अध्याय 5यात्रियों के नज़रिए

पाठ योजना34 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 5

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 115 से 139 · कालांश — 10 (9 पढ़ाने के, 1 मूल्यांकन का), हर एक 40–45 मिनट

इस्तेमाल कैसे करें — हर कालांश की पूरी तैयारी उसके अपने कार्ड में है: किताब के पृष्ठ, स्लाइड, इंटरैक्टिव अध्याय, प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड। पहले एक नज़र में वाला चित्र और तालिका देखिए, फिर आज के कालांश का कार्ड खोलिए। कार्ड के हिस्से और शब्द, जैसे निकास-पर्ची, तैयारी वाली तालिका में समझाए गए हैं।

अध्याय का बड़ा विचार — किताब पृष्ठ 116 पर बताती है कि बाहर से आए यात्री रोज़मर्रा की उन बातों पर ध्यान देते थे जिन्हें यहाँ के लोग लिखने लायक़ नहीं समझते थे, क्योंकि “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।” यानी इस अध्याय में हर यात्री को दो तरह से पढ़ा जाएगा: उसने क्या देखा, और उसकी अपनी पृष्ठभूमि ने उसकी नज़र को कैसे मोड़ा।

हमारी ओर से पूरे अध्याय के लिए एक सवाल: बाहर से आया यात्री किसी जगह के बारे में ऐसा क्या देख लेता है जो वहाँ रहने वाले नहीं देखते, और वह कहाँ ग़लत समझ सकता है? पहले दिन बच्चे इस पर दो पंक्तियाँ पर्ची पर लिखेंगे और पर्चियाँ आपके पास रहेंगी; कालांश 9 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वही पर्चियाँ लौटाकर परखी जाएँगी।


एक नज़र में — दस कालांश और उनकी सामग्री

हर तीर पर लिखा है कि अगला कालांश पिछले से क्यों निकलता है।

दस कालांश, एक कहानी

कालांश 1यात्री और अल–बिरूनीवृत्तांत किस काम के; ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी; किताब–उल–हिन्द (पृष्ठ 115–117)
कालांश 2इब्न बतूता का रिह्लामोरक्को से दिल्ली; सुल्तान का दूत; मानचित्र 1 (पृष्ठ 118–121)
कालांश 3फ्रांस्वा बर्नियरभारत में बारह वर्ष; उसका वृत्तांत कैसे छपा और फैला (पृष्ठ 122–123)
कालांश 4एक अपरिचित संसार की समझअल–बिरूनी के तीन अवरोध; जाति व्यवस्था, स्रोत 5 (पृष्ठ 124–125)
कालांश 5अनजाने को जानने की उत्कंठानारियल, पान, शहर, बाज़ार और डाक (पृष्ठ 126–129)
कालांश 6भूमि स्वामित्व का प्रश्नबर्नियर का तर्क; स्रोत 11 और 12 (पृष्ठ 130–132)
कालांश 7एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाईशिल्प, शहर और व्यापारी; स्रोत 13 और 14 (पृष्ठ 133–134)
कालांश 8महिलाएँदासियाँ, सती और श्रमिक; स्रोत 15 और 16 (पृष्ठ 135–136)
कालांश 9काल-रेखा और मानचित्रबारह यात्री; प्रश्न 10; पहले दिन की पर्चियाँ (पृष्ठ 137, 139)
कालांश 10मूल्यांकनअभ्यास के 12 प्रश्न (पृष्ठ 138–139)
हर कालांश के पृष्ठ, स्लाइड और बाक़ी सामग्री नीचे की तालिका में।

सामग्री के पन्ने: स्लाइड का पाठ · स्लाइड शो · प्रश्न बैंक · फ़्लैशकार्ड · इंटरैक्टिव अध्याय · रिवीजन नोट्स · क्विज़

कालांश और टॉपिकपृष्ठस्लाइडइंटरैक्टिवप्रश्न बैंकफ़्लैशकार्ड
1 शुरुआत; 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द115–117शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1शुरुआत, 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्दक1, क2, क3 · ख1, ख2 · ग1, ग2 · घ2 · ङ11–27
2 2. इब्न बतूता का रिह्ला, मानचित्र 1118–121भाग 22. इब्न बतूता का रिह्लाक4, क5, क6 · ख3, ख4 · ग3 · च228–51
3 3. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक122–123भाग 33. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सकक7, क8 · ख5 · ग4 · घ652–66
4 4. एक अपरिचित संसार की समझ124–125भाग 44. एक अपरिचित संसार की समझक9, क10 · घ1, घ3 · च1 · छ167–78
5 5. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा126–129भाग 55. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठाक11–क14 · ख6 · ग5, ग6 · घ4, घ5 · ङ2, ङ3 · च3 · छ279–105
6 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व: 6.1 भूमि स्वामित्व का प्रश्न130–133भाग 66. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्वक15, क16 · ख7, ख8 · ग7 · ङ4 · च5106–123
7 6.3 एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई133–134भाग 76. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्वक17 · ख9, ख10 · घ7 · ङ5 · च4 · छ3124–132
8 7. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक135–136भाग 87. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिकक18, क19, क20 · ग8 · घ8 · ङ6 · च6 · छ4133–143
9 काल-रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)137, 139काल-रेखा वाला भागसार और काल-रेखानमूना पत्र 1144–150
10 मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न138–139आख़िरी भागहर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्ननमूना पत्र 2 और 3पूरा सेट

प्रश्न बैंक के कोड ऐसे पढ़िए: क1 मतलब खण्ड क (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) का प्रश्न 1। ख रिक्त स्थान है, ग सही/ग़लत, घ अति लघूत्तरीय (2 अंक), ङ लघूत्तरीय (3 अंक), च दीर्घ उत्तरीय (5 अंक) और छ स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक)। फ़्लैशकार्ड के अंक कार्ड के नंबर हैं।

पढ़ाने से पहले

तैयारी — कार्ड में क्या-क्या है और उसे कैसे तैयार करें

हर कालांश का कार्ड इसी क्रम में चलता है। पहली बार पढ़ा रहे हैं तो यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।

हिस्सा या औज़ारयह क्या हैकैसे तैयार करें
किताबकार्ड के सबसे ऊपर लिखे पृष्ठ; बच्चे इन्हीं से पढ़ेंगेपृष्ठ एक दिन पहले पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाले बॉक्स और किनारे के प्रश्न
स्लाइडस्लाइड का पाठ का वह भाग जो इस कालांश का हैस्लाइड शो एक बार चलाकर देखिए; प्रोजेक्टर न हो तो स्लाइड का पाठ ही काफ़ी है
इंटरैक्टिव अध्यायकिताब के हर हिस्से का एक पड़ाव, जिसे बच्चे फ़ोन या कंप्यूटर पर ख़ुद पढ़ सकते हैंकार्ड में दिया पड़ाव खोलकर देखिए कि उसमें क्या है
लक्ष्यकालांश के अंत तक हर बच्चा क्या कर सकेनिकास-पर्ची इसी लक्ष्य को जाँचती है; दोनों साथ पढ़िए
साथ ले जाइएकिताब के अलावा जो चीज़ें कक्षा में चाहिएएक दिन पहले जुटा लीजिए; चार्ट पेपर पर चित्र पहले से बना लीजिए
40 मिनटकालांश के छह चरण, मिनट के हिसाब सेपहला चरण हमेशा पिछली पर्चियाँ है, आख़िरी हमेशा निकास-पर्ची; बीच के चरण किताब के क्रम में
चित्रउस कालांश का एक आरेख, किताब के एक पृष्ठ सेकॉपी में एक बार बना लीजिए, फिर बोर्ड पर बच्चों के जवाबों से बनवाइए
बोर्ड-कार्यकालांश के अंत तक बोर्ड पर बनने वाली तालिका, जिसे बच्चे कॉपी में उतारेंहर पंक्ति के साथ पृष्ठ लिखा है; बच्चे भी पृष्ठ लिखें
यहाँ बच्चे अटकेंगेवे बातें जहाँ बच्चे अक्सर भूल करते हैं, और कमज़ोर और तेज़ विद्यार्थी के लिए एक-एक कामकालांश से पहले पढ़ लीजिए, ताकि भूल होते ही रोक सकें
निकास-पर्चीआख़िरी कुछ मिनट में दो छोटे प्रश्न, जिनके उत्तर बच्चे काग़ज़ की पर्ची पर लिखकर देते हैंनमूना उत्तर कार्ड में हैं; पर्चियाँ अगले कालांश के पहले चरण में काम आती हैं
प्रश्न बैंकगृहकार्य के प्रश्न, कोड सेकोड ऊपर की तालिका के नीचे समझाए गए हैं
फ़्लैशकार्डदोहराने के लिए छोटे कार्ड, नंबर सेबच्चों को बता दीजिए कि आज कौन-से नंबर दोहराने हैं

हर कालांश से पहले:

  1. कार्ड के पृष्ठ किताब में पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाला बॉक्स।
  2. पिछली निकास-पर्चियाँ छाँटिए: कितनों ने सही लिखा, सबसे ज़्यादा कौन-सी भूल हुई।
  3. “चित्र” वाला आरेख कॉपी में एक बार बनाइए।
  4. गृहकार्य के कोड प्रश्न बैंक में खोलकर देख लीजिए कि उत्तर कितने लंबे हैं।

पढ़ाने का क्रम: तीन यात्री, दो चक्कर

किताब तीन यात्रियों को दो बार लेती है। पहले चक्कर (भाग 1 से 3) में वह बताती है कि हर यात्री कौन था, कहाँ से आया और उसका वृत्तांत कैसे लिखा गया: ग्यारहवीं सदी का अल–बिरूनी, चौदहवीं सदी का इब्न बतूता, और सत्रहवीं सदी का फ्रांस्वा बर्नियर। दूसरे चक्कर (भाग 4 से 7) में वह उसी क्रम में देखती है कि हर यात्री ने भारत को कैसे समझा: अल–बिरूनी ने संस्कृत ग्रंथों से, इब्न बतूता ने अनजानी चीज़ों के प्रति उत्सुकता से, और बर्नियर ने यूरोप से तुलना करके। आख़िर में महिलाओं पर तीनों की नज़र आती है।

यह क्रम इसलिए है कि बच्चे किसी यात्री की राय पढ़ने से पहले जान लें कि वह कौन था। कालांश 6 में बर्नियर का भूमि स्वामित्व वाला तर्क तभी समझ आता है जब कालांश 3 में बच्चे पढ़ चुके हों कि वह फ्रांस से आया था और अपनी कृति फ्रांस के शासक को समर्पित की थी; कालांश 4 में अल–बिरूनी की जाति वाली व्याख्या की सीमा तभी दिखती है जब कालांश 1 में बच्चे जान चुके हों कि उसने ब्राह्मण विद्वानों के साथ संस्कृत ग्रंथ पढ़े थे। अगर दूसरा चक्कर पहले पढ़ा दिया जाए, तो बच्चे यात्रियों की राय को किताब की राय समझ बैठेंगे। इस क्रम को मत तोड़िए।

सामग्री — यह जुटा लीजिए

#क्याकिस कालांश में
1चार्ट पेपर की कम से कम पाँच शीट: तीन यात्रियों की तालिका, रास्ते की मुश्किलें, जाने-पहचाने से अनजाने तक, शहर में कौन-कौन, काल-रेखा1, 2, 5, 7, 9
2विश्व का मानचित्र या एटलस1, 2, 9
3विश्व के रेखांकित मानचित्र, हर विद्यार्थी के लिए एक9
4काग़ज़ की पर्चियाँ, और पहले दिन की पर्चियों के लिए एक लिफ़ाफ़ाहर कालांश; लिफ़ाफ़ा 1 और 9 में
5नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ, या बोर्ड पर लिखे प्रश्न10
6प्रोजेक्टर, हो तोस्लाइड और इंटरैक्टिव अध्याय के लिए; न हो तो चार्ट पेपर और बोर्ड काफ़ी हैं

कक्षा-व्यवस्था

  • जोड़ियाँ स्रोत पढ़ने के कामों के लिए: स्रोत 5 (कालांश 4), स्रोत 6 से 10 (कालांश 5), स्रोत 11 से 14 (कालांश 6 और 7), और स्रोत 15 और 16 (कालांश 8)।
  • दो समूह कालांश 7 में: एक समूह बर्नियर के भूमि स्वामित्व वाले तर्क से भारत की तसवीर बनाए, दूसरा उसी बर्नियर के स्रोत 13 और 14 से। कोई समूह जीतता नहीं; दोनों अपना प्रमाण रखते हैं।
  • चार्ट पेपर कक्षा की दीवार पर एक जगह लगाइए। कालांश 9 और 10 में सब फिर काम आएँगे।
  • जाति, दास प्रथा और सती इतिहास की तरह: इन्हें वैसे ही पढ़ाइए जैसे स्रोत बताते हैं और किताब उन पर टिप्पणी करती है। किसी बच्चे से उसकी जाति मत पूछिए, जातियों को ऊँचा-नीचा मत आँकवाइए, और सती या दासों की बिक्री का अभिनय कभी मत करवाइए।
  • पूरब और पश्चिम की होड़ नहीं। बर्नियर का यूरोप को ऊँचा मानना उसकी अपनी राय है, जिसे किताब परखती है। कक्षा में यह बहस मत करवाइए कि कौन बेहतर था; बहस बस इतनी हो कि बर्नियर का प्रमाण क्या है।
  • बिना प्रोजेक्टर भी हर कालांश चल जाता है: हर कार्ड का चित्र बोर्ड पर बन सकता है, और बच्चे अपनी किताब में चित्र और मानचित्र देखते हैं।

अधिगम प्रतिफल

#प्रतिफलकालांशजाँच
1बताता है कि यात्रियों के वृत्तांत इतिहास के लिए क्यों काम के हैं, और उनकी सीमा क्या है1, 9पहले दिन की पर्ची, और कालांश 9 में उसका नया उत्तर
2अल–बिरूनी का जीवन और किताब–उल–हिन्द की विषयवस्तु और बनावट बताता है1निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 1
3इब्न बतूता की यात्राएँ, भारत में उसका काम और उसके रिह्ला के लिखे जाने का तरीक़ा बताता है2निकास-पर्ची; मानचित्र 1
4बर्नियर कौन था, उसने भारत को किस नज़र से देखा और उसका वृत्तांत यूरोप में कैसे फैला, यह लिखता है3निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 2
5अल–बिरूनी के तीन अवरोध और जाति व्यवस्था की उसकी व्याख्या, उसकी सीमा के साथ लिखता है4निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 6
6इब्न बतूता के स्रोतों से चौदहवीं सदी के शहर, बाज़ार और डाक व्यवस्था का चित्र बनाता है5निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 7
7बर्नियर का भूमि स्वामित्व वाला तर्क और उस पर किताब के प्रश्न बताता है6निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 8
8बर्नियर के अपने विवरणों से शिल्प, शहरों और व्यापारियों की जटिल तसवीर निकालता है7निकास-पर्ची; अभ्यास के प्रश्न 3 और 9
9यात्रियों के वृत्तांतों से दासियों, सती और महिला श्रमिकों के बारे में लिखता है, स्रोत के शब्दों में8निकास-पर्ची; अभ्यास के प्रश्न 4 और 5
10काल-रेखा पढ़ता है और इब्न बतूता के देखे देशों और समुद्रों का मानचित्र किताब के बताए स्थानों से बनाता है9मानचित्र; अभ्यास का प्रश्न 10

