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प्रयोग: दाईं ओर हाथ रखकर पढ़िए, उत्तर बोलिए, फिर हाथ हटाइए। कुल 156 कार्ड। हर उत्तर के साथ किताब का पृष्ठ लिखा है; शक हो तो किताब का वही पृष्ठ खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
निशानों का मतलब: ★★इस टॉपिक पर किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 222–223) में सीधे प्रश्न है · ★उन प्रश्नों के उत्तर में काम आता है · बिना निशान वाले कार्ड पृष्ठभूमि की जानकारी हैं · ! वाले कार्डों में अक्सर गलती होती है, इन्हें ध्यान से पढ़िए।
सेट 1 — गाँव, किसान और हमारे स्रोत (कार्ड 1–19)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 1 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में कितने लोग गाँवों में रहते थे? | करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग। (पृष्ठ 196) |
| 2 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत के बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते क्यों बने? | क्योंकि दोनों कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे। (पृष्ठ 196) |
| ★★3 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में मुग़ल राज्य अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कहाँ से उगाहता था, और उसके नुमाइंदे गाँवों में क्या करते थे? | कृषि उत्पादन से। राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूली करने वाले और हिसाब रखने वाले नुमाइंदे ग्रामीण समाज पर काबू रखने की कोशिश करते थे, ताकि खेतों की जुताई हो और राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए। (पृष्ठ 196) |
| ★4 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं; इससे गाँवों में क्या घुस आया, और खेती वाले इलाके किससे जुड़ गए? | व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में घुस आए, और खेती वाले इलाके शहर से जुड़ गए। (पृष्ठ 196) |
| ★5 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि इतिहास की जानकारी हमें खेतों में काम करने वालों से क्यों नहीं मिलती, और हमारे मुख्य स्रोत कौन-से हैं? | क्योंकि किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखा करते थे। मुख्य स्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे। (पृष्ठ 197) |
| ★6 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि इतिहास के प्रमुख ऐतिहासिक ग्रंथों में से एक आइन–ए–अकबरी किसने लिखी? | अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने। (पृष्ठ 197) |
| ★7 | अकबर के समय की आइन–ए–अकबरी में कृषि से जुड़े किन इंतज़ामों का लेखा–जोखा “बड़ी सावधानी से” पेश किया गया है? | राज्य ने जो इंतज़ाम खेतों की नियमित जुताई पक्की करने के लिए, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही के लिए और राज्य तथा ग्रामीण सत्तापोशों यानी ज़मींदारों के बीच के रिश्तों के नियमन के लिए किए थे, उनका। (पृष्ठ 197) |
| ★★8 | अकबर के समय की आइन का मुख्य उद्देश्य क्या था, और उसके लेखक के मुताबिक मुग़ल राज्य के ख़िलाफ़ बग़ावत या स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का क्या होना तय था? | उद्देश्य था अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका पेश करना जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल–जोल बनाकर रखता था। लेखक के मुताबिक ऐसी बग़ावत या दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था। (पृष्ठ 197) |
| ★★9 | ! किसानों के बारे में आइन से जो कुछ पता चलता है, वह किसका नज़रिया है? | “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया”, यानी क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया; किताब इसे “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” कहती है। (पृष्ठ 197, 218) |
| ★★10 | आइन के अलावा, मुग़ल राजधानी से दूर के इलाकों में लिखे गए कौन-से स्रोत सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि इतिहास में काम आते हैं? | सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के वे दस्तावेज़ जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं, और ईस्ट इंडिया कंपनी के बहुत सारे दस्तावेज़, जो पूर्वी भारत में कृषि–संबंधों का खाका पेश करते हैं। (पृष्ठ 197) |
| ★11 | गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के राजस्व दस्तावेज़ों और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों जैसे स्रोत, आइन के साथ इस्तेमाल करने पर, हमें क्या समझने में मदद करते हैं? | ये किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच तने झगड़ों को दर्ज करते हैं, और यह समझने में मदद करते हैं कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से उन्हें कैसे न्याय की उम्मीद थी। (पृष्ठ 197) |
| 12 | मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए आमतौर पर कौन-से शब्द इस्तेमाल करते थे? | रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान; साथ ही किसान और आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। (पृष्ठ 197) |
| 13 | ! सत्रहवीं सदी के स्रोत किन दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं, और दोनों में क्या फ़र्क था? | खुद–काश्त वे थे जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त वे खेतिहर थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। (पृष्ठ 197, 198) |
| 14 | सत्रहवीं सदी के स्रोतों में लोग पाहि–काश्त क्यों बनते थे? | अपनी मर्ज़ी से भी (मसलन, अगर करों की शर्तें किसी दूसरे गाँव में बेहतर मिलें) और मजबूरन भी (मसलन, अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी से)। (पृष्ठ 198) |
| 15 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास आमतौर पर क्या-क्या होता था? | शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा कुछ होता था; ज़्यादातर के पास इससे भी कम। (पृष्ठ 198) |
| 16 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में गुजरात और बंगाल में कितनी ज़मीन वाले किसान समृद्ध या अमीर माने जाते थे? | गुजरात में 6 एकड़ के करीब ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे। बंगाल में औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी, और 10 एकड़ ज़मीन वाला आसामी अमीर समझा जाता था। (पृष्ठ 198) |
| 17 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में खेती किस सिद्धांत पर आधारित थी, और किसानों की ज़मीन का क्या होता था? | व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर। किसानों की ज़मीन उसी तरह खरीदी और बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की। (पृष्ठ 198) |
| 18 | उन्नीसवीं सदी के दिल्ली–आगरा इलाके में किसानों की मिल्कियत का जो विवरण किताब देती है और जो सत्रहवीं सदी पर भी लागू होता है, वह ज़मीन की हदों के बारे में क्या बताता है? | हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर ज़मीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और ज़मीन के ऐसे हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं। (पृष्ठ 198) |
| 19 | स्रोत 1 में मुग़ल बादशाह बाबर ने अपने संस्मरण बाबरनामा में हिंदुस्तानी बस्तियों और गाँवों की कौन-सी ख़ासियत नोट की? | कि बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, “एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं”। वर्षों से आबाद बड़े शहर के बाशिंदे उसे छोड़ दें तो डेढ़ दिनों के अंदर हर नामोनिशान मिट जाता है; और बसने के लिए पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि फ़सलें बारिश के पानी में उगती हैं। (पृष्ठ 198) |
सेट 2 — सिंचाई, तकनीक और फ़सलें (कार्ड 20–38)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 20 | मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, फिर भी सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में सिंचाई के कृत्रिम उपाय क्यों बनाने पड़े? | क्योंकि कुछ ऐसी फ़सलें थीं जिनके लिए अतिरिक्त पानी की ज़रूरत थी। (पृष्ठ 198) |
| ★21 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था; इसलिए कौन-सी फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं? | रोज़मर्रा के खाने की ज़रूरतें पूरी करने वाली फ़सलें, जैसे चावल, गेहूँ, ज्वार। (पृष्ठ 198) |
