अध्याय 4विचारक, विश्वास और इमारतें

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4

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सेट 1 — साँची, भोपाल की बेगमें और अध्याय की भूमिका (कार्ड 1–15)

#प्रश्नउत्तर
★★1NCERT कक्षा 12 इतिहास के विषय 4 “विचारक, विश्वास और इमारतें” (ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक) में किस इमारत को अध्ययन का प्रमुख केंद्र-बिंदु बनाया गया है, और किताब उसके बारे में क्या कहती है?साँची का स्तूप। किताब के शब्दों में: “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।” (पृष्ठ 82)
★2बौद्ध धर्म का विशेष अध्ययन करते हुए भी किताब यह ध्यान देने को क्यों कहती है कि बौद्ध परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई?क्योंकि दूसरी कई परंपराएँ थीं जो एक-दूसरे के साथ लगातार वाद-विवाद और संवाद चला रही थीं (पृष्ठ 82)
3ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 के बीच के विचारों और विश्वासों को फिर से जोड़ने के लिए इतिहासकार कौन-से स्रोत इस्तेमाल करते हैं?बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ, और इमारतों तथा अभिलेखों जैसे भौतिक साक्ष्य (पृष्ठ 82)
★4शाहजहाँ बेगम के वर्णन के अनुसार साँची कनखेड़ा गाँव भोपाल से किस दिशा में और कितनी दूर है, और वह किस जगह बसा है?भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की तरफ़, एक पहाड़ी की तलहटी में (पृष्ठ 82)
★5भोपाल की किस नवाब ने अपनी आत्मकथा में साँची का वर्णन किया, उनका शासनकाल कब था, और आत्मकथा का नाम क्या है?शाहजहाँ बेगम ने, शासनकाल 1868 से 1901; आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) (पृष्ठ 82)
6एच.डी. बार्स्टो ने 1876 में शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा के साथ क्या किया?उसका अनुवाद किया (पृष्ठ 82)
★7शाहजहाँ बेगम के वर्णन के अनुसार मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने साँची में कई हफ़्ते रुककर क्या-क्या किया?जगह के चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, गुंबदनुमा ढाँचे के बीचोंबीच खुदाई की, और निष्कर्ष एक अंग्रेज़ी पुस्तक में लिखे (पृष्ठ 82)
★★8उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने शाहजहाँ बेगम से साँची का क्या ले जाने की इजाज़त माँगी, और किस काम के लिए?सबसे अच्छी हालत में बचा पूर्वी तोरणद्वार, फ्रांस के संग्रहालय में दिखाने के लिए (पृष्ठ 83)
★9फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों की माँग के बाद साँची के पूर्वी तोरणद्वार का क्या हुआ?दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए, और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा (पृष्ठ 83)
★★10साँची के संरक्षण के लिए धन देने वाली भोपाल की दो बेगमें कौन थीं, और सुल्तानजहाँ बेगम ने किन कामों के लिए अनुदान दिया?शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम। सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अनुदान दिया (पृष्ठ 83)
★11जॉन मार्शल ने साँची पर अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ कहाँ रहकर लिखे, और उन्हें किसे समर्पित किया?साँची में रहकर लिखे, और सुल्तानजहाँ बेगम को समर्पित किए (पृष्ठ 83)
12किताब के अनुसार साँची के स्तूप के बचे रहने में किस बात को शायद भाग्य माना गया?“शायद हम इस मामले में भी भाग्यशाली रहे हैं कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।” (पृष्ठ 83)
★13आज साँची का स्तूप किस संस्था के किस काम का “जीता जागता उदाहरण” है?भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का (पृष्ठ 83)
14साँची के स्तूप समूह में विशाल गोलार्ध ढाँचे के अलावा कौन-सी इमारत है जो पाँचवीं सदी में बनी?एक मंदिर (पृष्ठ 83)
15किताब साँची के टीले के बारे में कौन-से प्रश्न उठाती है, और इनके उत्तर कहाँ से मिलते हैं?यह टीला क्यों बना, इसके अंदर क्या था, चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों है, इसे किसने बनवाया या किसने धन दिया, इसकी “खोज” कब हुई। उत्तर ग्रंथों, मूर्तियों, स्थापत्य कला और अभिलेखों के अध्ययन से मिलते हैं (पृष्ठ 84)

सेट 2 — यज्ञ, उपनिषद और वाद-विवाद (कार्ड 16–35)

