कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 196 से 223
यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।
किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।
सामग्री के पन्ने
किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना
पृष्ठ 196–198 — 1.1 स्रोतों की तलाश, 1.2 किसान और उनकी ज़मीन
कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. किसान और कृषि उत्पादन
किताब कहाँ से शुरू करती है। गाँव से: “सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे।” (पृष्ठ 196)। फिर किताब गाँव के रिश्ते गिनाती है और बताती है कि हम उन्हें किन स्रोतों से जानते हैं:
- फ़सल के दावेदार: छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे। इससे उनके बीच “सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने।”
- मुग़ल राज्य: गाँवों में आई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था।
- बाज़ार: कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों में आ गए, और खेती वाले इलाके शहरों से जुड़ गए।
- स्रोत (भाग 1.1): किसान अपने बारे में ख़ुद नहीं लिखते थे। इसलिए मुख्य स्रोत वे ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए; इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी है।
- किसान के नाम (भाग 1.2): भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान लिखते थे; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं।
- दो किस्म के किसान: खुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे।
- स्रोत 1: बाबर ने बाबरनामा में लिखा कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव “एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।”
हमारी ओर से — तीन ढेर काग़ज़। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए और किताब के पृष्ठ 197 से भरिए: (1) आइन–ए–अकबरी, जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने लिखा; (2) सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं; (3) ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़, जो पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का खाका देते हैं। अब पूछिए: इनमें से किसे किसान ने लिखा? और अगर किसी ने नहीं, तो किसान की बात हम तक कैसे पहुँचती है?
नमूना उत्तर — किसी को नहीं, पर किसान की बात फिर भी दर्ज है:
- लिखने वाले: तीनों राज्य या कंपनी के काग़ज़ हैं; आइन दरबार में लिखी गई।
- किसान की बात: ये स्रोत किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े दर्ज करते हैं, और बताते हैं कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे।
इसीलिए किताब आइन के बारे में चेताती है: “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” (पृष्ठ 197)
किसानों के बारे में हमारे तीन तरह के स्रोत
यहीं रुकिए। गुजरात में 6 एकड़ के करीब ज़मीन वाला किसान समृद्ध माना जाता था। इससे एक औसत किसान की ज़मीन के बारे में क्या पता चलता है?
नमूना उत्तर — कि औसत किसान की ज़मीन छोटी होती थी:
- उत्तर भारत: एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा कुछ होता था; ज़्यादातर के पास इससे भी कम।
- बंगाल: औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी, और 10 एकड़ वाले आसामी को अमीर समझा जाता था।
किताब यह भी बताती है कि खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर टिकी थी, और किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की (पृष्ठ 198)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। पाहि–काश्त को बच्चे बिना ज़मीन का मज़दूर समझ लेते हैं। किताब के अनुसार वह दूसरे गाँव से ठेके पर खेती करने आता था, कभी अपनी मर्ज़ी से (जब किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें) और कभी मजबूरी में (अकाल या भुखमरी के बाद की आर्थिक परेशानी से)। दूसरी भूल: आइन को किसानों की अपनी किताब मान लेना। वह दरबार का ग्रंथ है, और उसका मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था।
इसी हिस्से में। प्रश्न 1 के मुख्य बिंदु · अध्याय का तर्क · पृष्ठ 198 का किनारे का प्रश्न · फ़्लैशकार्ड 1–19; प्रश्न बैंक क1, क2, क3, ख1, ग1, घ1, च1।
पृष्ठ 198–201 — 1.3 सिंचाई और तकनीक, 1.4 फ़सलों की भरमार
कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 1. किसान और कृषि उत्पादन
किताब कहाँ से शुरू करती है। खेती के फैलाव से: ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ (पृष्ठ 198)। फिर:
- पहले पेट: खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं। जहाँ प्रति वर्ष 40 इंच या उससे ज़्यादा बारिश होती थी, वहाँ कमोबेश चावल की खेती होती थी।
- सिंचाई (स्रोत 2): बाबर ने उत्तर भारत में दो उपकरण देखे: लाहौर और दीपालपुर में रहट, और आगरा, चाँदवर और बयाना में बालटी। दोनों बैल से चलते थे।
- राज्य की मदद: उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर।
- औज़ार: लकड़ी का हलका हल, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी। यह मिट्टी को बहुत गहरा नहीं खोदता था, इसलिए तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी।
- दो मौसम (भाग 1.4): खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)। ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थीं; जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक़्त थे, वहाँ तीन भी।
- विविधता: आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर आगरा प्रांत में 39 किस्म की और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें उगाई जाती थीं; बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में होती थीं।
- दो बॉक्स (पृष्ठ 200): तम्बाकू, जिसे अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार देखा; और आबादी, जो 1600 से 1800 के बीच लगभग 5 करोड़ बढ़ी, यानी 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी।
हमारी ओर से — दो टोकरियाँ। बोर्ड पर दो टोकरियाँ बनाइए: “पेट भरने के लिए” और “बेचने के लिए”। फिर किताब की ये बातें पढ़कर सुनाइए: रोज़ के खाने के लिए चावल, गेहूँ, ज्वार सबसे ज़्यादा उगाए जाते थे; मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें) की खेती को बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था; कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे; तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ़सलों में आते थे। अब पूछिए: हर फ़सल किस टोकरी में जाएगी, और कौन-सी दोनों में?