| ★22 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में प्रति वर्ष 40 इंच या उससे ज़्यादा बारिश वाले इलाकों में कौन-सी खेती होती थी? कम और कमतर बारिश वाले इलाकों में? | 40 इंच या उससे ज़्यादा बारिश वाले इलाकों में कमोबेश चावल की खेती होती थी। कम और कमतर बारिश वाले इलाकों में क्रमशः गेहूँ व ज्वार–बाजरे की खेती ज़्यादा प्रचलित थी। (पृष्ठ 198) |
| 23 | ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में खेती का क्या हुआ? | कृषि का लगातार विस्तार हुआ। (पृष्ठ 198) |
| 24 | स्रोत 2 में बाबर ने लाहौर और दीपालपुर जैसी जगहों पर सिंचाई का कौन-सा साधन देखा, और उसे कौन चलाता था? | रहट। रस्सी के दो गोलाकार फ़ंदों में लकड़ी के गुटकों पर घड़े बँधे होते थे और वे कुएँ के ऊपर पहियों से लटकते थे। पहिये की धुरी पर लगे एक और पहिये को बैल घुमाता था, जिससे घड़ों वाला पहिया घूमने लगता था। जहाँ घड़ों से पानी गिरता था, वहाँ संकरा नाला खोदकर पानी हर जगह पहुँचाया जाता था। (पृष्ठ 199) |
| 25 | स्रोत 2 में बाबर ने आगरा, चाँदवर और बयाना जैसी जगहों पर कुएँ से सिंचाई का कौन-सा तरीका बताया? | बालटियों से। कुएँ के किनारे लकड़ी के कन्ने गाड़कर उनके बीच बेलन टिकाया जाता था। बड़ी बालटी की रस्सी बेलन पर लपेटकर उसका दूसरा छोर बैल से बाँध दिया जाता था। एक शख़्स बैल हाँकता था और दूसरा बालटी से पानी निकालता था। (पृष्ठ 199) |
| 26 | स्रोत 2 में बाबर ने हिंदुस्तान की शरद ऋतु और बसंत ऋतु की फ़सलों के बारे में क्या लिखा? | शरद ऋतु की फ़सलें बारिश के पानी से ही पैदा हो जाती हैं, और बसंत ऋतु की फ़सलें तब भी पैदा हो जाती हैं जब बारिश बिलकुल नहीं होती। बाबर इसे हैरानगी की बात कहता है। फिर भी छोटे पेड़ों तक बालटियों या रहट के ज़रिये पानी पहुँचाया जाता था। (पृष्ठ 199) |
| 27 | उत्तर भारत में सिंचाई कार्यों को राज्य की मदद कैसे मिलती थी? उदाहरण में कौन-सी नहर का नाम है? | राज्य ने कई नयी नहरें व नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे कि शाहजहाँ के शासनकाल के दौरान पंजाब में शाह नहर। (पृष्ठ 200) |
| 28 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में किसान पशुबल पर आधारित कौन-से लकड़ी के हल का इस्तेमाल करते थे, और उसके क्या फ़ायदे थे? | एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगा लकड़ी का हलका हल, जो आसानी से बनाया जा सकता था। वह मिट्टी को बहुत गहरे नहीं खोदता था, इसलिए तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी। (पृष्ठ 200) |
| 29 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में बीज बोने के लिए बैलों की जोड़ी से खींचा जाने वाला कौन-सा औज़ार इस्तेमाल होता था, और कौन-सा तरीका ज़्यादा प्रचलित था? | बरमा। पर बीजों को हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था। मिट्टी की गुड़ाई और साथ–साथ निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार काम में लाए जाते थे। (पृष्ठ 200) |
| ★30 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में मौसम के कौन-से दो मुख्य चक्रों में खेती की जाती थी, और साल में कितनी फ़सलें होती थीं? | खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)। सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थीं। जहाँ बारिश या सिंचाई के अन्य साधन हर वक्त मौजूद थे, वहाँ साल में तीन फ़सलें भी उगाई जाती थीं। (पृष्ठ 200) |
| ★★31 | आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर मुग़ल प्रांत आगरा, दिल्ली प्रांत और बंगाल में फ़सलों की कितनी किस्में पैदा होती थीं? | आगरा में 39 किस्म की फ़सलें, दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें, और बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में। (पृष्ठ 200) |
| ★★32 | स्रोतों में मिलने वाले जिन्स–ए–कामिल का क्या मतलब है, और मुग़ल राज्य किसानों को ऐसी फ़सलों की खेती के लिए बढ़ावा क्यों देता था? | सर्वोत्तम फ़सलें। मुग़ल राज्य बढ़ावा देता था क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था। (पृष्ठ 200) |
| ★★33 | मुग़ल काल में कपास और गन्ना जैसी जिन्स–ए–कामिल फ़सलें कहाँ उगती थीं या किसके लिए मशहूर थीं, और कौन-सी दूसरी फ़सलें नकदी फ़सलों में आती थीं? | कपास मध्य भारत और दक्कनी पठार में फैले ज़मीन के बड़े–बड़े टुकड़ों पर उगाई जाती थी, जबकि बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ़सलों में आती थीं। (पृष्ठ 200) |
| ★★34 | ! क्या यह कहना ठीक है कि मध्यकालीन भारत में खेती सिर्फ़ गुज़ारा करने के लिए की जाती थी? | नहीं। दैनिक आहार की खेती पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता था, पर इसका मतलब यह नहीं था कि खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी। औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने के लिए होने वाला उत्पादन और व्यापार के लिए होने वाला उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे। (पृष्ठ 200) |
| 35 | अकबर और उसके अभिजातों ने तम्बाकू पहली बार कब देखा, और यह पौधा भारत में कहाँ से कहाँ पहुँचा? | 1604 ई. में। पौधा सबसे पहले दक्कन पहुँचा और वहाँ से सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया। आइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती। (पृष्ठ 200) |
| 36 | जहाँगीर ने तम्बाकू पर पाबंदी क्यों लगाई, और उसका क्या नतीजा रहा? | हुक्के या चिलम में तम्बाकू का धूम्रपान करने की लत फैलने से वह चिंतित हुआ। पाबंदी पूरी तरह बेअसर साबित हुई: सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था। (पृष्ठ 200) |
| 37 | आर्थिक इतिहासकारों की गणना के मुताबिक 1600 से 1800 के बीच (200 वर्षों में) भारत की आबादी कितनी बढ़ी? | लगभग 5 करोड़, यानी करीब–करीब 33 फ़ीसदी, समय–समय पर होने वाली भुखमरी और महामारी के बावजूद। किताब इसे कृषि उत्पादन के विविध और लचीले तरीक़ों का एक बड़ा नतीजा बताती है। किताब के इस वाक्य में “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है। (पृष्ठ 200) |
| 38 | सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग–अलग हिस्सों से भारतीय उपमहाद्वीप में कौन-सी नयी फ़सलें पहुँचीं, और मक्का किस रास्ते से आया? | मक्का अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया और सत्रहवीं सदी तक पश्चिम भारत की मुख्य फ़सलों में गिना जाने लगा। टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्ज़ियाँ तथा अनानास और पपीता जैसे फल नयी दुनिया से लाए गए। (पृष्ठ 201) |
सेट 3 — जाति, पंचायत और मुखिया (कार्ड 39–60)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★39 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में किसान एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा थे; इस समुदाय के तीन घटक कौन-से थे? | खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)। (पृष्ठ 201) |
| ★★40 | मुग़ल काल में खेतिहर किसान किन भेदभावों की वजह से कई समूहों में बँटे थे, और खेतों की जुताई करने वालों में बड़ी तादाद किनकी थी? | जाति और अन्य जाति जैसे भेदभावों की वजह से। बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मज़दूरी करते थे। (पृष्ठ 201) |
| ★★41 | खेती लायक ज़मीन की कमी न होने पर भी मुग़ल काल में कुछ जाति के लोग ग़रीब रहने के लिए मजबूर क्यों थे? | क्योंकि उन्हें सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे। इनके पास संसाधन सबसे कम थे और ये जाति व्यवस्था की पाबंदियों से बँधे थे; इनकी हालत कमोबेश वैसी ही थी जैसी आधुनिक भारत में दलितों की। (पृष्ठ 201, 202) |
| ★42 | मुग़ल काल के गाँवों में मुसलमान समुदायों के भीतर कौन-से समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे, और बिहार में किनकी तुलना दासों से की जा सकती थी? | नीच समझे जाने वाले कामों से जुड़े हलालख़ोरान जैसे समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे। बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी। (पृष्ठ 202) |
| ★★43 | समाज के निचले तबकों और बीच के समूहों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच कैसा रिश्ता था? | निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था। बीच के समूहों में ऐसा नहीं था। (पृष्ठ 202) |
