अध्याय 2 — राजा, किसान और नगर · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 · कक्षा 12
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 28 से 52
यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के नीचे एक हैं। उद्धरण-चिह्नों के भीतर सिर्फ़ किताब के शब्द हैं, और स्लाइड के ऊपर किताब का पृष्ठ लिखा है। जो बात हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रोजेक्टर न हो, तो यही पन्ना हाथ में रखकर बोर्ड से पढ़ाइए; हर स्लाइड की बात पाठ योजना के बोर्ड-कार्य में भी है।
बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।
कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:
- कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1: शुरुआत, प्रिंसेप और पियदस्सी
- कालांश 2 — भाग 2: प्रारंभिक राज्य, सोलह महाजनपद और मगध
- कालांश 3 — भाग 3: एक आरंभिक साम्राज्य, मौर्य
- कालांश 4 — भाग 4: राजधर्म के नवीन सिद्धांत, दक्षिण के राजा और सरदार, दैविक राजा
- कालांश 5 — भाग 5 का पहला हिस्सा: राजा की छवि और उपज बढ़ाने के तरीके
- कालांश 6 — भाग 5 का दूसरा हिस्सा: ग्रामीण समाज और भूमिदान
- कालांश 7 — भाग 6 का पहला हिस्सा: नए नगर और नगरीय जनसंख्या
- कालांश 8 — भाग 6 का दूसरा हिस्सा: व्यापार, सिक्के और राजा
- कालांश 9 — भाग 7: ब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं, अभिलेखों से साक्ष्य
- कालांश 10 — भाग 8: अभिलेख साक्ष्य की सीमा, काल रेखा 1 और 2, और पहले दिन की पर्चियाँ
- कालांश 11 — आख़िरी भाग: मूल्यांकन, अभ्यास के 12 प्रश्न
पहले यह पढ़िए — पियदस्सी कौन था?
पृष्ठ 28
हमारी ओर से: किसी पत्थर पर राजा का नाम न हो, बस एक उपाधि लिखी हो, तो आप कैसे पता करेंगे कि वह राजा कौन था?
किताब पृष्ठ 28 पर बताती है कि जेम्स प्रिंसेप को अधिकांश अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी, यानी “मनोहर मुखाकृति वाले राजा” का नाम लिखा मिला; कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम असोक भी लिखा था। बच्चों के अनुमान बोर्ड पर लिखिए; अभी जाँचने नहीं हैं। कालांश 9 में स्रोत 10 के साथ यही गुत्थी सुलझेगी।
लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक के राजाओं, किसानों और नगरों के बारे में इतिहासकार कैसे जानते हैं, और क्या-क्या नहीं जान पाते? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।
अध्याय का नक्शा
पृष्ठ 28 से 52 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से
- पहले स्रोत: अभिलेख कैसे पढ़े गए, और उनसे इतिहास की कौन-सी नयी दिशा खुली
- फिर राजा और राज्य: महाजनपद, मगध, मौर्य, दक्षिण के सरदार, कुषाण और गुप्त
- फिर गाँव और नगर: किसान, भूमिदान, नए नगर, व्यापार और सिक्के
- आख़िर में फिर स्रोत: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं, और अभिलेख कहाँ चुप रहते हैं
हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 10 में, अभिलेखों की सीमाएँ पढ़ने के बाद, वे हर बच्चे को लौटाई जाएँगी।
1 | शुरुआत: 600 ई.पू. से 600 ई. तक; प्रिंसेप और पियदस्सी
किसी पुराने पत्थर पर खुदी लिखावट को आज कोई पढ़ ही न पाए, तो उस पत्थर से हम क्या-क्या जान सकते हैं, और क्या नहीं?
हड़प्पा के बाद के डेढ़ हज़ार वर्ष
पृष्ठ 28
- सिंधु और उसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने ऋग्वेद की रचना की
- कई क्षेत्रों में कृषक बस्तियाँ बनीं
- मध्य और दक्षिण भारत में महापाषाण नाम के पत्थरों के बड़े ढाँचे मिले हैं, जिनमें शवों के साथ लोहे के उपकरण और हथियार भी दफ़नाए गए
महापाषाण ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दि के हैं। इसके बाद किताब ईसा पूर्व छठी शताब्दी से आए नए परिवर्तनों पर आती है। ऋग्वेद के लिए “रचना” शब्द ही बोलिए। हिंदी किताब में यहाँ ‘लेखन’ छपा है; अंग्रेज़ी संस्करण में ‘composed’ (रचना) है। वेद पहले रचे गए और मौखिक रूप से आगे बढ़े (कक्षा 6 के रिवीजन नोट्स)।
छठी शताब्दी ई.पू. से आगे
पृष्ठ 28
- आरंभिक राज्य, साम्राज्य और रजवाड़े
- खेती की उपज को संगठित करने के नए तरीके
- लगभग पूरे उपमहाद्वीप में नए नगर
इतिहासकार यह कहानी अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों और चित्रों से जोड़ते हैं। बोर्ड पर यही चार शब्द लिखिए; पूरे अध्याय में हर नयी बात के साथ पूछिए कि वह किस स्रोत से आई।
अभिलेख क्या होते हैं
“अभिलेख उन्हें कहते हैं जो पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे होते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 29
इनमें राजाओं के क्रियाकलाप और धार्मिक संस्थाओं को स्त्रियों और पुरुषों के दान का ब्योरा होता है। जिन अभिलेखों पर तिथि नहीं मिलती, उनका काल आमतौर पर पुरालिपि, यानी लेखन शैली से तय किया जा सकता है: लगभग 250 ई.पू. में अक्षर ‘अ’ जिस तरह लिखा जाता था, 500 ई. में वैसा नहीं लिखा जाता था।
1830 का दशक: प्रिंसेप की खोज
पृष्ठ 28–29
| बात | किताब में |
|---|---|
| किसने | ईस्ट इंडिया कंपनी के एक अधिकारी, जेम्स प्रिंसेप |
| क्या किया | ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला |
| इन लिपियों में क्या है | सबसे आरंभिक अभिलेख और सिक्के |
| क्या पता चला | अधिकांश अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी नाम; कुछ अभिलेखों पर असोक नाम भी |
| असोक कौन | बौद्ध ग्रंथों के अनुसार सबसे प्रसिद्ध शासकों में से एक |
इस शोध के बाद भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने अभिलेखों और ग्रंथों से प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनर्रचना की, और बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्र तैयार हो गया (पृष्ठ 29)। फिर विद्वानों ने देखा कि राजनीतिक परिवर्तनों और आर्थिक-सामाजिक विकास के बीच संबंध तो थे, पर संभवत: सीधे संबंध हमेशा नहीं थे।
प्राकृत
“प्राकृत उन भाषाओं को कहा जाता था जो जनसामान्य की भाषाएँ होती थीं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 29
सबसे पुराने अभिलेख प्राकृत में हैं, इसलिए किताब शासकों के प्राकृत नाम लिखती है, जैसे अजातसत्तु और असोक। तमिल, पालि और संस्कृत भाषाओं के अभिलेख भी मिले हैं।
2 | प्रारंभिक राज्य: सोलह महाजनपद और मगध
एक राजा की जगह बहुत-से लोग मिलकर राज करें, तो राज चलाने में क्या-क्या बदल जाएगा?
छठी शताब्दी ई.पू.
