पढ़िए, छाँटिए, क्रम लगाइए, सवाल पूछिए
भक्ति–सूफ़ी परंपराएँ
लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक उपमहाद्वीप में धार्मिक विश्वास और पूजा के तरीके बहुत बदले। इस अध्याय में पढ़िए कि तमिलनाडु के अलवार और नयनार संतों से लेकर सूफ़ी सिलसिलों, कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई तक लोगों ने ईश्वर को किन नए रास्तों से पुकारा।
पृष्ठ 140

इतिहासकार इन सदियों को किन स्रोतों से जानते हैं?
- पहले के स्रोत: पहली सहस्राब्दी के मध्य तक उपमहाद्वीप में स्तूप, विहार और मंदिर जैसी धार्मिक इमारतें दिखने लगी थीं; दूसरे विश्वासों का पता पुराण जैसी साहित्यिक परंपराओं से लगता है।
- संत कवियों की रचनाएँ: लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी के नए साहित्यिक स्रोत। संतों ने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपनी बात कही; ये रचनाएँ अधिकतर संगीतबद्ध थीं, और संतों की मृत्यु के बाद अनुयायियों ने इन्हें संकलित किया।
- जीवनियाँ: संतों के अनुयायियों की लिखी जीवनियाँ। ये अक्षरश: सत्य नहीं हैं, फिर भी बताती हैं कि अनुयायी अपने इन नेताओं को कैसे देखते थे।
किताब की बात (पृष्ठ 140)
"ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं": अनुयायियों की पीढ़ियों ने संतों का संदेश आगे बढ़ाया, और रास्ते में कुछ विचार बदले या छोड़ दिए गए।
इसलिए, किताब के शब्दों में, "इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।"
मणिक्वचक्कार कौन थे?
- मणिक्वचक्कार शिव के अनुयायी थे और तमिल में भक्तिगान रचते थे। किताब के पहले चित्र में उनकी बारहवीं शताब्दी की कांस्य मूर्ति है।

तस्वीर: मणिक्वचक्कार की धातु की मूर्ति, बाएँ हाथ में पन्ने लिए हुए; क्लीवलैंड म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट।
Cleveland Museum of Art, CC0. Image: Wikimedia Commons.
अध्याय का रास्ता
- 1धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावटमेल और टकरावपृष्ठ 141–142 · प्रश्न 1
- 2उपासना की कविताएँअलवार, नयनार, स्त्री भक्त और चोलपृष्ठ 143–146
- 3कर्नाटक की वीरशैव परंपराबासवन्ना और लिंगायतपृष्ठ 146–147 · प्रश्न 4
- 4उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ाननाथ, जोगी और सिद्धपृष्ठ 147–148
- 5दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँशासक, आम लोग और मस्जिदेंपृष्ठ 148–152 · प्रश्न 2
- 6सूफ़ीमत का विकासख़ानक़ाह, सिलसिला, बा–शरिया और बे–शरियापृष्ठ 152–153 · प्रश्न 3
- 7उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिलालंगर, ज़ियारत, कव्वाली और राज्यपृष्ठ 153–159 · प्रश्न 6, 7
- 8नवीन भक्ति पंथकबीर, बाबा गुरु नानक, मीराबाईपृष्ठ 160–164 · प्रश्न 5, 8
- 9धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माणस्रोत और उनकी मुश्किलेंपृष्ठ 164–166 · प्रश्न 9
- 10सार और काल-रेखाकाल-रेखा, मानचित्र और परियोजनापृष्ठ 167–169 · प्रश्न 10–12
2उपासना की कविताएँ

इस पड़ाव का सवाल
तमिलनाडु के अलवार और नयनार संत कौन थे, और जाति, स्त्री भक्तों और राज्य के बारे में उनकी कहानी क्या बताती है?
पिछली बात से कड़ी पूजा प्रणालियों के मेल में भक्ति एक बड़ी धारा थी। अब तमिलनाडु के शुरुआती भक्त संतों से मिलिए।
अध्याय के काल (लगभग आठवीं सदी) से पहले ही भक्ति उपासना की परंपरा लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी थी। इसमें मंदिर में इष्टदेव की पूजा से लेकर प्रेम में डूब जाने तक कई रूप थे, और रचनाएँ गाना या उनका पाठ करना इसका हिस्सा था, ख़ास तौर पर वैष्णव और शैव संप्रदायों में।
प्रारंभिक भक्ति परंपरा (पृष्ठ 143)
- संत कवि नेता बने, और उनके आसपास भक्तों के समुदाय बने।
- ब्राह्मण अक्सर देवताओं और भक्तों के बीच महत्त्वपूर्ण बिचौलिए बने रहे, पर भक्ति परंपराओं ने स्त्रियों और "निम्न वर्णों" को भी स्वीकार किया।
- भक्ति परंपरा की एक और विशेषता इसकी विविधता है।
2.1तमिलनाडु के अलवार और नयनार संतपृष्ठ 143–144
तमिलनाडु के अलवार और नयनार (पृष्ठ 143)
- किताब के शब्दों में, "प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।"
- अलवार और नयनार संत एक जगह से दूसरी जगह घूमते हुए तमिल में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे।
- जिन जगहों को इन संतों ने इष्ट का निवास बताया, वहाँ बाद में बड़े मंदिर बने और वे जगहें तीर्थस्थल बन गईं।
- संतों के भजन मंदिरों के अनुष्ठानों में गाए जाने लगे, और संतों की प्रतिमाओं की भी पूजा होने लगी।
2.2जाति के प्रति दृष्टिकोणपृष्ठ 144
अलवार, नयनार और जाति (पृष्ठ 144)
- किताब बताती है, "कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।"
- किताब के अनुसार "कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है", क्योंकि भक्ति संत अलग-अलग समुदायों से थे: ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान, और कुछ उन जातियों से भी जिन्हें "अस्पृश्य" माना जाता था।
- अलवार और नयनार संतों की रचनाओं को वेदों जितना महत्त्वपूर्ण बताया गया। अलवार संतों के एक मुख्य काव्य संकलन, नलयिरादिव्यप्रबंधम्, का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था।
स्रोत 1: चतुर्वेदी (चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण) और "अस्पृश्य" (पृष्ठ 144)
यह उद्धरण तोंदराडिप्पोडि नामक एक ब्राह्मण अलवार के काव्य से लिया गया है:
चतुर्वेदी जो अजनबी हैं और तुम्हारी सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, उनसे भी ज्यादा आप (हे विष्णु) उन "दासों" को पसंद करते हैं, जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
स्रोत 2: शास्त्र या भक्ति (पृष्ठ 144)
यह छंद अप्पार नामक नयनार संत की रचना है:
हे धूर्तजन, जो तुम शास्त्र को उद्धृत करते हो
तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?
तुम केवल मारपेरू के स्वामी (शिव जो तमिलनाडु के तंजावुर जिले के मारपेरू में बसते हैं।) को अपना एकमात्र आश्रयदाता मानकर नतमस्तक हो।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 144
स्रोत 1 तोंदराडिप्पोडि नामक एक ब्राह्मण अलवार के काव्य से लिया गया है।
क्या आपको लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति व्यवस्था के विरोधी थे?
जवाब देखिए
पूरी तरह नहीं, पर वे भक्ति को वर्ण से ऊपर रखते थे।
- क्या कहते हैं: विष्णु उन चतुर्वेदियों से, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, अधिक उन "दासों" को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
- कौन कह रहा है: तोंदराडिप्पोडि ख़ुद ब्राह्मण अलवार थे।
इसलिए वे जन्म के आधार पर बड़प्पन को चुनौती देते हैं। अलवार और नयनार संतों के जाति प्रथा के विरोध वाले मत पर किताब कहती है, "कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है"।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 144
स्रोत 1 ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि का है और स्रोत 2 नयनार संत अप्पार का छंद है।
क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडि और अप्पार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?
जवाब देखिए
हाँ, दोनों भक्ति को शास्त्र-ज्ञान और कुल से बड़ा मानते हैं, पर कहने का ढंग अलग है।
- तोंदराडिप्पोडि: निष्ठा न रखने वाले चतुर्वेदियों की तुलना भक्त "दासों" से करते हैं।
- अप्पार: शास्त्र उद्धृत करने वालों को "हे धूर्तजन" कहकर पूछते हैं, "तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?" और केवल मारपेरू के स्वामी (शिव) के आगे झुकने को कहते हैं।
अप्पार ज़्यादा तीखे हैं; दोनों के लिए इष्ट के प्रति प्रेम ही कसौटी है।
और जानिए भक्ति साहित्य का संकलन (बॉक्स, पृष्ठ 144)
- दसवीं शताब्दी तक बारह अलवारों की रचनाओं का एक संकलन बन गया, जो नलयिरादिव्यप्रबंधम् ("चार हज़ार पावन रचनाएँ") के नाम से जाना जाता है।
- दसवीं शताब्दी में ही अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताएँ तवरम नाम के संकलन में रखी गईं, जिनका वर्गीकरण संगीत के आधार पर हुआ।
2.3स्त्री भक्तपृष्ठ 144–145
स्रोत 3: एक राक्षसी? (पृष्ठ 145)
यह उद्धरण कराइक्काल अम्मइयार की कविता से लिया गया है, जहाँ वे स्वयं का वर्णन कर रही हैं:
राक्षसी, फूली हुई नाड़ियों वाली
बाहर निकली आँखें, सफेद दाँत और भीतर धँसा उदर
लाल केश और आगे निकले दाँत,
लंबी पिंडली की नली जो टखनों तक फैली हुई है।
वन में विचरते समय चीखना और
क्रंदन यह अलंकटु का वन है,
जो हमारे पिता (शिव) का घर है।
वह नृत्य करते हैं..... उनके जटाजूट आठों ओर बिखर जाते हैं।
उनके अंग शांत हैं।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 145
स्रोत 3 ("एक राक्षसी?") कराइक्काल अम्मइयार की कविता का अंश है, जिसमें वे स्वयं का वर्णन करती हैं।
उन उपायों की सूची बनाइए जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आप को प्रस्तुत करती हैं। किस भाँति यह उपाय स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा से भिन्न हैं।
जवाब देखिए
स्रोत 3 में वे अपने को सुंदर नहीं, डरावने रूप में दिखाती हैं:
- फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश और आगे निकले दाँत;
- वन में चीखती और क्रंदन करती हुई;
- वह वन "जो हमारे पिता (शिव) का घर है"।
वे सजने-सँवरने और सुंदर दिखने के बजाय शिव की भक्ति को ही अपनी पहचान बनाती हैं। उन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया था, और किताब कहती है, "इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।"

तस्वीर: कराइक्काल अम्मइयार की धातु की एक मूर्ति; तमिलनाडु, चोल काल, लगभग तेरहवीं शताब्दी का अंत; मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, न्यूयॉर्क।
Metropolitan Museum of Art, New York, CC0. Image: Wikimedia Commons.
2.4राज्य के साथ संबंधपृष्ठ 145–146
तमिल क्षेत्र के राज्य, बौद्ध और जैन धर्म (पृष्ठ 145)
- पहली सहस्राब्दी ईसवी के आरंभ में तमिल क्षेत्र में कई महत्त्वपूर्ण सरदारियाँ थीं। सहस्राब्दी के उत्तरार्ध में राज्य बने, जिनमें पल्लव और पांड्य राज्य (छठी से नवीं शताब्दी ईसवी) भी थे।
- बौद्ध और जैन धर्म तमिल क्षेत्र में सदियों से थे। इन धर्मों को व्यापारियों और शिल्पकारों का संरक्षण मिलता था, पर राजकीय संरक्षण और अनुदान यदा–कदा ही।
- तमिल भक्ति रचनाओं की एक मुख्य विषयवस्तु बौद्ध और जैन धर्म का विरोध है, ख़ास तौर पर नयनार संतों की रचनाओं में। इतिहासकारों का सुझाव है कि परस्पर विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान को लेकर प्रतिस्पर्धा थी।
चोल सम्राट (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) और भक्ति (पृष्ठ 145–146)
- चोल सम्राटों ने ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा को समर्थन दिया, और विष्णु और शिव के मंदिरों के निर्माण के लिए भूमि–अनुदान दिए।
- चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर चोल सम्राटों की मदद से बने।
- चोल सम्राटों के समय कांस्य में ढाली गई शिव की प्रतिमाएँ भी बनीं। किताब कहती है, "स्पष्ट है कि नयनार संतों का दर्शन शिल्पकारों के लिए प्रेरणा बना।"
- चोल सम्राटों ने तमिल भाषा के शैव भजनों का गायन मंदिरों में प्रचलित किया, और इन भजनों का संकलन एक ग्रंथ (तवरम) के रूप में करवाने का ज़िम्मा भी उठाया।
शासकों को संतों का साथ क्यों चाहिए था? (पृष्ठ 146)
- नयनार और अलवार संत वेल्लाल किसानों द्वारा सम्मानित थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया।
- उदाहरण के लिए, चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया और अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुंदर मंदिरों का निर्माण कराया, जिनमें पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ सजी थीं।
- 945 ईसवी के एक अभिलेख से पता चलता है कि चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं। इन मूर्तियों को उत्सव में एक जुलूस में निकाला जाता था।

