यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं। आँकड़े किताब के हैं।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (प्रश्न 1–13) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
अध्याय के दो भाग हैं: पहले में मुद्रा, दूसरे में साख (ऋण)। दोनों को बैंक जोड़ते हैं।
अध्याय के दो भाग, बीच में बैंक
अध्याय की तीन बड़ी बातें:
- मुद्रा विनिमय का माध्यम है: यह आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत ख़त्म कर देती है। आज मुद्रा के आधुनिक रूप करेंसी और माँग जमा हैं, और ये बैंक प्रणाली से जुड़े हैं।
- ऋण मदद भी कर सकता है और फँसा भी सकता है: सलीम की कमाई ऋण से बढ़ी, जबकि फसल बर्बाद होने पर स्वप्ना कर्ज़ में फँस गई। ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के जोखिम पर निर्भर है।
- सस्ता ऋण सबको चाहिए: औपचारिक स्रोत (बैंक, सहकारी समितियाँ) सस्ते हैं, पर इनसे ज़्यादातर अमीर परिवार ऋण पाते हैं; गरीब परिवार महँगे अनौपचारिक ऋण पर निर्भर हैं। रास्ता है औपचारिक ऋण का विस्तार और गरीबों तक उसका पहुँचना, जैसे स्वयं सहायता समूहों से।
2. ज़रूरी शब्द★
किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2, 3, 6, 12, 13 (इन्हीं शब्दों से उत्तर बनते हैं)
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| वस्तु विनिमय प्रणाली | मुद्रा के बिना, एक वस्तु के बदले सीधे दूसरी वस्तु का लेन-देन। | 39 |
| आवश्यकताओं का दोहरा संयोग | जो वस्तु एक व्यक्ति बेचना चाहता है, वही दूसरा ख़रीदना चाहे, और दूसरा जो बेचना चाहता है, वह पहला ख़रीदना चाहे। वस्तु विनिमय में यह ज़रूरी है। | 39 |
| विनिमय का माध्यम | लेन-देन के बीच की कड़ी। मुद्रा यही काम करती है, इसलिए उसे विनिमय का माध्यम कहते हैं। | 40 |
| करेंसी | मुद्रा के आधुनिक रूप: कागज़ के नोट और सिक्के। | 40 |
| निक्षेप (जमा) | लोगों का वह पैसा जो वे बैंक में अपने नाम का खाता खोलकर रखते हैं। बैंक इस पर सूद (ब्याज) देता है। | 40 |
| माँग जमा | बैंक खाते का वह जमा जिसे माँगने पर निकाला जा सकता है। इसे भी मुद्रा माना जाता है। | 40–41 |
| चैक | एक कागज़ जो बैंक को आदेश देता है कि खाताधारक के खाते से चैक पर लिखे नाम वाले व्यक्ति को एक ख़ास रकम दी जाए। | 41 |
| ऋण (उधार), साख | एक सहमति, जिसमें उधार देने वाला कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ देता है, और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा लेता है। | 43 |
| कार्यशील पूँजी | उत्पादन के रोज़ के खर्च (कच्चा माल, मज़दूरी) चलाने के लिए चाहिए पैसा; सलीम ने यह ज़रूरत ऋण से पूरी की। | 43 |
| कर्ज–ज़ाल (ऋण–जाल) | ऐसी हालत जिसमें ऋण कमाई बढ़ाने के बजाय स्थिति बदतर कर दे और कर्ज़दार उससे आसानी से बाहर न निकल सके। | 44, 49 |
| समर्थक ऋणाधार | कर्ज़दार की अपनी संपत्ति (भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में जमा पूँजी), जिसे वह ऋण चुकने तक गारंटी के रूप में उधारदाता के पास रखता है। | 44 |
| ऋण की शर्तें | ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके, सब मिलाकर। | 45 |
| सहकारी समिति | सदस्य अपने संसाधन मिलाकर एक-दूसरे की मदद करते हैं; कृषक सहकारी समिति अपने सदस्यों को सस्ता ऋण देती है। | 47 |
| औपचारिक क्षेत्रक ऋण | बैंकों और सहकारी समितियों से लिया गया ऋण; इन पर भारतीय रिज़र्व बैंक नज़र रखता है। | 48 |
| अनौपचारिक क्षेत्रक ऋण | साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त इत्यादि से लिया गया ऋण; इनकी देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं। | 48 |
| स्वयं सहायता समूह | 15–20 पड़ोसियों (ख़ासकर गरीब महिलाओं) का समूह, जो नियमित बचत करता है और सदस्यों को कर्ज़ देता है। | 51 |
| विमुद्रीकरण | पुराने करेंसी नोटों को अमान्य घोषित करके उन्हें नए नोटों से बदलना। | 38 |
3. मुद्रा: विनिमय का माध्यम★★
पृष्ठ 39–40 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 2
किताब का उदाहरण: एक जूता निर्माता जूते बेचकर गेहूँ ख़रीदना चाहता है।
जूते के बदले गेहूँ
- वस्तु विनिमय प्रणाली में, जहाँ मुद्रा के बिना वस्तुओं का विनिमय होता है, आवश्यकताओं का दोहरा संयोग होना ज़रूरी है। किताब के चित्र में यही मुश्किल दिखती है: गेहूँ वाले को जूते नहीं, कपड़े चाहिए; और जिसे जूते चाहिए, उसके पास गेहूँ नहीं।
- मुद्रा वाली अर्थव्यवस्था में जिसके पास मुद्रा है, वह उससे कोई भी वस्तु या सेवा आसानी से ख़रीद सकता है। इसलिए हर कोई भुगतान मुद्रा में लेना पसंद करता है।
- हमारे बहुत से लेन-देन में वस्तुएँ और सेवाएँ मुद्रा से ख़रीदी-बेची जाती हैं। कुछ में उस समय मुद्रा नहीं दी जाती, बस बाद में भुगतान का वादा होता है।
मुद्रा का बदलता रूप (पृष्ठ 40):
| कब | मुद्रा के रूप में क्या चला |
|---|---|
| बहुत प्रारंभिक काल से | भारतीय अनाज और पशु का मुद्रा के रूप में इस्तेमाल करते थे |
| इसके बाद, पिछली सदी तक | सोना, चाँदी और ताँबे जैसी धातुओं के सिक्के |
| आज | करेंसी: कागज़ के नोट और सिक्के; और बैंकों में माँग जमा |
किताब के पृष्ठ 40 पर सिक्कों की तस्वीरें हैं: प्रारम्भिक आहत सिक्के (लगभग 2500 वर्ष पुराने), गुप्तकालीन सिक्के, तुगलक के सिक्के, अकबर कालीन सोने की मोहर और आधुनिक सिक्का।
4. मुद्रा के आधुनिक रूप: करेंसी और माँग जमा★★
पृष्ठ 40–41 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 12 (ग)
करेंसी:
- आधुनिक मुद्रा सोने, चाँदी या ताँबे से नहीं बनी, और अनाज या पशुओं की तरह रोज़ के काम की चीज़ भी नहीं है। उसका अपना कोई इस्तेमाल नहीं है।
- फिर भी उसे विनिमय का माध्यम इसलिए स्वीकार किया जाता है, क्योंकि देश की सरकार उसे प्राधिकृत करती है।
- भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से करेंसी नोट जारी करता है। कानून के अनुसार किसी और व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं है।
- कानून रुपये को विनिमय के माध्यम की वैधता देता है: भारत में कोई व्यक्ति कानूनी तौर पर रुपयों में अदायगी को अस्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए रुपया हर जगह स्वीकार होता है।
बैंकों में निक्षेप और माँग जमा:
- लोगों को रोज़ के खर्च के लिए थोड़ी ही करेंसी चाहिए। जैसे महीने के आख़िर में वेतन पाने वाले मज़दूरों के पास अतिरिक्त नकद होता है। वे इसे बैंक में अपने नाम का खाता खोलकर जमा कर देते हैं।
- बैंक इस जमा पर सूद देता है, पैसा सुरक्षित रहता है, और ज़रूरत पर इसमें से निकाला जा सकता है।
- क्योंकि यह जमा माँगने पर निकाला जा सकता है, इसे माँग जमा कहते हैं।
चैक, और माँग जमा मुद्रा क्यों है:
- खाताधारक एक निश्चित रकम का चैक काटता है। चैक बैंक को आदेश है कि उसके खाते से चैक पर लिखे नाम वाले व्यक्ति को वह रकम दी जाए।
- किताब का उदाहरण: जूता निर्माता एम. सलीम चमड़ा आपूर्तिकर्ता को चैक देता है। आपूर्तिकर्ता उसे अपने बैंक खाते में जमा करता है, और कुछ दिनों में धन एक खाते से दूसरे में चला जाता है। लेन-देन बिना नकद के पूरा हो जाता है।
- माँग जमा के बदले चैक लिखकर बिना नकद सीधा भुगतान हो सकता है। माँग जमा को करेंसी की तरह ही भुगतान का माध्यम माना जाता है, इसलिए आधुनिक अर्थव्यवस्था में माँग जमा भी मुद्रा है। इसमें मुद्रा के ज़रूरी लक्षण मिलते हैं।
- बैंक न हों तो न माँग जमा होगा, न उसके बदले भुगतान। इसलिए मुद्रा के आधुनिक रूप, करेंसी और जमा, आधुनिक बैंक प्रणाली से बहुत क़रीब से जुड़े हैं।