नमूना उत्तर — टोकरियाँ पूरी तरह अलग नहीं होतीं:
- पेट भरने की टोकरी: चावल, गेहूँ, ज्वार।
- बेचने की टोकरी: कपास और गन्ना; कपास मध्य भारत और दक्कनी पठार में उगती थी, और बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था।
- दोनों में: दलहन और तिलहन (जैसे सरसों)। किताब इन्हें भी नकदी फ़सलों में गिनती है, और कहती है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
यही किताब की असली बात है: एक औसत किसान की ज़मीन पर “पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे।” (पृष्ठ 200)
सत्रहवीं सदी में आई नयी फ़सलें
यहीं रुकिए। जहाँगीर ने तम्बाकू पर पाबंदी लगाई थी। फिर सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू कहाँ तक पहुँच गया?
नमूना उत्तर — पूरे भारत तक, पाबंदी के बावजूद:
- रास्ता: तम्बाकू सबसे पहले दक्कन पहुँचा, और सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया।
- पाबंदी: जहाँगीर ने धूम्रपान की इस आदत के फैलने से चिंतित होकर पाबंदी लगाई, पर वह बेअसर रही।
- नतीजा: सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था।
किताब यह भी बताती है कि आइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती (पृष्ठ 200)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। आबादी के बॉक्स में किताब में यहाँ “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है। बच्चों को दोनों बातें दिखाइए: 200 वर्षों का हिसाब 1600 से 1800 बैठता है। कोई बच्चा किताब में छपा “1600 से 1700” लिखे, तो उसे ग़लत मत काटिए; बस 200 वर्षों वाली बात समझा दीजिए। दूसरी भूल: खरीफ़ और रबी को उलट देना। किताब में खरीफ़ पतझड़ में और रबी वसंत में है। तीसरी: 39 और 43 को किस्मों की एक ही गिनती मान लेना; ये दो अलग प्रांतों, आगरा और दिल्ली, की गिनतियाँ हैं, और 50 सिर्फ़ बंगाल के चावल की किस्में हैं।
इसी हिस्से में। प्रश्न 2 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 199 का किनारे का प्रश्न · पृष्ठ 201 का चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 20–38; प्रश्न बैंक क4, क5, क6, क7, ख2, ख3, ख4, ख5, ग2, ङ1, छ1।
पृष्ठ 201–204 — 2.1 जाति और ग्रामीण माहौल, 2.2 पंचायतें और मुखिया
कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. ग्रामीण समुदाय
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक उलझन से: किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह कई मायनों में एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था। इस समुदाय के तीन घटक थे: खेतिहर किसान, पंचायत, और गाँव का मुखिया (पृष्ठ 201)। फिर:
- जाति (भाग 2.1): जाति और जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई समूहों में बँटे थे। किताब के शब्दों में, जुताई करने वालों में “एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मज़दूरी करते थे।”
- ज़मीन थी, फिर भी ग़रीबी: खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ ऐसे ही काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे।
- बीच के समूह: निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था; बीच के समूहों में ऐसा नहीं था। पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं।
- पंचायत (भाग 2.2): गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा, आम तौर पर वे लोग जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे। किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है।
- मुखिया: मुक़द्दम या मंडल, जो पंचायत का सरदार था। वह गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाता था, और इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।
- दंड: पंचायत जुर्माना लगा सकती थी, और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन जैसा गंभीर दंड भी दे सकती थी।
- जाति पंचायत: हर जाति की अपनी पंचायत भी होती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें दीवानी के झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं, और देखती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं।
हमारी ओर से — आम ख़ज़ाने का हिसाब। बोर्ड पर लिखिए: पंचायत का खर्च गाँव के उस आम ख़ज़ाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति योगदान देता था। फिर किताब के गिनाए तीन खर्च लिखिए:
- 1गाँव का दौरा करने वाले कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी;
- 2बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटना;
- 3मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना। अब पूछिए: इनमें से कौन-सा खर्च बाहर के लोगों के लिए था, और कौन-से गाँव की अपनी ज़रूरत के लिए?
नमूना उत्तर — पहला बाहर वालों के लिए, बाकी दो गाँव के लिए:
- बाहर वाले: कर अधिकारी राज्य के नुमाइंदे थे; उनकी ख़ातिरदारी भी गाँव के ख़ज़ाने से होती थी।
- गाँव की ज़रूरत: विपदा से निपटना और बाँध या नहर का काम ऐसे सामुदायिक काम थे जो किसान अकेले नहीं कर सकते थे।
इससे बच्चे देखें कि ज़मीन हर किसान की अपनी होते हुए भी गाँव एक समुदाय की तरह कैसे चलता था (पृष्ठ 202)।
यहीं रुकिए। अगर राज्य बहुत ज़्यादा कर माँगे, तो किसान के पास कौन-से रास्ते थे?
