कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 28 से 52
यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।
किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।
सामग्री के पन्ने
किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना
पृष्ठ 28 — शुरुआत, प्रिंसेप और पियदस्सी
कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. प्रिंसेप और पियदस्सी
किताब कहाँ से शुरू करती है। हड़प्पा के बाद से (पृष्ठ 28)। हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में कई तरह के विकास हुए। इन्हीं वर्षों में सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने ऋग्वेद की रचना की। उत्तर भारत, दक्कन पठार और कर्नाटक में कृषक बस्तियाँ बसीं, और दक्कन व दक्षिण भारत में चरवाहा बस्तियों के प्रमाण मिलते हैं। ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दि में मध्य और दक्षिण भारत में शवों के अंतिम संस्कार का नया तरीका दिखा: पत्थरों के बड़े ढाँचे, जिन्हें महापाषाण कहते हैं, और कई जगह शवों के साथ लोहे के उपकरण और हथियार।
हमारी ओर से — वेद लंबे समय तक बोलकर याद रखे और सुनाए जाते रहे; यह बात कक्षा 6 के भारत की सांस्कृतिक जड़ें वाले पाठ में है। इसीलिए इस पन्ने पर “रचना” शब्द बोलिए, “लिखना” नहीं।
फिर किताब अपना असली काल बताती है: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक।
- इतिहासकार इस काल को अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों और चित्रों जैसे स्रोतों से समझते हैं।
- किताब पहले ही चेता देती है कि “इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है”।
यह पंक्ति एक चार्ट पेपर पर लिखकर रख लीजिए, और बच्चे इसे अपनी कॉपी में भी लिख लें; दसवें कालांश में इसी पर लौटना है।
भाग 1 एक आदमी की कहानी है।
- 1830 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला।
- उन्होंने पाया कि ज़्यादातर अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी, यानी “मनोहर मुखाकृति वाले राजा” का नाम है, और कुछ पर राजा का नाम असोक भी लिखा है।
इस खोज से बीसवीं सदी के आरंभ तक उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास की एक सामान्य रूपरेखा बन गई।
पृष्ठ 29 का अभिलेख वाला बॉक्स भी पहले कालांश में ही पढ़वा लीजिए (हमारी ओर से)। उसमें तीन बातें हैं: अभिलेख कठोर सतह पर खुदे होते हैं; जिन पर तिथि नहीं होती, उनका समय अक्षरों की बनावट (पुरालिपि) से आँका जाता है; और प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में हैं।
हमारी ओर से — स्रोतों की चार टोकरियाँ। बोर्ड पर चार खाने बनाइए: अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के, चित्र। फिर अध्याय के ये नाम एक-एक करके बोलिए: असोक के अभिलेख, मेगस्थनीज़ का विवरण, अर्थशास्त्र, कुषाणों के सोने के सिक्के, जातक कथाएँ, सारनाथ का सिंह शीर्ष (चित्र 2.3)। बच्चे बताएँ कि कौन किस खाने में जाएगा। सिंह शीर्ष पर बहस होने दीजिए: वह लिखा हुआ स्रोत नहीं, एक मूर्ति है, जिसे देखकर पढ़ा जाता है। आख़िर में पूछिए कि किस टोकरी से सबसे ज़्यादा जानकारी मिलेगी, और जवाब अगले कालांशों पर छोड़ दीजिए।
यहीं रुकिए। किसी अभिलेख पर तिथि नहीं लिखी है। इतिहासकार उसका समय कैसे बताएँगे?
नमूना उत्तर — अक्षरों की बनावट देखकर। समय के साथ अक्षर लिखने का ढंग बदलता रहा; किताब का उदाहरण है कि लगभग 250 ई.पू. और 500 ई. में ‘अ’ अलग ढंग से लिखा जाता था। जिन अभिलेखों पर तिथि नहीं होती, उनका काल पुरालिपि अथवा लेखन शैली के आधार पर काफ़ी सुस्पष्टता से तय किया जा सकता है (पृष्ठ 29)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। पहली उलझन: बच्चे मान लेते हैं कि ऋग्वेद भी 600 ई.पू. से 600 ई. वाले काल का है। नहीं: वह हड़प्पा के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों की बात है, जो अध्याय के काल से पहले आते हैं। दूसरी उलझन: पियदस्सी। पृष्ठ 28 पर वह अभिलेखों में लिखा नाम है; पृष्ठ 47 पर किताब बताती है कि देवानांपिय और पियदस्सी असोक की उपाधियाँ हैं। दोनों बातें साथ बताइए: अभिलेखों में राजा को इन्हीं उपाधियों से पुकारा गया है।
इसी हिस्से में। मुख्य शब्द · अध्याय का तर्क · फ़्लैशकार्ड 1–11; प्रश्न बैंक क1, क2, घ1।
पृष्ठ 29–31 — प्रारंभिक राज्य: सोलह महाजनपद और मगध
कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. प्रारंभिक राज्य
किताब कहाँ से शुरू करती है। छठी शताब्दी ई.पू. से (पृष्ठ 29), जिसे किताब परिवर्तनकारी काल कहती है: आरंभिक राज्य, नगर, लोहे का बढ़ता प्रयोग और सिक्के, और साथ में बौद्ध और जैन सहित कई विचारधाराएँ। आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथों में सोलह महाजनपदों के नाम आते हैं, पर सूची हर ग्रंथ में एक जैसी नहीं है। वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति के नाम बार-बार मिलते हैं।
ज़्यादातर महाजनपदों पर राजा का शासन था, पर गण और संघ कहलाने वाले राज्यों में लोगों का एक समूह शासन करता था, और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।
- महावीर और बुद्ध, दोनों गण से आते थे।
- वज्जि संघ जैसे राज्यों में भूमि सहित कई संसाधनों पर राजा मिलकर नियंत्रण रखते थे।
- हर महाजनपद की एक राजधानी थी, प्राय: किलेबंद।
- लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने संस्कृत में धर्मशास्त्र नाम के ग्रंथ रचने शुरू किए, जिनमें अपेक्षा थी कि शासक क्षत्रिय हों।
शासक किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट लेते थे, और पड़ोसी राज्यों पर धावा बोलकर धन जुटाना भी वैध माना जाता था।