| ★44 | सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी गई किताब राजपूतों और जाटों के बारे में क्या बताती है, और वृंदावन (उत्तर प्रदेश) के इलाके में किस समुदाय ने राजपूत होने का दावा किया? | किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है। जाट भी किसान थे, लेकिन जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों के मुक़ाबले नीची थी। वृंदावन के इलाके में गौरव समुदाय ने राजपूत होने का दावा किया, बावजूद इसके कि वे ज़मीन की जुताई के काम में लगे थे। (पृष्ठ 202) |
| ★★45 | मुग़ल काल में पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े की वजह से कौन-सी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं, और पूर्वी इलाकों में कौन-सी जातियाँ किसानों की सी सामाजिक स्थिति पाने लगीं? | अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ ऊपर उठीं। पूर्वी इलाकों में पशुपालक और मछुआरी जातियाँ, जैसे सदगोप व कैवर्त, किसानों की सी सामाजिक स्थिति पाने लगीं। (पृष्ठ 202) |
| ★★46 | मुग़ल काल के गाँव की पंचायत में कौन लोग होते थे, और कई जातियों वाले गाँवों में वह कैसी होती थी? | पंचायत में बुज़ुर्गों का जमावड़ा होता था; आमतौर पर वे गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग हुआ करते थे। जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ अकसर पंचायत में भी विविधता पाई जाती थी: यह एक अल्पतंत्र था जिसमें गाँव के अलग–अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। (पृष्ठ 202) |
| ★47 | मुग़ल काल की गाँव की पंचायत में किनके लिए जगह होने की संभावना कम ही थी, और उसका फ़ैसला किसे मानना पड़ता था? | छोटे–मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें कोई जगह होने की संभावना कम ही थी। पंचायत का फ़ैसला गाँव में सबको मानना पड़ता था। (पृष्ठ 202) |
| ★★48 | पंचायत का सरदार कौन होता था, और उसका चुनाव कैसे होता था? | मुखिया, जिसे मुक़द्दम या मंडल कहते थे। कुछ स्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया का चुनाव गाँव के बुज़ुर्गों की आम सहमति से होता था, और चुनाव के बाद उन्हें इसकी मंज़ूरी ज़मींदार से लेनी पड़ती थी। (पृष्ठ 202) |
| ★★49 | गाँव का मुखिया अपने ओहदे पर कब तक बना रहता था? | जब तक गाँव के बुज़ुर्गों को उस पर भरोसा था। ऐसा नहीं होने पर बुज़ुर्ग उसे बर्ख़ास्त कर सकते थे। (पृष्ठ 202) |
| ★★50 | गाँव के मुखिया का मुख्य काम क्या था, और इसमें उसकी मदद कौन करता था? | गाँव की आमदनी व खर्चे का हिसाब–किताब अपनी निगरानी में बनवाना। इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था। (पृष्ठ 202) |
| ★★51 | पंचायत का खर्चा किस ख़ज़ाने से चलता था, और उस ख़ज़ाने का इस्तेमाल किन कामों में होता था? | गाँव के उस आम ख़ज़ाने से जिसमें हर व्यक्ति अपना योगदान देता था। उससे समय–समय पर गाँव का दौरा करने वाले कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी का खर्चा होता था, बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटा जाता था, और ऐसे सामुदायिक कार्य कराए जाते थे जो किसान खुद नहीं कर सकते थे। (पृष्ठ 202, 203) |
| ★52 | मुग़ल काल में मंडलों पर कौन-से आरोप लगते थे? | कि वे अपने ओहदे का ग़लत इस्तेमाल करते थे: पटवारी के साथ मिलकर हिसाब–किताब में हेरा–फेरी करते थे, और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे। (पृष्ठ 202) |
| ★★53 | गाँव की पंचायत का एक बड़ा काम क्या था, और पूर्वी भारत में शादियों के बारे में क्या नियम था? | यह तसल्ली करना कि गाँव में रहने वाले अलग–अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों के अंदर रहें। पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं; “जाति की अवहेलना रोकने के लिए” लोगों के आचरण पर नज़र रखना गाँव के मुखिया की ज़िम्मेदारियों में से एक था। (पृष्ठ 203) |
| ★★54 | पंचायतों को कौन-से गंभीर दंड देने के अधिकार थे, और समुदाय से निकाले जाने पर क्या होता था? | जुर्माना लगाने और समुदाय से निष्कासित करने के। निष्कासन एक कड़ा कदम था जो सीमित समय के लिए लागू होता था: दंडित व्यक्ति को (दिए हुए समय के लिए) गाँव छोड़ना पड़ता था, और इस दौरान वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था। इसका मकसद जातिगत रिवाजों की अवहेलना रोकना था। (पृष्ठ 203) |
| ★★55 | ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी कौन-सी पंचायत होती थी, और राजस्थान में वह किन झगड़ों का निपटारा करती थी? | जाति पंचायत, जो समाज में काफ़ी ताकतवर होती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग–अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़ों का निपटारा करती थीं, ज़मीन से जुड़े दावेदारियों के झगड़े सुलझाती थीं, यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं। (पृष्ठ 203) |
| ★56 | ! मुग़ल राज्य जाति पंचायत के फ़ैसलों को किस तरह के मामलों को छोड़कर मान लेता था? | फ़ौजदारी न्याय को छोड़कर। फ़ौजदारी न्याय को छोड़ दें तो ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फ़ैसलों को मानता था। (पृष्ठ 203) |
| ★57 | पश्चिम भारत (ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र) के संकलित दस्तावेज़ों की अर्ज़ियों में पंचायत से क्या शिकायत की गई है, और ये अर्ज़ियाँ आमतौर पर कौन लगाते थे? | पंचायत से “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार वसूली की शिकायत की गई है। आमतौर पर ये अर्ज़ियाँ ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग लगाते थे; अकसर सामूहिक तौर पर भी ऐसी अर्ज़ियाँ दी जाती थीं। (पृष्ठ 203, 204) |
| ★★58 | मुग़ल काल की सामूहिक अर्ज़ियों में किसान बहुत ज़्यादा कर की माँग को नैतिक दृष्टि से अवैध क्यों मानते थे, और वे ग्राम पंचायत से क्या उम्मीद करते थे? | क्योंकि इससे किसानों का दैनिक गुज़ारा ही जोखिम में पड़ जाता था। उनकी नज़रों में ज़िंदा रहने के लिए न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक़ था। वे समझते थे कि ग्राम पंचायत को इसकी सुनवाई करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राज्य अपना नैतिक फ़र्ज़ अदा करे और न्याय करे। (पृष्ठ 204) |
| ★★59 | “निचली जाति” के किसानों और राज्य के अधिकारियों या ज़मींदारों के बीच झगड़ों में पंचायत क्या करती थी, और समझौता न होने पर किसान क्या करते थे? | पंचायत के फ़ैसले अलग–अलग मामलों में अलग–अलग हो सकते थे; अत्यधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अकसर समझौते का सुझाव देती थी। जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के ज़्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे कि गाँव छोड़कर भाग जाना। (पृष्ठ 204) |
| ★★60 | मुग़ल काल में गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार क्यों था? | क्योंकि जोतने लायक खाली ज़मीन अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध थी, जबकि श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी। (पृष्ठ 204) |
सेट 4 — दस्तकार, जजमानी, “छोटा गणराज्य” और नकद का चलन (कार्ड 61–69)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| 61 | अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों में किए गए गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ गाँवों में दस्तकारों की तादाद के बारे में क्या बताते हैं? | गाँवों में दस्तकार काफ़ी अच्छी तादाद में रहते थे। कहीं–कहीं तो कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे। (पृष्ठ 204) |
| 62 | मुग़ल काल के गाँवों में किसानों और दस्तकारों के बीच फ़र्क करना कभी–कभी मुश्किल क्यों होता था? | क्योंकि कई ऐसे समूह थे जो दोनों किस्म के काम करते थे। खेतिहर और उसके परिवार के सदस्य रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतनों को पकाना, खेती के औज़ारों को बनाना या उनकी मरम्मत करना जैसे काम करते थे; ये काम वे खेती से फ़ुरसत के महीनों में करते थे। (पृष्ठ 204, 205) |
| ★63 | गाँव के कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई और सुनार जैसे दस्तकारों को उनकी सेवाओं की अदायगी आमतौर पर कैसे की जाती थी? | आमतौर पर या तो उन्हें फ़सल का एक हिस्सा दे दिया जाता था या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी ज़मीन जो खेती लायक होने के बावजूद बेकार पड़ी थी। अदायगी की सूरत क्या होगी, ये शायद पंचायत ही तय करती थी। (पृष्ठ 205) |
