, और उनमें भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में थी।
2. ग्रंथों के आधार पर चार वर्ण (स्रोत 5)
ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न माने गए, और हिंदू उन्हें “मानव जाति में सबसे उत्तम” मानते थे; क्षत्रिय कंधों और हाथों से, जिनका दर्जा ब्राह्मणों से बहुत नीचे नहीं था; वैश्य जंघाओं से; शूद्र चरणों से।
उसके अनुसार अंतिम दो वर्गों में अधिक अंतर नहीं था; लेकिन वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में, समान घरों में मिल–जुलकर रहते थे।
3. अपवित्रता की मान्यता से इनकार
ब्राह्मणवादी व्याख्या मानते हुए भी उसने अपवित्रता की मान्यता नहीं मानी। उसके अनुसार अपवित्र हुई हर वस्तु अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है: सूर्य हवा को स्वच्छ करता है, और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है।
ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता। इसलिए उसके अनुसार जाति व्यवस्था में छिपी अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।
4. व्याख्या की सीमा
उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित था, जिनमें नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे।
वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी। अंत्यज (“व्यवस्था से परे”) कहलाने वाले लोगों से सामान्यतया किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी; वे अक्सर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र का हिस्सा थे।
निष्कर्ष: अल–बिरूनी की व्याख्या तुलना करने वाली और कुछ हद तक आलोचनात्मक थी, पर ग्रंथों पर टिकी होने के कारण वह समाज की असली, कम कड़ी तस्वीर पूरी तरह नहीं दिखाती। (पृष्ठ 124–125)
प्रश्न 7. क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केंद्रों में जीवन–शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्न बतूता का वृत्तांत सहायक है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, काफ़ी हद तक। चौदहवीं शताब्दी के उपमहाद्वीप के शहरों के बारे में इब्न बतूता का वृत्तांत बहुत जानकारी देता है, पर उसे पढ़ते हुए उसकी सीमाएँ भी ध्यान में रखनी चाहिए।
1. शहरों का आम चित्र
उसके अनुसार शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे, हालाँकि कभी–कभी युद्धों और अभियानों से उनका विध्वंस भी होता था। ज़्यादातर शहरों में भीड़–भाड़ वाली सड़कें और चमक–दमक वाले, रंगीन बाज़ार थे, जो तरह–तरह की वस्तुओं से भरे रहते थे।
उसे ये शहर उन लोगों के लिए अवसरों से भरे लगे जिनके पास ज़रूरी इच्छा, साधन और कौशल था।
2. दिल्ली और दौलताबाद का ब्योरा
वह दिल्ली को भारत का सबसे बड़ा शहर बताता है, और दौलताबाद को ऐसा शहर जो आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।
स्रोत 8 में दिल्ली की प्राचीर का बारीक वर्णन है: दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी; भीतर पहरेदारों के कक्ष और खाद्यसामग्री, हथियार और बारूद के भंडारगृह; निचला भाग पत्थर का, ऊपरी ईंटों का; अट्ठाईस द्वार, जैसे बदायूँ दरवाज़ा, मांडवी दरवाज़ा (भीतर अनाज मंडी) और गुल दरवाज़ा (बगल में फलों का बगीचा); और एक बेहतरीन क़ब्रगाह।
3. बाज़ार: सामाजिक जीवन के केंद्र
ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन की जगह तय थी।
दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद के वर्णन (स्रोत 9) से पता चलता है कि हिंदू शासकों में से एक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतरकर आता और गायिकाएँ उसके सामने गाती थीं; कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे।
4. शहरों के पीछे की अर्थव्यवस्था
उपजाऊ मिट्टी के कारण किसान वर्ष में दो फसलें उगाते थे। इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया है कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों के अधिशेष से पाते थे।
भारतीय कपड़ों की मध्य और दक्षिण–पूर्व एशिया में बहुत माँग थी; लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह थे, और डाक व्यवस्था से व्यापारी सूचना, उधार और माल भेज सकते थे।
5. सीमाएँ
उसने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया, और उस समय के शहरी केंद्रों की कहानियों में भी अपरिचित बातें विशेष रूप से रेखांकित की जाती थीं, ताकि पाठक प्रभावित हों। इसलिए उसके वृत्तांत में अनोखी बातों पर ज़्यादा ज़ोर हो सकता है।
शहरों की समृद्धि का वर्णन करने में उसकी अधिक रुचि नहीं थी, फिर भी इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया है कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों के अधिशेष से पाते थे। किताब याद दिलाती है कि यात्रा वृत्तांत सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए छोड़ देते हैं, या उन्हें एक ख़ास दृष्टिकोण से देखते हैं।
