अध्याय 5यात्रियों के नज़रिए

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कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 115 से 139

यह पन्ना किसलिए — किताब के तीन विषयों को और गहराई से समझाने के लिए: अल-बिरूनी का जीवन और उनकी किताब-उल-हिन्द कैसे बनी, इब्न बतूता की पूरी यात्रा, घर से निकलने से लेकर रिह्ला के लिखे जाने तक, और सुल्तान की वह डाक-व्यवस्था जिसका ब्योरा इब्न बतूता देते हैं। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर उसके आगे की बातें, स्रोत के लिंक के साथ, और अंत में कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।

परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। यहाँ की बातें किताब की बात को खोलकर समझाने के लिए हैं। पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।

अल-बिरूनी और किताब-उल-हिन्द

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि अल-बिरूनी का जन्म “आधुनिक उज़्बेकिस्तान में स्थित ख़्वारिज़्म में सन् 973 में हुआ था”, और “सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के पश्चात सुल्तान महमूद यहाँ के कई विद्वानों तथा कवियों को अपने साथ अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया।” अल-बिरूनी “बंधक के रूप में ग़ज़नी आया था पर धीरे–धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा और सत्तर वर्ष की आयु में अपनी मृत्यु तक उसने अपना बाकी जीवन यहीं बिताया।” (पृष्ठ 116) एक बॉक्स के अनुसार उसने “कई संस्कृत कृतियों, जिनमें पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ भी शामिल है, का अरबी में अनुवाद किया”, और “अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए उसने यूक्लिड (एक यूनानी गणितज्ञ) के कार्यों का संस्कृत में अनुवाद किया।” (पृष्ठ 116) किताब-उल-हिन्द के बारे में किताब कहती है कि वह “अस्सी अध्यायों में विभाजित है” (पृष्ठ 117)। किताब यहीं रुकती है: ग़ज़नी में अल-बिरूनी की हैसियत क्या थी, किताब-उल-हिन्द कब पूरी हुई, उसका पूरा नाम क्या कहता है, और पतंजलि का कौन-सा ग्रंथ उन्होंने अरबी में उतारा, यह बात उसमें नहीं आती। मृत्यु के बारे में किताब पृष्ठ 116 पर सत्तर वर्ष की आयु बताती है, और काल-रेखा (पृष्ठ 137) में उनके साल 973–1048 देती है।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: एडवर्ड ज़ाख़ाउ का किताब-उल-हिन्द का अनुवाद “अल्बेरूनीज़ इंडिया” (लंदन, 1888), उनकी लंबी भूमिका के साथ; ईरानिका विश्वकोश के अल-बिरूनी पर दो लेख, एक उनके जीवन पर और एक उनके भारत-अध्ययन पर; और ब्रिटैनिका विश्वकोश का अल-बिरूनी पर लेख।

ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी

  • ज़ाख़ाउ के अनुसार अल-बिरूनी का जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ, उस इलाक़े में जहाँ आज ख़ीवा है। ब्रिटैनिका जन्म की तारीख़ 4 सितंबर 973 देता है, और लिखता है कि यह इलाक़ा आज उज़्बेकिस्तान में है। जवानी में ही वे विज्ञान और साहित्य में नाम कमा चुके थे, और अपने देश के शासक राजकुमार के सलाहकार बनकर राजकाज में भी हिस्सा लेते थे। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)
  • ज़ाख़ाउ बताते हैं कि महमूद ख़्वारिज़्म जीतकर ग़ज़नी लौटा तो साथ में बहुत-सा लूट का माल और ख़ीवा की फ़ौज का बड़ा हिस्सा ले गया। हटाए गए राजवंश के राजकुमार और देश के बड़े लोग भी साथ ले जाए गए, कुछ युद्धबंदी बनाकर और कुछ बंधक बनाकर। बंधकों में अल-बिरूनी भी थे। यह सन् 1017 के वसंत और गर्मियों की बात है। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)
  • ईरानिका चहार मक़ाला नाम के एक पुराने ग्रंथ की कहानी बताता है। उसके अनुसार महमूद को ख़्वारिज़्म के शासक के दरबार की शान से जलन थी, इसलिए उसने हुक्म भेजा कि वहाँ के सारे बड़े विद्वान फ़ौरन ग़ज़नी भेजे जाएँ, ताकि उसका अपना दरबार सजे। कहानी कहती है कि दार्शनिक इब्न सीना और एक और विद्वान पश्चिम की ओर भाग निकले, पर अल-बिरूनी ग़ज़नी गए और महमूद की सेवा में आ गए। स्रोत: ईरानिका, अल-बिरूनी का जीवन (अंग्रेज़ी में)
  • ज़ाख़ाउ ने अल-बिरूनी के अपने लिखे को परखकर अंदाज़ा लगाया कि 1017 से 1030 तक के तेरह सालों में उन्हें राजा और उसके बड़े अफ़सरों की कृपा नहीं मिली। वे भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहे, शायद एक ऐसे बंधक या राजनीतिक क़ैदी की तरह जिसके साथ इज़्ज़त का बर्ताव होता था। ख़ाली समय में वे भारत का अध्ययन करते रहे, और इसके लिए उन्हें कोई सरकारी प्रेरणा नहीं थी। ईरानिका भी ज़ाख़ाउ के हवाले से लिखता है कि महमूद के राज में अल-बिरूनी को किसी तरह का सरकारी संरक्षण मिला हो, इसका कोई सबूत नहीं है। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में) · ईरानिका, अल-बिरूनी का जीवन (अंग्रेज़ी में)

किताब-उल-हिन्द: पूरा नाम, समय और तरीक़ा

  • किताब-उल-हिन्द असल में छोटा नाम है। अरबी में पूरा नाम “तहक़ीक़ मा लिल-हिन्द…” से शुरू होता है, और ब्रिटैनिका उसका अर्थ यों देता है: भारत के लोग जो कुछ बताते हैं, उस सबकी जाँच, जो बात बुद्धि को जँचे वह भी और जो न जँचे वह भी। ब्रिटैनिका के अनुसार यह नाम ही पूरी किताब का सार कह देता है। स्रोत: ब्रिटैनिका, अल-बिरूनी (अंग्रेज़ी में)
  • ज़ाख़ाउ के शब्दों में अल-बिरूनी का आम तरीक़ा यह है कि वे ख़ुद कम बोलते हैं और हिंदुओं को बोलने देते हैं: उनके शास्त्रीय लेखकों के ग्रंथों से लंबे-लंबे उद्धरण देते हैं। ज़ाख़ाउ की राय में भारत का ऐसा अध्येता न उनसे पहले हुआ, न उनके बाद। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

पतंजलि का कौन-सा ग्रंथ?