कालांश-दर-कालांश

कालांश 1 — शुरुआत: यात्री और उनके वृत्तांत; 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द (1.1-1.2)

किताब — पृष्ठ 115–117 · स्लाइड — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 · इंटरैक्टिव — शुरुआत, 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि यात्रियों के वृत्तांत इतिहास के लिए क्यों काम के हैं, अल–बिरूनी भारत से कैसे जुड़ा, और किताब–उल–हिन्द के हर अध्याय की बनावट क्या है।

साथ ले जाइए — किताब, पहले दिन की पर्ची के लिए काग़ज़ के छोटे टुकड़े और एक लिफ़ाफ़ा, विश्व का मानचित्र (उज़्बेकिस्तान ढूँढ़ने के लिए), और तीन यात्रियों की तालिका के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पहले दिन की पर्ची। बोर्ड पर अध्याय का नाम लिखिए। फिर ऊपर के बॉक्स वाला पूरे अध्याय का सवाल बोलिए। हर विद्यार्थी पर्ची पर दो पंक्तियाँ और अपना नाम लिखे। पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए; ये कालांश 9 में लौटेंगी।

  2. 5–12 मिनट · वृत्तांत किस काम के। पृष्ठ 115–116 साथ पढ़िए। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: यहाँ के लेखक और बाहर से आए यात्री। बच्चों से पूछिए कि रोज़ की कौन-सी बातें हम ख़ुद कभी नहीं लिखते, जैसे घर का खाना या बाज़ार का दिन। फिर किताब का वाक्य पढ़िए: “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।” चार्ट पेपर पर तीन यात्रियों की तालिका शुरू कीजिए: ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) से आए अल–बिरूनी, ग्यारहवीं शताब्दी; मोरक्को से आए इब्न बतूता, चौदहवीं शताब्दी; फ्रांस से आए फ्रांस्वा बर्नियर, सत्रहवीं शताब्दी। यह चार्ट पूरे अध्याय में भरता जाएगा।

  3. 12–22 मिनट · अल–बिरूनी: ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी। पृष्ठ 116 पढ़िए और बोर्ड पर क्रम से लिखवाइए: जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है; वह सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत समेत कई भाषाएँ जानता था; यूनानी नहीं जानता था, इसलिए प्लेटो जैसे दार्शनिकों की कृतियाँ उसने अरबी अनुवादों में पढ़ीं; 1017 ई. में सुल्तान महमूद ने ख़्वारिज़्म पर आक्रमण किया और अल–बिरूनी को बंधक बनाकर ग़ज़नी ले आया, जहाँ वह अपनी मृत्यु तक रहा। मानचित्र पर उज़्बेकिस्तान दिखाइए। फिर नीचे का चित्र बनाइए: ग़ज़नी में उसकी भारत में रुचि बढ़ी, उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर संस्कृत सीखी, और अनुवाद दोनों दिशाओं में किए।

  4. 22–30 मिनट · किताब–उल–हिन्द। पृष्ठ 116–117 पढ़िए। जोड़ियाँ तीन बातें ढूँढ़ें: भाषा (अरबी, सरल और स्पष्ट), आकार (अस्सी अध्याय), और विषय (धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि)। फिर हर अध्याय की बनावट बोर्ड पर तीन सीढ़ियों में लिखिए: एक प्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। किताब यहाँ “सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं)” कहती है; यह शब्द बोर्ड पर भी रहें। आख़िर में पृष्ठ 117 का बॉक्स “हिंदू” शब्द पर पढ़िए।

  5. 30–36 मिनट · पृष्ठ 116 का किनारे का प्रश्न। प्रश्न पढ़िए, जैसा छपा है: “अल–बिरूनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत 5) तथा चर्चा कीजिए कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है।” पहले स्रोत 1 में अल–बिरूनी के अपने बताए दो उद्देश्य बोर्ड पर लिखिए, फिर स्रोत 5 (पृष्ठ 125) साथ पढ़िए। नमूना उत्तर — काफ़ी हद तक, पर ग्रंथों की सीमा के साथ। स्रोत 1 में उसके दो उद्देश्य हैं: हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता, और उनसे जुड़ना चाहने वालों के लिए सूचना का संग्रह।

    • जो पूरा होता है: स्रोत 5 चार वर्णों का क्रम, ग्रंथों के अनुसार उनकी उत्पत्ति, और यह बताता है कि वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल–जुलकर रहते हैं। बाहर के पाठक के लिए यह काम की सूचना है।
    • जो कमी रह जाती है: यह जानकारी ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे संस्कृत ग्रंथों पर टिकी है, इसलिए असल जीवन की तसवीर अधूरी रहती है। यह बात कालांश 4 में फिर आएगी।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) किताब के अनुसार बाहर से आए यात्रियों के वृत्तांत किन बातों के लिए काम के हैं? (2) किताब–उल–हिन्द का हर अध्याय सामान्यत: किस क्रम में चलता है?

अनुवाद, दोनों दिशाओं में (चरण 3)

अनुवाद, दोनों दिशाओं में

संस्कृत से अरबीपतंजलि का व्याकरणअल–बिरूनी ने अरबी में अनुवाद किया
संस्कृत मेंयूक्लिड के कार्यब्राह्मण मित्रों के लिए संस्कृत में अनुवाद किया
अल–बिरूनीकई भाषाओं का जानकारसीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू, संस्कृत; यूनानी नहीं
NCERT, पृष्ठ 116

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
वृत्तांत क्यों काम केयात्री वे बातें दर्ज करते थे जो यहाँ के लेखकों को सामान्य लगती थीं116
अल–बिरूनी का जन्मसन् 973, ख़्वारिज़्म में, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है116
ग़ज़नी कैसे पहुँचा1017 ई. में सुल्तान महमूद के ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद बंधक के रूप में116
अनुवादपतंजलि का व्याकरण अरबी में; यूक्लिड के कार्य संस्कृत में116
किताब–उल–हिन्दअरबी में, सरल और स्पष्ट भाषा, अस्सी अध्याय116–117
हर अध्याय की बनावटप्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, फिर दूसरी संस्कृतियों से तुलना; सामान्यत:, हमेशा नहीं117
“हिंदू” शब्दसिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से; धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था117

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • अल–बिरूनी उज़्बेकिस्तान से आया था। वह ख़्वारिज़्म में जन्मा था, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है, और ग़ज़नी बंधक बनकर पहुँचा। बच्चे अक्सर लिखते हैं कि वह उज़्बेकिस्तान आया था; बोर्ड पर दो अलग पंक्तियाँ लिखिए: जन्म ख़्वारिज़्म में; ग़ज़नी बंधक बनकर, 1017 ई. में।
  • वह यूनानी नहीं जानता था। बच्चे सोचते हैं कि यूक्लिड का अनुवाद किया तो यूनानी आती होगी। किताब कहती है कि प्लेटो जैसे दार्शनिकों को उसने अरबी अनुवादों में पढ़ा।
  • “हिंदू” शब्द धर्म का नाम नहीं था। बॉक्स के अनुसार यह एक क्षेत्र के लोगों के लिए था; किताब कहती है: “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।”
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द खोलिए, और किताब–उल–हिन्द वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: हर अध्याय किस चीज़ से शुरू होता है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: अल–बिरूनी हर अध्याय के अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना क्यों करता होगा, जब वह अरबी पढ़ने वालों के लिए लिख रहा था? (किताब के अनुसार उसने शायद उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए लिखा; जानी-पहचानी चीज़ से तुलना करके अनजानी चीज़ समझाना आसान होता है।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) रोज़मर्रा की उन बातों के लिए जिन्हें यहाँ के लेखक सामान्य मानकर दर्ज नहीं करते थे। (2) सामान्यत: एक प्रश्न से शुरुआत, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1, क2, क3, ख1, ख2, ग1 और ग2; जो आगे हैं, वे घ2 और ङ1 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 1–27।

कालांश 2 — 2. इब्न बतूता का रिह्ला (2.1-2.2), मानचित्र 1

किताब — पृष्ठ 118–121 · स्लाइड — भाग 2 · इंटरैक्टिव — 2. इब्न बतूता का रिह्ला

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी इब्न बतूता की यात्रा का क्रम बता सके, भारत में उसके काम गिना सके, और समझा सके कि उसका रिह्ला किसने और कैसे लिखा।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, विश्व का मानचित्र, तीन यात्रियों वाला चार्ट, और रास्ते की मुश्किलों वाले चित्र के लिए एक नया चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने किताब–उल–हिन्द की बनावट लिखते हुए “सामान्यत:” छोड़ दिया, उन्हें याद दिलाइए कि हर अध्याय इसी क्रम में नहीं चलता।

  2. 5–12 मिनट · इब्न बतूता कौन था। पृष्ठ 118 पढ़िए। बोर्ड पर लिखवाइए: वह मोरक्को के तैंजियर के एक सम्मानित और शिक्षित परिवार से था, जो इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था; और वह पुस्तकों की जगह यात्राओं से मिले अनुभव को ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था। फिर स्रोत 2 पढ़िए। वह तैंजियर से अकेला निकला, बिना किसी साथी या कारवाँ के, और लिखता है: “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।” तीन यात्रियों वाले चार्ट में उसकी पंक्ति में जोड़िए: ज्ञान का स्रोत, यात्रा का अनुभव।

  3. 12–22 मिनट · यात्रा और दिल्ली। पृष्ठ 118–119 पढ़िए और विश्व के मानचित्र पर क्रम दिखाइए। भारत आने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ, और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था। 1332–33 में वह भारत के लिए निकला, 1333 में मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा, और मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली गया। सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसे दिल्ली का क़ाज़ी या न्यायाधीश बनाया। कई वर्ष बाद वह सुल्तान का विश्वास खो बैठा और कारागार में डाला गया; ग़लतफ़हमी दूर होने पर 1342 ई. में सुल्तान ने उसे अपने दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया। रास्ते में मालद्वीप में वह अठारह महीने क़ाज़ी रहा। 1347 में उसने घर लौटने का निश्चय किया। फिर किताब का मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) खोलिए और लाल रेखा पर जगहें क्रम से पढ़वाइए: लाहरी, ऊजा, मुल्तान, अजुदाहन, अबुहर, सरसती, हंसी, देहली। इस मानचित्र पर पैमाना नहीं है, इसलिए इससे दूरी मत निकलवाइए।

  4. 22–30 मिनट · रास्ते की मुश्किलें। पृष्ठ 119 और “एकाकी यात्री” वाला बॉक्स पढ़िए, फिर नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए। दिन किताब की तरह शब्दों में लिखिए। फिर पृष्ठ 119 का किनारे का प्रश्न पूछिए; बच्चे अपनी किताब में चित्र 5.4 देखें: “आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं?” नमूना उत्तर — चित्र 5.4 बंगाल के एक मंदिर की मृण मूर्तिकला है (लगभग सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियाँ), जिसमें नाव में यात्री हैं।

    • रास्ते असुरक्षित थे: किताब के अनुसार यात्रा कठिन और जोखिम भरी थी, और इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के समूहों के हमले झेले।
    • कारवाँ भी सुरक्षित नहीं था: साथियों के साथ कारवाँ में चलने पर भी मुल्तान से दिल्ली के रास्ते उसके कारवाँ पर हमला हुआ; कई साथी यात्री मारे गए, और जो बचे वे बुरी तरह घायल हुए।

    इसलिए शायद यात्री अपनी और अपने सामान की रक्षा के लिए हथियार साथ रखते थे।

  5. 30–36 मिनट · रिह्ला कैसे लिखा गया। पृष्ठ 120–121 पढ़िए। मोरक्को लौटने पर वहाँ के शासक ने निर्देश दिया कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ, और इब्न जुज़ाई ने उसके बोले हुए वृत्तांत लिखे (स्रोत 3)। फिर पृष्ठ 121 का बॉक्स “इब्न बतूता के पदचिह्नों पर” पढ़कर तीन नाम बोर्ड पर लिखिए: अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी, जिसने 1440 के दशक में दक्षिण भारत की यात्रा की; महमूद वली बल्खी, जिसने 1620 के दशक में ख़ूब यात्राएँ कीं और कुछ समय के लिए संन्यासी भी बना; और शेख़ अली हाज़िन, जो 1740 के दशक में उत्तर भारत आया और भारत से निराश हुआ। आख़िर में पृष्ठ 121 की चर्चा पूछिए: “आपके विचार में अल–बिरूनी और इब्न बतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान/भिन्न थे?” नमूना उत्तर — दोनों ने उपमहाद्वीप के बारे में लिखा, पर दोनों के उद्देश्य और तरीक़े अलग थे।

    • अल–बिरूनी: स्रोत 1 में उसका उद्देश्य हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता करना और सूचना का संग्रह देना है। इसके लिए उसने संस्कृत सीखी और ग्रंथ पढ़े।
    • इब्न बतूता: वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था। शासक के निर्देश पर लिखा गया उसका वृत्तांत ऐसा कथानक बना “जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी।”
    • समानता: दोनों बाहर से आए, और अपनी जानी-पहचानी दुनिया से तुलना करते हुए नई दुनिया का वर्णन करते रहे।

    यानी एक का ज़ोर समझाने पर था, दूसरे का दिखाने और सुनाने पर।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) इब्न बतूता ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत किसे मानता था? (2) रिह्ला किसने लिखा, और किसके निर्देश पर?

