अध्याय 6भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 6

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अध्याय 6 — भक्ति–सूफ़ी परंपराएँ · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2 · कक्षा 12

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 140 से 169

यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के बाद एक लिखी हैं, हर एक के नीचे शिक्षक के लिए एक टिप्पणी के साथ। उद्धरण-चिह्न में सिर्फ़ किताब के शब्द हैं; जहाँ हमारी ओर से लिखा है, वह बात हमारी अपनी है। प्रोजेक्टर न हो तो यही पाठ पढ़कर, बोर्ड और चार्ट पेपर से कक्षा चल सकती है; हर कालांश का पूरा क्रम पाठ योजना में है।

बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।

कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:

  • कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1: शुरुआत; धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट
  • कालांश 2 — भाग 2: उपासना की कविताएँ
  • कालांश 3 — भाग 3: कर्नाटक की वीरशैव परंपरा; उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान
  • कालांश 4 — भाग 4: दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ
  • कालांश 5 — भाग 5: सूफ़ीमत का विकास
  • कालांश 6 — भाग 6: उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला
  • कालांश 7 — भाग 7: भाषा और संपर्क; सूफ़ी और राज्य
  • कालांश 8 — भाग 8: नवीन भक्ति पंथ; दैवीय वस्त्र की बुनाई : कबीर
  • कालांश 9 — भाग 9: बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्द; मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी
  • कालांश 10 — भाग 10: धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण, काल-रेखा, मानचित्र कार्य, और पहले दिन की पर्चियाँ
  • कालांश 11 — आख़िरी भाग: मूल्यांकन, अभ्यास के 12 प्रश्न

पहले यह पढ़िए — पूजा के कई रास्ते

पृष्ठ 140

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हमारी ओर से: एक ही समय में पूजा के इतने अलग-अलग रास्ते साथ-साथ कैसे चलते रहे, और वे कहाँ मिले, कहाँ टकराए? यह सवाल पूरे अध्याय में साथ चलेगा।

किताब पृष्ठ 140 पर कहती है, “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”। पहले दिन बच्चे इस सवाल पर अपनी समझ से दो पंक्तियाँ लिखेंगे। सवाल पूजा के रास्तों के इतिहास का है; किसी बच्चे से उसके अपने धर्म या जाति के बारे में मत पूछिए।

एक ही समय में पूजा के इतने अलग-अलग रास्ते साथ-साथ कैसे चलते रहे, और वे कहाँ मिले, कहाँ टकराए? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।

अध्याय का नक्शा

पृष्ठ 140 से 169 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से

  • पहले पूजा प्रणालियों का मेल और टकराव: पौराणिक ग्रंथ, पुरी के जगन्नाथ, देवियाँ और तांत्रिक पूजा
  • फिर भक्ति की धारा: तमिल अलवार और नयनार, कर्नाटक के वीरशैव, और चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत
  • फिर इस्लामी परंपराएँ: शासक और प्रजा, लोक प्रचलन में इस्लाम, और मस्जिदें
  • फिर सूफ़ी धारा: ख़ानक़ाह और सिलसिला, चिश्ती, उनकी भाषा, और राज्य से उनका रिश्ता
  • फिर नए भक्ति पंथ: कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई
  • आख़िर में यह कि इतिहासकार इन परंपराओं का इतिहास किन स्रोतों से जोड़ते हैं, और काल-रेखा

हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वे लौटाई जाएँगी।

1 | शुरुआत; 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट (1.1-1.2)

जो गीत बिना लिखे एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचे, उसमें रास्ते में क्या-क्या बदल सकता है?

नए स्रोत

पृष्ठ 140

  • लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी के नए साहित्यिक स्रोत: संत कवियों की रचनाएँ
  • ये रचनाएँ उन्होंने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से रचीं
  • “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”: अनुयायियों की पीढ़ियों ने संदेश आगे बढ़ाया, और कुछ विचार बदले या छोड़ दिए
  • अनुयायियों की लिखी जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं हैं, फिर भी बताती हैं कि अनुयायी अपने नेताओं को कैसे देखते थे

किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।” फिर चित्र 6.1 दिखाइए: मणिक्वचक्कार की बारहवीं शताब्दी की कांस्य मूर्ति।

पौराणिक ग्रंथ और ब्राह्मणों का अपनाना

पृष्ठ 141

पहली प्रक्रिया

  • पौराणिक ग्रंथों की रचना सरल संस्कृत छंदों में हुई
  • ये स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे
  • यह ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की प्रक्रिया थी

दूसरी प्रक्रिया

  • ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे सामाजिक वर्गों के विश्वासों और आचरणों को स्वीकार किया
  • और उन्हें नया रूप दिया

पृष्ठ 141 का बॉक्स पढ़िए: “महान” और “लघु” परंपरा बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्द हैं, जो उन्होंने एक किसान समाज के बारे में कहे। फिर पूछिए: पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में ही क्यों रचे गए होंगे? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — ताकि वे लोग भी इन्हें समझ सकें जो वैदिक विद्या से दूर रखे गए थे।

  • किनके लिए: किताब के अनुसार ये ग्रंथ “वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे।”
  • किसलिए: यह ब्राह्मणीय विचारधारा के प्रचार की प्रक्रिया थी।

यानी सरल भाषा ने इन विचारों को उन लोगों तक पहुँचाया जिन तक वेद नहीं पहुँचते थे।

पुरी, देवियाँ और तांत्रिक पूजा

पृष्ठ 141–142

बातकिताब में
जगन्नाथपुरी के स्थानीय देवता; बारहवीं शताब्दी तक विष्णु के एक रूप में प्रस्तुत; प्रतिमा स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे और आज भी बनाते हैं
देवीउपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में; स्थानीय देवियाँ कहीं विष्णु की पत्नी लक्ष्मी, कहीं शिव की पत्नी पार्वती के रूप में
तांत्रिक पूजास्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे; अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण के भेद नहीं माने जाते थे; शैव और बौद्ध दर्शन पर इसका असर
वेदअग्नि, इंद्र और सोम पूरी तरह गौण हो गए, फिर भी वेद प्रामाणिक माने जाते रहे

जगन्नाथ का किताब में दिया अर्थ पढ़िए: “शाब्दिक अर्थ में संपूर्ण विश्व का स्वामी”। चित्र 6.2 में जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ हैं। फिर टकराव गिनवाइए: वैदिक परंपरा के प्रशंसक मंत्रों वाले यज्ञ से हटकर आचरणों की निंदा करते थे, तांत्रिक उपासक वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे, और भक्त अपने इष्ट विष्णु या शिव को सर्वोच्च बताते थे। बौद्ध और जैन धर्म से संबंध के बारे में किताब कहती है, “यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे।” यह टकराव किताब के शब्दों में ही पढ़ाइए; किसी परंपरा को ऊँचा या नीचा मत बताइए।

2 | 2. उपासना की कविताएँ (2.1-2.4)

जो गीत गाँव-गाँव घूमकर गाए जाते हों, वे किसी बड़े ग्रंथ जितने महत्त्वपूर्ण कैसे बन सकते हैं?

