कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 140 से 169 · कालांश — 11 (10 पढ़ाने के, 1 मूल्यांकन का), हर एक 40–45 मिनट
इस्तेमाल कैसे करें — हर कालांश की पूरी तैयारी उसके अपने कार्ड में है: किताब के पृष्ठ, स्लाइड, इंटरैक्टिव अध्याय, प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड। पहले एक नज़र में वाला चित्र और तालिका देखिए, फिर आज के कालांश का कार्ड खोलिए। कार्ड के हिस्से और शब्द, जैसे निकास-पर्ची, तैयारी वाली तालिका में समझाए गए हैं।
अध्याय का बड़ा विचार — किताब पृष्ठ 140 पर बताती है कि संत कवियों की रचनाएँ अनुयायियों की पीढ़ियों के हाथ से आगे बढ़ीं, और रास्ते में कुछ विचार बदले या छोड़ दिए गए: “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”। इसीलिए “इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।” यानी इस अध्याय में हर संत और सूफ़ी को दो तरह से पढ़ा जाएगा: उन्होंने क्या कहा, और वह बात हम तक किस रास्ते से पहुँची।
हमारी ओर से पूरे अध्याय के लिए एक सवाल: एक ही समय में पूजा के इतने अलग-अलग रास्ते साथ-साथ कैसे चलते रहे, और वे कहाँ मिले, कहाँ टकराए? पहले दिन बच्चे इस पर दो पंक्तियाँ पर्ची पर लिखेंगे और पर्चियाँ आपके पास रहेंगी; कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वही पर्चियाँ लौटाकर परखी जाएँगी।
एक नज़र में — ग्यारह कालांश और उनकी सामग्री
हर तीर पर लिखा है कि अगला कालांश पिछले से क्यों निकलता है।
ग्यारह कालांश, एक कहानी
सामग्री के पन्ने: स्लाइड का पाठ · स्लाइड शो · प्रश्न बैंक · फ़्लैशकार्ड · इंटरैक्टिव अध्याय · रिवीजन नोट्स · क्विज़
| कालांश और टॉपिक | पृष्ठ | स्लाइड | इंटरैक्टिव | प्रश्न बैंक | फ़्लैशकार्ड |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 शुरुआत; 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट (1.1-1.2) | 140–142 | शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 | शुरुआत, 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट | क1 · ख1 · ग1 · घ1, घ2 · च1 | 1–18 |
| 2 2. उपासना की कविताएँ (2.1-2.4) | 143–146 | भाग 2 | 2. उपासना की कविताएँ | क2, क3, क4 · ख2 · ग2, ग3 · ङ1, ङ3 · छ1 | 19–39 |
| 3 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा; 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान | 146–148 | भाग 3 | 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा, 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान | क5, क6 · ग4 · च2 | 40–52 |
| 4 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ (5.1-5.3) | 148–152 | भाग 4 | 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ | क7, क8, क9 · ख3, ख4 · ग5 · घ3 · ङ4 · छ2 | 53–73 |
| 5 6. सूफ़ीमत का विकास (6.1-6.2) | 152–153 | भाग 5 | 6. सूफ़ीमत का विकास | क10, क11, क12 · घ4 · ङ2 | 74–88 |
| 6 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला: 7.1-7.2 | 153–156 | भाग 6 | 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला | क13, क14 · ख5, ख6 · घ5 · ङ5 · च3 | 89–110 |
| 7 7.3 भाषा और संपर्क; 7.4 सूफ़ी और राज्य | 157–159 | भाग 7 | 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला | क15, क16 · ख7 · ग6 · च4 · छ3 | 111–129 |
| 8 8. नवीन भक्ति पंथ: 8.1 दैवीय वस्त्र की बुनाई : कबीर | 160–162 | भाग 8 | 8. नवीन भक्ति पंथ | क17 · ग7 · घ6 · च5 · छ4 | 130–140 |
| 9 8.2 बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्द; 8.3 मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी | 162–164 | भाग 9 | 8. नवीन भक्ति पंथ | क18, क19 · ख8, ख9, ख10 · ग8 · घ7, घ8 · ङ6 | 141–156 |
| 10 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण; काल-रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10) | 164–168 | भाग 10 | 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण, सार और काल-रेखा | क20 · च6 · नमूना पत्र 1 | 157–182 |
| 11 मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न | 168–169 | आख़िरी भाग | हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न | नमूना पत्र 2 और 3 | पूरा सेट |
प्रश्न बैंक के कोड ऐसे पढ़िए: क1 मतलब खंड क (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) का प्रश्न 1। ख रिक्त स्थान है, ग सही/ग़लत, घ अति लघूत्तरीय (2 अंक), ङ लघूत्तरीय (3 अंक), च दीर्घ उत्तरीय (5 अंक) और छ स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक)। फ़्लैशकार्ड के अंक कार्ड के नंबर हैं।
पढ़ाने से पहले
तैयारी — कार्ड में क्या-क्या है और उसे कैसे तैयार करें
हर कालांश का कार्ड इसी क्रम में चलता है। पहली बार पढ़ा रहे हैं तो यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।
| हिस्सा या औज़ार | यह क्या है | कैसे तैयार करें |
|---|---|---|
| किताब | कार्ड के सबसे ऊपर लिखे पृष्ठ; बच्चे इन्हीं से पढ़ेंगे | पृष्ठ एक दिन पहले पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाले बॉक्स और किनारे के प्रश्न |
| स्लाइड | स्लाइड का पाठ का वह भाग जो इस कालांश का है | स्लाइड शो एक बार चलाकर देखिए; प्रोजेक्टर न हो तो स्लाइड का पाठ ही काफ़ी है |
| इंटरैक्टिव अध्याय | किताब के हर हिस्से का एक पड़ाव, जिसे बच्चे फ़ोन या कंप्यूटर पर ख़ुद पढ़ सकते हैं | कार्ड में दिया पड़ाव खोलकर देखिए कि उसमें क्या है |
| लक्ष्य | कालांश के अंत तक हर बच्चा क्या कर सके | निकास-पर्ची इसी लक्ष्य को जाँचती है; दोनों साथ पढ़िए |
| साथ ले जाइए | किताब के अलावा जो चीज़ें कक्षा में चाहिए | एक दिन पहले जुटा लीजिए; चार्ट पेपर पर चित्र पहले से बना लीजिए |
| 40 मिनट | कालांश के छह चरण, मिनट के हिसाब से | पहला चरण हमेशा पिछली पर्चियाँ है, आख़िरी हमेशा निकास-पर्ची; बीच के चरण किताब के क्रम में |
| चित्र | उस कालांश का एक आरेख, किताब के एक पृष्ठ से | कॉपी में एक बार बना लीजिए, फिर बोर्ड पर बच्चों के जवाबों से बनवाइए |
| बोर्ड-कार्य | कालांश के अंत तक बोर्ड पर बनने वाली तालिका, जिसे बच्चे कॉपी में उतारें | हर पंक्ति के साथ पृष्ठ लिखा है; बच्चे भी पृष्ठ लिखें |
| यहाँ बच्चे अटकेंगे | वे बातें जहाँ बच्चे अक्सर भूल करते हैं, और कमज़ोर और तेज़ विद्यार्थी के लिए एक-एक काम | कालांश से पहले पढ़ लीजिए, ताकि भूल होते ही रोक सकें |
| निकास-पर्ची | आख़िरी कुछ मिनट में दो छोटे प्रश्न, जिनके उत्तर बच्चे काग़ज़ की पर्ची पर लिखकर देते हैं | नमूना उत्तर कार्ड में हैं; पर्चियाँ अगले कालांश के पहले चरण में काम आती हैं |
| प्रश्न बैंक | गृहकार्य के प्रश्न, कोड से | कोड ऊपर की तालिका के नीचे समझाए गए हैं |
| फ़्लैशकार्ड | दोहराने के लिए छोटे कार्ड, नंबर से | बच्चों को बता दीजिए कि आज कौन-से नंबर दोहराने हैं |
हर कालांश से पहले:
- कार्ड के पृष्ठ किताब में पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाला बॉक्स।
- पिछली निकास-पर्चियाँ छाँटिए: कितनों ने सही लिखा, सबसे ज़्यादा कौन-सी भूल हुई।
- “चित्र” वाला आरेख कॉपी में एक बार बनाइए।
- गृहकार्य के कोड प्रश्न बैंक में खोलकर देख लीजिए कि उत्तर कितने लंबे हैं।
पढ़ाने का क्रम: पहले दो धाराएँ, फिर उनका संवाद
किताब दो धाराओं को अलग-अलग लेती है और आख़िर में उन्हें मिलाती है। पहले भक्ति की धारा (भाग 1 से 4): पूजा प्रणालियों का मेल और टकराव, फिर दक्षिण के अलवार, नयनार और वीरशैव, और फिर चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत। फिर इस्लाम और सूफ़ी धारा (भाग 5 से 7): इस्लामी परंपराएँ, सूफ़ीमत का विकास, और चिश्ती सिलसिला। भाग 8 में उत्तर भारत के नए संत, कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई, इन दोनों धाराओं से संवाद करते हैं, और भाग 9 बताता है कि इतिहासकार यह सब किन स्रोतों से जोड़ते हैं।
यह क्रम इसलिए है कि हर नई बात के पीछे की बात बच्चे पहले पढ़ चुके हों। कालांश 7 में दक्खनी कवियों पर लिंगायतों के कन्नड़ वचनों का असर तभी समझ आता है जब कालांश 3 में बच्चे वचन पढ़ चुके हों; कालांश 8 में कबीर के परम सत्य के नाम, अल्लाह और पीर से लेकर अलख और शून्य तक, तभी समझ आते हैं जब कालांश 1 से 7 में बच्चे इस्लामी, सूफ़ी, वेदांत और जोगी परंपराओं से मिल चुके हों। अगर संतों को पहले पढ़ा दिया जाए, तो बच्चे उनकी बातों को बिना संदर्भ के रटेंगे। इस क्रम को मत तोड़िए।
सामग्री — यह जुटा लीजिए
| # | क्या | किस कालांश में |
|---|---|---|
| 1 | चार्ट पेपर की कम से कम दस शीट: हर कालांश का चित्र, और आख़िर में काल-रेखा | 1 से 10 |
| 2 | भारत का मानचित्र या एटलस | 6, 10 |
| 3 | भारत के रेखा-मानचित्र, हर विद्यार्थी के लिए एक | 10 |
| 4 | काग़ज़ की पर्चियाँ, और पहले दिन की पर्चियों के लिए एक लिफ़ाफ़ा | हर कालांश; लिफ़ाफ़ा 1 और 10 में |
| 5 | नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ, या बोर्ड पर लिखे प्रश्न | 11 |
| 6 | प्रोजेक्टर, हो तो | स्लाइड और इंटरैक्टिव अध्याय के लिए; न हो तो चार्ट पेपर और बोर्ड काफ़ी हैं |
कक्षा-व्यवस्था
- जोड़ियाँ स्रोत पढ़ने के कामों के लिए: स्रोत 1 और 2 (कालांश 2), स्रोत 4 (कालांश 3), स्रोत 5 और 6 (कालांश 4), और स्रोत 10 (कालांश 8)। बाक़ी स्रोत आप ज़ोर से पढ़िए।
- चार्ट पेपर कक्षा की दीवार पर एक जगह लगाइए। कालांश 10 और 11 में सब फिर काम आएँगे।
- धर्म और जाति इतिहास की तरह: इन्हें वैसे ही पढ़ाइए जैसे किताब बताती है। किसी बच्चे से उसका धर्म या जाति मत पूछिए, और कक्षा में किसी पूजा, नमाज़, कीर्तन या कव्वाली का अभिनय मत करवाइए।
- धर्मों की होड़ नहीं। कक्षा में यह बहस मत करवाइए कि कौन-सी परंपरा बेहतर थी; बहस बस इतनी हो कि किताब का प्रमाण क्या है।
- बिना प्रोजेक्टर भी हर कालांश चल जाता है: हर कार्ड का चित्र बोर्ड पर बन सकता है, और बच्चे अपनी किताब में चित्र और काल-रेखा देखते हैं।
अधिगम प्रतिफल
| # | प्रतिफल | कालांश | जाँच |
|---|---|---|---|
| 1 | पूजा प्रणालियों के समन्वय की दो प्रक्रियाएँ उदाहरण के साथ, और उनके बीच के टकराव बताता है | 1 | निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 1 |
| 2 | अलवार और नयनार संतों की पहचान, जाति और स्त्रियों के बारे में उनकी बातें, और चोल शासकों से उनका संबंध लिखता है | 2 | निकास-पर्ची; अभ्यास के प्रश्न 4 और 7 |
| 3 | वीरशैव परंपरा की मान्यताएँ और चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत की धार्मिक स्थिति बताता है | 3 | निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 4 |
| 4 | इस्लामी शासकों की नीति, लोक प्रचलन में इस्लाम और मस्जिदों की स्थापत्य कला समझाता है | 4 | निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 2 |
| 5 | ख़ानक़ाह, सिलसिला, दरगाह और उर्स का अर्थ, और बा–शरिया और बे–शरिया का अंतर लिखता है | 5 | निकास-पर्ची; अभ्यास के प्रश्न 3 और 6 |
| 6 | चिश्ती ख़ानक़ाह का जीवन और अजमेर की दरगाह की लोकप्रियता के कारण बताता है | 6 | निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 6 |
| 7 | चिश्तियों की भाषाएँ और सूफ़ियों और राज्य के संबंधों में सहयोग और तनाव बताता है | 7 | निकास-पर्ची; अभ्यास के प्रश्न 7 और 8 |
| 8 | कबीर की बानी, उसके संकलन और उनके जीवन के बारे में इतिहासकारों की सावधानी समझाता है | 8 | निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 5 |
| 9 | बाबा गुरु नानक का संदेश, गुरु ग्रंथ साहिब तक का क्रम, और मीराबाई का जीवन लिखता है | 9 | निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 5 |
| 10 | धार्मिक इतिहास के स्रोत और उनकी चुनौतियाँ बताता है, काल-रेखा पढ़ता है और प्रश्न 10 के स्थल मानचित्र पर दिखाता है | 10 | मानचित्र; अभ्यास के प्रश्न 9 और 10 |
| 11 | पूरे अध्याय के सवाल का उत्तर किताब के उदाहरणों से देता है | 1, 10 | पहले दिन की पर्ची, और कालांश 10 में उसका नया उत्तर |
कालांश-दर-कालांश
कालांश 1 — शुरुआत; 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट (1.1-1.2)
किताब — पृष्ठ 140–142 · स्लाइड — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 · इंटरैक्टिव — 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी इस अध्याय के नए स्रोत बता सके, पूजा प्रणालियों के समन्वय की दो प्रक्रियाएँ उदाहरण के साथ समझा सके, और तांत्रिक पूजा की दो विशेषताएँ लिख सके।
साथ ले जाइए — किताब, पहले दिन की पर्चियों के लिए काग़ज़ और एक लिफ़ाफ़ा, और पुरी से तंत्र तक वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
-
