पढ़िए, छाँटिए, क्रम लगाइए, सवाल पूछिए
यात्रियों के नज़रिए
लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक कई लोग दूर देशों से उपमहाद्वीप आए और जो देखा, वह लिख गए। इस अध्याय में तीन ऐसे यात्रियों के वृत्तांत पढ़िए और देखिए कि हर एक ने भारत को किस नज़र से देखा।
पृष्ठ 115–116

यात्री क्यों लिखते थे?
- ये लेखक बिलकुल अलग सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए थे, इसलिए रोज़ की गतिविधियों और प्रथाओं पर ज़्यादा ध्यान देते थे।
- कुछ वृत्तांत दरबार की गतिविधियों पर हैं, कुछ धार्मिक विषयों या स्थापत्य और स्मारकों पर।
- पंद्रहवीं शताब्दी में विजयनगर शहर का एक सबसे महत्त्वपूर्ण विवरण हेरात से आए राजनयिक अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी से मिलता है।
- मुग़ल साम्राज्य के कुछ प्रशासनिक अधिकारी भी साम्राज्य के भीतर घूमकर अपनी टिप्पणियाँ दर्ज करते थे।
कई यात्रियों ने नारियल तथा पान जैसी चीज़ों को असामान्य माना।

तस्वीर: पान का एक पत्ता, बेल पर।
Aathavan jaffna, CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.

तस्वीर: बीच से काटा गया एक नारियल, उसके दोनों आधे हिस्से।
Filo gèn', CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.
किताब की बात (पृष्ठ 116)
"देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।"
नज़रिए का यही फ़र्क यात्रा–वृत्तांतों को रोचक बनाता है।
अध्याय का रास्ता
- 1अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्दग्रंथों और विद्वानों से सीखने वाला विद्वानपृष्ठ 116–117
- 2इब्न बतूता का रिह्लायात्रा के अनुभव को ज्ञान मानने वाला यात्रीपृष्ठ 118–121
- 3फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सकहर चीज़ को यूरोप से तौलने वाला चिकित्सकपृष्ठ 122–123
- 4एक अपरिचित संसार की समझभाषा, धर्म और जाति व्यवस्थापृष्ठ 124–125
- 5इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठानारियल, पान, शहर और डाकपृष्ठ 126–129
- 6बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्वज़मीन, किसान, शहर और कारीगरपृष्ठ 130–134
- 7महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिकदास प्रथा, सती और महिलाओं का श्रमपृष्ठ 135–136
- 8सार और काल-रेखाकाल-रेखा, मानचित्र और परियोजना कार्यपृष्ठ 137–139
1अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द

इस पड़ाव का सवाल
अल–बिरूनी कौन था, और उसने उपमहाद्वीप को समझने के लिए क्या किया?
पिछली बात से कड़ी शुरुआत में आपने देखा कि यात्रियों के वृत्तांत इतिहास के लिए क्यों काम के हैं। अब पहले यात्री से मिलिए।
आज के मानचित्र पर: उज़्बेकिस्तान और भारत
अल–बिरूनी का जन्म ख़्वारिज़्म में हुआ था, जो आज उज़्बेकिस्तान में है (पृष्ठ 116)। गहरे रंग में उज़्बेकिस्तान है, हल्के रंग में भारत।
देशों की सीमाएँ आज की हैं, उस समय की नहीं।
Borders: Natural Earth, admin-0 countries (public domain).
1.1ख़्वारिज़्म से पंजाब तकपृष्ठ 116
मानचित्र: ख़्वारिज़्म से पंजाब तक
अल–बिरूनी के जीवन की जगहें, जैसी किताब पृष्ठ 116 पर बताती है। कोई नाम छूकर देखिए।
- ख़्वारिज़्म: यहीं सन् 973 में अल–बिरूनी का जन्म हुआ। ख़्वारिज़्म शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। यह इलाक़ा आज के उज़्बेकिस्तान में है।
- सीधा तीर (1017 ई.): ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद वहाँ के कई विद्वानों और कवियों को अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया। अल–बिरूनी भी बंधक के रूप में ग़ज़नी आया।
- ग़ज़नी: यहीं अल–बिरूनी की भारत में रुचि जागी, और सत्तर वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक वह यहीं रहा। ग़ज़नी आज अफ़ग़ानिस्तान में है।
- टूटी रेखा वाला तीर: पंजाब ग़ज़नवी साम्राज्य का हिस्सा बन गया था। अल–बिरूनी का यात्रा–कार्यक्रम साफ़ नहीं है, पर लगता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी। पंजाब का इलाक़ा आज पाकिस्तान और भारत में बँटा है।
तीर केवल दिशा दिखाते हैं, असली रास्ता नहीं। किताब पंजाब और उत्तर भारत में कोई शहर या रास्ता नहीं बताती, इसलिए वहाँ केवल इलाक़ों के नाम हैं।
पृष्ठ 116
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.
अनुवादक अल–बिरूनी (बॉक्स, पृष्ठ 116)
- कई भाषाएँ जानने से वह भाषाओं की तुलना और ग्रंथों का अनुवाद कर सका।
- उसने पतंजलि के व्याकरण के ग्रंथ समेत कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया।
- अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए उसने यूक्लिड (एक यूनानी गणितज्ञ) के कार्यों का संस्कृत में अनुवाद किया।
यात्रा वृत्तांतों की परंपरा
- अल–बिरूनी के लिखने के समय तक यात्रा वृत्तांत अरबी साहित्य का एक मान्य हिस्सा बन चुके थे। ये पश्चिम में सहारा रेगिस्तान से उत्तर में वोल्गा नदी तक के क्षेत्रों के बारे में थे।
- किताब कहती है: "1500 ई. से पहले भारत में अल–बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा, भारत से बाहर कई अन्य लोग संभवत: ऐसा कर चुके हैं।"
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 116
स्रोत 1 में अल–बिरूनी अपनी कृति के दो उद्देश्य बताता है। स्रोत 5 (पृष्ठ 124–125) में उसका जाति व्यवस्था का विवरण है।
अल–बिरूनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत 5) तथा चर्चा कीजिए कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है।
जवाब देखिए
दो उद्देश्य: हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता, और उनसे जुड़ना चाहने वालों के लिए सूचना का संग्रह।
- जो पूरा होता है: स्रोत 5 चार वर्णों का क्रम, ग्रंथों के अनुसार उनकी उत्पत्ति, और यह बताता है कि वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल–जुलकर रहते हैं। बाहर के पाठक के लिए यह समाज को समझने की काम की सूचना है।
- जो कमी रह जाती है: यह जानकारी ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे संस्कृत ग्रंथों पर टिकी है, इसलिए असल जीवन की तस्वीर अधूरी रहती है।
यानी कृति अपने उद्देश्य काफ़ी हद तक पूरे करती है, पर ग्रंथों की सीमा के साथ। (पृष्ठ 116, 125)
1.2किताब–उल–हिन्दपृष्ठ 117
स्रोत 1: अल–बिरूनी के उद्देश्य (पृष्ठ 116)
- अल–बिरूनी ने अपने कार्य को बताया: "उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं।"
किताब–उल–हिन्द एक नज़र में
- भाषा: अरबी, सरल और स्पष्ट।
- आकार: एक विस्तृत ग्रंथ, अस्सी अध्यायों में बँटा।
- विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान (मापने का विज्ञान) आदि।
- किसके लिए: अरबी में लिखने वाले अल–बिरूनी ने शायद अपनी कृतियाँ उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखी थीं।
- अनुवादों पर राय: वह संस्कृत, पाली और प्राकृत ग्रंथों के अरबी अनुवादों से परिचित था, पर उनकी लेखन शैली पर उसका नज़रिया आलोचनात्मक था और वह उन्हें बेहतर बनाना चाहता था।
किताब–उल–हिन्द के एक अध्याय की सामान्य बनावट
- 1आरंभएक प्रश्न
- 2बीच मेंसंस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन
- 3आख़िर मेंदूसरी संस्कृतियों से तुलना
सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) हर अध्याय इसी क्रम में चलता था। आज के कुछ विद्वान मानते हैं कि इस "लगभग ज्यामितीय संरचना" का एक मुख्य कारण अल–बिरूनी का गणित की ओर झुकाव था।
और जानिए "हिंदू" शब्द कहाँ से आया (बॉक्स, पृष्ठ 117)
- यह लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला, जो सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए था।
- अरबों ने इस क्षेत्र को "अल–हिंद" और यहाँ के निवासियों को "हिंदी" कहा।
- बाद में तुर्कों ने सिंधु के पूर्व में रहने वालों को "हिंदू", उनके क्षेत्र को "हिंदुस्तान" और उनकी भाषा को "हिंदवी" कहा।
- किताब कहती है: "इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।"

तस्वीर: सोलोन और उनके शिष्य; अल–मुबश्शिर पांडुलिपि नाम की एक अरबी पांडुलिपि का चित्र, लगभग 1200–1250 ई.; तोपकापी महल संग्रहालय, इस्तांबुल।
Master of the al-Mubashshir manuscript (Topkapı Palace Museum). Public domain. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 117
किताब का चित्र 5.2 तेरहवीं शताब्दी की एक अरबी पांडुलिपि का चित्र है, जिसमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व के एथेंस के राजनेता और कवि सोलोन विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे हैं।
क्या ये कपड़े यूनानी हैं अथवा अरबी?
जवाब देखिए
किताब का चित्र 5.2 ध्यान से देखिए।
- क्या देखिए: सिर पर क्या पहना है, कपड़ों की काट, रंग और किनारियाँ।
- याद रखिए: विषय यूनान का है, पर चित्र बनाने वाला अरबी संसार का था और सदियों बाद का।
अपने देखे के आधार पर तय कीजिए कि कपड़े किस संसार के लगते हैं, और अपने कारण लिखिए। (पृष्ठ 117)
किताब के अपने प्रश्न
1किताब–उल–हिन्द पर एक लेख लिखिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 116–117, 124–125
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: किताब–उल–हिन्द ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) में जन्मे अल–बिरूनी की कृति है, जो ग्यारहवीं शताब्दी के उपमहाद्वीप के बारे में बताती है।
- भाषा और आकार: यह अरबी में है, इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है, और यह अस्सी अध्यायों में बँटा एक विस्तृत ग्रंथ है।
- विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून और मापतंत्र विज्ञान।
- बनावट: सामान्यत: (हमेशा नहीं) हर अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। कुछ विद्वान इस "लगभग ज्यामितीय संरचना" का एक मुख्य कारण उसके गणित की ओर झुकाव को मानते हैं।
- जानकारी कहाँ से: ब्राह्मण विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर सीखी संस्कृत, और वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियाँ और मनुस्मृति।
- किसके लिए: शायद उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों के लोगों के लिए; स्रोत 1 के अनुसार हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता के लिए।
- सीमा: जाति व्यवस्था का विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे नियामक संस्कृत ग्रंथों पर टिका है।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1अल–बिरूनी ग़ज़नी कैसे पहुँचा?
सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद कई विद्वानों और कवियों को ग़ज़नी ले गया; अल–बिरूनी बंधक के रूप में आया (पृष्ठ 116)।
2यूक्लिड के कार्यों का अल–बिरूनी ने किस भाषा में अनुवाद किया?
अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए उसने यूक्लिड के कार्यों का संस्कृत में अनुवाद किया; पतंजलि का व्याकरण अरबी में गया (पृष्ठ 116)।
3किताब–उल–हिन्द के एक अध्याय का सामान्य क्रम क्या था?
सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) अध्याय प्रश्न से शुरू होता, फिर वर्णन, और अंत में तुलना (पृष्ठ 117)।
4"हिंदू" शब्द के बारे में किताब क्या कहती है?
बॉक्स पृष्ठ 117: "इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।"
2इब्न बतूता का रिह्ला

