यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं।
यह अध्याय लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक धार्मिक विश्वासों में आए बदलाव और श्रद्धा ग्रंथों की बात करता है। आठवीं से अठारहवीं सदी को समझने के लिए इतिहासकार संत कवियों की रचनाएँ पढ़ते हैं। संतों ने ये रचनाएँ लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से कहीं, और उनके अनुयायियों ने इन्हें संतों की मृत्यु के बाद संकलित किया। अध्याय तमिलनाडु के अलवार और नयनार संतों से शुरू होता है, फिर कर्नाटक के वीरशैव, उत्तर भारत के बदलाव, इस्लामी परंपराएँ, सूफ़ी सिलसिले (ख़ास तौर पर चिश्ती) और कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई तक जाता है। अंत में यह समझाता है कि इतिहासकार इन परंपराओं का इतिहास किन स्रोतों से और किन मुश्किलों के बीच बनाते हैं।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 168–169) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
- काल: लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक।
- इस अध्याय के नए स्रोत: संत कवियों की रचनाएँ, और अनुयायियों की लिखी उनकी जीवनियाँ।
2. ज़रूरी शब्द★
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| “महान” और “लघु” परंपरा | समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्द: पुरोहितों और राजाओं जैसे प्रभुत्वशाली वर्गों के अनुष्ठान (“महान”) और किसानों के अपने लोकाचार (“लघु”) | 141 |
| समन्वय | अलग-अलग पूजा प्रणालियों और विश्वासों का आपस में मिलकर एक होना | 141 |
| तांत्रिक | देवी की उपासना की वह पद्धति जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे और अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण का भेद नहीं माना जाता था | 142 |
| सगुण | विशेषण सहित: शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियाँ, जिनकी मूर्त रूप में उपासना होती थी | 143 |
| निर्गुण | विशेषण विहीन: अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना | 143 |
| अलवार | तमिलनाडु के विष्णु भक्त संत | 143 |
| नयनार | तमिलनाडु के शिव भक्त संत | 143 |
| चतुर्वेदी | चारों वेदों के ज्ञाता ब्राह्मण | 144 |
| नलयिरादिव्यप्रबंधम् | बारह अलवारों की रचनाओं का संकलन (“चार हज़ार पावन रचनाएँ”), जिसे तमिल वेद कहा गया | 144 |
| तवरम | अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताओं का संकलन, संगीत के आधार पर बँटा हुआ | 144 |
| वीरशैव, लिंगायत | बासवन्ना के अनुयायी: वीरशैव यानी शिव के वीर, लिंगायत यानी लिंग धारण करने वाले | 146 |
| जंगम | यायावर (घूमते रहने वाले) भिक्षु, जिनका लिंगायत आदर करते हैं | 147 |
| वचन | वीरशैव स्त्री-पुरुषों की कन्नड़ भाषा में रची रचनाएँ | 147 |
| उलमा | आलिम का बहुवचन: इस्लाम धर्म के ज्ञाता, जो धार्मिक, कानूनी और अध्यापन की ज़िम्मेदारी निभाते थे | 148 |
| शरिया | मुसलमान समुदाय को राह दिखाने वाला कानून: कुरान शरीफ़, हदीस, क़ियास और इजमा पर आधारित | 149 |
| हदीस | पैगम्बर साहब से जुड़ी परंपराएँ, उनके याद किए गए शब्द और क्रियाकलाप | 149 |
| ज़िम्मी | संरक्षित श्रेणी: इस्लामी शासन में रहने वाले वे लोग जो उद्घटित धर्मग्रंथ मानते थे, जैसे यहूदी और ईसाई; भारत में हिंदू भी | 149 |
| जज़िया | वह कर जिसे चुकाकर ज़िम्मी मुसलमान शासकों से संरक्षण के अधिकारी बनते थे | 149 |
| जीनन | खोजा इस्माइली समुदाय के राग में बँधे भक्ति गीत (शब्द संस्कृत के ज्ञान से बना) | 150 |
| मातृगृहता | विवाह के बाद स्त्री का अपनी संतान के साथ मायके में ही रहना, जहाँ पति आकर रह सकता है | 151 |
| मेहराब, मिम्बर | मस्जिद में प्रार्थना का आला और व्यासपीठ, जिनसे इमारत का मक्का की ओर होना पता चलता है | 151 |
| तसव्वुफ़ | इस्लामी ग्रंथों में सूफ़ीवाद के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द (“सूफ़ीवाद” उन्नीसवीं शताब्दी का अंग्रेज़ी शब्द है) | 152 |
| ख़ानक़ाह | सूफ़ियों का संगठित समुदाय और उनके रहने-उपासना की जगह | 152 |
| शेख, पीर, मुर्शीद | ख़ानक़ाह का नियंत्रण करने वाले गुरु (शेख अरबी शब्द है, पीर और मुर्शीद फारसी) | 152 |
| मुरीद | सूफ़ी गुरु के अनुयायी | 152 |
| खलीफ़ा | शेख का नियुक्त किया हुआ वारिस | 152 |
| सिलसिला | शाब्दिक अर्थ जंज़ीर: शेख और मुरीद के बीच का निरंतर रिश्ता, जिसकी पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है | 153 |
| दरगाह | फारसी में दरबार: पीर की मृत्यु के बाद उनकी मज़ार, जो मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी | 153 |
| ज़ियारत | दरगाह पर श्रद्धा से जाना | 153 |
| उर्स | शाब्दिक अर्थ विवाह: पीर की बरसी, जब माना जाता है कि पीर की आत्मा ईश्वर से मिली | 153 |
| वली (बहुवचन औलिया) | ईश्वर का मित्र: वह सूफ़ी जो अल्लाह के नज़दीक होने का दावा करता था और उनसे मिली बरकत से करामात करने की शक्ति रखता था | 153 |
| बा–शरिया, बे–शरिया | शरिया का पालन करने वाले सूफ़ी, और शरिया की अवहेलना करने वाले रहस्यवादी | 153 |
| कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी | ख़ानक़ाह को छोड़कर फकीर की ज़िंदगी बिताने वाले रहस्यवादियों के नाम | 153 |
| लंगर, फ़ुतूह | ख़ानक़ाह की सामुदायिक रसोई, जो फ़ुतूह यानी बिना माँगी खैर पर चलती थी | 154 |
| बरकत | सूफ़ी संत का आध्यात्मिक आशीर्वाद | 154 |
| ज़िक्र | ईश्वर का नाम-जाप | 156 |
| समा | शाब्दिक अर्थ श्रवण करना: आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल | 156 |
| कौल | अरबी शब्द, अर्थ कहावत: कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाने वाला हिस्सा | 157 |
| हिंदवी | वह भाषा जिसमें दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग बातचीत करते थे | 157 |
| मसनवी | सूफ़ियों की लंबी कविताएँ, जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया | 157 |
| इनाम | कर मुक्त भूमि, जो सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को दी | 158 |
| बानी | संत की रचनाओं का संग्रह (जैसे कबीर की बानी) | 160 |
| उलटबाँसी | उलटी कही उक्तियाँ, जिनमें रोज़ का अर्थ उलट दिया जाता है | 160 |
| शबद | बाबा गुरु नानक के पंजाबी भजन, जो वे अलग-अलग रागों में गाते थे | 163 |
| संगत | सामुदायिक उपासना, जहाँ मिलकर पाठ होता था | 163 |
| गुरबानी | आदि ग्रंथ साहिब में संकलित बानी | 163 |
| खालसा पंथ | पवित्रों की सेना: गुरु गोबिन्द सिंह ने इसकी नींव डाली | 163 |
| मुलफुज़ात | सूफ़ी संतों की बातचीत के संग्रह | 165 |
| मक्तुबात | सूफ़ी संतों के लिखे पत्रों के संकलन | 165 |
| तज़किरा | सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण | 165 |
3. पूजा प्रणालियों का मेल और टकराव★
किताब का भाग 1 (धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट), पृष्ठ 140–142 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 9
अध्याय की शुरुआत: नए स्रोत
- पहले के स्रोत: अध्याय 4 में देखा कि पहली सहस्राब्दी के मध्य तक उपमहाद्वीप में स्तूप, विहार और मंदिर जैसी धार्मिक इमारतें दिखने लगी थीं। दूसरे विश्वासों का पता पुराण जैसी साहित्यिक परंपराओं से लगता है।
- संत कवियों की रचनाएँ: लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी के नए साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ हैं। संतों ने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपनी बात कही। ये रचनाएँ अधिकतर संगीतबद्ध थीं और संतों की मृत्यु के बाद अनुयायियों ने इन्हें संकलित किया।
- किताब कहती है “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”: अनुयायियों की पीढ़ियों ने संदेश को आगे बढ़ाया और कुछ विचार बदले या छोड़ दिए।
- इसलिए “इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।”
- जीवनियाँ: इतिहासकार अनुयायियों की लिखी जीवनियों का भी इस्तेमाल करते हैं। ये अक्षरश: सत्य नहीं हैं, फिर भी बताती हैं कि अनुयायी इन नेताओं को कैसे देखते थे।
- मणिक्वचक्कार: शिव के अनुयायी थे और तमिल में भक्तिगान रचते थे।
विष्णु, शिव और देवी (भाग 1)
- क्या बदला: लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी की संभवत: सबसे बड़ी विशेषता यह है कि साहित्य और मूर्तिकला, दोनों में कई देवी-देवता अधिक दिखाई देने लगते हैं। विष्णु, शिव और देवी की उपासना जारी रही और फैली।
पूजा प्रणालियों का समन्वय (भाग 1.1)
इतिहासकार कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं:
- पहली प्रक्रिया: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार। पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और संरक्षण सरल संस्कृत छंदों में हुआ, “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे”।
- दूसरी प्रक्रिया: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे सामाजिक वर्गों के विश्वासों और आचरणों को स्वीकार किया और उन्हें नया रूप दिया।
- समाजशास्त्रियों का मत: कई परंपराएँ “महान” संस्कृत–पौराणिक परिपाटी और “लघु” परंपरा के बीच लगातार चलते संवाद का नतीजा हैं।
- पुरी (उड़ीसा) का उदाहरण: बारहवीं शताब्दी तक वहाँ के मुख्य देवता को जगन्नाथ (“शाब्दिक अर्थ में संपूर्ण विश्व का स्वामी”) के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया।
- जगन्नाथ के साथ उनकी बहन सुभद्रा और भाई बलराम हैं।
- यह एक स्थानीय देवता थे, जिनकी प्रतिमा स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे और आज भी बनाते हैं। यह रूप दूसरी जगहों के विष्णु से बहुत अलग है।
- देवियों का उदाहरण: देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में होती थी। स्थानीय देवियों को मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता मिली: कहीं विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के रूप में, कहीं शिव की पत्नी पार्वती के रूप में।
- “महान” और “लघु” परंपराएँ (बॉक्स, पृष्ठ 141): ये बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्द हैं, जो उन्होंने एक किसान समाज के बारे में कहे।
- किसान पुरोहितों और राजाओं जैसे प्रभुत्वशाली वर्गों के अनुष्ठानों की नकल करते थे (“महान”), और साथ ही अपने दूसरे लोकाचार भी मानते थे (“लघु”)।
- दोनों परंपराएँ आपसी लेन-देन से बदलती रहीं।
- विद्वान इन शब्दों में छिपे ऊँच-नीच के भाव को नहीं मानते, इसलिए इन्हें उद्धरण चिह्नों में लिखा जाता है।
समन्वय की दो प्रक्रियाएँ
भेद और संघर्ष (भाग 1.2)
- तांत्रिक पूजा पद्धति: देवी की उपासना अधिकतर तांत्रिक नाम से जानी जाती है।
- यह उपमहाद्वीप में बहुत फैली हुई थी। इसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे, और अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण के भेद नहीं माने जाते थे।
- इसके विचारों ने शैव और बौद्ध दर्शन को प्रभावित किया, ख़ास तौर पर उपमहाद्वीप के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी भागों में।
- “हिंदू” नाम: अगली सहस्राब्दी में इन सबको “हिंदू” के अंतर्गत रखा गया।
- वैदिक देवता: अग्नि, इंद्र और सोम पूरी तरह गौण हो गए। वेदों में विष्णु, शिव और देवी की झलक मिलती है, पर पौराणिक कथाओं जैसी नहीं। फिर भी, किताब के शब्दों में, “किंतु इन असंगतियों के बावजूद वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा।”
- टकराव कहाँ थे:
- वैदिक परंपरा के प्रशंसक उन आचरणों की निंदा करते थे जो मंत्रों के साथ यज्ञ से हटकर थे।
- तांत्रिक उपासक वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे।
- भक्त अपने इष्ट विष्णु या शिव को सर्वोच्च बताते थे।
- बौद्ध और जैन धर्म से संबंध भी अक्सर तनाव भरे थे, “यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे।”
- मारिची: बौद्ध देवी मारिची की एक मूर्ति (लगभग दसवीं शताब्दी, बिहार) को किताब अलग-अलग धार्मिक विश्वासों और क्रियाकलापों के एकीकरण की प्रक्रिया का उदाहरण बताती है।
4. दक्षिण के भक्त संत: अलवार और नयनार★★
किताब का भाग 2 (उपासना की कविताएँ), पृष्ठ 143–146 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 7, 8, 9
