ये प्रश्न रटकर हल नहीं होते। इनमें आपको किताब के स्रोत पढ़ना, प्रमाण से नतीजा निकालना, तुलना करना, पक्ष लेना और कारण देना है। पहले अपना उत्तर ख़ुद लिखिए, फिर नीचे दिया उत्तर खोलकर मिलाइए। अंक सिर्फ़ यह अंदाज़ा देते हैं कि उत्तर कितना लंबा हो।
तारों का मतलब: ★वाली पंक्ति उत्तर की मुख्य बात है; दोहराते समय पहले वही पढ़िए। ! वाली पंक्ति उस चूक की ओर इशारा करती है जो अक्सर हो जाती है।
भाग क — केस-आधारित प्रश्न
केस 1 — प्रिंसेप और पियदस्सी (पृष्ठ 28, 46–47)
किताब का उदाहरण: ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। उन्हें ज़्यादातर अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी लिखा मिला, यानी मनोहर मुखाकृति वाला राजा; कुछ अभिलेखों पर असोक नाम भी था। किताब का स्रोत 10 असोक का एक ऐसा अभिलेख है जिसमें असोक का अपना नाम नहीं है, केवल दो उपाधियाँ हैं: देवानांपिय (देवताओं का प्रिय) और पियदस्सी (देखने में सुंदर)।
1स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं है। फिर भी अभिलेखशास्त्री इसे असोक का ही अभिलेख क्यों मानते हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
अभिलेखशास्त्रियों ने असोक के कई अभिलेखों को आपस में मिलाकर परखा। (पृष्ठ 47)
- असोक का नाम दूसरे अभिलेखों में मिलता है, और वहाँ उपाधियाँ भी लिखी हैं।
- ★परखने पर सब अभिलेखों के विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान में समानता मिली।
इस समानता के आधार पर अभिलेखशास्त्रियों ने माना कि सभी अभिलेख एक ही शासक ने बनवाए। यानी नाम न हो, तब भी अभिलेख की पहचान उसके विषय, शैली, भाषा और लिपि की बनावट से हो सकती है।
2खरोष्ठी पढ़ने की कुंजी किन सिक्कों से मिली? अक्षर कैसे मिलाए गए? 3 अंक
उत्तर देखिए
खरोष्ठी की कुंजी हिंद-यूनानी राजाओं के सिक्कों से मिली। (पृष्ठ 46–47)
- खरोष्ठी पश्चिमोत्तर के कुछ अभिलेखों की लिपि है। पश्चिमोत्तर के हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय–प्रथम शताब्दी ई.पू.) के सिक्कों पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों में लिखे हैं।
- ★यूनानी पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने दोनों लिपियों के अक्षर मिलाए। जैसे दोनों लिपियों में अपोलोडोटस का नाम लिखने में एक ही प्रतीक इस्तेमाल हुआ था।
प्रिंसेप पहले ही खरोष्ठी अभिलेखों की भाषा प्राकृत पहचान चुके थे, इसलिए लंबे अभिलेख पढ़ना सरल हो गया।
3असोक के समय की ब्राह्मी का अर्थ कब निकला? आरंभिक अभिलेखों की भाषा के बारे में विद्वानों ने कई बार क्या अनुमान लगाया, और सच क्या निकला? 2 अंक
उत्तर देखिए
असोक के समय की ब्राह्मी का अर्थ 1838 ई. में निकला, अभिलेख वैज्ञानिकों के कई दशकों के अथक परिश्रम के बाद। (पृष्ठ 29, 46)
- विद्वानों ने कई बार अनुमान लगाया कि ये अभिलेख संस्कृत में लिखे हैं।
- ★सच यह था कि सबसे पुराने अभिलेख प्राकृत में हैं, जो जनसामान्य की भाषाएँ थीं।
केस 2 — सोलह महाजनपद और मगध (पृष्ठ 29–31)
किताब का उदाहरण: बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह राज्यों का उल्लेख महाजनपद नाम से मिलता है। सूची एकसमान नहीं है, फिर भी वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति के नाम प्रायः मिलते हैं। अधिकांश महाजनपदों पर राजा का शासन था, पर गण और संघ कहलाने वाले राज्यों में कई लोगों का समूह शासन करता था। छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध (आधुनिक बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बन गया।
1मगध की सत्ता के विकास की दो व्याख्याएँ लिखिए, एक आधुनिक इतिहासकारों की और एक आरंभिक जैन-बौद्ध लेखकों की। दोनों में भेद क्या है? 3 अंक
उत्तर देखिए
आधुनिक इतिहासकार और आरंभिक जैन-बौद्ध लेखक मगध की ताक़त का कारण अलग-अलग जगह खोजते हैं। (पृष्ठ 31)
