अध्याय 8किसान, ज़मींदार और राज्य

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 8

यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं।

यह अध्याय लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी के उन गाँवों की बात करता है जिनमें हिंदुस्तान के करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग रहते थे। इसमें किसान और उनकी ज़मीन, सिंचाई और फ़सलें, गाँव की पंचायत और दस्तकार, महिलाएँ, जंगल वासी और ज़मींदार आते हैं, और साथ में मुग़ल राज्य, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। यह पूरी तसवीर आइन–ए–अकबरी और दूसरे स्रोतों को मिलाकर बनती है।

तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 222–223) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।


1. अध्याय एक नज़र में

  • काल: लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी।
  • इस अध्याय के स्रोत: अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी; सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़; पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़; बाबर का बाबरनामा; मुकुंदराम चक्रवर्ती का चंडीमंगल; तैवर्नियर और कारेरी जैसे यात्रियों के ब्योरे; मुग़ल चित्र।
  • मुख्य किरदार: किसान, गाँव की पंचायत और मुखिया, दस्तकार, महिलाएँ, जंगल वासी, ज़मींदार और मुग़ल राज्य।

2. ज़रूरी शब्द★

शब्दमतलब (हमारे शब्दों में)पृष्ठ
रैयत (बहुवचन रिआया), मुज़रियानमुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोतों में किसान के लिए शब्द; किसान या आसामी भी कहा जाता था197
खुद–काश्तउन्हीं गाँवों में रहने वाले किसान जिनमें उनकी ज़मीन थी197–198
पाहि–काश्तदूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले किसान197–198
जिन्स–ए–कामिलसर्वोत्तम फ़सलें, जैसे कपास और गन्ना, जिनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था200
मुक़द्दम या मंडलगाँव का मुखिया, पंचायत का सरदार201–202
पंचायतगाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा, आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले लोग202
पटवारीपंचायत का हिसाब रखने वाला, जो गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब बनाने में मुखिया की मदद करता था202
जाति पंचायतगाँव में हर जाति की अपनी पंचायत; राजस्थान में ये दीवानी के झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं और देखती थीं कि शादियाँ जाति के नियमों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं203
मीरास या वतनमहाराष्ट्र में दस्तकारों को सेवा के बदले मिली ज़मीन, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था205
जजमानीदस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले अदायगी की व्यवस्था; बंगाल में ज़मींदार रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे205
सराफ़मुद्रा की फेर–बदल करने वाले, जो बैंकर की तरह हवाला भुगतान भी करते थे206
जंगलीवे लोग जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था208
मवासमुग़ल राज्य की नज़र में जंगल: बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा208
परगनामुग़ल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल209
पेशकशमुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट209
पायकअसम में अहोम राजाओं के वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी210
ज़मींदारवे लोग जिनकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे211
मिल्कियतज़मींदार की व्यक्तिगत ज़मीन, जिसे वह बेच सकता था, किसी और के नाम कर सकता था या गिरवी रख सकता था211
सनदराज्यादेश, जिससे किसी ज़मींदारी के हक़ की पुष्टि होती थी212
जमा / हासिलजमा निर्धारित राजस्व की रक़म, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म213
अमील–गुज़ारराजस्व वसूली करने वाला अधिकारी213
दीवानवह अधिकारी जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी213
अमीनएक मुलाज़िम, जिसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो214
पोलज, परौती, चचर, बंजरअकबर के समय ज़मीन के चार वर्ग: हर साल खेती; कुछ समय खेती रोकी गई; तीन–चार साल ख़ाली; पाँच या ज़्यादा साल से ख़ाली214
मनसबदारीमुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर सैनिक–नौकरशाही तंत्र, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी214
कणकुतकण यानी अनाज, कुत यानी अंदाज़ा: फ़सल का अंदाज़ा लगाकर राजस्व तय करना215
बटाई (भाओली)फ़सल काटकर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा215
सुयूरग़ालदान में दिया गया राजस्व अनुदान218
दफ़्तर (आइन में)आइन के पाँच भाग218

3. किसानों को हम किन स्रोतों से जानते हैं★★

किताब का भाग 1 और 1.1, पृष्ठ 196–197 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1

गाँव, किसान और बाहर की ताकतें (भाग 1)

  • गाँवों का देश: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे।
  • फ़सल के दावेदार: छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने, और इन्हीं रिश्तों के ताने-बाने से गाँव का समाज बनता था।
  • मुग़ल राज्य: गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। राज्य के नुमाइंदे (राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूल करने वाले और हिसाब रखने वाले) चाहते थे कि खेतों की जुताई हो और राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए।
  • बाज़ार गाँव तक: कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों में आ गए, और खेती वाले इलाके शहरों से जुड़ गए।
  • गाँव, बुनियादी इकाई: खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई गाँव था। किसान साल भर ज़मीन की जुताई, बीज बोने और फ़सल की कटाई का काम करते थे, और शक्कर, तेल जैसी कृषि-आधारित वस्तुओं के उत्पादन में भी शरीक होते थे।
  • हर जगह एक-सी खेती नहीं: सूखी ज़मीन के विशाल हिस्सों और पहाड़ियों वाले इलाकों में उपजाऊ ज़मीन जैसी खेती नहीं हो सकती थी, और भूखंड का बहुत बड़ा हिस्सा जंगलों से घिरा था। कृषि समाज की बात करते समय इन भौगोलिक विविधताओं का ध्यान रखना होता है।

स्रोतों की तलाश (भाग 1.1)

  • किसान ख़ुद नहीं लिखते थे: इसलिए ग्रामीण समाज की जानकारी खेतों में काम करने वालों से नहीं मिलती। सोलहवीं और सत्रहवीं सदियों के कृषि इतिहास के मुख्य स्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे।
  • आइन–ए–अकबरी: इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक, जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने लिखा। इसमें खेतों की नियमित जुताई, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही, और राज्य और ज़मींदारों के रिश्तों के नियमन के लिए राज्य के इंतज़ामों का लेखा-जोखा बड़ी सावधानी से दिया गया है।
  • आइन का नज़रिया: इसका मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था। लेखक के अनुसार मुग़ल राज्य के ख़िलाफ़ किसी बगावत या स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था। किताब का निष्कर्ष: “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।”
  • दूर के इलाकों के दस्तावेज़: मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गए स्रोत भी हैं: सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़: ये पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका देते हैं।
  • इनसे क्या पता चलता है: ये सभी स्रोत किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े दर्ज करते हैं, और बताते हैं कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे।

4. किसान, ज़मीन, सिंचाई और फ़सलें★★

किताब का भाग 1.2–1.4, पृष्ठ 197–201 · प्रश्नावली में: प्रश्न 2

किसान और उनकी ज़मीन (भाग 1.2)

  • किसान के नाम: मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए आम तौर पर रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान शब्द इस्तेमाल करते थे; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं।
  • दो किस्म के किसान: सत्रहवीं सदी के स्रोत खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों की चर्चा करते हैं।

सत्रहवीं सदी के स्रोतों में दो किस्म के किसान

पहली किस्मखुद–काश्तउन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी
दूसरी किस्मपाहि–काश्तदूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे
पाहि–काश्त क्यों बनतेदो कारण
  • मर्ज़ी से: किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें
  • मजबूरी में: अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से
NCERT, पृष्ठ 197–198
  • कितनी ज़मीन: उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा कुछ होता था; ज़्यादातर के पास इससे भी कम। गुजरात में 6 एकड़ के करीब ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे। बंगाल में औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी, और 10 एकड़ वाले आसामी को अमीर समझा जाता था।
  • व्यक्तिगत मिल्कियत: खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर आधारित थी, और किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की। किताब उन्नीसवीं सदी के दिल्ली–आगरा इलाके का एक विवरण देती है, जो उसके अनुसार सत्रहवीं सदी पर भी उतना ही लागू होता है: “हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर ज़मीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और ज़मीन के ऐसे हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।”
  • स्रोत 1 (किसान बस्तियों का बसना–उजड़ना): मुग़ल शासक बाबर ने अपने संस्मरण बाबरनामा में हिंदुस्तानी कृषि समाज की यह ख़ासियत दर्ज की:
    • “हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।”
    • बरसों से आबाद बड़े शहर के लोग उसे छोड़ते हैं तो डेढ़ दिन के अंदर उनका हर नामोनिशान मिट जाता है।
    • बसने के लिए उन्हें पानी के रास्ते खोदने नहीं पड़ते, क्योंकि उनकी सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती हैं; वे एक सरोवर या कुआँ बना लेते हैं, झोंपड़ियाँ बनती हैं, “और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!”

सिंचाई और तकनीक (भाग 1.3)

  • खेती का विस्तार: ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ।
  • पहले पेट: खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।

बारिश के हिसाब से मुख्य फ़सल

प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिशचावलकमोबेश चावल की खेती
कम बारिशगेहूँ
और कम बारिशज्वार–बाजरा
NCERT, पृष्ठ 198
  • मानसून और सिंचाई: मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, जैसा आज भी है। पर कुछ फ़सलों को अतिरिक्त पानी चाहिए था, इसलिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े।
  • स्रोत 2 (पेड़ों और खेतों की सिंचाई): बाबरनामा के इस अंश में बाबर उत्तर भारत में देखे सिंचाई के उपकरण बताता है:
    • शरद ऋतु की फ़सलें बारिश के पानी से ही हो जाती हैं, और बसंत ऋतु की फ़सलें बारिश बिलकुल न होने पर भी हो जाती हैं; छोटे पेड़ों तक बालटियों या रहट से पानी पहुँचाया जाता है।
    • रहट: लाहौर, दीपालपुर (दोनों आज के पाकिस्तान में) जैसी जगहों पर। कुएँ की गहराई जितने लंबे रस्सी के दो गोलाकार फंदों पर लकड़ी के गुटके और उन पर घड़े बाँधे जाते हैं; रस्सियाँ कुएँ के ऊपर पहियों से लटकती हैं। बैल अंतिम पहिये को घुमाता है, उसके दाँत पास के पहिये के दाँतों को जकड़ते हैं, और घड़ों वाला पहिया घूमने लगता है। घड़ों से पानी जहाँ गिरता है, वहाँ से एक संकरा नाला खोदकर हर जगह पानी पहुँचाया जाता है।
    • बालटी: आगरा, चाँदवर और बयाना जैसे इलाकों में (आगरा और चाँदवर आज के उत्तर प्रदेश में, बयाना आज के राजस्थान में; किताब तीनों को उत्तर प्रदेश में बताती है)। कुएँ के किनारे लकड़ी के कन्नों के बीच बेलन टिकाकर, बड़ी बालटी की रस्सी बेलन पर लपेटी जाती है और उसका दूसरा छोर बैल से बाँधा जाता है; एक आदमी बैल हाँकता है, दूसरा बालटी से पानी निकालता है।
  • राज्य की मदद: उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर।
  • औज़ार: खेती मेहनत का काम थी, पर किसान अक्सर पशुबल पर आधारित तकनीकें भी इस्तेमाल करते थे।
    • लकड़ी का हलका हल, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी। ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहरा नहीं खोदते थे, इसलिए तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी।
    • बीज बोने के लिए बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा, पर बीज हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था।
    • मिट्टी की गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार।

फ़सलों की भरमार (भाग 1.4)