  • ईरानिका के अनुसार यह दूसरी किताब पतंजलि के योगसूत्र का संस्कृत से अरबी में अनुवाद है, जिसका नाम किताब बातंजल (पतंजलि की किताब) है। यह किताब-उल-हिन्द से पहले की रचना है। सांख्य वाला अनुवाद आज नहीं मिलता, पर पतंजलि वाला एक अकेली पांडुलिपि में बच गया। उसे पहले एल. मासिन्यों ने 1922 में खोजा, फिर जे. डब्ल्यू. हाउअर ने 1930 में उसका ब्योरा दिया, और एच. रिटर ने 1956 में उसे छापा। यह योगसूत्र के चार भागों की तरह चार भागों में बँटा है, पर इसमें एक अनाम हिंदू टीकाकार की राय भी जुड़ी है, और ईरानिका के अनुसार संस्कृत पाठ और अल-बिरूनी के अरबी रूप में कई जगह फ़र्क़ है। स्रोत: ईरानिका, अल-बिरूनी का भारत-अध्ययन (अंग्रेज़ी में)

यूनानी ग्रंथ संस्कृत में

  • किताब बताती है कि अल-बिरूनी ने ब्राह्मण मित्रों के लिए यूक्लिड के काम संस्कृत में अनुवाद किए। अल-बिरूनी ख़ुद लिखते हैं कि हिंदू गद्य नहीं चाहते, भले ही वह समझने में आसान हो; उनकी ज़्यादातर किताबें श्लोकों में हैं, और वे ख़ुद श्लोक रचने का अभ्यास कर रहे हैं। इसी में वे हिंदुओं के लिए यूक्लिड की किताबों और अल्मागेस्ट का अनुवाद कर रहे हैं, और उन्हें एस्ट्रोलेब (आकाश के पिंडों की ऊँचाई नापने का यंत्र) बनाने पर एक ग्रंथ लिखवा रहे हैं, सिर्फ़ विज्ञान फैलाने की इच्छा से। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

मृत्यु: कब?

  • किताब पृष्ठ 116 पर कहती है कि सत्तर वर्ष की आयु में मृत्यु तक वे ग़ज़नी में रहे, और काल-रेखा (पृष्ठ 137) में उनके साल 973–1048 देती है; इन दोनों में लगभग पाँच साल का फ़र्क़ है। दूसरे स्रोत भी अलग-अलग साल देते हैं। ज़ाख़ाउ मृत्यु सन् 1048 में बताते हैं। ईरानिका के अनुसार वे तीन दशक से ज़्यादा ग़ज़नवी सुल्तानों के साथ रहे, दरबार के ज्योतिषी के रूप में उनका नाम था, और उनकी मृत्यु हिजरी 442 (सन् 1050) के बाद किसी अनजानी तारीख़ को हुई; ताशकंद के विद्वानों के नए शोध के अनुसार यह तारीख़ 11 दिसंबर 1048 है। ब्रिटैनिका लगभग 1052 देता है, और जगह ग़ज़ना (आज का ग़ज़नी, अफ़ग़ानिस्तान)। ईरानिका यह भी लिखता है कि जीवन के आख़िर में, जब अल-बिरूनी ख़ुद कहते हैं कि उनकी उम्र अस्सी से ऊपर है, उन्होंने दवाओं पर अपनी किताब लिखी, इसलिए वह किताब हिजरी 442 (सन् 1050) के बाद की है। वही लेख यह भी मानता है कि ग़ज़नवियों के यहाँ उनके जीवन के ब्योरे और समय-क्रम बहुत धुँधले हैं। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में) · ईरानिका, अल-बिरूनी का जीवन (अंग्रेज़ी में) · ब्रिटैनिका, अल-बिरूनी (अंग्रेज़ी में)
  • ज़ाख़ाउ की राय में मुसलमानों के बीच भारत के बारे में इस तरह का साहित्य कभी गहरी जड़ नहीं पकड़ सका: 1048 में अल-बिरूनी की मृत्यु के बाद इस क्षेत्र में कोई मौलिक काम नहीं हुआ। किताब भी कहती है: “1500 ई. से पहले भारत में अल–बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा” (पृष्ठ 117)। स्रोत: ज़ाख़ाउ, अल्बेरूनीज़ इंडिया, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब अल-बिरूनी को बंधक बताती है जिसे धीरे-धीरे ग़ज़नी पसंद आने लगा। ज़ाख़ाउ उन्हें महमूद के समय इज़्ज़त से रखा गया बंधक मानते हैं, जिसे राजा की कृपा नहीं मिली; ईरानिका की कहानी में वे महमूद की सेवा में आते हैं और बाद में दरबार के ज्योतिषी के रूप में जाने जाते हैं। ये दोनों बातें मिलकर बताती हैं कि उनकी हैसियत समय के साथ बदली होगी, और यह भी कि उनके ग़ज़नी वाले साल ठीक-ठीक पता नहीं हैं। पतंजलि के ग्रंथ पर भी दो बातें हैं: किताब उसे व्याकरण पर ग्रंथ कहती है, जबकि अल-बिरूनी के अपने शब्द और ईरानिका उसे योगसूत्र का अनुवाद बताते हैं, जिसका विषय आत्मा की मुक्ति है। कक्षा में दोनों बातें बताइए, और परीक्षा में किताब वाली बात लिखवाइए।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि अल-बिरूनी बंधक बनकर ग़ज़नी आए। वहाँ उनकी हालत कैसी थी, और यह जानना उनकी किताब पढ़ने में क्यों काम का है?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब और स्रोत मिलकर यह तस्वीर बनाते हैं:

