ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के स्रोत पढ़ना, प्रमाण से नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।
तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए। ! वाली पंक्ति उस चूक की ओर इशारा करती है जो अक्सर हो जाती है।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — पूजा के तरीक़ों का मेल और टकराव (पृष्ठ 141–142)
किताब का उदाहरण: किताब के अनुसार लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी की संभवत: सबसे बड़ी विशेषता यह है कि साहित्य और मूर्तिकला, दोनों में कई देवी-देवता अधिक दिखाई देने लगते हैं। इतिहासकार कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं। एक में पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में रचे गए, “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे”। दूसरी में ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को स्वीकार किया और उन्हें नया रूप दिया। पुरी (उड़ीसा) में मुख्य देवता को बारहवीं शताब्दी तक जगन्नाथ के रूप में, यानी विष्णु के एक स्वरूप में, प्रस्तुत किया गया।
1किताब के अनुसार इतिहासकार पूजा-प्रणालियों के मेल की कौन-सी दो प्रक्रियाएँ बताते हैं? 2 अंक
उत्तर देखिए
दो प्रक्रियाएँ थीं: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार और ब्राह्मणों द्वारा दूसरों की आस्थाओं को अपनाकर नया रूप देना। (पृष्ठ 141)
- ★पहली: पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और संरक्षण सरल संस्कृत छंदों में हुआ, जिन्हें वैदिक विद्या से दूर स्त्रियाँ और शूद्र भी समझ सकते थे।
- ★दूसरी: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को स्वीकार किया और उन्हें नया रूप दिया।
- ! इन्हें दो अलग-अलग धर्मों की टक्कर न समझिए; किताब बताती है कि इतिहासकारों के अनुसार इसी काल में कम से कम ये दो प्रक्रियाएँ साथ-साथ कार्यरत थीं।
2पुरी के जगन्नाथ का उदाहरण पूजा-प्रणालियों के मेल के बारे में क्या दिखाता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब पुरी को दूसरी प्रक्रिया, यानी ब्राह्मणों द्वारा दूसरों की आस्थाओं को अपनाकर नया रूप देने, का सबसे विशिष्ट उदाहरण बताती है: एक स्थानीय देवता को बारहवीं शताब्दी तक विष्णु के एक रूप में प्रस्तुत किया गया। (पृष्ठ 141)
- ★जगन्नाथ का अर्थ है “संपूर्ण विश्व का स्वामी”; चित्र 6.2 में वे अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ हैं।
- प्रतिमा स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे और आज भी बनाते हैं।
- किताब बताती है कि इस स्थानीय देवता की प्रतिमा पहले भी और आज भी स्थानीय जनजाति के विशेषज्ञ लकड़ी से गढ़ते हैं, और विष्णु का यह रूप देश के दूसरे भागों में मिलने वाले रूपों से सर्वथा भिन्न था। (पृष्ठ 142)
यही बात देवियों पर भी लागू हुई: स्थानीय देवियों को मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता मिली, कहीं लक्ष्मी (विष्णु की पत्नी) के रूप में, कहीं पार्वती (शिव की पत्नी) के रूप में।
3समाजशास्त्री रेडफील्ड ने “महान” और “लघु” परंपराओं से क्या समझाया? किताब के अनुसार विद्वान इन शब्दों को उद्धरण चिह्नों में क्यों लिखते हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
रेडफील्ड बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्री थे; उन्होंने एक किसान समाज के सांस्कृतिक आचरणों का वर्णन करने के लिए ये शब्द छापे। (पृष्ठ 141)
- ★किसान प्रभुत्वशाली वर्गों, जैसे पुरोहित और राजा, के कर्मकांडों की नकल करते थे; इसे उन्होंने “महान” परंपरा कहा। साथ ही वे ऐसे लोकाचार भी मानते थे जो इससे बिलकुल अलग थे; इसे “लघु” परंपरा कहा।
- रेडफील्ड ने यह भी देखा कि दोनों परंपराएँ आपसी लेन-देन से समय के साथ बदलती रहीं।
- विद्वान इन शब्दों में छिपे ऊँच-नीच के भाव को नहीं मानते, इसलिए इन्हें उद्धरण चिह्नों में लिखा जाता है।
- ! महान का मतलब बेहतर और लघु का मतलब कमतर मान लेना: किताब के अनुसार विद्वान ठीक इसी ऊँच-नीच वाले स्वर से सहमत नहीं हैं।
4किताब के अनुसार इन अलग-अलग पूजा-परंपराओं के बीच टकराव कहाँ-कहाँ दिखता था? बौद्ध और जैन धर्म से संबंध के बारे में किताब क्या कहती है? 4 अंक
उत्तर देखिए
किताब तीन तरह के टकराव गिनाती है, और बौद्ध-जैन धर्म से संबंधों को भी अकसर तनावपूर्ण बताती है; साथ ही यह भी कहती है कि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे। (पृष्ठ 142)
- ★वैदिक परंपरा के प्रशंसक उन आचरणों की निंदा करते थे जो मंत्रों के साथ यज्ञ से हटकर थे।
- तांत्रिक उपासक वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे।
- भक्त अपने इष्ट विष्णु या शिव को सर्वोच्च बताते थे।
- बौद्ध और जैन धर्म से संबंध भी अक्सर तनाव भरे थे, “यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे।”
- ! तांत्रिक पूजा को इस सूची में “विरोधी” भर मत लिख दीजिए; किताब के अनुसार उसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे और अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण के भेद नहीं माने जाते थे।
केस 2 — तमिलनाडु के अलवार और नयनार: जाति का सवाल (पृष्ठ 143–144)
किताब का उदाहरण: किताब के शब्दों में, “प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।” ये संत घूमते हुए तमिल में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे। ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु उन चतुर्वेदियों से, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, अधिक उन “दासों” को पसंद करते हैं “जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।” नयनार अप्पार शास्त्र उद्धृत करने वालों से पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”
1अलवार और नयनार कौन थे? उन्होंने अपने भजन किस भाषा में गाए? 2 अंक
उत्तर देखिए
अलवार विष्णु भक्ति में डूबे संत थे और नयनार शिवभक्त; उन्होंने भजन तमिल में गाए। (पृष्ठ 143)
- ★किताब इन्हीं के नेतृत्व में लगभग छठी शताब्दी में प्रारंभिक भक्ति आंदोलन की बात करती है।
- ये संत एक जगह से दूसरी जगह जाते थे। जिन जगहों को उन्होंने इष्ट का निवास बताया, वहाँ बाद में बड़े मंदिर बने और वे तीर्थस्थल बन गईं।
- संतों के भजन मंदिरों के अनुष्ठानों में गाए जाने लगे और संतों की प्रतिमाओं की भी पूजा होने लगी।
2यह कहा जाता है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा का विरोध किया। इस मत पर किताब क्या कहती है? दो प्रमाण दीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
किताब बताती है कि यह कुछ इतिहासकारों का मत है, और इसे कुछ हद तक सत्य प्रतीत होने वाला मानती है। (पृष्ठ 144)
- ★पहला प्रमाण संतों की पृष्ठभूमि है: वे ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और कुछ उन जातियों से भी थे जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था।
- ★दूसरा प्रमाण संतों के अपने शब्द हैं: स्रोत 1 में तोंदराडिप्पोडि वर्ण–व्यवस्था के परे के दासों को उन चतुर्वेदियों से ऊपर रखते हैं जो विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते; स्रोत 2 में अप्पार गोत्र और कुल को बेकार बताते हैं।
- ! यह लिख देना कि संतों ने जाति तोड़ दी: किताब ऐसा नहीं कहती। वह “कुछ इतिहासकारों” का मत बताकर उसे कुछ हद तक सत्य कहती है।
3तमिल वेद किसे कहा गया और यह नाम क्या बताता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
अलवारों के संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् को तमिल वेद कहा गया। (पृष्ठ 144)