  • दो मौसम: खेती दो मुख्य चक्रों में होती थी: खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)। सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थीं; जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक़्त थे, वहाँ तीन भी।
  • विविधता: आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर मुग़ल प्रांत आगरा में 39 किस्म की और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें उगाई जाती थीं। बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में पैदा होती थीं।
  • जिन्स–ए–कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें): मुग़ल राज्य इनकी खेती को बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था। कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे। कपास मध्य भारत और दक्कनी पठार में उगाई जाती थी, और बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ़सलों में आते थे।
  • गुज़ारा और व्यापार साथ-साथ: दैनिक आहार की खेती पर ज़्यादा ज़ोर था, पर इसका मतलब यह नहीं कि खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी। एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।
  • नयी फ़सलें: सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फ़सलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचीं। मक्का अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते आया, और सत्रहवीं सदी तक पश्चिम भारत की मुख्य फ़सलों में गिना जाने लगा। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्ज़ियाँ और अनानास और पपीता जैसे फल नयी दुनिया से आए।
  • तम्बाकू का प्रसार (बॉक्स): तम्बाकू सबसे पहले दक्कन पहुँचा, और सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया। आइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती। अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा। जहाँगीर ने धूम्रपान की इस आदत के फैलने से चिंतित होकर इस पर पाबंदी लगाई, पर पाबंदी बेअसर रही: सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था।
  • आबादी की बढ़ोतरी (बॉक्स): खेती के ऐसे विविध और लचीले तरीकों का एक बड़ा नतीजा यह था कि आबादी धीरे-धीरे बढ़ी। आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार, समय-समय की भुखमरी और महामारी के बावजूद, 1600 से 1800 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी की बढ़ोतरी। (किताब में यहाँ “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है।)

5. ग्रामीण समुदाय: जाति, पंचायत और दस्तकार★★

किताब का भाग 2, पृष्ठ 201–206 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 9

समुदाय के तीन घटक (भाग 2)

  • मिल्कियत अपनी, समुदाय साझा: किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह कई मायनों में एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था।
  • तीन घटक: खेतिहर किसान, पंचायत, और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)।

जाति और ग्रामीण माहौल (भाग 2.1)

  • बँटे हुए किसान: जाति और जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई समूहों में बँटे थे। जुताई करने वालों में बड़ी तादाद उन लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे या खेतों में मज़दूरी करते थे।
  • ज़मीन थी, फिर भी ग़रीबी: खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे। उस समय जनगणना नहीं होती थी, पर जो थोड़े-बहुत आँकड़े हैं उनसे पता चलता है कि गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था। इनके पास संसाधन सबसे कम थे, और इनकी हालत कमोबेश वैसी ही थी जैसी आधुनिक भारत में दलितों की।
  • दूसरे संप्रदायों में भी: मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे ‘नीच’ कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे; बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी।
  • निचले तबके और बीच के समूह: निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था; बीच के समूहों में ऐसा नहीं था।
    • सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है; उसके अनुसार जाट भी किसान थे, पर जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों से नीची थी।
    • सत्रहवीं सदी में वृंदावन (उत्तर प्रदेश) के इलाके में गौरव समुदाय ने भी राजपूत होने का दावा किया, जबकि वे ज़मीन की जुताई के काम में लगे थे।
    • पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े की वजह से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं।
    • पूर्वी इलाकों में पशुपालक और मछुआरी जातियाँ, जैसे सदगोप और कैवर्त, भी किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगीं।

पंचायतें और मुखिया (भाग 2.2)

गाँव का नियमन, किताब के अनुसार

ग्राम पंचायतबुज़ुर्गों का जमावड़ासंपत्ति के पुश्तैनी अधिकार वाले गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग; फ़ैसला सबको मानना पड़ता था
मुखियामुक़द्दम या मंडलकुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता, फिर ज़मींदार से मंज़ूरी; भरोसा न रहे तो बर्ख़ास्त
पंचायत कापटवारीगाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब, मुखिया की निगरानी में
अलग सेजाति पंचायतगाँव में हर जाति की अपनी पंचायत; राजस्थान में दीवानी झगड़े, ज़मीन के दावे और शादियों में जाति के नियम
NCERT, पृष्ठ 202–203
  • पंचायत कौन: गाँव के बुज़ुर्ग, आम तौर पर वे महत्त्वपूर्ण लोग जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे। कई जातियों वाले गाँवों में पंचायत में भी विविधता होती थी। किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है, जिसमें अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी; फिर भी छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें जगह होने की संभावना कम थी।
  • मुखिया का काम: गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना; इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।
  • भ्रष्ट मंडल (बॉक्स): मंडल अक्सर अपने ओहदे का ग़लत इस्तेमाल करते थे। उन पर आरोप था कि वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब-किताब में हेरा-फेरी करते थे, और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।
  • आम ख़ज़ाना: पंचायत का खर्च गाँव के उस आम ख़ज़ाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति योगदान देता था। इससे गाँव का दौरा करने वाले कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी होती थी, बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटा जाता था, और ऐसे सामुदायिक काम होते थे जो किसान अकेले नहीं कर सकते थे, जैसे मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना।
  • जाति की हदें: पंचायत का एक बड़ा काम यह देखना था कि गाँव के अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों में रहें। पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं। “जाति की अवहेलना रोकने के लिए” लोगों के आचरण पर नज़र रखना मुखिया की ज़िम्मेदारियों में से एक था।
  • दंड: पंचायत जुर्माना लगा सकती थी, और समुदाय से निष्कासन जैसा गंभीर दंड भी दे सकती थी। निष्कासन सीमित समय के लिए होता था: दंडित व्यक्ति को उतने समय गाँव छोड़ना पड़ता, और वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था।
  • जाति पंचायत: ग्राम पंचायत के अलावा हर जाति की अपनी पंचायत होती थी, जो समाज में काफ़ी ताकतवर थी। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़े निपटाती थीं, ज़मीन के दावों के झगड़े सुलझाती थीं, यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं, और गाँव के आयोजन में किसे किसके ऊपर तरजीह मिलेगी। फ़ौजदारी न्याय को छोड़कर ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फ़ैसले मानता था।
  • अर्ज़ियाँ: पश्चिम भारत, ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र, के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत है।
    • ये अर्ज़ियाँ आम तौर पर ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग देते थे, कभी अकेले, कभी किसी जाति या संप्रदाय के रूप में सामूहिक तौर पर।
    • सबसे बड़ी शिकायत बहुत ज़्यादा कर की माँग थी, क्योंकि उससे किसानों का दैनिक गुज़ारा, ख़ासकर सूखे जैसी विपदाओं में, जोखिम में पड़ जाता था। उनकी नज़र में ज़िंदा रहने के न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक़ थे, और वे मानते थे कि पंचायत को इसकी सुनवाई करनी चाहिए और राज्य को अपना नैतिक फ़र्ज़ निभाना चाहिए।
  • समझौता या भाग जाना: अत्यधिक कर के मामलों में पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती थी। समझौता न हो तो किसान विरोध के ज़्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे गाँव छोड़कर भाग जाना। जोतने लायक खाली ज़मीन आसानी से मिल जाती थी और श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी, इसलिए गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में “एक बड़ा प्रभावी हथियार” था।

ग्रामीण दस्तकार (भाग 2.3)

  • कितने दस्तकार: अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे।
  • किसान भी दस्तकार: कई समूह खेती और दस्तकारी, दोनों करते थे: रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतन पकाना, खेती के औज़ार बनाना या उनकी मरम्मत। यह काम वे उन महीनों में करते थे जब खेती से फ़ुरसत होती, जैसे बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच।
  • सेवा के बदले: कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार भी गाँव के लोगों को अपनी सेवाएँ देते थे। बदले में उन्हें आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा मिलता था, या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी ज़मीन जो खेती लायक होने पर भी बेकार पड़ी थी। अदायगी कैसे होगी, यह शायद पंचायत तय करती थी।
  • मीरास या वतन: महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था।
  • जजमानी: कभी दस्तकार और हर खेतिहर परिवार आपस में बातचीत करके अदायगी तय करते थे, और आम तौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। अठारहवीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।” इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालाँकि यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। नकद अदायगी का चलन भी बिलकुल नदारद नहीं था।

एक “छोटा गणराज्य”? (भाग 2.4)

  • अंग्रेज़ अफ़सरों की राय: उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय गाँवों को ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे।
  • किताब की राय: गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती। संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं। कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था।
  • गाँव में नकद: इससे भी ज़रूरी बात यह कि गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे।
    • मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी।
    • निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को मज़दूरी या पूर्व भुगतान नकद मिलता था।
    • कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ़सलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकद होता था।
  • गाँव में मुद्रा (बॉक्स): सत्रहवीं सदी के फ़्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।” उसके अनुसार सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे, और अपनी मर्ज़ी से पैसे के मुक़ाबले रुपये की कीमत और कौड़ियों के मुक़ाबले पैसे की कीमत बढ़ा देते थे।

6. कृषि समाज में महिलाएँ★★

किताब का भाग 3, पृष्ठ 206–207 · प्रश्नावली में: प्रश्न 3

खेत और दस्तकारी में काम

  • कंधे से कंधा मिलाकर: महिलाएँ और मर्द साथ-साथ खेतों में काम करते थे। मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं।
  • घर-बाहर का फ़र्क नहीं चला: छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती के विकास के साथ घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद बने। इसलिए “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा फ़र्क यहाँ मुमकिन नहीं था।
  • पूर्वाग्रह फिर भी: महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर पूर्वाग्रह बने रहे। पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी; बंगाल में मासिक धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।
  • दस्तकारी: सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही बढ़ती।
  • खेत से बाज़ार तक: किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर खेतों के साथ नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करने जाती थीं। मुग़ल चित्रों में फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती दिखती हैं; आस-पास के दूसरे गाँवों से आने वाली महिलाएँ अक्सर ऐसे निर्माण-स्थलों पर बोझा ढोने का काम करती थीं।

संसाधन भी, काबू में भी

  • महत्त्वपूर्ण संसाधन: समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत के कारण महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता था।
  • शादीशुदा महिलाओं की कमी: कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादीशुदा महिलाओं की कमी थी।
  • अलग रिवाज: इससे किसान और दस्तकार समाज में ऐसे रिवाज बने जो संभ्रांत समूहों से बहुत अलग थे। कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करनी होती थी, दहेज नहीं। तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं।
  • कड़ा काबू: प्रजनन शक्ति पर काबू खो देने का बड़ा डर था। घर का मुखिया मर्द होता था, और परिवार और समुदाय के मर्द महिला पर पुरज़ोर काबू रखते थे। बेवफ़ाई के शक पर ही महिलाओं को भयानक दंड दिए जा सकते थे।
  • पंचायत को दरख़्वास्त: पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र) के दस्तावेज़ों में महिलाओं की वे दरख़्वास्तें मिलती हैं जो उन्होंने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजीं।
    • पत्नियाँ पतियों की बेवफ़ाई का विरोध करती थीं, या घर के मर्द पर पत्नी और बच्चों की अनदेखी का आरोप लगाती थीं।
    • मर्दों की बेवफ़ाई हमेशा दंडित नहीं होती थी, पर राज्य और “ऊँची” जाति के लोग अक्सर यह कोशिश करते थे कि परिवार के भरण-पोषण का इंतज़ाम हो जाए।
    • ज़्यादातर दस्तावेज़ों में दरख़्वास्त देने वाली महिला का नाम दर्ज नहीं होता था; उसे घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में लिखा जाता था।

ज़मीन और ज़मींदारी पर हक़

  • पुश्तैनी संपत्ति: भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था।
  • पंजाब: यहाँ महिलाएँ (विधवाएँ भी) पुश्तैनी संपत्ति बेचने वाली के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय थीं।
  • ज़मींदारी: हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे वे बेचने या गिरवी रखने के लिए स्वतंत्र थीं। बंगाल में भी महिला ज़मींदार थीं: अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक, राजशाही की ज़मींदारी, की कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी।