  • किताब: 1017 में महमूद ख़्वारिज़्म के कई विद्वानों और कवियों को ग़ज़नी ले गया; अल-बिरूनी बंधक के रूप में आए, धीरे-धीरे उन्हें शहर पसंद आने लगा, और बाक़ी जीवन वहीं बीता (पृष्ठ 116)।
  • ज़ाख़ाउ: 1017 के वसंत और गर्मियों में वे बंधकों में ले जाए गए। आगे की बात ज़ाख़ाउ का अनुमान है, जिसे वे काफ़ी हद तक पक्का मानते हैं: 1017 से 1030 तक उन्हें राजा की कृपा नहीं मिली, वे शायद इज़्ज़त से रखे गए बंधक या राजनीतिक क़ैदी जैसे थे, भारत के अलग-अलग हिस्सों में रहे और ख़ाली समय में भारत का अध्ययन करते रहे।
  • ईरानिका: एक पुरानी कहानी में महमूद ख़्वारिज़्म के विद्वानों को ग़ज़नी भेजने का हुक्म देता है और अल-बिरूनी उसकी सेवा में आते हैं, पर सरकारी संरक्षण का कोई सबूत नहीं है।

हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि जिस विद्वान पर राजा की कृपा न हो और जिसे किसी सरकारी काम के लिए न लिखना हो, उसकी किताब का स्वर कैसा होगा। ज़ाख़ाउ के अनुसार किताब-उल-हिन्द इसी दौर के आख़िर में लिखी जा रही थी: जब वे इसे लिख रहे थे, तब महमूद को मरे कुछ ही हफ़्ते हुए थे।

सवाल: किताब के बॉक्स में “पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ” लिखा है। अल-बिरूनी ने पतंजलि का कौन-सा ग्रंथ अरबी में उतारा, इस पर स्रोत क्या कहते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: यहाँ दो बातें हैं, और दोनों बतानी चाहिए:

  • किताब: अल-बिरूनी ने कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, जिनमें पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ भी है (पृष्ठ 116)।
  • अल-बिरूनी के अपने शब्द: उन्होंने दो किताबें अरबी में उतारीं, एक सांख्य, और दूसरी आत्मा को शरीर के बंधनों से छुड़ाने पर, जिसे वे पतंजलि कहते हैं। (ज़ाख़ाउ के अनुवाद में इस नाम के साथ सवालिया निशान है।)
  • ईरानिका: यह दूसरी किताब योगसूत्र का अनुवाद है, नाम किताब बातंजल; इसकी एक पांडुलिपि 1922 में मिली और 1956 में छपी।

हमारी ओर से: परीक्षा में किताब वाली बात लिखवाइए। कक्षा में यह दिखाइए कि अल-बिरूनी के अपने शब्द पढ़ने से बात कैसे साफ़ होती है।

सवाल: किताब-उल-हिन्द का पूरा नाम और अल-बिरूनी का लिखने का तरीक़ा, स्रोत 1 में दिए उनके उद्देश्य से कैसे मेल खाते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: स्रोत 1 में अल-बिरूनी लिखते हैं कि उनकी किताब उन लोगों के काम की है जो हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर बात करना चाहते हैं, और उनके लिए जानकारी का संग्रह है जो उनसे जुड़ना चाहते हैं (पृष्ठ 116)। इससे ये बातें मेल खाती हैं:

  • पूरा नाम: भारत के लोग जो कुछ बताते हैं, उस सबकी जाँच, जो बुद्धि को जँचे वह भी और जो न जँचे वह भी।
  • तरीक़ा: ज़ाख़ाउ के अनुसार वे ख़ुद कम बोलते हैं और हिंदुओं के शास्त्रीय ग्रंथों से लंबे उद्धरण देकर उन्हें बोलने देते हैं।
  • ढाँचा: किताब बताती है कि ज़्यादातर अध्याय एक सवाल से शुरू होते हैं, फिर संस्कृत परंपरा का वर्णन आता है, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना (पृष्ठ 117)।

हमारी ओर से: बच्चों से स्रोत 5 का अंश पढ़वाइए और पूछिए कि उसमें अल-बिरूनी कहाँ अपनी राय दे रहे हैं और कहाँ संस्कृत परंपरा की बात बता रहे हैं।

इब्न बतूता की पूरी यात्रा

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि इब्न बतूता का जन्म तैंजियर के एक ऐसे परिवार में हुआ जो “इस्लामी कानून अथवा शरिया पर अपनी विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था”, और “1332–33 में भारत के लिए प्रस्थान करने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।” वे “सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध” पहुँचे, दिल्ली के क़ाज़ी बने, फिर क़ैद हुए, और “1342 ई. में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया।” (पृष्ठ 118) मालद्वीप में वे अठारह महीने क़ाज़ी रहे; फिर श्रीलंका, बंगाल, असम और सुमात्रा होते हुए चीन पहुँचे, और “1347 में उसने वापस अपने घर जाने का निश्चय किया।” (पृष्ठ 118 और 119) स्रोत 2 में वे कहते हैं, “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी”, और उसी बॉक्स में लिखा है: “इब्न बतूता 1354 में घर वापस पहुँचा, अपनी यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद।” (पृष्ठ 118) किताब यह भी बताती है कि लौटने पर स्थानीय शासक ने उनकी कहानियाँ दर्ज करवाने का निर्देश दिया, और इब्न जुज़ाई को उनके श्रुतलेख लिखने के लिए नियुक्त किया गया (पृष्ठ 120 और 121)। काल-रेखा में उनके नाम के आगे “1304–77” लिखा है (पृष्ठ 137)। किताब यहीं रुकती है: वे किस दिन निकले और बाईस साल की उम्र किस हिसाब से है, भारत आने से पहले का रास्ता, चीन जाते समय कालीकट में क्या हुआ, 1347 के बाद घर तक का रास्ता, रिह्ला का पूरा नाम और वह कब पूरी हुई, विद्वान उस पर कितना भरोसा करते हैं, और उनकी मृत्यु के साल पर स्रोत क्या कहते हैं, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: एच. ए. आर. गिब का रिह्ला के चुने हुए हिस्सों का अनुवाद (1929), उनकी भूमिका के साथ; हकलुइट सोसाइटी के लिए किया गया गिब का पूरा अनुवाद, जिसके पहले और चौथे खंड यहाँ काम आए; महदी हुसैन का रिह्ला के भारत वाले हिस्से का अनुवाद, जो बड़ौदा से छपा; और ईरानिका विश्वकोश का इब्न बतूता पर लेख।