“आरंभिक भारतीय इतिहास में छठी शताब्दी ई.पू. को एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी काल माना जाता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 29
किताब इस काल को आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास से जोड़ती है। इसी शताब्दी में बौद्ध और जैन सहित कई दार्शनिक विचारधाराएँ भी विकसित हुईं।
सोलह महाजनपद
पृष्ठ 29–30
| बात | किताब में |
|---|---|
| नाम कहाँ मिलते हैं | आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथों में |
| सूचियाँ | एक जैसी नहीं, पर कुछ नाम बार-बार आते हैं: वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति |
| राजधानी | हर महाजनपद की एक राजधानी, जो प्राय: किलेबंद होती थी |
| नियम | लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने संस्कृत में धर्मशास्त्र रचे, जिनमें शासक के लिए नियम थे; शासक क्षत्रिय वर्ण से हों, ऐसी अपेक्षा थी |
पृष्ठ 30 के मानचित्र 1 पर बच्चे देखें कि महाजनपद कहाँ-कहाँ सघन हैं। मानचित्र के नाम रिवीजन नोट्स में हैं।
राजा और गण: दो तरह का शासन
पृष्ठ 29–30
राजा वाले राज्य
- ज़्यादातर महाजनपदों पर राजा का शासन था
- शासक किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट लेते थे
- पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन जुटाना भी वैध माना जाता था
गण और संघ
- लोगों का एक समूह शासन करता था, और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था
- महावीर और बुद्ध, दोनों गणों से थे
- वज्जि संघ की ही भाँति कुछ राज्यों में भूमि सहित अनेक आर्थिक स्रोतों पर राजा मिलकर नियंत्रण रखते थे
सेना पर भी फ़र्क़ बताइए: धीरे-धीरे कुछ राज्यों ने स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही बना लीं; बाक़ी राज्य सहायक-सेना पर निर्भर रहे, जिसके सैनिक प्राय: कृषक वर्ग से लिए जाते थे।
मगध सबसे शक्तिशाली: दो व्याख्याएँ
पृष्ठ 31
आधुनिक इतिहासकार
- खेती की उपज खास तौर पर अच्छी
- लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड), जिनसे उपकरण और हथियार बनाना सरल
- जंगलों में हाथी, जो सेना का अंग थे
- गंगा और उपनदियों से सस्ता और सुलभ आवागमन
आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक
- बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्त्वाकांक्षी राजा
- उनके मंत्री, जो उनकी नीतियाँ लागू करते थे
छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध (आधुनिक बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना। बच्चों से पूछिए: दोनों में से कौन-सी व्याख्या किसी व्यक्ति पर टिकी है, और कौन-सी जगह के साधनों पर?
दो राजधानियाँ
पृष्ठ 31
- पहले राजगाह (आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम): पहाड़ियों के बीच बसा एक किलेबंद शहर; इस शब्द का अर्थ है ‘राजाओं का घर’
- बाद में, चौथी शताब्दी ई.पू. में, पाटलिपुत्र राजधानी बना, जिसे अब पटना कहा जाता है; गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर इसकी अवस्थिति महत्वपूर्ण थी
पृष्ठ 31 पर चित्र 2.2 राजगीर की किलेबंदी की दीवार का है। बच्चों से पूछिए कि दीवारें क्यों बनाई गईं; उत्तर (हमारी ओर से): सुरक्षा के लिए। पिछली स्लाइड याद कीजिए: पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन जुटाना वैध उपाय माना जाता था।
3 | एक आरंभिक साम्राज्य: मौर्य
एक यात्री की किताब के कुछ टुकड़े और पत्थरों पर खुदे कुछ संदेश, बस इतना हो, तो क्या आप एक पूरे साम्राज्य का इतिहास लिख पाएँगे?
मौर्य साम्राज्य की नींव
पृष्ठ 32
- लगभग 321 ई.पू. में चंद्रगुप्त मौर्य ने शासन की नींव रखी
- उनका शासन पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला
- उनके पौत्र असोक ने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय पाई
मगध के विकास के साथ-साथ मौर्य साम्राज्य का उदय हुआ। पृष्ठ 33 का मानचित्र 2 साथ में खोलकर रखिए; अगली स्लाइडों के केंद्र इसी पर दिखाने हैं।
मौर्य इतिहास के स्रोत
पृष्ठ 32
| स्रोत | किताब में |
|---|---|
| पुरातात्विक प्रमाण | विशेषकर मूर्तिकला |
| मेगस्थनीज़ का विवरण | चंद्रगुप्त के दरबार में आए यूनानी राजदूत; आज इसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं |
| अर्थशास्त्र | इसके कुछ भाग संभवत: कौटिल्य या चाणक्य के रचे हुए |
| बाद के (परवर्ती) ग्रंथ | जैन, बौद्ध और पौराणिक ग्रंथ, और संस्कृत साहित्य |
| असोक के अभिलेख | पत्थरों और स्तंभों पर |
हर स्रोत के साथ उसकी सीमा भी बोलिए: मेगस्थनीज़ के कुछ अंश ही बचे हैं, और अर्थशास्त्र के भी कुछ ही भाग संभवत: कौटिल्य या चाणक्य के हैं।
सबसे मूल्यवान स्रोत
“यद्यपि उक्त साक्ष्य बड़े उपयोगी हैं लेकिन पत्थरों और स्तंभों पर मिले असोक के अभिलेख प्राय: सबसे मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 32
असोक पहला सम्राट था जिसने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए, और इनसे धम्म का प्रचार किया। ज़्यादातर अभिलेख प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि में हैं; पश्चिमोत्तर के कुछ खरोष्ठी में, और अफ़गानिस्तान में मिले अभिलेख अरामेइक और यूनानी में।
पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र
पृष्ठ 32–33
| केंद्र | किताब में |
|---|---|
| पाटलिपुत्र | राजधानी |
| तक्षशिला | प्रांतीय केंद्र; लंबी दूरी के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर |
| उज्जयिनी | प्रांतीय केंद्र; लंबी दूरी के महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर |
| तोसलि | प्रांतीय केंद्र |
| सुवर्णगिरि | प्रांतीय केंद्र; अर्थ “सोने के पहाड़”; कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी |
इन सबका उल्लेख असोक के अभिलेखों में है।
- आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक एक जैसे संदेश खुदे मिले हैं।
- फिर भी इतिहासकार अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इतने विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था एक जैसी होना संभव नहीं था।
किताब कहती है कि यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो।
सेना का संगठन
“मेगस्थनीज़ ने सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए एक समिति और छ: उपसमितियों का उल्लेख किया है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 34
छ: उपसमितियाँ: नौसेना, यातायात और खान-पान, पैदल सैनिक, अश्वारोही, रथारोही और हाथी। दूसरी उपसमिति उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियाँ, सैनिकों का भोजन, जानवरों का चारा, और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवक और शिल्पकार जुटाती थी।
सेना कितनी बड़ी थी
“यूनानी स्रोतों के अनुसार, मौर्य सम्राट के पास छ: लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार घुड़सवार तथा नौ हज़ार हाथी थे। कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 35
पृष्ठ 35 का प्रश्न पूछिए: यूनानी विवरण सही हो, तो इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए किन संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? उत्तर:
- सैनिकों का भोजन, घोड़ों और हाथियों का चारा
- उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियाँ, सेवक और शिल्पकार
- जंगलों से पकड़े हाथी (स्रोत 2)
- हमारी ओर से: इन सबका खर्च संभवत: किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से वसूले गए कर से निकलता होगा
मौर्य साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था?
पृष्ठ 34–35
एक नज़र
- उन्नीसवीं और आरंभिक बीसवीं सदी के भारतीय इतिहासकारों को, जब भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन था, प्राचीन भारत में ऐसे साम्राज्य की संभावना चुनौतीपूर्ण और उत्साहवर्धक लगी
- प्रस्तर मूर्तियों सहित मौर्यकालीन पुरातत्व “एक अद्भुत कला के प्रमाण थे जो साम्राज्य की पहचान माने जाते हैं”
- बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने असोक से प्रेरणा ली
दूसरी नज़र
- साम्राज्य “मात्र डेढ़ सौ साल” चला
- यह उपमहाद्वीप के सभी क्षेत्रों में नहीं फैला
- साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था
- दूसरी शताब्दी ई.पू. तक कई भागों में नए शासक और रजवाड़े आ गए
असोक ने धम्म के प्रचार से भी साम्राज्य को अखंड रखने का प्रयास किया, और प्रचार के लिए धम्म महामात्त नियुक्त किए। बच्चों से पूछिए: दोनों नज़रों में से कौन-सी किस तरह के सबूत पर टिकी है?