#प्रश्नउत्तर
★16ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि में ईरान, चीन, यूनान और भारत में कौन-से चिंतक हुए?ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु, भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य (पृष्ठ 84)
17ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि में गंगा घाटी में समाज और अर्थव्यवस्था की क्या हालत थी, जिसे उस समय के मनीषी समझना चाहते थे?नए राज्य और शहर उभर रहे थे, और सामाजिक-आर्थिक जीवन बदल रहा था (पृष्ठ 84)
★★18ऋग्वेद कब संकलित हुआ, और उसमें किन देवताओं की स्तुतियाँ हैं?1500 से 1000 ईसा पूर्व में; अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुतियों का संग्रह (पृष्ठ 84)
19ऋग्वेद की स्तुतियों के समय होने वाले यज्ञों में लोग किन चीज़ों के लिए प्रार्थना करते थे?मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए (पृष्ठ 84)
★20वैदिक यज्ञ करने वाले लोग समय के साथ कैसे बदले?शुरू में यज्ञ सामूहिक होते थे; बाद में (लगभग 1000 से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे; राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे (पृष्ठ 84)
21राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ करने के लिए राजा और सरदार किन पर निर्भर थे?ब्राह्मण पुरोहितों पर (पृष्ठ 84)
22ऋग्वेद के यज्ञ-छंद (स्रोत 1) किस भाषा में रचे गए थे, और कैसे सिखाए जाते थे?वैदिक संस्कृत में; पुरोहित परिवारों के लोगों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे (पृष्ठ 84)
★23उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) की विचारधाराएँ क्या दिखाती हैं?कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे (पृष्ठ 84, 85)
★24लगभग छठी सदी ई.पू. के छांदोग्य उपनिषद (स्रोत 2) के अनुसार सच्चा यज्ञ क्या है?बहता हुआ पवन, क्योंकि बहते-बहते वह सबको पवित्र करता है (पृष्ठ 85)
25छांदोग्य उपनिषद के अंश में आत्मा की प्रकृति कैसी बताई गई है?धान, यव, सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी, और पृथ्वी, क्षितिज, स्वर्ग और सभी लोकों से बड़ी (पृष्ठ 85)
26वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक छठी सदी ई.पू. के आसपास कौन-सा प्रश्न पूछ रहे थे?कि सत्य एक होता है या अनेक (पृष्ठ 85)
★27समकालीन बौद्ध ग्रंथों में कितने संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख है?64 (पृष्ठ 85)
★28कुटागारशाला क्या है, और वहाँ क्या होता था?नुकीली छत वाली झोपड़ी; शिक्षकों की चर्चाएँ और बहस यहाँ या उपवनों में होती थीं, जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे (पृष्ठ 85)
★29शिक्षकों की बहस में एक शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को तर्कों से समझा लेता, तो क्या होता था?प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता था; इसलिए किसी भी संप्रदाय का समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था (पृष्ठ 85)
★★30महावीर और बुद्ध समेत कई शिक्षकों ने किस पर प्रश्न उठाए, और जीवन के दुखों से मुक्ति के बारे में क्या माना?वेदों के प्रभुत्व पर; माना कि दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है (पृष्ठ 85)
31दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति कर सकता है, यह समझ ब्राह्मणवाद से कैसे अलग थी?ब्राह्मणवाद मानता था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से तय होता है (पृष्ठ 85)
★★32सुत्त पिटक के दृष्टांत (स्रोत 3) में मगध के राजा अजातसत्तु ने बुद्ध को किस शिक्षक की बातें बताईं, और उसी स्रोत में दूसरा उपदेश किस दार्शनिक का है?राजा ने मक्खलि गोसाल (आजीविक परंपरा) की बातें बताईं; दूसरा उपदेश दार्शनिक अजीत केसकंबलिन् (लोकायत परंपरा) का है (पृष्ठ 87)
★33! आजीविक परंपरा के मक्खलि गोसाल के बारे में किताब क्या नाम बताती है, और वे क्या मानते थे?किताब के अनुसार आजीविकों को अक्सर नियतिवादी कहा जाता है। मक्खलि गोसाल के अनुसार सुख और दुख पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं और कोई कुछ बदल नहीं सकता (पृष्ठ 87)
★34! लोकायत परंपरा के अजीत केसकंबलिन् के बारे में किताब क्या नाम बताती है, और उनके अनुसार मृत्यु के बाद क्या होता है?किताब के अनुसार लोकायतों को सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है। उनके अनुसार मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता (पृष्ठ 87)
35! आजीविक और लोकायत परंपराओं के बारे में हमारी जानकारी सीमित क्यों है?इनके अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, इसलिए इनके बारे में दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से ही पता चलता है (पृष्ठ 87)

सेट 3 — महावीर और जैन धर्म (कार्ड 36–46)

#प्रश्नउत्तर
★36जैन परंपरा के अनुसार वर्धमान महावीर से पहले कितने शिक्षक हो चुके थे, और उन्हें क्या कहा जाता है?23 शिक्षक; उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है (पृष्ठ 88)
★★37जैन परंपरा में तीर्थंकर किन्हें कहा जाता है?“वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं” (पृष्ठ 88)
38जैनों के मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले कहाँ और कब प्रचलित थे?उत्तर भारत में, छठी सदी ईसा पूर्व में महावीर के जन्म से पहले ही (पृष्ठ 88)
★★39जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा क्या है?“संपूर्ण विश्व प्राणवान है”: पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है (पृष्ठ 88)
★40जैन दर्शन के केंद्र बिंदु अहिंसा का क्या अर्थ है, और उसका भारतीय चिंतन पर क्या असर पड़ा?इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना; इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया (पृष्ठ 88)
★41जैन दर्शन में जन्म और पुनर्जन्म का चक्र किससे तय होता है, उससे मुक्ति के लिए क्या ज़रूरी है, और इससे कौन-सा नियम बना?चक्र कर्म से तय होता है; मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या ज़रूरी है, जो संसार के त्याग से ही संभव है; इसलिए विहारों में रहना अनिवार्य नियम बन गया (पृष्ठ 88)
★★42जैन साधु और साध्वी कौन-से पाँच व्रत करते थे?हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन और धन संग्रह न करना (पृष्ठ 88)
43महावीर के शिष्यों ने उनके उपदेश किस रूप में संकलित किए, और क्यों?अक्सर कहानियों के रूप में, जो आम लोगों को आकर्षित करती थीं (पृष्ठ 88)
44उत्तराध्ययन सूत्र के अंश (स्रोत 4) में महारानी कमलावती अपने पति से क्या कहती हैं?संन्यास लेने के लिए समझाती हैं: संपूर्ण विश्व के खज़ाने से भी संतोष नहीं होगा; मृत्यु पर धन पीछे छूट जाएगा और सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा; जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से (पृष्ठ 88)
45जैन विद्वानों ने किन भाषाओं में साहित्य रचा, और उसकी पांडुलिपियाँ कहाँ सुरक्षित हैं?प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी कई भाषाओं में; पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में (पृष्ठ 89)
★46धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में कौन-सी मूर्तियाँ हैं?जैन तीर्थंकरों के उपासकों की बनवाई मूर्तियाँ, जो भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में मिली हैं (पृष्ठ 89)