| 64 | महाराष्ट्र में गाँव के दस्तकारों को दी गई ज़मीन क्या कहलाई, और उस पर किसका अधिकार होता था? | वह ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई, जिस पर दस्तकारों का पुश्तैनी अधिकार होता था। (पृष्ठ 205) |
| ★★65 | अठारहवीं सदी के स्रोतों में बंगाल के ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों को उनकी सेवाओं के बदले क्या देते थे, और इस व्यवस्था को क्या कहते थे? | “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी”। इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालाँकि यह शब्द सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। किताब के अनुसार इससे यह भी पता चलता है कि नकद अदायगी का चलन बिलकुल ही नदारद नहीं था। (पृष्ठ 205) |
| ★★66 | ! उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सर भारतीय गाँवों को किस रूप में देखते थे, और क्या किताब के अनुसार गाँव में सामाजिक बराबरी थी? | उन्होंने गाँवों को एक ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे। लेकिन किताब के अनुसार ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक बराबरी थी: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं। (पृष्ठ 205) |
| ★★67 | किताब के अनुसार गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार का गाँवों के रिश्तों पर क्या असर पड़ा? | इस व्यापार की वजह से गाँवों में भी नकद के रिश्ते फैल चुके थे। (पृष्ठ 205) |
| ★★68 | मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली कैसे होती थी, और निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों और व्यापारिक फ़सलें उगाने वालों को भुगतान कैसे मिलता था? | कर की गणना और वसूली भी नकद में की जाती थी। निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को उनकी मज़दूरी या पूर्व भुगतान भी नकद में ही मिलता था। कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ़सलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकदी ही होता था। (पृष्ठ 206) |
| ★★69 | सत्रहवीं सदी में फ्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को भारत के गाँवों में मुद्रा के बारे में क्या बात उल्लेखनीय लगी, और सराफ़ क्या करते थे? | उनके अनुसार ऐसा गाँव बहुत ही छोटा कहा जाएगा जिसमें मुद्रा की फेर–बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों। एक बैंकर की तरह सराफ़ हवाला भुगतान करते थे, और अपनी मर्ज़ी के मुताबिक पैसे के मुकाबले रुपये की कीमत और कौड़ियों के मुकाबले पैसे की कीमत बढ़ा देते थे। (पृष्ठ 206) |
सेट 5 — कृषि समाज में महिलाएँ (कार्ड 70–81)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★70 | मध्यकालीन भारत के खेतों में महिलाएँ और मर्द कौन-कौन से काम करते थे? | महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे। मर्द खेत जोतते थे व हल चलाते थे, और महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई के साथ–साथ पकी हुई फ़सल का दाना निकालने का काम करती थीं। (पृष्ठ 206) |
| ★71 | मध्यकालीन भारतीय कृषि में छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती के विकास के बाद लिंग बोध के आधार पर किया जाने वाला फ़र्क़ (घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द) मुमकिन क्यों नहीं था? | क्योंकि घर–परिवार के संसाधन और श्रम उत्पादन की बुनियाद बने। (पृष्ठ 206) |
| ★72 | महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर मध्यकालीन भारत के लोगों में कौन-से पूर्वाग्रह बने रहे? उदाहरण दीजिए। | पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी। बंगाल में अपने मासिक–धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं घुस सकती थीं। (पृष्ठ 206) |
| ★★73 | दस्तकारी के कौन-से काम महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे, और किसी वस्तु का वाणिज्यीकरण बढ़ने पर महिलाओं के श्रम की माँग का क्या होता था? | सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई। किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता था, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की उतनी ही माँग होती थी। (पृष्ठ 206) |
| ★74 | मध्यकालीन भारत में किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर कहाँ-कहाँ काम करती थीं? | न सिर्फ़ खेतों में, बल्कि नियोक्ताओं के घरों पर भी और बाज़ारों में भी। (पृष्ठ 206) |
| ★75 | मध्यकालीन भारत में महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन क्यों माना जाता था, फिर भी शादीशुदा महिलाओं की कमी क्यों थी? | समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत की वजह से महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन के रूप में देखा जाता था। फिर भी कुपोषण, बार–बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादी–शुदा महिलाओं की कमी थी। (पृष्ठ 207) |
| ★76 | ! कई ग्रामीण संप्रदायों में किसान और दस्तकार समाज में शादी के लिए दहेज चलता था या कुछ और अदा करना पड़ता था? और तलाकशुदा महिलाओं व विधवाओं के बारे में क्या नियम था? | शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करने की ज़रूरत होती थी, न कि दहेज की। तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ दोनों ही कानूनन शादी कर सकती थीं। (पृष्ठ 207) |
| ★77 | मध्यकालीन भारत के ग्रामीण समाज में महिला पर परिवार और समुदाय के मर्दों का काबू कैसा था? | महिलाओं की प्रजनन शक्ति को इतनी अहमियत दी जाती थी कि उस पर काबू खोने का बड़ा डर था। स्थापित रिवाजों के मुताबिक घर का मुखिया मर्द होता था, इसलिए महिला पर परिवार और समुदाय के मर्दों द्वारा पुरज़ोर काबू रखा जाता था। बेवफ़ाई के शक पर ही महिलाओं को भयानक दंड दिए जा सकते थे। (पृष्ठ 207) |
| ★78 | राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे पश्चिमी भारत के दस्तावेज़ों में महिलाओं की ग्राम पंचायत को भेजी गई दरख्वास्तों में क्या मिलता है? | महिलाओं ने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ये दरख्वास्त भेजी थीं। पत्नियाँ अपने पतियों की बेवफ़ाई का विरोध करती दिखाई देती हैं, या गृहस्थी के मर्द पर आरोप लगातीं कि वह पत्नी और बच्चों की अनदेखी करता है। (पृष्ठ 207) |
| ★79 | पंचायत को दरख्वास्त देने वाली महिलाओं के नाम दस्तावेज़ों में कैसे दर्ज होते थे? | ज़्यादातर उनके नाम दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं किए जाते थे: दरख्वास्त करने वाली का हवाला गृहस्थी के मर्द/मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में दिया जाता था। (पृष्ठ 207) |
| ★★80 | भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को संपत्ति का कौन-सा हक़ मिला हुआ था, और पंजाब के उदाहरणों से क्या पता चलता है? | पुश्तैनी संपत्ति का हक़। पंजाब से ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ महिलाएँ (विधवा महिलाएँ भी) पुश्तैनी संपत्ति की विक्रेता के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय हिस्सेदारी रखती थीं। हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी। (पृष्ठ 207) |
| ★81 | अठारहवीं सदी में बंगाल की कौन-सी बड़ी ज़मींदारी की कर्ता–धर्ता एक स्त्री थी? | राजशाही की ज़मींदारी, जो अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक थी। बंगाल में महिला ज़मींदार पाई जाती थीं। (पृष्ठ 207) |
सेट 6 — जंगल और कबीले (कार्ड 82–98)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★82 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों के फैलाव का औसत निकालना लगभग असंभव है; फिर भी समसामयिक स्रोतों के आधार पर उसका क्या अंदाज़ा लगाया जा सकता है? | कि यह औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी था। (पृष्ठ 208) |
| 83 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे इलाके कहाँ-कहाँ फैले थे? | उत्तर और उत्तर–पश्चिमी भारत की गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़कर ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे थे। ऐसे इलाके झारखंड सहित पूरे पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र, दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट और दक्कन के पठारों में फैले हुए थे। (पृष्ठ 208) |