तैंजियर से, 1325

  • गिब के अनुवाद में इब्न बतूता ख़ुद बताते हैं कि वे अपने जन्म के शहर तैंजियर से गुरुवार, 2 रजब 725 हिजरी को निकले। गिब इस तारीख़ को 14 जून 1325 लिखते हैं। उस समय उनकी उम्र बाईस साल थी, और गिब कोष्ठक में साफ़ करते हैं कि ये चंद्र साल हैं, यानी हिजरी कैलेंडर के साल। इरादा था मक्का में पवित्र घर (काबा) का हज और मदीना में पैग़ंबर की क़ब्र की ज़ियारत। वे अकेले निकले, रास्ते का कोई साथी नहीं था। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, 1929 (अंग्रेज़ी में)

सिंधु और दिल्ली

  • महदी हुसैन भारत तक का रास्ता यों बताते हैं। पूर्वी अफ़्रीका से वे एक और हज के लिए मक्का लौटे, फिर भारत की ओर चलना चाहा, पर जद्दा में जहाज़ न मिलने से रुक गए। तब वे उत्तर की ओर मुड़े और एशिया माइनर (आज के तुर्की का बड़ा हिस्सा) का चक्कर लगाकर कुस्तुंतुनिया पहुँचे। वहाँ से पूरब की ओर चले; हुसैन आगे की जगहें इस क्रम में गिनाते हैं: निशापुर, हिंदूकुश, हेरात, काबुल और करमाश। 12 सितंबर 1333 को वे सिंधु नदी पर पहुँचे। किताब इतना ही कहती है कि वे मध्य एशिया के रास्ते 1333 में ज़मीन के रास्ते सिंध पहुँचे (पृष्ठ 118)। स्रोत: हुसैन, द रेह्ला ऑफ़ इब्न बतूता (अंग्रेज़ी में)

चीन का सफ़र और कालीकट

  • किताब बताती है कि दूत बनकर वे मालाबार तट की ओर बढ़े और वहाँ से मालद्वीप गए (पृष्ठ 118)। बीच की एक घटना गिब के चौथे खंड में है। कालीकट में सुल्तान का भेजा तोहफ़ा एक बड़े जहाज़ (जंक) पर लदा था, और इब्न बतूता के साथी उनका सामान एक दूसरे जहाज़ (ककम) में रख चुके थे। वहाँ का समुद्र रोज़ दोपहर ढलते तूफ़ानी हो जाता था और तब कोई जहाज़ पर नहीं चढ़ पाता था, इसलिए इब्न बतूता ने शुक्रवार की रात समुद्र किनारे बिताई। शनिवार की सुबह एक दूसरा जंक किनारे से टकराकर टूट गया, और उसी रात समुद्र ने वह जंक तोड़ दिया जिस पर सुल्तान का तोहफ़ा था, और उस पर सवार सब लोग मारे गए। इस हादसे के बाद वे किनारे पर अकेले रह गए, साथ में बस एक ग़ुलाम था जिसे वे आज़ाद कर चुके थे। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 4 (अंग्रेज़ी में)
  • किताब के अनुसार वे सुमात्रा से एक अन्य जहाज़ से चीनी बंदरगाह जायतुन गए, जिसे आज क्वानझू कहते हैं, चीन में दूर-दूर तक घूमे और बीजिंग तक गए, पर वहाँ ज़्यादा दिन नहीं रुके (पृष्ठ 118 और 119)। गिब लिखते हैं कि सुमात्रा के मुस्लिम शासक ने उन्हें एक जंक दिया, उसी से वे जायतुन पहुँचे, और वे पेकिंग, यानी बीजिंग, तक गए। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

वापसी: 1347 से 1353

  • किताब कहती है कि 1347 में उन्होंने घर लौटने का निश्चय किया। गिब के अनुसार यह फ़ैसला चीन से सुमात्रा होकर मालाबार लौटने पर हुआ। लौटने का रास्ता यह रहा: फ़ारस की खाड़ी से बग़दाद, वहाँ से सीरिया, जहाँ उन्होंने 1348 की “काली मौत” (प्लेग की महामारी) की भयानक तबाही देखी, फिर मिस्र होकर एक बार और हज के लिए मक्का, फिर मिस्र लौटकर अलेक्ज़ैंड्रिया से जहाज़ से ट्यूनीशिया। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

रिह्ला कैसे लिखी गई

  • किताब इसे रिह्ला कहती है। हुसैन बताते हैं कि इसका पूरा नाम “तुहफ़त-उन-नुज़्ज़ार फ़ी ग़राइब-इल-अमसार व अजाइब-इल-असफ़ार” है, यानी पढ़ने वालों के लिए शहरों के अजूबों और सफ़र की अनोखी बातों पर एक बढ़िया किताब। हुसैन के अनुसार यह 756 हिजरी में पूरी हुई; वे इसका दिन ज़ुल-हिज्जा की 3 तारीख़ बताते हैं, और ज़ुल-हिज्जा हिजरी साल का आख़िरी महीना है। स्रोत: हुसैन, द रेह्ला ऑफ़ इब्न बतूता (अंग्रेज़ी में)
  • रिह्ला की कई पूरी प्रतियाँ उत्तर-पश्चिमी अफ़्रीका (मग़रिब) में मिलीं, तब सी. डेफ़्रेमेरी और बी. आर. सांगिनेत्ती ने उसका पाठ फ़्रांसीसी अनुवाद के साथ 1853 से 1858 के बीच पेरिस में चार खंडों में छापा। गिब लिखते हैं कि अलग-अलग प्रतियों के पाठभेदों समेत यही पाठ मानक संस्करण बना हुआ है, और उनका अपना अनुवाद भी इसी पर टिका है। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

