कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 140 से 169
यह पन्ना किसलिए — किताब कुछ बातों को छूकर आगे बढ़ जाती है। यह पन्ना उनमें से दो को खोलकर बताता है: सिख धर्म के दसों गुरु, एक-एक करके, और भारत के मुख्य सूफ़ी सिलसिले। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर आगे की बात, और फिर कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।
परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। यहाँ की बातें किताब के पाठ को खोलकर समझाने के लिए हैं।
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सिख धर्म के दस गुरु
किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि बाबा गुरु नानक ने अपने अनुयायी अंगद को अपने बाद गुरुपद पर आसीन किया, और “इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा” (पृष्ठ 163); नीचे की सूची के वर्षों से गिनें तो यह समय 1539 से 1708 तक, यानी लगभग 170 साल बनता है। पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने बाबा गुरु नानक और उनके चार उत्तराधिकारियों की बानी, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी के साथ, आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ भी इसमें शामिल कीं, और इस ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया। गुरु गोबिन्द सिंह ने खालसा पंथ की नींव भी डाली (पृष्ठ 163)। किताब यहीं रुकती है: दस गुरुओं में से पाँच (नानक, अंगद, अर्जन देव, तेग बहादुर और गोबिन्द सिंह) के नाम उसमें आते हैं; बाकी पाँच गुरु कौन थे और हर गुरु का समय क्या था, यह बात उसमें नहीं आती।
दस गुरु, एक-एक करके
हर गुरु के आगे जीवन के वर्ष हैं, फिर गुरुपद के वर्ष, और फिर उनसे जुड़ी एक-दो बातें। दोनों स्रोत अंग्रेज़ी में हैं: सिख धर्म विश्वकोश (Encyclopaedia of Sikhism) और शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) की वेबसाइट।
- 1. बाबा गुरु नानक (1469–1539): सिख धर्म के पहले गुरु। उनका जन्म राय भोई की तलवंडी में हुआ, जिसे आज ननकाना साहिब कहते हैं; यह पाकिस्तान में लाहौर से 65 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में है। लंबी यात्राओं के बाद उन्होंने रावी नदी के दाहिने किनारे पर करतारपुर बसाया, जो उभरते सिख समुदाय का केंद्र बना। जहाँ-जहाँ उनके अनुयायी जुटते थे, वहाँ उन्होंने गुरु का लंगर शुरू करवाया, जिसमें हर जाति के लोग साथ बैठकर खाते थे। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 2. गुरु अंगद देव (1504–1552), गुरुपद 1539–1552: जैसे गुरु नानक के समय करतारपुर था, वैसे ही इनके समय खडूर सिख धर्म का केंद्र बना। दोपहर के बाद का समय बच्चों को पढ़ाने का था, और गुरु अंगद ख़ुद उन्हें गुरमुखी के अक्षर सिखाते थे। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 3. गुरु अमर दास (1479–1574), गुरुपद 1552–1574: उन्होंने गोइंदवाल को अपना मुख्य केंद्र बनाया। उपदेश के लिए उन्होंने बाईस मंजियाँ (प्रचार के क्षेत्र) बनाईं, कुछ क्षेत्रों में संगतों की देखरेख स्त्रियों को सौंपी, और पर्दा और सती की प्रथाओं को रोकने की कोशिश की। बादशाह अकबर एक बार उनसे मिलने गोइंदवाल आए; कहा जाता है कि उन्होंने लंगर में आम यात्रियों की तरह भोजन किया। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 4. गुरु राम दास (1534–1581), गुरुपद 1574–1581: उन्होंने वह अमृत सरोवर बनवाया जो आज के स्वर्ण मंदिर (हरिमंदर) को घेरे हुए है, और उसके चारों ओर अमृतसर नगर बसाया। नगर का नाम पहले गुरु का चक्क (गुरु का गाँव) था, फिर रामदासपुर, और आख़िर में अमृतसर (अमृत का सरोवर)। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 5. गुरु अर्जन देव (1563–1606), गुरुपद 1581–1606: उन्होंने सिख धर्म को उसका ग्रंथ, ग्रंथ साहिब, और उसका मुख्य उपासना-स्थल हरिमंदर दिया; 1604 में ग्रंथ हरिमंदर में स्थापित हुआ। आदि ग्रंथ का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा उनकी अपनी बानी है, दो हज़ार से ज़्यादा छंद। 1606 में लाहौर में उनकी शहादत हुई, और विश्वकोश उन्हें “the first martyr of the Sikh faith” यानी सिख धर्म का पहला शहीद कहता है। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 6. गुरु हरगोबिन्द (1595–1644), गुरुपद 1606–1644: पिता की शहादत के समय वे मुश्किल से 11 साल के थे। उन्होंने दो तलवारें धारण कीं: एक आध्यात्मिक सत्ता (पीरी) की, दूसरी सांसारिक सत्ता (मीरी) की। जहाँगीर के आदेश पर उन्हें ग्वालियर के किले में रखा गया। छोड़े जाने पर उन्होंने शर्त रखी कि बाकी बंदी भी छोड़े जाएँ, और बावन क़ैदियों को साथ लेकर निकले; इसीलिए उन्हें आज भी बंदीछोड़ कहकर याद किया जाता है। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 7. गुरु हर राय (1630–1661), गुरुपद 1644–1661: वे गुरु हरगोबिन्द के पोते थे, और कीरतपुर उनका स्थायी ठिकाना था। सामूगढ़ की लड़ाई (29 मई 1658) में अपने भाई औरंगज़ेब से हारकर मुग़ल शहज़ादा दारा शुकोह पंजाब आया, तो जून 1658 के आख़िरी हफ़्ते में गोइंदवाल में गुरु हर राय से मिला और उनका आशीर्वाद माँगा। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 8. गुरु हर कृष्ण (1656–1664), गुरुपद 1661–1664: वे बहुत छोटी उम्र में गुरु बने। औरंगज़ेब ने आमेर के राजा जय सिंह के ज़रिए उन्हें दिल्ली बुलवाया। उस समय दिल्ली में चेचक फैली हुई थी; गुरु हर कृष्ण बीमारों की सेवा करने निकले, और जल्दी ही ख़ुद इस बीमारी की चपेट में आ गए। अंत समय में वे बस “बाबा बकाले” कह पाए, यानी अगले गुरु बकाला नगर में मिलेंगे। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 9. गुरु तेग बहादुर (1621–1675), गुरुपद 1664–1675: उन्होंने माखोवाल के टीले पर अपनी माता के नाम पर चक्क नानकी बसाया, जो आगे चलकर आनंदपुर के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 11 नवंबर 1675 को दिल्ली के चाँदनी चौक में सबके सामने उनका सिर कलम कर दिया गया। दिल्ली में उनकी शहादत से जुड़े दो गुरुद्वारे हैं: चाँदनी चौक में शीशगंज, जहाँ उनका सिर कलम हुआ, और रकाबगंज, जहाँ उनके धड़ का अंतिम संस्कार हुआ। विश्वकोश के अनुसार उनकी बानी कुल 59 शबद और 57 श्लोक है। किताब बताती है कि नवें गुरु की रचनाएँ गुरु गोबिन्द सिंह ने ग्रंथ में शामिल कीं (पृष्ठ 163)। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
- 10. गुरु गोबिन्द सिंह (1666–1708): उनका जन्म बिहार के पटना में हुआ, और पिता गुरु तेग बहादुर की शहादत के बाद वे गुरु बने। 30 मार्च 1699 को बैसाखी के मेले पर आनंदपुर में बड़ी संख्या में जुटे सिखों के सामने उन्होंने खालसा को ठोस रूप दिया। 1706 में तलवंडी साबो (आज दमदमा साहिब) में उन्होंने भाई मनी सिंह से लिखवाकर गुरु ग्रंथ साहिब का नया पाठ तैयार करवाया। आख़िरी दिनों में वे गोदावरी के किनारे नांदेड़ में रुके, और वहीं 7 अक्टूबर 1708 को उनका निधन हुआ। उससे पहले उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया; वे सिख धर्म के दसवें और अंतिम व्यक्ति-गुरु थे। स्रोत: सिख धर्म विश्वकोश (अंग्रेज़ी में) · SGPC (अंग्रेज़ी में)
