अध्याय 8किसान, ज़मींदार और राज्य

पाठ योजना47 मिनटस्रोत जाँचे गए

NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 8

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 196 से 223 · कालांश — 11 (10 पढ़ाने के, 1 मूल्यांकन का), हर एक 40 मिनट

इस्तेमाल कैसे करें — हर कालांश की पूरी तैयारी उसके अपने कार्ड में है: किताब के पृष्ठ, स्लाइड, इंटरैक्टिव अध्याय, प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड। पहले एक नज़र में वाला चित्र और तालिका देखिए, फिर आज के कालांश का कार्ड खोलिए। कार्ड के हिस्से और शब्द, जैसे निकास-पर्ची, तैयारी वाली तालिका में समझाए गए हैं।

अध्याय का बड़ा विचार — किताब पृष्ठ 197 पर बताती है कि किसान ख़ुद नहीं लिखते थे, और सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि इतिहास के मुख्य स्रोत मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं, जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी है। इसीलिए किताब कहती है: “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” पूरा अध्याय यही दिखाता है कि गाँव के किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य फ़सल के हिस्सों के लिए एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह तसवीर किन स्रोतों से, किसकी नज़र से बनती है।

हमारी ओर से पूरे अध्याय के लिए एक सवाल: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं? पहले दिन बच्चे इस पर दो पंक्तियाँ पर्ची पर लिखेंगे और पर्चियाँ आपके पास रहेंगी; कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वही पर्चियाँ लौटाकर परखी जाएँगी।


एक नज़र में — ग्यारह कालांश और उनकी सामग्री

हर तीर पर लिखा है कि अगला कालांश पिछले से क्यों निकलता है।

ग्यारह कालांश, एक कहानी

कालांश 1स्रोत, किसान और ज़मीनगाँवों का देश, आइन का नज़रिया, खुद–काश्त और पाहि–काश्त, स्रोत 1 (पृष्ठ 196–198)
कालांश 2सिंचाई, औज़ार और फ़सलेंरहट और बालटी, हल और बरमा, खरीफ़ और रबी, नयी फ़सलें (पृष्ठ 198–201)
कालांश 3जाति, पंचायत और मुखियागाँव की बनावट, पंचायत के काम, जाति पंचायत (पृष्ठ 201–204)
कालांश 4दस्तकार और "छोटा गणराज्य"?सेवाओं के बदले अदायगी, गाँव में नकद (पृष्ठ 204–206)
कालांश 5कृषि समाज में महिलाएँश्रम, अधिकार और नियंत्रण (पृष्ठ 206–207)
कालांश 6जंगल और कबीलेजंगल वासियों का जीवन, जंगलों में घुसपैठ, स्रोत 3 और 4 (पृष्ठ 208–211)
कालांश 7ज़मींदारमिल्कियत, सैनिक ताक़त, किसानों से रिश्ते (पृष्ठ 211–213)
कालांश 8भू–राजस्व प्रणालीजमा और हासिल, ज़मीन के चार वर्ग, मनसबदारी, स्रोत 5 से 7 (पृष्ठ 213–215)
कालांश 9चाँदी का बहावविश्व व्यापार, रुपया, स्रोत 8 (पृष्ठ 215–217)
कालांश 10आइन–ए–अकबरी और काल रेखाअबुल फ़ज़्ल की विधि, आइन की सीमाएँ, प्रश्न 10, पहले दिन की पर्चियाँ (पृष्ठ 217–222)
कालांश 11मूल्यांकनअभ्यास के 12 प्रश्न (पृष्ठ 222–223)
हर कालांश के पृष्ठ, स्लाइड और बाक़ी सामग्री नीचे की तालिका में।

सामग्री के पन्ने: स्लाइड का पाठ · स्लाइड शो · प्रश्न बैंक · फ़्लैशकार्ड · इंटरैक्टिव अध्याय · रिवीजन नोट्स · क्विज़

कालांश और टॉपिकपृष्ठस्लाइडइंटरैक्टिवप्रश्न बैंकफ़्लैशकार्ड
1 शुरुआत; 1. किसान और कृषि उत्पादन: 1.1 स्रोतों की तलाश; 1.2 किसान और उनकी ज़मीन196–198शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1शुरुआत · 1. किसान और कृषि उत्पादनक1 · क2 · क3 · ख1 · ग1 · घ11–19
2 1.3 सिंचाई और तकनीक; 1.4 फ़सलों की भरमार198–201भाग 21. किसान और कृषि उत्पादनक4 से क7 · ख2 से ख5 · ग2 · ङ1 · छ120–38
3 2. ग्रामीण समुदाय: 2.1 जाति और ग्रामीण माहौल; 2.2 पंचायतें और मुखिया201–204भाग 32. ग्रामीण समुदायक8 · क9 · क10 · ग3 · घ2 · च2 · च539–60
4 2.3 ग्रामीण दस्तकार; 2.4 एक “छोटा गणराज्य”?204–206भाग 42. ग्रामीण समुदायक11 · ख6 · ख7 · ख8 · ग4 · ङ361–69
5 3. कृषि समाज में महिलाएँ206–207भाग 53. कृषि समाज में महिलाएँक12 · ग6 · ङ270–81
6 4. जंगल और कबीले: 4.1 बसे हुए गाँवों के परे; 4.2 जंगलों में घुसपैठ208–211भाग 64. जंगल और कबीलेक13 · क14 · ख9 · ग5 · घ3 · घ4 · च3 · छ282–98
7 5. ज़मींदार211–213भाग 75. ज़मींदारक15 · घ5 · च499–111
8 6. भू–राजस्व प्रणाली; मानचित्र 1 और मनसबदारी व्यवस्था213–215भाग 86. भू–राजस्व प्रणालीक16 · क17 · क18 · ख10 · घ6 · ङ4 · छ3112–127
9 7. चाँदी का बहाव215–217भाग 97. चाँदी का बहावक19 · ग7 · छ4128–133
10 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी; काल रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)217–222भाग 108. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी · सार और काल रेखाक20 · ग8 · ङ5 · च1 · नमूना पत्र 1134–156
11 मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न222–223आख़िरी भागहर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्ननमूना पत्र 2 और 3पूरा सेट

प्रश्न बैंक के कोड ऐसे पढ़िए: क1 मतलब खंड क (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) का प्रश्न 1। ख रिक्त स्थान है, ग सही/ग़लत, घ अति लघूत्तरीय (2 अंक), ङ लघूत्तरीय (3 अंक), च दीर्घ उत्तरीय (5 अंक) और छ स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक)। फ़्लैशकार्ड के अंक कार्ड के नंबर हैं।

पढ़ाने से पहले

तैयारी — कार्ड में क्या-क्या है और उसे कैसे तैयार करें

हर कालांश का कार्ड इसी क्रम में चलता है। पहली बार पढ़ा रहे हैं तो यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।

हिस्सा या औज़ारयह क्या हैकैसे तैयार करें
किताबकार्ड के सबसे ऊपर लिखे पृष्ठ; बच्चे इन्हीं से पढ़ेंगेपृष्ठ एक दिन पहले पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाले बॉक्स, किनारे के प्रश्न और “चर्चा कीजिए” वाले बॉक्स
स्लाइडस्लाइड का पाठ का वह भाग जो इस कालांश का हैस्लाइड शो एक बार चलाकर देखिए; प्रोजेक्टर न हो तो स्लाइड का पाठ ही काफ़ी है
इंटरैक्टिव अध्यायकिताब के हर हिस्से का एक पड़ाव, जिसे बच्चे फ़ोन या कंप्यूटर पर ख़ुद पढ़ सकते हैंकार्ड में दिया पड़ाव खोलकर देखिए कि उसमें क्या है
लक्ष्यकालांश के अंत तक हर बच्चा क्या कर सकेनिकास-पर्ची इसी लक्ष्य को जाँचती है; दोनों साथ पढ़िए
साथ ले जाइएकिताब के अलावा जो चीज़ें कक्षा में चाहिएएक दिन पहले जुटा लीजिए; चार्ट पेपर पर चित्र पहले से बना लीजिए
40 मिनटकालांश के छह चरण, मिनट के हिसाब सेपहला चरण हमेशा पिछली पर्चियाँ है, आख़िरी हमेशा निकास-पर्ची; बीच के चरण किताब के क्रम में
चित्रउस कालांश का एक आरेख, किताब के एक पृष्ठ सेकॉपी में एक बार बना लीजिए, फिर बोर्ड पर बच्चों के जवाबों से बनवाइए
बोर्ड-कार्यकालांश के अंत तक बोर्ड पर बनने वाली तालिका, जिसे बच्चे कॉपी में उतारेंहर पंक्ति के साथ पृष्ठ लिखा है; बच्चे भी पृष्ठ लिखें
यहाँ बच्चे अटकेंगेवे बातें जहाँ बच्चे अक्सर भूल करते हैं, और कमज़ोर और तेज़ विद्यार्थी के लिए एक-एक कामकालांश से पहले पढ़ लीजिए, ताकि भूल होते ही रोक सकें
निकास-पर्चीआख़िरी कुछ मिनट में दो छोटे प्रश्न, जिनके उत्तर बच्चे काग़ज़ की पर्ची पर लिखकर देते हैंनमूना उत्तर कार्ड में हैं; पर्चियाँ अगले कालांश के पहले चरण में काम आती हैं
प्रश्न बैंकगृहकार्य के प्रश्न, कोड सेकोड ऊपर की तालिका के नीचे समझाए गए हैं
फ़्लैशकार्डदोहराने के लिए छोटे कार्ड, नंबर सेबच्चों को बता दीजिए कि आज कौन-से नंबर दोहराने हैं

हर कालांश से पहले:

  1. कार्ड के पृष्ठ किताब में पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाला बॉक्स।
  2. पिछली निकास-पर्चियाँ छाँटिए: कितनों ने सही लिखा, सबसे ज़्यादा कौन-सी भूल हुई।
  3. “चित्र” वाला आरेख कॉपी में एक बार बनाइए।
  4. गृहकार्य के कोड प्रश्न बैंक में खोलकर देख लीजिए कि उत्तर कितने लंबे हैं।

पढ़ाने का क्रम: पहले किसान और गाँव, फिर ज़मींदार और राज्य, आख़िर में स्रोत की परख

किताब नीचे से ऊपर चलती है। पहले वह किसान, उसकी ज़मीन, सिंचाई और फ़सलें दिखाती है (अनुभाग 1), फिर वह गाँव जिसमें किसान रहते थे: जाति, पंचायत, मुखिया और दस्तकार (अनुभाग 2)। फिर वह उन लोगों की बात करती है जो अकसर छूट जाते हैं: खेत और घर में काम करने वाली महिलाएँ (अनुभाग 3) और बसे हुए गाँवों के बाहर के जंगल वासी (अनुभाग 4)। इसके बाद वह ऊपर की ताक़तों तक जाती है: ज़मींदार (अनुभाग 5), मुग़ल राज्य की भू–राजस्व प्रणाली (अनुभाग 6) और वह चाँदी जिससे मुग़ल राज्य को नकदी कर उगाहने में आसानी हुई (अनुभाग 7)। आख़िर में वह उस ग्रंथ को परखती है जिससे यह ज़्यादातर तसवीर बनी, अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (अनुभाग 8)। कालांश इसी क्रम में चलते हैं।

यह क्रम इसलिए ज़रूरी है कि राजस्व की हर बात नीचे की बातों से अर्थ पाती है। जो बच्चा जानता है कि किसान के पास कितनी ज़मीन थी, गाँव कैसे चलता था और ज़मींदार कहाँ खड़े थे, वही समझेगा कि राज्य ज़मीन की नपाई और वर्गीकरण पर इतना ज़ोर क्यों देता था। और जो बच्चा पूरे अध्याय में आइन के आँकड़े पढ़ चुका है, वही कालांश 10 में ठीक से पूछ पाएगा कि इस ग्रंथ की नज़र किसकी थी और वह किन बातों पर चुप है। इस क्रम को मत तोड़िए।

सामग्री — यह जुटा लीजिए

#क्याकिस कालांश में
1चार्ट पेपर, दस शीट, और मोटे स्केच पेनहर कालांश का चित्र (कालांश 1 से 10)
2भारत का मानचित्र या एटलस2 (स्रोत 2 की जगहें), 8 (मानचित्र 1)
3विश्व का सीमारेखा मानचित्र, हर बच्चे के लिए एक9 (चाँदी कहाँ से आई), 10 (प्रश्न 10)
4पर्चियों के लिए काग़ज़, और एक लिफ़ाफ़ाहर कालांश; लिफ़ाफ़ा 1 और 10 में
5प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2, हर बच्चे के लिए एक प्रति11
6प्रोजेक्टर, हो तोस्लाइड और इंटरैक्टिव अध्याय के लिए; न हो तो चार्ट पेपर और बोर्ड काफ़ी हैं

कक्षा-व्यवस्था

  • जोड़ियाँ स्रोत पढ़ने के कामों के लिए: स्रोत 1 (कालांश 1), स्रोत 2 (कालांश 2), स्रोत 3 और 4 (कालांश 6), स्रोत 5, 6 और 7 (कालांश 8), स्रोत 8 (कालांश 9) और स्रोत 9 (कालांश 10)। किनारे के बाक़ी बॉक्स आप ज़ोर से पढ़िए।
  • चार्ट पेपर कक्षा की दीवार पर एक जगह लगाइए। कालांश 10 और 11 में सब फिर काम आएँगे।
  • जाति और महिलाएँ किताब के शब्दों में। जाति, पंचायत के दंड और महिलाओं पर नियंत्रण की बातें वैसे ही पढ़ाइए जैसे किताब लिखती है, उसी काल में। किसी बच्चे से उसकी जाति, उसके परिवार की ज़मीन या उसके घर की महिलाओं के बारे में मत पूछिए, और कक्षा में जाति या स्त्री–पुरुष की भूमिकाओं का अभिनय मत करवाइए। बहस इतनी हो कि किताब का प्रमाण क्या है, किसी को दोष देने की नहीं।
  • “जंगली” का अर्थ पहले दिन से साफ़ रखिए। पृष्ठ 208 के अनुसार समकालीन रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए “जंगली” शब्द इस्तेमाल करती थीं, पर इसका मतलब असभ्य नहीं था: इससे वे लोग समझे जाते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था।
  • गाँव का दौरा (प्रश्न 11) अकेले नहीं: समूह में, किसी शिक्षक या अभिभावक के साथ, और गाँव के बड़ों से पूछकर। बच्चे केवल गिनती और किस्में लिखें, जैसे कितने घर, कौन-सी फ़सलें, कौन-से काम; किसी का नाम, जाति या लोगों की तसवीर नहीं।
  • बिना प्रोजेक्टर भी हर कालांश चल जाता है: हर कार्ड का चित्र बोर्ड पर बन सकता है, और बच्चे अपनी किताब में चित्र, मानचित्र 1 और काल रेखा देखते हैं।

अधिगम प्रतिफल

#प्रतिफलकालांशजाँच
1बताता है कि सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के किसानों को हम किन स्रोतों से जानते हैं और आइन का नज़रिया किसका है, और खुद–काश्त और पाहि–काश्त का फ़र्क लिखता है1निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 1
2सिंचाई के साधन, खेती के औज़ार, खरीफ़ और रबी, जिन्स–ए–कामिल और नयी फ़सलें बताता है2निकास-पर्ची; स्रोत 2 के प्रश्न; अभ्यास का प्रश्न 2
3जाति के हिसाब से गाँव की बनावट, पंचायत और मुखिया के काम, और जाति पंचायत समझाता है3निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 9
4दस्तकारों की सेवाओं और उनकी अदायगी के तरीक़े बताता है, और “छोटा गणराज्य” वाली छवि को किताब के प्रमाण से परखता है4निकास-पर्ची
5खेती और दस्तकारी में महिलाओं का श्रम, उनके अधिकार और उन पर नियंत्रण किताब के शब्दों में बताता है5निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 3
6जंगल वासियों का जीवन, और सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में जंगलों में घुसपैठ के रूप बताता है6निकास-पर्ची; स्रोत 4 के प्रश्न; अभ्यास का प्रश्न 7
7ज़मींदारों की ताक़त के आधार, और किसानों से उनके रिश्ते समझाता है7निकास-पर्ची; अभ्यास का प्रश्न 8
8जमा और हासिल, ज़मीन के चार वर्ग, राजस्व वसूली के तरीक़े और मनसबदारी को जोड़कर बताता है8निकास-पर्ची; स्रोत 6 के प्रश्न; अभ्यास का प्रश्न 5
9चाँदी के बहाव को बाज़ार, नकद लेन-देन और राजस्व से जोड़ता है9निकास-पर्ची; स्रोत 8 के प्रश्न; अभ्यास का प्रश्न 4
10आइन की बनावट, अबुल फ़ज़्ल की विधि और आइन की सीमाएँ बताता है, और काल रेखा पढ़ता है10अभ्यास के प्रश्न 1, 10 और 12
11पूरे अध्याय के सवाल का उत्तर किताब के उदाहरणों से देता है1, 10पहले दिन की पर्ची, और कालांश 10 में उसका नया उत्तर

