अध्याय 5यात्रियों के नज़रिए

शिक्षण नोट्स40 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 5

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 115 से 139

यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।

सामग्री के पन्ने

किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना

पृष्ठ 115–117 — शुरुआत और अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द

कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द

किताब कहाँ से शुरू करती है। यात्रियों के वृत्तांतों से (पृष्ठ 115)। अध्याय लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक उपमहाद्वीप में आए यात्रियों के लिखे से अतीत समझने की कोशिश करता है, और तीन लोगों पर टिकता है: ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) से आए अल–बिरूनी (ग्यारहवीं शताब्दी), मोरक्को के इब्न बतूता (चौदहवीं शताब्दी) और फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर (सत्रहवीं शताब्दी)। बाहर से आए ये लेखक रोज़ की उन बातों पर ध्यान देते थे जिन्हें यहाँ के लेखक छोड़ देते थे, क्योंकि “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।” (पृष्ठ 116)

फिर किताब अल–बिरूनी के जीवन पर आती है।

  • अल–बिरूनी का जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है। ख़्वारिज़्म शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था।
  • वह सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत समेत कई भाषाएँ जानता था। यूनानी नहीं जानता था; प्लेटो और दूसरे यूनानी दार्शनिकों के काम उसने अरबी अनुवादों में पढ़े।
  • सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद वहाँ के कई विद्वानों और कवियों को अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया। अल–बिरूनी भी बंधक बनकर ग़ज़नी आया; धीरे-धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा और मृत्यु तक वह वहीं रहा।
  • ग़ज़नी में उसकी भारत में रुचि जागी। किताब कहती है कि यह असामान्य बात नहीं थी: आठवीं शताब्दी से संस्कृत के खगोल–विज्ञान, गणित और चिकित्सा के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद हो रहा था; पंजाब ग़ज़नवी साम्राज्य का हिस्सा बना तो स्थानीय लोगों से संपर्क बढ़े; और अल–बिरूनी ने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर संस्कृत, धर्म और दर्शन सीखा।
  • उसने पतंजलि के व्याकरण के ग्रंथ समेत कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, और अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए यूक्लिड के कार्यों का संस्कृत में (पृष्ठ 116 का बॉक्स)।

पृष्ठ 117 पर उसकी कृति किताब–उल–हिन्द आती है: अरबी में, सरल और स्पष्ट भाषा में, अस्सी अध्यायों का ग्रंथ, जिसमें धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, रीति–रिवाज, भार–तौल, मूर्तिकला, कानून जैसे विषय हैं। हर अध्याय सामान्यत: एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। किताब बताती है कि आज के कुछ विद्वान इस “लगभग ज्यामितीय संरचना” का कारण उसके गणित की ओर झुकाव में देखते हैं। एक बात बच्चों को चौंकाती है: “1500 ई. से पहले भारत में अल–बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा, भारत से बाहर कई अन्य लोग संभवत: ऐसा कर चुके हैं।”

हमारी ओर से — “हिंदू” शब्द की यात्रा। पहले पृष्ठ 117 का बॉक्स पढ़कर सुनाइए। उसकी बातें ये हैं: लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व का एक प्राचीन फ़ारसी शब्द सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए था। अरबों ने इस क्षेत्र को “अल–हिंद” और यहाँ के निवासियों को “हिंदी” कहा। बाद में तुर्कों ने सिंधु के पूर्व में रहने वालों को “हिंदू”, उनके क्षेत्र को “हिंदुस्तान” और उनकी भाषा को “हिंदवी” कहा। फिर बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: किसने, कौन-से शब्द, किसके लिए। बच्चों से खाने भरवाइए और आख़िर में पूछिए: इनमें से किस शब्द का अर्थ धर्म था?

नमूना उत्तर — खाने कुछ ऐसे भरेंगे:

  • फ़ारसी (लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व): एक प्राचीन शब्द, सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए।
  • अरब: “अल–हिंद” क्षेत्र के लिए, “हिंदी” निवासियों के लिए।
  • तुर्क: “हिंदू” लोगों के लिए, “हिंदुस्तान” क्षेत्र के लिए, “हिंदवी” भाषा के लिए।

आख़िरी सवाल का उत्तर किताब की अपनी पंक्ति है: “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।” धार्मिक अर्थ में इसका प्रयोग बहुत बाद की बात है।

"हिंदू" शब्द: किसने, किस अर्थ में बरता

फ़ारसीप्राचीन शब्दसिंधु नदी के पूर्व का क्षेत्र
अरबअल–हिंद, हिंदीक्षेत्र और उसके निवासी
तुर्कहिंदू, हिंदुस्तान, हिंदवीलोग, क्षेत्र और भाषा
धार्मिक पहचान?इनमें से कोई शब्द नहीं
NCERT, पृष्ठ 117

यहीं रुकिए। अल–बिरूनी ग़ज़नी कैसे पहुँचा, और वहाँ उसकी भारत में रुचि जागना असामान्य क्यों नहीं था?

नमूना उत्तर — वह अपनी इच्छा से नहीं, बंधक बनकर पहुँचा:

  • सन् 1017 ई. में सुल्तान महमूद ने ख़्वारिज़्म पर आक्रमण किया और वहाँ के कई विद्वानों और कवियों को ग़ज़नी ले गया; अल–बिरूनी भी बंधक के रूप में आया।
  • आठवीं शताब्दी से संस्कृत के खगोल–विज्ञान, गणित और चिकित्सा के ग्रंथ अरबी में अनूदित हो रहे थे।
  • पंजाब के ग़ज़नवी साम्राज्य का हिस्सा बनने के बाद स्थानीय लोगों से संपर्क बढ़े, जिनसे आपसी विश्वास और समझ का माहौल बना।