सेट 4 — बुद्ध, उनकी शिक्षाएँ और त्रिपिटक (कार्ड 47–65)

#प्रश्नउत्तर
47सैकड़ों वर्षों में बुद्ध के संदेश उपमहाद्वीप से बाहर किन इलाकों तक फैले?मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक (पृष्ठ 89)
★48! बुद्ध की जीवनी बताने वाले चरित ग्रंथों की क्या सीमा है?इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए (पृष्ठ 89)
★49संतचरित्र क्या होता है, और तथ्य के रूप में पूरी तरह सही न होने पर भी वह महत्वपूर्ण क्यों है?किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी, जो उसकी उपलब्धियों का गुणगान करती है। वह उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वास बताती है, इसलिए महत्वपूर्ण है (पृष्ठ 89)
50बुद्ध के बचपन का नाम क्या था, और वे किस कबीले के सरदार के बेटे थे?सिद्धार्थ; शाक्य कबीले के सरदार के (पृष्ठ 89)
★51सिद्धार्थ ने रथकार के साथ शहर घूमते हुए क्या-क्या देखा, और इसके बाद उन्होंने क्या किया?एक वृद्ध, एक बीमार और एक लाश; फिर एक गृहत्याग किए संन्यासी को। उन्होंने संन्यास का रास्ता चुना और महल छोड़ दिया (पृष्ठ 89, 90)
52सिद्धार्थ को ज्ञान कैसे प्राप्त हुआ?शरीर को अधिक से अधिक कष्ट देने के चलते वे मरते-मरते बचे; अतिवादी तरीके छोड़कर कई दिन ध्यान करने के बाद उन्हें ज्ञान मिला (पृष्ठ 90)
53बुद्ध के संभाषण क्या उनके जीवन काल में लिखे गए थे, और उनकी शिक्षाओं का संकलन कहाँ हुआ?नहीं, उनके जीवन काल में कोई संभाषण लिखा नहीं गया। मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) वेसली (बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप) में ‘ज्येष्ठों’ की सभा में संकलन हुआ (पृष्ठ 86)
★★54त्रिपिटक के तीन पिटक कौन-से हैं, और हर एक में क्या है?विनय पिटक: संघ या मठों में रहने वालों के नियम; सुत्त पिटक: बुद्ध की शिक्षाएँ; अभिधम्म पिटक: दर्शन से जुड़े विषय (पृष्ठ 86)
55‘त्रिपिटक’ शब्द का शब्दार्थ क्या है?‘तीन टोकरियाँ’, अलग-अलग प्रकार के ग्रंथ रखने के लिए (पृष्ठ 86)
56श्रीलंका में लिखे गए बौद्ध इतिहास के दो ग्रंथ कौन-से हैं?दीपवंश (द्वीप का इतिहास) और महावंश (महान इतिहास) (पृष्ठ 86)
57ज़्यादातर पुराने बौद्ध ग्रंथ किस भाषा में हैं, और फा-शिएन तथा श्वैन त्सांग किसलिए चीन से भारत आए?ज़्यादातर पालि में; बाद के युगों में संस्कृत में। वे बौद्ध ग्रंथों की खोज में आए और पुस्तकें अपने देश ले गए (पृष्ठ 86)
★★58बौद्ध दर्शन के मूल विचार (पृष्ठ 91) क्या हैं?विश्व अनित्य है; विश्व आत्माविहीन है, क्योंकि कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं; दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है; मध्यम मार्ग से दुखों से मुक्ति मिल सकती है (पृष्ठ 91)
★59बौद्ध दर्शन में मध्यम मार्ग किन दो चीज़ों के बीच का रास्ता है?घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच का (पृष्ठ 91)
60प्रारंभिक बौद्ध परंपराओं में भगवान के होने या न होने का क्या महत्व था?अप्रासंगिक था (पृष्ठ 91)
61मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ को बुद्ध ने किस तरह समझाया?बच्चे को जीवित करने के बजाय विवेक और तर्क से उसे मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई (पृष्ठ 91)
★62समाज के बारे में बुद्ध का क्या मत था, और इससे उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को क्या सलाह दी?समाज का निर्माण इनसानों ने किया, ईश्वर ने नहीं। इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी (पृष्ठ 92)
63बौद्ध दर्शन में निर्वाण का क्या मतलब है?“अहं और इच्छा का खत्म हो जाना” (पृष्ठ 92)
★64बौद्ध परंपरा के अनुसार शिष्यों के लिए बुद्ध का अंतिम निर्देश क्या था?“तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।” (पृष्ठ 92)
65सुत्त पिटक के अंश (स्रोत 5) में बुद्ध किसे सलाह देते हैं, और वे मालिक से नौकरों और कर्मचारियों के लिए क्या करने को कहते हैं?सिगल नाम के अमीर गृहपति को; मालिक नौकरों और कर्मचारियों की पाँच तरह से देखभाल करे: क्षमता के अनुसार काम, भोजन और मज़दूरी, बीमारी में परिचर्या, सुस्वादु भोजन बाँटना, समय-समय पर छुट्टी (पृष्ठ 91)