| करेंसी | माँग जमा | |
|---|---|---|
| रूप | कागज़ के नोट और सिक्के | बैंक खाते में जमा पैसा |
| कौन जारी करता है / कहाँ रहता है | भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय सरकार की तरफ़ से | बैंक में, खाताधारक के नाम से |
| भुगतान कैसे | नकद देकर | चैक से, बिना नकद |
शिक्षक के लिए निर्देश में (पृष्ठ 38): भारत में नवंबर 2016 में 500 और 1000 रुपये के करेंसी नोट अमान्य घोषित किए गए, और लोगों को उनके बदले 500 तथा 2000 रुपये के नए नोट लेने को कहा गया। इसे विमुद्रीकरण कहते हैं। तब से नकदी की जगह बैंक जमा के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया गया: बैंक से बैंक हस्तांतरण, इंटरनेट, मोबाइल फ़ोन, चैक, ए.टी.एम. कार्ड, दुकानों पर पी.ओ.एस. मशीन, और यू.पी.आई. से क्यू.आर. कोड द्वारा भुगतान; मकसद था नकदी की ज़रूरत कम करना और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण। यही पृष्ठ बताता है कि प्लास्टिक कार्ड लेन-देन में काम आते हैं, लेकिन वे अपने आप में मुद्रा नहीं हैं।
5. बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ★★
पृष्ठ 42 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 3, 12 (घ)
बैंक: जमाकर्ता और कर्ज़दार के बीच
- थोड़ा नकद, बाकी ऋण में: आजकल भारत में बैंक जमा का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा नकद के रूप में अपने पास रखते हैं। यह इसलिए काफ़ी है, क्योंकि किसी एक दिन केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने आते हैं।
- बड़ा भाग ऋण में: विभिन्न आर्थिक गतिविधियों के लिए ऋण की बहुत माँग रहती है, और बैंक जमा राशि के बड़े भाग से यही माँग पूरी करते हैं।
- मध्यस्थता: इस तरह बैंक उन लोगों (जमाकर्ता) के बीच, जिनके पास अतिरिक्त राशि है, और उन लोगों (कर्ज़दार) के बीच, जिन्हें राशि चाहिए, मध्यस्थता करते हैं।
- आय: बैंक जमा पर जितना ब्याज देते हैं, उससे ज़्यादा ऋण पर लेते हैं। कर्ज़दारों से लिए गए और जमाकर्ताओं को दिए गए ब्याज का अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है।
6. साख की दो स्थितियाँ: सलीम और स्वप्ना★★
पृष्ठ 43–44 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 1, 9
ऋण (उधार) एक सहमति है, जिसमें उधार देने वाला कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ देता है और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा लेता है। किताब दो उदाहरणों से दिखाती है कि ऋण की भूमिका क्या होती है।
ऋण की दो स्थितियाँ
सलीम (त्यौहार का मौसम): उसे अतिरिक्त मज़दूर रखने और कच्चा माल ख़रीदने के लिए पैसा चाहिए था। पहले, उसने चमड़ा व्यापारी से चमड़ा अभी लेकर भुगतान बाद में करने का वादा किया। दूसरे, बड़े व्यापारी से 1000 जूतों के लिए अग्रिम भुगतान के रूप में नकद कर्ज़ लिया। ऋण से उसकी कार्यशील पूँजी की ज़रूरत पूरी हुई, उत्पादन समय पर हुआ और कमाई बढ़ी। किताब का निष्कर्ष: “इस प्रकार ऋण एक महत्त्वपूर्ण तथा सकारात्मक भूमिका अदा करता है।”
स्वप्ना की समस्या: वह साहूकार से ऋण लेती है, इस उम्मीद में कि फसल तैयार होने पर चुका देगी। महँगी कीटनाशक दवाइयाँ छिड़कने पर भी फसल बर्बाद हो जाती है। कर्ज़ नहीं चुकता और साल भर में बड़ी रकम बन जाता है। अगले साल फसल सामान्य रहती है, पर इतनी कमाई नहीं होती कि कर्ज़ चुके। आख़िर उसे ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ता है। इसे आम भाषा में कर्ज–ज़ाल कहा जाता है: “इस मामले में ऋण कर्जदार को ऐसी परिस्थिति में धकेल देता है, जहाँ से बाहर निकलना काफी कष्टदायक होता है।”
गाँव में ऋण की ज़रूरत: ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य माँग फसल उगाने के लिए होती है: बीज, खाद, कीटनाशक दवाएँ, पानी, बिजली, उपकरणों की मरम्मत। इन आगतों की ख़रीद और फसल की बिक्री के बीच कम से कम 3–4 महीने का अंतराल होता है। किसान ऋतु के आरंभ में उधार लेते हैं और फसल के बाद लौटाते हैं, यानी अदायगी मुख्यतः फसल की कमाई पर निर्भर है।
सबसे ज़रूरी बात: “ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के खतरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।” स्वप्ना की फसल बर्बाद हुई, तो वह ऋण नहीं चुका पाई।
7. ऋण की शर्तें★★
पृष्ठ 44–45 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 7, 10, 11 (क), 12 (ङ)
हर ऋण समझौते में चार बातें तय होती हैं। इन्हें मिलाकर ऋण की शर्तें कहते हैं:
- ब्याज दर: कर्ज़दार मूल रकम के साथ यह ब्याज चुकाता है।
- समर्थक ऋणाधार: उधारदाता गिरवी के लिए कर्ज़दार की कोई संपत्ति माँग सकता है, जैसे भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में जमा पूँजी। ऋण चुकने तक यह गारंटी रहती है। कर्ज़दार उधार न लौटा पाए, तो उधारदाता को यह संपत्ति बेचकर भुगतान लेने का अधिकार होता है।
- आवश्यक कागज़ात: जैसे नौकरी और वेतन का रिकार्ड।
- भुगतान के तरीके: जैसे मासिक किश्तें, या फसल के बाद एक साथ।
ऋण की शर्तें एक ऋण व्यवस्था से दूसरी में बहुत बदल जाती हैं, और उधारदाता और कर्ज़दार की प्रकृति पर भी निर्भर करती हैं।
किताब का उदाहरण, मेघा का आवास ऋण (पृष्ठ 45 की तालिका भरी हुई):
| ऋण की बात | मेघा के ऋण में |
|---|---|
| ऋण राशि (रुपये में) | 5 लाख रुपये (5,00,000) |
| ऋण–अवधि | 10 साल |
| आवश्यक कागज़ात | नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड |
| ब्याज दर | 12 प्रतिशत वार्षिक |
| अदायगी का स्वरूप | मासिक किश्तें |
| समर्थक ऋणाधार | नए घर के सभी कागज़, जो ब्याज समेत कर्ज़ लौटाने पर वापस मिलेंगे |
8. सोनपुर: एक गाँव में ऋण के अलग-अलग प्रबंध★
पृष्ठ 46–47 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 11 (ख, ग)
रोहित और रंजन ने 15 नवम्बर 2019 को अपने गाँव सोनपुर (जहाँ सिंचाई की सुविधा है और आलू की फसल लगी है) में लोगों से बात की:
| व्यक्ति | कौन | ऋण किससे | ब्याज | और शर्तें |
|---|---|---|---|---|
| श्यामल | छोटा किसान, 1.5 एकड़ ज़मीन | पहले गाँव का महाजन; अब एक कृषि व्यापारी | महाजन: 5 प्रतिशत मासिक (60 प्रतिशत वार्षिक); व्यापारी: 3 प्रतिशत मासिक | व्यापारी जुताई के समय आगतें उधार देता है, फसल पर वापसी; श्यामल को फसल उसी व्यापारी को बेचने का वादा करना पड़ता है |
| अरुण | 7 एकड़ ज़मीन | बैंक | 8.5 प्रतिशत वार्षिक | अगले तीन वर्षों में कभी भी लौटा सकता है; आलू शीत भंडार गृह में रखकर बैंक से नया ऋण लेना चाहता है |
| रमा | भूमिहीन कृषि मज़दूर | अपना मालिक, एक मध्यवर्गीय भूस्वामी | 5 प्रतिशत मासिक | कर्ज़ भूस्वामी के यहाँ काम करके चुकाती है; पुराना चुकने से पहले नया लेना पड़ता है; अभी 5,000 रुपये बाकी |
- व्यापारी की कमाई: फसल कटते समय कीमतें कम होती हैं। व्यापारी किसानों से सस्ते में फसल ख़रीदकर बाद में कीमत बढ़ने पर बेचता है और भारी मुनाफ़ा कमाता है।
- रमा: साल में कई महीने उसके पास काम नहीं होता, इसलिए रोज़ के खर्च, बीमारी और समारोह के लिए भी कर्ज़ लेना पड़ता है। भूस्वामी अच्छा व्यवहार नहीं करता, फिर भी वह उसके लिए काम करती रहती है, ताकि ज़रूरत पर ऋण मिल सके। सोनपुर में भूमिहीन लोगों के लिए ऋण का एकमात्र स्रोत भूस्वामी-नियोक्ता ही है।