- ★इसका मतलब था कि इसे ब्राह्मणों के प्रिय चार संस्कृत वेदों जितना महत्त्वपूर्ण माना गया।
- किताब के अनुसार दसवीं शताब्दी तक बारह अलवारों की रचनाओं का यह संकलन (“चार हज़ार पावन रचनाएँ”) बन चुका था।
- शैव संतों की रचनाओं का संकलन तवरम है। उसमें अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताएँ रखी गईं, और उनका वर्गीकरण संगीत के आधार पर हुआ।
केस 3 — स्त्री भक्त (पृष्ठ 144–145)
किताब का उदाहरण: किताब के शब्दों में, “संभवत: इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी।” अंडाल अलवार स्त्री थीं; उनके गीत तब भी गाए जाते थे और आज भी गाए जाते हैं। वे अपने को विष्णु की प्रेयसी मानती थीं। कराइक्काल अम्मइयार शिव भक्त थीं और उन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया। स्रोत 3 (“एक राक्षसी?”) में वे अपने को राक्षसी के रूप में दिखाती हैं: फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश, आगे निकले दाँत, वन में चीखती हुई। वे कहती हैं कि यह वन “जो हमारे पिता (शिव) का घर है”।
1अंडाल और कराइक्काल अम्मइयार की भक्ति के रास्ते में क्या फ़र्क था? 2 अंक
उत्तर देखिए
अंडाल प्रेम की भक्ति गाती थीं, कराइक्काल अम्मइयार घोर तपस्या के रास्ते पर चलीं। (पृष्ठ 144)
- ★अंडाल अलवार स्त्री थीं और अपने को विष्णु की प्रेयसी मानती थीं।
- ★कराइक्काल अम्मइयार शिव भक्त थीं और उनकी रचनाएँ नयनार परंपरा में सुरक्षित रहीं।
2कराइक्काल अम्मइयार स्रोत 3 में अपने को ऐसी कठोर भाषा में क्यों दिखाती हैं? किताब इन स्त्रियों की रचनाओं के बारे में क्या नतीजा निकालती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
यह वर्णन सुंदर रूप का नहीं, डरावने रूप का है; किताब के अनुसार ऐसी स्त्रियों की रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी। (पृष्ठ 144–145)
- ★किताब के शब्दों में, “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।”
- इन स्त्रियों ने सामाजिक दायित्व छोड़े, पर किसी दूसरी व्यवस्था या भिक्षुणी समुदाय में शामिल नहीं हुईं।
- ! वर्णन के पीछे अम्मइयार के इरादे का अंदाज़ा मत लगाइए। नतीजा वही लिखिए जो किताब कहती है: उनका जीवन और उनकी रचनाएँ पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती देती थीं।
केस 4 — राज्य और भक्त संत: पल्लव, पांड्य और चोल (पृष्ठ 145–146)
किताब का उदाहरण: पहली सहस्राब्दी ईसवी की शुरुआत में तमिल क्षेत्र में कई सरदारियाँ थीं; सहस्राब्दी के दूसरे भाग में राज्य बने, जिनमें पल्लव और पांड्य (छठी से नवीं शताब्दी ईसवी) भी थे। बौद्ध और जैन धर्म सदियों से इस क्षेत्र में थे और उन्हें व्यापारियों और शिल्पकारों का संरक्षण मिलता था, पर राजकीय संरक्षण कभी-कभी ही मिला। तमिल भक्ति भजनों का एक मुख्य विषय बौद्ध और जैन धर्म का विरोध है। चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने विष्णु और शिव के मंदिरों के लिए भूमि–अनुदान दिए। एक अभिलेख के अनुसार 945 ईसवी में चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
1तमिल भक्ति भजनों में बौद्ध और जैन धर्म का विरोध क्यों दिखता है? इतिहासकारों का कारण बताइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
इतिहासकार इसका कारण राजकीय अनुदान पाने की होड़ बताते हैं। (पृष्ठ 145)
- ★बौद्ध और जैन धर्म को व्यापारियों और शिल्पकारों का संरक्षण मिलता था, पर राजकीय संरक्षण कभी-कभी ही; भक्त संत उसी राजकीय अनुदान की होड़ में थे।
- किताब के अनुसार यह विषय ख़ास तौर पर नयनारों की रचनाओं में मिलता है।
- ! यह लिख देना कि सभी अलवार और नयनार जैन-बौद्ध धर्म के विरोधी थे: किताब ऐसा नहीं कहती। वह भजनों का एक मुख्य विषय बताती है और कारण के लिए इतिहासकारों का मत देती है।
2चोल शासकों ने भक्ति परंपरा को कैसे सहारा दिया? किताब के दो प्रमाण दीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
चोल शासकों ने ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा का समर्थन किया और विष्णु और शिव के मंदिरों के लिए भूमि–अनुदान दिए। (पृष्ठ 145)
- ★चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के बड़े शिव मंदिर चोल शासकों की मदद से बने (पृष्ठ 146)।
- ★चोल शासकों के समय शिव की कांस्य प्रतिमाएँ भी बनीं। किताब कहती है, “स्पष्ट है कि नयनार संतों का दर्शन शिल्पकारों के लिए प्रेरणा बना।”
- चोल शासकों ने मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू करवाया और उनका तवरम के रूप में संकलन करवाया।
3शासकों को भक्त संतों का साथ क्यों चाहिए था? 945 ईसवी का अभिलेख इस बारे में क्या दिखाता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
नयनार और अलवार संतों का वेल्लाल किसान आदर करते थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। (पृष्ठ 146)
- ★चोल शासक दैवीय समर्थन का दावा करते थे और पत्थर और धातु की मूर्तियों वाले मंदिर बनवाते थे।
- ★945 ईसवी के अभिलेख से पता चलता है कि परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
- इन प्रतिमाओं को उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।
केस 5 — कर्नाटक की वीरशैव परंपरा (पृष्ठ 146–147)
किताब का उदाहरण: बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नया आंदोलन उभरा, जिसका नेतृत्व बासवन्ना (1106–68) नाम के एक ब्राह्मण ने किया। वे एक कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे। उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए। लिंगायतों का मानना है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता। स्रोत 4 में बासवन्ना का एक वचन है: लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं पर असली साँप को मारने को कहते हैं; खा सकने वाले देवता के सेवक को भगा देते हैं पर न खा सकने वाली प्रतिमा को व्यंजन परोसते हैं।
1लिंगायत मृत्यु के बाद के संस्कारों में क्या अलग करते थे, और मृत्यु के बारे में उनका विश्वास क्या है? 3 अंक
उत्तर देखिए
वे श्राद्ध संस्कार नहीं करते और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं। (पृष्ठ 147)
- ★उनका विश्वास है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता।
- किताब ये दोनों बातें साथ-साथ बताती है: यह विश्वास, और धर्मशास्त्रों में बताए श्राद्ध संस्कार का पालन न करना।
- ! दफ़नाने की जगह श्राद्ध लिख देना: किताब के अनुसार श्राद्ध नहीं किया जाता, मृतकों को दफ़नाया जाता है।
2जाति और सामाजिक आचरण के बारे में वीरशैवों के विचारों में चार बातें लिखिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
लिंगायतों ने जाति का विरोध किया और धर्मशास्त्रों से अलग कई आचरण अपनाए। (पृष्ठ 147)
- ★उन्होंने जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध किया।
- उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्न उठाए।
- उन्होंने वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह जैसे आचरण अपनाए, जिन्हें धर्मशास्त्र नहीं मानते थे।
- ब्राह्मणीय व्यवस्था में जिन समुदायों को नीचा स्थान मिला था, वे इनके अनुयायी बने।
3स्रोत 4 में बासवन्ना लोगों के किस व्यवहार की ओर इशारा करते हैं? शीर्षक “अनुष्ठान और यथार्थ संसार” से इसका क्या संबंध है? 3 अंक
उत्तर देखिए
बासवन्ना दो जोड़ियाँ रखकर दिखाते हैं कि अनुष्ठान में लोग जो करते हैं और असली दुनिया में जो करते हैं, उनमें मेल नहीं है। (पृष्ठ 147)