सेट 5 — संघ और थेरीगाथा (कार्ड 66–77)

#प्रश्नउत्तर
★★66बुद्ध ने किस संस्था की स्थापना की, और उसके भिक्षुओं को भिक्खु क्यों कहा जाता था?संघ की, यानी ऐसे भिक्षुओं की संस्था जो धम्म के शिक्षक बन गए। वे दान पर निर्भर थे, इसलिए भिक्खु कहलाए (पृष्ठ 92)
67संघ के श्रमण किस तरह का जीवन बिताते थे?सादा जीवन: बहुत ज़रूरी चीज़ों के अलावा उनके पास कुछ नहीं होता था, जैसे दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा (पृष्ठ 92)
★★68बौद्ध संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी कौन थीं, और बौद्ध ग्रंथों के अनुसार महिलाओं को अनुमति दिलाने में किसकी भूमिका थी?बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी; बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर अनुमति पाई (पृष्ठ 92)
★69थेरी किन्हें कहा जाता है?ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो; संघ में आई कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और आगे चलकर थेरी बनीं (पृष्ठ 92)
★70बुद्ध के अनुयायी किन-किन वर्गों से आए, और संघ में आने पर सब बराबर क्यों माने जाते थे?राजा, धनवान, गृहपति और कर्मकार, दास, शिल्पी जैसे सामान्य जन। भिक्खु या भिक्खुनी बनने पर पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी, इसलिए सब बराबर माने जाते थे (पृष्ठ 92)
71संघ की संचालन पद्धति किस परंपरा पर आधारित थी, और निर्णय कैसे होते थे?गणों और संघों की परंपरा पर; लोग बातचीत से एकमत होने की कोशिश करते थे, न हो पाता तो मतदान से निर्णय होता था (पृष्ठ 92)
★★72थेरीगाथा क्या है, और इतिहासकारों के लिए उसका क्या महत्व है?सुत्त पिटक का हिस्सा, जिसमें भिक्खुनियों के रचे छंद हैं; इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों की झलक मिलती है (पृष्ठ 93)
73थेरीगाथा (स्रोत 6) में दिए गए पद्य की रचना करने वाली पुन्ना कौन थी, और वह रोज़ क्या करती थी?एक दासी, जो रोज़ सुबह मालिक के घर के लिए नदी का पानी लाने जाती थी और वहाँ एक ब्राह्मण को स्नान कर्म करते देखती थी (पृष्ठ 93)
★74ब्राह्मण ने पुन्ना से कहा कि जल में स्नान करने से बुरा करने वाला भी मुक्त हो जाता है; पुन्ना ने इसका क्या उत्तर दिया?पुन्ना ने कहा: “वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे”। फिर उसने कहा: “इसके बदले में वे कर्म न करें जिनका डर आपको पानी की ओर खींचता है।” (पृष्ठ 93)
★75विनय पिटक के नियमों (स्रोत 7) में नया कंबल या गलीचा बनाने पर भिक्खु के लिए क्या नियम है?उसे उसका प्रयोग कम से कम छह वर्षों तक करना होगा; इससे पहले बिना भिक्खुओं की अनुमति के नया बनवाने पर वह ले लिया जाएगा और अपराध स्वीकार करना होगा (पृष्ठ 94)
76विनय पिटक के अनुसार गृहस्थ के घर से मिला भोजन कितना ले सकते हैं?दो से तीन कटोरा भर ही, और उसे दूसरे भिक्खुओं के साथ बाँटना होगा (पृष्ठ 94)
★77बौद्ध धर्म बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद तेज़ी से क्यों फैला?लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे और तेज़ सामाजिक बदलावों से उलझन में थे; शिक्षाओं में जन्म की जगह अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व मिला; और छोटे व कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा के आदर्श भाए (पृष्ठ 94)

सेट 6 — स्तूप: क्यों, कैसे और किस बनावट के (कार्ड 78–92)

