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प्रयोग: दाईं ओर हाथ रखकर पढ़िए, उत्तर बोलिए, फिर हाथ हटाइए। कुल 150 कार्ड। हर उत्तर के साथ किताब का पृष्ठ लिखा है; शक हो तो किताब का वही पृष्ठ खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
निशानों का मतलब: ★वाले कार्ड ज़्यादा ज़रूरी हैं · ★★सबसे ज़रूरी; समय कम हो तो पहले इन्हें दोहराइए · ! वाले कार्डों में अक्सर गलती होती है, इन्हें ध्यान से पढ़िए।
सेट 1 — अध्याय की भूमिका और तीन यात्री (कार्ड 1–7)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★1 | NCERT कक्षा 12 इतिहास के विषय 5 “यात्रियों के नज़रिए” का उपशीर्षक क्या है, और अध्याय किस काल को लेता है? | उपशीर्षक है “समाज के बारे में उनकी समझ”, और काल है “लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक”। (पृष्ठ 115) |
| 2 | अध्याय की शुरुआत में किताब के अनुसार महिलाओं और पुरुषों ने किन कारणों से और किन रूपों में यात्राएँ की हैं? | कार्य की तलाश में, प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए, व्यापारियों, सैनिकों, पुरोहितों और तीर्थयात्रियों के रूप में, या फिर साहस की भावना से प्रेरित होकर। (पृष्ठ 115) |
| ★3 | यात्रियों के छोड़े वृत्तांतों के बारे में किताब किस कमी पर अफ़सोस जताती है? | “दुर्भाग्य से हमारे पास महिलाओं द्वारा छोड़े गए वृत्तांत लगभग न के बराबर हैं, हालाँकि हम यह जानते हैं कि वे भी यात्राएँ करती थीं।” (पृष्ठ 115) |
| 4 | पंद्रहवीं शताब्दी के विजयनगर शहर के महत्त्वपूर्ण विवरणों में से एक किस राजनयिक से मिलता है, और वह कहाँ से आया था? | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी से, जो हेरात से आया एक राजनयिक था। (पृष्ठ 115) |
| ★★5 | अध्याय में किन तीन व्यक्तियों के वृत्तांतों पर ध्यान दिया गया है, और वे किस शताब्दी के हैं? | अल–बिरूनी (ग्यारहवीं शताब्दी), इब्न बतूता (चौदहवीं शताब्दी, मोरक्को से) और फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर (सत्रहवीं शताब्दी)। (पृष्ठ 115) |
| ★6 | ! क्या किताब के अनुसार हर यात्री दूर के क्षेत्रों की ही यात्रा करता था? | नहीं। कई बार यात्री सुदूर क्षेत्रों में नहीं जाते थे। मुग़ल साम्राज्य में प्रशासनिक अधिकारी कभी-कभी साम्राज्य के भीतर ही भ्रमण करते और अपनी टिप्पणियाँ दर्ज करते थे; कुछ अपने ही देश की लोकप्रिय प्रथाओं, जन-वार्ताओं और परंपराओं को समझना चाहते थे। (पृष्ठ 115) |
| ★7 | बाहर से आए लेखक दैनिक गतिविधियों और प्रथाओं पर अधिक ध्यान क्यों देते थे, जबकि देशज लेखक उन्हें दर्ज नहीं करते थे? | पूरी तरह भिन्न सामाजिक तथा सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आने के कारण वे इन बातों के प्रति अधिक सावधान रहते थे। देशज लेखकों के लिए ये विषय सामान्य थे, “वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे”। किताब कहती है: “नज़रिये में यही भिन्नता ही यात्रा–वृत्तांतों को अधिक रोचक बनाती है।” (पृष्ठ 116) |
सेट 2 — अल–बिरूनी: ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी और भारत (कार्ड 8–19)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★8 | अल–बिरूनी का जन्म कहाँ और कब हुआ था? | आधुनिक उज़्बेकिस्तान में स्थित ख़्वारिज़्म में, सन् 973 में। (पृष्ठ 116) |
| ★9 | ख़्वारिज़्म कैसा स्थान था, और अल–बिरूनी की शिक्षा के बारे में किताब क्या कहती है? | ख़्वारिज़्म शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था, और अल–बिरूनी ने उस समय उपलब्ध सबसे अच्छी शिक्षा प्राप्त की थी। (पृष्ठ 116) |
| ★10 | ! क्या अल–बिरूनी यूनानी भाषा जानता था? फिर वह प्लेटो जैसे यूनानी दार्शनिकों से कैसे परिचित हुआ? | वह यूनानी भाषा का जानकार नहीं था, फिर भी प्लेटो तथा अन्य यूनानी दार्शनिकों के कार्यों से पूरी तरह परिचित था, क्योंकि उसने उन्हें अरबी अनुवादों के माध्यम से पढ़ा था। भाषाएँ जो वह जानता था: सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू तथा संस्कृत। (पृष्ठ 116) |
| ★★11 | सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद ने क्या किया, और अल–बिरूनी का क्या हुआ? | सुल्तान महमूद यहाँ के कई विद्वानों तथा कवियों को अपने साथ अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया। अल–बिरूनी भी उनमें से एक था, जो बंधक के रूप में ग़ज़नी आया था। (पृष्ठ 116) |
| 12 | ग़ज़नी में अल–बिरूनी का बाकी जीवन कैसा बीता? | धीरे-धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा, और सत्तर वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक उसने अपना बाकी जीवन यहीं बिताया। पृष्ठ 137 की काल-रेखा उसके वर्ष 973–1048 देती है, जिससे आयु लगभग 75 वर्ष बनती है। (पृष्ठ 116, 137) |
| ★13 | अल–बिरूनी की भारत में रुचि कहाँ विकसित हुई, और किताब इसे असामान्य क्यों नहीं मानती? | ग़ज़नी में। यह असामान्य नहीं था, क्योंकि आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में रचित खगोल–विज्ञान, गणित और चिकित्सा संबंधी कार्यों का अरबी भाषा में अनुवाद होने लगा था। (पृष्ठ 116) |
| 14 | पंजाब के ग़ज़नवी साम्राज्य का हिस्सा बन जाने का क्या असर पड़ा? | स्थानीय लोगों से हुए संपर्कों ने आपसी विश्वास और समझ का वातावरण बनाने में मदद की। (पृष्ठ 116) |
| ★★15 | अल–बिरूनी ने भारत में किनके साथ कई वर्ष बिताए और क्या सीखा? उसकी यात्राओं के बारे में किताब क्या सावधानी रखती है? | उसने ब्राह्मण पुरोहितों तथा विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत, धर्म तथा दर्शन का ज्ञान प्राप्त किया। उसका यात्रा–कार्यक्रम स्पष्ट नहीं है, फिर भी प्रतीत होता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी। (पृष्ठ 116) |
| ★★16 | स्रोत 1 में अल–बिरूनी अपने कार्य का उद्देश्य क्या बताता है? | “उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं।” (पृष्ठ 116) |
| ★17 | अल–बिरूनी ने पतंजलि के ग्रंथ और यूक्लिड के कार्यों के साथ क्या किया? | उसने संस्कृत कृतियों, जिनमें पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ भी शामिल है, का अरबी में अनुवाद किया। अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए उसने यूक्लिड (एक यूनानी गणितज्ञ) के कार्यों का संस्कृत में अनुवाद किया। (पृष्ठ 116) |
| 18 | अल–बिरूनी के लिखने के समय तक अरबी साहित्य में यात्रा–वृत्तांतों की क्या स्थिति थी? | यात्रा–वृत्तांत अरबी साहित्य का एक मान्य हिस्सा बन चुके थे। वे पश्चिम में सहारा रेगिस्तान से लेकर उत्तर में वोल्गा नदी तक फैले क्षेत्रों से संबंधित थे। (पृष्ठ 116) |
| 19 | 1500 ई. से पहले अल–बिरूनी को किन लोगों ने पढ़ा होगा, इस बारे में किताब क्या कहती है? | भारत में उसे कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा; भारत से बाहर कई अन्य लोग संभवतः ऐसा कर चुके हैं। (पृष्ठ 117) |
सेट 3 — किताब–उल–हिन्द और “हिंदू” शब्द (कार्ड 20–27)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★20 | अल–बिरूनी की कृति का नाम क्या है, वह किस भाषा में लिखी गई और कितने अध्यायों में बँटी है? | कृति है किताब–उल–हिन्द। यह अरबी में लिखी गई, इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है, और यह एक विस्तृत ग्रंथ है जो अस्सी अध्यायों में विभाजित है। (पृष्ठ 117) |