पृष्ठ 31 पर मगध है: छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. के बीच वह सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना। किताब इसकी दो व्याख्याएँ देती है, और यही इस कालांश का केंद्र है। मगध की आरंभिक राजधानी राजगाह थी, जो राजगीर का प्राकृत नाम है और जिसका अर्थ है ‘राजाओं का घर’; यह पहाड़ियों के बीच बसा किलेबंद शहर था।
हमारी ओर से — दो वकील। कक्षा को दो दलों में बाँटिए। पहले किताब की दोनों व्याख्याएँ बोर्ड पर लिखिए। आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक: बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्वाकांक्षी शासकों और उनके मंत्रियों की नीतियाँ। आधुनिक इतिहासकार: उपजाऊ ज़मीन, लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में), जंगलों में हाथी, और गंगा व उसकी उपनदियों से सस्ता आवागमन। अब हर दल को तीन मिनट दीजिए कि वह अपनी व्याख्या के पक्ष में बोले। अंत में बोर्ड पर एक पंक्ति लिखिए: एक व्याख्या व्यक्तियों पर ज़ोर देती है, दूसरी भूगोल और संसाधनों पर।
यहीं रुकिए। चित्र 2.2 में राजगीर के किले की दीवार है। ऐसी दीवारें क्यों बनाई गईं?
नमूना उत्तर — सुरक्षा के लिए। पड़ोसी राज्य पर धावा बोलकर धन जुटाना वैध माना जाता था, इसलिए राजधानी को बचाना ज़रूरी था। महाजनपदों की राजधानियाँ प्राय: किलेबंद होती थीं, और राजगाह पहाड़ियों के बीच बसा किलेबंद शहर था (पृष्ठ 29–31)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। गण में राजा कौन था, इस पर बच्चे एक ही राजा ढूँढ़ते हैं। बोर्ड पर लिखिए: समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था। दूसरी भूल: “सोलह” को पक्की, एक जैसी सूची मान लेना। किताब ख़ुद कहती है कि ग्रंथों में नाम बदलते हैं।
इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 2) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 31) · फ़्लैशकार्ड 12–24; प्रश्न बैंक क3, क4, क5, घ2, घ3, ङ1, ङ2।
पृष्ठ 32–34 — एक आरंभिक साम्राज्य: मौर्य
कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. एक आरंभिक साम्राज्य
किताब कहाँ से शुरू करती है। स्रोतों से (पृष्ठ 32)। मगध के विकास के साथ मौर्य साम्राज्य उभरा, जिसकी नींव चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई.पू. में रखी; साम्राज्य पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला, और उनके पौत्र असोक ने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) जीता। इतिहास जानने के लिए पुरातात्विक प्रमाण हैं, विशेषकर मूर्तिकला; मेगस्थनीज़ का विवरण, जिसके आज कुछ अंश ही मिलते हैं; अर्थशास्त्र, जिसके संभवत: कुछ भाग कौटिल्य या चाणक्य ने रचे; और बाद के जैन, बौद्ध और पौराणिक ग्रंथ।
पर किताब कहती है कि “पत्थरों और स्तंभों पर मिले असोक के अभिलेख प्राय: सबसे मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं।” असोक पहले सम्राट थे जिन्होंने अपने संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए स्तंभों पर लिखवाए।
पृष्ठ 32–33 पर साम्राज्य का ढाँचा है।
- पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे: राजधानी पाटलिपुत्र, और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि।
- एक जैसे संदेश आधुनिक पाकिस्तान के पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक मिले हैं, पर किताब कहती है कि साम्राज्य के क्षेत्र बड़े विविध थे: “कहाँ अफ़गानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र और कहाँ उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र”।
- किताब आगे कहती है: “यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो” (पृष्ठ 33)।
पृष्ठ 34 पर मेगस्थनीज़ की सेना वाली “एक समिति और छ: उपसमितियों” की व्यवस्था, स्रोत 1 के अधिकारी, और धम्म है: बड़ों के प्रति आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार, और दूसरों के धर्मों और परंपराओं का आदर; इसके प्रचार के लिए धम्म महामात्त नियुक्त हुए।
पृष्ठ 35 का ऊपरी हिस्सा भी तीसरे कालांश में ही आता है (हमारी ओर से):
- यूनानी स्रोतों का सेना वाला आँकड़ा, जिस पर किताब कहती है, “कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।”
- साम्राज्य कितना महत्वपूर्ण था, यह बहस।
साम्राज्य मात्र डेढ़ सौ साल चला, जो उपमहाद्वीप के लंबे इतिहास में बहुत बड़ा काल नहीं है।
हमारी ओर से — केंद्र और उनके कारण। बोर्ड पर उपमहाद्वीप की मोटी रेखा खींचिए। किताब पृष्ठ 32 पर पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र गिनाती है: राजधानी पाटलिपुत्र और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। इनमें से मानचित्र 2 (पृष्ठ 33) पर तीन ही नाम छपे हैं: पाटलिपुत्र, तक्षशिला और उज्जयिनी। तीन बच्चे मानचित्र 2 देखकर इन तीनों को रेखा पर अंदाज़े से सही जगह रखें।
फिर किताब से कारण जोड़िए: तक्षशिला और उज्जयिनी लंबी दूरी वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर थे। सुवर्णगिरि मानचित्र पर नहीं है; उसके बारे में किताब इतना बताती है कि सुवर्णगिरि (“सोने के पहाड़”) कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी था। तोसलि की जगह किताब नहीं बताती, इसलिए उसे रेखा पर न रखवाइए।
इसके बाद पूछिए: राजधानी से प्रांतों तक पहुँचने में कितना समय लगता होगा? किताब कहती है कि “कई सप्ताह या महीनों का समय लगता होगा”, और यात्रियों के लिए खान-पान की व्यवस्था और उनकी सुरक्षा भी करनी पड़ती होगी (पृष्ठ 34)।
यहीं रुकिए। मौर्य साम्राज्य में हर इलाके पर नियंत्रण एक जैसा था, क्या यह कहना ठीक है?