4 | राजधर्म के नवीन सिद्धांत: दक्षिण के राजा और सरदार, दैविक राजा
शादी में लोग उपहार लेकर आते हैं, और कर भरने लोग सरकारी दफ़्तर जाते हैं। उपहार और कर में क्या फ़र्क़ है?
सरदार और राजा
पृष्ठ 35
सरदार
- शक्तिशाली व्यक्ति, जिसका पद वंशानुगत हो भी सकता है और नहीं भी
- विशेष अनुष्ठान करवाता, युद्ध में नेतृत्व करता और विवादों में मध्यस्थ बनता
- अपने लोगों से भेंट लेता और समर्थकों में बाँटता
- सरदारी में आम तौर पर स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते
राजा
- प्रजा से कर वसूलते हैं
तमिलकम में चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियाँ उभरीं। इनके बारे में जानकारी तमिल संगम ग्रंथों की कविताओं से मिलती है, जो बताती हैं कि सरदार संसाधनों का संकलन और वितरण कैसे करते थे।
स्रोत 3: सेनगुत्तुवन की वन-यात्रा
“जब वह वन की यात्रा पर थे तो लोग नाचते-गाते हुए पहाड़ों से उतरे ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 36 (स्रोत 3, सिलप्पादिकारम् से)
पृष्ठ 36 का प्रश्न पूछिए: लोग उपहार क्यों लाए, और सरदार इनका क्या करते होंगे? उत्तर: उपहार सरदार की सत्ता मानने और उसका आदर करने का तरीका थे; सरदार यह भेंट अपने समर्थकों में बाँटता था।
किताब स्रोत 3 के शीर्षक में सेनगुत्तुवन को “पाण्ड्य सरदार” लिखती है; सिलप्पादिकारम् और दूसरे तमिल स्रोतों में सेनगुत्तुवन चेर राजा हैं (रिवीजन नोट्स)।
व्यापार से राजस्व
पृष्ठ 35
- कई सरदार और राजा लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाते थे
- मध्य और पश्चिम भारत के सातवाहन, लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. तक
- पश्चिमोत्तर और पश्चिम में मध्य एशियाई मूल के शक शासक
सत्ता में आने के बाद इन शासकों ने कई तरह से ऊँचे सामाजिक दर्जे का दावा किया। अगली स्लाइड उसी का एक तरीका है।
दैविक राजा: कुषाण, फिर गुप्त
पृष्ठ 36–37
कुषाण
- लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई. तक; शासन मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत तक
- राजधर्म का सबसे अच्छा प्रमाण उनके सिक्के और मूर्तियाँ
- मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर और अफ़गानिस्तान के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ; कुछ इतिहासकार मानते हैं कि इनसे वे स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे
- कई कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ की उपाधि लगाई, शायद उन चीनी शासकों से प्रेरित होकर जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे
गुप्त
- चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य मिलते हैं; इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे
- सामंत स्थानीय संसाधनों से निर्वाह करते, शासक का आदर करते और सैनिक सहायता देते थे
- गुप्त इतिहास के स्रोत: साहित्य, सिक्के, अभिलेख, और कवियों की प्रशस्तियाँ
- प्रशस्तियों के रचयिता इन्हें तथ्य का विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे
पृष्ठ 36 का चित्र 2.4 एक कुषाण सिक्का है: एक ओर राजा कनिष्क, दूसरी ओर देवता। बच्चों से पूछिए कि राजा को किस तरह दिखाया गया है; उत्तर यही है कि राजा और देवता एक ही सिक्के के दो ओर हैं।
स्रोत 4: प्रयाग प्रशस्ति
“धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 37 (स्रोत 4)
प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख) संस्कृत में हरिषेण ने लिखी, जो गुप्त सम्राटों में संभवत: सबसे शक्तिशाली समुद्रगुप्त के राजकवि थे। प्रशस्ति समुद्रगुप्त की तुलना कुबेर, वरुण, इंद्र और यम से करती है। बच्चों से पूछिए: क्या यह तथ्य का विवरण है या प्रशंसा?
उत्तर: किताब के अनुसार प्रशस्तियों के रचयिता उन्हें तथ्यात्मक विवरण की अपेक्षा काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे (पृष्ठ 37), इसलिए इसे राजा की प्रशंसा की तरह पढ़िए।
5 | बदलता हुआ देहात: राजा की छवि और उपज बढ़ाने के तरीके (5.1-5.2)
गाँव के साधारण लोग राजा के बारे में कुछ लिखकर न छोड़ें, तो इतिहासकार कैसे जानेंगे कि प्रजा अपने राजा को कैसा मानती थी?
प्रजा की नज़र से राजा
पृष्ठ 38
- अभिलेखों से सभी जवाब नहीं मिलते; साधारण लोगों ने राजाओं के बारे में अपने विचारों और अनुभव के विवरण कम ही छोड़े
- इसलिए इतिहासकार जातक और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों की कथाएँ पढ़ते हैं
- इनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ हैं, जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा
- जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं
बच्चों से पूछिए: कहानी को इतिहास का स्रोत मानें, तो क्या सावधानी रखनी होगी? अगली स्लाइड की कथा पढ़ने के बाद यही सवाल फिर कीजिए।
गंदतिन्दु जातक: प्रजा की शिकायत
“उनकी शिकायत थी कि रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 38
एक कुटिल राजा अपनी पहचान बदलकर प्रजा के बीच गया। वृद्ध महिलाएँ, पुरुष, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक, यहाँ तक कि जानवर भी दुखी थे। बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़कर जंगल में बस गए। किताब कहती है कि राजा और प्रजा, विशेषकर ग्रामीण प्रजा, के संबंध तनावपूर्ण रहते थे, क्योंकि शासक राजकोष भरने के लिए बड़े-बड़े कर माँगते थे।
हल, रोपाई और सिंचाई
पृष्ठ 38–39
| तरीका | कहाँ | किताब में |
|---|---|---|
| हल | छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में | भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हलों से जुताई |
| धान की रोपाई | गंगा की घाटी | उपज में भारी वृद्धि |
| सिंचाई | कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरें | व्यक्तिगत लोगों और कृषक समुदायों ने मिलकर सिंचाई के साधन बनाए |
किताब इन तरीकों को करों की बढ़ती माँग से जोड़ती है: माँग पूरी करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के और उपाय ढूँढ़े। व्यक्तिगत तौर पर सिंचाई के साधन बनवाने वाले प्राय: राजा या प्रभावशाली लोग थे, जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया।
रोपाई की कीमत
“हालाँकि किसानों को इसके लिए कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 38
यह वाक्य धान की रोपाई के बारे में है। रोपाई उन क्षेत्रों में होती है जहाँ पानी बहुत हो: पहले बीज अंकुरित किए जाते हैं, फिर पानी से भरे खेतों में पौधे रोपे जाते हैं; ज़्यादा पौध बचती है, इसलिए उपज बढ़ती है। बच्चों से पूछिए: उपज बढ़ी, तो उसका लाभ किसे मिला होगा?