इस पड़ाव का सवाल
इब्न बतूता कौन था, और उसने कहाँ–कहाँ की यात्रा की?
पिछली बात से कड़ी अल–बिरूनी ग्रंथों से सीखता था। अब ऐसे यात्री से मिलिए जो पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था।
इब्न बतूता कौन था?
- रिह्ला: इब्न बतूता का अरबी में लिखा यात्रा वृत्तांत, जो चौदहवीं शताब्दी के भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के बारे में बहुत भरपूर और रोचक जानकारी देता है।
- परिवार: तैंजियर (मोरक्को) के सबसे सम्मानित और शिक्षित परिवारों में से एक, जो इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था।
- किताब से ज़्यादा अनुभव: अपनी श्रेणी के दूसरे लोगों से अलग, इब्न बतूता पुस्तकों की जगह यात्राओं से मिले अनुभव को ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था।
आज के मानचित्र पर: मोरक्को और भारत
इब्न बतूता का जन्म तैंजियर में हुआ था, जो मोरक्को में है (पृष्ठ 118)। गहरे रंग में मोरक्को है, हल्के रंग में भारत।
देशों की सीमाएँ आज की हैं, उस समय की नहीं।
मोरक्को के दक्षिण में टूटी रेखा के पार पश्चिमी सहारा है।
Borders: Natural Earth, admin-0 countries (public domain).
2.1एक आरंभिक विश्व–यात्रीपृष्ठ 118–120
स्रोत 2: घोंसले से निकलता पक्षी (पृष्ठ 118)
- "अपने जन्म स्थान तैंजियर से मेरा प्रस्थान गुरुवार को हुआ..."
- वह अकेला निकला, बिना किसी साथी यात्री या कारवाँ के, पुण्यस्थानों को देखने की इच्छा लेकर। वह लिखता है: "उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।"
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 118
किताब का चित्र 5.3 सोलहवीं शताब्दी का एक मुग़ल चित्र है, जिसमें डाकू यात्रियों पर हमला कर रहे हैं।
आप डाकुओं को यात्रियों से कैसे अलग करेंगे?
जवाब देखिए
किताब का चित्र 5.3 देखकर हल कीजिए।
- क्या देखिए: कौन हमला करता दिख रहा है और कौन बचाव करता या भागता; किसके हाथ में हथियार उठे हैं; किसके साथ सामान, लदे जानवर या गठरियाँ हैं।
- किताब से जोड़िए: इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के हमले झेले, और मुल्तान से दिल्ली जाते हुए उसके कारवाँ पर भी हमला हुआ था।
चित्र की जिन बातों से आपने डाकुओं और यात्रियों को पहचाना, वे अपने उत्तर में लिखिए। (पृष्ठ 118, 120)

तस्वीर: बिष्णुपुर (पश्चिम बंगाल) के जोड़ बांग्ला मंदिर की पकी मिट्टी (टेराकोटा) की एक पट्टिका पर बनी लंबी नाव।
Ankur P from Pune, India, CC BY 2.0. Image: Wikimedia Commons.
चौदहवीं शताब्दी में दिल्ली तक कितने दिन? (पृष्ठ 119)
| कहाँ से | दिल्ली तक |
|---|---|
| मुल्तान | चालीस दिन |
| सिंध | लगभग पचास दिन |
| दौलताबाद | चालीस दिन |
| ग्वालियर | दस दिन |
ये दिन इब्न बतूता के अपने वृत्तांत से हैं। यात्रा आज से कहीं ज़्यादा कठिन और जोखिम भरी थी।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 119
किताब का चित्र 5.4 बंगाल के एक मंदिर की मृण मूर्तिकला है (लगभग सत्रहवीं अठारहवीं शताब्दियाँ), जिसमें नाव में यात्री हैं।
आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं?
जवाब देखिए
रास्तों के बारे में किताब जो बताती है, उससे सोचिए।
- रास्ते असुरक्षित थे: यात्रा कठिन और जोखिम भरी थी; इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के हमले झेले।
- कारवाँ भी सुरक्षित नहीं: साथियों के साथ कारवाँ में चलने पर भी मुल्तान से दिल्ली के रास्ते उसके कारवाँ पर हमला हुआ।
इसलिए शायद यात्री अपनी और अपने सामान की रक्षा के लिए हथियार साथ रखते थे। (पृष्ठ 118–120)
मानचित्र 1: अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब में इब्न बतूता (पृष्ठ 120)
किताब के मानचित्र 1 की सारी जगहें, उसी वर्तनी में जिसमें किताब उन्हें छापती है। किताब के अनुसार कई जगहों के नाम उस तरह लिखे गए हैं जिस तरह इब्न बतूता उन्हें जानता होगा। लाल रेखा लाहरी से ऊजा, मुल्तान, अजुदाहन, अबुहर, सरसती और हंसी होकर देहली तक जाती है। कोई नाम छूकर देखिए।
किताब का मानचित्र 1 रेखाचित्र है, उस पर पैमाना नहीं दिया गया है। इसलिए यहाँ भी कोई दूरी नहीं दी गई है। लाल रेखा किताब के मानचित्र की तरह जगहों को सीधी रेखाओं से जोड़ती है; वह असली रास्ते का हर मोड़ नहीं दिखाती।
परवान और लाहरी की ठीक जगह पक्की नहीं है; उन्हें किताब के मानचित्र के अनुसार अंदाज़ से रखा गया है।
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.
2.2जिज्ञासाओं का उपभोगपृष्ठ 120–121
स्रोत 3: शिक्षा तथा मनोरंजन (पृष्ठ 121)
- घर लौटने पर स्थानीय शासक ने आदेश दिया कि इब्न बतूता की कहानियाँ दर्ज की जाएँ। उसके बोले हुए वृत्तांत लिखने के लिए इब्न जुज़ाई नियुक्त हुआ।
- राजा ने देखे गए शहरों, याद रह गई रोचक घटनाओं, मिले हुए शासकों, उनके महान साहित्यकारों और धर्मनिष्ठ संतों का वृत्तांत लिखवाने को कहा।
- ऐसा कथानक बना "जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी।"
और जानिए एकाकी यात्री (बॉक्स, पृष्ठ 119)
- लुटेरे ही अकेला ख़तरा नहीं थे; यात्री को घर की याद सता सकती थी और वह बीमार पड़ सकता था।
- रिह्ला में इब्न बतूता लिखता है कि उसे बुखार ने जकड़ लिया था, और कमज़ोरी के कारण गिरने से बचने के लिए उसने पगड़ी का कपड़ा ज़ीन से बाँध लिया।
- ट्यूनिस शहर पहुँचने पर कोई उसे पहचानता नहीं था। वह अकेलेपन से इतना उदास हुआ कि "बहुत रोया"। फिर एक तीर्थयात्री ने पास आकर उसका अभिवादन किया।
रास्ते के डाकू: इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के हमले झेले। वह कारवाँ में चलना पसंद करता था, फिर भी मुल्तान से दिल्ली जाते हुए उसके कारवाँ पर हमला हुआ: कई साथी यात्री मारे गए, और जो बचे, जिनमें इब्न बतूता भी था, बुरी तरह घायल हुए।
वह कहाँ–कहाँ गया (भाग 2.2)
- मोरक्को लौटने से पहले वह कई वर्ष उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भागों, भारतीय उपमहाद्वीप और चीन में घूमा। किताब कहती है: "हो सकता है वह रूस भी गया हो"।
- चीन के बारे में उसके वृत्तांत की तुलना मार्को पोलो के वृत्तांत से की जाती है, जिसने तेरहवीं शताब्दी के अंत में वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) यात्रा की थी।
और जानिए इब्न बतूता के पदचिह्नों पर (बॉक्स, पृष्ठ 121)
- 1400 से 1800 के बीच भारत आए यात्रियों ने फ़ारसी में कई यात्रा वृत्तांत लिखे। इनमें से कुछ ने अल–बिरूनी और इब्न बतूता को पढ़ा भी था।
- अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी ने 1440 के दशक में दक्षिण भारत की यात्रा की।
- महमूद वली बल्खी ने 1620 के दशक में ख़ूब यात्राएँ कीं और भारत से इतना सम्मोहित हुआ कि कुछ समय के लिए संन्यासी भी बन गया।
- शेख़ अली हाज़िन 1740 के दशक में उत्तर भारत आया और भारत से निराश हुआ, यहाँ तक कि घृणा भी करने लगा।
- इनमें से ज़्यादातर ने भारत को "अचंभों के देश" के रूप में देखा।

तस्वीर: पहाड़ियों में डेरा लगाया जा रहा है; अकबरनामा की एक पांडुलिपि का पन्ना, सत्रहवीं शताब्दी; मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, न्यूयॉर्क।
Metropolitan Museum of Art, New York. Public domain. Image: metmuseum.org.
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1इब्न बतूता ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत किसे मानता था?
अपनी श्रेणी के दूसरे लोगों से अलग, वह पुस्तकों की जगह यात्राओं के अनुभव को ज़्यादा महत्त्व देता था (पृष्ठ 118)।
2मालद्वीप के बाद श्रीलंका के बारे में किताब क्या कहती है?
पृष्ठ 118 पर इतना ही लिखा है: "अंतत: उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया।" वहाँ पहुँचने की बात किताब नहीं लिखती।
3इब्न बतूता के बोले हुए वृत्तांत किसने लिखे?
स्रोत 3: घर लौटने पर शासक के आदेश से इब्न जुज़ाई ने उसका श्रुतलेख लिखा (पृष्ठ 121)।
4इब्न बतूता के अनुसार सिंध से दिल्ली पहुँचने में कितने दिन लगे?
मुल्तान से दिल्ली चालीस दिन, सिंध से दिल्ली लगभग पचास दिन (पृष्ठ 119)।
3फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक

इस पड़ाव का सवाल
फ्रांस्वा बर्नियर कौन था, और वह भारत को किस नज़र से देखता था?
पिछली बात से कड़ी इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी का यात्री था। अब सत्रहवीं शताब्दी के एक फ्रांसीसी चिकित्सक की बारी।
बर्नियर से पहले के यूरोपीय यात्री
- लगभग 1500 ई. में पुर्तगालियों के आने के बाद उनमें से कई ने भारतीय सामाजिक रीति–रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत लिखे। जेसुइट रॉबर्टो नोबिली जैसे कुछ लोगों ने भारतीय ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद भी किया।
- दुआर्ते बरबोसा ने दक्षिण भारत के व्यापार और समाज का विस्तृत विवरण लिखा।
- 1600 ई. के बाद डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्री बढ़े। फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर कम से कम छह बार भारत आया और उसने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की।
- इतालवी चिकित्सक मनूकी जैसे कई यात्री कभी यूरोप नहीं लौटे और भारत में ही बस गए।

तस्वीर: फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (1605–1689); निकोला द लार्जिलियेर का बनाया चित्र, लगभग 1678 ई.; हर्ज़ोग आंटोन उलरिश संग्रहालय, ब्राउनश्वाइग (जर्मनी)।
Nicolas de Largillière (Herzog Anton Ulrich-Museum, Braunschweig). Public domain. Image: Wikimedia Commons.
फ्रांस्वा बर्नियर, एक नज़र में
| कौन | फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार, जो मुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया। |
| 1656–1668 | बारह वर्ष भारत में रहा और मुग़ल दरबार से नज़दीकी से जुड़ा रहा। |
| दरबार में | पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक; बाद में आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में। |
| किसके लिए | अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित की; कई दूसरे कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को लिखे पत्रों के रूप में थे। |
| 1670–71 | उसके कार्य फ्रांस में छपे, और अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में अनुवादित हो गए। |
| 1670–1725 | फ्रांसीसी में आठ बार दोबारा छपे; 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार। |
पृष्ठ 122–123
आज के मानचित्र पर: फ्रांस और भारत
बर्नियर फ्रांस का रहने वाला था (पृष्ठ 122)। गहरे रंग में फ्रांस है, हल्के रंग में भारत।
देशों की सीमाएँ आज की हैं, उस समय की नहीं।
Borders: Natural Earth, admin-0 countries (public domain).
3.1"पूर्व" और "पश्चिम" की तुलनापृष्ठ 122–123
"पूर्व" और "पश्चिम" की तुलना (भाग 3.1)
बर्नियर ने भारत में क्या किया
- देश के कई भागों की यात्रा की।
- भारत में जो देखता, उसकी तुलना सामान्यत: यूरोप की स्थिति से करता।
उसका नतीजा
- किताब कहती है: "लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।"
- उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था, फिर भी छपने पर उसके वृत्तांत बहुत प्रसिद्ध हुए।
वृत्तांत पाठकों तक कैसे पहुँचे
बर्नियर: छपी किताबें
- फ्रांस में 1670–71 में छपीं।
- अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी अनुवाद।
- 1670 से 1725 तक फ्रांसीसी में आठ बार, 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार।
अरबी और फ़ारसी वृत्तांत: हस्तलिपियाँ
- हाथ से लिखी प्रतियों में फैलते थे।
- 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे।
और जानिए भारत की छवि (बॉक्स, पृष्ठ 123)
- यूरोपीय यात्रियों की छपी किताबों ने यूरोप के लोगों के लिए भारत की एक छवि बनाई।
- 1750 के बाद जब शेख इतिसमुद्दीन और मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीय यूरोप गए, तो उन्हें इसी छवि का सामना करना पड़ा, और उन्होंने तथ्यों की अपनी व्याख्या से इसे बदलने की कोशिश की।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 123
स्रोत 4 में बर्नियर मुग़ल सेना के कश्मीर कूच में साथ ले जाए गए अपने सामान की सूची देता है।
बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौन सी वस्तुएँ हैं जो आज आप यात्रा में साथ ले जाएँगे?
जवाब देखिए
इसका उत्तर आपकी अपनी पसंद पर है। पहले स्रोत 4 की सूची दोबारा देखिए:
- सामान: औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश, खाना बनाने के सामान के झोले, और पानी का पात्र (जिसे लेकर एक सेवक आगे चलता था)।
- खाना–पीना: बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला।
जिन चीज़ों को आप चुनें, उनके साथ एक–एक कारण लिखिए कि आज की यात्रा में वे क्यों काम आएँगी। (पृष्ठ 123)
किताब के अपने प्रश्न
2इब्न बतूता और बर्नियर ने जिन दृष्टिकोणों से भारत में अपनी यात्राओं के वृत्तांत लिखे थे, उनकी तुलना कीजिए तथा अंतर बताइए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 118–123, 126–130
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: दोनों बाहर से आए थे, पर चौदहवीं शताब्दी का इब्न बतूता अचरज से नई चीज़ें दर्ज करता है, जबकि सत्रहवीं शताब्दी का बर्नियर हर चीज़ को यूरोप से तौलकर परखता है।
- इब्न बतूता: वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था। जो अनूठा लगा, उसका वर्णन किया: नारियल, पान, दिल्ली की प्राचीर, संगीत का बाज़ार, डाक व्यवस्था। उस समय के शहरी केंद्रों की कहानियों में अपरिचित बातें विशेष रूप से रेखांकित की जाती थीं, ताकि पढ़ने–सुनने वाले प्रभावित हों।
- बर्नियर: वह भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था। भारत में देखी हर चीज़ की तुलना यूरोप, ख़ासकर फ्रांस से करता, और लगभग हर दृष्टांत में भारत की स्थिति दयनीय बताता। उसने भारत को यूरोप का "विपरीत" दिखाया (द्वि–विपरीतता)।
- उद्देश्य का अंतर: इब्न बतूता की कहानियाँ शासक के आदेश पर इब्न जुज़ाई ने लिखीं, ताकि पाठकों का मनोरंजन और ज्ञान दोनों हों; बर्नियर नीति–निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करना चाहता था।
- निष्कर्ष: एक वर्णन करता है, दूसरा भिन्नताओं को ऊँच–नीच के क्रम में रखकर निष्कर्ष निकालता है।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1बर्नियर भारत में कितने वर्ष रहा?
वह 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में रहा (पृष्ठ 122)।
2बर्नियर पहले किसका चिकित्सक था?
पहले वह दारा शिकोह का चिकित्सक रहा; बाद में दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में (पृष्ठ 122)।
3बर्नियर की तुलना का नतीजा अक्सर क्या निकलता था?
"लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया" (पृष्ठ 122)।
4अरबी और फ़ारसी वृत्तांत 1800 से पहले आम तौर पर कैसे फैलते थे?
वे हस्तलिपियों के रूप में फैलते थे और 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे (पृष्ठ 123)।
4एक अपरिचित संसार की समझ