कालांश-दर-कालांश

कालांश 1 — शुरुआत; 1. किसान और कृषि उत्पादन: 1.1 स्रोतों की तलाश; 1.2 किसान और उनकी ज़मीन

किताब — पृष्ठ 196–198 · स्लाइड — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 · इंटरैक्टिव — शुरुआत और 1. किसान और कृषि उत्पादन

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के किसानों के बारे में हम किन स्रोतों से जानते हैं और आइन–ए–अकबरी किसकी नज़र से लिखी गई, खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों का फ़र्क लिख सके, और बाबर के स्रोत 1 से एक बात बता सके।

साथ ले जाइए — किताब, पहले दिन की पर्चियों के लिए काग़ज़ और एक लिफ़ाफ़ा, और किसान के पास कितनी ज़मीन वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पहले दिन की पर्ची। बोर्ड पर पूरे अध्याय का सवाल लिखिए: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं? हर बच्चा दो पंक्तियाँ और अपना नाम लिखे। पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में रखिए; कालांश 10 में ये लौटेंगी। यह सवाल हमारी ओर से है।

  2. 5–12 मिनट · गाँवों का देश। पृष्ठ 196 पढ़िए। बोर्ड पर लिखवाइए: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे, इसलिए उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने। गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों तक आए। चित्र 8.1 दिखाइए: सत्रहवीं शताब्दी के एक मुग़ल चित्र का ब्योरा, एक ग्रामीण दृश्य। फिर बताइए कि खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई गाँव था, पर हर जगह एक-सी खेती नहीं थी: सूखी ज़मीन और पहाड़ियों वाले इलाके थे, और भूखंड का बहुत बड़ा हिस्सा जंगलों से घिरा था।

  3. 12–22 मिनट · स्रोतों की तलाश। पृष्ठ 197 का भाग 1.1 पढ़िए। किसान ख़ुद नहीं लिखते थे, इसलिए इस काल के कृषि इतिहास के मुख्य स्रोत वे ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक आइन–ए–अकबरी है, जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने लिखा। इसका मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था। किताब का निष्कर्ष बोर्ड पर लिखिए: “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” फिर पूछिए: अगर किसान ख़ुद नहीं लिखते थे और आइन ऊपर की नज़र है, तो किसानों की अपनी बात हमें थोड़ी-बहुत किन स्रोतों से मिलती है? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गए दस्तावेज़ों से, जो पृष्ठ 197 पर गिनाए गए हैं।

    • दूर के इलाकों के दस्तावेज़: सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं।
    • ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़: ये पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका देते हैं।
    • इनमें क्या दर्ज है: किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े, और यह कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे।

    यही बात अभ्यास के प्रश्न 1 में पूछी गई है; उसका पूरा उत्तर कालांश 10 में बनेगा।

  4. 22–30 मिनट · किसान और उनकी ज़मीन। पृष्ठ 197–198 का भाग 1.2 पढ़िए। मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान शब्द इस्तेमाल करते थे; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। सत्रहवीं सदी के स्रोत दो किस्म के किसानों की चर्चा करते हैं: खुद–काश्त, जो उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी, और पाहि–काश्त, जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। लोग अपनी मर्ज़ी से भी पाहि–काश्त बनते थे, जब किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें, और मजबूरी में भी, जब अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी हो। फिर पृष्ठ 198 से ज़मीन की बात कीजिए और नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए। किताब उन्नीसवीं सदी के दिल्ली–आगरा इलाके का एक विवरण भी देती है, जो उसके अनुसार सत्रहवीं सदी पर भी उतना ही लागू होता है: “हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर ज़मीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और ज़मीन के ऐसे हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।”

  5. 30–36 मिनट · स्रोत 1: बाबर की नज़र। जोड़ियों में पृष्ठ 198 का स्रोत 1 पढ़वाइए। मुग़ल शासक बाबर ने अपने संस्मरण बाबरनामा में लिखा: “हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।” फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगी। नमूना उत्तर — बाबर को सबसे ज़्यादा यह बात चौंकाती है कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ बहुत जल्दी उजड़ती और बसती थीं।

    • पल में उजड़ना: बरसों से बसे बड़े शहर के लोग भी चले जाएँ तो डेढ़ दिन में उनका हर नामोनिशान मिट जाता था।
    • बसने में आसानी: पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी, क्योंकि सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं; लोग एक सरोवर या कुआँ बना लेते थे।
    • झोंपड़ियाँ: झोंपड़ियाँ बनाकर “यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!”

    किताब भी पृष्ठ 198 पर कहती है कि ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से खेती लगातार फैलती रही।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) किताब के अनुसार आइन से किसानों के बारे में जो पता चलता है, वह किसका नज़रिया है? (2) खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों में क्या फ़र्क था?

किसान के पास कितनी ज़मीन (चरण 4)

किसान के पास कितनी ज़मीन

उत्तर भारतऔसत किसानशायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा; ज़्यादातर के पास इससे भी कम
गुजरात6 एकड़ के करीबइतनी ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे
बंगाल5 एकड़औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा; 10 एकड़ वाला आसामी अमीर
व्यक्तिगत मिल्कियतज़मीन ख़रीदी-बेची जाती थीजैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की
NCERT, पृष्ठ 198

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
गाँवों में लोगसोलहवीं–सत्रहवीं सदी में करीब–करीब 85 फ़ीसदी196
फ़सल के दावेदारछोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत; सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष196
सबसे बड़ी बाहरी ताक़तमुग़ल राज्य, आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से196
मुख्य स्रोतमुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे ग्रंथ और दस्तावेज़; सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक, आइन–ए–अकबरी197
आइन का नज़रिया“सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया”197
दूसरे स्रोतगुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़; पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़197
किसान के नामरैयत (बहुवचन रिआया), मुज़रियान, किसान, आसामी197
दो किस्म के किसानखुद–काश्त उसी गाँव में रहते; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते198
ज़मीनउत्तर भारत: एक जोड़ी बैल, दो हल; गुजरात: 6 एकड़ = समृद्ध; बंगाल: ऊपरी सीमा 5 एकड़198
स्रोत 1बाबर: बस्तियाँ “एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं”198

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “आइन में किसानों की अपनी आवाज़ है।” ऐसा नहीं है। पृष्ठ 197 के अनुसार इसे अकबर के दरबारी इतिहासकार ने लिखा, और किसानों के बारे में इससे जो पता चलता है वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” किसान ख़ुद नहीं लिखते थे।
  • “पाहि–काश्त मतलब बिना ज़मीन का मज़दूर।” किताब ऐसा नहीं कहती। पाहि–काश्त वे किसान थे जो दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे, कभी अपनी मर्ज़ी से और कभी मजबूरी में।
  • रैयत और रिआया। दोनों एक ही शब्द हैं: रिआया रैयत का बहुवचन है।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 1. किसान और कृषि उत्पादन खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: बंगाल में कितनी ज़मीन वाले आसामी को अमीर समझा जाता था? (10 एकड़ वाले को।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पृष्ठ 198 का दिल्ली–आगरा वाला विवरण, जिसमें हर ज़मीन की हदों पर निशान हैं, किसानों की ज़मीन के बारे में क्या बताता है? (कि ज़मीन व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया”, यानी मुग़ल दरबार की नज़र। (2) खुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1, क2, क3, ख1, ग1 और घ1; जो बच्चे काम जल्दी पूरा कर लें, वे अभ्यास के प्रश्न 1 के लिए पृष्ठ 197 के सारे स्रोत कॉपी में नोट कर लें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 1–19।

कालांश 2 — 1.3 सिंचाई और तकनीक; 1.4 फ़सलों की भरमार

किताब — पृष्ठ 198–201 · स्लाइड — भाग 2 · इंटरैक्टिव — 1. किसान और कृषि उत्पादन

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बाबर के बताए सिंचाई के दो साधन और उनकी जगहें बता सके, खेती के तीन औज़ार गिना सके, और जिन्स–ए–कामिल और नयी फ़सलों के उदाहरण देकर बता सके कि खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए नहीं थी।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, भारत का मानचित्र या एटलस, और खेत के तीन औज़ार वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने पाहि–काश्त को मज़दूर लिखा हो, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: वे दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले किसान थे।

  2. 5–12 मिनट · खेती का फैलाव और बारिश। पृष्ठ 198 का भाग 1.3 पढ़िए। ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ। खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं। बोर्ड पर बारिश का नियम लिखवाइए: जहाँ प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिश होती थी, वहाँ कमोबेश चावल; कम बारिश में गेहूँ; और कम में ज्वार–बाजरा। मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, पर कुछ फ़सलों को अतिरिक्त पानी चाहिए था, इसलिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े।

  3. 12–22 मिनट · स्रोत 2: रहट और बालटी। जोड़ियों में पृष्ठ 199 का स्रोत 2 पढ़वाइए और चित्र 8.2 (रहट की संरचना) दिखाइए। एटलस पर जगहें दिखाइए: रहट लाहौर और दीपालपुर जैसी जगहों पर था (दोनों आज के पाकिस्तान में), और बालटी आगरा, चाँदवर और बयाना जैसे इलाकों में (आगरा और चाँदवर आज के उत्तर प्रदेश में, बयाना आज के राजस्थान में; किताब तीनों को उत्तर प्रदेश में बताती है)। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई व्यवस्था से कीजिए; इनमें किस तरह के संसाधन लगते होंगे, और किनमें सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी? नमूना उत्तर — बाबर कुओं से पानी उठाने के साधन बताता है, जबकि विजयनगर में बाँध, हौज़ और नहरें थीं।

    • बाबर के साधन: रहट में रस्सी के फंदों पर लकड़ी के गुटके और घड़े, पहिये, और बैल से घूमने वाला दाँतों वाला पहिया; पानी एक संकरे नाले से खेत तक। बालटी में लकड़ी के कन्ने, बेलन, रस्सी और बैल; एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा बालटी से पानी निकालता।
    • विजयनगर (अध्याय 7): धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़; एक बड़े हौज़ (आज का कमलपुरम् जलाशय) से आस–पास के खेत सींचे जाते थे; तुंगभद्रा पर बने बाँध से हिरिया नहर पानी लाती थी।
    • संसाधन और भागेदारी: बाबर के ब्योरे में रहट और बालटी एक कुएँ पर बैलों से चलते हैं, और बालटी में दो आदमी काम करते हैं, इसलिए उनमें सुधार किसानों की अपनी भागेदारी से हो सकता होगा; बड़े बाँध, हौज़ और नहरें बनाने में बहुत मज़दूर, सामान और शासकों की ताक़त लगती होगी।

    हर तर्क ठीक है, अगर वह स्रोत 2 या अध्याय 7 की किसी बात से जुड़ा हो।

  4. 22–28 मिनट · राज्य की नहरें और खेत के औज़ार। पृष्ठ 200 पढ़िए। सिंचाई को राज्य की मदद भी मिलती थी: उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर। खेती मेहनत का काम थी, पर किसान अकसर पशुबल पर आधारित तकनीकें भी इस्तेमाल करते थे। नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए।

  5. 28–36 मिनट · फ़सलों की भरमार। पृष्ठ 200–201 का भाग 1.4 पढ़िए। खेती दो मुख्य चक्रों में होती थी: खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)। सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थीं, और जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक़्त थे, वहाँ तीन भी। आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर मुग़ल प्रांत आगरा में 39 किस्म की और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें उगाई जाती थीं; बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में होती थीं। मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें) की खेती को बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था; कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे। पृष्ठ 201 पर नयी फ़सलें: मक्का अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते आया, और टमाटर, आलू, मिर्च, अनानास और पपीता नयी दुनिया से। पृष्ठ 200 के किनारे के दो बॉक्स आप पढ़िए:

    • तम्बाकू का प्रसार: तम्बाकू पहले दक्कन पहुँचा, और सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया। अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा। जहाँगीर ने इस पर पाबंदी लगाई, पर पाबंदी बेअसर रही, और सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था।
    • आबादी की बढ़ोतरी: आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार 1600 से 1800 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी की बढ़ोतरी। (किताब में यहाँ “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है।)
  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) बाबर ने सिंचाई के कौन-से दो साधन बताए, और वे कहाँ चलते थे? (2) जिन्स–ए–कामिल किसे कहते थे, और मुग़ल राज्य उनकी खेती को बढ़ावा क्यों देता था?

खेत के तीन औज़ार (चरण 4)

खेत के तीन औज़ार

जुताईलकड़ी का हलका हलएक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल
बुआईबरमाबैलों के जोड़े से खींचा जाता था
गुड़ाई और निराईलोहे के पतले धारलकड़ी के मूठ वाले
नतीजातेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थीपर बीज हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था
NCERT, पृष्ठ 200

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
खेती का फैलावज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी, किसानों की गतिशीलता198
बारिश और फ़सल40 इंच या ज़्यादा: चावल; कम: गेहूँ; और कम: ज्वार–बाजरा198
रहटलाहौर, दीपालपुर; बैल से घूमता पहिया, घड़े199
बालटीआगरा, चाँदवर, बयाना; एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा पानी निकालता199
राज्य की नहरशाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर200
औज़ारलोहे के फाल वाला लकड़ी का हल; बरमा; लोहे के पतले धार200
दो मौसमखरीफ़ (पतझड़ में), रबी (वसंत में); कहीं-कहीं तीन फ़सलें200
विविधताआगरा 39 किस्म, दिल्ली 43 फ़सलें; बंगाल में चावल की 50 किस्में200
जिन्स–ए–कामिलसर्वोत्तम फ़सलें, जैसे कपास और गन्ना; राज्य को ज़्यादा कर200
नयी फ़सलेंसत्रहवीं सदी में पहुँचीं: मक्का अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते; टमाटर, आलू, मिर्च, अनानास, पपीता नयी दुनिया से201

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • खरीफ़ और रबी के मौसम। किताब के शब्दों में: खरीफ़ पतझड़ में, रबी वसंत में। बच्चे दोनों उलट देते हैं; बोर्ड पर मौसम के साथ ही लिखवाइए।
  • “उस काल में खेती सिर्फ़ पेट भरने के लिए थी।” किताब पृष्ठ 200 पर कहती है कि दैनिक आहार पर ज़्यादा ज़ोर था, पर इसका मतलब यह नहीं कि खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी: एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे। यही अभ्यास का प्रश्न 2 है।
  • मक्का कहाँ से आया? सत्रहवीं सदी में पहुँची नयी फ़सलों में मक्का अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते आया; टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्ज़ियाँ नयी दुनिया से। दोनों को एक साथ मत मिलाइए।
  • तम्बाकू और आइन। आइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती; अकबर ने उसे 1604 ई. में पहली बार देखा।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 1. किसान और कृषि उत्पादन खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: शाह नहर किसके शासनकाल में और कहाँ बनी? (शाहजहाँ के शासनकाल में, पंजाब में।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पृष्ठ 201 का “चर्चा कीजिए” वाला प्रश्न करवाइए: इस अनुभाग की खेती की कौन-सी तकनीकें भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 के अध्याय 2 में बताई तकनीकों से मिलती-जुलती हैं, और कौन-सी भिन्न? (मिलती-जुलती: लोहे के फाल वाला हल, जो अध्याय 2 में छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में फैला; और कुओं, तालाबों और नहरों से सिंचाई। भिन्न: अध्याय 2 में गंगा की घाटी की धान की रोपाई है, जबकि यहाँ बीज ज़्यादातर हाथ से छिड़ककर बोए जाते थे। इस अध्याय में नया: बरमा, खरीफ़ और रबी, जिन्स–ए–कामिल और नयी दुनिया से आई फ़सलें।)