7. जंगल और कबीले★★

किताब का भाग 4, पृष्ठ 208–211 · प्रश्नावली में: प्रश्न 7

बसे हुए गाँवों के परे (भाग 4.1)

  • कितना जंगल: उत्तर और उत्तर–पश्चिमी भारत के गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़ दें तो ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे थे: झारखंड सहित पूरा पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (भारत–नेपाल सीमा की तराई सहित), दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार। उस समय के स्रोतों के आधार पर अंदाज़ा है कि अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों का औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी था।
  • “जंगली” का उस समय का अर्थ: उस समय की रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए जंगली शब्द इस्तेमाल करती हैं। पर इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था, जैसा आजकल समझा जाता है। यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था।
  • मौसम के हिसाब से काम (भील): बसंत में जंगल के उत्पाद इकट्ठा करना, गर्मियों में मछली पकड़ना, मानसून में खेती, और शरद और जाड़े में शिकार। यह सिलसिला लगातार गतिशीलता पर टिका था और उसे मज़बूत भी करता था; एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना जंगल के कबीलों की ख़ासियत थी।
  • राज्य की नज़र में जंगल: राज्य के लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था, बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास)। बाबर के अनुसार जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था “जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।” (परगना मुग़ल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल था।)

जंगलों में घुसपैठ (भाग 4.2)

  • हाथी और पेशकश: राज्य को सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश (मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट) में अक्सर हाथी भी होते थे।
  • शिकार अभियान: मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान इस बात का एक लक्षण था कि राज्य ग़रीबों और अमीरों, सबकी परवाह करता है। दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार के नाम पर बादशाह विशाल साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और अलग-अलग इलाकों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था। दरबारी चित्रों में शिकार बार-बार आता है, और चित्रकार अक्सर उसमें एक छोटा-सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था। बादशाहनामा के एक चित्र में शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है।
  • स्रोत 3 (कृषि बस्तियों के लिए जंगलों का सफ़ाया): सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल का नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है।
    • ख़बर मिलते ही तमाम जगहों से परदेसी आने लगे, और कालकेतु ने उन्हें चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे ख़रीदकर बाँटे।
    • कविता के अनुसार उत्तर से “दास / सैकड़ों उमड़ते हुए” आए; दक्खिन से फ़सल कटाई वाले “एक उद्यमी के साथ पाँच सौ”; और पश्चिम से ज़फ़र मियाँ “साथ में बाईस हज़ार लोग”।
    • जंगल हटाकर उन्होंने बाज़ार बसाए; “सैकड़ों सैकड़ों की तादाद में बिदेसी” जंगलों में घुस आए, और कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेर दहाड़ते हुए भाग निकले।
  • स्रोत 4 (पहाड़ी कबीलों और मैदानों के बीच व्यापार, लगभग 1595): अबुल फ़ज़्ल ने अवध सूबे (आज के उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के मैदानों और पहाड़ी कबीलों के लेन–देन का ब्योरा दिया है।
    • पहाड़ों से आने वाला सामान, इंसानों, मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर: सोना, ताँबा, शीशा, कस्तूरी, सुरागाय (याक) की पूँछ, शहद, चुक (संतरे और नींबू के रस को साथ उबालकर बना एक अम्ल), अनार दाना, अदरख, लंबी मिर्च, मजीठ की जड़ें (जिससे लाल रंग बनता है), सुहागा, ज़दवार (हल्दी जैसी एक जड़), मोम, ऊनी कपड़े, लकड़ी के सामान, और चील, बाज़, काले बाज़ और मर्लिन जैसे पक्षी।
    • बदले में पहाड़ों को जाने वाला सामान: सफ़ेद और रंगीन कपड़े, कहरुबा (जिससे गहने बनते थे), नमक, हींग, गहने, और शीशे और मिट्टी के बरतन।
  • व्यापार का असर: वाणिज्यिक खेती का असर बाहरी कारक के रूप में जंगलवासियों पर भी पड़ा। शहद, मधुमोम और लाक जैसे जंगल के उत्पादों की बहुत माँग थी; लाक तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में से था। हाथी पकड़े और बेचे जाते थे, और वस्तुओं की अदला–बदली भी होती थी।
  • ज़मीनी व्यापार में कबीले: कुछ कबीले भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच के ज़मीनी व्यापार में लगे थे, जैसे पंजाब का लोहानी कबीला, जो पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच के व्यापार में भी शरीक था।
  • सरदार से ज़मींदार और राजा: कबीलों के सरदार गाँव के “बड़े आदमियों” जैसे होते थे। कई सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी। सेना खड़ी करने के लिए उन्होंने अपने खानदान के लोगों को भर्ती किया या भाई–बंधुओं से सैन्य सेवा माँगी।
    • सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे।
    • असम में अहोम राजाओं के अपने पायक थे: वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपना एकाधिकार भी घोषित कर रखा था।
  • कबीले से राज्य तक: कबीलाई व्यवस्था से राजतंत्र की ओर बदलाव बहुत पहले शुरू हो चुका था, पर लगता है कि यह प्रक्रिया सोलहवीं सदी में आकर पूरी तरह विकसित हुई। आइन उत्तर–पूर्व के कबीलाई राज्यों के बारे में बताती है: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध किए और उन पर कब्ज़ा जमा लिया।
  • नए सांस्कृतिक प्रभाव: कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे–धीरे इस्लाम अपनाया, उसमें सूफ़ी संतों (पीर) की बड़ी भूमिका थी।

8. ज़मींदार★★

किताब का भाग 5, पृष्ठ 211–213 · प्रश्नावली में: प्रश्न 8

ज़मींदार कौन थे

  • खेती से कमाई, खेती में सीधे नहीं: ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। वे अपनी ज़मीन के मालिक थे और ऊँची हैसियत की वजह से उन्हें ख़ास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली थीं।
  • हैसियत के दो कारण: एक, जाति; दूसरा, वे राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे।
  • मिल्कियत: ज़मींदारों की समृद्धि की वजह उनकी विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी, जिसे मिल्कियत (यानी संपत्ति) कहते थे। इस पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूरों से। ज़मींदार इसे अपनी मर्ज़ी से बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे।
  • कर वसूली: ज़मींदार अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और बदले में उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था।
  • सैनिक ताकत: ज़्यादातर ज़मींदारों के अपने किले और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ थीं, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे।
  • एक समांतर सैनिक बल (बॉक्स): आइन के अनुसार मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति थी: 384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1,863 हाथी; 4,260 तोप; और 4,500 नाव।
  • पिरामिड का शीर्ष: मुग़ल गाँवों के सामाजिक संबंधों को पिरामिड मानें तो ज़मींदार उसके संकरे शीर्ष पर थे। अबुल फ़ज़्ल इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ग्रामीण समाज पर ठोस नियंत्रण था; ज़मींदारों में तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और कई मुसलमान ज़मींदार भी थे।

ज़मींदारी कैसे बनी और पक्की हुई

  • जंग में जीत: उस समय के दस्तावेज़ों से लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का एक संभावित स्रोत रही होगी। ताकतवर सैनिक सरदार कमज़ोर लोगों को बेदखल करके ज़मींदारी फैलाते थे। पर इसकी संभावना कम है कि राज्य ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त देता, जब तक एक राज्यादेश (सनद) से इसकी पुष्टि पहले न हो चुकी हो।
  • धीमी प्रक्रिया, ज़्यादा महत्त्वपूर्ण: ज़मींदारी पक्की करने की धीमी प्रक्रिया के दस्तावेज़ भी स्रोतों में हैं। यह कई तरीक़ों से होती थी: नयी ज़मीनें बसाकर (जंगल–बारी), अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
  • “निचली” जातियाँ भी: इन्हीं प्रक्रियाओं से अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे, क्योंकि उस काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी और बेची जाती थी।
  • वंश पर आधारित ज़मींदारियाँ: राजपूतों और जाटों ने उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी–बड़ी पट्टियों पर नियंत्रण पक्का किया; मध्य और दक्षिण–पश्चिम बंगाल में किसान–पशुचारियों (जैसे सदगोप) ने ताकतवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं।

ज़मींदारी पक्की होने के चार तरीक़े

पहलानयी ज़मीनें बसाकरजंगल–बारी
दूसराअधिकारों का हस्तांतरण
तीसराराज्य का आदेश
चौथाख़रीदकर
नतीजा"निचली" जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे
NCERT, पृष्ठ 212

गाँव में ज़मींदार की भूमिका

  • खेती का विस्तार: ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को खेती का साजो–सामान और उधार देकर उन्हें बसने में मदद की।
  • मुद्रा और बाज़ार: ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई। ज़मींदार अपनी मिल्कियत की फ़सल भी बेचते थे, और अक्सर बाज़ार (हाट) लगवाते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे।
  • शोषक, पर संरक्षक भी: इसमें शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, पर किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था। किताब इसके दो सबूत देती है:
    • भक्ति संतों ने जातिगत और दूसरे अत्याचारों की बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों को (और, दिलचस्प बात है, साहूकारों को भी) किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनके गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था।
    • सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए, और उनमें राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।

9. भू–राजस्व प्रणाली★★

किताब का भाग 6, पृष्ठ 213–215 · प्रश्नावली में: प्रश्न 5

राजस्व: साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद

  • बुनियाद: ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था। इसलिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, ताकि कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रहे और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के सभी इलाकों में राजस्व का आकलन और वसूली हो सके।
  • दीवान: इस तंत्र में दीवान शामिल था, जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी। इस तरह हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में दाखिल हुए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताकत बन गए।
  • पहले जानकारी, फिर कर: लोगों पर कर का बोझ तय करने से पहले मुग़ल राज्य ने ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में ख़ास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की।
  • दो चरण: भू–राजस्व के इंतज़ाम के दो चरण थे: पहला, कर निर्धारण; दूसरा, वास्तविक वसूली। जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म।
  • नक़द भी, फ़सल भी: अमील–गुज़ार (राजस्व वसूली करने वाले) के कामों की सूची में अकबर ने हुक्म दिया कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें, पर फ़सल में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे।
  • ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा: राजस्व तय करते समय राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, पर स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी इतनी वसूली सचमुच संभव नहीं हो पाती थी।
  • नपाई: हर प्रांत में जुती हुई और जोतने लायक, दोनों तरह की ज़मीन की नपाई हुई। अकबर के शासन काल में अबुल फ़ज़्ल ने आइन में ऐसी ज़मीनों के सभी आँकड़े संकलित किए। बाद के बादशाहों के समय भी नपाई की कोशिशें जारी रहीं: 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए। फिर भी सभी इलाकों की नपाई नहीं हो सकी; उपमहाद्वीप के जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई।
  • अमीन: एक मुलाज़िम, जिसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो रहा है।

ज़मीन का वर्गीकरण (स्रोत 5)

आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया।

अकबर के शासन में ज़मीन के चार वर्ग

हर साल खेतीपोलजएक के बाद एक हर फ़सल, कभी खाली नहीं
कुछ दिन खालीपरौतीताकि खोई ताकत वापस पा सके
तीन या चार वर्ष खालीचचर
पाँच या ज़्यादा वर्ष से खेती नहींबंजर
NCERT, पृष्ठ 214
  • तीन किस्में: पहले दो प्रकार की ज़मीन (पोलज और परौती) की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब।
  • शाही शुल्क कैसे निकलता था: हर किस्म की ज़मीन का उत्पाद जोड़ा जाता, उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता था।

वसूली के तरीक़े (स्रोत 6: नक़द या जीन्स?)