प्रारंभिक भक्ति परंपरा (भाग 2)
- पुरानी परंपरा: अध्याय के काल (लगभग आठवीं सदी) से पहले ही भक्ति उपासना की परंपरा लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी थी। इसमें मंदिर में इष्टदेव की पूजा से लेकर प्रेम में डूब जाने तक कई रूप थे। रचनाएँ गाना या उनका पाठ करना इसका हिस्सा था, ख़ास तौर पर वैष्णव और शैव संप्रदायों में।
- संत कवि नेता बने: उनके आसपास भक्तों के समुदाय बने।
- ब्राह्मण और दूसरे वर्ग: ब्राह्मण अक्सर देवताओं और भक्तों के बीच महत्त्वपूर्ण बिचौलिए बने रहे, पर इन परंपराओं ने स्त्रियों और “निम्न वर्णों” को भी स्वीकार किया।
- विविधता: इस परंपरा की एक और विशेषता इसकी विविधता है।
- दो तरह की भक्ति: धर्म के इतिहासकार भक्ति को दो भागों में बाँटते हैं:
- सगुण (विशेषण सहित): शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियाँ, जिनकी मूर्त रूप में उपासना होती थी।
- निर्गुण (विशेषण विहीन): अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना।
तमिलनाडु के अलवार और नयनार संत (भाग 2.1)
- शुरुआत: किताब के शब्दों में, “प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।”
- कैसे फैला: ये संत एक जगह से दूसरी जगह घूमते हुए तमिल में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे।
- तीर्थ बने: जिन जगहों को इन्होंने इष्ट का निवास बताया, वहाँ बाद में बड़े मंदिर बने और वे तीर्थस्थल बन गईं।
- मंदिरों में जगह: संतों के भजन मंदिरों के अनुष्ठानों में गाए जाने लगे और संतों की प्रतिमाओं की भी पूजा होने लगी।
जाति के प्रति दृष्टिकोण (भाग 2.2)
- इतिहासकारों का एक मत: “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।”
- किताब के अनुसार यह बात कुछ हद तक सत्य प्रतीत होती है: ये संत अलग-अलग समुदायों से थे: ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान, और कुछ उन जातियों से भी जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था।
- वेदों जितनी महत्त्वपूर्ण रचनाएँ: इनकी रचनाओं को वेदों जितना महत्त्वपूर्ण बताया गया। अलवारों के संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् को तमिल वेद कहा गया, यानी ब्राह्मणों के प्रिय चार संस्कृत वेदों जितना महत्त्वपूर्ण।
- स्रोत 1 (चतुर्वेदी और “अस्पृश्य”): ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु उन चतुर्वेदियों से अधिक उन “दासों” को पसंद करते हैं “जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।”
- स्रोत 2 (शास्त्र या भक्ति): नयनार अप्पार शास्त्र उद्धृत करने वालों से पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?” वे कहते हैं कि केवल मारपेरू के स्वामी (तंजावुर ज़िले के मारपेरू में बसे शिव) के आगे नतमस्तक होइए।
स्त्री भक्त (भाग 2.3)
- सबसे बड़ी विशेषता: “संभवत: इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी।”
- अंडाल: अलवार स्त्री, जिनके गीत तब भी गाए जाते थे और आज भी गाए जाते हैं। वे अपने को विष्णु की प्रेयसी मानती थीं।
- कराइक्काल अम्मइयार: शिव भक्त स्त्री, जिन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया। उनकी रचनाएँ नयनार परंपरा में सुरक्षित रहीं।
- स्रोत 3 (“एक राक्षसी?”) में वे अपने को राक्षसी के रूप में दिखाती हैं: फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश, आगे निकले दाँत, वन में चीखती हुई। वे कहती हैं कि यह वन “जो हमारे पिता (शिव) का घर है”।
- पितृसत्ता को चुनौती: इन स्त्रियों ने सामाजिक दायित्व छोड़े, पर किसी दूसरी व्यवस्था या भिक्षुणी समुदाय में शामिल नहीं हुईं। किताब कहती है, “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।”
- भक्ति साहित्य का संकलन (बॉक्स, पृष्ठ 144):
- दसवीं शताब्दी तक बारह अलवारों की रचनाओं का संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् (“चार हज़ार पावन रचनाएँ”) बन गया।
- दसवीं शताब्दी में ही अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताएँ तवरम में रखी गईं, जिनका वर्गीकरण संगीत के आधार पर हुआ।
राज्य के साथ संबंध (भाग 2.4)
- राज्यों का उदय: अध्याय 2 में देखा कि पहली सहस्राब्दी ईसवी की शुरुआत में तमिल क्षेत्र में कई सरदारियाँ थीं। सहस्राब्दी के दूसरे भाग में राज्य बने, जिनमें पल्लव और पांड्य (छठी से नवीं शताब्दी ईसवी) भी थे।
- बौद्ध और जैन धर्म: ये सदियों से इस क्षेत्र में थे और इन्हें व्यापारियों और शिल्पकारों का संरक्षण मिलता था, पर राजकीय संरक्षण कभी-कभी ही मिला।
- भजनों का एक मुख्य विषय: तमिल भक्ति भजनों का एक मुख्य विषय बौद्ध और जैन धर्म का विरोध है, ख़ास तौर पर नयनारों की रचनाओं में। इतिहासकार इसका कारण राजकीय अनुदान पाने की होड़ बताते हैं।
- चोल सम्राट (नवीं से तेरहवीं शताब्दी): इन्होंने ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा का समर्थन किया और विष्णु और शिव के मंदिरों के लिए भूमि–अनुदान दिए।
- चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के बड़े शिव मंदिर चोल शासकों की मदद से बने।
- चोल शासकों के समय शिव की कांस्य प्रतिमाएँ भी बनीं। किताब कहती है, “स्पष्ट है कि नयनार संतों का दर्शन शिल्पकारों के लिए प्रेरणा बना।”
- शासकों को संतों का साथ क्यों चाहिए था: वेल्लाल किसान इन संतों का आदर करते थे, इसलिए शासक भी उनका समर्थन चाहते थे। चोल शासक दैवीय समर्थन का दावा करते थे और पत्थर और धातु की मूर्तियों वाले मंदिर बनवाते थे।
- तवरम और प्रतिमाएँ: चोल शासकों ने मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू करवाया और उनका तवरम के रूप में संकलन करवाया।
- 945 ईसवी के एक अभिलेख से पता चलता है कि चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
- इन प्रतिमाओं को उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।
5. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा★★
किताब का भाग 3, पृष्ठ 146–147 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 8, 9
- शुरुआत: बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नया आंदोलन उभरा, जिसका नेतृत्व बासवन्ना (1106–68) नाम के एक ब्राह्मण ने किया। वे एक कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे।
- नाम: उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।
- लिंगायत समुदाय आज भी इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण है। वे शिव की उपासना लिंग के रूप में करते हैं।
- पुरुष बाएँ कंधे पर चाँदी के एक पिटारे में छोटा लिंग धारण करते हैं।
- वे जंगम, यानी यायावर भिक्षुओं, का आदर करते हैं।
- मृत्यु और अनुष्ठान: लिंगायतों का मानना है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता। इसलिए वे धर्मशास्त्रों में बताए श्राद्ध संस्कार नहीं करते और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं।
- जाति पर: लिंगायतों ने जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध किया। उन्होंने पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी प्रश्न उठाए।
- इसलिए ब्राह्मणीय व्यवस्था में जिन समुदायों को नीचा स्थान मिला था, वे इनके अनुयायी बने।
- धर्मशास्त्रों से हटकर: लिंगायतों ने वे आचरण अपनाए जिन्हें धर्मशास्त्र नहीं मानते थे, जैसे वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह।
- वचन: किताब कहती है, “वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।”
- स्रोत 4 (अनुष्ठान और यथार्थ संसार): बासवन्ना के इस वचन में लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं पर असली साँप को मारने को कहते हैं; खा सकने वाले देवता के सेवक को भगा देते हैं पर न खा सकने वाली प्रतिमा को व्यंजन परोसते हैं।
जाति और कर्मकांड पर दक्षिण के भक्त
- संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान, और "अस्पृश्य" मानी गई कुछ जातियों से
- रचनाओं को वेदों जितना महत्त्वपूर्ण बताया
- कुछ इतिहासकारों के अनुसार जाति प्रथा और ब्राह्मणों की प्रभुता का विरोध (किताब के अनुसार कुछ हद तक सत्य)
- जाति का और कुछ समुदायों को "दूषित" मानने का विरोध
- पुनर्जन्म पर प्रश्न; श्राद्ध नहीं
- वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह को अपनाया
6. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान★
किताब का भाग 4, पृष्ठ 147–148 · प्रश्नावली में: प्रश्न 8
- नए धार्मिक विकास (बॉक्स, पृष्ठ 147): बीच की शताब्दियों में दो मुख्य विकास हुए।
- तमिल भक्तों के (ख़ास तौर पर वैष्णव) विचार संस्कृत परंपरा में अपनाए गए; इसका नतीजा भागवत पुराण है।
- तेरहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में भक्ति का विकास हुआ।
- उत्तर भारत के मंदिर: यहाँ विष्णु और शिव की उपासना शासकों की मदद से बने मंदिरों में होती थी। पर इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलीं।
- कुछ इतिहासकारों का मत: उत्तरी भारत में चौदहवीं शताब्दी तक का यह वह दौर था जब अनेक राजपूत राज्य उभरे। इनमें ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था और वे ऐहिक और अनुष्ठान, दोनों तरह के काम करते थे। उनकी प्रभुता को सीधी चुनौती शायद ही किसी ने दी।
- नए नेता: उत्तरी भारत में रूढ़िवादी ब्राह्मणीय ढाँचे से बाहर के नेता भी प्रभाव पा रहे थे: नाथ, जोगी और सिद्ध।
- इनमें से कई शिल्पी समुदायों से थे, जिनमें जुलाहे भी थे।
- संगठित शिल्प उत्पादन के बढ़ने के साथ इनका महत्त्व बढ़ा। शहरी केंद्रों के विकास और मध्य और पश्चिम एशिया से व्यापार के कारण शिल्प की वस्तुओं की माँग बढ़ी थी।
- इन नेताओं ने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और लोगों की भाषाओं में बात की, जो आगे चलकर आज की भाषाओं के रूप में विकसित हुईं।
- फिर भी ये शासक वर्ग का समर्थन नहीं पा सके।
- तुर्कों का आगमन: इसका चरम दिल्ली सल्तनत (तेरहवीं शताब्दी) की स्थापना थी, जिसने राजपूत राज्यों और उनसे जुड़े ब्राह्मणों को कमज़ोर किया। किताब के शब्दों में, “सूफ़ियों का आगमन (अनुभाग 6) इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।”
7. इस्लामी परंपराएँ★★
किताब का भाग 5 (दुशाले के नए ताने-बाने: इस्लामी परंपराएँ), पृष्ठ 148–152 · प्रश्नावली में: प्रश्न 2, 9
- संपर्क पुराने थे: प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए, और मध्य एशिया से लोग देश के उत्तर–पश्चिम प्रांतों में आकर बसे। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उद्भव के बाद ये क्षेत्र उस संसार का हिस्सा बने जिसे अकसर इस्लामी विश्व कहा जाता है।
शासकों और शासितों के धार्मिक विश्वास (भाग 5.1)
- 711 ईसवी: अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीतकर उसे खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया।
- दिल्ली सल्तनत (लगभग तेरहवीं शताब्दी ईसवी): तुर्क और अफगानों ने इसकी नींव रखी, और समय के साथ इसकी सीमा दक्कन और दूसरे भागों तक फैली।
- बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म था। सोलहवीं शताब्दी में मुगल सल्तनत बनने पर भी यह बना रहा।
- अठारहवीं शताब्दी में उभरे कई क्षेत्रीय राज्यों के शासक भी इस्लाम मानने वाले थे।
- उलमा (बॉक्स, पृष्ठ 148): आलिम का बहुवचन। ये इस्लाम धर्म के ज्ञाता थे और धार्मिक, कानूनी और अध्यापन की ज़िम्मेदारी निभाते थे।
- सिद्धांत और हकीकत: सिद्धांत में मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना था, और उलमा से अपेक्षा थी कि वे शासन में शरिया का अमल सुनिश्चित करवाएँगे। पर उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी, क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम मानने वाली नहीं थी।
- शरिया (बॉक्स, पृष्ठ 149): मुसलमान समुदाय को राह दिखाने वाला कानून, जो कुरान शरीफ़ और हदीस पर आधारित है। इस्लाम अरब क्षेत्र से बाहर फैला, जहाँ आचार–व्यवहार अलग थे, तो क़ियास (सदृशता के आधार पर तर्क) और इजमा (समुदाय की सहमति) को भी कानून का स्रोत माना जाने लगा।