| ★21 | किताब–उल–हिन्द के अस्सी अध्याय किन विषयों पर हैं? | धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज तथा प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल तथा मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि। (पृष्ठ 117) |
| ★★22 | अल–बिरूनी सामान्यतः (हमेशा नहीं) किताब–उल–हिन्द के प्रत्येक अध्याय को किस शैली में रचता था? | आरंभ में एक प्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, और अंत में अन्य संस्कृतियों के साथ एक तुलना। (पृष्ठ 117) |
| ★23 | किताब के अनुसार आज के कुछ विद्वान किताब–उल–हिन्द की “लगभग ज्यामितीय संरचना” का मुख्य कारण क्या मानते हैं? | अल–बिरूनी का गणित की ओर झुकाव। किताब इसे आज के कुछ विद्वानों का तर्क बताती है; संरचना अपनी स्पष्टता तथा पूर्वानुमेयता के लिए उल्लेखनीय है। (पृष्ठ 117) |
| 24 | अल–बिरूनी ने अपनी कृतियाँ संभवतः किनके लिए लिखीं, और संस्कृत, पाली, प्राकृत ग्रंथों के बारे में उसका दृष्टिकोण कैसा था? | संभवतः उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए। वह इन ग्रंथों के अरबी अनुवादों तथा रूपांतरणों से परिचित था, पर उनकी शैली और सामग्री के बारे में उसका दृष्टिकोण आलोचनात्मक था, और वह निश्चित रूप से उन्हें बेहतर बनाना चाहता था। (पृष्ठ 117) |
| ★★25 | “हिंदू” शब्द किस शब्द से निकला, और उसका मूल प्रयोग किस क्षेत्र के लिए होता था? | लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व में प्रयोग होने वाले एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से, जिसका प्रयोग सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए होता था। (पृष्ठ 117) |
| ★26 | अरबी लोगों और बाद में तुर्कों ने सिंधु से पूर्व के क्षेत्र, उसके निवासियों और उनकी भाषा के लिए कौन-से नाम चलाए? | अरबी लोगों ने क्षेत्र को “अल–हिंद” और निवासियों को “हिंदी” कहा। कालांतर में तुर्कों ने निवासियों को “हिंदू”, उनके निवास क्षेत्र को “हिंदुस्तान” तथा उनकी भाषा को “हिंदवी” नाम दिया। (पृष्ठ 117) |
| ★★27 | ! क्या “हिंदू”, “हिंदुस्तान” और “हिंदवी” जैसे शब्द शुरू में लोगों की धार्मिक पहचान बताते थे? | नहीं। किताब कहती है: “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।” इस शब्द का धार्मिक संदर्भ में प्रयोग बहुत बाद की बात है। (पृष्ठ 117) |
सेट 4 — इब्न बतूता का रिह्ला: जीवन और यात्राएँ (कार्ड 28–51)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★28 | इब्न बतूता के यात्रा–वृत्तांत का नाम क्या है, वह किस भाषा में लिखा गया और किस शताब्दी के भारत के बारे में जानकारी देता है? | वृत्तांत का नाम रिह्ला है। वह अरबी में लिखा गया और चौदहवीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप के सामाजिक तथा सांस्कृतिक जीवन के बारे में बहुत प्रचुर तथा रोचक जानकारियाँ देता है। (पृष्ठ 118) |
| ★29 | इब्न बतूता किस देश और किस परिवार का था? | मोरक्को का। उसका जन्म तैंजियर के सबसे सम्मानित तथा शिक्षित परिवारों में से एक में हुआ, जो इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था। परिवार की परंपरा के अनुसार उसने कम उम्र में साहित्यिक तथा शास्त्ररूढ़ शिक्षा हासिल की। (पृष्ठ 118) |
| ★30 | अपनी श्रेणी के अन्य सदस्यों के विपरीत इब्न बतूता ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत किसे मानता था? | पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को। (पृष्ठ 118) |
| 31 | 1332–33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले इब्न बतूता कहाँ-कहाँ की यात्राएँ कर चुका था? | मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ। (पृष्ठ 118) |
| ★★32 | इब्न बतूता सिंध कब और किस मार्ग से पहुँचा? | सन् 1333 में, मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से। (पृष्ठ 118) |
| 33 | इब्न बतूता दिल्ली क्यों गया, और रास्ते में किन नगरों से होकर गुज़रा? | उसने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के बारे में सुना था और कला और साहित्य के एक दयाशील संरक्षक के रूप में उसकी ख्याति से आकर्षित हुआ। वह मुल्तान और उच्छ के रास्ते दिल्ली गया। (पृष्ठ 118) |
| ★★34 | सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने इब्न बतूता को दिल्ली में कौन-सा पद दिया? | उसकी विद्वता से प्रभावित होकर सुल्तान ने उसे दिल्ली का क़ाज़ी या न्यायाधीश नियुक्त किया। (पृष्ठ 118) |
| ★35 | इब्न बतूता दिल्ली में कई वर्ष क़ाज़ी रहा; उसके बाद उसके साथ क्या हुआ? | उसने सुल्तान का विश्वास खो दिया और उसे कारागार में कैद कर दिया गया। बाद में गलतफहमी दूर होने पर उसे राजकीय सेवा में पुनर्स्थापित किया गया। (पृष्ठ 118) |
| ★★36 | सन् 1342 ई. में इब्न बतूता को कौन-सा नया कार्य सौंपा गया? | मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया। (पृष्ठ 118) |
| 37 | चीन के रास्ते में इब्न बतूता मालद्वीप में क्या रहा, और उसके बाद उसने क्या तय किया? | मालाबार से वह मालद्वीप गया, जहाँ वह अठारह महीनों तक क़ाज़ी के पद पर रहा; अंततः उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया। (पृष्ठ 118) |
| 38 | इब्न बतूता चीन के किस बंदरगाह नगर में पहुँचा, जिसे आज किस नाम से जाना जाता है? | जायतुन में, जो आज क्वानझू के नाम से जाना जाता है। वह जहाज़ से सुमात्रा गया और वहाँ से एक अन्य जहाज़ से इस चीनी बंदरगाह नगर गया। (पृष्ठ 118, 119) |
| ★39 | चीन में इब्न बतूता कहाँ तक गया, और उसने घर लौटने का निश्चय कब किया? | उसने चीन में व्यापक रूप से यात्रा की और बीजिंग तक गया, लेकिन वहाँ लंबे समय तक नहीं ठहरा। 1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय किया। (पृष्ठ 119) |
| ★★40 | चीन के बारे में इब्न बतूता के वृत्तांत की तुलना किस यात्री के वृत्तांत से की जाती है? | मार्को पोलो से, जिसने तेरहवीं शताब्दी के अंत में वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) की यात्रा की थी। (पृष्ठ 119) |
| ★★41 | स्रोत 2 “घोंसले से निकलता पक्षी” में इब्न बतूता अपने घर छोड़ने की तुलना किससे करता है, और उस समय उसकी उम्र क्या थी? | उसने अपने घर को ऐसे छोड़ा “जैसे पक्षी अपने घोंसलों को छोड़ देते हैं”, और लिखा: “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।” वह तैंजियर से गुरुवार को “अकेला ही निकल पड़ा”। (पृष्ठ 118) |
| 42 | इब्न बतूता घर कब वापस पहुँचा? | 1354 में, अपनी यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद। (पृष्ठ 118) |
| ★43 | इब्न बतूता के अनुसार मुल्तान से दिल्ली और सिंध से दिल्ली की यात्रा में कितने दिन लगे? किताब चौदहवीं शताब्दी की यात्रा के बारे में क्या याद दिलाती है? | मुल्तान से दिल्ली में चालीस और सिंध से दिल्ली में लगभग पचास दिन। किताब याद दिलाती है कि चौदहवीं शताब्दी में यात्रा करना आज की तुलना में अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था। (पृष्ठ 119) |
| 44 | इब्न बतूता के अनुसार दौलताबाद से दिल्ली और ग्वालियर से दिल्ली की दूरी कितने दिन में तय की जा सकती थी? | दौलताबाद से दिल्ली की दूरी चालीस, जबकि ग्वालियर से दिल्ली की दूरी दस दिन में तय की जा सकती थी। (पृष्ठ 119) |
| ★45 | “एकाकी यात्री” बॉक्स के अनुसार लंबी यात्राओं में लुटेरों के अलावा यात्री को और कौन-से कष्ट हो सकते थे? | किताब कहती है: “लंबी यात्राओं में लुटेरे ही एकमात्र खतरा नहीं थे: यात्री गृहातुर हो सकता था और बीमार हो सकता था।” रिह्ला के उद्धरण में इब्न बतूता ज्वर से जकड़ा गया था, और ट्यूनिस में कोई परिचित न मिलने पर अपने एकाकीपन से उदास होकर बहुत रोया। (पृष्ठ 119) |