उत्तर: किताब कहती है कि उपज तो बढ़ी, लेकिन इसके लाभ समान नहीं थे। बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े-बड़े ज़मींदारों का उल्लेख मिलता है, और बड़े-बड़े ज़मींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली माने जाते थे (पृष्ठ 39)।
लोहे का फाल हर जगह नहीं पहुँचा
पृष्ठ 38–39
लोहे के फाल वाला हल
- इसका उपयोग उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में सीमित था
- पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में इसका प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ
कुदाल
- पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों ने खेती के लिए कुदाल का उपयोग किया
- ऐसे इलाके के लिए कुदाल कहीं अधिक उपयोगी थी
हमारी ओर से: नयी तकनीक हर जगह एक साथ नहीं फैलती। पृष्ठ 41 का “चर्चा कीजिए” यही पूछता है: आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाई और धान की रोपाई होती है या नहीं, और नहीं होती तो क्या दूसरी व्यवस्थाएँ हैं।
स्रोत 5: सुदर्शन झील
पृष्ठ 38
| बात | किताब में |
|---|---|
| क्या थी | गुजरात में एक कृत्रिम जलाशय, जलद्वारों और तटबंधों वाला |
| जानकारी कहाँ से | लगभग दूसरी शताब्दी ई. का संस्कृत पाषाण अभिलेख, जो शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियों का उल्लेख करने के लिए बनवाया गया |
| किसने बनवाई | अभिलेख के अनुसार, मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल ने |
| क्या हुआ | एक भीषण तूफ़ान से तटबंध टूट गए और सारा पानी बह गया |
| मरम्मत | बताया जाता है कि तत्कालीन शासक रुद्रदमन ने अपने खर्चे से मरम्मत करवाई थी, और इसके लिए प्रजा से कर नहीं लिया था |
| फिर | उसी पाषाण-खंड पर एक और अभिलेख (लगभग पाँचवीं सदी) कहता है कि गुप्त वंश के एक शासक ने फिर मरम्मत करवाई |
मानचित्र 2 में गिरनार ढूँढ़वाइए। फिर पृष्ठ 38 का प्रश्न पूछिए: शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए? उत्तर (हमारी ओर से):
- करों की बढ़ती माँग के बीच उपज बढ़ाने के तरीके खोजे गए और सिंचाई उनमें से एक थी।
- ज़्यादा उपज से खेती और राज्य की आय, दोनों को सहारा मिलता।
- बनवाने वाले अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाते थे।
ध्यान दीजिए, मरम्मत की बात रुद्रदमन के अपने अभिलेख में है।
5 | बदलता हुआ देहात: ग्रामीण समाज और भूमिदान (5.3-5.4)
आपके गाँव में खेत की मेड़ कहाँ तक है, यह आज काग़ज़ों में लिखा रहता है। दो हज़ार साल पहले लोग यह कैसे याद रखते होंगे?
गाँव में कौन-कौन था
पृष्ठ 39
| स्रोत | किताब में आए नाम |
|---|---|
| कहानियाँ, विशेषकर बौद्ध कथाएँ | भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े-बड़े ज़मींदार |
| पालि भाषा | गहपति: छोटे किसानों और ज़मींदारों, दोनों के लिए |
| आरंभिक तमिल संगम साहित्य | वेल्लालर (बड़े ज़मींदार), उल्वर (हलवाहा), अणिमई (दास) |
| शक्तिशाली कौन | बड़े-बड़े ज़मींदार और ग्राम प्रधान; ग्राम प्रधान का पद प्राय: वंशानुगत |
नयी तकनीकों से उपज तो बढ़ी, पर इसके लाभ समान नहीं थे। किताब कहती है कि यह संभव है कि वर्गों की यह विभिन्नता भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित हो; ऐसी परिस्थिति में भूमि का स्वामित्व महत्वपूर्ण हो गया।
स्रोत 6:मनुस्मृति और खेत की सीमा
पृष्ठ 39
- आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधिग्रंथ, संस्कृत में, दूसरी शताब्दी ई.पू. और दूसरी शताब्दी ई. के बीच लिखा गया
- राजा को सलाह: सीमाओं की पहचान के लिए पत्थर, हड्डियाँ, राख, कोयला, कंकड़ जैसे गुप्त निशान ज़मीन में गाड़े जाएँ
- ऐसे निशान, जो समय के साथ नष्ट न हों
पृष्ठ 39 का प्रश्न पूछिए: क्या ये सीमा चिह्न विवाद के हल के लिए पर्याप्त रहे होंगे? यह सोचने का प्रश्न है। उत्तर (हमारी ओर से): मदद, क्योंकि छिपे और टिकाऊ निशान विवाद के समय गवाही दे सकते थे। कमी, क्योंकि निशान खोदने पर ही दिखते, कोई उन्हें हटा या बदल सकता था, और यह कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं था।
प्रभावती गुप्त: ग्रंथ क्या कहते हैं, अभिलेख क्या दिखाता है
पृष्ठ 40
संस्कृत धर्मशास्त्र
- महिलाओं को भूमि जैसी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था
अभिलेख
- प्रभावती गुप्त, चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री, जिनका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ
- वह भूमि की स्वामी थीं और उन्होंने दान भी किया था
किताब दो कारण सुझाती है: वह एक रानी थीं (आरंभिक भारतीय इतिहास की ज्ञात कुछ रानियों में से एक), इसलिए यह उदाहरण विरला रहा हो सकता है; या यह भी संभव है कि धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू न किए जाते हों। बच्चों को यही सिखाइए: एक स्रोत नियम बताता है, दूसरा व्यवहार दिखाता है।
स्रोत 8: दंगुन गाँव को मिली छूट
“दौरे पर आने वाले शासकीय अधिकारियों को यह गाँव घास देने और आसन में प्रयुक्त होने वाली जानवरों की खाल और कोयला देने के दायित्व से मुक्त है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 41 (स्रोत 8)
प्रभावती ने दंगुन गाँव आचार्य चनालस्वामी को दान किया, और ग्राम कुटुंबिनों, ब्राह्मणों और गाँव के दूसरे वासियों को इसका आदेश दिया। साथ में एक अग्रहार के लिए उपयुक्त रियायतें दीं:
- गाँव में पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे;
- मदिरा खरीदने और नमक के लिए खुदाई करने के राजसी अधिकार से भी गाँव मुक्त था।
पृष्ठ 41 का प्रश्न पूछिए: इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं?
उत्तर (हमारी ओर से): छूट की सूची से घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध; मदिरा और नमक के बारे में सिर्फ़ अनुमान लगाया जा सकता है।
भूमिदान का असर: इतिहासकारों के दो मत
पृष्ठ 40–41
कुछ इतिहासकार
- भूमिदान शासक वंश की एक रणनीति थी
- ताकि कृषि नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित हो
कुछ दूसरे इतिहासकार
- भूमिदान से दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत मिलता है
- राजा का शासन सामंतों पर दुर्बल होने लगा, तो राजाओं ने भूमिदान से अपने समर्थक जुटाए
किताब इसे “एक गर्म वाद-विवाद का विषय” कहती है। बच्चों से किसी एक मत को सही मानकर मत रटवाइए; दोनों मत और उनके तर्क लिखवाइए। भूमि की माप और दान लेने वालों के अधिकार भी हर क्षेत्र में अलग थे।
जिन पर अधिकारियों या सामंतों का नियंत्रण नहीं था
पृष्ठ 40–41
- पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार और जगह-जगह घूमकर खेती करने वाले लोग
- सामान्यत: ऐसे लोग अपने जीवन और आदान-प्रदान के विवरण नहीं रखते थे
- स्रोत 7, हर्षचरित: कन्नौज के शासक हर्षवर्धन की संस्कृत जीवनी, जिसे उनके राजकवि बाणभट्ट (लगभग सातवीं शताब्दी ई.) ने लिखा
- इसमें विंध्य क्षेत्र के जंगल के किनारे की एक बस्ती के जीवन का चित्रण है
पृष्ठ 40 का प्रश्न पूछिए: स्रोत 7 के लोगों को व्यवसाय के आधार पर कैसे बाँटेंगे? उत्तर (हमारी ओर से):
- खेती करने वाले (छोटे किसान; वहाँ के अधिकांश लोग कुदाल का प्रयोग करते हैं),
- जंगल की उपज जुटाने और ढोने वाले (छाल, फूल, अलसी, सन, शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी और घास),
- और बेचने वाली ग्रामीण महिलाएँ, जो जंगल से एकत्र किए फलों की टोकरियाँ लेकर आसपास के गाँवों में बेचने जाती हैं।
दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब से कारण दे।
6 | नगर एवं व्यापार: नए नगर और नगरीय जनसंख्या (6.1-6.2)
जिस शहर में आज लोग रहते हैं, उसके नीचे दबी पुरानी बस्ती को पूरा खोदना मुश्किल क्यों है?