- ज़िम्मी: संरक्षित श्रेणी। ये उद्घाटित धर्मग्रंथ मानने वाले लोग थे, जैसे इस्लामी शासकों के क्षेत्र में रहने वाले यहूदी और ईसाई। ये जज़िया कर चुकाकर संरक्षण के अधिकारी बनते थे। भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया।
- मुगल बादशाह: वे अपने को केवल मुसलमानों का नहीं, सारे समुदायों का बादशाह मानते थे (अध्याय 9)।
- लचीली नीति: बहुत से शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को भूमि अनुदान और कर की छूट दी, और गैर–मुसलमान धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धा दिखाई। ऐसे अनुदान अकबर और औरंगज़ेब समेत अनेक मुगल बादशाहों ने दिए।
- स्रोत 5 (खम्बात का गिरजाघर): अकबर का 1598 का फ़रमान। यीशु की मुकद्दस जमात के पादरी खम्बायत में इबादत के लिए गिरजाघर बनाना चाहते थे। फ़रमान कहता है कि “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ और उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें जिससे वे अपनी इबादत कर सकें।”
- स्रोत 6 (जोगी के प्रति श्रद्धा): 1661–62 में औरंगज़ेब का एक जोगी, गुरु आनंद नाथ, को लिखा पत्र। बादशाह ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”
- मुग़ल चित्र में: एक मुग़ल चित्र बादशाह जहाँगीर को एक जोगी के साथ दिखाता है।
लोक प्रचलन में इस्लाम (भाग 5.2)
- किसके बीच फैला: इस्लाम के आने के बाद के बदलाव शासक वर्ग तक सीमित नहीं रहे। वे पूरे उपमहाद्वीप में किसान, शिल्पी, योद्धा और व्यापारी जैसे समुदायों के बीच फैले।
- पाँच मुख्य ‘बातें’: इस्लाम कबूल करने वालों ने सिद्धांत में ये बातें मानीं:
- अल्लाह एकमात्र ईश्वर है और पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत (शाहद) हैं;
- दिन में पाँच बार नमाज़;
- खैरात (ज़कात) बाँटना;
- रमज़ान के महीने में रोज़ा;
- हज के लिए मक्का जाना।
- व्यवहार में भिन्नता: सांप्रदायिक (शिया, सुन्नी) कारणों से और स्थानीय लोकाचारों के असर से धर्मांतरित लोगों के व्यवहार अलग-अलग थे।
- खोजा इस्माइली (शिया): इन्होंने कुरान के विचार कहने के लिए देशी साहित्यिक विधा अपनाई। जीनन नाम के भक्ति गीत राग में बँधे थे और पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में दैनिक प्रार्थना के समय गाए जाते थे।
- खोजकी लिपि में लिखे जाने से पहले जीनन मौखिक रूप से आगे बढ़ते थे। खोजकी लिपि स्थानीय लंडा (व्यापारियों की संक्षिप्त लिपि) से निकली है।
- मालाबार तट (केरल): यहाँ बसे अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा अपनाई, और मातृकुलीयता (अध्याय 3) और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार भी।
- मस्जिदें: किताब कहती है, “एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।”
मस्जिद: सार्वभौमिक और स्थानीय
- स्थानीय: छत और निर्माण का सामान
समुदायों के नाम (भाग 5.3)
- “हिंदू” और “मुसलमान”: हम इन्हें धार्मिक समुदायों के पक्के नाम मान लेते हैं, पर बहुत समय तक इन शब्दों का चलन नहीं था। आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं मिलता है।
- जन्मस्थान से नाम: लोगों को उनके जन्मस्थान से पहचाना जाता था:
- तुर्की मुसलमान: तुरुष्क;
- तजाकिस्तान से आए लोग: ताजिक;
- फारस के लोग: पारसीक।
- पुराने नाम नए लोगों पर: तुर्क और अफ़गानों को शक (अध्याय 2 व 3) और यवन (जो ग्रीक लोगों के लिए इस्तेमाल होता था) भी कहा गया।
- म्लेच्छ: इन प्रवासियों के लिए एक अधिक सामान्य शब्द। इसका मतलब था कि वे वर्ण नियम नहीं मानते और ऐसी भाषाएँ बोलते हैं जो संस्कृत से नहीं निकलीं। इन शब्दों में हीनभावना थी, पर इन्हें हिंदुओं के विरोधी किसी अलग मुसलमान समुदाय के लिए शायद ही इस्तेमाल किया गया।
- ‘हिंदू’ शब्द: अध्याय 5 में देखा कि यह शब्द कई तरह से इस्तेमाल होता था, केवल धार्मिक समुदाय के अर्थ में नहीं।
8. सूफ़ीमत का विकास★★
किताब का भाग 6, पृष्ठ 152–153 · प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 6
- शुरुआत: इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। यह धार्मिक और राजनीतिक संस्था के रूप में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था। इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा।
- किसकी आलोचना की: रूढ़िवादी परिभाषाओं की, और धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की।
- किस पर बल दिया: मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर। उन्होंने पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल बताकर उनका अनुसरण करने की सीख दी, और कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
- सूफ़ीवाद और तसव्वुफ़ (बॉक्स, पृष्ठ 152): “सूफ़ीवाद” उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया एक अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए तसव्वुफ़ शब्द आता है। इसके निकलने के तीन मत हैं:
- ‘सूफ़’ यानी ऊन, उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा जो सूफ़ी पहनते थे;
- ‘सफ़ा’ यानी साफ़;
- ‘सफ़ा’, पैगम्बर की मस्जिद के बाहर का वह चबूतरा जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली धर्म के बारे में जानने के लिए इकट्ठी होती थी।
ख़ानक़ाह और सिलसिला (भाग 6.1)
- पूरा आंदोलन: ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था, जिसका अपना साहित्य था।
- ख़ानक़ाह (फारसी): सूफ़ी एक संगठित समुदाय, ख़ानक़ाह, के आसपास रहते थे। इसका नियंत्रण शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में था।
- शेख अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे।
- वे आध्यात्मिक व्यवहार के नियम तय करते थे, और ख़ानक़ाह में रहने वालों के आपसी संबंधों और शेख और आम लोगों के रिश्तों की सीमा भी।
- सिलसिले (लगभग बारहवीं शताब्दी से): सिलसिला का शाब्दिक अर्थ जंज़ीर है। यह शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है।
- दीक्षा: दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था, और सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र पहनने पड़ते थे।
- दरगाह और उर्स: पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी।
- दरगाह पर ज़ियारत की परिपाटी चली, ख़ास तौर पर बरसी पर। इसे उर्स कहा गया, क्योंकि लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत होकर उनके और करीब हो जाते हैं।
- लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं के लिए उनका आशीर्वाद लेने जाते थे। इस तरह शेख का वली के रूप में आदर शुरू हुआ।
- सिलसिलों के नाम (बॉक्स, पृष्ठ 153): ज़्यादातर सिलसिलों के नाम उन्हें स्थापित करने वालों पर पड़े, जैसे कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर। कुछ के नाम जन्मस्थान पर पड़े, जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से।
सिलसिला: एक जंज़ीर
ख़ानक़ाह के बाहर (भाग 6.2)
- नए आंदोलन: कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नए आंदोलन शुरू किए।
- जीवन: ये ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे। इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी जैसे नामों से जाना जाता था।
- बे–शरिया और बा–शरिया: शरिया की अवहेलना करने के कारण इन्हें बे–शरिया कहा गया। इस तरह इन्हें शरिया का पालन करने वाले (बा–शरिया) सूफ़ियों से अलग करके देखा जाता था।
9. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला★★
किताब का भाग 7, पृष्ठ 153–159 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 7, 8, 9
- सबसे प्रभावशाली क्यों: बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आए सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे प्रभावशाली रहे, क्योंकि उन्होंने अपने को स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला और भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशेषताएँ भी अपनाईं।
चिश्ती ख़ानक़ाह में जीवन (भाग 7.1)
- शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह (चौदहवीं शताब्दी): उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर, यमुना के किनारे ग़ियासपुर में।
- कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना) था, जहाँ सहवासी और अतिथि रहते और उपासना करते थे। सहवासियों में शेख का परिवार, सेवक और अनुयायी थे।
- शेख छत पर एक छोटे कमरे में रहते थे और वहाँ सुबह-शाम मेहमानों से मिलते थे।
- एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोस के लोगों ने ख़ानक़ाह में शरण ली।
- लंगर: सामुदायिक रसोई फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी।
- कौन आते थे: सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर। वे अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज़ लेने या मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे।
- मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि और दरबारी इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी भी थे। इन सबने शेख के बारे में लिखा।
- स्थानीय परंपराएँ अपनाईं: शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों का सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम।
- चिश्ती यश कैसे फैला: शेख निज़ामुद्दीन ने कई आध्यात्मिक वारिस चुने और उन्हें उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में ख़ानक़ाह बनाने के लिए नियुक्त किया।
चिश्ती सिलसिला के मुख्य उपदेशक:
| सूफ़ी | मृत्यु का वर्ष | दरगाह का स्थान | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| शेख मुइनुद्दीन चिश्ती | 1235 | अजमेर (राजस्थान) | 154 |
| ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी | 1235 | दिल्ली | 154 |
| शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर | 1265 | अजोधन (पाकिस्तान) | 154 |
| शेख निज़ामुद्दीन औलिया | 1325 | दिल्ली | 154 |
| शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली | 1356 | दिल्ली | 154 |
- दाता गंज बख्श की कहानी (बॉक्स, पृष्ठ 154): 1039 ईसवी में अबुल हसन अल हुजविरी, जो अफगानिस्तान के गज़नी के निकट हुजविर के रहने वाले थे, तुर्की सेना के एक कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करके आए।
- वे लाहौर में बस गए और फारसी में कश्फ–उल–महजुब (परदे वाले की बेपर्दगी) लिखी, जिसमें तसव्वुफ़ के मायने और सूफ़ियों के बारे में बताया गया।
- उन्हें लाहौर में दफ़नाया गया। सुल्तान महमूद गज़नी के पोते ने उनकी मज़ार पर दरगाह बनवाई, जो बरसी पर अनुयायियों का तीर्थ स्थल बन गई।
- आज भी वे दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं और उनकी दरगाह को दाता दरबार यानी देने वाले की दरगाह कहा जाता है।
चिश्ती उपासना: ज़ियारत और कव्वाली (भाग 7.2)
- ज़ियारत: सूफ़ी संतों की दरगाह पर ज़ियारत सारे इस्लामी संसार में प्रचलित है। इसमें संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद, यानी बरकत, की कामना की जाती है।
- पाँच महान चिश्ती दरगाहें: “पिछले सात सौ सालों से” अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग इन पर आस्था प्रकट करते रहे हैं। सबसे पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन की है, जिन्हें ‘ग़रीब नवाज़’ कहा जाता है।
- अजमेर की दरगाह:
- सबसे पहला किताबी ज़िक्र चौदहवीं शताब्दी का है।
- लोकप्रियता के कारण: शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा, उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता, और राजसी मेहमानों का प्रश्रय।
- मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51) यहाँ आने वाले पहले सुल्तान थे। पर मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई।
- दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी, इसलिए अनेक यात्री आते थे।
- सोलहवीं शताब्दी तक यह बहुत लोकप्रिय हो गई थी। तीर्थयात्रियों के भजनों ने अकबर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया।
- अकबर और अजमेर: “अकबर यहाँ चौदह बार आया”, कभी साल में दो-तीन बार, नयी जीत के लिए आशीर्वाद लेने, संकल्प पूरा होने पर या पुत्रों के जन्म पर।
- यह परंपरा उन्होंने 1580 तक बनाए रखी। हर यात्रा की दान-भेंट शाही दस्तावेज़ों में दर्ज है।
