अध्याय 5यात्रियों के नज़रिए

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 5

ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के स्रोत पढ़ना, प्रमाण से नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।

तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए। ! वाली पंक्ति उस चूक की ओर इशारा करती है जो अक्सर हो जाती है।


भाग क — केस-आधारित प्रश्न

केस 1 — शुरुआत: यात्री क्या देखते हैं (पृष्ठ 115–116)

किताब का उदाहरण: अध्याय की शुरुआत बताती है कि महिलाओं और पुरुषों ने काम की तलाश में, प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए, व्यापारी, सैनिक, पुरोहित और तीर्थयात्री बनकर, या साहस की भावना से प्रेरित होकर यात्राएँ की हैं। यह अध्याय तीन लोगों के वृत्तांतों पर टिका है: ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) से आए अल–बिरूनी (ग्यारहवीं शताब्दी), मोरक्को के इब्न बतूता (चौदहवीं शताब्दी) और फ्रांसीसी यात्री फ्रांस्वा बर्नियर (सत्रहवीं शताब्दी)। किताब यह भी बताती है कि कई यात्रियों ने नारियल और पान जैसी चीज़ों को असामान्य माना।

1अल–बिरूनी, इब्न बतूता और बर्नियर किस-किस शताब्दी में और कहाँ से आए थे? 2 अंक

उत्तर देखिए

तीनों अलग-अलग शताब्दियों में और अलग-अलग देशों से आए थे। (पृष्ठ 115)

  • ★अल–बिरूनी ग्यारहवीं शताब्दी में ख़्वारिज़्म (आज के उज़्बेकिस्तान) से आया (पृष्ठ 116)।
  • इब्न बतूता चौदहवीं शताब्दी में मोरक्को से आया।
  • बर्नियर सत्रहवीं शताब्दी में फ्रांस से आया।

2बाहर से आए यात्री रोज़ की गतिविधियों और प्रथाओं पर इतना ध्यान क्यों देते थे? किताब के अनुसार इससे यात्रा-वृत्तांतों में क्या ख़ास बात आती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

क्योंकि वे बिलकुल अलग सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से आए थे। (पृष्ठ 116)

  • ★किताब कहती है: “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।”
  • यानी जो बात यहाँ के लेखक लिखने लायक नहीं समझते थे, उसे बाहर का यात्री नई चीज़ की तरह दर्ज करता था।
  • नज़रिए का यही फ़र्क यात्रा-वृत्तांतों को रोचक बनाता है।

आगे हर यात्री के नज़रिए को अलग से देखिए: वह क्या देखता है और कैसे लिखता है, यह उसका अपना नज़रिया तय करता है।


केस 2 — अल–बिरूनी: ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी (पृष्ठ 116)

किताब का उदाहरण: अल–बिरूनी का जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आधुनिक उज़्बेकिस्तान में है। ख़्वारिज़्म शिक्षा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र था। वह सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत समेत कई भाषाएँ जानता था। यूनानी भाषा नहीं जानता था, फिर भी प्लेटो और दूसरे यूनानी दार्शनिकों के काम उसने अरबी अनुवादों के ज़रिए पढ़े थे। सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद वहाँ के कई विद्वानों और कवियों को अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया।

1अल–बिरूनी कहाँ से आया था? वह ग़ज़नी कैसे पहुँचा, और वहाँ उसका मन कैसा रहा? 3 अंक

उत्तर देखिए

वह ख़्वारिज़्म से आया था, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है; सन् 1017 ई. में सुल्तान महमूद के आक्रमण के बाद वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया। (पृष्ठ 116)

  • ★उसका जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ था। वह अपनी इच्छा से नहीं गया; सुल्तान महमूद ख़्वारिज़्म के कई विद्वानों और कवियों को अपनी राजधानी ले गया था।
  • धीरे-धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा, और अपनी मृत्यु तक वह वहीं रहा।
  • ! “अल–बिरूनी, जो ग्यारहवीं शताब्दी में उज़्बेकिस्तान आया था” (पृष्ठ 115 पर यही छपा है): सही बात यह है कि वह उज़्बेकिस्तान से आया था। उसका जन्म ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है।

2ग़ज़नी में अल–बिरूनी की भारत में रुचि जगी। किताब इसे असामान्य बात क्यों नहीं मानती? 3 अंक

उत्तर देखिए

क्योंकि संस्कृत और अरबी की दुनिया के बीच ज्ञान का लेन-देन पहले से चल रहा था। (पृष्ठ 116)

  • आठवीं शताब्दी से ही संस्कृत में लिखे खगोल-विज्ञान, गणित और चिकित्सा के ग्रंथों का अरबी में अनुवाद होने लगा था।
  • पंजाब के ग़ज़नवी साम्राज्य का हिस्सा बनने के बाद स्थानीय लोगों से हुए संपर्कों ने आपसी विश्वास और समझ का माहौल बनाया।
  • ★अल–बिरूनी ने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर संस्कृत, धर्म और दर्शन का ज्ञान पाया।

3कई भाषाएँ जानने से अल–बिरूनी को क्या करने में मदद मिली? यूनानी न जानने पर भी वह यूनानी दार्शनिकों को कैसे पढ़ सका? 3 अंक

उत्तर देखिए

कई भाषाएँ जानने से वह भाषाओं की तुलना कर सका और ग्रंथों का अनुवाद भी। (पृष्ठ 116)

  • उसने पतंजलि के व्याकरण के ग्रंथ समेत कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया।
  • ★अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए उसने यूक्लिड (एक यूनानी गणितज्ञ) के कार्यों का संस्कृत में अनुवाद किया।
  • यूनानी वह नहीं जानता था; प्लेटो और दूसरे यूनानी दार्शनिकों के काम उसने अरबी अनुवादों के ज़रिए पढ़े थे।

केस 3 —किताब–उल–हिन्द: उद्देश्य, बनावट और नाम (पृष्ठ 116–117)

किताब का उदाहरण: अल–बिरूनी की कृति किताब–उल–हिन्द अरबी में है और इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है। स्रोत 1 में वह अपना उद्देश्य बताता है: “उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं।” किताब के बॉक्स में “हिंदू” शब्द का इतिहास भी दिया है।

1किताब–उल–हिन्द किस भाषा में है, कितने अध्यायों में बँटी है, और उसमें किन विषयों की बात है? 3 अंक

उत्तर देखिए

यह अरबी में है और अस्सी अध्यायों में बँटा एक विस्तृत ग्रंथ है। (पृष्ठ 117)

  • ★भाषा सरल और स्पष्ट है।
  • विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल-विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक-जीवन, भार-तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि।
  • ! इसे संस्कृत या फ़ारसी में लिखी कृति बताना ग़लत है।

2किताब–उल–हिन्द के हर अध्याय की बनावट कैसी थी? कुछ विद्वान उसे “लगभग ज्यामितीय” क्यों कहते हैं? 3 अंक

उत्तर देखिए

सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) हर अध्याय तीन हिस्सों में चलता था। (पृष्ठ 117)

  • अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता था।
  • फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता था।
  • अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना होती थी।
  • ★आज के कुछ विद्वान इस “लगभग ज्यामितीय संरचना” का एक मुख्य कारण अल–बिरूनी का गणित की ओर झुकाव मानते हैं।

यह संरचना अपनी स्पष्टता और पूर्वानुमेयता के लिए जानी जाती है।

3“हिंदू” शब्द कहाँ से आया? किताब इसके धार्मिक अर्थ के बारे में क्या कहती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

यह लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला, जो सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए था। (पृष्ठ 117)

  • अरबों ने इस क्षेत्र को “अल–हिंद” और यहाँ के निवासियों को “हिंदी” कहा।
  • बाद में तुर्कों ने सिंधु के पूर्व में रहने वालों को “हिंदू”, उनके क्षेत्र को “हिंदुस्तान” और उनकी भाषा को “हिंदवी” कहा।
  • ★किताब कहती है: “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।”
  • ! “हिंदू शब्द शुरू से एक धर्म का नाम था” लिखना ग़लत है।

4अल–बिरूनी की कृति को भारत में कितने लोगों ने पढ़ा होगा, इस बारे में किताब क्या कहती है? 2 अंक

उत्तर देखिए

किताब के अनुसार “1500 ई. से पहले भारत में अल–बिरूनी को कुछ ही लोगों ने पढ़ा होगा”। (पृष्ठ 117)

  • ★किताब “होगा” कहती है: यह अनुमान है, पक्की संख्या नहीं।
  • भारत से बाहर कई लोग उसे शायद पढ़ चुके थे।

केस 4 — इब्न बतूता कारिह्ला: एक आरंभिक विश्व-यात्री (पृष्ठ 118–121)

किताब का उदाहरण: इब्न बतूता मोरक्को के तैंजियर का रहने वाला था। उसका परिवार इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था। 1332–33 में भारत के लिए निकलने से पहले वह मक्का की तीर्थ यात्राएँ, और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाहों की यात्राएँ कर चुका था। सन् 1333 में मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से वह सिंध पहुँचा। स्रोत 2 में वह लिखता है कि तैंजियर से अकेला निकला, बिना किसी साथी या कारवाँ के, और “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।”

1इब्न बतूता ज्ञान के किस स्रोत को ज़्यादा महत्त्वपूर्ण मानता था? उसकी यात्रा कितने समय चली? 3 अंक

उत्तर देखिए

वह पुस्तकों की जगह यात्राओं से मिले अनुभव को ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था। (पृष्ठ 118)

  • ★किताब कहती है: “इब्न बतूता 1354 में घर वापस पहुँचा, अपनी यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद।”
  • स्रोत 2 के अनुसार वह तैंजियर से निकला तब उसकी उम्र बाईस वर्ष थी।

2दिल्ली में इब्न बतूता के साथ क्या-क्या हुआ? 1342 ई. में उसे कहाँ जाने का आदेश दिया गया? 3 अंक

उत्तर देखिए

सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसकी विद्वता से प्रभावित होकर उसे दिल्ली का क़ाज़ी बनाया। (पृष्ठ 118)

  • वह कई वर्ष इस पद पर रहा, फिर सुल्तान का विश्वास खो बैठा और कारागार में डाला गया।
  • ग़लतफ़हमी दूर होने पर उसे फिर राजकीय सेवा में लिया गया।
  • ★1342 ई. में उसे सुल्तान के दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया गया।
  • ! “इब्न बतूता दिल्ली में हमेशा क़ाज़ी बना रहा” ग़लत है।