| ! 46 | क्या इब्न बतूता कारवाँ में चलकर राजमार्गों के लुटेरों से बच जाता था? | नहीं। वह अपने साथियों के साथ कारवाँ में चलना पसंद करता था, पर इससे भी राजमार्गों के लुटेरों को रोका नहीं जा सका। मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में उसके कारवाँ पर आक्रमण हुआ, कई साथी यात्रियों की जान गई, और जो जीवित बचे, जिनमें इब्न बतूता भी था, बुरी तरह घायल हुए। (पृष्ठ 120) |
| ★47 | इब्न बतूता के मोरक्को लौटने पर उसकी कहानियाँ दर्ज करने का निर्देश किसने दिया? उसने कौन-से क्षेत्रों की यात्रा की थी? | स्थानीय शासक ने। इब्न बतूता ने उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग (हो सकता है वह रूस भी गया हो), भारतीय उपमहाद्वीप तथा चीन की यात्रा की थी। (पृष्ठ 120) |
| ★★48 | इब्न बतूता के श्रुतलेखों को किसने लिखा, और स्रोत 3 के अनुसार उससे क्या लिखवाने का निर्देश दिया गया था? | इब्न जुज़ाई ने, जिसे इसके लिए नियुक्त किया गया था। निर्देश था कि इब्न बतूता अपनी यात्रा में देखे शहरों का और रोचक घटनाओं का वृत्तांत लिखवाएँ, और जिन शासकों से वे मिले, उनके महान साहित्यकारों तथा धर्मनिष्ठ संतों के विषय में बताएँ। (पृष्ठ 121) |
| ★49 | “इब्न बतूता के पदचिह्नों पर” बॉक्स के अनुसार 1400 से 1800 के बीच भारत आने वाले यात्रियों ने किस भाषा में कई यात्रा–वृत्तांत लिखे? | फ़ारसी में। उसी समय भारत से मध्य एशिया, ईरान तथा ऑटोमन साम्राज्य की यात्रा करने वालों ने भी कभी–कभी अपने अनुभव लिखे। (पृष्ठ 121) |
| ★★50 | “इब्न बतूता के पदचिह्नों पर” बॉक्स में फ़ारसी में लिखने वाले किन तीन लेखकों को सबसे प्रसिद्ध बताया गया है, और हर एक कब, कहाँ आया? | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी: 1440 के दशक में दक्षिण भारत। महमूद वली बल्खी: 1620 के दशक में व्यापक यात्राएँ। शेख़ अली हाज़िन: 1740 के दशक में उत्तर भारत। (पृष्ठ 121) |
| ! 51 | क्या 1400 से 1800 के बीच भारत आए, फ़ारसी में लिखने वाले यात्री भारत से एक जैसे प्रभावित हुए? | नहीं। कुछ भारत से सम्मोहित थे, और महमूद बल्ख़ी तो कुछ समय के लिए सन्यासी भी बन गया था। कुछ अन्य, जैसे हाज़िन, भारत से निराश हुए और घृणा भी करने लगे। उनमें से अधिकांश ने भारत को अचंभों के देश के रूप में देखा। (पृष्ठ 121) |
सेट 5 — बर्नियर और दूसरे यूरोपीय यात्री (कार्ड 52–66)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★52 | लगभग 1500 ई. में भारत में पुर्तगालियों के आगमन के बाद उनमें से कई लोगों ने क्या लिखा, और जेसुइट रॉबर्टो नोबिली ने क्या किया? | कई पुर्तगालियों ने भारतीय सामाजिक रीति–रिवाजों तथा धार्मिक प्रथाओं के विषय में विस्तृत वृत्तांत लिखे। जेसुइट रॉबर्टो नोबिली ने तो भारतीय ग्रंथों को यूरोपीय भाषाओं में अनुवादित भी किया। (पृष्ठ 122) |
| 53 | दुआर्ते बरबोसा ने क्या लिखा? | सबसे प्रसिद्ध यूरोपीय लेखकों में एक बरबोसा ने दक्षिण भारत में व्यापार और समाज का एक विस्तृत विवरण लिखा। (पृष्ठ 122) |
| ★54 | 1600 ई. के बाद भारत में आने वाले यात्रियों में क्या बदलाव आया, और फ्रांसीसी जौहरी तैवर्नियर के बारे में किताब क्या बताती है? | 1600 ई. के बाद डच, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी। तैवर्नियर ने कम से कम छह बार भारत की यात्रा की, वह भारत की व्यापारिक स्थितियों से बहुत प्रभावित था और उसने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की। (पृष्ठ 122) |
| 55 | इतालवी चिकित्सक मनूकी का भारत से क्या रिश्ता रहा? | किताब के अनुसार वह उन यात्रियों में था जो कभी यूरोप वापस नहीं गए और भारत में ही बस गए। (पृष्ठ 122) |
| ★★56 | फ्रांस्वा बर्नियर कौन था, और वह मुग़ल साम्राज्य में क्यों आया था? | फ्रांस का रहने वाला बर्नियर एक चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा इतिहासकार था। कई और लोगों की तरह वह मुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था। (पृष्ठ 122) |
| ★★57 | बर्नियर भारत में कब से कब तक रहा? | 1656 से 1668 तक, यानी बारह वर्ष। (पृष्ठ 122) |
| ★58 | बर्नियर मुग़ल दरबार से किन रूपों में जुड़ा रहा? | पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में, और बाद में मुग़ल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी तथा वैज्ञानिक के रूप में। (पृष्ठ 122) |
| ★59 | बर्नियर ने अपनी प्रमुख कृति किसे समर्पित की, और भारत में जो देखता था उसकी तुलना वह किससे करता था? | अपनी प्रमुख कृति उसने फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित की। उसके कई अन्य कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में लिखे गए थे। वह सामान्यतः भारत में जो देखता था उसकी तुलना यूरोपीय स्थिति से करता था। (पृष्ठ 122) |
| ★★60 | ! बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप की तुलना में कैसा बताया, और किताब उसके आकलन के बारे में क्या कहती है? | लगभग प्रत्येक दृष्टांत में उसने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया। किताब कहती है कि उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था, फिर भी उसके कार्य छपने पर उसके वृत्तांत अत्यधिक प्रसिद्ध हुए। (पृष्ठ 122) |
| ★61 | मुग़ल सेना के साथ कश्मीर कूच के स्रोत 4 में बर्नियर से किस बात की अपेक्षा की जाती थी, और वह साथ में किन लोगों को रखता था? | देश की प्रथा के अनुसार उससे “दो अच्छे तुर्कमान घोड़े देखने” की अपेक्षा की जाती थी, यानी उसे ऐसे दो घोड़े रखने होते थे। साथ में वह एक शक्तिशाली फ़ारसी ऊँट तथा चालक, घोड़ों के लिए एक साईस, एक खानसामा और पानी का पात्र लेकर घोड़े के आगे चलने वाला एक सेवक भी रखता था। (पृष्ठ 123) |
| 62 | स्रोत 4 में बर्नियर पाँच या छह दिनों के उपभोग के लिए क्या साथ रखता है, और इस देश में किन दो चीज़ों से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती? | पाँच या छह दिनों के लिए बढ़िया चावल (साथ में सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू तथा चीनी का भंडार)। उसके अनुसार “नींबू के शरबत और दही से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती”। (पृष्ठ 123) |
| ★★63 | बर्नियर के कार्य फ्रांस में कब प्रकाशित हुए, और पाँच वर्षों के भीतर किन भाषाओं में उनका अनुवाद हुआ? | 1670–71 में फ्रांस में प्रकाशित हुए। अगले पाँच वर्षों के भीतर अंग्रेज़ी, डच, जर्मन तथा इतालवी भाषाओं में उनका अनुवाद हो गया। (पृष्ठ 123) |
| ★64 | 1670 और 1725 के बीच तथा 1684 तक बर्नियर का वृत्तांत कितनी बार पुनर्मुद्रित हुआ? | 1670 और 1725 के बीच फ्रांसीसी में आठ बार, और 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार। (पृष्ठ 123) |
| ! 65 | बर्नियर का वृत्तांत छपकर फैला; अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों का प्रसार कैसे होता था? | अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों का प्रसार हस्तलिपियों के रूप में होता था, और वे 1800 से पहले सामान्यतः प्रकाशित नहीं होते थे। यह बर्नियर के छपे वृत्तांत से पूरी तरह विपरीत था। (पृष्ठ 123) |
