कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 53 से 81
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
सामग्री के पन्ने
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
हमारी ओर से: यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी तक के समाज की कहानी है, पर असल में यह सिखाता है कि इतिहासकार ग्रंथों को कैसे पढ़ते हैं। किताब हर बार पहले बताती है कि ब्राह्मणीय ग्रंथ क्या नियम बनाते थे, फिर दूसरे स्रोतों से दिखाती है कि लोग असल में क्या करते थे।
- भाग 1 महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण से खुलता है: 1919 में शुरू हुई वह परियोजना, जिसने देश भर की पांडुलिपियों को मिलाया (पृष्ठ 54)।
- भाग 2 से 4 तीन व्यवस्थाएँ परखते हैं: परिवार और विवाह, वर्ण और जाति, और संपत्ति। हर भाग में पहले धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों के नियम आते हैं, फिर अभिलेख, कथाएँ और यात्रियों के वृत्तांत।
- भाग 5 बौद्ध सुत्तपिटक का मिथक है, जो विषमता की एक बिल्कुल अलग व्याख्या देता है।
- भाग 6 और 7 फिर महाभारत पर लौटते हैं: उसकी भाषा, विषयवस्तु, लेखक, तिथियाँ, हस्तिनापुर का उत्खनन, और यह कि ग्रंथ सदियों तक कैसे बदलता रहा।
किताब किन स्रोतों से समाज को पढ़ती है
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- ब्राह्मण लेखक मानते थे कि उनके नियम सब पर लागू हों, पर उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था” (पृष्ठ 58)।
- “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।” (पृष्ठ 77)
हमारी ओर से — नियम और व्यवहार की जोड़ियाँ: पूरा अध्याय एक चार्ट पेपर पर आ जाता है। बाईं ओर ग्रंथ का नियम, दाईं ओर वह साक्ष्य जो कुछ और दिखाता है। चार्ट पहले कालांश से कक्षा की दीवार पर रहे, और हर कालांश में एक-दो पंक्तियाँ जुड़ें:
| ग्रंथ का नियम | दूसरा साक्ष्य | पृष्ठ |
|---|---|---|
| पितृवंशिक उत्तराधिकार: पिता के बाद पुत्र | पुत्र न होने पर कभी भाई, कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे; प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली | 55–57 |
| विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाए; एक गोत्र में विवाह नहीं | सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र नाम रखा; कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं | 58–60 |
| शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे | शुंग और कण्व ब्राह्मण थे; शक रुद्रदामन; सातवाहन गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि | 62–63 |
| हर वर्ण की अपनी ‘उचित’ जीविका | मंदसौर के रेशम बुनकर संगीत से युद्ध तक कई कामों में; ब्राह्मण–वणिक चारुदत्त | 63–64 |
| चाण्डालों की निम्न स्थिति (मनुस्मृति) | मातंग जातक में चाण्डाल बोधिसत्त ब्राह्मणों को चुनौती देता है | 66–67 |
| सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का नियंत्रण | स्त्रीधन पर स्त्री का स्वामित्व; धनी वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त | 68 |
| ब्राह्मणों का दावा कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं | मज्झिमनिकाय में धनी शूद्र किसी भी वर्ण को सेवक बना सकता है; सुत्तपिटक में राजा को सब लोगों ने चुना | 69–72 |
हमारी ओर से — अध्याय का पाठ कैसे खोलें: बच्चे इस अध्याय को प्राचीन भारत की सामाजिक व्यवस्था की एक सूची की तरह रटने लगते हैं: गोत्र के दो नियम, आठ विवाह, चार वर्ण। किताब बार-बार दिखाती है कि नियम और व्यवहार अलग थे। हर नियम के साथ यह सवाल लौटाइए: यह किसने लिखा, किसके लिए, और क्या कोई दूसरा स्रोत कुछ और दिखाता है? उत्तर में यही तुलना अंक दिलाती है।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
काल रेखा 1: प्रमुख साहित्यिक परंपराएँ (पृष्ठ 79)
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 500 ई.पू. | पाणिनि की अष्टाध्यायी, संस्कृत व्याकरण | 79 |
| लगभग 500-200 ई.पू. | प्रमुख धर्मसूत्र (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 500-100 ई.पू. | आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित (पालि में) | 79 |
| लगभग 500 ई.पू.-400 ईसवी | रामायण और महाभारत (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवी | मनुस्मृति (संस्कृत में); तमिल संगम साहित्य की रचना और संकलन | 79 |
| लगभग 100 ईसवी | चरक और सुश्रुत संहिता, आयुर्वेद के ग्रंथ (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 200 ईसवी से | पुराणों का संकलन (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 300 ईसवी | भरतमुनि का नाट्यशास्त्र (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 300-600 ईसवी | अन्य धर्मशास्त्र (संस्कृत में) | 79 |
| लगभग 400-500 ईसवी | कालिदास के साहित्य सहित संस्कृत नाटक; आर्यभट्ट और वराहमिहिर के खगोल और गणित के ग्रंथ (संस्कृत में); जैन ग्रंथों का संग्रहण (प्राकृत में) | 79 |
काल रेखा 2: महाभारत के अध्ययन में प्रमुख कीर्तिमान, बीसवीं शताब्दी (पृष्ठ 79)
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1919-66 | महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन | 79 |
| 1973 | जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया; 1979 में उनकी मृत्यु के बाद यह परियोजना अधूरी रह गई | 79 |
किताब की कालरेखा में उनकी मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है।
अध्याय के बीच के आँकड़े
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी | अध्याय में देखा गया काल | 53 |
| एक लाख श्लोकों से अधिक | महाभारत अपने वर्तमान रूप में | 53 |
| लगभग 500 ई.पू. से, एक हज़ार वर्ष तक | महाभारत की रचना होती रही | 53 |
| 1919 | वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में समालोचनात्मक संस्करण का काम शुरू | 54 |
| 13,000 पृष्ठ; सैंतालीस वर्ष | समालोचनात्मक संस्करण का आकार और उसमें लगा समय | 54 |
| लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से | अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे | 55 |
| संभवत: लगभग 1000 ई.पू. | ऋग्वेद में विवाह का मंत्र (स्रोत 1) जोड़ा गया | 56 |
| लगभग 500 ई.पू. से | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में मानदंडों का संकलन | 58 |
| लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी | मनुस्मृति का संकलन | 58 |
| आठ, जिनमें पहले चार ‘उत्तम’ | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में विवाह के प्रकार | 58 |
| लगभग 1000 ई.पू. के बाद | गोत्रों में बाँटने की ब्राह्मणीय पद्धति | 58 |
| लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक | पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों पर सातवाहनों का शासन | 58 |
| लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी | शक राजा रुद्रदामन, सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार | 63 |
| लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी | मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, रेशम के बुनकरों की श्रेणी | 63 |
| लगभग चौथी शताब्दी ईसवी | शूद्रक का नाटक मृच्छकटिकम् | 64 |
| लगभग पाँचवीं और लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी | चीन से आए फा-शिएन और श्वैन-त्सांग | 66 |
| 16,000 | माण्डव्यकुमार रोज़ इतने ब्राह्मणों को भोजन कराता था (स्रोत 10) | 67 |
| सात और छ: | मनुस्मृति में पुरुषों और स्त्रियों के धन अर्जित करने के तरीके | 69 |
| लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से | प्रारंभिक बौद्ध धर्म | 69 |
| 2000 वर्ष पहले | तमिलकम् में अनेक सरदारियाँ | 70 |
| लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी | पुरनानूरु, तमिल संगम साहित्य | 71 |
| पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से | ब्राह्मणों ने महाभारत की कथा परंपरा को लिखा | 74 |
| लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी | महाभारत की रचना का एक और चरण: विष्णु की आराधना, श्रीकृष्ण विष्णु का रूप | 75 |
| लगभग 200-400 ईसवी | मनुस्मृति से मिलते-जुलते उपदेशात्मक प्रकरण जुड़े | 75 |
| संभवत: 10,000 से कम से एक लाख | महाभारत के श्लोक, शुरू में और बाद में | 75 |
| 1951-52 | बी.बी. लाल का हस्तिनापुर (मेरठ ज़िला, उ.प्र.) में उत्खनन | 75 |