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: किताब कहती है कि अर्जन देव जी ने “बाबा गुरु नानक तथा उनके चार उत्तराधिकारियों” की बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की (पृष्ठ 163)। ऊपर की सूची देखकर बताइए, ये चार उत्तराधिकारी कौन थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: सूची के क्रम से, गुरु नानक के बाद के चार गुरु, गुरु अर्जन देव तक:
- दूसरे से चौथे गुरु: गुरु अंगद देव, गुरु अमर दास और गुरु राम दास।
- पाँचवें गुरु: ख़ुद गुरु अर्जन देव; विश्वकोश के अनुसार आदि ग्रंथ का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा उनकी अपनी बानी है।
किताब के अनुसार नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ बाद में, सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में, गुरु गोबिन्द सिंह जी ने जोड़ीं (पृष्ठ 163)।
सवाल: किताब के अनुसार दसवें गुरु ने ग्रंथ के लिए क्या किया, और व्यक्ति-गुरुओं की परंपरा कैसे पूरी हुई?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब और विश्वकोश मिलकर पूरी बात बताते हैं:
- किताब: गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ ग्रंथ में शामिल कीं, और इसे गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया (पृष्ठ 163)।
- विश्वकोश: गुरु गोबिन्द सिंह सिख धर्म के दसवें और अंतिम व्यक्ति-गुरु थे; अपने निधन (1708) से पहले उन्होंने गुरु ग्रंथ साहिब को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया।
हमारी ओर से: इस तरह गुरुपद एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक जाने के बाद आख़िर में ग्रंथ को मिला।
सूफ़ी सिलसिले
किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में सूफ़ी सिलसिलों का गठन होने लगा। सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंज़ीर जो शेख और मुरीद के बीच एक निरंतर रिश्ते की द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है।” (पृष्ठ 153) आगे वह कहती है कि “बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे” (पृष्ठ 153)। एक बॉक्स में नाम पड़ने का तरीका है: “ज्यादातर सूफ़ी वंश उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े”, जैसे कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर, और कुछ का नाम जगह से पड़ा, जैसे चिश्ती नाम “मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर” से (पृष्ठ 153)। पृष्ठ 154 की तालिका चिश्ती सिलसिले के पाँच बड़े शेखों के नाम और उनकी मृत्यु के वर्ष देती है। पृष्ठ 158 पर किताब कहती है: “कुछ अन्य सूफ़ी भी, जैसे कि दिल्ली सल्तनत के युग में सुहरावर्दी और मुग़लयुगीन नक्शबंदी, राज्य से जुड़े रहे। लेकिन उनके जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से भिन्न थे। कभी–कभी सूफ़ी दरबारी पद भी स्वीकार कर लेते थे।” और पृष्ठ 167 की समय-रेखा में “पंजाब में बहादुद्दीन जकारिया” और “गुलबर्गा में मीर सैयद मौहम्मद गेसू दराज़” के नाम आते हैं। किताब यहीं रुकती है: चिश्ती के अलावा बाकी सिलसिले कहाँ शुरू हुए, उन्हें भारत में कौन लाया, उनके केंद्र कहाँ बने, और समय-रेखा के ये दो नाम किस सिलसिले के थे, यह बात उसमें नहीं आती।
नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: इग्नू (IGNOU) और एनआईओएस (NIOS) की इतिहास की पाठ्य-सामग्री, और एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (Encyclopaedia Iranica), जो ईरानी सभ्यता और उससे जुड़े इलाक़ों का बड़ा विश्वकोश है।
सिलसिला: एक जंज़ीर
हर सिलसिला गुरुओं की एक कतार है: हर शेख ने अपने शेख से सीखा, और वह शेख अपने शेख से। किताब के शब्दों में इस जंज़ीर की पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद तक जाती है। इसलिए किसी सूफ़ी से उसका सिलसिला पूछना यह पूछना था कि उसकी सीख किस कतार से आई है।
- अकबर के दरबारी अबुल फ़ज़ल ने आइन-ए-अकबरी में चौदह सूफ़ी सिलसिलों का ज़िक्र किया है। यानी किताब जिन सिलसिलों के नाम लेती है, वे इस बड़ी गिनती में से कुछ ही हैं। स्रोत: NIOS (अंग्रेज़ी में) · शोध-लेख, क्योटो विश्वविद्यालय (अंग्रेज़ी में)
- मध्यकालीन भारत के प्रमुख सिलसिलों में चिश्ती, सुहरावर्दी, कादरी और नक्शबंदी गिने जाते हैं; इनके अलावा फ़िरदौसी और शत्तारी जैसे सिलसिले भी थे। चिश्ती और सुहरावर्दी दिल्ली सल्तनत के समय लोकप्रिय हुए। नीचे इन चार की बात एक-एक करके है। स्रोत: NIOS (अंग्रेज़ी में) · NIOS (अंग्रेज़ी में)
- सिलसिले बनने से पहले भी इस ज़मीन पर सूफ़ी थे। एनआईओएस अल हुजविरी को उपमहाद्वीप का सबसे पुराना सूफ़ी कहता है; वे लाहौर में दफ़नाए गए। किताब की समय-रेखा भी “लगभग 1000-1100 ईसवी” में “पंजाब में अल हुजविरी, दाता गंज बक्श” का नाम लेती है (पृष्ठ 167)। स्रोत: NIOS (अंग्रेज़ी में)
चिश्ती: चिश्त से अजमेर, और दक्कन तक
- चिश्त हेरात के पूरब में हरीरूद नदी के किनारे का एक गाँव है, और हेरात आज अफ़ग़ानिस्तान में है। इसी गाँव के नाम पर यह सिलसिला चिश्ती कहलाया। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- भारत में चिश्ती सिलसिले को जमाने वाले ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती का जन्म, माना जाता है, लगभग 1141-42 में सीस्तान में हुआ। वे अजमेर में बसे, पर कब, इस पर स्रोत एक नहीं हैं: एनआईओएस उनके भारत आने का समय लगभग 1192 बताता है, इग्नू उनके अजमेर में बसने का समय लगभग 1206, और ईरानिका दोनों मत देता है: कुछ के अनुसार वे 1192 में शहर की जीत से पहले अजमेर पहुँचे, कुछ के अनुसार 1206 के बाद। उनकी मृत्यु का वर्ष तीनों स्रोत 1236 देते हैं, जबकि किताब की तालिका में 1235 है (पृष्ठ 154)। परीक्षा में बच्चे किताब वाला वर्ष ही लिखें। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में) · NIOS (अंग्रेज़ी में)
- दक्कन में सूफ़ी तेरहवीं सदी के आख़िर से आने लगे थे, पर वहाँ चिश्ती सिलसिला एक मजबूरी से शुरू हुआ। शेख निज़ामुद्दीन औलिया (किताब के पृष्ठ 154 की तालिका वाले) के ख़लीफ़ा बुरहानुद्दीन ग़रीब (मृत्यु 1340) को सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ ने दक्कन जाने को मजबूर किया। उन्होंने दौलताबाद को अपना केंद्र बनाया और वहाँ चिश्ती सिलसिला शुरू किया। स्रोत: IGNOU (अंग्रेज़ी में) · एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में)