नगर और उनके रास्ते
पृष्ठ 41–42
| नगर | किताब में |
|---|---|
| पाटलिपुत्र | नदीमार्ग के किनारे |
| उज्जयिनी | भूतल मार्गों के किनारे |
| पुहार | समुद्रतट पर, जहाँ से समुद्री मार्ग प्रारंभ हुए |
| मथुरा | व्यावसायिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों का जीवंत केंद्र |
नगरों का विकास लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के विभिन्न क्षेत्रों में हुआ। इनमें से अधिकांश नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे, और प्राय: सभी नगर संचार मार्गों के किनारे बसे थे।
पाटलिपुत्र की कहानी
पृष्ठ 42
| कब | क्या |
|---|---|
| शुरुआत | पाटलिग्राम नाम का एक गाँव |
| पाँचवीं सदी ई.पू. | मगध के शासकों ने राजधानी राजगाह से यहाँ लाने का निर्णय किया और इसका नाम बदल दिया |
| चौथी शताब्दी ई.पू. तक | मौर्य साम्राज्य की राजधानी, और एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक |
| बाद में | इसका महत्त्व कम हो गया |
| सातवीं सदी ई. | चीनी यात्री श्वैन त्सांग आया, तब यह नगर खंडहर था और जनसंख्या भी कम थी |
किताब कहती है कि प्रत्येक नगर का अपना इतिहास था। बच्चों से पूछिए: श्वैन त्सांग का विवरण न होता, तो सातवीं सदी के पाटलिपुत्र के बारे में हम क्या जानते?
चमकदार कलई वाले बर्तन
“इन्हें उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र कहा जाता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 42
ये उत्कृष्ट श्रेणी के मिट्टी के कटोरे और थालियाँ हैं, जिन पर चमकदार कलई चढ़ी है; संभवत: इनका उपयोग अमीर लोग करते होंगे। इन नगरों के अधिकांश स्थलों पर व्यापक खुदाई संभव नहीं, क्योंकि वहाँ आज भी लोग रहते हैं; फिर भी सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे जैसे पदार्थों के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन, और सीप और पक्की मिट्टी मिली हैं।
नगर के लोग: दानात्मक अभिलेख और श्रेणी
पृष्ठ 42–43
दानात्मक अभिलेख
- द्वितीय शताब्दी ई.पू. आते-आते कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख मिलते हैं
- दाता के नाम के साथ प्राय: उसका व्यवसाय भी लिखा होता है: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी और राजा
श्रेणी
- उत्पादकों और व्यापारियों के संघ
- ये संभवत: पहले कच्चा माल खरीदती थीं, फिर सामान तैयार कर बाज़ार में बेच देती थीं
चित्र 2.6 मथुरा से मिली एक मूर्ति का भाग है। उस पर प्राकृत में अभिलेख है कि स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने इसे एक धार्मिक स्थल में स्थापित किया था। बच्चों से पूछिए: एक छोटा-सा दान का अभिलेख नगर के लोगों के बारे में क्या-क्या बता देता है?
हड़प्पा के इलाके में फिर नगर?
पृष्ठ 43
- मानचित्र 3 का नाम है “कुछ महत्वपूर्ण राज्य और नगर”
- इसके नगर: तक्षशिला, मथुरा, कन्नौज, श्रावस्ती, वैशाली, पाटलिपुत्र, वाराणसी, कौशाम्बी, राजगीर, महास्थान, विदिशा, उज्जयिनी, भरूकच्छ, चंद्रकेतुगढ़, शिशुपालगढ़, सोपारा, पैठन, धान्यकटक, कोडूमनाल और पुहार
पृष्ठ 43 का प्रश्न पूछिए: तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली क्या वहाँ कोई नगर थे?
बच्चे मानचित्र 3 को अध्याय 1 के हड़प्पा वाले मानचित्र के साथ रखें, और उन नगरों की सूची बनाएँ जो हड़प्पा सभ्यता के फैलाव वाले क्षेत्र में पड़ते हैं।
6 | नगर एवं व्यापार: व्यापार, सिक्के और राजा (6.3-6.4)
सिक्के न हों, तो नमक के बदले कपड़ा कैसे लेंगे? और समुद्र पार के व्यापारी से सौदा कैसे होगा?
रास्ते, व्यापारी और सामान
पृष्ठ 43–44
| बात | किताब में |
|---|---|
| भूमार्ग | छठी शताब्दी ई.पू. से नदी मार्गों और भूमार्गों का मानो जाल बिछ गया; भूमार्ग मध्य एशिया और उससे भी आगे तक |
| जलमार्ग | अरब सागर से उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया तक; बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तक |
| व्यापारी | पैदल फेरी लगाने वाले, और बैलगाड़ी और घोड़े-खच्चरों के दल के साथ चलने वाले; लोग समुद्री मार्ग से भी यात्रा करते थे, जो खतरनाक थी पर बहुत लाभदायक भी |
| सफल व्यापारी | तमिल में मसत्थुवन, प्राकृत में सत्थवाह और सेट्ठी; ये बड़े धनी हो जाते थे |
| सामान | नमक, अनाज, कपड़ा, धातु और उससे बने उत्पाद, पत्थर, लकड़ी, जड़ी-बूटी |
रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसालों, कपड़ों और जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी; ये अरब सागर के रास्ते भूमध्य क्षेत्र तक पहुँचाई जाती थीं। शासकों ने प्राय: इन मार्गों पर नियंत्रण की कोशिश की, और संभवत: वे सुरक्षा के बदले व्यापारियों से धन लेते थे।
स्रोत 9: मालाबार तट का व्यापार
पृष्ठ 44
| बात | पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी में |
|---|---|
| किसकी रचना | एक यूनानी समुद्र यात्री की, लगभग प्रथम शताब्दी ई. |
| विदेशी व्यापारी क्या खरीदने आते | भारी मात्रा में काली मिर्च और दाल चीनी |
| यहाँ क्या आता | सिक्के, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चा शीशा, ताँबा, टिन और सीसा |
| यहाँ से क्या जाता | आसपास भारी मात्रा में उत्पन्न काली मिर्च |
पेरिप्लस यूनानी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ समुद्री यात्रा है, और एरीथ्रियन यूनानी में लाल सागर को कहते हैं। पृष्ठ 44 का प्रश्न पूछिए: लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी? उत्तर (हमारी ओर से): सूची बताती है कि मालाबार के बाज़ारों में क्या लाया जाता है और वहाँ से क्या ले जाया जाता है; इसलिए संभव है कि यह सूची समुद्र के रास्ते व्यापार करने वाले व्यापारियों और नाविकों के काम आने के लिए बनी हो।
किसने कौन-से सिक्के चलाए
पृष्ठ 44–45
| कौन | किताब में |
|---|---|
| आहत सिक्के | चाँदी और ताँबे के, सबसे पहले ढाले गए (छठी शताब्दी ई.पू.); पूरे उपमहाद्वीप में खुदाई में मिले |
| हिंद-यूनानी शासक | शासकों की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के; इन शासकों ने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था |
| कुषाण | प्रथम शताब्दी ई. में बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के; आकार और वज़न रोमन सम्राटों और ईरान के पार्थियन शासकों के सिक्कों के बिलकुल समान; उत्तर और मध्य भारत के कई पुरास्थलों पर मिले |
| रोमन सिक्के | दक्षिण भारत के अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में |
| यौधेय (प्रथम शताब्दी ई.) | पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों के कबायली गणराज्य; ताँबे के सिक्के हज़ारों की संख्या में |
| गुप्त | सोने के सबसे भव्य सिक्कों में से कुछ; आरंभिक सिक्कों का सोना अति उत्तम |
आहत सिक्कों के प्रतीकों को मौर्य वंश जैसे राजवंशों के प्रतीकों से मिलाने पर पता चला कि ये राजाओं ने जारी किए; यह भी संभव है कि व्यापारियों, धनपतियों और नागरिकों ने इस प्रकार के कुछ सिक्के जारी किए हों। रोमन सिक्कों से यह भी स्पष्ट है कि व्यापारिक तंत्र राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था।
छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम क्यों मिलते हैं?