- आधुनिक इतिहासकार: मगध में खेती की उपज अच्छी होती थी; लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) उपकरण और हथियार के लिए सुलभ थीं; जंगलों में हाथी मिलते थे, जो सेना का अंग थे; और गंगा तथा उसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता और सुलभ था।
- आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक: इसका श्रेय बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्वाकांक्षी शासकों और उनके मंत्रियों की नीतियों को देते हैं।
- ★भेद: आधुनिक व्याख्या भूगोल और संसाधनों पर ज़ोर देती है, आरंभिक व्याख्या व्यक्तियों पर।
2गण या संघ वाला राज्य राजा वाले महाजनपद से कैसे अलग था? महावीर और बुद्ध का इन राज्यों से क्या संबंध था? 3 अंक
उत्तर देखिए
गण और संघ वाले राज्यों में शासन एक राजा के हाथ में नहीं, लोगों के समूह के हाथ में था। (पृष्ठ 29)
- ★कई लोगों का समूह शासन करता था, और उस समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।
- वज्जि संघ की तरह कुछ गण-राज्यों में भूमि सहित आर्थिक स्रोतों पर सामूहिक नियंत्रण था। ऐसे कई राज्य लगभग एक हज़ार साल तक बने रहे।
- भगवान महावीर और भगवान बुद्ध गणों से संबंधित थे।
केस 3 — मौर्य साम्राज्य के पाँच केंद्र और यूनानी आँकड़े (पृष्ठ 32–35)
किताब का उदाहरण: चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.) के साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र थे: राजधानी पाटलिपुत्र और चार प्रांतीय केंद्र, तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि। इन सबका उल्लेख असोक के अभिलेखों में है। यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आया था, पर उसके विवरण के कुछ अंश ही आज उपलब्ध हैं। यूनानी स्रोतों के अनुसार मौर्य सम्राट के पास छह लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार घुड़सवार और नौ हज़ार हाथी थे; कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
1किताब के अनुसार प्रांतीय केंद्रों का चयन बड़े ध्यान से किया गया था। तक्षशिला, उज्जयिनी और सुवर्णगिरि को चुनने के कारण लिखिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
तीनों केंद्र अपनी जगह की किसी ख़ासियत के कारण चुने गए थे। (पृष्ठ 33)
- तक्षशिला और उज्जयिनी: दोनों लंबी दूरी वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित थे।
- ★सुवर्णगिरि: इसका अर्थ है सोने के पहाड़। वह कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी था।
2असोक के अभिलेख पश्चिमोत्तर से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक एक जैसे संदेश के साथ मिले हैं। क्या इससे मान लेना ठीक है कि पूरे साम्राज्य में प्रशासन एक जैसा था? कारण दीजिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
नहीं, संदेश का एक जैसा होना शासन के एक जैसा होने का प्रमाण नहीं है। (पृष्ठ 32–33)
- साम्राज्य में शामिल क्षेत्र बड़े विविध थे, अफ़गानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र से उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र तक।
- ★संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो।
3यदि यूनानी विवरण सही है, तो इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए मौर्य शासकों को किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? इस आँकड़े को सीधे मान लेने से पहले क्या सावधानी चाहिए? 4 अंक
उत्तर देखिए
किताब यह सूची नहीं देती; यह स्रोत 1 और 2 की मदद से लगाया गया अनुमान है। छह लाख पैदल सैनिकों, तीस हज़ार घुड़सवारों और नौ हज़ार हाथियों के लिए ये चीज़ें चाहिए होतीं। (पृष्ठ 34–35)
- सैनिकों का भोजन, और घोड़ों तथा हाथियों का चारा।
- उपकरण ढोने के लिए बैलगाड़ियाँ, और सैनिकों की देखभाल के लिए सेवक और शिल्पकार। मेगस्थनीज़ की दूसरी उपसमिति के यही काम थे।
- हथियारों के लिए लोहा और लकड़ी, और जंगलों से पकड़े गए हाथी।