नमूना उत्तर — नहीं। किताब तीन बातें कहती है।
- साम्राज्य के क्षेत्र बड़े विविध थे: “कहाँ अफ़गानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र और कहाँ उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र” (पृष्ठ 33)।
- “यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो” (पृष्ठ 33)।
- “साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था” (पृष्ठ 35)।
इसलिए “हर इलाके पर एक जैसा नियंत्रण” कहना ठीक नहीं।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। सेना का आँकड़ा पढ़कर बच्चे उसे पक्का तथ्य मान लेते हैं; “कुछ इतिहासकार … अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं” वाली पंक्ति साथ पढ़वाइए। दूसरी भूल: अर्थशास्त्र को पूरा का पूरा कौटिल्य की रचना कहना। किताब कहती है कि संभवत: इसके कुछ भागों की रचना कौटिल्य या चाणक्य ने की थी। तीसरी: असोक के अभिलेखों की भाषा। ज़्यादातर अभिलेख प्राकृत में हैं, और प्राकृत के ज़्यादातर अभिलेख ब्राह्मी लिपि में; पश्चिमोत्तर के कुछ अभिलेख खरोष्ठी में हैं, और पश्चिमोत्तर से मिले अभिलेख अरामेइक और यूनानी भाषा में हैं (पृष्ठ 32)।
इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 6) · 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 10) · फ़्लैशकार्ड 25–41; प्रश्न बैंक क6–क10, घ4, ङ3, ङ4, च1, छ1।
पृष्ठ 35–37 — राजधर्म के नवीन सिद्धांत
कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत
किताब कहाँ से शुरू करती है। दक्षिण से (पृष्ठ 35)। तमिलकम में चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियाँ उभरीं। सरदार और राजा का फ़र्क किताब बहुत साफ़ देती है, और यही इस कालांश की चाबी है: सरदार अपने अधीन लोगों से भेंट लेता था और उसे अपने समर्थकों में बाँटता था, जबकि राजा कर वसूलते थे; सरदारी में सामान्यतया स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते थे। संगम कविताएँ और स्रोत 3 (सिलप्पादिकारम्) इसका चित्र देते हैं: सेनगुत्तुवन की वनयात्रा में लोग नाचते-गाते पहाड़ों से उतरे और हाथी दाँत, चंदन, मधु, बाघों के बच्चे और बोलने वाले तोते जैसे उपहार लाए।
स्रोत 3 के शीर्षक में “पाण्ड्य सरदार” और प्रश्न 4 में “पांड्य सरदार” छपा है, पर सिलप्पादिकारम् और दूसरे तमिल स्रोतों में सेनगुत्तुवन चेर राजा हैं।
फिर पृष्ठ 35–36 पर दूसरे शासक आते हैं:
- मध्य और पश्चिम भारत के सातवाहन (लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई.)।
- पश्चिमोत्तर व पश्चिम में मध्य एशियाई मूल के शक, जो लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाते थे।
- कुषाण (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई.): मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं, और अफ़गानिस्तान के एक देवस्थान पर भी इसी प्रकार की मूर्तियाँ मिली हैं। कई कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ की उपाधि ली, शायद चीनी शासकों से प्रेरित होकर।
पृष्ठ 36–37 पर चौथी शताब्दी ई. के गुप्त सहित बड़े साम्राज्य, सामंत, और हरिषेण की प्रयाग प्रशस्ति (स्रोत 4) है, जो समुद्रगुप्त के बारे में कहती है: “धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।”
सरदार और राजा: फ़र्क कहाँ है
हमारी ओर से — प्रशस्ति या रिपोर्ट? पहले स्रोत 4 की दो पंक्तियाँ बोर्ड पर लिखिए: “धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।” और “वे अनेक सहस्र गायों के दाता हैं।” साथ में किताब की बात: प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के तुल्य बताया गया है, और प्रशस्ति लिखने वाले कवि इसे तथ्य का विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे। अब बच्चे हर पंक्ति के आगे लिखें: जाँच सकते हैं या कवि की प्रशंसा। फिर पूछिए: इतिहासकार ऐसे ग्रंथ से तथ्य कैसे निकालें? एक संभावित जवाब: दूसरे स्रोतों, जैसे सिक्कों और अभिलेखों, से मिलाकर।
यहीं रुकिए। राजाओं ने दैवी दर्जे का दावा क्यों किया?