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) रहट, लाहौर और दीपालपुर जैसी जगहों पर; और बालटी, आगरा, चाँदवर और बयाना जैसे इलाकों में। (2) सर्वोत्तम फ़सलें, जैसे कपास और गन्ना; इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क4 से क7, ख2 से ख5, ग2, ङ1 और छ1; जो आगे हैं, वे अभ्यास के प्रश्न 2 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 20–38।

कालांश 3 — 2. ग्रामीण समुदाय: 2.1 जाति और ग्रामीण माहौल; 2.2 पंचायतें और मुखिया

किताब — पृष्ठ 201–204 · स्लाइड — भाग 3 · इंटरैक्टिव — 2. ग्रामीण समुदाय

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी ग्रामीण समुदाय के तीन घटक गिना सके, किताब के शब्दों में बता सके कि जाति ने खेतिहर किसानों को कैसे बाँटा, पंचायत और मुखिया के काम लिख सके, और बता सके कि अत्यधिक कर के ख़िलाफ़ किसानों के पास कौन-से रास्ते थे।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और अर्ज़ी से गाँव छोड़ने तक वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने जिन्स–ए–कामिल को कोई एक फ़सल लिखा हो, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: ये सर्वोत्तम फ़सलें थीं, जैसे कपास और गन्ना, जिनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था।

  2. 5–10 मिनट · गाँव की एक तसवीर। पृष्ठ 201 का चित्र 8.3 बच्चों को उनकी किताब में दिखाइए, और किनारे का प्रश्न पूछिए: चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या-क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए। नमूना उत्तर — यह आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का पंजाब के एक गाँव का चित्र है।

    • महिलाएँ: सूत कातती और अनाज कूटती दिखती हैं।
    • पुरुष: पगड़ी पहने एक आदमी भैंस के साथ है; आस-पास ऊँट, मवेशी और घड़े हैं।
    • वास्तुकला: मिट्टी के घर, और उनके बीच किले जैसी एक मीनार।

    फिर भाग 2 की पहली बात बोर्ड पर लिखवाइए: किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था, जिसके तीन घटक थे: खेतिहर किसान, पंचायत, और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)।

  3. 10–18 मिनट · जाति और ग्रामीण माहौल। पृष्ठ 201–202 का भाग 2.1 आप ज़ोर से पढ़िए, किताब के शब्दों में। जाति और जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई समूहों में बँटे थे। खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे। मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे “नीच” कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे; बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी। फिर बीच के समूहों के उदाहरण बोर्ड पर लिखवाइए: सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है, और जाटों को भी किसान बताती है, पर जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों से नीची रखती है; पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं; पूर्वी इलाकों में सदगोप और कैवर्त जैसी पशुपालक और मछुआरी जातियाँ किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगीं। पूछिए: किताब के अनुसार निचले तबकों और बीच के समूहों में जाति और हैसियत का रिश्ता अलग कैसे था? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था; बीच के समूहों में ऐसा नहीं था।

    • निचले तबके: खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी उन्हें सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे।
    • बीच के समूह: मुनाफ़े और काम के बदलाव से उनकी हैसियत ऊपर उठ सकती थी, जैसे अहीर, गुज्जर और माली, या सदगोप और कैवर्त।

    यह बात अभ्यास के प्रश्न 6 का पहला हिस्सा है।

  4. 18–28 मिनट · पंचायत और मुखिया। पृष्ठ 202–203 का भाग 2.2 पढ़िए और बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ भरवाइए। पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, आम तौर पर वे लोग जिनके पास संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे; किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है। मुखिया, कुछ स्रोतों के अनुसार, बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता था और ज़मींदार उसे मंज़ूरी देता था; भरोसा न रहे तो उसे हटाया जा सकता था। पंचायत का पटवारी हिसाब-किताब में मुखिया की मदद करता था। पृष्ठ 202 का बॉक्स आप पढ़िए: मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब में हेरा-फेरी करते थे और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे। फिर पृष्ठ 203 से: पंचायत जुर्माना लगा सकती थी और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी; ग्राम पंचायत के अलावा हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी होती थी। फिर चित्र 8.4 किताब में दिखाइए और किनारे का प्रश्न पूछिए: चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है? नमूना उत्तर — आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी के इस चित्र में दोनों को अलग-अलग ढंग से दिखाया गया है।

    • बुज़ुर्ग: बाईं ओर करीब चौदह आदमियों का झुंड, ज़्यादातर पगड़ी में, कई की दाढ़ी सफ़ेद; उम्र और संख्या से वे गाँव के बड़े-बूढ़े लगते हैं।
    • अधिकारी: दाईं ओर सिर्फ़ दो आदमी: एक बही में लिख रहा है, दूसरा हरे कोट में है, और उनके पैरों के पास हिसाब की बहियाँ और कागज़ हैं।

    लिखा-पढ़ी और हिसाब कर अधिकारियों की पहचान है।

  5. 28–36 मिनट · अर्ज़ी से गाँव छोड़ने तक। पृष्ठ 203–204 पढ़िए और नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए। पश्चिम भारत, ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र, के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत है। फिर पूछिए: किताब गाँव छोड़कर भाग जाने को खेतिहरों के हाथ में “एक बड़ा प्रभावी हथियार” क्यों कहती है? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — क्योंकि किताब के अनुसार किसान के लिए गाँव छोड़ना संभव भी था, और उसकी ज़रूरत सबको थी।

    • ज़मीन: जोतने लायक खाली ज़मीन आसानी से मिल जाती थी।
    • श्रम: श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी, इसलिए खेत जोतने वाले हाथों की ज़रूरत सबको थी।

    किताब के अनुसार यह रास्ता तब अपनाया जाता था जब पंचायत के सुझाए समझौते से बात न बने।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) गाँव की पंचायत में कौन होते थे, और किताब उसे कैसा “अल्पतंत्र” बताती है? (2) राजस्थान में जाति पंचायतें कौन-से काम करती थीं?

अर्ज़ी से गाँव छोड़ने तक (चरण 5)

अर्ज़ी से गाँव छोड़ने तक

अर्ज़ीगाँव के सबसे निचले तबकेज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत, कभी अकेले, कभी किसी जाति या संप्रदाय के रूप में
पंचायतअकसर समझौते का सुझावकिसानों की नज़र में ज़िंदा रहने के न्यूनतम साधन उनका रिवाजी हक़ थे
गाँव छोड़ना"एक बड़ा प्रभावी हथियार"खाली ज़मीन आसानी से मिलती थी, और श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी
NCERT, पृष्ठ 203–204

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
समुदाय के तीन घटकखेतिहर किसान, पंचायत, मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)201
जाति और कामकुछ जातियों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम, इसलिए ग़रीबी201–202
दूसरे संप्रदायों मेंहलालख़ोरान गाँव की हदों के बाहर; बिहार के मल्लाहज़ादा202
ऊपर उठती जातियाँअहीर, गुज्जर, माली; पूर्व में सदगोप और कैवर्त202
पंचायतबुज़ुर्ग, पुश्तैनी संपत्ति वाले; “अल्पतंत्र”202
मुखियाआम सहमति से चुना, ज़मींदार की मंज़ूरी; पटवारी उसकी मदद करता202
आम ख़ज़ानाकर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी विपदाएँ, छोटे बाँध या नहर202–203
दंडजुर्माना; सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन203
जाति पंचायतराजस्थान में दीवानी झगड़े, ज़मीन के दावे, शादियों के जातिगत मानदंड203
विरोधअर्ज़ियाँ; समझौता; न बने तो गाँव छोड़कर भाग जाना203–204

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “पंचायत में गाँव के सब लोग बैठते थे।” ऐसा नहीं है। किताब के अनुसार पंचायत में आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले बुज़ुर्ग होते थे; छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें जगह होने की संभावना कम थी।
  • “निष्कासन हमेशा के लिए होता था।” किताब के अनुसार निष्कासन सीमित समय के लिए होता था; उतने समय दंडित व्यक्ति को गाँव छोड़ना पड़ता, और वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था।
  • ग्राम पंचायत और जाति पंचायत दो अलग चीज़ें थीं। फ़ौजदारी न्याय को छोड़कर ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फ़ैसले मानता था।
  • जाति वाला हिस्सा किताब के शब्दों में। इस हिस्से पर किसी बच्चे से उसकी अपनी जाति के बारे में मत पूछिए। बात किताब के उदाहरणों तक रखिए, सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव तक।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. ग्रामीण समुदाय खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: पूर्वी भारत में शादियाँ किसकी मौजूदगी में होती थीं? (मंडल की।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पंचायत का आम ख़ज़ाना किन कामों में लगता था, और उनमें से कौन-सा काम किसान अकेले नहीं कर सकते थे? (कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटना, और मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना; बाँध और नहर जैसे सामुदायिक काम किसान अकेले नहीं कर सकते थे।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) गाँव के बुज़ुर्ग, आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले महत्त्वपूर्ण लोग; किताब के अनुसार यह ऐसा “अल्पतंत्र” था जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी, पर “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए उसमें जगह होने की संभावना कम थी। (2) अलग-अलग जातियों के लोगों के दीवानी झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाना, यह देखना कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं, और यह तय करना कि गाँव के आयोजन में किसे किसके ऊपर तरजीह मिलेगी।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क8, क9, क10, ग3, घ2, च2 और च5; जो आगे हैं, वे अभ्यास के प्रश्न 9 की रूपरेखा बनाएँ।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 39–60।

कालांश 4 — 2.3 ग्रामीण दस्तकार; 2.4 एक “छोटा गणराज्य”?

किताब — पृष्ठ 204–206 · स्लाइड — भाग 4 · इंटरैक्टिव — 2. ग्रामीण समुदाय

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि गाँव के दस्तकार कौन थे और उन्हें सेवाओं के बदले क्या मिलता था, और किताब के तर्कों से परख सके कि मुग़ल काल का गाँव “छोटा गणराज्य” था या नहीं।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और छोटा गणराज्य? अफ़सरों की छवि, किताब के प्रमाण वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने लिखा हो कि पंचायत में गाँव के सब लोग थे, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: वह पुश्तैनी संपत्ति वाले बुज़ुर्गों का “अल्पतंत्र” थी।

  2. 5–12 मिनट · गाँव के दस्तकार। पृष्ठ 204 का भाग 2.3 पढ़िए। अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे। कई समूह खेती और दस्तकारी, दोनों करते थे: रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतन पकाना, खेती के औज़ार बनाना या उनकी मरम्मत, और यह काम बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच के फ़ुरसत के महीनों में होता था। फिर चित्र 8.5 किताब में दिखाइए और किनारे का प्रश्न पूछिए: चित्र में दर्शाई गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए। नमूना उत्तर — यह कपड़ा उत्पादन दिखाने वाली सत्रहवीं शताब्दी की एक चित्रकारी है।

    • ऊपरी हिस्सा: चट्टानी पहाड़ी पर एक शासक बैठा है, साथ में सेवक और रंग-बिरंगे कपड़ों में लोग।
    • निचला हिस्सा: घास-फूस के एक छप्पर के पास कारीगर कपड़ा बिछा रहे हैं, धो रहे हैं, और सूत कात रहे हैं या कपड़ा तैयार कर रहे हैं।

    चित्र पर लिखी पंक्तियाँ पढ़ने या उनका अर्थ बताने की ज़रूरत नहीं; बात चित्र में दिखते काम की है।

  3. 12–22 मिनट · सेवा के बदले क्या। पृष्ठ 205 पढ़िए और बोर्ड-कार्य की पंक्तियाँ भरवाइए। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार भी गाँव के लोगों को अपनी सेवाएँ देते थे। बदले में उन्हें आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा मिलता था, या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी ज़मीन जो खेती लायक होने पर भी बेकार पड़ी थी; अदायगी कैसे होगी, यह शायद पंचायत तय करती थी। महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था। कभी दस्तकार और हर खेतिहर परिवार आपस में बातचीत करके अदायगी तय करते थे, और आम तौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। अठारहवीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।” बोर्ड पर लिखवाइए कि इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, पर किताब के अनुसार यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था।

  4. 22–30 मिनट · क्या गाँव “छोटा गणराज्य” था? पृष्ठ 205 का भाग 2.4 पढ़िए। नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए: ऊपर उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की छवि, नीचे किताब के प्रमाण। फिर भाग 2.4 के शीर्षक का ही सवाल पूछिए: क्या मुग़ल काल का गाँव “छोटा गणराज्य” था? नमूना उत्तर — किताब कहती है कि ऐसा नहीं लगता कि गाँव में सामाजिक बराबरी थी; अंग्रेज़ अफ़सरों की यह छवि किताब के प्रमाणों से मेल नहीं खाती।

    • अफ़सरों की राय: उन्होंने भारतीय गाँवों को ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे।
    • बराबरी नहीं: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं।
    • ताक़त कुछ के हाथ में: कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था।
    • बाहर से जुड़ा गाँव: गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे।

    आख़िरी बात अगले चरण में खुलती है।

  5. 30–36 मिनट · गाँव में नकद। पृष्ठ 205–206 पढ़िए। मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी; निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को मज़दूरी या पूर्व भुगतान नकद मिलता था; कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ़सलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकद होता था। पृष्ठ 206 का बॉक्स आप पढ़िए और चित्र 8.6 किताब में दिखाइए: सत्रहवीं सदी के फ़्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।” उसके अनुसार सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) गाँव के दस्तकारों को सेवाओं के बदले क्या-क्या मिलता था? (2) किताब किन बातों के आधार पर कहती है कि गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं थी? कोई दो लिखिए।

छोटा गणराज्य? अफ़सरों की छवि, किताब के प्रमाण (चरण 4)

छोटा गणराज्य? अफ़सरों की छवि, किताब के प्रमाण

अंग्रेज़ अफ़सरों की छवि"छोटे गणराज्य"भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का सामूहिक बँटवारा
मिल्कियतव्यक्तिगतसंपत्ति पर व्यक्तिगत मिल्कियत
विषमताजाति और जेंडरगहरी विषमताएँ
ताक़तकुछ ताकतवर लोगफ़ैसले, कमज़ोर वर्गों का शोषण, न्याय का अधिकार
नकदगाँव-शहर का व्यापारगाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे
NCERT, पृष्ठ 205

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
दस्तकार कितनेकहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी204
किसान भी दस्तकाररँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, बरतन, औज़ार; खेती से फ़ुरसत के महीनों में204–205
कौन-से दस्तकारकुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, सुनार205
अदायगीफ़सल का हिस्सा, या गाँव की ज़मीन का टुकड़ा; शायद पंचायत तय करती205
महाराष्ट्रऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बनी205
जजमानीबंगाल, अठारहवीं सदी; यह शब्द सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कम इस्तेमाल होता था205
“छोटा गणराज्य”उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय205
किताब की रायव्यक्तिगत मिल्कियत; जाति और जेंडर की गहरी विषमताएँ; ताकतवरों के हाथ में फ़ैसले205
गाँव में नकदकर, निर्यात वाले दस्तकारों की मज़दूरी, कपास, रेशम या नील का भुगतान206
सराफ़तैवर्नियर: वे गाँव बहुत छोटे जिनमें सराफ़ न हों206