इसीलिए ग़ज़नी में रहते हुए भी वह ब्राह्मण विद्वानों के साथ बैठकर संस्कृत सीख सका।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। पहला पन्ना पढ़कर कुछ बच्चे लिख देते हैं कि अल–बिरूनी उज़्बेकिस्तान आया था, क्योंकि पृष्ठ 115 पर यही छपा है। सही बात: वह वहाँ से आया था; उसका जन्म ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है (पृष्ठ 116)। दूसरी उलझन भाषा की है: किताब–उल–हिन्द संस्कृत या फ़ारसी में नहीं, अरबी में है। तीसरी: अल–बिरूनी यूनानी नहीं जानता था; यूनानी दार्शनिकों को उसने अरबी अनुवादों में पढ़ा।

इसी हिस्से में। अध्याय का तर्क · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 1) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 117) · फ़्लैशकार्ड 1–27; प्रश्न बैंक क1, क2, क3, घ2, ङ1।

पृष्ठ 118–121 — इब्न बतूता का रिह्ला

कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. इब्न बतूता का रिह्ला

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक ऐसे यात्री से जो किताबों से ज़्यादा अनुभव पर भरोसा करता था (पृष्ठ 118)। इब्न बतूता का अरबी में लिखा यात्रा वृत्तांत रिह्ला चौदहवीं शताब्दी के उपमहाद्वीप के सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन की भरपूर जानकारी देता है।

  • उसका जन्म मोरक्को के तैंजियर के सबसे सम्मानित और शिक्षित परिवारों में से एक में हुआ, जो इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था।
  • अपनी श्रेणी के दूसरे लोगों से अलग, वह पुस्तकों की जगह यात्राओं के अनुभव को ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था।
  • 1332–33 में भारत के लिए निकलने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ, और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था।
  • मध्य एशिया के रास्ते वह 1333 में स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा, और मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली गया। मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसकी विद्वता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का क़ाज़ी बनाया।
  • कई वर्ष बाद वह सुल्तान का विश्वास खो बैठा और कारागार में डाला गया; ग़लतफ़हमी दूर होने पर फिर सेवा में लिया गया और 1342 ई. में मंगोल शासक के पास सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया।
  • स्रोत 2 में वह लिखता है कि तैंजियर से निकलते समय “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।” किताब जोड़ती है: “इब्न बतूता 1354 में घर वापस पहुँचा, अपनी यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद।”

पृष्ठ 119 यात्रा की कठिनाई पर है: डाकुओं के हमले, बीमारी और अकेलापन। ट्यूनिस में किसी ने उसका अभिवादन नहीं किया, तो वह “बहुत रोया”। पृष्ठ 120 पर मानचित्र 1 है, और पृष्ठ 121 पर स्रोत 3: लौटने पर शासक के आदेश से इब्न जुज़ाई ने उसके बोले हुए वृत्तांत लिखे, ऐसा कथानक “जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी।”

हमारी ओर से — पर्चियों पर यात्रा। आठ पर्चियाँ पहले से लिख लीजिए, हर पर्ची पर एक घटना और उसका साल, और उन्हें उलटे क्रम में बोर्ड पर चिपका दीजिए: तैंजियर से निकला (उम्र बाईस वर्ष); भारत के लिए निकला (1332–33); सिंध पहुँचा (1333); दिल्ली का क़ाज़ी बना; कारागार गया और फिर सेवा में लौटा; सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश मिला (1342 ई.); लौटने का निश्चय किया (1347); घर पहुँचा (1354)। बच्चे किताब के पृष्ठ 118–119 देखकर पर्चियाँ सही क्रम में लगाएँ। फिर पूछिए: पहली और आख़िरी पर्ची के बीच कितना समय है, और किताब इसे कैसे लिखती है?

नमूना उत्तर — सही क्रम ऊपर की सूची वाला ही है:

  • पहली पर्ची पर वह बाईस वर्ष का है; आख़िरी पर्ची 1354 की है।
  • किताब के शब्दों में वह “अपनी यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद” घर पहुँचा।

“लगभग” शब्द बोर्ड पर रहने दीजिए: किताब तीस वर्ष को ठीक गिनती की तरह नहीं, अनुमान की तरह देती है।

मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) पढ़ाते समय। मानचित्र पर लिखा है: “रेखाचित्र / पैमाना नहीं दिया गया है।” इसलिए इससे दूरी का कोई प्रश्न मत पूछिए। बच्चों से बस ये नाम ढूँढवाइए जिन्हें लाल रेखा जोड़ती है: लाहरी, ऊजा, मुल्तान, अजुदाहन, अबुहर, सरसती, हंसी और देहली। फिर ध्यान दिलाइए कि कई नाम वैसे लिखे हैं जैसे इब्न बतूता उन्हें जानता होगा, जैसे देहली और ग़जना।

यहीं रुकिए। इब्न बतूता का वृत्तांत उसके हाथ का लिखा क्यों नहीं है?

नमूना उत्तर — क्योंकि उसने अपनी यात्राएँ बोलकर लिखवाईं:

  • मोरक्को लौटने पर वहाँ के शासक ने आदेश दिया कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ।
  • इब्न जुज़ाई को उसके बोले हुए वृत्तांत (श्रुतलेख) लिखने के लिए नियुक्त किया गया (स्रोत 3, पृष्ठ 121)।
  • राजा ने देखे गए शहरों, रोचक घटनाओं, मिले हुए शासकों, साहित्यकारों और संतों का वृत्तांत लिखवाने को कहा।

इसलिए रिह्ला पढ़ते हुए यह याद रखना ठीक है कि इसमें एक लिखने वाला और एक बोलने वाला, दोनों हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे सोचते हैं कि इब्न बतूता दिल्ली में हमेशा क़ाज़ी रहा। सही क्रम है: क़ाज़ी, फिर कारागार, फिर सेवा में वापसी और 1342 ई. में चीन की ओर। दूसरी गड़बड़ पृष्ठ 121 के बॉक्स में होती है: भारत से मोहित होकर कुछ समय संन्यासी बनने वाला महमूद वली बल्खी था (1620 के दशक); शेख़ अली हाज़िन (1740 के दशक) भारत से निराश हुआ। इनके साथ अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी (1440 के दशक, दक्षिण भारत की यात्रा) को जोड़कर तीनों नाम दशकों के साथ बोर्ड पर लिख दीजिए।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 2) · 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 10) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 121) · फ़्लैशकार्ड 28–51; प्रश्न बैंक क4, क5, च2।

