अध्याय 2राजा, किसान और नगर

पाठ्यपुस्तक से आगे46 मिनटस्रोत जाँचे गए

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 28 से 52

यह पन्ना किसलिए — किताब के तीन विषयों को और गहराई से समझाने के लिए: ब्राह्मी लिपि पढ़ी कैसे गई, असोक के अभिलेख कहाँ-कहाँ मिले और किसने खोजे (राजस्थान के बैराट के साथ), और सारनाथ का सिंह शीर्ष। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर उसके आगे की बातें, स्रोत के लिंक के साथ, और अंत में कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।

परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। यहाँ की बातें किताब की बात को खोलकर समझाने के लिए हैं। पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।

ब्राह्मी कैसे पढ़ी गई

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “भारतीय अभिलेख विज्ञान में एक उल्लेखनीय प्रगति 1830 के दशक में हुई, जब ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला।” (पृष्ठ 28) प्रिंसेप को ज़्यादातर अभिलेखों और सिक्कों पर “पियदस्सी, यानी मनोहर मुखाकृति वाले राजा का नाम” मिला, और “कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम असोक भी लिखा है” (पृष्ठ 28-29)। पृष्ठ 46 पर किताब कहती है कि विद्वान कई बार इन अभिलेखों को संस्कृत में मानकर चले, “जबकि प्राचीनतम अभिलेख वस्तुत: प्राकृत में थे”, और फिर “जेम्स प्रिंसेप ने असोककालीन ब्राह्मी लिपि का 1838 ई. में अर्थ निकाल लिया”। खरोष्ठी हिंद-यूनानी राजाओं के उन सिक्कों से पढ़ी गई जिन पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों में लिखे थे (पृष्ठ 46-47)। किताब यहीं रुकती है: ब्राह्मी की कुंजी प्रिंसेप को कहाँ मिली, पहला लंबा अभिलेख कौन-सा पढ़ा गया, और पियदस्सी को असोक से किसने जोड़ा, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: कोलकाता की एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका के 1837 और 1838 के अंक, जिनमें प्रिंसेप और जॉर्ज टर्नर ने अपनी खोजें ख़ुद छापीं; और विद्वान ई. हुल्त्श का असोक के सभी अभिलेखों का बड़ा संग्रह (Corpus Inscriptionum Indicarum), जिसकी भूमिका 1922 में लिखी गई।

कुंजी: साँची के छोटे दान-लेख

  • इंजीनियर दस्ते के कैप्टन एड. स्मिथ ने एशियाटिक सोसाइटी के लिए साँची (भिलसा के पास) के छोटे अभिलेखों की नक़लें उतारीं, और सोसाइटी के सचिव प्रिंसेप ने जून 1837 की पत्रिका में इन पर लेख लिखा। ये लेख छोटे थे और लगभग हर लेख किसी के नाम के बाद एक ही शब्द पर ख़त्म होता था: “दानं”, यानी “का दान”। बार-बार आने वाला यह शब्द प्रिंसेप की कुंजी बना। प्रिंसेप के अपने शब्दों में, इसके सहारे कुछ ही मिनटों में पूरी वर्णमाला उनके हाथ आ गई, और उन्होंने उसे दिल्ली के स्तंभ के लंबे अभिलेख पर आज़माया। स्रोत: एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका, 1837 (अंग्रेज़ी में)

पहला लंबा अभिलेख: दिल्ली का स्तंभ

  • असोक का जो अभिलेख सबसे पहले पूरा पढ़ा गया और जिसका अनुवाद हुआ, वह दिल्ली-टोपरा स्तंभ का था; प्रिंसेप ने यह काम 1837 में किया। इसके शुरुआती शब्द उन्होंने इस तरह पढ़े: “देवानंपिय पियदसि लाजा हेवं आहा”, यानी “देवताओं के प्रिय पियदस्सी राजा ऐसा कहते हैं”। भाषा के बारे में उन्होंने लिखा कि यह संस्कृत नहीं, उसका बोलचाल वाला रूप है, वैसा ही जैसा श्रीलंका और बर्मा के आवा राज्य के पालि ग्रंथों में बचा है। किताब पृष्ठ 46 पर यही बात कहती है: अभिलेख संस्कृत में नहीं, प्राकृत में थे। स्रोत: एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका, 1837 (अंग्रेज़ी में) · हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

पियदस्सी कौन था?