तस्वीर: नटराज के रूप में शिव, एक गोल घेरे के भीतर नाचते हुए; धातु की मूर्ति, तमिलनाडु, लगभग ग्यारहवीं शताब्दी; मेट्रोपॉलिटन म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट, न्यूयॉर्क।
Metropolitan Museum of Art, New York, CC0. Image: Wikimedia Commons.
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1किताब के अनुसार प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) किनके नेतृत्व में हुआ?
किताब के शब्दों में, "प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।" (पृष्ठ 143)
2अलवार संतों के किस काव्य संकलन का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था?
किताब के अनुसार अलवारों के मुख्य काव्य संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् का वर्णन तमिल वेद के रूप में किया जाता था (पृष्ठ 144)। तवरम नयनार संतों अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताओं का संकलन है।
3शासकों ने नयनार और अलवार संतों का समर्थन पाने का प्रयास क्यों किया?
किताब कहती है कि नयनार और अलवार संत वेल्लाल कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया (पृष्ठ 146)।
4945 ईसवी के एक अभिलेख के अनुसार चोल सम्राट परांतक प्रथम ने क्या करवाया?
किताब के अनुसार परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं, और इन्हें उत्सव में जुलूस में निकाला जाता था (पृष्ठ 146)।
3कर्नाटक की वीरशैव परंपरा

इस पड़ाव का सवाल
बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक के वीरशैव (लिंगायत) किन बातों पर प्रश्न उठाते थे?
पिछली बात से कड़ी अलवार और नयनार संत तमिलनाडु में थे। अब कर्नाटक में बासवन्ना के आंदोलन की बारी।
बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नया आंदोलन उभरा, जिसका नेतृत्व बासवन्ना (1106–68) नाम के एक ब्राह्मण ने किया। बासवन्ना एक कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे।
वीरशैव और लिंगायत (पृष्ठ 146–147)
- बासवन्ना के अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।
- कर्नाटक में लिंगायत समुदाय का आज भी महत्त्व है। लिंगायत शिव की आराधना लिंग के रूप में करते हैं।
- लिंगायत समुदाय के पुरुष बाएँ कंधे पर चाँदी के एक पिटारे में एक छोटा लिंग धारण करते हैं।
- लिंगायत जिन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं, उनमें जंगम, यानी यायावर भिक्षु, शामिल हैं।
मृत्यु के बारे में लिंगायत (पृष्ठ 147)
विश्वास
लिंगायतों का विश्वास है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाएँगे और इस संसार में फिर नहीं लौटेंगे।
आचरण
लिंगायत धर्मशास्त्र में बताए गए श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते, और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं।
वचन (पृष्ठ 147)
- किताब कहती है, "वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।"
स्रोत 4: अनुष्ठान और यथार्थ संसार (पृष्ठ 147)
यह बासवन्ना द्वारा रचित एक वचन है:
जब वे एक पत्थर से बने सर्प को
देखते हैं तो उस पर दूध चढ़ाते हैं
यदि असली साँप आ जाए तो
कहते हैं "मारो–मारो"।
देवता के उस सेवक को, जो
भोजन परसने पर खा सकता है वे
कहते हैं "चले जाओ! चले जाओ।"
किन्तु ईश्वर की प्रतिमा को जो खा
नहीं सकती, वे व्यंजन परोसते हैं।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 147
स्रोत 4 बासवन्ना का एक वचन है, जिसमें पत्थर के साँप और असली साँप, और प्रतिमा और देवता के सेवक की बात है।
अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए। वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं।
जवाब देखिए
बासवन्ना दिखावटी अनुष्ठानों के विरोधी हैं।
- रवैया: लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप आए तो कहते हैं "मारो–मारो"; जो सेवक खा सकता है उसे कहते हैं "चले जाओ! चले जाओ।", और जो प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं।
- समझाने का ढंग: वे रोज़ की जानी-पहचानी बातों के जोड़े रखकर उलटापन दिखाते हैं, ताकि श्रोता ख़ुद देख ले कि कर्मकांड और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते।
भाषा भी सरल है: किताब बासवन्ना के वचनों को सरल, स्पष्ट भाषा वाले स्रोतों का उदाहरण बताती है (पृष्ठ 166)।
किताब के अपने प्रश्न
4चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 144–147
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- तमिलनाडु के भक्त संतों और कर्नाटक के वीरशैवों ने भक्ति को जन्म और कुल से ऊपर रखा, पर दोनों के तरीके अलग थे।
- अलवार और नयनार: "कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।" किताब के अनुसार कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है। संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और "अस्पृश्य" मानी गई जातियों से भी थे।
- रचनाएँ वेदों जितनी: नलयिरादिव्यप्रबंधम् को तमिल वेद कहा गया।
- स्रोत 1 और 2: ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु को अपने चरणों से प्रेम रखने वाले "दास", चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों, उन चतुर्वेदियों से ज़्यादा प्रिय हैं जो विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते। अप्पार पूछते हैं, "तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?"
- वीरशैव (लिंगायत): इन्होंने जाति का और कुछ समुदायों को "दूषित" मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध किया, पुनर्जन्म पर प्रश्न उठाए, और वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह अपनाए। इसलिए ब्राह्मणीय व्यवस्था में नीचा स्थान पाने वाले समुदाय इनके अनुयायी बने। (पृष्ठ 144–147)
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1कर्नाटक में बारहवीं शताब्दी के वीरशैव आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
किताब के अनुसार इस आंदोलन का नेतृत्व बासवन्ना (1106–68) ने किया, जो एक ब्राह्मण थे और कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे (पृष्ठ 146)।
2धर्मशास्त्रों ने जिन आचारों को अस्वीकार किया था, उनमें से लिंगायतों ने किन्हें मान्यता दी?
किताब कहती है कि धर्मशास्त्रों में अस्वीकार किए गए वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह को लिंगायतों ने मान्यता दी (पृष्ठ 147)।
3वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति किससे है?
किताब के अनुसार "वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।" (पृष्ठ 147)
4उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान

इस पड़ाव का सवाल
चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत में धार्मिक जीवन कैसा था?
पिछली बात से कड़ी दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलनों के बाद अब उत्तरी भारत को देखिए।
दक्षिण में भक्ति संतों की रचनाएँ मंदिरों तक पहुँचीं। इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत से ऐसा कोई ग्रंथ नहीं मिला। इस पड़ाव में किताब के क्रम में पढ़िए कि उत्तरी भारत में क्या अलग था।
और जानिए नए धार्मिक विकास (बॉक्स, पृष्ठ 147)
- मध्यवर्ती शताब्दियों में दो मुख्य विकास देखने में आए।
- एक ओर तमिल भक्तों (ख़ास तौर पर वैष्णव) के विचारों को संस्कृत परंपरा में समाहित कर लिया गया, जिसका परिणाम सबसे प्रसिद्ध पुराणों में से एक, भागवत पुराण, की रचना थी।
- दूसरे, तेरहवीं शताब्दी में भक्ति परंपरा का विकास महाराष्ट्र में हुआ।
किताब कहती है, "सूफ़ियों का आगमन (अनुभाग 6) इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।"
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1उत्तरी भारत में रूढ़िवादी ब्राह्मणीय साँचे के बाहर के किन धार्मिक नेताओं का प्रभाव बढ़ रहा था?
किताब के अनुसार ऐसे नेताओं में नाथ, जोगी और सिद्ध शामिल थे; उनमें से बहुत से शिल्पी समुदायों के थे, जिनमें जुलाहे भी थे (पृष्ठ 147)।
2भारत में तुर्कों के आगमन की पराकाष्ठा किसमें हुई?
किताब कहती है कि तुर्कों के आगमन की पराकाष्ठा दिल्ली सल्तनत (तेरहवीं शताब्दी) की स्थापना में हुई, जिससे राजपूत राज्यों और उनसे जुड़े ब्राह्मणों का पराभव हुआ (पृष्ठ 148)।
5दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ

इस पड़ाव का सवाल
इस्लाम के आने के बाद शासकों और आम लोगों के धार्मिक जीवन में क्या बदला?
पिछली बात से कड़ी उत्तरी भारत के नाथ, जोगी और सिद्ध के बाद अब देखिए कि उपमहाद्वीप में इस्लाम कैसे आया और लोक जीवन में कैसे घुला।
प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए, और मध्य एशिया से लोग देश के उत्तर–पश्चिम प्रांतों में आकर बसे। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उद्भव के बाद ये क्षेत्र उस संसार का हिस्सा बन गए जिसे अकसर इस्लामी विश्व कहा जाता है।
5.1शासकों और शासितों के धार्मिक विश्वासपृष्ठ 148–150
शासकों का धर्म (पृष्ठ 148)
- 711 ईसवी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध को जीतकर ख़लीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया।
- बाद में (लगभग तेरहवीं शताब्दी ईसवी) तुर्क और अफ़गानों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी। समय के साथ दक्कन और दूसरे भागों तक सल्तनत की सीमा फैली।
- बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म था। सोलहवीं शताब्दी में मुगल सल्तनत की स्थापना के साथ भी यह स्थिति बनी रही।
- अठारहवीं शताब्दी में उभरे कई क्षेत्रीय राज्यों के शासक भी इस्लाम धर्म मानने वाले थे।