नमूना उत्तर — किताब के अनुसार ऊँची स्थिति पाने का एक साधन देवी-देवताओं से जुड़ना था।
- कई कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ उपाधि ली; मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं, और अफ़गानिस्तान के एक देवस्थान पर भी ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं।
- प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को देवताओं के तुल्य बताया गया।
किताब यह भी बताती है कि चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे, और “जो सामंत शक्तिशाली होते थे वे राजा भी बन जाते थे” (पृष्ठ 36)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। एक भूल जिससे बचाना है: यह मान लेना कि सरदार भी कर लेता था; ऊपर का चित्र बोर्ड पर बनाइए। दूसरी: कुषाण मूर्तियों के बारे में किताब पक्की बात नहीं कहती, “कुछ इतिहासकारों का मानना है” कि इनके ज़रिए कुषाण स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे। यह शुरुआत उत्तर में भी लिखवाइए।
इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 8) · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 4) · फ़्लैशकार्ड 42–51; प्रश्न बैंक क11, क12, घ5, घ6, ङ7, च3, छ2।
पृष्ठ 38–39 — बदलता हुआ देहात: राजा की छवि और उपज बढ़ाने के तरीके
कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. बदलता हुआ देहात
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक सवाल से (पृष्ठ 38): प्रजा राजा को कैसे देखती थी? अभिलेखों से इसका जवाब कम मिलता है, क्योंकि साधारण लोगों ने राजाओं के बारे में अपने विचार कम ही लिखे। इसलिए इतिहासकार जातक और पंचतंत्र जैसी कथाएँ पढ़ते हैं। जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं। गंदतिन्दु जातक में एक कुटिल राजा की प्रजा दुखी है, और भेस बदलकर आए राजा से लोग शिकायत करते हैं कि “रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी”। बचने के लिए लोग गाँव छोड़कर जंगल में बस गए।
इससे किताब दो बातें निकालती है:
- राजा और ग्रामीण प्रजा के संबंध तनाव भरे रहते थे, क्योंकि शासक बड़े-बड़े कर माँगते थे।
- करों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के नए तरीके खोजे।
पृष्ठ 38–39 पर ये तरीके हैं:
- छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में हल का फैलना
- भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल
- गंगा की घाटी में धान की रोपाई
- कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरों से सिंचाई
स्रोत 5 गुजरात की सुदर्शन झील का है: झील मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल ने बनवाई थी, और लगभग दूसरी शताब्दी ई. के संस्कृत अभिलेख के अनुसार शक शासक रुद्रदमन ने उसकी मरम्मत अपने खर्च से, प्रजा से कर लिए बिना, करवाई।
हमारी ओर से — भेस बदला राजा। गंदतिन्दु जातक को पाँच मिनट के नाटक में बदलिए। एक बच्चा भेस बदला राजा बने; बाकी किताब में गिनाए लोग बनें: वृद्ध महिला, किसान, पशुपालक, ग्रामीण बालक। हर पात्र राजा से एक वाक्य में अपनी शिकायत कहे; किताब की पंक्ति (“रात में डकैत …”) किसान के मुँह से आए। नाटक के बाद बोर्ड पर पूछिए: यह कहानी किसकी नज़र से लिखी है, राजा की या प्रजा की? यही बात अभिलेखों से अलग है।
यहीं रुकिए। शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए? (किताब का प्रश्न, पृष्ठ 38)
नमूना उत्तर — करों की बढ़ती माँग के बीच उपज बढ़ाने के तरीके खोजे गए, और सिंचाई उनमें से एक थी: ज़्यादा उपज से खेती और राज्य की आय, दोनों को सहारा मिलता। जो राजा या प्रभावशाली लोग सिंचाई के साधन बनवाते थे, वे अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाते थे; सुदर्शन झील वाले अभिलेख में बताया गया है कि रुद्रदमन ने झील की मरम्मत करवाई थी (पृष्ठ 38–39)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि लोहे का फाल हर जगह फैल गया। किताब कहती है कि उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्सों में; पंजाब और राजस्थान जैसे अर्धशुष्क क्षेत्रों में इसका प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ, और पूर्वोत्तर व मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसान कुदाल से खेती करते रहे। राजस्थान के बच्चों के लिए यह पंक्ति अपने घर की बात है; पूछिए कि उनके दादा-दादी खेत किससे जोतते थे।
दूसरी उलझन: सुदर्शन झील बनवाई किसने और मरम्मत किसने करवाई। अभिलेख के अनुसार झील मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल ने बनवाई; बताया जाता है कि मरम्मत शक शासक रुद्रदमन ने करवाई; और उसी पत्थर पर लगभग पाँचवीं सदी के एक और अभिलेख के अनुसार गुप्त वंश के एक शासक ने फिर मरम्मत करवाई।
इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 9) · फ़्लैशकार्ड 52–64; प्रश्न बैंक क13, क14, क15, घ7, घ8, ङ5, च4।
पृष्ठ 39–41 — ग्रामीण समाज और भूमिदान
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. बदलता हुआ देहात
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक असमानता से (पृष्ठ 39): नई तकनीकों से उपज तो बढ़ी, पर लाभ सबको बराबर नहीं मिला। बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े ज़मींदार मिलते हैं; पालि का गहपति शब्द छोटे किसानों और ज़मींदारों के लिए आता है। बड़े ज़मींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली थे, और ग्राम प्रधान का पद प्राय: वंशानुगत होता था।
आरंभिक तमिल संगम साहित्य में वेल्लालर (बड़े ज़मींदार), उल्वर (हलवाहा) और अणिमई (दास) आते हैं। किताब का अनुमान है कि यह भेद शायद भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर टिका था। मनुस्मृति (स्रोत 6) जैसे विधिग्रंथ भूमि की सीमाओं की बात करते हैं; मनुस्मृति संस्कृत में दूसरी शताब्दी ई.पू. और दूसरी शताब्दी ई. के बीच लिखी गई (पृष्ठ 39)।
भाग 5.4 भूमिदान और नए संभ्रांत ग्रामीणों का है।
- भूमिदान के प्रमाण ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से मिलते हैं, ज़्यादातर ताम्र पत्रों पर।
- चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री प्रभावती गुप्त, जिसका विवाह दक्कन के वाकाटक परिवार में हुआ, ने दंगुन गाँव आचार्य चनालस्वामी को दान किया (स्रोत 8)।
- संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार स्त्रियों का भूमि पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था, फिर भी अभिलेख बताता है कि वह भूमि की स्वामी थी।
- पृष्ठ 40 पर इतिहासकारों की बहस है: कुछ के अनुसार भूमिदान खेती को नए क्षेत्रों में फैलाने की शासक वंशों की रणनीति थी, दूसरों के अनुसार कमज़ोर होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत।
स्रोत 7 (हर्षचरित, बाणभट्ट, लगभग सातवीं शताब्दी ई.) विंध्य के जंगल के किनारे की बस्ती दिखाता है, जहाँ ज़्यादातर लोग कुदाल चलाते हैं।
हमारी ओर से — छूट की सूची से गाँव पहचानिए। पहले स्रोत 8 की छूटें बोर्ड पर लिखिए, जैसे किताब देती है: गाँव में पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे; दौरे पर आए अधिकारियों को घास, जानवरों की खाल और कोयला देने से छूट; मदिरा खरीदने और नमक के लिए खुदाई के राजसी अधिकार से मुक्ति; खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध देने से छूट। फिर बच्चों से किताब का अपना प्रश्न पूछिए: इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा होती थीं? तर्क यह है कि जिस चीज़ को देने से छूट मिली, वह गाँव में मिलती होगी। अंत में पूछिए कि इस दान से गाँव के किसानों के लिए क्या बदला: अब उन्हें गाँव के नए प्रधान की आज्ञा माननी थी।
यहीं रुकिए। धर्मशास्त्रों के अनुसार स्त्रियाँ भूमि की स्वतंत्र स्वामी नहीं हो सकती थीं। फिर प्रभावती गुप्त ने भूमि दान कैसे की?