3किताब के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में यात्रा कितनी कठिन थी? ख़तरे केवल डाकुओं के ही थे क्या? 3 अंक

उत्तर देखिए

चौदहवीं शताब्दी में यात्रा आज की तुलना में कहीं ज़्यादा कठिन और जोखिम भरी थी। (पृष्ठ 119–120)

  • इब्न बतूता के अनुसार मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में चालीस दिन और सिंध से दिल्ली की यात्रा में लगभग पचास दिन लगे।
  • उसने कई बार डाकुओं के समूहों के हमले झेले। मुल्तान से दिल्ली जाते हुए उसके कारवाँ पर हमला हुआ: कई साथी यात्री मारे गए, और जो बचे, जिनमें इब्न बतूता भी था, बुरी तरह घायल हुए।
  • ★लुटेरे ही अकेला ख़तरा नहीं थे: यात्री को घर की याद सता सकती थी और वह बीमार पड़ सकता था। इब्न बतूता को बुखार ने जकड़ लिया था, और कमज़ोरी के कारण गिरने से बचने के लिए उसने पगड़ी का कपड़ा ज़ीन से बाँध लिया।

4रिह्ला के वृत्तांत किसने लिखे और क्यों? स्रोत 3 उनके बारे में क्या कहता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

इब्न बतूता के बोले हुए वृत्तांत इब्न जुज़ाई ने लिखे। (पृष्ठ 120–121)

  • घर लौटने पर वहाँ के शासक ने आदेश दिया कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ, और इब्न जुज़ाई इसी काम के लिए नियुक्त हुआ।
  • राजा ने देखे गए शहरों, याद रह गई रोचक घटनाओं, मिले हुए शासकों, उनके महान साहित्यकारों और धर्मनिष्ठ संतों का वृत्तांत लिखवाने को कहा।
  • ★स्रोत 3 के अनुसार ऐसा कथानक बना “जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी।”

यानी इन कहानियों से शिक्षा भी मिलनी थी और मनोरंजन भी; स्रोत 3 का शीर्षक भी यही है: “शिक्षा तथा मनोरंजन”।

51400 से 1800 के बीच भारत आए यात्रियों में महमूद वली बल्खी और शेख़ अली हाज़िन में क्या फ़र्क़ था? 2 अंक

उत्तर देखिए

दोनों का अनुभव उलटा रहा। (पृष्ठ 121)

  • ★महमूद वली बल्खी (1620 के दशक) भारत से इतना सम्मोहित हुआ कि कुछ समय के लिए संन्यासी भी बन गया।
  • शेख़ अली हाज़िन (1740 के दशक) भारत से निराश हुआ, यहाँ तक कि घृणा भी करने लगा।
  • ! संन्यासी बनने वाला हाज़िन नहीं, बल्खी था।

केस 5 — फ्रांस्वा बर्नियर: एक चिकित्सक जो तुलना करता था (पृष्ठ 122–123)

किताब का उदाहरण: बर्नियर फ्रांस का रहने वाला चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार था। कई और लोगों की तरह वह भी मुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया था। वह 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में रहा। स्रोत 4 में वह कश्मीर की ओर जाती मुग़ल सेना के साथ अपनी यात्रा का सामान गिनाता है।

1बर्नियर कौन था? भारत में उसने किन-किन के साथ समय बिताया? 2 अंक

उत्तर देखिए

वह फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार था, जो बारह वर्ष (1656 से 1668 तक) भारत में रहा। (पृष्ठ 122)

  • ★वह मुग़ल दरबार से नज़दीकी से जुड़ा रहा: पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह के चिकित्सक के रूप में।
  • बाद में वह मुग़ल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में रहा।
  • किताब में एक और फ्रांसीसी का नाम आता है: जौहरी ज्यौं–बैप्टिस्ट तैवर्नियर, जिसने कम से कम छह बार भारत की यात्रा की।

2बर्नियर अपनी देखी हुई बातों की तुलना किससे करता था? किताब उसकी तुलना के नतीजे के बारे में क्या कहती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

वह सामान्यत: भारत में जो देखता था, उसकी तुलना यूरोप की स्थिति से करता था। (पृष्ठ 122)

  • उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक लुई चौदहवें को समर्पित की; उसके कई दूसरे कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को लिखे पत्रों के रूप में थे।
  • ★किताब के शब्दों में: “लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।”
  • किताब यह भी कहती है कि उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था, फिर भी छपने पर उसके वृत्तांत बहुत प्रसिद्ध हुए।

इसलिए बर्नियर को पढ़ते समय उसके निष्कर्ष और किताब के साक्ष्य, दोनों को साथ रखिए।

3बर्नियर के वृत्तांत पाठकों तक कैसे पहुँचे? अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों से यह तरीक़ा किस तरह अलग था? 3 अंक

उत्तर देखिए

बर्नियर के कार्य छपकर फैले, जबकि अरबी और फ़ारसी वृत्तांत हस्तलिपियों में। (पृष्ठ 123)

  • बर्नियर के कार्य फ्रांस में 1670–71 में छपे और अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में उनका अनुवाद हो गया।
  • 1670 और 1725 के बीच फ्रांसीसी में वह आठ बार और 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार दोबारा छपा।
  • ★अरबी और फ़ारसी वृत्तांत हस्तलिपियों के रूप में फैलते थे और 1800 से पहले सामान्यत: छपते नहीं थे।
  • ! “बर्नियर के वृत्तांत 1800 के बाद छपे” ग़लत है; 1800 से पहले सामान्यत: न छपने वाले वृत्तांत अरबी और फ़ारसी के थे।

4स्रोत 4 में बर्नियर सेना के साथ यात्रा के लिए क्या-क्या रखता था? उनमें से आज आप यात्रा में क्या ले जाएँगे, और क्यों? 3 अंक

उत्तर देखिए

उसकी सूची में सवारी और सेवक भी हैं और रहने-खाने का सामान भी। (पृष्ठ 123)

  • सवारी और साथ चलने वाले: दो अच्छे तुर्कमान घोड़े (उस देश की प्रथा के अनुसार उसे रखने होते थे), एक फ़ारसी ऊँट और चालक, घोड़ों का साईस, एक खानसामा और पानी का पात्र लेकर घोड़े के आगे चलने वाला सेवक।
  • रहने का सामान: औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश।
  • खाने का सामान: पाँच या छह दिनों के लिए बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला।
  • ★आज के लिए आपका चुनाव आपका अपना है; ज़रूरी यह है कि आप हर चीज़ के साथ कारण लिखें। जैसे, पानी का पात्र और बिछौना आज भी काम आएँगे, पर घोड़ा और ऊँट शायद नहीं।

बर्नियर ने लिखा है: “इस देश में नींबू के शरबत और दही से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती।”


केस 6 — अल–बिरूनी: समझने की बाधाएँ और जाति का विवरण (पृष्ठ 124–125)

किताब का उदाहरण: अल–बिरूनी जानता था कि अपने लिए तय किए उद्देश्य में कौन-सी समस्याएँ छिपी हैं। उसने कई “अवरोधों” की चर्चा की, जो उसके अनुसार समझने में बाधक थे। फिर भी वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा। जाति व्यवस्था को समझाने के लिए उसने दूसरे समाजों में मिलते-जुलते रूप खोजे।

1अल–बिरूनी ने समझने के रास्ते में कौन-से तीन अवरोध गिनाए? पहले अवरोध की कठिनाई क्या थी? 3 अंक

उत्तर देखिए

उसके तीन अवरोध थे: भाषा, धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता, और अभिमान। (पृष्ठ 124)

  • ★पहला अवरोध भाषा: उसके अनुसार संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों और सिद्धांतों को एक भाषा से दूसरी में अनुवाद करना आसान नहीं था।
  • किताब के बॉक्स में वह कहता है कि संस्कृत सीखने की कठिनाई पार करना आसान नहीं। अरबी की तरह उसकी पहुँच शब्दों और विभक्तियों, दोनों में बहुत विस्तृत है।
  • एक ही वस्तु के लिए कई शब्द होते हैं, और एक ही शब्द कई वस्तुओं के लिए आता है।

2इन अवरोधों को जानते हुए भी अल–बिरूनी किन ग्रंथों पर टिका रहा? इसका उसके विवरण पर क्या असर पड़ा? 3 अंक

उत्तर देखिए

वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा। (पृष्ठ 124)

  • भारतीय समाज को समझने के लिए उसने अकसर वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत किए।
  • ★जाति व्यवस्था का उसका विवरण इन नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से गहराई से प्रभावित था, और इन ग्रंथों में नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे। (पृष्ठ 125)

किताब आगे जोड़ती है कि वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी। (पृष्ठ 125)

3“ईश्वर ही जानता है!” अल–बिरूनी ने यह कब कहा? इससे उसके सोचने के ढंग के बारे में क्या पता चलता है? 2 अंक

उत्तर देखिए

उसने एक कहानी सुनी कि लकड़ी की एक मूर्ति कथित रूप से 216,432 वर्षों तक बची रही। (पृष्ठ 124)

  • ★उसने पूछा कि जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र होती है, वहाँ लकड़ी इतने लंबे समय तक कैसे बची रही होगी। फिर कहा: “ईश्वर ही जानता है!”
  • किताब इसे इस बात का उदाहरण देती है कि यात्री हमेशा सुनी हुई बातों पर विश्वास नहीं करते थे।

4अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था को समझने के लिए क्या तरीक़ा अपनाया? अपवित्रता की मान्यता पर उसका मत क्या था, और उसके विवरण की सीमा क्या है? 4 अंक

उत्तर देखिए

उसने दूसरे समाजों में मिलते-जुलते रूप खोजकर इसे समझने और समझाने का प्रयास किया। (पृष्ठ 124–125)