तस्वीर: कूफ़ी लिपि में लिखे कुरान शरीफ़ का एक पन्ना (सूरा 48, आयतें 27–29); उत्तरी अफ़्रीका या निकट पूर्व, आठवीं–नवीं शताब्दी; फ़्रीयर गैलरी ऑफ़ आर्ट, वॉशिंगटन।
Freer Gallery of Art, Washington. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
उलमा (बॉक्स, पृष्ठ 148)
- उलमा (आलिम का बहुवचन) इस्लाम धर्म के ज्ञाता थे।
- इस्लामी परिपाटी के संरक्षक होने के नाते उलमा धार्मिक, कानूनी और अध्यापन संबंधी ज़िम्मेदारी निभाते थे।
शरिया (बॉक्स, पृष्ठ 149)
- शरिया मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाला कानून है। यह कुरान शरीफ़ और हदीस पर आधारित है।
- हदीस का अर्थ है पैगम्बर साहब से जुड़ी परंपराएँ, जिनमें उनके स्मृत शब्द और क्रियाकलाप भी आते हैं।
- जब इस्लाम अरब क्षेत्र से बाहर फैला, जहाँ के आचार–व्यवहार भिन्न थे, तो क़ियास (सदृशता के आधार पर तर्क) और इजमा (समुदाय की सहमति) को भी कानून का स्रोत माना जाने लगा।
- इस तरह शरिया कुरान, हदीस, क़ियास और इजमा से बना।
सिद्धांत और व्यवहार (पृष्ठ 149)
- सिद्धांत में मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना होता था, और उलमा से अपेक्षा थी कि वे शासन में शरिया का अमल सुनिश्चित करवाएँगे।
- पर उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी, क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं थी।
ज़िम्मी और जज़िया (पृष्ठ 149)
- ज़िम्मी (अरबी शब्द ज़िम्मा से) का अर्थ है संरक्षित श्रेणी। ज़िम्मी वे लोग थे जो उद्घाटित धर्मग्रंथ को मानते थे, जैसे इस्लामी शासकों के क्षेत्र में रहने वाले यहूदी और ईसाई।
- ज़िम्मी जज़िया नाम का कर चुकाकर मुसलमान शासकों से संरक्षण पाने के अधिकारी हो जाते थे। भारत में हिंदुओं को भी ज़िम्मी में शामिल कर लिया गया।
- मुगल शासक अपने आपको केवल मुसलमानों का नहीं, सारे समुदायों का बादशाह मानते थे।
शासितों के प्रति लचीली नीति (पृष्ठ 149)
- बहुत से शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को भूमि अनुदान और कर की छूट दी, और गैर–मुसलमान धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त किया।
- ऐसे अनुदान अकबर और औरंगज़ेब समेत अनेक मुगल बादशाहों ने दिए।
स्रोत 5: खम्बात का गिरजाघर (पृष्ठ 149)
यह उद्धरण उस फ़रमान (बादशाह के हुक्मनामे) का अंश है जिसे 1598 में अकबर ने जारी किया:
हमारे बुलंद और मुकद्दस (पवित्र) ज़ेहन में पहुँचा है कि यीशु की मुकद्दस जमात के पादरी खम्बायत गुजरात के शहर में इबादत के लिए (गिरजाघर) एक इमारत की तामीर (निर्माण) करना चाहते हैं; इसलिए यह शाही फ़रमान…. जारी किया जा रहा है…. खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ और उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें जिससे वे अपनी इबादत कर सकें। यह ज़रूरी है कि बादशाह के इस फ़रमान की हर तरह से तामील (पालन) हो।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 149
स्रोत 5 अकबर के 1598 के एक फ़रमान का अंश है, जिसमें खम्बायत (गुजरात) में पादरियों के गिरजाघर बनाने की बात है।
वे कौन लोग थे जिनकी तरफ़ से अकबर को अपने फ़रमान की बेअदबी का अंदेशा था?
जवाब देखिए
खम्बायत (गुजरात) के प्रभावशाली लोग।
- फ़रमान कहता है कि "खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ"।
- यानी अकबर को डर था कि शहर के बड़े लोग पादरियों को गिरजाघर बनाने से रोक सकते हैं।
बादशाह जहाँगीर और एक जोगी (पृष्ठ 149)
- किताब के एक मुगल चित्र में बादशाह जहाँगीर और एक जोगी को दिखाया गया है।

तस्वीर: बादशाह जहाँगीर और गोसाईं जदरूप; मुग़ल चित्र, लगभग 1625–1630; हार्वर्ड आर्ट म्यूज़ियम्स।
Harvard Art Museums. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
स्रोत 6: जोगी के प्रति श्रद्धा (पृष्ठ 150)
यह उद्धरण 1661–62 में औरंगज़ेब द्वारा एक जोगी को लिखे पत्र का अंश है:
बुलंद मकाम शिवमूरत गुरु आनंद नाथ जियो!
जनाब–ए–मुहतरम (श्रद्धेय) अमन और खुशी से हमेशा श्री शिव जियो की पनाह में रहें!
पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए की रकम जो भेंट के तौर पर भेजी गई है आप तक पहुँचेगी… जनाब–ए–मुहतरम आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 150
स्रोत 6 औरंगज़ेब के 1661–62 में एक जोगी, गुरु आनंद नाथ, को लिखे पत्र का अंश है।
जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए। जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।
जवाब देखिए
- देवता: शिव। पत्र में "श्री शिव जियो की पनाह" लिखा है।
- बादशाह का रवैया: आदर और उदारता का। औरंगज़ेब ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा, "आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।"
5.2लोक प्रचलन में इस्लामपृष्ठ 150–151
लोक प्रचलन में इस्लाम (पृष्ठ 150)
- इस्लाम के आगमन के बाद के परिवर्तन शासक वर्ग तक सीमित नहीं रहे। वे पूरे उपमहाद्वीप में दूर-दूर तक किसान, शिल्पी, योद्धा और व्यापारी जैसे समुदायों के बीच फैले।
जिन्होंने इस्लाम धर्म कबूल किया, उन्होंने सिद्धांत में ये पाँच मुख्य बातें मानीं:
इस्लाम की पाँच मुख्य ‘बातें’
- अल्लाह एकमात्र ईश्वर है, और पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत (शाहद) हैं;
- दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ी जानी चाहिए;
- खैरात (ज़कात) बाँटनी चाहिए;
- रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना चाहिए;
- हज के लिए मक्का जाना चाहिए।
व्यवहार में भिन्नता (पृष्ठ 150)
- सांप्रदायिक (शिया, सुन्नी) वजहों से और स्थानीय लोकाचारों के प्रभाव से धर्मांतरित लोगों के व्यवहारों में भिन्नता दिखती थी।
- खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय के लोगों ने कुरान के विचारों को कहने के लिए देशी साहित्यिक विधा का सहारा लिया। जीनन (संस्कृत शब्द ज्ञान से) नाम के भक्ति गीत राग में बँधे थे, और पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में दैनिक प्रार्थना के समय गाए जाते थे।
- मालाबार तट (केरल) पर बसे अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा अपनाई, और मातृकुलीयता और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार भी अपनाए।
खोजकी लिपि (पृष्ठ 150)
- खोजकी लिपि में लिखे जाने से पहले जीनन मौखिक रूप से आगे बढ़ते थे।
- खोजकी लिपि स्थानीय लंडा (व्यापारियों की संक्षिप्त लिपि) से निकली है। पंजाब, सिंध और गुजरात के खोजा लोग, सभी लंडा का प्रयोग करते थे।
मातृगृहता (बॉक्स, पृष्ठ 151)
- मातृगृहता वह परिपाटी है जिसमें स्त्रियाँ विवाह के बाद अपने मायके में ही अपनी संतान के साथ रहती हैं, और उनके पति उनके साथ आकर रह सकते हैं।
मस्जिदें: सार्वभौमिक और स्थानीय (पृष्ठ 151–152)
किताब कहती है, "एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।"
तीन मस्जिदें, किताब के उदाहरण
- केरल
- केरल में तेरहवीं शताब्दी की एक मस्जिद, जिसकी छत शिखर के आकार की है।
- बांग्लादेश
- ईंटों की बनी अतिया मस्जिद, 1609, ज़िला मैमनसिंग, बांग्लादेश।
- श्रीनगर
- श्रीनगर में झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद कश्मीर की सभी मस्जिदों में ‘मुकुट का नगीना’ समझी जाती है। इसका निर्माण 1395 में हुआ, और यह कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण है। इसके शिखर और नक्काशीदार छज्जे ख़ास हैं, और यह पेपरमैशी से सजाई गई है।

तस्वीर: ईंटों की बनी अतिया मस्जिद (1609), बांग्लादेश: पूरी इमारत, एक कोने से। सामने की दीवार ईंटों की सजावट से भरी है।
IqbalHossain, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.

तस्वीर: श्रीनगर: झेलम नदी और उसके किनारे शाह हमदान मस्जिद; सैमुअल बोर्न का फ़ोटो, 1862 और 1874 के बीच; राइक्सम्यूज़ियम, एम्सटर्डम।
Samuel Bourne (Rijksmuseum, Amsterdam), CC0. Image: Wikimedia Commons.
5.3समुदायों के नामपृष्ठ 151–152
समुदायों के नाम (पृष्ठ 151–152)
हम अधिकतर हिंदू और मुसलमान जैसे शब्दों को धार्मिक समुदायों का पक्का नाम मान लेते हैं, पर इन शब्दों का बहुत समय तक कोई प्रचलन नहीं था। जिन इतिहासकारों ने आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों का अध्ययन किया है, वे बताते हैं कि इनमें "मुसलमान" शब्द का शायद ही कहीं प्रयोग हुआ है। लोगों को उनके जन्मस्थान से पहचाना जाता था।
किताब के अपने प्रश्न
2किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 151–152
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- किताब कहती है, "एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।"
- सार्वभौमिक तत्व: हर मस्जिद का मक्का की ओर अनुस्थापन, जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिम्बर (व्यासपीठ) से पता चलता है।
- स्थानीय तत्व: छत और निर्माण का सामान जगह के हिसाब से बदलता था।
- केरल: तेरहवीं शताब्दी की एक मस्जिद, जिसकी छत शिखर के आकार की है।
- मैमनसिंग, बांग्लादेश: 1609 की अतिया मस्जिद, ईंटों की बनी।
- श्रीनगर: 1395 की शाह हमदान मस्जिद, कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का नमूना, जिसमें शिखर, नक्काशीदार छज्जे और पेपरमैशी की सजावट है।
- यानी नमाज़ की दिशा और मूल ढाँचा हर जगह एक था, पर दिखने में हर मस्जिद अपने इलाके की परिपाटी से बनी। (पृष्ठ 151–152)
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1711 ईसवी में सिंध को जीतकर ख़लीफ़ा के क्षेत्र में किसने शामिल किया?
किताब के अनुसार 711 ईसवी में मुहम्मद बिन कासिम नाम के एक अरब सेनापति ने सिंध को जीतकर ख़लीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया (पृष्ठ 148)।
2ज़िम्मी कौन थे?
किताब के अनुसार ज़िम्मी, यानी संरक्षित श्रेणी, वे लोग थे जो उद्घाटित धर्मग्रंथ मानते थे, जैसे यहूदी और ईसाई; वे जज़िया कर चुकाकर संरक्षण के अधिकारी होते थे, और भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल किया गया (पृष्ठ 149)। इस्लाम के ज्ञाता उलमा थे।
3खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय के जीनन क्या थे?
किताब के अनुसार जीनन राग में बँधे भक्ति गीत थे, जो पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में दैनिक प्रार्थना के समय गाए जाते थे (पृष्ठ 150)।
6सूफ़ीमत का विकास