नमूना उत्तर — किताब दो कारण सुझाती है।
- वह रानी थी, इसलिए यह उदाहरण विरला हो सकता है।
- या धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं होते थे।
उत्तर में दोनों कारण लिखिए, क्योंकि किताब इनमें से किसी एक को पक्का नहीं कहती (पृष्ठ 40)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। भूमिदान की बहस में बच्चे एक पक्ष चुनकर उसे ही सही उत्तर लिख देते हैं; किताब दोनों मत रखती है, उत्तर में भी दोनों आएँ। दूसरी बात: ग्रामीण समाज के कुछ लोग अधिकारियों या सामंतों के नियंत्रण से बाहर थे: पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार (घुमक्कड़ तथा लगभग एक ही स्थान पर रहने वाले) और जगह-जगह घूम कर खेती करने वाले लोग। ये लोग अपने जीवन का विवरण प्राय: नहीं रखते थे, और यह बात दसवें कालांश की “सीमा” वाली चर्चा में फिर काम आएगी।
इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 9) · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 3, 4) · फ़्लैशकार्ड 65–71; प्रश्न बैंक क16, क17, ङ6, च5, छ3।
पृष्ठ 41–43 — नगर एवं व्यापार: नए नगर और नगरीय जनसंख्या
कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. नगर एवं व्यापार
किताब कहाँ से शुरू करती है। नगरों की जगह से (पृष्ठ 41)। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों में नगर बने। ज़्यादातर नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे, और प्राय: सभी संचार मार्गों के किनारे बसे थे: पाटलिपुत्र नदीमार्ग पर, उज्जयिनी भूतल मार्ग पर, और पुहार समुद्रतट पर। मथुरा जैसे शहर व्यापार, संस्कृति और राजनीति के जीवंत केंद्र थे।
पृष्ठ 42 पर पाटलिपुत्र की पूरी कहानी है, जिसे नीचे के चित्र से एक बार में दिखाया जा सकता है। फिर नगरों के लोग:
- किताब कहती है कि “अधिकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाई करना संभव नहीं है, क्योंकि आज भी इन क्षेत्रों में लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न)”।
- फिर भी यहाँ से विभिन्न प्रकार के पुरावशेष मिले हैं: उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (चमकदार कलई वाले उत्कृष्ट कटोरे और थालियाँ, जिनका उपयोग संभवत: अमीर लोग करते थे) और सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन।
- साथ ही, द्वितीय शताब्दी ई.पू. तक कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख मिलते हैं, जिनमें दाता के नाम के साथ उसका व्यवसाय भी लिखा होता है: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार। चित्र 2.6 की मूर्ति स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने एक धार्मिक स्थल में स्थापित की थी।
उत्पादकों और व्यापारियों के संघ श्रेणी कहलाते थे (पृष्ठ 43)।
पाटलिग्राम से खंडहर तक: पाटलिपुत्र
हमारी ओर से — दान के पत्थर पर अपना नाम। पहले किताब की बात बोर्ड पर लिखिए: दानात्मक अभिलेखों में दाता का नाम और प्राय: उसका व्यवसाय लिखा होता था, और व्यवसायों की किताब वाली सूची। फिर हर बच्चा अपनी कॉपी में एक छोटा दान-अभिलेख लिखे, किताब की सूची से कोई एक व्यवसाय चुनकर, इस ढंग से: मैं (नाम), (व्यवसाय) का काम करने वाला या वाली, यह भेंट देता या देती हूँ। पाँच-छह बच्चे पढ़कर सुनाएँ, और कक्षा बताए कि इन पंक्तियों से नगर के बारे में क्या पता चलता है: किस-किस तरह के लोग वहाँ रहते और काम करते थे।
यहीं रुकिए। हड़प्पा के शहरों की तरह इन नगरों की बड़े पैमाने पर खुदाई क्यों नहीं हो पाती?