रास्ते की मुश्किलें (चरण 4)

रास्ते की मुश्किलें

लंबे रास्तेदिनों में नापी दूरीमुल्तान से दिल्ली चालीस दिन; सिंध से दिल्ली लगभग पचास दिन
डाकूकारवाँ पर हमलामुल्तान से दिल्ली के रास्ते; कई साथी मारे गए
बीमारीपहले ज्वर, फिर कमज़ोरीगिरने से बचने के लिए पगड़ी का कपड़ा ज़ीन से बाँधा
अकेलापनट्यूनिस मेंकिसी ने अभिवादन नहीं किया; वह "बहुत रोया"
घर वापसी1354 मेंयात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद
NCERT, पृष्ठ 118–120

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
परिवारतैंजियर (मोरक्को) का सम्मानित और शिक्षित परिवार, शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध118
ज्ञान का स्रोतपुस्तकों की जगह यात्राओं से मिला अनुभव118
भारत की ओर1332–33 में निकला; 1333 में स्थलमार्ग से सिंध; मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली118
दिल्ली मेंमुहम्मद बिन तुग़लक ने क़ाज़ी बनाया; फिर कारागार; 1342 ई. में सुल्तान के दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश118
घर वापसी1347 में लौटने का निश्चय; 1354 में घर, यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद118–119
रास्तेमुल्तान से दिल्ली चालीस दिन; डाकू, बीमारी और अकेलापन119–120
रिह्लाअरबी में; शासक के निर्देश पर इब्न जुज़ाई ने उसके बोले हुए वृत्तांत लिखे120–121

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • वह सुल्तान का दूत था। 1342 ई. में मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसे अपने दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया। बच्चे अक्सर लिख देते हैं कि वह चीन का दूत बनकर दिल्ली आया; बोर्ड पर तीर से दिखाइए कि वह दिल्ली से चीन की ओर गया।
  • पगड़ी कमज़ोरी के कारण बाँधी गई। बॉक्स में पहले ज्वर आता है, फिर कमज़ोरी, और गिरने से बचने के लिए पगड़ी का कपड़ा ज़ीन से बाँधा गया।
  • रिह्ला इब्न बतूता ने ख़ुद नहीं लिखा। उसने वृत्तांत बोले, और इब्न जुज़ाई ने लिखे।
  • मानचित्र 1 से दूरी नहीं निकलती। हिंदी किताब के मानचित्र पर लिखा है: “रेखाचित्र / पैमाना नहीं दिया गया है।” यात्रा का समय पृष्ठ 119 के दिनों से बताइए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. इब्न बतूता का रिह्ला खोलिए, और यात्रा वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: सिंध से दिल्ली जाते हुए वह किन दो शहरों से होकर गया?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: इब्न बतूता कारवाँ में चलना पसंद करता था, फिर भी उसके कारवाँ पर हमला हुआ। तो लोग कारवाँ में क्यों चलते होंगे? (अकेले के मुक़ाबले समूह में सुरक्षा और मदद ज़्यादा थी; “एकाकी यात्री” वाला बॉक्स यह भी दिखाता है कि अकेलापन अपने आप में एक कठिनाई था।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) पुस्तकों की जगह यात्राओं से मिले अनुभव को। (2) इब्न जुज़ाई ने, इब्न बतूता के बोले हुए वृत्तांत से; मोरक्को लौटने पर स्थानीय शासक के निर्देश पर।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क4, क5, क6, ख3, ख4 और ग3; जो आगे हैं, वे च2 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 28–51।

कालांश 3 — 3. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक (3.1)

किताब — पृष्ठ 122–123 · स्लाइड — भाग 3 · इंटरैक्टिव — 3. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि बर्नियर से पहले और उसके समय में कौन-से यूरोपीय भारत आए, बर्नियर कौन था, वह भारत को किस नज़र से देखता था, और उसकी किताबें यूरोप में कैसे फैलीं।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, विश्व का मानचित्र और तीन यात्रियों वाला चार्ट।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की पर्चियों में से वे पढ़िए जिनमें लिखा है कि रिह्ला इब्न बतूता ने ख़ुद लिखा। सही उत्तर साथ में बोलिए: इब्न जुज़ाई ने लिखा।

  2. 5–12 मिनट · बर्नियर से पहले के यूरोपीय। पृष्ठ 122 का पहला अनुच्छेद पढ़िए और नीचे का चित्र बोर्ड पर बनाइए। लगभग 1500 ई. में पुर्तगालियों के आने के बाद उनमें से कई ने भारतीय रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत लिखे। 1600 ई. के बाद डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी।

  3. 12–20 मिनट · बर्नियर कौन था। पृष्ठ 122 आगे पढ़िए। बोर्ड पर लिखवाइए: फ्रांस का रहने वाला चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार, जो कई और लोगों की तरह मुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया; वह 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में रहा; पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक रहा, बाद में मुग़ल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में। तीन यात्रियों वाले चार्ट में उसकी पंक्ति में जोड़िए: भारत में बारह वर्ष, मुग़ल दरबार के पास।

  4. 20–28 मिनट · “पूर्व” और “पश्चिम” की तुलना। भाग 3.1 पढ़िए। बर्नियर भारत में जो देखता था, उसकी तुलना सामान्यत: यूरोप की स्थिति से करता था। उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक को समर्पित की, और उसके कई कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को लिखे पत्रों के रूप में थे। फिर किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।” साथ में किताब की यह बात भी कहिए कि उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था। फिर पृष्ठ 123 से छपाई की कहानी: उसके कार्य फ्रांस में 1670–71 में छपे, अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में अनूदित हुए, 1670 और 1725 के बीच फ्रांसीसी में आठ बार और 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार दोबारा छपे। इसके उलट अरबी और फ़ारसी के वृत्तांत हस्तलिपियों के रूप में फैलते थे, और 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे।

  5. 28–35 मिनट · स्रोत 4: मुग़ल सेना के साथ यात्रा। स्रोत 4 साथ पढ़िए। कश्मीर कूच में देश की प्रथा के अनुसार उससे “दो अच्छे तुर्कमान घोड़े देखने” की अपेक्षा की जाती थी, यानी उसे ऐसे दो घोड़े रखने होते थे; साथ में एक फ़ारसी ऊँट और चालक, साईस, खानसामा और पानी का पात्र लेकर आगे चलने वाला सेवक था। आख़िरी वाक्य ज़ोर से पढ़िए: “इस देश में नींबू के शरबत और दही से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती।” फिर स्रोत के साथ छपा प्रश्न पूछिए: “बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौन सी वस्तुएँ हैं जो आज आप यात्रा में साथ ले जाएँगे?” नमूना उत्तर — उत्तर हर बच्चे की अपनी पसंद पर है, पर चुनाव स्रोत 4 की सूची में से हो।

    • सामान: औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश, खाना बनाने के सामान के झोले, और पानी का पात्र।
    • खाना-पीना: पाँच या छह दिनों के उपभोग के लिए बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला।

    जो चीज़ें चुनें, उनके साथ एक-एक कारण लिखिए कि आज की यात्रा में वे क्यों काम आएँगी।

  6. 35–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) बर्नियर भारत में कितने वर्ष रहा, और मुग़ल दरबार में किन दो लोगों के साथ रहा? (2) बर्नियर भारत की तुलना किससे करता था, और किताब के अनुसार उसका नतीजा क्या निकलता था?

बर्नियर से पहले और साथ के यूरोपीय (चरण 2)

बर्नियर से पहले और साथ के यूरोपीय

लगभग 1500 ई. के बादपुर्तगालीभारतीय रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत
  • जेसुइट रॉबर्टो नोबिली जैसे लोग: भारतीय ग्रंथों के यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद
  • दुआर्ते बरबोसा: दक्षिण भारत के व्यापार और समाज का विस्तृत विवरण
तैवर्नियरफ्रांसीसी जौहरीकम से कम छह बार भारत आया; भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की
मनूकीइतालवी चिकित्सकयूरोप नहीं लौटा, भारत में ही बस गया
बर्नियरफ्रांस का चिकित्सक1656 से 1668 तक भारत में
NCERT, पृष्ठ 122

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
पुर्तगालीलगभग 1500 ई. के बाद; रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत122
1600 ई. के बादडच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्री बढ़े, जैसे फ्रांसीसी जौहरी तैवर्नियर; इतालवी चिकित्सक मनूकी भी आया और यहीं बस गया122
बर्नियरफ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार; 1656 से 1668 तक, बारह वर्ष भारत में122
मुग़ल दरबार मेंपहले दारा शिकोह का चिकित्सक; फिर दानिशमंद ख़ान के साथ122
तुलनाभारत की तुलना यूरोप से; लगभग हर दृष्टांत में भारत की स्थिति “दयनीय” बताई122
छपाईफ्रांस में 1670–71; अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में123
अरबी और फ़ारसी वृत्तांतहस्तलिपियों में फैले; 1800 से पहले सामान्यत: छपे नहीं123

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • दारा शिकोह और दानिशमंद ख़ान को मिलाइए मत। पहले वह शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक था; बाद में आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में रहा।
  • “दयनीय” बर्नियर की राय है। बोर्ड पर उसकी राय के आगे बर्नियर के अनुसार लिखकर ही रखिए। किताब ख़ुद कहती है कि उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था; यह बात कालांश 6 और 7 में खुलेगी।
  • छपाई के साल आपस में मिल जाते हैं। 1670–71 पहली छपाई है; 1670 से 1725 के बीच फ्रांसीसी में आठ बार; 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार। तीनों अलग पंक्तियों में लिखवाइए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 3. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक खोलिए, और छपाई वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: अगले पाँच वर्षों में उसके कार्य किन भाषाओं में अनूदित हुए?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ 3, 4 और 5 काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: बर्नियर की किताबें छपकर कई भाषाओं में फैलीं, जबकि अरबी और फ़ारसी के वृत्तांत हस्तलिपियों में रहे। इसका यूरोप में भारत की छवि पर क्या असर पड़ा होगा? (पृष्ठ 123 का बॉक्स कहता है कि यूरोपीय यात्रियों की छपी किताबों ने यूरोप के लोगों के लिए भारत की एक छवि बनाई; 1750 के बाद यूरोप गए शेख इतिसमुद्दीन और मिर्ज़ा अबु तालिब को इसी छवि का सामना करना पड़ा, और उन्होंने तथ्यों की अपनी व्याख्या से इसे बदलने की कोशिश की।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) बारह वर्ष, 1656 से 1668 तक; पहले दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में, फिर दानिशमंद ख़ान के साथ। (2) यूरोप की स्थिति से; लगभग हर दृष्टांत में उसने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क7, क8, ख5 और ग4; जो आगे हैं, वे घ6 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 52–66।

कालांश 4 — 4. एक अपरिचित संसार की समझ (4.1-4.2)

किताब — पृष्ठ 124–125 · स्लाइड — भाग 4 · इंटरैक्टिव — 4. एक अपरिचित संसार की समझ

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी अल–बिरूनी के तीन अवरोध गिना सके, बता सके कि उसने जाति व्यवस्था को किन ग्रंथों और तुलनाओं से समझाया, अपवित्रता पर उसका तर्क लिख सके, और उसके विवरण की सीमा बता सके।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और किनारे के प्रश्न के लिए अध्याय 3 का स्रोत 6, हो सके तो उसकी एक प्रति।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की पर्चियों में से दो पढ़िए: एक जिसमें बर्नियर की तुलना ठीक लिखी है, और एक जिसमें “दयनीय” को किताब की अपनी राय लिख दिया गया है। फ़र्क़ बोर्ड पर दिखाइए।

  2. 5–13 मिनट · तीन अवरोध। पृष्ठ 124 पढ़िए। यात्री उपमहाद्वीप में जो देखते थे, सामान्यत: उसकी तुलना उन प्रथाओं से करते थे जिनसे वे परिचित थे। अल–बिरूनी ने समझने के रास्ते में तीन अवरोध गिनाए: भाषा, क्योंकि संस्कृत अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों का अनुवाद आसान नहीं था; धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता; और अभिमान। संस्कृत वाले बॉक्स से जोड़िए: एक ही वस्तु के लिए कई शब्द होते हैं, और एक ही शब्द कई वस्तुओं के लिए। फिर पृष्ठ 125 की चर्चा पूछिए: “एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान कितना आवश्यक है?” नमूना उत्तर — बहुत आवश्यक, यह अल–बिरूनी के अनुभव से साफ़ है।

    • पहला अवरोध भाषा: अल–बिरूनी ने समझने की बाधाओं में पहला अवरोध भाषा को माना।
    • भाषा सीखने का फल: उसने संस्कृत सीखी, कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, और किताब–उल–हिन्द लिख सका।
    • भाषा की बारीकी: संस्कृत में एक ही वस्तु के कई शब्द, और एक शब्द के कई अर्थ; भाषा जाने बिना ऐसी बारीकियाँ छूट जाती हैं।

    भाषा न जानने वाला यात्री दूसरों के बताए पर निर्भर रहता है।

  3. 13–19 मिनट · ग्रंथ और सुनी हुई बातें। इन अवरोधों को जानते हुए भी अल–बिरूनी लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा, और वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत करता था। फिर “ईश्वर ही जानता है!” वाला बॉक्स पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। बच्चों से पूछिए कि अल–बिरूनी ने कहानी पर सवाल किस आधार पर उठाया।

  4. 19–28 मिनट · जाति व्यवस्था का विवरण। भाग 4.2 पढ़िए। अल–बिरूनी ने दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजकर जाति व्यवस्था को समझाने का प्रयास किया: प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्ग थे, और इस्लाम में सभी लोग समान माने जाते थे, उनमें भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में थी। फिर स्रोत 5 किताब से वैसा ही पढ़िए जैसा छपा है, और बताइए कि यह विवरण ग्रंथों के आधार पर है। स्रोत की आख़िरी बात बोर्ड पर लिखिए: वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुलकर रहते हैं। फिर अपवित्रता पर उसका तर्क: जो वस्तु अपवित्र होती है, वह अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है; सूर्य हवा को स्वच्छ करता है, और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता, इसलिए उसके अनुसार अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।

  5. 28–36 मिनट · विवरण की सीमा। पृष्ठ 125 पढ़िए। उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित था, और इन ग्रंथों में नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे; वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी। अंत्यज (शाब्दिक अर्थ, “व्यवस्था से परे”) कहलाने वालों से किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी; वे अक्सर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र में शामिल थे। फिर पृष्ठ 125 का किनारे का प्रश्न पूछिए, जैसा छपा है: “अल-बिरूनी ने जो लिखा उसकी तुलना अध्याय 3 स्रोत 6 से कीजिए। क्या आप कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं? क्या आप को लगता है कि अल-बिरूनी भारतीय समाज के विषय में अपनी जानकारी और समझ के लिए केवल संस्कृत के ग्रंथों पर आश्रित रहा?” नमूना उत्तर — काफ़ी हद तक ग्रंथों पर, पर केवल ग्रंथों पर नहीं।

    • तुलना कैसे करें: अध्याय 3 का स्रोत 6 और इस अध्याय का स्रोत 5 साथ रखिए; दोनों में वर्णों की गिनती, उनकी उत्पत्ति की कथा और उनके बारे में कही बातें आमने-सामने लिखिए। जो मिलती हैं वे समानताएँ, जो नहीं मिलतीं वे भिन्नताएँ।
    • ग्रंथों पर कितना आश्रित: किताब के अनुसार वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा।
    • पर केवल ग्रंथ नहीं: उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए, और लगता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा भी की।

    इसलिए उसकी समझ ज़्यादातर ग्रंथों से बनी, पर उसमें विद्वानों से बातचीत और यात्रा का अनुभव भी जुड़ा था।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) अल–बिरूनी के तीन अवरोध कौन-से थे? (2) उसने अपवित्रता की मान्यता को किस तर्क से नहीं माना?