इस पड़ाव का सवाल
सूफ़ी कौन थे, और ख़ानक़ाह और सिलसिला क्या थे?
पिछली बात से कड़ी शासकों और आम लोगों के इस्लाम के बाद अब इस्लाम के भीतर की रहस्यवादी धारा, सूफ़ीमत, की बारी।
इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में धार्मिक और राजनीतिक संस्था के रूप में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा।
सूफ़ियों ने क्या कहा? (पृष्ठ 152)
- सूफ़ियों ने रूढ़िवादी परिभाषाओं की, और धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की।
- इसके बदले सूफ़ियों ने मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया।
- सूफ़ियों ने पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल बताकर उनका अनुसरण करने की सीख दी।
- सूफ़ियों ने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
"सूफ़ीवाद" उन्नीसवीं शताब्दी में बना एक अंग्रेज़ी शब्द है। इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए तसव्वुफ़ शब्द आता है। यह शब्द कहाँ से निकला, इस पर किताब तीन मत देती है:
सूफ़ीवाद और तसव्वुफ़ (बॉक्स, पृष्ठ 152)
- कुछ विद्वानों के अनुसार ‘सूफ़’ से, जिसका अर्थ ऊन है: उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा, जिसे सूफ़ी पहनते थे।
- दूसरे विद्वानों के अनुसार ‘सफ़ा’ से, जिसका अर्थ है साफ़।
- यह भी संभव है कि यह शब्द ‘सफ़ा’ से निकला हो, जो पैगम्बर की मस्जिद के बाहर एक चबूतरा था, जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली धर्म के बारे में जानने के लिए इकट्ठी होती थी।
6.1ख़ानक़ाह और सिलसिलापृष्ठ 152–153
ख़ानक़ाह (पृष्ठ 152)
- ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था, जिसका अपना साहित्य था।
- किताब के अनुसार सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह (फारसी) के इर्द-गिर्द, शेख की देखरेख में संगठित होते थे।
- ख़ानक़ाह का नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था। शेख आध्यात्मिक व्यवहार के नियम तय करते थे, और ख़ानक़ाह में रहने वालों के आपसी संबंधों और शेख और आम लोगों के रिश्तों की सीमा भी।
सिलसिला यानी जंज़ीर (पृष्ठ 152–153)
लगभग बारहवीं शताब्दी से इस्लामी दुनिया में सूफ़ी सिलसिले बनने लगे। सिलसिला शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी से आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता था।
- पैगम्बर मोहम्मदपहली अटूट कड़ी
- पीर (शेख, मुर्शीद)ख़ानक़ाह का नियंत्रण, मुरीदों की भरती
- मुरीददीक्षा: निष्ठा का वचन, सिर मुँड़ाना, थेगड़ी लगे वस्त्र
- ख़लीफ़ापीर का नियुक्त किया हुआ वारिस
दरगाह, उर्स और वली (पृष्ठ 153)
- पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी।
- दरगाह पर ज़ियारत के लिए जाने की परिपाटी चली, ख़ास तौर पर पीर की बरसी पर। इसे उर्स (विवाह, यानी पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन) कहा जाता था, क्योंकि लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत होकर उनके और करीब हो जाते हैं।
- लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं के लिए पीर का आशीर्वाद लेने जाते थे। इस तरह शेख का वली के रूप में आदर करने की परिपाटी शुरू हुई।
- वली (बहुवचन औलिया) यानी ईश्वर का मित्र: वह सूफ़ी जो अल्लाह के नज़दीक होने का दावा करता था, और अल्लाह से मिली बरकत से करामात करने की शक्ति रखता था (बॉक्स, पृष्ठ 153)।
सिलसिलों के नाम (बॉक्स, पृष्ठ 153)
- ज़्यादातर सिलसिलों के नाम उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े, जैसे कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर।
- कुछ सिलसिलों के नाम जन्मस्थान पर पड़े, जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से।
6.2ख़ानक़ाह के बाहरपृष्ठ 153
किताब के अपने प्रश्न
3बे शरिया और बा शरिया सूफ़ी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों को स्पष्ट कीजिए।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 152–153
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- दोनों सूफ़ी परंपरा से निकले, पर शरिया और ख़ानक़ाह के बारे में उनका रास्ता अलग था।
- एकरूपता: बे–शरिया आंदोलन भी कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर ही शुरू किए।
- बा–शरिया: ये शरिया का पालन करते थे। किताब में सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द, शेख की देखरेख में संगठित दिखते हैं; मुरीद दीक्षा लेते थे और सिलसिला आगे बढ़ता था। बे–शरिया इसी ख़ानक़ाह का तिरस्कार करते थे।
- बे–शरिया: ये ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे। इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी कहा जाता था।
- नाम का कारण: शरिया की अवहेलना करने के कारण इन्हें बे–शरिया कहा गया, और इस तरह इन्हें शरिया मानने वाले (बा–शरिया) सूफ़ियों से अलग देखा गया। (पृष्ठ 152–153)
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1सिलसिला शब्द का शाब्दिक अर्थ क्या है?
सिलसिला का शाब्दिक अर्थ जंज़ीर है, जो शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है (पृष्ठ 153)। दरबार दरगाह का अर्थ है, ऊन ‘सूफ़’ का, और कहावत ‘कौल’ का।
2सूफ़ी समुदाय में ख़लीफ़ा किसे कहा जाता था?
किताब के अनुसार शेख अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (ख़लीफ़ा) की नियुक्ति करते थे (पृष्ठ 152)।
3उर्स किसे कहा जाता था?
पीर की दरगाह पर, ख़ास तौर पर उनकी बरसी पर, ज़ियारत की परिपाटी को उर्स कहा जाता था (पृष्ठ 153)। सामुदायिक रसोई लंगर थी।
7उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला

इस पड़ाव का सवाल
चिश्ती ख़ानक़ाह में जीवन कैसा था, और चिश्तियों ने लोगों और शासकों से कैसे संबंध रखे?
पिछली बात से कड़ी सूफ़ी सिलसिलों में से अब उपमहाद्वीप के चिश्ती सिलसिले को पास से देखिए।
बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे। किताब के अनुसार इसका कारण यह था कि चिश्तियों ने अपने आपको स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला, और भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशेषताएँ भी अपनाईं।
7.1चिश्ती ख़ानक़ाह में जीवनपृष्ठ 153–154
शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह (पृष्ठ 153–154)
- शेख निज़ामुद्दीन औलिया (चौदहवीं शताब्दी) की ख़ानक़ाह उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर, यमुना नदी के किनारे ग़ियासपुर में थी।
- यहाँ कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना) था, जहाँ सहवासी और अतिथि रहते और उपासना करते थे। सहवासियों में शेख का अपना परिवार, सेवक और अनुयायी थे।
- शेख छत पर एक छोटे कमरे में रहते थे, जहाँ वे मेहमानों से सुबह-शाम मिलते थे। एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोस के लोगों ने ख़ानक़ाह में शरण ली।
लंगर और मिलने वाले (पृष्ठ 154)
- ख़ानक़ाह की सामुदायिक रसोई (लंगर) फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी।
- सुबह से देर रात तक सब तबकों के लोग आते थे: सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर। वे अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज़ लेने या मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे।
- मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि और दरबारी इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी भी थे। इन सबने शेख के बारे में लिखा।
- शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों का सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम: किताब के अनुसार ये व्यवहार बताते हैं कि स्थानीय परंपराओं को अपनाने का प्रयत्न किया गया।
- शेख निज़ामुद्दीन ने कई आध्यात्मिक वारिस चुने और उन्हें उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में ख़ानक़ाह बनाने के लिए नियुक्त किया। इससे चिश्तियों के उपदेश, व्यवहार और संस्थाएँ, और शेख का यश चारों ओर फैल गया।
चिश्ती सिलसिला के मुख्य उपदेशक (पृष्ठ 154)
| सूफ़ी | मृत्यु का वर्ष | दरगाह का स्थान |
|---|---|---|
| शेख मुइनुद्दीन चिश्ती | 1235 | अजमेर (राजस्थान) |
| ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी | 1235 | दिल्ली |
| शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर | 1265 | अजोधन (आज पाकिस्तान में) |
| शेख निज़ामुद्दीन औलिया | 1325 | दिल्ली |
| शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली | 1356 | दिल्ली |
दाता गंज बख्श की कहानी (बॉक्स, पृष्ठ 154)
- 1039 ईसवी में अबुल हसन अल हुजविरी, जो अफगानिस्तान के शहर गज़नी के निकट हुजविर के रहने वाले थे, तुर्की सेना के एक कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करके आए।
- हुजविरी लाहौर (आज पाकिस्तान में) में बस गए और फारसी में कश्फ–उल–महजुब (परदे वाले की बेपर्दगी) नाम की किताब लिखी, जिसमें तसव्वुफ़ के मायने और सूफ़ियों के बारे में बताया गया।
- हुजविरी को लाहौर में दफ़नाया गया। सुल्तान महमूद गज़नी के पोते ने उनकी मज़ार पर दरगाह बनवाई, जो उनकी बरसी पर अनुयायियों का तीर्थ स्थल बन गई।
- आज भी हुजविरी दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं, और उनकी दरगाह को दाता दरबार, यानी देने वाले की दरगाह, कहा जाता है।
7.2चिश्ती उपासना : ज़ियारत और कव्वालीपृष्ठ 154–157
ज़ियारत (पृष्ठ 154)
- सूफ़ी संतों की दरगाह पर ज़ियारत सारे इस्लामी संसार में प्रचलित है। इसमें संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद, यानी बरकत, की कामना की जाती है।
- किताब के अनुसार "पिछले सात सौ सालों से" अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग पाँच महान चिश्ती संतों की दरगाहों पर आस्था प्रकट करते रहे हैं। सबसे अधिक पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन की है, जिन्हें ‘ग़रीब नवाज़’ कहा जाता है।
अजमेर की दरगाह (पृष्ठ 155–156)
- ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह का सबसे पहला किताबी ज़िक्र चौदहवीं शताब्दी का है।
- किताब के अनुसार दरगाह शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा, उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता, और राजसी मेहमानों के प्रश्रय के कारण लोकप्रिय थी।
- अजमेर की दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी, इसलिए अनेक यात्री यहाँ आते थे।
- सोलहवीं शताब्दी तक अजमेर की दरगाह बहुत लोकप्रिय हो गई थी। तीर्थयात्रियों के भजनों ने ही अकबर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया।
- किताब कहती है, "अकबर यहाँ चौदह बार आया", कभी साल में दो-तीन बार: नयी जीत के लिए आशीर्वाद लेने, संकल्प पूरा होने पर या पुत्रों के जन्म पर। हर यात्रा की दान-भेंट के ब्योरे शाही दस्तावेज़ों में दर्ज हैं, और अकबर ने दरगाह के अहाते में एक मस्जिद भी बनवाई।

तस्वीर: बादशाह जहाँगीर एक सूफ़ी शेख को राजाओं से बढ़कर मान देते हुए; चित्रकार बिचित्र, लगभग 1615–1618।
Bichitr. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 155
किताब के चित्र 6.13 के कैप्शन के अनुसार यह अजमेर की तीर्थयात्रा पर बादशाह जहाँगीर का स्वागत करते हुए शेखों का चित्र है, मनोहर नाम के कलाकार का, लगभग 1615।
चित्र में कलाकार के हस्ताक्षर ढूँढ़िए।
जवाब देखिए
इस प्रश्न के लिए किताब का चित्र 6.13 सामने रखिए; इस पन्ने के फ़ोटो उस चित्र के नहीं हैं।
- कलाकार का नाम, मनोहर, किताब के कैप्शन में दिया है।
- चित्र में ऊपर दाईं ओर, पेड़ के पास, फ़ारसी लिपि की एक छोटी पंक्ति है। यह पंक्ति ‘जहाँगीर’ नाम पर ख़त्म होती लगती है, इसलिए शायद यह बादशाह की पहचान बताती है, कलाकार के हस्ताक्षर नहीं।
- उस पंक्ति को अपने अध्यापक की मदद से पढ़िए, और देखिए कि उसमें किसका नाम लिखा है।
स्रोत 7: मुगल शहज़ादी जहाँआरा की तीर्थयात्रा 1643 (पृष्ठ 156)
निम्नलिखित गद्यांश जहाँआरा द्वारा रचित शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस–अल–अखाह (यानी आत्मा का विश्वस्त) से लिया गया है।
अल्लाहताला की तारीफ़ के बाद.... यह फकीरा जहाँआरा... राजधानी आगरा से अपने पिता (बादशाह शाहजहाँ) के संग पाक और बेजोड़ अजमेर के लिए निकली.... मैं इस बात के लिए वायदापरस्त थी कि हर रोज़ और हर मुकाम पर मैं दो बार की अख़्तियारी नमाज़ अदा करूँगी... बहुत दिन... मैं रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोई और अपने पैर मुकद्दस दरगाह की तरफ नहीं फैलाए, न ही मैंने अपनी पीठ उनकी तरफ की। मैं पेड़ के नीचे दिन गुज़ारती थी।
वीरवार को रमज़ान के मुकद्दस महीने के चौथे रोज़ मुझे चिराग और इतर में डूबे दरगाह की ज़ियारत की खुशी हासिल हुई... चूँकि दिन की रोशनी की एक छड़ी बाकी थी मैं दरगाह के भीतर गई और अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से रगड़ा। दरवाज़े से मुकद्दस दरगाह तक मैं नंगे पाँव वहाँ की ज़मीन को चूमती हुई गई। गुम्बद के भीतर रोशनी से भरी दरगाह में मैंने मज़ार के चारों ओर सात फेरे लिए। आख़िर में अपने हाथों से मुकद्दस दरगाह पर मैंने सबसे उम्दा इतर छिड़का। चूँकि गुलाबी दुपट्टा जो मेरे सिर पर था, मैं उतार चुकी थी इसलिए उसे मैंने मुकद्दस मज़ार के ऊपर रखा।...
मुल्क का चिराग (बॉक्स, पृष्ठ 156)
अठारहवीं शताब्दी में दक्कन के दरगाह कुली खान ने शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली की दरगाह के बारे में मुरक्का–ए–देहली (दिल्ली की अलबम) में लिखा:
शेख सिर्फ देहली के ही चिराग नहीं अपितु सारे मुल्क के चिराग हैं। लोगों का हुजूम यहाँ आता है खासतौर से इतवार के रोज़। दीवाली के महीने में दिल्ली की सारी आबादी दरगाह पर उमड़ आती है और हौज़ के पास तम्बू गाड़ कर वे कई दिनों तक यहाँ रहते हैं। पुराने रोगों को ठीक करने के लिए वे यहाँ नहाते हैं। हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं। सुबह से शाम तक लोग आते हैं और पेड़ की छाँव में हँसी–खुशी में समय बिताते हैं।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 156
स्रोत 7 शहज़ादी जहाँआरा की 1643 की अजमेर तीर्थयात्रा का वर्णन है, जो उन्होंने शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी में लिखा।
जहाँआरा कौन सी चेष्टाओं का ज़िक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाती हैं। दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?
जवाब देखिए
- रास्ते में: हर रोज़ दो बार की अख़्तियारी नमाज़; रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; दरगाह की तरफ़ न पैर फैलाए, न पीठ की।
- दरगाह में: "अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से" रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, "मज़ार के चारों ओर सात फेरे" लिए, इतर छिड़का और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
- दरगाह की खासियत: जहाँआरा उसे बार-बार मुकद्दस (पवित्र) दरगाह कहती हैं, जो "चिराग और इतर में डूबे" थी और गुम्बद के भीतर "रोशनी से भरी" थी; उसकी चौखट और वहाँ की ज़मीन तक को वे आदर देती हैं।
ज़िक्र और समा (पृष्ठ 156)
- नाच और संगीत भी ज़ियारत का हिस्सा थे, ख़ास तौर पर कव्वालों का रहस्यवादी गुणगान, जिससे परमानंद की भावना उभरे।
- सूफ़ी संत ज़िक्र (ईश्वर का नाम-जाप) या समा (श्रवण करना), यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल, के द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे।
- किताब के अनुसार चिश्ती उपासना में समा का महत्त्व इस बात की पुष्टि करता है कि चिश्ती स्थानीय भक्ति परंपरा से जुड़े।