- बाद में कई चिश्ती सूफ़ी गुलबर्गा गए, जो बहमनी राज्य (1347–1538) की राजधानी था। इनमें सबसे जाने-माने मुहम्मद बंदानवाज़ गेसूदराज़ (लगभग 1321–1422) थे; किताब की समय-रेखा उन्हीं को “गुलबर्गा में मीर सैयद मौहम्मद गेसू दराज़” कहकर याद करती है (पृष्ठ 167)। गुलबर्गा आज कर्नाटक का कलबुर्गी है। स्रोत: IGNOU (अंग्रेज़ी में) · एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में)
चिश्ती और सत्ता: जितना कहा जाता है, उतना सीधा नहीं
अक्सर सुनने को मिलता है कि चिश्ती दरबार से दूर रहते थे और सुहरावर्दी सरकार के साथ। किताब ख़ुद इससे ज़्यादा सावधानी से बात रखती है: चिश्तियों के जीवन में “सत्ता से दूर रहने पर बल दिया जाता था। किंतु इसका मतलब यह नहीं था कि राजनीतिक सत्ता से अलगाव का भाव रखा जाए। सत्ताधारी विशिष्ट वर्ग अगर बिना माँगे अनुदान या भेंट देता था तो सूफी संत उसे स्वीकार करते थे।” (पृष्ठ 158) स्रोत इस बात को और खोलते हैं:
- ईरानिका कहता है कि “चिश्ती सिद्धांत रूप से राज्य से सहयोग नहीं करते थे और दरबार से ज़मीन नहीं लेते थे, जबकि सुहरावर्दी उत्साह से सरकारी सेवा अपनाते थे”, यह बात बार-बार दोहराई तो जाती है, पर संदिग्ध है। उसके अनुसार चिश्ती सुल्तानों के दिए वज़ीफ़े आम तौर पर लौटा देते थे, पर बिना माँगे मिली भेंट (फ़ुतूह) ले लेते थे। ख़ुद मुइनुद्दीन चिश्ती के बेटों के पास बड़ी ज़मीनें थीं, जिनके लिए उनके पिता को दिल्ली में सिफ़ारिश करनी पड़ी। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में)
- गुलबर्गा में चिश्ती सूफ़ियों ने बहमनी दरबार से नज़दीकी बनाई और राज्य का संरक्षण स्वीकार किया। इग्नू के अनुसार इससे राज्य के प्रति चिश्ती सिलसिले का रवैया ही बदल गया। बहमनी सुल्तानों ने इन सूफ़ियों को ज़मीनें दीं और बदले में उनकी राजनीतिक वफ़ादारी पाई; गेसूदराज़ को भी ज़मीन का अनुदान मिला। स्रोत: IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- किताब यह भी बताती है कि चिश्ती धन और सामान के रूप में दान लेते थे, पर उसे सँजोने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा की महफ़िलों पर ख़र्च कर देते थे (पृष्ठ 158)।
(हमारी ओर से) यानी फ़र्क़ “जुड़े या नहीं जुड़े” का कम, और “कैसे जुड़े” का ज़्यादा है। किताब की पंक्ति ठीक यही कहती है: “उनके जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से भिन्न थे” (पृष्ठ 158)।
सुहरावर्दी: बग़दाद से मुल्तान
- इस सिलसिले की शुरुआत बग़दाद में हुई, पर संस्थापक के नाम पर स्रोत दो नाम देते हैं। ईरानिका और इग्नू की एक इकाई अबू नजीब सुहरावर्दी (मृत्यु 1168) को संस्थापक मानते हैं; एनआईओएस और इग्नू की दूसरी इकाई उनके भतीजे और शिष्य शिहाबुद्दीन सुहरावर्दी (1145–1234) को। शिहाबुद्दीन का जन्म ज़ंजान के पास सुहरावर्द कस्बे में हुआ और मृत्यु बग़दाद में। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में) · NIOS (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- भारत में यह सिलसिला शिहाबुद्दीन के शिष्य बहाउद्दीन ज़कारिया (1182–1262) ने जमाया। उनका केंद्र मुल्तान था, और उनकी ख़ानक़ाह में शासक, बड़े अफ़सर और अमीर व्यापारी आते थे। किताब में मुल्तान (पाकिस्तान) की उनकी दरगाह का चित्र है (चित्र 6.18, पृष्ठ 169), और समय-रेखा उन्हें “पंजाब में बहादुद्दीन जकारिया” लिखती है (पृष्ठ 167)। स्रोत: NIOS (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- ज़कारिया