अलवार और नयनार

पृष्ठ 143

  • भक्ति की परंपरा इस अध्याय के काल से पहले ही लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी थी
  • सगुण (विशेषण सहित): शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियों की मूर्त रूप में उपासना; निर्गुण (विशेषण विहीन): अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना
  • अलवार विष्णु भक्त, नयनार शिवभक्त; ये एक जगह से दूसरी जगह घूमते हुए तमिल में भजन गाते थे
  • जिन जगहों को उन्होंने इष्ट का निवास बताया, वहाँ बाद में बड़े मंदिर बने

किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।” यही “लगभग छठी शताब्दी” कालांश 10 में काल-रेखा की पहली पंक्ति पढ़ते समय काम आएगी।

स्रोत 1: चतुर्वेदी और “अस्पृश्य”

“जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 144 (स्रोत 1)

यह तोंदराडिप्पोडि नाम के एक ब्राह्मण अलवार के काव्य से है। पूरा वाक्य किताब से पढ़िए: विष्णु उन चतुर्वेदियों से भी ज़्यादा, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, उन “दासों” को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं। फिर स्रोत के भीतर छपा प्रश्न पूछिए: “क्या आपको लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति व्यवस्था के विरोधी थे?”

नमूना उत्तर — काव्य के आधार पर, वे जाति से ऊपर भक्ति को रखते हैं।

  • काव्य में: विष्णु को वे चतुर्वेदी नहीं, वे “दास” प्रिय हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
  • कहने वाला कौन: यह बात ख़ुद एक ब्राह्मण अलवार कह रहे हैं।

किताब पृष्ठ 144 पर कहती है कि कुछ इतिहासकारों का यह मत कुछ हद तक सत्य प्रतीत होता है कि इन संतों ने जाति प्रथा के विरोध में आवाज़ उठाई; उत्तर में भी “कुछ हद तक” जैसा सावधान शब्द रखिए।

स्रोत 2: शास्त्र या भक्ति

“तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 144 (स्रोत 2)

यह छंद अप्पार नाम के नयनार संत का है, जो शास्त्र उद्धृत करने वालों से यह पूछते हैं और केवल मारपेरू के स्वामी (शिव) के आगे नतमस्तक होने को कहते हैं। फिर पृष्ठ 144 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडि और अप्पार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?”

नमूना उत्तर — हाँ, दोनों भक्ति को शास्त्र-ज्ञान और कुल से बड़ा मानते हैं, पर कहने का ढंग अलग है।

  • तोंदराडिप्पोडि: ये ख़ुद ब्राह्मण अलवार थे, और कहते हैं कि विष्णु उन चतुर्वेदियों से, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, अधिक उन “दासों” को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
  • अप्पार: ये शास्त्र उद्धृत करने वालों से पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?” और केवल मारपेरू के स्वामी (शिव) के आगे नतमस्तक होने को कहते हैं।

अप्पार ज़्यादा तीखे हैं; दोनों के लिए इष्ट के प्रति प्रेम ही कसौटी है। कोई बच्चा लिखे कि समानता सीमित है, तो वह भी ठीक है: अप्पार का छंद ब्राह्मणों का नाम नहीं लेता, “हे धूर्तजन, जो तुम शास्त्र को उद्धृत करते हो” से बात करता है, और तोंदराडिप्पोडि ख़ुद ब्राह्मण होकर केवल उन चतुर्वेदियों की बात करते हैं जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते। कारण साथ लिखे तो दोनों उत्तर पूरे हैं।

स्त्री भक्त

पृष्ठ 144–145

भक्तकिताब में
अंडालअलवार स्त्री, जो अपने को विष्णु की प्रेयसी मानती थीं; उनके गीत आज भी गाए जाते हैं
कराइक्काल अम्मइयारशिव भक्त, जिन्होंने घोर तपस्या का रास्ता अपनाया

किताब कहती है, “संभवत: इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी।” स्रोत 3 पढ़िए और पृष्ठ 145 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “उन उपायों की सूची बनाइए जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आप को प्रस्तुत करती हैं। किस भाँति यह उपाय स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा से भिन्न हैं।”

नमूना उत्तर — स्रोत 3 में वे अपने को सुंदर नहीं, डरावने रूप में दिखाती हैं।

  • रूप: फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश और आगे निकले दाँत।
  • जगह: वन में चीखती हुई; वह वन “जो हमारे पिता (शिव) का घर है”।

वे सुंदर दिखने के बजाय शिव की भक्ति को ही अपनी पहचान बनाती हैं, और किताब कहती है, “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।”

चोल शासक और संत

पृष्ठ 145–146

  • तमिल भक्ति भजनों का एक मुख्य विषय बौद्ध और जैन धर्म का विरोध है, ख़ास तौर पर नयनारों की रचनाओं में; इतिहासकार इसका कारण राजकीय अनुदान पाने की होड़ बताते हैं
  • चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने विष्णु और शिव के मंदिरों के लिए भूमि–अनुदान दिए
  • चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के बड़े शिव मंदिर चोल शासकों की मदद से बने
  • 945 ईसवी के एक अभिलेख के अनुसार चोल सम्राट परांतक प्रथम ने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं

यहाँ विरोध की बात किताब के शब्दों में ही रखिए: भजनों में विरोध, और इतिहासकारों के अनुसार उसका कारण अनुदान की होड़। चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम कालांश 10 के मानचित्र कार्य में शिव मंदिर वाले स्थल बनेंगे।

3 | 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा; 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान

किसी बात को समझाने के लिए आप कौन-सी रोज़ की ऐसी मिसाल देंगे, जिसमें लोगों का कहना और करना उलटा दिखे?