इस पड़ाव का सवाल
अल–बिरूनी को उपमहाद्वीप को समझने में कौन–सी बाधाएँ आईं, और उसने जाति व्यवस्था को कैसे समझाया?
पिछली बात से कड़ी तीनों यात्रियों से मिलने के बाद अब देखिए कि अल–बिरूनी ने एक अपरिचित संसार को कैसे समझा।
हर यात्री की अपनी विधि
- यात्री उपमहाद्वीप में जो भी देखते थे, सामान्यत: उसकी तुलना उन प्रथाओं से करते थे जिनसे वे परिचित थे। अल–बिरूनी जानता था कि अपने लिए तय किए उद्देश्य में कौन–सी समस्याएँ छिपी हैं। उसने कई "अवरोधों" की चर्चा की, जो उसके अनुसार समझने में बाधक थे। तीनों कार्ड पलटकर देखिए।
4.1समझने में बाधाएँ और उन पर विजयपृष्ठ 124
फिर भी वह किन पर निर्भर रहा?
- इन समस्याओं को जानते हुए भी अल–बिरूनी लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा।
- भारतीय समाज को समझने के लिए उसने अकसर वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत किए।
और जानिए विशाल पहुँच वाली एक भाषा (बॉक्स, पृष्ठ 124)
- अल–बिरूनी के अनुसार संस्कृत सीखने की कठिनाई पार करना आसान नहीं, क्योंकि अरबी की तरह इसकी पहुँच शब्दों और विभक्तियों, दोनों में बहुत विस्तृत है।
- एक ही वस्तु के लिए कई शब्द होते हैं, और एक ही शब्द कई वस्तुओं के लिए आता है।
ईश्वर ही जानता है! (बॉक्स, पृष्ठ 124)
- यात्री हमेशा सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करते थे।
- अल–बिरूनी ने लकड़ी की एक ऐसी मूर्ति की कहानी सुनी जो कथित रूप से 216,432 वर्षों तक बची रही।
- उसने पूछा कि ऐसी जगह, जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र होती है, लकड़ी इतने लंबे समय तक कैसे बची रही होगी, और लिखा: "ईश्वर ही जानता है!"
4.2अल–बिरूनी का जाति व्यवस्था का विवरणपृष्ठ 124–125
दूसरे समाजों में मिलते–जुलते रूप
- अल–बिरूनी ने दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजकर जाति व्यवस्था को समझने और समझाने का प्रयास किया।
- उसने लिखा कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी: "घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार।"
- यानी वह दिखाना चाहता था कि ऐसे सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे।
- साथ ही उसने बताया कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था, और उनमें भिन्नताएँ केवल धार्मिकता के पालन में थीं।
स्रोत 5: वर्ण व्यवस्था, अल–बिरूनी के शब्दों में (पृष्ठ 125)
- अल–बिरूनी हिंदुओं के ग्रंथों के आधार पर चार वर्ण गिनाता है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
- ग्रंथों के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से, क्षत्रिय कंधों और हाथों से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र चरणों से उत्पन्न हुए।
- अंतिम दो वर्गों में अधिक अंतर नहीं है। लेकिन इन वर्गों के बीच भिन्नता होने पर भी ये एक साथ एक ही शहरों और गाँवों में, समान घरों और आवासों में मिल–जुलकर रहते हैं।
विवरण की सीमा
- वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी।
- अंत्यज (शाब्दिक अर्थ, "व्यवस्था से परे") कहलाने वाली श्रेणियों से सामान्यतया यह अपेक्षा की जाती थी कि वे किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम दें।
- यानी ये लोग अकसर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र में शामिल थे।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 125
स्रोत 5 में अल–बिरूनी वर्ण व्यवस्था का वर्णन करता है। इसी किताब के अध्याय 3 के स्रोत 6 में भी वर्णों की बात है।
अल-बिरूनी ने जो लिखा उसकी तुलना अध्याय 3 स्रोत 6 से कीजिए। क्या आप कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं? क्या आप को लगता है कि अल-बिरूनी भारतीय समाज के विषय में अपनी जानकारी और समझ के लिए केवल संस्कृत के ग्रंथों पर आश्रित रहा?
जवाब देखिए
पहले भाग के लिए अध्याय 3 का स्रोत 6 खोलकर इस अध्याय के स्रोत 5 के साथ रखिए।
- तुलना कैसे करें: दोनों में वर्णों की गिनती, उनका क्रम, उनकी उत्पत्ति की कथा और उनके दर्जे की बातें आमने–सामने लिखिए; जो मिलती हैं वे समानताएँ, जो नहीं मिलतीं वे भिन्नताएँ।
- ग्रंथों पर कितना आश्रित: काफ़ी हद तक। किताब के अनुसार वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा, और वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत करता था।
- पर केवल ग्रंथ नहीं: उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए, और लगता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा भी की थी।
इसलिए उसकी समझ ज़्यादातर ग्रंथों से बनी, पर उसमें विद्वानों से बातचीत और यात्रा का अनुभव भी जुड़ा था। (पृष्ठ 116, 124–125)
किताब के अपने प्रश्न
6जाति व्यवस्था के संबंध में अल–बिरूनी की व्याख्या पर चर्चा कीजिए।
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 124–125
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: ग्यारहवीं शताब्दी के विद्वान अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था को तीन तरह से समझाया: दूसरे समाजों से तुलना करके, संस्कृत ग्रंथों के वर्ण–विवरण के सहारे, और अपवित्रता की मान्यता पर सवाल उठाकर।
- दूसरे समाजों से तुलना: उसने लिखा कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी: "घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार।" इससे वह दिखाना चाहता था कि ऐसे सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे। साथ ही उसने बताया कि इस्लाम में सभी लोग समान माने जाते थे, और उनमें भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में थी।
- चार वर्ण (स्रोत 5): ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न माने गए, और हिंदू उन्हें "मानव जाति में सबसे उत्तम" मानते थे; क्षत्रिय कंधों और हाथों से; वैश्य जंघाओं से; शूद्र चरणों से। उसके अनुसार अंतिम दो वर्गों में अधिक अंतर नहीं था; लेकिन वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल–जुलकर रहते थे।
- अपवित्रता की मान्यता से इनकार: उसके अनुसार अपवित्र हुई हर वस्तु अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है: सूर्य हवा को स्वच्छ करता है, और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। इसलिए जाति व्यवस्था में छिपी अपवित्रता की अवधारणा उसके अनुसार प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।
- व्याख्या की सीमा: उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित था, जिनमें नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे। वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी: अंत्यज ("व्यवस्था से परे") कहलाने वाले लोगों से सामान्यतया किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी; वे अक्सर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र का हिस्सा थे।
- निष्कर्ष: अल–बिरूनी की व्याख्या तुलना करने वाली और कुछ हद तक आलोचनात्मक थी, पर ग्रंथों पर टिकी होने के कारण वह समाज की असली, कम कड़ी तस्वीर पूरी तरह नहीं दिखाती।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1अल–बिरूनी के अनुसार समझने का पहला अवरोध क्या था?
पहला अवरोध भाषा थी: संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि अनुवाद आसान नहीं था (पृष्ठ 124)।
2भारतीय समाज को समझने के लिए अल–बिरूनी लगभग पूरी तरह किन पर आश्रित रहा?
वह वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत करता था (पृष्ठ 124)।
3अल–बिरूनी ने प्राचीन फ़ारस के चार सामाजिक वर्गों का उदाहरण क्यों दिया?
उसने दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजकर जाति व्यवस्था को समझाने का प्रयास किया (पृष्ठ 124)।
5इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा

इस पड़ाव का सवाल
इब्न बतूता को उपमहाद्वीप में क्या–क्या अनोखा लगा, और उसने उसे अपने पाठकों तक कैसे पहुँचाया?
पिछली बात से कड़ी अल–बिरूनी ग्रंथों के सहारे समझता था; इब्न बतूता अपनी आँखों से देखी चीज़ें लिखता है।
एक जुड़ी हुई दुनिया
- चौदहवीं शताब्दी में जब इब्न बतूता दिल्ली आया, तब तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था जो पूर्व में चीन से पश्चिम में उत्तर–पश्चिमी अफ़्रीका और यूरोप तक फैला था।
- उसने पवित्र पूजास्थल देखे, विद्वानों और शासकों के साथ समय बिताया, कई बार क़ाज़ी रहा, और ऐसे शहरी केंद्रों की संस्कृति का आनंद लिया जहाँ अरबी, फ़ारसी, तुर्की और दूसरी भाषाएँ बोलने वाले लोग विचार, सूचनाएँ और उपाख्यान बाँटते थे।
- इन शहरों में सुनाई जाने वाली कहानियों में धर्मनिष्ठ लोगों, निर्दयी और दयावान राजाओं, और सामान्य पुरुषों और महिलाओं के जीवन की बातें होती थीं। जो कुछ अपरिचित होता, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता, ताकि सुनने या पढ़ने वाले दूर के, पर पहुँच में आने लायक देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हों।
पृष्ठ 126
5.1नारियल तथा पानपृष्ठ 126
स्रोत 6: मानव सिर जैसे गिरिदार फल (पृष्ठ 127)
- ये वृक्ष हू–बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं; अंतर बस इतना कि एक से काष्ठफल मिलता है और दूसरे से खजूर।
- फल मानव सिर से मेल खाता है: मानो दो आँखें और एक मुख हों, अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा, और जुड़ा रेशा बालों जैसा।
- रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय इसी से जहाज़ सिले जाते हैं।