| ★★66 | यूरोपीय यात्रियों के वृत्तांतों ने भारत के बारे में क्या किया, और 1750 के बाद यूरोप जाने वाले भारतीयों के सामने कौन-सी चुनौती थी? | पुस्तकों के प्रकाशन और प्रसार से इन वृत्तांतों ने यूरोपीय लोगों के लिए भारत की एक छवि बनाने में सहायता की। 1750 के बाद शेख इतिसमुद्दीन तथा मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीयों ने यूरोप की यात्रा की, तो उन्हें यूरोपीय लोगों की भारतीय समाज की छवि का सामना करना पड़ा, और उन्होंने तथ्यों की अपनी अलग व्याख्या से उसे प्रभावित करने का प्रयास किया। (पृष्ठ 123) |
सेट 6 — अल–बिरूनी और जाति व्यवस्था (कार्ड 67–78)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★67 | अल–बिरूनी ने भारत को समझने में कौन-से तीन “अवरोध” बताए? | पहला भाषा: संस्कृत अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों का अनुवाद आसान नहीं था। दूसरा धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता। तीसरा अभिमान। (पृष्ठ 124) |
| ★★68 | ! इन अवरोधों की जानकारी होने पर भी अल–बिरूनी किन पर लगभग पूरी तरह आश्रित रहा? | ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर। उसने भारतीय समाज को समझने के लिए अकसर वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों तथा मनुस्मृति आदि से अंश उद्धृत किए। (पृष्ठ 124) |
| ★69 | “विशाल पहुँच वाली एक भाषा” बॉक्स में अल–बिरूनी संस्कृत की क्या विशेषता बताता है? | अरबी की तरह ही शब्दों तथा विभक्तियों, दोनों में इस भाषा की पहुँच बहुत विस्तृत है। एक ही वस्तु के लिए कई शब्द, मूल तथा व्युत्पन्न दोनों, होते हैं और एक ही शब्द का प्रयोग कई वस्तुओं के लिए होता है, इसलिए सीखना आसान नहीं होगा। (पृष्ठ 124) |
| ★★70 | अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था को समझने और समझाने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया, और उसने प्राचीन फ़ारस में कितने सामाजिक वर्ग बताए? | उसने अन्य समुदायों में प्रतिरूपों की खोज की। उसके अनुसार प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी, पहला घुड़सवार और शासक वर्ग और अंतिम कृषक तथा शिल्पकार। इससे वह दिखाना चाहता था कि ये सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे। (पृष्ठ 124) |
| 71 | अल–बिरूनी ने इस्लाम में लोगों की समानता के बारे में क्या दर्शाया? | कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था और उनमें भिन्नताएँ केवल धार्मिकता के पालन में थीं। (पृष्ठ 124) |
| ★★72 | ! जाति व्यवस्था की ब्राह्मणवादी व्याख्या को मानने के बावजूद अल–बिरूनी ने किस मान्यता को अस्वीकार किया? | अपवित्रता की मान्यता को। उसके अनुसार जाति व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी। (पृष्ठ 124, 125) |
| ★73 | अपवित्रता को अस्वीकार करते हुए अल–बिरूनी ने प्रकृति से कौन-से उदाहरण दिए? | हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है, अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। वह ज़ोर देकर कहता है कि ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता। (पृष्ठ 124, 125) |
| ★★74 | स्रोत 5 “वर्ण व्यवस्था” में अल–बिरूनी के अनुसार हिंदुओं के ग्रंथों में चारों वर्ग ब्रह्मन् के किन अंगों से उत्पन्न बताए गए हैं? | ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से, क्षत्रिय कंधों और हाथों से, वैश्य जंघाओं से और शूद्र चरणों से। (पृष्ठ 125) |
| ★75 | स्रोत 5 के अंत में अल–बिरूनी वैश्य और शूद्र के बीच अंतर और उनके रहने के बारे में क्या कहता है? | अंतिम दो वर्गों के बीच अधिक अंतर नहीं है। भिन्नता होने पर भी वे एक साथ एक ही शहरों और गाँवों में, समान घरों और आवासों में मिल–जुल कर रहते हैं। (पृष्ठ 125) |
| ★★76 | जाति व्यवस्था के बारे में अल–बिरूनी का विवरण किस चीज़ से गहनता से प्रभावित था? | नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से। इन ग्रंथों में ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से जाति व्यवस्था को संचालित करने वाले नियमों का प्रतिपादन किया गया था। (पृष्ठ 125) |
| ★★77 | ! क्या वास्तविक जीवन में जाति व्यवस्था उतनी ही कड़ी थी जितनी संस्कृत ग्रंथों में? अंत्यज श्रेणियों का उदाहरण दीजिए। | नहीं, वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी। अंत्यज (शाब्दिक रूप में व्यवस्था से परे) श्रेणियों से सामान्यतया अपेक्षा थी कि वे किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध करें। वे अक्सर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे, फिर भी उन्हें आर्थिक तंत्र में शामिल किया जाता था। (पृष्ठ 125) |
| ★78 | एक लकड़ी की मूर्ति की कहानी पर अल–बिरूनी ने क्या कहा? वह कहानी क्या बताती थी? | कहानी के अनुसार वह मूर्ति तथाकथित रूप से 216,432 वर्षों तक अस्तित्व में रही। अल–बिरूनी ने पूछा: “फिर लकड़ी इतने लंबे समय तक अस्तित्व में कैसे रही होगी, विशेष रूप से ऐसे स्थान पर जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र होती है? ईश्वर ही जानता है!” किताब के अनुसार यात्री हमेशा उन्हें बताई गई बातों पर विश्वास नहीं करते थे। (पृष्ठ 124) |
सेट 7 — इब्न बतूता: अनजाने की उत्कंठा, शहर और डाक (कार्ड 79–105)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★79 | चौदहवीं शताब्दी में इब्न बतूता के दिल्ली आने तक उपमहाद्वीप किस तंत्र का हिस्सा बन चुका था? | एक वैश्विक संचार तंत्र का, जो पूर्व में चीन से लेकर पश्चिम में उत्तर–पश्चिमी अफ़्रीका तथा यूरोप तक फैला हुआ था। (पृष्ठ 126) |
| 80 | इब्न बतूता ने शहरी केन्द्रों की किस संस्कृति का उपभोग किया, और वहाँ कौन-सी भाषाएँ बोलने वाले लोग मिलते थे? | शहरी केन्द्रों की विश्ववादी संस्कृति का। वहाँ अरबी, फ़ारसी, तुर्की तथा अन्य भाषाएँ बोलने वाले लोग विचारों, सूचनाओं तथा उपाख्यानों का आदान–प्रदान करते थे। (पृष्ठ 126) |
| ★81 | इब्न बतूता की चित्रण की विधियों के बेहतरीन उदाहरण किन दो वनस्पति–उपजों के वर्णन में मिलते हैं, और क्यों? | नारियल और पान के वर्णन में, क्योंकि उसके पाठक इन दोनों वानस्पतिक उपजों से पूरी तरह अपरिचित थे। (पृष्ठ 126) |
| ★★82 | स्रोत 6 में इब्न बतूता नारियल के वृक्ष की तुलना किस वृक्ष से करता है, और दोनों में अंतर क्या बताता है? | खजूर के वृक्ष से: दोनों एक जैसे दिखते हैं, केवल एक अपवाद के साथ। एक से काष्ठफल प्राप्त होता है और दूसरे से खजूर। (पृष्ठ 126) |
| ★★83 | स्रोत 6 में नारियल के फल की तुलना किससे की गई है? | मानव सिर से: उसमें मानो दो आँखें तथा एक मुख हैं, अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है और उससे जुड़ा रेशा बालों जैसा दिखाई देता है। (पृष्ठ 126) |
| 84 | स्रोत 6 के अनुसार नारियल के रेशे का क्या उपयोग होता है? | उससे रस्सी बनाई जाती है, और लोहे की कीलों के प्रयोग के बजाय उससे जहाज़ को सिलते हैं। वे उससे बर्तनों के लिए रस्सी भी बनाते हैं। (पृष्ठ 126) |
| ★85 | स्रोत 7 में इब्न बतूता के अनुसार पान कैसा वृक्ष है और उसे किसलिए उगाया जाता है, और खाने की विधि क्या है? | उसे अंगूर–लता की तरह उगाया जाता है। पान का कोई फल नहीं होता, केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है। खाने से पहले सुपारी (जायफल जैसी) के छोटे टुकड़े मुँह में रखकर चबाए जाते हैं, फिर पान की पत्तियों के साथ चबाए जाते हैं। (पृष्ठ 126) |
| ★86 | इब्न बतूता ने उपमहाद्वीप के शहरों को कैसा पाया? | उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर जिनके पास आवश्यक इच्छा, साधन तथा कौशल था। शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे, सिवाय कभी–कभी युद्धों तथा अभियानों से होने वाले विध्वंस के। (पृष्ठ 127) |