- ★पत्थर के साँप को दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप को मारने को कहते हैं।
- ★खा सकने वाले देवता के सेवक को भगा देते हैं, पर न खा सकने वाली प्रतिमा को व्यंजन परोसते हैं।
- स्रोत का शीर्षक भी यही बात कहता है: अनुष्ठान एक तरफ़, यथार्थ संसार दूसरी तरफ़।
4वीरशैव परंपरा की रचनाएँ किस भाषा में थीं और किन्होंने रचीं? 2 अंक
उत्तर देखिए
किताब के शब्दों में, “वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।” (पृष्ठ 147)
- ★भाषा कन्नड़ थी, और रचने वालों में स्त्री और पुरुष दोनों थे।
केस 6 — उत्तर भारत: नए नेता और तुर्कों का आगमन (पृष्ठ 147–148)
किताब का उदाहरण: उत्तर भारत में विष्णु और शिव की उपासना शासकों की मदद से बने मंदिरों में होती थी, पर इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलीं। उसी समय रूढ़िवादी ब्राह्मणीय ढाँचे से बाहर के नेता भी प्रभाव पा रहे थे: नाथ, जोगी और सिद्ध। उनमें कई शिल्पी समुदायों से थे, जिनमें जुलाहे भी थे। किताब के अनुसार तुर्कों के आगमन का चरम दिल्ली सल्तनत (तेरहवीं शताब्दी) की स्थापना थी।
1नाथ, जोगी और सिद्ध कौन थे? किताब के अनुसार उनका महत्त्व क्यों बढ़ा? 3 अंक
उत्तर देखिए
वे रूढ़िवादी ब्राह्मणीय ढाँचे से बाहर के नेता थे, जिनमें कई शिल्पी समुदायों से थे। (पृष्ठ 147)
- ★संगठित शिल्प उत्पादन के बढ़ने के साथ उनका महत्त्व बढ़ा।
- शहरी केंद्रों के विकास और मध्य और पश्चिम एशिया से व्यापार के कारण शिल्प की वस्तुओं की माँग बढ़ी थी।
2इन नेताओं ने वेदों और भाषा के सवाल पर क्या किया? उन्हें किस चीज़ में सफलता नहीं मिली? 3 अंक
उत्तर देखिए
उन्होंने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और लोगों की भाषाओं में बात की। (पृष्ठ 148)
- ★उनकी भाषाएँ आगे चलकर आज की भाषाओं के रूप में विकसित हुईं।
- ★फिर भी ये शासक वर्ग का समर्थन नहीं पा सके।
3किताब तुर्कों के आगमन और सूफ़ियों के आगमन को आपस में कैसे जोड़ती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब के अनुसार तुर्कों के आगमन का चरम दिल्ली सल्तनत की स्थापना था, जिसने राजपूत राज्यों और उनसे जुड़े ब्राह्मणों को कमज़ोर किया। (पृष्ठ 147–148)
- ★किताब के शब्दों में, “सूफ़ियों का आगमन (अनुभाग 6) इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।”
- ! ब्राह्मणों की प्रभुता पर सीधी चुनौती शायद ही किसी ने दी, यह किताब में “कुछ इतिहासकारों” का मत है; इसे किताब का अपना निर्णय बनाकर मत लिखिए।
केस 7 — इस्लामी परंपराएँ: शासक, जनता और मस्जिदें (पृष्ठ 148–151)
किताब का उदाहरण: सिद्धांत में मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना था, और उलमा से अपेक्षा थी कि वे शासन में शरिया का अमल सुनिश्चित करवाएँगे। पर उपमहाद्वीप में बड़ी जनसंख्या इस्लाम मानने वाली नहीं थी। अकबर के 1598 के फ़रमान (स्रोत 5) में खम्बायत के महानुभावों से कहा गया कि वे पादरियों को गिरजाघर बनाने दें। 1661–62 में औरंगज़ेब ने जोगी गुरु आनंद नाथ को पत्र लिखकर पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे (स्रोत 6)।
1सिद्धांत में और व्यवहार में मुसलमान शासकों की स्थिति में क्या फ़र्क था? 3 अंक
उत्तर देखिए
सिद्धांत में शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना था, पर उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी। (पृष्ठ 149)
- ★उलमा से अपेक्षा थी कि वे शासन में शरिया का अमल सुनिश्चित करवाएँगे।
- ★पर उपमहाद्वीप में बड़ी जनसंख्या इस्लाम मानने वाली नहीं थी, इसलिए स्थिति जटिल थी।
- ज़िम्मी संरक्षित श्रेणी थी: यहूदी और ईसाई जैसे उद्घाटित धर्मग्रंथ मानने वाले लोग, जो जज़िया कर चुकाकर संरक्षण के अधिकारी बनते थे। भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया (पृष्ठ 149)।
2स्रोत 5 और स्रोत 6 से मुग़ल बादशाहों की नीति के बारे में क्या पता चलता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
दोनों स्रोत दिखाते हैं कि बादशाह गैर–मुसलमान धार्मिक नेताओं और संस्थाओं के प्रति श्रद्धा और सहारे का रवैया दिखाते थे। (पृष्ठ 149–150)
- ★स्रोत 5: अकबर का 1598 का फ़रमान कहता है कि “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ और उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें जिससे वे अपनी इबादत कर सकें।”
- ★स्रोत 6: औरंगज़ेब ने जोगी गुरु आनंद नाथ को पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”
- किताब के अनुसार बहुत से शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को भूमि अनुदान और कर की छूट दी; ऐसे अनुदान अकबर और औरंगज़ेब समेत अनेक मुग़ल बादशाहों ने दिए।
3खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय ने कुरान के विचार कैसे कहे? मालाबार तट के मुसलमान व्यापारियों ने किस तरह स्थानीय रंग अपनाया? 3 अंक
उत्तर देखिए
खोजा इस्माइली समुदाय ने कुरान के विचार कहने के लिए देशी साहित्यिक विधा अपनाई, और मालाबार तट के अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय भाषा और आचार। (पृष्ठ 150)
- ★खोजा इस्माइली जीनन नाम के भक्ति गीत राग में बाँधकर गाते थे; ये पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में दैनिक प्रार्थना के समय गाए जाते थे।
- ★मालाबार तट (केरल) पर बसे अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा अपनाई, और मातृकुलीयता और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार भी (पृष्ठ 150–151)।
4किताब मस्जिदों की इमारतों में सार्वभौमिक और स्थानीय का मेल कैसे दिखाती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
मस्जिदों में इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन सार्वभौमिक बात है; छत और निर्माण के सामान में स्थानीय रंग दिखता है। (पृष्ठ 151–152)
- ★मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिम्बर (व्यासपीठ) से इमारत के मक्का की ओर अनुस्थापन का पता चलता है।
- केरल की तेरहवीं शताब्दी की मस्जिद (चित्र 6.9) की छत शिखर के आकार की है।
- मैमनसिंग (बांग्लादेश) की अतिया मस्जिद (1609, चित्र 6.10) ईंटों की बनी है।
- श्रीनगर की शाह हमदान मस्जिद (1395, चित्र 6.11) कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का नमूना है।
केस 8 — सूफ़ीमत: ख़ानक़ाह और सिलसिला (पृष्ठ 152–153)
किताब का उदाहरण: इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। यह ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था, और इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा। ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था, जिसका अपना साहित्य था। सूफ़ी एक संगठित समुदाय, ख़ानक़ाह, के आसपास रहते थे। उसका नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फ़ारसी) के हाथ में था।
1सूफ़ी किस बात के विरोध में उभरे और उन्होंने किन बातों पर बल दिया? 3 अंक
उत्तर देखिए
सूफ़ी ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता के विरोध में उभरे; उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं और धर्माचार्यों की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। (पृष्ठ 152)
- ★उन्होंने मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया।
- उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल बताकर उनका अनुसरण करने की सीख दी, और कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
- ! “सूफ़ीवाद” शब्द को इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों का मत समझ लेना: किताब के अनुसार यह उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए तसव्वुफ़ शब्द आता है।