एआई से बना चित्र: रेशे वाला एक नारियल। इसके तीन गड्ढों को देखिए और स्रोत 6 से मिलाकर ख़ुद परखिए: क्या इसमें "मानो दो आँखें तथा एक मुख" दिखते हैं?
Image generated with AI (ChatGPT).
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 126
स्रोत 6 में इब्न बतूता नारियल का वर्णन करता है।
किस तरह की तुलनाओं से इब्न बतूता अपने पाठकों को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नारियल देखने में कैसे होते हैं?
जवाब देखिए
इब्न बतूता नारियल को उन चीज़ों से जोड़ता है जिन्हें उसके पाठक जानते थे (स्रोत 6)।
- खजूर से: नारियल के वृक्ष हू–बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं।
- मानव सिर से: फल में मानो दो आँखें और एक मुख हैं, अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा, और जुड़ा रेशा बालों जैसा।
- असाधारण कैसे दिखाया: वह बताता है कि रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय इसी से जहाज़ सिले जाते हैं।
किताब यही प्रश्न आगे इस रूप में भी पूछती है कि क्या ये तुलनाएँ वाजिब हैं और वर्णन कितना सटीक है; इसके लिए किसी नारियल को ध्यान से देखकर ख़ुद परखिए। (पृष्ठ 126)
स्रोत 7: पान (पृष्ठ 127)
- पान अंगूर–लता की तरह उगाया जाता है; इसका कोई फल नहीं होता, इसे केवल पत्तियों के लिए उगाते हैं।
- खाने से पहले सुपारी ली जाती है, जो जायफल जैसी होती है; उसके छोटे–छोटे टुकड़े करके मुँह में रखकर चबाते हैं, फिर पान की पत्तियों के साथ।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 126
स्रोत 7 में इब्न बतूता पान का वर्णन करता है।
आपके विचार में इसने इब्न बतूता का ध्यान क्यों खींचा? क्या आप इस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहेंगे?
जवाब देखिए
- ध्यान क्यों खींचा: किताब के अनुसार पान उन दो वानस्पतिक उपजों में था जिनसे उसके पाठक पूरी तरह अपरिचित थे। ऐसा पौधा, जिसका कोई फल नहीं होता, जिसे केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है, और जो सुपारी के टुकड़ों के साथ चबाया जाता है, उसके लिए अनोखी बात थी।
- आप क्या जोड़ सकते हैं: अपने इलाक़े में पान कैसे उगता, बिकता और खाया जाता है, इसके बारे में जो आपने ख़ुद देखा है, वह जोड़िए।
किताब के अनुसार इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया; पान इसका अच्छा उदाहरण है। (पृष्ठ 126, 130)
5.2इब्न बतूता और भारतीय शहरपृष्ठ 127–128
अवसरों से भरे शहर
- इब्न बतूता ने उपमहाद्वीप के शहरों को उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास ज़रूरी इच्छा, साधन और कौशल था।
- शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे; कभी–कभी युद्धों और अभियानों से विध्वंस होता था। ज़्यादातर शहरों में भीड़–भाड़ वाली सड़कें और चमक–दमक वाले, रंगीन बाज़ार थे।
- वह दिल्ली को बड़ा शहर, विशाल आबादी वाला और भारत में सबसे बड़ा बताता है। दौलताबाद (महाराष्ट्र में) भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।

तस्वीर: तुग़लक़ाबाद क़िला, दिल्ली: पत्थरों से बना एक नुकीला मेहराब।
Anupamg, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

तस्वीर: तुग़लक़ाबाद क़िला, दिल्ली: मुख्य रास्ते से दिखते पत्थर के ऊँचे, ढलवाँ गोल बुर्ज।
Hadez47 (Ashwani Kumar), CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 127
स्रोत 8 में इब्न बतूता देहली का वर्णन करता है। किताब इसके साथ चित्र 5.8 (तुग़लक़ाबाद, दिल्ली का एक मेहराब) और चित्र 5.9 (किलेबंदी की दीवार का एक हिस्सा) रखती है।
स्थापत्य के कौन से अभिलक्षणों पर इब्न बतूता ने ध्यान दिया? चित्र 5.8 तथा 5.9 से इस वर्णन की तुलना कीजिए।
जवाब देखिए
स्रोत 8 में इब्न बतूता दिल्ली की इमारतों के कई अभिलक्षण गिनाता है।
- प्राचीर: ग्यारह हाथ चौड़ी दीवार, जिसके भीतर पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष और भंडारगृह थे, और जिसकी खिड़कियाँ शहर की ओर खुलती थीं।
- सामग्री और मीनारें: निचला भाग पत्थर का, ऊपरी भाग ईंटों का; पास–पास बनी कई मीनारें।
- द्वार और क़ब्रगाह: अट्ठाईस द्वार, जिन्हें दरवाज़ा कहते थे; क़ब्रगाह, जहाँ क़ब्रों पर गुंबद या मेहराब थे।
- चित्रों से तुलना: किताब के दोनों चित्रों में देखिए कि दीवार कितनी मोटी लगती है, पत्थर और ईंट कहाँ दिखते हैं, और मेहराब का आकार कैसा है।
जो बातें चित्र और वर्णन, दोनों में मिलें, उन्हें एक सूची में, और जो केवल वर्णन में हैं, उन्हें दूसरी सूची में लिखिए। (पृष्ठ 127)
बाज़ार: केवल लेन–देन की जगह नहीं
- बाज़ार सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे।
- ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कम से कम कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जगह तय थी।
स्रोत 9: बाज़ार में संगीत, दौलताबाद (पृष्ठ 128)
- पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार, ताराबबाद, सबसे विशाल और सुंदर बाज़ारों में से एक था। हर दुकान का एक दरवाज़ा मालिक के घर में खुलता था।
- दुकानें कालीनों से सजी थीं; बीच में झूला था जिस पर गायिका बैठती थी, और सेविकाएँ उसे झुलाती थीं।
- बाज़ार के बीच एक विशाल गुंबद था, जहाँ हर गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख अपने सेवकों और दासों के साथ बैठते थे, और गायिकाएँ झुंडों में आकर गाती और नाचती थीं।
- बाज़ार में इबादत के लिए मस्जिदें भी थीं। एक हिंदू शासक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतर कर आता और गायिकाएँ उसके सामने गातीं; कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 128
स्रोत 9 में दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद का वर्णन है।
अपने वर्णन में इब्न बतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?
जवाब देखिए
- पाठकों के लिए नया: किताब बताती है कि चौदहवीं शताब्दी के शहरी केंद्रों में सुनी–सुनाई जाने वाली कहानियों में जो कुछ अपरिचित होता, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था, ताकि पढ़ने–सुनने वाले प्रभावित हों। झूले पर बैठी गायिका, और हर गुरुवार गुंबद में गायन और नृत्य, उसके पाठकों के लिए ऐसी ही अपरिचित बातें रही होंगी।
- बाज़ार का सामाजिक रूप: इनसे पता चलता है कि बाज़ार केवल लेन–देन की जगह नहीं, सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे।
- शासकों की भागीदारी: एक हिंदू शासक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतर कर आता और गायिकाएँ उसके सामने गाती थीं, और कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे; यह भी उसके पाठकों के लिए ध्यान देने लायक बात रही होगी।
इसलिए शायद उसने इन गतिविधियों को अपने वृत्तांत में जगह दी। (पृष्ठ 126, 128)
शहरों की समृद्धि और व्यापार
- इब्न बतूता की रुचि शहरों की समृद्धि समझाने में अधिक नहीं थी, पर इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया है कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों का अधिशेष लेकर पाते थे।
- इब्न बतूता के अनुसार भारतीय कृषि इतनी उत्पादक इसलिए थी कि मिट्टी उपजाऊ थी, जिससे किसान वर्ष में दो फसलें उगा पाते थे।
- उपमहाद्वीप व्यापार और वाणिज्य के अंतर एशियाई तंत्रों से अच्छी तरह जुड़ा था। भारतीय माल की मध्य और दक्षिण–पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी, जिससे शिल्पकारों और व्यापारियों को भारी मुनाफ़ा होता था।
- भारतीय कपड़ों की, ख़ासकर सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की, बहुत माँग थी। महीन मलमल की कई किस्में इतनी महँगी थीं कि उन्हें केवल अमीर वर्ग और बहुत धनी लोग पहन पाते थे।
और जानिए इक़त बुनाई (किताब का चित्र 5.10)
किताब के चित्र 5.10 के परिचय के अनुसार इक़त बुनाई की ऐसी अभिरचनाएँ उपमहाद्वीप और दक्षिण–पूर्व एशिया के कई तटीय उत्पादन केंद्रों में अपनाई गईं और निखारी गईं।

तस्वीर: पाटन (गुजरात) की पटोला साड़ी, उन्नीसवीं शताब्दी: रेशम के ताने और बाने, दोनों के धागे बुनने से पहले रँगे गए (इक़त); लॉस एंजेलिस काउंटी म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट।
Los Angeles County Museum of Art. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
5.3संचार की एक अनूठी प्रणालीपृष्ठ 129
संचार की एक अनूठी प्रणाली (भाग 5.3)
- राज्य व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष उपाय करता था। लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह बने थे।
- इब्न बतूता डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ। इससे व्यापारी लंबी दूरी तक सूचना भेज सकते थे, उधार प्रेषित कर सकते थे, और कम सूचना पर माल भी भेज सकते थे।
- किताब के अनुसार सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, पर गुप्तचरों की ख़बरें डाक व्यवस्था से सुल्तान तक मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।
सिंध से दिल्ली तक: पचास दिन और पाँच दिन (पृष्ठ 129)
यात्री को: पचास दिन
गुप्तचरों की ख़बर को, डाक से: मात्र पाँच दिन
हर खाना एक दिन है।
ख़बर यात्री से कितने गुना जल्दी पहुँचती थी?
जवाब देखिए
दस गुना जल्दी, क्योंकि 50 ÷ 5 = 10। जितनी दूरी तय करने में यात्री को पचास दिन लगते थे, डाक से ख़बर उतनी दूरी पाँच दिन में तय कर लेती थी।
स्रोत 10: घोड़े पर और पैदल (पृष्ठ 129)
चित्र में दोनों रास्ते बराबर लंबाई के हैं: ऊपर राजकीय घोड़ों की दो चौकियाँ, चार मील के फ़ासले पर; नीचे उतनी ही दूरी में पैदल डाक के अवस्थान।
प्रति मील तीन अवस्थान; दावा एक मील का एक–तिहाई
पैदल डाक की दौड़ कैसे चलती थी
"आगे" दबाइए और देखिए कि पत्र एक दावा से अगले दावा तक कैसे पहुँचता है।
- 1मंडपों में लोग काम शुरू करने के लिए तैयार बैठे रहते हैं। हर एक के पास दो हाथ लंबी छड़ होती है, जिसके ऊपर ताँबे की घंटियाँ लगी होती हैं।
- 2संदेशवाहक शहर से चलता है: एक हाथ में पत्र, दूसरे में घंटियों वाली छड़। वह जितना तेज़ भाग सकता है, भागता है।
- 3घंटियों की आवाज़ सुनकर अगले मंडप में बैठे लोग तैयार हो जाते हैं।
- 4संदेशवाहक के पहुँचते ही उनमें से एक पत्र ले लेता है और छड़ हिलाते हुए पूरी ताक़त से अगले दावा तक दौड़ता है।
- 5पत्र अपने गंतव्य तक पहुँचने तक यही क्रम चलता रहता है।
- 6इब्न बतूता के अनुसार यह पैदल डाक अश्व डाक से ज़्यादा तेज़ होती है, और इसका प्रयोग अकसर खुरासान के फल ढोने में होता है, जो भारत में बहुत पसंद किए जाते हैं।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 129
स्रोत 10 में इब्न बतूता दो तरह की डाक का वर्णन करता है।
क्या आपको लगता है कि पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?
जवाब देखिए
शायद नहीं: किताब के उदाहरण बड़े मार्गों के हैं, इसलिए लगता है कि यह व्यवस्था मुख्य मार्गों तक सीमित रही होगी।
- किताब के उदाहरण: सिंध से दिल्ली तक गुप्तचरों की ख़बरें पाँच दिन में पहुँचती थीं, और पैदल डाक से खुरासान के फल ढोए जाते थे। ये बड़े मार्गों के उदाहरण हैं।
- कितने लोग चाहिए: पैदल डाक में प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, और हर एक पर दौड़ने को तैयार लोग बैठे रहते थे। पूरे उपमहाद्वीप में ऐसा जाल बनाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लोग चाहिए होते।
- किताब क्या नहीं बताती: किताब यह नहीं बताती कि यह व्यवस्था कहाँ–कहाँ चलती थी।
अपने उत्तर में यही तर्क दीजिए, और "होगा" वाली भाषा रखिए, क्योंकि यह अनुमान है। (पृष्ठ 129)
और जानिए एक विचित्र देश? (बॉक्स, पृष्ठ 129)
- 1440 के दशक में लिखा अब्दुर रज़्ज़ाक़ का यात्रा वृत्तांत भावनाओं और धारणाओं का रोचक मिश्रण है।
- केरल में कालीकट (आधुनिक कोज़ीकोड) बंदरगाह पर उसने जो देखा, उसकी प्रशंसा नहीं की: "यहाँ ऐसे लोग बसे हुए थे जिनकी कल्पना मैने कभी भी नहीं की थी।" इन लोगों को उसने एक ‘विचित्र देश’ बताया।
- आगे वह मंगलौर आया और पश्चिमी घाट पार किया। मंगलौर से नौ मील के भीतर उसने एक पूजा–स्थल देखा जिसे वह "पूरे विश्व में अतुलनीय" कहता है: वर्गाकार, हर भुजा लगभग दस गज, ऊँचाई पाँच गज़, चार द्वार–मंडप, पूरा ढले हुए काँसे से ढका।
- प्रवेश के द्वार–मंडप में सोने की आदमकद, मानव आकृति जैसी मूर्ति थी, जिसकी आँखों में माणिक इतनी चतुराई से लगे थे कि लगता था मूर्ति देख सकती है। वह लिखता है: "इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने!"
- यानी एक ही यात्री एक जगह नापसंदगी और दूसरी जगह गहरी प्रशंसा, दोनों दर्ज करता है।
किताब के अपने प्रश्न
7क्या आपको लगता है कि समकालीन शहरी केंद्रों में जीवन–शैली की सही जानकारी प्राप्त करने में इब्न बतूता का वृत्तांत सहायक है? अपने उत्तर के कारण दीजिए।
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 126–130, 136
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: हाँ, काफ़ी हद तक। चौदहवीं शताब्दी के उपमहाद्वीप के शहरों के बारे में इब्न बतूता का वृत्तांत बहुत जानकारी देता है, पर उसे पढ़ते हुए उसकी सीमाएँ भी ध्यान में रखनी चाहिए।
- शहरों का आम चित्र: उसके अनुसार शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे, हालाँकि कभी–कभी युद्धों और अभियानों से उनका विध्वंस भी होता था। ज़्यादातर शहरों में भीड़–भाड़ वाली सड़कें और चमक–दमक वाले, रंगीन बाज़ार थे। उसे ये शहर उन लोगों के लिए अवसरों से भरे लगे जिनके पास ज़रूरी इच्छा, साधन और कौशल था।
- दिल्ली और दौलताबाद: वह दिल्ली को भारत का सबसे बड़ा शहर बताता है, और दौलताबाद को ऐसा शहर जो आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। स्रोत 8 में दिल्ली की प्राचीर का बारीक वर्णन है: दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी; भीतर पहरेदारों के कक्ष और भंडारगृह; निचला भाग पत्थर का, ऊपरी ईंटों का; अट्ठाईस द्वार; और एक बेहतरीन क़ब्रगाह।
- बाज़ार, सामाजिक जीवन के केंद्र: ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन की जगह तय थी। दौलताबाद के ताराबबाद (स्रोत 9) में एक हिंदू शासक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतर कर आता और गायिकाएँ उसके सामने गाती थीं; कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे।
- शहरों के पीछे की अर्थव्यवस्था: उपजाऊ मिट्टी के कारण किसान वर्ष में दो फसलें उगाते थे; इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया है कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों के अधिशेष से पाते थे। भारतीय कपड़ों की मध्य और दक्षिण–पूर्व एशिया में बहुत माँग थी; लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह थे, और डाक व्यवस्था से व्यापारी सूचना, उधार और माल भेज सकते थे।
- सीमाएँ: उसने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया, और उस समय के शहरी केंद्रों की कहानियों में भी अपरिचित बातें विशेष रूप से रेखांकित की जाती थीं; इसलिए अनोखी बातों पर ज़्यादा ज़ोर हो सकता है। किताब याद दिलाती है कि यात्रा वृत्तांत सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए छोड़ देते हैं, या उन्हें एक ख़ास दृष्टिकोण से देखते हैं।
- निष्कर्ष: इब्न बतूता का वृत्तांत शहरों के रूप, बाज़ारों और व्यापार की उपयोगी और जीवंत जानकारी देता है, इसलिए सहायक है; पर पूरी तस्वीर के लिए उसे दूसरे साक्ष्यों के साथ पढ़ना चाहिए।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1इब्न बतूता ने नारियल के फल की तुलना किससे की?
स्रोत 6: फल मानव सिर से मेल खाता है, मानो दो आँखें और एक मुख हों (पृष्ठ 127)।
2स्रोत 8 के अनुसार देहली शहर के कितने द्वार थे?
शहर के अट्ठाईस द्वार हैं, जिन्हें दरवाज़ा कहते हैं; बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल (पृष्ठ 128)।
3इब्न बतूता के अनुसार कौन–सी डाक ज़्यादा तेज़ थी?
स्रोत 10: पैदल डाक अश्व डाक से तेज़ होती है, और इसका प्रयोग अकसर खुरासान के फल ढोने में होता है (पृष्ठ 129)।
4किताब के अनुसार गुप्तचरों की ख़बरें डाक व्यवस्था से सुल्तान तक कितने दिनों में पहुँचती थीं?
सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, पर ख़बरें डाक से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं (पृष्ठ 129)।
6बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व