| ★★84 | ! सोलहवीं–सत्रहवीं सदी की रचनाओं में जंगली शब्द का क्या मतलब था, क्या उसका मतलब सभ्यता का न होना था? | नहीं। जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था, भले ही आजकल इस शब्द का प्रचलित अर्थ यही है। उन दिनों यह शब्द ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल होता था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। (पृष्ठ 208) |
| ★85 | भीलों में बसंत, गर्मी, मानसून और शरद व जाड़े के महीनों में कौन-कौन से काम होते थे? | बसंत में जंगल के उत्पाद इकट्ठा किए जाते, गर्मियों में मछली पकड़ी जाती, मानसून के महीनों में खेती की जाती, और शरद व जाड़े के महीनों में शिकार किया जाता था। यह सिलसिला लगातार गतिशीलता की बुनियाद पर खड़ा था; एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना इन कबीलों की ख़ासियत थी। (पृष्ठ 208) |
| ★86 | मुग़ल राज्य के लिए जंगल कैसा इलाका था, और बाबर ने जंगल को किस रूप में बताया? | राज्य के लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था: बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास)। बाबर के अनुसार जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था “जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।” (पृष्ठ 208) |
| ★87 | मुग़ल राज्य को जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अकसर क्या शामिल होता था, और राज्य को उसकी ज़रूरत क्यों थी? | हाथी। राज्य को सेना के लिए हाथियों की ज़रूरत होती थी। पेशकश मुग़ल राज्य के द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट थी। (पृष्ठ 208, 209) |
| ★88 | मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान किस बात का लक्षण था, और दरबारी इतिहासकारों के अनुसार बादशाह शिकार के नाम पर क्या करता था? | गरीबों और अमीरों सहित सबके साथ जुड़ते हुए राज्य के गहरे सरोकार का लक्षण। दरबारी इतिहासकारों की मानें तो बादशाह शिकार अभियान के नाम पर अपने विशाल साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता था और अलग–अलग इलाकों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर व्यक्तिगत रूप से गौर करता था। (पृष्ठ 209) |
| 89 | दरबारी कलाकारों के चित्रों में शिकार का विषय बार-बार आता था; इन चित्रों में चित्रकार अकसर क्या डाल देते थे? | छोटा–सा एक ऐसा दृश्य जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था। (पृष्ठ 209) |
| ★★90 | सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की बंगाली कविता चंडीमंगल (स्रोत 3) का नायक कालकेतु क्या करता है? | कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य की स्थापना करता है। तमाम जगहों से परदेसी आने लगते हैं और कालकेतु ख़रीदकर उन्हें चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे बाँटता है। जंगलों को हटाने के बाद वे बाज़ार बसाते हैं, और कुल्हाड़ियों की आवाज़ सुनकर शेर डरकर दहाड़ते हुए भाग निकलते हैं। (पृष्ठ 209) |
| ★91 | अबुल फ़ज़्ल के अनुसार (स्रोत 4) लगभग 1595 में अवध सूबे के मैदानी इलाकों और पहाड़ी कबीलों के बीच कैसा लेन–देन होता था? | उत्तर के पहाड़ों से इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर बेशुमार सामान ले जाए जाते थे, जैसे सोना, ताँबा, शीशा, कस्तूरी, शहद, अदरख, मोम, ऊनी कपड़े और लकड़ी के सामान। इसके बदले पहाड़ वाले सफ़ेद और रंगीन कपड़े, नमक, हींग, गहने और शीशे व मिट्टी के बरतन वापिस ले जाते थे। (पृष्ठ 210) |
| ★★92 | वाणिज्यिक खेती का असर जंगलवासियों की ज़िंदगी पर भी पड़ा; जंगल के कौन-से उत्पादों की बहुत माँग थी? | शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थी। लाक जैसी कुछ वस्तुएँ तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं। हाथी भी पकड़े और बेचे जाते थे। (पृष्ठ 210) |
| 93 | भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच होने वाले ज़मीनी व्यापार में लगे कबीलों का किताब कौन-सा उदाहरण देती है, और जंगलवासी व्यापार में किस तरह शामिल थे? | पंजाब का लोहानी कबीला। वह पंजाब के गाँवों और शहरों के बीच होने वाले व्यापार में भी शिरकत करता था। व्यापार के तहत वस्तुओं की अदला–बदली भी होती थी। (पृष्ठ 210) |
| ★★94 | सामाजिक कारणों से जंगलवासियों के जीवन में क्या बदलाव आए? कबीलों के सरदारों का क्या हुआ? | कबीलों के भी सरदार होते थे, बहुत कुछ ग्रामीण समुदाय के “बड़े आदमियों” की तरह। कई कबीलों के सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ तो राजा भी हो गए। (पृष्ठ 210) |
| ★95 | कबीलों के सरदार ज़मींदार या राजा बन जाने पर सेना कैसे खड़ी करते थे, और सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में कितने सैनिक होते थे? | उन्होंने अपने ही खानदान के लोगों को सेना में भर्ती किया, या अपने ही भाई–बंधुओं से सैन्य सेवा की माँग की। सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे। (पृष्ठ 210) |
| 96 | असम में अहोम राजाओं के पायक कौन थे, और जंगली हाथियों के बारे में अहोम राजाओं ने क्या ऐलान कर रखा था? | पायक वे लोग थे जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी। अहोम राजाओं ने जंगली हाथी पकड़ने पर अपने एकाधिकार का ऐलान भी कर रखा था। (पृष्ठ 210) |
| ★97 | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में उत्तर–पूर्वी इलाकों में किन राजाओं ने पड़ोसी कबीलों पर कब्ज़ा जमा लिया, और कबीलाई व्यवस्था से राजतांत्रिक प्रणाली की ओर संक्रमण कब पूरी तरह विकसित हुआ? | कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों के साथ एक के बाद एक युद्ध किया और उन पर अपना कब्ज़ा जमा लिया। संक्रमण बहुत पहले ही शुरू हो चुका था, लेकिन ऐसा लगता है कि सोलहवीं सदी में आकर यह प्रक्रिया पूरी तरह विकसित हुई। (पृष्ठ 210, 211) |
| ★98 | जंगल के इलाकों में नए सांस्कृतिक प्रभावों के विस्तार के बारे में कुछ इतिहासकारों ने क्या सुझाया है? | कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे–धीरे इस्लाम को अपनाया, उसमें सूफ़ी संतों (पीर) ने एक बड़ी भूमिका अदा की थी। (पृष्ठ 211) |
सेट 7 — ज़मींदार (कार्ड 99–111)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★99 | मुग़ल भारत में ज़मींदार कौन थे? | गाँवों में रहने वाला एक ऐसा तबका जिसकी कमाई तो खेती से आती थी लेकिन जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सेदारी नहीं करता था। वे अपनी ज़मीन के मालिक होते थे, और ग्रामीण समाज में ऊँची हैसियत की वजह से उन्हें कुछ खास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली हुई थीं। (पृष्ठ 211) |
| ★★100 | मुग़ल भारत में ज़मींदारों की बढ़ी हुई हैसियत के दो कारण क्या थे? | एक कारण जाति था; दूसरा कारण यह था कि वे राज्य को कुछ खास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे। (पृष्ठ 211) |
| ★101 | ज़मींदारों की समृद्धि की वजह क्या थी, और उस ज़मीन पर कौन खेती करता था? | उनकी विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन, जिसे मिल्कियत कहते थे, यानी संपत्ति। मिल्कियत ज़मीन पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, और अकसर इन ज़मीनों पर दिहाड़ी के मज़दूर या पराधीन मज़दूर काम करते थे। (पृष्ठ 211) |
| ★★102 | मिल्कियत ज़मीन के अलावा ज़मींदारों की ताकत के और कौन-से स्रोत थे? | वे अकसर राज्य की ओर से कर वसूल कर सकते थे, और इसके बदले उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था। सैनिक संसाधन भी उनकी ताकत का ज़रिया थे: ज़्यादातर ज़मींदारों के पास अपने किले और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ थीं, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे। (पृष्ठ 211) |
| ★103 | मुग़लकालीन गाँवों में सामाजिक संबंधों की कल्पना एक पिरामिड के रूप में करें, तो ज़मींदार उसमें कहाँ थे? | ज़मींदार इस पिरामिड के संकरे शीर्ष का हिस्सा थे। (पृष्ठ 211, 212) |
| ★104 | ग्रामीण समाज पर ज़मींदारों के नियंत्रण के बारे में अबुल फ़ज़्ल किस ओर इशारा करता है? | कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन ने ग्रामीण समाज पर पहले ही अपना ठोस नियंत्रण बना रखा था। इसमें तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और इसी तरह कई मुसलमान ज़मींदारों की भी। (पृष्ठ 212) |