नमूना उत्तर — किताब तीन क़दम बताती है:
- अर्ज़ी: पश्चिम भारत, ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र, के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई कई अर्ज़ियाँ हैं, जिनमें “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत है। ये आम तौर पर ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग देते थे।
- समझौता: अत्यधिक कर के मामलों में पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती थी।
- भाग जाना: समझौता न हो, तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाते थे। जोतने लायक खाली ज़मीन आसानी से मिल जाती थी और श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी, इसलिए किताब लिखती है कि गाँव छोड़कर भाग जाना “खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।”
ध्यान दिलाइए कि अर्ज़ी देने वालों की नज़र में ज़िंदा रहने के न्यूनतम बुनियादी साधन उनका परंपरागत रिवाजी हक़ थे (पृष्ठ 204)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे पंचायत को सबकी बराबर सभा मान लेते हैं। किताब उसे “अल्पतंत्र” कहती है, जिसमें अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी, पर छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए जगह होने की संभावना कम थी। दूसरी भूल: किताब के “नीच समझे जाने वाले काम” को “नीच काम” लिख देना। किताब के शब्द बताते हैं कि यह उस समाज की नज़र थी, इसलिए उत्तर में भी वही शब्द लिखवाइए। तीसरी: मुखिया के चुनाव को पक्की बात मान लेना। किताब कहती है कि कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्ग उसे आम सहमति से चुनते थे, और फिर ज़मींदार से मंज़ूरी लेनी पड़ती थी।
इसी हिस्से में। प्रश्न 6 और 9 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 201 और 203 के किनारे के प्रश्न · फ़्लैशकार्ड 39–60; प्रश्न बैंक क8, क9, क10, ग3, घ2, च2, च5।
पृष्ठ 204–205 — 2.3 ग्रामीण दस्तकार, 2.4 एक “छोटा गणराज्य”?
कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. ग्रामीण समुदाय
किताब कहाँ से शुरू करती है। गिनती से: अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे (पृष्ठ 204)। फिर:
- किसान भी दस्तकार: कई समूह रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतन पकाना, और खेती के औज़ार बनाना या उनकी मरम्मत भी करते थे, उन महीनों में जब खेती से फ़ुरसत होती।
- सेवा के बदले: कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार भी गाँव के लोगों को सेवाएँ देते थे, और बदले में आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा पाते थे। अदायगी कैसे होगी, यह शायद पंचायत तय करती थी।
- मीरास या वतन: महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था।
- जजमानी: अठारहवीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।” इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, पर यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था।
- “छोटा गणराज्य” (भाग 2.4): उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय गाँवों को ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे।
- नकद: गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे।
दस्तकार को सेवा के बदले क्या मिलता था
हमारी ओर से — गणराज्य की जाँच। बोर्ड के बाएँ हिस्से में अंग्रेज़ अफ़सरों की राय लिखिए: गाँव एक “छोटा गणराज्य”, जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे। दाएँ हिस्से में किताब की चार बातें लिखिए: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी; जाति और जेंडर के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं; कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; और न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था। अब पूछिए: दाएँ हिस्से की कौन-सी बात “भाईचारे से बँटवारे” वाली तस्वीर को सबसे सीधे काटती है?
नमूना उत्तर — इस पर बच्चों की राय अलग हो सकती है; किताब का अपना निष्कर्ष यह है:
- बराबरी नहीं: किताब के अनुसार गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती; मिल्कियत व्यक्तिगत थी और विषमताएँ गहरी थीं।
- ताक़त कुछ हाथों में: फ़ैसले और न्याय, दोनों कुछ ताकतवर लोगों के हाथ में थे।
- गाँव बंद नहीं: किताब इससे भी ज़रूरी बात यह बताती है कि गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे; मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी।
जो बच्चा इनमें से किसी एक बात को किताब से जोड़कर रखे, उसका उत्तर ठीक है (पृष्ठ 205–206)।
यहीं रुकिए। सत्रहवीं सदी के फ़्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को भारत के गाँवों में कौन-सी बात उल्लेखनीय लगी?
नमूना उत्तर — गाँवों में भी मुद्रा का कारोबार:
- उसके शब्द: “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।”
- सराफ़ का काम: उसके अनुसार सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे।
यह बॉक्स पृष्ठ 206 पर है, और “छोटे गणराज्य” वाली बहस में नकद के रिश्तों का अच्छा सबूत है।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे जजमानी को सोलहवीं-सत्रहवीं सदी का आम शब्द मान लेते हैं; किताब कहती है कि यह शब्द उस समय बहुत इस्तेमाल नहीं होता था, और नकद अदायगी का चलन भी बिलकुल नदारद नहीं था। दूसरी भूल: “छोटा गणराज्य” को किताब की अपनी राय समझ लेना। यह उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय है, और शीर्षक का प्रश्न-चिह्न बताता है कि किताब उस पर सवाल उठाती है। तीसरी: 25 फ़ीसदी को हर गाँव पर लागू कर देना; किताब “कहीं–कहीं” की बात करती है।
इसी हिस्से में। प्रश्न 4 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 204 का किनारे का प्रश्न · पृष्ठ 206 का चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 61–69; प्रश्न बैंक क11, ख6, ख7, ख8, ग4।
पृष्ठ 206–208 — 3. कृषि समाज में महिलाएँ
कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. कृषि समाज में महिलाएँ
किताब कहाँ से शुरू करती है। खेत से: “महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे।” मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं (पृष्ठ 206)। फिर किताब काम और उसकी हदें, दोनों दिखाती है:
- घर-बाहर का फ़र्क नहीं: घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद थे, इसलिए “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा फ़र्क यहाँ मुमकिन नहीं था।
- पूर्वाग्रह: फिर भी महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर पूर्वाग्रह बने रहे। पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी; बंगाल में मासिक धर्म के समय वे पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।
- दस्तकारी: सूत कातना, बरतन के लिए मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे।
- संसाधन: समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत के कारण महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता था।
- काबू: घर का मुखिया मर्द होता था, और परिवार और समुदाय के मर्द महिला पर पुरज़ोर काबू रखते थे।
- दरख़्वास्तें: पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र) के दस्तावेज़ों में महिलाओं की वे दरख़्वास्तें मिलती हैं जो उन्होंने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजीं।
- ज़मीन पर हक़: भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था। हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे वे बेचने या गिरवी रखने के लिए स्वतंत्र थीं।
हमारी ओर से — काम और रोक, दो खाने। बोर्ड पर दो खाने बनाइए। पहले खाने में किताब के गिनाए काम लिखिए: बुआई, निराई, कटाई, दाना निकालना; सूत कातना, मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, कढ़ाई; ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में काम; और निर्माण-स्थलों पर बोझा ढोना। दूसरे खाने में किताब की बताई रोकें लिखिए: पश्चिमी भारत में हल और कुम्हार का चाक, बंगाल में पान का बगान। फिर किताब की यह बात पढ़िए: किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही बढ़ती। अब पूछिए: महिलाओं के काम का बोझ किस बात से बढ़ता था, और रोकें किस आधार पर थीं?