इस पड़ाव का सवाल
बर्नियर ने भारत को "अपविकसित" क्यों दिखाया, और उसकी बात कहाँ तक सही थी?
पिछली बात से कड़ी इब्न बतूता अचरज से लिखता है; बर्नियर हर चीज़ को यूरोप से तौलता है।
दो यात्री, दो परंपराएँ
- इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया।
- फ्रांस्वा बर्नियर एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था। वह भारत में देखी हर चीज़ की तुलना सामान्य रूप से यूरोप और ख़ास तौर पर फ्रांस की स्थितियों से करता रहता था, विशेषकर उन स्थितियों की, जिन्हें उसने अवसादकारी पाया।
- बर्नियर का इरादा नीति–निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना था, ताकि वे ऐसे निर्णय लें जिन्हें वह "सही" मानता था।
बर्नियर की ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर
- ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर गहन प्रेक्षण, आलोचनात्मक अंतर्दृष्टि और गहन चिंतन के लिए उल्लेखनीय है। इसमें मुग़लों के इतिहास को एक तरह के वैश्विक ढाँचे में रखने का प्रयास है।
- बर्नियर मुग़लकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा, और सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करता रहा।
- उसका चित्रण द्वि–विपरीतता पर टिका है: भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में, या कुछ इतिहासकारों के शब्दों में यूरोप के "विपरीत" के रूप में दिखाया गया। जो भिन्नताएँ उसे दिखीं, उन्हें उसने पदानुक्रम में सजाया, जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का लगे।
6.1भूमि स्वामित्व का प्रश्नपृष्ठ 130–133
एक और यात्री, पेलसर्ट (पृष्ठ 130)
- सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आया डच यात्री पेलसर्ट भी लोगों की व्यापक गरीबी देखकर अचंभित था। राज्य को उत्तरदायी ठहराते हुए वह लिखता है:
- "कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।"
स्रोत 11: ग़रीब किसान (पृष्ठ 131)
- ज़मीन और लोग: साम्राज्य के कई विशाल ग्रामीण अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत हैं; वहाँ खेती अच्छी नहीं होती और आबादी कम है। कृषियोग्य भूमि का बड़ा हिस्सा भी श्रमिकों के अभाव में बिना खेती के रह जाता है।
- शासन का बर्ताव: बर्नियर ज़्यादातर समस्याओं का कारण गवर्नरों और लोभी स्वामियों का बुरा व्यवहार बताता है। गवर्नरों के बुरे व्यवहार से कई श्रमिक मर जाते हैं; लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न कर पाने पर गरीबों से जीविका के साधन छीन लिए जाते हैं और उनके बच्चे दास बनाकर ले जाए जाते हैं।
- नतीजा: वह इसे "अत्यंत निरंकुशता" कहता है, जिससे हताश होकर किसान गाँव छोड़ देते हैं।
किताब बताती है कि यहाँ बर्नियर राज्य और समाज पर यूरोप में चल रहे विवादों में भाग ले रहा था। वह चाहता था कि उसका विवरण यूरोप में उन लोगों के लिए चेतावनी बने, जो निजी स्वामित्व की "अच्छाइयों" को नहीं मानते थे।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 131
स्रोत 11 में बर्नियर ग़रीब किसानों का वर्णन करता है।
बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?
जवाब देखिए
स्रोत 11 में बर्नियर किसानों की कई समस्याएँ गिनाता है।
- ज़मीन और लोग: कई अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत; खेती अच्छी नहीं, आबादी कम; श्रमिकों के अभाव में कृषियोग्य भूमि भी बिना खेती के।
- शासन का बर्ताव: गवर्नरों के बुरे व्यवहार से कई श्रमिकों की मृत्यु; लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न होने पर गरीबों से जीविका के साधन छीन लिए जाते, और उनके बच्चे दास बनाकर ले जाए जाते।
- नतीजा: "अत्यंत निरंकुशता" से हताश होकर किसान गाँव छोड़ देते।
- उसके पक्ष के लिए: हाँ, सहायक होता। उसका पक्ष यह था कि राजकीय भूस्वामित्व हानिकारक है, और वह चाहता था कि उसका विवरण यूरोप में निजी स्वामित्व की "अच्छाइयों" को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने। ऐसा दुखभरा चित्र उस चेतावनी को मज़बूत करता।
पर किताब बताती है कि ग्रामीण समाज असल में कहीं अधिक विविध था, इसलिए यह विवरण एकतरफ़ा है। (पृष्ठ 130–133)
किताब में चित्र 5.11 के साथ लिखा है: "उन्नीसवीं शताब्दी के ऐसे चित्रों ने अपरिवर्तनशील ग्रामीण समाज की धारणा को दृढ़ता प्रदान की।" नीचे उसी शताब्दी का, गाँव के जीवन का एक और चित्र है।

तस्वीर: हल चलाता एक किसान और बैलों की जोड़ी; अभ्रक पर बना चित्र, भारत, लगभग 1870 ई.; वॉल्टर्स आर्ट म्यूज़ियम, बाल्टीमोर।
Walters Art Museum, Baltimore. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
बीच का कोई वर्ग नहीं?
- बर्नियर भारतीय समाज को दरिद्र लोगों का एक–सा जनसमूह बताता है, जिसे एक बहुत अमीर और शक्तिशाली, पर अल्पसंख्यक, शासक वर्ग अपने अधीन रखता है। उसके अनुसार सबसे गरीब और सबसे अमीर के बीच नाम मात्र को भी कोई सामाजिक समूह नहीं था। वह लिखता है: "भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।"
मुग़ल साम्राज्य, बर्नियर की आँखों से
- राजा: "भिखारियों और क्रूर लोगों" का राजा।
- शहर और नगर: विनष्ट, और "खराब हवा" से दूषित।
- खेत: "झाड़ीदार" और "घातक दलदल" से भरे।
- इन सबका एक ही कारण, उसके अनुसार: राजकीय भूस्वामित्व।
स्रोत 12: यूरोप के लिए एक चेतावनी (पृष्ठ 132)
- बर्नियर यूरोप के शासकों को चेताता है कि अगर उन्होंने मुग़ल ढाँचा अपनाया, तो उनके अच्छी तरह जुते, बसे, समृद्ध और फलते–फूलते राज्य नहीं रहेंगे। वे रेगिस्तान और निर्जन स्थानों के, भिखारियों और क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे; बड़े शहर खराब हवा से रहने लायक नहीं रहेंगे, और खेत झाड़ियों और घातक दलदल से भर जाएँगे।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 132
स्रोत 12 में बर्नियर यूरोप के शासकों को चेतावनी देता है।
बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है? जब आप अध्याय 8 तथा 9 पढ़ लें, तब आप इस विवरण पर फिर आइएगा और फिर इसका आकलन कीजिएगा।
जवाब देखिए
बर्नियर दिखाता है कि अगर यूरोप के शासकों ने मुग़ल ढाँचा अपनाया, तो क्या होगा।
- राजा: अच्छी तरह जुते, बसे और समृद्ध राज्यों के बजाय वे रेगिस्तान और निर्जन स्थानों के, भिखारियों और क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे।
- शहर और खेत: बड़े शहर खराब हवा से रहने लायक नहीं रहेंगे, और खेत झाड़ियों और घातक दलदल से भर जाएँगे।
- कारण, उसके अनुसार: इन सबकी जड़ राजकीय भूस्वामित्व।
किताब कहती है कि अध्याय 8 और 9 पढ़ने के बाद इस विवरण पर लौटिए; तब वहाँ के साक्ष्यों से इसे परखिए। (पृष्ठ 132)
बर्नियर की बात कहाँ तक सही?
- मुग़ल दस्तावेज़: किताब के अनुसार एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।
- अबुल फ़ज़्ल: सोलहवीं शताब्दी में अकबर के सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को 'राजत्व का पारिश्रमिक' बताते हैं, यानी प्रजा को सुरक्षा देने के बदले राजा की माँग, न कि अपनी भूमि पर लगान।
- असल में क्या था: संभव है कि यूरोपीय यात्री इसे लगान मानते रहे, क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी। किताब के अनुसार यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।
ग्रामीण समाज की असली तस्वीर
किताब कहती है कि ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था:
- एक ओर भूमि पर उच्चाधिकार रखने वाले बड़े ज़मींदार।
- दूसरी ओर "अस्पृश्य" भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार)।
- बीच में किराए का श्रम लगाने वाला और माल उत्पादन करने वाला बड़ा किसान, और मुश्किल से गुज़ारे लायक उपजाने वाले छोटे किसान।
6.3एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाईपृष्ठ 133–134
बर्नियर के अपने विवरण में दरारें
मुग़ल राज्य को निरंकुश दिखाने की बर्नियर की तन्मयता साफ़ है, फिर भी उसके विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।
- एक ओर वह कहता है कि शिल्पकारों को अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था; इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था।
- दूसरी ओर वह मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं, क्योंकि उत्पाद सोने और चाँदी के बदले निर्यात होते थे।
- वह लंबी दूरी के विनिमय में लगे एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के होने को भी रेखांकित करता है।