सहकारी समितियों से ऋण (पृष्ठ 47): बैंकों के अलावा ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते ऋण का दूसरा स्रोत सहकारी समितियाँ हैं। सोनपुर के पास के एक गाँव की कृषक सहकारी समिति के 2300 किसान सदस्य हैं। यह सदस्यों से जमा लेती है, उसी जमा को ऋणाधार मानकर बैंक से बड़ा ऋण लेती है, और उससे सदस्यों को कर्ज़ देती है। एक ऋण लौटने पर कर्ज़ का अगला दौर शुरू होता है। यह कृषि उपकरण ख़रीदने, खेती और कृषि व्यापार, मछली पकड़ने, घर बनाने और दूसरे खर्चों के लिए ऋण देती है।
9. औपचारिक और अनौपचारिक साख★★
पृष्ठ 48–50 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 5, 8, 11 (ख), 12 (क, ख), 13 (ख)
ऋण के दो तरह के स्रोत
आलेख 1: ग्रामीण भारत में ऋण के स्रोत, 2019 (पृष्ठ 48)
| स्रोत | प्रतिशत | किस वर्ग का |
|---|---|---|
| व्यावसायिक बैंक | 51 | औपचारिक |
| सहकारी समितियाँ/बैंक | 10 | औपचारिक |
| अन्य औपचारिक एजेंसियाँ | 5 | औपचारिक |
| जमींदार | 1 | अनौपचारिक |
| साहूकार | 23 | अनौपचारिक |
| रिश्तेदार एवं मित्र | 7 | अनौपचारिक |
| अन्य अनौपचारिक एजेंसियाँ | 3 | अनौपचारिक |
ये आँकड़े राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अखिल भारतीय ऋण तथा निवेश सर्वेक्षण (77वाँ, 2019) से हैं (पृष्ठ 38)। ग्रामीण भारत में सबसे बड़ा स्रोत व्यावसायिक बैंक हैं, और उसके बाद साहूकार। औपचारिक टुकड़े जोड़ें तो 66 प्रतिशत, अनौपचारिक 34 प्रतिशत बनते हैं, यानी ग्रामीण ऋण का एक-तिहाई से ज़्यादा हिस्सा अब भी अनौपचारिक स्रोतों से आता है।
भारतीय रिज़र्व बैंक की नज़र (पृष्ठ 48):
- वह देखता है कि बैंक अपनी जमा का न्यूनतम नकद हिस्सा सचमुच अपने पास रख रहे हैं।
- वह देखता है कि बैंक सिर्फ़ लाभ कमाने वाले व्यवसायियों और व्यापारियों को नहीं, छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और छोटे कर्ज़दारों को भी ऋण दे रहे हैं।
- बैंकों को समय-समय पर उसे बताना पड़ता है कि वे कितना ऋण, किनको, और किस ब्याज दर पर दे रहे हैं।
इसके उलट, “अनौपचारिक क्षेत्रक में ऋणदाताओं की गतिविधियों की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं है।” वे मनमानी दरों पर ऋण दे सकते हैं, और उन्हें नाजायज़ तरीकों से पैसा वसूलने से कोई नहीं रोकता।
अनौपचारिक ऋण महँगा क्यों पड़ता है (पृष्ठ 49):
- अनौपचारिक क्षेत्रक के ज़्यादातर ऋणदाता औपचारिक ऋणदाताओं से कहीं अधिक ब्याज लेते हैं।
- ऋण की ऊँची लागत से कर्ज़दार की आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में चला जाता है, अपने लिए कम बचता है (सोनपुर के श्यामल की तरह)।
- कभी-कभी चुकाने की रकम आय से भी ज़्यादा हो जाती है; ऋण का बोझ बढ़ता है (सोनपुर की रमा की तरह) और व्यक्ति ऋण–जाल में फँस जाता है।
- जो लोग कर्ज़ लेकर अपना उद्यम शुरू करना चाहते हैं, वे ऊँची लागत देखकर पीछे हट सकते हैं।
इसलिए बैंकों और सहकारी समितियों को ज़्यादा कर्ज़ देना चाहिए, ताकि लोग फसल उगा सकें, कारोबार कर सकें, छोटे उद्योग लगा सकें। किताब के शब्दों में: “सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है।”
आलेख 2: शहरी परिवारों द्वारा लिए गए कुल ऋण में औपचारिक और अनौपचारिक हिस्सा (पृष्ठ 49)
| परिवार | औपचारिक (%) | अनौपचारिक (%) |
|---|---|---|
| गरीब परिवार | 46 | 54 |
| कम संपत्ति वाले परिवार | 62 | 38 |
| समृद्ध परिवार | 73 | 27 |
| अमीर परिवार | 83 | 17 |
किताब इससे यह निकालती है: शहरों के गरीब परिवारों की 54 प्रतिशत ऋण ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं, जबकि अमीर परिवारों के केवल 17 प्रतिशत; उनके 83 प्रतिशत ऋण औपचारिक स्रोतों से हैं। गाँवों में भी यही तस्वीर है: अमीर परिवार औपचारिक ऋणदाताओं से सस्ता ऋण ले रहे हैं, जबकि गरीब परिवारों को कर्ज़ के लिए बहुत सारा पैसा देना पड़ता है।
किताब के दो निष्कर्ष (पृष्ठ 49–50):
- औपचारिक ऋण बढ़े: आलेख 1 के अनुसार ग्रामीण ऋण का 66 प्रतिशत औपचारिक स्रोतों से आता है और बाकी 34 प्रतिशत अब भी अनौपचारिक स्रोतों से (किताब के पाठ में यहाँ “केवल 50 प्रतिशत” छपा है, जो आलेख 1 के आँकड़ों से मेल नहीं खाता)। अनौपचारिक स्रोतों की ब्याज दरें बहुत ऊँची हैं और जो आय बढ़ाने में कम ही मदद करते हैं। इसलिए बैंकों और सहकारी समितियों को अपनी गतिविधियाँ, ख़ासकर गाँवों में, बढ़ानी चाहिए।
- औपचारिक ऋण सबको मिले: आज अमीर परिवार ही औपचारिक स्रोतों से ऋण पाते हैं और गरीब अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर हैं। औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण ज़रूरी है, ताकि गरीब परिवार भी सस्ते ऋण का फ़ायदा उठा सकें।
10. स्वयं सहायता समूह: बिना ऋणाधार के ऋण★★
पृष्ठ 50–52 · किताब की प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 9, 11 (घ), 13 (क)
गरीब बैंक तक क्यों नहीं पहुँचते (पृष्ठ 50–51): भारत के सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक नहीं हैं। जहाँ हैं, वहाँ भी बैंक से कर्ज़ लेना मुश्किल है, क्योंकि ऋणाधार और विशेष कागज़ात चाहिए (मेघा का उदाहरण)। ऋणाधार का न होना गरीबों के बैंक से ऋण न ले पाने का एक प्रमुख कारण है। साहूकार उन्हें निजी तौर पर जानते हैं और अक्सर बिना ऋणाधार भी ऋण दे देते हैं, पर ब्याज बहुत ऊँचा रखते हैं, लेन-देन की लिखा-पढ़ी पूरी नहीं करते और गरीब कर्ज़दारों को तंग करते हैं।
स्वयं सहायता समूह कैसे काम करता है
- फ़ैसले सदस्य ख़ुद लेते हैं: बचत और ऋण के ज़्यादातर ज़रूरी निर्णय, जैसे ऋण का लक्ष्य, रकम, ब्याज दर और लौटाने की अवधि, समूह के सदस्य तय करते हैं।
- ज़िम्मेदारी समूह की: एक भी सदस्य ऋण न लौटाए, तो बाकी सदस्य इसे गंभीरता से लेते हैं। इसी कारण बैंक बिना ऋणाधार के भी संगठित गरीब महिलाओं को ऋण देने को तैयार हो जाते हैं।
- फ़ायदे: ऋणाधार की कमी की समस्या दूर होती है; समय पर, उचित ब्याज दर पर ऋण मिलता है; ग्रामीण गरीब संगठित होते हैं; महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनती हैं; और नियमित बैठकों में स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा जैसे सामाजिक विषयों पर चर्चा का मंच मिलता है।
बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक (पृष्ठ 52): इसने गरीबों की ऋण ज़रूरतें उचित ब्याज दरों पर पूरी करने में बड़ी सफलता पाई है। इसकी शुरुआत 1970 के दशक में छोटे पैमाने पर हुई। 2018 में इसके 90 लाख से ज़्यादा सदस्य थे, जो बांग्लादेश के 81,600 गाँवों में फैले थे (हिंदी छपी किताब में ‘1970 में’ और ‘9 लाख’ छपा है; अंग्रेज़ी संस्करण में 1970s और 9 million, यानी 90 लाख)। इससे ऋण लेने वाली ज़्यादातर महिलाएँ समाज के गरीब तबके से हैं। उन्होंने दिखाया कि गरीब महिलाएँ भरोसेमंद कर्ज़दार हैं और छोटी आय वाली गतिविधियाँ सफलता से शुरू करके चला सकती हैं।
ग्रामीण बैंक के संस्थापक प्रो. मोहम्मद युनूस को 2006 में शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। उनके शब्द, जैसे किताब में छपे हैं: “अगर गरीब लोगों को सही और उचित शर्तों पर ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है, तो लाखों छोटे लोग अपनी लाखों छोटी–छोटी गतिविधियों के ज़रिए विकास का सबसे बड़ा चमत्कार कर सकते हैं।”
11. आँकड़े और साल एक जगह★
| आँकड़ा या साल | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| नवंबर 2016 · 500 और 1000 · 500 और 2000 | विमुद्रीकरण: अमान्य हुए नोट · नए नोट | 38 |
| लगभग 2500 वर्ष | प्रारम्भिक आहत सिक्कों की उम्र (चित्र का कैप्शन) | 40 |