0–5 मिनट · पहले दिन की पर्ची। बोर्ड पर पूरे अध्याय का सवाल लिखिए: एक ही समय में पूजा के इतने अलग-अलग रास्ते साथ-साथ कैसे चलते रहे, और वे कहाँ मिले, कहाँ टकराए? हर बच्चा दो पंक्तियाँ और अपना नाम लिखे। पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में रखिए; कालांश 10 में ये लौटेंगी। यह सवाल हमारी ओर से है।
-
5–12 मिनट · नए स्रोत। पृष्ठ 140 पढ़िए। बोर्ड पर लिखवाइए: लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी के नए साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ हैं, जो उन्होंने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से रचीं। किताब कहती है, “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”: अनुयायियों की पीढ़ियों ने संदेश आगे बढ़ाया, और कुछ विचार बदले या छोड़ दिए। इसीलिए “इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।” अनुयायियों की लिखी जीवनियाँ भी स्रोत हैं; ये अक्षरश: सत्य नहीं हैं, फिर भी बताती हैं कि अनुयायी अपने नेताओं को कैसे देखते थे। चित्र 6.1 दिखाइए: मणिक्वचक्कार की बारहवीं शताब्दी की कांस्य मूर्ति।
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12–22 मिनट · समन्वय की दो प्रक्रियाएँ। पृष्ठ 141 पढ़िए। पहली प्रक्रिया: पौराणिक ग्रंथों की रचना सरल संस्कृत छंदों में हुई, “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे।” दूसरी प्रक्रिया: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे सामाजिक वर्गों के विश्वासों और आचरणों को स्वीकार किया और उन्हें नया रूप दिया। फिर पृष्ठ 141 का बॉक्स पढ़िए: “महान” और “लघु” परंपरा बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्द हैं, जो उन्होंने एक किसान समाज के बारे में कहे। किसान पुरोहितों और राजाओं जैसे प्रभुत्वशाली वर्गों के अनुष्ठानों की नकल करते थे, और साथ ही अपने लोकाचार भी मानते थे। फिर पूछिए: पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में ही क्यों रचे गए होंगे? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — ताकि वे लोग भी इन्हें समझ सकें जो वैदिक विद्या से दूर रखे गए थे।
- किनके लिए: किताब के अनुसार ये ग्रंथ “वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे।”
- किसलिए: यह ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की प्रक्रिया थी।
यानी सरल भाषा ने इन विचारों को उन लोगों तक पहुँचाया जिन तक वेद नहीं पहुँचते थे।
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22–30 मिनट · पुरी के जगन्नाथ और देवियाँ। पृष्ठ 141–142 पढ़िए और चित्र 6.2 दिखाइए, जिसमें जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ हैं। बारहवीं शताब्दी तक पुरी के मुख्य देवता को जगन्नाथ (“शाब्दिक अर्थ में संपूर्ण विश्व का स्वामी”) के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया। यह एक स्थानीय देवता थे, जिनकी प्रतिमा स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे और आज भी बनाते हैं। देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में होती थी, और स्थानीय देवियों को मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता मिली: कहीं विष्णु की पत्नी लक्ष्मी, कहीं शिव की पत्नी पार्वती। नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए।
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30–36 मिनट · तांत्रिक पूजा, और टकराव। पृष्ठ 142 पढ़िए। देवी की उपासना अधिकतर तांत्रिक नाम से जानी जाती है। इसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे, और अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण के भेद नहीं माने जाते थे। इसके विचारों ने शैव और बौद्ध दर्शन को प्रभावित किया। अग्नि, इंद्र और सोम पूरी तरह गौण हो गए, “किंतु इन असंगतियों के बावजूद वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा।” फिर टकराव गिनवाइए: वैदिक परंपरा के प्रशंसक मंत्रों वाले यज्ञ से हटकर आचरणों की निंदा करते थे, तांत्रिक उपासक वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे, और भक्त अपने इष्ट विष्णु या शिव को सर्वोच्च बताते थे। बौद्ध और जैन धर्म से संबंध भी अक्सर तनाव भरे थे, “यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे।” चित्र 6.3 दिखाइए: बौद्ध देवी मारिची, लगभग दसवीं शताब्दी, बिहार।
-
36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) समन्वय की दो प्रक्रियाएँ कौन-सी थीं? (2) तांत्रिक पूजा में कौन शामिल हो सकता था?
पुरी से तंत्र तक: पूजा के तीन रूप (चरण 4)
पुरी से तंत्र तक: पूजा के तीन रूप
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| नए स्रोत | संत कवियों की रचनाएँ, क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक; अनुयायियों की लिखी जीवनियाँ | 140 |
| पहली प्रक्रिया | पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में, स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य | 141 |
| दूसरी प्रक्रिया | ब्राह्मणों ने दूसरे वर्गों के विश्वास और आचरण अपनाए और उन्हें नया रूप दिया | 141 |
| “महान” और “लघु” | राबर्ट रेडफील्ड के शब्द, एक किसान समाज के बारे में | 141 |
| जगन्नाथ | पुरी के स्थानीय देवता, बारहवीं शताब्दी तक विष्णु के एक रूप में | 141 |
| देवी | सिंदूर से पोते गए पत्थर; लक्ष्मी या पार्वती के रूप में | 142 |
| तांत्रिक पूजा | स्त्री और पुरुष दोनों; वर्ग और वर्ण के भेद नहीं | 142 |
| वेद | अग्नि, इंद्र और सोम गौण, फिर भी वेद प्रामाणिक | 142 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “लघु” का अर्थ छोटा या नीचा नहीं। किताब के अनुसार विद्वान इन शब्दों में छिपे ऊँच-नीच के भाव को नहीं मानते, इसलिए इन्हें उद्धरण चिह्नों में लिखा जाता है।
- गौण देवता हुए, वेद नहीं। अग्नि, इंद्र और सोम गौण हुए, पर वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा। बच्चे अक्सर लिख देते हैं कि वेद छोड़ दिए गए।
- जगन्नाथ पहले स्थानीय देवता थे। उन्हें बाद में विष्णु के एक रूप में प्रस्तुत किया गया; यही दूसरी प्रक्रिया का उदाहरण है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट खोलिए, और देवियों वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: स्थानीय देवियों को किन दो देवियों के रूप में मान्यता मिली? (विष्णु की पत्नी लक्ष्मी, और शिव की पत्नी पार्वती।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: जगन्नाथ का उदाहरण दोनों में से किस प्रक्रिया का है, और क्यों? (दूसरी का: एक स्थानीय देवता को, जिनकी प्रतिमा जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे, विष्णु के एक रूप में अपनाया गया।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) पहली, पौराणिक ग्रंथों से ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार; दूसरी, ब्राह्मणों द्वारा स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे वर्गों के विश्वास और आचरण अपनाकर उन्हें नया रूप देना। (2) स्त्री और पुरुष दोनों, बिना वर्ग और वर्ण के भेद के।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1, ख1, ग1, घ1 और घ2; जो आगे हैं, वे च1 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 1–18।
कालांश 2 — 2. उपासना की कविताएँ (2.1-2.4)
किताब — पृष्ठ 143–146 · स्लाइड — भाग 2 · इंटरैक्टिव — 2. उपासना की कविताएँ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी अलवार और नयनार संतों की पहचान बता सके, जाति और स्त्रियों के बारे में इस परंपरा की बातें किताब के स्रोतों से समझा सके, और चोल शासकों से इसका संबंध दो उदाहरणों से लिख सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और संत, शासक और मंदिर वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
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0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने तांत्रिक पूजा के बारे में सिर्फ़ “स्त्रियाँ” लिखा, उन्हें याद दिलाइए कि किताब स्त्री और पुरुष दोनों कहती है, और वर्ग और वर्ण के भेद न मानने की बात भी।
-
5–12 मिनट · अलवार और नयनार। पृष्ठ 143 पढ़िए। भक्ति की परंपरा इस अध्याय के काल से पहले ही लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी थी। धर्म के इतिहासकार भक्ति को दो भागों में बाँटते हैं: सगुण (विशेषण सहित), जिसमें शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियों की मूर्त रूप में उपासना होती थी; और निर्गुण (विशेषण विहीन), यानी अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना। फिर यह वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।” ये संत एक जगह से दूसरी जगह घूमते हुए तमिल में भजन गाते थे; जिन जगहों को उन्होंने इष्ट का निवास बताया, वहाँ बाद में बड़े मंदिर बने।
-
12–22 मिनट · जाति पर दो स्रोत। पृष्ठ 144 पढ़िए। “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।” किताब के अनुसार यह बात कुछ हद तक सत्य प्रतीत होती है, क्योंकि ये संत ब्राह्मण, शिल्पकार और किसान समुदायों से थे, और कुछ उन जातियों से भी जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था। अलवारों के संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् को तमिल वेद कहा गया। फिर जोड़ियों में स्रोत 1 और स्रोत 2 पढ़वाइए और पृष्ठ 144 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडि और अप्पार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?” नमूना उत्तर — हाँ, दोनों भक्ति को शास्त्र-ज्ञान और कुल से बड़ा मानते हैं, पर कहने का ढंग अलग है।
- तोंदराडिप्पोडि: ये ख़ुद ब्राह्मण अलवार थे, और कहते हैं कि विष्णु उन चतुर्वेदियों से, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, अधिक उन “दासों” को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
- अप्पार: ये शास्त्र उद्धृत करने वालों से पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?” और केवल मारपेरू के स्वामी (शिव) के आगे नतमस्तक होने को कहते हैं।
अप्पार ज़्यादा तीखे हैं; दोनों के लिए इष्ट के प्रति प्रेम ही कसौटी है। कोई बच्चा लिखे कि समानता सीमित है, तो वह भी ठीक है: अप्पार का छंद ब्राह्मणों का नाम नहीं लेता, “हे धूर्तजन, जो तुम शास्त्र को उद्धृत करते हो” से बात करता है, और तोंदराडिप्पोडि ख़ुद ब्राह्मण होकर केवल उन चतुर्वेदियों की बात करते हैं जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते। कारण साथ लिखे तो दोनों उत्तर पूरे हैं।
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22–30 मिनट · स्त्री भक्त। पृष्ठ 144–145 पढ़िए। किताब कहती है, “संभवत: इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी।” अंडाल अलवार स्त्री थीं, जो अपने को विष्णु की प्रेयसी मानती थीं; उनके गीत आज भी गाए जाते हैं। कराइक्काल अम्मइयार शिव भक्त थीं, जिन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया। स्रोत 3 (“एक राक्षसी?”) पढ़िए और पृष्ठ 145 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “उन उपायों की सूची बनाइए जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आप को प्रस्तुत करती हैं। किस भाँति यह उपाय स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा से भिन्न हैं।” नमूना उत्तर — स्रोत 3 में वे अपने को सुंदर नहीं, डरावने रूप में दिखाती हैं।
- रूप: फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश और आगे निकले दाँत।
- जगह: वन में चीखती हुई; वह वन “जो हमारे पिता (शिव) का घर है”।
वे सुंदर दिखने के बजाय शिव की भक्ति को ही अपनी पहचान बनाती हैं, और किताब कहती है, “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।”
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30–36 मिनट · संत, शासक और मंदिर। पृष्ठ 145–146 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। तमिल भक्ति भजनों का एक मुख्य विषय बौद्ध और जैन धर्म का विरोध है, ख़ास तौर पर नयनारों की रचनाओं में; इतिहासकार इसका कारण राजकीय अनुदान पाने की होड़ बताते हैं। चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने विष्णु और शिव के मंदिरों के लिए भूमि–अनुदान दिए। चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के बड़े शिव मंदिर चोल शासकों की मदद से बने। 945 ईसवी के एक अभिलेख से पता चलता है कि चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
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36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) अलवार और नयनार किसके भक्त थे? (2) तमिल वेद किस संकलन को कहा गया?
