ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के स्रोत पढ़ना, प्रमाण से नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।
तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए। ! वाली पंक्ति उस चूक की ओर इशारा करती है जो अक्सर हो जाती है।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — गाँव, किसान और स्रोतों की तलाश (पृष्ठ 196–197)
किताब का उदाहरण: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों कृषि उत्पादन से जुड़े थे और दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे। गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। किसान ख़ुद नहीं लिखते थे, इसलिए उनकी जानकारी उन ग्रंथों और दस्तावेज़ों से मिलती है जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए। इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक आइन–ए–अकबरी है।
1सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कितने लोग गाँवों में रहते थे? छोटे खेतिहरों और भूमिहर संभ्रांतों के बीच कैसे रिश्ते बने? 2 अंक
उत्तर देखिए
उस समय हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। (पृष्ठ 196)
- ★छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे, इसलिए उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने।
- ★इन्हीं रिश्तों के ताने-बाने से गाँव का समाज बनता था।
- ! 85 फ़ीसदी गाँवों में रहने वालों का आँकड़ा है; इसे सिर्फ़ किसानों की संख्या मत लिखिए।
2गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण कौन थी? उसके नुमाइंदे गाँव से क्या चाहते थे? बाज़ार गाँव तक कैसे पहुँचा? 3 अंक
उत्तर देखिए
गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताकतों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। (पृष्ठ 196)
- ★राज्य के नुमाइंदे, यानी राजस्व निर्धारित करने वाले, राजस्व वसूल करने वाले और हिसाब रखने वाले, चाहते थे कि खेतों की जुताई हो और राज्य को उपज से अपने हिस्से का कर समय पर मिल जाए।
- ★कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों में आ गए, और खेती वाले इलाके शहरों से जुड़ गए।
- ! राज्य की आमदनी का बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से आता था; इसे “पूरी आमदनी” मत लिखिए।
3सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के किसानों के बारे में हमारी जानकारी के मुख्य स्रोत कौन-से हैं? किसानों के अपने लिखे स्रोत क्यों नहीं मिलते? 3 अंक
उत्तर देखिए
किसान ख़ुद नहीं लिखते थे, इसलिए ग्रामीण समाज की जानकारी खेतों में काम करने वालों से नहीं मिलती। (पृष्ठ 197)
- ★मुख्य स्रोत वे ऐतिहासिक ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए थे; इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी है।
- ★मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गए स्रोत भी हैं: सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं।
- ★पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ देते हैं।
- ! किसानों के अपने लिखे स्रोत मत गिनाइए; वे उपलब्ध नहीं हैं।
4आइन–ए–अकबरी का मुख्य उद्देश्य क्या था? किताब के अनुसार इससे किसानों के बारे में जो पता चलता है उसकी सीमा क्या है? 4 अंक
उत्तर देखिए
आइन का मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था। (पृष्ठ 197)
- ★लेखक के अनुसार मुग़ल राज्य के ख़िलाफ़ किसी बगावत या स्वायत्त सत्ता की दावेदारी का असफल होना पहले ही तय था।
- ★इस ग्रंथ में खेतों की नियमित जुताई, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही, और राज्य और ज़मींदारों के रिश्तों के नियमन के लिए राज्य के इंतज़ामों का लेखा-जोखा बड़ी सावधानी से दिया गया है।
- ★किताब का निष्कर्ष: “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।”
- ! आइन को किसानों की अपनी आवाज़ मत लिखिए; वह दरबार की नज़र से लिखी गई है।
5गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के दस्तावेज़ और कंपनी के दस्तावेज़ हमें किसानों के बारे में क्या बताते हैं? 2 अंक
उत्तर देखिए
ये सभी स्रोत किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े दर्ज करते हैं। (पृष्ठ 197)
- ★इनसे पता चलता है कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे।
- ★इनसे यह भी पता चलता है कि किसान राज्य से कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे।
- ! इन्हें सिर्फ़ आमदनी के हिसाब की किताबें मत लिखिए; इनमें झगड़े भी दर्ज हैं।
केस 2 — किसान और उनकी ज़मीन (पृष्ठ 197–198)
किताब का उदाहरण: मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए आम तौर पर रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान शब्द इस्तेमाल करते थे; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। सत्रहवीं सदी के स्रोत खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों की चर्चा करते हैं। किताब यह भी बताती है कि किसान के पास कितनी ज़मीन होती थी, और खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर कैसे टिकी थी। स्रोत 1 में बाबर ने बाबरनामा में हिंदुस्तानी बस्तियों के बसने–उजड़ने की बात दर्ज की है।
1मुग़ल काल के स्रोत किसान के लिए कौन-से शब्द इस्तेमाल करते थे? 2 अंक
उत्तर देखिए
भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए आम तौर पर रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान शब्द इस्तेमाल करते थे। (पृष्ठ 197–198)
- ★किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं।
- ! ये शब्द किसान के लिए थे; इन्हें ज़मींदार के लिए मत लिखिए।
2खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसानों में क्या फ़र्क था? कोई किसान पाहि–काश्त क्यों बनता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
खुद–काश्त किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी, और पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। (पृष्ठ 198)
- ★कोई किसान मर्ज़ी से भी पाहि–काश्त बनता था, जैसे जब किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें।
- ★और मजबूरी में भी, जैसे अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी में।
- ! दोनों नाम उलट मत दीजिए: अपने गाँव का किसान खुद–काश्त है, बाहर से आने वाला पाहि–काश्त।
3उत्तर भारत, गुजरात और बंगाल में किसान के पास कितनी ज़मीन होती थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
उत्तर भारत के एक औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा कुछ होता था; ज़्यादातर के पास इससे भी कम। (पृष्ठ 198)
- ★गुजरात में 6 एकड़ के करीब ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे।
- ★बंगाल में औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी, और 10 एकड़ वाले आसामी को अमीर समझा जाता था।
- ! तीनों इलाकों के आँकड़े अलग-अलग हैं; गुजरात के 6 एकड़ और बंगाल के 5 या 10 एकड़ को एक ही पैमाना मत बनाइए।
4किताब किसान की ज़मीन की मिल्कियत के बारे में क्या कहती है? दिल्ली–आगरा के इलाके का विवरण इसमें क्या जोड़ता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर आधारित थी, और किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की। (पृष्ठ 198)
- ★किताब उन्नीसवीं सदी के दिल्ली–आगरा इलाके का एक विवरण देती है, जो उसके अनुसार सत्रहवीं सदी पर भी उतना ही लागू होता है।
- ★उस विवरण में लिखा है: “हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर ज़मीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और ज़मीन के ऐसे हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।”
- ! यह विवरण उन्नीसवीं सदी का है; किताब इसे सत्रहवीं सदी पर लागू मानती है, इसलिए “किताब के अनुसार” जोड़कर लिखिए।
5स्रोत 1 में बाबर ने हिंदुस्तान की बस्तियों के बारे में क्या दर्ज किया? इससे किसानों के बारे में क्या समझ आता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
बाबर ने बाबरनामा में लिखा: “हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।” (पृष्ठ 198)
- ★बरसों से आबाद बड़े शहर के लोग उसे छोड़ते हैं तो डेढ़ दिन के अंदर उनका हर नामोनिशान मिट जाता है।
- ★बसने के लिए उन्हें पानी के रास्ते खोदने नहीं पड़ते, क्योंकि उनकी सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती हैं; वे एक सरोवर या कुआँ बना लेते हैं, झोंपड़ियाँ बनती हैं, “और यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!”