- इन सबका खर्च उठाने के लिए धन, जो संभवतः करों से आता होगा।
सावधानी यह है कि यह यूनानी स्रोतों का आँकड़ा है, और कुछ इतिहासकार इसे अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
केस 4 — गंदतिन्दु जातक और गाँव की खेती (पृष्ठ 38–39)
किताब का उदाहरण: गंदतिन्दु जातक में एक कुटिल राजा की प्रजा दुखी है। भेस बदलकर आए राजा से सबने शिकायत की कि “रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी”। इससे बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़कर जंगल में बस गए। जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं, और उनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ थे।
1यह कथा राजा और गाँव की प्रजा के संबंध के बारे में क्या बताती है? किसानों ने करों की बढ़ती माँग का क्या जवाब निकाला? 3 अंक
उत्तर देखिए
कथा बताती है कि राजा और गाँव की प्रजा के संबंध तनावपूर्ण रहते थे। (पृष्ठ 38)
- शासक राजकोष भरने के लिए बड़े-बड़े कर माँगते थे, और इससे किसान ख़ासतौर पर त्रस्त रहते थे।
- कथा में लोग गाँव छोड़कर जंगल में जा बसे।
- ★किसानों ने करों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए उपज बढ़ाने के और उपाय ढूँढ़ने शुरू किए।
2सुदर्शन झील का अभिलेख (स्रोत 5) सिंचाई के बारे में क्या बताता है? रुद्रदमन के बारे में उसमें क्या कहा गया है? 3 अंक
उत्तर देखिए
सुदर्शन झील गुजरात का एक कृत्रिम जलाशय थी। उसकी जानकारी लगभग दूसरी शताब्दी ई. के एक संस्कृत पाषाण अभिलेख से मिलती है। (पृष्ठ 38–39)
- झील मौर्य काल में एक स्थानीय राज्यपाल ने बनवाई थी। भीषण तूफ़ान से उसके तटबंध टूट गए।
- ★यह अभिलेख शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियाँ बताने के लिए बना था। बताया जाता है कि रुद्रदमन ने अपने खर्च से झील की मरम्मत करवाई थी, और इसके लिए प्रजा से कर भी नहीं लिया था।
- उसी पाषाण-खंड पर लगभग पाँचवीं सदी का एक और अभिलेख है, जिसके अनुसार गुप्त वंश के एक शासक ने झील की फिर मरम्मत करवाई।
ऐसे सिंचाई के साधन व्यक्तिगत तौर पर प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग बनवाते थे, और अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाते थे।
3खेती की नई तकनीकों से उपज बढ़ी, फिर भी किताब कहती है कि गाँव के लोगों में भेद बढ़ता गया। बौद्ध कथाओं और तमिल संगम साहित्य में गाँव के किन वर्गों का उल्लेख है, और भेद का आधार क्या हो सकता था? 3 अंक
उत्तर देखिए
उपज तो बढ़ी, पर उसके लाभ सबको समान नहीं मिले। खेती से जुड़े लोगों में भेद बढ़ता जा रहा था। (पृष्ठ 39)
- बौद्ध कथाओं में: भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े ज़मींदार। पालि भाषा का गहपति शब्द छोटे किसानों और ज़मींदारों के लिए आता था।
- आरंभिक तमिल संगम साहित्य में: वेल्लालर (बड़े ज़मींदार), उल्वर (हलवाहा) और अणिमई (दास)।
- ★भेद का आधार: किताब के अनुसार संभव है कि भेद भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित था। भूमि का स्वामित्व महत्वपूर्ण हो गया।
केस 5 — दंगुन गाँव का दान (पृष्ठ 40–41)
किताब का उदाहरण: प्रभावती गुप्त चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375–415 ई.) की पुत्री थी, जिसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ। उसके एक अभिलेख (स्रोत 8) में बताया गया है कि दंगुन गाँव आचार्य चनालस्वामी को दान किया गया। गाँव में पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे। दौरे पर आए अधिकारियों को घास, जानवरों की खाल और कोयला देने से, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध देने से, और मदिरा खरीदने तथा नमक के लिए खुदाई करने के राजसी अधिकार से छूट रहेगी। दान गाँव की संपत्ति और सभी करों सहित है।
1संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि जैसी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था। प्रभावती गुप्त का अभिलेख इसके विपरीत क्या दिखाता है, और किताब इसके क्या कारण सुझाती है? 3 अंक
उत्तर देखिए
प्रभावती गुप्त का अभिलेख इन धर्मशास्त्रों से मेल नहीं खाता। (पृष्ठ 40)
- ★अभिलेख से पता चलता है कि प्रभावती भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया।
- पहला कारण: वह रानी थी, इसलिए यह उदाहरण विरला हो सकता है।
- दूसरा कारण: यह भी संभव है कि धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किए जाते थे।
2स्रोत 8 में दी गई छूटों की सूची से अंदाज़ा लगाइए कि दंगुन गाँव में कौन-सी चीज़ें मिलती थीं। यह अंदाज़ा किस आधार पर है? 3 अंक
उत्तर देखिए
छूट की सूची में वही चीज़ें हैं जो गाँव से अधिकारियों को मिलती थीं, इसलिए सूची से गाँव की पैदावार का अंदाज़ा लगता है। (पृष्ठ 41)
- ★गाँव में घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध मिलते थे, क्योंकि इन्हें अधिकारियों को देने से ही छूट दी गई है।
- मदिरा खरीदने और नमक के लिए खुदाई करने के राजसी अधिकार से भी गाँव मुक्त था।
अभिलेख से यह भी पता चलता है कि दान के बाद गाँव की प्रजा को गाँव के नए प्रधान की आज्ञा माननी पड़ती थी।
3ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से भूमिदान के प्रमाण मिलते हैं। इनके असर को लेकर इतिहासकारों में क्या बहस है? दोनों मत अपने शब्दों में लिखिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
इतिहासकार भूमिदान को दो अलग ढंग से पढ़ते हैं। (पृष्ठ 40–41)
- पहला मत: भूमिदान शासक वंश की रणनीति था, ताकि खेती नए क्षेत्रों में फैले।
- दूसरा मत: भूमिदान दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत था। सामंतों पर पकड़ ढीली पड़ी तो राजाओं ने भूमिदान से समर्थक जुटाए और अपनी शक्ति का आडंबर दिखाया।
- ★फ़र्क़ यह है कि पहला मत दान को शासक की मज़बूत योजना मानता है, दूसरा उसकी कमज़ोरी की निशानी।
भूमिदान के प्रमाण ज़्यादातर ताम्र पत्रों पर खुदे मिलते हैं, कुछ पत्थरों पर भी। दान प्रायः धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए।
केस 6 — मालाबार का बाज़ार और सिक्के (पृष्ठ 43–45)
किताब का उदाहरण: पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी एक यूनानी समुद्र यात्री की रचना है (लगभग प्रथम शताब्दी ई.); पेरिप्लस का अर्थ ही समुद्री यात्रा है। इसके अंश (स्रोत 9) के अनुसार मालाबार तट (आधुनिक केरल) के बाज़ारों में विदेशी व्यापारी काली मिर्च और दाल चीनी खरीदने के लिए जहाज़ भेजते थे। वहाँ सिक्कों, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चे शीशे, ताँबे, टिन और सीसे का आयात होता था।
1लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की होगी? अपना अनुमान कारण सहित लिखिए। 2 अंक
उत्तर देखिए
किताब ख़ुद यह सवाल पूछती है (पृष्ठ 44)। इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है; अंक इस बात के हैं कि अनुमान का कारण किताब से दिया गया हो। एक उत्तर ऐसा हो सकता है:
- सूची बताती है कि मालाबार के बाज़ारों में क्या लाया जाता है और वहाँ से क्या ले जाया जा सकता है, जैसे भारी मात्रा में काली मिर्च।
- ★इसलिए संभव है कि यह सूची समुद्र के रास्ते व्यापार करने वाले व्यापारियों और नाविकों के काम आने के लिए बनी हो।
2रोमन साम्राज्य में किन चीज़ों की माँग थी? दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों का मिलना क्या बताता है? 3 अंक
उत्तर देखिए
व्यापार का सबूत सिक्कों में भी मिलता है। (पृष्ठ 44–45)
- रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसालों तथा कपड़ों और जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी, जिन्हें अरब सागर के रास्ते भूमध्य क्षेत्र तक पहुँचाया जाता था।
- दक्षिण भारत के अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में रोमन सिक्के मिले हैं।