| केवल 5 प्रतिशत | बैंक जमा का वह हिस्सा जो बैंक नकद रखते हैं | 42 |
| 20,000 रु. | सलीम नकद निकालना चाहता है (गतिविधि) | 42 |
| 3000 जोड़ी · 1000 जूते · एक महीना | सलीम का ऑर्डर · अग्रिम भुगतान वाले जूते · ऑर्डर पूरा करने का समय | 43 |
| 3 एकड़ | स्वप्ना की मूँगफली की ज़मीन | 43 |
| कम से कम 3–4 महीने | आगतें ख़रीदने और फसल बिकने के बीच का अंतराल | 44 |
| 6 साल | सलीम की स्थिति का अनुमान (गतिविधि) | 44 |
| 5 लाख रुपये · 12 प्रतिशत वार्षिक · 10 साल | मेघा का आवास ऋण | 45 |
| 15 नवम्बर 2019 | सोनपुर में बातचीत की तारीख़ | 46 |
| 1.5 एकड़ · 5% मासिक (60% वार्षिक) · 3% मासिक | श्यामल: ज़मीन · महाजन का ब्याज · व्यापारी का ब्याज | 46 |
| 7 एकड़ · 8.5% वार्षिक · तीन वर्ष | अरुण: ज़मीन · बैंक ऋण का ब्याज · लौटाने की अवधि | 46 |
| 5% मासिक · 5,000 रुपये | रमा: भूस्वामी का ब्याज · बकाया | 46 |
| 2300 | कृषक सहकारी समिति के किसान सदस्य | 47 |
| 51 · 10 · 5 | आलेख 1 (ग्रामीण, 2019), औपचारिक %: व्यावसायिक बैंक · सहकारी समितियाँ/बैंक · अन्य औपचारिक | 48 |
| 1 · 23 · 7 · 3 | आलेख 1, अनौपचारिक %: जमींदार · साहूकार · रिश्तेदार एवं मित्र · अन्य अनौपचारिक | 48 |
| 46/54 · 62/38 · 73/27 · 83/17 | आलेख 2 (शहरी), औपचारिक/अनौपचारिक %: गरीब · कम संपत्ति वाले · समृद्ध · अमीर | 49 |
| 15–20 · 25 से 100 रुपए या अधिक · एक या दो वर्ष | स्वयं सहायता समूह: सदस्य · प्रति व्यक्ति बचत · बैंक ऋण के योग्य होने का समय | 51 |
| 81,600 | ग्रामीण बैंक के गाँव (2018) | 52 |
| 2006 | प्रो. मोहम्मद युनूस को शांति का नोबेल पुरस्कार | 52 |
| 80 प्रतिशत | भारत में छोटे किसान (प्रश्न 11) | 53 |
12. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बैंक जमा का ज़्यादातर पैसा तिजोरी में नकद रखते हैं | केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं; बड़े भाग से ऋण देते हैं | 42 |
| आधुनिक मुद्रा इसलिए चलती है क्योंकि वह क़ीमती धातु की है | उसका अपना कोई इस्तेमाल नहीं; सरकार उसे प्राधिकृत करती है, इसलिए स्वीकार होती है | 40 |
| कोई भी बैंक अपने नोट छाप सकता है | भारत में केवल भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय सरकार की तरफ़ से, करेंसी नोट जारी करता है | 40 |
| चैक ख़ुद मुद्रा है | चैक बैंक को भुगतान का आदेश है; मुद्रा माँग जमा है | 41 |
| ए.टी.एम. या प्लास्टिक कार्ड मुद्रा है | कार्ड लेन-देन में काम आते हैं, पर अपने आप में मुद्रा नहीं हैं | 38 |
| ऋण हमेशा फ़ायदा देता है (या हमेशा नुक़सान) | सलीम को फ़ायदा, स्वप्ना को नुक़सान; यह परिस्थिति के जोखिम पर निर्भर है | 43–44 |
| सहकारी समितियाँ अनौपचारिक स्रोत हैं | बैंक और सहकारी समितियाँ, दोनों औपचारिक स्रोत हैं | 48 |
| मालिक या नियोक्ता से लिया ऋण औपचारिक है | मालिक, साहूकार, व्यापारी, रिश्तेदार, दोस्त अनौपचारिक स्रोत हैं | 48 |
| भारतीय रिज़र्व बैंक साहूकारों पर भी नज़र रखता है | वह औपचारिक स्रोतों पर नज़र रखता है; अनौपचारिक ऋणदाताओं की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं | 48 |
| बैंक का सस्ता ऋण सबसे ज़्यादा गरीबों को मिलता है | उल्टा: शहरों के अमीर परिवारों के 83 प्रतिशत ऋण औपचारिक हैं, गरीबों के 54 प्रतिशत ऋण अनौपचारिक | 49 |
| स्वयं सहायता समूह में फ़ैसले बैंक लेता है | बचत और ऋण के ज़्यादातर फ़ैसले सदस्य ख़ुद लेते हैं | 51 |
| स्वयं सहायता समूह को बैंक ऋण हर सदस्य के नाम पर देता है | ऋण समूह के नाम पर मिलता है; लौटाने की ज़िम्मेदारी समूह की है | 51 |
13. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
हर उत्तर पहले ख़ुद सोचिए, फिर खोलकर मिलाइए। प्रश्नावली किताब के पृष्ठ 52–53 पर है।
प्रश्न 1. जोखिम वाली परिस्थितियों में ऋण कर्ज़दार के लिए और समस्याएँ खड़ी कर सकता है। स्पष्ट कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थिति के खतरों और हानि होने पर मिलने वाले सहारे पर निर्भर करता है। स्वप्ना (पृष्ठ 43–44) ने मूँगफली की खेती के लिए साहूकार से ऋण लिया। कीटनाशकों के हमले से फसल बर्बाद हो गई, कर्ज़ नहीं चुका और साल भर में बड़ी रकम बन गया। अगले साल फसल सामान्य रही, फिर भी कर्ज़ नहीं चुका, और उसे ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचना पड़ा। यानी ऋण ने कमाई बढ़ाने के बजाय उसकी स्थिति बदतर कर दी। इसे कर्ज–ज़ाल कहते हैं। खेती में अदायगी फसल की कमाई पर टिकी होती है, इसलिए फसल का जोखिम सीधे कर्ज़दार पर आता है। ऊँचे ब्याज वाला अनौपचारिक ऋण यह ख़तरा और बढ़ा देता है, जैसे सोनपुर की रमा, जिसका ऋण बढ़ता जाता है (पृष्ठ 49)।
प्रश्न 2. मुद्रा आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की समस्या को किस तरह सुलझाती है? अपनी ओर से उदाहरण देकर समझाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: वस्तु विनिमय में दोनों पक्षों को एक-दूसरे की वस्तु चाहिए, यानी आवश्यकताओं का दोहरा संयोग। मान लीजिए एक कुम्हार घड़े देकर चावल लेना चाहता है। उसे ऐसा किसान ढूँढना होगा जिसके पास चावल भी हो और जिसे घड़े भी चाहिए; ऐसा मिलना मुश्किल है। मुद्रा हो तो कुम्हार घड़े किसी को भी बेचकर मुद्रा ले लेता है, और उस मुद्रा से किसी भी दुकानदार से चावल ख़रीद लेता है। मुद्रा बीच की कड़ी का काम करती है, इसलिए दोहरे संयोग की ज़रूरत ख़त्म हो जाती है। इसी कारण मुद्रा को विनिमय का माध्यम कहते हैं (पृष्ठ 39–40)।
प्रश्न 3. अतिरिक्त मुद्रा वाले लोगों और ज़रूरतमंद लोगों के बीच बैंक किस तरह मध्यस्थता करते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: जिन लोगों के पास अतिरिक्त धन है (जमाकर्ता), वे उसे बैंक में जमा करते हैं और ब्याज पाते हैं। बैंक इस जमा का केवल 5 प्रतिशत नकद रखते हैं, क्योंकि एक दिन में थोड़े ही जमाकर्ता पैसा निकालने आते हैं। जमा के बड़े भाग से बैंक उन लोगों (कर्ज़दारों) को ऋण देते हैं जिन्हें धन चाहिए। बैंक ऋण पर ज़्यादा ब्याज लेते हैं और जमा पर कम देते हैं; यह अंतर बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत है। इस तरह बैंक दोनों के बीच की कड़ी बनते हैं (पृष्ठ 42)।
प्रश्न 4. 10 रुपये के नोट को देखिए। इसके ऊपर क्या लिखा है? क्या आप इस कथन की व्याख्या कर सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: नोट पर भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर के हस्ताक्षर के साथ यह वचन छपा होता है: “मैं धारक को दस रुपये अदा करने का वचन देता हूँ”। साथ में लिखा होता है कि केंद्र सरकार इसकी गारंटी देती है (रिज़र्व बैंक: भारतीय मुद्रा, अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न)। इस वचन का मतलब है कि नोट रखने वाले के प्रति रिज़र्व बैंक की देनदारी है। व्याख्या (पृष्ठ 40):
- भारत में भारतीय रिज़र्व बैंक केंद्रीय सरकार की तरफ़ से करेंसी नोट जारी करता है; कानून किसी दूसरे व्यक्ति या संस्था को मुद्रा जारी करने की इजाज़त नहीं देता।
- नोट का अपना कोई इस्तेमाल नहीं है; वह विनिमय का माध्यम इसलिए है क्योंकि सरकार उसे प्राधिकृत करती है।
- कानून रुपये को वैधता देता है: भारत में कोई व्यक्ति रुपयों में अदायगी को कानूनी तौर पर अस्वीकार नहीं कर सकता।
यानी कागज़ का यह टुकड़ा इसलिए मूल्यवान है कि उसके पीछे सरकार और कानून खड़े हैं।
प्रश्न 5. हमें भारत में ऋण के औपचारिक स्रोतों को बढ़ाने की क्यों ज़रूरत है?