- 1568 में उन्होंने तीर्थयात्रियों का खाना पकाने के लिए एक विशाल देग़ भेंट की, और दरगाह के अहाते में एक मस्जिद भी बनवाई।
- स्रोत 7 (मुगल शहज़ादी जहाँआरा की तीर्थयात्रा 1643): जहाँआरा की लिखी शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस–अल–अखाह से। वे अपने पिता शाहजहाँ के साथ आगरा से अजमेर गईं।
- रास्ते में हर रोज़ दो बार की अख़्तियारी नमाज़ पढ़ीं; रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; दरगाह की तरफ़ पैर नहीं फैलाए, न पीठ की।
- दरगाह में “अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से” रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लिए, सबसे उम्दा इतर छिड़का और अपना गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
- मुल्क का चिराग (बॉक्स, पृष्ठ 156): अठारहवीं शताब्दी में दक्कन के दरगाह कुली खान ने मुरक्का–ए–देहली (दिल्ली की अलबम) में शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली की दरगाह के बारे में लिखा:
- “शेख सिर्फ देहली के ही चिराग नहीं अपितु सारे मुल्क के चिराग हैं।”
- इतवार को भीड़ होती थी; दीवाली के महीने में दिल्ली की सारी आबादी उमड़ आती थी और हौज़ के पास तम्बू गाड़कर कई दिन रहती थी; पुराने रोग ठीक करने के लिए लोग वहाँ नहाते थे।
- “हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं।”
- संगीत और ज़िक्र: नाच और संगीत भी ज़ियारत का हिस्सा थे, ख़ास तौर पर कव्वालों का रहस्यवादी गुणगान, जिससे परमानंद की भावना उभरे।
- सूफ़ी संत ज़िक्र (ईश्वर का नाम-जाप) या समा (श्रवण करना), यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल, से उपासना करते थे।
- किताब कहती है कि चिश्ती उपासना में समा का महत्त्व दिखाता है कि चिश्ती स्थानीय भक्ति परंपरा से जुड़े।
भाषा और संपर्क (भाग 7.3)
- हिंदवी: चिश्तियों ने समा में स्थानीय भाषा अपनाई, और दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे।
- बाबा फरीद: इन्होंने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचा, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है।
- मसनवी: कुछ सूफ़ियों ने लंबी कविताएँ लिखीं, जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया।
- मलिक मोहम्मद जायसी का प्रेमाख्यान पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा है। उनकी आज़माइश आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है।
- ख़ानक़ाहों में समा के दौरान ऐसे काव्यों का वाचन होता था।
- दक्खनी कविताएँ: बीजापुर (कर्नाटक) के आसपास दक्खनी (उर्दू का रूप) में छोटी कविताएँ रची गईं। इन्हें सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों में वहाँ बसे चिश्ती संतों ने रचा।
- ये संभवत: औरतें घर का काम करते हुए, जैसे चक्की पीसते और चरखा कातते समय, गाती थीं। कुछ रचनाएँ लोरीनामा और शादीनामा के रूप में लिखी गईं।
- लिंगायतों के कन्नड़ वचन और पंढरपुर के संतों के मराठी अभंगों ने भी इन सूफ़ियों पर असर डाला। इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका।
- स्रोत 8 (चरखानामा): चरखे की धुन पर गीत: रुई लेते हुए ज़िक्र–ए–जाली, रुई धुनते हुए ज़िक्र–ए–कल्बी, धागा फिरकी पर लपेटते हुए ज़िक्र–ए–आइनी; साँस के धागे “चौबीस हज़ार तक गिनें”, “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।”
- अमीर खुसरो और कौल (बॉक्स, पृष्ठ 157): अमीर खुसरो (1253–1325) महान कवि, संगीतज्ञ और शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे।
- उन्होंने कौल (अरबी शब्द, अर्थ कहावत) का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया। कौल कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था।
- इसके बाद फारसी, हिंदवी या उर्दू की सूफ़ी कविता गाई जाती थी, कभी तीनों भाषाओं के शब्दों के साथ।
- शेख निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह के कव्वाल आज भी अपना गायन कौल से शुरू करते हैं।
सूफ़ी और राज्य (भाग 7.4)
- सत्ता से दूरी, पर अलगाव नहीं: चिश्ती संयम और सादगी का जीवन जीते थे और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे। पर सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता, तो वे उसे स्वीकार करते थे।
- अनुदान: सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी और दान संबंधी न्यास बनाए।
- दान का क्या होता था: चिश्ती धन और सामान का दान लेते थे, पर उसे जोड़ने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर पूरा खर्च कर देते थे। इससे शेख के नैतिक अधिकार की पुष्टि होती थी और आम लोग उनकी ओर खिंचते थे।
- शासक समर्थन क्यों चाहते थे:
- सूफ़ी संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और उनकी चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास उन्हें लोकप्रिय बनाता था।
- तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत बनाई तो उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकरा दी, क्योंकि सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है। सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा लिया, जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता अल्लाह से मानते थे और उलमा की शरिया व्याख्या पर निर्भर नहीं थे।
- माना जाता था कि औलिया मध्यस्थ बनकर लोगों की ऐहिक और आध्यात्मिक दशा को बेहतर बनाते हैं। “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।”
- तनाव भी था: अपनी सत्ता जताने के लिए दोनों ही झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे। शेखों को आडंबरपूर्ण पदवियाँ भी दी जाती थीं, जैसे शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान–उल–मशेख (शेखों में सुल्तान) कहते थे।
- दूसरे सिलसिले (बॉक्स, पृष्ठ 158): दिल्ली सल्तनत के युग में सुहरावर्दी और मुगल युग में नक्शबंदी सूफ़ी भी राज्य से जुड़े रहे, पर उनके जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से अलग थे। कभी-कभी सूफ़ी दरबारी पद भी स्वीकार कर लेते थे।
- स्रोत 9 (शाही भेंट अस्वीकार): 1313 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह की एक घटना, अमीर हसन सिजज़ी के शब्दों में। एक स्थानीय शासक ने शेख को दो बगीचे और बहुत सी ज़मीन का पट्टा, और उनके रखरखाव के औज़ार भेजे।
- किताब के अंश में यहाँ ‘अपना हक कहते हैं’ छपा है; बात यह है कि शासक ने अपना सारा हक छोड़ दिया था, और आगे का सवाल शेख का है, जिन्होंने यह भेंट नहीं ली (अंश का शीर्षक भी ‘शाही भेंट अस्वीकार’ है)।
- शेख ने कहा, “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?… हमारे कोई भी आध्यात्मिक गुरु ने इस तरह का काम नहीं किया।”
- फिर उन्होंने एक कहानी सुनाई: सुल्तान ग़ियासुद्दीन (तब उलुग़ ख़ान) ने शेख फ़रीदुद्दीन को कुछ धन और चार गाँवों का पट्टा भेंट किया। शेख ने धन दरवेशों में बाँटने के लिए ले लिया, पर ज़मीन के पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।”
- शेख सलीम चिश्ती की दरगाह: अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी में बाबा फरीद के वंशज शेख सलीम चिश्ती की दरगाह, जो “चिश्तियों और मुग़ल राज्य के घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक थी।”
10. नवीन भक्ति पंथ: कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई★★
किताब का भाग 8 (नवीन भक्ति पंथ: उत्तरी भारत में संवाद और असहमति), पृष्ठ 160–164 · प्रश्नावली में: प्रश्न 5, 8
- संवाद: अनेक संत कवियों ने नई सामाजिक परिस्थितियों, विचारों और संस्थाओं के साथ स्पष्ट और सांकेतिक, दोनों तरह के संवाद कायम किए। किताब तीन प्रमुख व्यक्तियों के ज़रिए यह दिखाती है।
तीन संत, तीन रास्ते
कबीर: दैवीय वस्त्र की बुनाई (भाग 8.1)
- कैसे जानते हैं: इतिहासकारों ने कबीर के जीवन और काल का अध्ययन उनके काव्य और बाद में लिखी गई जीवनियों के आधार पर किया है। यह काम कई वजहों से चुनौती भरा रहा है।
- बानी तीन परिपाटियों में:
- कबीर बीजक: कबीर पंथियों ने वाराणसी और उत्तर प्रदेश के दूसरे स्थानों पर सँभाला;
- कबीर ग्रंथावली: राजस्थान के दादू पंथियों से जुड़ी;
- कई पद आदि ग्रंथ साहिब में संकलित।
- लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने। उन्नीसवीं शताब्दी में उनके पद संग्रह बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में छापे गए।
- भाषा: रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं, कुछ संत भाषा में, जो निर्गुण कवियों की खास बोली थी।
- उलटबाँसी (उलटी कही उक्तियाँ): इनमें रोज़ के अर्थ को उलट दिया जाता है। ये परम सत्य के स्वरूप को समझने की मुश्किल दिखाती हैं, जैसे “केवल ज फूल्या फूल बिन” और “समंदरि लागि आगि”।
- परम सत्य के कई नाम:
- इस्लामी दर्शन से: अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर;
- वेदांत दर्शन से: अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्;
- योगी परंपरा से: शब्द और शून्य।
- स्रोत 10 (एक ईश्वर): “यह रचना कबीर की मानी जाती है”। इसमें कहा गया है, “ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।” और “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
- विचार एक-से नहीं: कुछ कविताएँ इस्लामी दर्शन के एकेश्वरवाद और मूर्तिभंजन का समर्थन करती हैं और हिंदू धर्म के बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का खंडन। दूसरी कविताएँ ज़िक्र और इश्क के सूफ़ी सिद्धांतों से ‘नाम सिमरन’ की हिंदू परंपरा को व्यक्त करती हैं।
- कौन-से पद कबीर के: यह कहना मुश्किल है। विद्वान भाषा शैली और विषयवस्तु के आधार पर तय करने की कोशिश करते हैं।
- अवध: कबीर के विचार संभवत: अवध प्रदेश (उत्तर प्रदेश) की सूफ़ी और योगी परंपरा से हुए संवाद और विवाद से घनीभूत हुए।
- हिंदू या मुसलमान: यह विवाद आज भी है। यह उन संत जीवनियों में उभरता है जो सत्रहवीं शताब्दी से, यानी “उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद” से लिखी गईं।
- वैष्णव परंपरा की जीवनियों में कबीर (अरबी में अर्थ महान) को जन्म से हिंदू कबीरदास बताया गया। पर उनका पालन एक गरीब मुसलमान जुलाहा परिवार में हुआ, जो कुछ समय पहले ही इस्लाम का अनुयायी बना था।
- गुरु रामानंद वाली बात: इन जीवनियों के अनुसार कबीर के गुरु रामानंद थे। पर कबीर के पद गुरु और सतगुरु शब्द किसी ख़ास व्यक्ति के लिए नहीं बरतते, और इतिहासकार मानते हैं कि दोनों का समकालीन होना मुश्किल है, जब तक उन्हें बहुत लंबी आयु न दी जाए।
- इसलिए दोनों को जोड़ने वाली परंपराएँ स्वीकार नहीं की जा सकतीं। हाँ, इनसे यह पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ियों के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी।
- गायक: सत्रहवीं शताब्दी के एक मुग़ल चित्र में राह–चलते संगीतकार हैं। संभव है कि ऐसे गायक संतों की रचनाएँ गाते थे।
बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्द (भाग 8.2)
- जीवन (1469–1539): एक हिंदू व्यापारी परिवार में जन्म, मुख्यत: इस्लाम धर्मावलंबी पंजाब के ननकाना गाँव में, जो रावी नदी के पास था। उन्होंने फारसी पढ़ी और लेखाकार के काम का प्रशिक्षण लिया। उनका ज़्यादा समय सूफ़ी और भक्त संतों के बीच बीतता था, और उन्होंने दूर–दराज़ की यात्राएँ कीं।
- संदेश (भजन और उपदेश):
- निर्गुण भक्ति का प्रचार;
- धर्म के बाहरी आडंबर नहीं: यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा, कठोर तप;
- हिंदू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी नकारा;
- परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं; उपासना का सरल उपाय था निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
- शबद: विचार पंजाबी भाषा में शबद के रूप में रखे। वे शबद अलग–अलग रागों में गाते थे और सेवक मरदाना रबाब बजाकर साथ देता था।
- समुदाय: अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया और सामुदायिक उपासना (संगत) के नियम बनाए, जहाँ सामूहिक पाठ होता था। अनुयायी अंगद को अपने बाद गुरुपद दिया; “इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा।”