- ★इससे स्पष्ट होता है कि व्यापारिक तंत्र राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था। दक्षिण भारत रोमन साम्राज्य के अंतर्गत न होते हुए भी व्यापारिक दृष्टि से उससे संबंधित था।
3आहत सिक्के किसने जारी किए, इसका पता इतिहासकारों को कैसे चला? 3 अंक
उत्तर देखिए
आहत सिक्के उपमहाद्वीप में सबसे पहले ढाले गए और प्रयोग में आए सिक्के हैं। ये चाँदी और ताँबे के हैं और छठी शताब्दी ई.पू. के हैं। (पृष्ठ 44)
- इन सिक्कों पर बने प्रतीकों को मौर्य जैसे राजवंशों के प्रतीकों से मिलाकर देखा गया।
- ★इससे पता चला कि इन सिक्कों को राजाओं ने जारी किया था।
- यह भी संभव है कि व्यापारियों, धनपतियों और नागरिकों ने भी कुछ सिक्के जारी किए हों।
भाग ख — तर्क और मूल्यांकन
1“असोक की वेदना वाला अभिलेख कलिंग में नहीं मिला, इसलिए कलिंग असोक के राज्य में नहीं था।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है।
- स्रोत 11 में कलिंग पर विजय दर्ज है: शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर कलिंग जीता गया, और “डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए”। (पृष्ठ 48)
- असोक के दूसरे अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से मिले हैं।
- ★वेदना वाला अभिलेख जीते गए क्षेत्र में नहीं मिला, और किताब इसका कारण तय नहीं करती; इससे यह साबित नहीं होता कि कलिंग असोक के राज्य में नहीं था। किताब ख़ुद पूछती है कि क्या नव विजय की वेदना उस क्षेत्र के लिए इतनी दर्दनाक थी कि राजा इस मुद्दे पर कुछ कह न सका।
2“सरदार भी राजा की तरह अपनी प्रजा से कर वसूलता था।” (यह कथन काल्पनिक है।) क्या आप सहमत हैं? 3 अंक
उत्तर देखिए
नहीं, कथन ग़लत है। (पृष्ठ 35–36)
- सरदार अपने अधीन लोगों से भेंट लेता है और उसे अपने समर्थकों में बाँट देता है। कर राजा वसूलते हैं।
- सरदारी में सामान्यतया कोई स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते।
- ★स्रोत 3 में पहाड़ों के लोग सरदार के लिए हाथी दाँत, चंदन, मधु, मिर्च जैसी वस्तुएँ और हाथी, बंदर, मोर जैसे जानवर नाचते-गाते लाते हैं, “ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं”। यह कर नहीं, भेंट है।
3“जातक कथाएँ सिर्फ़ कहानियाँ हैं, इसलिए इतिहासकार उनसे कुछ नहीं सीख सकते।” (यह कथन काल्पनिक है।) इसे जाँचिए। 3 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। (पृष्ठ 38, 41)
- पशुपालक, शिकारी, मछुआरे और जगह-जगह घूमकर खेती करने वाले जैसे लोग प्रायः अपने जीवन के विवरण नहीं रखते थे। इसलिए इतिहासकार कई तरह के स्रोत जोड़ते हैं, जिनमें कथाएँ भी हैं।
- ★गंदतिन्दु जैसी कथा दिखाती है कि करों से तंग प्रजा राजा को कैसे देखती थी: वह अपने गाँव छोड़कर जंगल में बस गई।
- इतिहासकार अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों और चित्रों जैसे विभिन्न प्रकार के स्रोतों का अध्ययन करते हैं, और किताब कहती है कि इन स्रोतों से भी विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती (पृष्ठ 28)।
4“अभिलेख हमें राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूरा ज्ञान दे देते हैं।” (यह कथन काल्पनिक है। किताब की प्रश्नावली का प्रश्न 7 इसी विषय पर डी.सी. सरकार का वक्तव्य रखता है।) इसे जाँचिए। 4 अंक
उत्तर देखिए
कथन ग़लत है। किताब का निष्कर्ष है कि राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से नहीं मिलता। (पृष्ठ 48–49)
- पढ़ने की कठिनाई: अक्षर हलके ढंग से खुदे हों तो पढ़ना मुश्किल है; अभिलेख नष्ट हो सकते हैं; कुछ शब्दों के अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से जुड़े होते हैं।
- अधूरा भंडार: कई हज़ार अभिलेख मिले हैं, पर सबके अर्थ नहीं निकले, सब प्रकाशित या अनूदित नहीं हुए, और अनेक अभिलेख रहे होंगे जो सुरक्षित नहीं बचे। जो उपलब्ध हैं, वे संभवतः कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं।