  • उसने लिखा कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी, यानी वह दिखाना चाहता था कि ऐसे वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे। साथ ही उसने बताया कि इस्लाम में सभी लोगों को समान माना जाता था।
  • स्रोत 5 में वह हिंदुओं के ग्रंथों के आधार पर चार वर्ण गिनाता है: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र।
  • ★ब्राह्मणवादी व्याख्या मानने के बावजूद उसने अपवित्रता की मान्यता नहीं मानी। उसके अनुसार जो वस्तु अपवित्र होती है, वह अपनी पवित्रता की स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है: सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र का नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता। इसलिए अपवित्रता की अवधारणा उसे प्रकृति के नियमों के विरुद्ध लगी।
  • सीमा: उसका विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे ग्रंथों पर टिका था। वास्तविक जीवन में व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी।
  • उदाहरण: अंत्यज (शाब्दिक अर्थ “व्यवस्था से परे”) कहलाने वाली श्रेणियों से किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी। वे अकसर सामाजिक प्रताड़ना का शिकार होते थे, फिर भी उन्हें आर्थिक तंत्र में शामिल किया जाता था।
  • ! “अल–बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता भी मान ली” ग़लत है।

केस 7 — नारियल और पान: अनजाने को जाने-पहचाने से समझाना (पृष्ठ 126)

किताब का उदाहरण: इब्न बतूता की वर्णन-विधि के कुछ बेहतरीन उदाहरण नारियल और पान के विवरण में मिलते हैं। ये दो ऐसी वानस्पतिक उपज थीं जिनसे उसके पाठक पूरी तरह अपरिचित थे। स्रोत 6 में वह नारियल बताता है, स्रोत 7 में पान।

1अपने पाठकों को नारियल समझाने के लिए इब्न बतूता ने किन जानी-पहचानी चीज़ों से तुलना की? 3 अंक

उत्तर देखिए

उसने नारियल को खजूर के पेड़ और मानव सिर जैसी चीज़ों से जोड़कर समझाया। (पृष्ठ 126)

  • ★वृक्ष बिलकुल खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं; अंतर बस इतना कि एक से काष्ठफल मिलता है और दूसरे से खजूर।
  • फल मानव सिर से मेल खाता है: मानो दो आँखें और एक मुख हों, अंदर का हरा भाग मस्तिष्क जैसा, और जुड़ा रेशा बालों जैसा।
  • रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय इसी से जहाज़ सिले जाते हैं।

2पान का वर्णन करते हुए इब्न बतूता ने किन चीज़ों से उसकी तुलना की? पान कैसे खाया जाता है, यह वह क्या बताता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

उसने पान को अंगूर की लता और सुपारी को जायफल जैसा बताया। (पृष्ठ 126)

  • पान अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है। इसका कोई फल नहीं होता, इसे केवल पत्तियों के लिए उगाते हैं।
  • खाने से पहले सुपारी ली जाती है, जो जायफल जैसी होती है। उसके छोटे-छोटे टुकड़े करके मुँह में रखकर चबाते हैं, फिर पान की पत्तियों के साथ।
  • ★तरीक़ा वही है: अनजानी चीज़ को पाठक की जानी-पहचानी चीज़ (खजूर, मानव सिर, अंगूर-लता, जायफल) से जोड़ना।

3इब्न बतूता जिन कहानियों के बीच रहा, उनमें अपरिचित बातों को विशेष रूप से क्यों उभारा जाता था? उन कहानियों में और क्या-क्या होता था? 3 अंक

उत्तर देखिए

ताकि सुनने या पढ़ने वाले दूर के, पर सुगम्य देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हो सकें। (पृष्ठ 126)

  • इब्न बतूता ने ऐसे शहरी केंद्रों की विश्ववादी संस्कृति का उपभोग किया जहाँ अरबी, फ़ारसी, तुर्की और दूसरी भाषाएँ बोलने वाले लोग विचार, सूचनाएँ और उपाख्यान बाँटते थे।
  • इन कहानियों में अपनी धर्मनिष्ठता के लिए प्रसिद्ध लोग थे, निर्दयी और दयावान दोनों हो सकने वाले राजा थे, और सामान्य पुरुषों और महिलाओं के जीवन की बातें थीं।
  • ★जो कुछ अपरिचित होता, उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था।

केस 8 — दिल्ली, ताराबबाद और डाक (पृष्ठ 127–129)

किताब का उदाहरण: इब्न बतूता ने दिल्ली और दौलताबाद के बड़े शहर देखे। स्रोत 8 में वह दिल्ली की प्राचीर और द्वारों का वर्णन करता है, स्रोत 9 में दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद का, और स्रोत 10 में डाक की दो व्यवस्थाओं का: अश्व डाक उलुक और पैदल डाक दावा।

1इब्न बतूता ने दिल्ली और दौलताबाद को कैसा बताया? स्रोत 8 में दिल्ली की प्राचीर के बारे में क्या लिखा है? 3 अंक

उत्तर देखिए

वह दिल्ली को बड़ा शहर, विशाल आबादी वाला और भारत में सबसे बड़ा बताता है; दौलताबाद (महाराष्ट्र में) आकार में उसे चुनौती देता था। (पृष्ठ 127)

  • ★शहर के चारों ओर की प्राचीर अतुलनीय है; दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है (किताब के कोष्ठक में: एक हाथ लगभग 20 इंच के बराबर)।
  • प्राचीर के भीतर रात के पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष हैं, और खाद्यसामग्री, हथियार, बारूद और घेरेबंदी की मशीनों के भंडारगृह।
  • शहर के अट्ठाईस द्वार हैं, जिन्हें दरवाज़ा कहते हैं: बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल है, मांडवी दरवाज़े के भीतर अनाज मंडी है और गुल दरवाज़े की बगल में फलों का बगीचा है।
  • तत्कालीन ग्रंथों में दिल्ली को अकसर “देहली” लिखा गया।

2किताब के अनुसार बाज़ार केवल ख़रीद-बिक्री की जगह क्यों नहीं थे? ताराबबाद कहाँ था और वहाँ क्या होता था? 3 अंक

उत्तर देखिए

बाज़ार सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे। (पृष्ठ 128)

  • ज़्यादातर बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कम से कम कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए जगह तय थी।
  • ★ताराबबाद दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार था, जो इब्न बतूता के अनुसार सबसे विशाल और सुंदर बाज़ारों में से एक था।
  • उसके बीच एक विशाल गुंबद था, जहाँ हर गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख बैठते और गायिकाएँ झुंडों में आकर गाती और नाचती थीं।
  • ! “ताराबबाद दिल्ली का बाज़ार था” ग़लत है; वह दौलताबाद में था।

3इतिहासकार इब्न बतूता के वृत्तांत से शहरों की समृद्धि के बारे में क्या तर्क निकालते हैं? भारतीय माल की माँग से शिल्पकारों और व्यापारियों को क्या मिलता था? 3 अंक

उत्तर देखिए

इतिहासकारों का तर्क है कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों से मिलने वाला अधिशेष लेकर पाते थे। (पृष्ठ 128)

  • इब्न बतूता की रुचि शहरों की समृद्धि समझाने में अधिक नहीं थी; यह तर्क इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से निकाला।
  • उसके अनुसार भारतीय कृषि इतनी उत्पादक इसलिए थी कि मिट्टी उपजाऊ थी, जिससे किसान वर्ष में दो फसलें उगा पाते थे।
  • ★भारतीय माल की मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया, दोनों में बहुत माँग थी, जिससे शिल्पकारों और व्यापारियों को भारी मुनाफ़ा होता था।
  • सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की माँग ख़ास तौर पर थी; मलमल की कई किस्में इतनी महँगी थीं कि उन्हें केवल अमीर वर्ग और बहुत धनी लोग पहन पाते थे।

4उलुक और दावा में क्या फ़र्क़ था? इब्न बतूता डाक देखकर चकित क्यों हुआ? 3 अंक

उत्तर देखिए

उलुक अश्व डाक थी और दावा पैदल डाक। (पृष्ठ 129)

  • उलुक: हर चार मील की दूरी पर रखे राजकीय घोड़ों से चलने वाली डाक।
  • दावा: प्रति मील तीन अवस्थान होते थे (दावा एक मील का एक-तिहाई होता है), और संदेशवाहक घंटियों वाली छड़ लेकर दौड़ता था, जिसकी आवाज़ सुनकर अगले मंडप के लोग तैयार हो जाते थे।
  • ★इब्न बतूता के अनुसार पैदल डाक अश्व डाक से अधिक तेज़ होती है, और उसका प्रयोग अकसर खुरासान के फलों के परिवहन के लिए होता है, जिन्हें भारत में बहुत पसंद किया जाता है।
  • वह डाक की कार्यकुशलता देखकर चकित हुआ। किताब के अनुसार इससे व्यापारियों के लिए लंबी दूरी तक सूचना भेजना, उधार प्रेषित करना और अल्प सूचना पर माल भेजना संभव हुआ।
  • डाक इतनी कुशल थी कि सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, जबकि गुप्तचरों की ख़बरें सुल्तान तक मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं।
  • ! “उलुक पैदल डाक है और दावा अश्व डाक” ग़लत है; दोनों को उलट मत दीजिए।

51440 के दशक में भारत आए यात्री अब्दुर रज़्ज़ाक के वृत्तांत से कैसे पता चलता है कि एक ही यात्री का नज़रिया अलग-अलग जगह अलग हो सकता है? 3 अंक

उत्तर देखिए

क्योंकि किताब के अनुसार 1440 के दशक में लिखा उसका वृत्तांत संवेगों और अवबोधनों का एक रोचक मिश्रण है। (पृष्ठ 129)

  • केरल में कालीकट के बंदरगाह पर उसने जो देखा, उसकी प्रशंसा नहीं की; वह लिखता है कि यहाँ ऐसे लोग बसे थे जिनकी उसने कल्पना भी नहीं की थी, और इन लोगों को उसने एक “विचित्र देश” बताया।
  • ★मंगलौर से नौ मील के भीतर उसने एक पूजा-स्थल देखा, जिसे वह “पूरे विश्व में अतुलनीय” कहता है। वह वर्गाकार था, ढले हुए काँसे से ढका था, और उसमें सोने की आदमकद मूर्ति थी जिसकी आँखों की जगह माणिक लगे थे।
  • उसने लिखा: “इस शिल्प और कारीगरी के क्या कहने!”