- नया धर्म? किताब कहती है, “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे”। उनकी मृत्यु के बाद अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित करके अपने को हिंदू और मुसलमान, दोनों से अलग पहचाना।
- आदि ग्रंथ साहिब: पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक, उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी इसमें संकलित की। इसे “गुरबानी” कहा जाता है, और ये रचनाएँ अनेक भाषाओं में हैं।
- गुरु ग्रंथ साहिब: सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी इसमें जोड़ीं, और ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया।
- खालसा पंथ (पवित्रों की सेना): गुरु गोबिन्द सिंह ने इसकी नींव डाली और पाँच प्रतीक बताए: बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा। उनके नेतृत्व में समुदाय एक सामाजिक, धार्मिक और सैन्य बल के रूप में संगठित हुआ।
मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी (भाग 8.3)
- कौन थीं (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी): संभवत: भक्ति परंपरा की सबसे सुप्रसिद्ध कवयित्री। उनकी जीवनी उनके भजनों के आधार पर बनी, जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे।
- जीवन: मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी। उनकी इच्छा के विरुद्ध उनका विवाह मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ।
- उन्होंने पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्व निभाने से इनकार किया और विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना।
- ससुराल वालों ने उन्हें विष देने का प्रयत्न किया, पर वे राजभवन छोड़कर परिब्राजिका (घूम-घूमकर रहने वाली) संत बन गईं।
- स्रोत 11 (कृष्ण के प्रति प्रेम): एक पद की अंतिम पंक्ति है, “मीरा कहै प्रभु गिरधर नागर, जोत में जोत मिला जा।।” दूसरे पद में वे कहती हैं, “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।”
- सीधे शब्दों में: राणा जी मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी; राणा रूठे तो अपना गाँव रख लें, पर हरि रूठे तो मैं मुरझा जाऊँगी।
- गुरु रैदास: कुछ परंपराओं के अनुसार मीरा के गुरु रैदास थे, जो एक चर्मकार थे। इससे पता चलता है कि मीरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियाँ तोड़ीं। माना जाता है कि राजमहल का ऐश्वर्य छोड़कर उन्होंने विधवा के सफ़ेद वस्त्र या संन्यासिनी के जोगिया वस्त्र पहने।
- विरासत: उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई। फिर भी वे शताब्दियों से प्रेरणा का स्रोत हैं। उनके पद आज भी स्त्रियाँ और पुरुष गाते हैं, ख़ास तौर पर गुजरात और राजस्थान के वे गरीब लोग जिन्हें “नीच जाति” का समझा जाता है।
- कृष्ण का रूप: मीराबाई बाँसुरी बजाते कृष्ण के रूप को पूजती थीं।
- शंकरदेव (बॉक्स, पृष्ठ 164): पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में असम में वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक।
- उनके उपदेश ‘भगवती धर्म’ कहलाते हैं, क्योंकि वे भगवद् गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे, और सर्वोच्च देवता विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण पर केंद्रित थे।
- उन्होंने नाम कीर्तन और श्रद्धावान भक्तों के सत्संग में ईश्वर के नाम के उच्चारण पर बल दिया।
- आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिए सत्र (मठ) और नामघर (प्रार्थनागृह) बनाने को बढ़ावा दिया। असम में ये संस्थाएँ और आचार आज भी पनप रहे हैं।
- उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में कीर्तनघोष भी है।
11. धार्मिक परंपराओं के इतिहास कैसे जोड़े जाते हैं★
किताब का भाग 9 और पृष्ठ 165 का बॉक्स, पृष्ठ 164–166 · प्रश्नावली में: प्रश्न 9, 1
- कौन-से स्रोत: इतिहासकार धार्मिक परंपरा का इतिहास जोड़ने के लिए कई स्रोत बरतते हैं: मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ, और दैवीय स्वरूप को समझने को उत्सुक स्त्रियों और पुरुषों की काव्य रचनाएँ।
- मूर्ति और इमारत: इनका इस्तेमाल तभी हो सकता है जब हम उनका संदर्भ अच्छी तरह समझें, यानी उन्हें बनाने और बरतने वालों के विचार, आस्थाएँ और आचार (अध्याय 1 और 4)।
- साहित्यिक स्रोत: इनमें काफ़ी विविधता है; ये कई भाषाओं और शैलियों में हैं।
- कुछ सरल, स्पष्ट भाषा में हैं, जैसे बासवन्ना के वचन;
- कुछ अलंकृत फ़ारसी में लिखे मुग़ल सम्राटों के फ़रमान हैं।
- हर तरह के पाठ को समझने के लिए अलग कौशल चाहिए: कई भाषाओं की जानकारी, और हर विधा की शैली के बारीक अंतर पहचानने की समझ।
सूफ़ी परंपरा के चार तरह के ग्रंथ
- ख़ानक़ाहों के आसपास के ग्रंथ (बॉक्स, पृष्ठ 165):
- प्रबंध पुस्तिका: सूफ़ी विचारों और आचारों पर, जैसे कश्फ–उल–महजुब। इससे इतिहासकार जानते हैं कि उपमहाद्वीप के बाहर की परंपराओं ने भारत में सूफ़ी चिंतन को कैसे प्रभावित किया।
- मुलफुज़ात (सूफ़ी संतों की बातचीत): फवाइद–अल–फुआद एक आरंभिक ग्रंथ है; स्रोत 9 इसी से लिया गया है। मुलफुज़ात शेखों की अनुमति से संकलित हुए, इनका उद्देश्य मुख्यत: उपदेशात्मक था, और दक्कन समेत उपमहाद्वीप के कई भागों से ऐसे उदाहरण मिलते हैं।
- मक्तुबात (लिखे हुए पत्रों का संकलन): शेख अपने अनुयायियों और सहयोगियों को लिखते थे। इनमें धार्मिक सत्य के अनुभव और अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन पर टिप्पणी मिलती है। विद्वान सत्रहवीं शताब्दी के शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624) की विचारधारा की तुलना बादशाह अकबर की उदारवादी और असांप्रदायिक विचारधारा से करते हैं।
- तज़किरा (सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण): सियार–उल–औलिया मुख्यत: चिश्ती संतों के बारे में है। सबसे प्रसिद्ध तज़किरा अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी (मृत्यु 1642) का अख्बार–उल–अखयार है। लेखकों का उद्देश्य अपने सिलसिले की प्रधानता और आध्यात्मिक वंशावली की महिमा दिखाना था। बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं, फिर भी वे इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
- जो बचा, जो बदला: हर परिपाटी से अनेक साहित्यिक और मौखिक संदेश जुड़े थे। कुछ सुरक्षित रहे, बहुत से संप्रेषण के दौरान बदल गए, और कुछ हमेशा के लिए भुला दिए गए।
- परंपराएँ आज भी जीवित हैं: लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं। इससे इतिहासकार आज के आचार–व्यवहार की तुलना साहित्य और पुरानी चित्रकला में मिले वर्णन से कर सकते हैं और बदलावों की रूपरेखा बना सकते हैं।
- पर ये परंपराएँ लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, इसलिए लोगों के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि समय के साथ इनमें बदलाव आया होगा।
- इतिहासकारों के लिए चुनौती: यह याद रखना कि धार्मिक परंपराएँ भी दूसरी परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं।
12. आँकड़े और साल एक जगह★
पूरे अध्याय से, पृष्ठ 140–167
अध्याय के साल और संख्याएँ
| साल या संख्या | क्या | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बारहवीं शताब्दी तक | पुरी में मुख्य देवता को जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया | 141 |
| लगभग छठी शताब्दी | अलवार और नयनार संतों के नेतृत्व में प्रारंभिक भक्ति आंदोलन | 143 |
| दसवीं शताब्दी तक | बारह अलवारों की रचनाओं का संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् | 144 |
| दसवीं शताब्दी | अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताएँ तवरम में | 144 |
| नवीं से तेरहवीं शताब्दी | चोल सम्राट: ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा का समर्थन, मंदिरों को भूमि–अनुदान | 145 |
| 945 ईसवी | परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं | 146 |
| बारहवीं शताब्दी; 1106–68 | कर्नाटक में वीरशैव आंदोलन; बासवन्ना | 146 |
| तेरहवीं शताब्दी | महाराष्ट्र में भक्ति का विकास | 147 |
| चौदहवीं शताब्दी तक | उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलतीं | 147 |
| सातवीं शताब्दी | इस्लाम का उद्भव | 148 |
| 711 ईसवी | मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीता | 148 |
| 1598 | अकबर का फ़रमान: खम्बायत में गिरजाघर (स्रोत 5) | 149 |
| 1661–62 | औरंगज़ेब का जोगी गुरु आनंद नाथ को पत्र (स्रोत 6) | 150 |
| आठवीं से चौदहवीं शताब्दी | संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं | 151 |
| 1609; 1395 | अतिया मस्जिद (मैमनसिंग); शाह हमदान मस्जिद (श्रीनगर) | 151–152 |
| उन्नीसवीं शताब्दी | “सूफ़ीवाद” शब्द गढ़ा गया | 152 |
| ग्यारहवीं शताब्दी तक | सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन | 152 |
| लगभग बारहवीं शताब्दी | सिलसिलों का बनना | 153 |
| बारहवीं शताब्दी का अंत | चिश्ती भारत आए | 153 |
| 1039 | अल हुजविरी (दाता गंज बख्श) को तुर्की सेना के कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करनी पड़ी; वे लाहौर में बस गए | 154 |
| 1235, 1235, 1265, 1325, 1356 | पाँच मुख्य चिश्ती उपदेशकों की मृत्यु के वर्ष, इसी क्रम में: शेख मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी (दिल्ली), शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर (अजोधन), शेख निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली), शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली (दिल्ली) | 154 |
| सात सौ साल | “पिछले सात सौ सालों से” पाँच महान चिश्ती दरगाहों पर आस्था | 154 |
| 1324–51 | मुहम्मद बिन तुगलक, अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान | 155 |
| चौदह बार | अकबर अजमेर में ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आया, कभी साल में दो–तीन बार | 155 |
| लगभग 1615 | मनोहर का बनाया चित्र: अजमेर की तीर्थयात्रा पर बादशाह जहाँगीर का स्वागत करते शेख | 155 |
| 1568; 1580 तक | अकबर ने देग़ भेंट की; यात्राओं की परंपरा 1580 तक | 156 |
| 1643 | जहाँआरा की अजमेर यात्रा (स्रोत 7) | 156 |
| 1253–1325 | अमीर खुसरो | 157 |
| चौबीस हज़ार | चरखानामा में साँस के धागे गिनना (स्रोत 8) | 157 |
| 1313 | स्रोत 9 की घटना | 159 |
| चार गाँव | शेख फ़रीदुद्दीन को भेंट किया गया पट्टा | 159 |
| लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी | कबीर | 160 |
| 200 वर्ष | कबीर की जीवनियाँ “उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद” से लिखी गईं | 162 |
| 1469–1539 | बाबा गुरु नानक | 162 |
| 200 वर्ष | बाबा गुरु नानक के बाद गुरुपद की परिपाटी 200 वर्षों तक चली | 163 |
| लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी | मीराबाई | 163 |
| पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध | असम में शंकरदेव | 164 |
| 1624; 1642 | शेख अहमद सरहिंदी की मृत्यु; अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी की मृत्यु | 165 |
दाता गंज बख्श (हुजविरी): किताब में इनकी मृत्यु का वर्ष दो जगह अलग-अलग छपा है: पृष्ठ 154 पर 1073 और पृष्ठ 165 पर 1071।
काल-रेखा: भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ मुख्य धार्मिक शिक्षक (पृष्ठ 167)
| लगभग काल | शिक्षक और क्षेत्र | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 500–800 ईसवी | तमिलनाडु में अप्पार, संबंदर, सुंदरमूर्ति | 167 |
| लगभग 800–900 ईसवी | तमिलनाडु में नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल, तोंदराडिप्पोडी | 167 |
| लगभग 1000–1100 ईसवी | पंजाब में अल हुजविरी, दाता गंज बक्श; तमिलनाडु में रामानुजाचार्य | 167 |
| लगभग 1100–1200 ईसवी | कर्नाटक में बसवन्ना | 167 |
| लगभग 1200–1300 ईसवी | महाराष्ट्र में ज्ञानदेव, मुक्ताबाई; राजस्थान में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती; पंजाब में बहादुद्दीन जकारिया और फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर; दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी | 167 |