- छूटे विषय: खेती की दैनिक प्रक्रियाओं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख का उल्लेख प्रायः नहीं मिलता, क्योंकि अभिलेख बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं।
- ★एक ही दृष्टि: अभिलेख उन्हीं व्यक्तियों के विचार बताते हैं जो उन्हें बनवाते थे, इसलिए उनकी समीक्षा दूसरे विचारों के परिप्रेक्ष्य में करनी होगी।
5“छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम मिलते हैं, इसलिए तब व्यापार ठप हो गया था।” (यह कथन काल्पनिक है।) क्या यह नतीजा पक्का है? 3 अंक
उत्तर देखिए
नतीजा पक्का नहीं है। किताब के अनुसार इतिहासकारों में इस पर मतभेद है। (पृष्ठ 45)
- एक मत: रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार घटा, जिससे उससे लाभ पाने वाले राज्यों, समुदायों और क्षेत्रों की संपन्नता पर असर पड़ा।
- दूसरा मत: उस दौर में नए नगरों और व्यापार के नवीन तंत्रों का उदय होने लगा था, और अभिलेखों तथा ग्रंथों में सिक्के का उल्लेख होता रहा।
- ★शायद सिक्के प्रचलन में थे और किसी ने उनका संग्रह करके नहीं रखा, इसलिए वे कम मिलते हैं।
भाग ग — तुलना और वर्गीकरण
1इन सिक्कों के जारी करने वालों के नाम लिखिए और हर एक की एक पहचान बताइए: आहत सिक्के; शासक की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के; बड़े पैमाने पर जारी सोने के सिक्के; हज़ारों की संख्या में मिले ताँबे के सिक्के; सोने के भव्य सिक्के। 3 अंक
उत्तर देखिए
| सिक्का | किसने जारी किया | पहचान |
|---|---|---|
| आहत सिक्के (पृष्ठ 44) | राजाओं ने; शायद व्यापारियों, धनपतियों और नागरिकों ने भी | चाँदी और ताँबे के, छठी शताब्दी ई.पू.; पूरे उपमहाद्वीप में मिले |
| शासक की प्रतिमा और नाम वाले सबसे पहले सिक्के (पृष्ठ 44) | हिंद-यूनानी शासकों ने | उन्होंने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण किया; नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में (पृष्ठ 46) |
| बड़े पैमाने पर जारी सोने के सिक्के (पृष्ठ 44) | कुषाण राजाओं ने, प्रथम शताब्दी ई. में | आकार और वज़न रोमन सम्राटों और ईरान के पार्थियन शासकों के सिक्कों के बिलकुल समान |
| ताँबे के हज़ारों सिक्के (पृष्ठ 45) | यौधेय कबायली गणराज्यों ने (पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों, प्रथम शताब्दी ई.) | इनसे व्यापार में उनकी रुचि और सहभागिता दिखती है |
| सोने के भव्य सिक्के (पृष्ठ 45) | गुप्त शासकों ने | आरंभिक सिक्कों का सोना अति उत्तम; दूर देशों से व्यापार-विनिमय में आसानी |
★कसौटी: “सबसे पहले” और “बड़े पैमाने पर” अलग बातें हैं। शासक के नाम और चित्र वाले सबसे पहले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों ने जारी किए, जिन्होंने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था; कुषाणों ने बाद में, प्रथम शताब्दी ई. में, सोने के सिक्के बड़े पैमाने पर जारी किए (पृष्ठ 44)।
आहत सिक्के सोने के नहीं थे; सबसे पहले आहत सिक्के चाँदी और ताँबे के थे।
2उपज बढ़ाने के तीन तरीकों की तुलना कीजिए: लोहे के फाल वाला हल, धान की रोपाई और सिंचाई। हर तरीका कहाँ अपनाया गया, और उसकी सीमा या ख़ास बात क्या थी? 3 अंक
उत्तर देखिए
| तरीका | कहाँ और कैसे | सीमा या ख़ास बात |
|---|---|---|
| लोहे के फाल वाला हल (पृष्ठ 38–39) | छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्रों में हल फैला; भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हलों से जुताई होने लगी | उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में; पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन में बीसवीं सदी में शुरू हुआ; पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल से खेती |