पृष्ठ 122–123 — फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक

कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक

किताब कहाँ से शुरू करती है। यूरोपीय यात्रियों के आने से (पृष्ठ 122)। लगभग 1500 ई. में पुर्तगाली आए, और उनमें से कई ने यहाँ के रीति–रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत लिखे। 1600 ई. के बाद डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ी।

  • जेसुइट रॉबर्टो नोबिली ने भारतीय ग्रंथों का यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद किया; दुआर्ते बरबोसा ने दक्षिण भारत के व्यापार और समाज का विस्तृत विवरण लिखा।
  • फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर कम से कम छह बार भारत आया, और उसने भारत की तुलना ईरान और ऑटोमन साम्राज्य से की।
  • इतालवी चिकित्सक मनूकी जैसे कई यात्री कभी यूरोप नहीं लौटे और भारत में ही बस गए।
  • फ्रांस्वा बर्नियर फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार था। वह 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में रहा: पहले शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक, फिर आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में।
  • वह भारत में जो देखता, उसकी तुलना सामान्यत: यूरोप से करता। उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक लुई XIV को समर्पित की।

किताब का निष्कर्ष उसी पन्ने पर एक वाक्य में है: “लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।” पृष्ठ 123 पर उसका सामान (स्रोत 4) और उसकी किताबों के छपने की कहानी है।

हमारी ओर से — बर्नियर का सामान। पृष्ठ 123 का स्रोत 4 पढ़ाइए: मुग़ल सेना के कश्मीर कूच के साथ चलते हुए बर्नियर अपना सामान गिनाता है। किताब के अनुसार उसमें ये थे: दो अच्छे तुर्कमान घोड़े, एक फ़ारसी ऊँट और चालक, घोड़ों के लिए साईस, एक खानसामा, पानी का पात्र लेकर आगे चलने वाला सेवक, औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों का छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश, खाना बनाने के सामान के झोले, पाँच या छह दिनों के लिए बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: जानवर और लोग, रहने-सोने का सामान, खाने का सामान। बच्चे सूची को खानों में बाँटें। फिर पूछिए: इस सूची से बर्नियर के बारे में क्या पता चलता है?

नमूना उत्तर — खाने कुछ ऐसे भरेंगे:

  • जानवर और लोग: दो तुर्कमान घोड़े, फ़ारसी ऊँट और चालक, साईस, खानसामा, पानी लेकर चलने वाला सेवक।
  • रहने-सोने का सामान: तंबू, दरी, बेतों का बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश।
  • खाने का सामान: बढ़िया चावल, सौंफ वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, दही टाँगने का झोला, खाना बनाने के झोले।

सूची बताती है कि वह मुग़ल दरबार से जुड़ा, सुविधा से चलने वाला यात्री था; और वह यहाँ की आदतें भी दर्ज करता है: “इस देश में नींबू के शरबत और दही से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती।”

यहीं रुकिए। बर्नियर के वृत्तांत यूरोप में इतने ज़्यादा क्यों पढ़े गए, जबकि अरबी और फ़ारसी वृत्तांत कम लोगों तक पहुँचे?

नमूना उत्तर — फ़र्क छपाई का था:

  • बर्नियर के कार्य फ्रांस में 1670–71 में छपे, और अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में अनूदित हो गए।
  • 1670 और 1725 के बीच वे फ्रांसीसी में आठ बार और 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार दोबारा छपे।
  • अरबी और फ़ारसी वृत्तांत हस्तलिपियों के रूप में फैलते थे और 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे।

पृष्ठ 123 का बॉक्स बताता है कि ऐसी छपी किताबों ने यूरोप में भारत की एक छवि बनाई, जिसका सामना 1750 के बाद यूरोप गए शेख इतिसमुद्दीन और मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीयों को करना पड़ा।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। “1800 से पहले सामान्यत: प्रकाशित नहीं होते थे” (पृष्ठ 123) वाली बात बच्चे बर्नियर पर लगा देते हैं; वह अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों की बात है। दूसरी उलझन नामों की है: बर्नियर दारा शिकोह का चिकित्सक था, शाहजहाँ का नहीं; दारा शिकोह शाहजहाँ का ज्येष्ठ पुत्र था।

इसी हिस्से में। अध्याय के आँकड़े · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 2) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 123) · फ़्लैशकार्ड 52–66; प्रश्न बैंक क6, क7, क8, घ6।

पृष्ठ 124–125 — एक अपरिचित संसार की समझ

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. एक अपरिचित संसार की समझ

किताब कहाँ से शुरू करती है। समझने की कठिनाइयों से (पृष्ठ 124)। यात्री जो देखते थे, सामान्यत: उसकी तुलना अपनी जानी-पहचानी प्रथाओं से करते थे। अल–बिरूनी जानता था कि अपने लिए तय किए उद्देश्य में कौन-सी समस्याएँ छिपी हैं, और उसने कई “अवरोधों” की चर्चा की, जो उसके अनुसार समझने में बाधक थे।

  • पहला, भाषा: संस्कृत अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों का अनुवाद आसान नहीं था।
  • दूसरा, धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता।
  • तीसरा, अभिमान।
  • इन समस्याओं को जानते हुए भी वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा, और वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत करता रहा।

पृष्ठ 124–125 पर जाति व्यवस्था का उसका विवरण है। उसने दूसरे समाजों में मिलते-जुलते रूप खोजे: प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी, और इस्लाम में सब लोग समान माने जाते थे, भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में थी। स्रोत 5 में वह ग्रंथों के आधार पर चार वर्ण गिनाता है। ब्राह्मणवादी व्याख्या मानते हुए भी उसने अपवित्रता की मान्यता नहीं मानी।