निष्कर्ष: इब्न बतूता का वृत्तांत शहरों के रूप, बाज़ारों और व्यापार की उपयोगी और जीवंत जानकारी देता है, इसलिए सहायक है; पर पूरी तस्वीर के लिए उसे दूसरे साक्ष्यों के साथ पढ़ना चाहिए। (पृष्ठ 126–130, 136)
प्रश्न 8. चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित करने में सक्षम करता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: केवल सीमित हद तक। बर्नियर ग्रामीण समाज के बारे में बहुत कुछ कहता है, पर उसका चित्रण एक ख़ास तर्क को साबित करने के लिए था, इसलिए इतिहासकारों को उसे दूसरे साक्ष्यों से जाँचना पड़ता है।
1. बर्नियर का ग्रामीण चित्र
उसके अनुसार मुग़ल सम्राट सारी भूमि का स्वामी था। भूधारक भूमि अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए उत्पादन बढ़ाने के लिए दूरगामी निवेश नहीं करते थे; नतीजा, उसके अनुसार, कृषि का विनाश और किसानों का असीम उत्पीड़न।
स्रोत 11 में वह रेतीली और बंजर भूमि, श्रमिकों के अभाव में बिना खेती पड़ी भूमि, दास बनाकर ले जाए जाते बच्चों और गाँव छोड़ते किसानों का वर्णन करता है। वह कहता है: “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।”
2. यह चित्र एकतरफ़ा क्यों है
बर्नियर राज्य और समाज पर यूरोप में चल रहे विवादों में भाग ले रहा था, और चाहता था कि उसका विवरण निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने।
एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। अकबर के सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताते हैं; किताब के अनुसार यह उपज पर लगने वाला कर था।
3. इस पर टिके सिद्धांत
मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत से प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत बनाया, और कार्ल मार्क्स ने एशियाई उत्पादन शैली का, जिसमें ग्रामीण समाज को स्वायत्त और समतावादी समुदायों की एक निष्क्रिय प्रणाली माना गया।
किताब कहती है कि ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।
4. असली ग्रामीण समाज
सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: बड़े ज़मींदार, “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार), किराए का श्रम लगाने वाले बड़े किसान, और मुश्किल से गुज़ारा करने वाले छोटे किसान।
बर्नियर का अपना स्रोत 13 भी अलग तस्वीर दिखाता है: देश का ज़्यादातर भू–भाग अत्यधिक उपजाऊ, बंगाल मिस्र से आगे, और कई भागों में पर्याप्त जनसंख्या और अच्छी खेती।
निष्कर्ष: बर्नियर का वृत्तांत इतिहासकारों को कुछ सुराग देता है, जैसे भूमि राजस्व की ऊँची माँग और किसानों की कठिनाइयाँ, पर केवल उसके आधार पर ग्रामीण समाज का चित्र नहीं बनाया जा सकता; उसे मुग़ल दस्तावेज़ों और दूसरे साक्ष्यों से मिलाकर पढ़ना ज़रूरी है। (पृष्ठ 130–133)
प्रश्न 9. यह बर्नियर से लिया गया एक उद्धरण है:
“ऐसे लोगों द्वारा तैयार सुंदर शिल्पकारीगरी के बहुत उदाहरण हैं, जिनके पास औज़ारों का अभाव है, और जिनके विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी निपुण कारीगर से कार्य सीखा है। कभी–कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतनी निपुणता से नकल करते हैं कि असली और नकली के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। अन्य वस्तुओं में, भारतीय लोग बेहतरीन बंदूकें, और ऐसे सुंदर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि संदेह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है। मैं अकसर इनके चित्रों की सुंदरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ हूँ।”
उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यहाँ ‘अलिखित’ का मतलब है ‘उल्लिखित’, यानी इस अंश में बताए गए शिल्प। बर्नियर यहाँ भारतीय कारीगरों के कौशल की खुलकर तारीफ़ करता है।
1. अंश में बताए गए शिल्प
बिना औज़ारों और बिना किसी निपुण कारीगर से सीखे बनाई गई सुंदर शिल्पकारी।
यूरोप में बनी वस्तुओं की ऐसी नकल कि असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो।
बेहतरीन बंदूकें; ऐसे सुंदर स्वर्णाभूषण जिनसे बेहतर कोई यूरोपीय स्वर्णकार शायद न बना सके; और सुंदर, मृदु और सूक्ष्म चित्र।
2. अध्याय में बताई गई शिल्प गतिविधियाँ
स्रोत 13 (बर्नियर): गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र, और तरह–तरह के रेशमी और सूती वस्त्र, जो देश में भी काम आते थे और विदेश भी जाते थे।
स्रोत 14 (राजकीय कारखाने): कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी, जूते बनाने वाले, और रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले।
इब्न बतूता: सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की भारी माँग।