कितना भरोसा करें

  • गिब के अनुसार कुछ आलोचकों ने कुस्तुंतुनिया और चीन जाने के उनके दावे पर काफ़ी शक किया है। कुस्तुंतुनिया को लेकर मुश्किलें दो हैं: रास्ते का धुँधला ब्योरा, और यह दावा कि वे वहाँ के पूर्व सम्राट से मिले, जबकि उनके अपने समय-क्रम के हिसाब से वह सम्राट एक साल से ज़्यादा पहले मर चुका था। चीन के बारे में गिब की अपनी राय है कि वह वृत्तांत सच्चा लगता है, भले ही उसे बाक़ी हिस्सों से ज़्यादा संक्षेप में कहा गया है। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, 1929 (अंग्रेज़ी में)
  • ईरानिका साफ़ कहता है कि रिह्ला पूरी तरह भरोसे लायक़ रिकॉर्ड नहीं है, उसकी तारीख़ें अक्सर आपस में मेल नहीं खातीं, और बुलग़ार, यमन, ओमान और पूर्वी अनातोलिया में उनके घूमने की बातें विश्वसनीय नहीं लगतीं। किताब यमन और ओमान को उनकी यात्राओं में गिनाती है (पृष्ठ 118); कक्षा में दोनों बातें बताइए। स्रोत: ईरानिका, इब्न बतूता (अंग्रेज़ी में)
  • शक उस समय भी था। गिब बताते हैं कि इतिहासकार इब्न ख़ल्दून (मृत्यु 1406) ने अपने इतिहास-ग्रंथ की प्रसिद्ध भूमिका (मुक़द्दिमा) में अबू इनान के दरबार में इब्न बतूता के स्वागत का आँखों देखा हाल लिखा है, और यह भी कि उनकी अचरज भरी कहानियों पर लोगों को शक हुआ। इब्न मरज़ूक़ के हवाले से गिब यह भी बताते हैं कि अल-बलफ़ीक़ी नाम के एक व्यक्ति ने उन पर झूठ बोलने का आरोप लगाया था, पर इब्न मरज़ूक़ ने उन्हें इस आरोप से बरी किया। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 1 (अंग्रेज़ी में)

मृत्यु: कब?

(हमारी ओर से) किताब बताती है कि राजा ने इब्न बतूता से कहा कि वे देखे गए शहरों और “अपनी स्मृति में बैठ गई रोचक घटनाओं” का वृत्तांत लिखवाएँ (पृष्ठ 121)। यानी रिह्ला लगभग तीस साल की यात्रा के बाद, याद के सहारे, बोलकर लिखवाई गई। इसीलिए उसमें तारीख़ों की गड़बड़ और एक ही देश की कई यात्राओं का एक में मिल जाना कोई अचरज की बात नहीं, और उनकी कहानियों पर शक उनके अपने समय में भी हुआ था। फिर भी गिब उनके ऐतिहासिक ब्योरों को आम तौर पर भरोसेमंद मानते हैं। बच्चों को यही सिखाइए कि एक यात्री की हर बात को दूसरे स्रोतों से मिलाकर पढ़ा जाता है; अगले हिस्से में डाक का ब्योरा इसका एक उदाहरण है।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: स्रोत 2 में इब्न बतूता कहते हैं कि घर छोड़ते समय उनकी उम्र बाईस वर्ष थी। गिब अपनी एक किताब में इक्कीस साल लिखते हैं। दोनों बातें सही कैसे हो सकती हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: फ़र्क़ कैलेंडर का है:

  • किताब: स्रोत 2 में वे अपनी उम्र बाईस वर्ष बताते हैं (पृष्ठ 118)।
  • तारीख़ें: वे 2 रजब 725 हिजरी, यानी 14 जून 1325 को तैंजियर से निकले; जन्म फ़रवरी 1304 में हुआ था (गिब 24 तारीख़ देते हैं, ईरानिका 17 रजब 703 हिजरी, यानी 25 तारीख़)।
  • हिसाब: हिजरी साल चाँद के हिसाब से चलता है और लगभग ग्यारह दिन छोटा होता है। फ़रवरी 1304 से जून 1325 तक इक्कीस ईसवी साल और कुछ महीने होते हैं, यानी हिजरी हिसाब से लगभग बाईस साल। गिब 1929 वाले अनुवाद में ख़ुद कोष्ठक में लिखते हैं कि बाईस चंद्र साल हैं।

हमारी ओर से: बच्चों से दोनों हिसाब ख़ुद करवाइए। इससे उन्हें समझ आएगा कि पुराने स्रोत की तारीख़ पढ़ते समय पहले यह देखना पड़ता है कि वह किस कैलेंडर में है।

सवाल: रिह्ला के किन हिस्सों पर विद्वान शक करते हैं, और क्यों?

उत्तर देखिए

उत्तर: शक के कई कारण स्रोतों में मिलते हैं:

  • गिब: कुछ रास्ते बनावटी हैं, एक ही देश की कई यात्राएँ जोड़ दी गई हैं; कुस्तुंतुनिया में जिस पूर्व सम्राट से मिलने का दावा है, वह उनके अपने समय-क्रम से पहले ही मर चुका था; पर चीन वाला वृत्तांत गिब को सच्चा लगता है।
  • ईरानिका: रिह्ला पूरी तरह भरोसे लायक़ नहीं, तारीख़ें अक्सर मेल नहीं खातीं, और बुलग़ार, यमन, ओमान और पूर्वी अनातोलिया की यात्राएँ विश्वसनीय नहीं लगतीं। किताब यमन और ओमान को गिनाती है (पृष्ठ 118), इसलिए यहाँ दोनों बातें बताइए।
  • उस समय: इब्न ख़ल्दून लिखते हैं कि अबू इनान के दरबार में उनकी अचरज भरी कहानियों पर लोगों को शक हुआ।