| ★105 | समसामयिक दस्तावेज़ों के अनुसार ज़मींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत क्या रहा होगा, और राज्य के लिए किस बात की पुष्टि ज़रूरी थी? | ऐसा लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत रहा होगा। अकसर ज़मींदारी फैलाने का एक तरीक़ा ताकतवर सैनिक सरदारों द्वारा कमज़ोर लोगों को बेदखल करना था। पर इसकी संभावना कम ही है कि राज्य किसी ज़मींदार को इतने आक्रामक रुख की इजाज़त देता हो, जब तक कि राज्यादेश (सनद) के ज़रिये इसकी पुष्टि पहले ही न कर दी गई हो। (पृष्ठ 212) |
| ★★106 | ज़मींदारी को पुख्ता करने की धीमी प्रक्रिया किन तरीक़ों से की जा सकती थी, और इससे “निचली” जातियों के लोगों के लिए क्या संभव हुआ? | नयी ज़मीनों को बसाकर (जंगल–बारी), अधिकारों के हस्तांतरण के ज़रिये, राज्य के आदेश से, या फिर खरीदकर। मुग़ल काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से खरीदी और बेची जाती थी, इसलिए अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदारों के दर्जे में दाखिल हो सकते थे। (पृष्ठ 212) |
| ★107 | परिवार या वंश पर आधारित ज़मींदारियों को पुख्ता करने वाले उदाहरण के रूप में किताब किन समूहों का नाम लेती है? | राजपूतों और जाटों ने ऐसी रणनीति अपनाकर उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी–बड़ी पट्टियों पर अपना नियंत्रण पुख्ता किया। इसी तरह मध्य और दक्षिण–पश्चिम बंगाल में किसान–पशुचारियों (जैसे, सदगोप) ने ताकतवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं। (पृष्ठ 212) |
| ★★108 | ज़मींदार खेती के विस्तार और गाँवों के मौद्रीकरण में क्या योगदान देते थे? | उन्होंने खेती लायक ज़मीनों को बसाने में अगुआई की और खेतिहरों को खेती के साजो–सामान व उधार देकर वहाँ बसने में मदद की। ज़मींदारी की खरीद–फ़रोख्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया में तेज़ी आई। ज़मींदार अपनी मिल्कियत की ज़मीनों की फ़सल भी बेचते थे और अकसर बाज़ार (हाट) स्थापित करते थे। (पृष्ठ 212) |
| ★★109 | ! किताब के अनुसार ज़मींदार शोषण करने वाला तबका थे; फिर भी किसानों से उनके रिश्तों में क्या पुट था? | पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था। (पृष्ठ 212) |
| ★110 | ज़मींदारों और किसानों के रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण के पुट की पुष्टि करने वाले दो पहलू कौन-से थे? | पहला: भक्ति संतों ने जातिगत और दूसरी किस्मों के अत्याचारों की बड़ी बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों (या साहूकारों) को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया। दूसरा: सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए और उनमें राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अकसर किसानों का समर्थन मिला। (पृष्ठ 212, 213) |
| ★★111 | किताब के बॉक्स “एक समांतर सैनिक बल!” में आइन के मुताबिक मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति कितनी थी? | 384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1,863 हाथी; 4,260 तोप; और 4,500 नाव। (पृष्ठ 212) |
सेट 8 — भू-राजस्व प्रणाली (कार्ड 112–127)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★112 | ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य के लिए क्या था, और इस कारण राज्य के लिए क्या करना ज़रूरी था? | ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी। इसलिए कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रखने और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाकों में राजस्व आकलन व वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना ज़रूरी था। (पृष्ठ 213) |
| ★113 | मुग़ल राजस्व तंत्र में दीवान की क्या ज़िम्मेदारी थी, और इस तंत्र से खेती की दुनिया में कौन दाखिल हुए? | दीवान के दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी। इस तंत्र से हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में दाखिल हुए, और कृषि संबंधों को शक्ल देने में एक निर्णायक ताकत के रूप में उभरे। (पृष्ठ 213) |
| ★114 | लोगों पर कर का बोझ निर्धारित करने से पहले मुग़ल राज्य ने क्या किया? | ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में खास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की। (पृष्ठ 213) |
| ★★115 | ! मुग़ल भू-राजस्व के इंतज़ामात में कौन-से दो चरण थे, और जमा और हासिल में क्या फ़र्क था? | दो चरण थे: पहला कर निर्धारण और दूसरा वास्तविक वसूली। जमा निर्धारित रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। (पृष्ठ 213) |
| ★★116 | राजस्व निर्धारित करते समय मुग़ल राज्य क्या कोशिश करता था, और हर बार इतनी वसूली क्यों नहीं हो पाती थी? | राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था। मगर स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी सचमुच में इतनी वसूली कर पाना संभव नहीं हो पाता था। (पृष्ठ 213) |
| ★★117 | अकबर ने अमील–गुज़ार (राजस्व वसूली करने वाले) को भुगतान के बारे में क्या हुक्म दिया? | कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करे, पर फ़सलों में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे। (पृष्ठ 213) |
| ★118 | मुग़ल राज्य ने हर प्रांत में किस ज़मीन की नपाई कराई, और अकबर के शासन काल में ऐसी ज़मीनों के सभी आँकड़े किसने, किस ग्रंथ में संकलित किए? | हर प्रांत में जुती हुई ज़मीन और जोतने लायक ज़मीन दोनों की नपाई की गई। अकबर के शासन काल में अबुल फ़ज़्ल ने आइन में ऐसी ज़मीनों के सभी आँकड़े संकलित किए। (पृष्ठ 213) |
| ★★119 | 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को क्या निर्देश दिया? | कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए। स्रोत 7 के अंश में परगनाओं के अमीनों को निर्देश है कि वे सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें। (पृष्ठ 213, 215) |
| ★120 | मुग़ल साम्राज्य में सभी इलाकों की नपाई सफलतापूर्वक क्यों नहीं हुई? | क्योंकि उपमहाद्वीप के कई बड़े हिस्से जंगलों से घिरे हुए थे, और इनकी नपाई नहीं हुई। (पृष्ठ 213) |
| ★★121 | आइन के अनुसार अकबर के शासन में ज़मीन के चार वर्ग पोलज, परौती, चचर और बंजर में क्या फ़र्क था? | पोलज: वह ज़मीन जिसमें एक के बाद एक हर फ़सल की सालाना खेती होती है। परौती: वह ज़मीन जिस पर कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है ताकि वह अपनी खोयी ताकत वापस पा सके। चचर: वह ज़मीन जो तीन या चार वर्षों तक खाली रहती है। बंजर: वह ज़मीन जिस पर पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं की गई हो। (पृष्ठ 214) |
| ★122 | आइन (स्रोत 5) के अनुसार पहले दो प्रकार की ज़मीन पर राजस्व निर्धारित करने का तरीक़ा क्या था? | पहले दो प्रकार की ज़मीन (पोलज और परौती) की तीन किस्में हैं: अच्छी, मध्यम और खराब। वे हर किस्म की ज़मीन के उत्पाद को जोड़ देते हैं, और इसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता है, जिसका एक-तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता है। यानी तीनों किस्मों की उपज का औसत “मध्यम उत्पाद” था, और उस औसत का एक-तिहाई राजस्व। (पृष्ठ 214) |
| ★123 | आइन (स्रोत 6) के अनुसार फ़सल के रूप में राजस्व लेने का कणकुत तरीक़ा क्या है? | हिंदी ज़ुबान में कण का मतलब है अनाज और कुत का अंदाज़ा। अगर कोई शक हो, तो फ़सल को तीन अलग–अलग पुलिंदों में काटना चाहिए: अच्छा, मध्यम और बदतर, और इस तरह शक दूर करना चाहिए। अकसर अंदाज़ से किया गया ज़मीन का आकलन भी पर्याप्त रूप से सही नतीजा देता है। (पृष्ठ 215) |
| ★124 | आइन (स्रोत 6) में कणकुत के अलावा फ़सल के रूप में राजस्व लेने के कौन-से तीन तरीक़े गिनाए गए हैं? | बटाई (जिसे भाओली भी कहते हैं): फ़सल काटकर जमा कर लेते हैं और सभी पक्षों की मौजूदगी व रज़ामंदी में बँटवारा करते हैं। खेत बटाई: बीज बोने के बाद खेत बाँट लेते हैं। लाँग बटाई: फ़सल काटने के बाद उसका ढेर बना लेते हैं और आपस में बाँट लेते हैं। (पृष्ठ 215) |
| 125 | मुग़ल राजस्व तंत्र में अमीन कौन था? | एक मुलाज़िम जिसकी ज़िम्मेदारी यह सुनिश्चित करना था कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो रहा है। (पृष्ठ 214) |