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “सराफ़ मतलब सुनार।” किताब में सराफ़ मुद्रा की फेर बदल करने वाले हैं, जो एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे। सुनार दस्तकारों की सूची में अलग से आता है।
  • “जजमानी शब्द मुग़ल काल में आम था।” किताब कहती है कि यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था; बंगाल का उदाहरण अठारहवीं सदी का है।
  • “गाँव में पैसा नहीं चलता था, सब अदला-बदली थी।” किताब के अनुसार वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय आम था, पर नकद अदायगी का चलन भी बिलकुल नदारद नहीं था, और गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. ग्रामीण समुदाय खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: महाराष्ट्र में दस्तकारों की पुश्तैनी ज़मीन को क्या कहते थे? (मीरास या वतन।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पृष्ठ 206 के “चर्चा कीजिए” वाले प्रश्न की तैयारी करवाइए: इस अनुभाग की पंचायतों के बारे में किताब से चार बातें लिखिए: सदस्य, मुखिया, काम, और सीमाएँ। (सदस्य: पुश्तैनी संपत्ति वाले बुज़ुर्ग, एक “अल्पतंत्र”; मुखिया: मुक़द्दम या मंडल, कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना और ज़मींदार की मंज़ूरी से; काम: आम ख़ज़ाने से सामुदायिक काम, जाति की हदें, जुर्माना और निष्कासन, अर्ज़ियों की सुनवाई; सीमाएँ: “नीच” काम करने वालों की जगह कम, और मंडलों पर हेरा-फेरी के आरोप।) यह काम हमारी ओर से है। किताब का बॉक्स इन पंचायतों को आज की ग्राम पंचायतों से मिलाने को कहता है; वह मिलान कक्षा में मत करवाइए, बात किताब की तसवीर तक रखिए।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा, या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा; कभी हर खेतिहर परिवार से बातचीत करके वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय; और नकद भी, जैसे अठारहवीं सदी के बंगाल में रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी। (2) कोई दो: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत; जाति और जेंडर के नाम पर गहरी विषमताएँ; कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते थे और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क11, ख6, ख7, ख8, ग4 और ङ3; जो आगे हैं, वे अभ्यास के प्रश्न 6 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 61–69।

कालांश 5 — 3. कृषि समाज में महिलाएँ

किताब — पृष्ठ 206–207 · स्लाइड — भाग 5 · इंटरैक्टिव — 3. कृषि समाज में महिलाएँ

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी किताब के शब्दों में बता सके कि खेत, दस्तकारी और बाज़ार में महिलाएँ कौन-से काम करती थीं, उन पर कौन-से बंधन थे, और ज़मीन और ज़मींदारी पर उनके कौन-से हक़ थे।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और महिलाओं का श्रम, बंधन और हक़ वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने सराफ़ को सुनार लिखा हो, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: सराफ़ मुद्रा की फेर बदल करने वाले थे।

  2. 5–14 मिनट · खेत और दस्तकारी में। पृष्ठ 206 का भाग 3 पढ़िए और चित्र का पहला खाना भरवाइए। महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे: मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं। छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती में घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद थे, इसलिए “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा फ़र्क मुमकिन नहीं था। सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे; चित्र 8.7 (सूत कातती महिला) किताब में दिखाइए।

  3. 14–20 मिनट · घर से बाहर भी। पृष्ठ 207 के चित्र 8.8 (क) और (ख) किताब में दिखाइए और उनके शीर्षक पढ़वाइए: “फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण। महिलाएँ पत्थर तोड़ रही हैं।” और “बोझा ढोती महिलाएँ। आस–पास के दूसरे गाँवों से आने वाली महिलाएँ अकसर ऐसे निर्माण–स्थलों पर काम करती थीं।” बताइए कि किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करने जाती थीं। फिर पूछिए: किताब कहती है कि किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही बढ़ती। इसका एक उदाहरण इस अध्याय से दीजिए। यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — कपड़ा इसका अच्छा उदाहरण है।

    • महिलाओं का काम: सूत कातना महिलाओं के श्रम पर निर्भर था।
    • बाज़ार: निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को नकद मज़दूरी या पूर्व भुगतान मिलता था (पृष्ठ 206), और कपास बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थी (पृष्ठ 200)।

    जितना कपड़ा बाज़ार के लिए बनता, उतने सूत की, और इसलिए महिलाओं के श्रम की, ज़रूरत बढ़ती। हर उदाहरण ठीक है, अगर वह किताब की किसी बात से जुड़ा हो।

  4. 20–28 मिनट · संसाधन भी, काबू में भी। पृष्ठ 206–207 आप पढ़िए, किताब के शब्दों में और बिना किसी टिप्पणी के। पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी; बंगाल में मासिक धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं जा सकती थीं। समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत के कारण महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता था। कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादीशुदा महिलाओं की कमी थी। इससे किसान और दस्तकार समाज में ऐसे रिवाज बने जो संभ्रांत समूहों से बहुत अलग थे: कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करनी होती थी, दहेज नहीं, और तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं। फिर भी घर का मुखिया मर्द होता था, और परिवार और समुदाय के मर्द महिला पर पुरज़ोर काबू रखते थे।

  5. 28–36 मिनट · दरख़्वास्तें, और ज़मीन पर हक़। पृष्ठ 207 पढ़िए और चित्र के बाक़ी खाने भरवाइए। पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र) के दस्तावेज़ों में महिलाओं की वे दरख़्वास्तें मिलती हैं जो उन्होंने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजीं; ज़्यादातर में महिला का नाम दर्ज नहीं होता था, उसे घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में लिखा जाता था। भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था; पंजाब में महिलाएँ, विधवाएँ भी, पुश्तैनी संपत्ति बेचने वाली के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय थीं; हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी। फिर पूछिए: किताब बंगाल की किस ज़मींदारी का उदाहरण देती है? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — राजशाही की ज़मींदारी।

    • कब: अठारहवीं सदी में।
    • कितनी बड़ी: उस सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक।

    उसकी कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) खेत में मर्द कौन-से काम करते थे और महिलाएँ कौन-से? (2) किसान और दस्तकार समाज में शादी के कौन-से रिवाज संभ्रांत समूहों से अलग थे?

महिलाओं का श्रम, बंधन और हक़ (चरण 2)

महिलाओं का श्रम, बंधन और हक़

खेतबुआई, निराई, कटाईऔर पकी फ़सल का दाना निकालना
दस्तकारीसूत कातनामिट्टी साफ़ करना और गूँधना, कपड़ों पर कढ़ाई
घर से बाहरनियोक्ताओं के घर और बाज़ारनिर्माण-स्थलों पर बोझा ढोना
घर-परिवार का श्रमउत्पादन की बुनियादइसलिए "घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द" जैसा फ़र्क़ मुमकिन नहीं था
बंधनपूर्वाग्रह और काबूराजस्वला महिलाओं पर पाबंदियाँ; मर्दों का पुरज़ोर काबू
हक़पुश्तैनी संपत्ति और ज़मींदारीभूमिहर भद्रजनों में; पंजाब में ज़मीन बेचती महिलाएँ; उत्तराधिकार में ज़मींदारी
NCERT, पृष्ठ 206–207

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
खेत मेंमर्द जोतते और हल चलाते; महिलाएँ बुआई, निराई, कटाई, दाना निकालना206
घर और बाहर“घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा फ़र्क मुमकिन नहीं206
पूर्वाग्रहराजस्वला महिलाएँ हल या चाक नहीं छू सकती थीं (पश्चिमी भारत); पान के बगान (बंगाल)206
दस्तकारीसूत कातना, मिट्टी गूँधना, कढ़ाई; वाणिज्यीकरण से माँग बढ़ती206
बाहर कामनियोक्ताओं के घर, बाज़ार; फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण206–207
संसाधनबच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत; शादीशुदा महिलाओं की कमी207
रिवाज“दुलहन की कीमत”, दहेज नहीं; तलाकशुदा और विधवाएँ कानूनन शादी कर सकती थीं207
दरख़्वास्तेंपश्चिमी भारत; ज़्यादातर में महिला का नाम दर्ज नहीं207
हक़भूमिहर भद्रजनों में पुश्तैनी संपत्ति; पंजाब; ज़मींदारी उत्तराधिकार में207
राजशाहीअठारहवीं सदी की बड़ी ज़मींदारी, कर्ता-धर्ता एक स्त्री207

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में महिलाएँ सिर्फ़ घर का काम करती थीं।” ऐसा नहीं है। किताब के अनुसार वे खेत में बुआई, निराई और कटाई करती थीं, दस्तकारी करती थीं, और ज़रूरत पड़ने पर बाज़ारों और निर्माण-स्थलों पर भी काम करती थीं।
  • “महिलाओं को ज़मीन पर कोई हक़ नहीं था।” किताब के अनुसार भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था, और हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे वे बेचने या गिरवी रखने के लिए स्वतंत्र थीं।
  • “दुलहन की कीमत” और दहेज को उलटिए मत। किताब के अनुसार कई ग्रामीण संप्रदायों में दुलहन की कीमत अदा होती थी, दहेज नहीं।
  • यह हिस्सा किताब के शब्दों में। किसी बच्चे से उसके घर की महिलाओं या उसके परिवार की ज़मीन के बारे में मत पूछिए। पृष्ठ 207 का “चर्चा कीजिए” बॉक्स आज के प्रांत की बात पूछता है; उसकी जगह हमारी ओर से यह पूछिए: सोलहवीं–अठारहवीं सदी में ज़मीन पर महिलाओं के कौन-से हक़ थे, और पंचायत के दस्तावेज़ उन्हें कैसे दर्ज करते थे।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 3. कृषि समाज में महिलाएँ खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: पंजाब में महिलाएँ ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में किस रूप में सक्रिय थीं? (पुश्तैनी संपत्ति बेचने वाली के रूप में, विधवाएँ भी।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: शादीशुदा महिलाओं की कमी क्यों थी, और इसका शादी के रिवाजों पर क्या असर पड़ा? (कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी; इसलिए कई ग्रामीण संप्रदायों में दुलहन की कीमत अदा होती थी, दहेज नहीं, और तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ कानूनन शादी कर सकती थीं।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं। (2) कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा होती थी, दहेज नहीं; और तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क12, ग6 और ङ2; सब बच्चे अभ्यास के प्रश्न 3 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 70–81।

कालांश 6 — 4. जंगल और कबीले: 4.1 बसे हुए गाँवों के परे; 4.2 जंगलों में घुसपैठ

किताब — पृष्ठ 208–211 · स्लाइड — भाग 6 · इंटरैक्टिव — 4. जंगल और कबीले

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि उस समय की रचनाओं में “जंगली” शब्द का क्या अर्थ था, जंगल वासियों का गुज़ारा कैसे होता था, और सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में राज्य, खेती और व्यापार जंगलों तक कैसे पहुँचे।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और जंगलों में घुसपैठ, किताब के अनुसार वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने लिखा हो कि सब ग्रामीण संप्रदायों में दहेज चलता था, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: किताब के अनुसार कई ग्रामीण संप्रदायों में “दुलहन की कीमत” अदा होती थी, दहेज नहीं।

  2. 5–12 मिनट · बसे हुए गाँवों के परे। पृष्ठ 208 का भाग 4.1 पढ़िए और चित्र की पहली पंक्ति बनाइए। उत्तर और उत्तर–पश्चिमी भारत के गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़ दें तो ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे थे: झारखंड सहित पूरा पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (भारत–नेपाल सीमा की तराई सहित), दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट और दक्कन के पठार। उस समय के स्रोतों के आधार पर अंदाज़ा है कि अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों का औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी था। उस समय की रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए “जंगली” शब्द इस्तेमाल करती हैं, पर इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था; यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। फिर पूछिए: किताब भीलों के साल के बारे में क्या बताती है, और इससे जंगल के कबीलों की कौन-सी ख़ासियत पता चलती है? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — भीलों के काम मौसम के हिसाब से बदलते थे।

    • बसंत: जंगल के उत्पाद इकट्ठा करना।
    • गर्मियाँ: मछली पकड़ना।
    • मानसून: खेती।
    • शरद और जाड़ा: शिकार।

    यह सिलसिला लगातार गतिशीलता पर टिका था; एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना जंगल के कबीलों की ख़ासियत थी।

  3. 12–19 मिनट · राज्य की नज़र में जंगल। पृष्ठ 208–209 पढ़िए। राज्य के लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था, बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास)। बाबर के अनुसार जंगल एक ऐसा रक्षाकवच था “जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।” (परगना मुग़ल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल था।) राज्य को सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश (मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट) में अक्सर हाथी भी होते थे। मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान ग़रीबों और अमीरों सहित सबके साथ राज्य के गहरे सरोकार का एक लक्षण था। अब बच्चों की किताब में पृष्ठ 208 का चित्र 8.9 (बादशाहनामा से, नीलगाय का शिकार करता शाहजहाँ) दिखाइए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?” नमूना उत्तर — चित्र में शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है।

    • दृश्य: पहाड़ी, जंगली इलाके में बादशाह (शाहजहाँ) बंदूक से नीलगाय का शिकार कर रहा है; उसके सिर के पीछे रोशनी का घेरा (प्रभामंडल) है; दाईं ओर दरबारी खड़े हैं।
    • शिकार और न्याय: दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था।
    • सांकेतिक तत्व: किताब बताती है कि ऐसे चित्रों में चित्रकार अक्सर एक छोटा-सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था।

    जो बच्चा चित्र में दिखती चीज़ें ठीक-ठीक बता दे और शिकार को न्याय से किताब के तर्क से जोड़ दे, उसका उत्तर पूरा है।

  4. 19–27 मिनट · स्रोत 3: जंगल साफ़ करके बस्ती। पहले कहानी बताइए, फिर पृष्ठ 209 का स्रोत 3 ज़ोर से पढ़वाइए। सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल का नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है। ख़बर मिलते ही तमाम जगहों से परदेसी आने लगे, और कालकेतु ने उन्हें चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे ख़रीदकर बाँटे। कविता के अनुसार उत्तर से “दास / सैकड़ों उमड़ते हुए” आए, दक्खिन से फ़सल कटाई वाले “एक उद्यमी के साथ पाँच सौ”, और पश्चिम से ज़फ़र मियाँ “साथ में बाईस हज़ार लोग”। जंगल हटाकर उन्होंने बाज़ार बसाए, और कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेर दहाड़ते हुए भाग निकले। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें “बिदेसी” बताया गया है?” नमूना उत्तर — कविता जंगल को खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होते दिखाती है।

    • घुसपैठ के रूप: हर दिशा से परदेसियों का आना; चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे बाँटना; जंगल काटकर बाज़ार बसाना; कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेरों का भाग जाना।
    • चित्र से तुलना: चित्र 8.9 में राज्य बादशाह के शिकार के रूप में जंगल में आता है, और उसे अच्छे शासन की तरह दिखाया गया है; कविता में जंगल खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होता है। दोनों में बाहरी ताक़त जंगल तक पहुँचती है।
    • “बिदेसी”: कविता में बाज़ार बसने के बाद “सैकड़ों सैकड़ों की तादाद में” आए बाहर के लोग, जो “जंगलों को (जैसे) खा लिए, और घुस आए वहाँ”; ऊपर कविता सब आने वालों को “परदेसी” कहती है। बच्चा कविता की पंक्तियों से जुड़ी दूसरी व्याख्या दे, तो वह भी ठीक है।

    कविता की संख्याएँ कवि के शब्द हैं; बच्चे उन्हें कविता की पंक्तियों की तरह लिखें, गिनती की तरह नहीं।

  5. 27–36 मिनट · व्यापार, सरदार और नए असर। पृष्ठ 210–211 पढ़िए। स्रोत 4 में अबुल फ़ज़्ल लगभग 1595 के अवध सूबे (आज के उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के मैदानों और पहाड़ी कबीलों के लेन–देन का ब्योरा देता है। पहाड़ों से सोना, ताँबा, कस्तूरी, शहद, अदरख, मोम, ऊनी कपड़े और लकड़ी के सामान जैसी चीज़ें इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर आती थीं; बदले में सफ़ेद और रंगीन कपड़े, कहरुबा (जिससे गहने बनते थे), नमक, हींग, गहने, और शीशे और मिट्टी के बरतन पहाड़ों को जाते थे। किनारे का प्रश्न पूछिए: “इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।” नमूना उत्तर — सामान जानवरों और इंसानों की पीठ पर चलता था।

    • परिवहन: इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर सामान लादकर।
    • क्यों: पहाड़ के संकरे और ऊबड़–खाबड़ रास्तों पर गाड़ियाँ नहीं चल पाती होंगी, जबकि आदमी, मोटे–मोटे घोड़े और बकरे बोझ लेकर चढ़ सकते हैं।
    • मैदानों से पहाड़ तक: कपड़े पहनने के लिए; कहरुबा (किताब के अनुसार, जिससे गहने बनते थे) और गहने सजने के लिए; नमक और हींग खाने के लिए; शीशे और मिट्टी के बरतन घर के काम के लिए।

    फिर बताइए: शहद, मधुमोम और लाक जैसे जंगल के उत्पादों की बहुत माँग थी, और लाक जैसी कुछ वस्तुएँ तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं; हाथी पकड़े और बेचे जाते थे। पंजाब का लोहानी कबीला भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच के ज़मीनी व्यापार में लगा था। कबीलों के कई सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी: सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे, और असम में अहोम राजाओं के अपने पायक थे। सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध किए और उन पर कब्ज़ा जमा लिया। कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे–धीरे इस्लाम अपनाया, उसमें सूफ़ी संतों (पीर) की बड़ी भूमिका थी।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) उस समय की रचनाओं में “जंगली” शब्द किन लोगों के लिए इस्तेमाल होता था? (2) जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अक्सर हाथी क्यों होते थे?