के समय मुल्तान पर क़ुबाचा का क़ब्ज़ा था। दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश और क़ुबाचा की लड़ाई में ज़कारिया ने खुलकर इल्तुतमिश का साथ दिया, और इल्तुतमिश से उन्हें “शैख़ुल इस्लाम” (इस्लाम के अगुआ) की उपाधि मिली। इग्नू के अनुसार उन्होंने राज्य का संरक्षण लिया, शासकों से रिश्ते बनाए रखे, और बड़ी संपत्ति जुटाई। स्रोत: NIOS (अंग्रेज़ी में) · NIOS (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- सुहरावर्दी सुल्तानों से भेंट, जागीरें और सरकारी पद तक ले लेते थे। उनका मानना था कि सूफ़ी के पास तीन चीज़ें होनी चाहिए: संपत्ति, ज्ञान और हाल (आध्यात्मिक अनुभूति); उनका तर्क था कि इससे वे ग़रीबों की बेहतर सेवा कर सकेंगे। स्रोत: NIOS (अंग्रेज़ी में) · NIOS (अंग्रेज़ी में)
कादरी: बग़दाद से लाहौर
- किताब बताती है कि यह सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर पड़ा (पृष्ठ 153)। उनका जन्म 1077-78 में गीलान में हुआ, और 1166 में उनकी मृत्यु के बाद उन्हें बग़दाद में दफ़नाया गया; सिलसिला भी बग़दाद से ही शुरू हुआ। भारत में यह चौदहवीं सदी में पहुँचा; इग्नू की एक इकाई इसे चौदहवीं सदी के आख़िर का बताती है, और कहती है कि यह पंजाब, सिंध और दक्कन में जमा। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- मुग़ल काल में लाहौर के मियाँ मीर (मृत्यु 1635) कादरी सिलसिले के बड़े शेख थे। शाहजहाँ के बेटे दारा शिकोह किशोर उम्र में गंभीर रूप से बीमार पड़े, तो शाहजहाँ उन्हें लाहौर में मियाँ मीर के पास ले गए। दारा ठीक हो गए, और तब से मियाँ मीर के बड़े भक्त रहे। आगे चलकर दारा और उनकी बहन जहाँआरा, दोनों कादरी सिलसिले से जुड़े। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · NIOS (अंग्रेज़ी में)
नक्शबंदी: बुख़ारा से दिल्ली और सरहिंद
- यह सिलसिला ख़्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद के नाम पर है, जो चौदहवीं सदी में बुख़ारा के पास रहे; 1389 में उनकी मृत्यु हुई। बुख़ारा आज उज़्बेकिस्तान में है। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
- भारत में इसे ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह (1563–1603) लाए, जो बहाउद्दीन नक्शबंद के बाद इस कतार में सातवें थे। उन्हें ख़लीफ़ा बनाकर भारत भेजा गया था। पहले वे एक साल लाहौर में रहे, और 1598-99 में दिल्ली के फ़ीरोज़ाबाद में हमेशा के लिए बस गए; वहीं 1603 में उनकी मृत्यु हुई। यह अकबर के शासन का आख़िरी दौर था। स्रोत: IGNOU (अंग्रेज़ी में) · एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में)
- बाक़ी बिल्लाह के सबसे बड़े शिष्य शेख अहमद सरहिंदी (1563–1624) हुए। उनका जन्म सरहिंद में हुआ, जो आज पंजाब में है, और दिल्ली में बाक़ी बिल्लाह से उन्होंने दीक्षा ली। उन्हें “मुजद्दिद” कहा गया, यानी इस्लाम को नया करने वाला। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ईरानिका (अंग्रेज़ी में) · IGNOU (अंग्रेज़ी में)
किताब का पृष्ठ 158 इन्हीं “मुग़लयुगीन नक्शबंदी” सूफ़ियों की बात करता है, जो राज्य से जुड़े रहे।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: किताब कहती है कि ज़्यादातर सिलसिलों के नाम उन्हें शुरू करने वालों के नाम पर पड़े, और कुछ के नाम जगह पर (पृष्ठ 153)। चिश्ती, कादरी और नक्शबंदी में से किसका नाम किस तरह पड़ा?