तस्वीर: शेख निज़ामुद्दीन औलिया के सामने समा करते सूफ़ी; अमीर ख़ुसरो की ख़म्सा की एक पांडुलिपि का चित्र, हेरात, 1485; चेस्टर बीटी, डबलिन।
Chester Beatty, Dublin. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 155
किताब का चित्र 6.12 शेख निज़ामुद्दीन औलिया और उनके शिष्य अमीर खुसरो का सत्रहवीं शताब्दी का एक चित्र है।
यह बताइए कि कलाकार शेख साहब और उनके शिष्य में कैसे फर्क डालता है?
जवाब देखिए
इस प्रश्न के लिए किताब का चित्र 6.12 ध्यान से देखिए:
- शेख बैठे हैं, सिर के पीछे प्रभामंडल है और पास में किताब है।
- शिष्य उनके सामने घुटनों के बल है, और उसके हाथ में तार वाला वाद्य है।
बैठने के ढंग, प्रभामंडल और हाथ की चीज़ से लगता है कि कलाकार गुरु का ऊँचा दर्जा और शिष्य की विनम्रता दिखाना चाहता है। वाद्य याद दिलाता है कि अमीर खुसरो संगीतज्ञ थे (पृष्ठ 157)।
7.3भाषा और संपर्कपृष्ठ 157–158
भाषा और संपर्क (पृष्ठ 157–158)
- चिश्तियों ने समा में स्थानीय भाषा अपनाई, और दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे।
- बाबा फरीद ने भी क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचा, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है।
- कुछ सूफ़ियों ने लंबी कविताएँ, मसनवी, लिखीं, जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम को मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया। मलिक मोहम्मद जायसी का प्रेमाख्यान पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा के इर्द-गिर्द घूमता है; उनकी आज़माइश आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है। ख़ानक़ाहों में समा के दौरान ऐसे काव्यों का वाचन होता था।
दक्खनी कविताएँ (पृष्ठ 157–158)
- बीजापुर (कर्नाटक) के आसपास दक्खनी (उर्दू का रूप) में छोटी कविताएँ रची गईं। इन्हें सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों में बीजापुर क्षेत्र में बसे चिश्ती संतों ने रचा।
- किताब के अनुसार ये रचनाएँ संभवत: औरतें घर का काम करते हुए, जैसे चक्की पीसते और चरखा कातते हुए, गाती थीं। कुछ रचनाएँ लोरीनामा और शादीनामा के रूप में लिखी गईं।
- किताब कहती है कि यह संभव है कि बीजापुर क्षेत्र के सूफ़ी वहाँ पहले से चलती आई भक्ति परंपरा से प्रभावित हुए। लिंगायतों के कन्नड़ वचनों और पंढरपुर के संतों के मराठी अभंगों ने भी उन पर असर डाला। इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका।
स्रोत 8: चरखानामा (पृष्ठ 157)
चरखे के चलने की धुन पर आधारित गीत:
जैसे आप रुई लेते हैं,
आप ज़िक्र–ए–जाली करें।
जैसे आप रुई को धुनते हैं,
आप ज़िक्र–ए–कल्बी करें।
जैसे आप धागे को फिरकी पर लपेटते हैं,
आप ज़िक्र–ए–आइनी करें।
ज़िक्र पेट से छाती तक उच्चारित किया जाए।
उसे धागे की तरह गले से उतारें
स्वास के धागे एक–एक गिनें, बहन
चौबीस हज़ार तक गिनें
सुबह–शाम ऐसा करें
और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।
अमीर खुसरो और कौल (बॉक्स, पृष्ठ 157)
- अमीर खुसरो (1253–1325) महान कवि, संगीतज्ञ और शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे।
- अमीर खुसरो ने कौल (अरबी शब्द, जिसका अर्थ है कहावत) का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया। कौल कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था।
- कौल के बाद सूफ़ी कविता का पाठ होता था, जो फारसी, हिंदवी अथवा उर्दू में होती थी, और कभी-कभी तीनों भाषाओं के शब्द उसमें होते थे।
- शेख निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गाने वाले कव्वाल अपने गायन की शुरुआत कौल से करते हैं। उपमहाद्वीप की सभी दरगाहों पर कव्वाली गाई जाती है।

तस्वीर: दिल्ली में हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह पर कव्वाली, 2016।
Kumarvimal, CC BY-SA 4.0. Image: Wikimedia Commons.
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 157
स्रोत 8, चरखानामा, चरखे के चलने की धुन पर आधारित गीत है; स्रोत 7 जहाँआरा की अजमेर ज़ियारत का वर्णन है।
इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न हैं?
जवाब देखिए
- समानता: दोनों में पीर या शेख के प्रति भक्ति है। चरखानामा कहता है, "और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।"; जहाँआरा मज़ार पर इतर और दुपट्टा चढ़ाती हैं।
- अंतर (कौन, कहाँ): चरखानामा चरखे के चलने की धुन पर आधारित गीत है, और किताब के अनुसार ऐसी रचनाएँ संभवत: औरतें चक्की पीसते और चरखा कातते हुए गाती थीं; जहाँआरा की ज़ियारत एक शहज़ादी की लंबी तीर्थयात्रा है, जो उन्होंने शेख की जीवनी में लिखी।
- अंतर (तरीका): गीत में रोज़ का काम ही ज़िक्र बन जाता है (ज़िक्र–ए–जाली, ज़िक्र–ए–कल्बी, ज़िक्र–ए–आइनी); जहाँआरा की भक्ति शरीर के आचारों से दिखती है: सात फेरे, ज़मीन चूमना, नंगे पाँव चलना।
7.4सूफ़ी और राज्यपृष्ठ 158–159
सूफ़ी और राज्य (पृष्ठ 158)
- चिश्ती संयम और सादगी का जीवन जीते थे और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे। पर इसका मतलब राजनीतिक सत्ता से अलगाव नहीं था: सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता, तो सूफ़ी संत उसे स्वीकार करते थे।
- सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि अनुदान में दी और दान संबंधी न्यास बनाए।
- चिश्ती धन और सामान का दान लेते थे, पर उसे सँजोने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर पूरा खर्च कर देते थे। इससे शेख के नैतिक अधिकार की पुष्टि होती थी, और आम लोगों का उनकी ओर झुकाव बढ़ता था।
शासक सूफ़ियों का समर्थन क्यों चाहते थे? (पृष्ठ 158)
- सूफ़ी संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और उनकी चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास उनकी लोकप्रियता का कारण था। इन वजहों से शासक भी उनका समर्थन चाहते थे।
- तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की तो उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकरा दी, क्योंकि सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम धर्म मानने वाली नहीं है। सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा लिया, जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता अल्लाह से मानते थे और उलमा की शरिया व्याख्या पर निर्भर नहीं थे।
- माना जाता था कि औलिया मध्यस्थ बनकर लोगों की ऐहिक और आध्यात्मिक दशा सुधारते हैं। किताब कहती है, "शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।"
तनाव भी था (पृष्ठ 158)
- अपनी सत्ता का दावा करने के लिए सुल्तान और सूफ़ी, दोनों ही झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे।
- कभी-कभी सूफ़ी शेखों को आडंबरपूर्ण पदवी से संबोधित किया जाता था। शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान–उल–मशेख (यानी शेखों में सुल्तान) कहते थे।
- दिल्ली सल्तनत के युग में सुहरावर्दी और मुग़ल युग में नक्शबंदी सूफ़ी भी राज्य से जुड़े रहे, पर उनके जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से अलग थे। कभी-कभी सूफ़ी दरबारी पद भी स्वीकार कर लेते थे (बॉक्स, पृष्ठ 158)।
स्रोत 9: शाही भेंट अस्वीकार (पृष्ठ 159)
यह उद्धरण सूफ़ी ग्रंथ से है जो शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में 1313 में हुई घटना का वर्णन करता है:
मेरी (अमीर हसन सिजज़ी) अच्छी किस्मत थी कि मैं उनके (निज़ामुद्दीन औलिया) कदम चूम सका... इस समय एक स्थानीय शासक ने दो बगीचे और बहुत सी ज़मीन का पट्टा शेख साहब को भेजा है। साथ ही इनके रखरखाव के लिए औज़ार व आवश्यक वस्तुएँ भेजी हैं।…
[शेख ने कहा:] “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?... हमारे कोई भी आध्यात्मिक गुरु ने इस तरह का काम नहीं किया।”
फिर उन्होंने एक उचित कहानी सुनाई “...सुल्तान ग़ियासुद्दीन जो उस समय उलुग़ ख़ान के नाम से जाने जाते थे, शेख फ़रीदुद्दीन से मिलने आए। उन्होंने शेख को कुछ धनराशि और चार गाँवों का पट्टा भेंट किया। धन दरवेशों के लिए था और ज़मीन शेख के अपने इस्तेमाल के लिए थी। मुस्कुराते हुए शेख–अल–इस्लाम (फ़रीदुद्दीन) ने कहा: मुझे धन दे दो मैं इसे दरवेशों में बाँट दूँगा, पर जहाँ तक ज़मीन के पट्टे का सवाल है उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है....।”
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 159
स्रोत 9 में 1313 की एक घटना है: शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने एक स्थानीय शासक की भेजी ज़मीन और बगीचे नहीं लिए, और शेख फ़रीदुद्दीन का एक किस्सा सुनाया।
सूफ़ियों और राज्य के बीच संबंध का कौन सा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है? यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?
जवाब देखिए
- राज्य से संबंध: शासक शेखों को धन और ज़मीन भेंट करके उनसे जुड़ना चाहते थे; चिश्ती बिना माँगे मिले अनुदान तो स्वीकार करते थे, पर सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे। शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने बगीचे और ज़मीन नहीं ली; शेख फ़रीदुद्दीन ने धन दरवेशों में बाँटने के लिए लिया, पर पट्टे के बारे में कहा, "उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है....।"
- संपर्क का तरीका: अनुयायी शेख से मिलने आते थे; अमीर हसन सिजज़ी लिखते हैं कि वे शेख के कदम चूम सके। इस अंश में शेख फ़रीदुद्दीन का एक किस्सा भी आता है, यानी सीख बातचीत और किस्सों से दी जाती थी। ऐसे मिलने वाले कवियों और इतिहासकारों ने शेख के बारे में लिखा भी (पृष्ठ 154)।
शेख सलीम चिश्ती की दरगाह (पृष्ठ 159)
- किताब के अनुसार अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी में बाबा फरीद के वंशज शेख सलीम चिश्ती की दरगाह "चिश्तियों और मुग़ल राज्य के घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक थी।"