तस्वीर: जेड पत्थर का एक दर्पण: इस ओर सोने और मीने की जड़ाई से लाल–हरे फूल–पत्ते बने हैं; मुग़ल काल, अठारहवीं शताब्दी की शुरुआत; क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट।
Cleveland Museum of Art, CC0. Image: clevelandart.org.
स्रोत 13: एक भिन्न सामाजिक–आर्थिक परिदृश्य (पृष्ठ 133)
- ज़मीन: देश का ज़्यादातर भू–भाग अत्यधिक उपजाऊ है। बंगाल मिस्र से चावल, मकई और जीवन की दूसरी ज़रूरी वस्तुओं में ही नहीं, रेशम, कपास और नील जैसी वाणिज्यिक वस्तुओं में भी कहीं आगे है।
- लोग और खेती: भारत के कई भागों में जनसंख्या पर्याप्त है और खेती अच्छी होती है।
- शिल्प: शिल्पकार, जिसे बर्नियर "मूल रूप से आलसी" कहता है, ज़रूरत से गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र और तरह–तरह के रेशमी और सूती वस्त्र बनाता है, जो देश में भी काम आते हैं और विदेश भी जाते हैं।
- सोना और चाँदी: पूरे विश्व में घूमने के बाद सोना और चाँदी भारत में आकर कुछ हद तक खो जाता है।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 133
स्रोत 13 में बर्नियर एक भिन्न सामाजिक–आर्थिक परिदृश्य दिखाता है।
इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?
जवाब देखिए
स्रोत 13 और स्रोत 11, दोनों बर्नियर के हैं, पर दोनों लगभग उलटी तस्वीरें दिखाते हैं।
- भूमि: स्रोत 11 में रेतीली भूमि और बंजर पर्वत; स्रोत 13 में देश का ज़्यादातर भू–भाग अत्यधिक उपजाऊ, और बंगाल मिस्र से भी आगे।
- लोग और खेती: स्रोत 11 में कम आबादी और बिना खेती की भूमि; स्रोत 13 में कई भागों में पर्याप्त जनसंख्या और अच्छी खेती।
- समृद्धि: स्रोत 11 में गाँव छोड़ते किसान; स्रोत 13 में शिल्पकारों के वस्त्र विदेश जाते हैं, और दुनिया भर में घूमकर सोना–चाँदी भारत में आता है और कुछ हद तक यहीं खो जाता है।
यही अंतर किताब की इस बात का आधार है कि बर्नियर के विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। (पृष्ठ 131, 133)
शहर: केवल "शिविर नगर"?
- आँकड़ा: सत्रहवीं शताब्दी में मुग़ल भारत की जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था। यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
- बर्नियर का चित्र: वह मुग़लकालीन शहरों को "शिविर नगर" कहता है, यानी ऐसे नगर जो राजकीय शिविर पर टिके थे, दरबार के आने पर बसते और उसके जाने पर तेज़ी से उजड़ते थे, और जो राजकीय प्रश्रय पर आश्रित थे।
- किताब का आकलन: भूस्वामित्व की तरह यह भी एक अतिसरलीकृत चित्रण था। असल में सभी प्रकार के नगर थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि। इनका होना समृद्ध व्यापारिक समुदायों और व्यावसायिक वर्गों के होने का सूचक है।
व्यापारी संगठित थे
- व्यापारी अकसर मज़बूत सामुदायिक या बंधुत्व के संबंधों से जुड़े थे, और अपनी जाति और व्यावसायिक संस्थाओं के ज़रिए संगठित रहते थे।
- पश्चिमी भारत में ऐसे समूह महाजन कहलाते थे, और उनका मुखिया सेठ।
- अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय का मुखिया करता था, जिसे नगर सेठ कहते थे।
दूसरे शहरी समूह
- व्यावसायिक वर्ग, जैसे चिकित्सक (हकीम या वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार और सुलेखक। इनमें से कई राजकीय प्रश्रय पर निर्भर थे; कई दूसरे संरक्षकों की, या भीड़–भाड़ वाले बाज़ार में आम लोगों की सेवा करके जीते थे।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 134
स्रोत 14 में बर्नियर राजकीय कारखानों का वर्णन करता है।
बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालाँकि हर तरफ़ बहुत सक्रियता है पर उन्नति बहुत कम?
जवाब देखिए
स्रोत 14 में बर्नियर यह विचार दो हिस्सों में रखता है।
- सक्रियता: बड़े कक्षों में कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, दर्जी, और रेशम और मलमल के कारीगर; सब हर सुबह आते हैं और दिन भर काम करते हैं।
- उन्नति नहीं: शाम को सब घर लौट जाते हैं, और उसके अनुसार इसी "निश्चेष्ट नियमित ढंग" से समय बीतता है; कोई अपने जन्म की स्थितियों को बेहतर बनाना नहीं चाहता।
- कारण, उसके अनुसार: शिल्पकारों को अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था।
यानी व्यस्त दिनचर्या और ठहरी हुई ज़िंदगी को साथ रखकर वह यह छाप छोड़ता है। (पृष्ठ 133–134)
किताब के अपने प्रश्न
3बर्नियर के वृत्तांत से उभरने वाले शहरी केंद्रों के चित्र पर चर्चा कीजिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 132–134
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को "शिविर नगर" कहता है, पर किताब के साक्ष्य, और उसके अपने कुछ विवरण, एक भरी–पूरी शहरी दुनिया दिखाते हैं।
- बर्नियर का चित्र: ऐसे नगर जो राजकीय शिविर पर टिके थे, दरबार के आने पर बसते और जाने पर तेज़ी से उजड़ते; जिनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यवहार्य नहीं थी। उसके अनुसार शहर विनष्ट और "खराब हवा" से दूषित थे।
- किताब का आकलन: यह अतिसरलीकृत चित्रण है। सत्रहवीं शताब्दी में मुग़ल भारत की जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक था।
- हर तरह के नगर: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि।
- शहरी समाज: महाजन और उनके मुखिया सेठ, अहमदाबाद जैसे शहरों में नगर सेठ; चिकित्सक, अध्यापक, अधिवक्ता, चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक; और बर्नियर के बताए राजकीय कारखाने (स्रोत 14)।
- निष्कर्ष: बर्नियर के वृत्तांत से शहरों का चित्र अधूरा उभरता है, जिसे दूसरे साक्ष्यों से जाँचना पड़ता है।
8चर्चा कीजिए कि बर्नियर का वृत्तांत किस सीमा तक इतिहासकारों को समकालीन ग्रामीण समाज को पुनर्निर्मित करने में सक्षम करता है?
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 130–133
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: केवल सीमित हद तक। बर्नियर ग्रामीण समाज के बारे में बहुत कुछ कहता है, पर उसका चित्रण एक ख़ास तर्क को साबित करने के लिए था, इसलिए इतिहासकारों को उसे दूसरे साक्ष्यों से जाँचना पड़ता है।
- बर्नियर का ग्रामीण चित्र: उसके अनुसार मुग़ल सम्राट सारी भूमि का स्वामी था; भूधारक भूमि बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए दूरगामी निवेश नहीं करते थे; नतीजा, उसके अनुसार, कृषि का विनाश और किसानों का असीम उत्पीड़न। स्रोत 11 में रेतीली और बंजर भूमि, बिना खेती पड़ी भूमि, दास बनाकर ले जाए जाते बच्चे और गाँव छोड़ते किसान; और उसका वाक्य: "भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।"
- यह चित्र एकतरफ़ा क्यों है: बर्नियर यूरोप के विवादों में भाग ले रहा था, और चाहता था कि उसका विवरण निजी स्वामित्व की "अच्छाइयों" को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने। एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था; अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को 'राजत्व का पारिश्रमिक' बताते हैं।
- इस पर टिके सिद्धांत: मॉन्टेस्क्यू का प्राच्य निरंकुशवाद, और कार्ल मार्क्स की एशियाई उत्पादन शैली, जिसमें ग्रामीण समाज को स्वायत्त और समतावादी समुदायों की एक निष्क्रिय प्रणाली माना गया। किताब कहती है कि यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था।
- असली ग्रामीण समाज: सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: बड़े ज़मींदार, "अस्पृश्य" भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार), बड़े किसान और छोटे किसान। बर्नियर का अपना स्रोत 13 भी उपजाऊ भूमि, पर्याप्त जनसंख्या और अच्छी खेती दिखाता है।
- निष्कर्ष: बर्नियर का वृत्तांत कुछ सुराग देता है, जैसे भूमि राजस्व की ऊँची माँग और किसानों की कठिनाइयाँ, पर केवल उसके आधार पर ग्रामीण समाज का चित्र नहीं बनाया जा सकता; उसे मुग़ल दस्तावेज़ों और दूसरे साक्ष्यों से मिलाकर पढ़ना ज़रूरी है।
9यह बर्नियर से लिया गया एक उद्धरण है: "ऐसे लोगों द्वारा तैयार सुंदर शिल्पकारीगरी के बहुत उदाहरण हैं, जिनके पास औज़ारों का अभाव है, और जिनके विषय में यह भी नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने किसी निपुण कारीगर से कार्य सीखा है। कभी–कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतनी निपुणता से नकल करते हैं कि असली और नकली के बीच अंतर कर पाना मुश्किल हो जाता है। अन्य वस्तुओं में, भारतीय लोग बेहतरीन बंदूकें, और ऐसे सुंदर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि संदेह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार कारीगरी के इन उत्कृष्ट नमूनों से बेहतर बना सकता है। मैं अकसर इनके चित्रों की सुंदरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता से आकर्षित हुआ हूँ।" उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 128, 133–134, 138
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- यहाँ 'अलिखित' का मतलब है 'उल्लिखित', यानी इस अंश में बताए गए शिल्प। बर्नियर यहाँ भारतीय कारीगरों के कौशल की खुलकर तारीफ़ करता है।
- अंश में बताए गए शिल्प: बिना औज़ारों और बिना किसी निपुण कारीगर से सीखे बनाई गई सुंदर शिल्पकारी; यूरोप में बनी वस्तुओं की ऐसी नकल कि असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो; बेहतरीन बंदूकें; सुंदर स्वर्णाभूषण; और सुंदर, मृदु और सूक्ष्म चित्र।
- स्रोत 13 (बर्नियर): गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र, और तरह–तरह के रेशमी और सूती वस्त्र, जो देश में भी काम आते थे और विदेश भी जाते थे।
- स्रोत 14 (राजकीय कारखाने): कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी, जूते बनाने वाले, और रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले। इब्न बतूता के अनुसार सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की भारी माँग थी; किताब में इक़त बुनाई (चित्र 5.10) और पन्ने और माणिक जड़ा सोने का चम्मच (चित्र 5.12) भी है।
- तुलना: अंश के स्वर्णाभूषण कारखाने के सुनारों से, और अंश के चित्र कारखाने के चित्रकारों से मेल खाते हैं। अंश में बंदूकें हैं, जबकि अध्याय के दूसरे विवरणों में कपड़ों का काम बार–बार आता है।
- उलटी बात: इस अंश में बर्नियर कारीगरों की कुशलता सराहता है, जबकि स्रोत 13 में वह शिल्पकार को "मूल रूप से आलसी" कहता है, और किताब के भाग 6.3 के अनुसार वह यह भी कहता है कि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था, इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था।
- निष्कर्ष: यह अंश दिखाता है कि बर्नियर के अपने विवरण कभी–कभी उसके "अपविकसित" पूर्व वाले तर्क से मेल नहीं खाते, और एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1बर्नियर के अनुसार भूधारक उत्पादन बढ़ाने के लिए दूरगामी निवेश क्यों नहीं करते थे?
बर्नियर के अनुसार राजकीय भूस्वामित्व के कारण भूधारक भूमि अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए वे दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे (पृष्ठ 130–131)।
2अकबर के सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को क्या बताते हैं?
अबुल फ़ज़्ल इसे 'राजत्व का पारिश्रमिक' बताते हैं: प्रजा को सुरक्षा देने के बदले राजा की माँग। किताब के अनुसार यह उपज पर लगने वाला कर था (पृष्ठ 131–132)।
3किताब मुग़लकालीन शहरों को केवल "शिविर नगर" कहने को अतिसरलीकृत चित्रण क्यों मानती है?
किताब के अनुसार सभी प्रकार के नगर थे, और सत्रहवीं शताब्दी में मुग़ल भारत की जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था (पृष्ठ 134)।
4अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व कौन करता था?
व्यापारिक समुदाय का मुखिया, जिसे नगर सेठ कहते थे, सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व करता था (पृष्ठ 134)।
7महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक

इस पड़ाव का सवाल
यात्रियों ने महिलाओं के जीवन के बारे में क्या लिखा, और क्या अनछुआ रह गया?
पिछली बात से कड़ी शहरों, गाँवों और कारखानों के बाद अब यात्रियों की नज़र में महिलाएँ।
किसकी नज़र से लिखा गया?
- जिन यात्रियों ने अपने लिखित वृत्तांत छोड़े, वे सामान्यतया पुरुष थे। उन्हें उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति का विषय रुचिकर और कभी–कभी जिज्ञासा भरा लगता था। कभी–कभी वे सामाजिक पक्षपात को "सामान्य" स्थिति मान लेते थे।
इब्न बतूता: दास बाज़ार में और भेंट में
इब्न बतूता के अनुसार बाज़ारों में दास किसी भी दूसरी वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे, और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे।
- सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए भेंट में "घोड़े, ऊँट तथा दास" खरीदे।
- मुल्तान पहुँचकर उसने गवर्नर को "किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा" भेंट किए।
- नसीरुद्दीन नाम के धर्मोपदेशक के प्रवचन से प्रसन्न होकर मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसे "एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास" दे दिए।
दासों में विभेद
- सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; सुल्तान की बहन की शादी पर इब्न बतूता ने उनके प्रदर्शन का खूब आनंद लिया।
- सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था।
- दास सामान्यत: घरेलू श्रम में लगाए जाते थे; पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में इब्न बतूता ने उनकी सेवा ख़ास तौर पर अपरिहार्य पाई।
- दासों की, ख़ासकर घरेलू श्रम वाली दासियों की, कीमत बहुत कम होती थी; जो परिवार उन्हें रख सकते थे, वे ज़्यादातर कम से कम एक या दो रखते थे।
स्रोत 15: दासियाँ (पृष्ठ 135)
- इब्न बतूता के अनुसार सम्राट हर बड़े–छोटे अमीर के साथ अपना एक दास रखता था, जो उस अमीर की मुखबिरी करता था।
- सम्राट महिला सफ़ाई कर्मचारियों को भी नियुक्त करता था, जो बिना बताए घरों में चली जाती थीं, और दासियाँ अपनी जानकारी उन्हें दे देती थीं।
- ज़्यादातर दासियाँ हमलों और अभियानों में बलपूर्वक लाई जाती थीं।
बर्नियर और सती प्रथा
- सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था। इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना।
- उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
स्रोत 16: सती बालिका (पृष्ठ 135)
किताब इसे बर्नियर के वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है।
- लाहौर में बर्नियर ने एक अल्पवयस्क विधवा की बलि होते देखी, जिसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी।
- बच्ची काँपते हुए बुरी तरह रो रही थी। तीन या चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत की मदद से, उसे ज़बरदस्ती ले गए और उसे ज़िंदा जला दिया गया।
- बर्नियर लिखता है कि वह अपनी भावनाएँ दबा नहीं पा रहा था।
महिलाएँ श्रमिक भी थीं
किताब के अनुसार महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था।
- उनका श्रम कृषि में, और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन में, दोनों में महत्त्वपूर्ण था।
- व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं, और कभी–कभी वाणिज्यिक विवाद अदालत तक ले जाती थीं।
- इसलिए किताब के अनुसार यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के ख़ास हिस्सों तक सीमित रखा जाता था।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 136
किताब के चित्र 5.13 में मथुरा की एक मूर्ति का नमूना है, जिसमें यात्री दिखाए गए हैं। यह प्रश्न उसी चित्र पर है।
यहाँ यातायात के कौन–कौन से साधन अपनाए गए हैं?
जवाब देखिए
किताब का चित्र 5.13 खोलकर ध्यान से देखिए।
- क्या देखिए: कौन पैदल चल रहा है; कौन किसी जानवर पर सवार है, और वह कौन–सा जानवर है; कोई गाड़ी, पालकी या दूसरा वाहन है या नहीं।
- अध्याय से जोड़िए: अध्याय में घोड़ों, ऊँटों, पालकी या डोले, कारवाँ और जहाज़ों का ज़िक्र है; देखिए इनमें से कौन–से साधन मूर्ति में दिखते हैं।
जो साधन आप पहचानें, उन्हें एक सूची में लिखिए। (पृष्ठ 136)
वृत्तांतों की सीमा
- यात्रा वृत्तांत इन शताब्दियों के पुरुषों और महिलाओं के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं, पर उनमें सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या एक ख़ास दृष्टिकोण से देखे जाते हैं। इन्हें पढ़ते हुए यह ध्यान रखना ज़रूरी है।
- उपमहाद्वीप के जिन पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) ने समुद्र और पर्वत पार करके बाहर के क्षेत्रों की यात्राएँ कीं, उनके अनुभव अपेक्षाकृत अज्ञात हैं: उन्होंने क्या देखा–सुना, दूर के लोगों से उनके संबंध कैसे बने, वे कौन–सी भाषाएँ बोलते थे। किताब उम्मीद करती है कि आने वाले वर्षों में इतिहासकार इन प्रश्नों पर ध्यान देंगे।
किताब के अपने प्रश्न
4इब्न बतूता द्वारा दास प्रथा के संबंध में दिए गए साक्ष्यों का विवेचन कीजिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 135
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: इब्न बतूता के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में दास बाज़ारों में किसी भी दूसरी वस्तु की तरह खुले आम बिकते थे, और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे।
- भेंट के रूप में: सिंध पहुँचकर उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए "घोड़े, ऊँट तथा दास" खरीदे; मुल्तान के गवर्नर को "किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा" दिया। सुल्तान ने धर्मोपदेशक नसीरुद्दीन को "एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास" दिए।
- दासों में विभेद: कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; कुछ से सुल्तान अपने अमीरों की जासूसी करवाता था (स्रोत 15)।
- घरेलू श्रम: दास सामान्यत: घरेलू काम करते थे, और पालकी या डोला ढोते थे। दासों की, ख़ासकर घरेलू श्रम वाली दासियों की, कीमत बहुत कम होती थी; जो परिवार उन्हें रख सकते थे, उनमें से ज़्यादातर कम से कम एक या दो रखते थे।
- कहाँ से आते थे: ज़्यादातर दासियाँ हमलों और अभियानों में बलपूर्वक लाई जाती थीं।
- निष्कर्ष: इन साक्ष्यों से पता चलता है कि दास प्रथा आम थी और दासों के बीच काफ़ी विभेद था।
5सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 135
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: बर्नियर जैसे यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था, इसलिए उसने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना।
- इच्छा या ज़बरदस्ती: उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
- विधवा की कम उम्र: लाहौर में उसने जिस विधवा की बलि देखी, उसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी (स्रोत 16)।
- डर और विवशता: बच्ची काँपते हुए बुरी तरह रो रही थी; तीन या चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत की मदद से, उसे ज़बरदस्ती घातक स्थल की ओर ले गए।
- क्रूरता: उसके हाथ–पैर बाँध दिए गए ताकि वह भाग न सके, और उसे ज़िंदा जला दिया गया। बर्नियर लिखता है कि वह अपनी भावनाएँ दबा नहीं पा रहा था।
- निष्कर्ष: किताब इस विवरण को बर्नियर के वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है।
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1मुल्तान पहुँचकर इब्न बतूता ने गवर्नर को क्या भेंट किया?
"घोड़े, ऊँट तथा दास" उसने सिंध में सुल्तान के लिए खरीदे थे; "एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास" सुल्तान ने नसीरुद्दीन को दिए थे (पृष्ठ 135)।
2बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए क्यों चुना?
किताब के अनुसार महिलाओं से बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था (पृष्ठ 135)।
3किताब महिलाओं के श्रम के बारे में क्या बताती है?
किताब के अनुसार महिलाओं का श्रम दोनों में महत्त्वपूर्ण था, और व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में भी हिस्सा लेती थीं (पृष्ठ 136)।
सार और काल-रेखा

इस पड़ाव का सवाल
पूरा अध्याय एक नज़र में: किताब की काल-रेखा, मानचित्र और परियोजना कार्य।
पिछली बात से कड़ी सारे पड़ाव पूरे हुए; अब सब एक जगह जोड़िए।
अध्याय एक नज़र में
- अल–बिरूनी (ख़्वारिज़्म, आज के उज़्बेकिस्तान से): उसने संस्कृत सीखकर अरबी में किताब–उल–हिन्द लिखी। उसने उपमहाद्वीप के समाज को ज़्यादातर ब्राह्मणों के लिखे ग्रंथों के सहारे समझा, पर जाति व्यवस्था में अपवित्रता की मान्यता को प्रकृति के नियमों के विरुद्ध बताया।
- इब्न बतूता (मोरक्को से, चौदहवीं शताब्दी): वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था। उसने वे चीज़ें दर्ज कीं जिन्होंने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित किया: नारियल, पान, दिल्ली की प्राचीर, बाज़ार और डाक व्यवस्था।
- फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से, सत्रहवीं शताब्दी): उसने भारत में देखी हर चीज़ की तुलना यूरोप से की और भारत को यूरोप का "विपरीत" दिखाया। उसका मुख्य तर्क राजकीय भूस्वामित्व से पतन का था, पर उसके अपने कुछ विवरण एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।
- महिलाएँ: इब्न बतूता दास प्रथा का, और बर्नियर सती प्रथा का वर्णन करता है। लिखित वृत्तांत छोड़ने वाले यात्री सामान्यतया पुरुष थे, जबकि किताब के अनुसार महिलाओं का श्रम कृषि और दूसरे उत्पादन में महत्त्वपूर्ण था।
- सीख: यात्रा वृत्तांत इन शताब्दियों के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं, पर उनमें सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या एक ख़ास दृष्टिकोण से देखे जाते हैं। इसलिए उन्हें दूसरे साक्ष्यों के साथ मिलाकर पढ़िए।
और जानिए काल-रेखा: कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े (पृष्ठ 137)
| शताब्दी | तिथि | यात्री (कहाँ से) |
|---|---|---|
| दसवीं–ग्यारहवीं | 973–1048 | अल–बिरूनी, पूरा नाम मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल–बिरूनी (उज़्बेकिस्तान से) |
| तेरहवीं | 1254–1323 | मार्को पोलो (इटली से) |
| चौदहवीं | 1304–77 | इब्न बतूता (मोरक्को से) |
| पंद्रहवीं | 1413–82 | अब्द अल–रज़्ज़ाक कमाल अल–दिन इब्न इस्हाक़ अल–समरक़ंदी (समरक़ंद से) |
| पंद्रहवीं | 1466–72 (भारत में बिताए वर्ष) | अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से) |
| सोलहवीं | 1518 (भारत की यात्रा) | दुआर्ते बरबोसा, मृत्यु 1521 (पुर्तगाल से) |
| सोलहवीं | 1562 (मृत्यु का वर्ष) | सयदी अली रेइस (तुर्की से) |
| सोलहवीं | 1536–1600 | अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से) |
| सत्रहवीं | 1626–31 (भारत में बिताए वर्ष) | महमूद वली बल्खी (बल्ख़ से) |
| सत्रहवीं | 1600–67 | पीटर मुंडी (इंग्लैंड से) |
| सत्रहवीं | 1605–89 | ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से) |
| सत्रहवीं | 1620–88 | फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से) |
जिस पंक्ति में तिथि के साथ कोष्ठक में कुछ और नहीं लिखा है, वहाँ तिथियाँ यात्री का जीवन काल बताती हैं, यानी जन्म से मृत्यु तक के वर्ष। पंक्तियाँ उसी क्रम में हैं जिसमें किताब उन्हें देती है।
अल–बिरूनी की आयु: पृष्ठ 116 के अनुसार मृत्यु के समय उसकी आयु सत्तर वर्ष थी। पृष्ठ 137 की काल-रेखा उसके वर्ष 973–1048 देती है, जिससे आयु लगभग 75 वर्ष बनती है।
मानचित्र: ये यात्री कहाँ से आए थे
पृष्ठ 137 की काल-रेखा हर यात्री के नाम के साथ बताती है कि वह कहाँ से था। मानचित्र पर हर बिंदु वही जगह है, और नीचे की तालिका बताती है कि वह जगह आज किस देश में है। किसी नाम के बटन को दबाकर उसे मानचित्र पर दिखाइए या छिपाइए।
| यात्री | शताब्दी | किताब में: कहाँ से | वह जगह आज |
|---|---|---|---|
| अल–बिरूनी | दसवीं–ग्यारहवीं | उज़्बेकिस्तान से; जन्म ख़्वारिज़्म में (पृष्ठ 116) | उज़्बेकिस्तान |
| मार्को पोलो | तेरहवीं | इटली से | इटली |
| इब्न बतूता | चौदहवीं | मोरक्को से; जन्म स्थान तैंजियर (पृष्ठ 118) | मोरक्को |
| अब्द अल–रज़्ज़ाक | पंद्रहवीं | समरक़ंद से | उज़्बेकिस्तान का एक शहर |
| अफानासी निकितिच निकितिन | पंद्रहवीं | रूस से | रूस |
| दुआर्ते बरबोसा | सोलहवीं | पुर्तगाल से | पुर्तगाल |
| सयदी अली रेइस | सोलहवीं | तुर्की से | तुर्की |
| अंतोनियो मानसेरेते | सोलहवीं | स्पेन से | स्पेन |
| महमूद वली बल्खी | सत्रहवीं | बल्ख़ से | उत्तरी अफ़ग़ानिस्तान का एक क़स्बा |
| पीटर मुंडी | सत्रहवीं | इंग्लैंड से | इंग्लैंड, जो आज यूनाइटेड किंगडम का हिस्सा है |
| ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर | सत्रहवीं | फ्रांस से | फ्रांस |
| फ्रांस्वा बर्नियर | सत्रहवीं | फ्रांस से | फ्रांस |
किताब ज़्यादातर यात्रियों का केवल देश बताती है, शहर नहीं। इसलिए किसी देश का बिंदु उस देश के भीतर की एक जगह भर है, यात्री का घर नहीं। तैंजियर, समरक़ंद और बल्ख़ के बिंदु उन्हीं शहरों पर हैं; ख़्वारिज़्म एक क्षेत्र है, और उसका बिंदु केवल क्षेत्र की जगह बताता है।
इन यात्रियों के समय के राज्य और उनकी सीमाएँ आज जैसी नहीं थीं। "वह जगह आज" वाला खाना बस यह बताता है कि वह जगह आज किस देश में है।
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.
⚠️ ये ग़लतियाँ मत कीजिए
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अल–बिरूनी उज़्बेकिस्तान आया था (पृष्ठ 115 पर यही छपा है) | वह उज़्बेकिस्तान से आया था: उसका जन्म ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है | पृष्ठ 115, 116 |
| अल–बिरूनी अपनी इच्छा से ग़ज़नी गया | 1017 ई. में सुल्तान महमूद के ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया; बाद में उसे यह शहर पसंद आने लगा | पृष्ठ 116 |
| किताब–उल–हिन्द संस्कृत या फ़ारसी में लिखी गई | यह अरबी में है, सरल और स्पष्ट भाषा में, और अस्सी अध्यायों में बँटी है | पृष्ठ 117 |
| उलुक पैदल डाक है और दावा अश्व डाक | उलुक अश्व डाक है (हर चार मील पर राजकीय घोड़े); दावा पैदल डाक है (प्रति मील तीन अवस्थान), और पैदल डाक अश्व डाक से तेज़ होती है | पृष्ठ 129 |
| प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया | यह मॉन्टेस्क्यू ने दिया; मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी में एशियाई उत्पादन शैली का सिद्धांत दिया | पृष्ठ 132 |
| बर्नियर के अनुसार सभी महिलाएँ अपनी इच्छा से सती होती थीं | उसके अनुसार कुछ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगाती थीं, पर दूसरों को बाध्य किया जाता था | पृष्ठ 135 |
मानचित्र: इब्न बतूता की यात्राओं की जगहें (प्रश्न 10)
इस मानचित्र पर केवल वे जगहें हैं जिनका नाम किताब इब्न बतूता की यात्राओं में लेती है। मुल्तान और उच्छ ऊपर मानचित्र 1 पर हैं (वहाँ उच्छ का नाम ऊजा छपा है)। किताब पूरा रास्ता रेखा से नहीं दिखाती, इसलिए यहाँ कोई रास्ता नहीं खींचा गया है।
श्रीलंका और रूस इस मानचित्र पर नहीं हैं। श्रीलंका के बारे में किताब बस इतना कहती है कि उसने वहाँ जाने का निश्चय किया, और रूस के बारे में कहती है "हो सकता है वह रूस भी गया हो"। इसलिए दोनों को पक्का मत मानिए।
पूर्वी अफ्रीका का तट और बंगाल बड़े क्षेत्र हैं; उनके बिंदु केवल क्षेत्र की जगह बताते हैं।
समुद्रों के नाम मानचित्र पर हैं। उसने इनमें से कौन–से पार किए होंगे, यह नीचे प्रश्न 10 के उत्तर में देखिए, और अपने उत्तर में "होगा" वाली भाषा रखिए।
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.