| पाँच स्तर | हस्तिनापुर में आबादी के स्तर | 75 |
| लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू. | हस्तिनापुर का दूसरा स्तर | 75 |
| लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू. | हस्तिनापुर का तीसरा स्तर | 75 |
| पाँच पुत्र; छ: निर्दोष लोग | लाक्षागृह में जली निषादी और उसके पुत्र | 78 |
ध्यान दीजिए:
- लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी अध्याय का पूरा काल है; महाभारत की रचना का समय (लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष) इससे अलग है। दोनों को आपस में मिलने मत दीजिए।
- 1919 और 1919-66: काम 1919 में शुरू हुआ और सैंतालीस वर्ष चला; कालरेखा 2 पूरा दौर 1919-66 लिखती है। 1966 शुरुआत का साल नहीं है।
- 1951-52 और 1973 दोनों बीसवीं शताब्दी के हैं, पर पहला उत्खनन है (बी.बी. लाल, हस्तिनापुर) और दूसरा अनुवाद (वैन बियुटेनेन)।
- फा-शिएन और श्वैन-त्सांग में दो सौ साल का अंतर है: पहला लगभग पाँचवीं, दूसरा लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी।
- स्रोत 4 की गिनती: गोतमी–पुत्त 3, वसिथि (वसथि)–पुत्त 2। हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| कुल | संस्कृत ग्रंथों में परिवार के लिए शब्द | 55 |
| ज्ञाति | बांधवों का बड़ा समूह | 55 |
| वंश | किसी कुल के पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज, जो इकट्ठे रूप में एक ही वंश के माने जाते हैं | 55 |
| पितृवंशिकता | वह वंश परंपरा जो पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलती है | 55 |
| मातृवंशिकता | वह वंश परंपरा जो माँ से जुड़ी होती है | 55 |
| बहिर्विवाह | गोत्र से बाहर विवाह | 57 |
| अंतर्विवाह | समूह के भीतर ही विवाह; यह समूह एक गोत्र, कुल, जाति या एक ही स्थान पर बसने वालों का हो सकता है | 57 |
| बहुपत्नी प्रथा | एक पुरुष की अनेक पत्नियाँ होने की परिपाटी | 57 |
| बहुपति प्रथा | एक स्त्री के अनेक पति होने की पद्धति | 57 |
| कन्यादान | विवाह में कन्या की भेंट; इसे पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया | 57 |
| धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र | संस्कृत ग्रंथ, जिनमें लगभग 500 ई.पू. से ब्राह्मणों के बनाए सामाजिक मानदंड संकलित किए गए | 58 |
| मनुस्मृति | धर्मशास्त्रों में सबसे महत्वपूर्ण; संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच | 58 |
| गोत्र | लगभग 1000 ई.पू. के बाद से चली ब्राह्मणीय पद्धति; हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर होता था, और उसके सदस्य उस ऋषि के वंशज माने जाते थे | 58 |
| मातृनाम | माता के नाम से बना नाम, जैसे गोतमी–पुत्त, यानी ‘गोतमी का पुत्र’ | 59–60 |
| वर्ण | धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में बताई गई चार वर्गों वाली व्यवस्था: ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र | 61 |
| जाति | समाज के वर्गीकरण का दूसरा शब्द; वर्ण चार ही थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी | 63 |
| मलेच्छ | ब्राह्मण जिन्हें बर्बर या अन्यदेशीय मानते थे, जैसे मध्य एशिया से आए शक; कभी-कभी असंस्कृत भाषा बोलने वाले लोगों को भी मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था | 62, 65 |
| श्रेणी | एक ही जीविका या व्यवसाय वाली जातियों का संगठन | 63 |
| वणिक | संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में व्यापारी के लिए शब्द | 64 |
| निषाद | वन में रहने वाला शिकारी समुदाय; एकलव्य इसी से जुड़ा माना जाता था | 62, 64 |
| अस्पृश्य | वर्ण व्यवस्था के बाहर माने गए लोग, जिनसे अपने को ‘पवित्र’ मानने वाले भोजन तक नहीं लेते थे | 65–66 |
| चाण्डाल | शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वाले; वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखे गए | 66 |
| स्त्रीधन | विवाह के समय मिले उपहार, जिन पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; संतान इन्हें विरासत में पा सकती थी, पति का इन पर अधिकार नहीं था | 68 |
| महासम्मत्त | बौद्ध मिथक में सब लोगों द्वारा चुने गए मनुष्य की उपाधि | 72 |
| समालोचनात्मक संस्करण | देश भर की पांडुलिपियों के श्लोकों की तुलना करके तैयार किया गया महाभारत का पाठ; काम 1919 में शुरू हुआ | 54 |
| आख्यान | महाभारत का कहानियों वाला भाग | 73 |
| उपदेशात्मक | निर्देश या शिक्षा देने वाला भाग; इसमें सामाजिक आचार-विचार के मानदंड हैं | 73 |
| सूत | भाट सारथी, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे; संभवत: महाभारत की मूल कथा इन्हीं ने रची | 74 |
| इतिहास | आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत की श्रेणी; इस शब्द का अर्थ है ‘ऐसा ही था’ | 74 |
हिंदी किताब के बॉक्स में यहाँ ‘जाति’ छपा है; यह शब्द ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह) है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं।
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- अध्याय 2 (राजा, किसान और नगर) से: किताब वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त को अध्याय 2 से याद दिलाती है (पृष्ठ 68), और प्रश्न 10 इस अध्याय के मानचित्र 1 की तुलना अध्याय 2 के मानचित्र 1 से करवाता है।
- राजनीति विज्ञान से: बच्चे आज की जाति-व्यवस्था पर सवाल लाएँ तो एक ही वाक्य कहिए: भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और किसी भी रूप में उसके आचरण का निषेध करता है। चर्चा फिर किताब के स्रोतों पर लौटाइए।
- हिंदी और दूसरी भाषाओं के साहित्य से: महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी” (पृष्ठ 77–78) बताती है कि एक पुरानी कथा को नए प्रश्नों के साथ कैसे फिर से लिखा जाता है; प्रश्न 11 और 12 इसी से जुड़ते हैं।
- पुरातत्व से: हस्तिनापुर का उत्खनन (पृष्ठ 75–76) दिखाता है कि किसी ग्रंथ के वर्णन को ज़मीन से मिले साक्ष्य से कैसे परखा जाता है, और यह मिलान कितनी सावधानी माँगता है।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
चर्चा कीजिए — पृष्ठ 60, 67, 71 और 77
पृष्ठ 60 — आजकल बच्चों का नामकरण किस भाँति होता है? क्या ये नाम इस अंश में वर्णित नामों से मिलते-जुलते हैं अथवा भिन्न हैं?
नमूना उत्तर — इसके लिए बच्चे अपने आसपास से जानकारी जुटाएँ:
- नाम जुटाइए: अपने परिवार के आठ-दस नाम लिखिए।
- आधार लिखिए: हर नाम के आगे लिखिए कि उसमें पिता का नाम है, माता का नाम है, या कोई और आधार।
- मिलाइए: इनकी तुलना सातवाहन नामों से कीजिए, जिनमें राजा की पदवी के बाद माता के नाम से बना शब्द आता है, जैसे गोतमी–पुत्त, यानी गोतमी का पुत्र (पृष्ठ 59–60)।
फिर बच्चा लिखे कि आज के नाम उनसे मिलते-जुलते हैं या भिन्न।
हमारी ओर से — कक्षा में उपनाम और गोत्र की सूची मत बनवाइए; इनसे बच्चों की जाति या समुदाय सामने आ सकता है। बात केवल इस पर रखिए कि नाम में पिता का नाम आता है या माता का।
पृष्ठ 67 — इस प्रकरण में कौन से स्रोत हैं जिनसे यह ज्ञात होता है कि लोग ब्राह्मणों द्वारा बताई गई जीविका का अनुसरण करते थे? कौन से स्रोत हैं जिनसे अलग संभावनाओं की जानकारी मिलती है?
नमूना उत्तर — भाग 3 (पृष्ठ 61–67) के स्रोतों को दो खानों में रखिए:
- नियम मानने के संकेत: स्रोत 7 (एकलव्य से अँगूठा माँगकर क्षत्रिय अर्जुन का स्थान बचाया गया); मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची; फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) का वृत्तांत कि अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजानी पड़ती थी; और श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) का कि वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर के बाहर रहते थे।
- अलग संभावनाएँ: स्रोत 6 (ऋग्वेद के सूक्त में कवि, वैद्य पिता और अन्न पीसने वाली माता); स्रोत 8 (मंदसौर के रेशम बुनकरों की अनेक जीविकाएँ); वणिकों वाला बॉक्स (ब्राह्मण–वणिक चारुदत्त, क्षत्रिय–वणिक भाई); भाग 3.2 के अक्षत्रिय राजा; स्रोत 9 (हिडिम्बा); स्रोत 10 (चाण्डाल के पुत्र के रूप में जन्मे मातंग का दिथ्थ मांगलिक से विवाह, और उनके पुत्र माण्डव्यकुमार का तीन वेदों का अध्ययन)।
स्वयं ब्राह्मण द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना भी दूसरे खाने में जाता है।
पृष्ठ 71 — वर्तमान समाजों में सामाजिक रिश्ते किस तरह परिचालित होते हैं? क्या यह अतीत के सामाजिक रिश्तों से मिलते-जुलते हैं, अथवा भिन्न हैं?