उत्तर देखिए
उत्तर: (पृष्ठ 48–50)
- अनौपचारिक ऋणदाता कहीं अधिक ब्याज लेते हैं, इसलिए कर्ज़दार की आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में चला जाता है।
- कभी चुकाने की रकम आय से भी बढ़ जाती है और व्यक्ति ऋण–जाल में फँस जाता है; ऊँची लागत देखकर लोग नया उद्यम शुरू करने से भी पीछे हट सकते हैं।
- अनौपचारिक ऋणदाताओं की देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं; वे मनमानी दरें और नाजायज़ तरीके अपना सकते हैं। औपचारिक स्रोतों पर भारतीय रिज़र्व बैंक नज़र रखता है।
- औपचारिक स्रोत अभी भी ग्रामीण परिवारों की सारी ऋण ज़रूरतें पूरी नहीं कर पाते; आलेख 1 (2019) में एक-तिहाई से ज़्यादा ग्रामीण ऋण अनौपचारिक स्रोतों से है।
- सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है: इससे लोग फसल उगा सकते हैं, कारोबार और छोटे उद्योग लगा सकते हैं, और आय बढ़ा सकते हैं।
प्रश्न 6. गरीबों के लिए स्वयं सहायता समूहों के संगठनों के पीछे मूल विचार क्या हैं? अपने शब्दों में व्याख्या कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: गरीबों के पास ऋणाधार नहीं होता, इसलिए बैंक उन्हें ऋण नहीं देते और वे महँगे साहूकारों पर निर्भर रहते हैं। स्वयं सहायता समूह इसी का हल है (पृष्ठ 50–51):
- ग्रामीण गरीबों, ख़ासकर महिलाओं, के 15–20 पड़ोसियों के छोटे समूह बनाना, जो नियमित बचत करें।
- उसी बचत से सदस्यों को साहूकार से कम ब्याज पर छोटे कर्ज़ देना।
- एक या दो वर्ष नियमित बचत के बाद समूह के नाम पर बैंक से ऋण दिलाना, बिना ऋणाधार के, क्योंकि लौटाने की ज़िम्मेदारी पूरे समूह की होती है।
- ऋण से सदस्यों के लिए स्वरोज़गार के अवसर बनाना; फ़ैसले सदस्य ख़ुद लें।
- गरीबों को संगठित करना, महिलाओं को आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनाना, और स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा जैसे विषयों पर चर्चा का मंच देना।
प्रश्न 7. क्या कारण हैं कि बैंक कुछ कर्ज़दारों को कर्ज़ देने के लिए तैयार नहीं होते?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- ऋणाधार नहीं: बैंक समर्थक ऋणाधार माँगते हैं, जो हर किसी के पास नहीं होता (पृष्ठ 47)। ऋणाधार की अनुपलब्धता ही गरीबों के बैंक से ऋण न ले पाने का प्रमुख कारण है (पृष्ठ 50)।
- कागज़ात नहीं: बैंक आवश्यक कागज़ात माँगते हैं, जैसे मेघा से नौकरी और वेतन का रिकार्ड (पृष्ठ 45)। अनियमित काम वालों के पास ऐसे कागज़ नहीं होते।
- अदायगी का भरोसा नहीं: बैंक को भरोसा चाहिए कि ऋण लौटेगा। जिनकी आय अनिश्चित है, जैसे छोटे किसान जिनकी अदायगी फसल पर टिकी है (पृष्ठ 44), उनमें बैंक को जोखिम दिखता है।
प्रश्न 8. भारतीय रिज़र्व बैंक अन्य बैंकों की गतिविधियों पर किस तरह नज़र रखता है? यह ज़रूरी क्यों है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कैसे (पृष्ठ 48):
- वह देखता है कि बैंक अपनी जमा का न्यूनतम नकद हिस्सा सचमुच अपने पास रखें।
- वह देखता है कि बैंक सिर्फ़ लाभ कमाने वाले व्यवसायियों और व्यापारियों को नहीं, छोटे किसानों, छोटे उद्योगों और छोटे कर्ज़दारों को भी ऋण दें।
- बैंकों को समय-समय पर उसे बताना पड़ता है कि वे कितना ऋण, किनको और किस ब्याज दर पर दे रहे हैं।
क्यों ज़रूरी: नकद हिस्सा रहे तो जमाकर्ता ज़रूरत पर अपना पैसा निकाल सकते हैं। और ऋण सिर्फ़ बड़े और अमीर कर्ज़दारों तक सीमित न रहे, बल्कि छोटे कर्ज़दारों को भी उचित ब्याज पर मिले। जहाँ ऐसी देखरेख नहीं होती, वहाँ (अनौपचारिक क्षेत्रक में) ऋणदाता मनमानी दरें लेते हैं और नाजायज़ तरीकों से वसूली कर सकते हैं।
प्रश्न 9. विकास में ऋण की भूमिका का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- सकारात्मक भूमिका: ऋण उत्पादन की कार्यशील पूँजी देता है। सलीम ने ऋण से समय पर ऑर्डर पूरा किया और कमाई बढ़ाई (पृष्ठ 43)। खेती में बीज, खाद, सिंचाई के खर्च भी ऋण से चलते हैं (पृष्ठ 44)।
- सस्ता ऋण ज़रूरी: सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है; इससे लोग फसल, कारोबार और छोटे उद्योग शुरू कर सकते हैं (पृष्ठ 49)।
- महँगा ऋण उल्टा असर करता है: ऊँचे ब्याज से आय ऋण चुकाने में चली जाती है, लोग ऋण–जाल में फँसते हैं (स्वप्ना, रमा), और उद्यम शुरू करने से पीछे हटते हैं (पृष्ठ 44, 49)।
- गरीबों तक पहुँच: अगर गरीबों को सही और उचित शर्तों पर ऋण मिले, तो लाखों छोटी गतिविधियों से विकास हो सकता है, जैसा प्रो. मोहम्मद युनूस कहते हैं (पृष्ठ 52)। इसलिए औपचारिक ऋण बढ़े और गरीबों को उसका हिस्सा बढ़े; किताब के सारांश के अनुसार ये दोनों कदम विकास के लिए ज़रूरी हैं।
प्रश्न 10. मानव को एक छोटा व्यवसाय करने के लिये ऋण की ज़रूरत है। मानव किस आधार पर यह निश्चित करेगा कि उसे यह ऋण बैंक से लेना चाहिये या साहूकार से? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: मानव दोनों की ऋण की शर्तें मिलाएगा: ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके (पृष्ठ 45)।
आधार बैंक साहूकार ब्याज दर कम बहुत ऊँची ऋणाधार और कागज़ात चाहिए अक्सर नहीं, क्योंकि वह कर्ज़दार को निजी तौर पर जानता है देखरेख भारतीय रिज़र्व बैंक नज़र रखता है कोई संस्था नहीं; लिखा-पढ़ी अधूरी, तंग करने का डर ख़तरा कम लागत, आय का ज़्यादा हिस्सा मानव के पास बचेगा ऊँची लागत से ऋण–जाल का ख़तरा अगर मानव के पास ऋणाधार और कागज़ात हैं, तो बैंक का ऋण बेहतर है, क्योंकि सस्ता है और व्यवसाय की कमाई का बड़ा हिस्सा उसके पास रहेगा। साहूकार का ऋण आसान दिखता है, पर महँगा है और उसे फँसा सकता है (पृष्ठ 48–51)।
प्रश्न 11. भारत में 80 प्रतिशत किसान छोटे किसान हैं, जिन्हें खेती करने के लिए ऋण की ज़रूरत होती है।
- (क) बैंक छोटे किसानों को ऋण देने से क्यों हिचकिचा सकते हैं?