आइन के इस अनुच्छेद के अनुसार अमील–गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले, फ़सल लेने के लिए भी तैयार रहे। फ़सल में वसूली के चार तरीक़े बताए गए हैं:

  • कणकुत: हिंदी में कण का मतलब अनाज और कुत का मतलब अंदाज़ा। शक हो तो फ़सल को तीन अलग पुलिंदों में काटा जाए (अच्छा, मध्यम और बदतर) और इस तरह शक दूर किया जाए। अक्सर अंदाज़े से किया गया आकलन भी काफ़ी सही नतीजा देता है।
  • बटाई (भाओली): फ़सल काटकर जमा कर ली जाती, फिर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा होता। इसमें कई समझदार निरीक्षक चाहिए, वरना धोखेबाज़ी का डर रहता है।
  • खेत बटाई: बीज बोने के बाद खेत बाँट लिए जाते थे।
  • लाँग बटाई: फ़सल काटने के बाद उसका ढेर बनाकर आपस में बाँट लिया जाता, और हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता।

औरंगज़ेब का हुक्म (स्रोत 7: जमा)

  • 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व अधिकारी को हुक्म दिया कि वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें: हर गाँव और हर किसान (आसामीवार) के बारे में खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) पता करें, और बारीकी से जाँच के बाद सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) और किसानों के कल्याण, दोनों को ध्यान में रखकर जमा तय करें।

साम्राज्य का फैलाव और मनसबदार

  • फैलता साम्राज्य: मुग़ल साम्राज्य का इलाका तीन चरणों में बढ़ा: 1530 में बाबर के शासन तक, 1605 में अकबर के शासन तक और 1707 में औरंगज़ेब के शासन तक। जितना इलाका बढ़ा, उतनी ज़्यादा ज़मीन की नपाई, आकलन और वसूली राज्य के तंत्र को करनी पड़ी।
  • मनसबदारी व्यवस्था (बॉक्स): मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर एक सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी। कुछ मनसबदारों को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये भुगतान किया जाता था। समय–समय पर उनका तबादला होता था।

10. चाँदी का बहाव★★

किताब का भाग 7, पृष्ठ 215–217 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 10

बड़े साम्राज्य और व्यापार

  • एशिया के बड़े साम्राज्य: मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में था जो सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे। बाकी थे मिंग (चीन में), सफ़ावी (ईरान में) और ऑटोमन (तुर्की में)।
  • ज़मीनी व्यापार: इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की।
  • समुद्री व्यापार: खोजी यात्राओं और “नयी दुनिया” के खुलने से यूरोप के साथ एशिया, ख़ासकर भारत, के व्यापार में भारी विस्तार हुआ। भारत के समुद्र-पार व्यापार में भौगोलिक विविधता आई और कई नयी वस्तुओं का व्यापार शुरू हुआ।

चाँदी भारत में क्यों और कैसे

  • निर्यात के बदले चाँदी: भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। यह भारत के लिए अच्छा था, क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।
  • नतीजे: सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही। अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
  • जोवान्नी कारेरी: इटली का यह मुसाफ़िर लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा। उसने सजीव चित्र खींचा कि चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत कैसे पहुँचती थी। उससे यह भी पता चलता है कि सत्रहवीं सदी के भारत में नकद और वस्तुओं का बहुत बड़ी मात्रा में आदान–प्रदान हो रहा था।

भारत में चाँदी कैसे आई? (स्रोत 8)

जोवान्नी कारेरी का यह लेख बर्नियर के लेख पर आधारित है। उसके अनुसार “दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।”

स्रोत 8: सोना-चाँदी भारत तक, कारेरी के अनुसार

शुरुआतअमेरिकासोने-चाँदी का बहुत बड़ा हिस्सा यहीं से
बीच के देशतुर्की और फ़ारसथोड़ा तुर्की, कई वस्तुओं के लिए; थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस, रेशम के लिए
बंदरगाहमोचालाल सागर पर
बंदरगाहबसराफ़ारस की खाड़ी पर
मंज़िलइंदोस्तान (हिंदुस्तान)यूरोप जाने वाली वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जातीं, नकद यहीं रह जाता
NCERT, पृष्ठ 217
  • और रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव के टापू, मोज़ाम्बीक़ और दूसरी जगहों पर ले जाते थे, और इन देशों से सोना–चाँदी लाकर हिंदुस्तान पहुँचाते थे। डच लोग जापान की खानों से जो कुछ पाते थे, वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।
  • सबकी ज़रूरत: कारेरी के अनुसार तुर्की के लोग ओमान और अरबिया से आने वाली कॉफ़ी के बिना नहीं रह सकते थे, और फ़ारस, अरबिया और तुर्की के लोग भारत की वस्तुओं के बिना। इसलिए वे मुद्रा की विशाल मात्रा मोचा और बसरा भेजते थे, जहाँ से वह जहाज़ों से हिंदुस्तान पहुँचती थी।

11. अबुल फ़ज़्ल कीआइन–ए–अकबरी★★

किताब का भाग 8, पृष्ठ 217–221 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 12

ग्रंथ कैसे बना

  • एक बड़ी परियोजना: आइन–ए–अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी, जिसका ज़िम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया था।
  • कब पूरी हुई: अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद।
  • अकबरनामा का हिस्सा: आइन इतिहास लिखने की उस बड़ी परियोजना का हिस्सा थी जिसकी पहल अकबर ने की थी। उसका परिणाम अकबरनामा था, जो तीन जिल्दों में रचा गया: पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है, और तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है, जिसे शाही नियम–कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित किया गया।
  • किन बातों पर: दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन; राजस्व के स्रोत और अकबर के साम्राज्य के प्रांतों का भूगोल; और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिवाज। सरकार के सभी विभागों और प्रांतों (सूबों) के विस्तृत ब्योरे के साथ यह इन सूबों की पेचीदा, आँकड़ों वाली सूचनाएँ भी बारीकी से देती है।
  • बादशाह के लिए और हमारे लिए: सूचनाएँ इकट्ठा करके सिलसिलेवार संकलित करना एक महत्त्वपूर्ण शाही कवायद थी, जिससे बादशाह को साम्राज्य के सभी इलाकों के रिवाजों और पेशों की जानकारी मिली। हमारे लिए आइन अकबर के शासन के मुग़ल साम्राज्य के बारे में सूचनाओं की खान है। पर इसका नज़रिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया है, या किताब के शब्दों में “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”।

पाँच भाग (दफ़्तर)

आइन–ए–अकबरी के पाँच भाग (दफ़्तर)

पहलामंज़िल–आबादीशाही घर–परिवार और उसका रख–रखाव
दूसरासिपह–आबादीसैनिक और नागरिक प्रशासन, नौकरों की व्यवस्था
तीसरामुल्क–आबादीवित्त, राजस्व की दरें, "बारह प्रांतों का बयान"
चौथा और पाँचवाँलोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति–रिवाजआखिर में अकबर के "शुभ वचनों" का संग्रह
NCERT, पृष्ठ 218
  • पहले तीन भाग प्रशासन पर: दूसरे भाग (सिपह–आबादी) में शाही अफ़सरों (मनसबदार), विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ भी हैं।
  • मुल्क–आबादी में आँकड़े: साम्राज्य और प्रांतों के वित्तीय पहलुओं और राजस्व की दरों के बाद यह “बारह प्रांतों का बयान” देता है। इसमें सूबों और उनकी प्रशासनिक और वित्तीय इकाइयों (सरकार, परगना और महल) के भौगोलिक, स्थलाकृतिक और आर्थिक रेखाचित्र हैं, और हर प्रांत और उसकी इकाइयों की कुल मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) भी।
  • सरकारों की तालिकाएँ: सूबों के नीचे की इकाई सरकार की सूचनाएँ तालिकाओं में हैं। हर तालिका में आठ ख़ाने हैं:
    • (1) परगनात/महल; (2) क़िला; (3) अराज़ी और जमीन–ए–पाईमूद (मापे गए इलाके); (4) नकदी (नक़द निर्धारित राजस्व)
    • (5) सुयूरग़ाल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान); (6) ज़मींदार; (7 और 8) ज़मींदारों की जातियाँ, और उनके घुड़सवार, पैदल सिपाही (प्यादा) और हाथी (फ़ील) सहित उनकी फ़ौज।
  • नतीजा: मुल्क–आबादी उत्तर भारत के कृषि समाज का विस्तृत, आकर्षक और पेचीदा चित्र पेश करती है।

अबुल फ़ज़्ल ने सूचनाएँ कहाँ से लीं (स्रोत 9)

इस अंश का शीर्षक है “खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई”। अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसे हुक्म मिला: “शानदार घटनाओं और राज्य–क्षेत्र अधीन करने वाली हमारी फ़तहों की दास्तान ईमानदारी के कलम से लिखो…”। इसके लिए उसने:

  • बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़ इकट्ठे किए, और लंबे समय तक राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से सवाल-जवाब किए;
  • सच बोलने वाले समझदार बुज़ुर्गों और फ़ुर्तीले दिमाग वाले जवानों, दोनों की बातें परखकर लिखित रूप में दर्ज कीं;
  • सूबों को शाही हुक्म भिजवाया कि पुराने मुलाज़िमों में जिसे बीती घटनाएँ याद हों, वह अपने संस्मरण लिखकर दरबार भेजे; और हुक्म हुआ कि जमा सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए;
  • इलाही संवत के उन्नीसवें साल से, जब दस्तावेज़ दफ़्तर स्थापित हुआ, घटनाओं का इतिहासवृत्त लिया;
  • राज्याभिषेक से तब तक सूबों को जारी सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल हासिल की;
  • ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की भेजी रिपोर्टें शामिल कीं, जो साम्राज्य के मामलों या दूसरे देशों की घटनाओं के बारे में थीं;
  • जानकार और दूरदर्शी लोगों के लिखे कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र भी हासिल किए।

सावधानी भी, सीमाएँ भी

  • प्रामाणिकता की कोशिश: लेखक ने पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की। मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में शामिल करने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि की जाती थी। सांख्यिकी वाले खंडों में सभी आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी लिखे गए, ताकि बाद की प्रतियों में नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों।
  • सीमा 1, जोड़ की ग़लतियाँ: आइन का ध्यान से अध्ययन करने वाले इतिहासकारों को जोड़ में कई ग़लतियाँ मिली हैं: या तो अंकगणित की छोटी-मोटी चूक, या नकल उतारते समय अबुल फ़ज़्ल के सहयोगियों की भूल। ये आम तौर पर मामूली हैं और बड़े स्तर पर आँकड़ों की सच्चाई कम नहीं करतीं।
  • सीमा 2, आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में इकट्ठे नहीं हुए। कई सूबों के ज़मींदारों की जाति की विस्तृत सूचना है, पर बंगाल और उड़ीसा के लिए ऐसी सूचना नहीं है।
  • सीमा 3, कीमतें और मज़दूरी: राजकोषीय आँकड़े बड़ी तफ़सील से हैं, पर कीमतें और मज़दूरी उतनी अच्छी तरह दर्ज नहीं हुईं। जो विस्तृत सूची है, वह राजधानी आगरा या उसके आस-पास के इलाकों की है, इसलिए देश के बाकी हिस्सों के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है।
  • आइन का अनुवाद (बॉक्स): हेनरी ब्लॉकमेन ने आइन का संपादन किया, और कलकत्ता (आज का कोलकाता) की एशियाटिक सोसाइटी ने इसे अपनी बिब्लियोथिका शृंखला में छापा। इसका तीन खंडों में अंग्रेज़ी अनुवाद हुआ: पहले खंड का मानक अनुवाद ब्लॉकमेन का (कलकत्ता, 1873), बाकी दो खंडों के अनुवाद एच. एस. जैरेट के (कलकत्ता, 1891 और 1894)।