#प्रश्नउत्तर
★78बौद्ध साहित्य में चैत्यों की चर्चा के अनुसार बुद्ध के जीवन की कौन-सी चार जगहें पवित्र मानी गईं?लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (पहला उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान) (पृष्ठ 95, 96)
79पृष्ठ 95 के किनारे वाले बॉक्स के अनुसार चैत्य किन टीलों को कहा गया?शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रख दिए जाते थे; अंतिम संस्कार से जुड़े ऐसे टीले चैत्य के रूप में जाने गए। इसी पृष्ठ के मुख्य पाठ में पवित्र जगहों पर बनी छोटी-सी वेदी को भी कभी-कभी चैत्य कहा गया है (पृष्ठ 95)
★★80बौद्ध परंपरा में स्तूप किन टीलों को कहा गया?कुछ पवित्र जगहों पर बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे उनकी अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान, गाड़ दिए गए थे; इन टीलों को स्तूप कहा गया (पृष्ठ 96)
★81! क्या स्तूप बनाने की परंपरा बौद्ध धर्म ने शुरू की थी?किताब के अनुसार यह परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, पर बौद्ध धर्म से जुड़ गई। अवशेष पवित्र माने जाते थे, इसलिए पूरा स्तूप ही बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया (पृष्ठ 96)
★82अशोकावदान नाम के बौद्ध ग्रंथ के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों के बारे में क्या आदेश दिया?अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया (पृष्ठ 96)
83ईसा पूर्व दूसरी सदी तक किन जगहों पर स्तूप बन चुके थे?भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर (पृष्ठ 96)
★84सुत्त पिटक के महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) के अनुसार बुद्ध ने परिनिर्वाण से पहले आनंद को अपने अवशेषों के लिए क्या करने को कहा?पहले कहा कि अवशेषों को विशेष आदर देने में उलझो मत। फिर विशेष आग्रह पर कहा कि तथागत (बुद्ध का दूसरा नाम) के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए, जो वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा या सिर नवाएगा, उसके लिए वह चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा (पृष्ठ 96)
★85स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेख क्या बताते हैं, और दान देने वालों में कौन-कौन थे?कि इन्हें बनाने और सजाने के लिए दान किसने दिया। दान राजाओं (जैसे सातवाहन वंश के राजा), शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों, सैकड़ों स्त्री-पुरुषों, और भिक्खुओं तथा भिक्खुनियों ने दिए (पृष्ठ 96)
86साँची के किसी तोरणद्वार का एक हिस्सा किनके दान से बना था?हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से (पृष्ठ 96)
★★87स्तूप का अंड क्या है, और उसके ऊपर बनी हर्मिका किसका प्रतीक थी?अंड स्तूप का गोलार्ध मिट्टी का टीला है, जहाँ से स्तूप की शुरुआत हुई। उसके ऊपर हर्मिका थी, छज्जे जैसा ढाँचा जो देवताओं के घर का प्रतीक था (पृष्ठ 96)
★88! स्तूप में हर्मिका और छत्री में क्या अंतर है?दोनों अलग हैं: हर्मिका अंड के ऊपर का छज्जे जैसा ढाँचा है; उससे एक मस्तूल, यष्टि, निकलता था, और छत्री उस यष्टि पर अक्सर लगी होती थी (पृष्ठ 96)
89स्तूप के टीले के चारों ओर बनी वेदिका का काम क्या था?पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करना (पृष्ठ 96, 97)
90साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों में सजावट कहाँ थी?स्तूप बिना अलंकरण के थे, सिवाय पत्थर की वेदिकाओं (बाँस या काठ के घेरे जैसी) और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वारों के, जिन पर खूब नक्काशी थी (पृष्ठ 97)
★★91उपासक साँची जैसे स्तूप में कहाँ से प्रवेश करते थे, और परिक्रमा किस तरह करते थे?पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके, टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों (पृष्ठ 97)
92साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूपों के बाद के स्तूपों में अलंकरण कैसा बदला, और ऐसे उदाहरण कहाँ मिलते हैं?बाद में टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी होने लगी; अमरावती में और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी के स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उकेरने के बहुत उदाहरण मिलते हैं (पृष्ठ 97)

सेट 7 — अमरावती और साँची: खोज और संरक्षण (कार्ड 93–108)

#प्रश्नउत्तर
931796 में अमरावती में क्या हुआ?मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले। उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया; उन्हें लगा कि इस छोटी-सी पहाड़ी में शायद कोई खज़ाना छुपा हो (पृष्ठ 98)
94अमरावती के स्तूप के बारे में कॉलिन मेकेंज़ी ने क्या किया, और उनका काम आम लोगों तक क्यों नहीं पहुँचा?इस अंग्रेज़ अधिकारी ने कई मूर्तियाँ पाईं और उनका विस्तृत चित्रांकन किया, पर उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं (पृष्ठ 98)
★951854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर अमरावती से जो मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए, वे किस नाम से जाने जाते हैं, और उन्होंने क्या माना?उनके नाम पर एलियट संगमरमर। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार भी खोज निकाला और माना कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था (पृष्ठ 98)
★961850 के दशक में अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर कहाँ-कहाँ पहुँचे?कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, मद्रास में इंडिया ऑफिस और लंदन तक; कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बागों में भी अमरावती की मूर्तियाँ थीं (पृष्ठ 98)
★★97पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल अमरावती की मूर्तियों की लूट के बारे में क्या सोचते थे, और उन्होंने क्या सुझाया?उन्होंने लिखा: “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” उनका सुझाव था कि संग्रहालयों में प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें (पृष्ठ 98)
★98कोल की बात का अमरावती और साँची पर अलग-अलग क्या असर हुआ?कोल अधिकारियों को अमरावती के लिए राज़ी नहीं कर पाए, पर साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई (पृष्ठ 99)
★★99किताब के अनुसार साँची का स्तूप बचा रहा और अमरावती का नहीं; इसकी एक संभावित वजह क्या है?शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब तक विद्वान यह नहीं समझ पाए थे कि अवशेष उठा ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना ज़रूरी है (पृष्ठ 99)
★1001818 में साँची की खोज के समय स्तूप की क्या हालत थी?उसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला अच्छी हालत में था (पृष्ठ 99)
101आज अमरावती के महाचैत्य की क्या हालत है?किताब के शब्दों में “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।” (पृष्ठ 99)
102प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण की कालरेखा (पृष्ठ 110) में कलकत्ता के इंडियन म्यूज़ियम और मद्रास के गवर्नमेंट म्यूज़ियम की स्थापना के साल क्या हैं?1814 में इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता; 1851 में गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास (पृष्ठ 110)
103प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण की कालरेखा (पृष्ठ 110) के अनुसार 1834 में और 1835 से 1842 के बीच क्या हुआ?1834 में रामराजा की एसेज़ ऑन द आर्किटैक्चर ऑफ़ द हिंदूज़ प्रकाशित हुई और कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की; 1835 से 1842 में जेम्स फर्गुसन ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया (पृष्ठ 110)
104अलेक्जैंडर कनिंघम की 1854 की पुस्तक भिलसा टोप्स का क्या महत्व बताया गया है?वह साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है (पृष्ठ 110)
1051878 और 1880 में प्राचीन इमारतों की खोज और संरक्षण से जुड़ा क्या हुआ?1878 में राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक बुद्ध गया : द हेरिटेज़ ऑफ़ शाक्य मुनि छपी; 1880 में एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया (पृष्ठ 110)
★1061888 में बने ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट के अनुसार सरकार क्या कर सकती थी?पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी (पृष्ठ 110)
107खोज और संरक्षण की कालरेखा (पृष्ठ 110) में जॉन मार्शल की किन दो पुस्तकों का उल्लेख है, और वे किस साल प्रकाशित हुईं?1914 में अल्फ्रेड फूसे के साथ द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची; 1923 में कंजर्वेशन मैनुअल (पृष्ठ 110)
108खोज और संरक्षण की कालरेखा (पृष्ठ 110) में 1955 और 1989 के साल किन घटनाओं के हैं?1955 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी; 1989 में साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया (पृष्ठ 110)