संत, शासक और मंदिर (चरण 5)
संत, शासक और मंदिर
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सगुण और निर्गुण | विशेषण सहित, मूर्त रूप में; विशेषण विहीन, निराकार | 143 |
| अलवार और नयनार | लगभग छठी शताब्दी; विष्णु भक्त और शिवभक्त; तमिल में भजन | 143 |
| जाति पर | कुछ इतिहासकारों का मत; किताब के अनुसार कुछ हद तक सत्य | 144 |
| संकलन | नलयिरादिव्यप्रबंधम् (तमिल वेद), दसवीं शताब्दी तक; तवरम | 144 |
| स्त्री भक्त | अंडाल (विष्णु); कराइक्काल अम्मइयार (शिव) | 144–145 |
| बौद्ध और जैन | नयनारों के भजनों में विरोध; राजकीय अनुदान की होड़ | 145 |
| चोल सम्राट | नवीं से तेरहवीं शताब्दी; भूमि–अनुदान, बड़े शिव मंदिर | 145–146 |
| 945 ईसवी | परांतक प्रथम ने संत कवियों की धातु प्रतिमाएँ लगवाईं | 146 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- अलवार विष्णु के, नयनार शिव के। बच्चे दोनों को उलट देते हैं। बोर्ड पर दोनों के आगे इष्ट लिखवाइए।
- “कुछ हद तक”। किताब पूरा जाति-विरोध नहीं कहती; वह इतिहासकारों के मत को कुछ हद तक सत्य बताती है। उत्तर में यह शब्द छूटे तो अंक कटेंगे।
- तोंदराडिप्पोडि ब्राह्मण थे। बच्चे मान लेते हैं कि जाति पर सवाल केवल दूसरी जातियों के संतों ने उठाए।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. उपासना की कविताएँ खोलिए, और स्त्री भक्तों वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: अंडाल अपने को किसकी प्रेयसी मानती थीं? (विष्णु की।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: चोल शासकों ने संत कवियों की प्रतिमाएँ मंदिर में क्यों लगवाई होंगी? (किताब के अनुसार वेल्लाल किसान इन संतों का आदर करते थे, इसलिए शासक भी उनका समर्थन चाहते थे; इन प्रतिमाओं को उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था, यानी संतों से शासक का जुड़ाव सबको दिखता था।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) अलवार विष्णु के, नयनार शिव के। (2) अलवारों के संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् को।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क2, क3, क4, ख2, ग2 और ग3; जो आगे हैं, वे ङ1, ङ3 और छ1 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 19–39।
कालांश 3 — 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा; 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान
किताब — पृष्ठ 146–148 · स्लाइड — भाग 3 · इंटरैक्टिव — 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा और 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी वीरशैव परंपरा के संस्थापक और उसकी तीन मान्यताएँ बता सके, स्रोत 4 से अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना का रवैया समझा सके, और चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत की धार्मिक स्थिति दो वाक्यों में लिख सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और उत्तरी भारत, चौदहवीं शताब्दी तक वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
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0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने अलवार और नयनार के इष्ट उलट दिए, उनकी पर्ची पर बोर्ड से मिलान करवाइए।
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5–14 मिनट · बासवन्ना और लिंगायत। पृष्ठ 146 पढ़िए। बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नया आंदोलन उभरा, जिसका नेतृत्व बासवन्ना (1106–68) नाम के एक ब्राह्मण ने किया, जो एक कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे। उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए। वे शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं; पुरुष बाएँ कंधे पर चाँदी के एक पिटारे में छोटा लिंग धारण करते हैं; और वे जंगम, यानी यायावर भिक्षुओं, का आदर करते हैं।
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14–22 मिनट · तीन मान्यताएँ। पृष्ठ 146–147 पढ़िए और बोर्ड पर तीन खाने बनाइए। मृत्यु: लिंगायतों का मानना है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता। किताब इसी के साथ बताती है कि वे धर्मशास्त्रों में बताए श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं। जाति: उन्होंने जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध किया, और पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी प्रश्न उठाए। विवाह: उन्होंने वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह को अपनाया, जिन्हें धर्मशास्त्र नहीं मानते थे। फिर यह वाक्य पढ़िए: “वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।”
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22–28 मिनट · स्रोत 4, जोड़ियों में। जोड़ियाँ स्रोत 4 (“अनुष्ठान और यथार्थ संसार”) पढ़ें। फिर पृष्ठ 147 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए। वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं।” नमूना उत्तर — बासवन्ना दिखावटी अनुष्ठानों के विरोधी हैं।
- रवैया: लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप आए तो कहते हैं “मारो–मारो”; जो सेवक खा सकता है उसे भगा देते हैं, और जो प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं।
- समझाने का ढंग: वे रोज़ की जानी-पहचानी बातों के जोड़े रखकर उलटापन दिखाते हैं, ताकि श्रोता ख़ुद देख ले कि कर्मकांड और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते।
भाषा सरल है, जैसी वचनों की होती है।
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28–36 मिनट · उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान। पृष्ठ 147–148 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। यहाँ विष्णु और शिव की उपासना शासकों की मदद से बने मंदिरों में होती थी, पर इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलीं। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह वह दौर था जब अनेक राजपूत राज्य उभरे, जिनमें ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था। रूढ़िवादी ब्राह्मणीय ढाँचे से बाहर के नेता भी प्रभाव पा रहे थे: नाथ, जोगी और सिद्ध। इनमें से कई शिल्पी समुदायों से थे, जिनमें जुलाहे भी थे। इन्होंने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और लोगों की भाषाओं में बात की, फिर भी ये शासक वर्ग का समर्थन नहीं पा सके। तुर्कों के आगमन का चरम दिल्ली सल्तनत (तेरहवीं शताब्दी) की स्थापना थी। किताब के शब्दों में, “सूफ़ियों का आगमन (अनुभाग 6) इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।” पृष्ठ 147 का बॉक्स भी पढ़िए: तमिल भक्तों के विचार संस्कृत परंपरा में अपनाए गए, जिसका नतीजा भागवत पुराण है; और तेरहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में भक्ति का विकास हुआ।
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36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) मृत्यु के बारे में लिंगायतों का क्या विश्वास था, और वे अपने मृतकों के साथ क्या करते थे? (2) नाथ, जोगी और सिद्धों ने किन दो तरीक़ों से ब्राह्मणीय ढाँचे से अलग राह ली?
उत्तरी भारत, चौदहवीं शताब्दी तक (चरण 5)
उत्तरी भारत, चौदहवीं शताब्दी तक
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बासवन्ना | बारहवीं शताब्दी, कर्नाटक; ब्राह्मण, कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री | 146 |
| नाम | वीरशैव (शिव के वीर), लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) | 146 |
| मृत्यु | भक्त शिव में लीन; श्राद्ध नहीं, मृतकों को दफ़नाते हैं | 147 |
| जाति | जाति और “दूषित” मानने का विरोध; पुनर्जन्म पर प्रश्न | 147 |
| विवाह | वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह | 147 |
| वचन | कन्नड़ भाषा में, आंदोलन के स्त्री पुरुषों ने रचे | 147 |
| नाथ, जोगी, सिद्ध | कई शिल्पी समुदायों से; वेदों की सत्ता को चुनौती | 148 |
| दिल्ली सल्तनत | तेरहवीं शताब्दी; राजपूत राज्य और ब्राह्मण कमज़ोर | 148 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- बासवन्ना ख़ुद ब्राह्मण थे। यह तोंदराडिप्पोडि वाली बात से मिलती है; बच्चों से कालांश 2 की यह पंक्ति याद करवाइए।
- लिंगायत दफ़नाते हैं। किताब मृत्यु वाली मान्यता और श्राद्ध न करने की बात साथ-साथ बताती है, एक को दूसरे का कारण नहीं कहती; उत्तर में दोनों बातें लिखवाइए।
- चौदहवीं शताब्दी तक का मतलब। किताब यह नहीं कहती कि उत्तर भारत में भक्ति नहीं थी; वह कहती है कि अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलीं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा खोलिए, और मान्यताओं वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: लिंगायत किनका आदर करते हैं? (जंगम, यानी यायावर भिक्षुओं का।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: तमिल संतों और वीरशैवों में जाति के बारे में क्या मिलता-जुलता है? (दोनों में ऐसे लोग थे जो ख़ुद ब्राह्मण थे; तमिल संतों के बारे में किताब इतिहासकारों के मत को कुछ हद तक सत्य कहती है, और लिंगायतों ने जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने का विरोध किया।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता; वे श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते और मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं। (2) उन्होंने वेदों की सत्ता को चुनौती दी, और लोगों की भाषाओं में बात की।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क5, क6 और ग4; जो आगे हैं, वे च2 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 40–52।
कालांश 4 — 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ (5.1-5.3)
किताब — पृष्ठ 148–152 · स्लाइड — भाग 4 · इंटरैक्टिव — 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी समझा सके कि इस्लामी शासकों की नीति सिद्धांत और व्यवहार में कैसे अलग थी, ज़िम्मी और शरिया का अर्थ लिख सके, और मस्जिदों की स्थापत्य कला में सार्वभौमिक और स्थानीय तत्व पहचान सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और सिद्धांत में और व्यवहार में वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
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0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने लिंगायतों के दफ़नाने का कारण नहीं लिखा, उन्हें मृत्यु वाली मान्यता याद दिलाइए।
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5–12 मिनट · पुराने संपर्क। पृष्ठ 148 पढ़िए। प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए, और मध्य एशिया से लोग उत्तर–पश्चिम प्रांतों में आकर बसे। 711 ईसवी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीतकर उसे खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया। लगभग तेरहवीं शताब्दी में तुर्क और अफगानों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी। बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म था, और सोलहवीं शताब्दी में मुगल सल्तनत बनने पर भी यह बना रहा। पृष्ठ 148 का बॉक्स पढ़िए: उलमा, आलिम का बहुवचन, इस्लाम धर्म के ज्ञाता थे।
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12–22 मिनट · सिद्धांत और व्यवहार। पृष्ठ 149–150 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। सिद्धांत में मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना था, पर उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी, क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम मानने वाली नहीं थी। ज़िम्मी संरक्षित श्रेणी थी, जो जज़िया कर चुकाकर संरक्षण की अधिकारी बनती थी; भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया। बहुत से शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को भूमि अनुदान और कर की छूट दी। फिर जोड़ियों में स्रोत 5 (अकबर का 1598 का फ़रमान) और स्रोत 6 (औरंगज़ेब का 1661–62 का पत्र) पढ़वाइए, और पृष्ठ 150 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए। जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।” नमूना उत्तर — पत्र से देवता भी पता चलता है और बादशाह का मन भी।
- देवता: शिव। पत्र में “श्री शिव जियो की पनाह” लिखा है।
- बादशाह का रवैया: आदर और उदारता का। औरंगज़ेब ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”
यह पत्र गुरु आनंद नाथ नाम के जोगी को लिखा गया था।
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22–30 मिनट · लोक प्रचलन में इस्लाम। पृष्ठ 150–151 पढ़िए। इस्लाम कबूल करने वालों ने सिद्धांत में पाँच मुख्य बातें मानीं: अल्लाह एकमात्र ईश्वर है और पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत हैं; दिन में पाँच बार नमाज़; खैरात (ज़कात) बाँटना; रमज़ान के महीने में रोज़ा; और हज के लिए मक्का जाना। पर व्यवहार में भिन्नता थी। खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय ने जीनन नाम के भक्ति गीत अपनाए, जो राग में बँधे थे और पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे। मालाबार तट (केरल) पर बसे अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा अपनाई, और मातृकुलीयता और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार भी।
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30–36 मिनट · मस्जिदें और समुदायों के नाम। पृष्ठ 151–152 पढ़िए और चित्र 6.9, 6.10 और 6.11 दिखाइए। इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन हर जगह एक-सा है, जो मेहराब और मिम्बर से पता चलता है; छत और निर्माण के सामान में भिन्नता दिखती है। फिर पृष्ठ 151 पढ़िए: आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं मिलता है। लोगों को उनके जन्मस्थान से पहचाना जाता था: तुर्की मुसलमान तुरुष्क, तजाकिस्तान से आए लोग ताजिक, और फारस के लोग पारसीक। इन प्रवासियों के लिए एक अधिक सामान्य शब्द म्लेच्छ था।
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36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) ज़िम्मी कौन थे? (2) मस्जिदों का कौन-सा तत्व हर जगह एक-सा था?