उत्तर देखिए
उत्तर: दो तरह के नाम मिलते हैं:
- जगह के नाम पर: चिश्ती (चिश्त गाँव से)।
- व्यक्ति के नाम पर: कादरी (शेख अब्दुल कादिर जिलानी से) और नक्शबंदी (ख़्वाजा बहाउद्दीन नक्शबंद से)।
किताब के अनुसार “ज्यादातर सूफ़ी वंश उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े” और चिश्ती नाम एक जगह से लिया गया (पृष्ठ 153)।
सवाल: किताब कहती है कि सुहरावर्दी भी राज्य से जुड़े रहे, “लेकिन उनके जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से भिन्न थे” (पृष्ठ 158)। दोनों के तरीकों में क्या फ़र्क़ था?
उत्तर देखिए
उत्तर: फ़र्क़ जुड़ने के ढंग में था:
- चिश्ती: बिना माँगे मिला अनुदान या भेंट ले लेते थे, और दान को सँजोने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और समा पर ख़र्च कर देते थे।
- सुहरावर्दी: खुलकर शासकों का साथ देते थे; बहाउद्दीन ज़कारिया ने इल्तुतमिश का पक्ष लिया और “शैख़ुल इस्लाम” की उपाधि पाई। वे जागीरें और सरकारी पद भी ले लेते थे।
हमारी ओर से: यह रेखा हमेशा साफ़ नहीं रही। गुलबर्गा में चिश्तियों ने भी बहमनी दरबार का संरक्षण लिया।
सवाल: ये सिलसिले जहाँ शुरू हुए और भारत में जहाँ उनके केंद्र बने, वे जगहें आज किन देशों में हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: ये जगहें पाँच देशों में फैली हैं:
- भारत: अजमेर, दिल्ली, दौलताबाद और गुलबर्गा (कलबुर्गी)
- पाकिस्तान: मुल्तान और लाहौर
- अफ़ग़ानिस्तान: चिश्त, हेरात के पास
- इराक़: बग़दाद
- उज़्बेकिस्तान: बुख़ारा
हमारी ओर से: नक्शे पर ये जगहें दिखाइए। बच्चे ख़ुद देख लेंगे कि सिलसिले किस तरह एक देश से दूसरे देश तक फैले।
सवाल: जहाँआरा ने शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी लिखी (स्रोत 7, पृष्ठ 156), फिर भी वे कादरी सिलसिले से जुड़ीं। इससे सूफ़ी परंपरा के बारे में क्या पता चलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: एक व्यक्ति कई सिलसिलों के संतों को मान सकता था:
- चिश्ती दरगाह से श्रद्धा: किताब का स्रोत 7 जहाँआरा की 1643 की अजमेर यात्रा का बयान है, जो उनकी लिखी मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी से लिया गया है।
- कादरी सिलसिले से जुड़ाव: वे और उनके भाई दारा शिकोह कादरी सिलसिले से जुड़े।
हमारी ओर से: दरगाह पर जाने वाले को उस सिलसिले का मुरीद होना ज़रूरी नहीं था। एक सिलसिले से जुड़कर भी लोग दूसरे सिलसिले के संतों का आदर करते थे।