बासवन्ना और लिंगायत

पृष्ठ 146–147

बातकिताब में
कौनबारहवीं शताब्दी, कर्नाटक; बासवन्ना (1106–68), एक ब्राह्मण, जो एक कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे
नामअनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए
उपासनाशिव की उपासना लिंग के रूप में; पुरुष बाएँ कंधे पर चाँदी के एक पिटारे में छोटा लिंग धारण करते हैं; जंगम, यानी यायावर भिक्षुओं, का आदर
मृत्युभक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता; श्राद्ध संस्कार नहीं करते, मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं
जातिजाति का, और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध; पुनर्जन्म के सिद्धांत पर प्रश्न
विवाहवयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह, जिन्हें धर्मशास्त्र नहीं मानते थे

किताब का वाक्य पढ़िए: “वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।” यह तालिका किताब की बताई मान्यताओं की है; किसी अनुष्ठान का अभिनय या प्रदर्शन मत करवाइए।

स्रोत 4: अनुष्ठान और यथार्थ संसार

“जब वे एक पत्थर से बने सर्प को देखते हैं तो उस पर दूध चढ़ाते हैं”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 147 (स्रोत 4)

यह बासवन्ना का एक वचन है। जोड़ियाँ पूरा वचन किताब से पढ़ें, फिर पृष्ठ 147 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए। वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं।”

नमूना उत्तर — बासवन्ना दिखावटी अनुष्ठानों के विरोधी हैं।

  • रवैया: लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप आए तो कहते हैं “मारो–मारो”; जो सेवक खा सकता है उसे भगा देते हैं, और जो प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं।
  • समझाने का ढंग: वे रोज़ की जानी-पहचानी बातों के जोड़े रखकर उलटापन दिखाते हैं, ताकि श्रोता ख़ुद देख ले कि कर्मकांड और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते।

भाषा सरल है, जैसी वचनों की होती है।

उत्तरी भारत: मंदिर और नए नेता

पृष्ठ 147–148

शासकों के साथ

  • विष्णु और शिव की उपासना शासकों की मदद से बने मंदिरों में होती थी
  • चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलीं
  • कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह अनेक राजपूत राज्यों के उभरने का दौर था, जिनमें ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था

ढाँचे के बाहर

  • नाथ, जोगी और सिद्ध; इनमें से कई शिल्पी समुदायों से, जिनमें जुलाहे भी थे
  • इन्होंने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और लोगों की भाषाओं में बात की
  • फिर भी ये शासक वर्ग का समर्थन नहीं पा सके

फिर बताइए कि तुर्कों के आगमन का चरम दिल्ली सल्तनत (तेरहवीं शताब्दी) की स्थापना थी, और किताब का वाक्य पढ़िए: “सूफ़ियों का आगमन (अनुभाग 6) इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।” पृष्ठ 147 के बॉक्स से दो बातें जोड़िए: तमिल भक्तों के विचार संस्कृत परंपरा में अपनाए गए, जिसका नतीजा भागवत पुराण है; और तेरहवीं शताब्दी में महाराष्ट्र में भक्ति का विकास हुआ।

4 | 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ (5.1-5.3)

किसी नई जगह जाकर बसने वाले लोग अपनी कौन-सी बातें साथ रखते हैं, और वहाँ की कौन-सी बातें अपना लेते हैं?

पुराने संपर्क

पृष्ठ 148

  • प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए; मध्य एशिया से लोग उत्तर–पश्चिम प्रांतों में आकर बसे
  • 711 ईसवी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीतकर उसे खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया
  • लगभग तेरहवीं शताब्दी में तुर्क और अफगानों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी
  • बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म था, और सोलहवीं शताब्दी में मुगल सल्तनत बनने पर भी यह बना रहा

पृष्ठ 148 का बॉक्स पढ़िए: उलमा, आलिम का बहुवचन, इस्लाम धर्म के ज्ञाता थे। अगली स्लाइड में यही उलमा शासकों के मार्गदर्शक के रूप में आएँगे।

शासक, उलमा और प्रजा

पृष्ठ 149

सिद्धांत में

  • मुसलमान शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना था
  • उलमा से अपेक्षा थी कि वे शासन में शरिया का पालन करवाएँगे
  • शरिया कुरान शरीफ़ और हदीस पर आधारित कानून है; बाद में क़ियास और इजमा भी इसके स्रोत माने गए

व्यवहार में

  • उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी, क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम मानने वाली नहीं थी
  • ज़िम्मी संरक्षित श्रेणी थी, जो जज़िया कर चुकाकर संरक्षण की अधिकारी बनती थी; भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया
  • बहुत से शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को भूमि अनुदान और कर की छूट दी

यहाँ स्रोत 5 भी पढ़वाइए: अकबर का 1598 का फ़रमान, जिसका शीर्षक “खम्बात का गिरजाघर” है। बच्चे देखें कि यह फ़रमान यीशु की जमात के पादरियों को खम्बायत में इबादत के लिए एक इमारत बनाने देने के बारे में है। तुलना किताब के उदाहरणों तक ही रखिए; किसी धर्म को दूसरे से बेहतर या बुरा मत बताइए।

स्रोत 6: जोगी के प्रति श्रद्धा

“आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 150 (स्रोत 6)

यह औरंगज़ेब का 1661–62 का पत्र है, जो गुरु आनंद नाथ नाम के एक जोगी को लिखा गया था। पत्र पढ़कर पृष्ठ 150 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए। जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।”

नमूना उत्तर — पत्र से देवता भी पता चलता है और बादशाह का मन भी।

  • देवता: शिव। पत्र में “श्री शिव जियो की पनाह” लिखा है।
  • बादशाह का रवैया: आदर और उदारता का। औरंगज़ेब ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे, और मदद का भरोसा दिया।

यानी सिद्धांत की बात अलग थी, और शासक का अपनी प्रजा के एक जोगी से व्यवहार अलग।

लोक प्रचलन में इस्लाम

पृष्ठ 150–151

  • सिद्धांत में पाँच मुख्य बातें: अल्लाह एकमात्र ईश्वर हैं और पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत; दिन में पाँच बार नमाज़; खैरात (ज़कात) बाँटना; रमज़ान के महीने में रोज़ा; और हज के लिए मक्का जाना
  • खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय ने जीनन नाम के भक्ति गीत अपनाए, जो राग में बँधे थे और पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे
  • मालाबार तट (केरल) पर बसे अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय मलयालम भाषा अपनाई, और मातृकुलीयता और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार भी

इन पाँच बातों को एक जानकारी की तरह पढ़ाइए, किसी आचरण का अभिनय मत करवाइए। स्लाइड का असली सवाल यह है कि सिद्धांत एक होने पर भी व्यवहार में जगह के हिसाब से इतनी भिन्नता क्यों थी। यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — क्योंकि इस्लाम अपनाने वाले लोग अपनी जगह की भाषा और रीति-रिवाज साथ लेकर चले।

  • भाषा: जीनन छह क्षेत्रीय भाषाओं में गाए जाते थे; मालाबार के व्यापारियों ने मलयालम अपनाई।
  • रीति: मालाबार में मातृकुलीयता और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार भी अपनाए गए।

यही बात अध्याय के शीर्षक के “दुशाले के नए ताने-बाने” में है।

मस्जिदें और नाम

पृष्ठ 151–152

बातकिताब में
हर जगह एक-साइमारत का मक्का की ओर अनुस्थापन, जो मेहराब और मिम्बर से पता चलता है
जगह के हिसाब सेछत और निर्माण का सामान
चित्र6.9, 6.10 और 6.11
नामआठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं मिलता है; तुर्की मुसलमान तुरुष्क, तजाकिस्तान से आए लोग ताजिक, फारस के लोग पारसीक; इन प्रवासियों के लिए एक अधिक सामान्य शब्द म्लेच्छ

तीनों चित्र दिखाकर बच्चों से हर मस्जिद में दो बातें ढुँढवाइए: एक जो हर जगह एक-सी है, और एक जो उस जगह की अपनी है। यही अभ्यास का प्रश्न 2 है, जो कालांश 11 में आएगा।

5 | 6. सूफ़ीमत का विकास (6.1-6.2)

किसी बात का मतलब किसी और की व्याख्या से समझना, और ख़ुद अनुभव करके समझना, इन दोनों में क्या फ़र्क़ है?