हमारी ओर से — “ईश्वर ही जानता है!” पृष्ठ 124 का छोटा बॉक्स पढ़ाइए। अल–बिरूनी ने लकड़ी की एक ऐसी मूर्ति की कहानी सुनी जो कथित रूप से 216,432 वर्षों तक बची रही। उसने पूछा कि जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र होती है, वहाँ लकड़ी इतने लंबे समय तक कैसे बची रही होगी, और लिखा: “ईश्वर ही जानता है!” फिर पृष्ठ 125 का अपवित्रता वाला तर्क पढ़ाइए: उसके अनुसार अपवित्र वस्तु अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर पा लेती है; सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। अब बच्चों से पूछिए: दोनों जगह अल–बिरूनी किस चीज़ के सहारे सोचता है?

नमूना उत्तर — दोनों जगह वह प्रकृति को देखकर तर्क करता है:

  • मूर्ति वाली कहानी पर उसका सवाल आर्द्र हवा और मिट्टी से निकलता है, यानी प्रकृति की जानी हुई बात से।
  • अपवित्रता को वह इसलिए नहीं मानता कि सूर्य और समुद्र का नमक चीज़ों को फिर स्वच्छ कर देते हैं; उसके अनुसार ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।

इसलिए किताब कहती है कि जाति व्यवस्था में छिपी अपवित्रता की अवधारणा उसके अनुसार प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी।

यहीं रुकिए। अल–बिरूनी के जाति विवरण की सीमा क्या थी?

नमूना उत्तर — वह ग्रंथों से देखता था, जीवन से कम:

  • उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से गहराई से प्रभावित था, और इन ग्रंथों में नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे।
  • वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी।
  • किताब का उदाहरण: अंत्यज (शाब्दिक अर्थ “व्यवस्था से परे”) कहलाने वाली श्रेणियों से सामान्यतया किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी।

यानी ये लोग अकसर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र में शामिल थे।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था पूरी की पूरी मान ली। किताब दो बातें अलग रखती है: उसने ब्राह्मणवादी व्याख्या मानी, पर अपवित्रता की मान्यता नहीं मानी। इस हिस्से में जाति की बात किताब के शब्दों और अल–बिरूनी के विवरण तक रखिए; किसी बच्चे से उसकी अपनी जाति के बारे में मत पूछिए, और जातियों को ऊपर-नीचे रखने वाली कोई गतिविधि मत कराइए।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 6) · सावधानी · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 125) · फ़्लैशकार्ड 67–78; प्रश्न बैंक क9, क10, घ1, घ3, च1, छ1।

पृष्ठ 126–129 — इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक जुड़ी हुई दुनिया से (पृष्ठ 126)। चौदहवीं शताब्दी में जब इब्न बतूता दिल्ली आया, तब तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा बन चुका था जो पूर्व में चीन से पश्चिम में उत्तर–पश्चिमी अफ़्रीका और यूरोप तक फैला था। शहरों में अरबी, फ़ारसी, तुर्की और दूसरी भाषाएँ बोलने वाले लोग विचार, सूचनाएँ और उपाख्यान बाँटते थे, और जो कुछ अपरिचित होता, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता।

  • नारियल (स्रोत 6) और पान (स्रोत 7) ऐसी दो वानस्पतिक उपज थीं जिनसे उसके पाठक पूरी तरह अपरिचित थे। वह उन्हें जानी-पहचानी चीज़ों से जोड़कर समझाता है: नारियल के वृक्ष हू–बहू खजूर के वृक्ष जैसे, और फल मानव सिर जैसा; पान अंगूर–लता की तरह उगाया जाता है, और सुपारी जायफल जैसी होती है।
  • वह दिल्ली को भारत का सबसे बड़ा शहर बताता है; दौलताबाद (महाराष्ट्र में) आकार में दिल्ली को चुनौती देता था।
  • स्रोत 8 में देहली की प्राचीर की दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी है (किताब के कोष्ठक में: एक हाथ लगभग 20 इंच)। शहर के अट्ठाईस द्वार हैं, जिन्हें दरवाज़ा कहते हैं: बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल, मांडवी दरवाज़े के भीतर अनाज मंडी, और गुल दरवाज़े की बगल में फलों का बगीचा।
  • ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था। स्रोत 9 दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद का है।
  • इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों का अधिशेष लेकर पाते थे। उसके अनुसार मिट्टी उपजाऊ थी, जिससे किसान वर्ष में दो फसलें उगा पाते थे।
  • भारतीय माल की मध्य और दक्षिण–पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी; ख़ासकर सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की।

पृष्ठ 129 पर किताब बताती है कि राज्य व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष उपाय करता था: लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह बने थे, और इब्न बतूता डाक प्रणाली की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ। उसी पन्ने के बॉक्स में अब्दुर रज़्ज़ाक़ का वृत्तांत है: कालीकट के लोगों को उसने एक ‘विचित्र देश’ बताया, पर मंगलौर के पास के एक पूजा–स्थल की सोने की मूर्ति, जिसकी आँखों की जगह माणिक लगे थे, देखकर लिखा: “इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने!”