  • यह गुत्थी श्रीलंका में जॉर्ज टर्नर ने सुलझाई। वे वहाँ की अंग्रेज़ी सरकार में अफ़सर थे और पालि ग्रंथ पढ़ते थे। श्याम (आज का थाईलैंड) से श्रीलंका लाए गए पालि ग्रंथों के एक संग्रह में उन्हें दीपवंस मिला, और उसमें असोक को पियदस्सी भी कहा गया था। टर्नर ने यह बात प्रिंसेप को चिट्ठी में लिखी, और प्रिंसेप ने वह चिट्ठी सितंबर 1837 की पत्रिका में छाप दी। दिसंबर 1837 की पत्रिका में टर्नर ने पालि ग्रंथों की और पंक्तियाँ दीं। एक पंक्ति कहती है कि राजकुमार पियदास छत्र धारण करके “असोक धम्मराजा”, यानी धर्म पर चलने वाला राजा, कहलाएगा। स्रोत: एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका, 1837, भाग 2 (अंग्रेज़ी में)
  • मार्च 1838 में प्रिंसेप ने ख़ुद लिखा कि पियदस्सी की असोक के रूप में पहचान “हम टर्नर की खोज की बदौलत” जानते हैं। उसी लेख में उन्होंने बताया कि गया के पास नागार्जुनी पहाड़ी की गुफाओं में असोक के पोते दशरथ का नाम भी पढ़ लिया गया है, और बैक्ट्रिया के सिक्कों पर अगाथोक्लीज़ और पेंटालियन जैसे यूनानी राजाओं के नाम इसी पुरानी भारतीय लिपि में लिखे मिले हैं। स्रोत: एशियाटिक सोसाइटी की पत्रिका, 1838 (अंग्रेज़ी में) · हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब का 1838 (पृष्ठ 46, और पृष्ठ 51 की समय-रेखा) इसी कहानी का एक पड़ाव है: 1837 में अक्षर खुले और पहला लंबा अभिलेख पढ़ा गया, और 1838 तक प्रिंसेप पियदस्सी को असोक मानकर दूसरे अभिलेख और सिक्के पढ़ रहे थे। ब्राह्मी का पढ़ा जाना कई लोगों का, कई महीनों का काम था।

मास्की, 1915: अभिलेख में असोक का नाम

  • प्रिंसेप और टर्नर के समय पियदस्सी को असोक से जोड़ने का आधार श्रीलंका के ग्रंथ थे, कोई अभिलेख नहीं। 1915 में सोने की खदान के इंजीनियर सी. बीडन को मास्की में एक अभिलेख मिला (मास्की किताब के मानचित्र 2 में लघुशिलालेखों में है)। इसमें राजा को “देवानंपिय” के साथ “असोक” भी कहा गया है। हुल्त्श लिखते हैं कि यह नाम तब तक केवल बौद्ध ग्रंथों और पुराणों से जाना जाता था, यानी किसी अभिलेख में असोक का नाम पहली बार यहीं पढ़ा गया। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