शिल्प के उदाहरण: इक़त बुनाई; मुग़लकालीन शिल्पकारों का बनाया, पन्ने और माणिक जड़ा सोने का चम्मच।
3. तुलना
अंश के स्वर्णाभूषण कारखाने के सुनारों से, और अंश के चित्र कारखाने के चित्रकारों से मेल खाते हैं। अंश में बंदूकें हैं, जबकि अध्याय के दूसरे विवरणों में कपड़ों का काम बार–बार आता है।
इस अंश में बर्नियर कारीगरों की कुशलता सराहता है, जबकि स्रोत 13 में वह शिल्पकार को “मूल रूप से आलसी” कहता है, और किताब के भाग 6.3 के अनुसार वह यह भी कहता है कि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था, इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था।
निष्कर्ष: यह अंश दिखाता है कि बर्नियर के अपने विवरण कभी–कभी उसके “अपविकसित” पूर्व वाले तर्क से मेल नहीं खाते, और एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। (पृष्ठ 128, 133–134, 138)
मानचित्र कार्य
प्रश्न 10. विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित कीजिए जिनकी यात्रा इब्न बतूता ने की थी। कौन–कौन से समुद्रों को उसने पार किया होगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: मानचित्र पर वही जगहें चिह्नित कीजिए जिनका नाम किताब लेती है, और जहाँ किताब पुराना या क्षेत्र का नाम देती है, वहाँ आज का देश एटलस में खोजिए।
घर और शुरुआत: मोरक्को (तैंजियर); ट्यूनिस शहर (बॉक्स, पृष्ठ 119)।
भारत आने से पहले: मक्का, सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान, और पूर्वी अफ्रीका के तटीय व्यापारिक बंदरगाह।
उपमहाद्वीप तक: मध्य एशिया के रास्ते सिंध; फिर मुल्तान, उच्छ और दिल्ली। अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब में उसकी देखी जगहें: लाहरी, ऊजा, मुल्तान, अजुदाहन, अबुहर, सरसती, हंसी और देहली।
चीन के रास्ते में: मध्य भारत, मालाबार तट, मालद्वीप, बंगाल, असम, सुमात्रा, और चीन (जायतुन, आज क्वानझू; बीजिंग)। मालद्वीप के बाद उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया; किताब वहाँ पहुँचने की बात नहीं लिखती, इसलिए श्रीलंका को पक्का मत मानिए।
किताब का सार (पृष्ठ 120): उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग, भारतीय उपमहाद्वीप और चीन; किताब कहती है “हो सकता है वह रूस भी गया हो”, इसलिए रूस को पक्का मत मानिए।
समुद्र, जो पक्के हैं: किताब कहती है कि वह जहाज़ से सुमात्रा गया और वहाँ से दूसरे जहाज़ से जायतुन। मालद्वीप द्वीप है, और वह वहाँ दो बार गया, इसलिए वहाँ जाने के लिए उसने समुद्र पार किया होगा।
समुद्र, जो मानचित्र देखकर लगते हैं: मालाबार से मालद्वीप जाते हुए अरब सागर और हिंद महासागर; बंगाल से सुमात्रा जाते हुए बंगाल की खाड़ी; सुमात्रा से चीन जाते हुए दक्षिण चीन सागर। अगर वह पूर्वी अफ्रीका के बंदरगाहों, यमन और ओमान तक समुद्र से गया हो, तो लाल सागर और अरब सागर भी पार किए होंगे। उत्तरी अफ़्रीका से पश्चिम एशिया के रास्ते में भूमध्य सागर हो सकता है।
किताब पूरा रास्ता रेखा से नहीं दिखाती, इसलिए रास्ते की रेखाएँ अपने मन से मत खींचिए; केवल जगहों पर निशान लगाइए, और समुद्रों के लिए “होगा” वाली भाषा रखिए। (पृष्ठ 118–120)
परियोजना कार्य (कोई एक)
प्रश्न 11. अपने ऐसे किसी बड़े संबंधी (माता/पिता/दादा–दादी तथा नाना–नानी/चाचा/चाची) का साक्षात्कार कीजिए जिन्होंने आपके नगर अथवा गाँव के बाहर यात्राएँ की हों। पता कीजिए (क) वे कहाँ गए थे (ख) उन्होंने यात्रा कैसे की (ग) उन्हें कितना समय लगा (घ) उन्होंने यात्रा क्यों की (ङ) क्या उन्होंने किसी कठिनाई का सामना किया। ऐसी समानताओं और भिन्नताओं को सूचीबद्ध कीजिए जो उन्होंने अपने रहने के स्थान और यात्रा किए गए स्थानों के बीच देखीं, विशेष रूप से भाषा, पहनावा, खानपान, रीति–रिवाज, इमारतों, सड़कों तथा पुरुषों और महिलाओं की जीवन–शैली के संदर्भ में। अपने द्वारा हासिल जानकारियों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
पहले पूछ लीजिए: संबंधी से समय माँगिए और बताइए कि बातचीत स्कूल की रिपोर्ट के लिए है। रिपोर्ट में उनका नाम या फ़ोटो उनकी अनुमति से ही लिखिए।
प्रश्न तैयार कीजिए: (क) से (ङ) तक के पाँच प्रश्न एक काग़ज़ पर लिख लीजिए, और हर एक के नीचे जवाब लिखने की जगह छोड़िए। साल और जगहों के नाम उसी समय लिखिए।
तुलना की तालिका बनाइए: तीन खाने बनाइए: विषय, अपने रहने की जगह में, यात्रा की जगह में। विषय की पंक्तियाँ: भाषा, पहनावा, खानपान, रीति–रिवाज, इमारतें, सड़कें, पुरुषों का जीवन, महिलाओं का जीवन।
रिपोर्ट का ढाँचा: परिचय (किससे बात की, उनकी यात्रा कब और कहाँ की थी), यात्रा का ब्योरा, तुलना की तालिका, और अंत में आपकी राय: इब्न बतूता या बर्नियर की तरह क्या आपके संबंधी ने भी नई जगह को अपनी जगह से तौलकर देखा?