- (ख) वे दूसरे स्रोत कौन हैं, जिनसे छोटे किसान कर्ज ले सकते हैं।
- (ग) उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए कि किस तरह ऋण की शर्तें छोटे किसानों के प्रतिकूल हो सकती हैं।
- (घ) सुझाव दीजिए कि किस तरह छोटे किसानों को सस्ता ऋण उपलब्ध कराया जा सकता है।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) छोटे किसानों के पास ऋणाधार के लिए थोड़ी ही ज़मीन या संपत्ति होती है, और आवश्यक कागज़ात भी कम होते हैं (पृष्ठ 44–45, 50)। उनकी अदायगी फसल की कमाई पर टिकी होती है, और फसल बर्बाद हो सकती है, जैसे स्वप्ना की (पृष्ठ 43–44)। इसलिए बैंक को ऋण न लौटने का जोखिम दिखता है।
- (ख) साहूकार या महाजन, कृषि व्यापारी, भूस्वामी या मालिक, रिश्तेदार और दोस्त (पृष्ठ 46, 48); इनके अलावा कृषक सहकारी समितियाँ (पृष्ठ 47) और स्वयं सहायता समूह (पृष्ठ 51)।
- (ग) सोनपुर के श्यामल (1.5 एकड़) को महाजन से 5 प्रतिशत मासिक, यानी 60 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पर ऋण लेना पड़ता था। अब व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक पर लेता है, पर फसल उसी व्यापारी को बेचने का वादा करना पड़ता है, जो कटाई के समय सस्ते में फसल ख़रीदकर बाद में महँगी बेचता है (पृष्ठ 46)। स्वप्ना को साहूकार का कर्ज़ चुकाने के लिए ज़मीन का हिस्सा बेचना पड़ा (पृष्ठ 43)। इसके मुक़ाबले 7 एकड़ वाले अरुण को बैंक से 8.5 प्रतिशत वार्षिक पर, तीन साल में लौटाने वाला ऋण मिला।
- (घ) बैंक और सहकारी समितियाँ अपनी गतिविधियाँ, ख़ासकर गाँवों में, बढ़ाएँ, और औपचारिक ऋण का अधिक समान वितरण हो (पृष्ठ 50); किसान कृषक सहकारी समितियों से जुड़ें, जो सदस्यों की जमा के आधार पर बैंक से ऋण लेकर सस्ता ऋण देती हैं (पृष्ठ 47); स्वयं सहायता समूह बनें, जिनसे बिना ऋणाधार बैंक ऋण मिलता है (पृष्ठ 51)।
प्रश्न 12. रिक्त स्थानों की पूर्ति करें:
- (क) …… परिवारों की ऋण की अधिकांश ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं।
- (ख) …… ऋण की लागत ऋण का बोझ बढ़ाती है।
- (ग) …… केन्द्रीय सरकार की ओर से करेंसी नोट जारी करता है।
- (घ) बैंक …… पर देने वाले ब्याज से ऋण पर अधिक ब्याज लेते हैं।
- (ङ) …… सम्पत्ति है जिसका मालिक कर्ज़दार होता है जिसे वह ऋण लेने के लिए गारंटी के रूप में इस्तेमाल करता है, जब तक ऋण चुकता नहीं हो जाता।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) गरीब। शहरों के गरीब परिवारों की 54 प्रतिशत ऋण ज़रूरतें अनौपचारिक स्रोतों से पूरी होती हैं (पृष्ठ 49)।
- (ख) ऊँची। (पृष्ठ 49)
- (ग) भारतीय रिज़र्व बैंक। (पृष्ठ 40)
- (घ) जमा। (पृष्ठ 42)
- (ङ) समर्थक ऋणाधार। (पृष्ठ 44)
प्रश्न 13. सही उत्तर का चयन करें:
(क) स्वयं सहायता समूह में बचत और ऋण संबंधित अधिकतर निर्णय लिए जाते हैं:
- बैंक द्वारा
- सदस्यों द्वारा
- गैर सरकारी संस्था द्वारा
(ख) ऋण के औपचारिक स्रोतों में शामिल नहीं है:
- बैंक
- सहकारी समिति
- नियोक्ता
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) सदस्यों द्वारा। बचत और ऋण के ज़्यादातर ज़रूरी निर्णय समूह के सदस्य ख़ुद लेते हैं (पृष्ठ 51)।
- (ख) नियोक्ता। बैंक और सहकारी समितियाँ औपचारिक हैं; मालिक या नियोक्ता अनौपचारिक स्रोत है (पृष्ठ 48), जैसे रमा का भूस्वामी-नियोक्ता।
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
किताब का सवाल (पृष्ठ 39). अपने चारों ओर देखिए: किसी एक दिन में मुद्रा से जुड़े कई सौदे दिखेंगे। क्या आप उनकी सूची बना सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: अपनी सूची ख़ुद बनाइए, जैसे दूध और सब्ज़ी ख़रीदना, बस या ऑटो का किराया, नाई या दर्ज़ी को भुगतान, दुकान से कॉपी-पेन ख़रीदना। फिर बाँटिए: किनमें मुद्रा से वस्तु ख़रीदी गई, किनमें मुद्रा के बदले सेवा मिली, और किनमें उस समय मुद्रा नहीं दी गई, बस बाद में भुगतान का वादा हुआ (जैसे दुकान पर उधार खाता)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 40), 1. मुद्रा के प्रयोग से वस्तुओं के विनिमय में सहूलियत कैसे आती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: मुद्रा से आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत नहीं रहती। जूता निर्माता को अब ऐसा किसान नहीं ढूँढना पड़ता जो जूते ख़रीदे और गेहूँ भी बेचे; उसे बस जूतों का ख़रीदार चाहिए। जूते मुद्रा में बदल गए, तो उस मुद्रा से वह गेहूँ या कोई भी दूसरी वस्तु ख़रीद सकता है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 40), 2. क्या आप कुछ ऐसे उदाहरण सोच सकते हैं, जहाँ वस्तुओं तथा सेवाओं का विनिमय या मज़दूरी की अदायगी वस्तु विनिमय के ज़रिए हो रही है?
उत्तर देखिए
उत्तर: सोनपुर की रमा को देखिए: वह भूस्वामी का कर्ज़ नकद से नहीं, उसके यहाँ काम करके चुकाती है (पृष्ठ 46)। अपने आसपास भी देखिए, जैसे गाँव में किसी सेवा या मज़दूरी के बदले अनाज देना, या एक वस्तु के बदले दूसरी वस्तु लेना। जो उदाहरण आप ख़ुद देखें, वही लिखिए।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 42), 1. एम. सलीम भुगतान के लिए 20,000 रु. नकद निकालना चाहते हैं। इसके लिए वह चैक कैसे लिखेंगे?
उत्तर देखिए
उत्तर: पृष्ठ 41 के नमूना चैक के खाने देखिए। सलीम तारीख़ लिखेंगे; जिसे भुगतान होना है, उसके नाम की जगह अपना नाम लिखेंगे, क्योंकि नकद उन्हें ख़ुद चाहिए; रकम शब्दों में (बीस हज़ार रुपये) और अंकों में (20,000) लिखेंगे; और खाताधारक के रूप में हस्ताक्षर करेंगे। फिर यह चैक अपने बैंक में देकर अपने खाते से नकद लेंगे।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 42), 2. सही उत्तर पर निशान लगाएँ: (अ) सलीम और प्रेम के बीच लेन-देन के बाद
- (क) सलीम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है।
- (ख) सलीम के बैंक खाते में शेष घट जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है।
- (ग) सलीम के बैंक खाते में शेष बढ़ जाता है और प्रेम के बैंक खाते में शेष घट जाता है।
उत्तर देखिए
उत्तर: (ख)। सलीम ने प्रेम के नाम चैक लिखा है (पृष्ठ 41 का नमूना चैक), इसलिए रकम सलीम के खाते से निकलकर प्रेम के खाते में जाती है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 42), 3. माँग जमा को मुद्रा क्यों समझा जाता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: माँग जमा को माँगने पर निकाला जा सकता है, और उसके बदले चैक लिखकर बिना नकद सीधा भुगतान हो सकता है। लोग इसे करेंसी की तरह ही भुगतान का माध्यम स्वीकार करते हैं, यानी इसमें मुद्रा का ज़रूरी लक्षण, विनिमय का माध्यम होना, मिलता है (पृष्ठ 41)।
किताब का सवाल (पृष्ठ 42). अगर सभी जमाकर्ता एक ही समय में अपनी धन राशि की माँग करने बैंक पहुँच जाएँ तो क्या होगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: बैंक सबको एक साथ पैसा नहीं दे पाएगा, क्योंकि वह जमा का केवल 5 प्रतिशत नकद रखता है और बड़ा भाग ऋण में दे चुका होता है। बैंक का काम इसी भरोसे पर चलता है कि किसी एक दिन केवल कुछ जमाकर्ता ही नकद निकालने आते हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 44), 1. निम्नलिखित तालिका की पूर्ति कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
सलीम स्वप्ना उन्हें ऋण की आवश्यकता क्यों पड़ी? 3000 जोड़ी जूतों का ऑर्डर एक महीने में पूरा करने के लिए अतिरिक्त मज़दूर और कच्चा माल 3 एकड़ में मूँगफली की खेती का खर्च जोखिम क्या था? ऑर्डर समय पर पूरा न होता तो लाभ न होता और उधार चुकाना मुश्किल होता फसल बर्बाद होने का; अदायगी फसल की कमाई पर टिकी थी परिणाम क्या हुए? समय पर जूते पहुँचाए, अच्छा-खासा लाभ हुआ, उधार चुका दिया फसल बर्बाद, कर्ज़ बढ़ा, ज़मीन का हिस्सा बेचना पड़ा
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 44), 2. मान लीजिए, सलीम को व्यापारियों से ऑर्डर मिलते रहते हैं। 6 साल बाद उसकी स्थिति क्या होगी?