नमूना उत्तर — इसके लिए बच्चे आज के समाज को स्वयं देखें और बड़ों से पूछें:
- रिश्ते चुनिए: अध्याय के तीन-चार रिश्ते, जैसे आश्रयदाता और चारण (स्रोत 14), धनी स्वामी और सेवक (स्रोत 13), पिता से पुत्र को विरासत, और विवाह का निर्णय कौन ले (स्रोत 3)।
- आज से मिलाइए: हर रिश्ते के लिए लिखिए कि आज वह कैसे चलता है।
फिर बताइए कि हर रिश्ता अतीत जैसा है या अलग। दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब के स्रोत से तुलना करे।
पृष्ठ 77 — इस अध्याय में महाभारत से उद्धृत अंशों को एक बार फिर पढ़िए। इनमें से प्रत्येक के विषय में यह चर्चा कीजिए कि क्या वे वास्तव में सत्य थे। ये उद्धरण हमें महाकाव्य के रचयिताओं, पाठकों या फिर श्रोताओं के विषय में क्या बताते हैं?
नमूना उत्तर — हर अंश (स्रोत 2, 5, 7, 9, 11, 15, 16) के लिए दो बातें लिखिए: क्या इसकी पुष्टि किसी और साक्ष्य से होती है, और इससे लिखने वालों की सोच के बारे में क्या पता चलता है।
- सत्य के बारे में: किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे। कुछ इतिहासकार महाभारत के मुख्य कथानक को स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति मानते हैं, जबकि अन्य कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती। हस्तिनापुर के वर्णन (स्रोत 15) को बी.बी. लाल के उत्खनन से मिलाकर देखिए।
- लेखकों और श्रोताओं के बारे में: स्रोत 2 पितृवंशिक उत्तराधिकार को महत्व देता है, स्रोत 7 वर्ण के नियम लागू करता है, स्रोत 9 बताता है कि ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग लोगों को कैसे देखा जाता था, और स्रोत 16 बहुपति प्रथा के लिए तीन स्पष्टीकरण देता है।
साथ में किताब की यह बात याद रखिए: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न “लगभग 100-150 शब्दों में” उत्तर माँगते हैं (पृष्ठ 80)।
प्रश्न 1 — विशिष्ट परिवारों में पितृवंशिकता क्यों महत्वपूर्ण रही होगी (पृष्ठ 55–57)
- पितृवंशिकता का अर्थ: वंश पिता से पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र तक।
- पिता के बाद पुत्र संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर, अधिकार जमाते थे।
- अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से इसी पर चलते थे।
- स्रोत 1 (ऋग्वेद का विवाह मंत्र) और स्रोत 2 (दुर्योधन का डर) इसके साक्ष्य हैं।
- लचीलापन: भाई, बंधु-बांधव, और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ।
जाँचते समय: बच्चा “विशिष्ट परिवार” का अर्थ, यानी शासक और धनी परिवार, पकड़े; केवल परिभाषा लिखना आधा उत्तर है। कम से कम एक स्रोत का नाम हो।
नमूना उत्तर — शासक और धनी परिवारों में पितृवंशिकता से ही तय होता था कि संसाधन और सत्ता आगे किसके हाथ जाएँगे, इसलिए उनके लिए यह बहुत अहम रही होगी।
- विरासत: पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।
- राजवंशों का चलन: अधिकतर राजवंश लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से इसी प्रणाली पर चलते थे।
- पुत्र की कामना: ऋग्वेद के विवाह मंत्र (स्रोत 1) में कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”।
- गद्दी का झगड़ा: आदिपर्वन् (स्रोत 2) में दुर्योधन को डर है कि “उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और फिर प्रपौत्र इस पैतृक संपत्ति के अधिकारी हो जाएँगे”।
नियम में लचीलापन भी था: पुत्र न होने पर कभी भाई और कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली।
प्रश्न 2 — क्या आरंभिक राज्यों में शासक निश्चित रूप से क्षत्रिय ही होते थे (पृष्ठ 62–63)
- शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे।
- मौर्य: उद्भव पर बहस; बौद्ध ग्रंथ क्षत्रिय, ब्राह्मणीय शास्त्र ‘निम्न’ कुल का बताते हैं।
- शुंग और कण्व ब्राह्मण थे।
- शक मलेच्छ माने गए, फिर भी रुद्रदामन ने सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार करवाया।
- सातवाहन गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताया।
जाँचते समय: उत्तर “नहीं” से शुरू हो और कम से कम तीन राजवंश उदाहरण में आएँ। किताब का निष्कर्ष वाला वाक्य उत्तर को सधा हुआ बनाता है।
नमूना उत्तर — नहीं। शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर अनेक महत्वपूर्ण राजवंश दूसरे वर्णों से निकले।
- मौर्य: इनके उद्भव पर बहस होती रही है। बाद के बौद्ध ग्रंथ इन्हें क्षत्रिय बताते हैं, जबकि ब्राह्मणीय शास्त्र इन्हें ‘निम्न’ कुल का मानते हैं।
- शुंग और कण्व: मौर्यों के बाद आए ये दोनों वंश ब्राह्मण थे।
- शक: मध्य एशिया से आए शकों को ब्राह्मण मलेच्छ मानते थे; फिर भी संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक में शक राजा रुद्रदामन (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) द्वारा सुदर्शन सरोवर के जीर्णोद्धार का वर्णन है।
- सातवाहन: गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया; उसने चार वर्णों के बीच विवाह रोकने का दावा किया, पर स्वयं रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध जोड़ा।
किताब का निष्कर्ष: राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके; “राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था।”
प्रश्न 3 — द्रोण, हिडिम्बा और मातंग की कथाओं में धर्म के मानदंडों की तुलना (पृष्ठ 61–62, 65, 67)
- द्रोण और एकलव्य (स्रोत 7): मानदंड पूरी सख्ती से लागू।
- हिडिम्बा (स्रोत 9): मानदंड से बाहर का रिश्ता, शर्तों के साथ स्वीकार।
- मातंग (स्रोत 10): जन्म पर टिके मानदंड को चुनौती।
- पहली दो कथाएँ संस्कृत महाभारत की, तीसरी पालि की बौद्ध मातंग जातक की।
जाँचते समय: तीनों कथाओं का सार छोटा हो; अंक “अंतर” वाले भाग के हैं। बच्चा यह लिखे कि मातंग की कथा चाण्डाल के नज़रिए से कही गई है।
नमूना उत्तर — तीनों कथाएँ वर्ण और जन्म के मानदंडों से जुड़ी हैं, पर तीनों में उनका निभाव अलग है।
- द्रोण और एकलव्य: ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना किया; एकलव्य ने अभ्यास से महारत पाई, तो अर्जुन के याद दिलाने पर द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उसका दाहिना अँगूठा माँग लिया। धर्मसूत्रों में युद्ध क्षत्रियों का कार्य था, फिर भी ब्राह्मण द्रोण धनुर्विद्या सिखा रहे थे।
- हिडिम्बा: एक राक्षस स्त्री ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा; युधिष्ठिर ने शर्त के साथ विवाह मान लिया, पुत्र घटोत्कच हुआ, और माँ-बेटा वन में चले गए। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि राक्षस उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग थे।
- मातंग: चाण्डाल के रूप में जन्मे बोधिसत्त मातंग अपने ही पुत्र माण्डव्य से, जो रोज़ 16,000 ब्राह्मणों को भोजन कराता था, भोजन माँगने पर ठुकराए गए। मातंग ने कहा: “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।”
अंतर: द्रोण की कथा मानदंड को लागू करती है, हिडिम्बा की कथा उसमें समझौता दिखाती है, और मातंग की कथा उसे नकारती है।
प्रश्न 4 — सामाजिक अनुबंध की बौद्ध अवधारणा और ‘पुरुषसूक्त’ पर आधारित ब्राह्मणीय दृष्टिकोण (पृष्ठ 62, 69, 70, 72)