सिद्धांत में और व्यवहार में (चरण 3)
सिद्धांत में और व्यवहार में
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 711 ईसवी | मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीतकर खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल किया | 148 |
| उलमा | आलिम का बहुवचन; इस्लाम धर्म के ज्ञाता | 148 |
| शरिया | कुरान शरीफ़ और हदीस पर आधारित कानून; बाद में क़ियास और इजमा भी | 149 |
| ज़िम्मी | संरक्षित श्रेणी; जज़िया चुकाकर संरक्षण; भारत में हिंदू भी | 149 |
| स्रोत 5 और 6 | अकबर का 1598 का फ़रमान; औरंगज़ेब का 1661–62 का पत्र | 149–150 |
| पाँच बातें | एक ईश्वर, नमाज़, ज़कात, रोज़ा, हज | 150 |
| स्थानीय रंग | खोजा इस्माइली के जीनन; मालाबार में मलयालम | 150–151 |
| मस्जिद | मक्का की ओर अनुस्थापन हर जगह; छत और सामान में भिन्नता | 151–152 |
| नाम | तुरुष्क, ताजिक, पारसीक; म्लेच्छ | 151 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- ज़िम्मी में हिंदू भी। किताब के उदाहरण यहूदी और ईसाई हैं, पर भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया। उत्तर में यह पंक्ति छूटती है।
- सिद्धांत और व्यवहार। पाँच बातें इस्लाम कबूल करने वालों ने सिद्धांत में मानीं; व्यवहार में सांप्रदायिक और स्थानीय कारणों से भिन्नता थी। दोनों बातें साथ लिखवाइए।
- “मुसलमान” शब्द। किताब यह नहीं कहती कि लोग नहीं थे; वह कहती है कि आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों में यह शब्द शायद ही मिलता है।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ खोलिए, और मालाबार वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: अरब व्यापारियों ने कौन-सी स्थानीय भाषा अपनाई? (मलयालम।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: अकबर के फ़रमान में “खम्बायत के महानुभाव” का ज़िक्र क्यों है? (फ़रमान कहता है कि “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ”, यानी अकबर को डर था कि शहर के प्रभावशाली लोग पादरियों को गिरजाघर बनाने से रोक सकते हैं; यह पृष्ठ 149 का किनारे का प्रश्न भी है।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) संरक्षित श्रेणी के लोग, जो उद्घाटित धर्मग्रंथ मानते थे और जज़िया कर चुकाकर संरक्षण के अधिकारी बनते थे; भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया। (2) इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन, जो मेहराब और मिम्बर से पता चलता है।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क7, क8, क9, ख3, ख4, ग5 और घ3; जो आगे हैं, वे ङ4 और छ2 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 53–73।
कालांश 5 — 6. सूफ़ीमत का विकास (6.1-6.2)
किताब — पृष्ठ 152–153 · स्लाइड — भाग 5 · इंटरैक्टिव — 6. सूफ़ीमत का विकास
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि सूफ़ी किसके विरोध में और किस बात पर बल देते थे, ख़ानक़ाह, सिलसिला, दरगाह और उर्स का अर्थ लिख सके, और बा–शरिया और बे–शरिया का अंतर समझा सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और ख़ानक़ाह के भीतर और बाहर वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने ज़िम्मी के उत्तर में हिंदुओं वाली बात छोड़ दी, उन्हें पृष्ठ 149 की वह पंक्ति दिखाइए।
- 5–13 मिनट · सूफ़ी कौन थे। पृष्ठ 152 पढ़िए। इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। यह धार्मिक और राजनीतिक संस्था के रूप में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था। इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा। उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं की, और धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। उन्होंने मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया, पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल बताकर उनका अनुसरण करने की सीख दी, और कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
- 13–20 मिनट · सूफ़ीवाद और तसव्वुफ़। पृष्ठ 152 का बॉक्स पढ़िए। “सूफ़ीवाद” उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया एक अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए तसव्वुफ़ शब्द आता है। बोर्ड पर इसके निकलने के तीन मत लिखवाइए: ‘सूफ़’ यानी ऊन, उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा जो सूफ़ी पहनते थे; ‘सफ़ा’ यानी साफ़; और ‘सफ़ा’, पैगम्बर की मस्जिद के बाहर का वह चबूतरा जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली इकट्ठी होती थी।
- 20–30 मिनट · ख़ानक़ाह और सिलसिला। पृष्ठ 152–153 पढ़िए। ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था, जिसका अपना साहित्य था। सूफ़ी एक संगठित समुदाय, ख़ानक़ाह, के आसपास रहते थे, जिसका नियंत्रण शेख, पीर अथवा मुर्शीद के हाथ में था। शेख अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे। लगभग बारहवीं शताब्दी से सिलसिले बनने लगे; सिलसिला का शाब्दिक अर्थ जंज़ीर है, जो शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है, और जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है। पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी, और बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया। फिर पृष्ठ 153 का बॉक्स पढ़िए: ज़्यादातर सिलसिलों के नाम स्थापित करने वालों पर पड़े, जैसे कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर; कुछ के नाम जन्मस्थान पर, जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से।
- 30–36 मिनट · ख़ानक़ाह के बाहर। पृष्ठ 153 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नए आंदोलन शुरू किए। ये ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे; इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी जैसे नामों से जाना जाता था। शरिया की अवहेलना करने के कारण इन्हें बे–शरिया कहा गया, और शरिया का पालन करने वाले सूफ़ियों को बा–शरिया।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) सिलसिला का शाब्दिक अर्थ क्या है? (2) उर्स किसे कहा गया?
ख़ानक़ाह के भीतर और बाहर (चरण 5)
ख़ानक़ाह के भीतर और बाहर
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सूफ़ी किसके विरोध में | ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) | 152 |
| किस पर बल | मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों का पालन | 152 |
| तसव्वुफ़ | इस्लामी ग्रंथों का शब्द; “सूफ़ीवाद” उन्नीसवीं शताब्दी का अंग्रेज़ी शब्द | 152 |
| ख़ानक़ाह | संगठित समुदाय; शेख, पीर या मुर्शीद का नियंत्रण | 152 |
| सिलसिला | शाब्दिक अर्थ जंज़ीर; पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद | 153 |
| दरगाह और उर्स | पीर की मज़ार भक्ति का स्थल; बरसी पर ज़ियारत | 153 |
| बे–शरिया | कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी; शरिया की अवहेलना | 153 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “सूफ़ीवाद” पुराना शब्द नहीं। यह उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ़ आता है।
- सिलसिला शेख से शुरू नहीं होता। इसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है।
- बे–शरिया ख़ानक़ाह में नहीं रहते थे। वे ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. सूफ़ीमत का विकास खोलिए, और ख़ानक़ाह वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: शेख के अनुयायी क्या कहलाते थे? (मुरीद।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: चिश्ती सिलसिले का नाम किसी व्यक्ति पर पड़ा या किसी जगह पर? (जगह पर: मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से; कादरी सिलसिले का नाम इसके उलट एक व्यक्ति, शेख अब्दुल कादिर जिलानी, पर पड़ा।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) जंज़ीर; यह शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है। (2) पीर की दरगाह पर, ख़ास तौर पर उनकी बरसी पर, होने वाली ज़ियारत को।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क10, क11, क12 और घ4; जो आगे हैं, वे ङ2 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 74–88।
कालांश 6 — 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला: 7.1-7.2
किताब — पृष्ठ 153–156 · स्लाइड — भाग 6 · इंटरैक्टिव — 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह का जीवन बता सके, चिश्ती सिलसिले के पाँच मुख्य उपदेशकों और उनकी दरगाहों की जगह लिख सके, और अजमेर की दरगाह की लोकप्रियता के कारण गिना सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, भारत का मानचित्र, और अजमेर की दरगाह, सदी दर सदी वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
-
0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने उर्स को कोई भी मेला लिख दिया, उन्हें याद दिलाइए कि यह पीर की बरसी पर दरगाह की ज़ियारत है।
-
5–14 मिनट · ख़ानक़ाह में एक दिन। पृष्ठ 153–154 पढ़िए। बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आए सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे प्रभावशाली रहे, क्योंकि उन्होंने अपने को स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला और भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशेषताएँ भी अपनाईं। शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह (चौदहवीं शताब्दी) उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर, यमुना के किनारे ग़ियासपुर में थी। इसमें कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना) था। सामुदायिक रसोई, लंगर, फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी। आने वालों में सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर थे। चिश्तियों ने स्थानीय परंपराएँ भी अपनाईं: शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों का सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम।
-
14–20 मिनट · पाँच उपदेशक। पृष्ठ 154 की तालिका बोर्ड पर उतरवाइए और मानचित्र पर अजमेर और दिल्ली दिखाइए। पृष्ठ 154 का बॉक्स भी पढ़िए: 1039 ईसवी में अबुल हसन अल हुजविरी तुर्की सेना के एक कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करके आए, लाहौर में बसे और फारसी में कश्फ–उल–महजुब लिखी। आज भी वे दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं।