जंगलों में घुसपैठ, किताब के अनुसार (चरण 2 से 5)

जंगलों में घुसपैठ, किताब के अनुसार

जंगलअखिल भारतीय औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदीगुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से
राज्यहाथी और *पेशकश*शिकार अभियान
खेतीजंगल साफ़ करके बस्तीस्रोत 3, *चंडीमंगल*
व्यापारशहद, मधुमोम, लाकहाथी पकड़े और बेचे जाते थे
सरदारज़मींदार, कुछ राजाअहोम राजाओं के *पायक*; कोच राजा
नए सांस्कृतिक असरसूफ़ी संत (पीर)कुछ इतिहासकारों का सुझाव
NCERT, पृष्ठ 208–211

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
कितना जंगलअखिल भारतीय औसत करीब–करीब 40 फ़ीसदी (उस समय के स्रोतों के आधार पर अंदाज़ा)208
“जंगली”सभ्यता का न होना नहीं; जंगल के उत्पाद, शिकार और स्थानांतरीय खेती से गुज़ारा208
भीलों का सालबसंत: जंगल के उत्पाद; गर्मियाँ: मछली; मानसून: खेती; शरद और जाड़ा: शिकार208
मवासराज्य की नज़र में बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा208
पेशकशमुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट; अक्सर हाथी भी208
शिकार अभियानदरबारी इतिहासकारों के अनुसार बादशाह का दौरा और शिकायतों पर ध्यान209
स्रोत 3चंडीमंगल (मुकुंदराम चक्रवर्ती): कालकेतु जंगल खाली करवाकर साम्राज्य बसाता है209
स्रोत 4लगभग 1595, अवध सूबा: पहाड़ी कबीलों और मैदानों का लेन–देन210
लाकलाक जैसी कुछ वस्तुएँ सत्रहवीं सदी में समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं210
सरदारकई ज़मींदार बने, कुछ राजा; सिंध: 6000 घुड़सवार, 7000 पैदल; अहोम: पायक210
कोच और पीरकोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों पर कब्ज़ा जमाया; सूफ़ी संतों (पीर) की भूमिका211

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “जंगली” का मतलब असभ्य नहीं। किताब साफ़ कहती है कि उस समय इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था; यह शब्द उनके लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। कक्षा में यह शब्द इसी अर्थ में, और किताब के हवाले से ही आए।
  • “जंगल के लोग बाहर की दुनिया से कटे हुए थे।” किताब उलटी तसवीर देती है: पेशकश और शिकार अभियान, जंगल साफ़ करके बसी बस्तियाँ, शहद, मधुमोम और लाक का व्यापार, और ज़मीनी व्यापार में लोहानी जैसे कबीले।
  • स्रोत 3 की संख्याएँ कविता की हैं। “दास / सैकड़ों उमड़ते हुए”, “एक उद्यमी के साथ पाँच सौ” और “साथ में बाईस हज़ार लोग” कवि के शब्द हैं; इन्हें आबादी के आँकड़ों की तरह मत लिखवाइए।
  • पीर वाली बात “कुछ इतिहासकारों का सुझाव” है। उत्तर में यह शर्त बनी रहे।
  • यह हिस्सा किताब के समय तक। पृष्ठ 211 का “चर्चा कीजिए” बॉक्स आज के जंगल वाले इलाकों के बारे में पूछता है; कक्षा में बात किताब की तसवीर तक रखिए: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी किन वजहों से बदली।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 4. जंगल और कबीले खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: अहोम राजाओं के पायक कौन थे? (वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली पाँच पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: किताब कहती है कि कबीलाई व्यवस्था से राजतांत्रिक प्रणाली की ओर संक्रमण बहुत पहले शुरू हो चुका था, पर ऐसा लगता है कि सोलहवीं सदी में आकर ही यह प्रक्रिया पूरी तरह विकसित हुई। पृष्ठ 210–211 से इसके उदाहरण दीजिए। (कई सरदार ज़मींदार बने, कुछ राजा भी, और सेना के लिए उन्होंने अपने खानदान के लोगों को भर्ती किया या भाई–बंधुओं से सैन्य सेवा माँगी; अहोम राजाओं के अपने पायक थे और उन्होंने जंगली हाथी पकड़ने पर अपना एकाधिकार घोषित कर रखा था; कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध करके उन पर कब्ज़ा जमा लिया।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) उन लोगों के लिए जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब सभ्यता का न होना नहीं था। (2) राज्य को सेना के लिए हाथी चाहिए थे।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क13, क14, ख9, ग5, घ3, घ4, च3 और छ2; सब बच्चे अभ्यास के प्रश्न 7 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 82–98।

कालांश 7 — 5. ज़मींदार

किताब — पृष्ठ 211–213 · स्लाइड — भाग 7 · इंटरैक्टिव — 5. ज़मींदार

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि ज़मींदार कौन थे, उनकी ताक़त किन चीज़ों से आती थी, ज़मींदारी कैसे बनी और पक्की हुई, और किसानों से उनके रिश्ते के बारे में किताब कौन-से दो सबूत देती है।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और ज़मींदार की ताक़त कहाँ से आती थी वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने “जंगली” का मतलब असभ्य लिखा हो, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: किताब के अनुसार यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था।

  2. 5–12 मिनट · ज़मींदार कौन थे। पृष्ठ 211 का भाग 5 पढ़िए और चित्र की पहली पंक्ति भरवाइए। ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। उनकी ऊँची हैसियत के दो कारण थे: एक, जाति; दूसरा, वे राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे। उनकी समृद्धि की वजह उनकी विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी, जिसे मिल्कियत (यानी संपत्ति) कहते थे। इस पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूरों से, और ज़मींदार इसे अपनी मर्ज़ी से बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे।

  3. 12–19 मिनट · कर वसूली और सैनिक ताक़त। पृष्ठ 211–212 पढ़िए। ज़मींदार अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और बदले में उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था। ज़्यादातर ज़मींदारों के अपने किले और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ थीं, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे। अब पृष्ठ 212 का बॉक्स “एक समांतर सैनिक बल!” पढ़वाइए और उसके आँकड़े बोर्ड पर लिखिए: 384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1,863 हाथी; 4,260 तोप; और 4,500 नाव। फिर पूछिए: ये आँकड़े किस ग्रंथ से हैं, और इनसे ज़मींदारों के बारे में क्या पता चलता है? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — ये आँकड़े आइन के हैं, और मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति बताते हैं।

    • कितनी बड़ी ताक़त: घुड़सवार, पैदल, हाथी, तोप और नाव, सब लाखों और हज़ारों में।
    • किताब की बात से मेल: पृष्ठ 211 कहता है कि सैनिक संसाधन ज़मींदारों की ताक़त का एक और ज़रिया था, और ज़्यादातर ज़मींदारों के अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।

    ज़मींदार की ताक़त ज़मीन से भी आती थी और हथियारों से भी।

  4. 19–27 मिनट · पिरामिड का शीर्ष, और ज़मींदारी कैसे बनी। पृष्ठ 211–212 पढ़िए। मुग़ल गाँवों के सामाजिक संबंधों को पिरामिड मानें तो ज़मींदार उसके संकरे शीर्ष पर थे। अबुल फ़ज़्ल इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ग्रामीण समाज पर ठोस नियंत्रण था; पर ज़मींदारों में तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और कई मुसलमान ज़मींदार भी थे। उस समय के दस्तावेज़ों से लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का एक संभावित स्रोत रही होगी, पर इसकी संभावना कम है कि राज्य किसी ज़मींदार को ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त देता, जब तक एक राज्यादेश (सनद) से इसकी पुष्टि पहले न हो चुकी हो। किताब के अनुसार इससे भी महत्त्वपूर्ण थी ज़मींदारी पक्की करने की धीमी प्रक्रिया। राजपूतों और जाटों ने उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी–बड़ी पट्टियों पर नियंत्रण पक्का किया, और मध्य और दक्षिण–पश्चिम बंगाल में किसान–पशुचारियों (जैसे सदगोप) ने ताकतवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं। फिर पूछिए: किताब के अनुसार अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार कैसे बन सकते थे? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — ज़मींदारी पक्की करने की धीमी प्रक्रिया के तरीक़ों से।

    • नयी ज़मीनें बसाकर: जंगल–बारी।
    • अधिकारों के हस्तांतरण से, या राज्य के आदेश से।
    • ख़रीदकर: उस काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी और बेची जाती थी।

    इन्हीं प्रक्रियाओं से वे ज़मींदारों के दर्जे में दाखिल हो सकते थे।

  5. 27–36 मिनट · गाँव में भूमिका, और किसानों से रिश्ता। पृष्ठ 212–213 पढ़िए और चित्र का आख़िरी खाना भरवाइए। ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को खेती का साजो–सामान और उधार देकर उन्हें बसने में मदद की। ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई; ज़मींदार अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते थे, और अक्सर हाट लगवाते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे। किताब कहती है कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, पर किसानों से उनके रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” था, और इसके दो सबूत देती है: भक्ति संतों ने जातिगत और दूसरे अत्याचारों की बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया, उनके गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था; और सत्रहवीं सदी के कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला। फिर पृष्ठ 213 का “चर्चा कीजिए” बॉक्स पढ़िए: “आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।” किताब कारण गिनाकर नहीं देती; बच्चे पृष्ठ 211–213 की बातों से कारण ख़ुद निकालें। हमारी ओर से — पृष्ठ 211–213 से ये कारण समझ में आते हैं:

    • बिना खेती की कमाई: ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; उनकी मिल्कियत पर अक्सर दिहाड़ी या पराधीन मज़दूर काम करते थे।
    • शोषण: किताब कहती है कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था।
    • राज्य और किसान के बीच: वे राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे।
    • अपनी ताक़त: उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।
    • जाति का विशेषाधिकार: उनकी ऊँची हैसियत का एक कारण उनकी जाति थी।

    साथ में यह भी याद रखिए कि किताब उनके रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी बताती है।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) मिल्कियत क्या थी, और ज़मींदार उसके साथ क्या कर सकते थे? (2) किताब किन दो सबूतों से कहती है कि किसानों से ज़मींदारों के रिश्तों में संरक्षण का पुट था?

ज़मींदार की ताक़त कहाँ से आती थी (चरण 2 और 3)

ज़मींदार की ताक़त कहाँ से आती थी

जातिऊँची हैसियत का एक कारण
ख़िदमतराज्य को ख़ास किस्म की सेवाएँ
*मिल्कियत*विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीनबेचना, किसी और के नाम करना, गिरवी रखना
कर वसूलीराज्य की ओर सेबदले में वित्तीय मुआवज़ा
किले और सैनिक टुकड़ियाँ*आइन* के आँकड़े384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1,863 हाथी; 4,260 तोप; 4,500 नाव
NCERT, पृष्ठ 211–212

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
ज़मींदार कौनकमाई खेती से, पर कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं211
हैसियतजाति; राज्य को सेवाएँ (ख़िदमत)211
मिल्कियतविस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन; दिहाड़ी या पराधीन मज़दूर; बेचना, नाम करना, गिरवी रखना211
कर वसूलीराज्य की ओर से; बदले में वित्तीय मुआवज़ा211
सैनिक ताक़तअपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ211
“एक समांतर सैनिक बल!”384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1,863 हाथी; 4,260 तोप; 4,500 नाव212
पिरामिडसंकरे शीर्ष पर ज़मींदार; ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन; मध्यम जातियाँ और मुसलमान ज़मींदार भी211–212
कैसे बनीजंग में जीत (सनद के बिना संभावना कम); धीमी प्रक्रिया: जंगल–बारी, हस्तांतरण, राज्य का आदेश, ख़रीद212
बड़ी ज़मींदारियाँराजपूत और जाट (उत्तर भारत); सदगोप (बंगाल)212
गाँव में भूमिकाज़मीनें बसाना, साजो–सामान और उधार; मौद्रीकरण; हाट212
दो सबूतभक्ति संतों का निशाना राजस्व अधिकारी; कृषि विद्रोहों में ज़मींदारों को किसानों का समर्थन212–213

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “ज़मींदार ख़ुद हल चलाते थे।” नहीं। उनकी कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; मिल्कियत पर अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूर काम करते थे।
  • “सब ज़मींदार ऊँची जाति के थे।” किताब के अनुसार ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ठोस नियंत्रण था, पर तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, कई मुसलमान ज़मींदार थे, और अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।
  • “भक्ति संतों ने ज़मींदारों को शोषक बताया।” उलटा। उन्होंने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनका निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था।
  • यह हिस्सा किताब के शब्दों में। किसी बच्चे की जाति या उसके परिवार की ज़मीन से इसे मत जोड़िए। पृष्ठ 213 के “चर्चा कीजिए” का उत्तर पृष्ठ 211–213 की बातों से बनवाइए; किताब के बाहर का इतिहास मत जोड़िए।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 5. ज़मींदार खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: ज़मींदार गाँव के बाज़ार से कैसे जुड़े थे? (वे अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते थे, और अक्सर हाट लगवाते थे जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली पाँच पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: किताब जंग में जीत को ज़मींदारों की उत्पत्ति का एक संभावित स्रोत मानती है, फिर भी धीमी प्रक्रिया को “इससे भी महत्त्वपूर्ण” कहती है। आपके विचार से क्यों? (किताब इसकी वजह नहीं लिखती; बच्चे किताब की इन बातों से तर्क करें: इसकी संभावना कम थी कि राज्य सनद से पुष्टि के बिना किसी ज़मींदार को ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त देता; धीमी प्रक्रिया के दस्तावेज़ स्रोतों में हैं, और उसके कई तरीक़े थे: नयी ज़मीनें बसाना, अधिकारों का हस्तांतरण, राज्य का आदेश और ख़रीद; और इन्हीं प्रक्रियाओं से अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदारों के दर्जे में दाख़िल हुए।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) मिल्कियत ज़मींदार की विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी, जिस पर उसके निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी; ज़मींदार इसे अपनी मर्ज़ी से बेच सकता था, किसी और के नाम कर सकता था या गिरवी रख सकता था। (2) भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया, उनका निशाना राजस्व अधिकारी था; और सत्रहवीं सदी के कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क15, घ5 और च4; सब बच्चे अभ्यास के प्रश्न 8 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 99–111।

कालांश 8 — 6. भू–राजस्व प्रणाली; मानचित्र 1 और मनसबदारी व्यवस्था

किताब — पृष्ठ 213–215 · स्लाइड — भाग 8 · इंटरैक्टिव — 6. भू–राजस्व प्रणाली

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी जमा और हासिल का फ़र्क बता सके, अकबर के ज़मीन-वर्गीकरण और शाही शुल्क का तरीक़ा समझा सके, फ़सल में वसूली के चार तरीक़े गिना सके, और बता सके कि साम्राज्य के फैलाव और मनसबदारी का राजस्व से क्या रिश्ता था।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, भारत का मानचित्र या एटलस, और कर तय होने से वसूली तक वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने लिखा हो कि ज़मींदार ख़ुद खेती करते थे, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: उनकी कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे।

  2. 5–12 मिनट · राजस्व: साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद। पृष्ठ 213 का भाग 6 पढ़िए और चित्र की पहली दो पंक्तियाँ बनाइए। ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था, इसलिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, ताकि कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रहे और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के सभी इलाकों में राजस्व का आकलन और वसूली हो सके। इस तंत्र में दीवान शामिल था, जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी। कर का बोझ तय करने से पहले राज्य ने ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में ख़ास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की। भू–राजस्व के इंतज़ाम के दो चरण थे: कर निर्धारण और वास्तविक वसूली; जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। अमील–गुज़ार (राजस्व वसूली करने वाले) के लिए अकबर का हुक्म था कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें, पर फ़सल में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे। हर प्रांत में जुती हुई और जोतने लायक, दोनों तरह की ज़मीन की नपाई हुई, और 1665 ई. में औरंगज़ेब ने निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए; फिर भी जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई। पृष्ठ 214 की किनारे की टिप्पणी के अनुसार अमीन एक मुलाज़िम था, जिसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो रहा है।