खरोष्ठी: चार विद्वानों का साझा काम

  • खरोष्ठी दाएँ से बाएँ लिखी जाती है। हुल्त्श के अनुसार इसे पढ़ने का श्रेय चार विद्वानों में बँटता है: प्रिंसेप, लासेन, नॉरिस और कनिंघम। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • महाराजा रणजीत सिंह की सेवा में रहे अफ़सर कोर्ट (जो बाद में जनरल बने) ने 1836 में ख़बर दी कि शहबाज़गढ़ी के पास एक चट्टान पर खरोष्ठी में अभिलेख है, और कुछ अक्षर ख़ुद नक़ल करके भेजे। 1838 में सी. मैसन ने एक युवक के ज़रिए कपड़े पर उसकी अधूरी छाप मँगवाई, और फिर ख़ुद वहाँ जाकर नई नक़लें तैयार कीं। हुल्त्श लिखते हैं कि उस समय उस अशांत इलाके से गुज़रना बड़े जोखिम का काम था। मैसन की सामग्री यूरोप पहुँची, जहाँ नॉरिस ने उसमें सबसे पहले “देवानंपियस” (“देवताओं के प्रिय का”) शब्द पढ़ा। इसी की मदद से पहचाना गया कि शहबाज़गढ़ी का अभिलेख असोक के एक शिलालेख की ही प्रति है। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब सिक्कों वाला रास्ता बताती है (पृष्ठ 46-47): सिक्कों पर दोनों लिपियों में लिखे नामों से अक्षर मिले। शहबाज़गढ़ी की कहानी बताती है कि फिर उन्हीं अक्षरों से चट्टानों के लंबे अभिलेख पढ़े गए, और उनमें वही “देवानंपिय” निकला जो ब्राह्मी अभिलेखों में पढ़ा जा चुका था।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि प्रिंसेप ने ब्राह्मी का अर्थ 1838 में निकाला (पृष्ठ 46), और यह भी कि यह प्रगति 1830 के दशक में हुई (पृष्ठ 28)। यह काम एक दिन में क्यों नहीं हुआ होगा?

उत्तर देखिए

उत्तर: यह कई पड़ावों में हुआ:

  • 1837, साँची: छोटे दान-लेखों में बार-बार आने वाले “दानं” से अक्षर खुले।
  • 1837, दिल्ली: दिल्ली-टोपरा स्तंभ का अभिलेख पूरा पढ़ा गया, और पता चला कि भाषा संस्कृत नहीं, प्राकृत है।
  • सितंबर 1837, श्रीलंका से चिट्ठी: टर्नर ने दीपवंस के आधार पर लिखा कि असोक का एक नाम पियदस्सी था; दिसंबर 1837 में उन्होंने पालि ग्रंथों की और पंक्तियाँ छापीं।
  • 1838: प्रिंसेप ने लिखा कि यह पहचान टर्नर की खोज से मिली, और वे इसी आधार पर और अभिलेख और सिक्के पढ़ रहे थे।

हमारी ओर से: परीक्षा में किताब का साल 1838 ही लिखिए। कक्षा में यह बताइए कि लिपि पढ़ना कई लोगों का साझा काम था: नक़ल उतारने वाले अफ़सर, प्रिंसेप, और श्रीलंका में बैठे टर्नर।

सवाल: ज़्यादातर अभिलेखों में राजा का नाम पियदस्सी है। फिर इतिहासकार उसे असोक कैसे मान पाए?

उत्तर देखिए

उत्तर: सबूत अलग-अलग रास्तों से, अलग-अलग समय पर मिले:

  • ग्रंथों से (1837): श्रीलंका के पालि ग्रंथ दीपवंस में असोक को पियदस्सी भी कहा गया है; यह टर्नर ने दिखाया।
  • अभिलेखों की आपसी तुलना से: किताब बताती है (पृष्ठ 47) कि असोक का नाम कुछ अभिलेखों में उनकी उपाधियों के साथ मिलता है, और अभिलेखशास्त्रियों ने पाया कि इन अभिलेखों के “विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान सबमें समानता है”, इसलिए वे इस नतीजे पर पहुँचे कि इन्हें एक ही शासक ने बनवाया था।
  • अभिलेख में नाम (1915): असोक का नाम लेने वाला पहला अभिलेख 1915 में मास्की में मिला; उसमें राजा को “देवानंपिय” के साथ “असोक” भी कहा गया है।

हमारी ओर से: यह इतिहासकार के काम का अच्छा उदाहरण है। एक स्रोत से अनुमान बनता है, और बरसों बाद दूसरा स्रोत उसे पक्का करता है। प्रिंसेप का पहला अनुमान (श्रीलंका का राजा) ग़लत निकला; इतिहास में अनुमान बदलना भी काम का हिस्सा है।