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20–28 मिनट · अजमेर की दरगाह। पृष्ठ 155 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। ज़ियारत में संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद, यानी बरकत, की कामना की जाती है। सबसे पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन की है, जिन्हें ‘ग़रीब नवाज़’ कहा जाता है। लोकप्रियता के कारण गिनवाइए: शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा, उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता, और राजसी मेहमानों का प्रश्रय। दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी। किताब कहती है, “अकबर यहाँ चौदह बार आया”; यह परंपरा उन्होंने 1580 तक बनाए रखी, और 1568 में तीर्थयात्रियों का खाना पकाने के लिए एक विशाल देग़ भेंट की।
-
28–36 मिनट · स्रोत 7, जहाँआरा की तीर्थयात्रा। स्रोत 7 पढ़िए: 1643 में जहाँआरा अपने पिता शाहजहाँ के साथ आगरा से अजमेर गईं, और यह वर्णन उनकी लिखी शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस–अल–अखाह से है। फिर पृष्ठ 156 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “जहाँआरा कौन सी चेष्टाओं का ज़िक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाती हैं। दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?” नमूना उत्तर — जहाँआरा की भक्ति रास्ते में भी दिखती है और दरगाह में भी।
- रास्ते में: हर रोज़ दो बार की अख़्तियारी नमाज़; रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; दरगाह की तरफ़ न पैर फैलाए, न पीठ की।
- दरगाह में: “अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से” रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लिए, इतर छिड़का और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
- दरगाह की खासियत: वे उसे बार–बार मुकद्दस (पवित्र) दरगाह कहती हैं, और उसकी चौखट और वहाँ की ज़मीन तक को आदर देती हैं। अंश का वर्णन भी इसका उत्तर देता है: वे “चिराग और इतर में डूबे दरगाह” और “गुम्बद के भीतर रोशनी से भरी दरगाह” की बात करती हैं।
यानी शहज़ादी होकर भी वे शेख के आगे पूरी विनम्रता दिखाती हैं।
-
36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) चिश्ती ख़ानक़ाह का लंगर किस पर चलता था? (2) अजमेर की दरगाह की लोकप्रियता के दो कारण लिखिए।
अजमेर की दरगाह, सदी दर सदी (चरण 4)
अजमेर की दरगाह, सदी दर सदी
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| सूफ़ी | मृत्यु का वर्ष | दरगाह का स्थान | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शेख मुइनुद्दीन चिश्ती | 1235 | अजमेर (राजस्थान) | 154 |
| ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी | 1235 | दिल्ली | 154 |
| शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर | 1265 | अजोधन (पाकिस्तान) | 154 |
| शेख निज़ामुद्दीन औलिया | 1325 | दिल्ली | 154 |
| शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली | 1356 | दिल्ली | 154 |
इसके नीचे दो पंक्तियाँ और: लंगर फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलता था (पृष्ठ 154); ज़ियारत में संत की बरकत की कामना होती है (पृष्ठ 154)।
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- दो सूफ़ियों का मृत्यु-वर्ष एक है। शेख मुइनुद्दीन चिश्ती और ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, दोनों 1235। बच्चे इसे छपाई की भूल मानकर बदल देते हैं; किताब में दोनों का वर्ष यही है।
- पहली इमारत अकबर की नहीं। मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई। अकबर ने देग़ भेंट की और अहाते में एक मस्जिद बनवाई।
- ख़ानक़ाह और दरगाह अलग हैं। ख़ानक़ाह में शेख अपने समुदाय के साथ रहते थे; दरगाह पीर की मृत्यु के बाद उनकी मज़ार पर बनती थी।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला खोलिए, और ख़ानक़ाह वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह किस नदी के किनारे थी? (यमुना के किनारे, ग़ियासपुर में।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: व्यापारिक मार्ग पर होना दरगाह के लिए क्यों मायने रखता था? (किताब के अनुसार दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी, इसलिए अनेक यात्री आते थे।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) फ़ुतूह, यानी बिना माँगी खैर, पर। (2) इनमें से कोई दो: शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा; उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता; राजसी मेहमानों का प्रश्रय।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क13, क14, ख5, ख6 और घ5; जो आगे हैं, वे ङ5 और च3 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 89–110।
कालांश 7 — 7.3 भाषा और संपर्क; 7.4 सूफ़ी और राज्य
किताब — पृष्ठ 157–159 · स्लाइड — भाग 7 · इंटरैक्टिव — 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि चिश्तियों ने किन भाषाओं और रूपों में अपनी बात कही, अमीर खुसरो का योगदान लिख सके, और सूफ़ियों और राज्य के संबंधों में सहयोग और तनाव, दोनों के उदाहरण दे सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और भेंट: लेना, बाँटना, ठुकराना वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
-
0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने अजमेर की पहली इमारत अकबर के नाम लिखी, उन्हें गियासुद्दीन खलजी वाली पंक्ति दिखाइए।
-
5–12 मिनट · समा और हिंदवी। पृष्ठ 156–157 पढ़िए। सूफ़ी संत ज़िक्र (ईश्वर का नाम-जाप) या समा (श्रवण करना), यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल, से उपासना करते थे। चिश्तियों ने समा में स्थानीय भाषा अपनाई, और दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे। बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचा, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। फिर पृष्ठ 157 का बॉक्स पढ़िए: अमीर खुसरो (1253–1325) महान कवि, संगीतज्ञ और शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे। उन्होंने कौल (अरबी शब्द, अर्थ कहावत) का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया; कौल कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था।
-
12–20 मिनट · मसनवी और दक्खनी। पृष्ठ 157 पढ़िए। कुछ सूफ़ियों ने मसनवी लिखीं, लंबी कविताएँ जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया। मलिक मोहम्मद जायसी का प्रेमाख्यान पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा है, जिसमें उनकी आज़माइश आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है। बीजापुर (कर्नाटक) के आसपास सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों में बसे चिश्ती संतों ने दक्खनी (उर्दू का रूप) में छोटी कविताएँ रचीं, जो संभवत: औरतें चक्की पीसते और चरखा कातते समय गाती थीं। फिर स्रोत 8 (चरखानामा) पढ़िए और पृष्ठ 157 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न हैं?” नमूना उत्तर — दोनों में पीर के प्रति भक्ति है, पर कहने वाले भी अलग हैं और ढंग भी।
- समानता: चरखानामा कहता है, “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।”; जहाँआरा मज़ार पर इतर और दुपट्टा चढ़ाती हैं।
- अंतर (कौन, कहाँ): चरखानामा चरखे के चलने की धुन पर आधारित गीत है, और किताब के अनुसार दक्खनी की ऐसी रचनाएँ संभवत: औरतें चक्की पीसते और चरखा कातते हुए गाती थीं; जहाँआरा की ज़ियारत एक शहज़ादी की लंबी तीर्थयात्रा है।
- अंतर (तरीका): गीत में रोज़ का काम ही ज़िक्र बन जाता है (ज़िक्र–ए–जाली, ज़िक्र–ए–कल्बी, ज़िक्र–ए–आइनी); जहाँआरा की भक्ति सात फेरे, ज़मीन चूमना और नंगे पाँव चलना जैसे आचारों से दिखती है।
यानी भक्ति का भाव एक है, उसे जीने के ढंग अलग।
-
20–28 मिनट · सत्ता से दूरी, पर अलगाव नहीं। पृष्ठ 158 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। चिश्ती संयम और सादगी का जीवन जीते थे और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता तो वे उसे स्वीकार करते थे। सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी। चिश्ती दान को जोड़ने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर पूरा खर्च कर देते थे। शासक समर्थन क्यों चाहते थे: तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत बनाई तो उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकरा दी, क्योंकि सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है; सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा लिया, जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता अल्लाह से मानते थे। किताब यह भी कहती है, “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।”
-
28–36 मिनट · स्रोत 9, शाही भेंट अस्वीकार। स्रोत 9 पढ़िए: 1313 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह की एक घटना, अमीर हसन सिजज़ी के शब्दों में। एक स्थानीय शासक ने शेख को दो बगीचे और बहुत सी ज़मीन का पट्टा भेजा। किताब के अंश में यहाँ ‘अपना हक कहते हैं’ छपा है; बात यह है कि शासक ने अपना सारा हक छोड़ दिया था, और आगे का सवाल शेख का है, जिन्होंने यह भेंट नहीं ली (अंश का शीर्षक भी ‘शाही भेंट अस्वीकार’ है)। फिर पृष्ठ 159 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “सूफ़ियों और राज्य के बीच संबंध का कौन सा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है?” और: “यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?” नमूना उत्तर — शासक शेखों को भेंट देकर उनसे जुड़ना चाहते थे, पर चिश्ती शेख दूरी बनाए रखते थे।
- शेख निज़ामुद्दीन औलिया: बगीचे और ज़मीन नहीं ली; कहा, “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?”
- शेख फ़रीदुद्दीन: सुल्तान ग़ियासुद्दीन (तब उलुग़ ख़ान) का धन दरवेशों में बाँटने के लिए लिया, पर चार गाँवों के पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।”
यानी भेंट का धन बाँटा जा सकता था, पर ज़मीन से बँधना उन्हें मंज़ूर नहीं था।
दूसरे हिस्से का उत्तर — अनुयायी शेख से मिलने आते थे; अमीर हसन सिजज़ी लिखते हैं कि वे शेख के कदम चूम सके। इस अंश में शेख फ़रीदुद्दीन का एक किस्सा भी आता है, यानी सीख बातचीत और किस्सों से दी जाती थी। (पृष्ठ 159)
-
36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) अमीर खुसरो ने कौल से क्या किया? (2) सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा क्यों लिया?