  3. 12–19 मिनट · ज़मीन के चार वर्ग (स्रोत 5)। पृष्ठ 214 का स्रोत 5 पढ़वाइए। आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?” नमूना उत्तर — आइन के अनुसार ज़मीन इस आधार पर बँटी थी कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है, और हर वर्ग का राजस्व अलग था।

    • पोलज: हर साल खेती, कभी ख़ाली नहीं छोड़ी जाती।
    • परौती: कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके।
    • चचर: तीन या चार वर्षों तक ख़ाली।
    • बंजर: पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं हुई।
    • राजस्व: पहले दो वर्गों की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब। तीनों का उत्पाद जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और उसका एक–तिहाई शाही शुल्क।

    एक–तिहाई वाला नियम किताब पोलज और परौती के लिए बताती है; बच्चे इसे चारों वर्गों पर न लगाएँ।

  4. 19–27 मिनट · फ़सल में वसूली (स्रोत 6)। पृष्ठ 215 का स्रोत 6 पढ़वाइए और चित्र की तीसरी पंक्ति भरवाइए। आइन के इस अनुच्छेद के अनुसार अमील–गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले, फ़सल लेने के लिए भी तैयार रहे। फ़सल में वसूली के चार तरीक़े हैं: कणकुत (कण यानी अनाज, कुत यानी अंदाज़ा; शक हो तो फ़सल अच्छे, मध्यम और बदतर, तीन पुलिंदों में काटी जाए); बटाई या भाओली (फ़सल काटकर जमा की जाती, फिर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा); खेत बटाई (बीज बोने के बाद खेत बाँट लिए जाते); और लाँग बटाई (फ़सल काटने के बाद उसका ढेर बनाकर बाँट लिया जाता, और हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता)। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?” नमूना उत्तर — हर तरीक़े का किसान पर असर अलग रहा होगा।

    • नक़द: किसान को फ़सल बेचकर पैसा जुटाना पड़ता होगा, इसलिए बाज़ार के भाव का असर उस पर पड़ता होगा।
    • कणकुत: फ़सल का अंदाज़ा लगाया जाता; ग़लत अंदाज़े से किसान को नुक़सान भी हो सकता था।
    • बटाई या भाओली: सबके सामने और रज़ामंदी से बँटवारा होता; पर इसमें कई समझदार निरीक्षक चाहिए थे, वरना धोखेबाज़ी का डर था।
    • खेत बटाई: बुआई के बाद खेत ही बाँट लिए जाते, तो फ़सल अच्छी हो या ख़राब, दोनों का जोखिम बँट जाता होगा।
    • लाँग बटाई: कटाई के बाद ढेर बाँटकर हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता।

    यह प्रश्न “क्या फ़र्क पड़ता होगा” पूछता है, इसलिए हर तर्क ठीक है, अगर वह तरीक़े के किताब में दिए ब्योरे से निकले।

  5. 27–36 मिनट · औरंगज़ेब का हुक्म, फैलता साम्राज्य और मनसबदार। पृष्ठ 215 का स्रोत 7 पढ़वाइए: 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व अधिकारी को हुक्म दिया कि वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें कि हर गाँव और हर किसान (आसामीवार) के बारे में खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) पता करें, और बारीकी से जाँच के बाद सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) और किसानों के कल्याण, दोनों को ध्यान में रखकर जमा तय करें। फिर बच्चों की किताब में पृष्ठ 214 का मानचित्र 1 (मुग़ल साम्राज्य का विस्तार) खुलवाइए और एटलस से मिलाइए: साम्राज्य तीन चरणों में बढ़ा, 1530 में बाबर के शासन तक, 1605 में अकबर के शासन तक और 1707 में औरंगज़ेब के शासन तक। मनसबदार का मतलब यहीं समझा दीजिए: मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर एक सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी; कुछ मनसबदारों को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये भुगतान किया जाता था, और समय–समय पर उनका तबादला होता था। फिर पृष्ठ 214 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?” नमूना उत्तर — साम्राज्य जितना फैला, राजस्व का तंत्र भी उतना बढ़ा।

    • बड़ा प्रशासनिक तंत्र: तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में राजस्व आकलन और वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, जिसमें दीवान का दफ़्तर शामिल था।
    • नए लोग, नयी ताक़त: हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में आए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताक़त बने।
    • आँकड़े और जाँच: ज़मीन और खेती की जानकारी जुटाई गई; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव, हर किसान की जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
    • मनसबदारों का भुगतान: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।

    जो बच्चा फैलाव को तंत्र, आँकड़ों और मनसबदारों के भुगतान, तीनों से जोड़ दे, उसका उत्तर पूरा है।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) जमा और हासिल में क्या अंतर था? (2) ज़्यादातर मनसबदारों को भुगतान कैसे होता था?

कर तय होने से वसूली तक (चरण 2 से 5)

कर तय होने से वसूली तक

पहले जानकारीनपाईजुती हुई और जोतने लायक ज़मीन; 1665 ई. में औरंगज़ेब का निर्देश: हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब
*जमा*निर्धारित रक़मराज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था
*हासिल*सचमुच वसूली गई रक़मनक़द, या फ़सल में: *कणकुत*, बटाई, खेत बटाई, लाँग बटाई
नतीजासाम्राज्य की आर्थिक बुनियादज़्यादातर मनसबदारों को राजस्व के आबंटन से भुगतान
NCERT, पृष्ठ 213–215

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
बुनियादज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद213
दीवानउसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख213
दो चरणकर निर्धारण (जमा: निर्धारित रक़म) और वास्तविक वसूली (हासिल: सचमुच वसूली गई रक़म)213
अमील–गुज़ारअकबर का हुक्म: नक़द भुगतान की कोशिश, फ़सल का विकल्प भी खुला213
नपाईजुती हुई और जोतने लायक ज़मीन; 1665 ई.: हर गाँव में खेतिहरों का सालाना हिसाब; जंगल वाले हिस्सों की नपाई नहीं213
अमीनप्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन पक्का करने वाला मुलाज़िम214
चार वर्ग (स्रोत 5)पोलज, परौती, चचर, बंजर; पहले दो की तीन किस्में214
शाही शुल्कतीनों किस्मों के उत्पाद का तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद; उसका एक–तिहाई शाही शुल्क214
फ़सल में वसूली (स्रोत 6)कणकुत; बटाई या भाओली; खेत बटाई; लाँग बटाई215
स्रोत 71665 ई., औरंगज़ेब: आसामीवार जाँच, मौजूदात; किफ़ायत और किसानों का कल्याण215
मानचित्र 1साम्राज्य का फैलाव: 1530 बाबर, 1605 अकबर, 1707 औरंगज़ेब214
मनसबदारसैनिक–नौकरशाही तंत्र; कुछ को नक़द, ज़्यादातर को राजस्व का आबंटन; समय–समय पर तबादला214

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • जमा और हासिल एक नहीं। जमा निर्धारित रक़म थी, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, पर स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी इतनी वसूली सचमुच संभव नहीं हो पाती थी।
  • “मुग़ल सिर्फ़ नक़द कर लेते थे।” अकबर के हुक्म में फ़सल का विकल्प भी खुला था, और स्रोत 6 कहता है कि अमील–गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले।
  • “हर इलाके की नपाई हुई।” किताब के अनुसार उपमहाद्वीप के जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई।
  • “सब मनसबदारों को नक़द वेतन मिलता था।” कुछ को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को राजस्व के आबंटन के ज़रिये।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. भू–राजस्व प्रणाली खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पृष्ठ 215 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?” (हर गाँव की ज़मीन और फ़सल अलग थी, इसलिए बारीक जाँच के बिना जमा ठीक से तय नहीं हो सकता था; हुक्म कहता है कि जमा सरकार के वित्तीय हितों और किसानों के कल्याण, दोनों को ध्यान में रखकर तय हो; और ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली तीन पंक्तियाँ और चार वर्ग वाली पंक्ति काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पृष्ठ 215 का “चर्चा कीजिए” पूछिए: “क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?” (यह राय का सवाल है; किताब के तथ्यों से तर्क देने वाला कोई भी उत्तर ठीक है। एक नमूना: काफ़ी हद तक हाँ: ज़मीन के चार वर्ग और तीन किस्में, हर एक का अलग राजस्व; नक़द या फ़सल, और फ़सल में कई तरीक़े; जमा और हासिल अलग दर्ज; औरंगज़ेब के हुक्म में किफ़ायत और किसानों का कल्याण, दोनों। पर सीमा भी थी: राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, और पोलज और परौती पर शाही शुल्क मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई तय था।)

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। (2) कुछ मनसबदारों को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क16, क17, क18, ख10, घ6, ङ4 और छ3; सब बच्चे अभ्यास के प्रश्न 5 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 112–127।

कालांश 9 — 7. चाँदी का बहाव

किताब — पृष्ठ 215–217 · स्लाइड — भाग 9 · इंटरैक्टिव — 7. चाँदी का बहाव

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में भारत में चाँदी क्यों और किन रास्तों से आई, इससे मुद्रा और कर वसूली में क्या बदला, और नकद का लेन–देन गाँव तक कैसे पहुँचा।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, दुनिया का नक्शा या एटलस, और चाँदी आई, तो क्या बदला वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने जमा और हासिल को एक ही लिख दिया हो, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म।

  2. 5–12 मिनट · बड़े साम्राज्य और व्यापार। पृष्ठ 215 पढ़िए। मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में था जो सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे; बाकी थे मिंग (चीन में), सफ़ावी (ईरान में) और ऑटोमन (तुर्की में)। एटलस पर ये चारों इलाके दिखाइए। फिर पूछिए: किताब के अनुसार इस दौर में व्यापार किन दो तरह से फैला, और भारत पर इसका क्या असर हुआ? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — ज़मीन पर भी और समुद्र पार भी; समुद्र-पार व्यापार में भारत का हिस्सा ख़ास तौर पर बढ़ा।

    • ज़मीनी व्यापार: इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की।
    • समुद्री व्यापार: खोजी यात्राओं और “नयी दुनिया” के खुलने से यूरोप के साथ एशिया, ख़ासकर भारत, के व्यापार में भारी विस्तार हुआ; भारत के समुद्र-पार व्यापार में भौगोलिक विविधता आई और कई नयी वस्तुओं का व्यापार शुरू हुआ।

    दोनों रास्तों का नतीजा अगले चरण में है: भारत की वस्तुओं के बदले चाँदी।

  3. 12–19 मिनट · चाँदी भारत में क्यों आई। पृष्ठ 216 पढ़िए और नीचे का चित्र बनाइए। भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। बच्चों की किताब में पृष्ठ 215 का चित्र 8.11 (अकबर द्वारा जारी किए गए चाँदी के रुपये) दिखाइए। फिर पूछिए: किताब चाँदी के इस बहाव को भारत के लिए अच्छा क्यों मानती है, और इसके क्या नतीजे हुए? यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, इसलिए बाहर से आई चाँदी यहाँ के लिए अच्छी थी।

    • स्थिर मुद्रा: सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही।
    • मुद्रा का चलन: अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ।
    • कर वसूली: मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।

    जो बच्चा “प्राकृतिक संसाधन नहीं थे” वाली बात और तीनों नतीजे लिख दे, उसका उत्तर पूरा है।

  4. 19–27 मिनट · कारेरी की गवाही (स्रोत 8)। पहले बताइए: इटली का मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा, और उसने सजीव चित्र खींचा कि चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत कैसे पहुँचती थी। पृष्ठ 217 का उसका लेख (बर्नियर के लेख पर आधारित) जोड़ियों में पढ़वाइए। उसके अनुसार “दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।” फिर पूछिए: कारेरी के अनुसार सोना–चाँदी किन रास्तों से हिंदुस्तान पहुँचता था? एटलस पर रास्ते उँगली से दिखवाइए। यह सवाल हमारी ओर से है। नमूना उत्तर — कारेरी कई रास्ते बताता है।

    • अमेरिका से यूरोप होकर: सोने–चाँदी का बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिका से यूरोप के कई राज्यों से होते हुए आता; थोड़ा तुर्की जाता, कई वस्तुओं के लिए, और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस, रेशम के लिए।
    • मोचा और बसरा: तुर्की के लोग ओमान और अरबिया से आने वाली कॉफ़ी के बिना नहीं रह सकते थे, और फ़ारस, अरबिया और तुर्की के लोग भारत की वस्तुओं के बिना; इसलिए वे मुद्रा की विशाल मात्रा लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा भेजते, जहाँ से वह जहाज़ों से हिंदुस्तान पहुँचती।
    • दूसरे जहाज़: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव के टापू, मोज़ाम्बीक़ और दूसरी जगहों पर ले जाते, और वहाँ से सोना–चाँदी लाकर हिंदुस्तान पहुँचाते।
    • जापान: डच लोग जापान की खानों से जो कुछ पाते थे, वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।

    कारेरी के अनुसार यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं, और नकद भारत में ही रह जाता था।

  5. 27–36 मिनट · नकद गाँव तक। अब अभ्यास का प्रश्न 4 बोर्ड पर लिखिए: “विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।” उत्तर की रूपरेखा बच्चों से बुलवाइए; हर बिंदु पिछले किसी कालांश से आएगा, बोर्ड-कार्य की तालिका उसमें मदद करेगी। नमूना उत्तर — सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में नकद का लेन–देन दरबार से गाँव तक फैल चुका था।

    • चाँदी का बहाव: निर्यात के बदले चाँदी भारत आई; चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
    • कारेरी की गवाही: लगभग 1690 ई. में यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं, और नकद भारत में ही रह जाता था।
    • राजस्व में नकद: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह खेतिहरों से नक़द भुगतान की कोशिश करे (कालांश 8)।
    • गाँव में नकद: फ़्रांसीसी यात्री तैवर्नियर के अनुसार वे गाँव बहुत छोटे माने जाते जिनमें सराफ़ न हों (कालांश 4)।
    • ज़मींदार: ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ, और ज़मींदार हाट लगवाते थे (कालांश 7)।

    पूरा उत्तर बच्चे घर पर लिखेंगे।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में भारत में भारी मात्रा में चाँदी क्यों आई? (2) जोवान्नी कारेरी कौन था, और उसके अनुसार यूरोप जाने वाली वस्तुएँ किस तरह ख़रीदी जाती थीं?