तस्वीर: फ़तेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, 2010 का फ़ोटो।
Marcin Białek, CC BY-SA 3.0. Image: Wikimedia Commons.
किताब के अपने प्रश्न
6सूफ़ी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 152–158
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- शुरुआत: इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा।
- विश्वास: उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं और धर्माचार्यों की कुरान और सुन्ना की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया, पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल मानकर उनका अनुसरण सिखाया, और कुरान की व्याख्या निजी अनुभव से की।
- ख़ानक़ाह: ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था। किताब के अनुसार सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द, शेख की देखरेख में संगठित होते थे। शेख मुरीद भरती करते और खलीफ़ा नियुक्त करते थे।
- सिलसिला: सिलसिला (जंज़ीर) शेख और मुरीद का निरंतर रिश्ता था, जिसकी पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी थी। दीक्षा में निष्ठा का वचन, सिर मुँड़ाना और थेगड़ी लगे वस्त्र थे।
- दरगाह, ज़ियारत और उर्स: पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह भक्ति का स्थल बनी। बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया। लोग बरकत (आध्यात्मिक आशीर्वाद) की कामना से आते थे।
- चिश्ती आचार: लंगर फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलता था; ज़िक्र (नाम-जाप) और समा (आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल) होते थे; अमीर खुसरो ने कौल से समा को विशिष्ट आकार दिया। शेख के सामने झुकना, पानी पिलाना, सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम जैसी स्थानीय परंपराएँ भी अपनाई गईं। चिश्ती सादगी से रहते और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे।
- बे–शरिया: कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नए आंदोलन चलाए। वे ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर बने और शरिया की अवहेलना की।
- निष्कर्ष: सूफ़ी मत में ईश्वर से निजी प्रेम केंद्र में था, और उसके आचार स्थानीय परिवेश में ढलते गए। (पृष्ठ 152–158)
7क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफ़ी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 146, 155–159
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- चोल सम्राट और नयनार, किस तरह: चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने विष्णु और शिव के मंदिरों को भूमि–अनुदान दिए। चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर चोल सम्राटों की मदद से बने। मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू हुआ और उनका तवरम के रूप में संकलन हुआ।
- 945 ईसवी में परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
- चोल सम्राट और नयनार, क्यों: नयनार और अलवार संत वेल्लाल किसानों द्वारा सम्मानित थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा भी किया।
- सुल्तान, मुग़ल और सूफ़ी, किस तरह: सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी और दान संबंधी न्यास बनाए। मुहम्मद बिन तुगलक अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान थे। "अकबर यहाँ चौदह बार आया"; उन्होंने 1568 में देग़ भेंट की और अहाते में मस्जिद बनवाई।
- सुल्तान और सूफ़ी, क्यों: सूफ़ियों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास उन्हें लोकप्रिय बनाता था। सुल्तान जानते थे कि अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है, इसलिए उन्होंने उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकराई और सूफ़ियों का सहारा लिया, जो अपनी सत्ता अल्लाह से मानते थे। किताब कहती है, "शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।"
- दोनों अपनी सत्ता का दावा करते थे: अपनी सत्ता का दावा करने के लिए सुल्तान और सूफ़ी, दोनों ही झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे। स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने एक स्थानीय शासक की भेजी ज़मीन की भेंट नहीं ली।
- निष्कर्ष: शासक संतों की लोकप्रियता से अपने लिए समर्थन चाहते थे, और चिश्ती बिना माँगे मिले अनुदान तो स्वीकार करते थे, पर सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे। (पृष्ठ 146, 155–159)
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1चिश्ती ख़ानक़ाह का लंगर किस पर चलता था?
किताब के अनुसार सामुदायिक रसोई (लंगर) फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी (पृष्ठ 154)।
2अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान कौन थे?
मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51) दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान थे; मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई (पृष्ठ 155)।
3कौल का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार किसने दिया?
अमीर खुसरो (1253–1325) ने कौल (अरबी शब्द, अर्थ कहावत) का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया (पृष्ठ 157)।
4स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने एक स्थानीय शासक के भेजे बगीचों और ज़मीन के पट्टे का क्या किया?
शेख ने कहा, "इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?" अंश का शीर्षक भी ‘शाही भेंट अस्वीकार’ है (पृष्ठ 159)। दरवेशों में बाँटने की बात शेख फ़रीदुद्दीन के किस्से में धन के बारे में है।
8नवीन भक्ति पंथ

इस पड़ाव का सवाल
कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई ने क्या कहा, और उनकी बात कैसे फैली?
पिछली बात से कड़ी चिश्तियों ने समा में स्थानीय भाषा अपनाई। अब उन संत कवियों से मिलिए जिन्होंने लोगों की भाषा में भक्ति की बात कही।
अनेक संत कवियों ने नई सामाजिक परिस्थितियों, विचारों और संस्थाओं के साथ स्पष्ट और सांकेतिक, दोनों तरह के संवाद कायम किए। किताब तीन प्रमुख संतों के ज़रिए यह दिखाती है: कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई।
8.1दैवीय वस्त्र की बुनाई : कबीरपृष्ठ 160–162
कबीर हिंदू थे या मुसलमान? (पृष्ठ 162)
- कबीर हिंदू थे या मुसलमान, यह विवाद आज भी है। यह विवाद उन संत जीवनियों में उभरता है जो सत्रहवीं शताब्दी से, यानी कबीर की मृत्यु के 200 वर्ष बाद से, लिखी गईं।
- वैष्णव परंपरा की जीवनियों में कबीर (अरबी में अर्थ महान) को जन्म से हिंदू कबीरदास बताया गया। पर कबीर का पालन एक गरीब मुसलमान जुलाहा परिवार में हुआ, जो कुछ समय पहले ही इस्लाम का अनुयायी बना था।
- इन जीवनियों के अनुसार कबीर के गुरु रामानंद थे। पर कबीर के पद गुरु और सतगुरु शब्द किसी ख़ास व्यक्ति के लिए नहीं बरतते, और इतिहासकार मानते हैं कि कबीर और रामानंद का समकालीन होना मुश्किल है, जब तक दोनों को बहुत लंबी आयु न दी जाए।
- इसलिए कबीर और रामानंद को जोड़ने वाली परंपराएँ स्वीकार नहीं की जा सकतीं। हाँ, इन परंपराओं से यह पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ियों के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी।
स्रोत 10: एक ईश्वर (पृष्ठ 160)
यह रचना कबीर की मानी जाती है:
हे भाई यह बताओ, किस तरह हो सकता है
कि संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?
किसने तुम्हें भ्रमित किया है?
ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।
विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।
कबीर कहते हैं दोनों ही भुलावे में हैं।
इनमें से कोई एक राम को प्राप्त नहीं कर सकता।
एक बकरे को मारता है और दूसरा गाय को।
वे पूरा जीवन विवादों में ही गँवा देते हैं।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 160
स्रोत 10 कबीर की मानी जाने वाली एक रचना है, जिसमें ईश्वर के अनेक नाम गिनाए गए हैं।
विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?
जवाब देखिए
कबीर तर्क और सवाल से बात रखते हैं:
- सवाल: कबीर पूछते हैं कि यह कैसे हो सकता है "कि संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?"
- नाम अलग, ईश्वर एक: अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि और हज़रत एक ही ईश्वर के नाम हैं; "विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।"
- दोनों पर चोट: कबीर कहते हैं कि दोनों भुलावे में हैं; एक बकरे को मारता है, दूसरा गाय को, और दोनों पूरा जीवन विवादों में गँवा देते हैं।
संतों की रचनाएँ कैसे फैलीं (पृष्ठ 161)
- किताब में सत्रहवीं शताब्दी का एक मुग़ल चित्र राह-चलते संगीतकारों का है। किताब के अनुसार संभव है कि ऐसे गायक संतों की रचनाएँ गाते थे।

तस्वीर: संगीतकारों के साथ एक जुलूस का दृश्य; पादशाहनामा की एक प्रति से, मुग़ल चित्र, 1625 और 1675 के बीच; आर्ट इंस्टिट्यूट ऑफ़ शिकागो।
Art Institute of Chicago. Public domain. Image: Wikimedia Commons.
8.2बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्दपृष्ठ 162–163
आदि ग्रंथ साहिब से गुरु ग्रंथ साहिब तक (पृष्ठ 163)
- पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक, उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की। इन रचनाओं को "गुरबानी" कहा जाता है, और ये अनेक भाषाओं में हैं।
- सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी इसमें जोड़ीं, और ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया।
- गुरु गोबिन्द सिंह जी ने खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की नींव डाली और पाँच प्रतीक बताए: बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा। उनके नेतृत्व में समुदाय एक सामाजिक, धार्मिक और सैन्य बल के रूप में संगठित हुआ।
8.3मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारीपृष्ठ 163–164
मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी (पृष्ठ 163–164)
- मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी) संभवत: भक्ति परंपरा की सबसे सुप्रसिद्ध कवयित्री हैं। उनकी जीवनी उनके भजनों के आधार पर बनी, जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे।
- मीराबाई मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक राजपूत राजकुमारी थीं। उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ।
- मीराबाई ने पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्व निभाने से इनकार किया और विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना। ससुराल वालों ने उन्हें विष देने का प्रयत्न किया, पर वे राजभवन छोड़कर परिब्राजिका (घूम-घूमकर रहने वाली) संत बन गईं।
स्रोत 11: कृष्ण के प्रति प्रेम (पृष्ठ 164)
यह मीराबाई द्वारा रचित एक गीत का अंश है:
अगर–चंदण की चिता बणाऊँ, अपणै हाथ जला जा।
जल–बल भयी भसम की ढेरी, अपणै अंग लगा जा।
मीरा कहै प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा।।
एक और पद में वह कहती हैं:
राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी,
म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।
राणों जी रूससी गाँव रखासी, हरी रूस्याँ कुमलास्या।।
दूसरे पद का सरल अर्थ: राणा जी मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी; राणा रूठें तो अपना गाँव रख लें, पर हरि रूठें तो मैं मुरझा जाऊँगी।
किताब के किनारे का प्रश्न: पृष्ठ 164
स्रोत 11 में मीराबाई के दो पदों के अंश हैं; दूसरे पद में वे राणा की बात करती हैं।
यह उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है?
जवाब देखिए
मीराबाई राणा से डरती नहीं हैं:
- मीराबाई कहती हैं, "राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।" यानी राणा मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी।
- मीराबाई के लिए राणा का रूठना छोटी बात है, हरि का रूठना बड़ी।
यह मीराबाई के जीवन से मेल खाता है: उन्होंने ससुराल के दायित्व नहीं निभाए, कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़ दिया (पृष्ठ 163–164)।
- कुछ परंपराओं के अनुसार मीराबाई के गुरु रैदास थे, जो एक चर्मकार थे। किताब के अनुसार इससे पता चलता है कि मीराबाई ने जातिवादी समाज की रूढ़ियाँ तोड़ीं। माना जाता है कि राजमहल का ऐश्वर्य छोड़कर उन्होंने विधवा के सफ़ेद वस्त्र या संन्यासिनी के जोगिया वस्त्र पहने।
- मीराबाई के आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई। फिर भी वे शताब्दियों से प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके पद आज भी स्त्रियाँ और पुरुष गाते हैं, ख़ास तौर पर गुजरात और राजस्थान के वे गरीब लोग जिन्हें "नीच जाति" का समझा जाता है।