असोक के अभिलेख कहाँ-कहाँ

किताब कहाँ रुकती है। किताब कहती है: “असोक वह पहला सम्राट था जिसने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए थे।” (पृष्ठ 32) मानचित्र 2 (पृष्ठ 33) महाशिलालेख, लघुशिलालेख और स्तंभ अभिलेखों की जगहें दिखाता है। किताब यह भी बताती है कि ज़्यादातर अभिलेख प्राकृत में हैं, जबकि “अरामेइक और यूनानी लिपियों का प्रयोग अफ़गानिस्तान में मिले अभिलेखों में किया गया था” (पृष्ठ 32)। पृष्ठ 48 का स्रोत 11, “राजा की वेदना”, कलिंग की लड़ाई का असोक का अपना बयान है: “डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई।” किताब यहीं रुकती है: अभिलेख गिनती में कितने हैं, कौन-सा कहाँ और किसने खोजा, स्रोत 11 कौन-सा अभिलेख है, और राजस्थान के बैराट में क्या लिखा मिला, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें ज़्यादातर हुल्त्श के असोक के अभिलेखों के संग्रह से हैं, और कंधार की बात वेनिस के का’ फ़ोस्कारी विश्वविद्यालय की शोध-पत्रिका के 2018 के एक लेख के सार से। दोनों अंग्रेज़ी में हैं।

गिनती: चौदह शिलालेख, सात स्तंभ-लेख

  • असोक के बड़े शिलालेखों का एक सेट चौदह लेखों का है। चौदहों लेख पूरे चार जगह मिले: गिरनार, कलसी, शहबाज़गढ़ी और मानसेहरा। धौली और जौगड़ में इनमें से ज़्यादातर लेख हैं (इनकी बात आगे है)। स्तंभों पर सात लेख हैं; पहले छह दूसरे स्तंभों पर भी मिले हैं, पर सातवाँ और सबसे लंबा लेख केवल दिल्ली-टोपरा स्तंभ पर है। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • बहुत-से लेख “देवताओं के प्रिय पियदस्सी राजा ऐसा कहते हैं” से शुरू होते हैं। हुल्त्श के अनुसार यह शुरुआत ईरान के हख़ामनी राजाओं के अभिलेखों की याद दिलाती है, जो “राजा दारा कहता है” जैसे वाक्य से शुरू होते थे। उनके अनुसार घंटी के आकार वाले स्तंभ-शीर्ष की शैली भी पर्सेपोलिस (ईरान) से आई। सारनाथ के शीर्ष की बात आगे है। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

कलिंग: जहाँ स्रोत 11 नहीं खुदा

  • किताब का स्रोत 11 असोक के तेरहवें बड़े शिलालेख का हिस्सा है। हुल्त्श के अनुवाद में भी यही बातें हैं: अभिषेक के आठ साल बाद कलिंग जीता गया, डेढ़ लाख लोग वहाँ से ले जाए गए, एक लाख मारे गए, और उससे कई गुना लोग मरे। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • अचरज की बात यह है कि कलिंग में ही, धौली और जौगड़ की चट्टानों पर, यह तेरहवाँ लेख नहीं है। वहाँ ग्यारहवें से तेरहवें लेख की जगह दो अलग लेख खुदे हैं। हुल्त्श का अनुमान है कि ये तीन लेख, या कम से कम तेरहवाँ, वहाँ ठीक नहीं बैठते थे, क्योंकि कलिंग नया-नया जीता गया इलाका था और वहाँ के अफ़सरों के लिए अलग आदेश चाहिए थे। धौली के ये दो अलग लेख तोसलि के महामात्रों के नाम हैं, जिनके मुखिया एक राजकुमार थे। तोसलि को किताब मौर्य साम्राज्य के चार प्रांतीय केंद्रों में गिनती है (पृष्ठ 32)। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