- ! बाबर की यह बात बारिश पर टिकी खेती की है; इसे हर तरह की खेती पर लागू मत कीजिए।
हमारा निष्कर्ष: जहाँ जोतने लायक ज़मीन खाली मिलती हो और किसान आसानी से जा सकें, वहाँ बस्ती का बसना और उजड़ना आसान था; किताब यही बात आगे “गाँव छोड़कर भाग जाना” के बारे में भी कहती है।
केस 3 — सिंचाई, औज़ार और फ़सलें (पृष्ठ 198–201)
किताब का उदाहरण: ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ। खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं। मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, पर कुछ फ़सलों को अतिरिक्त पानी चाहिए था, इसलिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े। स्रोत 2 में बाबर उत्तर भारत में देखे सिंचाई के उपकरण बताता है। किताब औज़ारों, दो मौसमों की फ़सलों, जिन्स–ए–कामिल, नयी फ़सलों, तम्बाकू और आबादी की बढ़ोतरी के बारे में भी बताती है।
1खेती का प्राथमिक उद्देश्य क्या था? बारिश के हिसाब से मुख्य फ़सल क्या होती थी? 2 अंक
उत्तर देखिए
खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं। (पृष्ठ 198)
- ★प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिश वाले इलाकों में कमोबेश चावल की खेती होती थी; कम बारिश में गेहूँ, और उससे भी कम बारिश में ज्वार–बाजरा।
- ! किताब यहाँ “कमोबेश” कहती है; इसे सख़्त नियम की तरह मत लिखिए।
2स्रोत 2 और पाठ के आधार पर बताइए कि कुओं से सिंचाई के कौन-से दो तरीक़े थे। राज्य ने सिंचाई में क्या मदद की? 3 अंक
उत्तर देखिए
मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, पर कुछ फ़सलों को अतिरिक्त पानी चाहिए था, इसलिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े। (पृष्ठ 198)
- ★रहट: लाहौर और दीपालपुर जैसी जगहों पर। कुएँ की गहराई जितने लंबे रस्सी के दो गोलाकार फंदों पर लकड़ी के गुटके और उन पर घड़े बाँधे जाते हैं; बैल अंतिम पहिये को घुमाता है और घड़ों वाला पहिया घूमने लगता है।
- ★बालटी: आगरा, चाँदवर और बयाना जैसे इलाकों में। बड़ी बालटी की रस्सी बेलन पर लपेटी जाती है और उसका दूसरा छोर बैल से बाँधा जाता है; एक आदमी बैल हाँकता है, दूसरा बालटी से पानी निकालता है।
- ★राज्य ने उत्तर भारत में कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर (पृष्ठ 200)।
- ! रहट और बालटी को एक मत समझिए: रहट में घड़ों वाला पहिया घूमता है, बालटी में रस्सी बेलन पर लिपटी रहती है।
3उस समय के किसान किन औज़ारों से खेती करते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
खेती मेहनत का काम थी, पर किसान अक्सर पशुबल पर आधारित तकनीकें भी इस्तेमाल करते थे। (पृष्ठ 200)
- ★लकड़ी का हलका हल, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी। ऐसे हल मिट्टी को बहुत गहरा नहीं खोदते थे, इसलिए तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी।
- ★बीज बोने के लिए बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा, और गुड़ाई–निराई के लिए लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार।
- ! बीज बोने का आम तरीक़ा बरमा नहीं था; हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था।
4खेती के दो मौसम कौन-से थे? फ़सलों की भरमार के उदाहरण आइन और बंगाल से दीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
खेती दो मुख्य चक्रों में होती थी: खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)। (पृष्ठ 200)
- ★सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें होती थीं; जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक़्त थे, वहाँ तीन भी।
- ★आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर मुग़ल प्रांत आगरा में 39 किस्म की और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें उगाई जाती थीं।
- ★बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में पैदा होती थीं।
- ! आगरा के 39 और दिल्ली के 43 उलट मत दीजिए।
5जिन्स–ए–कामिल क्या थी? राज्य इन्हें क्यों बढ़ावा देता था? क्या खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
जिन्स–ए–कामिल का मतलब सर्वोत्तम फ़सलें है, और मुग़ल राज्य इनकी खेती को बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था। (पृष्ठ 200)
- ★कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे; कपास मध्य भारत और दक्कनी पठार में उगाई जाती थी, और बंगाल अपनी चीनी के लिए मशहूर था। तिलहन (जैसे सरसों) और दलहन भी नकदी फ़सलों में आते थे।
- ★दैनिक आहार की खेती पर ज़्यादा ज़ोर था, पर इसका मतलब यह नहीं कि खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी: एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।
- ! खेती को सिर्फ़ गुज़ारे की खेती मत लिखिए।
6सत्रहवीं सदी में कौन-सी नयी फ़सलें आईं? तम्बाकू और आबादी के बारे में किताब क्या बताती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
सत्रहवीं सदी में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से कई नयी फ़सलें भारतीय उपमहाद्वीप पहुँचीं। (पृष्ठ 201)
- ★मक्का अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते आया और सत्रहवीं सदी तक पश्चिम भारत की मुख्य फ़सलों में गिना जाने लगा; टमाटर, आलू और मिर्च जैसी सब्ज़ियाँ और अनानास और पपीता जैसे फल नयी दुनिया से आए।
- ★तम्बाकू सबसे पहले दक्कन पहुँचा, और सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया। आइन उत्तर भारत की फ़सलों की सूची में तम्बाकू का ज़िक्र नहीं करती। जहाँगीर ने इस पर पाबंदी लगाई, पर पाबंदी बेअसर रही (पृष्ठ 200)।
- ★आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार 1600 से 1800 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी की बढ़ोतरी (पृष्ठ 200)।
- ! किताब में यहाँ “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है।
केस 4 — जाति और ग्रामीण माहौल (पृष्ठ 201–202)
किताब का उदाहरण: किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह कई मायनों में एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था। इस समुदाय के तीन घटक थे: खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)। जाति और जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई समूहों में बँटे थे।
1किताब के अनुसार ग्रामीण समुदाय के तीन घटक कौन-से थे? 2 अंक
उत्तर देखिए
ग्रामीण समुदाय के तीन घटक थे: खेतिहर किसान, पंचायत और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)। (पृष्ठ 201)
- ★किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह कई मायनों में एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था।
- ! व्यक्तिगत मिल्कियत और सामूहिक समुदाय, दोनों बातें साथ लिखिए।
2ज़मीन की कमी न होने पर भी कुछ जातियों के लोग ग़रीब क्यों रहे? किताब इसकी तुलना किससे करती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम ही दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे। (पृष्ठ 201)
- ★जुताई करने वालों में बड़ी तादाद उन लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे या खेतों में मज़दूरी करते थे।
- ★उस समय जनगणना नहीं होती थी, पर जो थोड़े-बहुत आँकड़े हैं उनसे पता चलता है कि गाँव की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसे ही समूहों का था। किताब इनकी हालत की तुलना आधुनिक भारत में दलितों की हालत से करती है (पृष्ठ 202)।
- ! ग़रीबी का कारण ज़मीन की कमी मत लिखिए; किताब के अनुसार ज़मीन की कमी नहीं थी।
3क्या ऐसे भेदभाव दूसरे संप्रदायों में भी थे? दो उदाहरण दीजिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
किताब के अनुसार दूसरे संप्रदायों में भी ऐसे भेदभाव फैलने लगे। (पृष्ठ 202)
- ★मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे ‘नीच’ कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे।
- ★बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी।
- ! इस भेदभाव को सिर्फ़ एक संप्रदाय तक सीमित मत लिखिए।
4निचले तबकों और बीच के समूहों में जाति, ग़रीबी और हैसियत का रिश्ता कैसा था? बीच के समूहों के दो उदाहरण दीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था; बीच के समूहों में ऐसा नहीं था। (पृष्ठ 202)
- ★सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है; उसके अनुसार जाट भी किसान थे, पर जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों से नीची थी।
- ★सत्रहवीं सदी में वृंदावन के इलाके में गौरव समुदाय ने राजपूत होने का दावा किया, जबकि वे ज़मीन की जुताई के काम में लगे थे।
- ★पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े की वजह से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं; पूर्वी इलाकों में सदगोप और कैवर्त भी किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगे।
- ! जाट को किसान और जाति व्यवस्था में राजपूतों से नीचा, दोनों बातें साथ लिखिए।
केस 5 — पंचायत और मुखिया (पृष्ठ 202–204)
किताब का उदाहरण: गाँव की पंचायत में बुज़ुर्गों का जमावड़ा होता था, आम तौर पर वे महत्त्वपूर्ण लोग जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे। पंचायत का सरदार मुखिया होता था, जिसे मुक़द्दम या मंडल कहते थे। पंचायत का खर्च गाँव के आम ख़ज़ाने से चलता था, और उसका एक बड़ा काम यह देखना था कि गाँव के अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों में रहें। ग्राम पंचायत के अलावा हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। पश्चिम भारत के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई कई अर्ज़ियाँ मिलती हैं।
1ग्राम पंचायत में कौन लोग होते थे? किताब इसे “अल्पतंत्र” क्यों कहती है? 2 अंक
उत्तर देखिए
पंचायत में गाँव के बुज़ुर्ग होते थे, आम तौर पर वे महत्त्वपूर्ण लोग जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे। (पृष्ठ 202)
- ★कई जातियों वाले गाँवों में पंचायत में भी विविधता होती थी; किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है, जिसमें अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी।
- ★फिर भी छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें जगह होने की संभावना कम थी।
- ! पंचायत को सबकी बराबर नुमाइंदगी वाली सभा मत लिखिए।
2मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) कैसे चुना जाता था और उसका क्या काम था? उस पर क्या आरोप लगते थे? 4 अंक
उत्तर देखिए