पृष्ठ 45
कुछ इतिहासकार
- रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार में कमी आई
- इससे उन राज्यों, समुदायों और क्षेत्रों की संपन्नता पर असर पड़ा, जिन्हें दूरवर्ती व्यापार से लाभ मिलता था
अन्य इतिहासकार
- इस काल में नए नगरों और व्यापार के नवीन तंत्रों का उदय होने लगा था
- अभिलेखों और ग्रंथों में सिक्कों का उल्लेख होता रहा
- हो सकता है सिक्के इसलिए कम मिलते हों कि वे प्रचलन में थे और किसी ने उनका संग्रह करके नहीं रखा
किताब पूछती है कि क्या इससे उस काल में किसी आर्थिक संकट का संकेत मिलता है, और कहती है कि इतिहासकारों में इसे लेकर मतभेद है। पृष्ठ 45 का “चर्चा कीजिए” यहीं कराइए: व्यापार में विनिमय के लिए क्या-क्या प्रयोग होता था, और कौन-से विनिमय स्रोतों से पता नहीं चलते? संकेत (हमारी ओर से): पृष्ठ 41 याद कीजिए, पशुपालक, शिकारी, मछुआरे जैसे लोग अपने आदान-प्रदान के विवरण सामान्यत: नहीं रखते थे।
7 | मूल बातें: ब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं, अभिलेखों से साक्ष्य
जिस लिपि को आज कोई नहीं पढ़ पाता, उसे पहली बार कोई कैसे पढ़ेगा? आपके पास कौन-से सुराग होंगे?
दो लिपियाँ, पढ़ने के दो रास्ते
पृष्ठ 46–47
ब्राह्मी
- आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल; असोक के अभिलेख इसी लिपि में हैं
- अट्ठारहवीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से बंगाली और देवनागरी की पांडुलिपियाँ पढ़ीं, और उनके अक्षरों की तुलना प्राचीन अक्षरों के नमूनों से की
- आरंभिक अभिलेखों का अध्ययन करने वाले विद्वानों ने कई बार अनुमान लगाया कि ये संस्कृत में हैं, जबकि प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में थे
- कई दशकों बाद, अभिलेख वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम के बाद, जेम्स प्रिंसेप ने 1838 ई. में असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकाला
खरोष्ठी
- पश्चिमोत्तर के अभिलेखों की लिपि
- इस क्षेत्र के हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय–प्रथम शताब्दी ई.पू.) के सिक्कों पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों में लिखे हैं
- यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने दोनों के अक्षरों का मेल किया, जैसे अपोलोडोटस के नाम में
- प्रिंसेप खरोष्ठी अभिलेखों की भाषा प्राकृत पहचान चुके थे, इसलिए लंबे अभिलेख पढ़ना सरल हो गया
चित्र 2.12 (पृष्ठ 47) में हिंद-यूनानी शासक मेनाण्डर का एक सिक्का है; बच्चे किताब में देखें। पृष्ठ 46 का प्रश्न भी यहीं पूछिए: क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? क्या कुछ भिन्न भी हैं? बच्चे चित्र 2.11 देखकर ख़ुद दो सूचियाँ बनाएँ, मिलते-जुलते अक्षर और अलग अक्षर। अक्षर रटवाने की ज़रूरत नहीं।
पियदस्सी की गुत्थी
“ध्यान देने योग्य बात है कि अभिलेख (स्रोत 10) में शासक असोक का नाम नहीं लिखा है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 47
अभिलेख में असोक की दो उपाधियाँ हैं: देवानांपिय, यानी देवताओं का प्रिय, और पियदस्सी, यानी देखने में सुन्दर। असोक नाम दूसरे अभिलेखों में मिलता है, जिनमें ये उपाधियाँ भी लिखी हैं। अभिलेखशास्त्रियों ने देखा कि इन अभिलेखों के विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान, सबमें समानता है, और इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इन्हें एक ही शासक ने बनवाया था। कालांश 1 के बोर्ड पर लिखे अनुमान अब बच्चों के साथ मिलाइए।
स्रोत 10: राजा के आदेश
“अतीत में मसलों को निपटाने और नियमित रूप से सूचना एकत्र करने की व्यवस्थाएँ नहीं थीं। लेकिन मैंने निम्नलिखित (व्यवस्था) की हैं। लोगों के समाचार हम तक पतिवेदक सदैव पहुँचाएँ।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 47
ब्रैकेट वाला शब्द देखिए। किताब बताती है कि अभिलेखशास्त्री प्राय: वाक्यों के अर्थ स्पष्ट करने के लिए कुछ शब्द ब्रैकेट में लिखते हैं, और यह बड़े ध्यान से करना पड़ता है, जिससे कि लेखक का मूल अर्थ बदल न जाए।
पतिवेदक और आज का संवाददाता
पृष्ठ 47
पतिवेदक (स्रोत 10 में)
- लोगों के समाचार राजा तक पहुँचाने थे, सदैव
- राजा कहीं भी हों: खाना खा रहे हों, अन्त:पुर में हों, विश्राम कक्ष में, गोशाले में, पालकी में या वाटिका में
- राजा का वचन: मैं लोगों के विषयों का निराकरण हर स्थल पर करूँगा
आज का संवाददाता (हमारी ओर से)
- समाचार अखबार, रेडियो, टीवी या इंटरनेट के ज़रिए आम लोगों तक पहुँचाता है
- किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं, सबके पढ़ने-सुनने के लिए लिखता है
पृष्ठ 47 का प्रश्न: अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक शब्द का अर्थ संवाददाता बताया है। आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भिन्न रहे होंगे? उत्तर (हमारी ओर से):
- पतिवेदक का काम लोगों के समाचार सीधे राजा तक पहुँचाना था, ताकि राजा उनके विषय निपटा सकें;
- आज का संवाददाता खबर जनता तक पहुँचाता है।
इतिहासकार अभिलेख को कैसे परखते हैं
पृष्ठ 47–48
- असोक कहते हैं कि उनसे पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी। क्या यह वक्तव्य सही है?
- इतिहासकारों को बार-बार परखना पड़ता है कि अभिलेख में लिखी बात सत्य है, संभव है या फिर अतिशयोक्तिपूर्ण है
- अगर राजा के आदेश यातायात मार्गों के किनारे और नगरों के पास प्राकृतिक पत्थरों पर खुदे थे, तो क्या आने-जाने वाले लोग उन्हें पढ़ने के लिए रुकते थे? अधिकांश लोग प्राय: पढ़े-लिखे नहीं थे
- क्या पाटलिपुत्र में इस्तेमाल होने वाली प्राकृत उपमहाद्वीप में सभी जगह लोग समझते थे? क्या राजा के आदेशों का पालन होता था?
किताब ख़ुद कहती है कि इन प्रश्नों के उत्तर पाना सदैव आसान नहीं है।
- पहले कथन पर बच्चों से तीन में से एक खाना चुनवाइए, सत्य, संभव या अतिशयोक्ति, और हर चुनाव के साथ कारण बुलवाइए।
- संकेत (हमारी ओर से): कालांश 2 याद दिलाइए, जहाँ किताब कहती है कि महाजनपदों के शासकों का काम किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर तथा भेंट वसूलना माना जाता था (पृष्ठ 30)।
स्रोत 11: राजा की वेदना
“डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 48
अभिलेख के अनुसार, शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर देवानांपिय पियदस्सी ने कलिंग (आधुनिक तटवर्ती उड़ीसा) पर विजय पाई, और उसके बाद वे धम्म के गहन अध्ययन, धम्म के स्नेह और धम्म के उपदेश में डूब गए। किताब बताती है कि इस अभिलेख की व्याख्या प्राय: असोक की वेदना के प्रतिबिंब के रूप में की जाती है, और यह युद्ध के प्रति उनकी मनोवृत्ति में परिवर्तन भी दिखाता है।
वेदना का अभिलेख कलिंग में क्यों नहीं मिला?