सुनी बात की जाँच (चरण 3)

सुनी बात की जाँच

सुनी कहानीलकड़ी की एक मूर्तिकथित रूप से 216,432 वर्षों तक बची रही
जाँचहवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्रऐसी जगह लकड़ी इतने लंबे समय तक कैसे बची रही होगी?
नतीजा"ईश्वर ही जानता है!"यात्री हर सुनी बात पर विश्वास नहीं करते थे
NCERT, पृष्ठ 124

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
तुलना की आदतयात्री जो देखते थे, सामान्यत: उसकी तुलना जानी-पहचानी प्रथाओं से करते थे124
तीन अवरोधभाषा; धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता; अभिमान124
किन पर आश्रितलगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियाँ: वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियाँ, मनुस्मृति124
दूसरे समाजों से तुलनाप्राचीन फ़ारस के चार सामाजिक वर्ग; इस्लाम में सब समान124
स्रोत 5ग्रंथों के आधार पर चार वर्णों का विवरण; वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुलकर रहते हैं125
अपवित्रतानहीं मानी: उसके अनुसार यह मान्यता प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी124–125
सीमानियामक संस्कृत ग्रंथ, ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से; असल जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं125

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • स्रोत 5 ग्रंथों का विवरण है। बच्चे इसे उस समय के समाज का सीधा चित्र मान लेते हैं। किताब कहती है कि ये नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे, और वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी।
  • उसने ब्राह्मणवादी व्याख्या मानी, पर अपवित्रता की मान्यता नहीं। बच्चे दोनों बातें एक कर देते हैं; बोर्ड पर दोनों अलग पंक्तियों में लिखिए।
  • बात स्रोत के शब्दों तक रखिए। इस कालांश में किसी बच्चे से उसकी जाति मत पूछिए, और वर्णों पर कोई खेल या भूमिका मत करवाइए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 4. एक अपरिचित संसार की समझ खोलिए, और अवरोधों वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: अल–बिरूनी के अनुसार पहला अवरोध क्या था?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ 2, 3 और 7 काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: अल–बिरूनी ने भारत की बात करते हुए प्राचीन फ़ारस का उदाहरण क्यों दिया होगा? (किताब के अनुसार वह दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजकर जाति व्यवस्था समझाना चाहता था; इससे दिखता है कि ऐसे सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) भाषा; धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता; और अभिमान। (2) हर अपवित्र वस्तु अपनी पवित्रता फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है, जैसे सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है; ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता, इसलिए यह मान्यता प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क9, क10, घ1 और घ3; जो आगे हैं, वे च1 और छ1 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 67–78।

कालांश 5 — 5. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा (5.1-5.3)

किताब — पृष्ठ 126–129 · स्लाइड — भाग 5 · इंटरैक्टिव — 5. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि इब्न बतूता ने नारियल और पान जैसी अनजानी चीज़ें किन तुलनाओं से समझाईं, उसे भारत के शहरों और बाज़ारों में क्या दिखा, और डाक व्यवस्था ने उसे क्यों चकित किया।

साथ ले जाइए — किताब, हो सके तो एक नारियल और पान का एक पत्ता, उपमहाद्वीप का मानचित्र (दिल्ली, दौलताबाद और सिंध ढूँढ़ने के लिए), और तीन यात्रियों वाला चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की पर्चियों में से वे पढ़िए जिनमें अल–बिरूनी के तीनों अवरोध ठीक लिखे हैं। फिर पूछिए: अल–बिरूनी ने अनजाने समाज को ग्रंथों से समझा; जो यात्री अपनी आँखों से देखी चीज़ को ज़्यादा मानता था, वह अनजानी चीज़ अपने पाठकों को कैसे समझाता?

  2. 5–10 मिनट · एक जुड़ी हुई दुनिया। पृष्ठ 126 का पहला अनुच्छेद पढ़िए। चौदहवीं शताब्दी तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा था जो पूर्व में चीन से पश्चिम में उत्तर-पश्चिमी अफ़्रीका और यूरोप तक फैला था। शहरों में अरबी, फ़ारसी, तुर्की और दूसरी भाषाएँ बोलने वाले लोग विचार, सूचनाएँ और उपाख्यान आपस में बाँटते थे। बोर्ड पर किताब का यह वाक्य लिखिए: “जो भी कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था।” किताब के अनुसार ऐसा इसलिए होता था कि सुनने और पढ़ने वाले दूर के देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हों।

  3. 10–19 मिनट · नारियल और पान (स्रोत 6 और 7)। किताब कहती है कि ये दोनों उपज इब्न बतूता के पाठकों के लिए “पूरी तरह से अपरिचित” थीं। दोनों स्रोत साथ पढ़िए। नारियल और पान का पत्ता लाए हैं तो मेज़ पर रखिए। फिर नीचे का चित्र बोर्ड पर बनाइए और दोनों किनारे के प्रश्न पूछिए। पहला प्रश्न, जैसा छपा है: “किस तरह की तुलनाओं से इब्न बतूता अपने पाठकों को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नारियल देखने में कैसे होते हैं?” इसी के साथ किताब पूछती है कि क्या ये तुलनाएँ वाजिब हैं, और वर्णन कितना सटीक है। नमूना उत्तर — वह दो तुलनाएँ करता है, और फिर उपयोग बताकर नारियल को असाधारण दिखाता है।

    • पेड़ की तुलना: नारियल के पेड़ “हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं”; अंतर बस इतना है कि एक से काष्ठफल मिलता है और दूसरे से खजूर।
    • फल की तुलना: फल मानव सिर से मेल खाता है: मानो दो आँखें और एक मुख, अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा, और रेशा बालों जैसा।
    • असाधारण कैसे: वह इन्हें प्रकृति में सबसे विस्मयकारी वृक्षों में से एक कहता है, और बताता है कि रेशे से रस्सी बनती है और लोहे की कीलों के बजाय जहाज़ सिले जाते हैं।
    • कितना सटीक: यह हिस्सा बच्चे ख़ुद जाँचें: असली नारियल हाथ में लेकर देखें कि कौन-सी तुलना ठीक बैठती है। यह जाँच हमारी ओर से है।

    दूसरा प्रश्न, स्रोत 7 के नीचे: “आपके विचार में इसने इब्न बतूता का ध्यान क्यों खींचा? क्या आप इस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहेंगे?” नमूना उत्तर — क्योंकि पान उसके पाठकों के लिए बिल्कुल नई चीज़ थी, और उस समय के वृत्तांतों में अपरिचित बातें ख़ास तौर पर उभारी जाती थीं।

    • ऐसा पौधा जिसका कोई फल नहीं होता, और जिसे केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है।
    • खाने का अनोखा तरीका: पहले सुपारी के छोटे-छोटे टुकड़े करके चबाना, फिर पान की पत्तियों के साथ।
    • जोड़ने के लिए बच्चे अपने इलाक़े की बात लिख सकते हैं, जैसे पान कहाँ मिलता है और किन मौक़ों पर खाया जाता है। यह हिस्सा हर बच्चे का अपना होगा।
  4. 19–28 मिनट · शहर और बाज़ार। पृष्ठ 127–128 पढ़िए। शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे, सिवाय उनके जो कभी-कभी युद्धों और अभियानों में उजड़ जाते थे। इब्न बतूता दिल्ली को भारत का सबसे बड़ा शहर बताता है, और दौलताबाद (महाराष्ट्र में) आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। मानचित्र पर दोनों दिखाइए। फिर स्रोत 8 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए, जैसा छपा है: “स्थापत्य के कौन से अभिलक्षणों पर इब्न बतूता ने ध्यान दिया?” किताब साथ में कहती है कि इस वर्णन की तुलना चित्र 5.8 और 5.9 से कीजिए; किताब के चित्र 5.8 और 5.9 देखिए। नमूना उत्तर — शहर की प्राचीर, उसके द्वारों और क़ब्रगाह पर।

    • प्राचीर: दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ; भीतर पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष, और खाद्यसामग्री और हथियारों के भंडारगृह; शहर की ओर खुलती खिड़कियाँ; निचला भाग पत्थर का और ऊपरी भाग ईंटों का; पास-पास बनी कई मीनारें।
    • द्वार: अट्ठाईस द्वार, जिन्हें दरवाज़ा कहा जाता है; बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल।
    • क़ब्रगाह: क़ब्रों के ऊपर गुंबद, और जिन पर गुंबद नहीं, उन पर मेहराब।
    • चित्रों से तुलना (किताब का प्रश्न): चित्र 5.8 तुग़लक़ाबाद, दिल्ली का एक मेहराब है और चित्र 5.9 बस्ती की किलेबंदी की दीवार का एक हिस्सा। चित्रों में पत्थर का नुकीला मेहराबदार द्वार और गोल बुर्जों वाली लंबी किलेबंद दीवार दिखती है, जो वर्णन के प्राचीर, मीनारों और द्वारों से मेल खाती है; दीवार के भीतर के कक्ष और भंडारगृह, अट्ठाईस द्वार और ईंटों का ऊपरी भाग चित्रों में नहीं दिखते।

    अब पृष्ठ 128 का बाज़ार वाला अनुच्छेद और स्रोत 9 पढ़िए। किनारे का प्रश्न: “अपने वर्णन में इब्न बतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?” नमूना उत्तर — क्योंकि ये उसके पाठकों के लिए नई और ध्यान खींचने वाली बातें थीं, और इनसे बाज़ार की एक जीती-जागती तसवीर बनती थी।

    • किताब के अनुसार बाज़ार सिर्फ़ लेन-देन की जगह नहीं थे; वे सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे।
    • दौलताबाद के ताराबबाद बाज़ार में सजी हुई दुकानें, झूले पर बैठी गायिका, और हर गुरुवार सुबह की इबादत के बाद गुंबद में संगीतकारों के प्रमुख का आना: यह सब वह बारीकी से दर्ज करता है।
    • वह बताता है कि एक हिंदू शासक और कई मुस्लिम शासक भी यहाँ गान सुनते थे।
  5. 28–36 मिनट · डाक की अनूठी प्रणाली। पृष्ठ 129 पढ़िए। लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह थे। डाक से व्यापारी दूर तक सूचना भेज सकते थे, उधार भेज सकते थे, और अल्प सूचना पर माल भी। किताब का उदाहरण बोर्ड पर लिखिए: “सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे”, जबकि गुप्तचरों की ख़बरें इस डाक से सुलतान तक मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं। फिर स्रोत 10 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “क्या आपको लगता है कि पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?” नमूना उत्तर — शायद नहीं; किताब इसका सीधा उत्तर नहीं देती, इसलिए यह तर्क से निकाली गई राय है।

    • पैदल डाक के लिए हर दावा पर, यानी हर एक-तिहाई मील पर, तैयार बैठे लोग चाहिए थे। यह बहुत लोगों और पक्के इंतज़ाम का काम था। स्रोत 10 में आगे “हर तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव” भी छपा है, जो एक–तिहाई मील वाली बात से मेल नहीं खाता; अंग्रेज़ी किताब में यहाँ गाँव हर एक–तिहाई मील पर है। बच्चा पूछे तो यही बताइए।
    • इब्न बतूता ने इसे सुल्तान के राज्य में देखा, जहाँ गुप्तचरों की ख़बरें इसी से सुलतान तक पहुँचती थीं।
    • जहाँ आबादी कम हो या रास्ते कठिन हों, वहाँ ऐसा जाल बनाना और चलाना मुश्किल रहा होगा।

    आख़िर में पृष्ठ 129 की चर्चा पूछिए: “इब्न बतूता लोगों के लिए ऐसी वस्तुओं और स्थितियों के वर्णन की समस्या को कैसे हल करता था, जिनसे वे अनभिज्ञ थे और जिन्हें उन्होंने अनुभव नहीं किया था?” नमूना उत्तर — अनजानी चीज़ को किसी जानी-पहचानी चीज़ से जोड़कर, और बारीक ब्योरे देकर।

    • तुलना: नारियल का पेड़ खजूर जैसा, फल मानव सिर जैसा; पान अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है, सुपारी जायफल जैसी।
    • गिनती और माप: दिल्ली की दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी, अट्ठाईस द्वार; घोड़ों की डाक हर चार मील पर।
    • काम कैसे होता है: नारियल के रेशे से रस्सी; पान खाने का क्रम; घंटियों वाली छड़ लेकर एक दावा से अगले तक दौड़ता संदेशवाहक।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) इब्न बतूता ने नारियल और पान समझाने के लिए किन-किन चीज़ों से तुलना की? (2) डाक व्यवस्था कितनी कुशल थी, इसका किताब कौन-सा उदाहरण देती है?

जाने-पहचाने से अनजाने तक (चरण 3)

जाने-पहचाने से अनजाने तक

नारियलपेड़ खजूर के पेड़ जैसा, फल मानव सिर जैसामानो दो आँखें और मुख; अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा; रेशा बालों जैसा (स्रोत 6)
पानअंगूर-लता की तरह उगाया जाता है, सुपारी जायफल जैसीकोई फल नहीं, केवल पत्तियों के लिए; सुपारी के टुकड़े पत्तियों के साथ चबाए जाते हैं (स्रोत 7)
इब्न बतूता का तरीकाअनजानी चीज़ को किसी जानी-पहचानी चीज़ से जोड़ना
NCERT, पृष्ठ 126

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
वैश्विक संचार तंत्रचौदहवीं शताब्दी तक उपमहाद्वीप चीन से उत्तर-पश्चिमी अफ़्रीका और यूरोप तक फैले तंत्र का हिस्सा126
नारियल (स्रोत 6)पेड़ खजूर जैसा; फल मानव सिर जैसा; रेशे से रस्सी, और जहाज़ सिलने में126
पान (स्रोत 7)अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है; फल नहीं होता; सुपारी जायफल जैसी126
शहरघनी आबादी, समृद्ध; दिल्ली भारत में सबसे बड़ा; दौलताबाद आकार में दिल्ली को चुनौती देता था127
दिल्ली (स्रोत 8)दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी; अट्ठाईस द्वार; बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल127
बाज़ारज़्यादातर में एक मस्जिद और एक मंदिर; कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के प्रदर्शन की जगह128
खेती और व्यापारउपजाऊ मिट्टी, वर्ष में दो फसलें; भारतीय माल की मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में माँग128
डाक (स्रोत 10)उलुक: हर चार मील पर राजकीय घोड़े; पैदल डाक: प्रति मील तीन अवस्थान (दावा), और यह ज़्यादा तेज़129

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • नारियल को मानव सिर जैसा बताने को मज़ाक़ समझना। यह इब्न बतूता का समझाने का तरीका था। उसके पाठकों ने नारियल कभी देखा ही नहीं था; जिसने चीज़ देखी न हो, उसके मन में तसवीर किसी जानी-पहचानी शक्ल से ही बनती है।
  • पैदल डाक घोड़े से तेज़। बच्चे मानते हैं कि घोड़ा हमेशा तेज़ होगा। स्रोत 10 साफ़ कहता है कि पैदल डाक अश्व डाक से अधिक तीव्र होती है। कारण बच्चों से ही निकलवाइए: हर एक-तिहाई मील पर नया धावक पूरी ताक़त से दौड़ता था, इसलिए शायद कोई थककर धीमा नहीं पड़ता था।
  • अब्दुर रज़्ज़ाक़ ने भारत को सिर्फ़ “विचित्र” नहीं कहा। पृष्ठ 129 के बॉक्स में उसका 1440 के दशक का वृत्तांत है। कालीकट में उसने जो देखा, वह उसे अच्छा नहीं लगा, पर मंगलौर के पास एक मंदिर ने उसे प्रशंसा से भर दिया: सोने की आदमकद मूर्ति, आँखों में माणिक, और उसके शब्द “इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने!” एक ही यात्री में दोनों भाव हैं।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 5. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा खोलिए, और नारियल-पान वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: इब्न बतूता ने पान को किस पौधे से जोड़ा, और क्यों?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ 2, 3 और 8 काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 8 में दीवार की चौड़ाई “हाथ” में है, और किताब ने उसके साथ कोष्ठक में क्या लिखा है? यह कोष्ठक आज के पाठक के लिए वही काम कैसे करता है जो इब्न बतूता की तुलनाएँ अपने पाठकों के लिए करती थीं? (कोष्ठक में लिखा है कि एक हाथ लगभग 20 इंच के बराबर है। पुरानी इकाई को आज की जानी-पहचानी इकाई से जोड़ना भी अनजाने को जाने-पहचाने से समझाना है।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) नारियल के पेड़ की खजूर के पेड़ से और फल की मानव सिर से; पान की अंगूर-लता से, और सुपारी की जायफल से। (2) “सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे”, पर गुप्तचरों की ख़बरें डाक से सुलतान तक मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क11, क12, क13, क14, ख6, ग5, ग6, घ4 और घ5; जो आगे हैं, वे ङ2, ङ3, च3 और छ2 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 79–105।

कालांश 6 — 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व: 6.1 भूमि स्वामित्व का प्रश्न

किताब — पृष्ठ 130–133 · स्लाइड — भाग 6 · इंटरैक्टिव — 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि बर्नियर भारत को किस नज़र से देखता था, भूमि स्वामित्व पर उसका तर्क क्या था, और किताब किन बातों के आधार पर उस तर्क को नहीं मानती।

साथ ले जाइए — किताब, तीन यात्रियों वाला चार्ट पेपर, और कल का बोर्ड-कार्य (इब्न बतूता के शहर और बाज़ार), ताकि दोनों यात्रियों की नज़र की तुलना हो सके।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की दो-तीन पर्चियाँ पढ़िए जिनमें नारियल और पान की तुलनाएँ ठीक लिखी हैं। फिर पूछिए: इब्न बतूता हर अनोखी चीज़ से उत्सुक होता था; बर्नियर भारत में क्या ढूँढ़ रहा होगा?