खोज की कहानियाँ

  • धौली, 1837: भुवनेश्वर से लगभग सात मील दक्षिण की इस चट्टान को लेफ़्टिनेंट किटो ने 1837 में खोजा और इसे “अश्वत्थामा” नाम से दर्ज किया। चट्टान पर ठोस पत्थर में तराशा हुआ हाथी का अगला आधा हिस्सा है, लगभग चार फ़ुट ऊँचा। किटो की नक़लें देखकर प्रिंसेप ने पाया कि धौली का ज़्यादातर पाठ गिरनार के लेखों जैसा ही है। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • कलसी, 1860: फ़ॉरेस्ट ने 1860 की शुरुआत में यह चट्टान खोजी। तब अक्षर काई की पुरानी काली परत के नीचे लगभग दिख ही नहीं रहे थे। चट्टान के दाईं ओर हाथी की आकृति की रेखाएँ खिंची हैं। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • सोपारा, 1882: बंबई के ठाणे ज़िले के सोपारा में पंडित भगवानलाल इंद्रजी को 1882 में बेसाल्ट पत्थर का एक टूटा टुकड़ा मिला, जिस पर आठवें शिलालेख का लगभग एक-तिहाई हिस्सा है। हुल्त्श के अनुसार इससे लगता है कि यहाँ कभी चौदह लेखों का पूरा सेट रहा होगा। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • कंधार, 1957 और 1963: किताब बताती है कि अफ़ग़ानिस्तान के अभिलेखों में अरामेइक और यूनानी का प्रयोग हुआ (पृष्ठ 32)। कंधार से असोक के दो ऐसे लेख मिले: पहला 1957 में, जो यूनानी और अरामेइक, दोनों भाषाओं में है, और दूसरा 1963 में, केवल यूनानी में। दोनों में असोक के बदलाव और उसके नैतिक सिद्धांतों का सार है, जो कलिंग की ख़ूनी लड़ाई के बाद आया। स्रोत: का’ फ़ोस्कारी विश्वविद्यालय, वेनिस की शोध-पत्रिका (अंग्रेज़ी में)

गिरनार: एक चट्टान, कई राजा

  • जूनागढ़ के पास गिरनार की चट्टान पर असोक के चौदह लेख हैं। मेजर जेम्स टॉड दिसंबर 1822 में यहाँ आए, तब अभिलेख शायद पूरा था। बाद में एक धर्मप्रेमी सेठ जूनागढ़ से पक्का रास्ता बनवा रहे थे; उनके मज़दूरों ने बारूद से चट्टान तोड़ी, और पाँचवें और तेरहवें लेख के कुछ हिस्से उड़ गए। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • इसी चट्टान पर रुद्रदमन का वह अभिलेख भी है जिसकी बात किताब स्रोत 5 में करती है (पृष्ठ 38)। किताब कहती है कि सुदर्शन झील “मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल” ने बनवाई थी। हुल्त्श के अनुसार रुद्रदमन का अभिलेख उस राज्यपाल का नाम भी देता है: चंद्रगुप्त मौर्य के प्रांतीय राज्यपाल, वैश्य पुष्यगुप्त। वह यह भी कहता है कि बाद में असोक मौर्य के लिए यवन राजा तुषास्फ ने झील में नालियाँ बनवाईं। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब बताती है कि इसी पाषाण-खंड पर लगभग पाँचवीं सदी का एक और अभिलेख है, जिसके अनुसार गुप्त वंश के एक शासक ने झील की फिर मरम्मत करवाई (पृष्ठ 38)। यानी एक ही चट्टान पर चंद्रगुप्त मौर्य के समय से गुप्त काल तक, कई सौ साल की एक झील की कहानी लिखी है, और साथ में असोक के चौदह लेख।