कुछ स्रोतों से ऐसा लगता है कि मुखिया बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता था, और चुनाव के बाद उसे गाँव के ज़मींदार से मंज़ूरी लेनी पड़ती थी; भरोसा न रहे तो वह बर्ख़ास्त हो सकता था। (पृष्ठ 202)
- ★उसका काम था गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब-किताब अपनी निगरानी में बनवाना; इसमें पंचायत का पटवारी उसकी मदद करता था।
- ★मंडल अक्सर अपने ओहदे का ग़लत इस्तेमाल करते थे: उन पर आरोप था कि वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब-किताब में हेरा-फेरी करते थे, और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।
- ! किताब “कुछ स्रोतों से ऐसा लगता है” कहती है, इसलिए चुनाव और मंज़ूरी की बात को पक्की बात की तरह मत लिखिए।
3पंचायत का खर्च कहाँ से चलता था? उस पैसे से क्या-क्या होता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
पंचायत का खर्च गाँव के उस आम ख़ज़ाने से चलता था जिसमें हर व्यक्ति योगदान देता था। (पृष्ठ 202)
- ★इससे गाँव का दौरा करने वाले कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी होती थी।
- ★इससे बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटा जाता था।
- ★और ऐसे सामुदायिक काम होते थे जो किसान अकेले नहीं कर सकते थे, जैसे मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना।
- ! ख़ज़ाने में हर व्यक्ति योगदान देता था; इसे सिर्फ़ ज़मींदार या मुखिया का पैसा मत लिखिए।
4पंचायत जाति की हदों के बारे में क्या करती थी? वह क्या दंड दे सकती थी? जाति पंचायत ग्राम पंचायत से कैसे अलग थी? 4 अंक
उत्तर देखिए
पंचायत का एक बड़ा काम यह देखना था कि गाँव के अलग-अलग समुदायों के लोग अपनी जाति की हदों में रहें। (पृष्ठ 203)
- ★पूर्वी भारत में सभी शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं; “जाति की अवहेलना रोकने के लिए” लोगों के आचरण पर नज़र रखना मुखिया की ज़िम्मेदारियों में से एक था।
- ★दंड: पंचायत जुर्माना लगा सकती थी, और समुदाय से निष्कासन जैसा गंभीर दंड भी दे सकती थी। निष्कासन सीमित समय के लिए होता था; दंडित व्यक्ति को उतने समय गाँव छोड़ना पड़ता, और वह अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था।
- ★ग्राम पंचायत के अलावा गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत होती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें अलग-अलग जातियों के लोगों के बीच दीवानी के झगड़े निपटाती थीं, ज़मीन के दावों के झगड़े सुलझाती थीं और यह तय करती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं।
- ! राज्य जाति पंचायत के फ़ैसले ज़्यादातर मामलों में मानता था, पर फ़ौजदारी न्याय को छोड़कर; “सभी मामलों में” मत लिखिए।
5पंचायत को दी गई अर्ज़ियों में किसान क्या शिकायत करते थे? बात न बनने पर किसान क्या करते थे, और यह उनके हाथ में “प्रभावी हथियार” क्यों था? 4 अंक
उत्तर देखिए
पश्चिम भारत के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत है। (पृष्ठ 203)
- ★ये अर्ज़ियाँ आम तौर पर ग्रामीण समुदाय के सबसे निचले तबके के लोग देते थे, कभी अकेले, कभी किसी जाति या संप्रदाय के रूप में सामूहिक तौर पर। सबसे बड़ी शिकायत बहुत ज़्यादा कर की माँग थी, क्योंकि उससे किसानों का दैनिक गुज़ारा, ख़ासकर सूखे जैसी विपदाओं में, जोखिम में पड़ जाता था (पृष्ठ 204)।
- ★अत्यधिक कर के मामलों में पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती थी। समझौता न हो तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाने जैसा उग्र रास्ता अपनाते थे।
- ★जोतने लायक खाली ज़मीन आसानी से मिल जाती थी और श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी, इसलिए गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में “एक बड़ा प्रभावी हथियार” था।
- ! भाग जाने को डर या कमज़ोरी का रास्ता मत लिखिए; किताब इसे प्रभावी हथियार कहती है।
केस 6 — ग्रामीण दस्तकार और “छोटा गणराज्य”? (पृष्ठ 204–206)
किताब का उदाहरण: अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे। कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई और सुनार गाँव के लोगों को अपनी सेवाएँ देते थे। उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय गाँवों को “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा, पर किताब इससे सहमत नहीं है। गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे।
1गाँवों में दस्तकार कितनी तादाद में थे? कई समूह खेती के साथ दस्तकारी कब करते थे? 2 अंक
उत्तर देखिए
अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे। (पृष्ठ 204)
- ★कई समूह खेती और दस्तकारी, दोनों करते थे: रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतन पकाना, खेती के औज़ार बनाना या उनकी मरम्मत।
- ★यह काम वे उन महीनों में करते थे जब खेती से फ़ुरसत होती, जैसे बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच।
- ! 25 फ़ीसदी “कहीं-कहीं” की बात है; इसे हर गाँव पर लागू मत कीजिए।
2गाँव के दस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले क्या मिलता था? मीरास या वतन क्या था? 3 अंक
उत्तर देखिए
कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार भी गाँव के लोगों को अपनी सेवाएँ देते थे। (पृष्ठ 205)
- ★बदले में उन्हें आम तौर पर फ़सल का एक हिस्सा मिलता था, या गाँव की ज़मीन का एक टुकड़ा, शायद कोई ऐसी ज़मीन जो खेती लायक होने पर भी बेकार पड़ी थी। अदायगी कैसे होगी, यह शायद पंचायत तय करती थी।
- ★महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बन गई, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था।
- ! दस्तकारों की अदायगी को सिर्फ़ नकद मत लिखिए; आम तौर पर फ़सल का हिस्सा या ज़मीन मिलती थी।
3जजमानी व्यवस्था क्या थी? बंगाल का उदाहरण दीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कभी दस्तकार और हर खेतिहर परिवार आपस में बातचीत करके अदायगी तय करते थे, और आम तौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था। (पृष्ठ 205)
- ★अठारहवीं सदी के स्रोत बताते हैं कि बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।”
- ★इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, हालाँकि यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था। नकद अदायगी का चलन भी बिलकुल नदारद नहीं था।
- ! जजमानी का मतलब सिर्फ़ वस्तु-विनिमय मत लिखिए; बंगाल के उदाहरण में नकदी भी थी।
4अंग्रेज़ अफ़सर भारतीय गाँव को “छोटा गणराज्य” क्यों कहते थे? किताब इस राय के बारे में क्या सोचती है? 4 अंक
उत्तर देखिए
उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों ने भारतीय गाँवों को ऐसे “छोटे गणराज्य” के रूप में देखा जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे। (पृष्ठ 205)
- ★किताब की राय अलग है: गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती। संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं।
- ★कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था।
- ! “छोटा गणराज्य” को किताब की अपनी राय मत लिखिए; यह अंग्रेज़ अफ़सरों की राय है, जिससे किताब सहमत नहीं।
5किताब के अनुसार गाँवों में नकद के रिश्ते कैसे फैल चुके थे? तैवर्नियर ने सराफ़ के बारे में क्या लिखा? 3 अंक
उत्तर देखिए
गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे। (पृष्ठ 205)
- ★मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी; निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को मज़दूरी या पूर्व भुगतान नकद मिलता था; कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ़सलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकद होता था।
- ★सत्रहवीं सदी के फ़्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।” (पृष्ठ 206)
- ★उसके अनुसार सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे।
- ! तैवर्नियर यात्री था, गाँव का निवासी नहीं; उसकी बात को “उसके अनुसार” जोड़कर लिखिए।
केस 7 — कृषि समाज में महिलाएँ (पृष्ठ 206–207)
किताब का उदाहरण: महिलाएँ और मर्द साथ-साथ खेतों में काम करते थे। मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं। सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किताब यह भी बताती है कि समाज महिलाओं को संसाधन भी मानता था और उन पर कड़ा काबू भी रखता था, और कुछ इलाकों में महिलाओं को ज़मीन और ज़मींदारी का हक़ भी मिला था।
1खेती और दस्तकारी में महिलाएँ क्या-क्या काम करती थीं? “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा फ़र्क यहाँ क्यों मुमकिन नहीं था? 3 अंक
उत्तर देखिए
महिलाएँ और मर्द साथ-साथ खेतों में काम करते थे: मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं। (पृष्ठ 206)
- ★छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती के विकास के साथ घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद बने, इसलिए घर और बाहर का ऐसा फ़र्क मुमकिन नहीं था।
- ★सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे। किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की माँग उतनी ही बढ़ती।
- ★ज़रूरत पड़ने पर किसान और दस्तकार महिलाएँ नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करने जाती थीं; मुग़ल चित्रों में फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती दिखती हैं (पृष्ठ 207)।
- ! महिलाओं को सिर्फ़ घर के काम तक सीमित मत लिखिए।
2काम के बावजूद महिलाओं के बारे में कौन-से पूर्वाग्रह बने रहे? दो उदाहरण दीजिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
महिलाओं की जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर पूर्वाग्रह बने रहे। (पृष्ठ 206)
- ★पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी।
- ★बंगाल में मासिक धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।
- ! दोनों उदाहरणों के इलाके अलग हैं: हल और चाक पश्चिमी भारत के, पान का बगान बंगाल का।
3महिलाओं को “महत्त्वपूर्ण संसाधन” क्यों माना जाता था? इससे किसान और दस्तकार समाज में कौन-से रिवाज बने? 3 अंक
उत्तर देखिए
समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत के कारण महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता था। (पृष्ठ 207)
- ★कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादीशुदा महिलाओं की कमी थी।
- ★इससे ऐसे रिवाज बने जो संभ्रांत समूहों से बहुत अलग थे: कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करनी होती थी, दहेज नहीं; तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं।