2ख़ानक़ाह में शेख की भूमिका क्या थी? मुरीद और खलीफ़ा शब्दों का अर्थ भी बताइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
ख़ानक़ाह का नियंत्रण शेख (पीर या मुर्शीद) के हाथ में था। (पृष्ठ 152)
- ★शेख अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे।
- वे आध्यात्मिक व्यवहार के नियम तय करते थे, और ख़ानक़ाह में रहने वालों के आपसी संबंधों और शेख और आम लोगों के रिश्तों की सीमा भी।
- मुरीद यानी अनुयायी; खलीफ़ा यानी शेख का नियुक्त किया हुआ वारिस।
3सिलसिला किसे कहते हैं? दीक्षा, दरगाह और उर्स को जोड़कर समझाइए। 4 अंक
उत्तर देखिए
सिलसिला का शाब्दिक अर्थ जंज़ीर है; यह शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है। (पृष्ठ 153)
- ★इस जंज़ीर की पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है।
- दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था, और सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र पहनने पड़ते थे।
- पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी; बरसी पर ज़ियारत की परिपाटी चली, जिसे उर्स कहा गया।
- ! उर्स को सिर्फ़ “बरसी” लिख देना: किताब के अनुसार बरसी पर ज़ियारत को उर्स इसलिए कहा गया कि लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत होकर उनके और करीब हो जाते हैं।
4किताब के अनुसार सिलसिलों के नाम कैसे पड़े? दो उदाहरण दीजिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
ज़्यादातर सिलसिलों के नाम उन्हें स्थापित करने वालों पर पड़े, और कुछ के जन्मस्थान पर। (पृष्ठ 153)
- ★कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर पड़ा।
- चिश्ती नाम मध्य अफ़गानिस्तान के चिश्ती शहर से आया।
केस 9 — चिश्ती सिलसिला: ख़ानक़ाह का जीवन और ज़ियारत (पृष्ठ 153–156)
किताब का उदाहरण: बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आए सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे प्रभावशाली रहे, क्योंकि उन्होंने अपने को स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला और भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशेषताएँ भी अपनाईं। शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह (चौदहवीं शताब्दी) उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर, यमुना के किनारे ग़ियासपुर में थी। वहाँ कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना) था, और सामुदायिक रसोई, यानी लंगर, फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी।
1शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में कौन-कौन लोग आते थे और क्यों? 3 अंक
उत्तर देखिए
वहाँ हर तरह के लोग आते थे: सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर। (पृष्ठ 153–154)
- ★वे अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज़ लेने या मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे।
- मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि और दरबारी इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी भी थे। इन सबने शेख के बारे में लिखा।
- ! ख़ानक़ाह को सिर्फ़ मुसलमानों की जगह न लिखिए; किताब की सूची में हिंदू जोगी भी हैं।
2अजमेर की दरगाह लोकप्रिय क्यों हुई? किताब के कारण बताइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब तीन कारण बताती है: शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा, उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता, और राजसी मेहमानों का प्रश्रय। (पृष्ठ 154–155)
- ★इसके साथ किताब बताती है कि दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी, इसलिए अनेक यात्री आते थे।
- मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51) यहाँ आने वाले पहले सुल्तान थे; मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई।
- सबसे पहला किताबी ज़िक्र चौदहवीं शताब्दी का है। सोलहवीं शताब्दी तक यह बहुत लोकप्रिय हो गई थी।
3अकबर का अजमेर से क्या रिश्ता था? दो प्रमाण दीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
किताब के शब्दों में, “अकबर यहाँ चौदह बार आया”, कभी साल में दो-तीन बार। (पृष्ठ 155)
- ★वह नयी जीत के लिए आशीर्वाद लेने, संकल्प पूरा होने पर या पुत्रों के जन्म पर आता था; यह परंपरा उसने 1580 तक बनाए रखी (पृष्ठ 156)।
- ★1568 में उसने तीर्थयात्रियों का खाना पकाने के लिए एक विशाल देग़ भेंट की, और दरगाह के अहाते में एक मस्जिद भी बनवाई।
- हर यात्रा की दान-भेंट शाही दस्तावेज़ों में दर्ज है।
4स्रोत 7 में मुग़ल शहज़ादी जहाँआरा की अजमेर यात्रा (1643) का ब्योरा है। इसके दो प्रमाण दीजिए कि वे दरगाह का आदर कैसे करती थीं। 3 अंक
उत्तर देखिए
जहाँआरा अपने पिता शाहजहाँ के साथ आगरा से अजमेर गईं और उन्होंने शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस–अल–अखाह लिखी। (पृष्ठ 156)
- ★उन्होंने दरगाह की तरफ़ पैर नहीं फैलाए, न पीठ की।
- ★वे नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लिए, सबसे उम्दा इतर छिड़का और अपना गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
5अठारहवीं शताब्दी में दरगाह कुली खान ने शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली की दरगाह के बारे में क्या लिखा? इससे दरगाह पर आने वालों के बारे में क्या पता चलता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
उसने लिखा, “शेख सिर्फ देहली के ही चिराग नहीं अपितु सारे मुल्क के चिराग हैं।” (पृष्ठ 156)
- ★वहाँ इतवार को भीड़ होती थी; दीवाली के महीने में दिल्ली की सारी आबादी उमड़ आती थी और हौज़ के पास तम्बू गाड़कर कई दिन रहती थी।
- ★उसके शब्दों में, “हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं।”
- पुराने रोग ठीक करने के लिए लोग वहाँ नहाते थे।
केस 10 — भाषा, कौल और राज्य: चिश्ती तरीक़े (पृष्ठ 156–159)
किताब का उदाहरण: चिश्तियों ने समा में स्थानीय भाषा अपनाई, और दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे। अमीर खुसरो (1253–1325) शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे और उन्होंने कौल का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया। चिश्ती सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता, तो वे उसे स्वीकार करते थे। 1313 की एक घटना (स्रोत 9, “शाही भेंट अस्वीकार”) अमीर हसन सिजज़ी के शब्दों में दर्ज है।
1चिश्ती संतों और उनसे जुड़े कवियों ने भाषा के मामले में क्या किया? दो उदाहरण दीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
उन्होंने स्थानीय भाषाओं में रचा और बोला। (पृष्ठ 157)
- ★बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचा, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है।
- ★बीजापुर के आसपास सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों में वहाँ बसे चिश्ती संतों ने दक्खनी (उर्दू का रूप) में छोटी कविताएँ रचीं; लोरीनामा और शादीनामा भी लिखे गए।
- इन कविताओं को संभवत: औरतें घर का काम करते हुए, जैसे चक्की पीसते और चरखा कातते समय, गाती थीं।
2मसनवी क्या होती है? मलिक मोहम्मद जायसी की पद्मावत से इसे समझाइए। 3 अंक
उत्तर देखिए
मसनवी लंबी कविता है, जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया। (पृष्ठ 157)