सेट 8 — मूर्तिकला: कथाएँ, प्रतीक और लोक परंपराएँ (कार्ड 109–123)

#प्रश्नउत्तर
109चारणचित्र क्या होते हैं, और किताब का कौन-सा भाग साँची की मूर्तियों के बारे में इन्हीं के उदाहरण से शुरू होता है?कपड़ों या कागज़ पर बने चित्र, जिन्हें घुमक्कड़ कथावाचक साथ लेकर घूमते हैं और कहानी कहते समय दिखाते हैं। भाग 9.1 “पत्थर में गढ़ी कथाएँ” इसी उदाहरण से शुरू होता है (पृष्ठ 99)
★★110! साँची के उत्तरी तोरणद्वार के एक हिस्से की मूर्ति में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला दृश्य पहली नज़र में ग्रामीण लगता है; कला इतिहासकार उसे किस कथा का दृश्य बताते हैं?वेसान्तर जातक का। यह एक दानी राजकुमार की कहानी है, जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और पत्नी तथा बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया (पृष्ठ 99, 100)
111किसी मूर्ति की व्याख्या इतिहासकार अक्सर कैसे करते हैं?उसकी लिखित साक्ष्यों के साथ तुलना करके (पृष्ठ 100)
★★112कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर किन प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई, और इसे समझने के लिए कला इतिहासकारों को क्या पढ़ना पड़ा?रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र और पेड़ जैसे प्रतीकों से। इन्हें समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध का चरित लेखन समझना पड़ा (पृष्ठ 100)
★113प्रारंभिक बौद्ध मूर्तिकला में रिक्त स्थान, स्तूप और चक्र हर एक किस बात का प्रतीक है?रिक्त स्थान: बुद्ध के ध्यान की दशा; स्तूप: महापरिनिब्बान; चक्र: सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश (पृष्ठ 100)
114पेड़ वाले प्रतीक के बारे में किताब क्या कहती है?कि वह केवल एक पेड़ नहीं है, बल्कि बुद्ध के जीवन की एक घटना दिखाता है; बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान मिला था (पृष्ठ 100, 101)
115! प्रतीकों वाली प्रारंभिक बौद्ध मूर्तिकला के बारे में किताब क्या चेतावनी देती है?किताब कहती है, “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” इन्हें समझने के लिए इतिहासकारों को कलाकृतियों के निर्माताओं की परंपराओं को जानना ज़रूरी है (पृष्ठ 100, 101)
★★116साँची के तोरणद्वार के किनारे पेड़ पकड़कर झूलती सुंदर स्त्री की मूर्ति पहले विद्वानों को असमंजस में क्यों डालती थी, और आगे क्या पता चला?उसका त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नहीं दिखता था। साहित्यिक परंपराओं से पता चला कि वह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका है; लोक परंपरा में माना जाता था कि उसके छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल लगने लगते थे (पृष्ठ 101)
★117शालभंजिका की मूर्ति से बौद्ध धर्म के बारे में क्या पता चलता है?लगता है यह शुभ प्रतीक माना जाता था, इसलिए स्तूप के अलंकरण में आई। इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया (पृष्ठ 101)
118साँची में जानवरों की मूर्तियाँ क्यों उकेरी गईं, और हाथी किसके प्रतीक माने जाते थे?साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, पर लगता है कि जानवर लोगों को आकर्षित करने के लिए भी उकेरे गए। जानवर मनुष्यों के गुणों के प्रतीक भी थे; हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे (पृष्ठ 101)
★119! साँची की मूर्तियों में कमल दल और हाथियों के बीच जिस महिला पर हाथी जल छिड़क रहे हैं (चित्र 4.19), वह कौन है?इतिहासकार एकमत नहीं हैं: कुछ उसे बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं, दूसरे उसे लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं, जो सौभाग्य लाने वाली देवी हैं। यह भी संभव है कि उपासक उसे दोनों से जोड़ते थे (पृष्ठ 102, 103)
120साँची के स्तंभों पर दिखाए गए सर्प किस तरह की परंपराओं से आए माने जाते हैं?शायद उन लोक परंपराओं से, जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था (पृष्ठ 102, 103)
121जेम्स फर्गुसन ने साँची को किस पूजा का केंद्र माना, और उन्होंने यह निष्कर्ष किस आधार पर निकाला?वृक्ष और सर्प पूजा का। वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे, क्योंकि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था; उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर निष्कर्ष निकाले (पृष्ठ 103)
122गुफाओं की दीवारों के चित्रों में कौन-सी चित्रकारी बहुत प्रसिद्ध है, और वह किन कथाओं को दिखाती है?अजंता (महाराष्ट्र) की, जो जातकों की कथाएँ दिखाती है: राज दरबार का जीवन, शोभा यात्राएँ, काम करते स्त्री-पुरुष और त्यौहार (पृष्ठ 102)
123अजंता के चित्रों को त्रिविम रूप देने के लिए कलाकारों ने कौन-सी तकनीक अपनाई?आभाभेद (पृष्ठ 102)