| लगभग 1300–1400 ईसवी | कश्मीर में लाल देद; सिंध में लाल शाहबाज़ कलंदर; दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया; उत्तर प्रदेश में रामानंद; महाराष्ट्र में चोखमेला; बिहार में शराफुद्दीन याह्या मनेरी | 167 |
| लगभग 1400–1500 ईसवी | उत्तर प्रदेश में कबीर, रैदास, सूरदास; पंजाब में बाबा गुरु नानक; गुजरात में बल्लभाचार्य; ग्वालियर में अबदुल्ला सत्तारी; गुजरात में मुहम्मद शाह आलम; गुलबर्गा में मीर सैयद मौहम्मद गेसू दराज़; असम में शंकरदेव; महाराष्ट्र में तुकाराम | 167 |
| लगभग 1500–1600 ईसवी | बंगाल में श्री चैतन्य; राजस्थान में मीराबाई; उत्तर प्रदेश में शेख अब्दुल कुद्दस गंगोही, मलिक मौहम्मद जायसी, तुलसीदास | 167 |
| लगभग 1600–1700 ईसवी | हरियाणा में शेख अहमद सरहिंदी; पंजाब में मियाँ मीर | 167 |
- किताब का नोट: “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।”
- पहली पंक्ति: किताब की समय-रेखा में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं।
13. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति को ईसा से पहले का मानना | ये लगभग 500–800 ईसवी के हैं; प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग छठी शताब्दी का है | 143, 167 |
| यह लिखना कि सारे अलवार और नयनार ब्राह्मणों और जाति के विरोधी थे | यह कुछ इतिहासकारों का मत है, जो कुछ हद तक ही सत्य प्रतीत होता है; संतों में ब्राह्मण भी थे, जैसे तोंदराडिप्पोडि | 144 |
| मान लेना कि उत्तर भारत में भी चौदहवीं शताब्दी से पहले अलवार–नयनार जैसी रचनाएँ मिलती हैं | इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से ऐसी रचनाएँ नहीं मिलीं | 147 |
| “हिंदू” और “मुसलमान” को हमेशा से चले आ रहे नाम मानना | बहुत समय तक इनका चलन नहीं था; लोग जन्मस्थान से पहचाने जाते थे: तुरुष्क, ताजिक, पारसीक | 151 |
| यह लिखना कि मस्जिदें हर जगह एक जैसी बनीं | मक्का की ओर अनुस्थापन सार्वभौमिक था; छत और निर्माण का सामान स्थानीय था | 151 |
| “सूफ़ीवाद” को इस्लामी ग्रंथों का शब्द मानना | यह उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ़ आता है | 152 |
| उर्स को पीर की मृत्यु का शोक समझना | बरसी की ज़ियारत को उर्स इसलिए कहा गया कि लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत होकर उनके और करीब हो जाते हैं | 153 |
| यह लिखना कि हर सिलसिले का नाम उसके संस्थापक पर है | कई के नाम संस्थापक पर हैं (कादरी), पर कुछ के जन्मस्थान पर (चिश्ती, चिश्ती शहर से) | 153 |
| यह लिखना कि चिश्ती हर अनुदान ठुकरा देते थे | वे बिना माँगे अनुदान और भेंट स्वीकार करते थे, पर जोड़ते नहीं थे, खर्च कर देते थे; स्रोत 9 में शेख ने ज़मीन का पट्टा नहीं लिया | 158–159 |
| रामानंद को कबीर का पक्का गुरु लिखना | यह बात जीवनियों की है; इतिहासकार दोनों का समकालीन होना मुश्किल मानते हैं | 162 |
| यह लिखना कि बाबा गुरु नानक ने आदि ग्रंथ साहिब संकलित किया | संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया; गुरु ग्रंथ साहिब नाम गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय पड़ा | 163 |
| यह लिखना कि बाबा गुरु नानक ने नया धर्म स्थापित किया | किताब कहती है, “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे” | 163 |
| मीराबाई को किसी संप्रदाय या मंडली की संस्थापक बताना | उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने कोई निजी मंडली नहीं बनाई | 164 |
14. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
किताब की प्रश्नावली, पृष्ठ 168–169
उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)
प्रश्न 1. उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए कि संप्रदाय के समन्वय से इतिहासकार क्या अर्थ निकालते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: समन्वय का मतलब है अलग-अलग पूजा प्रणालियों का आपस में मिलना। इतिहासकार इसकी कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं।
पहली प्रक्रिया: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार। पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में रचे गए, “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे”।
दूसरी प्रक्रिया: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे वर्गों के विश्वासों और आचरणों को स्वीकार करके उन्हें नया रूप दिया।
पुरी का उदाहरण: बारहवीं शताब्दी तक एक स्थानीय देवता को जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया। उनकी प्रतिमा आज भी स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते हैं।
देवियों का उदाहरण: स्थानीय देवियों को विष्णु की पत्नी लक्ष्मी या शिव की पत्नी पार्वती के रूप में मान्यता मिली।
“महान” और “लघु” परंपरा: समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्दों में, कई परंपराएँ इन दोनों के लगातार संवाद से बनीं।
इसी तरह तांत्रिक विचारों ने शैव और बौद्ध दर्शन को प्रभावित किया, और बौद्ध देवी मारिची की मूर्ति (चित्र 6.3) भी एकीकरण का उदाहरण है। (पृष्ठ 141–142)
प्रश्न 2. किस हद तक उपमहाद्वीप में पाई जाने वाली मस्जिदों का स्थापत्य स्थानीय परिपाटी और सार्वभौमिक आदर्शों का सम्मिश्रण है?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब कहती है, “एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।”
सार्वभौमिक तत्व: हर मस्जिद का मक्का की ओर अनुस्थापन, जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिम्बर (व्यासपीठ) से पता चलता है।
स्थानीय तत्व: छत और निर्माण का सामान जगह के हिसाब से बदलता था।
केरल: तेरहवीं शताब्दी की मस्जिद, जिसकी छत शिखर के आकार की है।
मैमनसिंग, बांग्लादेश: 1609 की अतिया मस्जिद, ईंटों की बनी।
श्रीनगर: 1395 की शाह हमदान मस्जिद, कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का नमूना, जिसमें शिखर, नक्काशीदार छज्जे और पेपरमैशी की सजावट है।
यानी नमाज़ की दिशा और मूल ढाँचा हर जगह एक था, पर दिखने में हर मस्जिद अपने इलाके की परिपाटी से बनी। (पृष्ठ 151–152)
प्रश्न 3. बे शरिया और बा शरिया सूफ़ी परंपरा के बीच एकरूपता और अंतर, दोनों को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों सूफ़ी परंपरा से निकले, पर शरिया और ख़ानक़ाह के बारे में उनका रास्ता अलग था।
एकरूपता: दोनों सूफ़ी सिद्धांतों पर टिके थे। बे–शरिया आंदोलन भी कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर ही शुरू किए।
बा–शरिया: ये शरिया का पालन करते थे। किताब में सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द–गिर्द संगठित दिखते हैं, जहाँ शेख, पीर या मुर्शीद की देखरेख होती थी; मुरीद दीक्षा लेते थे और सिलसिला आगे बढ़ता था।
बे–शरिया: ये ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे। इन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी कहा जाता था।
नाम का कारण: शरिया की अवहेलना करने के कारण इन्हें बे–शरिया कहा गया, और इस तरह इन्हें शरिया मानने वाले (बा–शरिया) सूफ़ियों से अलग देखा गया।
(पृष्ठ 152–153)
प्रश्न 4. चर्चा कीजिए कि अलवार, नयनार और वीरशैवों ने किस प्रकार जाति प्रथा की आलोचना प्रस्तुत की?
उत्तर देखिए
उत्तर: तमिलनाडु के भक्त संतों और कर्नाटक के वीरशैवों ने भक्ति को जन्म और कुल से ऊपर रखा, पर दोनों के तरीके अलग थे।
अलवार और नयनार: “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।” किताब के अनुसार यह बात कुछ हद तक सत्य प्रतीत होती है। संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और “अस्पृश्य” मानी गई जातियों से भी थे।
रचनाएँ वेदों जितनी: नलयिरादिव्यप्रबंधम् को तमिल वेद कहा गया।
स्रोत 1 और 2: तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु भक्त “दासों” को चतुर्वेदियों से अधिक पसंद करते हैं; अप्पार पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”
वीरशैव (लिंगायत): इन्होंने जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध किया, पुनर्जन्म पर प्रश्न उठाए, और वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह अपनाए। इसलिए ब्राह्मणीय व्यवस्था में नीचा स्थान पाने वाले समुदाय इनके अनुयायी बने।
(पृष्ठ 144–147)
प्रश्न 5. कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के मुख्य उपदेशों का वर्णन कीजिए। इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ।
उत्तर देखिए
उत्तर: परीक्षा में दोनों में से एक लिखिए। यहाँ दोनों दिए हैं।
(क) कबीर
- एक ईश्वर: स्रोत 10 में वे पूछते हैं कि “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?” यह कैसे हो सकता है; “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
- परम सत्य के कई नाम: अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर; अलख, निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्; शब्द और शून्य।
- संप्रेषण: बानी तीन परिपाटियों में सँभली: कबीर बीजक (कबीर पंथी, वाराणसी), कबीर ग्रंथावली (दादू पंथी, राजस्थान) और आदि ग्रंथ साहिब। उन्नीसवीं शताब्दी में पद बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र में छपे। किताब के अनुसार संभव है कि राह–चलते गायक संतों की रचनाएँ गाते थे।
(ख) बाबा गुरु नानक
- उपदेश: निर्गुण भक्ति; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप को नकारा; रब का कोई लिंग या आकार नहीं; निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
- संप्रेषण: पंजाबी में शबद, जिन्हें वे रागों में गाते थे और मरदाना रबाब बजाता था; संगत में सामूहिक पाठ; अंगद को गुरुपद; अर्जन देव जी ने बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की।
(पृष्ठ 160–163)
निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)
प्रश्न 6. सूफ़ी मत के मुख्य धार्मिक विश्वासों और आचारों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
1. शुरुआत और विश्वास
- इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। यह ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था।
- उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं और धर्माचार्यों की कुरान और सुन्ना की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की।
- मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया; पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल मानकर उनका अनुसरण सिखाया; कुरान की व्याख्या निजी अनुभव से की।
2. ख़ानक़ाह और सिलसिला
- ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद पूर्ण विकसित आंदोलन था। सूफ़ी ख़ानक़ाह में रहते थे, जिसका नियंत्रण शेख, पीर या मुर्शीद के हाथ में था; वे मुरीद भरती करते और खलीफ़ा नियुक्त करते थे।
- सिलसिला (जंज़ीर) शेख और मुरीद का निरंतर रिश्ता था, जिसकी पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी थी। दीक्षा में निष्ठा का वचन, सिर मुँड़ाना और थेगड़ी लगे वस्त्र थे।
3. दरगाह, ज़ियारत और उर्स
- पीर की मृत्यु के बाद दरगाह भक्ति का स्थल बनी। बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया। लोग बरकत (आध्यात्मिक आशीर्वाद) की कामना से आते थे।
4. चिश्ती आचार
- लंगर फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलता था; ज़िक्र (नाम-जाप) और समा (आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल); अमीर खुसरो ने कौल से समा को विशिष्ट आकार दिया।
- शेख के सामने झुकना, पानी पिलाना, सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम जैसी स्थानीय परंपराएँ अपनाईं। वे सादगी से रहते और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे।
5. बे–शरिया
- कुछ रहस्यवादी ख़ानक़ाह ठुकराकर फकीर बने और शरिया की अवहेलना की।
निष्कर्ष: सूफ़ी मत में ईश्वर से निजी प्रेम केंद्र में था, और उसके आचार स्थानीय परिवेश में ढलते गए। (पृष्ठ 152–158)
प्रश्न 7. क्यों और किस तरह शासकों ने नयनार और सूफ़ी संतों से अपने संबंध बनाने का प्रयास किया?