केस 9 — बर्नियर और भूमि का स्वामित्व (पृष्ठ 130–132)

किताब का उदाहरण: बर्नियर के अनुसार भारत और यूरोप के बीच मूल भिन्नताओं में से एक भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव था। उसे लगा कि सम्राट सारी भूमि का स्वामी है। स्रोत 11 में वह किसानों का हाल लिखता है। किताब इस दावे को मुग़ल दस्तावेज़ों से परखती है।

1इब्न बतूता और बर्नियर के लिखने के मक़सद में क्या अंतर था? 3 अंक

उत्तर देखिए

इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया; बर्नियर एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से संबंधित था। (पृष्ठ 130)

  • बर्नियर यूरोप, ख़ासकर फ्रांस, की स्थितियों से तुलना और भिन्नता को उजागर करने के प्रति अधिक चिंतित था।
  • ★उसका विचार नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करने का था, ताकि वे ऐसे निर्णय लें जिन्हें वह “सही” मानता था।
  • किताब के अनुसार वह निरंतर मुग़लकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा, सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करते हुए।

2निजी भूस्वामित्व के अभाव पर बर्नियर के तर्क की कड़ियाँ क्रम से लिखिए। 4 अंक

उत्तर देखिए

बर्नियर निजी स्वामित्व के गुणों में दृढ़ विश्वास रखता था और राजकीय स्वामित्व को राज्य तथा उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक मानता था। (पृष्ठ 130)

  • पहली कड़ी: उसे लगा कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था, जो उसे अपने अमीरों के बीच बाँटता था।
  • दूसरी कड़ी: राजकीय भूस्वामित्व के कारण भूधारक अपने बच्चों को भूमि नहीं दे सकते थे, इसलिए वे उत्पादन के स्तर को बनाए रखने और बढ़ाने के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे।
  • तीसरी कड़ी: निजी भूस्वामित्व के अभाव में “बेहतर” भूधारकों का वर्ग नहीं उभरा, जैसा पश्चिमी यूरोप में उभरा। (पृष्ठ 131)
  • ★नतीजा, उसके अनुसार: कृषि का समान रूप से विनाश, किसानों का असीम उत्पीड़न और समाज के सभी वर्गों के जीवन स्तर में पतन, सिवाय शासक वर्ग के।

यह बर्नियर का तर्क है, जिसे किताब आगे (पृष्ठ 132) परखती है। किताब यह भी बताती है कि सम्राट को सारी भूमि का स्वामी मानने की यह धारणा सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों के वृत्तांतों में मिलती है।

3स्रोत 11 में बर्नियर ने किसानों के बारे में क्या लिखा? किताब के अनुसार वह यह क्यों लिख रहा था? 3 अंक

उत्तर देखिए

उसने ग्रामीण अंचलों की ऐसी तस्वीर खींची जिसमें खेत ख़ाली हैं और किसान पीड़ित। (पृष्ठ 131)

  • हिंदुस्तान के कई ग्रामीण अंचल रेतीली भूमियाँ या बंजर पर्वत हैं; कृषियोग्य भूमि का बड़ा हिस्सा भी श्रमिकों के अभाव में कृषि विहीन रह जाता है।
  • ग़रीब लोग लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न कर पाएँ तो उन्हें जीवन-निर्वहन के साधनों से वंचित कर दिया जाता है और अपने बच्चों से भी हाथ धोना पड़ता है, जिन्हें दास बनाकर ले जाया जाता है। इस निरंकुशता से हताश किसान गाँव छोड़कर चले जाते हैं।
  • ★किताब के अनुसार बर्नियर यूरोप में राज्य और समाज पर चल रहे विवादों में भाग ले रहा था। वह चाहता था कि उसका विवरण उन लोगों के लिए चेतावनी बने जो निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को स्वीकार नहीं करते थे।
  • पृष्ठ 130 के बॉक्स में डच यात्री पेलसर्ट की बात भी है, जिसने सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में उपमहाद्वीप की यात्रा की थी। बर्नियर की ही तरह वह भी लोगों में व्यापक ग़रीबी देखकर अचंभित था। राज्य को उत्तरदायी ठहराते हुए वह कहता है: “कृषकों को इतना अधिक निचोड़ा जाता है कि पेट भरने के लिए उनके पास सूखी रोटी भी मुश्किल से बचती है।”

4बर्नियर का कहना था कि राज्य ही सारी भूमि का स्वामी था। किताब इस बात को किस आधार पर परखती है? 4 अंक

उत्तर देखिए

किताब कहती है कि एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। (पृष्ठ 132)

  • सोलहवीं शताब्दी में अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है। यह माँग राजा द्वारा अपनी प्रजा को सुरक्षा देने के बदले की गई प्रतीत होती है, न कि अपने स्वामित्व वाली भूमि पर लगान।
  • ★ऐसा संभव है कि यूरोपीय यात्री इन माँगों को लगान मानते थे, क्योंकि भूमि राजस्व की माँग अकसर बहुत अधिक होती थी।
  • लेकिन असल में यह न तो लगान था, न ही भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था।
  • ! “मुग़ल दस्तावेज़ बताते हैं कि राज्य ही सारी भूमि का स्वामी था” ग़लत है; एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा नहीं बताता।
  • ! “भूमि राजस्व एक तरह का लगान या भूमिकर था” भी ग़लत है; किताब के अनुसार वह उपज पर लगने वाला कर था।

5मॉन्टेस्क्यू और कार्ल मार्क्स ने बर्नियर के विचारों का क्या किया? किताब ग्रामीण समाज की उस तस्वीर के बारे में क्या कहती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। (पृष्ठ 132)

  • फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत से प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत विकसित किया: एशिया में शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे और सारी भूमि पर राजा का स्वामित्व था, निजी संपत्ति नहीं।
  • उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया।
  • ★किताब के अनुसार ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के गाँवों में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: बड़े ज़मींदार, “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार), किराए के श्रम से माल उत्पादन करने वाले बड़े किसान और मुश्किल से निर्वहन लायक उत्पादन करने वाले छोटे किसान। (पृष्ठ 132–133)
  • ! “प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया” ग़लत है; वह मॉन्टेस्क्यू ने दिया। मार्क्स ने एशियाई उत्पादन शैली का सिद्धांत दिया।

केस 10 — एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई (पृष्ठ 133–134)

किताब का उदाहरण: मुग़ल राज्य को निरंकुश रूप देने की बर्नियर की तन्मयता स्पष्ट है, फिर भी किताब कहती है कि उसके विवरण कभी-कभी “एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई” की ओर इशारा करते हैं। स्रोत 13 में वह बंगाल और शिल्पकारों का हाल लिखता है, स्रोत 14 में राजकीय कारखानों का।

1शिल्पकारों के बारे में बर्नियर क्या तर्क देता है? उसी वृत्तांत की कौन-सी बातें इस तर्क के साथ पूरी तरह नहीं बैठतीं? 3 अंक

उत्तर देखिए

वह कहता है कि शिल्पकारों के पास अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़े का अधिग्रहण राज्य द्वारा कर लिया जाता था; इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था। (पृष्ठ 133)

  • ★पर साथ ही वह मानता है कि पूरे विश्व से बड़ी मात्रा में बहुमूल्य धातुएँ भारत में आती थीं, क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था।
  • वह एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय के अस्तित्व को भी रेखांकित करता है, जो लंबी दूरी के विनिमय से जुड़ा था।

इन्हीं बातों के कारण किताब कहती है कि उसके विवरण एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।

2स्रोत 13 में बर्नियर बंगाल, खेती और शिल्पकारों के बारे में क्या बताता है? यह स्रोत 11 के चित्र से किन बातों में अलग है? 4 अंक

उत्तर देखिए

वह कहता है कि इस देश के विस्तृत भू-भाग का अधिकांश भाग अत्यधिक उपजाऊ है। (पृष्ठ 133)

  • ★बंगाल का विशाल राज्य चावल, मकई और जीवन की अन्य आवश्यक वस्तुओं में, और रेशम, कपास तथा नील जैसी वाणिज्यिक वस्तुओं में मिस्र से कहीं आगे है।
  • भारत के कई भागों में जनसंख्या पर्याप्त है और भूमि पर खेती अच्छी होती है।
  • शिल्पकार गलीचे, ज़री, कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चाँदी के वस्त्र, तथा रेशम और सूती वस्त्र बनाते हैं, जो देश में भी प्रयोग होते हैं और विदेश में निर्यात किए जाते हैं।
  • स्रोत 11 में बंजर भूमि, श्रमिकों का अभाव और गाँव छोड़ते किसान हैं; स्रोत 13 में उपजाऊ भूमि, पर्याप्त जनसंख्या और देश-विदेश में बिकने वाला शिल्प। दोनों बर्नियर के ही वृत्तांत से हैं।

3बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को “शिविर नगर” क्यों कहता था? किताब इस बारे में क्या कहती है? 3 अंक

उत्तर देखिए

उसका आशय उन नगरों से था जो अपने अस्तित्व और बने रहने के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे। (पृष्ठ 134)

  • उसका विश्वास था कि ये नगर राजकीय दरबार के आने के साथ अस्तित्व में आते थे और उसके कहीं और चले जाने के बाद तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते थे।
  • ★किताब के अनुसार सत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था।
  • किताब कहती है कि बर्नियर एक अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था। वास्तव में सभी प्रकार के नगर थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि।
  • ! “मुग़ल शहर सचमुच केवल ‘शिविर नगर’ थे” ग़लत है; यह बर्नियर का कहना है, जिसे किताब अतिसरलीकृत मानती है।
  • ! “सत्रहवीं शताब्दी में नगरों में रहने वालों का अनुपात पश्चिमी यूरोप से कम था” भी ग़लत है; यह अनुपात औसतन अधिक था।

4नगरों में व्यापारी किस तरह संगठित रहते थे? दूसरे शहरी समूह कौन-से थे? 2 अंक

उत्तर देखिए

व्यापारी अकसर मज़बूत सामुदायिक या बंधुत्व के संबंधों से जुड़े होते थे और अपनी जाति तथा व्यावसायिक संस्थाओं के माध्यम से संगठित रहते थे। (पृष्ठ 134)

  • पश्चिमी भारत में ऐसे समूहों को महाजन और उनके मुखिया को सेठ कहा जाता था। अहमदाबाद जैसे केंद्रों में सभी महाजनों का सामूहिक प्रतिनिधित्व व्यापारिक समुदाय का मुखिया करता था, जिसे नगर सेठ कहते थे।
  • ★अन्य शहरी समूह: चिकित्सक (हकीम या वैद्य), अध्यापक (पंडित या मुल्ला), अधिवक्ता (वकील), चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार और सुलेखक।
  • इन अन्य समूहों में कई राजकीय प्रश्रय पर आश्रित थे, कई अन्य संरक्षकों या भीड़भाड़ वाले बाज़ार में आम लोगों की सेवा से जीवनयापन करते थे।