इस तरह आप भी एक छोटा यात्रा वृत्तांत दर्ज कर लेंगे, जैसा इस अध्याय के यात्रियों ने किया।
प्रश्न 12. इस अध्याय में उल्लिखित यात्रियों में से एक के जीवन तथा कृतियों के विषय में और अधिक जानकारी हासिल कीजिए। उनकी यात्राओं पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हुए कि उन्होंने समाज का कैसा विवरण किया है तथा इनकी तुलना अध्याय में दिए गए उद्धरणों से कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
यात्री चुनिए: अल–बिरूनी, इब्न बतूता या फ्रांस्वा बर्नियर, या पृष्ठ 137 की काल-रेखा का कोई और यात्री।
पहले अध्याय से सूची बनाइए: उस यात्री के बारे में किताब जो कहती है (जन्म, यात्राएँ, कृति, किसके लिए लिखा) और उसके सभी स्रोत–अंश एक जगह लिख लीजिए।
और जानकारी खोजिए: स्कूल या ज़िले के पुस्तकालय की किताबों से, या शिक्षक के सुझाए भरोसेमंद स्रोतों से। हर नई बात के साथ लिखिए कि वह कहाँ से ली।
तुलना कीजिए: उसने समाज के किन पहलुओं (जाति, शहर, गाँव, व्यापार, महिलाएँ) का वर्णन किया, और क्या नई जानकारी अध्याय के उद्धरणों से मेल खाती है या उनसे अलग है।
रिपोर्ट का ढाँचा: यात्री का परिचय, यात्राओं का नक्शा या सूची, समाज का उसका वर्णन, अध्याय के उद्धरणों से तुलना, और अंत में यह कि उसके नज़रिए की ताक़त और सीमा क्या थी।
अध्याय के अंत में किताब याद दिलाती है कि ऐसे वृत्तांत एक ख़ास दृष्टिकोण से लिखे जाते हैं; रिपोर्ट में इस बात को ज़रूर परखिए।
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 116). अल–बिरूनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत 5) तथा चर्चा कीजिए कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 1 में अल–बिरूनी अपने दो उद्देश्य बताता है: हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता, और उनसे जुड़ना चाहने वालों के लिए सूचना का संग्रह।
जो पूरा होता है: स्रोत 5 चार वर्णों का क्रम, ग्रंथों के अनुसार उनकी उत्पत्ति, और यह बताता है कि वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल–जुलकर रहते हैं। किसी बाहरी पाठक के लिए यह समाज को समझने की काम की सूचना है।
जो कमी रह जाती है: यह जानकारी ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे संस्कृत ग्रंथों पर टिकी है, इसलिए असल जीवन की तस्वीर अधूरी रहती है।
इसलिए यह कृति अपने उद्देश्य काफ़ी हद तक पूरे करती है, पर ग्रंथों की सीमा के साथ। (पृष्ठ 116, 125)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 117). यदि अल–बिरूनी इक्कीसवीं शताब्दी में रहता, तो वही भाषाएँ जानने पर भी उसे विश्व के किन क्षेत्रों में आसानी से समझा जा सकता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: इसका उत्तर आपको एटलस और शिक्षक की मदद से खोजना है।
उसकी भाषाएँ: किताब के अनुसार वह सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत समेत कई भाषाएँ जानता था, और उसने किताब–उल–हिन्द अरबी में लिखी।
क्या कीजिए: हर भाषा के आगे लिखिए कि आज वह, या उससे निकली भाषा, किन देशों या क्षेत्रों में बोली या पढ़ी जाती है; फिर उन क्षेत्रों को विश्व मानचित्र पर रंग दीजिए।
इससे दिखेगा कि भाषाएँ आज भी लोगों को दूर–दूर के क्षेत्रों से जोड़ती हैं। (पृष्ठ 116–117)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 117). क्या ये कपड़े यूनानी हैं अथवा अरबी?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब कपड़ों का वर्णन नहीं देती, इसलिए कोई एक उत्तर नहीं है; तरीका यह है:
चित्र के बारे में किताब: यह तेरहवीं शताब्दी की अरबी पांडुलिपि का चित्र है, जिसमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व के एथेंस के राजनेता और कवि सोलोन विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे हैं।
क्या देखिए: सिर पर क्या पहना है, कपड़ों की काट, रंग और किनारियाँ। याद रखिए कि विषय यूनान का है, पर चित्र बनाने वाला अरबी संसार का था और सदियों बाद का।
अपने देखे के आधार पर तय कीजिए कि कपड़े किस संसार के लगते हैं, और अपने कारण लिखिए। (पृष्ठ 117)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 118). आप डाकुओं को यात्रियों से कैसे अलग करेंगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: सोलहवीं शताब्दी के इस मुग़ल चित्र में डाकू यात्रियों पर हमला कर रहे हैं। किताब पहचान का कोई एक उत्तर नहीं देती; तरीका यह है:
क्या देखिए: कौन हमला करता दिख रहा है और कौन बचाव करता या भागता; किसके हाथ में हथियार उठे हैं; किसके साथ सामान, लदे जानवर या गठरियाँ हैं।
किताब से जोड़िए: इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के हमले झेले, और मुल्तान से दिल्ली जाते हुए उसके कारवाँ पर भी हमला हुआ था।