| ★126 | मुग़ल प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर कौन-सा तंत्र था, और ज़्यादातर मनसबदारों को भुगतान कैसे किया जाता था? | एक सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी), जिस पर राज्य के सैनिक व नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी। कुछ मनसबदारों को नक़दी भुगतान किया जाता था, जबकि उनमें से ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये भुगतान किया जाता था। समय–समय पर उनका तबादला किया जाता था। (पृष्ठ 214) |
| ★127 | मुग़ल साम्राज्य का इलाका किन तीन चरणों में बढ़ा? | 1530 में बाबर के शासन तक, 1605 में अकबर के शासन तक और 1707 में औरंगज़ेब के शासन तक। (पृष्ठ 214) |
सेट 9 — चाँदी का बहाव (कार्ड 128–133)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★128 | सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में एशिया के कौन-से बड़े साम्राज्य सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाने में कामयाब रहे, और उनकी राजनीतिक स्थिरता से क्या हुआ? | मुग़ल साम्राज्य, और साथ में मिंग (चीन में), सफ़ावी (ईरान में) और ऑटोमन (तुर्की में)। इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से लेकर भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की। (पृष्ठ 215) |
| ★129 | खोजी यात्राओं और नयी दुनिया के खुलने से भारत के व्यापार पर क्या असर पड़ा? | यूरोप के साथ एशिया के, खास कर भारत के, व्यापार में भारी विस्तार हुआ। भारत के समुद्र–पार व्यापार में एक ओर भौगोलिक विविधता आई, तो दूसरी ओर कई नयी वस्तुओं का व्यापार भी शुरू हो गया। (पृष्ठ 215) |
| ★★130 | बढ़ते व्यापार के साथ भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में क्या आया, और यह भारत के लिए अच्छा क्यों था? | एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और इसका एक बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। यह भारत के लिए अच्छा था क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। (पृष्ठ 216) |
| ★★131 | सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच चाँदी के बहाव के भारत की अर्थव्यवस्था और मुग़ल राज्य पर कौन-से दो नतीजे हुए? | भारत में धातु मुद्रा, खास कर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही। एक तरफ़ अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ, दूसरी तरफ़ मुग़ल राज्य को नकदी कर उगाहने में आसानी हुई। (पृष्ठ 216) |
| ★★132 | इटली के मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी ने, जो लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा था, भारत के बारे में क्या बताया? | इस बात का बड़ा सजीव चित्र पेश किया कि किस तरह चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत पहुँचती थी। उसी से यह भी पता चलता है कि सत्रहवीं सदी के भारत में बड़ी अद्भुत मात्रा में नकद और वस्तुओं का आदान–प्रदान हो रहा था। (पृष्ठ 216) |
| ★★133 | कारेरी के लेख (बर्नियर के लेख पर आधारित) के अंश (स्रोत 8) के अनुसार दुनिया भर का सोना–चाँदी आख़िरकार कहाँ पहुँच जाता था, और यूरोप को जाने वाली वस्तुएँ कैसे खरीदी जाती थीं? | दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आख़िरकार मुग़ल साम्राज्य में पहुँच जाता था; इसका बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका से आता था। यूरोप को जाने वाली सारी वस्तुएँ, चाहे वे फ्रांस जाएँ या इंग्लैंड या पुर्तगाल, नकद में खरीदी जाती थीं, और वह नकद वहीं (हिंदुस्तान में) रह जाता था। (पृष्ठ 217) |
सेट 10 — अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (कार्ड 134–149)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★134 | आइन–ए–अकबरी का ज़िम्मा किसके हुक्म पर किसने उठाया, और उसे कब पूरा किया गया? | बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने। अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद, इसे पूरा किया गया। (पृष्ठ 217) |
| ★135 | आइन–ए–अकबरी इतिहास लिखने की किस बड़ी परियोजना का हिस्सा थी? | इतिहास लिखने की एक बृहत्तर परियोजना का, जिसकी पहल अकबर ने की थी। इसका परिणाम था अकबरनामा, जिसे तीन जिल्दों में रचा गया। तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी थी, जिसे शाही नियम कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र की सूरत में संकलित किया गया था। (पृष्ठ 217) |
| ★136 | आइन–ए–अकबरी कौन-से मसलों पर विस्तार से चर्चा करती है? | दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन; राजस्व के स्रोत और अकबरी साम्राज्य के प्रांतों का भूगोल; और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक व धार्मिक रिवाज। अकबर की सरकार के तमाम विभागों और प्रांतों (सूबों) के बारे में भी यह विस्तार से जानकारी देती है। (पृष्ठ 217, 218) |
| ★137 | इतिहासकारों के लिए आइन अकबर के शासन के दौरान मुग़ल साम्राज्य के बारे में क्या है, और सूचनाओं का इकट्ठा किया जाना बादशाह के किस काम आया? | आइन सूबों के बारे में पेचीदे और आँकड़ेबद्ध सूचनाएँ बड़ी बारीकी के साथ देती है, इसलिए यह अकबर के शासन के दौरान मुग़ल साम्राज्य के बारे में सूचनाओं की खान है। सूचनाओं को इकट्ठा करके सिलसिलेवार तरीक़े से संकलित करना एक महत्त्वपूर्ण शाही कवायद थी; इसने बादशाह को साम्राज्य के तमाम इलाकों में प्रचलित रिवाजों और पेशों की जानकारी दी। (पृष्ठ 218) |
| ★138 | आइन–ए–अकबरी कितने भागों (दफ़्तर) का संकलन है, और उसकी पहली, दूसरी और तीसरी किताब किस बारे में हैं? | पाँच भागों का। पहली किताब मंज़िल–आबादी शाही घर–परिवार और उसके रख–रखाव से ताल्लुक रखती है। दूसरी सिपह–आबादी सैनिक व नागरिक प्रशासन और नौकरों की व्यवस्था के बारे में है। तीसरी मुल्क–आबादी साम्राज्य व प्रांतों के वित्तीय पहलुओं तथा राजस्व की दरों के आँकड़ों की विस्तृत जानकारी देती है। (पृष्ठ 218) |
| ★139 | आइन–ए–अकबरी की चौथी और पाँचवीं किताबों में क्या है? | चौथी और पाँचवीं किताबें भारत के लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति–रिवाजों से ताल्लुक रखती हैं। इनके आखिर में अकबर के “शुभ वचनों” का एक संग्रह भी है। (पृष्ठ 218) |
| ★140 | आइन की तीसरी किताब मुल्क–आबादी में सूबों और उनकी इकाइयों के बारे में क्या दिया गया है? | यह किताब “बारह प्रांतों का बयान” देती है। सांख्यिकी सूचनाएँ तफ़सील से दी गई हैं, जिनमें सूबों और उनकी प्रशासनिक व वित्तीय इकाइयों (सरकार, परगना और महल) के भौगोलिक, स्थलाकृतिक और आर्थिक रेखाचित्र भी शामिल हैं। इसी खंड में हर प्रांत और उसकी अलग–अलग इकाइयों की कुल मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) भी दी गई हैं। (पृष्ठ 218) |
| ★141 | आइन में सरकारों (सूबों के नीचे की इकाई) की जानकारी जिन तालिकाओं में दी गई है, उनमें कितने ख़ाने हैं और वे क्या जानकारी देते हैं? | हर तालिका में आठ ख़ाने हैं: (1) परगनात/महल; (2) क़िला; (3) अराज़ी और जमीन–ए–पाईमूद (मापे गए इलाके); (4) नकदी (नक़द निर्धारित राजस्व); (5) सुयूरग़ाल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान); (6) ज़मींदार; ख़ाने 7 और 8 में ज़मींदारों की जातियाँ और उनके घुड़सवार, पैदल सिपाही व हाथी सहित उनके फ़ौज की जानकारी। (पृष्ठ 218) |
| ★142 | अबुल फ़ज़्ल ने स्रोत 9 में अकबरनामा के लिए अपनी सूचनाएँ कैसे और किनसे हासिल करने की बात कही है? | उसने खोजबीन और मेहनत करके महामहिम की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़ इकट्ठे किए, और बहुत समय तक राज्य के मुलाज़िमों व शाही परिवार के सदस्यों के साथ जवाब तलब किया। सूबों को हुक्म जारी किया गया कि पुराने मुलाज़िमों में जिसे बीते वक्त की घटनाएँ याद हों, वह अपना संस्मरण लिखकर दरबार भेज दे। (पृष्ठ 219) |
| ★143 | प्रामाणिकता की खोज में अबुल फ़ज़्ल की सावधानी के क्या उदाहरण हैं? | मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में किताब में शामिल करने से पहले अन्य स्रोतों से उनकी असलियत और सच्चाई की पुष्टि करने की कोशिश की जाती थी। सांख्यिकी वाले खंडों में सभी आँकड़ों को अंकों के साथ शब्दों में भी लिखा गया, ताकि बाद की प्रतियों में नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों। (पृष्ठ 220) |