- ★पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा है; किताब के अनुसार उनकी आज़माइश आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है।
- ख़ानक़ाहों में समा के दौरान ऐसे काव्यों का वाचन होता था।
3कौल क्या है, और उसका कव्वाली में क्या स्थान है? 3 अंक
उत्तर देखिए
कौल अरबी शब्द है, जिसका अर्थ कहावत है; अमीर खुसरो ने इसका प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया। (पृष्ठ 157)
- ★कौल कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था।
- इसके बाद फ़ारसी, हिंदवी या उर्दू की सूफ़ी कविता गाई जाती थी, कभी तीनों भाषाओं के शब्दों के साथ।
- शेख निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के कव्वाल अपने गायन की शुरुआत कौल से करते हैं (चित्र 6.14)।
4चिश्ती सत्ता और शासकों से कैसा रिश्ता रखते थे? धन और ज़मीन की भेंट के बारे में उनकी नीति बताइए। 4 अंक
उत्तर देखिए
चिश्ती संयम और सादगी का जीवन जीते थे और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर बिना माँगे मिली भेंट स्वीकार कर लेते थे। (पृष्ठ 158)
- ★सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी और दान संबंधी न्यास बनाए।
- ★चिश्ती धन और सामान का दान लेते थे, पर उसे जोड़ने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर पूरा खर्च कर देते थे। इससे शेख के नैतिक अधिकार की पुष्टि होती थी और आम लोग उनकी ओर खिंचते थे।
- तनाव भी था: दोनों पक्ष अपनी सत्ता जताने के लिए झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे।
5स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने शासक की भेंट के बारे में क्या कहा? उन्होंने शेख फ़रीदुद्दीन की कौन-सी कहानी सुनाई? 3 अंक
उत्तर देखिए
शेख ने शासक की भेंट नहीं ली; अंश का शीर्षक भी “शाही भेंट अस्वीकार” है। (पृष्ठ 159)
- ★शेख ने पूछा, “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?” और कहा, “हमारे कोई भी आध्यात्मिक गुरु ने इस तरह का काम नहीं किया।”
- कहानी में सुल्तान ग़ियासुद्दीन (तब उलुग़ ख़ान) ने शेख फ़रीदुद्दीन को कुछ धन और चार गाँवों का पट्टा भेंट किया।
- शेख फ़रीदुद्दीन ने धन दरवेशों में बाँटने के लिए ले लिया, पर ज़मीन के पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है”।
केस 11 — कबीर: दैवीय वस्त्र की बुनाई (पृष्ठ 160–162)
किताब का उदाहरण: इतिहासकारों ने कबीर के जीवन और काल का अध्ययन उनके काव्य और बाद में लिखी गई जीवनियों के आधार पर किया है, और यह काम कई वजहों से चुनौती भरा रहा है। उनकी बानी तीन परिपाटियों में मिलती है: कबीर बीजक (कबीर पंथियों ने वाराणसी और उत्तर प्रदेश के दूसरे स्थानों पर सँभाला), कबीर ग्रंथावली (राजस्थान के दादू पंथियों से जुड़ी) और आदि ग्रंथ साहिब में संकलित कई पद। लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने। रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं, कुछ संत भाषा में।
1कबीर की रचनाओं को जानने में इतिहासकारों को कौन-सी कठिनाई आती है? कबीर की बानी किन तीन परिपाटियों में बची है? 3 अंक
उत्तर देखिए
कठिनाई यह है कि लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने, और यह कहना मुश्किल है कि कौन-से पद कबीर के हैं। (पृष्ठ 160)
- ★तीन परिपाटियाँ: कबीर बीजक (कबीर पंथियों के पास), कबीर ग्रंथावली (राजस्थान के दादू पंथियों से जुड़ी), और आदि ग्रंथ साहिब में संकलित पद।
- विद्वान भाषा शैली और विषयवस्तु के आधार पर तय करने की कोशिश करते हैं कि कौन-से पद कबीर के हैं।
- ! तीनों संकलनों को कबीर के अपने हाथ का लिखा मान लेना: किताब के अनुसार संकलन उनकी मृत्यु के बहुत बाद बने।
2कबीर परम सत्य को किन-किन नामों से पुकारते हैं? ये नाम किन परंपराओं से आए? 3 अंक
उत्तर देखिए
कबीर परम सत्य के लिए कई परंपराओं के नाम बरतते हैं। (पृष्ठ 160)
- ★इस्लामी दर्शन से: अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर।
- ★वेदांत दर्शन से: अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्।
- योगी परंपरा से: शब्द और शून्य।
- उलटबाँसी (उलटी कही उक्तियाँ) में रोज़ के अर्थ को उलट दिया जाता है; ये परम सत्य के स्वरूप को समझने की मुश्किल दिखाती हैं।
3स्रोत 10 कबीर की मानी जाने वाली रचना है। इसमें ईश्वर के नामों के बारे में क्या कहा गया है? किताब के अनुसार कबीर के विचार एक-से क्यों नहीं लगते? 4 अंक
उत्तर देखिए
स्रोत 10 कहता है कि एक ही ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है। (पृष्ठ 160)
- ★स्रोत के शब्दों में, “ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।” और “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
- कुछ कविताएँ इस्लामी दर्शन के एकेश्वरवाद और मूर्तिभंजन का समर्थन करती हैं और हिंदू धर्म के बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का खंडन।
- दूसरी कविताएँ ज़िक्र और इश्क के सूफ़ी सिद्धांतों से “नाम सिमरन” की हिंदू परंपरा को व्यक्त करती हैं।
- ! सारे पदों को एक ही विचार का मान लेना: किताब के अनुसार पदों में विचार एक-से नहीं हैं, और कौन-से पद कबीर के हैं, यह कहना मुश्किल है।
4बाद की जीवनियों में कबीर और रामानंद के रिश्ते के बारे में क्या कहा गया है? इतिहासकार इसे क्यों नहीं मानते? 3 अंक
उत्तर देखिए
जीवनियों के अनुसार कबीर के गुरु रामानंद थे, पर इतिहासकार इसे स्वीकार नहीं करते। (पृष्ठ 162)
- ★कबीर के पद गुरु और सतगुरु शब्द किसी ख़ास व्यक्ति के लिए नहीं बरतते।
- ★इतिहासकार मानते हैं कि दोनों का समकालीन होना मुश्किल है, जब तक उन्हें बहुत लंबी आयु न दी जाए।
- इन जीवनियों से यह पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ियों के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी।
केस 12 — बाबा गुरु नानक और मीराबाई (पृष्ठ 162–164)
किताब का उदाहरण: बाबा गुरु नानक (1469–1539) का जन्म एक हिंदू व्यापारी परिवार में पंजाब के ननकाना गाँव में हुआ, जो रावी नदी के पास था। उन्होंने फ़ारसी पढ़ी और लेखाकार के काम का प्रशिक्षण लिया। मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी) मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी थीं। उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ। उनकी जीवनी उनके भजनों के आधार पर बनी, जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे।
1बाबा गुरु नानक का संदेश क्या था, और उन्होंने उसे किस रूप में रखा? 3 अंक
उत्तर देखिए
बाबा गुरु नानक ने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया और अपने विचार पंजाबी भाषा में शबद के रूप में रखे। (पृष्ठ 162–163)
- ★उन्होंने धर्म के बाहरी आडंबरों को नकारा: यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप। उन्होंने हिंदू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी नकारा।
- परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं है; उपासना का सरल उपाय था निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
- वे शबद अलग–अलग रागों में गाते थे और सेवक मरदाना रबाब बजाकर साथ देता था।
2नानक ने अनुयायियों को किस तरह संगठित किया? उनकी मृत्यु के बाद क्या हुआ? 3 अंक
उत्तर देखिए
उन्होंने अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया और सामुदायिक उपासना (संगत) के नियम बनाए, जहाँ सामूहिक पाठ होता था। (पृष्ठ 163)
- ★उन्होंने अपने अनुयायी अंगद को अपने बाद गुरुपद पर आसीन किया।
- किताब कहती है, “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे”।