सूफ़ी कौन थे

पृष्ठ 152

  • इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके
  • यह धार्मिक और राजनीतिक संस्था के रूप में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था; इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा
  • उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं की, और धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की
  • उन्होंने मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया, और पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल बताकर उनका अनुसरण करने की सीख दी
  • उन्होंने कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की

बोर्ड पर दो खाने बनाइए: किसके विरोध में और किस पर बल। बच्चे पहली स्लाइड की बातें इन्हीं दो खानों में बाँटें।

एक शब्द, तीन मत

पृष्ठ 152

शब्दकिताब में
तसव्वुफ़इस्लामी ग्रंथों में आने वाला शब्द
“सूफ़ीवाद”उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया एक अंग्रेज़ी शब्द
‘सूफ़’ऊन; उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा जो सूफ़ी पहनते थे
‘सफ़ा’साफ़
‘सफ़ा’पैगम्बर की मस्जिद के बाहर का वह चबूतरा जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली इकट्ठी होती थी

किताब इन तीनों को शब्द के निकलने के अलग-अलग मत की तरह रखती है। बच्चों से इनमें से कोई एक “सही” चुनवाने के बजाय तीनों याद करवाइए।

ख़ानक़ाह और सिलसिला

पृष्ठ 152–153

  • ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन था, जिसका अपना साहित्य था
  • सूफ़ी एक संगठित समुदाय, ख़ानक़ाह, के आसपास रहते थे, जिसका नियंत्रण शेख, पीर अथवा मुर्शीद के हाथ में था
  • शेख अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे
  • लगभग बारहवीं शताब्दी से सिलसिले बनने लगे; सिलसिला का शाब्दिक अर्थ जंज़ीर है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है
  • पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी; बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया

पृष्ठ 153 का बॉक्स भी पढ़िए: ज़्यादातर सिलसिलों के नाम स्थापित करने वालों पर पड़े, जैसे कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर; कुछ के नाम जन्मस्थान पर, जैसे चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से।

बा–शरिया और बे–शरिया

पृष्ठ 153

बा–शरिया

  • शरिया का पालन करने वाले सूफ़ी

बे–शरिया

  • सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नए आंदोलन
  • ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी; निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव
  • कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी जैसे नाम

“बा” और “बे” का फ़र्क़ एक पंक्ति में लिखवाइए: एक शरिया का पालन करते थे, दूसरे उसकी अवहेलना करते थे। यही अभ्यास का प्रश्न 3 है।

6 | 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला: 7.1-7.2

किसी जगह पर दूर-दूर से लोग पीढ़ियों तक बार-बार क्यों आते रहते हैं?

ख़ानक़ाह में एक दिन

पृष्ठ 153–154

  • बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आए सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे प्रभावशाली रहे, क्योंकि उन्होंने अपने को स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला
  • शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह (चौदहवीं शताब्दी) उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर, यमुना के किनारे ग़ियासपुर में थी
  • इसमें कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना) था; सामुदायिक रसोई, लंगर, फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी
  • आने वालों में सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर थे
  • चिश्तियों ने स्थानीय परंपराएँ भी अपनाईं: शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों का सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम

आने वालों की सूची बोर्ड पर लिखवाइए और पूछिए कि इसमें कितने तरह के लोग हैं। यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — हर तरह के लोग, ऊँचे-नीचे और अलग-अलग धर्मों के।

  • काम के हिसाब से: सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर।
  • धन के हिसाब से: धनी और निर्धन, दोनों।
  • परंपरा के हिसाब से: हिंदू जोगी और कलंदर भी।

यही विविधता बताती है कि चिश्ती ख़ानक़ाह सबके लिए खुली थी।

चिश्ती सिलसिले के पाँच उपदेशक

पृष्ठ 154

सूफ़ीमृत्यु का वर्षदरगाह का स्थान
शेख मुइनुद्दीन चिश्ती1235अजमेर (राजस्थान)
ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी1235दिल्ली
शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर1265अजोधन (पाकिस्तान)
शेख निज़ामुद्दीन औलिया1325दिल्ली
शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली1356दिल्ली

मानचित्र पर अजमेर और दिल्ली दिखाइए; अजोधन आज पाकिस्तान में है। पृष्ठ 154 का बॉक्स भी पढ़िए: 1039 ईसवी में अबुल हसन अल हुजविरी तुर्की सेना के एक कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करके आए, लाहौर में बसे और फारसी में कश्फ–उल–महजुब लिखी। आज भी वे दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं।

अजमेर की दरगाह

पृष्ठ 155–156

  • ज़ियारत में संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद, यानी बरकत, की कामना की जाती है
  • सबसे पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन की है, जिन्हें ‘ग़रीब नवाज़’ कहा जाता है
  • लोकप्रियता के कारण: शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा, उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता, और राजसी मेहमानों का प्रश्रय
  • दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी
  • “अकबर यहाँ चौदह बार आया”; यह परंपरा उन्होंने 1580 तक बनाए रखी, और 1568 में तीर्थयात्रियों का खाना पकाने के लिए एक विशाल देग़ दरगाह को भेंट की

लोकप्रियता के तीन कारण किताब ख़ुद गिनाती है; बच्चे इनके साथ व्यापारिक मार्ग वाली बात जोड़ें। किताब यह भी बताती है कि नाच और संगीत भी ज़ियारत का हिस्सा थे।

स्रोत 7: मुगल शहज़ादी जहाँआरा की तीर्थयात्रा 1643

“गुम्बद के भीतर रोशनी से भरी दरगाह में मैंने मज़ार के चारों ओर सात फेरे लिए।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 156 (स्रोत 7)

यह गद्यांश जहाँआरा की लिखी शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस–अल–अखाह से है; 1643 में वे अपने पिता शाहजहाँ के साथ आगरा से अजमेर गई थीं। पूरा गद्यांश पढ़कर पृष्ठ 156 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “जहाँआरा कौन सी चेष्टाओं का ज़िक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाती हैं। दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?”