  2. 5–12 मिनट · बर्नियर की नज़र। पृष्ठ 130 का पहला हिस्सा पढ़िए। बर्नियर एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था। वह भारत में जो देखता, उसकी तुलना यूरोप और ख़ास तौर पर फ्रांस से करता, और ख़ास तौर पर उन स्थितियों पर ध्यान देता जो उसे अवसादकारी लगीं। उसका विचार नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करने का था। बोर्ड पर लिखिए: उसका ग्रंथ ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर; वह सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करता है; उसका चित्रण द्वि-विपरीतता पर टिका है, जहाँ भारत यूरोप का “विपरीत” है; और भिन्नताओं को उसने पदानुक्रम में रखा, जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का लगे।

  3. 12–20 मिनट · भूमि स्वामित्व का तर्क। भाग 6.1 पढ़िए। बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच एक मूल भिन्नता थी: भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव। उसे लगा कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था और उसे अपने अमीरों में बाँटता था। किताब बताती है कि यह धारणा सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों में मिलती है। उसका तर्क बच्चों से क्रम में बुलवाइए: भूधारक भूमि अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे; इससे “बेहतर” भूधारकों का वर्ग नहीं उभरा, जैसा पश्चिमी यूरोप में उभरा; और नतीजा उसके अनुसार खेती का विनाश, किसानों का उत्पीड़न, और शासक वर्ग को छोड़ सबके जीवन स्तर में पतन था। फिर पृष्ठ 130 का पेलसर्ट वाला बॉक्स पढ़िए: सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आया एक डच यात्री, जो लोगों की व्यापक गरीबी देखकर बर्नियर की ही तरह अचंभित था।

  4. 20–28 मिनट · स्रोत 11 और स्रोत 12। स्रोत 11 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए, जैसा छपा है: “बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?” नमूना उत्तर — समस्याएँ कई थीं, और उसने उन्हें इस तरह चुना और जोड़ा कि उसका पक्ष मज़बूत हो।

    • ज़मीन: कई ग्रामीण अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत; खेती अच्छी नहीं, आबादी कम।
    • श्रमिकों का अभाव: कृषियोग्य भूमि का बड़ा हिस्सा बिना खेती के रह जाता था; कई श्रमिक गवर्नरों के बुरे व्यवहार से मर जाते थे।
    • लोभी स्वामी: माँग पूरी न कर पाने पर गरीबों से जीवन-निर्वहन के साधन छिन जाते थे, और उनके बच्चों को दास बनाकर ले जाया जाता था।
    • नतीजा: इस निरंकुशता से हताश होकर किसान गाँव छोड़कर चले जाते थे।

    हाँ, यह विवरण उसके पक्ष को मज़बूत करता: ज़्यादातर समस्याओं का कारण वह गवर्नरों और लोभी स्वामियों का बुरा व्यवहार बताता है, और अंत में इसे “अत्यंत निरंकुशता” कहता है। किताब ख़ुद बताती है कि यह विवरण यूरोप में उन लोगों के लिए चेतावनी था जो निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को स्वीकार नहीं करते थे। पर तसवीर एकतरफ़ा है; उसी बर्नियर का बंगाल वाला वर्णन अगले कालांश में आएगा।

    अब स्रोत 12 पढ़िए और उसका किनारे का प्रश्न पूछिए: “बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है? जब आप अध्याय 8 तथा 9 पढ़ लें, तब आप इस विवरण पर फिर आइएगा और फिर इसका आकलन कीजिएगा।” नमूना उत्तर — यूरोप के शासकों को चेतावनी देकर: अगर उन्होंने मुग़ल ढाँचा अपनाया, तो उनके राज्यों का यही हाल होगा।

    • राज्य अच्छी तरह जुते और बसे हुए, समृद्ध और फलते-फूलते नहीं रह जाएँगे।
    • शासक “रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा” बनकर रह जाएँगे।
    • महान शहर “खराब हवा” के कारण रहने लायक़ नहीं रहेंगे, उजड़ जाएँगे और कोई उनकी मरम्मत की चिंता नहीं करेगा; खेत झाड़ियों और “घातक दलदल” से भर जाएँगे।

    आकलन अध्याय 8 और 9 के बाद कीजिए। अभी इतना कहा जा सकता है कि किताब के अनुसार असल ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर विभेद था, यानी तसवीर एक-सी नहीं थी (अगला चरण)।

  5. 28–36 मिनट · किताब की जाँच, और विचार आगे कहाँ गया। पृष्ठ 132 पढ़िए। किताब कहती है कि एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है, जो प्रजा की सुरक्षा के बदले की माँग प्रतीत होती है, न कि अपनी भूमि पर लगान। किताब के अनुसार यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था। फिर नीचे का चित्र बनाइए: बर्नियर के विचार को अठारहवीं शताब्दी में मॉन्टेस्क्यू ने और उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने आगे बढ़ाया, और आख़िर में किताब बताती है कि असल ग्रामीण समाज कैसा था।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नता क्या थी? (2) किताब किस आधार पर कहती है कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी नहीं था?

बर्नियर का विचार आगे किसने बढ़ाया (चरण 5)

बर्नियर का विचार आगे किसने बढ़ाया

बर्नियरसत्रहवीं शताब्दीमुग़ल साम्राज्य में निजी भूस्वामित्व नहीं, सारी भूमि सम्राट की
मॉन्टेस्क्यूफ्रांसीसी दार्शनिकप्राच्य निरंकुशवाद: एशिया में शासक का प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व
कार्ल मार्क्सएशियाई उत्पादन शैलीउपनिवेशवाद से पहले अधिशेष राज्य लेता था; स्वायत्त, समतावादी ग्रामीण समुदाय; एक निष्क्रिय प्रणाली
बड़े ज़मींदारभूमि पर उच्चाधिकार
बड़ा किसानकिराए का श्रम, माल उत्पादन
छोटे किसानमुश्किल से निर्वहन लायक उत्पादन
भूमिविहीन श्रमिकबलाहारकिताब में "अस्पृश्य", उद्धरण चिह्नों में
NCERT, पृष्ठ 132–133

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
बर्नियर की नज़रभारत की तुलना यूरोप से, सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता दिखाते हुए; भारत यूरोप का “विपरीत”130
उसका ग्रंथट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर130
मूल भिन्नताभारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव; उसके अनुसार सम्राट सारी भूमि का स्वामी130
उसका तर्कभूधारक भूमि बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए दूरगामी निवेश से उदासीन; “बेहतर” भूधारकों का वर्ग नहीं उभरा130–131
पेलसर्टडच यात्री, सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशक; लोगों की व्यापक गरीबी130
मुग़ल दस्तावेज़एक भी दस्तावेज़ राज्य को एकमात्र स्वामी नहीं कहता; अबुल फ़ज़्ल: ‘राजत्व का पारिश्रमिक’132
आगे का प्रभावमॉन्टेस्क्यू: प्राच्य निरंकुशवाद; मार्क्स: एशियाई उत्पादन शैली132
असल ग्रामीण समाजबड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद132–133

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • राजा को सारी ज़मीन का मालिक बताना किताब की बात मान लेना। यह बर्नियर की धारणा है। किताब बताती है कि एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा इंगित नहीं करता। बोर्ड पर हर पंक्ति के आगे बर्नियर के अनुसार लिखिए।
  • लगान, भूमिकर और उपज पर कर। बच्चे तीनों को एक समझते हैं। किताब के अनुसार भूमि राजस्व न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर; यूरोपीय यात्री इसे शायद इसलिए लगान मानते थे कि माँग अक्सर बहुत ज़्यादा होती थी। इसका विस्तार अध्याय 8 में है।
  • मॉन्टेस्क्यू और मार्क्स का क्रम। मॉन्टेस्क्यू अठारहवीं शताब्दी का फ्रांसीसी दार्शनिक, मार्क्स उन्नीसवीं शताब्दी का। दोनों के सिद्धांत बर्नियर की इसी धारणा पर खड़े थे कि सारी भूमि राजा की थी।
  • “अस्पृश्य” शब्द। किताब इसे उद्धरण चिह्नों में लिखती है। किताब के शब्द ही पढ़िए, अपनी ओर से कोई उदाहरण मत जोड़िए, और किसी बच्चे से उसकी जाति मत पूछिए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व खोलिए, और भूमि स्वामित्व वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: बर्नियर के अनुसार निजी भूस्वामित्व न होने से किसान ज़मीन पर पैसा क्यों नहीं लगाते थे?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ 3, 4 और 6 काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: बर्नियर का विवरण यूरोप के पाठकों के लिए “चेतावनी” था। जब कोई लेखक पहले से तय कर ले कि उसे अपने देश को क्या समझाना है, तो दूसरे देश के बारे में उसका विवरण किस तरह बदल सकता है? (वह वही बातें चुनेगा जो उसके तर्क में फ़िट हों, जैसे स्रोत 11 में ज़्यादातर समस्याओं का कारण निरंकुशता; जो बातें तर्क से मेल न खाएँ, वे पीछे रह सकती हैं। किताब इसी को आगे “अतिसरलीकृत चित्रण” कहती है।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव; उसके अनुसार सम्राट सारी भूमि का स्वामी था और उसे अपने अमीरों में बाँटता था। (2) एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा नहीं कहता; अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है, जो सुरक्षा के बदले की माँग प्रतीत होती है, भूमि पर लगान नहीं।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क15, क16, ख7, ख8 और ग7; जो आगे हैं, वे ङ4 और च5 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 106–123।

कालांश 7 — 6.3 एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई

किताब — पृष्ठ 133–134 · स्लाइड — भाग 7 · इंटरैक्टिव — 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि बर्नियर के अपने विवरण में शिल्प, व्यापार और शहरों की कौन-सी बातें उसके “पतन” वाले तर्क से मेल नहीं खातीं, और सत्रहवीं शताब्दी के शहरों में कौन-कौन से लोग थे।

साथ ले जाइए — किताब, कल का बोर्ड-कार्य (स्रोत 11 की बातें), और शहर के लोगों वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की वे पर्चियाँ पढ़िए जिनमें अबुल फ़ज़्ल का ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ ठीक लिखा है। फिर पूछिए: बर्नियर कहता है कि सब कुछ गिर रहा था; क्या उसके अपने ब्योरों में कुछ और भी दिखता है?

  2. 5–13 मिनट · दो बातें एक साथ, और स्रोत 13। भाग 6.3 का पहला अनुच्छेद पढ़िए। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: पतन की बात और समृद्धि के संकेत। पहले खाने में: शिल्पकारों के पास उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था, इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था। दूसरे में: पूरे विश्व से बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था, और लंबी दूरी के व्यापार से जुड़ा एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय था। फिर स्रोत 13 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए, जैसा छपा है: “इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?” नमूना उत्तर — स्रोत 11 उजाड़ की तसवीर है, जबकि स्रोत 13 उपजाऊपन, उत्पादन और व्यापार की।

    • ज़मीन: स्रोत 11 में रेतीली भूमि और बंजर पर्वत; स्रोत 13 में देश के विस्तृत भू-भाग का अधिकांश भाग “अत्यधिक उपजाऊ” है, और बंगाल चावल, मकई, रेशम, कपास और नील में मिस्र से आगे है।
    • लोग: स्रोत 11 में श्रमिकों का अभाव और गाँव छोड़ते किसान; स्रोत 13 में कई भाग जहाँ जनसंख्या पर्याप्त है और खेती अच्छी होती है।
    • शिल्प और व्यापार: स्रोत 13 में गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र, रेशम और सूती वस्त्र, जो देश में भी काम आते हैं और विदेश भी भेजे जाते हैं; और सोना-चाँदी भारत में आकर “कुछ हद तक खो जाता है”।

    एक बात दोनों में एक-सी है: बर्नियर की अपनी राय। स्रोत 13 में भी वह शिल्पकार को “मूल रूप से आलसी” कहता है, जबकि उसी वाक्य में उसकी बनाई चीज़ें गिनाता है।

  3. 13–21 मिनट · शहर। पृष्ठ 134 पढ़िए। सत्रहवीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोग नगरों में रहते थे, जो औसतन उसी समय के पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक था। फिर भी बर्नियर मुग़ल शहरों को “शिविर नगर” कहता है: ऐसे नगर जो राजकीय शिविर पर निर्भर थे, दरबार के आने पर बनते और उसके चले जाने के बाद तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते। किताब इसे भूस्वामित्व की तरह ही एक अतिसरलीकृत चित्रण कहती है, क्योंकि हर तरह के नगर थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि। अब किताब का चित्र 5.12 देखिए: सोने का एक चम्मच जिसमें पन्ने और माणिक जड़े हैं, जिसे किताब मुग़लकालीन शिल्पकारों की खास दक्षता का अच्छा उदाहरण कहती है। बच्चों से पूछिए कि क्या यह चम्मच बर्नियर की इस बात से मेल खाता है कि “उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था”। नमूना उत्तर — मेल नहीं खाता। इतनी बारीक कारीगरी दिखाती है कि कम से कम कुछ शिल्पकार ऊँचे दर्जे का काम कर रहे थे, और किताब भी कहती है कि बर्नियर के विवरण एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।