हमारी ओर से: वजह भी किताब में ही है: रिह्ला याद के सहारे, बरसों बाद लिखवाई गई (पृष्ठ 121)। बच्चों से पूछिए कि रिह्ला की कौन-सी बात वे किसी दूसरे स्रोत से मिलाकर जाँच सकते हैं।

सवाल: इब्न बतूता की यात्रा के बड़े पड़ाव क्रम से लगाइए, जहाँ हो सके साल के साथ।

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब और ऊपर के स्रोतों को मिलाकर यह क्रम बनता है:

  • 1325: तैंजियर से अकेले हज के लिए निकले।
  • 1333 से पहले: मक्का, सीरिया, इराक, फ़ारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ़्रीका के बंदरगाह (किताब, पृष्ठ 118); हुसैन के अनुसार एशिया माइनर और कुस्तुंतुनिया भी।
  • 12 सितंबर 1333: सिंधु नदी पर पहुँचे; फिर मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली, जहाँ क़ाज़ी बने और सात-आठ साल सुल्तान की सेवा में रहे (गिब: लगभग सात, ईरानिका: आठ)।
  • 1342: सुल्तान के दूत बनकर चीन की ओर; कालीकट में तोहफ़े वाला जहाज़ डूबा; फिर मालद्वीप, श्रीलंका, बंगाल, असम और सुमात्रा।
  • चीन: जायतुन (आज का क्वानझू) और बीजिंग।
  • 1347: घर लौटने का निश्चय; फिर बग़दाद, सीरिया (1348 का प्लेग), मिस्र और फिर मक्का।
  • नवंबर 1349: फ़ेज़; उसके बाद अंदलुस और माली।
  • 1354: किताब के अनुसार घर वापसी (ईरानिका माली से फ़ेज़ की वापसी दिसंबर 1353 में बताता है); फिर इब्न जुज़ाई को रिह्ला लिखवाई, जो 756 हिजरी में पूरी हुई।

हमारी ओर से: बच्चों से यह क्रम एक नक़्शे पर उतरवाइए। किताब का मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) अफ़ग़ानिस्तान, सिंध और पंजाब वाला हिस्सा दिखाता है; बाक़ी हिस्सा वे ख़ुद जोड़ सकते हैं।

डाक: उलुक और दावा

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि व्यापारियों के लिए “लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय तथा विश्राम गृह स्थापित किए गए थे”, और “इब्न बतूता डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ।” डाक इतनी तेज़ थी कि “जहाँ सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे वहीं गुप्तचरों की खबरें सुलतान तक इस डाक व्यवस्था के माध्यम से मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।” स्रोत 10 (“घोड़े पर और पैदल”) में इब्न बतूता के शब्द हैं: “अश्व डाक व्यवस्था जिसे उलुक कहा जाता है, हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों द्वारा चालित होती है। पैदल डाक व्यवस्था के प्रति मील तीन अवस्थान होते हैं; इसे दावा कहा जाता है, और यह एक मील का एक-तिहाई होता है”। उसी स्रोत में दो हाथ लंबी, ताँबे की घंटियों वाली छड़ लेकर दौड़ते संदेशवाहक का ब्योरा है, और यह भी कि पैदल डाक घोड़े की डाक से तेज़ थी और उससे खुरासान के फल लाए जाते थे (पृष्ठ 129)। किताब यहीं रुकती है: उलुक और दावा शब्द किस भाषा के हैं और उनका मतलब क्या है, इब्न बतूता का “मील” कितना था, डाक से फलों के अलावा और क्या भेजा जाता था, गुप्तचरों की चिट्ठियों में क्या लिखा होता था, दिल्ली से दौलताबाद की सड़क पर डाक कैसी थी, और इब्न बतूता से पहले की डाक के बारे में बरनी क्या लिखते हैं, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: हकलुइट सोसाइटी के लिए किया गया गिब का पूरा अनुवाद, जिसके तीसरे खंड में डाक का यह ब्योरा नोट्स के साथ है; महदी हुसैन का रिह्ला के भारत वाले हिस्से का अनुवाद; और इलियट और डाउसन के इतिहास-संग्रह का तीसरा खंड, जिसमें ज़ियाउद्दीन बरनी की तारीख़-ए-फ़िरोज़शाही के हिस्से अनुवाद में हैं।

दो तरह की डाक

  • गिब के अनुवाद में इब्न बतूता लिखते हैं कि भारत में डाक दो तरह की है। घोड़े की डाक को वहाँ उलुक कहते हैं; इसमें सुल्तान के घोड़े होते हैं, और हर चार मील पर घोड़े बदले जाते हैं। पैदल हरकारों की डाक में हर मील के भीतर तीन चौकियाँ होती हैं, जिन्हें दावा कहते हैं; यानी एक दावा मील का तिहाई हिस्सा है। मील को वहाँ के लोग कुरीह कहते हैं। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)
  • ये शब्द किस भाषा के हैं, यह गिब के नोट्स बताते हैं। उलुक तुर्की शब्द है, यानी डाक के घोड़ों की बदली पर चलने वाला संदेशवाहक। दावा फ़ारसी के “दौ” से है, जिसका अर्थ है दौड़ना। कुरीह उर्दू का “कुरोह” है, जो एक फ़रसख़ का तिहाई होता है; गिब लिखते हैं कि इसे अरबी मील, यानी लगभग दो किलोमीटर, के बराबर मानना मोटा अंदाज़ा ही है। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)
  • महदी हुसैन के नोट्स भी यही दिशा दिखाते हैं। उनके अनुसार उलुक का अर्थ है संदेशवाहक, यानी वह जिसके हाथों संदेश या चिट्ठियाँ आगे भेजी जाती हैं। दावा शायद फ़ारसी शब्द “दवादविया” का छोटा रूप है, जिसका अर्थ है लगातार, या हर दिशा में, दौड़ते रहना। स्रोत: हुसैन, द रेह्ला ऑफ़ इब्न बतूता (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से): गिब के नोट से मोटा हिसाब लगाइए। अगर इब्न बतूता का मील लगभग दो किलोमीटर था, तो एक दावा लगभग दो-तिहाई किलोमीटर बैठता है, और घोड़े हर चार मील पर, यानी लगभग आठ किलोमीटर पर, बदले जाते थे। यह अंदाज़ा ही है, क्योंकि गिब ख़ुद लिखते हैं कि बराबरी मोटे तौर पर ही है।