भेंट: लेना, बाँटना, ठुकराना (चरण 4)
भेंट: लेना, बाँटना, ठुकराना
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| हिंदवी | दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोगों की बातचीत की भाषा | 157 |
| बाबा फरीद | क्षेत्रीय भाषा में काव्य; गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित | 157 |
| कौल | अमीर खुसरो (1253–1325); कव्वाली के शुरू और आख़िर में | 157 |
| मसनवी | ईश्वर के प्रति प्रेम, मानवीय प्रेम के रूपक से; जायसी का पद्मावत | 157 |
| दक्खनी | बीजापुर के आसपास; चक्की और चरखे के गीत | 157 |
| इनाम भूमि | सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त भूमि दी | 158 |
| सहारा क्यों | अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं; सूफ़ियों की सत्ता अल्लाह से; धर्मनिष्ठा, विद्वता, चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास | 158 |
| तनाव | झुककर प्रणाम, कदम चूमना; सुल्तान–उल–मशेख जैसी पदवियाँ | 158 |
| स्रोत 9 | 1313; शेख ने ज़मीन और बगीचे का पट्टा नहीं लिया | 159 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- चिश्ती भेंट से इनकार नहीं करते थे। वे बिना माँगी भेंट स्वीकार करते थे, पर उसे जोड़ते नहीं थे। स्रोत 9 में इनकार ज़मीन के पट्टे का है।
- स्रोत 9 की उलझन वाली पंक्ति। बच्चे ‘अपना हक कहते हैं’ को शेख का दावा समझ लेते हैं। चरण 5 वाली बात बोर्ड पर लिखिए: हक शासक ने छोड़ा था, शेख ने भेंट नहीं ली।
- शरिया की माँग किसकी थी। उलमा की; सुल्तानों ने वह माँग ठुकराई। बच्चे अक्सर इसे सूफ़ियों की माँग लिख देते हैं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला खोलिए, और भाषा वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: पद्मावत किसकी प्रेम कथा है? (पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: चिश्ती अलग-अलग भाषाओं में क्यों रचते थे? (किताब के अनुसार समा में स्थानीय भाषा अपनाने से वे लोगों से जुड़े; दक्खनी की रचनाओं के माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) कौल का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया; कौल कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था। (2) सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है, और सूफ़ी संत अपनी आध्यात्मिक सत्ता अल्लाह से मानते थे, उलमा की शरिया व्याख्या पर निर्भर नहीं थे। किताब यह भी बताती है कि सूफ़ी संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और लोगों द्वारा उनकी चमत्कारी शक्ति में विश्वास उनकी लोकप्रियता का कारण था, और इन वजहों से शासक भी उनका समर्थन हासिल करना चाहते थे (पृष्ठ 158); यह लिखने वाले उत्तर भी सही हैं।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क15, क16, ख7 और ग6; जो आगे हैं, वे च4 और छ3 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 111–129।
कालांश 8 — 8. नवीन भक्ति पंथ: 8.1 दैवीय वस्त्र की बुनाई : कबीर
किताब — पृष्ठ 160–162 · स्लाइड — भाग 8 · इंटरैक्टिव — 8. नवीन भक्ति पंथ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि कबीर की बानी कहाँ-कहाँ संकलित है, परम सत्य के लिए कबीर के बरते नाम तीन परंपराओं में बाँट सके, और समझा सके कि कबीर के जीवन के बारे में इतिहासकार सावधानी क्यों बरतते हैं।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और कबीर की बानी, तीन जगह वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
-
0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने लिखा कि चिश्ती हर भेंट ठुकरा देते थे, उन्हें याद दिलाइए कि वे बिना माँगी भेंट लेते थे और उसे खर्च कर देते थे।
-
5–12 मिनट · कबीर को कैसे जानते हैं। पृष्ठ 160 पढ़िए। इतिहासकारों ने कबीर के जीवन और काल का अध्ययन उनके काव्य और बाद में लिखी गई जीवनियों के आधार पर किया है, और यह काम चुनौती भरा रहा है। नीचे का चित्र बनाइए: कबीर की बानी तीन परिपाटियों में संकलित है। कबीर बीजक कबीर पंथियों ने वाराणसी और उत्तर प्रदेश के दूसरे स्थानों पर सँभाला; कबीर ग्रंथावली राजस्थान के दादू पंथियों से जुड़ी है; और कई पद आदि ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने।
-
12–20 मिनट · भाषा और परम सत्य के नाम। पृष्ठ 160–161 पढ़िए। कबीर की रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं, कुछ संत भाषा में, जो निर्गुण कवियों की खास बोली थी। उलटबाँसी (उलटी कही उक्तियाँ) में रोज़ के अर्थ को उलट दिया जाता है, जैसे “समंदरि लागि आगि”। फिर बोर्ड पर तीन खाने बनाइए और परम सत्य के नाम भरवाइए: इस्लामी दर्शन से अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर; वेदांत दर्शन से अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्; और योगी परंपरा से शब्द और शून्य।
-
20–28 मिनट · स्रोत 10, जोड़ियों में। जोड़ियाँ स्रोत 10 (“एक ईश्वर”) पढ़ें। किताब कहती है, “यह रचना कबीर की मानी जाती है”। फिर पृष्ठ 160 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?” नमूना उत्तर — कबीर तर्क और सवाल से बात रखते हैं।
- सवाल: “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?” यह कैसे हो सकता है।
- नाम अलग, ईश्वर एक: “ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।”
- अंतर कहाँ है: “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
यानी उनकी दलील यह है कि झगड़ा नामों का है, ईश्वर का नहीं।
-
28–36 मिनट · जीवनियाँ और विवाद। पृष्ठ 161–162 पढ़िए। किताब कहती है कि “इस विषय पर आज भी विवाद है कि वह जन्म से हिंदू थे अथवा मुसलमान”; यह विवाद उन संत जीवनियों में उभरता है जो सत्रहवीं शताब्दी, यानी उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद से लिखी गईं। वैष्णव परंपरा की जीवनियों में कबीर को जन्म से हिंदू कबीरदास बताया गया, पर उनका पालन एक गरीब मुसलमान परिवार में हुआ, जो जुलाहे थे और कुछ समय पहले ही इस्लाम धर्म के अनुयायी बने थे। इन जीवनियों के अनुसार कबीर के गुरु रामानंद थे, पर किताब के अनुसार दोनों का समकालीन होना मुश्किल प्रतीत होता है, जब तक उन्हें बहुत ही लंबी आयु न दे दी जाए। इसलिए दोनों को जोड़ने वाली परंपराएँ स्वीकार नहीं की जा सकतीं; हाँ, इनसे पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ियों के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी। यह विवाद किताब के शब्दों और काल में ही पढ़ाइए; बच्चों से इस पर पक्ष मत लिवाइए।
-
36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) कबीर की बानी किन तीन परिपाटियों में संकलित है? (2) किताब के अनुसार कबीर और रामानंद को जोड़ने वाली परंपराएँ क्यों स्वीकार नहीं की जा सकतीं?
कबीर की बानी, तीन जगह (चरण 2)
कबीर की बानी, तीन जगह
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| काल | लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी | 160 |
| बानी | कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, आदि ग्रंथ साहिब | 160 |
| भाषा | कई भाषाएँ और बोलियाँ; संत भाषा; उलटबाँसी | 160 |
| परम सत्य के नाम | इस्लामी, वेदांत और योगी परंपराओं से | 160 |
| स्रोत 10 | ईश्वर एक, नाम अनेक; विभिन्नताएँ केवल शब्दों में | 160 |
| जीवनियाँ | सत्रहवीं शताब्दी से, “उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद” से | 162 |
| रामानंद | इतिहासकारों के अनुसार दोनों का समकालीन होना मुश्किल | 162 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- रामानंद पक्के गुरु नहीं। यह बात जीवनियों की है; इतिहासकार दोनों का समकालीन होना मुश्किल मानते हैं। उत्तर में “जीवनियों के अनुसार” लिखना ज़रूरी है।
- कौन-सा पद कबीर का है, यह तय नहीं। विद्वान भाषा शैली और विषयवस्तु के आधार पर तय करने की कोशिश करते हैं; इसीलिए किताब स्रोत 10 के बारे में “मानी जाती है” कहती है।
- परम सत्य के नाम तीन परंपराओं से। बच्चे केवल राम और अल्लाह लिखते हैं; अलख, निराकार और शब्द, शून्य भी गिनवाइए।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 8. नवीन भक्ति पंथ खोलिए, और कबीर वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: कबीर ग्रंथावली किस पंथ से जुड़ी है? (राजस्थान के दादू पंथियों से।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: कबीर ने परम सत्य के लिए इतनी परंपराओं के नाम क्यों बरते होंगे? (किताब के अनुसार उनके विचार संभवत: अवध प्रदेश की सूफ़ी और योगी परंपरा से हुए संवाद और विवाद से घनीभूत हुए; अलग-अलग परंपराओं के नाम बरतकर वे दिखाते हैं कि ईश्वर एक है, नाम अनेक।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, और आदि ग्रंथ साहिब। (2) क्योंकि किताब के अनुसार दोनों का समकालीन होना मुश्किल प्रतीत होता है, जब तक उन्हें बहुत ही लंबी आयु न दे दी जाए।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क17, ग7 और घ6; जो आगे हैं, वे च5 और छ4 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 130–140।
कालांश 9 — 8.2 बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्द; 8.3 मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी
किताब — पृष्ठ 162–164 · स्लाइड — भाग 9 · इंटरैक्टिव — 8. नवीन भक्ति पंथ
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बाबा गुरु नानक के संदेश की चार बातें लिख सके, आदि ग्रंथ साहिब और गुरु ग्रंथ साहिब का क्रम बता सके, और मीराबाई के जीवन और स्रोत 11 से उनका रुख समझा सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और गुरु से ग्रंथ तक वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
-
0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने रामानंद को कबीर का पक्का गुरु लिखा, उन्हें “जीवनियों के अनुसार” जोड़ना याद दिलाइए।
-
5–13 मिनट · बाबा गुरु नानक का जीवन और संदेश। पृष्ठ 162 पढ़िए। बाबा गुरु नानक (1469–1539) का जन्म एक हिंदू व्यापारी परिवार में, मुख्यत: इस्लाम धर्मावलंबी पंजाब के ननकाना गाँव में हुआ, जो रावी नदी के पास था। उन्होंने फारसी पढ़ी और लेखाकार के काम का प्रशिक्षण लिया; उनका ज़्यादा समय सूफ़ी और भक्त संतों के बीच बीतता था। संदेश की बातें बोर्ड पर लिखवाइए: निर्गुण भक्ति का प्रचार; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप जैसे बाहरी आडंबरों को नकारना; परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं; और उपासना का सरल उपाय, निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
-
13–20 मिनट · शबद और संगत। पृष्ठ 162–163 पढ़िए। उन्होंने अपने विचार पंजाबी भाषा में शबद के रूप में रखे, जिन्हें वे अलग–अलग रागों में गाते थे, और उनका सेवक मरदाना रबाब बजाकर साथ देता था। उन्होंने अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया और सामुदायिक उपासना (संगत) के नियम बनाए। अपने अनुयायी अंगद को उन्होंने अपने बाद गुरुपद दिया, और किताब कहती है, “इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा।” यह वाक्य भी पढ़िए: “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे, किंतु उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित कर अपने को हिंदू और मुसलमान दोनों से पृथक चिह्नित किया।” (पृष्ठ 163)
-
20–26 मिनट · गुरु से ग्रंथ तक। पृष्ठ 163 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक, उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी इसमें जोड़ीं, और ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया। गुरु गोबिन्द सिंह ने खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की नींव डाली और उसके पाँच प्रतीक बताए: बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा।
-
26–36 मिनट · मीराबाई। पृष्ठ 163–164 पढ़िए। मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी) मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी थीं, जिनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ। उन्होंने विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़कर परिब्राजिका संत बन गईं। कुछ परंपराओं के अनुसार उनके गुरु रैदास थे, जो एक चर्मकार थे। फिर स्रोत 11 पढ़िए और पृष्ठ 164 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “यह उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है?” नमूना उत्तर — मीराबाई राणा से डरती नहीं हैं।
- पद की पंक्ति: “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।” इसका सरल अर्थ (हमारी ओर से) है कि राणा जी मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी।
- दूसरी पंक्ति: “राणों जी रूससी गाँव रखासी, हरी रूस्याँ कुमलास्या।।” यहाँ राणा के रूठने के सामने हरि का रूठना रखा गया है; मीरा को चिंता हरि के रूठने की है (यह पढ़त हमारी ओर से)।
यह उनके जीवन से मेल खाता है: उन्होंने कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़ दिया।
आख़िर में पृष्ठ 164 का शंकरदेव वाला बॉक्स पढ़िए: पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वे असम में वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक थे, और उनके उपदेश ‘भगवती धर्म’ कहलाते हैं।
-
36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) आदि ग्रंथ साहिब में बानी किसने संकलित की? (2) मीराबाई ने किसे अपना एकमात्र पति माना?