| धान की रोपाई (पृष्ठ 38) | गंगा की घाटी में; पहले बीज अंकुरित किए जाते, फिर पानी से भरे खेतों में पौधे रोपे जाते | कमरतोड़ मेहनत; वहीं हो सकती है जहाँ पानी बहुतायत में हो |
| सिंचाई (पृष्ठ 39) | कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों से | साधन व्यक्तिगत तौर पर प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग बनवाते थे; कृषक समुदायों ने भी मिलकर साधन बनाए |
★कसौटी: तीनों तरीकों से उपज बढ़ी, पर लाभ सबको समान नहीं मिले, और लोहे के फाल वाला हल उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में पहुँचा (पृष्ठ 38–39)।
3अध्याय के इन स्रोतों से हम क्या जान पाते हैं, और हर एक को पढ़ते समय क्या सावधानी रखनी चाहिए? 4 अंक
उत्तर देखिए
| स्रोत | इनसे क्या पता चलता है | सावधानी |
|---|---|---|
| असोक के अभिलेख (पृष्ठ 32, 47–48) | राजा के संदेश, उपाधियाँ, धम्म, कलिंग की विजय | अभिलेख बड़े और विशेष अवसर दर्ज करते हैं, और उन्हीं के विचार बताते हैं जो उन्हें बनवाते थे (पृष्ठ 48–49) |
| मेगस्थनीज़ का विवरण (पृष्ठ 32, 34–35) | अधिकारियों के काम, और सेना के लिए एक समिति तथा छह उपसमितियाँ | आज उसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं; यूनानी स्रोतों के सेना-आँकड़ों को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं |
| गंदतिन्दु जैसी जातक कथा (पृष्ठ 38) | करों से परेशान प्रजा और राजा के तनावपूर्ण संबंध | अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ थे, जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा |
| प्रयाग प्रशस्ति (पृष्ठ 37) | समुद्रगुप्त की प्रशंसा: उन्हें कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के तुल्य बताया गया | प्रशस्तियों के रचयिता उन्हें तथ्यात्मक विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे (पृष्ठ 36–37) |
| सिक्के (पृष्ठ 44–45) | शासकों की पहचान, और व्यापार की पहुँच, जैसे दक्षिण भारत में रोमन सिक्कों का मिलना | छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम मिलने के कारणों पर इतिहासकार एकमत नहीं |
★कसौटी: हर स्रोत अपने रचयिता या बनवाने वाले की नज़र से बोलता है, इसलिए एक स्रोत के भरोसे नतीजा मत निकालिए। अभिलेखों को ग्रंथों, सिक्कों और पुरावशेषों के साथ मिलाकर पढ़ना पड़ता है (पृष्ठ 48–49)।
भाग घ — प्रोजेक्ट और गतिविधि
1. कतरनों से अभिलेख तक (किताब का प्रश्न 11, पृष्ठ 52)
असोक ने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए। सुदर्शन झील का अभिलेख (स्रोत 5) बताता है कि झील किसने बनवाई और किसने उसकी मरम्मत करवाई; बताया जाता है कि रुद्रदमन ने अपने खर्च से मरम्मत करवाई थी और प्रजा से कर भी नहीं लिया था (पृष्ठ 32, 38)। अब एक महीने के अखबार इकट्ठा कीजिए और सड़क, पुल, नहर, तालाब, स्कूल जैसे सार्वजनिक कामों पर सरकारी अधिकारियों के वक्तव्य काटकर रखिए। हर कतरन पर तारीख़ और अखबार का नाम लिखिए। फिर एक तालिका भरिए: कार्य क्या है, उद्देश्य क्या बताया गया, पैसा और दूसरे संसाधन कहाँ से आएँगे, वक्तव्य किसने जारी किया और कैसे फैलाया गया। अंत में इन्हें सुदर्शन झील और असोक के अभिलेखों से मिलाइए, और समानताएँ तथा असमानताएँ दो स्तंभों में लिखिए।
2. सिक्के और नोट (किताब का प्रश्न 12, पृष्ठ 52)
अध्याय में आहत सिक्के चाँदी और ताँबे के हैं, और उन पर प्रतीक आहत करके, यानी ठोककर, बनाए जाते थे। हिंद-यूनानी सिक्कों पर शासक का नाम और चित्र है, और नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों लिपियों में लिखे हैं। कुषाणों और गुप्तों के सिक्के सोने के हैं, और यौधेयों के ताँबे के (पृष्ठ 44–46)। अब आज प्रचलित पाँच अलग नोट या सिक्के लीजिए। हर एक के दोनों ओर का चित्र बनाइए या ध्यान से वर्णन कीजिए। एक तालिका बनाइए: मूल्य, धातु या कागज़, आकार और माप, चित्र और प्रतीक, लिपियाँ और भाषाएँ, जारी करने वाले का नाम। फिर एक पृष्ठ की रिपोर्ट लिखिए कि आज के सिक्कों-नोटों और अध्याय के सिक्कों में क्या एक जैसा है और क्या अलग।