चित्र की जिन बातों से आपने डाकुओं और यात्रियों को पहचाना, वे अपने उत्तर में लिखिए। (पृष्ठ 118, 120)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 119). आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह बंगाल के एक मंदिर की मृण मूर्तिकला है (लगभग सत्रहवीं अठारहवीं शताब्दियाँ), जिसमें नाव में यात्री हैं।
रास्ते असुरक्षित थे: किताब के अनुसार यात्रा कठिन और जोखिम भरी थी; इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के हमले झेले।
कारवाँ भी सुरक्षित नहीं: साथियों के साथ कारवाँ में चलने पर भी मुल्तान से दिल्ली के रास्ते उसके कारवाँ पर हमला हुआ।
इसलिए शायद यात्री अपनी और अपने सामान की रक्षा के लिए हथियार साथ रखते थे। (पृष्ठ 118–120)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 121). आपके विचार में अल–बिरूनी और इब्न बतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान/भिन्न थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों ने उपमहाद्वीप के बारे में ऐसे पाठकों के लिए लिखा जो इसे नहीं जानते थे, पर दोनों के उद्देश्य और तरीके अलग थे।
अल–बिरूनी: उसका उद्देश्य (स्रोत 1) हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता करना और सूचना का संग्रह देना था। इसके लिए उसने संस्कृत सीखी और ग्रंथ पढ़े।
इब्न बतूता: वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था, और जो अनूठा लगा, वह दर्ज करता था। घर लौटने पर स्थानीय शासक के निर्देश से दर्ज हुआ उसका वृत्तांत (स्रोत 3) पाठकों के मनोरंजन और ज्ञान, दोनों के लिए था।
समानता: दोनों बाहर से आए, और अपनी जानी–पहचानी दुनिया से तुलना करते हुए नई दुनिया का वर्णन करते रहे।
यानी एक का ज़ोर समझाने पर था, दूसरे का दिखाने और सुनाने पर। (पृष्ठ 116, 118, 120–121, 124)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 123). बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौन सी वस्तुएँ हैं जो आज आप यात्रा में साथ ले जाएँगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: इसका उत्तर आपकी अपनी पसंद पर है। पहले स्रोत 4 की सूची दोबारा देखिए:
सामान: औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश, खाना बनाने के सामान के झोले, और पानी का पात्र (जिसे लेकर एक सेवक आगे चलता था)।
खाना–पीना: बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला।
जिन चीज़ों को आप चुनें, उनके साथ एक–एक कारण लिखिए कि आज की यात्रा में वे क्यों काम आएँगी। (पृष्ठ 123)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 123). भारतीय भाषाओं में बहुत प्रचुर यात्रा वृत्तांत साहित्य उपलब्ध है। आप अपने घर में बोली जाने वाली भाषा के यात्री–लेखकों के विषय में पता कीजिए। किसी एक ऐसे वृत्तांत को पढ़िए और यात्री द्वारा देखे गए क्षेत्रों, उसने जो देखा और उसके द्वारा वृत्तांत लिखे जाने के कारणों पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह काम आपको स्वयं खोजकर करना है। तरीका:
लेखक खोजिए: अपने घर की भाषा के यात्री–लेखकों के नाम शिक्षक, पुस्तकालय या घर के बड़ों से पूछिए।
एक वृत्तांत पढ़िए: पढ़ते हुए तीन बातें अलग–अलग लिखिए: यात्री किन क्षेत्रों में गया, उसने वहाँ क्या देखा, और उसने वृत्तांत क्यों लिखा।
टिप्पणी लिखिए: देखिए कि क्या वह भी इब्न बतूता की तरह अनोखी चीज़ें रेखांकित करता है, या बर्नियर की तरह अपनी जगह से तुलना करता है।
टिप्पणी में वृत्तांत का नाम और लेखक का नाम ज़रूर लिखिए। (पृष्ठ 123)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 125). अल-बिरूनी ने जो लिखा उसकी तुलना अध्याय 3 स्रोत 6 से कीजिए। क्या आप कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं? क्या आप को लगता है कि अल-बिरूनी भारतीय समाज के विषय में अपनी जानकारी और समझ के लिए केवल संस्कृत के ग्रंथों पर आश्रित रहा?
उत्तर देखिए
उत्तर: पहले भाग के लिए अध्याय 3 का स्रोत 6 खोलकर इस अध्याय के स्रोत 5 के साथ रखिए।
तुलना कैसे करें: दोनों में वर्णों की गिनती, उनका क्रम, उनकी उत्पत्ति की कथा और उनके दर्जे की बातें आमने–सामने लिखिए; जो मिलती हैं वे समानताएँ, जो नहीं मिलतीं वे भिन्नताएँ।
ग्रंथों पर कितना आश्रित: काफ़ी हद तक। किताब के अनुसार वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा, और वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत करता था।
पर केवल ग्रंथ नहीं: उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए, और लगता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा भी की थी।
इसलिए उसकी समझ ज़्यादातर ग्रंथों से बनी, पर उसमें विद्वानों से बातचीत और यात्रा का अनुभव भी जुड़ा था। (पृष्ठ 116, 124–125)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 125). एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान कितना आवश्यक है?