- उनकी मृत्यु के बाद अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित करके अपने को हिंदू और मुसलमान, दोनों से अलग पहचाना।
3आदि ग्रंथ साहिब और गुरु ग्रंथ साहिब में क्या फ़र्क है? किसने क्या जोड़ा? 3 अंक
उत्तर देखिए
पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने आदि ग्रंथ साहिब में रचनाएँ संकलित कीं; सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने उसमें नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी जोड़ीं। (पृष्ठ 163)
- ★अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक, उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी इसमें संकलित की। इसे “गुरबानी” कहा जाता है।
- ★तेग बहादुर की रचनाएँ जुड़ने के बाद ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया।
- ! बाबा गुरु नानक को आदि ग्रंथ साहिब का संकलनकर्ता लिख देना: किताब के अनुसार संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया।
4मीराबाई ने परंपरागत दायित्वों के बारे में क्या किया? उसके बाद उनके जीवन में क्या मोड़ आया? 3 अंक
उत्तर देखिए
उन्होंने पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्व निभाने से इनकार किया और विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना। (पृष्ठ 163)
- ★ससुराल वालों ने उन्हें विष देने का प्रयत्न किया, पर वे राजभवन छोड़कर परिब्राजिका (घूम-घूमकर रहने वाली) संत बन गईं।
- किताब के अनुसार कुछ परंपराओं में मीरा के गुरु रैदास माने जाते हैं, जो एक चर्मकार थे (पृष्ठ 164; पृष्ठ 163 पर इन्हीं का नाम रविदास छपा है)।
5स्रोत 11 की इन दो पंक्तियों का भाव समझाइए: “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी,” और “म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।” 3 अंक
उत्तर देखिए
मीरा कहती हैं कि राणा जी उनका क्या कर लेंगे, वे तो गोविंद के गुण गाएँगी। (पृष्ठ 164)
- ★आगे की पंक्ति का भाव यह है कि राणा रूठें तो अपना गाँव रख लें, पर हरि रूठें तो वे मुरझा जाएँगी।
- एक दूसरे पद की अंतिम पंक्ति है, “मीरा कहै प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा।।”
- ! मीरा के आसपास अनुयायियों का समुदाय मान लेना: किताब के अनुसार उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई।
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1“अलवार और नयनार संत सब ब्राह्मण थे, और उनमें कोई स्त्री नहीं थी।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार संत अलग-अलग समुदायों से थे, और स्त्रियों की उपस्थिति इस परंपरा की संभवत: सबसे बड़ी विशिष्टता थी। (पृष्ठ 144)
- ★संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और कुछ उन जातियों से भी थे जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था।
- ★अंडाल अलवार स्त्री थीं और कराइक्काल अम्मइयार शिव भक्त स्त्री थीं।
- ब्राह्मण संत भी थे; स्रोत 1 के तोंदराडिप्पोडि ब्राह्मण अलवार थे।
2“चोल शासकों ने तमिल भक्त संतों के भजनों और प्रतिमाओं से दूरी रखी।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार चोल शासकों ने मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू करवाया और संतों की प्रतिमाएँ भी लगवाईं। (पृष्ठ 146)
- ★चोल शासकों ने भजनों का तवरम के रूप में संकलन करवाया।
- ★945 ईसवी के अभिलेख के अनुसार परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं, जिन्हें उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।
3“लिंगायत मृत्यु के बाद श्राद्ध करते थे और पुनर्जन्म के सिद्धांत को पूरी तरह मानते थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार लिंगायत श्राद्ध संस्कार नहीं करते और मृतकों को दफ़नाते हैं, और उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्न उठाए। (पृष्ठ 146–147)
- ★उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता।
- इसी के साथ किताब बताती है कि वे धर्मशास्त्रों में बताए श्राद्ध संस्कार का पालन नहीं करते।
4“आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में मुसलमानों के लिए ‘मुसलमान’ शब्द ही आम तौर पर मिलता है।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार इन ग्रंथों और अभिलेखों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं मिलता है। (पृष्ठ 151)
- ★लोगों को उनके जन्मस्थान से पहचाना जाता था: तुर्की मुसलमान तुरुष्क, तजाकिस्तान से आए लोग ताजिक, और फ़ारस के लोग पारसीक।
- तुर्क और अफ़गानों को शक और यवन भी कहा गया।
- म्लेच्छ इन प्रवासियों के लिए एक अधिक सामान्य शब्द था; इसका मतलब था कि वे वर्ण नियम नहीं मानते और ऐसी भाषाएँ बोलते हैं जो संस्कृत से नहीं निकलीं।
5“सिलसिला सूफ़ी संत की दरगाह को कहते हैं।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ जंज़ीर है; दरगाह पीर की मृत्यु के बाद मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बनती थी। (पृष्ठ 153)
- ★सिलसिला शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है।
- ज़्यादातर सिलसिलों के नाम उन्हें स्थापित करने वालों पर पड़े, जैसे कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर।
6“चिश्ती शेख शासकों की दी हुई हर भेंट और अनुदान ठुकरा देते थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार चिश्ती सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता, तो वे उसे स्वीकार करते थे। (पृष्ठ 158)
- ★सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी और दान संबंधी न्यास बनाए।
- ★चिश्ती दान में मिला धन जोड़ते नहीं थे; वे उसे खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर खर्च कर देते थे।
- स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने ज़मीन और बगीचों की भेंट नहीं ली (पृष्ठ 159)। उसी अंश की कहानी में शेख फ़रीदुद्दीन ने धन दरवेशों में बाँटने के लिए लिया, पर ज़मीन के पट्टे को उन लोगों को देने को कहा जिन्हें उसकी कामना हो।
7“कबीर के पदों में साफ़ लिखा है कि उनके गुरु रामानंद थे।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार कबीर के पद गुरु और सतगुरु शब्द किसी ख़ास व्यक्ति के लिए नहीं बरतते। (पृष्ठ 162)
- ★कबीर के गुरु रामानंद थे, यह बात बाद में लिखी जीवनियों में आती है; कबीर के अपने पदों में नहीं।
- इतिहासकार मानते हैं कि दोनों का समकालीन होना मुश्किल है, जब तक उन्हें बहुत लंबी आयु न दी जाए।
8“बाबा गुरु नानक ने नया धर्म चलाने के लिए आदि ग्रंथ साहिब का संकलन किया।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार आदि ग्रंथ साहिब का संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया, और बाबा गुरु नानक के बारे में किताब यह कहती है कि वे किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे। (पृष्ठ 163)
- ★किताब के शब्दों में, “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे”।
- गुरु ग्रंथ साहिब नाम तब पड़ा जब दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी इसमें जोड़ीं।
भाग ग — तुलना और वर्गीकरण
1तमिलनाडु के अलवार–नयनार और कर्नाटक के वीरशैवों की तुलना तालिका में कीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
| बात | अलवार और नयनार | वीरशैव (लिंगायत) |
|---|---|---|
| क्षेत्र और भाषा | तमिलनाडु; भजन तमिल में | कर्नाटक; वचन कन्नड़ में |
| काल | किताब के अनुसार प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग छठी शताब्दी का | बारहवीं शताब्दी |