नमूना उत्तर — जहाँआरा की भक्ति रास्ते में भी दिखती है और दरगाह में भी।

  • रास्ते में: हर रोज़ दो बार की अख़्तियारी नमाज़; रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; दरगाह की तरफ़ न पैर फैलाए, न पीठ की।
  • दरगाह में: “अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से” रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, सात फेरे लिए, इतर छिड़का और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
  • दरगाह की खासियत: वे उसे बार–बार मुकद्दस (पवित्र) दरगाह कहती हैं, और उसकी चौखट और वहाँ की ज़मीन तक को आदर देती हैं। अंश का वर्णन भी इसका उत्तर देता है: वे “चिराग और इतर में डूबे दरगाह” और “गुम्बद के भीतर रोशनी से भरी दरगाह” की बात करती हैं।

यानी शहज़ादी होकर भी वे शेख के आगे पूरी विनम्रता दिखाती हैं। इसे एक ऐतिहासिक वर्णन की तरह पढ़िए; कक्षा में कोई आचार दोहराया न जाए।

7 | 7.3 भाषा और संपर्क; 7.4 सूफ़ी और राज्य

अपनी बात बहुत सारे लोगों तक पहुँचानी हो, तो आप किस भाषा में और किस रूप में कहेंगे?

चिश्तियों की भाषा और रूप

पृष्ठ 156–157

रूपकिताब में
ज़िक्र और समाज़िक्र, ईश्वर का नाम–जाप; समा (श्रवण करना), यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल
हिंदवीदिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे
बाबा फरीदक्षेत्रीय भाषा में काव्य, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है
कौलअमीर खुसरो (1253–1325) ने इसका प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया; कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाता था
मसनवीलंबी कविताएँ, जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया; जैसे मलिक मोहम्मद जायसी का पद्मावत
दक्खनीबीजापुर (कर्नाटक) के आसपास सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों के चिश्ती संतों की छोटी कविताएँ, जो संभवत: औरतें चक्की पीसते और चरखा कातते समय गाती थीं

यह तालिका अभ्यास के प्रश्न 8 की नींव है, जो कालांश 11 में आएगा। बच्चे हर पंक्ति के आगे लिखें कि यह रूप किन लोगों तक पहुँचता होगा।

स्रोत 8: चरखानामा

“और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 157 (स्रोत 8)

पूरा गीत पढ़कर पृष्ठ 157 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न हैं?”

नमूना उत्तर — दोनों में पीर के प्रति भक्ति है, पर कहने वाले भी अलग हैं और ढंग भी।

  • समानता: चरखानामा कातने को पीर की भेंट बनाता है; जहाँआरा मज़ार पर इतर और दुपट्टा चढ़ाती हैं।
  • अंतर (कौन, कहाँ): चरखानामा चरखे के चलने की धुन पर आधारित गीत है, और किताब के अनुसार दक्खनी की ऐसी रचनाएँ संभवत: औरतें चक्की पीसते और चरखा कातते हुए गाती थीं; जहाँआरा की ज़ियारत एक शहज़ादी की लंबी तीर्थयात्रा है।
  • अंतर (तरीका): गीत में रोज़ का काम ही ज़िक्र बन जाता है (ज़िक्र–ए–जाली, ज़िक्र–ए–कल्बी, ज़िक्र–ए–आइनी); जहाँआरा की भक्ति सात फेरे, ज़मीन चूमना और नंगे पाँव चलना जैसे आचारों से दिखती है।

यानी भक्ति का भाव एक है, उसे जीने के ढंग अलग।

सत्ता से दूरी, पर अलगाव नहीं

पृष्ठ 158

  • चिश्ती संयम और सादगी का जीवन जीते थे और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर बिना माँगे अनुदान या भेंट स्वीकार करते थे
  • सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी; चिश्ती दान को जोड़ने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर पूरा खर्च कर देते थे
  • तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत बनाई तो उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकरा दी, क्योंकि अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं थी
  • सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा लिया, जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता अल्लाह से मानते थे
  • सूफ़ी संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और चमत्कारी शक्ति में लोगों के विश्वास से वे लोकप्रिय थे; इन वजहों से शासक भी उनका समर्थन चाहते थे
  • तनाव भी था: झुककर प्रणाम करना और कदम चूमना, और सुल्तान–उल–मशेख जैसी पदवियाँ

किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।” “शायद” शब्द पर रुकिए: किताब यहाँ अनुमान बता रही है, पक्की बात नहीं।

स्रोत 9: शाही भेंट अस्वीकार

“इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 159 (स्रोत 9)

यह 1313 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह की एक घटना है, अमीर हसन सिजज़ी के शब्दों में: एक स्थानीय शासक ने शेख को दो बगीचे और बहुत सी ज़मीन का पट्टा भेजा। किताब के अंश में यहाँ ‘अपना हक कहते हैं’ छपा है; बात यह है कि शासक ने अपना सारा हक छोड़ दिया था, और आगे का सवाल शेख का है, जिन्होंने यह भेंट नहीं ली (अंश का शीर्षक भी ‘शाही भेंट अस्वीकार’ है)। फिर पृष्ठ 159 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “सूफ़ियों और राज्य के बीच संबंध का कौन सा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है?” और: “यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?”

नमूना उत्तर — शासक शेखों को भेंट देकर उनसे जुड़ना चाहते थे, पर चिश्ती शेख दूरी बनाए रखते थे।

  • शेख निज़ामुद्दीन औलिया: बगीचे और ज़मीन नहीं ली, और यही सवाल पूछा जो स्लाइड पर है।
  • शेख फ़रीदुद्दीन: सुल्तान ग़ियासुद्दीन (तब उलुग़ ख़ान) का धन दरवेशों में बाँटने के लिए लिया, पर चार गाँवों के पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।”

यानी भेंट का धन बाँटा जा सकता था, पर ज़मीन से बँधना उन्हें मंज़ूर नहीं था।

दूसरे हिस्से का उत्तर — अनुयायी शेख से मिलने आते थे; अमीर हसन सिजज़ी लिखते हैं कि वे शेख के कदम चूम सके। इस अंश में शेख फ़रीदुद्दीन का एक किस्सा भी आता है, यानी सीख बातचीत और किस्सों से दी जाती थी। (पृष्ठ 159)

8 | 8. नवीन भक्ति पंथ: 8.1 दैवीय वस्त्र की बुनाई : कबीर

एक ही चीज़ को अलग-अलग लोग अलग-अलग नामों से पुकारें, तो क्या वह चीज़ बदल जाती है?