नमूना उत्तर — बोझ बाज़ार से बढ़ता था, रोकें पूर्वाग्रह से थीं:
- बोझ: जिस चीज़ का जितना ज़्यादा व्यापार होता, उसे बनाने में महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही बढ़ती।
- रोकें: किताब के अनुसार ये रोकें महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर बने “पूर्वाग्रह” से थीं।
इस खाने में बच्चों के अपने घर या आस-पड़ोस की बात मत जुड़वाइए; पूरी चर्चा किताब के पन्नों तक रखिए (पृष्ठ 206–207)।
यहीं रुकिए। किसान और दस्तकार समाज में शादी के रिवाज संभ्रांत समूहों से अलग क्यों थे?
नमूना उत्तर — किताब इसकी वजह महिलाओं की कमी में देखती है:
- कमी: कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादीशुदा महिलाओं की कमी थी।
- रिवाज: कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करनी होती थी, दहेज नहीं; तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं।
- दूसरा पहलू: महिलाओं की प्रजनन शक्ति को इतनी अहमियत दी जाती थी कि उस पर काबू खोने का बड़ा डर था। घर का मुखिया मर्द होता था, और परिवार और समुदाय के मर्द महिलाओं पर पुरज़ोर काबू रखते थे।
बच्चे देखें कि किताब एक ही कारण से दो उलटे नतीजे निकालती है: रिवाज में छूट भी, और काबू भी (पृष्ठ 207)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे “दुलहन की कीमत” को दहेज लिख देते हैं; किताब में यह दहेज की जगह अदा होती थी। दूसरी भूल: ज़मीन के हक़ को सभी महिलाओं पर लागू कर देना। किताब पुश्तैनी संपत्ति के हक़ की बात भूमिहर भद्रजनों में करती है, और ज़मींदारी के उत्तराधिकार की बात हिंदू और मुसलमान महिलाओं के लिए; बंगाल में अठारहवीं सदी की राजशाही ज़मींदारी की कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी। तीसरी: दरख़्वास्तों में महिलाओं के नाम ढूँढना। किताब बताती है कि ज़्यादातर दस्तावेज़ों में उनका नाम दर्ज नहीं होता था; उन्हें घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में लिखा जाता था।
इसी हिस्से में। प्रश्न 3 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 207 का चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 70–81; प्रश्न बैंक क12, ग6, ङ2।
पृष्ठ 208–211 — 4. जंगल और कबीले
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. जंगल और कबीले
किताब कहाँ से शुरू करती है। नक्शे के बड़े हिस्से से: उत्तर और उत्तर–पश्चिमी भारत के गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़ दें तो ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों से घिरे थे, और उस समय के स्रोतों के आधार पर अंदाज़ा है कि अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों का औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी था (पृष्ठ 208)। फिर:
- “जंगली” का अर्थ: उस समय की रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए जंगली शब्द इस्तेमाल करती हैं, “लेकिन जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था”। यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था।
- गतिशीलता: एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना जंगल के कबीलों की ख़ासियत थी।
- राज्य की नज़र: राज्य के लिए जंगल बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास) था। बाबर के अनुसार जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था “जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।”
- हाथी और पेशकश (भाग 4.2): राज्य को सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अक्सर हाथी भी होते थे।
- शिकार अभियान: दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था (पृष्ठ 209)।
- स्रोत 3 और 4: सोलहवीं सदी की बंगाली कविता चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है; और अबुल फ़ज़्ल अवध सूबे के मैदानों और पहाड़ी कबीलों के लेन–देन का ब्योरा देता है (लगभग 1595)।
- सरदार से राजा: कई कबीलाई सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी। सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे; असम में अहोम राजाओं के अपने पायक थे (पृष्ठ 210)।
भीलों का साल, किताब के अनुसार
हमारी ओर से — जंगल पर चार दस्तकें। बोर्ड पर किताब के पन्नों से चार दस्तकें लिखिए: (1) राज्य: सेना के लिए हाथी, और पेशकश में हाथी; (2) व्यापार: शहद, मधुमोम और लाक जैसे जंगल के उत्पादों की बहुत माँग थी, और लाक सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुओं में से था; (3) नए बसने वाले: चंडीमंगल में कालकेतु ने जंगल खाली करवाकर राज्य बसाया, और ख़बर मिलते ही तमाम जगहों से परदेसी आने लगे; (4) सूफ़ी संत: कुछ इतिहासकारों ने सुझाया है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे–धीरे इस्लाम अपनाया, उसमें पीरों की बड़ी भूमिका थी। अब पूछिए: हर दस्तक में जंगल से बाहर क्या गया, या जंगल में क्या बदला?