- ★साथ ही परिवार और समुदाय के मर्द महिला पर पुरज़ोर काबू रखते थे; घर का मुखिया मर्द होता था।
- ! “दुलहन की कीमत” और दहेज को एक मत समझिए; किताब के अनुसार इन संप्रदायों में दहेज नहीं, दुलहन की कीमत थी।
4पश्चिमी भारत के दस्तावेज़ों में महिलाओं की दरख़्वास्तें क्या बताती हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र) के दस्तावेज़ों में महिलाओं की वे दरख़्वास्तें मिलती हैं जो उन्होंने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजीं। (पृष्ठ 207)
- ★पत्नियाँ पतियों की बेवफ़ाई का विरोध करती थीं, या घर के मर्द पर पत्नी और बच्चों की अनदेखी का आरोप लगाती थीं।
- ★मर्दों की बेवफ़ाई हमेशा दंडित नहीं होती थी, पर राज्य और “ऊँची” जाति के लोग अक्सर यह कोशिश करते थे कि परिवार के भरण-पोषण का इंतज़ाम हो जाए।
- ★ज़्यादातर दस्तावेज़ों में दरख़्वास्त देने वाली महिला का नाम दर्ज नहीं होता था; उसे घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में लिखा जाता था।
- ! “मर्दों की बेवफ़ाई हमेशा दंडित नहीं होती थी” को “कभी दंडित नहीं होती थी” मत लिखिए।
5महिलाओं के ज़मीन और ज़मींदारी पर हक़ के बारे में किताब क्या बताती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था। (पृष्ठ 207)
- ★पंजाब में महिलाएँ (विधवाएँ भी) पुश्तैनी संपत्ति बेचने वाली के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय थीं।
- ★हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे वे बेचने या गिरवी रखने के लिए स्वतंत्र थीं।
- ★बंगाल में भी महिला ज़मींदार थीं: अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक, राजशाही की ज़मींदारी, की कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी।
- ! राजशाही को “सबसे बड़ी ज़मींदारी” मत लिखिए; किताब उसे सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक कहती है।
केस 8 — जंगल, कबीले और बाहर की दुनिया (पृष्ठ 208–211)
किताब का उदाहरण: अखिल भारतीय स्तर पर उस समय अंदाज़न करीब–करीब 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था। “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। भील जैसे कबीले मौसम के हिसाब से काम बदलते रहते थे। राज्य जंगल को बदमाशों का अड्डा (मवास) मानता था, और सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए पेशकश में अक्सर हाथी भी होते थे। दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता था। स्रोत 3 में बंगाली कविता चंडीमंगल का अंश है, जिसमें नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है; स्रोत 4 में अबुल फ़ज़्ल ने लगभग 1595 में अवध सूबे के पहाड़ी कबीलों और मैदानों के लेन–देन का ब्योरा दिया है।
1सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के स्रोतों में “जंगली” किन लोगों को कहा जाता था? क्या इसका मतलब असभ्य था? 2 अंक
उत्तर देखिए
“जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था। (पृष्ठ 208)
- ★किताब के अनुसार इसका मतलब असभ्य नहीं था; यह गुज़ारे के तरीक़े का नाम था।
- ★उस समय के स्रोतों के आधार पर अखिल भारतीय स्तर पर करीब–करीब 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था।
- ! “जंगली” को “असभ्य” मत लिखिए; किताब में यह शब्द गुज़ारे के तरीक़े के लिए आया है।
2मुग़ल राज्य जंगल को किस नज़र से देखता था? पेशकश में हाथी क्यों लिए जाते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
राज्य जंगल को बदमाशों का अड्डा (मवास) मानता था, पर उसे सेना के लिए हाथी भी चाहिए थे। (पृष्ठ 208)
- ★इसीलिए जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अक्सर हाथी भी होते थे।
- पेशकश किताब के शब्दों में मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट थी।
- ! पेशकश को जुर्माना मत लिखिए; वह भेंट की तरह ली जाती थी।
3दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान का क्या मतलब था? चित्रकार शिकार के चित्र में क्या जोड़ देते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह विशाल साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता था। (पृष्ठ 209)
- ★वह अलग-अलग इलाकों के लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था।
- ★मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान इस बात का एक लक्षण था कि राज्य ग़रीबों और अमीरों, सबकी परवाह करता है।
- ★चित्रकार अक्सर चित्र में एक छोटा-सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था।
- ! “दरबारी इतिहासकारों के अनुसार” जोड़कर लिखिए; यह दरबार की अपनी बात है, आम लोगों का अनुभव नहीं।
हमारा निष्कर्ष: शिकार का यह वर्णन दरबार की नज़र से लिखा गया है; इसे वैसे ही पढ़िए जैसे आइन को, यानी ऊपर से देखी हुई तसवीर की तरह।
4स्रोत 3 के अनुसार कालकेतु ने जंगल में बस्ती बसाने के लिए क्या किया? कविता में किन दिशाओं से कौन आए? 4 अंक
उत्तर देखिए
कालकेतु ने जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाया। (पृष्ठ 209)
- ★ख़बर मिलते ही तमाम जगहों से परदेसी आने लगे, और कालकेतु ने उन्हें चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे ख़रीदकर बाँटे।
- ★कविता के अनुसार उत्तर से “दास / सैकड़ों उमड़ते हुए” आए; दक्खिन से फ़सल कटाई वाले “एक उद्यमी के साथ पाँच सौ”; और पश्चिम से ज़फ़र मियाँ “साथ में बाईस हज़ार लोग”।
- ★जंगल हटाकर उन्होंने बाज़ार बसाए, और कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेर दहाड़ते हुए भाग निकले।
- ! संख्याएँ लिखते समय “कविता के अनुसार” जोड़िए; यह मुकुंदराम चक्रवर्ती की बंगाली कविता का अंश है।
5स्रोत 4 के अनुसार पहाड़ों से मैदानों में क्या आता था और मैदानों से पहाड़ों को क्या जाता था? सामान कैसे ढोया जाता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
लगभग 1595 के इस ब्योरे में अबुल फ़ज़्ल अवध सूबे के पहाड़ी कबीलों और मैदानों के लेन–देन का हाल देता है। (पृष्ठ 210)
- ★पहाड़ों से आता था सोना, ताँबा, कस्तूरी, शहद, मोम, ऊनी कपड़े और लकड़ी के सामान जैसी चीज़ें।
- ★बदले में पहाड़ों को जाते थे सफ़ेद और रंगीन कपड़े, नमक, हींग, गहने, और शीशे और मिट्टी के बरतन।
- ★सामान इंसानों, मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर लादकर ढोया जाता था।
- ! दोनों सूचियाँ उलट मत दीजिए: नमक, हींग और गहने मैदानों से पहाड़ों को गए।
6किताब के अनुसार कबीलों के सरदारों का क्या हुआ? कबीलाई सेनाओं और राजाओं के उदाहरण दीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कबीलों के सरदार गाँव के “बड़े आदमियों” जैसे होते थे; कई सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी। (पृष्ठ 210–211)
- ★सेना खड़ी करने के लिए उन्होंने अपने खानदान के लोगों को भर्ती किया या भाई–बंधुओं से सैन्य सेवा माँगी; सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे।
- ★असम में अहोम राजाओं के अपने पायक थे, यानी वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी।
- ★सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध किए और उन पर कब्ज़ा जमा लिया।
- ! किताब कहती है कि कबीले से राजतंत्र की ओर बदलाव बहुत पहले शुरू हो चुका था, पर “लगता है” कि यह प्रक्रिया सोलहवीं सदी में पूरी तरह विकसित हुई; इसे इसी सावधानी से लिखिए।
केस 9 — ज़मींदार: कौन थे, कैसे बने, गाँव में क्या करते थे (पृष्ठ 211–213)
किताब का उदाहरण: ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। उनकी ऊँची हैसियत के दो कारण थे: एक, जाति; दूसरा, वे राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे। उनकी विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन मिल्कियत कहलाती थी। वे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और ज़्यादातर के अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं। एक बॉक्स में आइन के अनुसार उनकी मिली–जुली सैनिक शक्ति दी गई है: 384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल; 1,863 हाथी; 4,260 तोप; और 4,500 नाव।
1ज़मींदार कौन थे? उनकी कमाई कहाँ से आती थी, और उनकी ऊँची हैसियत के दो कारण क्या थे? 2 अंक
उत्तर देखिए
ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी। (पृष्ठ 211)
- ★पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे।
- ★हैसियत के दो कारण: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)।
- ! ज़मींदार को खुद खेत जोतने वाला किसान मत लिखिए।
2मिल्कियत क्या थी? उस पर खेती कौन करता था, और ज़मींदार उसके साथ क्या कर सकते थे? 3 अंक
उत्तर देखिए
मिल्कियत ज़मींदारों की विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी, यानी उनकी संपत्ति। (पृष्ठ 211)
- ★इस पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी, अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूरों से।
- ★ज़मींदार इसे अपनी मर्ज़ी से बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे।
- ! किताब मिल्कियत को “व्यक्तिगत ज़मीन” कहती है; इसे राज्य की ज़मीन मत लिखिए।
3ज़मींदारी कैसे बनती और पक्की होती थी? जंग में जीत की भूमिका के बारे में किताब क्या सावधानी रखती है? 4 अंक
उत्तर देखिए
उस समय के दस्तावेज़ों से लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का एक संभावित स्रोत रही होगी। (पृष्ठ 212)
- ★किताब के अनुसार इसकी संभावना कम है कि राज्य ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त देता, जब तक एक राज्यादेश (सनद) से इसकी पुष्टि पहले न हो चुकी हो।
- ★ज़मींदारी पक्की करने की धीमी प्रक्रिया ज़्यादा महत्त्वपूर्ण थी, और वह चार तरीक़ों से होती थी: नयी ज़मीनें बसाकर (जंगल–बारी), अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
- ★ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी और बेची जाती थी, इसलिए अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।
- ! जंग की जीत को पक्का स्रोत मत लिखिए; किताब “संभावित” और “लगता है” जैसे शब्द रखती है।
4गाँव की खेती और अर्थव्यवस्था में ज़मींदारों की क्या भूमिका थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की। (पृष्ठ 212)
- ★वे खेतिहरों को खेती का साजो–सामान और उधार देकर उन्हें बसने में मदद करते थे।
- ★ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई।