राजस्थान: बैराट के दो अभिलेख

  • जयपुर शहर से लगभग 42 मील उत्तर-उत्तरपूर्व में बैराट है। यहाँ भीम-की-डूँगरी नाम की पहाड़ी के ठीक नीचे अलग पड़ी एक शिला पर असोक का एक लघु शिलालेख है, जिसे कार्लाइल ने 1871-72 में खोजा। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • दूसरा अभिलेख कैप्टन बर्ट को 1840 में बैराट से सटी एक पहाड़ी पर मिला। कनिंघम के अनुसार यह पहाड़ी कस्बे से लगभग एक मील दक्षिण-पश्चिम में है, लगभग 200 फ़ुट ऊँची, और लोग इसे “बीजक पहाड़”, यानी अभिलेख वाली पहाड़ी, कहते थे। उस पर खंडहर हैं, जिन्हें कनिंघम ने दो बौद्ध मठों के अवशेष माना। यह शिला कोलकाता पहुँची; 1920 के दशक की शुरुआत में हुल्त्श ने लिखा कि वह वहाँ एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल के पास रखी है, इसलिए इसे कलकत्ता-बैराट अभिलेख कहते हैं। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • इसी शिला को लंबे समय तक “भाब्रा अभिलेख” कहा गया। हुल्त्श के अनुसार इस नाम में दोहरी भूल है: गाँव का नाम भाब्रा नहीं, भाब्रू है, और भाब्रू बैराट से बारह मील दूर है, जबकि शिला बैराट के पास मिली थी। किताब के मानचित्र 2 में बैराट और भाब्रू, दोनों लघुशिलालेखों में हैं (पृष्ठ 33); भाब्रू नाम से जाना जाने वाला लेख यही कलकत्ता-बैराट शिला है। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • इस शिला पर राजा ख़ुद को मगध का राजा पियदसि कहता है, संघ को प्रणाम करता है, और बुद्ध, धम्म और संघ में अपनी श्रद्धा बताता है। फिर वह भिक्षुओं, भिक्षुणियों, उपासकों और उपासिकाओं से धम्म के सात पाठ पढ़ने को कहता है, जो उसने ख़ुद चुने थे। ये सातों पाठ बौद्ध ग्रंथों में खोज लिए गए हैं। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब के अनुसार असोक का धम्म सबके लिए था: बड़ों का आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों से अच्छा व्यवहार, और दूसरों के धर्मों का आदर (पृष्ठ 32)। बैराट की शिला राजा का अपना झुकाव दिखाती है, जो बौद्ध संघ की ओर था। राजा की निजी श्रद्धा एक बात है और प्रजा के लिए लिखा धम्म दूसरी; बैराट में दोनों को साथ रखकर देखा जा सकता है।

टोपरा और मेरठ से दिल्ली: फ़िरोज़ शाह के स्तंभ

  • मानचित्र 2 के टोपरा और मेरठ, दोनों के स्तंभ सुल्तान फ़िरोज़ शाह (शासन 1351-88) दिल्ली ले गए। टोपरा का स्तंभ हल्के गुलाबी बलुआ पत्थर का एक ही टुकड़ा है, 42 फ़ुट 7 इंच लंबा, जिसका ऊपरी 35 फ़ुट हिस्सा ख़ूब चमकाया गया है। शम्स-ए-सिराज के बयान के अनुसार इसे बयालीस पहियों की गाड़ी पर यमुना के किनारे तक लाया गया, फिर बड़ी नावों पर नदी के रास्ते फ़िरोज़ाबाद (दिल्ली) पहुँचाया गया, और सुल्तान के महल के ऊपर खड़ा किया गया। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
  • मेरठ का स्तंभ फ़िरोज़ शाह ने दिल्ली के रिज पर अपने शिकार-महल (कुश्क-ए-शिकार) में खड़ा करवाया। उस पर पहले पाँच स्तंभ-लेख हैं, कुछ घिसे हुए। बाद में यह पाँच टुकड़ों में टूटा मिला; एक पुराने बयान के अनुसार शायद पास के बारूदख़ाने में हुए धमाके से। अठारहवीं सदी के बीच में पादरी टीफ़ेनथालर ने ये पाँच टुकड़े रिज पर पड़े देखे। फिर लेख वाला हिस्सा काटकर कोलकाता में एशियाटिक सोसाइटी के संग्रहालय भेजा गया; बाद में वह दिल्ली लौटाया गया और स्तंभ फिर अपनी पुरानी जगह खड़ा किया गया। स्रोत: हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) मानचित्र 2 स्तंभों की मूल जगहें दिखाता है। ये दोनों स्तंभ फ़िरोज़ शाह के समय से दिल्ली में हैं, यानी असोक के स्तंभ बाद के शासकों के लिए भी देखने और दिखाने की चीज़ थे।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: स्रोत 11, “राजा की वेदना” (पृष्ठ 48), कलिंग की लड़ाई के बारे में है। फिर कलिंग की ही चट्टानों (धौली और जौगड़) पर यह लेख क्यों नहीं मिलता?