| ★★87 | इब्न बतूता ने भारत का सबसे बड़ा शहर किसे बताया, और आकार में उसे कौन-सा शहर चुनौती देता था? | दिल्ली को, जो विशाल आबादी वाला और भारत में सबसे बड़ा शहर था। दौलताबाद (महाराष्ट्र में) भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। (पृष्ठ 127) |
| ★88 | स्रोत 8 में इब्न बतूता के अनुसार दिल्ली की दीवार की चौड़ाई कितनी थी? | ग्यारह हाथ; किताब कोष्ठक में बताती है कि एक हाथ लगभग 20 इंच के बराबर होता है। (पृष्ठ 127) |
| ★89 | स्रोत 8 के अनुसार दिल्ली की प्राचीर के भीतर और उसकी बनावट में क्या था? | भीतर रात्रि के पहरेदार तथा द्वारपालों के कक्ष; खाद्यसामग्री, हथियार, बारूद, प्रक्षेपास्त्र तथा घेरेबंदी की मशीनों के लिए भंडारगृह; भीतरी भाग में घुड़सवार और पैदल सैनिक आते–जाते थे। प्राचीर का निचला भाग पत्थर से और ऊपरी भाग ईंटों से बना था। (पृष्ठ 127) |
| ★★90 | स्रोत 8 के अनुसार दिल्ली के कितने द्वार थे, सबसे विशाल कौन-सा था, और मांडवी तथा गुल दरवाज़ों के पास क्या था? | अट्ठाईस द्वार थे, जिन्हें दरवाज़ा कहा जाता था। बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल था। मांडवी दरवाज़े के भीतर एक अनाज मंडी थी और गुल दरवाज़े की बगल में एक फलों का बगीचा। (पृष्ठ 127) |
| ★★91 | किताब के अनुसार बाज़ार केवल आर्थिक विनिमय के स्थान क्यों नहीं थे? | वे सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। अधिकांश बाज़ारों में एक मस्जिद तथा एक मंदिर होता था, और कम से कम कुछ में नर्तकों, संगीतकारों तथा गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी चिह्नित थे। (पृष्ठ 128) |
| ★★92 | इब्न बतूता को शहरों की समृद्धि के वर्णन में अधिक रुचि नहीं थी; फिर भी इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से क्या तर्क दिया है? | कि शहर अपनी संपत्ति का एक बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष के अधिग्रहण से प्राप्त करते थे। (पृष्ठ 128) |
| ★93 | इब्न बतूता ने भारतीय कृषि के इतने उत्पादनकारी होने का क्या कारण पाया? | मिट्टी का उपजाऊपन, जो किसानों के लिए वर्ष में दो फसलें उगाना संभव करता था। (पृष्ठ 128) |
| ★94 | इब्न बतूता ने भारतीय माल और व्यापार के बारे में क्या ध्यान दिया? | उपमहाद्वीप व्यापार तथा वाणिज्य के अंतर एशियाई तंत्रों से भली–भाँति जुड़ा था। भारतीय माल की मध्य तथा दक्षिण–पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी, जिससे शिल्पकारों तथा व्यापारियों को भारी मुनाफ़ा होता था। (पृष्ठ 128) |
| 95 | किन भारतीय कपड़ों की अत्यधिक माँग थी, और महीन मलमल की कई किस्में किनके लिए ही सुलभ थीं? | सूती कपड़ा, महीन मलमल, रेशम, ज़री तथा साटन की अत्यधिक माँग थी। महीन मलमल की कई किस्में इतनी महँगी थीं कि उन्हें अमीर वर्ग के तथा बहुत धनाढ्य लोग ही पहन सकते थे। (पृष्ठ 128) |
| ★★96 | स्रोत 9 में दौलताबाद के किस बाज़ार का वर्णन है, और वह किनके लिए था? | ताराबबाद नामक बाज़ार का, जो पुरुष और महिला गायकों के लिए था। इब्न बतूता के अनुसार यह सबसे विशाल और सुंदर बाज़ारों में से एक था। (पृष्ठ 128) |
| ★97 | स्रोत 9 के अनुसार ताराबबाद के विशाल गुंबद में हर गुरुवार क्या होता था, और कौन-से शासक वहाँ आते थे? | प्रत्येक गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख अपने सेवकों और दासों के साथ स्थान ग्रहण करते, और गायिकाएँ एक के बाद एक झुंडों में आकर सूर्यास्त का गीत गातीं और नाचतीं। इब्न बतूता के अनुसार हिंदू शासकों में से एक, और कई मुस्लिम शासक भी, बाज़ार से गुज़रते समय गुंबद में उतरकर यह गान सुनते थे। (पृष्ठ 128) |
| 98 | इब्न बतूता के समय (चौदहवीं शताब्दी) के भारत में राज्य व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए क्या करता था? | विशेष उपाय करता था: लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय तथा विश्राम गृह स्थापित किए गए थे। (पृष्ठ 129) |
| ★★99 | डाक प्रणाली की किस बात ने इब्न बतूता को चकित किया, और इससे व्यापारियों को क्या सुविधा हुई? | डाक प्रणाली की कार्यकुशलता ने। व्यापारियों के लिए लंबी दूरी तक सूचना भेजना और उधार प्रेषित करना संभव हुआ, और अल्प सूचना पर माल भेजना भी। (पृष्ठ 129) |
| ★★100 | डाक प्रणाली की कुशलता दिखाने के लिए किताब सिंध से दिल्ली की यात्रा और गुप्तचरों की खबरों की तुलना कैसे करती है? | सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, जबकि गुप्तचरों की खबरें सुलतान तक डाक व्यवस्था से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं। (पृष्ठ 129) |
| ★★101 | स्रोत 10 के अनुसार भारत में किस-किस प्रकार की डाक व्यवस्था थी? | अश्व डाक व्यवस्था, जिसे उलुक कहा जाता था, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों से चलती थी। पैदल डाक व्यवस्था में प्रति मील तीन अवस्थान होते थे; इसे दावा कहा जाता था, और यह एक मील का एक–तिहाई होता था। (पृष्ठ 129) |
| ★102 | पैदल डाक में संदेशवाहक पत्र को आगे कैसे पहुँचाते थे? | संदेशवाहक एक हाथ में पत्र और दूसरे में ताँबे की घंटियों वाली दो हाथ लंबी छड़ लेकर तेज़ भागता था। घंटियों की आवाज़ सुनकर मंडप में बैठे लोग तैयार हो जाते, उनमें से एक पत्र लेकर छड़ हिलाते हुए अगले दावा तक पूरी ताकत से दौड़ता, और यह प्रक्रिया पत्र के गंतव्य तक चलती रहती। (पृष्ठ 129) |
| ! 103 | इब्न बतूता के अनुसार घोड़े वाली डाक और पैदल डाक में कौन-सी अधिक तेज़ थी, और पैदल डाक का एक अकसर होने वाला उपयोग क्या था? | पैदल डाक अश्व डाक से अधिक तीव्र होती थी। उसका अकसर प्रयोग खुरासान के फलों के परिवहन के लिए होता था, जिन्हें भारत में बहुत पसंद किया जाता था। (पृष्ठ 129) |
| ★104 | 1440 के दशक में अब्दुर रज़्ज़ाक ने कालीकट बंदरगाह पर लोगों को देखकर क्या माना, और इस देश को क्या कहा? | कालीकट (आधुनिक कोज़ीकोड, केरल) के बंदरगाह पर उसने जो देखा उसे प्रशंसनीय नहीं माना, और इन लोगों को एक “विचित्र देश” बताया। (पृष्ठ 129) |
| ★105 | अब्दुर रज़्ज़ाक ने मंगलौर के पास कैसा पूजा–स्थल देखा, जिसने उसे प्रशंसा से भर दिया? | मंगलौर से नौ मील के भीतर ऐसा पूजा–स्थल, जो उसके अनुसार पूरे विश्व में अतुलनीय था: वर्गाकार, प्रत्येक भुजा लगभग दस गज, ऊँचाई पाँच गज, चार द्वार–मंडपों के साथ पूरी तरह ढले हुए काँसे से ढँका। प्रवेशद्वार के द्वार–मंडप में सोने की आदमकद मूर्ति थी, जिसकी आँखों में माणिक लगे थे। (पृष्ठ 129) |
सेट 8 — बर्नियर: भूमि स्वामित्व और “अपविकसित” पूर्व (कार्ड 106–132)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★106 | इब्न बतूता और बर्नियर के लिखने के ढंग में किताब क्या फ़र्क बताती है? | इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया। बर्नियर भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा का था: वह भारत की स्थितियों की यूरोप (विशेषकर फ्रांस) से तुलना और भिन्नता उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था, और नीति–निर्माताओं तथा बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना चाहता था। (पृष्ठ 130) |
| ★★107 | बर्नियर के ग्रंथ ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर में भारत का चित्रण किस ढाँचे पर टिका है? | द्वि-विपरीतता के नमूने पर: भारत को यूरोप के प्रतिलोम (उलटे) के रूप में दिखाया गया है। बर्नियर ने भिन्नताओं को पदानुक्रम में क्रमबद्ध किया, जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का प्रतीत हो। (पृष्ठ 130) |