नमूना उत्तर — हर दस्तक ने जंगल को अलग तरह से बदला:
- राज्य: हाथी जंगल से सेना तक गए।
- व्यापार: शहद, मधुमोम, लाक और हाथी बाज़ार तक गए; हाथी पकड़े और बेचे जाते थे।
- बसने वाले: जंगल ख़ुद कटा, और उसकी जगह खेती और बाज़ार आए।
- पीर: जंगल के इलाकों में नए सांस्कृतिक प्रभाव फैलने लगे। इस्लाम अपनाने में पीरों की बड़ी भूमिका के बारे में किताब कहती है कि कुछ इतिहासकारों ने ऐसा “सुझाया है”; यह पक्की बात नहीं।
किताब का अपना वाक्य यह है: “वाणिज्यिक खेती का असर, बाहरी कारक के रूप में, जंगलवासियों की ज़िंदगी पर भी पड़ता था।” (पृष्ठ 210)
यहीं रुकिए। स्रोत 4 में पहाड़ों से आने वाले सामान और पहाड़ों को जाने वाले सामान में क्या फ़र्क़ दिखता है?
नमूना उत्तर — पहाड़ के लोग अपनी चीज़ें नीचे लाते थे और बदले में मैदान की चीज़ें ले जाते थे:
- पहाड़ों से: सोना, ताँबा, शीशा, कस्तूरी, सुरागाय (याक) की पूँछ, शहद, मोम, ऊनी कपड़े, लकड़ी के सामान, और चील और बाज़ जैसे पक्षी (सूची इससे लंबी है); यह सामान इंसानों, मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर लाया जाता था।
- पहाड़ों को: सफ़ेद और रंगीन कपड़े, कहरुबा, नमक, हींग, गहने, और शीशे और मिट्टी के बरतन।
हमारा निष्कर्ष: इस लेन-देन से लगता है कि पहाड़ी कबीले मैदान के बाज़ार से कटे हुए नहीं थे (पृष्ठ 210)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे “जंगली” का अर्थ असभ्य लिख देते हैं; किताब साफ़ कहती है कि उस समय इसका यह मतलब बिलकुल नहीं था। दूसरी भूल: स्रोत 3 की पंक्ति “सैकड़ों उमड़ते हुए” को कोई गिनती बना देना। कविता में यह जैसी छपी है वैसी ही लिखवाइए; वहाँ कोई पक्की संख्या नहीं है। तीसरी: 40 फ़ीसदी को नापा हुआ आँकड़ा मान लेना; किताब इसे उस समय के स्रोतों पर टिका “अंदाज़ा” कहती है, और वह भी अखिल भारतीय औसत।
इसी हिस्से में। प्रश्न 7 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 208, 209 और 210 के किनारे के प्रश्न · पृष्ठ 211 का चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 82–98; प्रश्न बैंक क13, क14, ख9, ग5, घ3, घ4, च3, छ2।
पृष्ठ 211–213 — 5. ज़मींदार
कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. ज़मींदार
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक परिभाषा से: ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। वे अपनी ज़मीन के मालिक थे, और ऊँची हैसियत की वजह से उन्हें ख़ास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली थीं (पृष्ठ 211)। फिर:
- हैसियत के दो कारण: एक, जाति; दूसरा, वे राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे।
- मिल्कियत: ज़मींदार की विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन, जिस पर उसके निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूरों से। ज़मींदार इसे अपनी मर्ज़ी से बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे।
- कर वसूली: ज़मींदार अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और बदले में उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था।
- किले और सेना: ज़्यादातर ज़मींदारों के अपने किले और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ थीं, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे।
- पिरामिड का शीर्ष: मुग़ल गाँवों के सामाजिक संबंधों को पिरामिड मानें तो ज़मींदार उसके संकरे शीर्ष पर थे। अबुल फ़ज़्ल इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ग्रामीण समाज पर ठोस नियंत्रण था; ज़मींदारों में तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और कई मुसलमान ज़मींदार भी थे।
- उत्पत्ति: किताब के अनुसार जंग में जीत “ज़मींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत रहा होगा”; पर राज्य ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त शायद ही देता, जब तक एक राज्यादेश (सनद) से उसकी पुष्टि पहले न हो चुकी हो।
- वंश पर टिकी ज़मींदारियाँ: राजपूतों और जाटों ने उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी–बड़ी पट्टियों पर नियंत्रण पक्का किया; मध्य और दक्षिण–पश्चिम बंगाल में किसान–पशुचारियों (जैसे सदगोप) ने ताकतवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं।
- गाँव में भूमिका: ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, खेतिहरों को खेती का साजो–सामान और उधार दिया, और अक्सर हाट लगवाए जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे (पृष्ठ 212)।
ज़मींदार के दो रूप, किताब के अनुसार
हमारी ओर से — ज़मींदार की ताकत की ईंटें। बोर्ड पर किताब के पन्नों से छह ईंटें लिखिए: (1) जाति; (2) राज्य को दी जाने वाली ख़िदमत; (3) मिल्कियत; (4) राज्य की ओर से कर वसूली और उसका मुआवज़ा; (5) राज्यादेश (सनद); (6) अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ। फिर किताब के बॉक्स “एक समांतर सैनिक बल!” से आइन के आँकड़े पढ़िए: ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति “384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1863 हाथी; 4260 तोप; और 4,500 नाव” थी (पृष्ठ 212)। अब पूछिए: इन छह में से कौन-सी ईंटें राज्य से जुड़ी थीं, और कौन-सी ज़मींदार की अपनी थीं?