उत्तर देखिए
उत्तर: बहुत आवश्यक, यह अल–बिरूनी के अनुभव से साफ़ है।
पहला अवरोध भाषा: अल–बिरूनी ने समझने की बाधाओं में पहला अवरोध भाषा को माना; संस्कृत अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों का अनुवाद आसान नहीं था।
भाषा सीखने का फल: उसने संस्कृत सीखी, कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, और किताब–उल–हिन्द लिख सका।
भाषा की बारीकी: उसके अनुसार संस्कृत में एक ही वस्तु के लिए कई शब्द होते हैं, और एक ही शब्द कई वस्तुओं के लिए आता है; भाषा जाने बिना ऐसी बारीकियाँ छूट जाती हैं।
भाषा न जानने वाला यात्री दूसरों के बताए पर निर्भर रहता है; अपने उत्तर में इस पर अपनी राय भी जोड़िए। (पृष्ठ 116, 124)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 126). आपके विचार में इसने इब्न बतूता का ध्यान क्यों खींचा? क्या आप इस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहेंगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह प्रश्न स्रोत 7 (पान) के बारे में है।
ध्यान क्यों खींचा: किताब के अनुसार पान उन दो वानस्पतिक उपजों में था जिनसे उसके पाठक पूरी तरह अपरिचित थे। ऐसा पौधा, जिसका कोई फल नहीं होता, जिसे केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है, और जो सुपारी के टुकड़ों के साथ चबाया जाता है, उसके लिए अनोखी बात थी।
आप क्या जोड़ सकते हैं: अपने इलाक़े में पान कैसे उगता, बिकता और खाया जाता है, इसके बारे में जो आपने ख़ुद देखा है, वह जोड़िए।
किताब के अनुसार इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया; पान इसका अच्छा उदाहरण है। (पृष्ठ 126, 130)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 126). किस तरह की तुलनाओं से इब्न बतूता अपने पाठकों को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नारियल देखने में कैसे होते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: इब्न बतूता नारियल को उन चीज़ों से जोड़ता है जिन्हें उसके पाठक जानते थे (स्रोत 6)।
खजूर से: नारियल के वृक्ष हू–बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं।
मानव सिर से: फल में मानो दो आँखें और एक मुख हैं, अंदर का हरा भाग मस्तिष्क जैसा, और जुड़ा रेशा बालों जैसा।
असाधारण कैसे दिखाया: वह बताता है कि रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय इसी से जहाज़ सिले जाते हैं।
किताब यही प्रश्न आगे इस रूप में भी पूछती है कि क्या ये तुलनाएँ वाजिब हैं और वर्णन कितना सटीक है; इसके लिए किसी नारियल को ध्यान से देखकर ख़ुद परखिए। (पृष्ठ 126)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 127). स्थापत्य के कौन से अभिलक्षणों पर इब्न बतूता ने ध्यान दिया? चित्र 5.8 तथा 5.9 से इस वर्णन की तुलना कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 8 में इब्न बतूता दिल्ली की इमारतों के कई अभिलक्षण गिनाता है।
प्राचीर: ग्यारह हाथ चौड़ी दीवार, जिसके भीतर पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष और भंडारगृह थे, और जिसकी खिड़कियाँ शहर की ओर खुलती थीं।
सामग्री और मीनारें: निचला भाग पत्थर का, ऊपरी भाग ईंटों का; पास–पास बनी कई मीनारें।
द्वार और क़ब्रगाह: अट्ठाईस द्वार, जिन्हें दरवाज़ा कहते थे; क़ब्रगाह, जहाँ क़ब्रों पर गुंबद या मेहराब थे।
चित्रों से तुलना: किताब तुग़लक़ाबाद (दिल्ली) के एक मेहराब और किलेबंदी की दीवार के एक हिस्से के चित्र देती है, पर उनका वर्णन नहीं। उनसे मिलाते समय दीवार की मोटाई, पत्थर और ईंट, और मेहराब का आकार देखिए।
जो बातें चित्र और वर्णन, दोनों में मिलें, उन्हें एक सूची में, और जो केवल वर्णन में हैं, उन्हें दूसरी सूची में लिखिए। (पृष्ठ 127)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 128). अपने वर्णन में इब्न बतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह प्रश्न स्रोत 9, दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद, के बारे में है।
पाठकों के लिए नया: किताब बताती है कि चौदहवीं शताब्दी के शहरी केंद्रों में सुनी–सुनाई जाने वाली कहानियों में जो कुछ अपरिचित होता, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था, ताकि पढ़ने–सुनने वाले प्रभावित हों। झूले पर बैठी गायिका, और हर गुरुवार गुंबद में गायन और नृत्य, उसके पाठकों के लिए ऐसी ही अपरिचित बातें रही होंगी।
बाज़ार का सामाजिक रूप: इनसे पता चलता है कि बाज़ार केवल लेन–देन की जगह नहीं, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे।
शासकों की भागीदारी: हिंदू शासकों में से एक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतरकर आता और गायिकाएँ उसके सामने गाती थीं, और कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे; यह भी उसके पाठकों के लिए ध्यान देने लायक बात रही होगी।
इसलिए शायद उसने इन गतिविधियों को अपने वृत्तांत में जगह दी। (पृष्ठ 126, 128)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 129). क्या आपको लगता है कि पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब के साक्ष्य से लगता है कि शायद नहीं; यह मुख्य मार्गों तक सीमित रही होगी।
किताब के उदाहरण: सिंध से दिल्ली तक गुप्तचरों की ख़बरें पाँच दिन में पहुँचती थीं, और पैदल डाक से खुरासान के फल ढोए जाते थे। ये बड़े मार्गों के उदाहरण हैं।
कितने लोग चाहिए: पैदल डाक में प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, और हर एक पर दौड़ने को तैयार लोग बैठे रहते थे। पूरे उपमहाद्वीप में ऐसा जाल बनाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लोग चाहिए होते।
किताब क्या नहीं बताती: किताब यह नहीं बताती कि यह व्यवस्था कहाँ–कहाँ चलती थी।
अपने उत्तर में यही तर्क दीजिए, और “होगा” वाली भाषा रखिए, क्योंकि यह अनुमान है। (पृष्ठ 129)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 129). इब्न बतूता लोगों के लिए ऐसी वस्तुओं और स्थितियों के वर्णन की समस्या को कैसे हल करता था, जिनसे वे अनभिज्ञ थे और जिन्हें उन्होंने अनुभव नहीं किया था?