- वे अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते थे और अक्सर बाज़ार (हाट) लगवाते थे, जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे।
5किताब के अनुसार ज़मींदार शोषक थे या संरक्षक? किताब कौन-से दो सबूत देती है? 4 अंक
उत्तर देखिए
किताब कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था”, पर किसानों से उनके रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी था। (पृष्ठ 212–213)
- ★पहला सबूत: भक्ति संतों ने जातिगत और दूसरे अत्याचारों की बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनके गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था।
- ★दूसरा सबूत: सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए, और उनमें राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।
- ! ज़मींदारों को सिर्फ़ शोषक या सिर्फ़ संरक्षक मत लिखिए; किताब दोनों बातें साथ रखती है।
केस 10 — भू-राजस्व: ज़मीन से कर कैसे तय होता था (पृष्ठ 213–215)
किताब का उदाहरण: ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था, इसलिए राज्य ने एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा किया, जिसमें दीवान का दफ़्तर शामिल था। भू–राजस्व के इंतज़ाम के दो चरण थे: पहला, कर निर्धारण; दूसरा, वास्तविक वसूली। जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया। स्रोत 6 में फ़सल के रूप में वसूली के चार तरीक़े बताए गए हैं, और स्रोत 7 में 1665 ई. का औरंगज़ेब का हुक्म है।
1जमा और हासिल में क्या फ़र्क था? दोनों अलग क्यों रखे जाते थे? 2 अंक
उत्तर देखिए
जमा निर्धारित रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। (पृष्ठ 213)
- ★राजस्व तय करते समय राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, पर स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी इतनी वसूली सचमुच संभव नहीं हो पाती थी।
- ! दोनों को एक ही रक़म मत लिखिए; जमा तय की गई रक़म है, हासिल मिली हुई।
2अकबर के शासन में ज़मीन के चार वर्ग कौन-से थे? शाही शुल्क कैसे निकाला जाता था? 4 अंक
उत्तर देखिए
आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीनों का वर्गीकरण किया और हर वर्ग के लिए अलग राजस्व तय किया। (पृष्ठ 214)
- ★पोलज पर हर साल खेती होती थी, कभी खाली नहीं छोड़ी जाती थी; परौती पर कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती थी, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके।
- ★चचर तीन या चार वर्ष खाली रहती थी; बंजर पर पाँच या उससे ज़्यादा वर्ष से खेती नहीं हुई होती थी।
- ★पहले दो प्रकार (पोलज और परौती) की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब। हर किस्म की ज़मीन का उत्पाद जोड़ा जाता, उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई हिस्सा शाही शुल्क माना जाता था।
- ! परौती को बरसों से खाली ज़मीन मत लिखिए; पाँच या ज़्यादा वर्ष से खाली ज़मीन बंजर कहलाती थी।
3स्रोत 6 में फ़सल के रूप में वसूली के कौन-से चार तरीक़े बताए गए हैं? अमील–गुज़ार को क्या हिदायत थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
आइन के इस अनुच्छेद के अनुसार अमील–गुज़ार सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले, फ़सल लेने के लिए भी तैयार रहे। (पृष्ठ 215)
- ★कणकुत: कण का मतलब अनाज और कुत का मतलब अंदाज़ा; यानी फ़सल का अंदाज़ा लगाना।
- ★बटाई (भाओली): फ़सल काटकर जमा कर ली जाती, फिर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा होता।
- ★खेत बटाई: बीज बोने के बाद खेत बाँट लिए जाते थे।
- ★लाँग बटाई: फ़सल काटने के बाद उसका ढेर बनाकर आपस में बाँट लिया जाता था।
- ! खेत बटाई और लाँग बटाई का फ़र्क समय का है: एक में बुआई के बाद खेत बँटते हैं, दूसरी में कटाई के बाद ढेर।
4स्रोत 7 में औरंगज़ेब का हुक्म क्या था? उसमें किन दो हितों का ध्यान रखने को कहा गया? 3 अंक
उत्तर देखिए
1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व अधिकारी को हुक्म दिया कि वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें। (पृष्ठ 215)
- ★हर गाँव और हर किसान (आसामीवार) के बारे में खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) पता किए जाएँ।
- ★बारीकी से जाँच के बाद जमा तय हो, सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) और किसानों के कल्याण, दोनों को ध्यान में रखकर।
- ★इसी साल उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए (पृष्ठ 213)।
- ! नपाई को पूरे उपमहाद्वीप की मत लिखिए; किताब कहती है कि जंगलों से घिरे बड़े हिस्सों की नपाई नहीं हुई।
5साम्राज्य के फैलाव का राजस्व तंत्र पर क्या असर पड़ा? मनसबदारों को भुगतान कैसे होता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
साम्राज्य का इलाका तीन चरणों में बढ़ा: 1530 में बाबर के शासन तक, 1605 में अकबर के शासन तक और 1707 में औरंगज़ेब के शासन तक। (पृष्ठ 214)
- यानी जितना इलाका बढ़ा, उतनी ज़्यादा ज़मीन की नपाई, आकलन और वसूली राज्य के तंत्र को करनी पड़ी।
- ★मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर एक सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था; कुछ मनसबदारों को नक़द भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग-अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये।
- ! मनसबदारों के वेतन को सिर्फ़ नक़द मत लिखिए; समय-समय पर उनका तबादला भी होता था।
केस 11 — चाँदी का बहाव: भारत में नकद कहाँ से आया (पृष्ठ 215–217)
किताब का उदाहरण: मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में था जो सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे; बाकी थे मिंग (चीन में), सफ़ावी (ईरान में) और ऑटोमन (तुर्की में)। भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। स्रोत 8 में इटली का मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी, जो लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा, बताता है कि सोना–चाँदी दुनिया भर से घूमकर भारत कैसे पहुँचता था।
1सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में भारत में इतनी चाँदी क्यों आई? यह भारत के लिए अच्छा क्यों था? 2 अंक
उत्तर देखिए
भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, और उसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। (पृष्ठ 216)
- ★यह भारत के लिए अच्छा था, क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।
- ! भारत में चाँदी की अपनी खानें मत लिखिए; चाँदी निर्यात के भुगतान के रूप में बाहर से आई।
2चाँदी के आने के क्या नतीजे हुए? 3 अंक
उत्तर देखिए
सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच भारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही। (पृष्ठ 216)
- ★अर्थव्यवस्था में मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ।
- ★मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
3एशिया के कौन-से बड़े साम्राज्य मुग़लों के समय में फले-फूले? उनकी राजनीतिक स्थिरता और नयी खोजों का व्यापार पर क्या असर पड़ा? 3 अंक
उत्तर देखिए
मुग़ल साम्राज्य के साथ मिंग (चीन में), सफ़ावी (ईरान में) और ऑटोमन (तुर्की में) साम्राज्य भी सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत करने में कामयाब रहे। (पृष्ठ 215)
- ★इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की।
- ★खोजी यात्राओं और “नयी दुनिया” के खुलने से यूरोप के साथ एशिया, ख़ासकर भारत, के व्यापार में भारी विस्तार हुआ।
- ! मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन को भारत के राज्य मत लिखिए; किताब इन्हें एशिया के दूसरे बड़े साम्राज्य बताती है।
4स्रोत 8 के आधार पर बताइए कि कारेरी के अनुसार सोना–चाँदी भारत तक किस रास्ते से पहुँचता था। 4 अंक
उत्तर देखिए
कारेरी के अनुसार “दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।” उसका लेख बर्नियर के लेख पर आधारित है। (पृष्ठ 217)
- ★अमेरिका से सोने–चाँदी का बहुत बड़ा हिस्सा यूरोप के कई राज्यों से होते हुए आगे जाता था।
- ★थोड़ा तुर्की जाता था, कई वस्तुओं के लिए; थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस, रेशम के लिए।
- ★ये देश भारत की वस्तुओं के बिना नहीं रह सकते थे, इसलिए मुद्रा लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा पहुँचती, जहाँ से जहाज़ों से हिंदुस्तान आती।
- ★यूरोप जाने वाली वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जातीं, और नकद यहीं रह जाता।
- ! रास्ते में सिर्फ़ अमेरिका और यूरोप मत लिखिए; किताब के अनुसार डच लोग जापान की खानों से जो कुछ पाते थे, वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।
केस 12 —आइन–ए–अकबरी: ग्रंथ, स्रोत और सीमाएँ (पृष्ठ 217–221)
किताब का उदाहरण: आइन–ए–अकबरी आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा थी, जिसका ज़िम्मा बादशाह अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया था। वह अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद पूरी हुई। अकबरनामा तीन जिल्दों में रचा गया, और तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है। स्रोत 9 में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसने सूचनाएँ कहाँ से जुटाईं। किताब आइन को “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” कहती है, और उसकी सीमाएँ भी गिनाती है।
1आइन–ए–अकबरी का अकबरनामा से क्या संबंध है? इसे किसने और कब पूरा किया? 2 अंक
उत्तर देखिए
आइन–ए–अकबरी अकबरनामा की तीसरी जिल्द है। (पृष्ठ 217)
- ★पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है; तीसरी जिल्द आइन शाही नियम–कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित की गई।
- ★अबुल फ़ज़्ल ने अकबर के हुक्म पर इसे उठाया, और यह अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद पूरी हुई।
- ! आइन को अकबरनामा से अलग किताब मत लिखिए।
2आइन के पाँच भाग (दफ़्तर) कौन-से हैं? गाँव और खेती के आँकड़े किस भाग में हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
आइन के पहले तीन भाग प्रशासन पर हैं। (पृष्ठ 218)
- ★पहला मंज़िल–आबादी: शाही घर–परिवार और उसका रख–रखाव। दूसरा सिपह–आबादी: सैनिक और नागरिक प्रशासन, नौकरों की व्यवस्था।
- ★तीसरा मुल्क–आबादी: वित्त और राजस्व की दरें, और “बारह प्रांतों का बयान”; इसमें सरकारों की तालिकाएँ हैं, जिनमें मापी गई ज़मीन, निर्धारित राजस्व (जमा), ज़मींदारों की जातियाँ और उनकी फ़ौज दर्ज है।