नमूना उत्तर — एक बँटवारा यह है; कोई बच्चा किसी ईंट को दूसरे खाने में रखे और कारण बताए, तो वह भी ठीक है:
- राज्य से जुड़ी: ख़िदमत, कर वसूली और उसका मुआवज़ा, और सनद।
- अपनी: मिल्कियत, जिसे वह बेच या गिरवी रख सकता था; अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ; और जाति से मिली हैसियत।
बॉक्स के आँकड़े दिखाते हैं कि दूसरी तरह की ताकत कितनी बड़ी थी; बॉक्स का शीर्षक ही इसे “एक समांतर सैनिक बल!” कहता है (पृष्ठ 212)।
यहीं रुकिए। अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार कैसे बन सकते थे?
नमूना उत्तर — ज़मींदारी पक्की करने की धीमी प्रक्रिया से:
- रास्ते: नयी ज़मीनें बसाकर (जंगल–बारी), अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
- किताब की वजह: “इस काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से खरीदी और बेची जाती थी।”
किताब इस धीमी प्रक्रिया को जंग में जीत से भी ज़्यादा महत्त्वपूर्ण मानती है (पृष्ठ 212)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे ज़मींदार को “बड़ा किसान” लिख देते हैं, जो ख़ुद खेत जोतता हो; किताब के अनुसार वह कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था, और मिल्कियत पर खेती दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूर करते थे। दूसरी भूल: जंग में जीत को ज़मींदारी की पक्की और मुख्य जड़ बताना। किताब इसे “संभावित स्रोत” कहती है, और लिखती है: “इससे भी महत्त्वपूर्ण थी ज़मींदारी को पुख्ता करने की धीमी प्रक्रिया।” तीसरी: बॉक्स के आँकड़ों को मुग़ल सेना की गिनती समझ लेना; आइन के अनुसार यह ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति थी।
इसी हिस्से में। प्रश्न 8 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 213 का चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 99–111; प्रश्न बैंक क15, ग8, घ5, च4।
पृष्ठ 213–215 — 6. भू–राजस्व प्रणाली
कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. भू–राजस्व प्रणाली
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक वाक्य से: “ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी।” इसलिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, ताकि कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रहे और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के सभी इलाकों में राजस्व का आकलन और वसूली हो सके (पृष्ठ 213)। फिर:
- दीवान: इस तंत्र में दीवान शामिल था, जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी।
- पहले जानकारी, फिर कर: कर का बोझ तय करने से पहले मुग़ल राज्य ने ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में ख़ास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की।
- दो चरण: पहला, कर निर्धारण; दूसरा, वास्तविक वसूली। जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म।
- नक़द भी, फ़सल भी: अकबर ने अमील–गुज़ार (राजस्व वसूली करने वाले) को हुक्म दिया कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें, पर फ़सल में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे।
- नपाई: हर प्रांत में जुती हुई और जोतने लायक, दोनों तरह की ज़मीन की नपाई हुई। 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए। फिर भी उपमहाद्वीप के जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई।
- ज़मीन के वर्ग (स्रोत 5): आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीन को पोलज, परौती, चचर और बंजर में बाँटा, और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया। पहले दो वर्गों की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब (पृष्ठ 214)।
- फैलता साम्राज्य: मुग़ल साम्राज्य का इलाका तीन चरणों में बढ़ा: 1530 में बाबर के शासन तक, 1605 में अकबर के शासन तक और 1707 में औरंगज़ेब के शासन तक। जितना इलाका बढ़ा, उतनी ज़्यादा ज़मीन की नपाई, आकलन और वसूली राज्य के तंत्र को करनी पड़ी।
- मनसबदार कौन थे: मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर एक सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी। कुछ मनसबदारों को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये भुगतान किया जाता था; समय–समय पर उनका तबादला होता था (पृष्ठ 214)।
पोलज और परौती पर शाही शुल्क, तीन क़दम
हमारी ओर से — चार तरीक़े, एक खेत। पहले स्रोत 6 के चारों तरीक़े बोर्ड पर लिखिए: (1) कणकुत: कण यानी अनाज, कुत यानी अंदाज़ा; शक हो तो फ़सल को अच्छे, मध्यम और बदतर, तीन पुलिंदों में काटकर शक दूर किया जाए। (2) बटाई या भाओली: फ़सल काटकर जमा कर ली जाती, फिर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा होता। (3) खेत बटाई: बीज बोने के बाद खेत बाँट लिए जाते थे। (4) लाँग बटाई: फ़सल काटकर उसका ढेर बनाया जाता, उसे आपस में बाँटा जाता, और हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता। अब पूछिए: (क) किस तरीक़े में बँटवारा फ़सल काटने से पहले, बुआई के बाद ही हो जाता था? (ख) किस तरीक़े में किताब ख़ुद धोखे का डर बताती है, और उससे बचने के लिए क्या चाहिए?
नमूना उत्तर — दोनों जवाब स्रोत में ही हैं:
- (क) खेत बटाई: इसमें बीज बोने के बाद ही खेत बाँट लिए जाते थे।
- (ख) भाओली: इसमें कई समझदार निरीक्षकों की ज़रूरत पड़ती थी, वरना धोखेबाज़ी का डर रहता था।
इसी अनुच्छेद की पहली बात भी बच्चों को दिखाइए: अमील–गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले, फ़सल लेने के लिए भी तैयार रहे (पृष्ठ 215)।
यहीं रुकिए। जमा और हासिल में क्या फ़र्क़ है, और दोनों हर बार बराबर क्यों नहीं होते थे?