किताब का निष्कर्ष

  • अपने समय का अनोखा दस्तावेज़: इन सीमाओं के बावजूद आइन अपने समय के लिए एक असामान्य और अनोखा दस्तावेज़ है। साम्राज्य के गठन और संरचना की झलकियाँ और उसके बाशिंदों और उत्पादों के सांख्यिकीय आँकड़े देकर अबुल फ़ज़्ल मध्यकालीन इतिहासकारों की परंपराओं से कहीं आगे निकल गया।
  • पहले के इतिहासकार: अबुल फ़ज़्ल से पहले के इतिहासकार ज़्यादातर राजनीतिक घटनाओं (जंग, फ़तह, सियासी साज़िशें, वंशीय उथल–पुथल) के बारे में लिखते थे। देश, उसके लोगों या उत्पादों का ज़िक्र कभी-कभार प्रसंगवश ही आता था, एक राजनीतिक लेख की “साज–सज्जा” के रूप में।
  • संदर्भ बिंदु: लोगों और साम्राज्य की विस्तृत सूचनाएँ दर्ज करके आइन सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु बन गई। कृषि संबंधों के लिए इसके सांख्यिकीय सबूतों की अहमियत चुनौतियों से परे है; और लोगों, उनके पेशों, साम्राज्य की व्यवस्था और उच्चाधिकारियों की सूचनाओं की मदद से इतिहासकार उस समय के भारत के सामाजिक ताने–बाने का इतिहास फिर से रचते हैं।

12. आँकड़े और साल एक जगह★

पूरे अध्याय से, पृष्ठ 196–221

अध्याय के साल और संख्याएँ

साल या संख्याक्यापृष्ठ
करीब–करीब 85 फ़ीसदीसोलहवीं–सत्रहवीं सदी में हिंदुस्तान के इतने लोग गाँवों में रहते थे196
करीब 6 एकड़गुजरात में इतनी ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे198
5 एकड़; 10 एकड़बंगाल में औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा; इतनी ज़मीन वाला आसामी अमीर समझा जाता था198
प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादाइतनी बारिश वाले इलाकों में कमोबेश चावल की खेती होती थी198
39; 43; 50आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर आगरा प्रांत में फ़सलों की किस्में; दिल्ली प्रांत में फ़सलें; बंगाल में सिर्फ़ चावल की किस्में200
1604 ई.अकबर और उसके अभिजातों ने पहली बार तम्बाकू देखा200
1600 से 1800 के बीचभारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी (किताब में यहाँ “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है)200
25 फ़ीसदीकहीं–कहीं गाँव के कुल घरों में से इतने घर दस्तकारों के थे (अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़)204
करीब–करीब 40 फ़ीसदीउस समय के स्रोतों के आधार पर अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों का औसत208
लगभग 1595अबुल फ़ज़्ल का अवध के पहाड़ी कबीलों और मैदानों के व्यापार का ब्योरा (स्रोत 4)210
6000; 7000सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में घुड़सवार; पैदल सिपाही210
384,558; 4,277,057; 1,863; 4,260; 4,500आइन के अनुसार ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति: घुड़सवार; पैदल; हाथी; तोप; नाव212
1665 ई.औरंगज़ेब का हुक्म: हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब, और आसामीवार जाँच के बाद जमा तय करना (स्रोत 7)213, 215
1530; 1605; 1707मुग़ल साम्राज्य का विस्तार दिखाने वाले मानचित्र के तीन चरण: बाबर, अकबर और औरंगज़ेब का शासन214
4 वर्ग; 3 किस्मेंअकबर के शासन में ज़मीन के वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर); पोलज और परौती की किस्में (अच्छी, मध्यम, खराब)214
एक–तिहाईमध्यम उत्पाद का इतना हिस्सा शाही शुल्क माना जाता था214
लगभग 1690 ई.इटली का मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी भारत से होकर गुज़रा216
सोलहवीं से अठारहवीं सदीभारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में स्थिरता216
1598 ई.अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष में, पाँच संशोधनों के बाद, आइन पूरी हुई217
3 जिल्दें; 5 दफ़्तरअकबरनामा की जिल्दें (तीसरी आइन); आइन के भाग217–218
12; 8मुल्क–आबादी में “बारह प्रांतों का बयान”; सरकार की तालिकाओं के ख़ाने218
1873; 1891 और 1894आइन के अंग्रेज़ी अनुवाद: पहला खंड ब्लॉकमेन का; बाकी दो एच. एस. जैरेट के (सब कलकत्ता से)220

काल रेखा: मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव (पृष्ठ 221)

वर्षघटनापृष्ठ
1526दिल्ली के सुलतान, इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बनता है221
1530–40हुमायूँ के शासन का पहला चरण221
1540–55शेरशाह से हार कर हुमायूँ सफ़ावी दरबार में प्रवासी बन कर रहता है221
1555–56हुमायूँ खोये हुए राज्य को फिर से हासिल करता है221
1556–1605अकबर का शासन काल221
1605–27जहाँगीर का शासन काल221
1628–58शाहजहाँ का शासन काल221
1658–1707औरंगज़ेब का शासन काल221
1739नादिरशाह भारत पर आक्रमण करता है और दिल्ली को लूटता है221
1761अहमद शाह अब्दाली पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को हराता है221
1765बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिये जाते हैं221
1857अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ गद्दी से हटा देते हैं और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार में) भेज देते हैं221

13. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान

ग़लतीसही बातपृष्ठ
“1600 से 1700 के बीच आबादी 5 करोड़ बढ़ी”1600 से 1800 के बीच (200 वर्षों में) लगभग 5 करोड़, करीब 33 फ़ीसदी200
जमा और हासिल को एक माननाजमा निर्धारित रक़म थी, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म213
खुद–काश्त और पाहि–काश्त को उलट देनाखुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे197–198
परौती को ऐसी ज़मीन समझना जिस पर बरसों से खेती नहीं हुईपरौती पर कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती थी, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके; पाँच या ज़्यादा वर्ष से खाली ज़मीन बंजर थी214
“जंगली” का मतलब असभ्य समझनाउस समय यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था208
यह मानना कि उस समय खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थीदैनिक आहार पर ज़्यादा ज़ोर था, पर एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन जुड़े हुए थे200
भारतीय गाँव को बराबरी वाला “छोटा गणराज्य” मान लेनायह उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी; गाँव में संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत और जाति और जेंडर की गहरी विषमताएँ थीं205
यह मानना कि ज़मींदार खुद खेती करते थेज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; मिल्कियत पर अक्सर दिहाड़ी या पराधीन मज़दूर काम करते थे211
भक्ति संतों को ज़मींदारों का विरोधी मान लेनाभक्ति संतों के गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था, ज़मींदार नहीं212–213
यह मानना कि भारत में चाँदी की अपनी खानें थींभारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; चाँदी निर्यात के भुगतान के रूप में बाहर से आती थी216
आइन–ए–अकबरी को अकबरनामा से अलग किताब माननाआइन अकबरनामा की तीसरी जिल्द है; पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है217
आइन को आम किसान का नज़रिया माननाआइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”218
कीमतों और मज़दूरी की आइन की सूची को पूरे देश पर लागू करनावह सूची राजधानी आगरा और उसके आस–पास की है, इसलिए बाकी देश के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है220

14. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★

किताब की प्रश्नावली, पृष्ठ 222–223

उत्तर दीजिए (लगभग 100 से 150 शब्दों में)

प्रश्न 1. कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (1598 ई. में पूरी) अकबर के साम्राज्य के खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसकी सीमाएँ हैं।

  • ऊपर से देखा नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में आइन से जो पता चलता है वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है”; यह केंद्र की नज़र है, समाज के शीर्ष से देखी तसवीर। इसका उद्देश्य एक ऐसे साम्राज्य का खाका पेश करना था जहाँ मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल–जोल बनाए रखता था।
  • जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी चूक या नकल उतारने वाले सहयोगियों की भूल; ये आम तौर पर मामूली हैं।
  • आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे; जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है।
  • कीमतें और मज़दूरी: सिर्फ़ राजधानी आगरा और उसके आस–पास की विस्तृत सूची है।
  • इतिहासकार कैसे निपटते हैं: वे आइन को ध्यान से पढ़कर उसकी ग़लतियाँ पकड़ते हैं और उन्हें दूसरे स्रोतों से मिलाते हैं: सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़। ये किसानों, ज़मींदारों और राज्य के झगड़े और किसानों की नज़र भी दर्ज करते हैं।

(पृष्ठ 197, 218–220)

प्रश्न 2. सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? अपने उत्तर के कारण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: सिर्फ़ कुछ हद तक। खेती का पहला उद्देश्य पेट भरना था, पर किताब कहती है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।

  • गुज़ारे का पक्ष: चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
  • जिन्स–ए–कामिल: कपास और गन्ना जैसी सर्वोत्तम फ़सलों की खेती को मुग़ल राज्य बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे ज़्यादा कर मिलता था; तिलहन और दलहन भी नकदी फ़सलें थीं।
  • विविधता और नयी फ़सलें: आगरा प्रांत में 39 और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें; मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती और व्यापार की मुख्य वस्तु।
  • बाज़ार गाँव तक: बिक्री के लिए उगाई फ़सलों की वजह से व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में आए; कपास, रेशम या नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था।

(पृष्ठ 196, 198–201, 205–206)

प्रश्न 3. कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिका का विवरण दीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे।

  • खेत में: मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं।
  • घर ही उत्पादन की बुनियाद: किसान की व्यक्तिगत खेती में घर–परिवार का श्रम ही उत्पादन का आधार था, इसलिए “घर के लिए महिलाएँ, बाहर के लिए मर्द” जैसा बँटवारा मुमकिन नहीं था।
  • दस्तकारी: सूत कातना, बरतन के लिए मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर टिके थे; वाणिज्यीकरण बढ़ने के साथ इस श्रम की माँग बढ़ी।
  • बाहर भी काम: किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करती थीं; फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती थीं।
  • पाबंदियाँ: पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाएँ हल या कुम्हार का चाक नहीं छू सकती थीं; बंगाल में मासिक धर्म के समय पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।

(पृष्ठ 206–207)

प्रश्न 4. विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में नकद का लेन–देन दरबार से गाँव तक फैल चुका था।

  • चाँदी का बहाव: भारत के निर्यात का भुगतान करने के लिए चाँदी भारी मात्रा में भारत आई, जबकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
  • कारेरी की गवाही: लगभग 1690 ई. में भारत आए जोवान्नी कारेरी के अनुसार यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं और नकद भारत में ही रह जाता था।
  • राजस्व में नकद: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह खेतिहरों से नक़द भुगतान की कोशिश करे; मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी।
  • गाँव में नकद: निर्यात के लिए काम करने वाले दस्तकारों और कपास, रेशम, नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था। फ़्रांसीसी यात्री तैवर्नियर के अनुसार वे गाँव बहुत छोटे माने जाते जिनमें सराफ़ न हों।
  • ज़मींदार: ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ, और ज़मींदार हाट लगवाते थे।

(पृष्ठ 205–206, 212–213, 216–217)

प्रश्न 5. उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुग़ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू–राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब के अनुसार ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था। इसके सबूत:

  • पूरा प्रशासनिक तंत्र: दीवान के दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख थी; हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी कृषि संबंधों की निर्णायक ताकत बन गए।
  • नपाई और आँकड़े: हर प्रांत में जुती और जोतने लायक ज़मीन नपवाई गई; आइन हर प्रांत की मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) दर्ज करती है; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव के खेतिहरों का सालाना हिसाब और आसामीवार जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
  • बारीक नियम: ज़मीन के चार वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर), मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई शाही शुल्क, और कणकुत, बटाई जैसे वसूली के तरीक़े।
  • फ़सलों पर नज़र: राज्य जिन्स–ए–कामिल को बढ़ावा देता था क्योंकि उनसे ज़्यादा कर मिलता था।
  • मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।

(पृष्ठ 200, 213–215, 218)

निम्नलिखित पर एक लघु निबंध लिखिए (लगभग 250-300 शब्दों में)

प्रश्न 6. आपके मुताबिक कृषि समाज में सामाजिक व आर्थिक संबंधों को प्रभावित करने में जाति किस हद तक एक कारक थी?