उत्तर देखिए
उत्तर: उसने मुख्य रूप से तीन तरीके अपनाए।
जानी–पहचानी चीज़ से तुलना: नारियल का पेड़ खजूर जैसा, फल मानव सिर जैसा; पान अंगूर–लता की तरह, सुपारी जायफल जैसी।
अनजानी बात को उभारना: उसने हर उस चीज़ का वर्णन किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया, जैसे लोहे की कीलों के बजाय नारियल की रस्सी से सिले जहाज़, या झूले पर बैठी गायिका।
नाप और गिनती: दिल्ली की दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी, शहर के अट्ठाईस द्वार; अश्व डाक के घोड़े हर चार मील पर; सिंध से दिल्ली की ख़बर पाँच दिन में।
इन तरीकों से पाठक बिना देखे भी चीज़ की तस्वीर मन में बना पाते थे। (पृष्ठ 126–130)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 131). बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 11 में बर्नियर किसानों की कई समस्याएँ गिनाता है।
ज़मीन और लोग: कई अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत; खेती अच्छी नहीं, आबादी कम; श्रमिकों के अभाव में कृषियोग्य भूमि भी बिना खेती के।
शासन का बर्ताव: गवर्नरों के बुरे व्यवहार से कई श्रमिकों की मृत्यु; लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न होने पर गरीबों से जीविका के साधन छीन लिए जाते, और उनके बच्चे दास बनाकर ले जाए जाते।
नतीजा: निरंकुशता से हताश होकर किसान गाँव छोड़ देते।
उसके पक्ष के लिए: हाँ, सहायक होता। उसका पक्ष यह था कि राजकीय भूस्वामित्व हानिकारक है, और वह चाहता था कि उसका विवरण यूरोप में निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने। ऐसा दुखभरा चित्र उस चेतावनी को मज़बूत करता।
पर किताब बताती है कि ग्रामीण समाज असल में कहीं अधिक विविध था, इसलिए यह विवरण एकतरफ़ा है। (पृष्ठ 130–132)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 132). बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है? जब आप अध्याय 8 तथा 9 पढ़ लें, तब आप इस विवरण पर फिर आइएगा और फिर इसका आकलन कीजिएगा।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 12 में बर्नियर यूरोप के शासकों को चेताने वाला चित्र खींचता है: अगर उन्होंने मुग़ल ढाँचा अपनाया, तो क्या होगा।
राजा: अच्छी तरह जुते, बसे और समृद्ध राज्यों के बजाय वे रेगिस्तान और निर्जन स्थानों के, भिखारियों और क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे।
शहर और खेत: बड़े शहर खराब हवा से रहने लायक नहीं रहेंगे, और खेत झाड़ियों और घातक दलदल से भर जाएँगे।
कारण, उसके अनुसार: इन सबकी जड़ राजकीय भूस्वामित्व।
किताब कहती है कि अध्याय 8 और 9 पढ़ने के बाद इस विवरण पर लौटिए; तब वहाँ के साक्ष्यों से इसे परखिए। (पृष्ठ 132)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 133). इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 13 और स्रोत 11, दोनों बर्नियर के हैं, पर दोनों लगभग उलटी तस्वीरें दिखाते हैं।
भूमि: स्रोत 11 में रेतीली भूमि और बंजर पर्वत; स्रोत 13 में देश का ज़्यादातर भू–भाग अत्यधिक उपजाऊ, और बंगाल मिस्र से भी आगे।
लोग और खेती: स्रोत 11 में कम आबादी और बिना खेती की भूमि; स्रोत 13 में कई भागों में पर्याप्त जनसंख्या और अच्छी खेती।
समृद्धि: स्रोत 11 में गाँव छोड़ते किसान; स्रोत 13 में शिल्पकारों के वस्त्र विदेश जाते हैं, और दुनिया भर में घूमकर सोना–चाँदी भारत में आते हैं और कुछ हद तक यहीं खो जाते हैं।
यही अंतर किताब की इस बात का आधार है कि बर्नियर के विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। (पृष्ठ 131, 133)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 134). आपके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब से इसके कई कारण निकलते हैं।
जानी–पहचानी कसौटी: यात्री उपमहाद्वीप में जो देखते थे, सामान्यत: उसकी तुलना उन प्रथाओं से करते थे जिनसे वे परिचित थे। बर्नियर के लिए वह कसौटी यूरोप, और ख़ासकर फ्रांस, था।
पाठक कौन थे: उसने अपनी प्रमुख कृति लुई XIV को समर्पित की, और कई कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में लिखे। वह नीति–निर्माताओं को ऐसे निर्णयों की ओर ले जाना चाहता था जिन्हें वह “सही” मानता था।
यूरोप के विवाद: वह राज्य और समाज पर यूरोप में चल रहे विवादों में भाग ले रहा था, और भारत का उदाहरण चेतावनी की तरह रखता था।
इसीलिए उसकी तुलनाओं में भारत अकसर यूरोप का “विपरीत” दिखता है। (पृष्ठ 122, 124, 130–131)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 134). बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालाँकि हर तरफ़ बहुत सक्रियता है पर उन्नति बहुत कम?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 14 (राजकीय कारखाने) में बर्नियर यह विचार दो हिस्सों में रखता है।
सक्रियता: बड़े कक्षों में कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, दर्जी, और रेशम और मलमल के कारीगर; सब हर सुबह आते हैं और दिन भर काम करते हैं।
उन्नति नहीं: शाम को सब घर लौट जाते हैं, और उसके अनुसार इसी “निश्चेष्ट नियमित ढंग” से समय बीतता है; कोई अपने जन्म की स्थितियों को बेहतर बनाना नहीं चाहता।
कारण, उसके अनुसार: शिल्पकारों को अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था।