हमारी ओर से — कक्षा में दावा की दौड़। पहले पृष्ठ 129 का स्रोत 10 पढ़ाइए। उसकी बातें ये हैं: भारत में दो तरह की डाक थी। अश्व डाक, उलुक, हर चार मील की दूरी पर रखे राजकीय घोड़ों से चलती थी। पैदल डाक, दावा, में प्रति मील तीन अवस्थान होते थे; दावा एक मील का एक–तिहाई होता है। मंडपों में लोग तैयार बैठे रहते, हर एक के पास दो हाथ लंबी छड़ होती जिसके ऊपर ताँबे की घंटियाँ लगी होतीं। संदेशवाहक एक हाथ में पत्र और दूसरे में छड़ लेकर पूरी तेज़ी से दौड़ता; घंटियों की आवाज़ सुनकर मंडप के लोग तैयार हो जाते, और उनमें से एक पत्र लेकर अगले दावा तक दौड़ता। इब्न बतूता लिखता है कि यह पैदल डाक व्यवस्था अश्व डाक व्यवस्था से “अधिक-तीव्र” होती है, और इससे अकसर खुरासान के फल ढोए जाते थे। अब कक्षा की हर पंक्ति को एक मंडप बना दीजिए: मुड़ा हुआ एक कागज़ पत्र बने, और ताली घंटियों का काम करे। पत्र पहली पंक्ति से आख़िरी पंक्ति तक पहुँचे, और हर बच्चा बस अगली पंक्ति तक जाए। फिर पूछिए: हर धावक को कितना दौड़ना पड़ता था, और पत्र रास्ते में कहीं रुका क्या?

नमूना उत्तर — हर धावक का हिस्सा छोटा था और पत्र रुकता नहीं था:

  • दावा में हर धावक बस अगले दावा तक, यानी एक मील का एक–तिहाई, पूरी तेज़ी से दौड़ता था।
  • घंटियों की आवाज़ अगले मंडप के लोगों को पहले से तैयार कर देती थी, इसलिए पत्र हाथ बदलते ही आगे बढ़ जाता था।
  • अश्व डाक हर चार मील पर रखे राजकीय घोड़ों से चलती थी।

किताब बस इतना कहती है कि पैदल डाक तेज़ थी; कारण पर बच्चे जो सोचें, उसे बोर्ड पर अनुमान के रूप में ही लिखिए।

यहीं रुकिए। सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, पर गुप्तचरों की ख़बरें डाक से सुल्तान तक पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं। ऐसी डाक व्यापारियों के किस काम आती थी?

नमूना उत्तर — किताब के अनुसार डाक से व्यापारियों के तीन काम आसान होते थे:

  • वे लंबी दूरी तक सूचना भेज सकते थे।
  • वे उधार प्रेषित कर सकते थे।
  • वे कम सूचना पर भी माल भेज सकते थे।

किताब यह बात उसी पन्ने पर कहती है जहाँ वह राज्य के उन विशेष उपायों की बात करती है जो व्यापारियों को प्रोत्साहित करने के लिए थे, जैसे सराय और विश्राम गृह।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि इब्न बतूता ने समझाया कि शहर अमीर कैसे बने। किताब कहती है कि शहरों की समृद्धि समझाने में उसकी रुचि अधिक नहीं थी; गाँवों के अधिशेष वाला तर्क इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से निकाला है (पृष्ठ 128)। दूसरी उलझन नामों की है: उलुक घोड़े की डाक है, दावा पैदल डाक, और तेज़ पैदल डाक थी। दावा के लिए “प्रति मील तीन अवस्थान” ही लिखवाइए, क्योंकि दावा एक मील का एक–तिहाई है। स्रोत 10 में आगे “हर तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव” भी छपा है, जो एक–तिहाई मील वाली बात से मेल नहीं खाता; अंग्रेज़ी किताब में यहाँ गाँव हर एक–तिहाई मील पर है। बच्चा पूछे तो यही बताइए।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 7) · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 2) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 129) · फ़्लैशकार्ड 79–105; प्रश्न बैंक क11, क12, क13, क14, घ4, घ5, ङ2, ङ3, च3, छ2।

पृष्ठ 130–132 — बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व: भूमि स्वामित्व का प्रश्न

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व

किताब कहाँ से शुरू करती है। दो यात्रियों के फ़र्क से (पृष्ठ 130)। इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करना तय किया जिसने अपने अनूठेपन से उसे प्रभावित और उत्सुक किया; बर्नियर एक अलग बुद्धिजीवी परंपरा से था। वह भारत में देखी हर चीज़ की तुलना सामान्य रूप से यूरोप और ख़ास तौर पर फ्रांस की स्थितियों से करता रहा, और उसका इरादा नीति–निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना था।

  • उसकी कृति ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर का चित्रण द्वि–विपरीतता पर टिका है: भारत को यूरोप के प्रतिलोम के रूप में, या कुछ इतिहासकारों के शब्दों में यूरोप के “विपरीत” के रूप में दिखाया गया।
  • उसके अनुसार भारत और यूरोप के बीच एक मूल भिन्नता थी, भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव। उसे लगा कि मुग़ल सम्राट सारी भूमि का स्वामी था और उसे अपने अमीरों में बाँटता था। किताब बताती है कि ऐसी धारणा सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ज़्यादातर यात्रियों के वृत्तांतों में मिलती है।
  • उसके तर्क में भूधारक अपनी भूमि बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए वे दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे; नतीजा, उसके अनुसार, कृषि का विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न और शासक वर्ग को छोड़ सबके जीवन स्तर में लगातार पतन।
  • पृष्ठ 131 पर उसकी एक पंक्ति है: “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।”

पृष्ठ 132 पर किताब जवाब देती है: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। फिर वह बताती है कि बर्नियर के वृत्तांत से फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत विकसित किया, और उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने उसे एशियाई उत्पादन शैली के रूप में आगे बढ़ाया; और यह भी कि ग्रामीण समाज की असली तस्वीर इस चित्रण से बहुत दूर थी।

हमारी ओर से — किसकी बात, किसका नज़रिया। बोर्ड पर छह पंक्तियाँ लिखिए, बोलने वाले का नाम छिपाकर। साथ में छह नाम अलग से लिखिए: पेलसर्ट, बर्नियर, अबुल फ़ज़्ल, मॉन्टेस्क्यू, कार्ल मार्क्स, और किताब के लेखक। बच्चों को बताइए कि सब पंक्तियाँ पृष्ठ 130 से 132 पर हैं।