नमूना उत्तर — एक तय रक़म थी, दूसरी वसूली गई रक़म:
- जमा: कर निर्धारण के चरण में तय हुई रक़म।
- हासिल: वसूली के चरण में सचमुच वसूली गई रक़म।
- फ़र्क़ क्यों: राज्य राजस्व तय करते समय अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, पर स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी इतनी वसूली सचमुच संभव नहीं हो पाती थी।
औरंगज़ेब के 1665 ई. के हुक्म (स्रोत 7) में भी जमा तय करते समय सरकार के वित्तीय हितों और किसानों के कल्याण, दोनों को ध्यान में रखने की बात है (पृष्ठ 215)। ध्यान रहे: पृष्ठ 213 इसी हुक्म को हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब बताता है, जबकि स्रोत 7 में हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के हालात की जाँच करके जमा तय करने की बात है। बच्चा जिस हिस्से का हवाला दे, बात उसी की लिखे।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे 1665 ई. का हुक्म अकबर के नाम लिख देते हैं; यह औरंगज़ेब का था। दूसरी भूल: यह मान लेना कि साम्राज्य की सारी ज़मीन नापी गई; किताब बताती है कि जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई। तीसरी: चारों वर्गों की तीन-तीन किस्में बता देना; किताब यह बात सिर्फ़ पोलज और परौती के लिए कहती है। मनसबदार का अर्थ पृष्ठ 214 के बॉक्स से यहीं समझा दीजिए; बच्चों को इसके लिए किसी और अध्याय में मत भेजिए।
इसी हिस्से में। प्रश्न 5 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 214 और 215 के किनारे के प्रश्न · पृष्ठ 215 और 216 के चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 112–127; प्रश्न बैंक क16, क17, क18, ख10, घ6, ङ4, छ3।
पृष्ठ 215–217 — 7. चाँदी का बहाव
कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. चाँदी का बहाव
किताब कहाँ से शुरू करती है। गाँव से निकलकर एशिया के नक्शे पर: मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में था जो सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे (पृष्ठ 215)। फिर:
- ज़मीनी व्यापार: इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की।
- समुद्री व्यापार: खोजी यात्राओं और “नयी दुनिया” के खुलने से यूरोप के साथ एशिया, ख़ासकर भारत, के व्यापार में भारी विस्तार हुआ, और कई नयी वस्तुओं का व्यापार शुरू हुआ।
- निर्यात के बदले चाँदी: भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। यह भारत के लिए अच्छा था, “क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।”
- नतीजे: सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही; मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ; और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई (पृष्ठ 216)।
- जोवान्नी कारेरी: इटली का यह मुसाफ़िर लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा। उसका ब्योरा (स्रोत 8) दिखाता है कि चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत कैसे पहुँचती थी, और यह भी कि सत्रहवीं सदी के भारत में नकद और वस्तुओं का बहुत बड़ी मात्रा में आदान–प्रदान हो रहा था।
एशिया के बड़े साम्राज्य, सोलहवीं और सत्रहवीं सदी
हमारी ओर से — चाँदी गाँव तक। बोर्ड पर किताब की दो बातें लिखिए। एक, भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, फिर भी निर्यात के भुगतान में आई चाँदी का बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। दो, इससे मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई। फिर स्रोत 6 (पृष्ठ 215) की एक बात याद दिलाइए: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया था कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें। अब पूछिए: चाँदी के बहाव और अकबर के इस हुक्म में क्या रिश्ता दिखता है?
नमूना उत्तर — दोनों बातें एक ही दिशा में जाती हैं:
- चाँदी से सिक्के: बाहर से आई चाँदी से सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और चाँदी के रुपयों की उपलब्धि में स्थिरता बनी रही।
- सिक्कों से कर: किताब ख़ुद कहती है कि इससे मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई; यह वही नक़द भुगतान है जिसकी कोशिश का हुक्म अकबर ने दिया था।
यह जोड़ हमारी ओर से है; बच्चे उत्तर में किताब के इन्हीं दो वाक्यों का सहारा लें (पृष्ठ 216)।
यहीं रुकिए। कारेरी के अनुसार तुर्की, फ़ारस और अरबिया के लोग इतनी मुद्रा मोचा और बसरा क्यों भेजते थे?