गुरु से ग्रंथ तक (चरण 4)
गुरु से ग्रंथ तक
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बाबा गुरु नानक | 1469–1539; ननकाना गाँव, रावी नदी के पास | 162 |
| संदेश | निर्गुण भक्ति; बाहरी आडंबर नहीं; नाम का जाप | 162–163 |
| शबद और संगत | पंजाबी में, रागों में; सामुदायिक उपासना के नियम | 162–163 |
| आदि ग्रंथ साहिब | पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बानी संकलित की | 163 |
| गुरु ग्रंथ साहिब | गुरु गोबिन्द सिंह जी; तेग बहादुर की रचनाएँ जोड़ीं | 163 |
| खालसा | पाँच प्रतीक: बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा, लोहे का कड़ा | 163 |
| मीराबाई | लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी; मेड़ता की राजकुमारी; कृष्ण को एकमात्र पति माना | 163 |
| शंकरदेव | पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध, असम; ‘भगवती धर्म’ | 164 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- संकलन बाबा गुरु नानक ने नहीं किया। आदि ग्रंथ साहिब का संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया; गुरु ग्रंथ साहिब नाम गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय पड़ा।
- नया धर्म। किताब कहती है, “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे, किंतु उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित कर अपने को हिंदू और मुसलमान दोनों से पृथक चिह्नित किया।” (पृष्ठ 163) उत्तर में किताब का यह पूरा वाक्य लिखवाइए, अपना निष्कर्ष नहीं।
- मीराबाई ने कोई मंडली नहीं बनाई। उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा, फिर भी वे शताब्दियों से प्रेरणा का स्रोत हैं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 8. नवीन भक्ति पंथ खोलिए, और बाबा गुरु नानक वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: शबद गाते समय रबाब कौन बजाता था? (उनका सेवक मरदाना।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: मीराबाई के गुरु रैदास थे, इस परंपरा से किताब क्या निष्कर्ष निकालती है? (रैदास एक चर्मकार थे, इसलिए किताब कहती है कि इससे पता चलता है कि मीरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियाँ तोड़ीं।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने। (2) विष्णु के अवतार कृष्ण को।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क18, क19, ख8, ख9, ख10, ग8, घ7 और घ8; जो आगे हैं, वे ङ6 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 141–156।
कालांश 10 — 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण; काल-रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)
किताब — पृष्ठ 164–168 · स्लाइड — भाग 10 · इंटरैक्टिव — 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण और सार और काल-रेखा
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि इतिहासकार धार्मिक परंपराओं का इतिहास किन स्रोतों से और किन मुश्किलों के साथ जोड़ते हैं, सूफ़ी परंपरा के चार तरह के ग्रंथ पहचान सके, पृष्ठ 167 की काल-रेखा पढ़ सके, और प्रश्न 10 के स्थल भारत के मानचित्र पर दिखा सके।
साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, पहले दिन की पर्चियों वाला लिफ़ाफ़ा, भारत का रेखा-मानचित्र (हर बच्चे के लिए एक), एटलस, और काल-रेखा वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।
40 मिनट
-
0–4 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने लिखा कि आदि ग्रंथ साहिब बाबा गुरु नानक ने संकलित किया, उन्हें अर्जन देव जी वाली पंक्ति दिखाइए।
-
4–12 मिनट · इतिहास कैसे जोड़ा जाता है। पृष्ठ 164–166 पढ़िए। इतिहासकार धार्मिक परंपरा का इतिहास जोड़ने के लिए मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ और काव्य रचनाएँ बरतते हैं। मूर्ति और इमारत का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब हम उनका संदर्भ अच्छी तरह समझें। साहित्यिक स्रोतों में काफ़ी विविधता है: कुछ सरल, स्पष्ट भाषा में हैं, जैसे बासवन्ना के वचन, और कुछ अलंकृत फ़ारसी में लिखे मुग़ल सम्राटों के फ़रमान हैं, इसलिए हर तरह के पाठ के लिए अलग कौशल चाहिए। हर परिपाटी के कुछ संदेश सुरक्षित रहे, बहुत से संप्रेषण के दौरान बदल गए, और कुछ हमेशा के लिए भुला दिए गए। किताब के अनुसार लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं, और इतिहासकारों के लिए चुनौती यह याद रखना है कि धार्मिक परंपराएँ भी दूसरी परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।
-
12–18 मिनट · ख़ानक़ाहों के आसपास के ग्रंथ। पृष्ठ 165 का बॉक्स पढ़िए और बोर्ड-कार्य की तालिका भरवाइए। फिर पूछिए: स्रोत 9 इनमें से किस तरह के ग्रंथ से लिया गया है? नमूना उत्तर — मुलफुज़ात से।
- ग्रंथ: किताब कहती है, “स्रोत 9 में इस ग्रंथ से लिया एक अंश उद्धृत है”, यानी फवाइद–अल–फुआद से, जो मुलफुज़ात पर एक आरंभिक ग्रंथ है और शेख निज़ामुद्दीन औलिया की बातचीत पर आधारित एक संग्रह है।
- किसने: इसका संकलन प्रसिद्ध फ़ारसी कवि अमीर हसन सिजज़ी देहलवी ने किया।
यानी स्रोत 9 शेख की बातचीत है, जिसे किसी और ने संकलित किया।
-
18–26 मिनट · काल-रेखा। पृष्ठ 167 की काल-रेखा खोलिए और नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए। किताब का नोट पढ़िए: “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।” पहली पंक्ति पर रुकिए: किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं। फिर हर पंक्ति के आगे वह कालांश लिखवाइए जिसमें उस नाम की बात हुई।
-
26–34 मिनट · मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)। हर बच्चे को भारत का रेखा-मानचित्र दीजिए और प्रश्न पढ़िए: “भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफ़ी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।” सार और काल-रेखा का नक्शा पर्दे पर दिखा सकते हैं। नमूना उत्तर — स्थल अध्याय में आई जगहों में से ही चुनिए।
- सूफ़ी स्थल: अजमेर, राजस्थान (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह); दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह); फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह)।
- विष्णु से जुड़ा मंदिर: पुरी, उड़ीसा (जगन्नाथ, विष्णु का एक रूप)।
- शिव से जुड़ा मंदिर: चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम।
- देवी से जुड़ा मंदिर: अध्याय के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता; इसके लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए।
अजोधन और लाहौर भी सूफ़ी स्थल हैं; किताब अजोधन को पाकिस्तान में बताती है (पृष्ठ 154), और लाहौर भी आज पाकिस्तान में है; भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाले स्थल लीजिए।
-
34–40 मिनट · पहले दिन की पर्चियाँ, फिर निकास-पर्ची। लिफ़ाफ़े से पर्चियाँ लौटाइए। हर बच्चा अपनी पहली पंक्तियाँ पढ़े और नीचे एक पंक्ति जोड़े: अब वह किस उदाहरण से उत्तर देगा। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। फिर निकास-पर्ची: (1) मुलफुज़ात क्या हैं? (2) काल-रेखा में अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति किस काल में रखे गए हैं? पहले दिन के सवाल का नमूना उत्तर — किताब के उदाहरणों से उत्तर ऐसे बनता है।
- मिले: पौराणिक ग्रंथों के ज़रिए और ब्राह्मणों द्वारा दूसरे वर्गों के विश्वास अपनाकर (कालांश 1); चिश्तियों ने स्थानीय परंपराएँ और स्थानीय भाषा अपनाई (कालांश 6 और 7); कबीर ने परम सत्य के लिए कई परंपराओं के नाम बरते (कालांश 8)।
- टकराए: वैदिक परंपरा के प्रशंसक और तांत्रिक उपासक; नयनारों के भजनों में बौद्ध और जैन धर्म का विरोध (कालांश 1 और 2)।
- साथ-साथ चले: किताब के अनुसार लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं (कालांश 10)।
यह सवाल और यह उत्तर हमारी ओर से हैं; किताब के शब्द सिर्फ़ उद्धरण-चिह्नों वाली बातों में हैं।
काल-रेखा के नौ खाने (चरण 4)
काल-रेखा के नौ खाने
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| स्रोत | मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं की कहानियाँ, काव्य रचनाएँ | 164, 166 |
| साहित्य की विविधता | बासवन्ना के सरल वचन; अलंकृत फ़ारसी में मुग़ल फ़रमान | 166 |
| प्रबंध पुस्तिका | कश्फ–उल–महजुब; बाहर की परंपराओं का असर समझने में मदद | 165 |
| मुलफुज़ात | सूफ़ी संतों की बातचीत; फवाइद–अल–फुआद (स्रोत 9 इसी से) | 165 |
| मक्तुबात | लिखे हुए पत्रों का संकलन; शेख अहमद सरहिंदी के लिखे मक्तुबात–ए–इमाम रब्बानी | 165 |
| तज़किरा | सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण; सियार–उल–औलिया | 165 |
| परंपराएँ आज | लगभग सभी आज भी पनप रही हैं; फिर भी परिवर्तनशील | 166 |
| काल-रेखा | अनुमानित काल; पहली पंक्ति में किताब में ‘ई.पू.’ छपा है, पर किताब का पाठ (पृष्ठ 143) इसे ईसवी का बताता है: लगभग 500–800 ईसवी | 167 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- पहली पंक्ति ईसवी की है। चरण 4 वाली बात बोर्ड पर लिखी रहे; अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति के आगे बच्चे “ईसवी” ही लिखें।
- मुलफुज़ात और मक्तुबात। एक बातचीत है, दूसरा पत्र। बच्चे दोनों को उलट देते हैं; किताब का अर्थ याद करवाइए: मक्तुबात यानी लिखे हुए पत्रों का संकलन।
- तज़किरा के वर्णन पूरे सच नहीं। किताब कहती है कि बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं, फिर भी वे इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
- मानचित्र पर सिर्फ़ किताब की जगहें। देवी मंदिर का नाम किताब के पाठ में नहीं है; बच्चे अंदाज़े से नाम न लिखें।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण खोलिए, और ग्रंथों वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: सियार–उल–औलिया किस तरह का ग्रंथ है? (तज़किरा, यानी सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण।)
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: लोगों के लिए यह मानना आसान क्यों नहीं होता कि उनकी परंपरा समय के साथ बदली होगी? (किताब के अनुसार ये परंपराएँ लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, इसलिए।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) सूफ़ी संतों की बातचीत के संकलन, जैसे फवाइद–अल–फुआद; ये शेखों की अनुमति से संकलित हुए और इनका उद्देश्य मुख्यत: उपदेशात्मक था। (2) लगभग 500–800 ईसवी में।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क20 और नमूना पत्र 1; जो आगे हैं, वे च6 भी।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 157–182।
कालांश 11 — मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न
किताब — पृष्ठ 168–169 · स्लाइड — आख़िरी भाग · इंटरैक्टिव — हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी अभ्यास का प्रश्न 8 (कई भाषाएँ क्यों) पूरे अध्याय के उदाहरणों से लिख सके, नमूना पत्र 2 हल करे, और जान ले कि अभ्यास के बाक़ी प्रश्न किस कालांश की किस बात से जुड़े हैं।
साथ ले जाइए — किताब, नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ या बोर्ड पर लिखे प्रश्न, और प्रश्न बैंक के उत्तर।
40 मिनट
-
0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 10 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें मुलफुज़ात और काल-रेखा, दोनों सही हों, और एक जिसमें कोई चूक हो। कक्षा से सुधरवाइए।
-
5–12 मिनट · प्रश्न 8: कई भाषाएँ क्यों। प्रश्न वैसे ही पढ़िए जैसा छपा है: “उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?” बच्चे उदाहरण बोलें, आप बोर्ड पर लिखिए। नमूना उत्तर — संत और सूफ़ी लोगों की अपनी भाषा में बोले, ताकि बात उन तक पहुँचे।