उत्तर देखिए

उत्तर: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि समाज में जाति एक बहुत बड़ा कारक थी, सबसे ज़्यादा निचले तबकों के लिए; पर बाज़ार और पैसे के साथ बीच के समूहों की हैसियत बदल भी सकती थी।

1. काम और ग़रीबी

  • खेतिहर किसान जाति और जाति जैसे भेदभावों से कई समूहों में बँटे थे।
  • खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे; उनकी हालत कमोबेश आधुनिक भारत के दलितों जैसी थी।
  • मुसलमान समुदायों में भी हलालख़ोरान गाँव की हदों के बाहर रहते थे, और बिहार के मल्लाहज़ादाओं की तुलना दासों से की जा सकती थी।

2. बीच के समूहों में ढील

  • निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और हैसियत का सीधा रिश्ता था, बीच के समूहों में नहीं।
  • पशुपालन और बागबानी के मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली ऊपर उठे; पूर्व में सदगोप और कैवर्त किसानों जैसी स्थिति पाने लगे।

3. पंचायत में जाति

  • पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; ज़रूरत पर जुर्माना या निष्कासन देती थी।
  • राजस्थान में जाति पंचायतें दीवानी झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं, और यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं।
  • पंचायत में “नीच” काम करने वाले मज़दूरों के लिए जगह कम थी।

4. ज़मींदारी में जाति

  • ज़मींदारों की ऊँची हैसियत का एक कारण जाति था; ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ग्रामीण समाज पर ठोस नियंत्रण था।
  • पर ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी-बेची जाती थी, इसलिए “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।

निष्कर्ष: जाति काम, हैसियत, न्याय और ज़मीन पर पकड़ तय करती थी; फिर भी मुनाफ़ा, ज़मीन की ख़रीद–बिक्री और नकद के रिश्तों ने कुछ समूहों को ऊपर उठने का रास्ता दिया। (पृष्ठ 201–205, 211–212)

प्रश्न 7. सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी किस तरह बदल गई?

उत्तर देखिए

उत्तर: इन दो सदियों में राज्य, खेती और व्यापार, तीनों जंगलों तक पहुँचे, और जंगल वासियों की ज़िंदगी बदलने लगी।

1. पहले कैसा जीवन

  • अखिल भारतीय स्तर पर अंदाज़न लगभग 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था। “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था।
  • भीलों जैसे कबीले मौसम के हिसाब से काम बदलते और एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।

2. राज्य की घुसपैठ

  • राज्य जंगल को बदमाशों का अड्डा (मवास) मानता था।
  • सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए पेशकश में अक्सर हाथी लिए जाते थे।
  • दरबारी इतिहासकारों के अनुसार, शिकार अभियानों के बहाने बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता था।

3. खेती का फैलाव

  • मुकुंदराम चक्रवर्ती के चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल साफ़ करवाकर राज्य बसाता है; दूर–दूर से लोग आकर बाज़ार बसाते हैं।

4. व्यापार

  • शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थी; लाक समुद्र पार निर्यात की मुख्य वस्तु था।
  • हाथी पकड़े और बेचे जाते थे; पंजाब का लोहानी कबीला भारत–अफ़ग़ानिस्तान के ज़मीनी व्यापार में लगा था।

5. सरदार से राजा

  • कई कबीलाई सरदार ज़मींदार, कुछ राजा भी बने; सिंध की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल थे; अहोम राजाओं के पायक थे।
  • उत्तर–पूर्व में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों पर कब्ज़ा किया।

6. नए सांस्कृतिक प्रभाव

  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार नए बसे इलाकों में सूफ़ी संतों (पीर) ने इस्लाम के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई।

निष्कर्ष: घूमते रहने वाली, आत्मनिर्भर ज़िंदगी पर राज्य की माँगों, बसती खेती और बाज़ार का दबाव बढ़ा, और कबीलाई व्यवस्था राजतंत्र की ओर बढ़ी। (पृष्ठ 208–211)

प्रश्न 8. मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: ज़मींदार मुग़ल गाँवों के सामाजिक पिरामिड के संकरे शीर्ष पर थे: वे राज्य के सहायक भी थे, किसानों के शोषक भी, और कुछ हद तक संरक्षक भी।

1. कौन थे

  • उनकी कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे।
  • हैसियत के दो कारण: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)।
  • उनकी व्यक्तिगत ज़मीन मिल्कियत कहलाती थी, जिसे वे बेच या गिरवी रख सकते थे।

2. राज्य के लिए

  • वे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे।
  • उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं; आइन के अनुसार उनकी मिली–जुली शक्ति 384,558 घुड़सवार और 4,277,057 पैदल थी।

3. ज़मींदारी कैसे बनती

  • जंग में जीत एक संभावित स्रोत थी, पर राज्य आम तौर पर सनद के बिना ऐसी इजाज़त नहीं देता था।
  • ज़्यादातर धीमी प्रक्रिया से: नयी ज़मीनें बसाकर, अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।

4. गाँव की अर्थव्यवस्था में

  • उन्होंने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को साजो–सामान और उधार दिया।
  • अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते और हाट लगवाते थे; ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ।

5. शोषक, पर संरक्षक भी

  • भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनका निशाना राज्य का राजस्व अधिकारी था।
  • सत्रहवीं सदी के कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।

निष्कर्ष: ज़मींदार राज्य और किसान के बीच की कड़ी थे; उनके रिश्ते में शोषण के साथ पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था। (पृष्ठ 211–213)

प्रश्न 9. पंचायत और गाँव का मुखिया किस तरह से ग्रामीण समाज का नियमन करते थे? विवेचना कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: मुग़ल काल के गाँव में पंचायत और उसका सरदार, मुखिया, मिलकर गाँव का हिसाब, जाति के नियम और झगड़े सँभालते थे।

1. कौन

  • पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, आम तौर पर संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार वाले लोग; उसका फ़ैसला सबको मानना पड़ता था।
  • मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता और ज़मींदार उसे मंज़ूरी देता था; भरोसा न रहे तो उसे हटाया जा सकता था।

2. हिसाब और आम ख़ज़ाना

  • मुखिया पटवारी की मदद से गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब बनवाता था।
  • आम ख़ज़ाने से कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी विपदाओं से निपटना, और छोटे बाँध या नहर जैसे सामुदायिक काम होते थे।

3. जाति के नियम

  • पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; पूर्वी भारत में शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं।
  • वह जुर्माना लगा सकती थी, और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी।
  • हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी थी; फ़ौजदारी मामलों को छोड़कर राज्य उसके फ़ैसले मानता था।

4. शिकायतों की सुनवाई

  • सबसे निचले तबकों के लोग ज़बरन कर उगाही या बेगार के ख़िलाफ़ पंचायत को अर्ज़ियाँ देते थे; महिलाएँ भी न्याय और मुआवज़े के लिए दरख़्वास्त भेजती थीं।
  • पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती; न बने तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाते थे।

5. सीमाएँ

  • पंचायत “अल्पतंत्र” थी, जिसमें छोटे-मोटे काम करने वाले मज़दूरों की जगह कम थी।
  • मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी से मिलकर हिसाब में हेरा-फेरी करते और कर का बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।

निष्कर्ष: पंचायत और मुखिया गाँव में व्यवस्था रखते थे, पर उनका नियमन जाति की ऊँच–नीच और ताकतवर लोगों के हितों से बँधा था। (पृष्ठ 202–204, 207)

मानचित्र कार्य

प्रश्न 10. विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था। इन इलाकों के साथ यातायात–मार्गों को भी दिखाएँ।

उत्तर देखिए

उत्तर: पहले एटलस की मदद से नीचे के इलाके अंकित कीजिए, फिर किताब में बताए रास्ते तीर से दिखाइए:

  • ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार (मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों से होकर); भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार।
  • चाँदी का रास्ता (स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप के राज्यों होकर; थोड़ा तुर्की और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से भारत।
  • कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की।
  • भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते और सोना–चाँदी लाते थे; जापान की खानों की चाँदी भी डचों के ज़रिये भारत आती थी।
  • यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल, जहाँ भेजी जाने वाली भारतीय वस्तुएँ (जैसे यूरोपीय बाज़ार के लिए बने वस्त्र) नकद में ख़रीदी जाती थीं।

किताब इन रास्तों पर भारत के बंदरगाहों के नाम नहीं देती; भारत की ओर तीर बनाते समय बंदरगाह चुनने के लिए एटलस देखिए या अपने शिक्षक से पूछिए। (पृष्ठ 210, 215–217)

परियोजना कार्य (कोई एक)

प्रश्न 11. पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए। पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और वहाँ की पंचायत किस तरह काम करती है। जो आपने सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के बारे में सीखा है उससे इस सूचना की तुलना करते हुए, समानताएँ नोट कीजिए। परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं गाँव जाकर करनी है। तरीका:

  • तैयारी: प्रश्न की छह बातों की एक प्रश्नावली बनाइए, और जानकारी सरपंच, पटवारी, बुज़ुर्गों, किसानों, दस्तकारों और महिलाओं से अलग–अलग पूछिए।
  • तालिका बनाइए: चार ख़ाने रखिए: पहलू | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी (किताब से) | आज का गाँव (आपकी जानकारी) | बदलाव या निरंतरता।
  • किताब वाले ख़ाने के लिए: खरीफ़–रबी की फ़सलें और जिन्स–ए–कामिल; कहीं–कहीं 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के; पंजाब में ज़मीन बेचती महिलाएँ और ज़मींदारी पाने वाली महिलाएँ; बुज़ुर्गों की पंचायत, मुखिया, पटवारी और जाति पंचायत।
  • व्याख्या: हर बदलाव की वजह लिखिए, और जो चीज़ें आज भी वैसी हैं (जैसे फ़सलों के मौसम) उन्हें निरंतरता के रूप में दिखाइए।

आँकड़े वही लिखिए जो आपको गाँव में मिलें; अंदाज़ा हो तो उसे अंदाज़ा ही लिखिए। (पृष्ठ 200–207)

प्रश्न 12. आइन का एक छोटा सा अंश चुन लीजिए (10 से 12 पृष्ठ, दी गई वेबसाइट पर उपलब्ध)। इसे ध्यान से पढ़िए और इस बात का ब्योरा दीजिए कि इसका इस्तेमाल एक इतिहासकार किस तरह से कर सकता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब आइन पढ़ने के लिए एक वेबसाइट का पता देती है; अंश की प्रति के लिए अपने स्कूल के पुस्तकालय या शिक्षक की मदद लीजिए (अंग्रेज़ी अनुवाद ब्लॉकमेन और एच. एस. जैरेट के हैं)। फिर ब्योरा इन बिंदुओं में लिखिए:

  • अंश किस भाग से: पाँच दफ़्तरों में से कौन सा (जैसे मुल्क–आबादी, जिसमें सूबों, सरकारों और परगनों के आँकड़े हैं)।
  • क्या सूचना मिलती है: मापी गई ज़मीन, जमा, सुयूरग़ाल, ज़मींदारों की जातियाँ और फ़ौज, फ़सलें या रीति–रिवाज।
  • किसका नज़रिया: केंद्र का, समाज के शीर्ष से देखा हुआ।
  • सावधानी: जोड़ की ग़लतियाँ, सूबों के आँकड़ों में विषमता, और आगरा तक सीमित कीमतें–मज़दूरी।
  • इतिहासकार का इस्तेमाल: इन आँकड़ों को गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के दस्तावेज़ों या ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से मिलाकर उस समय के समाज की तसवीर बनाना।

(पृष्ठ 197, 217–220, 223)

किताब की गतिविधियाँ

ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 198). कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगी।

उत्तर देखिए

उत्तर: बाबरनामा में बाबर को सबसे ज़्यादा यह बात चौंकाती है कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ बहुत जल्दी उजड़ती और बसती थीं।

  • पल में उजड़ना: बरसों से बसे बड़े शहर के लोग भी चले जाएँ तो डेढ़ दिन में उनका हर नामोनिशान मिट जाता था।
  • बसने में आसानी: पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी, क्योंकि सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं; लोग एक सरोवर या कुआँ बना लेते थे।
  • न घर, न दीवार: खस की घास बहुत थी और जंगल अपार थे, इसलिए झोंपड़ियाँ बनाकर यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता था।
  • बेशुमार आबादी: आबादी इतनी थी कि लोग उमड़ते चले आते थे।

किताब भी कहती है कि ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से खेती लगातार फैलती रही। (पृष्ठ 198)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 199). सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई (अध्याय 7) व्यवस्था से कीजिए। सिंचाई की इन दोनों अलग–अलग प्रणालियों में किस–किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? इनमें से किन–किन प्रणालियों में कृषि तकनीक में सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी?