नमूना उत्तर — उन्हें भारत की वस्तुएँ चाहिए थीं:
- ज़रूरत: कारेरी लिखता है कि फ़ारस, अरबिया और तुर्की के लोग भारत की वस्तुओं के बिना नहीं रह सकते थे।
- रास्ता: इसलिए वे मुद्रा की विशाल मात्रा लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा भेजते थे, जहाँ से वह जहाज़ों से हिंदुस्तान पहुँचती थी।
कारेरी के अनुसार “दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।” (पृष्ठ 217)
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि भारत की अपनी चाँदी की खानों से रुपये बने; किताब साफ़ कहती है कि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। दूसरी भूल: कारेरी को अंग्रेज़ या पुर्तगाली लिख देना; वह इटली का मुसाफ़िर था, जो लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा। तीसरी: चाँदी के आने को सिर्फ़ व्यापार की बात मान लेना; किताब बताती है कि इससे मुग़ल राज्य को नकदी कर उगाहने में आसानी हुई।
इसी हिस्से में। प्रश्न 4 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 10 का मानचित्र कार्य · फ़्लैशकार्ड 128–133; प्रश्न बैंक क19, ग7, ङ3, छ4।
पृष्ठ 217–221 — 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी, काल रेखा
कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी
किताब कहाँ से शुरू करती है। ग्रंथ के बनने से: आइन–ए–अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी, जिसका ज़िम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया था। अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद यह पूरी हुई (पृष्ठ 217)। फिर:
- अकबरनामा की तीसरी जिल्द: अकबरनामा तीन जिल्दों में रचा गया; पहली दो में ऐतिहासिक दास्तान है, और तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है।
- किन बातों पर: दरबार, प्रशासन और सेना का संगठन; राजस्व के स्रोत और प्रांतों का भूगोल; और लोगों के साहित्यिक, सांस्कृतिक और धार्मिक रिवाज।
- नज़रिया: हमारे लिए आइन सूचनाओं की खान है, पर इसका नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” (पृष्ठ 218)।
- सरकार की तालिकाएँ: मुल्क–आबादी में सूबों के नीचे की इकाई सरकार की सूचनाएँ तालिकाओं में हैं, और हर तालिका में आठ ख़ाने हैं: ज़मीन और राजस्व से लेकर ज़मींदारों, उनकी जातियों और उनकी फ़ौज तक।
- सूचनाएँ कहाँ से (स्रोत 9): अबुल फ़ज़्ल ने दस्तावेज़ इकट्ठे किए, राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से सवाल-जवाब किए, सूबों से पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण मँगवाए, और सूबों को जारी हुक्मों की प्रतियाँ हासिल कीं।
- काल रेखा: अध्याय के अंत में मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव हैं, 1526 में बाबर के पहला मुग़ल बादशाह बनने से 1857 में बहादुर शाह ज़फ़र को गद्दी से हटाए जाने तक (पृष्ठ 221)।
आइन की सीमाएँ, किताब के अनुसार
हमारी ओर से — काल रेखा पर अध्याय के अपने साल। पहले किताब की काल रेखा से चार शासन काल बोर्ड पर लिखिए: अकबर 1556–1605, जहाँगीर 1605–27, शाहजहाँ 1628–58, औरंगज़ेब 1658–1707। फिर इस अध्याय में आए पाँच साल लिखिए: लगभग 1595 (अबुल फ़ज़्ल का अवध के पहाड़ी कबीलों और मैदानों के व्यापार का ब्योरा), 1598 (आइन पूरी हुई), 1604 (अकबर और उसके अभिजातों ने पहली बार तम्बाकू देखा), 1665 (औरंगज़ेब का जमा वाला हुक्म) और लगभग 1690 (कारेरी भारत से होकर गुज़रा)। अब पूछिए: हर साल किस बादशाह के शासन में पड़ता है?
नमूना उत्तर — पाँचों साल दो बादशाहों के शासन में पड़ते हैं:
- अकबर (1556–1605): लगभग 1595, 1598 और 1604।
- औरंगज़ेब (1658–1707): 1665 और लगभग 1690।
बच्चे देखें कि आइन अकबर के समय की है, पर अध्याय औरंगज़ेब के समय (1665 और लगभग 1690) तक की बातें भी इस्तेमाल करता है (पृष्ठ 221)।
यहीं रुकिए। अबुल फ़ज़्ल ने सांख्यिकी वाले खंडों में आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी क्यों लिखवाए?
नमूना उत्तर — ताकि नकल में आँकड़े न बिगड़ें:
- किताब की वजह: ऐसा “ताकि बाद की प्रतियों में नकल की गलतियाँ” कम से कम हों।
- और सावधानियाँ: लेखक ने पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की, और मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में शामिल करने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि की जाती थी।
फिर भी इतिहासकारों को आइन के जोड़ में कई ग़लतियाँ मिली हैं; किताब इन्हें आम तौर पर मामूली मानती है (पृष्ठ 220)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे आइन और अकबरनामा को एक ही किताब के दो नाम मान लेते हैं; आइन अकबरनामा की तीसरी जिल्द है। दूसरी भूल: आइन को पूरे देश की बराबर तसवीर मान लेना; किताब इसकी सीमाएँ ख़ुद गिनाती है, जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना का न होना, और कीमतों और मज़दूरी की सूची का सिर्फ़ आगरा और उसके आस-पास का होना। तीसरी: काल रेखा के 1857 को अध्याय का विषय समझ लेना; अध्याय का विषय लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी है, काल रेखा पूरे मुग़ल इतिहास के पड़ाव दिखाती है।
इसी हिस्से में। प्रश्न 1 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 12 की परियोजना · पृष्ठ 219 का किनारे का प्रश्न · फ़्लैशकार्ड 134–156; प्रश्न बैंक क20, ङ5, च1।
पृष्ठ 222–223 — प्रश्नावली
कालांश 11 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल रेखा
इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:
- 1 से 5 तक के प्रश्न: उत्तर के मुख्य बिंदु (लगभग 100 से 150 शब्द)
- 6 से 9 तक के प्रश्न: लघु निबंध के मुख्य बिंदु (लगभग 250-300 शब्द)
- 10 से 12 तक के प्रश्न: मानचित्र और परियोजना
- चर्चा कीजिए: पृष्ठ 201 से 216 तक के सात बॉक्स
- किनारे के प्रश्न
प्रश्न 11 (पड़ोस के एक गाँव का दौरा) बच्चे टोली में, किसी बड़े के साथ और इजाज़त लेकर करें; वे गिनती दर्ज करें, किसी के नाम, जाति या तसवीर नहीं।
अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।