उत्तर देखिए
उत्तर: ऑर्डर मिलते रहें और वह समय पर पूरे करता रहे, तो ऋण से हर बार कार्यशील पूँजी मिलेगी, लाभ होगा और उधार चुकता रहेगा। 6 साल में उसकी कमाई और बचत बढ़ेगी, और वह अपना काम बढ़ा सकता है।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 44), 3. कौन से कारण हैं, जो स्वप्ना की स्थिति को जोखिम भरा बनाते हैं? निम्नलिखित कारकों की चर्चा कीजिए: कीटनाशक दवाइयाँ, साहूकारों की भूमिका, मौसम।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- कीटनाशक दवाइयाँ: फसल पर कीटनाशकों का हमला हुआ; महँगी दवाइयाँ छिड़कने पर भी फ़र्क नहीं पड़ा, उल्टे खर्च बढ़ गया।
- साहूकारों की भूमिका: ऋण साहूकार से था; न चुकने पर कर्ज़ साल भर में बड़ी रकम बन गया, और आख़िर ज़मीन का हिस्सा बेचना पड़ा।
- मौसम: खेती की कमाई फसल पर टिकी है; फसल ख़राब हुई या कम रही, तो अदायगी नहीं होती, जैसा स्वप्ना के साथ हुआ।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 45), 1. उधारदाता उधार देते समय समर्थक ऋणाधार की माँग क्यों करता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: ताकि ऋण लौटने की गारंटी रहे। कर्ज़दार उधार न लौटा पाए, तो उधारदाता को ऋणाधार (भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में जमा पूँजी) बेचकर अपना पैसा वसूलने का अधिकार होता है (पृष्ठ 44)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 45), 2. हमारे देश की एक बहुत बड़ी आबादी निर्धन है। क्या यह उनके कर्ज लेने की क्षमता को प्रभावित करती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ। गरीबों के पास ऋणाधार लायक संपत्ति और ज़रूरी कागज़ात नहीं होते, इसलिए बैंक उन्हें ऋण नहीं देते। उन्हें साहूकारों जैसे अनौपचारिक स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ता है, जहाँ ब्याज बहुत ऊँचा है और ऋण–जाल का ख़तरा है (पृष्ठ 49–50)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 45), 3. कोष्ठक में दिए गए सही विकल्पों का चयन कर रिक्त स्थानों की पूर्ति करें: ऋण लेते समय कर्जदार आसान ऋण शर्तों को देखता है। इसका अर्थ है …… (निम्न/उच्च) ब्याज दर, …… (आसान/कठिन) अदायगी की शर्तें, …… (कम/अधिक) समर्थक ऋणाधार एवं आवश्यक कागज़ात।
उत्तर देखिए
उत्तर: निम्न ब्याज दर, आसान अदायगी की शर्तें, कम समर्थक ऋणाधार एवं आवश्यक कागज़ात।
आवास ऋण (पृष्ठ 45). मेघा के आवास ऋण के विवरणों की पूर्ति कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: भरी हुई तालिका ऊपर हिस्सा 7 में है: 5 लाख रुपये, 10 साल, नौकरी और वेतन संबंधी रिकार्ड, 12 प्रतिशत वार्षिक, मासिक किश्तें, और ऋणाधार के रूप में नए घर के सभी कागज़।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 1. सोनपुर में ऋण के विभिन्न स्रोतों की सूची बनाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: गाँव का महाजन, कृषि व्यापारी, बैंक, भूस्वामी-नियोक्ता, और पास के गाँव की कृषक सहकारी समिति।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 2. ऊपर दिए हुए अनुच्छेदों में ऋण के विभिन्न प्रयोगों वाली पंक्तियों को रेखांकित कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: रेखांकित करने वाली बातें:
- श्यामल: 1.5 एकड़ ज़मीन जोतने के लिए हर मौसम में उधार; व्यापारी से कृषि की आगतें।
- अरुण: खेती के लिए बैंक ऋण; आलू शीत भंडार गृह में रखकर नया ऋण।
- रमा: रोज़मर्रा के खर्च, अचानक बीमारी, परिवार के समारोह।
- कृषक सहकारी समिति: कृषि उपकरण ख़रीदना, खेती और कृषि व्यापार, मछली पकड़ना, घर बनाना और दूसरे खर्च।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 3. सोनपुर के छोटे किसान, मध्यम किसान और भूमिहीन कृषि मज़दूर के लिए ऋण की शर्तों की तुलना कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर:
छोटा किसान (श्यामल) मध्यम किसान (अरुण) भूमिहीन मज़दूर (रमा) स्रोत कृषि व्यापारी (पहले महाजन) बैंक भूस्वामी-नियोक्ता ब्याज दर 3 प्रतिशत मासिक (महाजन का 5 प्रतिशत मासिक) 8.5 प्रतिशत वार्षिक 5 प्रतिशत मासिक अदायगी फसल तैयार होने पर अगले तीन वर्षों में कभी भी भूस्वामी के यहाँ काम करके और शर्त फसल उसी व्यापारी को बेचने का वादा — नया ऋण पाने के लिए उसके यहाँ काम करते रहना सबसे सस्ती और आसान शर्तें अरुण की हैं; सबसे कठिन रमा की।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 4. श्यामल की तुलना में अरुण को खेती से ज़्यादा आय क्यों होगी?
उत्तर देखिए
उत्तर: अरुण का ब्याज बहुत कम है (8.5 प्रतिशत वार्षिक, जबकि श्यामल का 3 प्रतिशत मासिक), और उसे तीन साल तक का समय मिलता है। वह उपज का कुछ हिस्सा बेचकर ऋण चुकाएगा और बाकी आलू शीत भंडार गृह में रखकर बैंक से नया ऋण ले सकता है। श्यामल को फसल उसी व्यापारी को कटाई के समय सस्ते दाम पर बेचनी पड़ती है। साथ ही अरुण के पास 7 एकड़ ज़मीन है, श्यामल के पास 1.5 एकड़।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 5. क्या सोनपुर के सभी लोगों को सस्ती ब्याज दरों पर कर्ज़ मिल सकता है? किन लोगों को मिल सकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: नहीं। अरुण सोनपुर के उन कुछ लोगों में से है जिन्हें खेती के लिए बैंक से ऋण मिला है (पृष्ठ 46); बैंक समर्थक ऋणाधार माँगते हैं, जो हर किसी के पास नहीं होता (पृष्ठ 47)। पास के गाँव की सहकारी समिति के सदस्य किसानों को भी सस्ता ऋण मिल सकता है। श्यामल जैसे छोटे किसान और रमा जैसे भूमिहीन मज़दूर महँगे अनौपचारिक ऋण पर निर्भर हैं।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 6. सही उत्तर पर निशान लगाइए: (क) समय के साथ, रमा का ऋण: बढ़ जाएगा / समान रहेगा / घट जाएगा। (ख) अरुण सोनपुर के उन लोगों में से है जो बैंक से उधार लेते हैं क्योंकि: गाँव के अन्य लोग साहूकारों से कर्ज़ लेना चाहते हैं / बैंक समर्थक ऋणाधार की माँग करते हैं जो कि हर किसी के पास नहीं होती / बैंक ऋण पर ब्याज दरें उतनी ही हैं जितना कि व्यापारी लेते हैं।
उत्तर देखिए
उत्तर:
- (क) बढ़ जाएगा। वह पुराना ऋण चुकाने से पहले नया लेती है, और ब्याज 5 प्रतिशत मासिक है।
- (ख) बैंक समर्थक ऋणाधार की माँग करते हैं जो कि हर किसी के पास नहीं होती।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 47), 7. कुछ लोगों से बातचीत कीजिए, जिनसे आपको अपने क्षेत्र में ऋण प्रबंधों के बारे में कोई जानकारी मिले। अपनी बातचीत को रिकॉर्ड कीजिए। विभिन्न लोगों में ऋण की शर्तों में विभिन्नता को लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपका अपना सर्वे है, इसका कोई तय उत्तर नहीं। हर व्यक्ति से ऋण की चारों शर्तें पूछिए: ऋण किससे लिया, ब्याज दर कितनी, कोई ऋणाधार या कागज़ात दिए या नहीं, और लौटाने का तरीका क्या है। फिर सोनपुर की तालिका की तरह अपनी तालिका बनाइए और देखिए कि किसे सस्ता ऋण मिला, किसे महँगा, और क्यों।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 50), 1. ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों में क्या अन्तर है?
उत्तर देखिए
उत्तर:
औपचारिक अनौपचारिक कौन बैंक, सहकारी समितियाँ साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त देखरेख भारतीय रिज़र्व बैंक नज़र रखता है कोई संस्था नहीं ब्याज कम कहीं अधिक, मनमाना ऋणाधार, कागज़ात चाहिए अक्सर नहीं किसे ज़्यादा मिलता है अमीर परिवारों को गरीब परिवार इन पर निर्भर
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 50), 2. सभी लोगों के लिए यथोचित दरों पर ऋण क्यों उपलब्ध होना चाहिए?