चाँदी आई, तो क्या बदला (चरण 3)

चाँदी आई, तो क्या बदला

कारणनिर्यात के बदले चाँदीभारत की वस्तुओं का भुगतान चाँदी में; यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, इसलिए यह भारत के लिए अच्छा था
मुद्राचाँदी के रुपयेउपलब्धि में अच्छी स्थिरता
चलनमुद्रा संचारसिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार
राज्यकर वसूलीनकदी में कर उगाहने में आसानी
NCERT, पृष्ठ 216

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
एशिया के बड़े साम्राज्यमुग़ल, मिंग (चीन), सफ़ावी (ईरान), ऑटोमन (तुर्की)215
ज़मीनी व्यापारराजनीतिक स्थिरता से चीन से भूमध्य सागर तक व्यापार का जाल215
समुद्री व्यापारखोजी यात्राएँ और “नयी दुनिया”; यूरोप के साथ व्यापार में भारी विस्तार215
चाँदी क्यों आईभारत के निर्यात का भुगतान; यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे216
नतीजेचाँदी के रुपयों की स्थिर उपलब्धि; मुद्रा संचार और ढलाई; नकदी में कर216
जोवान्नी कारेरीइटली का मुसाफ़िर, लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा216
स्रोत 8अमेरिका, यूरोप, तुर्की और फ़ारस, मोचा और बसरा से होकर हिंदुस्तान; नकद यहीं रह जाता217

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “चाँदी भारत की अपनी खानों से निकलती थी।” नहीं। किताब कहती है कि भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; चाँदी निर्यात के भुगतान के रूप में बाहर से आई।
  • “कारेरी ने ख़ुद हर रास्ता देखा था।” किताब बताती है कि उसका यह लेख बर्नियर के लेख पर आधारित है; उत्तर में “कारेरी के अनुसार” लिखिए।
  • स्रोत 8 में “इंदोस्तान” किताब की छपी हुई वर्तनी है। बच्चे अपने उत्तर में हिंदुस्तान लिखें।
  • यह हिस्सा किताब के समय तक। पृष्ठ 216 का “चर्चा कीजिए” बॉक्स आज के राज्य के करों से तुलना माँगता है; कक्षा में बात मुग़ल पक्ष तक रखिए: राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था, और कर नकदी में उगाहना आसान हुआ।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. चाँदी का बहाव खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: कारेरी के अनुसार डच लोग जापान की खानों से मिला सोना–चाँदी कहाँ ले जाते थे? (वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।)
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली पाँच पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: किताब के अनुसार कारेरी के ब्योरे से सत्रहवीं सदी के भारत के बारे में और क्या पता चलता है? (कि उस समय भारत में नकद और वस्तुओं का बहुत बड़ी मात्रा में आदान–प्रदान हो रहा था।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए (यह भारत के लिए अच्छा था, क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे)। (2) इटली का मुसाफ़िर, जो लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा; उसके अनुसार यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं, और नकद भारत में ही रह जाता था।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क19, ग7 और छ4; सब बच्चे अभ्यास के प्रश्न 4 का उत्तर कॉपी में लिखें।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 128–133।

कालांश 10 — 8. अबुल फ़ज़्ल कीआइन–ए–अकबरी; काल रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

किताब — पृष्ठ 217–222 · स्लाइड — भाग 10 · इंटरैक्टिव — 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी और सार और काल रेखा

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सके कि आइन–ए–अकबरी कब और कैसे बनी और उसके पाँच भाग कौन-से हैं, अबुल फ़ज़्ल की सामग्री के स्रोत और आइन की सीमाएँ गिना सके, काल रेखा पर अकबर और औरंगज़ेब का शासन काल ढूँढ सके, और पहले दिन के सवाल का उत्तर अपने शब्दों में दे सके।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, पहले दिन की पर्चियों वाला लिफ़ाफ़ा, विश्व का रेखा-मानचित्र (हर बच्चे के लिए एक), और अबुल फ़ज़्ल की सामग्री कहाँ से आई वाले चित्र के लिए एक चार्ट पेपर।

40 मिनट

  1. 0–4 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। जिसने लिखा हो कि चाँदी भारत की अपनी खानों से निकलती थी, उसे बिना नाम लिए सुधारिए: किताब के अनुसार भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, और चाँदी भारत के निर्यात के भुगतान के रूप में आई।

  2. 4–11 मिनट · आइन कैसे बनी, उसके भाग, और काल रेखा। पृष्ठ 217–218 पढ़िए। आइन–ए–अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी, जिसका ज़िम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया। यह अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद पूरी हुई। अकबर ने इतिहास लिखने की जो बड़ी परियोजना शुरू की थी, उसका परिणाम अकबरनामा था, जो तीन जिल्दों में रचा गया: पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है, और तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है, जिसे शाही नियम-कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित किया गया। बच्चे अपनी किताब में चित्र 8.14 देखें: अबुल फ़ज़्ल अपने आश्रयदाता को अकबरनामा की पांडुलिपि पेश कर रहे हैं। आइन पाँच भागों (दफ़्तर) में है: मंज़िल–आबादी (शाही घर-परिवार और उसका रख-रखाव), सिपह–आबादी (सैनिक और नागरिक प्रशासन, नौकरों की व्यवस्था, और मनसबदारों, विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ), मुल्क–आबादी (वित्त, राजस्व की दरें और “बारह प्रांतों का बयान”), और चौथा और पाँचवाँ भाग लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों पर। मुल्क–आबादी में सूबों के नीचे की इकाई सरकार की तालिकाएँ हैं, हर तालिका में आठ ख़ाने: परगनात/महल; क़िला; अराज़ी और जमीन–ए–पाईमूद (मापे गए इलाके); नकदी (नक़द निर्धारित राजस्व); सुयूरग़ाल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान); ज़मींदार; और आख़िरी दो ख़ानों में ज़मींदारों की जातियाँ और उनकी फ़ौज। फिर जोड़ियों में पृष्ठ 221 की काल रेखा पढ़वाइए, और पूछिए: इस अध्याय के तीन साल, 1598 (आइन पूरी हुई), 1665 (औरंगज़ेब का हुक्म) और लगभग 1690 (कारेरी भारत से होकर गुज़रा), काल रेखा पर किसके शासन काल में आते हैं? यह सवाल हमारी ओर से है।

    नमूना उत्तर — तीनों साल काल रेखा के दो शासन कालों में आते हैं।

    • 1598: अकबर का शासन काल, 1556–1605।
    • 1665 और लगभग 1690: औरंगज़ेब का शासन काल, 1658–1707।

    काल रेखा 1526 से शुरू होती है, जब दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बना, और 1857 पर ख़त्म होती है, जब अंग्रेज़ों ने अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को गद्दी से हटाकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार में) भेज दिया।

  3. 11–19 मिनट · स्रोत 9: अबुल फ़ज़्ल की सामग्री। जोड़ियों में पृष्ठ 219 का स्रोत 9 पढ़वाइए, जिसका शीर्षक है “खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई”। अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसे हुक्म मिला: “शानदार घटनाओं और राज्य–क्षेत्र अधीन करने वाली हमारी फ़तहों की दास्तान ईमानदारी के कलम से लिखो…”। हर जोड़ी अबुल फ़ज़्ल के तरीक़ों की सूची बनाए; फिर बोर्ड पर नीचे वाला चित्र बनाइए। अब किनारे का प्रश्न पूछिए: उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?

    नमूना उत्तर — स्रोत 9 में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसने सूचनाएँ कैसे जुटाईं।

    • स्रोतों की सूची: बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ; समझदार बुज़ुर्गों और जवानों के बयान, लिखकर दर्ज; सूबों के पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण; इलाही संवत के उन्नीसवें साल से दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल; ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र।
    • कृषि संबंधों के लिए: सूबों को भेजे हुक्म, अफ़सरों की रिपोर्टें और सूबों के संस्मरण सबसे काम के होते, क्योंकि उनमें ज़मीन, राजस्व और गाँवों की बातें होतीं।
    • अकबर से रिश्ते का असर: किताब अकबर के हुक्म से लिखी गई; हुक्म था कि जुटाई सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए; अबुल फ़ज़्ल अपनी किताब को “खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग” कहता है। इसलिए आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”।

    स्रोतों की सूची और अकबर के हुक्म की बातें स्रोत 9 में लिखी हैं; कौन-से स्रोत सबसे उपयोगी होते और आइन के नज़रिये पर क्या असर हुआ, ये तर्क की बातें हैं, जो बच्चे इन्हीं सबूतों से ख़ुद दें।

  4. 19–28 मिनट · सावधानी, सीमाएँ और प्रश्न 1। पृष्ठ 220–221 पढ़िए। किताब के अनुसार यह किताब “आधिकारिक दस्तावेज़ों की महज नकल से कहीं बढ़ कर थी”: लेखक ने पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की, मौखिक बयानों को तथ्य मानने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि करने की कोशिश की जाती थी, और सांख्यिकी वाले खंडों में सभी आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी लिखे गए, ताकि बाद की प्रतियों में नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों। फिर सीमाएँ, और किताब का निष्कर्ष: इन सीमाओं के बावजूद आइन “अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़ है”, और सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु बन गई। अब बोर्ड पर अभ्यास का प्रश्न 1 लिखिए: कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं? पूरी कक्षा मिलकर उत्तर की रूपरेखा बनाए।

    नमूना उत्तर — आइन अकबर के साम्राज्य के खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसकी सीमाएँ हैं।

    • ऊपर से देखा नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में आइन से जो पता चलता है, वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है”; यह केंद्र की नज़र है, समाज के शीर्ष से देखी तसवीर।
    • जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी-मोटी चूक, या नकल उतारते समय अबुल फ़ज़्ल के सहयोगियों की भूल; ये आम तौर पर मामूली हैं।
    • आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे; जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है।
    • कीमतें और मज़दूरी: विस्तृत सूची सिर्फ़ राजधानी आगरा या उसके आस-पास के इलाकों की है, इसलिए बाकी देश के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है।
    • इतिहासकार कैसे निपटते हैं: वे आइन को ध्यान से पढ़कर उसकी ग़लतियाँ पकड़ते हैं, और उसके साथ–साथ दूसरे स्रोतों का भी इस्तेमाल करते हैं: सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़, जो किसानों, ज़मींदारों और राज्य के झगड़े और किसानों की नज़र भी दर्ज करते हैं।

    इस उत्तर का आख़िरी बिंदु कालांश 1 में शुरू हुआ था; आज सब बच्चे पूरा उत्तर कॉपी में लिखें।

  5. 28–36 मिनट · प्रश्न 10 का मानचित्र, और पहले दिन की पर्चियाँ। हर बच्चे को विश्व का रेखा-मानचित्र दीजिए और अभ्यास का प्रश्न 10 पढ़िए: विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाएँ जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था; इन इलाकों के साथ यातायात-मार्गों को भी दिखाएँ। तीन मिनट में बताइए कि कौन-से इलाके और रास्ते अंकित होंगे; बच्चे इलाके पेंसिल से अंकित करना शुरू करें और मानचित्र घर पर पूरा करें। किताब में इन रास्तों का कोई नक्शा नहीं है, सिर्फ़ जगहों के नाम हैं, इसलिए तीर अंदाज़े से बनेंगे।

    नमूना उत्तर — पहले एटलस की मदद से इलाके अंकित कीजिए, फिर किताब में बताए रास्ते तीर से दिखाइए।

    • ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार, जिसे मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता से मदद मिली (पृष्ठ 215); और भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार, जिसमें कुछ कबीले लगे थे (पृष्ठ 210)।
    • चाँदी का रास्ता (स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप के राज्यों होकर; थोड़ा तुर्की, और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से भारत।
    • कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की।
    • भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते और सोना-चाँदी लाते थे; डच लोग जापान की खानों से जो कुछ पाते थे, वह भी देर–सवेर भारत पहुँचता था।
    • यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल, जहाँ जाने वाली भारतीय वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं।

    किताब इन रास्तों पर भारत के बंदरगाहों के नाम नहीं देती; भारत की ओर तीर बनाते समय बंदरगाह चुनने के लिए बच्चे एटलस देखें या आपसे पूछें।

    फिर लिफ़ाफ़ा खोलिए। पहले दिन का सवाल था: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं? पाँच-छह पर्चियाँ बिना नाम लिए पढ़कर सुनाइए, और पूछिए कि आज वे क्या जोड़ेंगे।

    पहले दिन के सवाल का नमूना उत्तर — किसान, ज़मींदार और राज्य, तीनों खेती की उपज और उससे मिलने वाले राजस्व से बँधे थे, और हम यह ज़्यादातर ऊपर से लिखे स्रोतों से जानते हैं।

    • किसान: अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था, जिसका नियमन पंचायत और मुखिया करते थे (कालांश 1–4)।
    • ज़मींदार: वे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और बदले में उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था (कालांश 7)।
    • राज्य: ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था; यह काम दीवान के दफ़्तर, अमील–गुज़ार और कर वसूलने वाले ज़मींदारों के ज़रिये होता था (कालांश 8), और चाँदी के बहाव से नकद में कर उगाहना आसान हुआ (कालांश 9)।
    • हम कैसे जानते हैं: आइन–ए–अकबरी से, जो समाज के शीर्ष से देखी तसवीर है; गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ों और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से; और बाबर, तैवर्नियर और कारेरी जैसे लेखकों के ब्योरों से।

    यह सवाल हमारी ओर से है।

  6. 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) आइन–ए–अकबरी कब पूरी हुई, और वह किस किताब की कौन-सी जिल्द है? (2) आइन की कोई दो सीमाएँ लिखिए।

अबुल फ़ज़्ल की सामग्री कहाँ से आई (चरण 3)

अबुल फ़ज़्ल की सामग्री कहाँ से आई

हुक्मअकबर का आदेशशानदार घटनाओं और फ़तहों की दास्तान ईमानदारी से लिखने का
लोगपूछताछ और बयानराज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार से पूछताछ; बुज़ुर्गों और जवानों के बयान लिखित रूप में दर्ज
सूबेसंस्मरणसूबों को हुक्म: पुराने मुलाज़िम अपने संस्मरण लिखकर दरबार भेजें
दफ़्तरदस्तावेज़इलाही संवत के उन्नीसवें साल से घटनाओं का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे हुक्मों की मूल प्रति या नकल
अफ़सररिपोर्टें और मसौदेऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र
दरबारशाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाएबाद में लिखी जाने वाली बातें परिशिष्ट की शक्ल में जोड़ी जाएँ
NCERT, पृष्ठ 219

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।

बातकिताब क्या कहती हैपृष्ठ
आइन कब पूरी हुईअकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद217
अकबरनामातीन जिल्दें: पहली दो में ऐतिहासिक दास्तान, तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी217
नज़रियाकेंद्र का नज़रिया, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”218
पाँच भाग (दफ़्तर)मंज़िल–आबादी, सिपह–आबादी, मुल्क–आबादी; चौथा और पाँचवाँ लोगों के रीति-रिवाजों पर218
सरकार की तालिकाआठ ख़ाने: परगनात/महल, क़िला, मापी गई ज़मीन, नकदी, सुयूरग़ाल, ज़मींदार, उनकी जातियाँ और फ़ौज218
स्रोत 9बयान, संस्मरण, दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त, हुक्मों की नकल, अफ़सरों की रिपोर्टें, मसौदे219
सावधानीपाँच बार संशोधन; मौखिक बयानों की दूसरे स्रोतों से पुष्टि की कोशिश; आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी220
सीमाएँजोड़ की मामूली ग़लतियाँ; बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं; कीमतें और मज़दूरी सिर्फ़ आगरा और आस-पास की220
निष्कर्ष“असामान्य व अनोखा दस्तावेज़”; सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए संदर्भ बिंदु220–221
काल रेखा1526 बाबर पहला मुग़ल बादशाह; 1556–1605 अकबर; 1658–1707 औरंगज़ेब; 1857 बहादुर शाह ज़फ़र रंगून भेजे गए221

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • “आइन और अकबरनामा दो अलग किताबें हैं।” नहीं: अकबरनामा तीन जिल्दों में है, और आइन–ए–अकबरी उसकी तीसरी जिल्द है।
  • “आइन बस सरकारी काग़ज़ों की नकल है।” किताब के अनुसार यह “आधिकारिक दस्तावेज़ों की महज नकल से कहीं बढ़ कर थी”: पांडुलिपि पाँच बार संशोधित हुई, और मौखिक बयानों की दूसरे स्रोतों से पुष्टि करने की कोशिश की गई।
  • “ग़लतियाँ हैं, तो आइन किसी काम की नहीं।” किताब के अनुसार जोड़ की ग़लतियाँ आम तौर पर मामूली हैं, और इन सीमाओं के बावजूद आइन “अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़ है”।
  • सावधानी और सीमा को एक समझ लेना। पाँच बार संशोधन और आँकड़े शब्दों में भी, ये अबुल फ़ज़्ल की सावधानी हैं; जोड़ की ग़लतियाँ, आँकड़ों की विषमता और आगरा तक सीमित कीमतें, ये आइन की सीमाएँ हैं।
  • इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी खोलिए, और पढ़ते हुए रुककर पूछिए: सरकार की तालिका का कौन-सा ख़ाना दान में दिए गए राजस्व अनुदान का है? (सुयूरग़ाल, पाँचवाँ ख़ाना।) काल रेखा के लिए सार और काल रेखा खोलिए।
  • कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य की पहली पाँच पंक्तियाँ काफ़ी हैं।
  • तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: अबुल फ़ज़्ल से पहले के इतिहासकार ज़्यादातर किस बारे में लिखते थे, और आइन उनसे अलग कैसे है? (वे ज़्यादातर राजनीतिक घटनाओं के बारे में लिखते थे: जंग, फ़तह, सियासी साज़िशें, वंशीय उथल–पुथल; देश, लोग और उत्पाद कभी-कभार “साज–सज्जा” के रूप में आते थे। आइन ने लोगों, उनके पेशों और साम्राज्य की व्यवस्था की विस्तृत सूचनाएँ दर्ज कीं, जिनकी मदद से इतिहासकार उस समय के सामाजिक ताने-बाने का इतिहास फिर से रचते हैं।) यह सवाल हमारी ओर से है।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • निकास-पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न।
  • निकास-पर्ची के नमूना उत्तर — (1) अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद; यह अकबरनामा की तीसरी जिल्द है। (2) कोई दो: जोड़ की ग़लतियाँ (आम तौर पर मामूली); बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं; कीमतें और मज़दूरी की विस्तृत सूची सिर्फ़ आगरा और उसके आस-पास की।
  • गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क20, ग8, ङ5 और च1, और नमूना पत्र 1; सब बच्चे प्रश्न 10 का मानचित्र घर पर पूरा करें। जो प्रश्न 12 का प्रोजेक्ट चुनें, उनके लिए नीचे प्रोजेक्ट और गतिविधि देखिए।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 134–156।