उत्तर देखिए

उत्तर: बाबर कुओं से पानी उठाने के साधन बताता है, जबकि विजयनगर में बाँध, हौज़ और नहरें थीं।

  • बाबर के साधन: लाहौर और दीपालपुर में रहट: रस्सी के फंदों पर लकड़ी के गुटके और घड़े, पहिये, और बैल से घूमने वाला दाँतों वाला पहिया; पानी एक संकरे नाले से खेत तक। आगरा, चाँदवर और बयाना में बालटी: लकड़ी के कन्ने, बेलन, रस्सी और बैल; एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा बालटी से पानी निकालता।
  • विजयनगर (अध्याय 7): धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़; एक बड़े हौज़ (आज का कमलपुरम् जलाशय) से आस–पास के खेत सींचे जाते थे; तुंगभद्रा पर बने बाँध से हिरिया नहर पानी लाती थी।
  • संसाधन: रहट और बालटी के लिए कुआँ, लकड़ी, रस्सी, घड़े, बैल और दो-एक आदमी काफ़ी थे; बाँध, बड़े हौज़ और नहरें बनाने में बहुत मज़दूर, सामान और शासकों की ताकत लगती होगी।
  • किसानों की भागेदारी: रहट और बालटी एक कुएँ पर दो-एक आदमी और बैलों से चलते थे, इसलिए उनमें सुधार किसानों की भागेदारी से ही होता होगा; बड़ी नहरों और हौज़ों में शासकों की भूमिका बड़ी थी, हालाँकि उनके पानी का इस्तेमाल किसान ही करते थे।

(पृष्ठ 199–200; विजयनगर के लिए अध्याय 7)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 201). इस अनुभाग में खेती संबंधी जिन क्रियाकलापों और तकनीकों की चर्चा हुई है उनमें से कौन–कौन सी अध्याय 2 में वर्णित तकनीकों और क्रियाकलापों से मिलती–जुलती हैं और कौन कौन सी भिन्न हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: भाग I के अध्याय 2 (राजा, किसान और नगर) में बताई खेती से तुलना:

  • मिलती-जुलती: लोहे के फाल वाला हल। अध्याय 2 में यह छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में फैला; मुग़ल काल में लकड़ी का हलका हल था जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी।
  • मिलती-जुलती: सिंचाई। अध्याय 2 में कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरें; यहाँ कुएँ, रहट और बालटी, और राज्य की खुदवाई नहरें, जैसे शाहजहाँ के समय पंजाब की शाह नहर।
  • भिन्न: अध्याय 2 में गंगा की घाटी की धान की रोपाई है (बीज अंकुरित करके पानी भरे खेत में पौधे लगाना); यहाँ बीज ज़्यादातर हाथ से छिड़ककर बोए जाते थे।
  • इस अध्याय में नया: बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा; गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी की मूठ वाले लोहे के पतले धार; खरीफ़ और रबी, कहीं साल में तीन फ़सलें; जिन्स–ए–कामिल; नयी फ़सलें (अफ्रीका और स्पेन के रास्ते मक्का; नयी दुनिया से टमाटर, आलू, मिर्च)।

(पृष्ठ 198–201)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 201). चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या–क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: यह आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का पंजाब के एक गाँव का चित्र है।

  • महिलाएँ: सूत कातती और अनाज कूटती दिखती हैं, जो किताब की इस बात से मेल खाता है कि सूत कातना महिलाओं के श्रम पर टिका था।
  • पुरुष: पगड़ी पहने एक आदमी भैंस के साथ है; आस–पास ऊँट, मवेशी और घड़े हैं।
  • वास्तुकला: मिट्टी के घर, और उनके बीच किले जैसी एक मीनार।

(पृष्ठ 201, 206)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 203). चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है?

उत्तर देखिए

उत्तर: आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी के इस चित्र में गाँव के बुज़ुर्ग कर अधिकारियों से मिल रहे हैं, और दोनों को अलग–अलग ढंग से दिखाया गया है।

  • बुज़ुर्ग: बाईं ओर करीब चौदह आदमियों का झुंड, ज़्यादातर पगड़ी में, कई की दाढ़ी सफ़ेद; उम्र और संख्या से वे गाँव के बड़े–बूढ़े लगते हैं।
  • अधिकारी: दाईं ओर सिर्फ़ दो आदमी: एक बही में लिख रहा है, दूसरा हरे कोट में है, और उनके पैरों के पास हिसाब की बहियाँ और कागज़ हैं; लिखा–पढ़ी और हिसाब उनकी पहचान है।

(पृष्ठ 203)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 204). चित्र में दर्शाई गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: यह कपड़ा उत्पादन दिखाने वाली सत्रहवीं शताब्दी की एक चित्रकारी है।

  • ऊपरी हिस्सा: चट्टानी पहाड़ी पर एक शासक बैठा है, साथ में सेवक और रंग–बिरंगे कपड़ों में लोग।
  • निचला हिस्सा: घास–फूस के एक छप्पर के पास कारीगर कपड़ा बिछा रहे हैं, धो रहे हैं, और सूत कात रहे हैं या कपड़ा तैयार कर रहे हैं।

किताब बताती है कि गाँवों में बहुत से दस्तकार थे, और कई किसान खेती से फ़ुरसत के महीनों में रँगरेज़ी और कपड़े पर छपाई भी करते थे। (पृष्ठ 204)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 206). इस अनुभाग में जिन पंचायतों का ज़िक्र किया गया है, वे आपके मुताबिक किस तरह से आज की ग्राम पंचायतों से मिलती–जुलती थीं अथवा भिन्न थीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: पहले किताब की पंचायत की बातें लिखिए, फिर अपनी ग्राम पंचायत के बारे में वही बातें पता करके मिलाइए:

  • सदस्य: तब गाँव के बुज़ुर्ग, आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले; यह एक “अल्पतंत्र” था जिसमें छोटे–मोटे काम करने वालों की जगह कम थी।
  • मुखिया: मुक़द्दम या मंडल, बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता और ज़मींदार की मंज़ूरी पाता; भरोसा न रहे तो हटाया जा सकता था।
  • काम: आम ख़ज़ाने से सामुदायिक काम, जाति की हदें बनाए रखना, जुर्माना और निष्कासन, अर्ज़ियों की सुनवाई।
  • आज के लिए पूछिए: सदस्य कैसे चुने जाते हैं, क्या सब जातियों और महिलाओं को जगह मिलती है, पैसा कहाँ से आता है, और पंचायत कौन से झगड़े सुलझाती है।

जो समान है उसे निरंतरता, और जो बदला है उसे परिवर्तन लिखिए। (पृष्ठ 202–204)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 207). क्या आपके प्रांत में कृषि भूमि पर महिलाओं और मर्दों की पहुँच में कोई फ़र्क़ है?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब उस समय की तसवीर देती है; आज की बात आपको अपने गाँव या परिवार से पता करनी है।

  • तब: भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था; पंजाब में महिलाएँ, विधवाएँ भी, ज़मीन बेचती थीं; हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी; अठारहवीं सदी में राजशाही की बड़ी ज़मींदारी की कर्ता–धर्ता एक स्त्री थी।
  • तब की सीमा: पंचायत को अर्ज़ी देने वाली महिलाओं के नाम दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं होते थे; उनका हवाला घर के मर्द की माँ, बहन या पत्नी के रूप में होता था।
  • आज के लिए: अपने गाँव में पूछिए कि ज़मीन के काग़ज़ों में किनके नाम हैं, बेटियों को ज़मीन मिलती है या नहीं, और ज़मीन बेचने–ख़रीदने का फ़ैसला कौन करता है।

(पृष्ठ 207)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 208). आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: बादशाहनामा के इस चित्र में शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है।

  • दृश्य: पहाड़ी, जंगली इलाके में बादशाह (शाहजहाँ) बंदूक से नीलगाय का शिकार कर रहा है; उसके सिर के पीछे रोशनी का घेरा (प्रभामंडल) है; दाईं ओर दरबारी खड़े हैं।
  • शिकार और न्याय: दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद गौर करता था।
  • सांकेतिक तत्व: किताब बताती है कि ऐसे चित्रों में चित्रकार अक्सर एक छोटा–सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था।

(पृष्ठ 208–209)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 209). यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें “बिदेसी” बताया गया है?

उत्तर देखिए

उत्तर: मुकुंदराम चक्रवर्ती के चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल साफ़ करवाकर राज्य बसाता है।

  • घुसपैठ के रूप: हर दिशा से परदेसियों का आना; चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे बाँटना; उत्तर से सैकड़ों दास, दक्खिन से एक उद्यमी के साथ पाँच सौ फ़सल काटने वाले, पश्चिम से ज़फ़र मियाँ के साथ बाईस हज़ार लोग; जंगल काटकर बाज़ार बसाना; कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेरों का भाग जाना।
  • चित्र से तुलना: चित्र में राज्य बादशाह के शिकार के रूप में जंगल में आता है, और उसे अच्छे शासन की तरह दिखाया गया है; कविता में जंगल खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होता है। दोनों में बाहरी ताकत जंगल तक पहुँचती है।
  • “बिदेसी”: जंगल वासियों की नज़र में वे सब लोग जो बाहर से आकर बसे: दास, फ़सल काटने वाले, ज़फ़र मियाँ के साथ आए लोग और बाज़ार बसाने वाले।

(पृष्ठ 208–209)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 210). इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: लगभग 1595 के अवध सूबे के इस ब्योरे में अबुल फ़ज़्ल पहाड़ी कबीलों और मैदानों का लेन–देन बताता है।

  • परिवहन: इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर सामान लादकर।
  • क्यों: पहाड़ के संकरे और ऊबड़–खाबड़ रास्तों पर गाड़ियाँ नहीं चल पाती होंगी, जबकि आदमी, मोटे–मोटे घोड़े और बकरे बोझ लेकर चढ़ सकते हैं।
  • मैदानों से पहाड़ तक: सफ़ेद और रंगीन कपड़े (पहनने के लिए), कहरुबा (किताब के अनुसार, जिससे गहने बनाए जाते थे), नमक और हींग (खाने के लिए), गहने (सजने के लिए), और शीशे व मिट्टी के बरतन (घर के काम के लिए)।

(पृष्ठ 210)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 211). पता कीजिए कि आपके प्रांत में किन क्षेत्रों को आजकल जंगल वाले इलाके के रूप में पहचाना जाता है? क्या इन इलाकों में आज ज़िंदगियाँ बदल रही हैं? इन बदलावों की वजहें वही हैं जिनका ज़िक्र हमने इस अनुभाग में किया है या उनसे अलग?