एक चिट्ठी कैसे दौड़ती थी

  • किताब का स्रोत 10 इसी हिस्से से लिया गया है। गिब के अनुवाद में यह ब्योरा इस तरह है: हर मील के तिहाई हिस्से पर एक आबाद गाँव होता है, जिसके बाहर तीन मंडप होते हैं। उनमें कमर कसे आदमी चल पड़ने को तैयार बैठे रहते हैं, और हर एक के पास दो हाथ लंबी छड़ होती है जिसके सिरे पर ताँबे की घंटियाँ लगी होती हैं। हरकारा शहर से निकलता है तो एक हाथ की उँगलियों में चिट्ठी और दूसरे हाथ में घंटियों वाली छड़ लेकर पूरी ताक़त से दौड़ता है। मंडप में बैठे लोगों में से एक चिट्ठी हाथ में लेता है और छड़ हिलाते हुए पूरी ताक़त से अगले दावा तक दौड़ता है; ऐसे ही चिट्ठी हाथ बदलती हुई अपने ठिकाने तक पहुँचती है। इब्न बतूता के अनुसार यह पैदल डाक घोड़े की डाक से तेज़ थी। किताब के हिंदी पाठ में गाँवों की यह दूरी “हर तीन मील पर” छपी है; गिब के अनुवाद में यह मील का तिहाई हिस्सा है, और किताब का पिछला वाक्य भी दावा को “एक मील का एक-तिहाई” बताता है। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से): इब्न बतूता यह नहीं बताते कि पैदल डाक तेज़ क्यों थी। एक वजह ब्योरे में ही दिखती है: हर हरकारे को मील का बस तिहाई हिस्सा दौड़ना होता था, इसलिए वह पूरी ताक़त से दौड़ सकता था, और अगले मंडप में ताज़ा आदमी तैयार बैठा मिलता था। बच्चों से यही बात अपने शब्दों में निकलवाइए।

डाक से और क्या आता था

  • किताब बताती है कि पैदल डाक से खुरासान के फल लाए जाते थे, जो भारत में बड़ी नेमत माने जाते थे। गिब के अनुवाद में इब्न बतूता आगे लिखते हैं कि इसी तरह बड़े अपराधियों को भी लाया जाता था: हर आदमी को एक खटोले पर रखते और हरकारे उस खटोले को सिर पर उठाकर दौड़ते। सुल्तान जब दौलताबाद में होते, तो उनके पीने का पानी भी इसी तरह गंगा नदी से आता था, जहाँ हिंदू तीर्थ के लिए जाते हैं और जो दौलताबाद से चालीस दिन की दूरी पर है। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)
  • किताब की “गुप्तचरों की खबरें” वाली बात गिब के अनुवाद में और खुलकर आती है। सिंध से सुल्तान की राजधानी दिल्ली पचास दिन का रास्ता है, पर ख़ुफ़िया अधिकारी सिंध से सुल्तान को लिखते हैं तो डाक से चिट्ठी पाँच दिन में पहुँच जाती है। जब कोई परदेसी सुल्तान के देश में आता है, तो ये अधिकारी उसके बारे में पूरी बारीकी और विस्तार से लिखते हैं: वह कैसा दिखता है और क्या पहनता है, उसके साथ कितने लोग, ग़ुलाम, नौकर और जानवर हैं, चलते और ठहरते समय उसका बर्ताव कैसा है, और वह क्या-क्या करता है। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से): 1333 में इब्न बतूता ख़ुद परदेसी बनकर सिंधु नदी पर पहुँचे थे। उनके बारे में भी ऐसी ही चिट्ठी दिल्ली गई होगी। बच्चों से पूछिए कि उस चिट्ठी में क्या-क्या लिखा गया होगा।

दिल्ली से दौलताबाद: चालीस दिन का बाज़ार

  • किताब के मुख्य पाठ में भी लिखा है कि दौलताबाद से दिल्ली चालीस दिन का रास्ता था (पृष्ठ 119)। गिब के अनुवाद में इब्न बतूता इस सड़क का ब्योरा देते हैं। सड़क के दोनों ओर विलो और दूसरे पेड़ लगे थे, इसलिए उस पर चलने वाले को लगता मानो वह किसी बाग़ में चल रहा हो। इस सड़क के हर मील पर तीन दावा, यानी डाक-चौकियाँ थीं, और हर दावा पर मुसाफ़िर की ज़रूरत की हर चीज़ मिलती थी; इसलिए लगता था मानो वह चालीस दिन लंबे एक ही बाज़ार से गुज़र रहा हो। हर पड़ाव पर सुल्तान के लिए एक महल और मुसाफ़िरों के लिए एक सराय थी, इसलिए ग़रीब आदमी को इस सड़क पर रसद साथ लेकर चलने की ज़रूरत नहीं थी। स्रोत: गिब, इब्न बतूता की यात्राएँ, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)