5स्रोत 14 में बर्नियर राजकीय कारखानों का क्या वर्णन करता है? वह यह विचार कैसे देता है कि सक्रियता बहुत है पर उन्नति बहुत कम? 3 अंक

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किताब के अनुसार संभवत: बर्नियर ही ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देता है। (पृष्ठ 134)

  • कई स्थानों पर बड़े कक्ष दिखाई देते हैं जिन्हें कारखाना या शिल्पकारों की कार्यशाला कहते हैं। पहले कक्ष में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण में व्यस्तता से काम करते हैं; दूसरे में सुनार हैं; तीसरे में चित्रकार; चौथे में प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले; पाँचवें में बढ़ई, खरादी, दर्जी तथा जूते बनाने वाले; और छठे में रेशम, ज़री तथा महीन मलमल का काम करने वाले।
  • शिल्पकार हर रोज़ सुबह कारखाने आते हैं, पूरे दिन काम करते हैं और शाम को अपने-अपने घर चले जाते हैं।
  • ★इसी वर्णन से यह विचार बनता है कि हर तरफ़ सक्रियता है, पर उन्नति बहुत कम। वह लिखता है: “इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है; कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ था।”

केस 11 — महिलाएँ: दासियाँ, सती और श्रमिक (पृष्ठ 135–136)

किताब का उदाहरण: जिन यात्रियों ने अपने लिखित वृत्तांत छोड़े, वे सामान्यतया पुरुष थे। उन्हें उपमहाद्वीप में महिलाओं की स्थिति का विषय रुचिकर और कभी-कभी जिज्ञासापूर्ण लगता था। किताब यह भी कहती है कि कभी-कभी वे सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” परिस्थिति मान लेते थे।

1दासों के बारे में किताब क्या बताती है? इब्न बतूता के वृत्तांत से भेंट के तीन उदाहरण दीजिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

दास बाज़ारों में किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे। (पृष्ठ 135)

  • सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए भेंटस्वरूप “घोड़े, ऊँट तथा दास” ख़रीदे।
  • मुल्तान पहुँचकर उसने वहाँ के गवर्नर को एक दास और घोड़ा भेंट में दिए।
  • ★वह बताता है कि मुहम्मद बिन तुग़लक नसीरुद्दीन नामक धर्मोपदेशक के प्रवचन से इतना प्रसन्न हुआ कि उसे “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास” दे दिए।

2इब्न बतूता के विवरण में दासों के बीच किस तरह का विभेद दिखता है? स्रोत 15 से दासियों के बारे में क्या पता चलता है? 3 अंक

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इब्न बतूता के विवरण से प्रतीत होता है कि दासों में काफ़ी विभेद था। (पृष्ठ 135)

  • सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; सुल्तान की बहन की शादी में उनके प्रदर्शन से इब्न बतूता खूब आनंदित हुआ।
  • ★सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए दासियों को भी नियुक्त करता था। स्रोत 15 में यह भी दर्ज है कि अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।
  • दासों को सामान्यत: घरेलू श्रम के लिए ही इस्तेमाल किया जाता था। पालकी या डोले में पुरुषों और महिलाओं को ले जाने में इब्न बतूता ने उनकी सेवाओं को विशेष रूप से अपरिहार्य पाया।
  • दासों की कीमत, विशेष रूप से घरेलू श्रम के लिए चाहिए दासियों की, बहुत कम होती थी। अधिकांश परिवार जो उन्हें रख पाने में समर्थ थे, कम से कम एक या दो को रखते ही थे।

3बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए क्यों चुना? उसने क्या लिखा? 3 अंक

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सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अकसर पश्चिमी और पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था, इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना। (पृष्ठ 135)

  • ★उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, जबकि अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
  • स्रोत 16 में लाहौर की एक अल्पवयस्क विधवा का ज़िक्र है, जिसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी। किताब इसे उसके वृत्तांत के संभवत: सबसे मार्मिक विवरणों में से एक कहती है।
  • ! “बर्नियर के अनुसार सभी महिलाएँ अपनी इच्छा से सती होती थीं” ग़लत है; उसके अनुसार दूसरों को बाध्य किया जाता था।

4सती प्रथा के अलावा महिलाओं के जीवन के बारे में किताब क्या बताती है? इससे घरों में बंद रहने वाली महिलाओं की तस्वीर के बारे में क्या नतीजा निकलता है? 3 अंक

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किताब कहती है कि महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था। (पृष्ठ 135–136)

  • उनका श्रम कृषि और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था।
  • व्यापारिक परिवारों से आने वाली महिलाएँ व्यापारिक गतिविधियों में हिस्सा लेती थीं, यहाँ तक कि कभी-कभी वाणिज्यिक विवादों को अदालत के सामने भी ले जाती थीं।
  • ★किताब का नतीजा: “यह असंभाव्य लगता है कि महिलाओं को उनके घरों के खास स्थानों तक परिसीमित कर रखा जाता था।”

5अध्याय के अंत में किताब यात्रा-वृत्तांतों को पढ़ने के बारे में क्या याद रखने को कहती है? 2 अंक

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किताब कहती है कि ये यात्री वृत्तांत अपने समय के पुरुषों और महिलाओं के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं। (पृष्ठ 136)

  • ★पर इनमें सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या फिर एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं, जिन्हें वृत्तांत पढ़ते हुए ध्यान में रखना आवश्यक है।
  • उपमहाद्वीप के पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) के अनुभव अपेक्षाकृत अज्ञात हैं, जिन्होंने समुद्रों और पर्वतों को पार करके उपमहाद्वीप से परे क्षेत्रों में साहसिक यात्राएँ कीं।

भाग ख — तर्क और मूल्यांकन

1“अल–बिरूनी अपनी इच्छा से ग़ज़नी गया था।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

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कथन ग़लत है। सन् 1017 ई. में ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद सुल्तान महमूद कई विद्वानों और कवियों को अपनी राजधानी ग़ज़नी ले गया; अल–बिरूनी भी उनमें से एक था। (पृष्ठ 116)

  • वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया था।
  • ★बाद की बात अलग है: धीरे–धीरे उसे यह शहर पसंद आने लगा, और अपनी मृत्यु तक उसने बाक़ी जीवन वहीं बिताया। ग़ज़नी में ही उसकी भारत के प्रति रुचि विकसित हुई।

2“अल–बिरूनी यूनानी भाषा जानता था, इसलिए उसने प्लेटो के कार्य मूल यूनानी में पढ़े।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

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कथन ग़लत है। किताब के अनुसार वह यूनानी भाषा का जानकार नहीं था। फिर भी वह प्लेटो तथा अन्य यूनानी दार्शनिकों के कार्यों से पूरी तरह परिचित था, जिन्हें उसने अरबी अनुवादों के माध्यम से पढ़ा था। (पृष्ठ 116)

  • ★वह कई भाषाओं का ज्ञाता था, जिनमें सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू तथा संस्कृत शामिल थीं।
  • इसी दक्षता से वह ग्रंथों का अनुवाद कर सका: उसने कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, जिनमें पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ भी शामिल है, और अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए यूक्लिड के कार्यों का संस्कृत में।

3“इब्न बतूता ने अपनी रिह्ला पूरी तरह ख़ुद अपने हाथ से लिखी थी।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

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कथन ग़लत है। किताब के अनुसार इब्न बतूता के वापस आने पर स्थानीय शासक ने निर्देश दिए कि उसकी कहानियों को दर्ज किया जाए। (पृष्ठ 120)

  • ★स्रोत 3 बताता है कि इब्न जुज़ाई को इब्न बतूता के श्रुतलेखों को लिखने के लिए नियुक्त किया गया था। (पृष्ठ 121)
  • उसी स्रोत के अनुसार राजा के शालीन निर्देश पर इब्न बतूता ने अपनी यात्रा में देखे गए शहरों और रोचक घटनाओं का वृत्तांत लिखवाया।
  • यानी रिह्ला इब्न बतूता का वृत्तांत है, पर उसे लिखने का काम इब्न जुज़ाई को सौंपा गया था।

4“बर्नियर ने भारत को हर बात में यूरोप से बेहतर बताया।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब के अनुसार लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया। (पृष्ठ 122)

  • ★वह मुग़लकालीन भारत की तुलना तत्कालीन यूरोप से करता रहा और सामान्यतया यूरोप की श्रेष्ठता को रेखांकित करता रहा। (पृष्ठ 130)
  • किताब यह भी याद दिलाती है कि उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था। (पृष्ठ 122)

5“बर्नियर के अनुसार भारत में अमीरों और ग़रीबों के बीच एक बड़ा मध्य वर्ग था।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

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कथन ग़लत है। बर्नियर ने ठीक उलटा लिखा: बहुत विश्वास से उसने कहा, “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।” (पृष्ठ 131)

  • ★वह भारतीय समाज को दरिद्र लोगों के समरूप जनसमूह से बना बताता है, जिसे एक बहुत अमीर और शक्तिशाली अल्पसंख्यक शासक वर्ग अधीन बनाता है।
  • उसके अनुसार गरीबों में सबसे गरीब और अमीरों में सबसे अमीर व्यक्ति के बीच नाममात्र को भी कोई सामाजिक समूह या वर्ग नहीं था।
  • यह बर्नियर का दावा है। किताब के अनुसार सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: एक ओर बड़े ज़मींदार, दूसरी ओर “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार), और बीच में किराए के श्रम का प्रयोग करने वाला बड़ा किसान तथा अपेक्षाकृत छोटे किसान। (पृष्ठ 132–133)

6“बाज़ारों में दास केवल बेचे जाते थे, उन्हें भेंट में नहीं दिया जाता था।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब के अनुसार बाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप भी दिए जाते थे। (पृष्ठ 135)

  • ★चौदहवीं शताब्दी में उपमहाद्वीप आए इब्न बतूता के वृत्तांत से: मुल्तान पहुँचकर उसने गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा” भेंट के रूप में दिए।
  • सिंध पहुँचकर उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए भेंटस्वरूप “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे।

7“इब्न बतूता और बर्नियर के वृत्तांत पढ़ लें तो उस समय के समाज का पूरा चित्र मिल जाता है।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब कहती है कि ये वृत्तांत पुरुषों और महिलाओं के जीवन की रोचक झाँकी देते हैं, पर इनमें सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या फिर एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं। (पृष्ठ 136)