- ★चौथे और पाँचवें भाग में लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति–रिवाज हैं, और आख़िर में अकबर के “शुभ वचनों” का संग्रह।
- ! खेती और ज़मींदारों के आँकड़े पहले भाग में मत ढूँढिए; वे मुल्क–आबादी में हैं।
3स्रोत 9 के अनुसार अबुल फ़ज़्ल ने सूचनाएँ कहाँ-कहाँ से जुटाईं? इनमें से कौन-से स्रोत खेती के रिश्ते समझने में सबसे काम के होते? 4 अंक
उत्तर देखिए
अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसे हुक्म मिला और उसने कई तरह के स्रोत इकट्ठे किए। (पृष्ठ 219)
- ★बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से सवाल-जवाब।
- ★सच बोलने वाले समझदार बुज़ुर्गों और फ़ुर्तीले दिमाग वाले जवानों की बातें, जो लिखित रूप में दर्ज की गईं; सूबों के पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण।
- ★राज्याभिषेक से तब तक सूबों को जारी सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल; ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र।
- ! यह निष्कर्ष हमारा है; किताब यहाँ पाठक से अपनी राय बनाने को कहती है।
हमारा निष्कर्ष: खेती के रिश्तों के लिए सूबों को भेजे हुक्म, अफ़सरों की रिपोर्टें और सूबों के संस्मरण सबसे काम के होते, क्योंकि उनमें ज़मीन, राजस्व और गाँवों की बातें होतीं।
4अबुल फ़ज़्ल ने अपने आँकड़ों को भरोसेमंद रखने के लिए क्या सावधानी बरती? इतिहासकारों को आइन में कौन-सी तीन सीमाएँ मिलती हैं? 4 अंक
उत्तर देखिए
लेखक ने पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की। (पृष्ठ 220)
- ★सावधानी: मौखिक बयानों को तथ्य के रूप में शामिल करने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि की जाती थी, और आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी लिखे गए, ताकि नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों।
- ★पहली सीमा: जोड़ में कई ग़लतियाँ, जो आम तौर पर मामूली हैं और बड़े स्तर पर आँकड़ों की सच्चाई कम नहीं करतीं।
- ★दूसरी सीमा: सभी सूबों से आँकड़े एक ही शक्ल में नहीं जुटे; कई सूबों के ज़मींदारों की जाति की सूचना है, पर बंगाल और उड़ीसा के लिए नहीं।
- ★तीसरी सीमा: कीमतें और मज़दूरी उतनी अच्छी तरह दर्ज नहीं हुईं; जो विस्तृत सूची है वह राजधानी आगरा और उसके आस-पास की है।
- ! जोड़ की ग़लतियों से यह नतीजा मत निकालिए कि आइन भरोसे लायक नहीं; किताब इन्हें मामूली बताती है।
5आइन किसका नज़रिया दिखाती है? इसके बावजूद किताब इसे अनोखा दस्तावेज़ क्यों कहती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
आइन का नज़रिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया है, या किताब के शब्दों में “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”। (पृष्ठ 218)
- ★किताब के अनुसार इन सीमाओं के बावजूद आइन अपने समय के लिए एक असामान्य और अनोखा दस्तावेज़ है (पृष्ठ 220)।
- ★अबुल फ़ज़्ल से पहले के इतिहासकार ज़्यादातर राजनीतिक घटनाओं के बारे में लिखते थे; आइन ने साम्राज्य के लोगों और उत्पादों की विस्तृत सूचनाएँ और सांख्यिकीय आँकड़े दर्ज किए।
- ★इसी से यह सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए संदर्भ बिंदु बनी (पृष्ठ 221)।
- ! आइन को आम किसान की आवाज़ मत लिखिए; किताब के अनुसार किसानों के बारे में जो पता चलता है वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है”।
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1ज़मींदार गाँव के वे किसान थे जो अपने हाथ से खेत जोतकर कमाते थे। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार ज़मींदार गाँवों में रहने वाला वह तबका था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। (पृष्ठ 211)
- ★उनकी मिल्कियत पर खेती ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए होती थी, अक्सर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूरों से।
- ★उनकी ऊँची हैसियत के दो कारण थे: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)।
- ! “कमाई खेती से आती थी” और “खेत ख़ुद जोतते थे”, ये दो अलग बातें हैं।
2जमा वह रक़म थी जो राज्य ने गाँव से सचमुच वसूल की। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म। (पृष्ठ 213)
- ★राजस्व तय करते समय राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, पर स्थानीय हालात की वजह से कभी-कभी इतनी वसूली संभव नहीं हो पाती थी।
- ★इसीलिए दोनों रक़में अलग-अलग दर्ज की जाती थीं।
3जिस ज़मीन पर पाँच या उससे ज़्यादा वर्ष से खेती नहीं हुई, उसे परौती कहते थे। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। ऐसी ज़मीन बंजर कहलाती थी; परौती पर तो कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती थी, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके। (पृष्ठ 214)
- ★चारों वर्ग इस क्रम में समझिए: पोलज पर हर साल खेती होती थी, परौती पर कुछ दिन रोक, चचर तीन या चार वर्ष खाली, बंजर पाँच या ज़्यादा वर्ष खाली।
- ! परौती और बंजर के बीच खाली रहने की अवधि का फ़र्क याद रखिए।
4किताब के अनुसार सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के स्रोतों में “जंगली” का मतलब असभ्य लोग था। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था, और इसका मतलब असभ्य नहीं था। (पृष्ठ 208)
- ★किताब इस शब्द को गुज़ारे के तरीक़े का नाम बताती है।
- ★उस समय अखिल भारतीय स्तर पर अंदाज़न करीब–करीब 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था।
- ! आज के अर्थ में “जंगली” को किताब पर मत थोपिए।
5मुग़लों के समय भारत में चाँदी अपनी खानों से निकलती थी, इसलिए सिक्के ढालने के लिए बाहर से चाँदी की ज़रूरत नहीं थी। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, और निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई, जिसका बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया। (पृष्ठ 216)
- ★इसी चाँदी से मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
- ★स्रोत 8 में कारेरी लिखता है कि दुनिया भर में घूमने वाला सारा सोना–चाँदी आख़िरकार हिंदुस्तान पहुँचता है (पृष्ठ 217)।
6आइन–ए–अकबरी अबुल फ़ज़्ल की एक अलग किताब थी, जिसका अकबरनामा से कोई संबंध नहीं था। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार अकबरनामा तीन जिल्दों में रचा गया, और तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है। (पृष्ठ 217)
- ★पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है; तीसरी जिल्द शाही नियम–कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित की गई।
- ★आइन अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद पूरी हुई।
7भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों का शोषक बताकर उनकी कड़ी निंदा की। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार भक्ति संतों ने जातिगत और दूसरे अत्याचारों की बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया। (पृष्ठ 212)
- ★उनके गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था।
- ★किताब इसे इस बात का सबूत मानती है कि ज़मींदारों और किसानों के रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी था।
- ! किताब यह भी कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था” (पृष्ठ 212)। उत्तर में दोनों बातें साथ रखिए।
8खुद–काश्त किसान दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार खुद–काश्त किसान उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले पाहि–काश्त कहलाते थे। (पृष्ठ 198)
- ★कोई किसान मर्ज़ी से भी पाहि–काश्त बनता था, जैसे जब किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें।
- ★और मजबूरी में भी, जैसे अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी में।
9किताब मानती है कि भारतीय गाँव “छोटे गणराज्य” थे, जहाँ सब लोग बराबर थे। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। “छोटे गणराज्य” उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी, कि गाँवों में लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे; किताब इससे सहमत नहीं है। (पृष्ठ 205)
- ★किताब के अनुसार गाँव में सामाजिक बराबरी नहीं लगती: संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं।
- ★कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था।
- ★गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते भी फैल चुके थे।
10आइन–ए–अकबरी में किसान अपनी हालत ख़ुद बयान करते हैं, इसलिए वह किसानों की आवाज़ का सबसे सीधा स्रोत है। (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब के अनुसार किसान ख़ुद नहीं लिखते थे, और “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” (पृष्ठ 197)
- ★आइन मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखी गई और उसका उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का वह खाका पेश करना था जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था।
- ★किसानों की राज्य से न्याय की उम्मीद और झगड़ों का हाल गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ों और कंपनी के दस्तावेज़ों से पता चलता है।
- ★फिर भी किताब आइन को अनोखा दस्तावेज़ कहती है, क्योंकि उसमें साम्राज्य के लोगों और उत्पादों की विस्तृत सूचनाएँ और सांख्यिकीय आँकड़े हैं (पृष्ठ 220)।
भाग ग — तुलना और वर्गीकरण
1आइन के स्रोत 5 में बताए ज़मीन के चार वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर) तालिका में रखिए। 4 अंक
| बात | पोलज | परौती | चचर | बंजर |
|---|---|---|---|---|
| खेती की हालत | ||||
| खाली रहने की अवधि | ||||
| पृष्ठ |
उत्तर देखिए
| बात | पोलज | परौती | चचर | बंजर |
|---|---|---|---|---|
| खेती की हालत | एक के बाद एक हर फ़सल की सालाना खेती होती है | कुछ दिनों के लिए खेती रोक दी जाती है, ताकि ज़मीन अपनी खोयी ताकत वापस पा सके | खाली रहती है | खेती नहीं की गई होती |
| खाली रहने की अवधि | कभी खाली नहीं छोड़ी जाती | कुछ दिन | तीन या चार वर्ष | पाँच या उससे ज़्यादा वर्ष |
| पृष्ठ | 214 | 214 | 214 | 214 |
★कसौटी: चारों नाम खाली रहने की अवधि से पहचानिए: हर साल खेती, कुछ दिन की रोक, तीन या चार वर्ष, पाँच या उससे ज़्यादा वर्ष। किस्मों वाली बात सिर्फ़ पहले दो वर्गों की है: उनकी तीन किस्में (अच्छी, मध्यम, खराब) थीं (पृष्ठ 214)।
2आइन के स्रोत 6 में फ़सल के रूप में वसूली के चार तरीक़े (कणकुत, बटाई, खेत बटाई, लाँग बटाई) तालिका में रखिए। 4 अंक