  4. 21–29 मिनट · शहर में कौन-कौन। पृष्ठ 134 के अगले दो अनुच्छेद पढ़िए और नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए। व्यापारी मज़बूत सामुदायिक या बंधुत्व के संबंधों से जुड़े रहते थे और अपनी जाति और व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन कहा जाता था और उनके मुखिया को सेठ; अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का प्रतिनिधित्व नगर सेठ करता था। इनके साथ व्यावसायिक वर्ग थे, जिनमें से कई राजकीय प्रश्रय पर टिके थे, और कई दूसरे संरक्षकों या भीड़भाड़ वाले बाज़ार में आम लोगों की सेवा से जीवन चलाते थे।

  5. 29–36 मिनट · राजकीय कारखाने (स्रोत 14) और चर्चा। किताब कहती है कि संभवत: बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देता है। स्रोत 14 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालाँकि हर तरफ़ बहुत सक्रियता है पर उन्नति बहुत कम?” नमूना उत्तर — पहले काम की भरमार दिखाकर, फिर उसे एक ठहरी हुई दिनचर्या बताकर।

    • सक्रियता: कई बड़े कक्ष, हर कक्ष में अलग काम: एक मास्टर के निरीक्षण में कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी और जूते बनाने वाले, और रेशम, जरी और महीन मलमल का काम करने वाले।
    • उन्नति नहीं: शिल्पकार हर रोज़ सुबह आते, दिन भर काम करते और शाम को घर लौट जाते; “इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है”।
    • उसका निष्कर्ष: “कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ था।” यह उसकी अपनी राय है, जो इस बात से जुड़ती है कि उसके अनुसार शिल्पकारों को कोई प्रोत्साहन नहीं था।

    फिर पृष्ठ 134 की चर्चा पूछिए: “आपके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की?” नमूना उत्तर — किताब से कई कारण निकलते हैं।

    • उसका उद्देश्य यूरोप के नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना था।
    • वह यूरोप में राज्य और समाज पर चल रहे विवादों में भाग ले रहा था; भारत का विवरण उसके लिए वहाँ के पाठकों को दी गई चेतावनी था।
    • यात्री सामान्यत: अनजानी चीज़ को अपनी जानी-पहचानी दुनिया से तौलते थे; अल–बिरूनी और इब्न बतूता भी तुलना करते थे।
    • पर बर्नियर की तुलना बराबरी की नहीं थी: उसने भिन्नताओं को पदानुक्रम में रखा। इसलिए उसका विवरण पढ़ते समय यह पूछना ज़रूरी है कि वह किसे क्या समझाना चाहता था।
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) बर्नियर मुग़ल शहरों को क्या कहता था, और इससे उसका आशय क्या था? (2) पश्चिमी भारत में व्यापारियों के समूह और उनके मुखिया को क्या कहा जाता था?

शहर में कौन-कौन (चरण 4)

शहर में कौन-कौन

व्यापारीपश्चिमी भारत में समूह महाजन, मुखिया सेठअहमदाबाद जैसे शहरी केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधि नगर सेठ
चिकित्सकहकीम या वैद्य
अध्यापकपंडित या मुल्ला
अधिवक्तावकील
और भीचित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक
नगरों के प्रकारउत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थानबर्नियर के "शिविर नगर" से कहीं बड़ी तसवीर
NCERT, पृष्ठ 134

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
बर्नियर का तर्कशिल्पकारों को प्रोत्साहन नहीं, मुनाफ़ा राज्य ले लेता; उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख133
उसी का दूसरा ब्योरापूरे विश्व से बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं; समृद्ध व्यापारिक समुदाय133
स्रोत 13बंगाल मिस्र से आगे; गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, रेशम और सूती वस्त्र, विदेश भी भेजे जाते133
नगरों में आबादीसत्रहवीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत; औसतन पश्चिमी यूरोप से अधिक134
“शिविर नगर”बर्नियर के अनुसार राजकीय शिविर पर निर्भर नगर; किताब: अतिसरलीकृत चित्रण134
व्यापारीमहाजन, मुखिया सेठ; अहमदाबाद जैसे शहरों में नगर सेठ134
स्रोत 14राजकीय कारखाने: बड़े कक्ष, हर कक्ष में अलग शिल्प134

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “शिविर नगर” को किताब की बात मान लेना। यह बर्नियर का शब्द है। किताब इसे अतिसरलीकृत कहती है और नगरों के पाँच प्रकार गिनाती है।
  • पंद्रह प्रतिशत कम लगना। बच्चे सोचते हैं कि पंद्रह प्रतिशत तो थोड़ा है। किताब की असली बात तुलना में है: यह औसतन उसी समय के पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक था। “लगभग” शब्द भी बोर्ड पर रहे।
  • एक ही लेखक, दो तसवीरें। बच्चे पूछेंगे कि बर्नियर सही था या ग़लत। किताब का कहना इतना है कि मुग़ल राज्य को निरंकुश दिखाने की उसकी तन्मयता साफ़ है, पर उसके विवरण कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं। उत्तर में यही दोनों बातें आनी चाहिए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व खोलिए, और शहरों वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: बर्नियर के “शिविर नगर” और किताब के गिनाए नगरों में क्या अंतर है?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ 1, 2 और 6 काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: स्रोत 13 में बर्नियर शिल्पकार को “मूल रूप से आलसी” कहता है, और उसी वाक्य में गलीचे, ज़री और सोने-चाँदी के वस्त्र गिनाता है। इन दोनों बातों को साथ रखकर आप उसके विवरण के बारे में क्या कहेंगे? (उसकी गिनाई चीज़ें, यानी उसका देखा हुआ ब्योरा, कौशल और मेहनत दिखाती हैं; “आलसी” उसकी पहले से बनी राय लगती है। इसलिए ब्योरे और राय को अलग करके पढ़ना चाहिए।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) “शिविर नगर”: ऐसे नगर जो अपने बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे, दरबार के आने पर बनते और उसके चले जाने के बाद तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते। (2) समूहों को महाजन और उनके मुखिया को सेठ; अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का प्रतिनिधि नगर सेठ कहलाता था।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क17, ख9, ख10 और घ7; जो आगे हैं, वे ङ5, च4 और छ3 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 124–132।

कालांश 8 — 7. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक

किताब — पृष्ठ 135–136 · स्लाइड — भाग 8 · इंटरैक्टिव — 7. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि यात्रियों ने महिलाओं के बारे में क्या लिखा, उनकी नज़र किस बात से बनी थी, और किताब किस आधार पर कहती है कि महिलाएँ घरों तक सीमित नहीं थीं।

साथ ले जाइए — किताब, और तीन यात्रियों वाला चार्ट पेपर (आज उसका आख़िरी खाना भरेगा)।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कल की वे पर्चियाँ पढ़िए जिनमें “शिविर नगर” का आशय ठीक लिखा है। फिर बोर्ड पर एक सवाल लिखिए जो पूरे कालांश में रहेगा: किसने लिखा, और उसे क्या “सामान्य” लगा?

  2. 5–12 मिनट · लिखने वाले कौन थे। भाग 7 का पहला वाक्य पढ़िए। जिन यात्रियों ने वृत्तांत छोड़े, वे सामान्यतया पुरुष थे, जिन्हें महिलाओं की स्थिति का विषय रुचिकर और कभी-कभी जिज्ञासापूर्ण लगता था। किताब कहती है कि वे कभी-कभी सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” परिस्थिति मान लेते थे। बच्चों से पूछिए कि लिखने वाले का पुरुष होना उसकी नज़र को कैसे बदल सकता है।

  3. 12–20 मिनट · दास और दासियाँ। पृष्ठ 135 का बाक़ी हिस्सा और स्रोत 15 पढ़िए, किताब के ही शब्दों में। बाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और भेंट में दिए जाते थे; इब्न बतूता ने ख़ुद सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए भेंट ख़रीदी। उसके विवरण से लगता है कि दासों में काफ़ी विभेद था: सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं, और सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए भी दासियों को नियुक्त करता था। दासों को सामान्यत: घरेलू श्रम में लगाया जाता था, और पालकी या डोले में लोगों को ले जाने में इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। स्रोत 15 की आख़िरी पंक्ति बोर्ड पर लिखिए: “अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।”

  4. 20–27 मिनट · बर्नियर और सती। पृष्ठ 135 का सती वाला अनुच्छेद पढ़िए। सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अक्सर पश्चिमी और पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था, इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना। उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, जबकि अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था। स्रोत 16 बच्चे चुपचाप ख़ुद पढ़ें; उसे ज़ोर से पढ़कर सुनाने या उसके ब्योरों पर बात करने की ज़रूरत नहीं। चर्चा इस पर रखिए कि बर्नियर ने यही विवरण क्यों चुना।

  5. 27–36 मिनट · श्रमिक महिलाएँ, और चर्चा। पृष्ठ 135–136 का आख़िरी अनुच्छेद पढ़िए। किताब कहती है: “लेकिन महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था।” उनका श्रम खेती और दूसरे उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था; व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में हिस्सा लेती थीं, और कभी-कभी वाणिज्यिक विवाद अदालत तक ले जाती थीं। फिर नीचे का चित्र बनाइए और पृष्ठ 136 की चर्चा पूछिए: “आपके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्न बतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा?” नमूना उत्तर — किताब की बातों से कुछ कारण निकलते हैं; बच्चे इनमें अपने कारण जोड़ सकते हैं।

    • लिखने वाले सामान्यतया पुरुष थे, और कभी-कभी सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” मान लेते थे।
    • वृत्तांतों में अपरिचित बातें ख़ास तौर पर उभारी जाती थीं; खेत या घर में काम करती महिला उन्हें शायद अनोखी नहीं लगी।
    • बर्नियर पूर्व और पश्चिम का अंतर दिखाना चाहता था, इसलिए उसने सती जैसी प्रथा चुनी, रोज़ का श्रम नहीं।
    • दोनों यात्री ऊँचे लोगों के बीच रहे: इब्न बतूता दिल्ली का क़ाज़ी था, और बर्नियर मुग़ल दरबार से जुड़ा था (कालांश 2 और 3)।

    आख़िर में किताब का चित्र 5.13 देखिए, मथुरा की एक मूर्ति जिसमें यात्री दिखाए गए हैं, और किनारे का प्रश्न पूछिए: “यहाँ यातायात के कौन–कौन से साधन अपनाए गए हैं?” नमूना उत्तर — चित्र में घोड़ों पर सवार लोग, एक ढका हुआ पहियों वाला वाहन जिसमें कई लोग बैठे हैं, हाथी पर बैठे दो लोग, और पैदल लोग दिखते हैं। बच्चे पहले ख़ुद गिनें, फिर मिलाएँ।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) इब्न बतूता के विवरण के अनुसार दासों को सामान्यत: किस काम में लगाया जाता था? (2) किताब किस आधार पर कहती है कि महिलाएँ घरों तक सीमित नहीं थीं?

वृत्तांतों में महिलाएँ, तीन रूपों में (चरण 5)

वृत्तांतों में महिलाएँ, तीन रूपों में

दासियाँइब्न बतूता के विवरण मेंघरेलू श्रम; कुछ संगीत और गायन में निपुण; कुछ अमीरों पर नज़र रखने के लिए
सतीबर्नियर के विवरण मेंउसके अनुसार कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से, अन्य को बाध्य किया जाता था
श्रमिककिताब के अनुसारखेती और दूसरे उत्पादन में श्रम; व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में, कभी-कभी अदालत तक
किताब का निष्कर्षतीसरे रूप, यानी श्रमिक महिलाओं के आधार परमहिलाएँ घरों के खास स्थानों तक सीमित रखी जाती थीं, यह "असंभाव्य" लगता है
NCERT, पृष्ठ 135–136

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
वृत्तांत लिखने वालेसामान्यतया पुरुष; कभी-कभी सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” मान लेते135
दासबाज़ारों में खुले आम बेचे जाते, भेंट में दिए जाते135
दासों में विभेदकुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण; कुछ अमीरों पर नज़र रखने के लिए135
दासों का कामसामान्यत: घरेलू श्रम; पालकी या डोले में लोगों को ले जाना135
सतीमहिलाओं से बर्ताव को यूरोपीय यात्री पूर्व और पश्चिम की भिन्नता का संकेतक मानते थे; बर्नियर ने सती को विस्तृत विवरण के लिए चुना135
श्रमिक महिलाएँखेती और दूसरे उत्पादन में श्रम; व्यापार में हिस्सा, कभी-कभी अदालत तक136
जो अनछुआ रहाउपमहाद्वीप के पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) के अपने यात्रा-अनुभव अपेक्षाकृत अज्ञात136

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • यात्री के लिखे को सीधे सच्चाई मान लेना। हर पंक्ति पर बोर्ड वाला सवाल लौटाइए: किसने लिखा, और उसे क्या “सामान्य” लगा?
  • सती को हर महिला की कहानी मान लेना। किताब साफ़ कहती है कि महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था, और बर्नियर ख़ुद लिखता है कि कुछ को बाध्य किया जाता था, यानी यह सबकी कहानी नहीं थी।
  • कक्षा में सावधानी। इस कालांश में दास-बिक्री या सती का कोई अभिनय, नाटक या कल्पना वाला काम मत दीजिए। किताब के शब्द पढ़िए, और चर्चा इस पर रखिए कि लिखने वाले ने क्या चुना और क्यों।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक खोलिए, और श्रमिक महिलाओं वाले हिस्से के बाद रुककर पूछिए: किताब किन दो बातों से कहती है कि महिलाएँ घरों तक सीमित नहीं थीं?
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ 1, 4 और 6 काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: किताब के आख़िरी अनुच्छेद के अनुसार उपमहाद्वीप के जिन पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) ने समुद्र और पर्वत पार किए, उनके अनुभव अपेक्षाकृत अज्ञात हैं। अगर उनमें से किसी का वृत्तांत मिल जाए, तो आप उसमें कौन-सी तीन बातें सबसे पहले ढूँढ़ेंगे? (किताब ख़ुद तीन सवाल देती है: उन्होंने क्या देखा और सुना, दूर के लोगों से उनके संबंध कैसे बने, और वे किन भाषाओं का प्रयोग करते थे।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) सामान्यत: घरेलू श्रम में; पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को विशेष रूप से अपरिहार्य पाया। (2) महिलाओं का श्रम खेती और दूसरे उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था; और व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में हिस्सा लेती थीं, कभी-कभी वाणिज्यिक विवाद अदालत तक भी ले जाती थीं।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क18, क19, क20, ग8 और घ8; जो आगे हैं, वे ङ6, च6 और छ4 भी।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 133–143।

कालांश 9 — काल-रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

किताब — पृष्ठ 137 और 139 · स्लाइड — काल-रेखा वाला भाग · इंटरैक्टिव — सार और काल-रेखा, मानचित्र

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी काल-रेखा की बारह पंक्तियों को उन कालांशों से जोड़ सके जिनमें उन यात्रियों की बात आई, प्रश्न 10 का मानचित्र सिर्फ़ किताब में बताई जगहों से बना सके, और पहले दिन की अपनी पर्ची का उत्तर पूरे अध्याय के आधार पर सुधार सके।