  • ★किताब के अनुसार वृत्तांतों को पढ़ते हुए इस बात को ध्यान में रखना आवश्यक है।
  • उपमहाद्वीप से बाहर साहसिक यात्राएँ करने वाले पुरुषों (और संभवत: महिलाओं) के अनुभव और प्रेक्षण अपेक्षाकृत अज्ञात हैं। (पृष्ठ 136)
  • महिलाओं द्वारा छोड़े गए वृत्तांत लगभग न के बराबर हैं, हालाँकि वे भी यात्राएँ करती थीं। (पृष्ठ 115)

8“इब्न बतूता के अनुसार दौलताबाद दिल्ली से बहुत छोटा शहर था।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक

उत्तर देखिए

कथन ग़लत है। किताब के अनुसार इब्न बतूता दिल्ली को एक बड़ा शहर, विशाल आबादी वाला तथा भारत में सबसे बड़ा बताता है; पर दौलताबाद (महाराष्ट्र में) भी कम नहीं था और आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। (पृष्ठ 127)

  • ★उसने उपमहाद्वीप के शहरों को उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरपूर पाया जिनके पास आवश्यक इच्छा, साधन तथा कौशल था।
  • ये शहर घनी आबादी वाले तथा समृद्ध थे, सिवाय कभी-कभी युद्धों तथा अभियानों से होने वाले विध्वंस के।

भाग ग — तुलना और वर्गीकरण

1अल–बिरूनी, इब्न बतूता और बर्नियर की तुलना कीजिए: वे कौन थे, भारत में कैसे आए, उन्होंने क्या रचा और भारत को किस नज़रिए से देखा? 4 अंक

उत्तर देखिए
बातअल–बिरूनीइब्न बतूताबर्नियर
कौन, कबग्यारहवीं शताब्दी; जन्म सन् 973 में आधुनिक उज़्बेकिस्तान के ख़्वारिज़्म मेंचौदहवीं शताब्दी; मोरक्को के यात्री, जन्म तैंजियर मेंसत्रहवीं शताब्दी; फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा इतिहासकार
भारत से नातासन् 1017 ई. में बंधक के रूप में ग़ज़नी आया; वहीं भारत में रुचि जगी; ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताएसन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा; सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक की ख्याति से आकर्षित होकर दिल्ली गया, जहाँ उसे क़ाज़ी नियुक्त किया गयामुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया; 1656 से 1668 तक बारह वर्ष रहा, पहले दारा शिकोह का चिकित्सक, फिर दानिशमंद ख़ान के साथ
उसकी कृतिअरबी में किताब–उल–हिन्द, अस्सी अध्यायों में बँटीअरबी में रिह्ला; लिखने का काम श्रुतलेखों से हुआग्रंथ ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर; उसकी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक को समर्पित थी
नज़रियासामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) हर अध्याय में पहले एक प्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, अंत में अन्य संस्कृतियों से तुलना; स्रोत 1 में अपने कार्य को उन लोगों के लिए सहायक बताया जो हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैंहर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक कियाभारत की तुलना यूरोप से और भिन्नता को उजागर करना; नीति-निर्माताओं तथा बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना
पृष्ठ115–117115, 118–121, 130115, 122–123, 130

★कसौटी: हर यात्री के साथ उसका समय, उसकी कृति और उसका नज़रिया एक साथ लिखिए। लिखने के कारणों के सुराग़ किताब में अलग-अलग जगह मिलते हैं: अल–बिरूनी के स्रोत 1 में, इब्न बतूता के स्रोत 3 में और बर्नियर के बारे में पृष्ठ 130 पर। (पृष्ठ 116, 121, 130)

2इब्न बतूता और बर्नियर ने भारत को किस तरह अलग-अलग देखा? चार बातों में तुलना कीजिए। 4 अंक

उत्तर देखिए
बातइब्न बतूताबर्नियर
ध्यान किस परहर वह चीज़ जो उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक करेयूरोप से तुलना और भिन्नता, विशेष रूप से वे स्थितियाँ जिन्हें उसने अवसादकारी पाया
शहरउसके वृत्तांत से प्रतीत होता है कि अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें और चमक-दमक वाले रंगीन बाज़ार थे; दिल्ली उसके अनुसार भारत में सबसे बड़ामुग़लकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है, यानी वे नगर जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे; किताब इसे अतिसरलीकृत चित्रण बताती है
दास और महिलाएँदासों में काफ़ी विभेद प्रतीत होता है; उसने भेंट के लिए दास खरीदे; पालकी या डोले में ले जाने में दासों की सेवाएँ अपरिहार्य पाईंविस्तृत विवरण के लिए सती प्रथा को चुना, क्योंकि सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों तथा लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अकसर पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था
किसके लिए लिखाराजा के निर्देश पर यात्रा में देखे गए शहरों और रोचक घटनाओं का वृत्तांत लिखवाया (स्रोत 3)प्रमुख कृति फ्रांस के शासक को समर्पित; कई कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को पत्रों के रूप में लिखे
पृष्ठ121, 127, 130, 135122, 130, 134, 135

★कसौटी: तुलना में दोनों का नज़रिया लिखिए, सिर्फ़ उनके देश नहीं। इब्न बतूता ने जो अनूठा लगा उसे दर्ज किया, जबकि बर्नियर भारत की तुलना यूरोप से करता रहा। (पृष्ठ 130)

3बर्नियर के चित्र और किताब की जाँच की तुलना कीजिए: बर्नियर ने क्या कहा और किताब इसके बारे में क्या दिखाती है? 4 अंक

उत्तर देखिए
बातबर्नियर का कहनाकिताब क्या दिखाती है
भूमि का स्वामीउसे लगा कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था और उसे अपने अमीरों के बीच बाँटता थाएक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था; अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है; यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर
समाजभारतीय समाज दरिद्र लोगों का समरूप जनसमूह है; “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।”सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद: बड़े ज़मींदार, बड़ा किसान जो किराए के श्रम का प्रयोग करता था, अपेक्षाकृत छोटे किसान और “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक
शिल्प और व्यापारशिल्पकारों के पास उत्पाद बेहतर बनाने का प्रोत्साहन नहीं, क्योंकि मुनाफ़े का अधिग्रहण राज्य कर लेता है; इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुखउसके विवरण कभी-कभी “एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई” की ओर इशारा करते हैं: वह यह भी मानता है कि निर्यात के बदले बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं और एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय लंबी दूरी के विनिमय से जुड़ा था
नगरमुग़लकालीन शहर “शिविर नगर” हैं, यानी राजकीय शिविर पर निर्भर नगर; उसका विश्वास था कि ये दरबार के आगमन के साथ अस्तित्व में आते और उसके कहीं और चले जाने के बाद तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते थेसत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था; उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान आदि सभी प्रकार के नगर थे
पृष्ठ130, 131, 133, 134132–134

★कसौटी: बर्नियर का कथन और किताब की जाँच अलग-अलग लिखिए। किताब ख़ुद कहती है कि भूस्वामित्व के प्रश्न की तरह ही नगरों के बारे में भी बर्नियर “एक अतिसरलीकृत चित्रण” प्रस्तुत कर रहा था। (पृष्ठ 134)

भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि

1. अपनी भाषा का यात्रा-वृत्तांत (किताब का पृष्ठ 123)

पृष्ठ 123 की चर्चा में किताब कहती है कि भारतीय भाषाओं में बहुत प्रचुर यात्रा वृत्तांत साहित्य उपलब्ध है। उसी पृष्ठ के बॉक्स में किताब बताती है कि यूरोपीय यात्रियों के वृत्तांतों ने अपनी पुस्तकों के प्रकाशन और प्रसार के माध्यम से यूरोपीय लोगों के लिए भारत की एक छवि बनाने में सहायता की। बाद में, 1750 के बाद, जब शेख इतिसमुद्दीन और मिर्ज़ा अबु तालिब जैसे भारतीयों ने यूरोप की यात्रा की, तो उन्हें यूरोपीय लोगों की भारतीय समाज की छवि का सामना करना पड़ा, और उन्होंने तथ्यों की अपनी अलग व्याख्या से उसे प्रभावित करने का प्रयास किया।

1अपने घर में बोली जाने वाली भाषा के किसी यात्री-लेखक का पता कीजिए। घर के बड़ों, शिक्षक या पास के पुस्तकालय से पूछ सकते हैं।

2उसका कोई एक वृत्तांत पढ़िए।

3एक टिप्पणी लिखिए: यात्री ने कौन-से क्षेत्र देखे, उसने क्या देखा, और उसने वृत्तांत क्यों लिखा।

4टिप्पणी के अंत में एक पंक्ति जोड़िए कि उसके लिखने का कारण इब्न बतूता या बर्नियर के कारण से मिलता है या अलग है।

इस प्रश्न का कोई एक सही उत्तर नहीं है; आपका उत्तर उस वृत्तांत पर टिकेगा जो आपने पढ़ा। उसे इस तरह परखिए। (पृष्ठ 123)

  • क्षेत्र: उन्हीं जगहों के नाम लिखिए जिनका वृत्तांत में सचमुच ज़िक्र है।
  • जो देखा: दो-तीन बातें, यात्री के अपने शब्दों के पास रहकर; हू-ब-हू वाक्य लें तो उद्धरण-चिह्न में लिखिए।
  • लिखने का कारण: देखिए कि वृत्तांत किसके कहने पर या किसके लिए लिखा गया। इब्न बतूता के मामले में स्थानीय शासक ने निर्देश दिए कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ (पृष्ठ 120)। बर्नियर नीति-निर्माताओं तथा बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना चाहता था (पृष्ठ 130)।

सीख: किताब के अनुसार यूरोपीय यात्रियों के वृत्तांतों से यूरोप में भारत की एक छवि बनी (पृष्ठ 123)। इसलिए कोई भी वृत्तांत पढ़ते समय पूछिए कि यात्री ने किसके लिए और क्यों लिखा।

2. जानी-पहचानी चीज़ से अनजानी का वर्णन (किताब का पृष्ठ 126 और 129)

किताब के अनुसार नारियल और पान से इब्न बतूता के पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे (पृष्ठ 126)। स्रोत 6 में वह नारियल को खजूर और मानव सिर से मिलाकर समझाता है; स्रोत 7 में पान को अंगूर की लता से और सुपारी को जायफल से। पृष्ठ 129 की चर्चा पूछती है कि इब्न बतूता लोगों के लिए ऐसी वस्तुओं और स्थितियों के वर्णन की समस्या को कैसे हल करता था, जिनसे वे अनभिज्ञ थे और जिन्हें उन्होंने अनुभव नहीं किया था।

1अपने आसपास की कोई ऐसी चीज़ चुनिए जो आपके किसी दोस्त ने कभी नहीं देखी: कोई फल, पौधा, खाना या औज़ार।

2उसका वर्णन दोस्त को सिर्फ़ तुलनाओं से बताइए, जैसे “यह … जैसा दिखता है”। नाम मत बताइए और चीज़ मत दिखाइए।

3दोस्त से सुनकर उसका चित्र बनवाइए, फिर चित्र को असली चीज़ से मिलाइए।

4किताब के पृष्ठ 126 के सवालों से अपनी तुलनाएँ परखिए: क्या तुलनाएँ वाजिब थीं, वर्णन कितना सटीक रहा, और आप उसमें और क्या जोड़ना चाहेंगे?