उत्तर देखिए
उत्तर:
1. चोल शासक और नयनार
- कैसे: चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने विष्णु और शिव के मंदिरों को भूमि–अनुदान दिए; चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के बड़े शिव मंदिर बनवाए; मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू करवाया और उनका तवरम के रूप में संकलन करवाया। 945 ईसवी में परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
- क्यों: वेल्लाल किसान इन संतों का आदर करते थे, इसलिए शासक भी उनका समर्थन चाहते थे; चोल शासक दैवीय समर्थन का दावा करते थे।
2. सुल्तान, मुगल और सूफ़ी
- कैसे: सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी और दान संबंधी न्यास बनाए। मुहम्मद बिन तुगलक अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान थे। “अकबर यहाँ चौदह बार आया”, 1568 में देग़ भेंट की और अहाते में मस्जिद बनवाई।
- क्यों: सूफ़ियों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास उन्हें लोकप्रिय बनाता था। सुल्तान जानते थे कि अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है, इसलिए उन्होंने उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकराई और सूफ़ियों का सहारा लिया, जो अपनी सत्ता अल्लाह से मानते थे। “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।”
3. तनाव भी
- दोनों झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे। स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने ज़मीन की भेंट नहीं ली।
निष्कर्ष: शासकों को संतों की लोकप्रियता से वैधता मिलती थी, और संत अनुदान लेकर भी अपनी दूरी बनाए रखना चाहते थे। (पृष्ठ 146, 155–159)
प्रश्न 8. उदाहरण सहित विश्लेषण कीजिए कि क्यों भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अपने विचारों को अभिव्यक्त करने के लिए विभिन्न भाषाओं का प्रयोग किया?
उत्तर देखिए
उत्तर:
1. क्यों
- संत आम लोगों तक पहुँचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपनी बात कही। दक्खनी कविताओं के बारे में किताब बताती है कि इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका।
2. भक्ति संत
- अलवार और नयनार तमिल में भजन गाते थे; वीरशैवों के वचन कन्नड़ में रचे गए।
- कबीर की रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं, कुछ संत भाषा में; उलटबाँसी भी।
- बाबा गुरु नानक ने विचार पंजाबी में शबद के रूप में रखे।
3. सूफ़ी और दूसरे
- दिल्ली के चिश्ती हिंदवी में बात करते थे; बाबा फरीद का क्षेत्रीय भाषा का काव्य गुरु ग्रंथ साहिब में है।
- जायसी की पद्मावत जैसी मसनवी मानवीय प्रेम के रूपक से ईश्वर-प्रेम कहती थी।
- बीजापुर के आसपास दक्खनी में चक्की और चरखे के गीत, लोरीनामा और शादीनामा।
- अमीर खुसरो की कव्वाली में फारसी, हिंदवी या उर्दू; हुजविरी ने कश्फ–उल–महजुब फारसी में लिखी।
- खोजा इस्माइलियों के जीनन पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे।
निष्कर्ष: भाषा श्रोता के हिसाब से चुनी गई, ताकि संदेश घर, खेत और काम के बीच तक पहुँचे। (पृष्ठ 140, 143, 147, 150, 154, 157–158, 160–163)
प्रश्न 9. इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्त्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
1. स्रोत 1 (चतुर्वेदी और “अस्पृश्य”), पृष्ठ 144
- ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु उन “दासों” को पसंद करते हैं, “जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।” विचार: भक्ति जन्म से बड़ी है।
2. स्रोत 4 (अनुष्ठान और यथार्थ संसार), पृष्ठ 147
- बासवन्ना पत्थर के साँप को दूध चढ़ाने और असली साँप को “मारो–मारो” कहने वालों पर व्यंग्य करते हैं। विचार: खोखले कर्मकांड का विरोध।
3. स्रोत 6 (जोगी के प्रति श्रद्धा), पृष्ठ 150
- औरंगज़ेब ने जोगी गुरु आनंद नाथ को वस्त्र और पच्चीस रुपए भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।” विचार: शासक दूसरे धर्मों के गुरुओं का आदर करते थे।
4. स्रोत 9 (शाही भेंट अस्वीकार), पृष्ठ 159
- एक स्थानीय शासक ने शेख निज़ामुद्दीन औलिया को दो बगीचे और ज़मीन का पट्टा भेंट किया। शेख ने कहा, “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?” विचार: चिश्ती सत्ता और संपत्ति से दूरी रखते थे।
5. स्रोत 10 (एक ईश्वर), पृष्ठ 160
- कबीर कहते हैं, “ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।” विचार: ईश्वर एक है, समुदायों के झगड़े व्यर्थ हैं।
निष्कर्ष: इन स्रोतों में भक्ति को जाति और कर्मकांड से ऊपर रखा गया, और धर्मों के बीच आदर और संवाद दिखता है। (पृष्ठ 144–160)
मानचित्र कार्य
प्रश्न 10. भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफ़ी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: अध्याय में आए इन स्थानों में से चुनिए:
सूफ़ी स्थल (भारत में): अजमेर, राजस्थान (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह); दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया, ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली); फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह)।
विष्णु से जुड़ा मंदिर: पुरी, उड़ीसा (जगन्नाथ, विष्णु का एक रूप)।
शिव से जुड़ा मंदिर: चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम (चोल शासकों की मदद से बने बड़े शिव मंदिर)।
देवी से जुड़ा मंदिर: अध्याय के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता। इसके लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए।
! अजोधन, लाहौर (दाता दरबार) और मुल्तान (शेख़ बहाउद्दीन ज़कारिया की दरगाह) भी सूफ़ी स्थल हैं, पर आज पाकिस्तान में हैं; भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाले स्थल लीजिए। (पृष्ठ 141, 146, 154–155, 159, 169)
परियोजना कार्य (कोई एक)
प्रश्न 11. इस अध्याय में वर्णित किन्हीं 2 धार्मिक उपदेशकों/चिंतकों/संतों का चयन कीजिए और उनके जीवन व उपदेशों के बारे में अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए। इनके समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचारों के बारे में एक विवरण तैयार कीजिए। हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है और हमें क्यों लगता है कि वे महत्त्वपूर्ण हैं।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
- पृष्ठ 167 की काल-रेखा से दो नाम चुनिए, जैसे एक भक्त संत और एक सूफ़ी।
- हर एक के लिए चार खाने बनाइए: समय, क्षेत्र, मुख्य विचार, और जानकारी के स्रोत।
- स्रोतों में देखिए कि उनकी अपनी रचनाएँ, बाद में लिखी जीवनियाँ, मुलफुज़ात या तज़किरा में से क्या मिलता है (पृष्ठ 165)।
- याद रखिए कि जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं होतीं, पर बताती हैं कि अनुयायी उन्हें कैसे देखते थे (पृष्ठ 140)।
- अंत में लिखिए कि आज उनकी रचनाएँ कहाँ गाई या पढ़ी जाती हैं।
प्रश्न 12. इस अध्याय में वर्णित सूफ़ी व देव स्थलों से संबद्ध तीर्थयात्रा के आचारों के बारे में अधिक जानकारी हासिल कीजिए। क्या यह यात्राएँ अभी भी की जाती हैं? इन स्थानों पर कौन लोग और कब-कब जाते हैं? वे यहाँ क्यों जाते हैं? इन तीर्थयात्राओं से जुड़ी गतिविधियाँ कौन सी हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
- एक सूफ़ी स्थल (जैसे अजमेर) और एक मंदिर (जैसे पुरी) चुनिए।
- अध्याय से शुरुआत कीजिए: दरगाह पर ज़ियारत, उर्स, समा और कव्वाली (पृष्ठ 153–157); मंदिरों में संतों के भजनों का गायन और प्रतिमाओं के जुलूस (पृष्ठ 143, 146)।
- जाने वालों से या अपने परिवार से पूछिए: कौन जाता है, साल में कब, और क्यों।
- गतिविधियों की सूची बनाइए: चढ़ावा, लंगर या भोजन, संगीत, मेले।
- तुलना कीजिए कि आज के आचार किताब के वर्णन (जैसे जहाँआरा की यात्रा, स्रोत 7) से कितने मिलते हैं।
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 143). अपने शहर या गाँव में पूजित देवी–देवताओं के नाम और उनके चित्रण पर विचार कीजिए। उनकी उपासना से जुड़े अनुष्ठानों की व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपके अपने इलाके की खोज है। तरीका:
- तीन-चार देवी-देवताओं के नाम लिखिए और देखिए कि उनकी प्रतिमा किस रूप में है।
- किताब से मिलान कीजिए: देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में होती थी, और पुरी में जगन्नाथ की प्रतिमा लकड़ी की है (पृष्ठ 141–142)।
- पूछिए कि कौन-से अनुष्ठान होते हैं, कौन करवाता है, और क्या कोई स्थानीय देवी किसी बड़े देवता की पत्नी के रूप में भी पूजी जाती है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 144). क्या आपको लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति व्यवस्था के विरोधी थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: पूरी तरह नहीं, पर वे भक्ति को वर्ण से ऊपर रखते थे।
क्या कहते हैं: विष्णु उन चतुर्वेदियों से अधिक, जो विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, उन “दासों” को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
कौन कह रहा है: तोंदराडिप्पोडि ख़ुद ब्राह्मण अलवार थे।
इसलिए वे जन्म के आधार पर बड़प्पन को चुनौती देते हैं, जो किताब की इस बात से मेल खाता है कि जाति-विरोध वाला मत कुछ हद तक सत्य प्रतीत होता है। (पृष्ठ 144)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 144). क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडि और अप्पार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, दोनों भक्ति को शास्त्र-ज्ञान और कुल से बड़ा मानते हैं, पर कहने का ढंग अलग है।
तोंदराडिप्पोडि: निष्ठा न रखने वाले चतुर्वेदियों की तुलना भक्त “दासों” से करते हैं।
अप्पार: शास्त्र उद्धृत करने वालों को “हे धूर्तजन” कहकर पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?” और केवल मारपेरू के स्वामी (शिव) के आगे झुकने को कहते हैं।
अप्पार ज़्यादा तीखे हैं; दोनों के लिए इष्ट के प्रति प्रेम ही कसौटी है। (पृष्ठ 144)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 145). उन उपायों की सूची बनाइए जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आप को प्रस्तुत करती हैं। किस भाँति यह उपाय स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा से भिन्न हैं।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 3 (“एक राक्षसी?”) में वे अपने को सुंदर नहीं, डरावने रूप में दिखाती हैं।
- फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश और आगे निकले दाँत;
- वन में चीखती और क्रंदन करती हुई;
- वह वन “जो हमारे पिता (शिव) का घर है”।
वे सजने-सँवरने और सुंदर दिखने के बजाय शिव की भक्ति को ही अपनी पहचान बनाती हैं। उन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया था, और किताब कहती है, “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।” (पृष्ठ 144–145)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 146). आपको क्यों लगता है कि शासक भक्तों से अपने संबंध को दर्शाने के लिए उत्सुक थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब से ये कारण मिलते हैं:
जनता का समर्थन: वेल्लाल किसान इन संतों का आदर करते थे, इसलिए शासक भी उनका समर्थन चाहते थे।
दैवीय समर्थन का दावा: चोल शासक भव्य मंदिर बनवाकर और उनमें पत्थर और धातु की मूर्तियाँ लगवाकर दैवीय समर्थन जताते थे।
दिखने वाला संबंध: परांतक प्रथम ने 945 ईसवी में संत कवियों की प्रतिमाएँ शिव मंदिर में लगवाईं, जिन्हें उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।
अपनी राय भी जोड़िए: संतों से जुड़कर शासक लोगों की श्रद्धा अपनी ओर खींच सकते थे। (पृष्ठ 145–146)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 147). अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए। वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं।
उत्तर देखिए
उत्तर: बासवन्ना दिखावटी अनुष्ठानों के विरोधी हैं।
रवैया: लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप आए तो कहते हैं “मारो–मारो”; जो सेवक खा सकता है उसे कहते हैं “चले जाओ! चले जाओ।”, और जो प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं।
समझाने का ढंग: वे रोज़ की जानी-पहचानी बातों के जोड़े रखकर उलटापन दिखाते हैं, ताकि श्रोता ख़ुद देख ले कि कर्मकांड और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते। भाषा सरल है, जैसा किताब वचनों के बारे में कहती है। (पृष्ठ 147, 166)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 149). वे कौन लोग थे जिनकी तरफ़ से अकबर को अपने फ़रमान की बेअदबी का अंदेशा था?