| ★★108 | बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक क्या थी, और मुग़ल साम्राज्य में भूमि के स्वामी के बारे में उसे क्या लगा? | भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव। उसे लगा कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था, जो उसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था, और इसके अर्थव्यवस्था तथा समाज के लिए अनर्थकारी परिणाम होते थे। (पृष्ठ 130) |
| ★109 | क्या सोलहवीं–सत्रहवीं शताब्दी में भूमि पर राजकीय स्वामित्व की धारणा केवल बर्नियर की थी? | नहीं। यह अवबोधन बर्नियर तक ही सीमित नहीं था; किताब के अनुसार वह सोलहवीं तथा सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों के वृत्तांतों में मिलता है। (पृष्ठ 130) |
| ★★110 | राजकीय भूस्वामित्व के कारण बर्नियर के तर्क में भूधारक क्या नहीं कर सकते थे, और इसका क्या असर पड़ा? | भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे। इसलिए वे उत्पादन का स्तर बनाए रखने और बढ़ाने के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे। (पृष्ठ 130) |
| ★111 | बर्नियर के तर्क के अनुसार निजी भूस्वामित्व के अभाव का अंतिम परिणाम क्या हुआ? | पश्चिमी यूरोप की तरह बेहतर भूधारकों का वर्ग नहीं उभर सका, जो भूमि के रखरखाव व बेहतरी के प्रति सजग रहता। इसी से कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न और शासक वर्ग को छोड़कर समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में अनवरत पतन हुआ। (पृष्ठ 130, 131) |
| ★112 | डच यात्री पेलसर्ट ने सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में उपमहाद्वीप की यात्रा में क्या देखा? | बर्नियर की ही तरह वह भी लोगों में व्यापक गरीबी देखकर अचंभित था और उसने राज्य को उत्तरदायी ठहराया। उसके शब्द: “कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।” (पृष्ठ 130) |
| ★113 | स्रोत 11 “ग़रीब किसान” में बर्नियर ने हिंदुस्तान के ग्रामीण अंचलों और किसानों का क्या हाल बताया है? | कई ग्रामीण अंचल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत हैं, और कृषियोग्य भूमि का एक बड़ा हिस्सा भी श्रमिकों के अभाव में कृषि विहीन रह जाता है। जो गरीब लोग लोभी स्वामियों की माँगें पूरी नहीं कर पाते, उन्हें अपने बच्चों से भी हाथ धोना पड़ता है, जिन्हें दास बना कर ले जाया जाता है। इस निरंकुशता से हताश किसान गाँव छोड़कर चले जाते हैं। (पृष्ठ 131) |
| ★★114 | स्रोत 11 के उद्धरण में बर्नियर किस बहस में भाग ले रहा था, और उसका प्रयास क्या था? | वह राज्य और समाज से संबंधित यूरोप में प्रचलित तत्कालीन विवादों में भाग ले रहा था। उसका प्रयास था कि मुग़लकालीन भारत का उसका विवरण यूरोप में उन लोगों के लिए चेतावनी का कार्य करे जो निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को स्वीकार नहीं करते थे। (पृष्ठ 131) |
| ★115 | बर्नियर भारतीय समाज को किस रूप में वर्णित करता है, और मध्य वर्ग के बारे में उसने क्या कहा? | दरिद्र लोगों के समरूप जनसमूह के रूप में, जो बहुत अमीर तथा शक्तिशाली अल्पसंख्यक शासक वर्ग के अधीन है। गरीबों में सबसे गरीब और अमीरों में सबसे अमीर के बीच नाममात्र को भी कोई सामाजिक समूह नहीं था। बर्नियर विश्वास से कहता है: “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।” (पृष्ठ 131) |
| ★116 | बर्नियर ने मुग़ल साम्राज्य को किस रूप में देखा, और इसका एकमात्र कारण क्या माना? | इसका राजा “भिखारियों और क्रूर लोगों” का राजा था; शहर और नगर विनष्ट तथा “खराब हवा” से दूषित थे; खेत “झाड़ीदार” तथा “घातक दलदल” से भरे थे। इसका मात्र एक कारण था: राजकीय भूस्वामित्व। (पृष्ठ 132) |
| ★★117 | ! क्या मुग़ल दस्तावेज़ बर्नियर की इस बात का समर्थन करते हैं कि राज्य भूमि का एकमात्र स्वामी था? | नहीं। किताब कहती है: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता। सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को “राजत्व का पारिश्रमिक” बताता है, यानी प्रजा को सुरक्षा देने के बदले की गई माँग, न कि अपनी भूमि पर लगान। (पृष्ठ 132) |
| ★118 | यूरोपीय यात्री भूमि राजस्व की माँग को लगान क्यों मानते रहे होंगे, और असल में वह क्या थी? | किताब का अनुमान है कि ऐसा संभव है कि यूरोपीय यात्री इसे लगान मानते थे क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी। असल में वह न लगान थी, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था। (पृष्ठ 132) |
| ★★119 | फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के वृत्तांत का क्या उपयोग किया? | अठारहवीं शताब्दी से बर्नियर के विवरणों ने पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत से प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत विकसित किया: एशिया के शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे और प्रजा दासता तथा गरीबी में रहती थी। इसका आधार था कि सारी भूमि पर राजा का स्वामित्व था और निजी संपत्ति नहीं थी। (पृष्ठ 132) |
| ★★120 | उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने बर्नियर वाले विचार को किस सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया? | एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में। उसका तर्क था कि भारत (तथा अन्य एशियाई देशों) में उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष का अधिग्रहण राज्य द्वारा होता था। (पृष्ठ 132) |
| ★121 | एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत में भारतीय ग्रामीण समुदाय कैसे बताए गए? | बड़ी संख्या में स्वायत्त (आंतरिक रूप से) समतावादी ग्रामीण समुदाय, जिन पर राजकीय दरबार का नियंत्रण था। जब तक अधिशेष की आपूर्ति निर्विघ्न जारी रहती थी, उनकी स्वायत्तता का सम्मान किया जाता था। इसे एक निष्क्रिय प्रणाली माना जाता था। (पृष्ठ 132) |
| ! 122 | सोलहवीं–सत्रहवीं शताब्दी का ग्रामीण समाज वास्तव में कैसा था, और मार्क्स वाले चित्रण के बारे में किताब क्या कहती है? | किताब कहती है कि ग्रामीण समाज का वह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। वास्तव में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: एक ओर बड़े ज़मींदार, जो भूमि पर उच्चाधिकारों का उपभोग करते थे; दूसरी ओर “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार); बीच में किराए के श्रम का प्रयोग करने वाला बड़ा किसान, और मुश्किल से निर्वहन लायक उत्पादन करने वाले अपेक्षाकृत छोटे किसान। (पृष्ठ 132, 133) |
| ★123 | स्रोत 12 “यूरोप के लिए एक चेतावनी” में बर्नियर ने क्या चेतावनी दी? | कि यदि यूरोपीय शासकों ने मुग़ल ढाँचे का अनुसरण किया, तो उनके राज्य अच्छी तरह जुते–बसे, समृद्ध और फलते–फूलते नहीं रह जाएँगे। वे जल्द ही रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे, और महान शहर खराब हवा से न रहने योग्य हो जाएँगे। (पृष्ठ 132) |
| ★★124 | निरंकुश मुग़ल राज्य की अपनी तस्वीर के बावजूद बर्नियर के कौन-से कथन एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं? | (1) शिल्पकारों के पास उत्पाद बेहतर बनाने का प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि मुनाफ़े का अधिग्रहण राज्य कर लेता था, इसलिए उत्पादन पतनोन्मुख था। (2) उत्पादों का सोने–चाँदी के बदले निर्यात होने से पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं। (3) उसने समृद्ध व्यापारिक समुदाय के अस्तित्व को भी रेखांकित किया, जो लंबी दूरी के विनिमय से जुड़ा था। (पृष्ठ 133) |