पृष्ठ 48
हमारी ओर से: जो बात राजा अपने अभिलेखों में कह रहे थे, वह जीते गए क्षेत्र के लोगों के लिए ही क्यों नहीं खुदवाई गई होगी?
किताब बताती है कि असोक के अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से मिले हैं, लेकिन वेदना वाला यह अभिलेख वहाँ नहीं मिला, यानी उस क्षेत्र में नहीं जिस पर विजय पाई गई थी।
किताब पूछती है कि इसका हम क्या अर्थ लगाएँ, और एक संभावना भी प्रश्न के रूप में रखती है: क्या नयी विजय की वेदना उस क्षेत्र के लिए इतनी दर्दनाक थी कि राजा इस मुद्दे पर कुछ कह न सका?
बच्चे दो मिनट सोचें। किताब कोई उत्तर तय नहीं करती, इसलिए आप भी कोई एक उत्तर पक्का मत कीजिए।
मानचित्र 2: असोक के अभिलेख कहाँ मिले
पृष्ठ 33, 48
| अभिलेख का प्रकार | मानचित्र 2 में कुछ स्थान |
|---|---|
| महाशिलालेख | जैसे गिरनार, कलसी, शहबाज़गढ़ी, मानसेहरा, जौगड़ |
| लघुशिलालेख | जैसे बैराट, भाब्रू, मास्की, ब्रह्मगिरि |
| स्तंभ अभिलेख | जैसे सारनाथ, कौशाम्बी, टोपरा, मेरठ, रामपुरवा, साँची |
पृष्ठ 48 का “चर्चा कीजिए” यहीं कराइए: मानचित्र 2 देखिए और असोक के अभिलेख के प्राप्ति स्थान की चर्चा कीजिए। क्या उनमें कोई एक-सा प्रारूप दिखता है? संकेत (हमारी ओर से): मानचित्र में छपे केंद्रों, पाटलिपुत्र, तक्षशिला और उज्जयिनी, से अभिलेखों के स्थान मिलाकर देखिए, और देखिए कि कौन-से अभिलेख साम्राज्य के किनारों की ओर हैं। चिह्न गिनवाने की ज़रूरत नहीं।
8 | अभिलेख साक्ष्य की सीमा; काल रेखा 1-2
अगर आपके स्कूल के बारे में सिर्फ़ उसके नोटिस बोर्ड से जानना हो, तो क्या-क्या पता चलेगा, और क्या छूट जाएगा?
अभिलेख क्या नहीं बताते
पृष्ठ 48–49
| किताब की बात | किताब में |
|---|---|
| तकनीकी सीमा | अक्षर हलके ढंग से खुदे हों तो पढ़ना मुश्किल; अभिलेख नष्ट हो जाएँ तो अक्षर लुप्त हो जाते हैं; शब्दों का वास्तविक अर्थ जानना सदैव सरल नहीं, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से जुड़े होते हैं; विद्वान पढ़ने की वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं |
| अधूरा भंडार | कई हज़ार अभिलेख मिले हैं, पर सबके अर्थ नहीं निकाले जा सके, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए; अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे; जो उपलब्ध हैं, वे संभवत: कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं |
| मौलिक समस्या | जिसे आज हम राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह अभिलेखों में अंकित हो: खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख अभिलेखों में नहीं मिलते, क्योंकि अभिलेख प्राय: बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं; और अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार बताते हैं जो उन्हें बनवाते थे, इसलिए इन विचारों को अन्य विचारों के साथ रखकर परखना होगा |
हर बात के आगे अध्याय से एक उदाहरण बच्चों से माँगिए। बनवाने वालों के विचारों वाली बात के लिए सुदर्शन झील वाला अभिलेख याद दिलाइए, जिसे किताब के अनुसार शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियों का उल्लेख करने के लिए बनवाया गया था (पृष्ठ 38), या समुद्रगुप्त की प्रयाग प्रशस्ति (पृष्ठ 37)। उदाहरणों का चुनाव और अधूरा भंडार नाम, दोनों हमारी ओर से हैं।
अध्याय का सार, किताब के शब्दों में
“अर्थात् राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 49
हमारी ओर से: इसका अर्थ यह नहीं कि अभिलेख काम के नहीं। इस अध्याय की बहुत-सी बातें, असोक, सुदर्शन झील, प्रयाग प्रशस्ति, भूमिदान और दानात्मक अभिलेख, अभिलेखों से ही आई हैं। सीमा जानकर ही उन्हें ग्रंथों, सिक्कों और पुरावशेषों के साथ पढ़ा जाता है।
इतिहासकारों की बदलती रुचि
पृष्ठ 49
| कब | इतिहासकारों की रुचि |
|---|---|
| उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशक और बीसवीं सदी का प्रारंभ | प्रमुख रूप से राजाओं का इतिहास |
| बीसवीं सदी के मध्य से | आर्थिक परिवर्तन, विभिन्न सामाजिक समुदायों का उदय |
| हाल के दशक | वे समुदाय जो सामाजिक हाशिए पर रहे हैं |
किताब यह भी कहती है कि इतिहासकार प्राय: प्राचीन और अर्वाचीन, दोनों प्रकार के प्रमाणों पर आशंका व्यक्त करते हैं, और नयी रुचि से संभवत: प्राचीन स्रोतों पर पुनर्विचार होगा और विश्लेषण की नयी विधियाँ विकसित होंगी।
काल रेखा 1: मौर्य साम्राज्य के अंत तक
पृष्ठ 50
| लगभग कब | क्या हुआ |
|---|---|
| लगभग 600–500 ई.पू. | धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के |
| लगभग 500–400 ई.पू. | मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़ |
| लगभग 327–325 ई.पू. | सिकंदर का आक्रमण |
| लगभग 321 ई.पू. | चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण |
| लगभग 272/268–231 ई.पू. | असोक का शासन |
| लगभग 185 ई.पू. | मौर्य साम्राज्य का अंत |
किताब इस काल रेखा के नीचे लिखती है कि आर्थिक विकास का शुद्ध कालनिर्धारण आसान नहीं है, और उपमहाद्वीप की अनेक भिन्नताएँ काल रेखा में नहीं दिखाई गई हैं। इसलिए हर तिथि के आगे “लगभग” ज़रूर लिखवाइए।
काल रेखा 1: मौर्यों के बाद
पृष्ठ 50
| लगभग कब | क्या हुआ |
|---|---|
| लगभग 200–100 ई.पू. | पश्चिमोत्तर में हिंद-यूनानी शासन; दक्षिण भारत में चोल, चेर व पांड्य; दक्कन में सातवाहन |
| लगभग 100 ई.पू.–200 ई. तक | पश्चिमोत्तर के शक (मध्य एशिया के लोग) शासक; रोमन व्यापार; सोने के सिक्के |
| लगभग 78 ई. (तिथि निश्चित नहीं) | कनिष्क का राज्यारोहण |
| लगभग 100–200 ई. | सातवाहन और शक शासकों द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण |
| लगभग 320 ई. | गुप्त शासन का आरंभ |
| लगभग 335–375 ई. | समुद्रगुप्त |
| लगभग 375–415 ई. | चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक |
| लगभग 500–600 ई. | कर्नाटक में चालुक्यों का उदय और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय |
| लगभग 606–647 ई. | कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा |
| लगभग 712 | अरबों की सिंध पर विजय |
छपी किताब की काल रेखा 1 में लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति में ‘शक शासन’ छपा है; शक अगली पंक्ति के हैं, और किताब के पृष्ठ 44 के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर हिंद-यूनानी शासकों का नियंत्रण था। किताब का नोट यह भी कहता है कि कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि निश्चित नहीं है।
काल रेखा 2: अभिलेखशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति
पृष्ठ 51
| कब | क्या हुआ |
|---|---|
| 1784 | बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन |
| 1810 का दशक | कोलिन मैकेंज़ी ने संस्कृत और तमिल भाषा के 8,000 अभिलेख एकत्र किए |