यानी व्यस्त दिनचर्या और ठहरी हुई ज़िंदगी को साथ रखकर वह यह छाप छोड़ता है। (पृष्ठ 133–134)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 136). आपके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्न बतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब इसका सीधा उत्तर नहीं देती, पर अध्याय से कुछ कारण समझे जा सकते हैं।
लिखने वाले पुरुष थे: लिखित वृत्तांत छोड़ने वाले यात्री सामान्यतया पुरुष थे, और कभी–कभी वे सामाजिक पक्षपात को सामान्य स्थिति मान लेते थे।
अनोखी बातों पर नज़र: यात्री वही ज़्यादा दर्ज करते थे जो उन्हें अलग या अनोखा लगता था। बर्नियर ने महिलाओं के बारे में सती प्रथा चुनी, क्योंकि यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव पूर्व और पश्चिम की भिन्नता का संकेतक था।
रोज़ का श्रम आम लगा: खेतों और घरों में काम करती महिलाएँ शायद उन्हें इतनी साधारण लगीं कि लिखने लायक नहीं लगीं।
फिर भी किताब बताती है कि महिलाओं का श्रम कृषि और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था। (पृष्ठ 135–136)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 136). यहाँ यातायात के कौन–कौन से साधन अपनाए गए हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: मथुरा की इस मूर्ति में यात्री दिखाए गए हैं। किताब साधनों के नाम नहीं देती; तरीका यह है:
क्या देखिए: कौन पैदल चल रहा है; कौन किसी जानवर पर सवार है, और वह कौन–सा जानवर है; कोई गाड़ी, पालकी या दूसरा वाहन है या नहीं।
अध्याय से जोड़िए: अध्याय में घोड़ों, ऊँटों, पालकी या डोले, कारवाँ और जहाज़ों का ज़िक्र है; देखिए इनमें से कौन–से साधन मूर्ति में दिखते हैं।
जो साधन आप पहचानें, उन्हें एक सूची में लिखिए। (पृष्ठ 136)
झटपट दोहराइए
1. अल–बिरूनी का जन्म कब और कहाँ हुआ?
उत्तर देखिए
उत्तर: सन् 973 में ख़्वारिज़्म में, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है। (पृष्ठ 116)
2. अल–बिरूनी ग़ज़नी कैसे पहुँचा?
उत्तर देखिए
उत्तर: सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद वहाँ के कई विद्वानों और कवियों को ग़ज़नी ले गया; अल–बिरूनी भी बंधक के रूप में वहाँ आया। (पृष्ठ 116)
3. अल–बिरूनी की किताब–उल–हिन्द किस भाषा में है, और कितने अध्यायों में बँटी है?
उत्तर देखिए
उत्तर: अरबी में; अस्सी अध्यायों में। (पृष्ठ 117)
4. इब्न बतूता के अरबी में लिखे यात्रा वृत्तांत का क्या नाम है?
उत्तर देखिए
उत्तर: रिह्ला। (पृष्ठ 118)
5. सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने इब्न बतूता को कौन–सा पद दिया, और 1342 ई. में उसे कहाँ जाने का आदेश दिया?
उत्तर देखिए
उत्तर: उसे दिल्ली का क़ाज़ी या न्यायाधीश बनाया, और 1342 ई. में उसे अपने दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया। (पृष्ठ 118)
6. इब्न बतूता के बोले हुए वृत्तांत किसने लिखे?
उत्तर देखिए
उत्तर: इब्न जुज़ाई ने। इब्न बतूता के घर लौटने पर स्थानीय शासक ने उसकी कहानियाँ दर्ज कराने के निर्देश दिए थे, और इब्न जुज़ाई इसी काम के लिए नियुक्त हुआ। (पृष्ठ 120–121)
7. फ्रांस्वा बर्नियर भारत में कब से कब तक रहा?
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उत्तर: 1656 से 1668 तक, बारह वर्ष। (पृष्ठ 122)
8. बर्नियर ने अपनी प्रमुख कृति किसे समर्पित की?
उत्तर देखिए
उत्तर: फ्रांस के शासक लुई XIV को। (पृष्ठ 122)
9. अल–बिरूनी के बताए, समझने के तीन अवरोध कौन–से थे?
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उत्तर: भाषा; धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता; और अभिमान। (पृष्ठ 124)
10. अंत्यज शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
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उत्तर: “व्यवस्था से परे”। (पृष्ठ 125)
11. दौलताबाद का ताराबबाद क्या था?
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उत्तर: पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार, जिसे इब्न बतूता सबसे विशाल और सुंदर बाज़ारों में गिनता है। (पृष्ठ 128)
12. इब्न बतूता के अनुसार उलुक और दावा क्या थे?
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उत्तर: उलुक अश्व डाक थी, जो हर चार मील पर रखे राजकीय घोड़ों से चलती थी; दावा पैदल डाक थी, जिसमें प्रति मील तीन अवस्थान होते थे। (पृष्ठ 129)
13. बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक क्या थी?
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उत्तर: भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव। (पृष्ठ 130)
14. बर्नियर के वृत्तांत से फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने कौन–सा सिद्धांत विकसित किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत। (पृष्ठ 132)
15. पश्चिमी भारत में व्यापारियों के समूह और उनके मुखिया क्या कहलाते थे?
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उत्तर: समूह महाजन, और उनका मुखिया सेठ; अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का प्रतिनिधित्व करने वाला मुखिया नगर सेठ कहलाता था। (पृष्ठ 134)
16. लाहौर में बर्नियर ने जिस अल्पवयस्क विधवा की बलि देखी, उसकी आयु बर्नियर के विचार में कितनी थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: बारह वर्ष से अधिक नहीं। (पृष्ठ 135)