- ब्राह्मणीय दृष्टिकोण: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ, “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं” (स्रोत 13)।
- बौद्ध मिथक (सुत्तपिटक): व्यवस्था मनुष्यों के अपने कर्म से बनी।
- राजा: शास्त्रों में केवल क्षत्रिय; मिथक में महासम्मत्त, सब लोगों द्वारा चुना गया; ‘कर’ उसकी सेवा का मूल्य।
- विषमता के भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”।
- मनुष्य व्यवस्था बना सकते थे, तो बदल भी सकते थे।
जाँचते समय: बच्चा दोनों पक्ष आमने-सामने रखे। पुरुषसूक्त किताब में विस्तार से नहीं है, इसलिए उसका एक वाक्य काफ़ी है; उत्तर का बड़ा भाग बौद्ध मिथक की बातों का हो।
नमूना उत्तर — ब्राह्मणीय दृष्टिकोण में समाज की ऊँच-नीच सृष्टि की कथा का हिस्सा है; बौद्ध सुत्तपिटक का मिथक उसे मनुष्यों के अपने निर्णय से जोड़ता है।
- पुरुषसूक्त: ऋग्वेद (मंडल 10, सूक्त 90) के इस सूक्त में चारों वर्ण एक ही आदि-पुरुष के अंगों से जोड़े गए हैं: ब्राह्मण उसका मुख, राजन्य उसकी भुजाएँ, वैश्य उसकी जंघाएँ, और पैरों से शूद्र (मूल पाठ, मंत्र 12)। स्रोत 13 में ब्राह्मण यही दावा करते हैं कि वे “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं”।
- समाज की उत्पत्ति: बौद्ध मिथक में व्यवस्था तब बनी जब मनुष्य लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए और उन्होंने स्वयं एक व्यक्ति को चुना।
- राजा: वह महासम्मत्त है, यानी सब लोगों द्वारा चुना गया, और ‘कर’ उसकी सेवा के बदले दिया जाने वाला मूल्य है।
- विषमता: बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता है, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया।
यह मिथक बताता है कि आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मानवीय कर्म का बड़ा हाथ था; और यदि मनुष्य स्वयं व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में उसे बदल भी सकते थे।
प्रश्न 5 — युधिष्ठिर का संजय को संदेश: सूची के आधार (पृष्ठ 80)
- भेद (वर्ण और हैसियत): पहले ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित, लगभग अंत में दासियाँ।
- गुरु: द्रोण और कृपाचार्य।
- उम्र: भीष्म और वृद्ध राजा पहले, युवा योद्धा बाद में।
- लिंग: पहले सारे पुरुष, फिर स्त्रियाँ।
- बंधुत्व: भाई, पुत्र, पौत्र, माताएँ, पत्नियाँ, कुलवधुएँ, पुत्रियाँ।
- अन्य आधार: विदुर का आदर, गणिकाएँ, वृद्ध, विकलांग और असहाय जन।
जाँचते समय: प्रश्न हर श्रेणी के स्थान का कारण माँगता है; केवल श्रेणियों के नाम गिनाना आधा उत्तर है। विदुर वाला आधार पहचानने वाले बच्चे को पूरा श्रेय दीजिए।
नमूना उत्तर — अवतरण में अभिवादन का क्रम ही बता देता है कि किसे कितना ऊँचा माना गया। ऐसा लगता है कि सूची इन आधारों पर बनी है:
- भेद: सबसे पहले धृतराष्ट्र के घर के ब्राह्मण और मुख्य पुरोहित, और लगभग अंत में दासियाँ और उनकी संतानें।
- गुरु और उम्र: गुरु द्रोण और कृपाचार्य के सामने युधिष्ठिर नतमस्तक होते हैं; भीष्म और वृद्ध राजा धृतराष्ट्र, दुर्योधन और युवा कुरु योद्धाओं से पहले आते हैं।
- लिंग और बंधुत्व: पहले सारे पुरुष, फिर स्त्रियाँ; पुरुषों को नमन मिलता है, पत्नियों के लिए बस कुशल-क्षेम का संदेश है। पूरा परिवार रिश्ते के हिसाब से गिना गया है।
- अन्य आधार: दासी से जन्मे विदुर को “सर्वोपरि” नमस्कार मिलता है, क्योंकि वे “हमारे पिता और माता के सदृश” हैं; गणिकाओं का अलग से उल्लेख है; और अंत में वृद्ध, विकलांग और असहाय जनों को भी नमस्कार है।
इस तरह यह सूची वर्ण, उम्र, लिंग और रिश्ते, चारों के मेल से बनी ऊँच-नीच दिखाती है।
6 से 9 तक के प्रश्न — लघु निबंध के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न “लगभग 500 शब्दों में” लघु निबंध माँगते हैं (पृष्ठ 81)। नीचे हर निबंध का ढाँचा है: भूमिका, मुख्य बिंदु, और निष्कर्ष।
प्रश्न 6 — विंटरविट्ज़ का कथन: महाभारत “संपूर्ण साहित्य का प्रतिनिधित्व करता है” (पृष्ठ 53–54, 60, 68, 73–78)
जाँचते समय: बच्चा कथन को आँख मूँदकर न माने। अच्छा निबंध दिखाता है कि महाभारत में बहुत कुछ है, और साथ में किताब की सावधानी भी लिखता है कि सृजनात्मक साहित्य हमेशा समाज की वास्तविकता नहीं दिखाता।
नमूना उत्तर — भूमिका: यह अध्याय विंटरविट्ज़ की बात को कई तरह से सही ठहराता है, क्योंकि महाभारत कई सदियों, कई लेखकों और पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ है; साथ ही अध्याय यह भी सिखाता है कि इसे सावधानी से पढ़ा जाए।
- अनेक प्रकार की सामग्री: इतिहासकार इसकी विषयवस्तु को आख्यान (कहानियाँ) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड) में रखते हैं; सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है।
- कई सदियाँ, कई हाथ: रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक होती रही; मूल कथा संभवत: सूतों की थी, पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखा, और ग्रंथ संभवत: 10,000 से कम श्लोकों से बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला बना।
- पूरे उपमहाद्वीप का ग्रंथ: समालोचनात्मक संस्करण के लिए कश्मीर और नेपाल से केरल और तमिलनाडु तक की पांडुलिपियाँ मिलाई गईं; सबमें समानता मिली, और 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठ क्षेत्रीय प्रभेदों का ब्योरा देते हैं।
- समाज के अनेक स्वर: राजाओं और योद्धाओं के साथ निषाद एकलव्य, राक्षस हिडिम्बा, युद्ध रोकने की सलाह देती गांधारी और प्रश्न पूछती द्रौपदी; द्रौपदी के प्रश्न पर दो मत और द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण।
- एक जीवित परंपरा: भिन्न-भिन्न भाषाओं में पाठान्तर, क्षेत्रीय कहानियाँ, मूर्तियाँ (अहिच्छत्र की मिट्टी की मूर्ति, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी), चित्र (फारसी अनुवाद, लगभग 1740-50), नाटक और नृत्य; और महाश्वेता देवी की “कुंती ओ निषादी”।
- सावधानी: किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे; और संस्कृत पाठ कई प्रश्नों पर मूक है, जैसे लाक्षागृह में जले छ: निर्दोष लोग।
निष्कर्ष: महाभारत में सचमुच “बहुत सारी और अनेक प्रकार की चीज़ें” हैं, पर इतिहासकार इसे एक समाज का सीधा चित्र मानने के बजाय इसकी भाषा, लेखक, श्रोता और काल को परखकर पढ़ते हैं।
प्रश्न 7 — क्या महाभारत का एक ही रचयिता था (पृष्ठ 53–54, 73–77)
जाँचते समय: परंपरा (व्यास) और साक्ष्य, दोनों आएँ। रचना के चरण सही क्रम में और किताब की तिथियों के साथ हों; “लगभग” और “संभवत:” न छूटें।
नमूना उत्तर — भूमिका: साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को इसका रचयिता मानती है, और परंपरा के अनुसार व्यास ने महाभारत श्रीगणेश को लिखवाया; पर अध्याय के साक्ष्य बताते हैं कि यह एक व्यक्ति की रचना नहीं हो सकती।
- सूत: संभवत: मूल कथा भाट सारथियों, यानी सूतों, ने रची, जो क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते थे; ये रचनाएँ मौखिक रूप में आगे बढ़ीं।
- ब्राह्मण: पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा।