| ★★144 | जिन इतिहासकारों ने आइन का ध्यान से अध्ययन किया, उन्हें जोड़ करने में क्या मिला, और वे उसके बारे में क्या मानते हैं? | जोड़ करने में कई ग़लतियाँ पाई गई हैं। ऐसा माना जाता है कि या तो ये अंकगणित की छोटी–मोटी चूक है, या नकल उतारने के दौरान अबुल फ़ज़्ल के सहयोगियों की भूल। आमतौर पर ये ग़लतियाँ मामूली हैं और व्यापक स्तर पर किताब के आँकड़ों की सच्चाई को कम नहीं करतीं। (पृष्ठ 220) |
| ★★145 | आइन की एक और सीमा क्या है, जो उसके संख्यात्मक आँकड़ों से जुड़ी है? | इसके संख्यात्मक आँकड़ों में विषमताएँ हैं: सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में नहीं इकट्ठे किए गए। सूबों से लिए गए राजकोषीय आँकड़े बड़ी तफ़सील से दिए गए हैं, पर उन्हीं इलाकों से कीमतों और मज़दूरी जैसे इतने ही महत्त्वपूर्ण मापदंड उतने अच्छे से दर्ज नहीं किए गए। (पृष्ठ 220) |
| ★★146 | आइन में कीमतों और मज़दूरी की दरों की जो विस्तृत सूची दी गई है, वह कहाँ से ली गई है, और इसका क्या नतीजा है? | वह साम्राज्य की राजधानी आगरा या उसके इर्द–गिर्द के इलाकों से ली गई है। इसलिए देश के बाकी हिस्सों के लिए इन आँकड़ों की प्रासंगिकता सीमित है। (पृष्ठ 220) |
| ★★147 | जोड़ की ग़लतियों और आँकड़ों की विषमताओं जैसी सीमाओं के बावजूद आइन अपने समय के लिए क्या है, और अबुल फ़ज़्ल मध्यकालीन इतिहासकारों की परंपरा से कैसे आगे निकल गए? | आइन अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़ है। अबुल फ़ज़्ल ने मुग़ल साम्राज्य के गठन और उसकी संरचना की झलकियाँ दिखाकर और उसके बाशिंदों व उत्पादों के बारे में सांख्यिकीय आँकड़े देकर प्रचलित परंपराओं को पीछे छोड़ दिया। उनसे पहले के मध्यकालीन भारत के इतिहासकार ज़्यादातर राजनीतिक वारदातों के बारे में ही लिखते थे। (पृष्ठ 220) |
| ★★148 | कृषि संबंधों के सवाल पर आइन के सांख्यिकीय सबूतों की क्या अहमियत है, और उसकी सूचनाओं की मदद से इतिहासकार क्या करते हैं? | आइन के सांख्यिकीय सबूतों की अहमियत चुनौतियों के परे है। लोगों, उनके पेशों और व्यवसायों, साम्राज्य की व्यवस्था और उसके उच्चाधिकारियों के बारे में जो सूचनाएँ आइन मुहैया कराती है, उनकी मदद से इतिहासकार समकालीन भारत के सामाजिक ताने–बाने का इतिहास पुनः रचते हैं। (पृष्ठ 221) |
| 149 | आइन का मानक अंग्रेज़ी अनुवाद किसने किया, और कब? | तीन खंडों में अंग्रेज़ी अनुवाद हुआ। पहले खंड का मानक अनुवाद हेनरी ब्लॉकमेन का है (कलकत्ता, 1873); बाकी दो खंडों के अनुवाद एच. एस. जैरेट ने किए (कलकत्ता, 1891 और 1894)। (पृष्ठ 220) |
सेट 11 — साल और काल रेखा (कार्ड 150–156)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★150 | काल रेखा “मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव” में 1526 में क्या दर्ज है? | बाबर ने पानीपत में दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी को हराया और पहला मुग़ल बादशाह बना। (पृष्ठ 221) |
| ★151 | मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा के अनुसार हुमायूँ के जीवन के तीन चरण और उनके साल क्या हैं? | 1530–40: हुमायूँ के शासन का पहला चरण। 1540–55: शेरशाह से हारकर हुमायूँ सफ़ावी दरबार में प्रवासी बनकर रहता है। 1555–56: हुमायूँ खोये हुए राज्य को फिर से हासिल करता है। (पृष्ठ 221) |
| ★152 | मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा के अनुसार अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ और औरंगज़ेब के शासन काल किन सालों में थे? | अकबर: 1556–1605; जहाँगीर: 1605–27; शाहजहाँ: 1628–58; औरंगज़ेब: 1658–1707। (पृष्ठ 221) |
| 153 | मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा के अनुसार 1739 में क्या हुआ? | नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली को लूटा। (पृष्ठ 221) |
| 154 | मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा के अनुसार 1761 में पानीपत के तीसरे युद्ध में क्या हुआ? | अहमद शाह अब्दाली ने पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को हराया। (पृष्ठ 221) |
| 155 | मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा के अनुसार 1765 में बंगाल के बारे में क्या हुआ? | बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिए गए। (पृष्ठ 221) |
| ★156 | मुग़ल साम्राज्य की काल रेखा के अनुसार 1857 में अंतिम मुग़ल बादशाह के साथ क्या हुआ? | अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ों ने गद्दी से हटा दिया और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार में) भेज दिया। (पृष्ठ 221) |
अंतिम पाँच मिनट — यही दोहराइए
स्रोत: किसान अपने बारे में खुद नहीं लिखते थे, इसलिए मुख्य स्रोत मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे ग्रंथ हैं, जैसे अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (1598 ई.)। आइन का नज़रिया “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया” है; इसलिए गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के राजस्व दस्तावेज़ और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ भी साथ में देखे जाते हैं। (पृष्ठ 197, 217, 218)
खेती और फ़सलें: करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। खरीफ़ और रबी; साल में कम से कम दो फ़सलें, कहीं तीन। आइन के अनुसार आगरा में 39, दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें और बंगाल में चावल की 50 किस्में। जिन्स–ए–कामिल यानी सर्वोत्तम फ़सलें; तम्बाकू 1604 ई. में पहली बार देखा गया। खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए नहीं थी। (पृष्ठ 196, 200)
गाँव: खेतिहर किसान, पंचायत और मुखिया (मुक़द्दम या मंडल); पटवारी हिसाब–किताब में मदद करता था। पंचायत जुर्माना लगा सकती और समुदाय से निकाल सकती थी; हर जाति की अपनी जाति पंचायत थी। झगड़ों में समझौता न होने पर किसान विरोध के ज़्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे गाँव छोड़कर भाग जाना। (पृष्ठ 201, 202, 203, 204)
दस्तकार और नकद: कहीं–कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे; अदायगी फ़सल के हिस्से या ज़मीन के टुकड़े (महाराष्ट्र में दस्तकारों की मीरास या वतन) से, और जजमानी की व्यवस्था। गाँव एक “छोटा गणराज्य” नहीं था: उसमें गहरी विषमताएँ थीं। गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे; सराफ़ गाँवों में मुद्रा की फेर–बदल करते थे। (पृष्ठ 204, 205, 206)
महिलाएँ: महिलाएँ बुआई, निराई, कटाई और दाना निकालने का काम करती थीं; सूत कातना जैसे दस्तकारी के काम उनके श्रम पर निर्भर थे। कई संप्रदायों में “दुलहन की कीमत” दी जाती थी, दहेज नहीं। भूमिहर भद्रजनों में उन्हें पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था; राजशाही की ज़मींदारी की कर्ता–धर्ता एक स्त्री थी। (पृष्ठ 206, 207)
जंगल: जंगलों के फैलाव का औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी। जंगली का मतलब जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से गुज़ारा करने वाले, सभ्यता का न होना नहीं। राज्य को पेशकश में हाथी मिलते थे; शहद, मधुमोम और लाक की माँग थी। कबीलों के सरदार ज़मींदार और राजा बने; कोच राजा, अहोम राजा और उनके पायक; सूफ़ी संतों (पीर) की भूमिका। (पृष्ठ 208, 209, 210, 211)
ज़मींदार: मिल्कियत ज़मीन, राज्य की ओर से कर वसूली, किले और सैनिक टुकड़ियाँ (आइन के अनुसार 384,558 घुड़सवार, 4,277,057 पैदल, 1,863 हाथी, 4,260 तोप और 4,500 नाव)। शोषक होते हुए भी किसानों से रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट। (पृष्ठ 211, 212, 213)
भू-राजस्व: ज़मीन का राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद; जमा निर्धारित रक़म और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। ज़मीन के वर्ग पोलज, परौती, चचर, बंजर; वसूली के तरीक़े कणकुत और बटाई; 1665 ई. में औरंगज़ेब का हुक्म; मनसबदारी। (पृष्ठ 213, 214, 215)
चाँदी और साल: भारी मात्रा में चाँदी भारत की तरफ़ खिंची, जिससे मुद्रा संचार बढ़ा और राज्य को नकदी कर उगाहने में आसानी हुई; कारेरी लगभग 1690 ई. में। साल: 1526 बाबर; अकबर 1556–1605; जहाँगीर 1605–27; शाहजहाँ 1628–58; औरंगज़ेब 1658–1707; 1857 में बहादुर शाह ज़फ़र का देश निकाला। (पृष्ठ 216, 217, 221)