सेट 9 — नयी परंपराएँ: महायान, वैष्णव, शैव और मंदिर (कार्ड 124–138)

#प्रश्नउत्तर
★★124ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में कौन-से बदलाव दिखने लगे?एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरी, बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए, और बुद्ध तथा बोधिसत्तों की मूर्ति पूजा इस परंपरा का अंग बन गई (पृष्ठ 103)
★125प्रारंभिक बौद्ध मत में निब्बान के लिए किसे महत्त्व दिया जाता था, और बोधिसत्त को कैसा माना गया?निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व था, और बुद्ध भी एक मनुष्य समझे जाते थे। बोधिसत्त सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे, पर उस पुण्य से दुनिया को दुखों में छोड़कर निब्बान नहीं पाते थे, बल्कि दूसरों की सहायता करते थे (पृष्ठ 103)
★★126! नयी चिंतन परंपरा किस नाम से जानी गई, और पुरानी परंपरा को हीनयान किसने कहा?नयी चिंतन परंपरा महायान के नाम से जानी गई, और इसे अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा। पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे, यानी पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के बताए रास्ते पर चलने वाले (पृष्ठ 103)
★127वैष्णव और शैव परंपराएँ किन्हें सबसे महत्वपूर्ण देवता मानती थीं?वैष्णव परंपरा में विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है; शैव संकल्पना में शिव परमेश्वर हैं (पृष्ठ 104)
★★128भक्ति किसे कहते हैं?किसी विशेष देवता की पूजा, जिसमें भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना जाता है (पृष्ठ 104)
★129वैष्णववाद में कितने अवतारों की कल्पना है, और अवतार कब लेते थे?दस अवतारों की। माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव से जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आती, तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते (पृष्ठ 104)
130अलग-अलग अवतारों की कल्पना से एकीकृत धार्मिक परंपरा बनाने में क्या मदद मिली होगी?शायद अलग-अलग अवतार देश के अलग-अलग हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एक एकीकृत धार्मिक परंपरा बनाने का महत्वपूर्ण तरीका था (पृष्ठ 104)
131शिव को किस रूप में बनाया जाता था, और देवताओं की खूबियाँ मूर्तियों में कैसे दिखाई जाती थीं?शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था, पर कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया। खूबियाँ शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों और बैठने की शैली से दिखाई जाती थीं (पृष्ठ 104)
132पुराणों के बारे में किताब क्या बताती है: वे कब से मिलते हैं, किस भाषा में लिखे गए और कौन सुन सकता था?कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में मिलती हैं। वे सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में लिखे गए और ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, ताकि कोई भी सुन सके; महिलाएँ और शूद्र, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराण सुन सकते थे (पृष्ठ 104, 105)
133पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ कैसे बनीं, और मथुरा इलाके के कौन-से देवता का उदाहरण दिया गया है?लोगों के आपसी मेल-मिलाप से: पुजारी, व्यापारी और आम स्त्री-पुरुष जगह-जगह आते-जाते अपने विश्वासों का आदान-प्रदान करते थे। वासुदेव-कृष्ण मथुरा इलाके के महत्वपूर्ण देवता थे, और कई शताब्दियों में उनकी पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी फैल गई (पृष्ठ 105)
★★134शुरू के मंदिर की बनावट कैसी थी, और गर्भगृह क्या है?गर्भगृह एक चौकोर कमरा था, जिसमें एक दरवाज़ा होता था, जिससे उपासक मूर्ति की पूजा के लिए भीतर जा सकता था (पृष्ठ 105)
135गर्भगृह के ऊपर धीरे-धीरे क्या बनाया जाने लगा, और बाद के मंदिरों में क्या जुड़ा?ऊँचा ढाँचा, जिसे शिखर कहा जाता था। बाद के युगों में मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण जुड़ गए, और जल आपूर्ति का इंतज़ाम भी होने लगा (पृष्ठ 105, 106)
★136! सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ किसके आदेश से, किनके लिए और कब बनाई गई थीं?किताब के शब्दों में: “सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।” (पृष्ठ 107)
★137कृत्रिम गुफाओं की परंपरा का सबसे विकसित रूप कौन-सा मंदिर है?आठवीं सदी का कैलाशनाथ (शिव का एक नाम) मंदिर, एलोरा, जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया (पृष्ठ 107)
138एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर का निर्माण पूरा होने पर, एक ताम्रपत्र अभिलेख के अनुसार, प्रमुख तक्षक ने अपना आश्चर्य किन शब्दों में व्यक्त किया?“हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!” (पृष्ठ 107)

सेट 10 — दृश्य परंपराओं को समझना और कालरेखा 1 (कार्ड 139–149)