| बात | कणकुत | बटाई (भाओली) | खेत बटाई | लाँग बटाई |
|---|---|---|---|---|
| क्या होता था | ||||
| ख़ास बात | ||||
| पृष्ठ |
उत्तर देखिए
| बात | कणकुत | बटाई (भाओली) | खेत बटाई | लाँग बटाई |
|---|---|---|---|---|
| क्या होता था | कण का मतलब अनाज और कुत का मतलब अंदाज़ा; यानी फ़सल का अंदाज़ा लगाना | फ़सल काटकर जमा कर ली जाती है, फिर बँटवारा होता है | बीज बोने के बाद खेत बाँट लिए जाते हैं | फ़सल काटने के बाद उसका ढेर बनाकर आपस में बाँट लिया जाता है |
| ख़ास बात | शक हो तो फ़सल को तीन अलग-अलग पुलिंदों में काटा जाता है: अच्छा, मध्यम और बदतर | बँटवारा सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से होता है; इसमें कई समझदार निरीक्षकों की ज़रूरत पड़ती है | बँटता खेत है, फ़सल नहीं | हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता है |
| पृष्ठ | 215 | 215 | 215 | 215 |
★कसौटी: बँटवारे का समय देखिए। खेत बटाई में बुआई के बाद खेत बँटते हैं, बटाई और लाँग बटाई में कटाई के बाद फ़सल, और कणकुत में फ़सल का सिर्फ़ अंदाज़ा लगता है (पृष्ठ 215)।
3किसानों के बारे में जानकारी देने वाले तीन तरह के स्रोतों (आइन–ए–अकबरी, गुजरात–महाराष्ट्र–राजस्थान के दस्तावेज़, ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़) की तुलना तालिका में कीजिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
| बात | आइन–ए–अकबरी | गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ | ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ |
|---|---|---|---|
| कहाँ और किसकी निगरानी में | मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक | मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गए; सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के | ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़; पूर्वी भारत के बारे में |
| क्या देते हैं | खेतों की नियमित जुताई, राज्य के नुमाइंदों द्वारा करों की उगाही, और राज्य और ज़मींदारों के रिश्तों के नियमन के लिए राज्य के इंतज़ामों का लेखा-जोखा | सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी | पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका |
| किसान का पक्ष | किताब के अनुसार वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है” | किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े दर्ज करते हैं; इनसे पता चलता है कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और उससे कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे | यही बात यहाँ भी लागू है: झगड़े दर्ज हैं और किसान का नज़रिया झलकता है |
| पृष्ठ | 197 | 197 | 197 |
★कसौटी: आइन राज्य की नज़र से लिखी गई है; किसानों की शिकायत और न्याय की उम्मीद दूर के दस्तावेज़ों और कंपनी के दस्तावेज़ों से झलकती है। किसानों के अपने लिखे स्रोत नहीं हैं (पृष्ठ 197)।
भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि
1. नक्शे पर व्यापार के इलाके और रास्ते (किताब का प्रश्न 10, पृष्ठ 223)
किताब का प्रश्न है कि विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर वे इलाके दिखाइए जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था, और उनके साथ यातायात–मार्ग भी। इसकी सामग्री अध्याय के चाँदी वाले अनुभाग (पृष्ठ 215–217) और जंगल वाले अनुभाग (पृष्ठ 210) में बिखरी है। आपका काम उसे एक नक्शे पर इकट्ठा करना है।
1विश्व का एक खाली बहिर्रेखा मानचित्र लीजिए या एटलस से देखकर बनाइए।
2ज़मीनी व्यापार के दो रास्ते तीर से दिखाइए।
3चाँदी के आने का रास्ता तीर से दिखाइए और हर पड़ाव का नाम लिखिए।
4भारतीय माल के समुद्री रास्ते और कॉफ़ी का रास्ता दिखाइए।
5भारत में तीर कहाँ पहुँचे, इसके लिए बंदरगाह एटलस से या अध्यापक से पूछकर चुनिए।
आपके नक्शे में ये इलाके और रास्ते होने चाहिए। (पृष्ठ 210, 215–217)
- ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार, जो मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों से होकर चलता था (पृष्ठ 215); और भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार (पृष्ठ 210)।
- चाँदी का रास्ता (स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप के कई राज्यों से होते हुए; थोड़ा हिस्सा तुर्की, और थोड़ा हिस्सा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से हिंदुस्तान (पृष्ठ 217)।
- कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की (पृष्ठ 217)।
- भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी, स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते थे; जापान की खानों की चाँदी भी डचों के ज़रिये भारत आती थी (पृष्ठ 217)।
- यूरोप: भारत से फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल जाने वाली वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं (पृष्ठ 217)।
- ! किताब इन रास्तों पर भारत के बंदरगाहों के नाम नहीं देती। भारत वाले तीर के सिरे के लिए एटलस या अध्यापक की मदद लीजिए।
सीख: नक्शे पर तीर खींचने से दिखता है कि मुग़ल साम्राज्य की नकद की अर्थव्यवस्था ज़मीन और समुद्र, दोनों रास्तों से दूर-दूर के इलाकों से जुड़ी थी।
2. पड़ोस के एक गाँव का दौरा (किताब का प्रश्न 11, पृष्ठ 223)
किताब कहती है कि पड़ोस के एक गाँव का दौरा कीजिए और पता कीजिए कि वहाँ कितने लोग रहते हैं, कौन सी फ़सलें उगाई जाती हैं, कौन से जानवर पाले जाते हैं, कौन से दस्तकार समूह रहते हैं, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और पंचायत किस तरह काम करती है। फिर सोलहवीं–सत्रहवीं सदी से तुलना कीजिए और परिवर्तन व निरंतरता दोनों की व्याख्या कीजिए। हमारी ओर से: यह दौरा समूह में, किसी अध्यापक या माता–पिता में से एक बड़े के साथ और गाँव के बड़े–बुज़ुर्गों से इजाज़त लेकर कीजिए। सिर्फ़ गिनती और किस्में लिखिए। किसी का नाम, जाति या तसवीर मत लीजिए, और किसी एक व्यक्ति या परिवार की ज़मीन के बारे में मत पूछिए।
1अध्यापक या किसी बड़े के साथ तय कीजिए कि कौन-सा पड़ोसी गाँव जाएँगे, और चार-पाँच साथियों के समूह में जाइए।
2गाँव पहुँचकर पहले बड़े–बुज़ुर्गों या पंचायत के किसी सदस्य से इजाज़त लीजिए।
3छह बातें लिखिए: लगभग कितने लोग, कौन सी फ़सलें, कौन से जानवर, कौन से दस्तकार समूह, महिलाओं के ज़मीन के मालिक होने की आम स्थिति (हाँ, ना या कहीं-कहीं), और पंचायत का ढंग।
4चार ख़ानों की तालिका बनाइए: पहलू | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी (किताब से) | आज का गाँव (आपकी जानकारी) | बदलाव या निरंतरता।
5हर बदलाव की वजह लिखिए, और जो चीज़ें आज भी वैसी हैं उन्हें निरंतरता के रूप में दिखाइए।
आपकी तालिका के किताब वाले ख़ाने इस तरह भरे होने चाहिए। (पृष्ठ 200–207)
- फ़सलें: खरीफ़ और रबी की फ़सलें, और जिन्स–ए–कामिल (पृष्ठ 200)।
- दस्तकार: कहीं–कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के (पृष्ठ 204)।
- महिलाएँ और ज़मीन: पंजाब में महिलाएँ ज़मीन बेचती थीं, और हिंदू व मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी (पृष्ठ 207)।
- पंचायत: बुज़ुर्गों की पंचायत, मुखिया, पटवारी और हर जाति की अपनी पंचायत (पृष्ठ 202–203)।
- ! आँकड़े वही लिखिए जो आपको गाँव में मिलें; अंदाज़ा हो तो उसे अंदाज़ा ही लिखिए।
सीख: जब एक ही तालिका में तब और अब आमने-सामने रखे जाते हैं, तो साफ़ दिखता है कि कौन-सी चीज़ बदली और कौन-सी चली आ रही है।
3.आइन का एक अंश और इतिहासकार का इस्तेमाल (किताब का प्रश्न 12, पृष्ठ 223)
किताब कहती है कि आइन का 10 से 12 पृष्ठ का एक छोटा-सा अंश चुनकर ध्यान से पढ़िए और ब्योरा दीजिए कि इतिहासकार उसका इस्तेमाल किस तरह कर सकता है। किताब आइन पढ़ने के लिए एक वेबसाइट बताती है। अंश की प्रति के लिए अपने स्कूल के पुस्तकालय या अध्यापक से मदद लीजिए। अंग्रेज़ी अनुवाद ब्लॉकमेन और एच. एस. जैरेट के हैं (पृष्ठ 220)।
1अध्यापक या पुस्तकालय की मदद से आइन का एक अंश लीजिए।
2लिखिए कि वह पाँच दफ़्तरों में से किस भाग का है।
3अंश में जो सूचनाएँ मिलें, उन्हें अलग-अलग लिखिए।
4लिखिए कि वह सूचना किसके नज़रिये से लिखी गई है।
5लिखिए कि जाँच के लिए इतिहासकार इसे और किन स्रोतों से मिलाएगा, और किन बातों से सावधान रहेगा।
आपकी जाँच इस तरह होनी चाहिए। (पृष्ठ 197, 217–220)
- अंश किस भाग से: आइन पाँच भागों (दफ़्तर) का संकलन है। पहला मंज़िल–आबादी शाही घर–परिवार पर है; तीसरा मुल्क–आबादी वित्त और राजस्व की दरों पर है और उसी में “बारह प्रांतों का बयान” है (पृष्ठ 218)।
- क्या सूचना मिलती है: सरकारों की तालिकाओं में आठ ख़ाने हैं, जैसे मापे गए इलाके, नक़द निर्धारित राजस्व, सुयूरग़ाल, ज़मींदार, उनकी जातियाँ और उनकी फ़ौज (पृष्ठ 218)।
- किसका नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में जो कुछ आइन से पता चलता है, वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है (पृष्ठ 197)।
- सावधानी: जोड़ की ग़लतियाँ, सूबों के आँकड़ों में विषमता (बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं), और कीमतें–मज़दूरी की विस्तृत सूची सिर्फ़ आगरा और आस-पास की (पृष्ठ 220)।
- इतिहासकार का इस्तेमाल: आइन के साथ-साथ मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गए गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ों और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है (पृष्ठ 197)। इन सीमाओं के बावजूद किताब आइन को अपने समय का असामान्य व अनोखा दस्तावेज़ कहती है (पृष्ठ 220)।
- ! अंश की जानकारी को सीधे किसानों की आवाज़ मत लिखिए।
सीख: आइन जैसा स्रोत जानकारी की खान है, पर उसे पढ़ने से पहले यह पूछना ज़रूरी है कि किसने, किसके लिए और किस नज़र से लिखा।
4. बाबर को क्या अनोखा लगा (किताब का किनारे का प्रश्न, पृष्ठ 198)
किताब का प्रश्न है कि कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगे। स्रोत 1 बाबरनामा का अंश है, जिसमें बाबर हिंदुस्तान की बस्तियों, पानी और आबादी के बारे में लिखता है।
1पृष्ठ 198 पर स्रोत 1 को एक बार पूरा पढ़िए।
2चार शीर्षक लिखिए: बस्तियाँ उजड़ना, बस्तियाँ बसना, घर और दीवार, आबादी।
3हर शीर्षक के नीचे वह बात लिखिए जो बाबर ने बताई।
4आख़िर में एक वाक्य में लिखिए कि किताब इन बातों से खेती के बारे में क्या नतीजा निकालती है।
आपकी जाँच इस तरह होनी चाहिए। (पृष्ठ 198)