- बाद के चरण: लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच विष्णु की आराधना बढ़ी और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया गया; लगभग 200-400 ईसवी के बीच मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए।
- आकार और समय: ग्रंथ संभवत: 10,000 से कम श्लोकों से बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हुआ, और रचना लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक चली। अधिकतर इतिहासकार मानते हैं कि यह पहले एक नाटकीय कथानक था, जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।
- भीतर के संकेत: किताब पूछती है कि क्या हस्तिनापुर का भव्य चित्रण (स्रोत 15) बाद में, ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात, जोड़ा गया; द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण (स्रोत 16); और किताब स्वयं “लेखक(कों)” लिखती है।
निष्कर्ष: परंपरा व्यास का नाम लेती है, पर साक्ष्य बताते हैं कि महाभारत सदियों तक अनेक सूतों, ब्राह्मणों और लेखकों के हाथों बढ़ा; इसलिए इसका एक ही रचयिता होना संभव नहीं लगता।
प्रश्न 8 — आरंभिक समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों की विषमताएँ (पृष्ठ 55–60, 68–69)
जाँचते समय: उत्तर केवल इस बात पर न रुके कि स्त्रियों की स्थिति खराब थी। वंश, विवाह और संपत्ति, तीनों क्षेत्रों से साक्ष्य हों, और दूसरा पहलू भी (गांधारी, द्रौपदी, प्रभावती गुप्त, सातवाहन रानियाँ)।
नमूना उत्तर — भूमिका: ये विषमताएँ बहुत गहरी थीं, क्योंकि वंश, विवाह और संपत्ति, तीनों के नियम पुरुषों के पक्ष में बने थे; फिर भी कुछ स्त्रियों के उदाहरण बताते हैं कि तस्वीर पूरी तरह एक जैसी नहीं थी।
- वंश और विवाह: पितृवंशिकता में पुत्र ही पिता के संसाधनों और सिंहासन के अधिकारी थे; बेटियों का विवाह गोत्र से बाहर कराया जाता था, कन्यादान पिता का धार्मिक कर्तव्य था, और विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी।
- संपत्ति: मनुस्मृति पुरुषों के लिए धन अर्जित करने के सात तरीके बताती है, पर स्त्रियों के छ: तरीके सब भेंट या उपहार हैं। स्त्रीधन पर पति का अधिकार नहीं था, फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति या अपने बहुमूल्य धन के गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी देती है।
- पत्नी, संपत्ति के रूप में: युधिष्ठिर ने द्यूत में द्रौपदी को दाँव पर लगाया; एक मत यह था कि “पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है”।
- दूसरा पहलू: द्रौपदी ने स्वयं प्रश्न उठाया; गांधारी ने दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह दी; वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनी थीं; सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र रखा, पर सातवाहनों में भी उत्तराधिकार पितृवंशिक रहा।
निष्कर्ष: सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का नियंत्रण था, और इससे दोनों की सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”; कुछ स्त्रियों ने इसके भीतर अपनी जगह बनाई, पर नियम पुरुषों के पक्ष में ही रहे।
प्रश्न 9 — बंधुत्व और विवाह के ब्राह्मणीय नियमों का सर्वत्र अनुसरण नहीं होता था (पृष्ठ 56, 58, 60, 63, 65, 67, 76–77)
जाँचते समय: हर बिंदु में पहले नियम, फिर उसे तोड़ता साक्ष्य हो, और यह भी कि साक्ष्य किस तरह के स्रोत से है: अभिलेख, ग्रंथ या कथा।
नमूना उत्तर — भूमिका: ब्राह्मण लेखक मानते थे कि उनके नियम सब पर लागू हों, पर क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”।
- धर्मशास्त्रों की अपनी स्वीकृति: धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र विवाह के आठ प्रकार मानते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ थे, बाकी निंदित। संभव है कि निंदित पद्धतियाँ उन लोगों में चलती थीं जो ब्राह्मणीय नियम नहीं मानते थे।
- सातवाहन रानियाँ: रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्र से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था और अंतर्विवाह का उदाहरण है।
- बहुपति प्रथा: द्रौपदी का पाँच पांडवों से विवाह। वर्तमान इतिहासकारों का सुझाव है कि संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी, और कुछ इतिहासकार ध्यान दिलाते हैं कि ब्राह्मणों की दृष्टि में अमान्य होते हुए भी यह हिमालय क्षेत्र में प्रचलन में थी (और आज भी है)।
- वर्ण और समुदाय से बाहर के विवाह: भीम का राक्षस स्त्री हिडिम्बा से विवाह; मातंग जातक में चाण्डाल मातंग का व्यापारी की पुत्री दिथ्थ मांगलिक से विवाह; गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि का शक रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध।
- उत्तराधिकार में फेरबदल: पुत्र न होने पर कभी भाई, कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली।
निष्कर्ष: ब्राह्मणीय नियम एक आदर्श थे; असल व्यवहार क्षेत्र, समुदाय और परिस्थिति के हिसाब से बदलता था।
10 से 12 तक के प्रश्न — मानचित्र और परियोजना
प्रश्न 10 — इस अध्याय का मानचित्र 1 और अध्याय 2 का मानचित्र 1 (पृष्ठ 56)
करने का तरीका:
- इस अध्याय का मानचित्र 1, “कुरु पांचाल क्षेत्र और निकटवर्ती स्थान” (पृष्ठ 56), और अध्याय 2 का मानचित्र 1 (महाजनपद) सामने रखिए।
- दोनों पर छपे नाम तीन खानों में लिखवाइए: दोनों पर, केवल इस अध्याय के मानचित्र पर, केवल अध्याय 2 के मानचित्र पर।
- इस अध्याय के मानचित्र पर पांचाल का अलग नाम नहीं है, केवल शीर्षक में है; पांचाल की जगह अध्याय 2 के मानचित्र पर देखिए।
- फिर कुरु और पांचाल के ठीक आसपास के महाजनपद और नगर चुनकर सूची बनवाइए, हर नाम के आगे यह लिखकर कि वह किस मानचित्र पर मिला।
जाँचते समय: नाम किताब के मानचित्रों की वर्तनी में हों। किसी नाम को “पास” मानने पर दो बच्चों में मतभेद हो सकता है; दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा मानचित्र से कारण दे।
नमूना उत्तर — दोनों मानचित्रों पर छपे नाम ये हैं:
- दोनों मानचित्रों पर (क्षेत्र): कुरु, शूरसेन, मत्स्य, अवन्ति, वत्स, मल्ल, और कोसल (अध्याय 2 के मानचित्र पर “कोशल”)।
- दोनों मानचित्रों पर (नगर): इंद्रप्रस्थ (अध्याय 2 में “इन्द्रप्रस्थ”), मथुरा, उज्जयिनी, श्रावस्ती, कुशीनगर, वैशाली, कौशाम्बी, वाराणसी।
- केवल इस अध्याय के मानचित्र पर: क्षेत्र शाक्य; नगर हस्तिनापुर, विराट, अयोध्या, कपिलवस्तु, लुंबिनी, पावा, पाटलिपुत्र, सारनाथ, बोधगया।
- केवल अध्याय 2 के मानचित्र पर: महाजनपद कंबोज, गांधार, पांचाल, काशी, वज्जि (वृजि), मगध, अंग, वंग, चेदि, अश्मक; नगर पुष्कलावती, तक्षशिला, अहिच्छत्र, चंपा, राजगीर।
कुरु–पांचाल के पास के महाजनपदों और नगरों की सूची इन्हीं नामों में से बनेगी; कौन-सा नाम पास है, यह बच्चे मानचित्र देखकर स्वयं तय करें।
प्रश्न 11 — दूसरी भाषाओं में महाभारत की पुनर्व्याख्या (परियोजना) (पृष्ठ 77–78)
करने का तरीका:
- अध्याय के दो प्रसंग चुनिए, जैसे एकलव्य (स्रोत 7), हिडिम्बा (स्रोत 9), द्यूत और द्रौपदी के प्रश्न (स्रोत 11), द्रौपदी का विवाह (स्रोत 16) या लाक्षागृह।
- अपनी भाषा या किसी और भारतीय भाषा में इन प्रसंगों का कोई पाठ, लोककथा, नाटक या कहानी ढूँढ़िए। किताब का उदाहरण महाश्वेता देवी की बांग्ला कहानी “कुंती ओ निषादी” है।