उत्तर देखिए

उत्तर: जंगल वाले इलाके एटलस या शिक्षक की मदद से पहचानिए, फिर उनके बदलावों को इस अनुभाग की वजहों से मिलाइए:

  • राज्य की माँग: सेना के लिए हाथी, और पेशकश में हाथी।
  • राज्य की पहुँच: शिकार अभियानों के बहाने बादशाह का दौरा।
  • खेती का फैलाव: जंगल साफ़ करके बस्तियाँ और बाज़ार।
  • व्यापार: शहद, मधुमोम और लाक की माँग; हाथियों का व्यापार।
  • समाज और संस्कृति: कबीलाई सरदारों का ज़मींदार और राजा बनना; नए इलाकों में सूफ़ी संतों (पीर) का असर।

जो वजह इनमें न हो, उसे “नयी वजह” लिखिए। (पृष्ठ 208–211)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 213). आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।

उत्तर देखिए

उत्तर: इस अनुभाग से ये कारण समझ में आते हैं:

  • बिना खेती की कमाई: ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; उनकी मिल्कियत पर अक्सर दिहाड़ी या पराधीन मज़दूर काम करते थे।
  • शोषण: किताब कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था”।
  • राज्य और किसान के बीच: वे राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे।
  • अपनी ताकत: उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।
  • जाति का विशेषाधिकार: उनकी ऊँची हैसियत का एक कारण उनकी जाति थी।

साथ में यह भी याद रखिए कि किताब उनके रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी बताती है। (पृष्ठ 211–212)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 214). अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीन को इस आधार पर बाँटा कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है, और हर वर्ग का राजस्व अलग रखा।

  • पोलज: हर साल खेती, कभी ख़ाली नहीं छोड़ी जाती।
  • परौती: कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके।
  • चचर: तीन या चार वर्षों तक ख़ाली।
  • बंजर: पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं हुई।
  • राजस्व: पहले दो वर्गों की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब। तीनों का उत्पाद जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और उसका एक–तिहाई शाही शुल्क।

(पृष्ठ 214)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 214). भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?

उत्तर देखिए

उत्तर: साम्राज्य 1530, 1605 और 1707 तक के चरणों में फैलता गया, और इसके साथ राजस्व का तंत्र भी बढ़ा।

  • बड़ा प्रशासनिक तंत्र: तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में राजस्व आकलन और वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, जिसमें दीवान का दफ़्तर शामिल था।
  • नए लोग, नयी ताकत: हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में आए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताकत बने।
  • आँकड़े और जाँच: हर इलाके की ज़मीन और खेती की जानकारी जुटाई गई; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव, हर किसान की जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
  • मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।

(पृष्ठ 213–215)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 215). राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?

उत्तर देखिए

उत्तर: आइन में नक़द और फ़सल, दोनों तरह की वसूली है; हर एक का किसान पर असर अलग रहा होगा।

  • नक़द: किसान को फ़सल बेचकर पैसा जुटाना पड़ता होगा, इसलिए बाज़ार के भाव का असर उस पर पड़ता होगा।
  • कणकुत (अंदाज़े से): फ़सल का अंदाज़ा लगाया जाता; शक हो तो फ़सल अच्छी, मध्यम और बदतर के तीन पुलिंदों में काटी जाती। ग़लत अंदाज़े से किसान को नुक़सान भी हो सकता था।
  • बटाई या भाओली: फ़सल काटकर, सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा; पर इसमें कई समझदार निरीक्षक चाहिए थे, वरना धोखेबाज़ी का डर था।
  • खेत बटाई: बुआई के बाद खेत ही बाँट लिए जाते, तो फ़सल अच्छी हो या ख़राब, दोनों का जोखिम बँट जाता होगा।
  • लाँग बटाई: कटाई के बाद ढेर बाँटकर हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता और उससे मुनाफ़ा कमाता।

(पृष्ठ 215)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 215). क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?

उत्तर देखिए

उत्तर: काफ़ी हद तक हाँ, क्योंकि किताब के ब्योरे कई तरह की छूट दिखाते हैं; पर राज्य का हिस्सा और समय पर कर, दोनों पर ज़ोर बना रहता था।

  • ज़मीन के हिसाब से: चार वर्ग और तीन किस्में, हर एक का अलग राजस्व।
  • नक़द या फ़सल: अमील–गुज़ार को कहा गया कि वह सिर्फ़ नक़द की आदत न डाले, फ़सल लेने को भी तैयार रहे; कणकुत और बटाई के कई तरीक़े थे।
  • जमा और हासिल: निर्धारित रक़म और सचमुच वसूली गई रक़म अलग–अलग दर्ज होती थीं।
  • दोनों हितों का ध्यान: औरंगज़ेब के हुक्म में जमा तय करते समय सरकार के वित्तीय हित (किफ़ायत) और किसानों का कल्याण, दोनों देखने को कहा गया।
  • सीमा: शाही शुल्क मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई तय था, और राज्य के नुमाइंदे चाहते थे कि कर समय पर मिल जाए।

(पृष्ठ 196, 213–215)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 215). आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1665 ई. के अपने हुक्म में औरंगज़ेब हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) जानना चाहता है।

  • सही जमा: हर गाँव की ज़मीन और फ़सल अलग थी, इसलिए बारीक जाँच के बिना राजस्व ठीक से तय नहीं हो सकता था।
  • दोनों हित: हुक्म कहता है कि जमा सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) और किसानों के कल्याण को ध्यान में रखकर तय हो।
  • हर साल की गिनती: हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखने को भी कहा गया।
  • बड़ी आमदनी: ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।

(पृष्ठ 213, 215)

चर्चा कीजिए (पृष्ठ 216). पता लगाइए कि वर्तमान में आपके राज्य में कृषि उत्पादन पर कर लगाए जाते हैं या नहीं। आज की राज्य सरकारों की राजकोषीय नीतियों और मुग़ल राजकोषीय नीतियों में समानताओं और भिन्नताओं को समझाइए।

उत्तर देखिए

उत्तर: आज की जानकारी अपने शिक्षक, पटवारी या राज्य सरकार के आधिकारिक स्रोत से लीजिए; मुग़ल पक्ष की बातें किताब से:

  • मुग़लों की आमदनी: ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।
  • कितना: मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई शाही शुल्क।
  • कैसे: नक़द या फ़सल में, नपाई और सर्वेक्षण के आधार पर; जिन्स–ए–कामिल से ज़्यादा कर।
  • किसके ज़रिये: दीवान का दफ़्तर, अमील–गुज़ार, और कर वसूलने वाले ज़मींदार।

फिर एक तालिका बनाइए: आमदनी का मुख्य स्रोत, खेती पर कर, कर कौन वसूलता है, और किसान को क्या राहत मिलती है। (पृष्ठ 200, 213–215)

किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 219). उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?

उत्तर देखिए

उत्तर: स्रोत 9 में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसने सूचनाएँ कैसे जुटाईं।

  • स्रोतों की सूची: बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ; समझदार बुज़ुर्गों और जवानों के बयान, लिखकर दर्ज; सूबों के पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण; इलाही संवत के उन्नीसवें साल से दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल; ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र।
  • कृषि संबंधों के लिए: सूबों को भेजे हुक्म, अफ़सरों की रिपोर्टें और सूबों के संस्मरण सबसे काम के होते, क्योंकि उनमें ज़मीन, राजस्व और गाँवों की बातें होतीं।
  • अकबर से रिश्ते का असर: किताब अकबर के हुक्म से लिखी गई; हुक्म था कि जुटाई सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए; अबुल फ़ज़्ल उसे “खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग” कहता है। इसलिए आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”।

(पृष्ठ 218–219)

झटपट दोहराइए

1. सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में हिंदुस्तान के कितने लोग गाँवों में रहते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: करीब–करीब 85 फ़ीसदी। (पृष्ठ 196)

2. मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए कौन से शब्द इस्तेमाल करते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: आम तौर पर रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। (पृष्ठ 197)

3. सत्रहवीं सदी के स्रोतों में खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों में क्या फ़र्क था?

उत्तर देखिए

उत्तर: खुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। (पृष्ठ 197–198)

4. मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल की खेती को बढ़ावा क्यों देता था, और इसके दो उदाहरण क्या हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: इन सर्वोत्तम फ़सलों से राज्य को ज़्यादा कर मिलता था; कपास और गन्ना। (पृष्ठ 200)

5. मक्का भारत में किस रास्ते से आया?

उत्तर देखिए

उत्तर: अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते। (पृष्ठ 201)

6. मुग़ल गाँव में पंचायत के मुखिया को क्या कहते थे, और गाँव का हिसाब बनाने में उसकी मदद कौन करता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: मुक़द्दम या मंडल; पंचायत का पटवारी। (पृष्ठ 201–202)

7. किताब के अनुसार मुग़ल काल में किसानों के विरोध का “एक बड़ा प्रभावी हथियार” क्या था?

उत्तर देखिए

उत्तर: गाँव छोड़कर भाग जाना, जब पंचायत के सुझाए समझौते से बात न बने। (पृष्ठ 204)

8. महाराष्ट्र में दस्तकारों को सेवा के बदले मिली जिस ज़मीन पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था, उसे क्या कहते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: मीरास या वतन। (पृष्ठ 205)

9. किस फ़्रांसीसी यात्री के अनुसार वे गाँव बहुत छोटे माने जाते थे जिनमें सराफ़ न हों?

उत्तर देखिए

उत्तर: तैवर्नियर। (पृष्ठ 206)

10. सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में अखिल भारतीय स्तर पर कितना इलाका जंगल था?

उत्तर देखिए

उत्तर: उस समय के स्रोतों के आधार पर करीब–करीब 40 फ़ीसदी। (पृष्ठ 208)

11. असम में अहोम राजाओं के पायक कौन थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। (पृष्ठ 210)

12. मुग़ल भारत में ज़मींदार की व्यक्तिगत ज़मीन को क्या कहते थे, और वह उसके साथ क्या कर सकता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: मिल्कियत; वह उसे बेच सकता था, किसी और के नाम कर सकता था या गिरवी रख सकता था। (पृष्ठ 211)

13. आइन के अनुसार ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति में कितने घुड़सवार और कितने पैदल सिपाही थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: 384,558 घुड़सवार और 4,277,057 पैदल सिपाही। (पृष्ठ 212)

14. मुग़ल भू–राजस्व में जमा और हासिल में क्या फ़र्क था?

उत्तर देखिए

उत्तर: जमा निर्धारित रक़म थी, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। (पृष्ठ 213)

15. अकबर के शासन में ज़मीन के चार वर्ग कौन से थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: पोलज, परौती, चचर और बंजर। (पृष्ठ 214)

16. आइन के अनुसार कणकुत शब्द का मतलब क्या है?

उत्तर देखिए

उत्तर: कण का मतलब अनाज और कुत का मतलब अंदाज़ा; फ़सल का अंदाज़ा लगाकर राजस्व तय करना। (पृष्ठ 215)

17. आइन–ए–अकबरी कब पूरी हुई, और उससे पहले उसमें कितने संशोधन हुए?

उत्तर देखिए

उत्तर: 1598 ई. में, अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष में, पाँच संशोधनों के बाद। (पृष्ठ 217)

18. आइन के पाँच दफ़्तरों में से पहले तीन कौन से हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: मंज़िल–आबादी, सिपह–आबादी और मुल्क–आबादी। (पृष्ठ 218)