#प्रश्नउत्तर
★139उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों को कई सिरों, कई हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूप मिलाकर बनी मूर्तियाँ कैसी लगीं, और उन्होंने इन्हें समझने के लिए किससे तुलना की?उन्हें ये मूर्तियाँ विकृत लगीं। उन्होंने तुलना प्राचीन यूनान की कला से की और प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनानी कला से निम्न माना (पृष्ठ 107, 108)
★★140उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों को बुद्ध और बोधिसत्त की कौन-सी मूर्तियाँ भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना लगीं, और क्यों?तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिलीं मूर्तियाँ। वे यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं और यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं (पृष्ठ 108)
★141! उत्तर-पश्चिम में भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य कब बनाए, जिससे वहाँ की मूर्तियों पर यूनानी असर पड़ा?किताब के अनुसार ईसा से दो सौ साल पहले (पृष्ठ 108)
142मूर्ति का महत्त्व और संदर्भ समझने के लिए कला इतिहासकार अक्सर किसकी मदद लेते हैं, और किताब इस तरीके के बारे में क्या कहती है?लिखित ग्रंथों की। यह यूनानी मूर्तियों से तुलना करने से बेहतर तरीका है, पर बहुत आसान नहीं (पृष्ठ 108)
★★143महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान पर किस कथा का चित्रण है?विद्वान एकमत नहीं हैं: कुछ इसे गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण मानते हैं (चट्टान की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है), दूसरे इसे महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या मानते हैं (पृष्ठ 109)
144बहुत से रीति-रिवाज और धार्मिक विश्वास इमारतों, मूर्तियों या चित्रों में स्थायी रूप से दर्ज़ क्यों नहीं हुए होंगे?शायद कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत न लगी हो, फिर भी उनकी धार्मिक और दार्शनिक परंपरा सक्रिय रही हो (पृष्ठ 109)
145किताब अध्याय के शानदार उदाहरणों को किस रूप में देखने को कहती है?किताब कहती है कि चुने गए उदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं” (पृष्ठ 109)
★146पृष्ठ 110 की धार्मिक बदलावों की कालरेखा 1 के अनुसार लगभग 1500 से 1000 ईसा पूर्व और लगभग 1000 से 500 ईसा पूर्व में कौन-सी परंपराएँ थीं?लगभग 1500–1000 ई.पू.: प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ; लगभग 1000–500 ई.पू.: उत्तर वैदिक परंपराएँ (पृष्ठ 110)
★147धार्मिक बदलावों की कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) के अनुसार लगभग छठी सदी ई.पू. में कौन-से विचार और धर्म उभरे?प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म और बौद्ध धर्म (पृष्ठ 110)
148धार्मिक बदलावों की कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) में लगभग तीसरी सदी ई.पू. और लगभग तीसरी सदी ईसवी की पंक्तियाँ किनकी हैं?लगभग तीसरी सदी ई.पू.: आरंभिक स्तूप; लगभग तीसरी सदी ईसवी: सबसे पुराने मंदिर (पृष्ठ 110)
★★149धार्मिक बदलावों की कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) की “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे” वाली पंक्ति में कौन-से विकास साथ रखे गए हैं?महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ (पृष्ठ 110)

अंतिम पाँच मिनट — यही दोहराइए

साँची और बेगमें: साँची कनखेड़ा भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व है। भोपाल की शाहजहाँ बेगम (1868 से 1901) और सुल्तानजहाँ बेगम ने संरक्षण के लिए धन दिया; फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हुए और मूल पूर्वी तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह रहा (पृष्ठ 82, 83)

वाद-विवाद का युग: महावीर और बुद्ध जैसे शिक्षकों ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए; समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों का उल्लेख है। आजीविकों को अक्सर नियतिवादी और लोकायतों को सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है; इनके अपने ग्रंथ नष्ट हो गए (पृष्ठ 85, 87)

जैन धर्म: महावीर से पहले 23 तीर्थंकर; अहिंसा केंद्र में; पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन, धन संग्रह न करना (पृष्ठ 88)

बुद्ध और त्रिपिटक: विश्व अनित्य और आत्माविहीन, दुख जीवन का अंतर्निहित तत्व, मध्यम मार्ग से मुक्ति; भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक। त्रिपिटक: विनय, सुत्त, अभिधम्म (पृष्ठ 86, 91)

संघ: भिक्खु दान पर निर्भर; पहली भिक्खुनी बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी, अनुमति आनंद के समझाने पर मिली; थेरीगाथा में भिक्खुनियों के रचे छंद (पृष्ठ 92, 93)

स्तूप: अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका और तोरणद्वार; पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश, टीले को दाईं तरफ़ रखकर दक्षिणावर्त परिक्रमा (पृष्ठ 96, 97)

खोज और संरक्षण: अमरावती: 1796 में एक स्थानीय राजा को स्तूप के अवशेष मिले, 1854 में गुंटूर के कमिश्नर कई मूर्तियाँ मद्रास ले गए (एलियट संगमरमर); साँची की खोज 1818, तीन तोरणद्वार खड़े; एच.एच. कोल: असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही (पृष्ठ 98, 99)

मूर्तिकला और नयी परंपराएँ: बुद्ध के प्रतीक (रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र, पेड़); शालभंजिका; कमल दल और हाथियों के बीच की महिला माया हैं या गजलक्ष्मी, इस पर इतिहासकार एकमत नहीं। ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं में बदलाव: मुक्तिदाता, बोधिसत्त, मूर्ति पूजा (महायान); भक्ति और दस अवतार; गर्भगृह और शिखर; सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविकों के लिए (पृष्ठ 100 से 107)