उत्तर देखिए

उत्तर: वहाँ इसकी जगह दूसरे लेख खुदवाए गए:

  • क्या मिलता है: धौली और जौगड़ पर ग्यारहवें से तेरहवें शिलालेख की जगह दो अलग लेख हैं, जो तोसलि जैसे केंद्रों के अफ़सरों के लिए आदेश हैं।
  • क्यों: हुल्त्श का अनुमान है कि कलिंग नया जीता गया इलाका था, इसलिए वहाँ अलग तरह के आदेश चाहिए थे, और लड़ाई वाला लेख वहाँ ठीक नहीं बैठता था।

हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि हारे हुए इलाके के लोगों के सामने राजा अपनी जीत और पछतावे की बात लिखवाता, तो उन्हें कैसा लगता। यह अनुमान का सवाल है; उत्तर में “हुल्त्श के अनुसार” जोड़ना ठीक रहेगा।

सवाल: राजस्थान के बैराट में मिली शिला असोक के अपने धर्म के बारे में क्या बताती है, और यह किताब में दिए धम्म से कैसे अलग है?

उत्तर देखिए

उत्तर: दोनों अलग बातें बताते हैं:

  • बैराट की शिला: राजा ख़ुद को मगध का राजा कहता है, बुद्ध, धम्म और संघ में श्रद्धा बताता है, और भिक्षुओं, भिक्षुणियों और उपासकों को सात बौद्ध पाठ पढ़ने को कहता है।
  • किताब का धम्म (पृष्ठ 32): बड़ों का आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों से अच्छा व्यवहार, और दूसरे धर्मों का आदर, यानी सबके लिए नैतिक बातें।

हमारी ओर से: एक व्यक्ति की निजी श्रद्धा और राजा के रूप में सारी प्रजा से कही गई बात अलग-अलग हो सकती हैं। बच्चे इसे अपने आसपास के उदाहरणों से समझ सकते हैं।

सवाल: गिरनार की चट्टान को “पत्थर पर लिखी किताब” क्यों कहा जा सकता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: एक ही चट्टान पर कई सदियों के अभिलेख हैं:

  • असोक: चौदह शिलालेख।
  • रुद्रदमन (लगभग दूसरी शताब्दी ई.): सुदर्शन झील की मरम्मत का अभिलेख, जो झील बनाने वाले चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यपाल पुष्यगुप्त और असोक के समय के तुषास्फ का नाम भी लेता है।
  • गुप्त वंश का एक शासक (लगभग पाँचवीं सदी): झील की फिर मरम्मत, जैसा किताब बताती है (पृष्ठ 38)।

हमारी ओर से: मानचित्र 2 में गिरनार दिखाइए और पूछिए कि एक ही झील की देखभाल इतने अलग-अलग राजाओं ने क्यों की होगी।

सारनाथ का सिंह शीर्ष

किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 32 पर किताब चित्र 2.3 में “सिंह शीर्ष” का फ़ोटो देती है और किनारे पर पूछती है: “सिंह शीर्ष को आज महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?” उसी पन्ने पर वह कहती है कि असोक ने संदेश “पॉलिश किए हुए स्तंभों” पर लिखवाए, और मानचित्र 2 में सारनाथ स्तंभ अभिलेखों की जगहों में है (पृष्ठ 33)। किताब यहीं रुकती है: यह शीर्ष कहाँ और कब मिला, किस पत्थर का है, उस पर क्या-क्या बना है, और किनारे के सवाल का उत्तर क्या है, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की 1904-05 की वार्षिक रिपोर्ट, हुल्त्श के संग्रह और 2005 के राष्ट्रीय प्रतीक क़ानून से हैं; ये सब अंग्रेज़ी में हैं। मुण्डक उपनिषद का पाठ संस्कृत में है।

1905: खुदाई में मिला शीर्ष

  • मंदिर से थोड़ा पश्चिम में एक बड़े गोल स्तंभ के अवशेष मिले। सबसे पहले सिंह शीर्ष निकला, मंदिर की पश्चिमी दीवार के पास; फिर स्तंभ के टुकड़े, और आख़िर में स्तंभ का निचला ठूँठ, अपनी असली जगह पर। रिपोर्ट के अनुसार लगता है कि स्तंभ को गिराकर ज़ोर से मंदिर पर पटका गया था; शीर्ष के दो सिंहों के सिर, जो शायद इमारत से टकराए, टूट गए। स्रोत: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वार्षिक रिपोर्ट 1904-05 (अंग्रेज़ी में)