- बाबर को सबसे ज़्यादा यह चौंकाता है कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ बहुत जल्दी उजड़ती और बसती थीं।
- उजड़ना: बरसों से बसे बड़े शहर के लोग भी चले जाएँ तो डेढ़ दिन में उनका हर नामोनिशान मिट जाता था।
- बसना: पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी, क्योंकि सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं; लोग एक सरोवर या कुआँ बना लेते थे।
- घर और दीवार: खस की घास बहुत थी और जंगल अपार थे, इसलिए झोंपड़ियाँ बनाकर यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता था।
- आबादी: आबादी इतनी थी कि लोग उमड़ते चले आते थे।
- नतीजा: किताब कहती है कि ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से खेती लगातार फैलती रही।
सीख: बाबर की नज़र से दिखता है कि ज़मीन और मज़दूर आसानी से मिलने के कारण बस्तियाँ और खेत जल्दी बस और उजड़ सकते थे।
5. बाबर की सिंचाई और विजयनगर की सिंचाई (किताब का किनारे का प्रश्न, पृष्ठ 199)
किताब पूछती है कि बाबर ने सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र किया है, उनकी तुलना विजयनगर (अध्याय 7) की सिंचाई व्यवस्था से कीजिए; दोनों प्रणालियों में किस तरह के संसाधन लगते होंगे; और किनमें किसानों की भागीदारी ज़रूरी रही होगी। विजयनगर में धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़ बनाए गए थे; एक बड़े हौज़ से आस-पास के खेत सींचे जाते थे, और तुंगभद्रा पर बने बाँध से हिरिया नहर पानी लाती थी। बाबर के अंश में रहट और बालटी का वर्णन है।
1कॉपी में दो स्तंभ बनाइए: बाबर के साधन | विजयनगर के साधन।
2हर स्तंभ में साधन का नाम और पानी उठाने या लाने का तरीक़ा लिखिए।
3हर साधन के आगे लिखिए कि उसमें क्या-क्या लगता होगा: कुआँ, लकड़ी, रस्सी, बैल, मज़दूर या बहुत सारा सामान।
4अंत में अपना अनुमान लिखिए कि किसके सुधार में किसान सीधे शामिल रहे होंगे, और कारण दीजिए।
आपकी तालिका इस तरह होनी चाहिए। (पृष्ठ 199–200)
- बाबर के साधन: लाहौर और दीपालपुर में रहट: रस्सी के फंदों पर लकड़ी के गुटके और घड़े, पहिये, और बैल से घूमने वाला दाँतों वाला पहिया; पानी एक संकरे नाले से खेत तक। आगरा, चाँदवर और बयाना में बालटी: लकड़ी के कन्ने, बेलन, रस्सी और बैल; एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा बालटी से पानी निकालता।
- संसाधन: रहट और बालटी के लिए कुआँ, लकड़ी, रस्सी, घड़े, बैल और दो-एक आदमी काफ़ी थे; बाँध, बड़े हौज़ और नहरें बनाने में बहुत मज़दूर, सामान और शासकों की ताकत लगती होगी।
- किसानों की भागीदारी: रहट और बालटी एक कुएँ पर दो-एक आदमी और बैलों से चलते थे, इसलिए उनमें सुधार किसानों की भागीदारी से ही होता होगा; बड़ी नहरों और हौज़ों में शासकों की भूमिका बड़ी थी, हालाँकि उनके पानी का इस्तेमाल किसान ही करते थे।
- ! यह अनुमान का प्रश्न है; “होता होगा” की भाषा में लिखिए, पक्की बात की तरह नहीं।
सीख: साधन छोटा हो या बड़ा, यह देखने से कि उसे कौन चलाता है, पता चलता है कि सुधार किसके हाथ में था।
6. खेती की तकनीकें: भाग I से तुलना (चर्चा कीजिए, पृष्ठ 201)
किताब पूछती है कि इस अनुभाग में खेती की जिन क्रियाओं और तकनीकों की चर्चा हुई है, उनमें से कौन-सी भाग I के अध्याय 2 (राजा, किसान और नगर) में बताई तकनीकों से मिलती-जुलती हैं और कौन-सी भिन्न हैं। अध्याय 2 में लोहे के फाल वाला हल छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में फैला; सिंचाई कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरों से होती थी; और गंगा की घाटी में धान की रोपाई होती थी, यानी बीज अंकुरित करके पानी भरे खेत में पौधे लगाना।
1पृष्ठ 198–201 से इस अध्याय की खेती की तकनीकें एक सूची में लिखिए।
2अध्याय 2 की तीन बातें (हल, सिंचाई, धान की रोपाई) एक-एक करके इस सूची से मिलाइए।
3दो स्तंभ बनाइए: मिलती-जुलती | भिन्न।
4जो तकनीक इस अध्याय में नयी हो, उसे तीसरी पंक्ति में अलग लिखिए।
आपकी तुलना इस तरह होनी चाहिए। (पृष्ठ 198–201)
- मिलती-जुलती (हल): मुग़ल काल में लकड़ी का हलका हल था जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी।
- मिलती-जुलती (सिंचाई): अध्याय 2 में कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरें थीं; यहाँ कुएँ, रहट और बालटी, और राज्य की खुदवाई नहरें, जैसे शाहजहाँ के समय पंजाब की शाह नहर।
- भिन्न: अध्याय 2 में गंगा की घाटी की धान की रोपाई है; यहाँ बीज ज़्यादातर हाथ से छिड़ककर बोए जाते थे।
- इस अध्याय में नया: बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा; गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी की मूठ वाले लोहे के पतले धार; खरीफ़ और रबी, कहीं साल में तीन फ़सलें; जिन्स–ए–कामिल; नयी फ़सलें (अफ्रीका और स्पेन के रास्ते मक्का; नयी दुनिया से टमाटर, आलू, मिर्च)।
- ! बरमा का नाम सुनकर यह मत लिख दीजिए कि सारी बुआई उसी से होती थी; बीज हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था।
सीख: तुलना में पहले दोनों तरफ़ की बात लिखिए, फिर देखिए कि क्या समान है, क्या अलग और क्या नया।
अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए
| आपके उत्तर में | तो |
|---|---|
| स्रोत या तथ्य किताब से सही उठाया, उससे नतीजा निकाला और अपना कारण लिखा | उत्तर पूरा है। |
| किताब का हवाला दिया, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता है | हर हवाले के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात पता चलती है। |
| 85 फ़ीसदी को किसानों की संख्या लिखा | यह गाँवों में रहने वाले लोगों का आँकड़ा है (पृष्ठ 196)। केस 1 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| आइन को किसानों की अपनी आवाज़ लिखा | किताब के अनुसार आइन से किसानों के बारे में जो पता चलता है, वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया” है (पृष्ठ 197)। केस 1 का प्रश्न 4, केस 12 का प्रश्न 5 और भाग ख का प्रश्न 10 फिर से कीजिए। |
| खुद–काश्त और पाहि–काश्त के नाम उलट दिए | अपने गाँव में रहने वाला किसान खुद–काश्त है, दूसरे गाँव से ठेके पर खेती करने आने वाला पाहि–काश्त (पृष्ठ 198)। केस 2 का प्रश्न 2 और भाग ख का प्रश्न 8 फिर से कीजिए। |
| रहट और बालटी को एक ही तरीक़ा लिखा | रहट में रस्सी के गोलाकार फंदों पर घड़े बाँधे जाते हैं; बालटी की रस्सी बेलन पर लपेटी जाती है (पृष्ठ 199)। केस 3 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| आबादी की बढ़ोतरी को “1600 से 1700 के बीच” लिखा | अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है, इसलिए यह 1600 से 1800 के बीच लगभग 5 करोड़, करीब 33 फ़ीसदी है (पृष्ठ 200)। केस 3 का प्रश्न 6 फिर से कीजिए। |
| ग़रीबी का कारण ज़मीन की कमी लिखा | किताब के अनुसार खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी; कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे (पृष्ठ 201)। केस 4 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| पंचायत को सबकी बराबर नुमाइंदगी वाली सभा लिखा | पंचायत में गाँव के बुज़ुर्ग होते थे, आम तौर पर जिनके पास संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे; किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है (पृष्ठ 202)। केस 5 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| गाँव छोड़कर भाग जाने को किसान की कमज़ोरी लिखा | किताब इसे किसान का प्रभावी हथियार बताती है (पृष्ठ 204)। केस 5 का प्रश्न 5 फिर से कीजिए। |
| “छोटा गणराज्य” को किताब की अपनी राय लिखा | यह उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी, जिससे किताब सहमत नहीं (पृष्ठ 205)। केस 6 का प्रश्न 4 और भाग ख का प्रश्न 9 फिर से कीजिए। |
| “दुलहन की कीमत” को दहेज लिखा | कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करनी होती थी, दहेज नहीं (पृष्ठ 207)। केस 7 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए। |
| राजशाही को सबसे बड़ी ज़मींदारी लिखा | किताब उसे अठारहवीं सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक कहती है (पृष्ठ 207)। केस 7 का प्रश्न 5 फिर से कीजिए। |
| “जंगली” का मतलब असभ्य लिखा | यह नाम उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था (पृष्ठ 208)। केस 8 का प्रश्न 1 और भाग ख का प्रश्न 4 फिर से कीजिए। |
| ज़मींदार को खुद खेत जोतने वाला किसान लिखा | ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे (पृष्ठ 211)। केस 9 का प्रश्न 1 और भाग ख का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| ज़मींदारों को सिर्फ़ शोषक या सिर्फ़ संरक्षक लिखा | किताब कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था”, पर रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी था (पृष्ठ 212–213)। केस 9 का प्रश्न 5 और भाग ख का प्रश्न 7 फिर से कीजिए। |
| जमा और हासिल को एक ही रक़म लिखा | जमा निर्धारित रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म (पृष्ठ 213)। केस 10 का प्रश्न 1 और भाग ख का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| परौती को पाँच साल से खाली ज़मीन लिखा | पाँच या उससे ज़्यादा वर्ष खाली रहने वाली ज़मीन बंजर कहलाती थी; परौती पर कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती थी (पृष्ठ 214)। केस 10 का प्रश्न 2, भाग ख का प्रश्न 3 और भाग ग का प्रश्न 1 फिर से कीजिए। |
| खेत बटाई और लाँग बटाई का समय उलट दिया | खेत बटाई में बुआई के बाद खेत बँटते हैं, लाँग बटाई में कटाई के बाद फ़सल का ढेर बँटता है (पृष्ठ 215)। केस 10 का प्रश्न 3 और भाग ग का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| भारत की अपनी खानों से चाँदी आना लिखा | भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; निर्यात के भुगतान के रूप में चाँदी बाहर से आई (पृष्ठ 216)। केस 11 का प्रश्न 1 और भाग ख का प्रश्न 5 फिर से कीजिए। |
| आइन–ए–अकबरी को अकबरनामा से अलग किताब लिखा | अकबरनामा तीन जिल्दों में रचा गया, और तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी है (पृष्ठ 217)। केस 12 का प्रश्न 1 और भाग ख का प्रश्न 6 फिर से कीजिए। |
| खेती और ज़मींदारों के आँकड़े आइन के पहले भाग में बताए | वे तीसरे भाग मुल्क–आबादी में हैं; पहला भाग मंज़िल–आबादी शाही घर–परिवार पर है (पृष्ठ 218)। केस 12 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
इनमें से जिस पंक्ति में आपका उत्तर बैठता है, उसमें बताया प्रश्न फिर से हल कीजिए और अपना उत्तर ऊपर दिए उत्तर से मिलाइए।