तस्वीर: मीराबाई कृष्ण के बाँसुरी बजाते रूप को पूजती थीं। यह उसी रूप की पत्थर की एक मूर्ति है; तमिलनाडु, चोल काल, ग्यारहवीं–बारहवीं शताब्दी; होनोलूलू म्यूज़ियम ऑफ़ आर्ट।
Hiart (Honolulu Museum of Art), CC0. Image: Wikimedia Commons.
असम के शंकरदेव (बॉक्स, पृष्ठ 164)
- पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में शंकरदेव असम में वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में उभरे।
- शंकरदेव के उपदेश ‘भगवती धर्म’ कहलाते हैं, क्योंकि वे भगवद् गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे और सर्वोच्च देवता विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण पर केंद्रित थे।
- शंकरदेव ने नाम कीर्तन और श्रद्धावान भक्तों के सत्संग में ईश्वर के नाम के उच्चारण पर बल दिया, और सत्र (मठ) और नामघर (प्रार्थनागृह) बनाने को बढ़ावा दिया। असम में ये संस्थाएँ और आचार आज भी पनप रहे हैं।
- शंकरदेव की प्रमुख काव्य रचनाओं में कीर्तनघोष भी है।
तीन संत, आमने-सामने (पृष्ठ 160–164)
| कबीर | बाबा गुरु नानक | मीराबाई | |
|---|---|---|---|
| समय | लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी | 1469–1539 | लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी |
| इलाका | विचार संभवत: अवध (उत्तर प्रदेश) की सूफ़ी और योगी परंपरा से संवाद में बने | ननकाना गाँव, पंजाब, रावी नदी के पास | मेड़ता (मारवाड़) की राजकुमारी; विवाह मेवाड़ के सिसोदिया कुल में |
| भाषा | कई भाषाएँ और बोलियाँ, कुछ संत भाषा में; उलटबाँसी | पंजाबी में शबद, रागों में गाए | |
| बानी कैसे बची | कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, आदि ग्रंथ साहिब | आदि ग्रंथ साहिब, जिसे गुरु अर्जन देव जी ने संकलित किया | भजन शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़े |
| गुरु | जीवनियों में रामानंद, पर इतिहासकार यह जोड़ स्वीकार नहीं करते | कुछ परंपराओं के अनुसार रैदास | |
| अनुयायी | कबीर पंथी और दादू पंथी बानी सँभालते रहे | संगत; अंगद को गुरुपद | अनुयायियों का जमघट नहीं, कोई निजी मंडली नहीं |
जहाँ खाना खाली है, वहाँ किताब उस संत के बारे में यह बात नहीं बताती।
किताब के अपने प्रश्न
5कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ।
लगभग 100 से 150 शब्द · पृष्ठ 160–163
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- प्रश्न दोनों में से एक के बारे में पूछता है; यहाँ दोनों दिए हैं।
- कबीर, एक ईश्वर: स्रोत 10 में वे पूछते हैं कि संसार के दो स्वामी कैसे हो सकते हैं, और कहते हैं, "विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।"
- कबीर, परम सत्य के कई नाम: अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर; अलख, निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्; शब्द और शून्य।
- कबीर, संप्रेषण: उनकी बानी तीन परिपाटियों में सँभली: कबीर बीजक (कबीर पंथी, वाराणसी), कबीर ग्रंथावली (दादू पंथी, राजस्थान) और आदि ग्रंथ साहिब। उन्नीसवीं शताब्दी में उनके पद-संग्रह बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में छपे। किताब के अनुसार संभव है कि राह-चलते गायक संतों की रचनाएँ गाते थे।
- बाबा गुरु नानक, उपदेश: निर्गुण भक्ति; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप को नकारा; रब का कोई लिंग या आकार नहीं; निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
- बाबा गुरु नानक, संप्रेषण: पंजाबी में शबद, जिन्हें वे रागों में गाते थे और मरदाना रबाब बजाता था; संगत में सामूहिक पाठ; अंगद को गुरुपद; पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की। (पृष्ठ 160–163)
8उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 140–163
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- क्यों: संत आम लोगों तक पहुँचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपनी बात कही।
- भक्ति संत: अलवार और नयनार तमिल में भजन गाते थे; वीरशैवों के वचन कन्नड़ में रचे गए।
- कबीर की रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं, कुछ संत भाषा में; उलटबाँसी भी। बाबा गुरु नानक ने अपने विचार पंजाबी में शबद के रूप में रखे।
- सूफ़ी: दिल्ली के चिश्ती हिंदवी में बात करते थे; बाबा फरीद का क्षेत्रीय भाषा का काव्य गुरु ग्रंथ साहिब में है। जायसी की पद्मावत जैसी मसनवी मानवीय प्रेम के रूपक से ईश्वर-प्रेम कहती थी।
- दक्खनी: बीजापुर के आसपास दक्खनी में चक्की और चरखे के गीत, लोरीनामा और शादीनामा रचे गए। किताब के अनुसार इन्हें संभवत: औरतें घर का काम करते हुए गाती थीं।
- अमीर खुसरो की कव्वाली में फारसी, हिंदवी या उर्दू थी; हुजविरी ने कश्फ–उल–महजुब फारसी में लिखी। खोजा इस्माइलियों के जीनन पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे।
- निष्कर्ष: भाषा श्रोता के हिसाब से चुनी गई, ताकि संदेश घर, खेत और काम के बीच तक पहुँचे। (पृष्ठ 140, 143, 147, 150, 154, 157–158, 160–163)
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1कबीर की बानी किन तीन परिपाटियों में संकलित है?
कबीर बीजक कबीर पंथियों ने, कबीर ग्रंथावली राजस्थान के दादू पंथियों ने सँभाली, और कई पद आदि ग्रंथ साहिब में हैं (पृष्ठ 160)।
2बाबा गुरु नानक के शबद गाते समय रबाब बजाकर साथ कौन देता था?
बाबा गुरु नानक शबद अलग-अलग रागों में गाते थे और उनका सेवक मरदाना रबाब बजाकर साथ देता था (पृष्ठ 163)।
3आदि ग्रंथ साहिब में बानी किसने संकलित की?
पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की; गुरु गोबिन्द सिंह जी ने बाद में नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ जोड़ीं (पृष्ठ 163)।
4कुछ परंपराओं के अनुसार मीराबाई के गुरु कौन थे?
कुछ परंपराओं के अनुसार मीराबाई के गुरु रैदास थे, जो एक चर्मकार थे (पृष्ठ 164)। रामानंद को जीवनियाँ कबीर का गुरु बताती हैं।
9धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण

इस पड़ाव का सवाल
इतिहासकार धार्मिक परंपराओं का इतिहास किन स्रोतों से जोड़ते हैं, और उनमें क्या मुश्किलें हैं?
पिछली बात से कड़ी संतों और सूफ़ियों के बारे में आपने जो पढ़ा, वह कुछ स्रोतों से जाना गया है। अब उन्हीं स्रोतों को देखिए।
इतिहासकार धार्मिक परंपरा का इतिहास जोड़ने के लिए कई स्रोत बरतते हैं: मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ, और दैवीय स्वरूप को समझने को उत्सुक स्त्रियों और पुरुषों की काव्य रचनाएँ।
स्रोत पढ़ना आसान नहीं (पृष्ठ 166)
- मूर्ति और इमारत का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब हम उनका संदर्भ अच्छी तरह समझें, यानी उन्हें बनाने और बरतने वालों के विचार, आस्थाएँ और आचार।
- साहित्यिक स्रोतों में काफ़ी विविधता है; ये कई भाषाओं और शैलियों में हैं। कुछ सरल, स्पष्ट भाषा में हैं, जैसे बासवन्ना के वचन; कुछ अलंकृत फ़ारसी में लिखे मुग़ल सम्राटों के फ़रमान हैं।
- हर तरह के पाठ को समझने के लिए अलग कौशल चाहिए: कई भाषाओं की जानकारी, और हर विधा की शैली के बारीक अंतर पहचानने की समझ।
- प्रबंध पुस्तिका
- सूफ़ी विचारों और आचारों पर, जैसे कश्फ–उल–महजुब। इससे इतिहासकार जानते हैं कि उपमहाद्वीप के बाहर की परंपराओं ने भारत में सूफ़ी चिंतन को कैसे प्रभावित किया।
- मुलफुज़ात
- सूफ़ी संतों की बातचीत। फवाइद–अल–फुआद एक आरंभिक मुलफुज़ात है, जिसमें शेख निज़ामुद्दीन औलिया की बातचीत अमीर हसन सिजज़ी देहलवी ने संकलित की; स्रोत 9 इसी से लिया गया है। मुलफुज़ात शेखों की अनुमति से संकलित हुए और इनका उद्देश्य मुख्यत: उपदेशात्मक था।
- मक्तुबात
- शेखों के अपने अनुयायियों और सहयोगियों को लिखे पत्रों का संकलन, जैसे नक्शबंदी शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) के मक्तुबात–ए–इमाम रब्बानी। इनमें धार्मिक सत्य के अनुभव और अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन पर टिप्पणी मिलती है। विद्वान शेख अहमद सरहिंदी की विचारधारा की तुलना बादशाह अकबर की उदारवादी और असांप्रदायिक विचारधारा से करते हैं।
- तज़किरा
- सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण। मीर खुर्द किरमानी का सियार–उल–औलिया भारत में लिखा पहला सूफ़ी तज़किरा है, जो मुख्यत: चिश्ती संतों के बारे में है। सबसे प्रसिद्ध तज़किरा अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी (मृत्यु 1642) का अख्बार–उल–अखयार है। लेखक अपने सिलसिले की प्रधानता दिखाना चाहते थे; बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं, फिर भी इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
परंपराएँ आज भी जीवित हैं (पृष्ठ 166)
- हर परिपाटी से अनेक साहित्यिक और मौखिक संदेश जुड़े थे। कुछ सुरक्षित रहे, बहुत से एक से दूसरे तक पहुँचते हुए बदल गए, और कुछ हमेशा के लिए भुला दिए गए।
- लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं। इससे इतिहासकार आज के आचार-व्यवहार की तुलना साहित्य और पुरानी चित्रकला में मिले वर्णन से कर सकते हैं और बदलावों की रूपरेखा बना सकते हैं।
- पर ये परंपराएँ लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, इसलिए लोगों के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि समय के साथ इनमें बदलाव आया होगा। इतिहासकारों के लिए चुनौती यह याद रखना है कि धार्मिक परंपराएँ भी दूसरी परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।
किताब के अपने प्रश्न
9इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्त्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
लघु निबंध, लगभग 250-300 शब्द · पृष्ठ 144–160
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- स्रोत 1 (पृष्ठ 144): ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु उन "दासों" को पसंद करते हैं, "जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।" विचार: भक्ति जन्म से बड़ी है।
- स्रोत 4 (पृष्ठ 147): बासवन्ना पत्थर के साँप को दूध चढ़ाने वालों और असली साँप को मारने के लिए कहने वालों पर व्यंग्य करते हैं। विचार: खोखले कर्मकांड का विरोध।
- स्रोत 6 (पृष्ठ 150): औरंगज़ेब ने एक जोगी को वस्त्र और रुपए भेजे और उन्हें लिखा कि वे मदद की ज़रूरत होने पर लिख सकते हैं। विचार: शासक दूसरे धर्मों के गुरुओं का आदर भी करते थे।
- स्रोत 9 (पृष्ठ 159): एक स्थानीय शासक ने दो बगीचे और बहुत सी ज़मीन का पट्टा शेख साहब को भेजा। शेख ने कहा, "इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?" विचार: चिश्ती सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे; भेंट का धन बाँटा जा सकता था, पर ज़मीन से बँधना उन्हें मंज़ूर नहीं था।
- स्रोत 10 (पृष्ठ 160): कबीर कहते हैं, "ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।" विचार: ईश्वर एक है; भेद केवल नामों के हैं।
- निष्कर्ष: इन स्रोतों में भक्ति को जाति और कर्मकांड से ऊपर रखा गया, और धर्मों के बीच आदर और संवाद दिखता है। (पृष्ठ 144–160)
जाँच पड़ाव✓ पड़ाव पूरा
1सूफ़ी संतों की बातचीत के संकलन को क्या कहा जाता है?
मुलफुज़ात सूफ़ी संतों की बातचीत हैं, जैसे फवाइद–अल–फुआद (पृष्ठ 165)। मक्तुबात पत्र हैं, तज़किरा जीवनियों का स्मरण, और मसनवी लंबी कविता।
2भारत में लिखा पहला सूफ़ी तज़किरा कौन-सा है?
मीर खुर्द किरमानी का सियार–उल–औलिया भारत में लिखा पहला सूफ़ी तज़किरा है; अख्बार–उल–अखयार सबसे प्रसिद्ध तज़किरा है (पृष्ठ 165)।
सार और काल-रेखा