उत्तर देखिए
उत्तर: ऊँची दरों पर आय का बड़ा हिस्सा ऋण चुकाने में चला जाता है और लोग ऋण–जाल में फँसते हैं। उचित दर पर ऋण मिले, तो लोग फसल उगा सकते हैं, कारोबार और छोटे उद्योग लगा सकते हैं, और उनकी आय बढ़ सकती है। सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है (पृष्ठ 49)।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 50), 3. क्या भारतीय रिज़र्व बैंक के जैसा कोई निरीक्षक होना चाहिए जो अनौपचारिक ऋणदाताओं की गतिविधियों पर नज़र रखे? उसका काम मुश्किल क्यों होगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, होना चाहिए, क्योंकि अभी अनौपचारिक ऋणदाता मनमानी दरों पर ऋण देते हैं और नाजायज़ तरीकों से वसूली कर सकते हैं (पृष्ठ 48)। पर यह काम मुश्किल होगा: बहुत-से ऋण निजी पहचान पर दिए जाते हैं, और लेन-देन की लिखा-पढ़ी पूरी नहीं होती (पृष्ठ 50–51), इसलिए जाँच का कोई रिकार्ड ही नहीं मिलता।
आओ–इन पर विचार करें (पृष्ठ 50), 4. आपकी समझ में गरीब परिवारों की तुलना में अमीर परिवारों के औपचारिक ऋणों का हिस्सा अधिक क्यों होता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: बैंक ऋणाधार और कागज़ात माँगते हैं। अमीर परिवारों के पास ज़मीन, मकान, जमा पूँजी और नियमित आय के कागज़ होते हैं; गरीबों के पास नहीं (पृष्ठ 44–45, 50)। इसलिए शहरों में अमीर परिवारों के 83 प्रतिशत ऋण औपचारिक हैं, जबकि गरीब परिवारों के केवल 46 प्रतिशत (आलेख 2, पृष्ठ 49)।
किताब के चित्र में सवाल (पृष्ठ 48). हल चलाता किसान पूछता है: लेकिन, बैंक हमारी उच्च आय क्यों चाहेगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: बैंक को भरोसा चाहिए कि ऋण लौटेगा। इसलिए वह आय का सबूत (जैसे मेघा से नौकरी और वेतन का रिकार्ड, पृष्ठ 45) और ऋणाधार माँगता है। जिसकी आय कम और अनिश्चित है, उसे बैंक जोखिम मानता है।
किताब का सवाल (पृष्ठ 48). आलेख 1 में देखिए: क्या अधिक ऋण औपचारिक क्षेत्रक से आ रहा है या अनौपचारिक क्षेत्रक से?
उत्तर देखिए
उत्तर: औपचारिक से। आलेख के औपचारिक टुकड़े (51 + 10 + 5) जोड़कर 66 प्रतिशत बनते हैं और अनौपचारिक (1 + 23 + 7 + 3) 34 प्रतिशत। अकेला सबसे बड़ा स्रोत व्यावसायिक बैंक (51) हैं, फिर साहूकार (23)।
किताब के चित्र में सवाल (पृष्ठ 50). रजाई सिलता मज़दूर पूछता है: क्या आप मानते हैं कि बैंक मुझे ऋण देगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: अकेले उसे शायद नहीं, क्योंकि उसके पास न ऋणाधार है, न नियमित आय के कागज़ (पृष्ठ 50)। पर अगर वह अपने जैसे लोगों के साथ स्वयं सहायता समूह बनाकर नियमित बचत करे, तो एक-दो साल बाद समूह के नाम पर बैंक से बिना ऋणाधार ऋण मिल सकता है (पृष्ठ 51)।
अतिरिक्त परियोजना/कार्यकलाप (पृष्ठ 53). तालिका में शहरी क्षेत्रों के आठ लोगों के व्यवसाय हैं: निर्माण मज़दूर, कंप्यूटर शिक्षित स्नातक छात्र, सरकारी सेवा में नियोजित व्यक्ति, दिल्ली में प्रवासी मज़दूर, घरेलू नौकरानी, छोटा व्यापारी, ऑटो रिक्सा चालक, बंद फैक्ट्री का मज़दूर। इन्हें किन उद्देश्यों के लिए ऋण चाहिए हो सकता है, यह भरिए। फिर इन्हें दो वर्गों में बाँटिए: जिन्हें बैंक से कर्ज़ मिल सकता है, और जिन्हें नहीं। वर्गीकरण के लिए आपने किन कारकों का उपयोग किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपकी सोच का सवाल है; नीचे एक नमूना उत्तर है। ऐसे लोगों से पूछकर इसे और पक्का कीजिए।
व्यवसाय ऋण लेने का संभावित कारण बैंक से कर्ज़? निर्माण मज़दूर बीमारी, घर का खर्च, काम न मिलने के दिनों का गुज़ारा मुश्किल: आय अनियमित, ऋणाधार नहीं कंप्यूटर शिक्षित स्नातक छात्र आगे की पढ़ाई, कंप्यूटर ख़रीदना, अपना काम शुरू करना ऋणाधार या आय का भरोसा दिखा सके तो संभव सरकारी सेवा में नियोजित व्यक्ति घर बनाना, वाहन, बच्चों की पढ़ाई आसानी से: नियमित आय और उसके कागज़ दिल्ली में प्रवासी मज़दूर घर पैसे भेजना, किराया, बीमारी मुश्किल: आय अनियमित, कागज़ और ऋणाधार नहीं घरेलू नौकरानी घर का खर्च, बच्चों की पढ़ाई, बीमारी मुश्किल; स्वयं सहायता समूह से संभव छोटा व्यापारी माल ख़रीदना, दुकान बढ़ाना ऋणाधार और कमाई के कागज़ हों तो संभव ऑटो रिक्सा चालक ऑटो ख़रीदना या उसकी मरम्मत ऋणाधार हो तो संभव, नहीं तो मुश्किल बंद फैक्ट्री का मज़दूर काम छूटने पर घर का गुज़ारा, नया काम शुरू करना मुश्किल: नियमित आय बंद हो गई वर्गीकरण के लिए किताब के कारक लीजिए:
- नियमित आय और उसके कागज़ हैं या नहीं (मेघा, पृष्ठ 45);
- ऋणाधार के लिए कोई संपत्ति है या नहीं (पृष्ठ 44);
- आय पक्की है या अनिश्चित, यानी ऋण लौटने का भरोसा (पृष्ठ 44, 50)।
जिनके पास ये तीनों हैं, उन्हें बैंक से कर्ज़ मिलने की संभावना है; जिनके पास नहीं, वे अनौपचारिक स्रोतों या स्वयं सहायता समूह पर निर्भर होंगे।
झटपट दोहराइए
1. मुद्रा को विनिमय का माध्यम क्यों कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: क्योंकि वह विनिमय प्रक्रिया में बीच की कड़ी (मध्यस्थता) का काम करती है और आवश्यकताओं के दोहरे संयोग की ज़रूरत ख़त्म करती है।
2. मुद्रा के आधुनिक रूप कौन-से हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: करेंसी (कागज़ के नोट और सिक्के) और बैंकों में माँग जमा।
3. भारत में करेंसी नोट कौन जारी करता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: भारतीय रिज़र्व बैंक, केंद्रीय सरकार की तरफ़ से।
4. बैंक जमा का कितना हिस्सा नकद रखते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: केवल 5 प्रतिशत; बाकी के बड़े भाग से ऋण देते हैं।
5. बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: कर्ज़दारों से लिए गए ब्याज और जमाकर्ताओं को दिए गए ब्याज का अंतर।
6. ऋण की चार शर्तें कौन-सी हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: ब्याज दर, समर्थक ऋणाधार, आवश्यक कागज़ात और भुगतान के तरीके।
7. समर्थक ऋणाधार के उदाहरण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: भूमि, इमारत, गाड़ी, पशु, बैंकों में जमा पूँजी।
8. कर्ज–ज़ाल किसे कहते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: जब ऋण कमाई बढ़ाने के बजाय स्थिति बदतर कर दे और कर्ज़दार ऐसी हालत में फँस जाए जहाँ से निकलना बहुत कष्टदायक हो, जैसे स्वप्ना।
9. ऋण के औपचारिक और अनौपचारिक स्रोतों के दो-दो उदाहरण दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: औपचारिक: बैंक, सहकारी समितियाँ। अनौपचारिक: साहूकार, व्यापारी (और मालिक, रिश्तेदार, दोस्त)।
10. ग्रामीण भारत में ऋण का सबसे बड़ा स्रोत कौन-सा है (आलेख 1, 2019)?
उत्तर देखिए
उत्तर: व्यावसायिक बैंक, 51 प्रतिशत; उसके बाद साहूकार, 23 प्रतिशत।
11. शहरों के गरीब और अमीर परिवारों के ऋण का कितना हिस्सा अनौपचारिक स्रोतों से है?
उत्तर देखिए
उत्तर: गरीब: 54 प्रतिशत; अमीर: केवल 17 प्रतिशत।
12. स्वयं सहायता समूह में कितने सदस्य होते हैं, और बैंक ऋण कब मिलता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: 15–20 सदस्य; एक या दो वर्ष नियमित बचत के बाद, समूह के नाम पर।
13. ग्रामीण बैंक के संस्थापक कौन हैं, और उन्हें कौन-सा सम्मान मिला?
उत्तर देखिए
उत्तर: प्रो. मोहम्मद युनूस; 2006 में शांति का नोबेल पुरस्कार।
14. सोनपुर में अरुण को किस दर पर ऋण मिला, और श्यामल को व्यापारी से किस दर पर?
उत्तर देखिए
उत्तर: अरुण: बैंक से 8.5 प्रतिशत वार्षिक; श्यामल: व्यापारी से 3 प्रतिशत मासिक।