उत्तर देखिए
उत्तर: खम्बायत (गुजरात) के प्रभावशाली लोग। फ़रमान कहता है कि “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ”, यानी अकबर को डर था कि शहर के बड़े लोग पादरियों को गिरजाघर बनाने से रोक सकते हैं। (पृष्ठ 149)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 150). जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए। जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
देवता: शिव। पत्र में “श्री शिव जियो की पनाह” लिखा है।
बादशाह का रवैया: आदर और उदारता का। औरंगज़ेब ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”
(पृष्ठ 150)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 152). अपने गाँव अथवा शहर की मस्जिद की स्थापत्य कला के बारे में जानकारी हासिल कीजिए। इसे बनाने में किस तरह की सामग्री का इस्तेमाल हुआ है? क्या यह सामग्री स्थानीय स्तर पर मिलती है? क्या इसके कुछ विशिष्ट स्थापत्य लक्षण हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपके अपने इलाके की खोज है। तरीका:
- मस्जिद की दिशा देखिए और मेहराब और मिम्बर पहचानिए; किताब के अनुसार मक्का की ओर अनुस्थापन हर जगह एक-सा है।
- छत का आकार और सामान (पत्थर, ईंट, लकड़ी) लिखिए, और पूछिए कि यह सामान आसपास मिलता है या नहीं।
- किताब के उदाहरणों से मिलाइए: केरल की शिखर जैसी छत, अतिया मस्जिद की ईंटें, शाह हमदान मस्जिद की कश्मीरी लकड़ी (पृष्ठ 151–152)।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 153). क्या आपके गाँव अथवा शहर में ख़ानक़ाह या दरगाह है? मालूम कीजिए इनकी स्थापना कब हुई थी तथा इनके संग कौन से क्रियाकलाप जुड़े हुए हैं? क्या ऐसे अन्य स्थान हैं जहाँ धार्मिक स्त्री और पुरुष मिलते और रहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपके अपने इलाके की खोज है। तरीका:
- दरगाह के बारे में वहाँ के लोगों से पूछिए: किसकी है, कब बनी, उर्स कब होता है।
- क्रियाकलाप लिखिए: ज़ियारत, कव्वाली या समा, लंगर। किताब में ये सब चिश्ती परंपरा में आते हैं (पृष्ठ 153–157)।
- दूसरे स्थान भी सोचिए जहाँ धार्मिक लोग साथ रहते हैं, जैसे मठ; असम के सत्र (मठ) का उदाहरण पृष्ठ 164 पर है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 155). यह बताइए कि कलाकार शेख साहब और उनके शिष्य में कैसे फर्क डालता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: सत्रहवीं शताब्दी के इस चित्र में शेख निज़ामुद्दीन औलिया और उनके शिष्य अमीर खुसरो आम के पेड़ के नीचे हैं:
- शेख बैठे हैं, सिर के पीछे प्रभामंडल है और पास में किताब है;
- शिष्य उनके सामने घुटनों के बल है और उसके हाथ में तार वाला वाद्य है।
यानी कलाकार बैठने के ढंग, प्रभामंडल और हाथ की चीज़ से गुरु का ऊँचा दर्जा और शिष्य की विनम्रता दिखाता है। वाद्य याद दिलाता है कि अमीर खुसरो संगीतज्ञ थे (पृष्ठ 157)। (पृष्ठ 155)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 155). चित्र में कलाकार के हस्ताक्षर ढूँढ़िए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह मनोहर नाम के कलाकार का चित्र है (लगभग 1615), जिसमें शेख अजमेर की तीर्थयात्रा पर आए बादशाह जहाँगीर का स्वागत कर रहे हैं। चित्र में फ़ारसी लिपि की लिखावट एक ही जगह है: ऊपर दाएँ, पेड़ के पास एक छोटी पंक्ति। हस्ताक्षर वहीं खोजना है; किताब उस पंक्ति को पढ़कर नहीं बताती। (पृष्ठ 155)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 156). जहाँआरा कौन सी चेष्टाओं का ज़िक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाती हैं। दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
रास्ते में: हर रोज़ दो बार की अख़्तियारी नमाज़; रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; दरगाह की तरफ़ न पैर फैलाए, न पीठ की।
दरगाह में: “अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से” रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लिए, इतर छिड़का और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
दरगाह की खासियत: वे उसे बार–बार मुकद्दस (पवित्र) दरगाह कहती हैं, जो “चिराग और इतर में डूबे” थी और गुम्बद के भीतर “रोशनी से भरी” थी; उसकी चौखट और वहाँ की ज़मीन तक को वे आदर देती हैं। (पृष्ठ 156)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 157). इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर:
समानता: दोनों में पीर या शेख के प्रति भक्ति है। चरखानामा कहता है, “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।”; जहाँआरा मज़ार पर इतर और दुपट्टा चढ़ाती हैं।
अंतर (कौन, कहाँ): चरखानामा घर में चरखा कातते हुए गाया जाने वाला गीत है; जहाँआरा की ज़ियारत एक शहज़ादी की लंबी तीर्थयात्रा है, जो उन्होंने शेख की जीवनी में लिखी।
अंतर (तरीका): गीत में रोज़ का काम ही ज़िक्र बन जाता है (ज़िक्र–ए–जाली, ज़िक्र–ए–कल्बी, ज़िक्र–ए–आइनी); जहाँआरा की भक्ति शरीर के आचारों से दिखती है: सात फेरे, ज़मीन चूमना, नंगे पाँव चलना। (पृष्ठ 156–157)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 159). धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के संभावित स्रोत क्या–क्या हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब से ये स्रोत मिलते हैं:
सत्ता का दिखावा: दोनों झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे।
पदवियाँ: शेखों को आडंबरपूर्ण पदवियाँ मिलती थीं, जैसे सुल्तान–उल–मशेख।
भेंट और ज़मीन: शासक भेंट देकर संतों को जोड़ना चाहते थे, पर स्रोत 9 में शेख ने ज़मीन का पट्टा नहीं लिया।
शरिया का प्रश्न: उलमा शरिया लागू करवाना चाहते थे, जबकि सुल्तानों ने यह माँग ठुकराई।
अपनी राय भी जोड़िए: जनता की निष्ठा किसके साथ है, यह भी टकराव की जड़ बन सकता है। (पृष्ठ 158–159)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 159). सूफ़ियों और राज्य के बीच संबंध का कौन सा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है? यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
राज्य से संबंध: शासक शेखों को धन और ज़मीन भेंट करके उनसे जुड़ना चाहते थे, पर चिश्ती शेख दूरी बनाए रखते थे। शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने बगीचे और ज़मीन नहीं ली; शेख फ़रीदुद्दीन ने धन दरवेशों में बाँटने के लिए लिया, पर पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।”
संपर्क का तरीका: अनुयायी शेख से मिलने आते थे; अमीर हसन सिजज़ी लिखते हैं कि वे शेख के कदम चूम सके। इस अंश में शेख फ़रीदुद्दीन का एक किस्सा भी आता है, यानी सीख बातचीत और किस्सों से दी जाती थी। ऐसे मिलने वाले कवियों और इतिहासकारों ने शेख के बारे में लिखा भी। (पृष्ठ 154, 159)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 160). विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: कबीर तर्क और सवाल से बात रखते हैं।
सवाल: “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?” यह कैसे हो सकता है।
नाम अलग, ईश्वर एक: अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि और हज़रत एक ही ईश्वर के नाम हैं; “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
दोनों पर चोट: दोनों भुलावे में हैं; एक बकरे को मारता है, दूसरा गाय को, और दोनों पूरा जीवन विवादों में गँवा देते हैं। (पृष्ठ 160)
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 164). यह उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: मीराबाई राणा से डरती नहीं हैं।
वे कहती हैं, “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।” यानी राणा मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी।
उनके लिए राणा का रूठना छोटी बात है, हरि का रूठना बड़ी।
यह उनके जीवन से मेल खाता है: उन्होंने ससुराल के दायित्व नहीं निभाए, कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़ दिया। (पृष्ठ 163–164)
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 164). आपको क्यों लगता है कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई इक्कीसवीं शताब्दी में भी महत्त्वपूर्ण हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपकी अपनी राय का प्रश्न है। किताब से ये बातें काम आएँगी:
कबीर: ईश्वर एक है और समुदायों के झगड़े व्यर्थ हैं (स्रोत 10)।
बाबा गुरु नानक: बाहरी आडंबर के बजाय नाम का स्मरण, और संगत में मिलकर उपासना; उनकी बानी गुरु ग्रंथ साहिब में है।
मीराबाई: जातिवादी रूढ़ियाँ तोड़ीं; उनके पद आज भी गुजरात और राजस्थान में गाए जाते हैं।
परंपराएँ जीवित हैं: किताब के अनुसार लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं (पृष्ठ 166)।
इनसे जोड़कर लिखिए कि आज के समाज में बराबरी और आपसी आदर की बात इन्हें क्यों प्रासंगिक बनाती है। (पृष्ठ 160–166)
झटपट दोहराइए
1. प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग किस शताब्दी का है, और इसके नेता कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: लगभग छठी शताब्दी; अलवार (विष्णु भक्त) और नयनार (शिव भक्त)। (पृष्ठ 143)
2. नलयिरादिव्यप्रबंधम् को क्या कहा गया?
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उत्तर: तमिल वेद। (पृष्ठ 144)
3. किस चोल सम्राट ने संत कवियों की धातु प्रतिमाएँ शिव मंदिर में लगवाईं?
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उत्तर: परांतक प्रथम, 945 ईसवी के अभिलेख के अनुसार। (पृष्ठ 146)
4. वीरशैव आंदोलन का नेतृत्व किसने किया?
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उत्तर: बासवन्ना (1106–68), कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री। (पृष्ठ 146)
5. ज़िम्मी कौन थे?
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उत्तर: संरक्षित श्रेणी के लोग, जो जज़िया चुकाकर संरक्षण पाते थे; भारत में हिंदू भी इसमें शामिल किए गए। (पृष्ठ 149)
6. अकबर ने खम्बात के गिरजाघर का फ़रमान कब जारी किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1598 में। (पृष्ठ 149)
7. इस्लाम के पाँच मुख्य आचार कौन-से हैं?
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उत्तर: एक ईश्वर और पैगम्बर मोहम्मद को दूत मानना, पाँच बार नमाज़, ज़कात, रमज़ान में रोज़ा, हज। (पृष्ठ 150)
8. सिलसिला का शाब्दिक अर्थ क्या है?
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उत्तर: जंज़ीर। (पृष्ठ 153)
9. उर्स किसे कहते हैं?
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उत्तर: पीर की बरसी पर दरगाह की ज़ियारत। (पृष्ठ 153)
10. अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान कौन थे?
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उत्तर: मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51)। (पृष्ठ 155)
11. अमीर खुसरो ने कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाने वाला क्या प्रचलित किया?
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उत्तर: कौल। (पृष्ठ 157)
12. कबीर की बानी किन तीन परिपाटियों में सँभली?
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उत्तर: कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ साहिब। (पृष्ठ 160)
13. आदि ग्रंथ साहिब किसने संकलित किया?
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उत्तर: पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने। (पृष्ठ 163)
14. मीराबाई कहाँ की राजकुमारी थीं और उनका विवाह किस कुल में हुआ?
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उत्तर: मारवाड़ के मेड़ता ज़िले की एक राजपूत राजकुमारी; विवाह मेवाड़ के सिसोदिया कुल में। (पृष्ठ 163)
15. शंकरदेव के उपदेश क्या कहलाते हैं?
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उत्तर: ‘भगवती धर्म’। (पृष्ठ 164)