साथ ले जाइए — किताब, विश्व के रेखांकित मानचित्र (हर विद्यार्थी के लिए एक), एटलस, पहले दिन की पर्चियों वाला लिफ़ाफ़ा, चार्ट पेपर की काल-रेखा वाली शीट, और पिछले कालांशों के चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 8 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें श्रमिक महिलाओं वाले प्रश्न के दोनों आधार हों (खेती और दूसरे उत्पादन में श्रम, और व्यापार में हिस्सा), और एक जिसमें सिर्फ़ एक लिखा हो। कक्षा से सुधरवाइए।

  2. 5–15 मिनट · काल-रेखा (पृष्ठ 137)। पहले काल-रेखा का शीर्षक और उसके नीचे छपा नोट पढ़िए: “कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े”, और “जहाँ कोई अन्य संकेत नहीं है तिथियाँ यात्री के जीवन काल को बता रही हैं।” फिर बारह पंक्तियाँ उसी क्रम में बोर्ड पर लिखिए जिस क्रम में छपी हैं, और बच्चों से हर पंक्ति के आगे वह कालांश लिखवाइए जिसमें उस यात्री की बात आई। पूरी सूची नीचे बोर्ड-कार्य की तालिका में है। तीन मुख्य यात्रियों से शुरू कीजिए: अल–बिरूनी 973–1048 (कालांश 1 और 4), इब्न बतूता 1304–77 (कालांश 2, 5 और 8), फ्रांस्वा बर्नियर 1620–88 (कालांश 3, 6, 7 और 8)।

  3. 15–20 मिनट · कोष्ठक वाली तारीखें, और चार नए नाम। चार पंक्तियों की तारीख के साथ कोष्ठक छपा है, यानी वहाँ तारीख जीवन काल नहीं, कुछ और बताती है: अफानासी निकितिच निकितिन 1466–72 (भारत में बिताए वर्ष), दुआर्ते बरबोसा 1518 (भारत की यात्रा), सयदी अली रेइस 1562 (मृत्यु का वर्ष), और महमूद वली बल्खी 1626–31 (भारत में बिताए वर्ष)। फिर पूछिए: किन चार यात्रियों के नाम अध्याय के पाठ में कहीं नहीं आते, सिर्फ़ काल-रेखा में हैं? नमूना उत्तर — अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से), सयदी अली रेइस (तुर्की से), अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से) और पीटर मुंडी (इंग्लैंड से)। इनके बारे में किताब सिर्फ़ तारीख और देश देती है, इसलिए कक्षा भी इतना ही लिखे। मार्को पोलो का नाम पाठ में एक ही जगह आता है: पृष्ठ 119 पर किताब कहती है कि चीन के बारे में इब्न बतूता के वृत्तांत की तुलना मार्को पोलो के वृत्तांत से की जाती है, जिसने तेरहवीं शताब्दी के अंत में वेनिस से चलकर चीन (और भारत की भी) यात्रा की थी।

  4. 20–32 मिनट · मानचित्र कार्य, प्रश्न 10 (पृष्ठ 139)। प्रश्न पढ़िए: “विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित कीजिए जिनकी यात्रा इब्न बतूता ने की थी। कौन–कौन से समुद्रों को उसने पार किया होगा?” पहले जानकारी दीजिए, फिर बच्चे मानचित्र बनाएँ। नमूना उत्तर — किताब जिन जगहों का नाम लेती है, सिर्फ़ उन्हीं पर निशान लगाइए; जहाँ किताब शहर या इलाके का नाम देती है, वहाँ आज का देश एटलस में खोजिए।

    • घर और शुरुआत: मोरक्को, जहाँ तैंजियर में उसका जन्म हुआ; वहीं से वह बाईस वर्ष की उम्र में अकेला निकला (पृष्ठ 118)। पृष्ठ 119 के बॉक्स में वह बताता है कि बुख़ार की हालत में वह ट्यूनिस शहर पहुँचा, जहाँ उसे कोई नहीं पहचानता था।
    • भारत आने से पहले: मक्का की तीर्थ यात्राएँ, और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाह।
    • उपमहाद्वीप में: मध्य एशिया के रास्ते सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध, फिर मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली; बाद में मध्य भारत होकर मालाबार तट और मालद्वीप (दोनों जगह वह दो बार गया), फिर बंगाल और असम। मालद्वीप के बाद उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया; किताब वहाँ पहुँचने की बात नहीं लिखती, इसलिए श्रीलंका पर पक्का निशान मत लगाइए।
    • चीन की ओर: जहाज से सुमात्रा, और सुमात्रा से एक दूसरे जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन (आज क्वानझू); चीन में वह बीजिंग तक गया।
    • किताब का अपना सार (पृष्ठ 120): उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग, भारतीय उपमहाद्वीप और चीन। रूस के लिए किताब कहती है “हो सकता है वह रूस भी गया हो”, इसलिए रूस पर पक्का निशान मत लगाइए।
    • समुद्र, जो किताब से पक्के हैं: सुमात्रा तक और फिर जायतुन तक वह जहाज से गया; मालद्वीप द्वीप है, और वह वहाँ दो बार गया, इसलिए वहाँ जाने के लिए उसने समुद्र पार किया होगा।
    • समुद्र, जो मानचित्र देखकर लगते हैं: मालाबार से मालद्वीप जाते हुए अरब सागर और हिंद महासागर; बंगाल से सुमात्रा जाते हुए बंगाल की खाड़ी; सुमात्रा से चीन जाते हुए दक्षिण चीन सागर। अगर वह पूर्वी अफ्रीका के बंदरगाहों, यमन और ओमान तक समुद्र से गया हो, तो लाल सागर और अरब सागर भी।

    प्रश्न जगहों पर निशान और समुद्रों के नाम माँगता है, रास्ते की रेखाएँ नहीं, इसलिए रेखाएँ अपने मन से मत खींचिए, और समुद्रों के लिए “होगा” वाली भाषा रखिए। मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) पर पैमाना नहीं है, इसलिए उससे कोई दूरी मत पढ़िए।

  5. 32–37 मिनट · पहले दिन की पर्चियाँ लौटाइए। लिफ़ाफ़ा खोलिए और हर विद्यार्थी को उसकी पर्ची दीजिए। सवाल फिर बोलिए: बाहर से आया यात्री किसी जगह के बारे में ऐसा क्या देख लेता है जो वहाँ रहने वाले नहीं देखते, और वह कहाँ ग़लत समझ सकता है? बच्चे अपनी पुरानी पंक्तियों के नीचे अध्याय से दोनों हिस्सों का एक-एक उदाहरण जोड़ें। नमूना उत्तर — अध्याय दोनों बातें दिखाता है।

    • जो बाहर वाला देख लेता है: किताब कहती है कि देशज लेखकों के लिए रोज़ की बहुत-सी बातें इतनी सामान्य थीं कि वे उन्हें दर्ज करने लायक नहीं मानते थे; यात्रियों ने उन्हें लिखा (कालांश 1)। इब्न बतूता ने नारियल, पान, दिल्ली की दीवार और डाक व्यवस्था को बारीकी से लिखा (कालांश 5)।
    • तुलना से समझना: अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था को समझने के लिए दूसरे समुदायों में प्रतिरूप ढूँढ़े, जैसे प्राचीन फ़ारस के चार सामाजिक वर्ग (कालांश 4)।
    • उसकी समझ की सीमा, अल–बिरूनी: जाति के बारे में उसकी समझ नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित थी, जबकि वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी (कालांश 4)।
    • ग़लत कहाँ समझा, बर्नियर: वह भारत की तुलना यूरोप से करता रहा, सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता दिखाते हुए; उसकी यह बात कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था, किसी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ में नहीं मिलती (कालांश 6); और मुग़ल शहरों को वह “शिविर नगर” कहता है, जबकि किताब हर तरह के नगर दिखाती है (कालांश 7)।
    • जो छूट गया: वृत्तांत लिखने वाले सामान्यतया पुरुष थे, और किताब कहती है कि इन वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं; जैसे सती पर बहुत लिखा गया, जबकि महिलाओं का श्रम खेती और दूसरे उत्पादन में भी महत्त्वपूर्ण था (कालांश 8)।
  6. 37–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) काल-रेखा के किन चार यात्रियों का नाम अध्याय के पाठ में नहीं आता? (2) किताब के अनुसार इब्न बतूता सुमात्रा तक और फिर चीन तक कैसे पहुँचा?

बारह यात्री, सदी के हिसाब से (चरण 2)

बारह यात्री, सदी के हिसाब से

दसवीं-ग्यारहवीं शताब्दियाँअल–बिरूनी973–1048, उज़्बेकिस्तान से
तेरहवीं शताब्दीमार्को पोलो1254–1323, इटली से
चौदहवीं शताब्दीइब्न बतूता1304–77, मोरक्को से
पंद्रहवीं शताब्दीअब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी1413–82, समरक़ंद से
पंद्रहवीं शताब्दीअफानासी निकितिच निकितिन1466–72 (भारत में बिताए वर्ष), रूस से; सिर्फ़ काल-रेखा में
सोलहवीं शताब्दीदुआर्ते बरबोसा1518 (भारत की यात्रा), पुर्तगाल से
सोलहवीं शताब्दीसयदी अली रेइस1562 (मृत्यु का वर्ष), तुर्की से; सिर्फ़ काल-रेखा में
सोलहवीं शताब्दीअंतोनियो मानसेरेते1536–1600, स्पेन से; सिर्फ़ काल-रेखा में
सत्रहवीं शताब्दीमहमूद वली बल्खी1626–31 (भारत में बिताए वर्ष), बल्ख़ से
सत्रहवीं शताब्दीपीटर मुंडी1600–67, इंग्लैंड से; सिर्फ़ काल-रेखा में
सत्रहवीं शताब्दीज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर1605–89, फ्रांस से
सत्रहवीं शताब्दीफ्रांस्वा बर्नियर1620–88, फ्रांस से
NCERT, पृष्ठ 137

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। नाम पाठ वाले रूप में हैं; जो चार नाम पाठ में नहीं आते, वे काल-रेखा की तरह।

काल-रेखा की पंक्तिकबकालांशपाठ में पृष्ठ
अल–बिरूनी (उज़्बेकिस्तान से)973–10481, 4115–117, 124–125
मार्को पोलो (इटली से)1254–13239119, एक पंक्ति
इब्न बतूता (मोरक्को से)1304–772, 5, 8118–121, 126–129, 135
अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी (समरक़ंद से)1413–822, 5121, 129
अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से)1466–72 (भारत में बिताए वर्ष)9सिर्फ़ काल-रेखा
दुआर्ते बरबोसा (पुर्तगाल से)1518 (भारत की यात्रा); मृत्यु 15213122
सयदी अली रेइस (तुर्की से)1562 (मृत्यु का वर्ष)9सिर्फ़ काल-रेखा
अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से)1536–16009सिर्फ़ काल-रेखा
महमूद वली बल्खी (बल्ख़ से)1626–31 (भारत में बिताए वर्ष)2121
पीटर मुंडी (इंग्लैंड से)1600–679सिर्फ़ काल-रेखा
ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से)1605–893122
फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से)1620–883, 6, 7, 8122–123, 130–135

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • हर तारीख जीवन काल नहीं है। बच्चे लिख देते हैं कि बल्खी 1626 में पैदा हुआ। कोष्ठक वाली चार पंक्तियों में तारीख के साथ कोष्ठक भी कॉपी में उतरवाइए: भारत में बिताए वर्ष, भारत की यात्रा, या मृत्यु का वर्ष।
  • पंक्तियाँ हर जगह तारीख के क्रम में नहीं छपीं। सोलहवीं शताब्दी में 1562 वाली पंक्ति 1536–1600 से पहले छपी है, और सत्रहवीं में 1626–31 वाली 1600–67 से पहले। बोर्ड पर किताब का क्रम रखिए; हर पंक्ति की सदी सही है।
  • काल-रेखा में कुछ नाम पूरे या थोड़े अलग रूप में छपे हैं। जैसे “मोहम्मद इब्न अहमद अबू रेहान अल बिरूनी”, “अब्द अल–रज़्ज़ाक कमाल अल–दिन इब्न इस्हाक़ अल–समरक़ंदी” और “फ्रांस्वा बर्नीयर”। ये वही यात्री हैं जिन्हें पाठ अल–बिरूनी, अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी और फ्रांस्वा बर्नियर कहता है; उत्तर में पाठ वाला रूप लिखिए।
  • मानचित्र पर अपनी ओर से जगहें जोड़ना। सिर्फ़ वही जगहें जिनका नाम किताब लेती है। रूस पर पक्का निशान नहीं, और समुद्रों के आगे “होगा”।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो सार और काल-रेखा खोलिए, और काल-रेखा की पंक्तियाँ एक-एक करके दिखाइए।
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए तीन मुख्य यात्रियों की पंक्तियाँ, और मानचित्र पर मोरक्को, भारत और चीन काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पृष्ठ 122 कहता है कि 1600 ई. के बाद भारत आने वाले डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी थी। काल-रेखा की सत्रहवीं शताब्दी वाली पंक्तियों में यह बात कैसे दिखती है, और काल-रेखा से इसकी गिनती क्यों नहीं की जा सकती? (सत्रहवीं शताब्दी की चार पंक्तियों में तीन यात्री इंग्लैंड और फ्रांस से हैं: पीटर मुंडी, ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर और फ्रांस्वा बर्नियर। पर काल-रेखा का शीर्षक ही कहता है कि ये “कुछ यात्री” हैं, सारे नहीं, इसलिए इससे संख्या नहीं गिनी जा सकती।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) अफानासी निकितिच निकितिन, सयदी अली रेइस, अंतोनियो मानसेरेते और पीटर मुंडी। (2) बंगाल और असम के बाद वह जहाज से सुमात्रा गया, और सुमात्रा से एक दूसरे जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन, जो आज क्वानझू कहलाता है।
  • गृहकार्य: मानचित्र पूरा कीजिए, और प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1 घर पर हल कीजिए।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 144–150।

कालांश 10 — मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

किताब — पृष्ठ 138–139 · स्लाइड — आख़िरी भाग · इंटरैक्टिव — हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी अभ्यास का प्रश्न 9 (बर्नियर का शिल्प वाला उद्धरण) स्रोत की तरह पढ़ सके, नमूना पत्र 2 हल करे, और जान ले कि अभ्यास के बाक़ी प्रश्न किस कालांश की किस बात से जुड़े हैं।

साथ ले जाइए — किताब, नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ या बोर्ड पर लिखे प्रश्न, और प्रश्न बैंक के उत्तर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। कालांश 9 की दो पर्चियाँ पढ़िए: एक जिसमें चारों नाम सही हों, और एक जिसमें कोई नाम छूटा हो या पाठ वाला कोई यात्री आ गया हो। कक्षा से सुधरवाइए।

  2. 5–12 मिनट · प्रश्न 9: बर्नियर का उद्धरण। पृष्ठ 138 का उद्धरण ज़ोर से पढ़वाइए, फिर प्रश्न वैसे ही पढ़िए जैसा छपा है: “उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।” नमूना उत्तर — किताब में ‘अलिखित’ छपा है, पर अंग्रेज़ी किताब में यहाँ ‘mentioned’ (बताए गए) है, इसलिए इसे ‘उल्लिखित’ पढ़िए, यानी इस अंश में बताए गए शिल्प।