नमूना उत्तर — क्योंकि इन जगहों पर आज भी लोग रहते हैं।
- किताब के अनुसार “अधिकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाई करना संभव नहीं है, क्योंकि आज भी इन क्षेत्रों में लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न)” (पृष्ठ 42)।
- फिर भी यहाँ से विभिन्न प्रकार के पुरावशेष मिले हैं।
- साथ ही, द्वितीय शताब्दी ई.पू. तक कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख मिलते हैं, जिनमें दाता के नाम के साथ प्राय: उसका व्यवसाय भी लिखा होता है (पृष्ठ 42)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। पाटलिपुत्र की दो तिथियाँ बच्चे मिला देते हैं: राजधानी वहाँ लाने का निर्णय पाँचवीं सदी ई.पू. में हुआ (पृष्ठ 42), और चौथी शताब्दी ई.पू. तक वह मौर्य साम्राज्य की राजधानी बन चुका था (पृष्ठ 31)। चित्र दोनों को अलग-अलग दिखाता है। दूसरी बात: उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र के बारे में किताब कहती है कि संभवत: इनका उपयोग अमीर लोग करते थे; “संभवत:” उत्तर में भी रहे।
इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 1) · फ़्लैशकार्ड 72–89; प्रश्न बैंक घ9, घ10।
पृष्ठ 43–45 — व्यापार, सिक्के और राजा
कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. नगर एवं व्यापार
किताब कहाँ से शुरू करती है। रास्तों से (पृष्ठ 43)। छठी शताब्दी ई.पू. से नदी मार्गों और भूमार्गों का जाल बिछ गया था। भू-मार्ग मध्य एशिया और उससे आगे तक जाते थे।
पृष्ठ 44 पर आगे: समुद्री मार्ग अरब सागर से उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया तक, और बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तक। व्यापारी कई तरह के थे: पैदल फेरी वाले, बैलगाड़ी और घोड़े-खच्चरों के दल वाले, और समुद्री यात्री। सफल व्यापारी तमिल में मसत्थुवन और प्राकृत में सत्थवाह और सेट्ठी कहलाते थे। रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसालों, कपड़ों और जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी।
स्रोत 9 पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी (लगभग प्रथम शताब्दी ई.) का अंश है, जिसमें मालाबार तट के आयात और निर्यात की सूची है।
पृष्ठ 44–45 पर सिक्के हैं, और यहीं अध्याय की याद रखने लायक तारीखें हैं।
- सबसे पहले चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के (छठी शताब्दी ई.पू.) ढाले गए।
- शासक की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों ने जारी किए, जिनका द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण था।
- कुषाणों ने प्रथम शताब्दी ईसवी में सोने के सिक्के बड़े पैमाने पर जारी किए।
- दक्षिण भारत के कई पुरास्थलों से रोमन सिक्के बड़ी संख्या में मिले हैं।
- पंजाब और हरियाणा के यौधेय (प्रथम शताब्दी ई.) के ताँबे के सिक्के हज़ारों की संख्या में मिले हैं।
- सोने के सबसे भव्य सिक्कों में से कुछ गुप्त शासकों ने जारी किए।
छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम मिलते हैं, और इसके कारण पर इतिहासकार एकमत नहीं।
हमारी ओर से — सिक्कों की कतार। पाँच पर्चियाँ बनाइए और उन पर किताब के पाँच सिक्के लिखिए, बिना तारीख के: आहत सिक्के, हिंद-यूनानी सिक्के, कुषाणों के सोने के सिक्के, यौधेय के ताँबे के सिक्के, गुप्तों के सोने के सिक्के। पाँच बच्चे पर्चियाँ लेकर समय के क्रम में खड़े हों; बाकी कक्षा उन्हें आगे-पीछे करवाए। फिर हर बच्चा किताब से अपने सिक्के की एक पहचान बोले: धातु, समय, या पहली बार क्या हुआ। यौधेय और कुषाण, दोनों प्रथम शताब्दी ई. के हैं, इसलिए ये दो बच्चे साथ खड़े हों।
यहीं रुकिए। दक्षिण भारत रोमन साम्राज्य का हिस्सा नहीं था, फिर भी वहाँ रोमन सिक्के बड़ी संख्या में क्यों मिले?
नमूना उत्तर — क्योंकि व्यापार राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था। दक्षिण भारत रोमन साम्राज्य में न होते हुए भी व्यापार के ज़रिए उससे जुड़ा था (पृष्ठ 45); रोम में काली मिर्च जैसे मसालों, कपड़ों और जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी (पृष्ठ 44)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। एक भूल जिससे बचाना है: शासक के नाम और चित्र वाले पहले सिक्के कुषाणों के थे। नहीं, हिंद-यूनानी शासकों के; कुषाणों की पहचान बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के हैं। दूसरी: आहत सिक्कों को सोने का मान लेना; वे चाँदी और ताँबे के थे। तीसरी: छठी शताब्दी ई. के बाद सोने के सिक्के कम मिलने का कोई एक कारण लिखवाना। किताब दोनों मत देती है: कुछ इतिहासकार रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूर के व्यापार के घटने की बात कहते हैं, दूसरे कहते हैं कि नए नगर और व्यापार के नए तंत्र उभरे, और हो सकता है सिक्के प्रचलन में रहने के कारण जमा न हुए हों।
इसी हिस्से में। 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 12) · अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 72–89; प्रश्न बैंक क18, क19, च6।
पृष्ठ 45–48 — मूल बातें: ब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं
कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं
किताब कहाँ से शुरू करती है। लिपि से (पृष्ठ 46)। आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी है, और असोक के अभिलेख इसी लिपि में हैं। अट्ठारहवीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से बंगाली और देवनागरी पांडुलिपियों के अक्षरों की तुलना पुराने अक्षरों से की। शुरू के विद्वान कई बार मान बैठे कि अभिलेख संस्कृत में हैं, जबकि प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में थे। कई दशकों के परिश्रम के बाद जेम्स प्रिंसेप ने 1838 ई. में असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकाला।
खरोष्ठी की चाबी सिक्के बने।
- पश्चिमोत्तर के हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय-प्रथम शताब्दी ई.पू.) के सिक्कों पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों में लिखे हैं।
- यूनानी पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने दोनों के अक्षर मिलाए, जैसे अपोलोडोटस के नाम में।
- पृष्ठ 47 पर किताब बताती है कि स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं, केवल उपाधियाँ हैं।
पृष्ठ 48 पर स्रोत 11 है: शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर कलिंग पर विजय, जिसके बारे में अभिलेख कहता है, “डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई।”
हमारी ओर से — दो लिपियों वाली चाबी। बोर्ड पर किसी बच्चे का नाम देवनागरी में लिखिए, और उसके नीचे वही नाम एक गढ़ी हुई गुप्त लिपि में, जिसमें हर अक्षर की जगह एक आकृति हो (गोला, त्रिकोण, तारा जैसी आकृतियाँ; यह लिपि काल्पनिक है)। फिर उसी गुप्त लिपि में एक दूसरा शब्द लिखिए, जिसमें वही अक्षर दोबारा आएँ। बच्चे पहली पंक्ति को चाबी बनाकर दूसरा शब्द पढ़ें। अब बताइए कि खरोष्ठी के साथ यही हुआ था: सिक्के पर एक ही नाम दो लिपियों में था, और एक लिपि (यूनानी) विद्वान पहले से पढ़ सकते थे।
यहीं रुकिए। स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं है। फिर अभिलेखशास्त्रियों ने कैसे माना कि यह असोक का ही अभिलेख है?