| नेतृत्व | अलवार विष्णु भक्त, नयनार शिवभक्त | बासवन्ना (1106–68), ब्राह्मण और कलाचुरी राजा के मंत्री |
| जाति पर रुख | कुछ इतिहासकारों के अनुसार जाति और ब्राह्मणों की प्रभुता का विरोध; किताब इसे कुछ हद तक सत्य कहती है | जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध |
| आचरण | संतों के भजन मंदिर के अनुष्ठानों में गाए गए, प्रतिमाएँ पूजी गईं | श्राद्ध नहीं, दफ़नाना; वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह |
| राज्य से रिश्ता | चोल शासकों की मदद से बड़े शिव मंदिर बने | बासवन्ना कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे |
| पृष्ठ | 143–146 | 146–147 |
★कसौटी: अलवार–नयनार के बारे में किताब का नतीजा “कुछ हद तक” है; वीरशैवों के बारे में किताब श्राद्ध, पुनर्जन्म और विवाह जैसे आचरण गिनाती है (पृष्ठ 144, 146–147)।
2किताब के पृष्ठ 165 के बॉक्स में सूफ़ी परंपरा के चार तरह के ग्रंथ बताए गए हैं। इन्हें तालिका में रखिए। 4 अंक
| प्रकार | क्या है | किताब का उदाहरण | इतिहासकार को क्या मिलता है |
|---|---|---|---|
| प्रबंध पुस्तिका | |||
| मुलफुज़ात | |||
| मक्तुबात | |||
| तज़किरा | |||
| पृष्ठ |
उत्तर देखिए
| प्रकार | क्या है | किताब का उदाहरण | इतिहासकार को क्या मिलता है |
|---|---|---|---|
| प्रबंध पुस्तिका | सूफ़ी विचारों और आचारों पर ग्रंथ | कश्फ–उल–महजुब | उपमहाद्वीप के बाहर की परंपराओं ने भारत में सूफ़ी चिंतन को कैसे प्रभावित किया |
| मुलफुज़ात | सूफ़ी संतों की बातचीत | फवाइद–अल–फुआद (स्रोत 9 इसी से लिया गया) | शेखों की अनुमति से संकलित; उद्देश्य मुख्यत: उपदेशात्मक |
| मक्तुबात | लिखे हुए पत्रों का संकलन | शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) के पत्र | धार्मिक सत्य के अनुभव और अनुयायियों के जीवन पर टिप्पणी |
| तज़किरा | सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण | सियार–उल–औलिया (मुख्यत: चिश्ती संत); अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी (मृत्यु 1642) का अख्बार–उल–अखयार | बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय, फिर भी इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण |
| पृष्ठ | 165 | 165 | 165 |
★कसौटी: ग्रंथ का प्रकार उसके उद्देश्य से पहचानिए: विचार (प्रबंध पुस्तिका), बातचीत (मुलफुज़ात), पत्र (मक्तुबात), जीवनी-स्मरण (तज़किरा) (पृष्ठ 165)।
3कबीर और मीराबाई की रचनाएँ हम तक कैसे पहुँचीं, इसकी तुलना कीजिए। बाबा गुरु नानक को भी तालिका में रखिए। 4 अंक
| बात | कबीर | बाबा गुरु नानक | मीराबाई |
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| समय | |||
| रचना का रूप | |||
| हम तक कैसे पहुँचे | |||
| ईश्वर | |||
| पृष्ठ |
उत्तर देखिए
| बात | कबीर | बाबा गुरु नानक | मीराबाई |
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| समय | लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी | 1469–1539 | लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी |
| रचना का रूप | पद कई भाषाओं और बोलियों में, कुछ संत भाषा में; उलटबाँसी भी | पंजाबी में शबद, रागों में गाए गए | भजन, जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे |
| हम तक कैसे पहुँचे | कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, आदि ग्रंथ साहिब; संकलन उनकी मृत्यु के बहुत बाद के | अनुयायियों का समुदाय (संगत); पाँचवें गुरु ने आदि ग्रंथ साहिब में संकलित किया | जीवनी उनके भजनों के आधार पर बनी |
| ईश्वर | परम सत्य के कई नाम, कई परंपराओं से | निर्गुण; रब का कोई लिंग या आकार नहीं | कृष्ण, जिन्हें उन्होंने अपना एकमात्र पति माना |
| पृष्ठ | 160–162 | 162–163 | 163–164 |
★कसौटी: कबीर के संकलन उनकी मृत्यु के बहुत बाद बने, इसलिए कौन-से पद कबीर के हैं, यह कहना मुश्किल है; मीरा की जीवनी उनके उन भजनों के आधार पर बनी जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से चले (पृष्ठ 160, 163)।
भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि
1. मानचित्र पर छह जगहें (किताब का प्रश्न 10, पृष्ठ 168)
किताब का प्रश्न है कि भारत के मानचित्र पर 3 सूफ़ी स्थल और 3 मंदिर-स्थल (विष्णु, शिव और देवी से जुड़े) दिखाइए। अध्याय में ये जगहें आई हैं: सूफ़ी स्थल अजमेर (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह), दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया और दूसरे चिश्ती) और फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह); विष्णु से जुड़ी जगह पुरी (जगन्नाथ); शिव से जुड़ी जगहें चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम।
1भारत का एक खाली मानचित्र लीजिए या हाथ से बनाइए।
2तीन सूफ़ी स्थल चुनकर बिंदु लगाइए और नाम लिखिए।
3विष्णु और शिव से जुड़ा एक-एक स्थल चुनिए और दर्ज कीजिए।
4देवी से जुड़े मंदिर के लिए एटलस या अध्यापक की मदद लीजिए।
मानचित्र पर आपके चुने हुए बिंदु अध्याय की जगहों से मेल खाने चाहिए; सही बिंदु जाँचने के लिए ये बातें देखिए। (पृष्ठ 168)
- सूफ़ी स्थलों के लिए अजमेर, दिल्ली और फतेहपुर सीकरी काफ़ी हैं; किताब के पाठ में किसी देवी-मंदिर की जगह का नाम नहीं आता, इसलिए वह स्थल आपको बाहर से खोजना है।
- ! अजोधन और मुल्तान भी अध्याय में सूफ़ी स्थल हैं, पर किताब इन्हें पाकिस्तान में बताती है (पृष्ठ 154, 169), और लाहौर भी आज पाकिस्तान में है; भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाली जगहें लीजिए।
सीख: छह जगहें दो तरह की हैं: दरगाहें (सूफ़ी) और मंदिर (भक्ति और राज्य की मदद से बने)।
2. दो संतों का परिचय (किताब का प्रश्न 11, पृष्ठ 169)
किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) में अनुमानित काल के साथ शिक्षकों के नाम और क्षेत्र दिए हैं: जैसे लगभग 800–900 ईसवी में तमिलनाडु के नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल और तोंदराडिप्पोडी, और लगभग 1200–1300 ईसवी में महाराष्ट्र के ज्ञानदेव और मुक्ताबाई। किताब का नोट है कि कालावधियाँ अनुमानित काल हैं। जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं होतीं, पर बताती हैं कि अनुयायी अपने नेताओं को कैसे देखते थे (पृष्ठ 140)।
1काल-रेखा से दो नाम चुनिए: एक भक्त संत और एक सूफ़ी।
2हर एक के लिए चार खाने बनाइए: समय, क्षेत्र, मुख्य विचार, और जानकारी के स्रोत।
3स्रोतों में लिखिए कि संत की अपनी रचनाएँ, बाद की जीवनियाँ, मुलफुज़ात या तज़किरा में से क्या मिलता है (पृष्ठ 165)।
4अंत में लिखिए कि आपकी राय में वे क्यों महत्त्वपूर्ण हैं।
इस प्रश्न का कोई एक सही उत्तर नहीं है; आपका उत्तर आपके चुने दो नामों पर टिकेगा। उसे इस तरह परखिए। (पृष्ठ 169)
- समय के खाने में काल-रेखा का “लगभग” वाला काल ही लिखिए।
- स्रोतों के खाने में बताइए कि जानकारी रचना से मिली या बाद की जीवनी से।
सीख: किसी संत के बारे में जानकारी कितनी पक्की है, यह स्रोत के प्रकार पर निर्भर करता है।
3. समन्वय की दो प्रक्रियाओं का चार्ट (किताब पृष्ठ 141–143)
किताब के अनुसार देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में होती थी, और स्थानीय देवियों को मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता मिली। पुरी के जगन्नाथ की प्रतिमा स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे। बौद्ध देवी मारिची की मूर्ति (लगभग दसवीं शताब्दी, बिहार) को किताब अलग-अलग धार्मिक विश्वासों और क्रियाकलापों के एकीकरण का उदाहरण बताती है।