    • अंश में बताए शिल्प: सुंदर शिल्पकारीगरी, ऐसे लोगों की जिनके पास औज़ारों का अभाव है और जिन्होंने किसी निपुण कारीगर से काम नहीं सीखा; यूरोप में तैयार वस्तुओं की इतनी निपुण नकल कि असली और नकली में अंतर मुश्किल हो; बेहतरीन बंदूकें; सुंदर स्वर्णाभूषण; और चित्र, जिनकी सुंदरता, मृदुलता और सूक्ष्मता से वह आकर्षित हुआ।
    • अध्याय में वर्णित शिल्प: बर्नियर का ही स्रोत 13 गलीचे, ज़री, कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चाँदी के वस्त्र, और रेशम और सूती वस्त्र गिनाता है (पृष्ठ 133); स्रोत 14 के कारखानों में कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी, जूते बनाने वाले, और रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले हैं (पृष्ठ 134); और इब्न बतूता के समय के बारे में किताब बताती है कि सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की बहुत माँग थी (पृष्ठ 128)।
    • तुलना: उद्धरण में बर्नियर कारीगरी की खुलकर तारीफ़ करता है, और स्रोत 13 और 14 भी बहुत-से शिल्प दिखाते हैं। पर वही बर्नियर कहता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था, और यह भी मानता है कि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था (पृष्ठ 133)।

    किताब इसी को कहती है कि उसके विवरण कभी-कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।

  3. 12–32 मिनट · लिखित परख। प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2 (कुल 20 अंक) बीस मिनट में हल करवाइए। किताब बंद रहे।

  4. 32–36 मिनट · जोड़ियों में जाँच। बच्चे कॉपियाँ बदलें और नीचे के अंक कैसे कटेंगे वाले तीन नियमों से एक-दूसरे का उत्तर जाँचें। फिर प्रश्न बैंक के उत्तर से मिलाएँ।

  5. 36–38 मिनट · अभ्यास के 12 प्रश्न। बोर्ड-कार्य की तालिका दिखाइए। बच्चे अपनी कॉपी में देखें कि किस प्रश्न का उत्तर उनके पास है, और जो छूटे हैं उन पर निशान लगाएँ।

  6. 38–40 मिनट · आख़िरी पर्ची। इस अध्याय के तीन यात्रियों में से किसका वृत्तांत आपको इतिहास के लिए सबसे काम का लगा, और उसकी एक सीमा क्या है? एक उदाहरण के साथ लिखिए। यह सवाल हमारी ओर से है।

बोर्ड-कार्य

यह तालिका बोर्ड पर या चार्ट पेपर पर रहे; उत्तर की मुख्य बात से आगे पूरा उत्तर रिवीजन नोट्स में है।

प्रश्नकब दियाउत्तर की मुख्य बात
1. किताब–उल–हिन्द पर लेखकालांश 1अरबी में, अस्सी अध्याय, कई विषय; अध्याय सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) एक प्रश्न, फिर संस्कृत परंपराओं पर वर्णन, फिर दूसरी संस्कृतियों से तुलना
2. इब्न बतूता और बर्नियर के दृष्टिकोणकालांश 2, 3; फिर 5–7इब्न बतूता नई चीज़ों को अचरज और बारीकी से दर्ज करता है; बर्नियर हर बात की तुलना यूरोप से करता है और भिन्नताओं को पदानुक्रम में रखता है
3. बर्नियर के शहरी केंद्रकालांश 7उसके लिए “शिविर नगर”, राजकीय शिविर पर निर्भर; किताब उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थान भी दिखाती है
4. इब्न बतूता और दास प्रथाकालांश 8दास बाज़ारों में खुले आम बिकते और भेंट में दिए जाते; दासों में विभेद; काम सामान्यत: घरेलू श्रम
5. सती और बर्नियरकालांश 8महिलाओं से बर्ताव को यूरोपीय यात्री पश्चिम और पूर्व की भिन्नता का संकेतक मानते थे; बर्नियर ने सती को विस्तृत विवरण के लिए चुना; उसके अनुसार कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से, अन्य को बाध्य किया जाता था
6. अल–बिरूनी और जाति व्यवस्थाकालांश 4दूसरे समुदायों में प्रतिरूप, जैसे प्राचीन फ़ारस; ब्राह्मणवादी व्याख्या मानी, पर अपवित्रता की मान्यता अस्वीकार की; सीमा: नियामक संस्कृत ग्रंथों से प्रभावित
7. इब्न बतूता और शहरी जीवनकालांश 5काफ़ी हद तक हाँ: घने और समृद्ध शहर, बाज़ार, दिल्ली की दीवार और द्वार, डाक; पर नज़र एक बाहरी यात्री की
8. बर्नियर और ग्रामीण समाजकालांश 6सीमित हद तक: भूमि पर राज्य के स्वामित्व की उसकी बात किसी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ में नहीं मिलती; ग्रामीण समाज में बड़े ज़मींदारों से भूमिविहीन श्रमिकों तक बहुत अंतर था
9. बर्नियर का शिल्प वाला उद्धरणकालांश 7, 10‘अलिखित’ यानी ‘उल्लिखित’; शिल्पकारीगरी, नकल, बंदूकें, स्वर्णाभूषण, चित्र; अध्याय में स्रोत 13 और 14 के शिल्प
10. मानचित्र कार्यकालांश 9सिर्फ़ किताब में बताई जगहें; समुद्र “होगा” के साथ
11. परियोजना: बड़े संबंधी का साक्षात्कारघर पर(क) से (ङ) तक पाँच बातें पूछिए; भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतों, सड़कों और पुरुषों और महिलाओं की जीवन-शैली की समानताएँ और भिन्नताएँ; रिपोर्ट
12. परियोजना: एक यात्री पर रिपोर्टघर परअध्याय के किसी एक यात्री के जीवन और कृतियों पर और जानकारी; उसने समाज का कैसा विवरण दिया; तुलना अध्याय के उद्धरणों से

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • प्रश्न 9 में सूची अंश से बनती है। बच्चे पहले उद्धरण में आए शिल्प गिनें, फिर अध्याय से तुलना करें। अंश से बाहर के शिल्प सूची में नहीं, तुलना में आते हैं।
  • प्रश्न 10 में सिर्फ़ किताब की जगहें। रूस पर पक्का निशान नहीं, और समुद्रों के आगे “होगा”; रास्ते की रेखाएँ नहीं।
  • प्रश्न 5 किताब के शब्दों में। उत्तर इस पर रहे कि बर्नियर ने सती को क्यों चुना और उसके अनुसार क्या होता था; स्रोत 16 के दृश्य को दोहराने या बढ़ाने की ज़रूरत नहीं।
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए नमूना पत्र 2 के वस्तुनिष्ठ और अति लघूत्तरीय प्रश्न पहले, फिर बाक़ी।
  • तेज़ विद्यार्थी को प्रश्न 6 या 8 का पूरा निबंध घर पर लिखने दीजिए, और रिवीजन नोट्स के उत्तर से मिलाने दीजिए।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): आख़िरी पर्ची, ऊपर का प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — कोई भी एक यात्री, एक उदाहरण और एक सीमा के साथ। जैसे: अल–बिरूनी, क्योंकि किताब–उल–हिन्द धर्म और दर्शन से लेकर खगोल-विज्ञान और रीति-रिवाजों तक बहुत-से विषयों पर है; सीमा: जाति के बारे में उसकी समझ नियामक संस्कृत ग्रंथों से प्रभावित थी। या बर्नियर, क्योंकि उसके विवरण से कारखानों और शिल्पों का पता चलता है; सीमा: वह हर बात की तुलना यूरोप से करता है, और भूमि के स्वामित्व वाली उसकी बात किसी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ में नहीं मिलती।
  • गृहकार्य: क्विज़ हल कीजिए, और परख के प्रश्न देखिए। घर पर बात करने के लिए अभिभावकों का पन्ना है।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड का पूरा सेट।

पूरे अध्याय के लिए

अलग-अलग बच्चों के लिए

किसके लिएक्या कीजिए
कमज़ोर विद्यार्थीहर कालांश के बोर्ड-कार्य की पहली तीन पंक्तियाँ और निकास-पर्ची का पहला प्रश्न; फ़्लैशकार्ड रोज़ दस
तेज़ विद्यार्थीहर कार्ड का तेज़ विद्यार्थी वाला प्रश्न, और अभ्यास के प्रश्न 6 से 9 के निबंध
जो कुछ कालांश नहीं आ पाएइंटरैक्टिव अध्याय का वही पड़ाव, और किसी साथी की बोर्ड-कार्य वाली कॉपी
पूरी कक्षा, जब जाति, दास प्रथा या सती की बात हो (कालांश 4 और 8)ये बातें स्रोतों के शब्दों और किताब की टिप्पणी से ही पढ़ाइए; किसी विद्यार्थी से उसकी जाति या घर की प्रथाओं के बारे में मत पूछिए

सतत मूल्यांकन

साधनकबक्या देखिए
निकास-पर्चीहर कालांश“लगभग”, “शायद”, “संभवत:” और “सामान्यत:” बचे या नहीं; दो बातें मिलीं या नहीं
पहले दिन की पर्चीकालांश 1 और 9पहली और आख़िरी पंक्तियों में क्या जुड़ा
बोर्ड-कार्य की कॉपीहर हफ़्तेतालिका पूरी है, और पृष्ठ लिखे हैं
स्रोत पढ़नाकालांश 1 से 8, और 10यात्री के शब्द, किताब की टिप्पणी और अपनी बात अलग रखी या नहीं
मानचित्रकालांश 9सिर्फ़ किताब में बताई जगहें; समुद्र “होगा” के साथ

लिखित मूल्यांकन

अपनी इकाई-परीक्षा के लिए एक सुझाया हुआ ढाँचा; प्रश्न प्रश्न बैंक से चुनिए। कुल 30 अंक।

प्रकारअंकक्या पूछें
वस्तुनिष्ठ, रिक्त स्थान, सही/ग़लत6 × 1 = 6तीन यात्री और उनके देश, किताब–उल–हिन्द, उलुक और दावा, “शिविर नगर”
अति लघूत्तरीय3 × 2 = 6अपवित्रता की मान्यता, महाजन और सेठ, नारियल या पान
लघूत्तरीय2 × 3 = 6इब्न बतूता की दिल्ली; बर्नियर और भूमि का स्वामित्व
स्रोत पर आधारित1 × 4 = 4किताब के किसी एक स्रोत पर
दीर्घ उत्तरीय1 × 5 = 5अल–बिरूनी और जाति व्यवस्था, या इब्न बतूता और बर्नियर के दृष्टिकोण
मानचित्र1 × 3 = 3प्रश्न 10 की जगहें और समुद्र

अंक कैसे कटेंगे, यह पहले ही बता दीजिए

  1. “लगभग”, “शायद”, “संभवत:” और “सामान्यत:” छोड़ने पर। किताब जहाँ पक्की बात नहीं कहती, वहाँ उत्तर भी पक्का नहीं होना चाहिए।
  2. दो यात्रियों या दो सदियों को मिला देने पर। जैसे अल–बिरूनी (973–1048) की बात इब्न बतूता (1304–77) के नाम लिख देना, या बर्नियर (1620–88) को मुहम्मद बिन तुग़लक के दरबार में रख देना।
  3. यात्री की राय को तथ्य बना देने पर। जैसे यह लिख देना कि भारत में भूमि का स्वामी सिर्फ़ राजा था। लिखिए कि बर्नियर के अनुसार ऐसा था, और किताब की टिप्पणी अलग वाक्य में।

प्रोजेक्ट और गतिविधि

#प्रोजेक्टकैसे
1अभ्यास का प्रश्न 11: बड़े संबंधी का साक्षात्कारकिसी ऐसे बड़े संबंधी से बात कीजिए जिन्होंने अपने नगर या गाँव के बाहर यात्राएँ की हों: कहाँ गए, कैसे गए, कितना समय लगा, क्यों गए, क्या कठिनाई आई; फिर दोनों जगहों की समानताएँ और भिन्नताएँ लिखकर रिपोर्ट बनाइए
2अभ्यास का प्रश्न 12: एक यात्री पर रिपोर्टअध्याय के किसी एक यात्री के जीवन और कृतियों के बारे में और पढ़िए, लिखिए कि उसने समाज का कैसा विवरण दिया, और उसकी तुलना अध्याय के उद्धरणों से कीजिए
3कक्षा की यात्री-तालिकाहर कालांश के बाद चार्ट पेपर पर एक पंक्ति: कौन-सा यात्री, किस पृष्ठ पर, उसने क्या देखा, और किताब उस पर क्या टिप्पणी करती है। यह गतिविधि हमारी ओर से है
4काल-रेखा चार्टपृष्ठ 137 की बारह पंक्तियाँ एक लंबी पट्टी पर, हर पंक्ति के साथ उसका कालांश

शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ

  1. जाति, दास प्रथा और सती को इतिहास की तरह पढ़ाइए। ये बातें वैसे पढ़ाइए जैसे स्रोत उन्हें बताते हैं और किताब उन पर टिप्पणी करती है। दास-बिक्री या सती का कोई अभिनय नहीं, किताब के शब्दों से आगे कोई ब्योरा नहीं, और कोई गतिविधि नहीं जो जातियों को ऊँचा-नीचा रखे या बच्चों से उनकी जाति पूछे।
  2. पूर्व और पश्चिम की होड़ मत करवाइए। “पूर्व” को कमतर दिखाना बर्नियर का नज़रिया है, जिसे किताब जाँचती है। कक्षा में कोई बहस या गतिविधि नहीं जो भारत और यूरोप में किसी को ऊँचा ठहराए।
  3. “लगभग”, “शायद”, “संभवत:” और “सामान्यत:” बचाइए। इस अध्याय की कई बातें किताब सावधानी के शब्दों के साथ कहती है, जैसे अल–बिरूनी के अध्यायों की बनावट “सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं)” (पृष्ठ 117), इब्न बतूता के रूस जाने पर “हो सकता है” (पृष्ठ 120), दासों के काम के साथ “सामान्यत:” (पृष्ठ 135), और आख़िरी अनुच्छेद में “(और संभवत: महिलाओं)” (पृष्ठ 136)। आपके बोलने में भी ये शब्द रहें।
  4. किताब से बाहर की तारीखें और जगहें मत जोड़िए। हर तारीख किताब की; इब्न बतूता के रास्ते में सिर्फ़ वे जगहें जिनका किताब नाम लेती है; काल-रेखा के चार नए यात्रियों के बारे में सिर्फ़ उतना जितना पृष्ठ 137 देता है। बच्चे बाहर की बात लाएँ, तो पूछिए कि किताब का कौन-सा पृष्ठ उसे बताता है।
  5. चार्ट पेपर सँभालिए। बोर्ड हर कालांश मिट जाता है; जो तालिकाएँ और चित्र कालांश 9 और 10 में फिर लगेंगे, वे चार्ट पेपर पर रहें।