कबीर की बानी, तीन परिपाटियाँ

पृष्ठ 160

संकलनकिताब में
कबीर बीजककबीर पंथियों द्वारा वाराणसी और उत्तर प्रदेश के दूसरे स्थानों पर संरक्षित
कबीर ग्रंथावलीइसका संबंध राजस्थान के दादू पंथियों से है
आदि ग्रंथ साहिबकबीर के कई पद इसमें संकलित हैं

किताब के अनुसार कबीर लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी के हैं, और इतिहासकारों ने उनके जीवन और काल का अध्ययन उनके काव्य और बाद में लिखी गई जीवनियों के आधार पर किया है। लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने। बच्चों से पूछिए कि इस बात से इतिहासकार का काम कठिन क्यों होता है। यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — क्योंकि जो बानी हम तक पहुँची, वह कई हाथों से होकर आई है।

  • समय का अंतर: संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने।
  • तीन परिपाटियाँ: तीनों संकलन अलग-अलग पंथों और जगहों से जुड़े हैं।

यही बात अध्याय की शुरुआत में भी आई थी: “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”।

भाषा और परम सत्य के नाम

पृष्ठ 160–161

बातकिताब में
भाषाकई भाषाएँ और बोलियाँ; कुछ संत भाषा में, जो निर्गुण कवियों की खास बोली थी
उलटबाँसीउलटी कही उक्तियाँ, जिनमें रोज़ के अर्थ को उलट दिया जाता है, जैसे “समंदरि लागि आगि”
इस्लामी दर्शन सेअल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर
वेदांत दर्शन सेअलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्
योगी परंपरा सेशब्द और शून्य

बोर्ड पर तीन खाने बनाकर नाम भरवाइए। बच्चे देखें कि एक ही कवि तीन परंपराओं के शब्द बरत रहा है।

स्रोत 10: एक ईश्वर

“विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 160 (स्रोत 10)

किताब कहती है, “यह रचना कबीर की मानी जाती है”। जोड़ियाँ पूरा पद पढ़ें, फिर पृष्ठ 160 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?”

नमूना उत्तर — कबीर तर्क और सवाल से बात रखते हैं।

  • सवाल: “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?” यह कैसे हो सकता है।
  • नाम अलग, ईश्वर एक: “ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।”
  • अंतर कहाँ है: विभिन्नताएँ केवल शब्दों में हैं, जिन्हें हम ख़ुद गढ़ते हैं।

यानी उनकी दलील यह है कि झगड़ा नामों का है, ईश्वर का नहीं।

जीवनियाँ और विवाद

पृष्ठ 161–162

  • किताब कहती है कि “इस विषय पर आज भी विवाद है कि वह जन्म से हिंदू थे अथवा मुसलमान”; यह विवाद उन संत जीवनियों में उभरता है जो सत्रहवीं शताब्दी, यानी उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद से लिखी गईं
  • वैष्णव परंपरा की जीवनियों में कबीर को जन्म से हिंदू कबीरदास बताया गया, पर उनका पालन एक गरीब मुसलमान परिवार में हुआ, जो जुलाहे थे और कुछ समय पहले ही इस्लाम धर्म के अनुयायी बने थे
  • इन जीवनियों के अनुसार कबीर के गुरु रामानंद थे, पर किताब के अनुसार दोनों का समकालीन होना मुश्किल प्रतीत होता है, जब तक उन्हें बहुत ही लंबी आयु न दे दी जाए
  • इसलिए दोनों को जोड़ने वाली परंपराएँ स्वीकार नहीं की जा सकतीं; हाँ, इनसे पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ियों के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी

यह विवाद किताब के शब्दों और काल में ही पढ़ाइए। बच्चों से इस पर पक्ष मत लिवाइए; उनका काम यह देखना है कि किताब किस स्रोत की बात कर रही है और वह स्रोत कब लिखा गया।

9 | 8.2 बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्द; 8.3 मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी

किसी गीत को बरसों तक याद रखने में उसकी धुन और साथ में गाने वाले लोग कैसे मदद करते हैं?

बाबा गुरु नानक

पृष्ठ 162

  • बाबा गुरु नानक (1469–1539) का जन्म एक हिंदू व्यापारी परिवार में, मुख्यत: इस्लाम धर्मावलंबी पंजाब के ननकाना गाँव में हुआ, जो रावी नदी के पास था
  • उन्होंने फारसी पढ़ी और लेखाकार के काम का प्रशिक्षण लिया; उनका ज़्यादा समय सूफ़ी और भक्त संतों के बीच बीतता था
  • संदेश: निर्गुण भक्ति का प्रचार; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप जैसे बाहरी आडंबरों को नकारना
  • परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं; उपासना का सरल उपाय, निरंतर स्मरण और नाम का जाप

किताब का वाक्य पढ़िए: “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे, किंतु उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित कर अपने को हिंदू और मुसलमान दोनों से पृथक चिह्नित किया।” (पृष्ठ 163) “प्रतीत होता है” पर रुकिए: किताब यहाँ सावधानी से बात रख रही है।

शबद, संगत और ग्रंथ

पृष्ठ 162–163

बातकिताब में
शबदविचार पंजाबी भाषा में, अलग–अलग रागों में गाए; सेवक मरदाना रबाब बजाकर साथ देता था
संगतअनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया; सामुदायिक उपासना के नियम बनाए
गुरुपदअपने अनुयायी अंगद को अपने बाद गुरुपद दिया; “इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा।”
आदि ग्रंथ साहिबपाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक, उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी संकलित की
गुरु ग्रंथ साहिबसत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी जोड़ीं
खालसा पंथगुरु गोबिन्द सिंह ने नींव डाली; पाँच प्रतीक: बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा

आदि ग्रंथ साहिब में बाबा फरीद और कबीर की बानी भी है; बच्चे इसे कालांश 7 और 8 से जोड़ें। यह तालिका जानकारी की है; किसी आचार का प्रदर्शन मत करवाइए।

मीराबाई

पृष्ठ 163–164

  • मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी) मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी थीं
  • उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ
  • उन्होंने विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़कर परिब्राजिका संत बन गईं
  • कुछ परंपराओं के अनुसार उनके गुरु रैदास थे, जो एक चर्मकार थे

“कुछ परंपराओं के अनुसार” शब्द बोर्ड पर लिखिए; यह बात पक्की नहीं, परंपरा की है। मेड़ता और मेवाड़ राजस्थान के बच्चों के लिए जानी-पहचानी जगहें हैं; मानचित्र पर दिखा दीजिए।

स्रोत 11: कृष्ण के प्रति प्रेम

“राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 164 (स्रोत 11)

स्रोत 11 में मीराबाई के दो पदों के अंश हैं; ऊपर की पंक्तियाँ दूसरे पद की हैं। पूरा स्रोत पढ़कर पृष्ठ 164 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “यह उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है?”