इब्न बतूता अनजानी चीज़ को पाठक की जानी-पहचानी चीज़ों से जोड़कर समझाता है। (पृष्ठ 126)

  • नारियल (स्रोत 6): पेड़ “हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं”; फ़र्क़ बस इतना कि एक से काष्ठफल मिलता है और दूसरे से खजूर।
  • नारियल का फल मानव सिर से मेल खाता है, क्योंकि इसमें मानो “दो आँखें तथा एक मुख” है; अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है और रेशा बालों जैसा।
  • नारियल का उपयोग: रेशे से रस्सी बनती है, और “लोहे की कीलों के प्रयोग के बजाय इनसे जहाज़ को सिलते हैं”।
  • पान (स्रोत 7): उसे अंगूर की लता की तरह उगाया जाता है; उसका कोई फल नहीं होता, केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है। सुपारी “जायफल जैसी” होती है; उसे तोड़कर छोटे टुकड़े किए जाते हैं, मुँह में रखकर चबाया जाता है, फिर पान की पत्तियों के साथ चबाया जाता है।
  • अपनी तुलनाएँ परखने के लिए: दोस्त का चित्र जहाँ असली चीज़ से अलग निकले, वहीं आपकी तुलना कमज़ोर थी; उस जगह कोई और तुलना या एक अतिरिक्त बात जोड़िए।

सीख: पाठक इन उपजों से पूरी तरह अपरिचित थे (पृष्ठ 126), और इब्न बतूता ने इन दोनों को खजूर, मानव सिर, अंगूर की लता और जायफल जैसी जानी-पहचानी चीज़ों से जोड़कर बताया।

3. बर्नियर के अंश में कौन-से शिल्प (किताब का प्रश्न 9, पृष्ठ 138; तुलना के लिए पृष्ठ 133–134)

किताब के प्रश्न 9 में बर्नियर का एक अंश छपा है, जिसके नीचे लिखा है: “उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।” अध्याय में शिल्पों का वर्णन स्रोत 13 (पृष्ठ 133) और स्रोत 14 (पृष्ठ 134) में है।

1पृष्ठ 138 का अंश पढ़िए और उसमें बताए हर शिल्प-कार्य को पहली सूची में लिखिए।

2स्रोत 13 और स्रोत 14 से अध्याय में वर्णित शिल्पों की दूसरी सूची बनाइए।

3दोनों सूचियाँ साथ रखिए और देखिए कि कौन-से शिल्प दोनों में हैं और कौन-से सिर्फ़ एक में।

4एक पंक्ति में लिखिए कि इस तुलना से बर्नियर के लेखन के बारे में क्या पता चलता है।

यहाँ “अलिखित” का मतलब “उल्लिखित” है, यानी इस अंश में बताए गए शिल्प। (पृष्ठ 138)

  • अंश में बताए शिल्प: ऐसी सुंदर शिल्पकारी जो औज़ारों के अभाव वाले लोग बनाते हैं; यूरोप में बनी वस्तुओं की इतनी निपुण नकल कि असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो जाए; बेहतरीन बंदूकें; सुंदर स्वर्णाभूषण; और चित्र, जिनकी “सुंदरता, मृदुलता तथा सूक्ष्मता” से वह अकसर आकर्षित हुआ।
  • अध्याय के शिल्प: स्रोत 13 (पृष्ठ 133) में गलीचे, ज़री, कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चाँदी के वस्त्र, तथा विभिन्न प्रकार के रेशम और सूती वस्त्र। स्रोत 14 (पृष्ठ 134) के छह कक्षों में क्रम से कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, बढ़ई-खरादी-दर्जी-जूते बनाने वाले, और रेशम, ज़री तथा महीन मलमल का काम करने वाले।
  • तुलना: सुनार (स्वर्णाभूषण) और चित्रकार (चित्र) दोनों जगह मिलते हैं। बंदूकें और यूरोपीय वस्तुओं की नकल सिर्फ़ इस अंश में हैं; गलीचे, कसीदाकारी और रेशमी-सूती कपड़ों का वर्णन सिर्फ़ स्रोत 13 और 14 में।

सीख: एक ही लेखक के अलग-अलग अंश साथ पढ़िए। किताब के अनुसार बर्नियर के विवरण कभी-कभी “एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई” की ओर इशारा करते हैं (पृष्ठ 133)।

4. इब्न बतूता का नक्शा (किताब का प्रश्न 10, पृष्ठ 139; तथ्य पृष्ठ 118–120)

प्रश्न 10 में विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित करने को कहा गया है जिनकी यात्रा इब्न बतूता ने की थी। साथ में पूछा गया है: “कौन–कौन से समुद्रों को उसने पार किया होगा?” उसकी यात्राओं का क्रम किताब के पृष्ठ 118 से 120 में है।

1दुनिया का सीमारेखा मानचित्र लीजिए। पृष्ठ 118–120 पढ़कर वे जगहें चिह्नित कीजिए जिनके नाम किताब ने लिए हैं।

2हर जगह के पास छोटी संख्या (1, 2, 3 …) लिखिए, ताकि यात्रा का क्रम दिखे।

3जिस जगह के बारे में किताब सिर्फ़ इरादा या संभावना बताती है, उसके पास प्रश्न-चिह्न लगाइए।

4समुद्रों के प्रश्न के लिए एटलस खोलिए।

किताब के अनुसार इब्न बतूता की यात्राएँ इस क्रम से हुईं। (पृष्ठ 118–120)

  • जन्म: तैंजियर, मोरक्को।
  • भारत के लिए प्रस्थान (1332–33) से पहले: मक्का की तीर्थ यात्राएँ और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान तथा पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाह।
  • सन् 1333: मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से सिंध; फिर मुल्तान और उच्छ के रास्ते दिल्ली।
  • दिल्ली से आगे: 1342 ई. में सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश; मध्य भारत के रास्ते मालाबार तट; वहाँ से मालद्वीप, जहाँ अठारह महीने क़ाज़ी रहा। किताब कहती है कि उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया; वहाँ पहुँचने की बात नहीं लिखती। बाद में फिर मालाबार तट और मालद्वीप, और बंगाल तथा असम।
  • आगे: जहाज़ से सुमात्रा; वहाँ से दूसरे जहाज़ से जायतुन (आज का क्वानझू); चीन में दूर-दूर तक, बीजिंग तक; 1347 में घर लौटने का निश्चय।
  • किताब का सार (पृष्ठ 120): उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग (हो सकता है वह रूस भी गया हो), भारतीय उपमहाद्वीप और चीन; फिर मोरक्को वापसी।
  • समुद्र: किताब के पाठ में किसी समुद्र का नाम नहीं है; पृष्ठ 120 के मानचित्र 1 पर सिर्फ़ अरब सागर लिखा है। बाक़ी समुद्र एटलस में मालाबार, मालद्वीप, सुमात्रा और चीन के बंदरगाह जैसे पड़ावों के बीच देखकर तय कीजिए, और उत्तर में “पार किया होगा” ही लिखिए।

सीख: जो किताब ने नहीं बताया, उसे अपनी ओर से मत गढ़िए। मानचित्र 1 में केवल अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब की जगहें हैं और उस पर पैमाना नहीं दिया गया है (पृष्ठ 120), इसलिए उससे दूरी भी मत निकालिए।

5. घर के बड़ों का साक्षात्कार (किताब का प्रश्न 11, पृष्ठ 139)

किताब में परियोजना कार्य के नीचे प्रश्न 11 और 12 में से कोई एक चुनना है। प्रश्न 11 में आपको अपने ऐसे किसी बड़े संबंधी का साक्षात्कार करना है (माता/पिता, दादा–दादी, नाना–नानी या चाचा/चाची) जिन्होंने आपके नगर या गाँव के बाहर यात्राएँ की हों। पाँच बातें पता करनी हैं: (क) वे कहाँ गए थे, (ख) उन्होंने यात्रा कैसे की, (ग) उन्हें कितना समय लगा, (घ) उन्होंने यात्रा क्यों की, (ङ) क्या उन्होंने किसी कठिनाई का सामना किया। फिर उनके रहने के स्थान और यात्रा किए गए स्थानों की समानताओं और भिन्नताओं की सूची बनानी है, विशेष रूप से भाषा, पहनावा, खानपान, रीति–रिवाज, इमारतों, सड़कों तथा पुरुषों और महिलाओं की जीवन–शैली के बारे में, और जानकारी पर एक रिपोर्ट तैयार करनी है।

1जिनसे बात करनी है, उनसे पहले अनुमति लीजिए और ऐसा समय पूछिए जब वे आराम से बैठकर बात कर सकें।

2पाँचों प्रश्न (क) से (ङ) पूछिए और उनके उत्तर उन्हीं के शब्दों में लिखिए; अपनी ओर से कुछ मत जोड़िए।

3एक तालिका बनाइए: बिंदु, उनका अपना स्थान, यात्रा का स्थान, समानता या अंतर। बिंदु ये सात लीजिए: भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतें, सड़कें, पुरुषों और महिलाओं की जीवन-शैली।

4तालिका के आधार पर रिपोर्ट लिखिए।

कोई एक सही उत्तर नहीं है; रिपोर्ट आपके संबंधी की अपनी यात्रा पर टिकेगी। उसका ढाँचा यह रखिए। (पृष्ठ 139)