1कागज़ पर दो खाने बनाइए: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार, और दूसरों के विश्वासों को अपनाकर नया रूप देना।
2जगन्नाथ, स्थानीय देवियाँ और पौराणिक ग्रंथ, तीनों को उचित खाने में लिखिए।
3हर उदाहरण के आगे लिखिए कि स्थानीय बात क्या थी और बड़ी परंपरा में उसे कैसे जगह मिली।
4नीचे “महान” और “लघु” शब्दों के लिए एक पंक्ति में लिखिए कि इन्हें उद्धरण चिह्नों में क्यों लिखा जाता है।
आपका चार्ट इस तरह भरा होना चाहिए। (पृष्ठ 141–142)
- पौराणिक ग्रंथ पहले खाने में जाएँगे: सरल संस्कृत छंद, जिन्हें स्त्रियाँ और शूद्र भी समझ सकें।
- जगन्नाथ और स्थानीय देवियाँ दूसरे खाने में जाएँगी।
सीख: मेल दोनों तरफ़ से हुआ: ऊपर से भी और नीचे से भी, और इसीलिए इतिहासकार “महान” और “लघु” के बीच संवाद की बात करते हैं।
4. तीन मस्जिदों की तालिका (किताब पृष्ठ 151–152)
किताब बताती है कि सभी मस्जिदों में इमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन एक-सा है, जो मेहराब और मिम्बर से पता चलता है, पर छत और निर्माण का सामान अलग-अलग। तीन उदाहरण: केरल की तेरहवीं शताब्दी की मस्जिद (चित्र 6.9), शिखर के आकार की छत; मैमनसिंग (बांग्लादेश) की अतिया मस्जिद, 1609 (चित्र 6.10), ईंटों की बनी; श्रीनगर की शाह हमदान मस्जिद, 1395 (चित्र 6.11), कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला, जिसमें शिखर, नक्काशीदार छज्जे और पेपरमैशी की सजावट है।
1चार खाने की तालिका बनाइए: जगह, साल, सामग्री, ख़ास बात।
2तीनों मस्जिदों की पंक्तियाँ भरिए।
3तालिका के नीचे लिखिए कि तीनों में समान बात क्या है।
4फिर लिखिए कि फ़र्क कहाँ-कहाँ है।
आपकी तालिका की तीनों पंक्तियाँ किताब से इस तरह मिलनी चाहिए। (पृष्ठ 151–152)
- समान बात: मक्का की ओर अनुस्थापन; मेहराब और मिम्बर इसका संकेत हैं।
- फ़र्क: छत का आकार और निर्माण का सामान, यानी ईंट और लकड़ी जैसी स्थानीय चीज़ें।
सीख: एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के साथ मेल को किताब मस्जिदों की स्थापत्य कला में सबसे अच्छी तरह दिखा हुआ बताती है।
5. धार्मिक और राजनीतिक नेताओं के टकराव के स्रोत (किताब की चर्चा, पृष्ठ 159)
किताब पूछती है कि धार्मिक और राजनीतिक नेताओं के बीच टकराव के संभावित स्रोत क्या-क्या हो सकते हैं। अध्याय में इसके संकेत हैं: दोनों झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे; शेखों को आडंबरपूर्ण पदवियाँ दी जाती थीं, जैसे शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान–उल–मशेख (शेखों में सुल्तान) कहते थे; तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत बनाई तो उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकरा दी।
1ऊपर के संकेतों से तीन टकराव-स्रोत छाँटिए।
2स्रोत 9 को पढ़िए और लिखिए कि भेंट के मामले में शेख का रुख क्या था।
3अपनी राय की एक पंक्ति जोड़िए कि और कौन-सी चीज़ टकराव ला सकती थी।
आपके तीन स्रोत इस तरह के होने चाहिए। (पृष्ठ 158–159)
- तीन स्रोत: सत्ता जताने के आचार, आडंबरपूर्ण पदवियाँ, शरिया का सवाल।
- स्रोत 9 में शेख ने ज़मीन और बगीचों की भेंट नहीं ली।
सीख: टकराव के स्रोत किताब से मिलते हैं, पर उन्हें जोड़कर अपनी राय बनाना आपका काम है।
6. दो भक्तियाँ आमने-सामने: चरखानामा और जहाँआरा (किताब का किनारे का प्रश्न, पृष्ठ 157)
स्रोत 8 (चरखानामा) चरखे की धुन पर गीत है: रुई लेते हुए ज़िक्र–ए–जाली, रुई धुनते हुए ज़िक्र–ए–कल्बी, धागा फिरकी पर लपेटते हुए ज़िक्र–ए–आइनी; साँस के धागे “चौबीस हज़ार तक गिनें”, “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।” स्रोत 7 में जहाँआरा (1643) अजमेर में दरगाह पर “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लेती हैं, इतर छिड़कती हैं और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखती हैं।
1दो खाने बनाइए: “चरखानामा” और “जहाँआरा की ज़ियारत”।
2हर खाने में लिखिए: कौन, कहाँ, किस तरीक़े से।
3एक समानता की पंक्ति लिखिए।
4एक अंतर की पंक्ति लिखिए।
आपके दोनों खानों में ये बातें आनी चाहिए। (पृष्ठ 156–157)
- समानता: दोनों में पीर या शेख के प्रति भक्ति है।
- अंतर: चरखानामा में रोज़ का काम ही ज़िक्र बन जाता है; जहाँआरा की भक्ति शरीर के आचारों से दिखती है: सात फेरे, ज़मीन चूमना, नंगे पाँव चलना।
सीख: एक ही शेख या पीर के प्रति आदर घर के काम में भी दिख सकता है और तीर्थयात्रा में भी।
अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए
| आपके उत्तर में | तो |
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| स्रोत या आँकड़ा किताब से सही उठाया, उससे नतीजा निकाला और अपना कारण लिखा | उत्तर पूरा है। |
| किताब का हवाला दिया, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता है | हर हवाले के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात सिद्ध होती है। |
| “महान” परंपरा को श्रेष्ठ और “लघु” को कमतर लिखा | किताब के अनुसार विद्वान इन शब्दों के ऊँच-नीच वाले स्वर को नहीं मानते (पृष्ठ 141)। केस 1 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए। |
| सब अलवार–नयनार को जाति-विरोधी लिखा | यह कुछ इतिहासकारों का मत है, जिसे किताब कुछ हद तक सत्य मानती है (पृष्ठ 144)। केस 2 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति को ईसा से पहले का लिखा | किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) की पहली पंक्ति में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं: लगभग 500–800 ईसवी। केस 2 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| बौद्ध-जैन विरोध को सभी संतों का बताया | किताब इसे ख़ास तौर पर नयनारों की रचनाओं में बताती है, और कारण के लिए इतिहासकारों का मत देती है (पृष्ठ 145)। केस 4 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| लिंगायतों के बारे में श्राद्ध लिखा | श्राद्ध नहीं होता, मृतकों को दफ़नाया जाता है (पृष्ठ 147)। केस 5 का प्रश्न 1 और भाग ख का प्रश्न 3 फिर से कीजिए। |
| “मुसलमान” शब्द हमेशा से चला आ रहा नाम लिखा | आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के ग्रंथों में लोग जन्मस्थान से पहचाने जाते थे (पृष्ठ 151)। भाग ख का प्रश्न 4 फिर से कीजिए। |
| सूफ़ीवाद को इस्लामी ग्रंथों का शब्द लिखा | यह उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ़ आता है (पृष्ठ 152)। केस 8 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| सिलसिला को दरगाह लिखा | सिलसिला का अर्थ जंज़ीर है (पृष्ठ 153)। भाग ख का प्रश्न 5 फिर से कीजिए। |
| चिश्तियों को हर अनुदान ठुकराने वाला लिखा | वे बिना माँगी भेंट स्वीकार करते थे, पर जोड़ते नहीं थे (पृष्ठ 158)। केस 10 का प्रश्न 4 और भाग ख का प्रश्न 6 फिर से कीजिए। |
| रामानंद को कबीर का पक्का गुरु लिखा | यह बात जीवनियों की है; कबीर के पद किसी ख़ास व्यक्ति को गुरु नहीं कहते (पृष्ठ 162)। केस 11 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए। |
| आदि ग्रंथ साहिब का संकलन बाबा गुरु नानक का लिखा | संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया (पृष्ठ 163)। केस 12 का प्रश्न 3 और भाग ख का प्रश्न 8 फिर से कीजिए। |
| मीराबाई को किसी मंडली की संस्थापक लिखा | उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई (पृष्ठ 164)। केस 12 का प्रश्न 5 फिर से कीजिए। |
इनमें से जिस पंक्ति में आपका उत्तर बैठता है, उसमें बताया प्रश्न फिर से हल कीजिए और अपना उत्तर नीचे दिए उत्तर से मिलाइए।