| ★125 | स्रोत 13 में बर्नियर ने बंगाल की तुलना किससे की, और शिल्पकारों के किन उत्पादों का नाम लिया? | बर्नियर के अनुसार बंगाल का विशाल राज्य मिस्र से कहीं आगे है: चावल, मकई और जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुओं में ही नहीं, रेशम, कपास तथा नील जैसी वाणिज्यिक वस्तुओं में भी। शिल्पकार गलीचे, ज़री, कसीदाकारी कढ़ाई, सोने–चाँदी के वस्त्र तथा रेशम और सूती वस्त्र बनाते हैं, जो देश में प्रयोग होते हैं और विदेश में निर्यात किए जाते हैं। (पृष्ठ 133) |
| ★★126 | सत्रहवीं शताब्दी में मुग़ल भारत की कितनी जनसंख्या नगरों में रहती थी, और यह पश्चिमी यूरोप की तुलना में कैसा था? | लगभग पंद्रह प्रतिशत। यह औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था। (पृष्ठ 134) |
| ★★127 | बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को क्या कहता था, और उसका आशय क्या था? | उन्हें “शिविर नगर” कहता था: ऐसे नगर जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे। उसका विश्वास था कि वे राजकीय दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते और उसके कहीं और चले जाने के बाद तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते थे; उसने यह भी सुझाया कि उनकी सामाजिक–आर्थिक नींव व्यवहार्य नहीं थी। (पृष्ठ 134) |
| ! 128 | क्या “शिविर नगर” वाला चित्रण पूरा सच था? नगरों के कौन-से प्रकार थे? | नहीं। भूस्वामित्व के प्रश्न की तरह बर्नियर अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था। वास्तव में सभी प्रकार के नगर थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि। इनका अस्तित्व समृद्ध व्यापारिक समुदायों तथा व्यावसायिक वर्गों के अस्तित्व का सूचक है। (पृष्ठ 134) |
| ★129 | पश्चिमी भारत में व्यापारी समूहों और उनके मुखिया को क्या कहा जाता था? अहमदाबाद में सामूहिक प्रतिनिधित्व किसके हाथ में था? | व्यापारी अक्सर मज़बूत सामुदायिक अथवा बंधुत्व के संबंधों से जुड़े थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन और उनके मुखिया को सेठ कहा जाता था। अहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय का मुखिया करता था, जिसे नगर सेठ कहा जाता था। (पृष्ठ 134) |
| 130 | मुग़लकालीन शहरों में व्यापारियों के अलावा कौन-से व्यावसायिक वर्ग थे, और वे कैसे गुज़ारा करते थे? | चिकित्सक (हकीम अथवा वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक आदि। कई राजकीय प्रश्रय पर आश्रित थे; कई अन्य संरक्षकों या भीड़भाड़ वाले बाज़ार में आम लोगों की सेवा से जीवनयापन करते थे। (पृष्ठ 134) |
| ★131 | स्रोत 14 के अनुसार बर्नियर राजकीय कारखानों के बारे में क्या विशेष बताता है, और वहाँ कौन-से कारीगर काम करते थे? | किताब कहती है कि संभवतः बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देता है। बड़े कक्षों में कसीदाकार (मास्टर के निरीक्षण में), सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई–खरादी–दर्जी–जूते बनाने वाले, तथा रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले अलग–अलग काम करते थे। (पृष्ठ 134) |
| ★132 | स्रोत 14 में बर्नियर शिल्पकारों के दिन और उनकी मनोदशा का कैसा चित्र खींचता है? | शिल्पकार हर सुबह कारखाने आते, पूरे दिन काम करते और शाम को घर लौट जाते हैं। उनका समय निश्चेष्ट नियमित ढंग से बीतता है; बर्नियर के अनुसार कोई भी उन स्थितियों को बेहतर बनाने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ था। (पृष्ठ 134) |
सेट 9 — दासियाँ, सती और महिला श्रमिक (कार्ड 133–143)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★133 | महिलाओं के बारे में लिखने वाले यात्रियों की क्या सीमा थी? | जिन यात्रियों ने लिखित वृत्तांत छोड़े वे सामान्यतया पुरुष थे। उन्हें उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति का विषय रुचिकर और कभी–कभी जिज्ञासापूर्ण लगता था। कभी–कभी वे सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” परिस्थिति मान लेते थे। (पृष्ठ 135) |
| ★★134 | इब्न बतूता के वृत्तांत से दासों के बारे में क्या पता चलता है? बाज़ार में और भेंट के रूप में उनकी क्या स्थिति थी? | बाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए भेंट में “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे। मुल्तान पहुँचकर उसने गवर्नर को भेंट में “एक दास और घोड़ा” दिए। (पृष्ठ 135) |
| ★135 | धर्मोपदेशक नसीरुद्दीन के प्रवचन से प्रसन्न होकर मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसे क्या दिया? | इब्न बतूता के अनुसार सुल्तान ने उसे “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास” दे दिए। (पृष्ठ 135) |
| ★136 | इब्न बतूता के विवरण में दासों में किस तरह का विभेद दिखता है? | सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; इब्न बतूता सुल्तान की बहन की शादी के अवसर पर उनके प्रदर्शन से खूब आनंदित हुआ। सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। (पृष्ठ 135) |
| ★137 | दासों का सामान्यतः किस काम में उपयोग होता था, और उनकी कीमत कैसी थी? | सामान्यतः घरेलू श्रम में। इब्न बतूता ने पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में उनकी सेवाओं को विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। दासों की, विशेषकर घरेलू श्रम वाली दासियों की, कीमत बहुत कम होती थी और अधिकांश परिवार जो उन्हें रख सकते थे, कम से कम एक या दो को तो रखते ही थे। (पृष्ठ 135) |
| ★138 | स्रोत 15 “दासियाँ” में इब्न बतूता सम्राट की कौन-सी आदत बताता है, और दासियों को कैसे प्राप्त किया जाता था? | सम्राट हर बड़े या छोटे अमीर के साथ अपने दासों में से एक को रखता था, जो अमीरों की मुखबिरी करता था। वह महिला सफाई कर्मचारियों को भी नियुक्त करता था, जो बिना बताए घर में दाखिल हो जाती थीं। इब्न बतूता के अनुसार: “अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।” (पृष्ठ 135) |
| ★★139 | यूरोपीय यात्री महिलाओं के बर्ताव को क्यों महत्त्व देते थे, और बर्नियर ने किस प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना? | सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अकसर पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था। इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को चुना। उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, जबकि अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था। (पृष्ठ 135) |
| ★★140 | स्रोत 16 “सती बालिका” में बर्नियर ने लाहौर में क्या देखा? | एक बहुत सुंदर अल्पवयस्क विधवा की बलि होते हुए, जिसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी। तीन या चार ब्राह्मण और एक बूढ़ी औरत उस अनिच्छुक बालिका को जबरन घातक स्थल की ओर ले गए। बर्नियर ने लिखा कि वह अपनी भावनाओं को दबाने में असमर्थ था। किताब के अनुसार यह संभवतः बर्नियर के वृत्तांत के सबसे मार्मिक विवरणों में से एक है। (पृष्ठ 135) |
| ★141 | सती प्रथा के अलावा महिलाओं का जीवन किन चीज़ों के चारों ओर घूमता था? व्यापारिक परिवारों की महिलाओं के बारे में किताब क्या बताती है? | महिलाओं का श्रम कृषि तथा कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था। व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं, यहाँ तक कि कभी–कभी वाणिज्यिक विवादों को अदालत के सामने भी ले जाती थीं। इसलिए किताब के अनुसार यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को घरों के खास स्थानों तक परिसीमित रखा जाता था। (पृष्ठ 135, 136) |