इस पड़ाव का सवाल
पूरे अध्याय को एक नज़र में कैसे याद रखें?
पिछली बात से कड़ी स्रोतों के बाद अब पूरे अध्याय को काल-रेखा और मानचित्र पर एक साथ देखिए।
अध्याय एक नज़र में
- लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक उपमहाद्वीप में धार्मिक विश्वासों और आचरणों में बहुत विविधता दिखी। पूजा प्रणालियों का समन्वय भी हुआ, और उनके बीच भेद और संघर्ष भी रहे (पृष्ठ 140–142)।
- तमिलनाडु में अलवार (विष्णु के भक्त) और नयनार (शिव के भक्त) संतों ने तमिल में भजन गाए। कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि इन संतों ने जाति प्रथा और ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई; किताब के अनुसार कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है (पृष्ठ 143–144)।
- बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में बासवन्ना के नेतृत्व में वीरशैव (लिंगायत) आंदोलन उभरा। लिंगायतों ने जाति की अवधारणा का विरोध किया और पुनर्जन्म पर प्रश्न उठाए (पृष्ठ 146–147)।
- 711 ईसवी में मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध को जीता। सिद्धांत में मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना होता था, पर व्यवहार में बहुत से शासकों ने शासितों के प्रति लचीली नीति अपनाई (पृष्ठ 148–149)।
- इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके और सूफ़ी कहलाए। किताब के अनुसार सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द, शेख की देखरेख में संगठित होते थे (पृष्ठ 152–153)।
- चिश्ती ख़ानक़ाहों में लंगर चलता था, दरगाहों पर ज़ियारत होती थी, और समा में स्थानीय भाषा अपनाई गई। सुल्तान और मुग़ल बादशाह सूफ़ियों का समर्थन चाहते थे (पृष्ठ 153–159)।
- कबीर ने परम सत्य को कई नामों से पुकारा, बाबा गुरु नानक ने निर्गुण भक्ति सिखाई, और मीराबाई ने विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना (पृष्ठ 160–164)।
- इतिहासकार इन परंपराओं को मूर्तियों, इमारतों, संतों की रचनाओं और अनुयायियों की लिखी जीवनियों से जानते हैं। जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं होतीं, पर बताती हैं कि अनुयायी संतों को कैसे देखते थे (पृष्ठ 140, 164–166)।
काल-रेखा: भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ मुख्य धार्मिक शिक्षक (पृष्ठ 167)
| लगभग काल | शिक्षक और क्षेत्र |
|---|---|
| लगभग 500–800 ईसवी | तमिलनाडु में अप्पार, संबंदर, सुंदरमूर्ति |
| लगभग 800–900 ईसवी | तमिलनाडु में नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल, तोंदराडिप्पोडि |
| लगभग 1000–1100 ईसवी | पंजाब में अल हुजविरी (दाता गंज बख्श); तमिलनाडु में रामानुजाचार्य |
| लगभग 1100–1200 ईसवी | कर्नाटक में बासवन्ना |
| लगभग 1200–1300 ईसवी | महाराष्ट्र में ज्ञानदेव, मुक्ताबाई; राजस्थान में ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती; पंजाब में बहाउद्दीन ज़कारिया और फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर; दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी |
| लगभग 1300–1400 ईसवी | कश्मीर में लाल देद; सिंध में लाल शाहबाज़ कलंदर; दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया; उत्तर प्रदेश में रामानंद; महाराष्ट्र में चोखमेला; बिहार में शराफुद्दीन याह्या मनेरी |
| लगभग 1400–1500 ईसवी | उत्तर प्रदेश में कबीर, रैदास, सूरदास; पंजाब में बाबा गुरु नानक; गुजरात में बल्लभाचार्य; ग्वालियर में अबदुल्ला सत्तारी; गुजरात में मुहम्मद शाह आलम; गुलबर्गा में मीर सैयद मौहम्मद गेसू दराज़; असम में शंकरदेव; महाराष्ट्र में तुकाराम |
| लगभग 1500–1600 ईसवी | बंगाल में श्री चैतन्य; राजस्थान में मीराबाई; उत्तर प्रदेश में शेख अब्दुल कुद्दस गंगोही, मलिक मौहम्मद जायसी, तुलसीदास |
| लगभग 1600–1700 ईसवी | हरियाणा में शेख अहमद सरहिंदी; पंजाब में मियाँ मीर |
किताब का नोट: "यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।"
किताब की काल-रेखा की पहली पंक्ति में यहाँ 'ई.पू.' छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं।
⚠️ ये ग़लतियाँ मत कीजिए
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अप्पार, संबंदर, सुंदरमूर्ति ईसा पूर्व के संत थे | लगभग 500–800 ईसवी (छठी शताब्दी से) | पृष्ठ 143 |
| सारे अलवार और नयनार जाति प्रथा और ब्राह्मणों के विरोधी थे | कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि इन संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई; किताब के अनुसार कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है। संतों में ब्राह्मण भी थे, जैसे तोंदराडिप्पोडि। | पृष्ठ 144 |
| "हिंदू" और "मुसलमान" हमेशा से चले आ रहे नाम हैं | बहुत समय तक इनका चलन नहीं था; लोग जन्मस्थान से भी पहचाने जाते थे, जैसे तुरुष्क, ताजिक, पारसीक | पृष्ठ 151 |
| मस्जिदें हर जगह एक जैसी बनीं | मक्का की ओर अनुस्थापन सार्वभौमिक था; छत और निर्माण का सामान स्थानीय था | पृष्ठ 151 |
| "सूफ़ीवाद" इस्लामी ग्रंथों का शब्द है | यह उन्नीसवीं शताब्दी में बना एक अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ़ शब्द आता है | पृष्ठ 152 |
| हर सिलसिले का नाम उसके संस्थापक पर है | कई के नाम संस्थापक पर हैं (जैसे कादरी), पर कुछ के जन्मस्थान पर (चिश्ती, मध्य अफ़गानिस्तान के चिश्ती शहर से) | पृष्ठ 153 |
| चिश्ती हर अनुदान ठुकरा देते थे | वे बिना माँगे अनुदान और भेंट स्वीकार करते थे, पर जोड़ते नहीं थे, खर्च कर देते थे; स्रोत 9 में शेख ने ज़मीन का पट्टा नहीं लिया | पृष्ठ 158–159 |
| रामानंद पक्के तौर पर कबीर के गुरु थे | इतिहासकार मानते हैं कि दोनों का समकालीन होना मुश्किल है, जब तक उन्हें बहुत लंबी आयु न दी जाए | पृष्ठ 162 |
| बाबा गुरु नानक ने आदि ग्रंथ साहिब संकलित किया | संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया; गुरु ग्रंथ साहिब नाम गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय पड़ा | पृष्ठ 163 |
| मीराबाई ने एक संप्रदाय या मंडली बनाई | उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई | पृष्ठ 164 |
मानचित्र: प्रश्न 10 की जगहें (पृष्ठ 169)
भरे बिंदु भारत की जगहें हैं। खोखले बिंदु वे सूफ़ी स्थल हैं जो आज पाकिस्तान में हैं।
- सूफ़ी स्थल: अजमेर (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह), दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह) और फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह)।
- विष्णु से जुड़ा मंदिर: पुरी, उड़ीसा (जगन्नाथ, विष्णु का एक रूप)।
- शिव से जुड़े मंदिर: चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर, जो चोल सम्राटों की मदद से बने।
अजोधन, लाहौर (दाता दरबार) और मुल्तान भी सूफ़ी स्थल हैं, पर आज पाकिस्तान में हैं। भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाले स्थल लीजिए।
देवी से जुड़ा मंदिर: अध्याय के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता। इसके लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए।
रेखाचित्र, पैमाना नहीं दिया गया है।
इसमें सिर्फ़ समुद्र तट दिखाए गए हैं, देशों की सीमाएँ नहीं।
Coastlines: Natural Earth (public domain). Places at their Wikipedia coordinates.

तस्वीर: मुल्तान (पाकिस्तान) में शेख बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह।
Wasif Malik, CC BY 2.0. Image: Wikimedia Commons.
किताब के अपने प्रश्न
10भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफ़ी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।
मानचित्र कार्य · पृष्ठ 141, 146, 154–155, 159
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- अध्याय में आए इन स्थानों में से चुनिए; ऊपर के रेखाचित्र में ये सब दिखाए गए हैं।
- सूफ़ी स्थल (भारत में): अजमेर, राजस्थान (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह); दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया, ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली); फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह)।
- विष्णु से जुड़ा मंदिर: पुरी, उड़ीसा (जगन्नाथ, विष्णु का एक रूप)।
- शिव से जुड़ा मंदिर: चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम (चोल सम्राटों की मदद से बने विशाल शिव मंदिर)।
- देवी से जुड़ा मंदिर: अध्याय के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता। इसके लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए।
- अजोधन, लाहौर (दाता दरबार) और मुल्तान भी सूफ़ी स्थल हैं, पर आज पाकिस्तान में हैं; भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाले स्थल लीजिए।
11इस अध्याय में वर्णित किन्हीं 2 धार्मिक उपदेशकों/चिंतकों/संतों का चयन कीजिए और उनके जीवन व उपदेशों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। इनके समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचारों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए। हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है और हमें क्यों लगता है कि वे महत्त्वपूर्ण हैं।
परियोजना कार्य (कोई एक)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
- पृष्ठ 167 की काल-रेखा से दो नाम चुनिए, जैसे एक भक्त संत और एक सूफ़ी।
- हर एक के लिए चार खाने बनाइए: समय, क्षेत्र, मुख्य विचार, और जानकारी के स्रोत।
- स्रोतों में देखिए कि उनकी अपनी रचनाएँ, बाद में लिखी जीवनियाँ, मुलफुज़ात या तज़किरा में से क्या मिलता है (पृष्ठ 165)।
- याद रखिए कि जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं होतीं, पर बताती हैं कि अनुयायी उन्हें कैसे देखते थे (पृष्ठ 140)।
- अंत में लिखिए कि आज उनकी रचनाएँ कहाँ गाई या पढ़ी जाती हैं।
12इस अध्याय में वर्णित सूफ़ी व देव स्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या यह यात्राएँ अभी भी की जाती हैं? इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं? वे यहाँ क्यों जाते हैं? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन सी हैं?
परियोजना कार्य (कोई एक)
जवाब के मुख्य बिंदु देखिए
- यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
- एक सूफ़ी स्थल (जैसे अजमेर) और एक मंदिर (जैसे पुरी) चुनिए।
- अध्याय से शुरुआत कीजिए: दरगाह पर ज़ियारत, उर्स, समा और कव्वाली (पृष्ठ 153–157); मंदिरों में संतों के भजनों का गायन (पृष्ठ 143, 146)।
- जाने वालों से या अपने परिवार से पूछिए: कौन जाता है, साल में कब, और क्यों।
- गतिविधियों की सूची बनाइए: चढ़ावा, लंगर या भोजन, संगीत, मेले।
- तुलना कीजिए कि आज के आचार किताब के वर्णन (जैसे जहाँआरा की यात्रा, स्रोत 7) से कितने मिलते हैं।
आख़िरी जाँच✓ पड़ाव पूरा
1पृष्ठ 167 की काल-रेखा में कर्नाटक के बासवन्ना किस काल में रखे गए हैं?
काल-रेखा में बासवन्ना लगभग 1100–1200 ईसवी की पंक्ति में हैं। किताब का पाठ भी कर्नाटक के वीरशैव आंदोलन को बारहवीं शताब्दी का बताता है (पृष्ठ 146, 167)।
2इनमें से कौन-सा सूफ़ी स्थल आज पाकिस्तान में है?
मुल्तान में शेख बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह है। मुल्तान, लाहौर और अजोधन आज पाकिस्तान में हैं; अजमेर, फतेहपुर सीकरी और दिल्ली भारत में हैं।
3संतों की जीवनियों के बारे में किताब क्या कहती है?
किताब के अनुसार अनुयायियों की लिखी जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं होतीं, पर उनसे पता चलता है कि अनुयायी संतों को कैसे देखते थे (पृष्ठ 140)।
4मीराबाई के बारे में किताब के अनुसार कौन-सी बात सही है?
किताब के अनुसार मीराबाई के आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई। वे मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजकुमारी थीं, और उनका विवाह मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ (पृष्ठ 163–164)।
शाबाश! आपने पूरा अध्याय पढ़ लिया और हर जाँच कर ली।