  1. “कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।”
  2. “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।”
  3. भूमि राजस्व ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ है, यानी प्रजा को सुरक्षा देने के बदले राजा की माँग।
  4. एशिया में शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे, और प्रजा दासता और गरीबी में रहती थी।
  5. उपनिवेशवाद से पहले अधिशेष राज्य लेता था, और समाज बहुत–से स्वायत्त ग्रामीण समुदायों से बना था।
  6. एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।

बच्चे हर पंक्ति के आगे नाम लिखें, और बताएँ कि कौन-सी पंक्ति बर्नियर के चित्र से मेल खाती है और कौन-सी उसे कमज़ोर करती है।

नमूना उत्तर — नाम और नज़रिया कुछ ऐसे जुड़ेंगे:

  • पंक्ति 1, पेलसर्ट (पृष्ठ 130 का बॉक्स): सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आया डच यात्री, जो बर्नियर की तरह व्यापक गरीबी देखकर अचंभित था। मेल खाती है।
  • पंक्ति 2, बर्नियर (पृष्ठ 131): उसका अपना दावा।
  • पंक्ति 3, अबुल फ़ज़्ल (पृष्ठ 132): अकबर का सरकारी इतिहासकार; राजस्व अपनी भूमि पर लगान नहीं, सुरक्षा के बदले राजा की माँग था। कमज़ोर करती है।
  • पंक्ति 4, मॉन्टेस्क्यू, और पंक्ति 5, मार्क्स (पृष्ठ 132): मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के वृत्तांत से अपना सिद्धांत विकसित किया, और मार्क्स ने उसे आगे बढ़ाया। मेल खाती हैं।
  • पंक्ति 6, किताब के लेखक (पृष्ठ 132): कमज़ोर करती है।

बात यहीं पूरी होती है: बर्नियर का चित्र दूर तक फैला, पर मुग़ल दस्तावेज़ उसका साथ नहीं देते।

यहीं रुकिए। बर्नियर और दूसरे यूरोपीय यात्रियों ने भूमि राजस्व को लगान समझा। किताब के अनुसार वह असल में क्या था?

नमूना उत्तर — वह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर:

  • अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताते हैं: प्रजा को सुरक्षा देने के बदले राजा की माँग, न कि अपनी भूमि पर लगान।
  • किताब के अनुसार संभव है कि यूरोपीय यात्री इसे लगान इसलिए मानते रहे कि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी।
  • एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था।

यानी बर्नियर के पूरे तर्क की पहली कड़ी, कि सम्राट सारी भूमि का स्वामी था, मुग़ल दस्तावेज़ों से नहीं निकलती।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे “प्राच्य निरंकुशवाद” को बर्नियर का सिद्धांत लिख देते हैं। सही बात: यह फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू का सिद्धांत है, जो उसने बर्नियर के वृत्तांत से विकसित किया; “एशियाई उत्पादन शैली” उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने आगे बढ़ाई। दूसरी बात ग्रामीण समाज की है: किताब बड़े ज़मींदार, बड़े किसान, छोटे किसान और भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार) गिनाती है। बलाहार के साथ किताब का अपना शब्द “अस्पृश्य” उद्धरण-चिह्नों में ही रहने दीजिए, और बात किताब के वाक्य तक रखिए।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 8) · मुख्य शब्द · फ़्लैशकार्ड 106–132; प्रश्न बैंक क15, क16, ङ4, च5।

पृष्ठ 133–134 — बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व: एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व

किताब कहाँ से शुरू करती है। बर्नियर के अपने विवरण की दरारों से (पृष्ठ 133)। मुग़ल राज्य को निरंकुश दिखाने में वह तन्मय था, फिर भी उसके विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।

  • एक ओर वह कहता है कि शिल्पकारों को अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था; इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था।
  • दूसरी ओर वह मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं, क्योंकि उत्पाद सोने और चाँदी के बदले निर्यात होते थे; और वह एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के होने को भी रेखांकित करता है।
  • पृष्ठ 134 के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
  • फिर भी बर्नियर मुग़ल शहरों को “शिविर नगर” कहता है: ऐसे नगर जो दरबार के आने पर बसते और उसके जाने पर तेज़ी से उजड़ते। किताब इसे भूस्वामित्व की तरह एक अतिसरलीकृत चित्रण मानती है।
  • स्रोत 14 राजकीय कारखानों का है। किताब कहती है कि संभवत: बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो इनकी कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देता है।

हमारी ओर से — बर्नियर बनाम बर्नियर। बोर्ड पर दो खाने बनाइए। बाएँ खाने में पहले से लिख दीजिए, “बर्नियर कहता है”: शिल्पकारों को कोई प्रोत्साहन नहीं, उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख; और स्रोत 13 में शिल्पकार “मूल रूप से आलसी”। फिर पृष्ठ 133 का स्रोत 13 पढ़कर सुनाइए। उसकी बातें ये हैं: देश का ज़्यादातर भू–भाग अत्यधिक उपजाऊ है; बंगाल मिस्र से चावल, मकई और जीवन की दूसरी ज़रूरी वस्तुओं में ही नहीं, रेशम, कपास और नील में भी कहीं आगे है; शिल्पकार गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र और तरह–तरह के रेशमी और सूती वस्त्र बनाता है, जो देश में भी काम आते हैं और विदेश भी जाते हैं; और पूरे विश्व में घूमने के बाद सोना और चाँदी भारत में आकर कुछ हद तक खो जाता है। बच्चे दाएँ खाने में, “बर्नियर ही बताता है”, ये बातें छाँटकर लिखें। फिर पूछिए: क्या दायाँ खाना बाएँ खाने से मेल खाता है?