नमूना उत्तर — स्रोत 10 में देवानांपिय और पियदस्सी जैसी उपाधियाँ हैं, और असोक नाम दूसरे अभिलेखों में इन्हीं उपाधियों के साथ मिलता है। विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान की समानता देखकर अभिलेखशास्त्रियों ने माना कि ये सब अभिलेख एक ही शासक ने बनवाए (पृष्ठ 47)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। दो तारीखें: 1830 का दशक (पृष्ठ 28, प्रिंसेप ने दोनों लिपियों का अर्थ निकाला) और 1838 ई. (पृष्ठ 46, असोककालीन ब्राह्मी)। दोनों सही हैं; बच्चे इन्हें एक-दूसरे का खंडन न समझें। दूसरी उलझन कलिंग वाले अभिलेख की है: असोक के अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से मिले हैं, फिर भी वेदना वाला यह अभिलेख उस जीते गए क्षेत्र में नहीं मिला। इस पर बच्चों से अनुमान लगवाइए, पर उत्तर में अनुमान को अनुमान ही लिखवाइए।
इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 5) · फ़्लैशकार्ड 90–105; प्रश्न बैंक क20, छ4।
पृष्ठ 48–51 — अभिलेख साक्ष्य की सीमा; काल रेखा 1 और 2
कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा
किताब कहाँ से शुरू करती है। अक्षरों से (पृष्ठ 48)। किताब अभिलेखों की सीमा इन बातों में रखती है:
- तकनीकी सीमा: कुछ अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण होते हैं और पढ़ने में मुश्किल होते हैं; अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं, जिससे अक्षर लुप्त हो जाते हैं; और शब्दों का वास्तविक अर्थ जानना सदैव सरल नहीं होता, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से जुड़े होते हैं।
- कई हज़ार अभिलेख मिले हैं, पर सबके अर्थ नहीं निकाले जा सके हैं, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए हैं; और “अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे हैं”।
- एक और मौलिक समस्या: जिसे हम आज राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह अभिलेखों में अंकित हो। खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख इनमें नहीं मिलते, क्योंकि प्राय: अभिलेख बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं; और अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे।
पृष्ठ 49 का निष्कर्ष: “राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है”। अब पहले कालांश वाली पंक्ति पर लौटिए: “इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है।”
पृष्ठ 50–51 पर दो काल रेखाएँ हैं:
- काल रेखा 1: राजनीतिक और आर्थिक विकास
- काल रेखा 2: अभिलेखशास्त्र की प्रगति, 1784 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी से 1965–66 में डी.सी. सरकार की पुस्तक तक
काल रेखा 1 की लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति में किताब (पृष्ठ 50) पश्चिमोत्तर में शक शासन छापती है; पृष्ठ 44 के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर हिंद-यूनानी शासकों का नियंत्रण था, और शक अगली पंक्ति (लगभग 100 ई.पू.-200 ई.) में आते हैं। कनिष्क के राज्यारोहण के आगे लगभग 78 ई. (तिथि निश्चित नहीं) लिखवाइए।
हमारी ओर से — तीन उँगलियाँ, तीन बातें। बच्चे अपने हाथ की तीन उँगलियाँ खोलें। हर उँगली किताब की एक बात: पहली तकनीकी सीमा (हलके और टूटे अक्षर, शब्दों का अर्थ), दूसरी अभिलेखों की गिनती (सबके अर्थ नहीं निकले, और अनेक अभिलेख सुरक्षित नहीं बचे होंगे), तीसरी मौलिक समस्या (रोज़ की ज़िंदगी इनमें नहीं, और बनवाने वालों के ही विचार)। हर उँगली के साथ किताब का एक उदाहरण बोलवाइए; तीसरी उँगली पर असोक का यह दावा याद कराइए कि पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी, जिसे इतिहासकार परखते हैं। तीनों उँगलियाँ प्रश्न 5 और प्रश्न 7 के उत्तर का ढाँचा हैं।
यहीं रुकिए। किसी गाँव के किसान रोज़ खेत में क्या करते थे, यह जानने के लिए क्या अभिलेख काफ़ी होंगे?