| 1838 | जेम्स प्रिंसेप द्वारा असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ लगाना |
| 1877 | अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों के एक अंश को प्रकाशित किया |
| 1886 | दक्षिण भारत के अभिलेखों के शोधपत्र एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक |
| 1888 | एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक |
| 1965–66 | डी.सी. सरकार ने इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी प्रकाशित की |
बच्चों से पूछिए कि 1838 वाली पंक्ति अध्याय के किस भाग से जुड़ती है (भाग 7.1)। पृष्ठ 48 पर किताब ख़ुद अभिलेखों के शोधपत्रों की ओर इशारा करती है, और कहती है कि उनमें से कुछ का उल्लेख काल रेखा 2 में है।
पूरा अध्याय, एक नज़र में
पृष्ठ 28 से 52 · सार हमारी ओर से
| कालांश | मुख्य बात |
|---|---|
| 1 | इतिहासकार अभिलेख, सिक्के और ग्रंथ मिलाकर पढ़ते हैं; प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी पढ़ी, और पियदस्सी का सवाल उठा |
| 2 | सोलह महाजनपद, कहीं राजा तो कहीं गण; छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना |
| 3 | मौर्य साम्राज्य: पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र, सेना की समिति और उपसमितियाँ, असोक का धम्म; नियंत्रण हर जगह एकसमान नहीं |
| 4 | दक्षिण के सरदार, कुषाणों का ‘देवपुत्र’, कई बड़े साम्राज्य सामंतों पर निर्भर, और प्रशस्तियाँ |
| 5 | जातक कथाओं में प्रजा की नज़र से राजा; हल का लोहे का फाल, धान की रोपाई, सिंचाई |
| 6 | गाँव में भेद: भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान, बड़े ज़मींदार; भूमिदान और अग्रहार |
| 7 | नदी, भूमि और समुद्र के रास्तों पर नगर; दानात्मक अभिलेख और श्रेणी |
| 8 | दूर तक फैले व्यापार के रास्ते; आहत सिक्कों से सोने के सिक्कों तक |
| 9 | ब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं; स्रोत 10 और 11 की जाँच |
| 10 | अभिलेखों की सीमाएँ; काल रेखा 1 और 2 |
| 11 | अभ्यास के 12 प्रश्न |
यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।
और अब पहले दिन की पर्चियाँ
पृष्ठ 48–49
हमारी ओर से: पहले दिन आपने लिखा था कि इतिहासकार क्या जानते हैं और क्या नहीं जान पाते। अब आप उसमें क्या जोड़ेंगे?
लिफ़ाफ़ा खोलिए और हर बच्चे को उसकी पर्ची लौटाइए। हर बच्चा पर्ची के नीचे एक पंक्ति जोड़े कि अब वह क्या जानता है, और कम से कम एक बात लिखे जो अभिलेख नहीं बता पाते। दो-तीन बच्चे अपनी पुरानी और नयी पंक्ति, दोनों पढ़कर सुनाएँ।
मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न
इन बारह प्रश्नों में से कौन-सा आपको सबसे कठिन लगता है, और उसका उत्तर अध्याय के किस भाग में मिलेगा?
अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात
पृष्ठ 51–52 · मुख्य बात हमारी ओर से
| प्रश्न | उत्तर की मुख्य बात |
|---|---|
| 1. नगरों में शिल्प उत्पादन, हड़प्पा से भिन्नता | पुरावशेष और दानात्मक अभिलेख, श्रेणी; इन नगरों के अधिकांश स्थलों पर व्यापक खुदाई संभव नहीं, क्योंकि आज भी वहाँ लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न) (पृष्ठ 42–43); हड़प्पा में शिल्प उत्पादन की पहचान पुरावशेषों से होती है, और हड़प्पा लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है (अध्याय 1) |
| 2. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण | राजा या गण; किलेबंद राजधानी; धर्मशास्त्र; कर और भेंट; सेना और नौकरशाही (पृष्ठ 29–30) |
| 3. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण | कथाएँ, अभिलेख, ग्रंथ और खेती के प्रमाण; साथ में सावधानी, क्योंकि कई लोग अपना विवरण नहीं रखते थे (पृष्ठ 38–42, 48–49) |
| 4. स्रोत 3 और स्रोत 8 की वस्तुओं की तुलना | दोनों में स्थानीय उपज; स्रोत 3 में सरदार को भेंट, स्रोत 8 में गाँव को अधिकारियों को चीज़ें देने से छूट (पृष्ठ 35–36, 41) |
| 5. अभिलेखशास्त्रियों की समस्याएँ | हलके खुदे अक्षर; नष्ट अभिलेखों में लुप्त अक्षर; ब्रैकेट में शब्द जोड़ते समय मूल अर्थ न बदले; स्थान या समय से जुड़े अर्थ और वैकल्पिक पाठ; सबके अर्थ नहीं निकले, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए; अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे, इसलिए उपलब्ध अभिलेख संभवत: कुल के अंश मात्र हैं; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ जैसे विषय दर्ज नहीं; बनवाने वालों का ही दृष्टिकोण; पहले ब्राह्मी और खरोष्ठी पढ़नी पड़ीं (पृष्ठ 46–49) |
| 6. मौर्य प्रशासन और असोक के अभिलेख | पाँच केंद्र, नियंत्रण एकसमान नहीं, सेना की समितियाँ, अधिकारी, धम्म; अभिलेखों में केंद्र, फैलाव, धम्म और पतिवेदक (पृष्ठ 32–35, 47–48) |
| 7. डी.सी. सरकार का वक्तव्य | अभिलेख जीवन के बहुत से पक्ष दिखाते हैं, पर किताब का निष्कर्ष है कि पूरा ज्ञान केवल अभिलेखों से नहीं मिलता (पृष्ठ 48–49) |
| 8. उत्तर-मौर्य काल के राजत्व के विचार | सरदार, व्यापार से राजस्व, ‘देवपुत्र’, सामंत, प्रशस्ति (पृष्ठ 35–37) |
| 9. कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन | हल, रोपाई, सिंचाई; परिवर्तन हर जगह नहीं; गाँव में बढ़ते भेद (पृष्ठ 38–41) |
| 10. मानचित्र 1 और 2 की तुलना | तरीका: मानचित्र 1 के महाजनपद (मोटे अक्षरों के 16 नाम, और अश्मक) मानचित्र 2 के अभिलेख-स्थलों और केंद्रों से मिलाइए; जो इस फैलाव के भीतर आते हैं, वे शामिल रहे होंगे। संकेत: मगध केंद्र था (राजधानी पाटलिपुत्र); तक्षशिला और उज्जयिनी प्रांतीय केंद्र थे, इसलिए जिन महाजनपदों में ये नगर हैं, उन्हें मानचित्र 1 पर देखकर सूची में रखें; साम्राज्य अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था। दूसरा भाग: हाँ, जैसे कौशाम्बी (मानचित्र 1 पर नगर, मानचित्र 2 पर स्तंभ अभिलेख)। दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा मानचित्र से कारण दे। (पृष्ठ 30–33) |
| 11. अखबारों के वक्तव्यों की परियोजना | कतरनों की तालिका; सुदर्शन झील और असोक के अभिलेखों से तुलना (पृष्ठ 38, 47–49) |
| 12. आज के नोट और सिक्के | सामग्री, तकनीक, प्रतीक, लिपि और कार्य की तुलना (पृष्ठ 44–46) |
पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं। लिखित परख के लिए प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1 लीजिए। उत्तर जाँचते समय देखिए कि स्रोत का नाम आया है, और किताब के “संभवत:” या “कुछ इतिहासकार” जैसे शब्द उत्तर में भी बने रहे हैं।
अध्याय का बड़ा विचार
“इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 28
पहले कालांश का यह वाक्य आख़िरी कालांश में फिर पढ़िए। अब बच्चे अध्याय से उदाहरण देकर बता सकते हैं कि कहानी कहाँ अधूरी रहती है: गाँव के आम लोग, पशुपालक और शिकारी, और रोज़ के सुख-दुख, जिनका विवरण अभिलेखों में कम मिलता है।