इब्न बतूता से पहले: बरनी का ब्योरा

  • ज़ियाउद्दीन बरनी ने दिल्ली के सुल्तानों का इतिहास लिखा। लद्दर देव के क़िले पर मलिक काफ़ूर की चढ़ाई का ब्योरा, जहाँ से काफ़ूर 710 हिजरी में लौटे, पूरा करने के बाद बरनी लिखते हैं कि सुल्तान जब सेना को मुहिम पर भेजते, तो रास्ते में जहाँ-जहाँ चौकी टिक सकती थी, डाक-चौकियाँ बनवाते, पहले पड़ाव तिलपत से शुरू करके। हर चौकी पर घोड़ों की बदली तैयार रहती, हर आधे या चौथाई कोह पर हरकारे बैठाए जाते, और जिस शहर या जगह घोड़े रखे जाते, वहाँ अधिकारी और ख़बर लिखने वाले नियुक्त होते। हर दिन, या हर दो-तीन दिन में, सेना की बढ़त की ख़बर सुल्तान तक आती और सुल्तान की सेहत की ख़बर सेना तक जाती; इससे शहर या सेना में झूठी ख़बरें नहीं फैल पाती थीं। स्रोत: इलियट और डाउसन, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)
  • बलबन के बारे में बरनी लिखते हैं कि इंसाफ़ पक्का करने के लिए उन्होंने सारी जागीरों में भरोसे के ख़ुफ़िया ख़बरनवीस बैठाए, जिन्हें बरीद कहते थे। बरनी एक क़िस्सा भी देते हैं। बदायूँ की जागीर वाले मलिक बक़बक़ ने नशे में अपने एक घरेलू नौकर को कोड़ों से पिटवाकर मरवा डाला। कुछ समय बाद सुल्तान बदायूँ गए, तो उस आदमी की विधवा ने शिकायत की, और सुल्तान ने मलिक बक़बक़ को विधवा के सामने कोड़ों से मरवा दिया। बदायूँ की जागीर पर नज़र रखने के लिए जो बरीद तैनात थे और जिन्होंने कोई ख़बर नहीं भेजी थी, उन्हें फाँसी दी गई। स्रोत: इलियट और डाउसन, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से): इन ब्योरों को साथ रखकर पढ़िए तो किताब की दो बातें, “डाक प्रणाली” और “गुप्तचरों की खबरें”, एक ही व्यवस्था के दो हिस्से दिखते हैं: हरकारे और घोड़े ख़बर ढोते थे, और बरीद या ख़बर लिखने वाले ख़बर लिखते थे। बलबन का समय और मलिक काफ़ूर की लद्दर देव वाली मुहिम का दौर, दोनों इब्न बतूता के भारत आने से पहले के हैं, इसलिए यह व्यवस्था इब्न बतूता की देखी हुई डाक से पुरानी थी। किताब का “चर्चा कीजिए” पूछता है कि इब्न बतूता अनजानी चीज़ों का वर्णन कैसे करते थे (पृष्ठ 129); डाक वाला यही हिस्सा इसका अच्छा उदाहरण है, नीचे का तीसरा सवाल देखिए।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब पूछती है: “क्या आपको लगता है कि पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?” (पृष्ठ 129) स्रोत इसके बारे में क्या दिखाते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: स्रोत जिन रास्तों का नाम लेते हैं, वे सब सुल्तान के बड़े रास्ते हैं:

  • सिंध से दिल्ली: यात्रा पचास दिन की, पर ख़ुफ़िया चिट्ठी पाँच दिन में।
  • दिल्ली से दौलताबाद: हर मील पर तीन दावा; और सड़क आगे तिलिंग और मअबर तक।
  • गंगा से दौलताबाद: सुल्तान के पीने का पानी, चालीस दिन की दूरी से।
  • बरनी: चौकियाँ वहीं बनती थीं “जहाँ-जहाँ चौकी टिक सकती थी”, यानी सेना के रास्ते पर।

पूरे उपमहाद्वीप में ऐसी डाक चलती थी, यह इन स्रोतों से नहीं दिखता।

हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि हर मील पर तीन चौकियाँ, हर चौकी पर तैयार आदमी और हर चार मील पर घोड़े रखने में कितना ख़र्च और कितना इंतज़ाम लगता होगा। इसी से वे समझ जाएँगे कि यह डाक वहीं चल सकती थी जहाँ सुल्तान की पकड़ मज़बूत थी।

सवाल: सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, पर ख़ुफ़िया चिट्ठी पाँच दिन में पहुँच जाती थी। यह कैसे होता था?

उत्तर देखिए

उत्तर: चिट्ठी किसी एक आदमी के साथ नहीं, हाथ बदलती हुई चलती थी:

  • हर मील के तिहाई हिस्से पर एक दावा, यानी चौकी, थी, जहाँ हरकारे तैयार बैठे रहते थे।
  • हरकारा एक हाथ में चिट्ठी और दूसरे में घंटियों वाली छड़ लेकर पूरी ताक़त से दौड़ता, और अगले दावा पर चिट्ठी दूसरे हरकारे को मिल जाती।
  • ऐसे ही चिट्ठी ठिकाने तक पहुँचती। इब्न बतूता के अनुसार यह पैदल डाक घोड़े की डाक से भी तेज़ थी।

हमारी ओर से: बच्चों से हिसाब करवाइए कि चिट्ठी आम मुसाफ़िर से कितने गुना तेज़ थी (पचास दिन बनाम पाँच दिन, यानी दस गुना)।

सवाल: किताब का “चर्चा कीजिए” पूछता है कि इब्न बतूता ऐसी चीज़ों का वर्णन कैसे करते थे जिनसे उनके पाठक अनजान थे (पृष्ठ 129)। डाक वाले हिस्से से इसके उदाहरण दीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: डाक वाले हिस्से में ही कई तरीक़े दिखते हैं:

  • वहाँ के नाम: वे स्थानीय नाम देते हैं, उलुक, दावा और कुरीह, और साथ में बताते हैं कि उनका मतलब क्या है।
  • जानी-पहचानी नाप: दूरी मील और दिनों में, छड़ की लंबाई हाथ में।
  • छोटे ब्योरे: तीन मंडप, ताँबे की घंटियाँ, एक हाथ में चिट्ठी और दूसरे में छड़।
  • तुलना: पेड़ों वाली सड़क बाग़ जैसी, और चौकियों वाली सड़क चालीस दिन लंबे बाज़ार जैसी।

हमारी ओर से: बच्चों से कहिए कि वे अपने गाँव या शहर की कोई चीज़ ऐसे आदमी के लिए लिखें जिसने उसे कभी नहीं देखा, और इन्हीं चार तरीक़ों में से कम से कम दो काम में लें।