- तुलना कीजिए: कथा कौन कह रहा है, किसका नज़रिया सामने है, क्या जोड़ा या छोड़ा गया, और अंत कैसा है।
जाँचते समय: हर पाठ का नाम, भाषा और लेखक साफ़ लिखा हो। बच्चा जो पाठ लाए, वह उसने स्वयं पढ़ा या सुना हो; सुनी-सुनाई बात को स्रोत न माना जाए।
नमूना उत्तर — इस परियोजना का कोई एक तय उत्तर नहीं। अच्छा काम इस रूप में आता है:
- एक तालिका: प्रसंग · संस्कृत पाठ में · दूसरी भाषा के पाठ में · समानता · अंतर।
- किताब का उदाहरण पहली पंक्ति में: लाक्षागृह का प्रसंग। संस्कृत पाठ में कुंती के भोज में आई एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ पांडवों की लगाई आग में भस्म हो जाती है, और उनके शव देखकर लोग समझते हैं कि पांडव मर गए; “कुंती ओ निषादी” में एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, कुंती से कहती है कि अपने अतीत पर सोचते समय उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई।
- सार: तालिका के नीचे 200 से 300 शब्दों में समानता और अंतर।
अंत में बच्चा बताए कि दूसरी भाषा के पाठ में किसकी आवाज़ ज़्यादा सुनाई देती है।
प्रश्न 12 — एकलव्य की कथा अपने दृष्टिकोण से (परियोजना) (पृष्ठ 62)
करने का तरीका:
- स्रोत 7 (आदिपर्वन्) दोबारा पढ़िए: द्रोण का मना करना, मिट्टी की प्रतिमा, अर्जुन का याद दिलाना, गुरु दक्षिणा में अँगूठा।
- कथा कहने वाला चुनिए: एकलव्य, द्रोण, अर्जुन, या एकलव्य की माँ।
- घटनाएँ वही रखिए; उस पात्र के मन की बात, डर और प्रश्न लिखिए। किताब के किनारे के प्रश्न मदद करेंगे: निषादों को क्या संदेश मिला, क्षत्रियों को क्या, और क्या द्रोण धर्मसूत्र का पालन कर रहे थे।
जाँचते समय: यह लिखित रचना है; इसे कक्षा में अभिनय करवाकर किसी बच्चे को किसी वर्ण या समुदाय की भूमिका में मत खड़ा कीजिए। किताब की घटनाएँ बदली न जाएँ।
नमूना उत्तर — यह बच्चे की अपनी रचना होगी। पूरी रचना में ये तीन बातें हों:
- लगभग एक पन्ने की कहानी, शीर्षक के साथ।
- किताब की सारी घटनाएँ, सही क्रम में।
- अंत में दो-तीन पंक्तियाँ कि यह नज़रिया क्यों चुना।
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — दस भूलें जिनसे बचाना है
1. भूल: महाभारत एक ही लेखक ने एक ही समय में लिखा। सही बात: यह कई चरणों में बना: सूत, फिर पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मण, फिर लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी और लगभग 200-400 ईसवी के जोड़; परंपरा व्यास को रचयिता मानती है (पृष्ठ 74–75)।
2. भूल: समालोचनात्मक संस्करण में क्षेत्रीय पाठ हटा दिए गए। सही बात: प्रभेद पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखे गए; 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठ उन्हीं के ब्योरे हैं (पृष्ठ 54)।
3. भूल: पितृवंशिकता महाभारत से शुरू हुई। सही बात: पितृवंशिकता महाकाव्य से पहले भी थी; महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इसे और सुदृढ़ किया (पृष्ठ 55)।
4. भूल: ब्राह्मणीय नियम हर जगह माने जाते थे। सही बात: ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”; सातवाहन रानियों ने पिता का गोत्र रखा (पृष्ठ 58, 60)।
5. भूल: सातवाहन राजाओं के मातृनाम का मतलब मातृवंशिक उत्तराधिकार। सही बात: सातवाहनों में सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था (पृष्ठ 60)।
6. भूल: राजा हमेशा क्षत्रिय होते थे। सही बात: शुंग और कण्व ब्राह्मण थे, मौर्यों के उद्भव पर बहस है, ब्राह्मण शकों को मलेच्छ मानते थे, और सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण बताया (पृष्ठ 62–63)।
7. भूल: वर्णों की तरह जातियाँ भी चार थीं। सही बात: वर्ण चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी (पृष्ठ 63)।
8. भूल: स्त्रीधन पर पति का अधिकार था। सही बात: स्त्रीधन पर पति का कोई अधिकार नहीं था; संतान उसे विरासत में पा सकती थी (पृष्ठ 68)।
9. भूल: बौद्ध मानते थे कि समाज में कोई विषमता नहीं। सही बात: बौद्धों ने विषमता मानी, पर उसे न नैसर्गिक माना न स्थायी; उन्होंने जन्म पर आधारित प्रतिष्ठा अस्वीकार की (पृष्ठ 69)।
10. भूल: हस्तिनापुर गाँव निश्चित रूप से महाभारत वाला हस्तिनापुर है। सही बात: यह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी; नामों की समानता संयोग भी हो सकती है (पृष्ठ 75)।
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
ये पंक्तियाँ रटवाने के लिए नहीं हैं। पहले बात समझाइए, फिर उत्तर में यह पंक्ति लिखवाइए; किताब के अपने शब्द उत्तर को सधा हुआ बनाते हैं।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “उत्तम पुत्र हों” | 56 | प्रश्न 1, पितृवंशिकता |
| ब्राह्मणों का प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था” | 58 | प्रश्न 9, नियम और व्यवहार |
| “राजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर शायद ही निर्भर करता था।” | 62 | प्रश्न 2, अक्षत्रिय राजा |
| “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।” | 67 | प्रश्न 3, मातंग की कथा |
| “अधिक प्रखर हुई” | 68 | प्रश्न 8, संपत्ति और स्त्री-पुरुष की हैसियत |
| “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी” | 69 | प्रश्न 4, बौद्धों का नज़रिया |
| “अक्षरश: सत्य न भी हों” | 57 | प्रश्न 6, चर्चा पृष्ठ 77: स्रोत की सीमा |
| ‘इतिहास’, यानी ‘ऐसा ही था’ | 74 | प्रश्न 6 और 7, महाभारत की श्रेणी |
| कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर “हो सकती थी” | 75 | पुरातत्व और ग्रंथ का मिलान |
| “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।” | 77 | प्रश्न 6 और 9, बहुपति प्रथा |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
किताब के किनारों पर छोटे सवाल छपे हैं। बच्चे इन्हें पढ़कर पूछेंगे; नीचे हर एक का छोटा उत्तर है।
पृष्ठ 56 — इस मंत्र के संदर्भ में, विवाह का वधू और वर के लिए क्या अभिप्राय है? इसकी चर्चा कीजिए। क्या ये अभिप्राय समान हैं या फिर इनमें भिन्नताएँ हैं? (स्रोत 1)
नमूना उत्तर — दोनों के लिए अर्थ अलग है:
- वधू के लिए: उसे ‘यहाँ’ (पिता के घर) से मुक्त करके ‘वहाँ’ (पति के घर) मज़बूती से स्थापित किया जाता है; कामना यह भी है कि उसे पति के प्रेम का सौभाग्य मिले।
- वर के लिए: कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के उत्तम पुत्र हों, यानी वर का वंश आगे बढ़े।
अभिप्राय समान नहीं हैं: वधू का घर और जीवन बदलता है, वर के लिए विवाह पुत्र और वंश से जुड़ा है।
पृष्ठ 57 — उद्धरण पढ़िए और उन सारे मूल तत्वों की सूची तैयार कीजिए जिनका राजा बनने के लिए प्रस्ताव किया गया है। एक विशेष कुल में जन्म लेना कितना महत्वपूर्ण था? इनमें से कौन-सा मूल तत्व सही लगता है? क्या ऐसा कोई तत्व है जो आपको अनुचित लगता है? (स्रोत 2)
नमूना उत्तर — स्रोत 2 (आदिपर्वन्) में राजा बनने के ये आधार दिखते हैं:
- शारीरिक पूर्णता: धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए उनके अनुज पांडु सिंहासन पर बैठे।
- उम्र: पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सब राजकुमार अल्पवयस्क थे।