नमूना उत्तर — दायाँ खाना बाएँ खाने को काटता है:

  • उपज: बंगाल मिस्र से अनाज में भी आगे है और रेशम, कपास और नील में भी।
  • शिल्प: गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र, रेशमी और सूती कपड़े, जो विदेश भी जाते हैं।
  • धन: सोना और चाँदी भारत में आकर कुछ हद तक खो जाता है; व्यापारिक समुदाय समृद्ध है।

जिस शिल्पकार को बर्नियर “मूल रूप से आलसी” कहता है, उसी के बनाए माल के बदले पूरे विश्व से सोना और चाँदी भारत आते हैं; किताब इसी हिस्से को “एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई” नाम देती है।

व्यापारी कैसे संगठित थे

महाजनव्यापारियों का समूहपश्चिमी भारत में
सेठमहाजन का मुखिया
नगर सेठसभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधि
NCERT, पृष्ठ 134

यहीं रुकिए। बर्नियर मुग़ल शहरों को “शिविर नगर” कहता है। किताब इस चित्र को अतिसरलीकृत क्यों मानती है?

नमूना उत्तर — क्योंकि नगर कई तरह के थे और उनमें समृद्ध व्यापारी और व्यावसायिक वर्ग थे:

  • सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था।
  • नगर कई तरह के थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थान।
  • व्यापारी महाजन, सेठ और नगर सेठ के रूप में संगठित थे।
  • चिकित्सक (हकीम या वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार और सुलेखक जैसे व्यावसायिक वर्ग भी थे।

किताब के अनुसार ऐसे नगरों का होना समृद्ध व्यापारिक समुदायों और व्यावसायिक वर्गों के होने का सूचक है।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। “शिविर नगर” को बच्चे किताब का निष्कर्ष समझ लेते हैं; यह बर्नियर का शब्द है, जिसे किताब अतिसरलीकृत कहती है। दूसरी उलझन स्रोत 14 की है: किताब के शब्दों में कारखाने बड़े कक्ष थे, जिन्हें शिल्पकारों की कार्यशाला भी कहते थे। किताब छह कक्ष गिनाती है: कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, बढ़ई-खरादी-दर्जी-जूते बनाने वाले, और रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले। “पंद्रह प्रतिशत” के साथ “लगभग” और “एकमात्र ऐसा इतिहासकार” के साथ “संभवत:” ज़रूर लिखवाइए।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 3) · 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 9) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 134) · फ़्लैशकार्ड 106–132; प्रश्न बैंक क17, घ7, ङ5, च4, छ3।

पृष्ठ 135–136 — महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक

कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक

किताब कहाँ से शुरू करती है। लिखने वालों से (पृष्ठ 135)। लिखित वृत्तांत छोड़ने वाले यात्री सामान्यतया पुरुष थे, जिन्हें उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति रुचिकर और कभी–कभी जिज्ञासा भरी लगती थी; कभी–कभी वे सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” स्थिति मान लेते थे।

  • बाज़ारों में दास किसी भी दूसरी वस्तु की तरह खुले आम बिकते थे, और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे। सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक को भेंट देने के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे।
  • दासों में विभेद था: सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था (स्रोत 15); दास सामान्यत: घरेलू श्रम में लगाए जाते थे, और पालकी या डोले ढोने में इब्न बतूता ने उनकी सेवा ख़ास तौर पर अपरिहार्य पाई।
  • सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था, इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना। उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
  • स्रोत 16 लाहौर में एक अल्पवयस्क विधवा का है, जिसे किताब बर्नियर के वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है।

पृष्ठ 136 पर किताब महिलाओं के श्रम पर आती है: उनका श्रम कृषि में और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था, और व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में हिस्सा लेती थीं, कभी–कभी वाणिज्यिक विवाद अदालत तक ले जाती थीं।

हमारी ओर से — तीन खाने: दासियाँ, सती, श्रमिक। भाग का शीर्षक ही तीन खाने देता है। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए और बच्चों से कहिए कि पृष्ठ 135–136 पढ़कर हर खाने में किताब की दो-दो बातें लिखें, किताब के ही शब्दों में। फिर पूछिए: तीसरा खाना पहले दो खानों के बारे में हमारी समझ कैसे बदलता है?

नमूना उत्तर — खाने कुछ ऐसे भरेंगे:

  • दासियाँ: कुछ संगीत और गायन में निपुण; कुछ अमीरों पर नज़र रखने के लिए नियुक्त; ज़्यादातर हमलों और अभियानों में बलपूर्वक लाई जाती थीं (स्रोत 15)।
  • सती: बर्नियर ने इसे पूर्व और पश्चिम की भिन्नता के संकेतक के रूप में चुना; कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को बाध्य किया जाता था।
  • श्रमिक: कृषि और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन में महिलाओं का श्रम महत्त्वपूर्ण; व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में, और कभी–कभी अदालत तक।

तीसरा खाना वह दिखाता है जो यात्रियों ने कम लिखा। किताब का निष्कर्ष है: “अत: यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के खास स्थानों तक परिसीमित कर रखा जाता था।” (पृष्ठ 136)

यहीं रुकिए। बर्नियर ने सती प्रथा को ही विस्तृत विवरण के लिए क्यों चुना?

नमूना उत्तर — क्योंकि उसके लिए यह पूर्व और पश्चिम की भिन्नता का संकेतक था:

  • सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था।
  • उसने दर्ज किया कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
  • स्रोत 16 का विवरण, जो लाहौर का है, किताब के अनुसार उसके वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में से एक है।

प्रश्न 5 (“सती प्रथा के कौन से तत्वों ने बर्नियर का ध्यान अपनी ओर खींचा?”) के उत्तर में यही बातें काम आती हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि सब दास एक जैसे थे; किताब संगीत में निपुण दासियाँ, अमीरों पर नज़र रखने वाली दासियाँ, और घरेलू श्रम और पालकी ढोने वाले दास अलग-अलग दिखाती है। दूसरी भूल: “उस समय महिलाएँ घरों में बंद रहती थीं”; किताब इसे असंभाव्य कहती है। स्रोत 16 किताब से ही पढ़िए; उस पर अभिनय या चित्र मत बनवाइए, और विवरण किताब से आगे मत बढ़ाइए। दास प्रथा और सती पर बात किताब के शब्दों तक रहे (सावधानी)।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 4, 5) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 136) · फ़्लैशकार्ड 133–143; प्रश्न बैंक क18, क19, घ8, ङ6, च6, छ4।