  • यात्रा का ब्योरा: कहाँ गए, कैसे, कितना समय लगा, क्यों गए और कौन-सी कठिनाई आई, हर बात एक-दो वाक्य में, उन्हीं के शब्दों में।
  • तुलना तालिका: सात बिंदुओं में से हर एक के आगे उनका अपना स्थान, यात्रा का स्थान और “समान” या “अलग”। जहाँ उन्होंने कुछ नहीं बताया, वह खाना खाली छोड़िए; अपनी ओर से मत भरिए।
  • निष्कर्ष: दो-तीन वाक्य कि उन्हें सबसे ज़्यादा क्या अलग लगा और उसका कारण उन्होंने क्या बताया।

सीख: यह उसी व्यक्ति का नज़रिया है जिसने यात्रा की। किताब भी कहती है कि यात्रियों के वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम “अनछुए” रह जाते हैं, या फिर “एक दृष्टिकोण विशेष” से देखे जाते हैं (पृष्ठ 136)।

6. एक यात्री पर रिपोर्ट (किताब का प्रश्न 12, पृष्ठ 139; काल-रेखा पृष्ठ 137)

प्रश्न 12 कहता है: अध्याय में उल्लिखित यात्रियों में से एक के जीवन तथा कृतियों के बारे में और जानकारी हासिल कीजिए, उसकी यात्राओं पर रिपोर्ट तैयार कीजिए, खासकर इस बात पर कि उसने समाज का कैसा विवरण किया है, और इसकी तुलना अध्याय में दिए गए उद्धरणों से कीजिए। पृष्ठ 137 की काल-रेखा में बारह यात्री हैं; नीचे वे तीन हैं जिन पर अध्याय में पूरा खंड है। काल-रेखा के नोट के अनुसार, जहाँ कोई अन्य संकेत नहीं है, तिथियाँ यात्री के जीवन काल को बताती हैं।

यात्रीजीवन कालकहाँ से
अल–बिरूनी973–1048उज़्बेकिस्तान
इब्न बतूता1304–77मोरक्को
बर्नियर1620–88फ्रांस

1इनमें से एक यात्री चुनिए।

2अध्याय से उसका जीवन काल, वह कहाँ से आया, उसने किस भाषा में और किस ग्रंथ में लिखा, यह लिखिए।

3उसके जीवन या ग्रंथ के बारे में कुछ और पता कीजिए। रिपोर्ट में अध्याय की बातें और अलग से खोजी बातें अलग-अलग लिखिए।

4समाज के उसके वर्णन से अध्याय के कम से कम दो उद्धरण चुनिए। हर उद्धरण के बाद एक पंक्ति में लिखिए कि उससे क्या पता चलता है।

5अंत में लिखिए कि उसके वर्णन में समाज का कौन-सा पहलू नहीं आया।

रिपोर्ट का आधार अध्याय में इस तरह मिलता है; आगे की जानकारी आपको ख़ुद खोजनी है।

  • अल–बिरूनी: जन्म सन् 973 में आज के उज़्बेकिस्तान के ख़्वारिज़्म में; सन् 1017 में बंधक के रूप में ग़ज़नी आया; अरबी में किताब–उल–हिन्द, जो अस्सी अध्यायों में बँटा है (पृष्ठ 115–117)। समाज के वर्णन के लिए स्रोत 5, वर्ण व्यवस्था (पृष्ठ 125)।
  • इब्न बतूता: मोरक्को का यात्री, जन्म तैंजियर में; सन् 1333 में स्थलमार्ग से सिंध; दिल्ली का क़ाज़ी; अरबी में रिह्ला, जो इब्न जुज़ाई के श्रुतलेखों से लिखा गया (पृष्ठ 118–121)। समाज के वर्णन के लिए स्रोत 6 और 7 (पृष्ठ 126), स्रोत 8 (पृष्ठ 127), स्रोत 9 (पृष्ठ 128), स्रोत 10 (पृष्ठ 129)।
  • बर्नियर: फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक तथा इतिहासकार; 1656 से 1668 तक बारह वर्ष भारत में; ग्रंथ ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर (पृष्ठ 122–123, 130)। समाज के वर्णन के लिए स्रोत 11 (पृष्ठ 131), स्रोत 13 (पृष्ठ 133), स्रोत 14 (पृष्ठ 134)।

सीख: किताब के अनुसार ये वृत्तांत पुरुषों और महिलाओं के जीवन की “रोचक झाँकी” देते हैं, पर इन्हें पढ़ते हुए यह ध्यान में रखना आवश्यक है कि कौन-सी बातें अनछुई रह गईं और कौन-सी एक दृष्टिकोण से देखी गईं (पृष्ठ 136)।

अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए

आपके उत्तर मेंतो
स्रोत या आँकड़ा किताब से सही उठाया, उससे नतीजा निकाला और अपना कारण लिखाउत्तर पूरा है।
किताब का हवाला दिया, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता हैहर हवाले के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात सिद्ध होती है।
अल–बिरूनी के आने की दिशा उलटी लिखीउसका जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है; वहाँ से वह बंधक के रूप में ग़ज़नी आया (पृष्ठ 116)। केस 2 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए।
किताब–उल–हिन्द को संस्कृत या फ़ारसी की कृति लिखावह अरबी में है और अस्सी अध्यायों में बँटी है (पृष्ठ 117)। केस 3 का प्रश्न 1 फिर से कीजिए।
“हिंदू” को शुरू से एक धर्म का नाम लिखायह शब्द लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला था, जो सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए इस्तेमाल होता था। किताब कहती है: “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था” (पृष्ठ 117)। केस 3 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
इब्न बतूता को दिल्ली में हमेशा क़ाज़ी लिखावह इस पद पर कई वर्षों तक रहा, पर फिर उसने विश्वास खो दिया और उसे कारागार में कैद कर दिया गया। सुल्तान और उसके बीच की गलतफहमी दूर होने के बाद उसे राजकीय सेवा में पुनर्स्थापित किया गया और 1342 ई. में सुल्तान के दूत के रूप में चीन जाने का आदेश दिया गया (पृष्ठ 118)। केस 4 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए।
संन्यासी बनने वाला शेख़ अली हाज़िन को लिखामहमूद वली बल्खी (1620 के दशक) कुछ समय के लिए संन्यासी भी बन गया था; शेख़ अली हाज़िन (1740 के दशक) भारत से निराश हुआ (पृष्ठ 121)। केस 4 का प्रश्न 5 फिर से कीजिए।
बर्नियर के वृत्तांत 1800 के बाद छपे लिखावे फ्रांस में 1670–71 में प्रकाशित हुए थे। अरबी और फ़ारसी वृत्तांतों का प्रसार हस्तलिपियों के रूप में होता था और वे 1800 से पहले सामान्यत: प्रकाशित नहीं होते थे (पृष्ठ 123)। केस 5 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
अल–बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता मान ली लिखाब्राह्मणवादी व्याख्या मानने के बावजूद उसने अपवित्रता की मान्यता नहीं मानी; उसके अनुसार वह अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी (पृष्ठ 124–125)। केस 6 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए।
ताराबबाद को दिल्ली का बाज़ार लिखाताराबबाद दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार था (पृष्ठ 128)। केस 8 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए।
उलुक को पैदल डाक और दावा को अश्व डाक लिखाउलुक अश्व डाक व्यवस्था है, जो हर चार मील की दूरी पर स्थापित राजकीय घोड़ों से चलती है; दावा पैदल डाक व्यवस्था है, जिसमें प्रति मील तीन अवस्थान होते हैं (पृष्ठ 129)। केस 8 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए।
मुग़ल दस्तावेज़ों के हवाले से राज्य को सारी भूमि का स्वामी लिखाएक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था (पृष्ठ 132)। केस 9 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए।
भूमि राजस्व को लगान या भूमिकर लिखाकिताब के अनुसार वह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था (पृष्ठ 132)। केस 9 का प्रश्न 4 फिर से कीजिए।
प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत मार्क्स का लिखाफ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने बर्नियर के वृत्तांत का प्रयोग करके प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत विकसित किया; बर्नियर के विवरणों ने अठारहवीं शताब्दी से पश्चिमी विचारकों को प्रभावित किया। उन्नीसवीं शताब्दी में मार्क्स ने इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया (पृष्ठ 132)। केस 9 का प्रश्न 5 फिर से कीजिए।
मुग़ल शहरों को सचमुच केवल “शिविर नगर” लिखायह बर्नियर का कहना है, और किताब के अनुसार वह एक अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था; वास्तव में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे (पृष्ठ 134)। केस 10 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
नगरों में रहने वालों का अनुपात पश्चिमी यूरोप से कम लिखासत्रहवीं शताब्दी में जनसंख्या का लगभग पंद्रह प्रतिशत भाग नगरों में रहता था, जो औसतन उसी समय पश्चिमी यूरोप की नगरीय जनसंख्या के अनुपात से अधिक था (पृष्ठ 134)। केस 10 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
बर्नियर के अनुसार सभी महिलाएँ अपनी इच्छा से सती होती थीं लिखाउसने लिखा कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था (पृष्ठ 135)। केस 11 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
रिह्ला को इब्न बतूता की पूरी तरह अपने हाथ की लिखी बतायास्थानीय शासक ने निर्देश दिए कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ, और इब्न जुज़ाई को उसके श्रुतलेख लिखने के लिए नियुक्त किया गया (पृष्ठ 120–121)। भाग ख का प्रश्न 3 फिर से कीजिए।
बर्नियर के अनुसार भारत में बड़ा मध्य वर्ग था लिखाबर्नियर ने लिखा: “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है” (पृष्ठ 131)। भाग ख का प्रश्न 5 फिर से कीजिए।
दासों को भेंट में नहीं दिया जाता था लिखाबाज़ारों में दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे (पृष्ठ 135)। भाग ख का प्रश्न 6 फिर से कीजिए।
इब्न बतूता को श्रीलंका पहुँचा हुआ लिखाकिताब सिर्फ़ इतना कहती है कि उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया (पृष्ठ 118)। भाग घ की गतिविधि 4 फिर से कीजिए।

इनमें से जिस पंक्ति में आपका उत्तर बैठता है, उसमें बताया प्रश्न फिर से हल कीजिए और अपना उत्तर नीचे दिए उत्तर से मिलाइए।