नमूना उत्तर — मीराबाई राणा से डरती नहीं हैं।

  • पहली पंक्ति: इसका सरल अर्थ (हमारी ओर से) है कि राणा जी मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी।
  • दूसरी पंक्ति: “राणों जी रूससी गाँव रखासी, हरी रूस्याँ कुमलास्या।।” यहाँ राणा के रूठने के सामने हरि का रूठना रखा गया है; मीरा को चिंता हरि के रूठने की है (यह पढ़त हमारी ओर से)।

यह उनके जीवन से मेल खाता है: उन्होंने कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़ दिया।

आख़िर में पृष्ठ 164 का शंकरदेव वाला बॉक्स पढ़िए: पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वे असम में वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक थे, और उनके उपदेश ‘भगवती धर्म’ कहलाते हैं।

10 | 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण; काल-रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

सौ साल पुराने किसी गीत से आप उस समय के बारे में क्या-क्या जान सकते हैं, और क्या नहीं?

इतिहास कैसे जोड़ा जाता है

पृष्ठ 164–166

  • स्रोत: मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ और काव्य रचनाएँ
  • मूर्ति और इमारत का इस्तेमाल तभी हो सकता है जब हम उनका संदर्भ अच्छी तरह समझें
  • साहित्यिक स्रोतों में काफ़ी विविधता है: कुछ सरल, स्पष्ट भाषा में, जैसे बासवन्ना के वचन, और कुछ अलंकृत फ़ारसी में लिखे मुग़ल सम्राटों के फ़रमान; हर तरह के पाठ के लिए अलग कौशल चाहिए
  • हर परिपाटी के कुछ संदेश सुरक्षित रहे, बहुत से संप्रेषण के दौरान बदल गए, और कुछ हमेशा के लिए भुला दिए गए
  • किताब के अनुसार लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं; फिर भी इतिहासकारों के लिए चुनौती यह याद रखना है कि धार्मिक परंपराएँ भी दूसरी परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं

इस स्लाइड पर बच्चे पूरे अध्याय से एक-एक उदाहरण दें: मूर्ति का (चित्र 6.1, मणिक्वचक्कार की कांस्य मूर्ति), इमारत का (मस्जिदें, कालांश 4), कहानी का (कबीर की जीवनियाँ, कालांश 8), और काव्य का (बासवन्ना के वचन, कालांश 3)।

ख़ानक़ाहों के आसपास के ग्रंथ

पृष्ठ 165

किस तरह का ग्रंथकिताब में
प्रबंध पुस्तिकासूफ़ी विचारों और आचारों पर, जैसे कश्फ–उल–महजुब
मुलफुज़ातसूफ़ी संतों की बातचीत, जैसे फवाइद–अल–फुआद
मक्तुबातलिखे हुए पत्रों का संकलन, जैसे शेख अहमद सरहिंदी के लिखे मक्तुबात–ए–इमाम रब्बानी
तज़किरासूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण, जैसे सियार–उल–औलिया

तालिका भरवाकर पूछिए: स्रोत 9 इनमें से किस तरह के ग्रंथ से लिया गया है?

नमूना उत्तर — मुलफुज़ात से।

  • ग्रंथ: किताब कहती है, “स्रोत 9 में इस ग्रंथ से लिया एक अंश उद्धृत है”, यानी फवाइद–अल–फुआद से, जो मुलफुज़ात पर एक आरंभिक ग्रंथ है और शेख निज़ामुद्दीन औलिया की बातचीत पर आधारित एक संग्रह है।
  • किसने: इसका संकलन प्रसिद्ध फ़ारसी कवि अमीर हसन सिजज़ी देहलवी ने किया।

यानी स्रोत 9 शेख की बातचीत है, जिसे किसी और ने संकलित किया।

काल-रेखा: भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ मुख्य धार्मिक शिक्षक

पृष्ठ 167

लगभग कालशिक्षक और क्षेत्र
लगभग 500–800 ईसवीतमिलनाडु में अप्पार, संबंदर, सुंदरमूर्ति
लगभग 800–900 ईसवीतमिलनाडु में नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल, तोंदराडिप्पोडी
लगभग 1000–1100 ईसवीपंजाब में अल हुजविरी, दाता गंज बक्श; तमिलनाडु में रामानुजाचार्य
लगभग 1100–1200 ईसवीकर्नाटक में बसवन्ना
लगभग 1200–1300 ईसवीमहाराष्ट्र में ज्ञानदेव, मुक्ताबाई; राजस्थान में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती; पंजाब में बहादुद्दीन जकारिया और फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर; दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी
लगभग 1300–1400 ईसवीकश्मीर में लाल देद; सिंध में लाल शाहबाज़ कलंदर; दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया; उत्तर प्रदेश में रामानंद; महाराष्ट्र में चोखमेला; बिहार में शराफुद्दीन याह्या मनेरी
लगभग 1400–1500 ईसवीउत्तर प्रदेश में कबीर, रैदास, सूरदास; पंजाब में बाबा गुरु नानक; गुजरात में बल्लभाचार्य; ग्वालियर में अबदुल्ला सत्तारी; गुजरात में मुहम्मद शाह आलम; गुलबर्गा में मीर सैयद मौहम्मद गेसू दराज़; असम में शंकरदेव; महाराष्ट्र में तुकाराम
लगभग 1500–1600 ईसवीबंगाल में श्री चैतन्य; राजस्थान में मीराबाई; उत्तर प्रदेश में शेख अब्दुल कुद्दस गंगोही, मलिक मौहम्मद जायसी, तुलसीदास
लगभग 1600–1700 ईसवीहरियाणा में शेख अहमद सरहिंदी; पंजाब में मियाँ मीर

किताब का नोट पढ़िए: “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।” पहली पंक्ति पर रुकिए: किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं। फिर बच्चे हर पंक्ति के आगे वह कालांश लिखें जिसमें उस नाम की बात हुई।

मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

पृष्ठ 168 · अभ्यास, प्रश्न 10

  • “भारत के एक मानचित्र पर, 3 सूफ़ी स्थल और 3 वे स्थल जो मंदिरों (विष्णु, शिव तथा देवी से जुड़ा एक मंदिर) से संबद्ध हैं, निर्दिष्ट कीजिए।”
  • हर बच्चे को भारत का रेखा-मानचित्र दीजिए; स्थल अध्याय में आई जगहों में से ही चुनने हैं

इंटरैक्टिव अध्याय का नक्शा पर्दे पर दिखा सकते हैं।

नमूना उत्तर — स्थल अध्याय में आई जगहों में से ही चुनिए।

  • सूफ़ी स्थल: अजमेर, राजस्थान (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह); दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह); फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह)।
  • विष्णु से जुड़ा मंदिर: पुरी, उड़ीसा (जगन्नाथ, विष्णु का एक रूप)।
  • शिव से जुड़ा मंदिर: चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम।
  • देवी से जुड़ा मंदिर: अध्याय के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता; इसके लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए।