पत्थर और चमक

  • चमक इतनी थी कि रिपोर्ट लिखने वाले ने पहले इसे ग्रेनाइट जैसा कोई पत्थर समझा; बाद में पता चला कि यह बनारस से लगभग बीस मील दक्षिण की चुनार की खदानों का बलुआ पत्थर है। रिपोर्ट लिखती है कि इस पत्थर को ऐसा चमकाने की कला खो चुकी है। किताब जिन “पॉलिश किए हुए स्तंभों” की बात करती है (पृष्ठ 32), यह उसी चमक का उदाहरण है। स्रोत: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की वार्षिक रिपोर्ट 1904-05 (अंग्रेज़ी में)

शीर्ष पर क्या बना है

सिंह शीर्ष से राष्ट्रीय प्रतीक

  • भारत का राष्ट्रीय प्रतीक इसी सिंह शीर्ष से लिया गया है, जो सारनाथ संग्रहालय में रखा है। यह बात 2005 के राष्ट्रीय प्रतीक क़ानून (The State Emblem of India (Prohibition of Improper Use) Act, 2005) की अनुसूची में लिखी है। स्रोत: राष्ट्रीय प्रतीक क़ानून, 2005 (अंग्रेज़ी में)
  • अनुसूची के अनुसार प्रतीक इस शीर्ष को एक ओर से देखने का रूप है: तीन सिंह दिखते हैं, बीच में धर्मचक्र, दाईं ओर बैल और बाईं ओर दौड़ता घोड़ा, और दोनों छोरों पर धर्मचक्रों की रेखाएँ। घंटी के आकार वाला कमल छोड़ दिया गया है, और नीचे देवनागरी में “सत्यमेव जयते” लिखा है, जो प्रतीक का ही हिस्सा है। स्रोत: राष्ट्रीय प्रतीक क़ानून, 2005 (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब के किनारे वाले सवाल का सीधा उत्तर यहीं है: जो सिंह शीर्ष असोक ने बुद्ध के पहले उपदेश की जगह खड़ा करवाया, वही आज भारत का राष्ट्रीय प्रतीक है।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब के किनारे का सवाल (पृष्ठ 32): सिंह शीर्ष को आज महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: इसके कई कारण हैं:

  • राष्ट्रीय प्रतीक: भारत का राष्ट्रीय प्रतीक सारनाथ के इसी सिंह शीर्ष से लिया गया है।
  • कारीगरी: यह चुनार के बलुआ पत्थर का है, और उस पर ऐसी चमक है जिसकी कला अब खो चुकी है; पुरातत्व सर्वेक्षण ने इसकी नक्काशी को भारत की सबसे उत्तम नक्काशी में गिना।
  • इतिहास का स्रोत: यह स्तंभ बुद्ध के पहले उपदेश की जगह खड़ा था, और उस पर असोक का संघ के बारे में एक आदेश खुदा है।

हमारी ओर से: परीक्षा के उत्तर में पहला कारण ज़रूर लिखवाइए, और बाकी दो से उत्तर को पूरा कीजिए।

सवाल: राष्ट्रीय प्रतीक और सारनाथ का असली सिंह शीर्ष, दोनों में क्या अंतर है?

उत्तर देखिए

उत्तर: प्रतीक शीर्ष को एक ओर से देखने का रूप है:

  • सिंह: शीर्ष पर चार सिंह हैं; प्रतीक में तीन दिखते हैं।
  • नीचे की पट्टी: प्रतीक में बीच में धर्मचक्र, दाईं ओर बैल और बाईं ओर घोड़ा दिखता है; शीर्ष की पूरी पट्टी पर हाथी भी है, और सिंह भी।
  • कमल: शीर्ष के नीचे घंटी के आकार का कमल है; प्रतीक में वह नहीं है।
  • आदर्श वाक्य: प्रतीक के नीचे देवनागरी में “सत्यमेव जयते” लिखा है, जो मुण्डक उपनिषद से लिया गया है।

हमारी ओर से: किताब का प्रश्न 12 (पृष्ठ 52) बच्चों से नोट और सिक्के इकट्ठा करने को कहता है। उन्हीं नोटों और सिक्कों को देखकर बच्चे बताएँ कि उन पर यह प्रतीक है या नहीं, और है तो कितने सिंह और कौन-से पशु दिखते हैं।