पृष्ठ 137, 139 — काल-रेखा और मानचित्र कार्य

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक तालिका से (पृष्ठ 137): “कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े”। इसमें दसवीं-ग्यारहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक के बारह यात्री हैं, हर एक के साथ उसका देश।

  • अध्याय के तीन मुख्य यात्री: अल–बिरूनी (973–1048, उज़्बेकिस्तान से), इब्न बतूता (1304–77, मोरक्को से) और फ्रांस्वा बर्नियर (1620–88, फ्रांस से)।
  • अध्याय में जिनका नाम और भी आता है: मार्को पोलो (1254–1323, इटली से), अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी (1413–82, समरक़ंद से), दुआर्ते बरबोसा (1518 में भारत की यात्रा, पुर्तगाल से), महमूद वली बल्खी (1626–31 भारत में, बल्ख़ से) और ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (1605–89, फ्रांस से)।
  • जिनका नाम केवल काल-रेखा में है: अफानासी निकितिच निकितिन (1466–72 भारत में, रूस से), सयदी अली रेइस (मृत्यु 1562, तुर्की से), अंतोनियो मानसेरेते (1536–1600, स्पेन से) और पीटर मुंडी (1600–67, इंग्लैंड से)।
  • जिस पंक्ति में तिथि के साथ कोष्ठक में कुछ और नहीं लिखा, वहाँ तिथियाँ यात्री का जीवन काल हैं।

पृष्ठ 139 पर मानचित्र कार्य (प्रश्न 10) है: विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इब्न बतूता के देश, और वे समुद्र जो उसने पार किए होंगे।

हमारी ओर से — सदियों की रस्सी। कक्षा की लंबाई में एक रस्सी या सुतली बाँधिए और उस पर छह पर्चियाँ लगाइए: दसवीं-ग्यारहवीं, तेरहवीं, चौदहवीं, पंद्रहवीं, सोलहवीं, सत्रहवीं शताब्दी। बारह बच्चों को काल-रेखा का एक-एक नाम पर्ची पर दीजिए, साथ में तिथि और देश, जैसा ऊपर लिखा है। हर बच्चा अपनी पर्ची सही सदी के नीचे टाँगे। फिर पूछिए: किस सदी के नीचे सबसे ज़्यादा पर्चियाँ हैं, और अध्याय के तीन मुख्य यात्री किन सदियों में हैं?

नमूना उत्तर — रस्सी पर पर्चियाँ ऐसे बँटेंगी:

  • सत्रहवीं शताब्दी में चार: महमूद वली बल्खी, पीटर मुंडी, ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर, फ्रांस्वा बर्नियर।
  • सोलहवीं में तीन: दुआर्ते बरबोसा, सयदी अली रेइस, अंतोनियो मानसेरेते।
  • पंद्रहवीं में दो: अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी, अफानासी निकितिच निकितिन।
  • दसवीं-ग्यारहवीं, तेरहवीं और चौदहवीं में एक-एक: अल–बिरूनी, मार्को पोलो, इब्न बतूता।

तीन मुख्य यात्री तीन अलग पर्चियों के नीचे हैं: अल–बिरूनी दसवीं-ग्यारहवीं, इब्न बतूता चौदहवीं और बर्नियर सत्रहवीं शताब्दी के नीचे। सत्रहवीं शताब्दी की चार पर्चियों में से तीन यूरोपीय यात्रियों की हैं: पीटर मुंडी, तैवर्नियर और बर्नियर। यह पृष्ठ 122 की उस बात से मेल खाता है कि “1600 ई. के बाद भारत में आने वाले डच, अंग्रेज़ तथा फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी थी”। बच्चों को याद दिलाइए कि यह बारह नामों की एक छोटी सूची है, सारे यात्रियों की गिनती नहीं।

यहीं रुकिए। काल-रेखा में निकितिन के आगे 1466–72 लिखा है, और बरबोसा के आगे 1518। इन तिथियों को जीवन काल क्यों नहीं मान सकते?

नमूना उत्तर — क्योंकि इन तिथियों के साथ कोष्ठक में अलग बात लिखी है:

  • 1466–72 के साथ “(भारत में बिताए वर्ष)” लिखा है, यानी निकितिन के भारत में रहने के वर्ष।
  • 1518 के साथ “(भारत की यात्रा)” लिखा है; बरबोसा की मृत्यु 1521 में अलग से दी गई है।
  • सयदी अली रेइस के आगे 1562 “(मृत्यु का वर्ष)” है।

तालिका पढ़ने से पहले बच्चों से हर पंक्ति का कोष्ठक पढ़वाइए।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। मानचित्र कार्य में बच्चे इब्न बतूता का पूरा रास्ता अपने मन से खींच देते हैं। अध्याय का अकेला मानचित्र, मानचित्र 1 (पृष्ठ 120), केवल “अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब में इब्न बतूता द्वारा भ्रमण किए गए स्थान” दिखाता है। इसलिए विश्व के मानचित्र पर केवल वे देश और जगहें चिह्नित करवाइए जिनका नाम किताब लेती है, और समुद्रों के लिए प्रश्न 10 वाली भाषा रखिए: “पार किया होगा”। रूस के बारे में किताब बस इतना कहती है: “हो सकता है वह रूस भी गया हो”, इसलिए उसे पक्का मत मानिए। मानचित्र 1 पर लिखा है “पैमाना नहीं दिया गया है”, इसलिए उससे कोई दूरी मत नपवाइए। चार्ट पेपर पर बना विश्व का एक ही सीमारेखा मानचित्र पूरी कक्षा के लिए काफ़ी है।

इसी हिस्से में। 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 10 का पूरा उत्तर) · अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 144–150; प्रश्न बैंक क20।

पृष्ठ 138–139 — प्रश्नावली

कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:

अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।