तस्वीर: पहाड़ों में एक डेरा: तंबू, लदे हुए ऊँट, घोड़े और बकरियाँ; कश्मीर में बना चित्र, लगभग 1650 ई.; क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट।
Cleveland Museum of Art, CC0. Image: clevelandart.org.
किताब के अपने प्रश्न
10विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित कीजिए जिनकी यात्रा इब्न बतूता ने की थी। कौन–कौन से समुद्रों को उसने पार किया होगा?
मानचित्र कार्य · पृष्ठ 118–120
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- तरीका: मानचित्र पर वही जगहें चिह्नित कीजिए जिनका नाम किताब लेती है, और जहाँ किताब पुराना या क्षेत्र का नाम देती है, वहाँ आज का देश एटलस में खोजिए।
- घर और शुरुआत: मोरक्को (तैंजियर); ट्यूनिस शहर (बॉक्स, पृष्ठ 119)।
- भारत आने से पहले: मक्का, सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान, और पूर्वी अफ्रीका के तटीय व्यापारिक बंदरगाह।
- उपमहाद्वीप तक: मध्य एशिया के रास्ते सिंध; फिर मुल्तान, उच्छ और दिल्ली। मानचित्र 1 में अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब की जगहें हैं।
- चीन के रास्ते में: मध्य भारत, मालाबार तट, मालद्वीप, बंगाल, असम, सुमात्रा, और चीन (जायतुन, आज क्वानझू; बीजिंग)। मालद्वीप के बाद उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया; किताब वहाँ पहुँचने की बात नहीं लिखती, इसलिए श्रीलंका को पक्का मत मानिए।
- किताब का सार (पृष्ठ 120): उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग, भारतीय उपमहाद्वीप और चीन; किताब कहती है "हो सकता है वह रूस भी गया हो", इसलिए रूस को पक्का मत मानिए।
- समुद्र, जो पक्के हैं: किताब कहती है कि वह जहाज़ से सुमात्रा गया और वहाँ से दूसरे जहाज़ से जायतुन। मालद्वीप द्वीप है, और वह वहाँ दो बार गया, इसलिए वहाँ जाने के लिए उसने समुद्र पार किया होगा।
- समुद्र, जो मानचित्र देखकर लगते हैं: मालाबार से मालद्वीप जाते हुए अरब सागर और हिंद महासागर; बंगाल से सुमात्रा जाते हुए बंगाल की खाड़ी; सुमात्रा से चीन जाते हुए दक्षिण चीन सागर। अगर वह पूर्वी अफ्रीका के बंदरगाहों, यमन और ओमान तक समुद्र से गया हो, तो लाल सागर और अरब सागर भी पार किए होंगे। उत्तरी अफ़्रीका से पश्चिम एशिया के रास्ते में भूमध्य सागर हो सकता है।
- ध्यान रखिए: किताब पूरा रास्ता रेखा से नहीं दिखाती, इसलिए रास्ते की रेखाएँ अपने मन से मत खींचिए; केवल जगहों पर निशान लगाइए, और समुद्रों के लिए "होगा" वाली भाषा रखिए।
11अपने ऐसे किसी बड़े संबंधी (माता/पिता/दादा–दादी तथा नाना–नानी/चाचा/चाची) का साक्षात्कार कीजिए जिन्होंने आपके नगर अथवा गाँव के बाहर यात्राएँ की हों। पता कीजिए (क) वे कहाँ गए थे (ख) उन्होंने यात्रा कैसे की (ग) उन्हें कितना समय लगा (घ) उन्होंने यात्रा क्यों की (ङ) क्या उन्होंने किसी कठिनाई का सामना किया। ऐसी समानताओं और भिन्नताओं को सूचीबद्ध कीजिए जो उन्होंने अपने रहने के स्थान और यात्रा किए गए स्थानों के बीच देखीं, विशेष रूप से भाषा, पहनावा, खानपान, रीति–रिवाज, इमारतों, सड़कों तथा पुरुषों और महिलाओं की जीवन–शैली के संदर्भ में। अपने द्वारा हासिल जानकारियों पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
परियोजना कार्य (कोई एक)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- पहले पूछ लीजिए: संबंधी से समय माँगिए और बताइए कि बातचीत स्कूल की रिपोर्ट के लिए है। रिपोर्ट में उनका नाम या फ़ोटो उनकी अनुमति से ही लिखिए।
- प्रश्न तैयार कीजिए: (क) से (ङ) तक के पाँच प्रश्न एक काग़ज़ पर लिख लीजिए, और हर एक के नीचे जवाब लिखने की जगह छोड़िए। साल और जगहों के नाम उसी समय लिखिए।
- तुलना की तालिका बनाइए: तीन खाने बनाइए: विषय, अपने रहने की जगह में, यात्रा की जगह में। विषय की पंक्तियाँ: भाषा, पहनावा, खानपान, रीति–रिवाज, इमारतें, सड़कें, पुरुषों का जीवन, महिलाओं का जीवन।
- रिपोर्ट का ढाँचा: परिचय (किससे बात की, उनकी यात्रा कब और कहाँ की थी), यात्रा का ब्योरा, तुलना की तालिका, और अंत में आपकी राय: इब्न बतूता या बर्नियर की तरह क्या आपके संबंधी ने भी नई जगह को अपनी जगह से तौलकर देखा?
- इस तरह आप भी एक छोटा यात्रा वृत्तांत दर्ज कर लेंगे, जैसा इस अध्याय के यात्रियों ने किया।
12इस अध्याय में उल्लिखित यात्रियों में से एक के जीवन तथा कृतियों के विषय में और अधिक जानकारी हासिल कीजिए। उनकी यात्राओं पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए विशेष रूप से इस बात पर जोर देते हुए कि उन्होंने समाज का कैसा विवरण किया है तथा इनकी तुलना अध्याय में दिए गए उद्धरणों से कीजिए।
परियोजना कार्य (कोई एक)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- यात्री चुनिए: अल–बिरूनी, इब्न बतूता या फ्रांस्वा बर्नियर, या पृष्ठ 137 की काल-रेखा का कोई और यात्री।
- पहले अध्याय से सूची बनाइए: उस यात्री के बारे में किताब जो कहती है (जन्म, यात्राएँ, कृति, किसके लिए लिखा) और उसके सभी स्रोत–अंश एक जगह लिख लीजिए।
- और जानकारी खोजिए: स्कूल या ज़िले के पुस्तकालय की किताबों से, या शिक्षक के सुझाए भरोसेमंद स्रोतों से। हर नई बात के साथ लिखिए कि वह कहाँ से ली।
- तुलना कीजिए: उसने समाज के किन पहलुओं (जाति, शहर, गाँव, व्यापार, महिलाएँ) का वर्णन किया, और क्या नई जानकारी अध्याय के उद्धरणों से मेल खाती है या उनसे अलग है।
- रिपोर्ट का ढाँचा: यात्री का परिचय, यात्राओं का नक्शा या सूची, समाज का उसका वर्णन, अध्याय के उद्धरणों से तुलना, और अंत में यह कि उसके नज़रिए की ताक़त और सीमा क्या थी।
- ध्यान रखिए: अध्याय के अंत में किताब याद दिलाती है कि ऐसे वृत्तांत एक ख़ास दृष्टिकोण से लिखे जाते हैं; रिपोर्ट में इस बात को ज़रूर परखिए।
आख़िरी जाँच✓ पड़ाव पूरा
1पृष्ठ 137 की काल-रेखा में सबसे पहले समय का यात्री कौन है?
अल–बिरूनी के वर्ष 973–1048 हैं, यानी दसवीं–ग्यारहवीं शताब्दी (पृष्ठ 137)।
2काल-रेखा की जिस पंक्ति में तिथि के साथ कोष्ठक में कुछ और नहीं लिखा, वहाँ तिथियाँ क्या बताती हैं?
जहाँ कोष्ठक में "भारत में बिताए वर्ष" या "मृत्यु का वर्ष" जैसा कुछ नहीं लिखा, वहाँ तिथियाँ जीवन काल हैं (पृष्ठ 137)।
3किताब के अनुसार इब्न बतूता के बारे में कौन–सी बात पक्की नहीं है?
किताब कहती है "हो सकता है वह रूस भी गया हो"; बाकी तीनों बातें किताब पक्के तौर पर बताती है (पृष्ठ 118–120)।
शाबाश! आपने पूरा अध्याय पढ़ लिया और हर जाँच कर ली।