- दक्षिण में: अलवार और नयनार तमिल में भजन गाते थे (पृष्ठ 143); वीरशैवों के वचन कन्नड़ में रचे गए (पृष्ठ 147)।
- चिश्ती: दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे; बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचा; बीजापुर के आसपास दक्खनी में छोटी कविताएँ रची गईं, और इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका (पृष्ठ 157–158)।
- उत्तर के संत: कबीर की रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं, कुछ संत भाषा में; बाबा गुरु नानक ने अपने विचार पंजाबी में शबद के रूप में रखे (पृष्ठ 160, 163)।
- खोजा इस्माइली: जीनन पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे (पृष्ठ 150)।
यानी भाषा चुनना लोगों से जुड़ने का तरीक़ा था; यह निष्कर्ष हमारी ओर से है, उदाहरण किताब के।
-
12–32 मिनट · लिखित परख। प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक) बीस मिनट में हल करवाइए। किताब बंद रहे।
-
32–36 मिनट · जोड़ियों में जाँच। बच्चे कॉपियाँ बदलें और नीचे के अंक कैसे कटेंगे वाले तीन नियमों से एक-दूसरे का उत्तर जाँचें। फिर प्रश्न बैंक के उत्तर से मिलाएँ।
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36–38 मिनट · अभ्यास के 12 प्रश्न। बोर्ड-कार्य की तालिका दिखाइए। बच्चे अपनी कॉपी में देखें कि किस प्रश्न का उत्तर उनके पास है, और जो छूटे हैं उन पर निशान लगाएँ।
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38–40 मिनट · आख़िरी पर्ची। इस अध्याय के किस एक संत या सूफ़ी की बात आपको सबसे साफ़ समझ आई, और किताब के अनुसार उनके बारे में कौन-सी बात पक्की नहीं है? एक उदाहरण के साथ लिखिए। यह सवाल हमारी ओर से है।
बोर्ड-कार्य
यह तालिका बोर्ड पर या चार्ट पेपर पर रहे; उत्तर की मुख्य बात से आगे पूरा उत्तर रिवीजन नोट्स में है।
| प्रश्न | कब दिया | उत्तर की मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1. संप्रदाय का समन्वय | कालांश 1 | दो प्रक्रियाएँ: पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में; ब्राह्मणों ने दूसरे वर्गों के विश्वास अपनाकर नया रूप दिया; उदाहरण पुरी के जगन्नाथ और स्थानीय देवियाँ |
| 2. मस्जिदों का स्थापत्य | कालांश 4 | मक्का की ओर अनुस्थापन, मेहराब और मिम्बर सार्वभौमिक; छत और सामान में भिन्नता; केरल, अतिया (1609) और शाह हमदान (1395) की मस्जिदें |
| 3. बा–शरिया और बे–शरिया | कालांश 5 | दोनों सूफ़ी परंपरा से; बे–शरिया ख़ानक़ाह ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी, निर्धनता और ब्रह्मचर्य; शरिया की अवहेलना |
| 4. जाति प्रथा की आलोचना | कालांश 2, 3 | तमिल संत कई समुदायों से, रचनाएँ वेदों जितनी महत्त्वपूर्ण, मत “कुछ हद तक” सत्य; लिंगायतों ने जाति और “दूषित” मानने का विरोध किया, पुनर्जन्म पर प्रश्न उठाए |
| 5. कबीर या बाबा गुरु नानक | कालांश 8, 9 | कबीर: परम सत्य के कई नाम, बानी तीन परिपाटियों में; नानक: निर्गुण भक्ति, नाम का जाप, शबद, संगत; संप्रेषण गीत, संकलन और अनुयायियों से |
| 6. सूफ़ी मत के विश्वास और आचार | कालांश 5, 6, 7 | ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों का पालन; ख़ानक़ाह, सिलसिला, दीक्षा; ज़ियारत, उर्स, ज़िक्र और समा; लंगर |
| 7. शासक, नयनार और सूफ़ी | कालांश 2, 7 | चोल: नयनार और अलवार संत वेल्लाल किसानों द्वारा सम्मानित थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया; भूमि–अनुदान, उनकी मदद से विशाल शिव मंदिर, संतों की धातु प्रतिमाएँ (945 ईसवी का अभिलेख); सुल्तान: इनाम भूमि, अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं; तनाव भी |
| 8. कई भाषाएँ क्यों | कालांश 11 | तमिल, कन्नड़, हिंदवी, दक्खनी, पंजाबी, संत भाषा; लोगों तक उनकी भाषा में |
| 9. पाँच स्रोत | कालांश 2–10 | जैसे स्रोत 1, 2, 4, 9 और 10; हर एक का सामाजिक या धार्मिक विचार एक वाक्य में |
| 10. मानचित्र कार्य | कालांश 10 | अजमेर, दिल्ली, फतेहपुर सीकरी; पुरी; चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम; देवी मंदिर एटलस से |
| 11. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): दो संतों का विवरण | घर पर | दो उपदेशकों का समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचार; विवरण तैयार कीजिए |
| 12. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): तीर्थयात्रा के आचार | घर पर | अध्याय के सूफ़ी और देव स्थलों से जुड़े तीर्थयात्रा के आचार; किताब के वर्णन, जैसे स्रोत 7, से मिलान |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- प्रश्न 4 में दोनों परंपराएँ। बच्चे केवल लिंगायत लिखते हैं; तमिल संतों वाली बात “कुछ हद तक” के साथ पहले आए।
- प्रश्न 7 में “क्यों” और “किस तरह” दोनों। कारण (वेल्लाल किसानों का आदर; अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं) और तरीक़े (अनुदान, मंदिर, प्रतिमाएँ, इनाम भूमि) अलग-अलग लिखवाइए।
- प्रश्न 10 में सिर्फ़ किताब की जगहें। देवी मंदिर के लिए अंदाज़ा नहीं; एटलस या अध्यापक की मदद।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए नमूना पत्र 2 के वस्तुनिष्ठ और अति लघूत्तरीय प्रश्न पहले, फिर बाक़ी।
- तेज़ विद्यार्थी को प्रश्न 6 या 9 का पूरा निबंध घर पर लिखने दीजिए, और रिवीजन नोट्स के उत्तर से मिलाने दीजिए।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): आख़िरी पर्ची, ऊपर का प्रश्न।
- निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — कोई भी एक संत या सूफ़ी, एक उदाहरण और एक अनिश्चित बात के साथ। जैसे: कबीर, क्योंकि स्रोत 10 कहता है कि ईश्वर एक है और नाम अनेक; पक्की नहीं: रामानंद उनके गुरु थे, क्योंकि इतिहासकार दोनों का समकालीन होना मुश्किल मानते हैं। या मीराबाई, क्योंकि उन्होंने कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना; पक्की नहीं: उनके गुरु रैदास थे, यह कुछ परंपराओं के अनुसार है।
- गृहकार्य: नमूना पत्र 3 हल कीजिए; क्विज़ हल कीजिए, और परख के प्रश्न देखिए। घर पर बात करने के लिए अभिभावकों का पन्ना है।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड का पूरा सेट।
पूरे अध्याय के लिए
अलग-अलग बच्चों के लिए
| किसके लिए | क्या कीजिए |
|---|---|
| कमज़ोर विद्यार्थी | हर कालांश के बोर्ड-कार्य की पहली तीन पंक्तियाँ और निकास-पर्ची का पहला प्रश्न; फ़्लैशकार्ड रोज़ दस |
| तेज़ विद्यार्थी | हर कार्ड का तेज़ विद्यार्थी वाला प्रश्न, और अभ्यास के प्रश्न 6 से 9 के निबंध |
| जो कुछ कालांश नहीं आ पाए | इंटरैक्टिव अध्याय का वही पड़ाव, और किसी साथी की बोर्ड-कार्य वाली कॉपी |
| पूरी कक्षा, जब जाति या धर्मों के आपसी संबंधों और टकराव की बात हो (कालांश 1 से 4, 7 और 8) | ये बातें किताब के शब्दों और काल में ही पढ़ाइए; किसी विद्यार्थी से उसके धर्म या जाति के बारे में मत पूछिए, और किसी धर्म को ऊँचा या नीचा मत ठहराइए |
सतत मूल्यांकन
| साधन | कब | क्या देखिए |
|---|---|---|
| निकास-पर्ची | हर कालांश | “कुछ हद तक”, “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है”, “संभवत:” और “लगभग” बचे या नहीं; दो बातें मिलीं या नहीं |
| पहले दिन की पर्ची | कालांश 1 और 10 | पहली और आख़िरी पंक्तियों में क्या जुड़ा |
| बोर्ड-कार्य की कॉपी | हर हफ़्ते | तालिका पूरी है, और पृष्ठ लिखे हैं |
| स्रोत पढ़ना | कालांश 2 से 9 | संत या लेखक के शब्द, किताब की टिप्पणी और अपनी बात अलग रखी या नहीं |
| मानचित्र | कालांश 10 | सिर्फ़ किताब में आई जगहें; देवी मंदिर एटलस से |
लिखित मूल्यांकन
अपनी इकाई-परीक्षा के लिए एक सुझाया हुआ ढाँचा; प्रश्न प्रश्न बैंक से चुनिए। कुल 30 अंक।
| प्रकार | अंक | क्या पूछें |
|---|---|---|
| वस्तुनिष्ठ, रिक्त स्थान, सही/ग़लत | 6 × 1 = 6 | तमिल वेद, बासवन्ना, सिलसिला का अर्थ, अमीर खुसरो, कबीर ग्रंथावली, मीराबाई के गुरु |
| अति लघूत्तरीय | 3 × 2 = 6 | तांत्रिक पूजा, ज़िम्मी, खालसा के पाँच प्रतीक |
| लघूत्तरीय | 2 × 3 = 6 | तमिल भक्ति में स्त्रियाँ; बा–शरिया और बे–शरिया |
| स्रोत पर आधारित | 1 × 4 = 4 | किताब के किसी एक स्रोत पर, जैसे स्रोत 2, 6, 9 या 10 |
| दीर्घ उत्तरीय | 1 × 5 = 5 | जाति प्रथा की आलोचना, या चिश्ती सूफ़ी और सुल्तान |
| मानचित्र | 1 × 3 = 3 | प्रश्न 10 के स्थल |
अंक कैसे कटेंगे, यह पहले ही बता दीजिए
- “कुछ हद तक”, “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है”, “संभवत:” और “ऐसा प्रतीत होता है” छोड़ने पर। किताब जहाँ पक्की बात नहीं कहती, वहाँ उत्तर भी पक्का नहीं होना चाहिए।
- दो परंपराओं या दो कालों को मिला देने पर। जैसे अलवार (विष्णु) और नयनार (शिव) को उलट देना, या चिश्ती ख़ानक़ाह की बात बे–शरिया सूफ़ियों के नाम लिख देना।
- जीवनी या परंपरा की बात को तथ्य बना देने पर। जैसे यह लिख देना कि रामानंद कबीर के गुरु थे, या मीराबाई के गुरु रैदास थे। लिखिए कि जीवनियों के अनुसार, या कुछ परंपराओं के अनुसार, ऐसा है।
प्रोजेक्ट और गतिविधि
| # | प्रोजेक्ट | कैसे |
|---|---|---|
| 1 | अभ्यास का प्रश्न 11 (11 और 12 में से कोई एक): दो उपदेशकों का विवरण | अध्याय के किन्हीं दो धार्मिक उपदेशकों, चिंतकों या संतों को चुनिए, उनके जीवन और उपदेशों के बारे में और जानकारी जुटाइए, और उनके समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचारों का विवरण तैयार कीजिए |
| 2 | अभ्यास का प्रश्न 12 (11 और 12 में से कोई एक): तीर्थयात्रा के आचार | अध्याय के सूफ़ी और देव स्थलों से जुड़े तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में और जानकारी जुटाइए, और उसे किताब के वर्णनों, जैसे जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7), से मिलाइए |
| 3 | कक्षा की संत-तालिका | हर कालांश के बाद चार्ट पेपर पर एक पंक्ति: कौन-सा संत या सूफ़ी, किस पृष्ठ पर, किस भाषा में, और किताब उनके बारे में क्या कहती है। यह गतिविधि हमारी ओर से है |
| 4 | काल-रेखा चार्ट | पृष्ठ 167 की नौ पंक्तियाँ एक लंबी पट्टी पर, हर पंक्ति के साथ उसका कालांश; पहली पंक्ति ईसवी के साथ |
शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ
- धर्मों को इतिहास की तरह पढ़ाइए। हर परंपरा वैसे पढ़ाइए जैसे किताब उसे बताती है। कोई गतिविधि नहीं जो किसी धर्म को ऊँचा या नीचा ठहराए, कोई सवाल नहीं जो बच्चों से उनका धर्म या जाति पूछे, और कक्षा में किसी पूजा, नमाज़, कीर्तन या कव्वाली का अभिनय नहीं।
- टकराव किताब के शब्दों और काल में। बौद्ध और जैन धर्म से संबंधों के लिए किताब का वाक्य, “यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे।”; कबीर जन्म से हिंदू थे अथवा मुसलमान, इस विवाद को किताब के शब्दों में, जीवनियों की बात की तरह पढ़ाइए। आज की ख़बरों या आज के विवादों से इसे मत जोड़िए।
- सावधानी के शब्द बचाइए। इस अध्याय की कई बातें किताब सावधानी से कहती है: अलवार और नयनार पर इतिहासकारों का मत “कुछ हद तक यह बात सत्य प्रतीत होती है” (पृष्ठ 144), स्रोत 10 के बारे में “यह रचना कबीर की मानी जाती है” (पृष्ठ 160), बाबा गुरु नानक के बारे में “ऐसा प्रतीत होता है” (पृष्ठ 163), और मीराबाई के गुरु के बारे में “कुछ परंपराओं के अनुसार” (पृष्ठ 164)। आपके बोलने में भी ये शब्द रहें।
- किताब से बाहर की तारीखें और नाम मत जोड़िए। हर तारीख किताब की; मानचित्र पर सिर्फ़ वे जगहें जिनका अध्याय नाम लेता है; काल-रेखा के नामों के बारे में सिर्फ़ उतना जितना पृष्ठ 167 देता है। बच्चे बाहर की बात लाएँ, तो पूछिए कि किताब का कौन-सा पृष्ठ उसे बताता है।
- चार्ट पेपर सँभालिए। बोर्ड हर कालांश मिट जाता है; जो तालिकाएँ और चित्र कालांश 10 और 11 में फिर लगेंगे, वे चार्ट पेपर पर रहें।