3. हमारे यहाँ की खेती (किताब की चर्चा, पृष्ठ 41)
किताब के अनुसार छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में हल का प्रचलन फैला, गंगा की घाटी में धान की रोपाई होने लगी, और सिंचाई कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों से होती थी। पंजाब और राजस्थान में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ (पृष्ठ 38–39)। अब अपने गाँव या आसपास के किसानों से पूछिए कि खेत किससे जोते जाते हैं (बैल, हल, ट्रैक्टर), सिंचाई कैसे होती है (कुआँ, ट्यूबवेल, तालाब, नहर, बारिश), और धान की रोपाई होती है या नहीं। नहीं होती, तो कौन-सी फ़सलें और तरीके अपनाए जाते हैं। फिर एक तालिका में अपने इलाके की तुलना किताब के तीन तरीकों से कीजिए।
4. पतिवेदक और आज का संवाददाता (स्रोत 10, पृष्ठ 47)
स्रोत 10 में असोक कहते हैं कि लोगों के समाचार पतिवेदक सदैव उन तक पहुँचाएँ, चाहे वे खाना खा रहे हों, अंतःपुर, विश्राम कक्ष, गोशाले, पालकी या वाटिका में हों। अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक का अर्थ संवाददाता बताया है। अब सोचिए कि आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने अलग रहे होंगे। चार पंक्तियों में लिखिए कि दोनों किसके प्रति जवाबदेह हैं, और समाचार किसके काम आता है।
5. मानचित्र 2 पर असोक के अभिलेख (मानचित्र 2, पृष्ठ 33; किताब की चर्चा, पृष्ठ 48)
मानचित्र 2 में असोक के अभिलेखों के प्राप्ति स्थान तीन तरह के हैं: महाशिलालेख, लघुशिलालेख और स्तंभ अभिलेख। राजधानी पाटलिपुत्र और प्रांतीय केंद्र तक्षशिला और उज्जयिनी भी इसी मानचित्र पर देखे जा सकते हैं। अब मानचित्र को ध्यान से देखिए: हर प्रकार के अभिलेख कहाँ-कहाँ मिले हैं, क्या वे राजधानी और प्रांतीय केंद्रों के आसपास हैं, और क्या वे व्यापार मार्गों के पास हैं। फिर तय कीजिए कि कोई एक-सा प्रारूप दिखता है या नहीं। एक संकेत: कलिंग विजय की वेदना वाला अभिलेख उस विजित क्षेत्र में नहीं मिला (पृष्ठ 48)।
अपना उत्तर ख़ुद जाँचिए
| आपके उत्तर में | तो |
|---|---|
| स्रोत या आँकड़ा किताब से सही उठाया, उससे नतीजा निकाला और अपना कारण लिखा | उत्तर पूरा है। |
| किताब का हवाला दिया, पर यह नहीं लिखा कि उससे क्या पता चलता है | हर हवाले के बाद एक पंक्ति जोड़िए कि उससे अध्याय की कौन-सी बात सिद्ध होती है। |
| लिख दिया कि सबसे पुराने अभिलेख संस्कृत में हैं | सबसे पुराने अभिलेख प्राकृत में हैं, जो जनसामान्य की भाषाएँ थीं। विद्वानों ने कई बार इन्हें संस्कृत मान लिया था (पृष्ठ 29, 46)। केस 1 का प्रश्न 3 फिर से कीजिए। |
| सरदार को भी कर वसूलने वाला लिख दिया | सरदार भेंट लेता और समर्थकों में बाँटता है; कर राजा वसूलते हैं (पृष्ठ 35)। भाग ख का प्रश्न 2 फिर से देखिए। |
| लिख दिया कि अभिलेखों के संदेश एक जैसे थे, इसलिए मौर्य साम्राज्य में शासन भी एक जैसा था | क्षेत्र बड़े विविध थे, और सबसे प्रबल नियंत्रण राजधानी और प्रांतीय केंद्रों के आसपास रहा होगा (पृष्ठ 32–33)। केस 3 का प्रश्न 2 फिर से कीजिए। |
| लिख दिया कि लोहे के फाल वाला हल पूरे उपमहाद्वीप में फैल गया | वह कुछ ही हिस्सों में पहुँचा; पंजाब और राजस्थान में बीसवीं सदी में आया, और पूर्वोत्तर तथा मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल से खेती होती रही (पृष्ठ 38–39)। भाग ग का प्रश्न 2 फिर से देखिए। |
| ! लिख दिया कि शासक के नाम और चित्र वाले सबसे पहले सिक्के कुषाणों ने जारी किए | ऐसे सबसे पहले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों ने जारी किए, जिन्होंने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था; कुषाणों ने प्रथम शताब्दी ई. में सोने के सिक्के बड़े पैमाने पर जारी किए (पृष्ठ 44)। भाग ग का प्रश्न 1 फिर से देखिए। |