अजोधन और लाहौर भी सूफ़ी स्थल हैं; किताब अजोधन को पाकिस्तान में बताती है (पृष्ठ 154), और लाहौर भी आज पाकिस्तान में है; भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाले स्थल लीजिए।

पूरा अध्याय, एक नज़र में

पृष्ठ 140 से 169 · सार हमारी ओर से

कालांशएक पंक्ति में
1पूजा प्रणालियों का मेल: पौराणिक ग्रंथ, पुरी के जगन्नाथ, देवियाँ, तांत्रिक पूजा, और उनके टकराव
2अलवार और नयनार: तमिल भजन, स्त्री भक्त, और चोल शासकों का संरक्षण
3बासवन्ना और लिंगायत; चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत के नाथ, जोगी और सिद्ध
4इस्लामी परंपराएँ: सिद्धांत और व्यवहार, लोक प्रचलन, और मस्जिदें
5सूफ़ीमत: ख़ानक़ाह, सिलसिला, बा–शरिया और बे–शरिया
6चिश्ती ख़ानक़ाह, पाँच उपदेशक, और अजमेर की दरगाह
7चिश्तियों की भाषा और रूप, और सूफ़ियों का राज्य से रिश्ता
8कबीर: बानी, परम सत्य के नाम, और जीवनियों का विवाद
9बाबा गुरु नानक, गुरु ग्रंथ साहिब, और मीराबाई
10स्रोतों से इतिहास, सूफ़ी ग्रंथ, काल-रेखा, और मानचित्र

यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।

और अब पहले दिन की पर्चियाँ

पृष्ठ 140 से 169

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हमारी ओर से: एक ही समय में पूजा के इतने अलग-अलग रास्ते साथ-साथ कैसे चलते रहे, और वे कहाँ मिले, कहाँ टकराए?

लिफ़ाफ़े से पर्चियाँ लौटाइए। हर बच्चा अपनी पहली पंक्तियाँ पढ़े और नीचे एक पंक्ति जोड़े: अब वह किस उदाहरण से उत्तर देगा। दो-तीन पर्चियाँ पढ़कर सुनाइए।

नमूना उत्तर — किताब के उदाहरणों से उत्तर ऐसे बनता है।

  • मिले: पौराणिक ग्रंथों के ज़रिए और ब्राह्मणों द्वारा दूसरे वर्गों के विश्वास अपनाकर (कालांश 1); चिश्तियों ने स्थानीय परंपराएँ और स्थानीय भाषा अपनाई (कालांश 6 और 7); कबीर ने परम सत्य के लिए कई परंपराओं के नाम बरते (कालांश 8)।
  • टकराए: वैदिक परंपरा के प्रशंसक और तांत्रिक उपासक; नयनारों के भजनों में बौद्ध और जैन धर्म का विरोध (कालांश 1 और 2)।
  • साथ-साथ चले: किताब के अनुसार लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं (कालांश 10)।

पुरानी और नई पंक्तियों का अंतर ही बताता है कि बच्चों ने इस अध्याय से क्या सीखा।

मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

इस अध्याय की कौन-सी एक बात आप अपने किसी साथी को दो वाक्यों में समझा सकते हैं?

अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात

पृष्ठ 168–169 · मुख्य बात हमारी ओर से

प्रश्नउत्तर की मुख्य बात
1. संप्रदाय का समन्वयदो प्रक्रियाएँ: पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में; ब्राह्मणों ने दूसरे वर्गों के विश्वास अपनाकर नया रूप दिया; उदाहरण पुरी के जगन्नाथ और स्थानीय देवियाँ (कालांश 1)
2. मस्जिदों का स्थापत्यमक्का की ओर अनुस्थापन, मेहराब और मिम्बर सार्वभौमिक; छत और सामान में भिन्नता; केरल, अतिया (1609) और शाह हमदान (1395) की मस्जिदें (कालांश 4)
3. बा–शरिया और बे–शरियादोनों सूफ़ी परंपरा से; बे–शरिया ख़ानक़ाह ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी, निर्धनता और ब्रह्मचर्य; शरिया की अवहेलना (कालांश 5)
4. जाति प्रथा की आलोचनातमिल संत कई समुदायों से, मत “कुछ हद तक” सत्य; लिंगायतों ने जाति और “दूषित” मानने का विरोध किया, पुनर्जन्म पर प्रश्न उठाए (कालांश 2 और 3)
5. कबीर या बाबा गुरु नानककबीर: परम सत्य के कई नाम, बानी तीन परिपाटियों में; नानक: निर्गुण भक्ति, नाम का जाप, शबद, संगत (कालांश 8 और 9)
6. सूफ़ी मत के विश्वास और आचारईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों का पालन; ख़ानक़ाह, सिलसिला; ज़ियारत, उर्स, ज़िक्र और समा; लंगर (कालांश 5, 6 और 7)
7. शासक, नयनार और सूफ़ीचोल: नयनार और अलवार संत वेल्लाल किसानों द्वारा सम्मानित थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया; भूमि–अनुदान, उनकी मदद से विशाल शिव मंदिर, संतों की धातु प्रतिमाएँ (945 ईसवी का अभिलेख); सुल्तान: इनाम भूमि, अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं; तनाव भी (कालांश 2 और 7)
8. कई भाषाएँ क्योंतमिल, कन्नड़, हिंदवी, दक्खनी, पंजाबी, संत भाषा; लोगों तक उनकी भाषा में (कालांश 11)
9. पाँच स्रोतजैसे स्रोत 1, 2, 4, 9 और 10; हर एक का सामाजिक या धार्मिक विचार एक वाक्य में (कालांश 2 से 10)
10. मानचित्र कार्यअजमेर, दिल्ली, फतेहपुर सीकरी; पुरी; चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम; देवी मंदिर एटलस से (कालांश 10)
11. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): दो संतों का विवरणदो उपदेशकों का समय, कार्यक्षेत्र और मुख्य विचार (घर पर)
12. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): तीर्थयात्रा के आचारअध्याय के सूफ़ी और देव स्थलों से जुड़े तीर्थयात्रा के आचार; किताब के वर्णन, जैसे स्रोत 7, से मिलान (घर पर)

पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं।

अध्याय का बड़ा विचार

“ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं–अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने मूल संदेश का न केवल विस्तार किया अपितु उन विचारों को, जो भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में संदिग्ध व अनावश्यक लगे, उन्हें या तो परिवर्तित कर दिया अथवा त्याग दिया।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 140

हमारी ओर से: अध्याय इसी वाक्य से शुरू हुआ था और कालांश 10 में इसी बात पर लौटा, कि धार्मिक परंपराएँ भी परिवर्तनशील हैं। कक्षा से पूछिए कि इस अध्याय की किस परंपरा में उन्होंने यह बदलाव सबसे साफ़ देखा, और किताब के किसी एक उदाहरण से उत्तर दिलवाइए।