नमूना उत्तर — नहीं। किताब के अनुसार खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा के सुख-दुख अभिलेखों में प्राय: नहीं मिलते, क्योंकि अभिलेख बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं। इसके लिए जातक जैसी कथाएँ और दूसरे ग्रंथ भी पढ़ने पड़ते हैं, जैसा पाँचवें कालांश में देखा (पृष्ठ 38, 48–49)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे सीमा का मतलब यह समझ लेते हैं कि अभिलेख बेकार हैं। किताब ऐसा नहीं कहती; अभिलेख बहुत कुछ बताते हैं, बस उन्हें दूसरे स्रोतों के साथ परखना पड़ता है। दूसरी बात इतिहास-लेखन के बदलते रुख की है: उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों और बीसवीं सदी के प्रारंभ में इतिहासकारों की रुचि मुख्य रूप से राजाओं में थी; बीसवीं सदी के मध्य से आर्थिक परिवर्तन और सामाजिक समुदाय महत्वपूर्ण बने; और हाल के दशकों में हाशिए पर रहे समुदायों में रुचि बढ़ी है।
इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 3, 5) · 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 7) · अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 90–118; प्रश्न बैंक ङ8, च2।
कक्षा की गतिविधियाँ
पृष्ठ 41 की गतिविधि — अपने इलाके में हल, सिंचाई और रोपाई
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. बदलता हुआ देहात
किताब पृष्ठ 41 पर पूछती है कि क्या आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाई और धान की रोपाई होती है, और अगर नहीं, तो कोई और व्यवस्था है या नहीं। बच्चों को खोज पर भेजने से पहले किताब की बातें बोर्ड पर रखिए:
- छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में हल फैला।
- किताब (पृष्ठ 39) बताती है कि पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ।
- सिंचाई कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों से होती थी।
- धान की रोपाई में पहले बीज अंकुरित करके पौधे पानी भरे खेतों में रोपे जाते हैं (पृष्ठ 38–39)।
हमारी ओर से। हर बच्चा अपने घर या पड़ोस के एक किसान से तीन सवाल पूछे: खेत किससे जोतते हैं, सिंचाई किससे करते हैं, और धान लगाते हैं या नहीं; न लगाते हों तो कौन-सी फ़सलें। अगले दिन उत्तर चार्ट पेपर पर बनी एक तालिका में भरिए, और बच्चे यही तालिका अपनी कॉपी में भी उतार लें; फिर कक्षा मिलकर किताब की बातों से तुलना करे।
नमूना उत्तर — उत्तर हर इलाके में अलग होगा। रेगिस्तानी इलाके का कोई बच्चा लिख सकता है:
- खेत ट्रैक्टर से जोते जाते हैं।
- सिंचाई ट्यूबवेल से होती है।
- धान की जगह बाजरा या गेहूँ बोया जाता है।
ऐसा उत्तर तब पूरा माना जाए जब उसमें तीनों बातें हों और साथ में किताब की एक बात, जैसे: किताब (पृष्ठ 39) बताती है कि पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ।
पृष्ठ 48 की गतिविधि — मानचित्र 2 पर असोक के अभिलेख
कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं
किताब पृष्ठ 48 पर कहती है कि मानचित्र 2 देखकर असोक के अभिलेखों के प्राप्ति स्थानों की चर्चा कीजिए, और देखिए कि उनमें कोई एक-सा प्रारूप दिखता है या नहीं। पहले मानचित्र 2 (पृष्ठ 33) के तीन प्रकार बोर्ड पर लिखिए, हर एक के कुछ नामों के साथ:
- महाशिलालेख: जैसे गिरनार, कलसी, शहबाज़गढ़ी, मानसेहरा, जौगड़
- लघुशिलालेख: जैसे बैराट, भाब्रू, मास्की, ब्रह्मगिरि
- स्तंभ अभिलेख: जैसे सारनाथ, कौशाम्बी, टोपरा, मेरठ, रामपुरवा, साँची
साथ में मानचित्र पर छपे तीन केंद्र भी लिखिए: राजधानी पाटलिपुत्र, और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला और उज्जयिनी।
हमारी ओर से। कक्षा को तीन दलों में बाँटिए, हर दल को एक प्रकार। हर दल किताब का मानचित्र देखकर बताए कि उसके अभिलेख ज़्यादातर कहाँ हैं: राजधानी और प्रांतीय केंद्रों के पास, साम्राज्य के किनारों पर, या व्यापार मार्गों के पास। तीनों दलों के निष्कर्ष बोर्ड पर एक साथ लिखिए। शिलालेख और स्तंभ, दोनों के नाम बच्चे मानचित्र पर ख़ुद गिनें; गिनती यहाँ लिखी नहीं गई है।
नमूना उत्तर — इसका कोई एक तय उत्तर नहीं। अच्छा उत्तर तीन बातें देखता है:
- हर प्रकार के अभिलेख कहाँ-कहाँ हैं।
- क्या वे पाटलिपुत्र, तक्षशिला और उज्जयिनी जैसे केंद्रों के आसपास हैं।
- क्या वे व्यापार मार्गों के पास हैं।
उत्तर के अंत में किताब का एक संकेत जोड़ा जा सकता है: कलिंग विजय की वेदना वाला अभिलेख उस जीते गए क्षेत्र में नहीं मिला (पृष्ठ 32–33, 48)।
पृष्ठ 51–52 — प्रश्नावली
कालांश 11 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा
इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:
- 1 से 5 तक के प्रश्न: उत्तर के मुख्य बिंदु (लगभग 100 से 150 शब्द)
- 6 से 9 तक के प्रश्न: लघु निबंध के मुख्य बिंदु (लगभग 500 शब्द)
- 10 से 12 तक के प्रश्न: मानचित्र और परियोजना
- चर्चा कीजिए: पृष्ठ 31, 34, 37, 41, 45 और 48
- किनारे के प्रश्न
अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।