| ! 142 | यात्रा–वृत्तांतों को पढ़ते समय किताब किस बात का ध्यान रखने को कहती है? | ये वृत्तांत पुरुषों और महिलाओं के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं और इनसे बहुत सी जानकारी मिलती है, पर सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या फिर वे एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं। (पृष्ठ 136) |
| 143 | उपमहाद्वीप से बाहर यात्रा करने वालों के बारे में अध्याय के अंत में कौन-सी कमी बताई गई है? | उपमहाद्वीप के पुरुषों (और संभवतः महिलाओं) के अनुभव और प्रेक्षण, जिन्होंने समुद्रों और पर्वतों को पार करके उपमहाद्वीप से परे क्षेत्रों में साहसिक यात्राएँ कीं, अपेक्षाकृत अज्ञात हैं। किताब उम्मीद करती है कि आने वाले वर्षों में इतिहासकार इन पर योजनापूर्ण तरीके से ध्यान केंद्रित करेंगे। (पृष्ठ 136) |
सेट 10 — काल-रेखा और प्रश्नावली (कार्ड 144–150)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★144 | अध्याय की काल-रेखा में अल–बिरूनी, मार्को पोलो और इब्न बतूता की तिथियाँ और उनके देश क्या दिए हैं? | अल–बिरूनी: 973–1048 (दसवीं–ग्यारहवीं शताब्दियाँ; काल-रेखा में उज़्बेकिस्तान से)। मार्को पोलो: 1254–1323 (तेरहवीं शताब्दी; इटली से)। इब्न बतूता: 1304–77 (चौदहवीं शताब्दी; मोरक्को से)। (पृष्ठ 137) |
| ★145 | काल-रेखा की पंद्रहवीं शताब्दी की दो पंक्तियों में कौन-से यात्री हैं, और किसके आगे जीवनकाल नहीं लिखा है? | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी: 1413–82 (समरक़ंद से)। अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से): 1466–72, जो उसके भारत में बिताए वर्ष हैं, जीवनकाल नहीं। (पृष्ठ 137) |
| ★146 | काल-रेखा की सोलहवीं शताब्दी की तीन पंक्तियों में कौन-से यात्री, कौन-सी तिथि और कौन-सा देश है? | दुआर्ते बरबोसा (पुर्तगाल से): 1518 भारत की यात्रा, मृत्यु 1521। सयदी अली रेइस (तुर्की से): 1562 उसकी मृत्यु का वर्ष। अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से): 1536–1600। (पृष्ठ 137) |
| ★147 | काल-रेखा की सत्रहवीं शताब्दी की चार पंक्तियों में कौन-से यात्री, कौन-सी तिथि और कौन-सा देश है? | महमूद वली बल्ख़ी (बल्ख़ से): 1626–31, भारत में बिताए वर्ष। पीटर मुंडी (इंग्लैंड से): 1600–67। ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से): 1605–89। फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से): 1620–88। (पृष्ठ 137) |
| ★★148 | ! काल-रेखा में दी गई तिथियों का सामान्य अर्थ क्या है, और कहाँ उसकी जगह कुछ और लिखा है? | काल-रेखा के नोट के अनुसार जहाँ कोई अन्य संकेत नहीं है, तिथियाँ यात्री के जीवनकाल को बताती हैं। अपवाद: निकितिन (1466–72) और बल्ख़ी (1626–31) के आगे भारत में बिताए वर्ष, बरबोसा के आगे 1518 भारत की यात्रा (मृत्यु 1521), और सयदी अली रेइस के आगे 1562 मृत्यु का वर्ष। (पृष्ठ 137) |
| ★149 | बर्नियर के अनुसार भारतीय शिल्पकारों की कारीगरी कैसी थी? (प्रश्नावली के प्रश्न 9 का अंश) | बर्नियर लिखता है कि औज़ारों के अभाव में और बिना किसी निपुण कारीगर से सीखे भी सुंदर कारीगरी के बहुत उदाहरण हैं। कभी–कभी वे यूरोप में तैयार वस्तुओं की नकल इतनी निपुणता से करते हैं कि असली–नकली का अंतर मुश्किल हो जाता है। भारतीय लोग बेहतरीन बंदूकें और ऐसे सुंदर स्वर्णाभूषण बनाते हैं कि संदेह होता है कि कोई यूरोपीय स्वर्णकार बेहतर बना सकता है। वह उनके चित्रों की सुंदरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता से भी आकर्षित हुआ। (पृष्ठ 138) |
| 150 | अध्याय की प्रश्नावली में उत्तर की शब्द-सीमाएँ और प्रश्नों के प्रकार क्या हैं? | प्रश्न 1 से 5: “उत्तर दीजिए”, लगभग 100 से 150 शब्दों में। प्रश्न 6 से 9: लघु निबंध, लगभग 250–300 शब्दों में। प्रश्न 10: मानचित्र कार्य। प्रश्न 11 और 12: परियोजना कार्य, कोई एक। कुल बारह प्रश्न हैं। (पृष्ठ 138, 139) |
अंतिम पाँच मिनट — यही दोहराइए
तीन यात्री: अल–बिरूनी (ग्यारहवीं शताब्दी; जन्म ख़्वारिज़्म में सन् 973; सुल्तान महमूद के साथ ग़ज़नी), इब्न बतूता (चौदहवीं शताब्दी; मोरक्को का) और फ्रांस्वा बर्नियर (सत्रहवीं शताब्दी; फ्रांस का; भारत में 1656 से 1668 तक) (पृष्ठ 115, 116, 122)
अल–बिरूनी की कृति: किताब–उल–हिन्द, अरबी में, अस्सी अध्याय; हर अध्याय में सामान्यतः (हमेशा नहीं) एक प्रश्न, संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन और अन्य संस्कृतियों से तुलना (पृष्ठ 117)
जाति व्यवस्था पर अल–बिरूनी: प्राचीन फ़ारस के चार सामाजिक वर्गों की मिसाल देकर दिखाया कि ऐसे वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे; अपवित्रता की धारणा को प्रकृति के नियमों के विरुद्ध माना; उसका विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण वाले नियामक संस्कृत ग्रंथों पर टिका था, जबकि वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी (पृष्ठ 124, 125)
इब्न बतूता का जीवन: रिह्ला, अरबी में; सिंध सन् 1333 में; मुहम्मद बिन तुग़लक ने दिल्ली का क़ाज़ी बनाया; सन् 1342 में सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश; 1354 में घर लौटा; श्रुतलेख इब्न जुज़ाई ने लिखे (पृष्ठ 118, 119, 121)
इब्न बतूता: शहर, बाज़ार और डाक: दिल्ली भारत का सबसे बड़ा शहर, दौलताबाद उसे चुनौती देता था; दिल्ली के अट्ठाईस द्वार; अश्व डाक उलुक हर चार मील पर, पैदल डाक दावा प्रति मील तीन अवस्थान; सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन, पर गुप्तचरों की खबरें पाँच दिन में (पृष्ठ 127, 129)
बर्नियर का मुख्य तर्क: भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव, सम्राट सारी भूमि का स्वामी; इसलिए भूधारक निवेश के प्रति उदासीन और कृषि का विनाश। किताब: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं कहता कि राज्य एकमात्र स्वामी था; अबुल फ़ज़्ल ने भूमि राजस्व को “राजत्व का पारिश्रमिक” कहा (पृष्ठ 130, 131, 132)
बर्नियर के बाद के विचारक: मॉन्टेस्क्यू (प्राच्य निरंकुशवाद, अठारहवीं शताब्दी से) और कार्ल मार्क्स (एशियाई उत्पादन शैली, उन्नीसवीं शताब्दी); किताब: ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था, वहाँ बड़े ज़मींदार, बड़े किसान, छोटे किसान और बलाहार थे (पृष्ठ 132, 133)
बर्नियर के नगर: सत्रहवीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत जनसंख्या नगरों में; बर्नियर ने उन्हें “शिविर नगर” कहा; किताब: चित्रण अतिसरलीकृत था, सभी प्रकार के नगर थे; पश्चिमी भारत में महाजन, उनका मुखिया सेठ, अहमदाबाद में नगर सेठ (पृष्ठ 134)
दास, सती और महिलाएँ: बाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह बिकते और भेंट में दिए जाते थे; बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना, लाहौर में उसने बारह वर्ष से अधिक की नहीं लगने वाली विधवा बालिका की बलि देखी; महिलाओं का श्रम कृषि और उत्पादन में महत्त्वपूर्ण था (पृष्ठ 135, 136)
काल-रेखा के फंदे: नोट के अनुसार तिथियाँ यात्री का जीवनकाल हैं; निकितिन (1466–72) और बल्ख़ी (1626–31) के आगे भारत में बिताए वर्ष; बरबोसा: 1518 में भारत की यात्रा, मृत्यु 1521; सयदी अली रेइस: 1562 मृत्यु का वर्ष (पृष्ठ 137)