- योग्यता और जनता का समर्थन: नागरिक पांडवों को चाहते थे, क्योंकि वे “अधिक योग्य और सदाचारी” थे।
- पिता से विरासत: दुर्योधन का तर्क है कि गद्दी पिता से पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र को जाती है।
सारे दावेदार कुरु वंश के ही हैं, इसलिए उस कुल में जन्म लेना पहली शर्त थी; झगड़ा इस पर है कि कुल की कौन-सी शाखा राज करे। कौन-सा आधार उचित या अनुचित लगता है, यह बच्चा कारण के साथ स्वयं लिखे।
पृष्ठ 58 — इनमें से प्रत्येक विवाह पद्धति के विषय में चर्चा कीजिए कि विवाह का निर्णय किसके द्वारा लिया गया था : (क) वधू (ख) वर (ग) वधू का पिता (घ) वर का पिता (ङ) अन्य लोग (स्रोत 3)
नमूना उत्तर — स्रोत 3 (मनुस्मृति) की चारों पद्धतियाँ देखिए:
- पहली और चौथी: वधू का पिता; वह कन्या का दान करता है।
- पाँचवीं: वर; वह वधू के बांधवों को और स्वयं वधू को यथेष्ट धन देकर वधू प्राप्त करता है, इसलिए बांधव (अन्य लोग) भी इस सौदे में शामिल हैं।
- छठी: वधू और वर दोनों; यह स्त्री और पुरुष का अपनी इच्छा से संयोग है।
किसी भी पद्धति में वर के पिता का नाम नहीं आता।
पृष्ठ 59 — यहाँ कितने गोतमी–पुत्त तथा कितने वसिथि (वैकल्पिक वर्तनी वसथि) पुत्त हैं? (स्रोत 4)
नमूना उत्तर — गोतमी–पुत्त 3 (पहली, तीसरी और सातवीं पंक्ति) और वसिथि/वसथि–पुत्त 2 (दूसरी और पाँचवीं पंक्ति)। ये नाम माता के नाम से बने हैं; गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं, जो वैदिक ऋषि थे और जिनके नाम से गोत्र हैं।
छपी हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है।
पृष्ठ 60 — क्या यह उद्धरण आपको आरंभिक भारतीय समाज में माँ को किस दृष्टि से देखा जाता था इसका जायज़ा देता है। (स्रोत 5)
नमूना उत्तर — कुछ हद तक:
- माँ की सलाह: गांधारी दुर्योधन को युद्ध न करने की सलाह देती है; यहाँ माँ एक समझदार सलाहकार के रूप में दिखती है।
- निर्णय पुत्र का: दुर्योधन ने सलाह नहीं मानी, युद्ध लड़ा और हार गया।
यानी माँ की बात का आदर था, पर अंतिम निर्णय पुत्र का रहा; एक उद्धरण से निष्कर्ष सावधानी से निकालिए।
पृष्ठ 62 — इस कहानी के द्वारा निषादों को कौन–सा संदेश दिया जा रहा था? क्षत्रियों को इससे क्या संदेश मिला होगा? क्या आपको लगता है कि एक ब्राह्मण के रूप में द्रोण धर्मसूत्र का अनुसरण कर रहे थे जब वे धनुर्विद्या की शिक्षा दे रहे थे? (स्रोत 7)
नमूना उत्तर — कथा से तीन बातें निकलती हैं:
- निषादों के लिए: राजकुमारों वाली विद्या उनके लिए नहीं है; अपने अभ्यास से महारत पा लें, तब भी वह छीनी जा सकती है, जैसे एकलव्य का अँगूठा।
- क्षत्रियों के लिए: उनका स्थान सुरक्षित रखा जाएगा; द्रोण ने अर्जुन को दिया वचन निभाया और “कोई भी अर्जुन से बेहतर धनुर्धारी नहीं रहा।”
- द्रोण और धर्मसूत्र: धर्मसूत्रों के अनुसार ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य वेदों और शास्त्रों का अध्ययन-अध्यापन, यज्ञ और दान था, जबकि युद्ध करना क्षत्रियों का प्रमुख कार्य था; इसलिए लगता है कि धनुर्विद्या सिखाकर द्रोण स्वयं उस नियम से बाहर जा रहे थे जिसे वे एकलव्य पर लागू कर रहे थे।
पृष्ठ 64 — क्या आपको लगता है कि रेशम के बुनकर उस जीविका का पालन कर रहे थे जो उनके लिए शास्त्रों ने तय की थी? (स्रोत 8)
नमूना उत्तर — पूरी तरह नहीं। मंदसौर (मध्य प्रदेश) के अभिलेख (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार:
- ये बुनकर लाट (गुजरात) से दशपुर जाकर बसे और सूर्य देवता का मंदिर बनवाया।
- इस श्रेणी के सदस्य संगीत, जीवनियों और कथाओं, धार्मिक व्याख्यानों, अनुष्ठानों, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध में भी लगे थे।
इसलिए वे एक तय जीविका तक सीमित नहीं थे।
पृष्ठ 65 — इस सारांश में उन व्यवहारों को निर्दिष्ट कीजिए जो अब्राह्मणीय प्रतीत होते हैं। (स्रोत 9)
नमूना उत्तर — हिडिम्बा की कथा में ये व्यवहार ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग दिखते हैं:
- हिडिम्बा ने स्वयं भीम से विवाह का प्रस्ताव किया और अपना पति स्वयं चुना।
- उसने मित्र, बांधव और अपने धर्म का परित्याग किया।
- विवाह शर्त के साथ हुआ, और पुत्र घटोत्कच के जन्म के बाद माँ और पुत्र वन में चले गए।
कुछ इतिहासकारों का मत है कि ‘राक्षस’ उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से भिन्न थे।
पृष्ठ 67 — इस कथा में उन तत्वों की ओर इंगित कीजिए जिनसे यह ज्ञात हो कि वह मातंग के नज़रिए से लिखे गए थे। (स्रोत 10)
नमूना उत्तर — मातंग जातक (पालि) का नायक चाण्डाल मातंग है:
- चाण्डाल के रूप में जन्मे मातंग ही बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) हैं।
- पिटाई के बाद वे दरवाज़े के बाहर लेट गए, और सातवें दिन घरवालों ने दिथ्थ को उन्हें सौंप दिया।
- कथा की नैतिक बात मातंग के मुँह से आती है, और अंत में दिथ्थ माफ़ी माँगने आती है।
यानी जीत, नैतिकता और अलौकिक शक्ति, तीनों मातंग के पक्ष में हैं।
पृष्ठ 68 — क्या आपको ऐसा लगता है कि यह प्रकरण इस बात की ओर इंगित करता है कि पत्नियों को पतियों की निजी संपत्ति माना जाए? (स्रोत 11)
नमूना उत्तर — प्रकरण बताता है कि ऐसा विचार मौजूद था, पर उस पर विवाद भी था:
- हाँ की ओर: युधिष्ठिर ने सब कुछ हारने के बाद द्रौपदी को भी दाँव पर लगाया, और एक मत था कि “पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है।”
- नहीं की ओर: दूसरा मत था कि दासत्व स्वीकार करने वाला पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता; मुद्दों का निष्कर्ष नहीं निकला, और अंत में धृतराष्ट्र ने पांडवों और द्रौपदी को उनकी निजी स्वतंत्रता लौटा दी।
पृष्ठ 69 — स्त्री और पुरुष किस प्रकार धन प्राप्त कर सकते थे इसकी तुलना कीजिए व अंतर भी स्पष्ट कीजिए। (स्रोत 12)
नमूना उत्तर — मनुस्मृति के अनुसार:
- पुरुष, सात तरीके: विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा, और सज्जनों की दी गई भेंट।
- स्त्री, छ: तरीके: वैवाहिक अग्नि के सामने, वधूगमन के समय और स्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट; भ्राता, माता और पिता के उपहार; परवर्ती काल में मिली भेंट; और “अनुरागी” पति से मिला सब कुछ।
अंतर: पुरुष अपनी मेहनत, खरीद, निवेश या विजय से धन पा सकते थे; स्त्रियों के सारे तरीके दूसरों के दिए धन पर टिके हैं।
पृष्ठ 70 — अवन्तिपुत्र के पहले वक्तव्य को दुबारा पढ़िए। इसमें कौन से विचार ऐसे हैं जो ब्राह्मणीय ग्रंथों/ परंपराओं से लिए गए हैं? क्या आप इनमें से किसी विचार के स्रोत की पहचान कर सकते हैं? इस ग्रंथ के अनुसार सामाजिक असमानता के लिए क्या स्पष्टीकरण दिया जा सकता है? (स्रोत 13)
नमूना उत्तर — स्रोत 13 पालि के बौद्ध ग्रंथ मज्झिमनिकाय से है:
- ब्राह्मणीय विचार: ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ हैं, केवल वे पवित्र हैं, और वे “ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं”; यह बात ऋग्वेद के पुरुषसूक्त (मंडल 10, सूक्त 90) से मिलती-जुलती है।
- असमानता का स्पष्टीकरण: इस कथा में असमानता धन से आती है: धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी अपना सेवक बना सकता था।
किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों का वर्ण संबंधी रवैया दिखाती है।
पृष्ठ 71 — चारण ने सरदार को दानी बताने के लिए किस तरह के दाँव-पेंच अपनाए? धन अर्जित करने के लिए सरदार को क्या करना होता था जिससे वह उसका कुछ अंश चारण को दे सके? (स्रोत 14)
नमूना उत्तर — स्रोत 14 तमिल संगम साहित्य की पद्यावली पुरनानूरु (लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) से है:
- चारण के दाँव-पेंच: वह मान लेता है कि सरदार के पास रोज़ खर्च करने को धन नहीं, फिर कहता है कि सरदार इतना ओछा नहीं कि मना कर दे; उसे “चारणों की क्षुधा का शत्रु” बताता है।
- सरदार का धन: भूख से क्षीण पसलियाँ देखकर सरदार लोहार से युद्ध के लिए लंबा भाला बनवाएगा; यानी सरदार युद्ध से धन लाता था, ताकि उसका अंश चारणों को दे सके।
किताब में इस संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है।
पृष्ठ 71 — मूर्तिकार ने सरदार व उसके अनुयायी के बीच अंतर को कैसे दर्शाया है? (चित्र 3.7)
नमूना उत्तर — अमरावती (आंध्र प्रदेश) की इस पत्थर की मूर्ति (लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी) में अंतर तीन तरह से दिखाया गया है:
- आकार: सरदार बहुत बड़ा बना है और अनुयायी लगभग उसकी कमर तक।
- सजावट: सरदार के सिर पर ऊँची पगड़ी और गले में कई हार हैं।
- मुद्रा: सरदार का एक हाथ अनुयायी के सिर पर है।
इनसे दिखता है कि सरदार ऊँचे पद पर है और अनुयायी उसके अधीन।
पृष्ठ 76 — क्या आपको लगता है कि लाल की खोज और महाकाव्य में वर्णित हस्तिनापुर में समानता है। (स्रोत 15)
नमूना उत्तर — बहुत कम:
- महाकाव्य में: नगर समुद्र की भाँति भरा है, सैकड़ों प्रासादों वाला है, और इंद्र की नगरी के समान है।
- बी.बी. लाल की खोज (1951-52): दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.) पर मिट्टी की दीवारें और कच्ची ईंटें; तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.) पर कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, शोषक-घट, ईंटों के नाले और वलय-कूप।
लाल के विवरण में साधारण घर हैं, सैकड़ों प्रासाद नहीं; हाँ, उत्खनन सीमित क्षेत्र में ही हुआ था।
पृष्ठ 76 — आपको क्यों लगता है कि लेखक(कों) ने एक ही प्रकरण के लिए तीन स्पष्टीकरण प्रस्तुत किए? (स्रोत 16)
नमूना उत्तर — द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण हैं:
- कुंती की आज्ञा।
- व्यास का कथन कि पांडव इंद्र के अवतार थे।
- शिव से पाँच बार पति का वर।
किताब (पृष्ठ 77) के अनुसार इस प्रकरण के विभिन्न स्पष्टीकरण यह भी व्यंजित करते हैं कि समय के साथ बहुपति प्रथा धीरे-धीरे लोगों के बीच अमान्य होती चली गई। इसलिए लगता है कि लेखकों को इसके लिए एक से अधिक कारण देने पड़े।
सावधानी
- वर्ण और जाति, किताब के शब्दों में: यह अध्याय वही इतिहास पढ़ाता है जो ग्रंथ बताते हैं। जहाँ किताब किसी बात को मानदंड कहती है, वहाँ “ग्रंथों के अनुसार” या “शास्त्रों के अनुसार” कहिए। आज की किसी जाति या समुदाय का नाम कक्षा में मत लीजिए।
- वर्ण जन्म से या कर्म से? किताब (पृष्ठ 61) ग्रंथों के अनुसार वर्ण को योग्यता और कार्य से जोड़ती है, और स्रोत 6 आरंभिक वैदिक समाज में व्यवसायों का लचीलापन दिखाता है। बच्चे पूछें कि जन्म कब जुड़ा, तो क्रम बताइए: ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल पुरुषसूक्त में आते हैं, और यह सूक्त ऋग्वेद के सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था (IGNOU, इकाई 4)। ब्राह्मण स्वयं को “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” और सबसे श्रेष्ठ बताते थे (स्रोत 13, पृष्ठ 70); लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।
- स्रोतों की तुलना, बच्चों की नहीं: कोई खेल या अभिनय ऐसा न हो जो बच्चों को किसी वर्ण, जाति या चाण्डाल की भूमिका में खड़ा करे; बैठने या दल बनाने में भी वर्ण का कोई आधार न हो। हर गतिविधि एक ग्रंथ के नियम को किसी अभिलेख या कथा के साक्ष्य से मिलाए। इस विषय पर कोई मज़ाक नहीं।
- जब बच्चा आज की जाति की बात छेड़े: साफ़ कहिए: भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और किसी भी रूप में उसके आचरण का निषेध करता है। फिर बात किताब के स्रोतों पर लौटाइए।
- किताब की छपाई की भूलें: स्रोत 4 की सूची (पाँचवीं पंक्ति: ‘हरिति–पुत्त’ छपा है, अंग्रेज़ी संस्करण में वसथि–पुत्त), स्रोत 14 का नाम (पुरनानूरु; किताब में ‘पुरुनारुरू’), पृष्ठ 55 के बॉक्स का ‘जाति’ (यहाँ ज्ञाति, बांधवों का बड़ा समूह), और कालरेखा 2 में वैन बियुटेनेन की मृत्यु का साल (1979; किताब में 1978)। बच्चों को सही बात बताइए, और किताब की भूल पर एक पंक्ति काफ़ी है।
- चित्र 3.3 (पृष्ठ 59): सातवाहन राजा और रानी की यह मूर्ति किसी शासक के गिने-चुने मूर्ति-चित्रणों में से एक है, लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू.; बच्चों से यह मत कहिए कि ऐसी मूर्तियाँ आम थीं। हिंदी किताब के कैप्शन में ‘बहुधा’ छपा है; अंग्रेज़ी संस्करण इसे गिने-चुने चित्रणों में से एक बताता है।
- “लगभग”, “संभवत:” और “शायद” न छूटें: अध्याय की लगभग हर तिथि अनुमान है; उत्तर में ये शब्द रखना सही इतिहास है, कमज़ोरी नहीं।
- हमारी ओर से — बोर्ड साझा है। नियम और व्यवहार वाला चार्ट, कालरेखा 1 और गोत्र वाली सातवाहन सूची चार्ट पेपर पर बनाइए, ताकि अगले कालांश में दोबारा न लिखना पड़े। प्रोजेक्टर न हो तो भी यह पूरा अध्याय किताब, बोर्ड और चार्ट से पढ़ाया जा सकता है।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- ब्राह्मणों ने लगभग 500 ई.पू. से धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में नियम बनाए, पर उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”; सातवाहन रानियाँ इसका सबसे साफ़ उदाहरण हैं (पृष्ठ 58–60)।
- पितृवंशिकता में पिता के बाद पुत्र अधिकारी थे; फिर भी पुत्र न होने पर कभी भाई और कभी बंधु-बांधव गद्दी पर बैठे, और कुछ विशेष परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों ने सत्ता संभाली (पृष्ठ 55–57)।
- शास्त्रों के अनुसार केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे, पर मौर्य, शुंग, कण्व, शक और सातवाहन दिखाते हैं कि सत्ता समर्थन और संसाधन से मिलती थी (पृष्ठ 62–63)।
- वर्ण चार थे, जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी; मंदसौर के रेशम बुनकर और मातंग जातक दिखाते हैं कि लोग तय जीविका और तय स्थान से आगे गए या उसे चुनौती दी (पृष्ठ 63–67)।
- सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का नियंत्रण था, पर स्त्रीधन पर स्त्री का स्वामित्व था; बौद्धों ने जन्म पर आधारित प्रतिष्ठा अस्वीकार की, और सुत्तपिटक के मिथक में राजा (महासम्मत्त) को सब लोगों ने चुना (पृष्ठ 68–72)।
- महाभारत एक लाख श्लोकों से अधिक का ग्रंथ है, जो लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक बनता रहा; समालोचनात्मक संस्करण (1919 से, सैंतालीस वर्ष) और हस्तिनापुर का उत्खनन (1951-52) इसे परखने के दो तरीके हैं (पृष्ठ 53–54, 74–76)।
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़।