कालांश 11 — मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

किताब — पृष्ठ 222–223 · स्लाइड — आख़िरी भाग · इंटरैक्टिव — हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न

लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी एक लिखित परख दे चुका हो, जोड़ी में उसकी जाँच कर चुका हो, और जान ले कि अभ्यास का हर प्रश्न किस कालांश में पढ़ा गया।

साथ ले जाइए — किताब, पिछली निकास-पर्चियाँ, और प्रश्न बैंक के नमूना पत्र 2 की प्रतियाँ (या बोर्ड पर लिखे प्रश्न)।

40 मिनट

  1. 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए। बोर्ड पर लिखिए: 1526, 1556–1605, 1598, 1658–1707; 1665, लगभग 1690, 1857।

  2. 5–12 मिनट · एक प्रश्न बोर्ड पर। अभ्यास का प्रश्न 2 बोर्ड पर लिखिए: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कृषि उत्पादन को किस हद तक महज़ गुज़ारे के लिए खेती कह सकते हैं? पूरी कक्षा मिलकर उत्तर का ढाँचा बनाए।

    नमूना उत्तर — सिर्फ़ कुछ हद तक। खेती का पहला उद्देश्य पेट भरना था, पर किताब कहती है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।

    • गुज़ारे का पक्ष: चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
    • जिन्स–ए–कामिल: कपास और गन्ना जैसी सर्वोत्तम फ़सलों की खेती को मुग़ल राज्य बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे ज़्यादा कर मिलता था; तिलहन और दलहन भी नकदी फ़सलें थीं।
    • विविधता और नयी फ़सलें: आगरा प्रांत में 39 और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें; मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती और व्यापार की मुख्य वस्तु।
    • बाज़ार गाँव तक: बिक्री के लिए उगाई फ़सलों की वजह से व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में आए; कपास, रेशम या नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था (पृष्ठ 196, 198–201, 205–206)।

    100–150 शब्दों में यही चार हिस्से काफ़ी हैं।

  3. 12–32 मिनट · लिखित परख। प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2 दीजिए (20 अंक)। बच्चे अकेले लिखें, किताब बंद।

  4. 32–36 मिनट · जोड़ियों में जाँच। बच्चे कॉपियाँ बदलें और नीचे अंक कैसे कटेंगे वाले तीन नियमों से एक-दूसरे का उत्तर जाँचें। हर कटे अंक के पास कारण लिखें।

  5. 36–38 मिनट · अभ्यास के 12 प्रश्न। बोर्ड-कार्य की तालिका दिखाइए: हर प्रश्न कब पढ़ा गया और उसके उत्तर की मुख्य बात क्या है।

  6. 38–40 मिनट · आख़िरी पर्ची। (1) इस अध्याय की कौन-सी बात आपको सबसे ज़्यादा याद रहेगी, और क्यों? (2) कौन-सा प्रश्न अब भी कठिन लगता है?

बोर्ड-कार्य

कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें। तीसरे खाने की मुख्य बातें हमारी ओर से हैं।

प्रश्नकब दियाउत्तर की मुख्य बात
1. कृषि इतिहास के स्रोत के रूप में आइन की समस्याएँ, और इतिहासकार उनसे कैसे निपटते हैंकालांश 1 और 10ऊपर से देखा नज़रिया; जोड़ की मामूली ग़लतियाँ; आँकड़ों में विषमता; कीमतें और मज़दूरी सिर्फ़ आगरा और आस-पास की; दूसरे इलाक़ों के दस्तावेज़ों से मिलान
2. कृषि उत्पादन किस हद तक महज़ गुज़ारे की खेतीकालांश 2 और 11सिर्फ़ कुछ हद तक; रोज़ के खाने की फ़सलें, पर जिन्स–ए–कामिल, ढेरों फ़सलें और नकद भुगतान भी
3. कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिकाकालांश 5बुआई, निराई और कटाई; घर ही उत्पादन की बुनियाद; दस्तकारी; पाबंदियाँ भी
4. मौद्रिक कारोबार की अहमियतकालांश 9चाँदी का बहाव; कारेरी, लगभग 1690; राजस्व में नकद; गाँव में नकद और सराफ़; ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त
5. मुग़ल राजकोष के लिए भू–राजस्वकालांश 8साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद; दीवान का दफ़्तर; नपाई और आँकड़े; ज़मीन के चार वर्ग; मनसबदारों का वेतन
6. सामाजिक व आर्थिक संबंधों में जातिकालांश 3 और 4बड़ा कारक, ख़ासकर निचले तबकों के लिए; बीच के कुछ समूह सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठे; पंचायत और ज़मींदारी में भी जाति
7. जंगल वासियों की ज़िंदगी का बदलनाकालांश 6राज्य की घुसपैठ; खेती का फैलाव; व्यापार; सरदार से राजा; नए सांस्कृतिक प्रभाव
8. ज़मींदारों की भूमिकाकालांश 7राज्य के सहायक, किसानों के शोषक, और कुछ हद तक संरक्षक भी
9. पंचायत और मुखिया से गाँव का नियमनकालांश 3गाँव का हिसाब, जाति के नियम, झगड़े और अर्ज़ियाँ; सीमाएँ भी
10. विश्व मानचित्र: मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क वाले इलाके और रास्तेकालांश 10किताब में बताए इलाके एटलस से; रास्ते तीर से
11. परियोजना: पड़ोस के एक गाँव का दौराघर परलोग, फ़सलें, जानवर, दस्तकार समूह, ज़मीन पर महिलाओं का हक़, पंचायत; किताब से तुलना, परिवर्तन और निरंतरता
12. परियोजना: आइन का एक छोटा अंशघर परअंश किस भाग से, क्या सूचना, किसका नज़रिया, सावधानी, इतिहासकार का इस्तेमाल

यहाँ बच्चे अटकेंगे

  • लंबे उत्तर में एक ही बात दोहराना। 250–300 शब्दों के प्रश्नों (6 से 9) में हर अनुच्छेद एक नई बात रखे: बोर्ड-कार्य की “मुख्य बात” वाला खाना ही ढाँचा है।
  • राय को तथ्य की तरह लिखना। प्रश्न 2 “किस हद तक” और प्रश्न 6 “आपके मुताबिक” पूछते हैं। राय लिखिए, पर हर राय के साथ किताब का एक तथ्य।
  • प्रश्न 7 में “जंगली” को असभ्य समझ लेना। किताब (पृष्ठ 208) के अनुसार उन दिनों यह शब्द ऐसे लोगों के लिए था “जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था”; इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था।
  • कमज़ोर विद्यार्थी को परख में पहले वस्तुनिष्ठ प्रश्न (प्र. 1 से 3) करने दीजिए।
  • तेज़ विद्यार्थी को परियोजना (प्रश्न 11 या 12) का खाका इसी हफ़्ते बनाने दीजिए।

निकास-पर्ची और गृहकार्य

  • आख़िरी पर्ची (चरण 6): ऊपर के दो प्रश्न; इनका कोई एक सही उत्तर नहीं है। पर्चियाँ पढ़कर अगली दोहराई तय कीजिए।
  • गृहकार्य: क्विज़ के 20 प्रश्न; प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 3; और परख से अपनी तैयारी जाँचिए।
  • घर के लिए: अभिभावकों के लिए पन्ना घर भेजिए, ताकि घर पर भी इस अध्याय की बात हो सके।
  • दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड का पूरा सेट।

पूरे अध्याय के लिए

अलग-अलग बच्चों के लिए

किसके लिएक्या कीजिए
जो पढ़ने में धीमे हैंहर कालांश के बोर्ड-कार्य की पहली चार पंक्तियाँ और फ़्लैशकार्ड; लंबे उत्तर की जगह पहले तालिका भरवाइए।
जो आगे हैंअभ्यास के 250–300 शब्दों वाले प्रश्न (6 से 9) और कालांश कार्डों के तेज़ विद्यार्थी वाले प्रश्न।
जिन्हें लिखने में कठिनाई हैउत्तर बोलकर दें; चार्ट पेपर के चित्र और काल-रेखा बनाने का काम दीजिए।
जाति, महिलाओं और जंगल वासियों से जुड़े हिस्सेकिताब के शब्दों में, उसी समय की बात की तरह पढ़ाइए: “नीच समझे जाने वाले” काम, राजस्वला महिलाओं पर पाबंदी, और “जंगली” का उन दिनों वाला अर्थ। किसी बच्चे से उसकी जाति, परिवार की ज़मीन या घर की महिलाओं के बारे में मत पूछिए, और किसी हिस्से का अभिनय मत करवाइए।

सतत मूल्यांकन

साधनकबक्या देखिए
निकास-पर्चीहर कालांश के अंत मेंदोनों उत्तरों में किताब की कोई ठोस बात (नाम, तिथि, पृष्ठ) है या नहीं
बोर्ड-कार्य की कॉपीहफ़्ते में एक बारतालिका पूरी है, और पृष्ठ लिखे हैं
चार्ट पेपर के चित्रकालांश 1 से 10बच्चा चित्र देखकर एक कड़ी समझा सकता है
मानचित्रकालांश 10किताब में बताए इलाके सही जगह; रास्ते तीर से, और सिर्फ़ वही जो किताब बताती है
लिखित परखकालांश 11नीचे के ढाँचे और अंक काटने के नियम के अनुसार

लिखित मूल्यांकन

अपनी इकाई-परीक्षा के लिए एक सुझाया हुआ ढाँचा; प्रश्न प्रश्न बैंक से चुनिए। कुल 30 अंक।

प्रकारअंकक्या पूछें
वस्तुनिष्ठ (खंड क, ख, ग)6 × 1 = 6तिथियाँ, यात्रियों के नाम, और जमा, हासिल, पोलज जैसे शब्द
अति लघूत्तरीय (खंड घ)2 × 2 = 4पंचायत के दंड (घ2), भीलों का साल (घ3) जैसी एक-एक बात
लघूत्तरीय (खंड ङ)2 × 3 = 6महज़ गुज़ारे की खेती? (ङ1), महिलाओं की भूमिका (ङ2)
दीर्घ उत्तरीय (खंड च)1 × 5 = 5जंगल वासियों की ज़िंदगी (च3), या ज़मींदारों की भूमिका (च4)
स्रोत पर आधारित (खंड छ)1 × 4 = 4स्रोत 2, 4, 6 या 8 (छ1 से छ4)
मानचित्र1 × 5 = 5प्रश्न 10: मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क वाले इलाके और रास्ते

अंक कैसे कटेंगे, यह पहले ही बता दीजिए

  1. बिना आधार की राय। प्रश्न 2 और 6 राय पूछते हैं। किताब के अनुसार जैसा आधार और किताब का कोई तथ्य न हो, तो आधा अंक कटेगा।
  2. तिथि या शब्द ग़लत। आइन का 1598, कारेरी का लगभग 1690, या औरंगज़ेब का 1665 का निर्देश आपस में मिला देना, या जमा और हासिल को उलट देना: उस बिंदु का अंक कटेगा।
  3. किताब की शर्त हटाना। पीरों वाली बात पर “कुछ इतिहासकारों ने” (पृष्ठ 211) और शिकार अभियान पर “दरबारी इतिहासकारों की मानें” (पृष्ठ 209) हटाकर उसे पक्की बात लिखना, या किसी हुक्म को हो चुकी घटना लिख देना: उस बिंदु का आधा अंक कटेगा।

प्रोजेक्ट और गतिविधि

#प्रोजेक्टकैसे
1अभ्यास का प्रश्न 11: पड़ोस के एक गाँव का दौरासमूह में, शिक्षक या किसी अभिभावक के साथ, गाँव के बड़ों से अनुमति लेकर। बच्चे गिनती और किस्में लिखें: कितने लोग, कौन-सी फ़सलें, कौन-से जानवर, कौन-से दस्तकार समूह, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और पंचायत कैसे काम करती है। किसी का नाम, जाति या लोगों की तस्वीरें नहीं। फिर चार ख़ानों की तालिका (पहलू, सोलहवीं–सत्रहवीं सदी किताब से, आज गाँव में मिला, समानता या परिवर्तन), और परिवर्तन और निरंतरता दोनों की व्याख्या।
2अभ्यास का प्रश्न 12: आइन का एक छोटा अंश (10 से 12 पृष्ठ)किताब एक वेबसाइट का पता देती है; अंश की प्रति के लिए स्कूल के पुस्तकालय या शिक्षक की मदद लीजिए। पाँच बातें लिखिए: अंश किस भाग (दफ़्तर) से है, उसमें क्या सूचना है, किसका नज़रिया है, अबुल फ़ज़्ल ने क्या सावधानी बरती, और इतिहासकार इसका इस्तेमाल कैसे करे।
3कक्षा का चार्ट: खेत से दरबार तककालांश 1 से 10 के चार्ट पेपर जोड़कर एक दीवार-चार्ट: किसान और खेती, गाँव का समुदाय, महिलाएँ, जंगल, ज़मींदार, भू–राजस्व, चाँदी, और आइन।
4काल-रेखा चार्टकिताब की काल रेखा (पृष्ठ 221) एक लंबी पट्टी पर, और उसमें पाठ की तीन तिथियाँ: 1598 (आइन पूरी हुई), 1665 (औरंगज़ेब का निर्देश), लगभग 1690 (कारेरी)।

शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ

  1. किताब के बाहर का इतिहास मत जोड़िए। राजस्व मंत्रियों के नाम, राजस्व व्यवस्थाओं के अलग-अलग नाम और आज की ख़बरें या नीतियाँ इस अध्याय के पन्नों में नहीं हैं।
  2. जाति, महिलाएँ और जंगल वासी किताब के शब्दों में। “नीच समझे जाने वाले” काम, राजस्वला महिलाओं पर पाबंदी और “जंगली” शब्द (पृष्ठ 208 का अर्थ) उस समय के इतिहास की बातें हैं। किसी बच्चे से उसकी जाति, परिवार की ज़मीन या घर की महिलाओं के बारे में मत पूछिए, और किसी हिस्से का अभिनय मत करवाइए।
  3. चर्चा-बक्सों को “तब” पर रखिए। पृष्ठ 206, 207, 211 और 216 के चर्चा-बक्से आज से तुलना माँगते हैं; कक्षा में किताब के समय की बातें ही लीजिए, जैसा कालांश कार्डों में लिखा है। प्रश्न 11 का दौरा ऊपर के नियम से ही करवाइए।
  4. हुक्म को घटना मत बनाइए। स्रोत 9 के हुक्म, अकबर का अमील–गुज़ार को हुक्म और 1665 में औरंगज़ेब का निर्देश बताते हैं कि क्या करने को कहा गया, यह नहीं कि सब जगह वैसा हुआ। किताब ख़ुद लिखती है कि इसके बावजूद सभी इलाक़ों की नपाई सफलतापूर्वक नहीं हुई (पृष्ठ 213)। “लगभग” और “कुछ इतिहासकारों ने” जैसी शर्तें बच्चे भी लिखें।
  5. बिना प्रोजेक्टर भी पूरा पाठ चलेगा। हर कालांश का चित्र चार्ट पेपर पर बनता है और हर बोर्ड-कार्य बोर्ड पर; इंटरैक्टिव अध्याय और स्लाइड केवल सहारा हैं।