Practise with cards
One card at a time. Think of the answer, turn the card, and say whether you knew it. A card you did not know comes back in this round; one you knew returns a few days later.
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प्रयोग: दाईं ओर हाथ रखकर पढ़िए, उत्तर बोलिए, फिर हाथ हटाइए। कुल 182 कार्ड। हर उत्तर के साथ किताब का पृष्ठ लिखा है; शक हो तो किताब का वही पृष्ठ खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।
निशानों का मतलब: ★वाले कार्ड ज़्यादा ज़रूरी हैं · ★★सबसे ज़रूरी; समय कम हो तो पहले इन्हें दोहराइए · ! वाले कार्डों में अक्सर गलती होती है, इन्हें ध्यान से पढ़िए।
सेट 1 — स्रोत और पूजा-प्रणालियों का समन्वय (कार्ड 1–18)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★1 | NCERT कक्षा 12 इतिहास के विषय 6 “भक्ति–सूफ़ी परंपराएँ” में किताब किस कालखंड की बात करती है? | लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक। विषय का उप-शीर्षक है “धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ”। (पृष्ठ 140) |
| ★2 | आठवीं से अठारहवीं सदी के नए साहित्यिक स्रोतों में किताब किन रचनाओं को गिनाती है? | संत कवियों की रचनाएँ। संतों ने जनसाधारण की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपने को व्यक्त किया था, और ये रचनाएँ अधिकतर संगीतबद्ध हैं। (पृष्ठ 140) |
| 3 | संत कवियों की रचनाएँ किसने और कब संकलित कीं? | संतों के अनुयायियों ने, उनकी मृत्यु के उपरांत। (पृष्ठ 140) |
| ★4 | संत कवियों की परंपराओं के लिए किताब “प्रवाहमान” शब्द क्यों लिखती है, और इससे इतिहासकारों के सामने क्या चुनौती आती है? | किताब कहती है “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”: अनुयायियों की कई पीढ़ियों ने मूल संदेश का विस्तार किया, और जो विचार भिन्न राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में संदिग्ध व अनावश्यक लगे, उन्हें बदल दिया या त्याग दिया। इसलिए इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है। (पृष्ठ 140) |
| ★5 | संत कवियों के अनुयायियों की लिखी जीवनियाँ अक्षरशः सत्य नहीं हैं, फिर भी इतिहासकार उनका इस्तेमाल क्यों करते हैं? | इनसे यह पता चलता है कि अनुयायी अपने पथ-प्रदर्शक स्त्री-पुरुषों के जीवन को किस तरह देखते थे। (पृष्ठ 140) |
| 6 | मणिक्वचक्कार कौन थे, जिनकी बारहवीं शताब्दी की कांस्य मूर्ति विषय 6 के आरंभ में चित्र 6.1 में छपी है? | वे शिव के अनुयायी थे और तमिल में भक्तिगान की रचना करते थे। (पृष्ठ 140) |
| ★7 | संभवत: आठवीं से अठारहवीं सदी की सबसे प्रभावी विशिष्टता क्या थी, जिसका किताब साहित्य और मूर्तिकला के आधार पर ज़िक्र करती है? | साहित्य और मूर्तिकला दोनों में अनेक तरह के देवी-देवता अधिकाधिक दिखाई देते हैं। एक स्तर पर इसका अर्थ है कि विष्णु, शिव और देवी की आराधना की परिपाटी न केवल चलती रही, बल्कि और अधिक विस्तृत हुई। (पृष्ठ 141) |
| ★★8 | पूजा-प्रणालियों के समन्वय को समझाने के लिए इतिहासकार कम से कम कौन-सी दो प्रक्रियाएँ बताते हैं? | (1) ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार: पौराणिक ग्रंथों की रचना, संकलन और परिरक्षण से; ये ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में थे, जिन्हें वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियाँ और शूद्र भी समझ सकते थे। (2) स्त्री, शूद्रों व अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं और आचरणों को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकृत किया जाना और उन्हें नया रूप देना। (पृष्ठ 141) |
| ★9 | पुरी (उड़ीसा) के जगन्नाथ को किताब पूजा-प्रणालियों के समन्वय का सबसे विशिष्ट उदाहरण क्यों मानती है? | पुरी में मुख्य देवता को बारहवीं शताब्दी तक आते-आते जगन्नाथ (शाब्दिक अर्थ में संपूर्ण विश्व का स्वामी) के नाम से विष्णु के एक स्वरूप के रूप में प्रस्तुत किया गया। चित्र 6.2 में जगन्नाथ अपनी बहन सुभद्रा और भाई बलराम के साथ हैं। (पृष्ठ 141) |
| ★★10 | पुरी के जगन्नाथ की प्रतिमा किससे और किनके द्वारा गढ़ी जाती है, और इससे विष्णु के रूप के बारे में क्या पता चलता है? | एक स्थानीय देवता को विष्णु के रूप में प्रस्तुत किया गया, और उसकी प्रतिमा पहले और आज भी लकड़ी से स्थानीय जनजाति के विशेषज्ञों द्वारा गढ़ी जाती है। विष्णु का यह रूप देश के अन्य भागों में मिलने वाले स्वरूपों से सर्वथा भिन्न था। (पृष्ठ 142) |
| ★11 | समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड ने किसे “महान” परंपरा और किसे “लघु” परंपरा कहा? | बीसवीं शताब्दी के इस समाजशास्त्री ने देखा कि किसान उन कर्मकांडों और पद्धतियों का अनुकरण करते थे जिनका पालन पुरोहित और राजा जैसा प्रभुत्वशाली वर्ग करता था: यह “महान” परंपरा है। किसान अन्य लोकाचार भी मानते थे जो इस महान परिपाटी से सर्वथा भिन्न थे: यह “लघु” परंपरा है। (पृष्ठ 141) |
| 12 | कई विद्वान “महान” और “लघु” शब्दों को उद्धरण चिह्न के साथ क्यों लिखते हैं? | वे इन प्रक्रियाओं और वर्गीकरण के महत्त्व से इनकार नहीं करते, पर इन शब्दों से जो पदसोपानात्मक (ऊँच-नीच का क्रम बताने वाला) स्वर उभरता है, उसकी अवमानना करते हैं। उसे लक्षित करने का एक तरीका इन शब्दों को उद्धरण चिह्न के साथ लिखना है। (पृष्ठ 141) |
| ★13 | देवी-संप्रदायों में समन्वय कैसे दिखता है? स्थानीय देवियों को पौराणिक परंपरा से कैसे जोड़ा गया? | देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में होती थी। इन स्थानीय देवियों को पौराणिक परंपरा के भीतर मुख्य देवताओं की पत्नी के रूप में मान्यता दी गई: कभी विष्णु की पत्नी लक्ष्मी के रूप में, कभी शिव की पत्नी पार्वती के रूप में। (पृष्ठ 142) |
| ★14 | देवी की आराधना की जिस पद्धति को किताब “तांत्रिक” नाम से जोड़ती है, उसकी क्या विशेषताएँ थीं? | यह पद्धति उपमहाद्वीप के कई भागों में प्रचलित थी। इसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे, और कर्मकांड में वर्ग और वर्ण के भेद की अवहेलना की जाती थी। इसके विचारों ने शैव और बौद्ध दर्शन को भी प्रभावित किया, खासतौर से उपमहाद्वीप के पूर्वी, उत्तरी और दक्षिणी भागों में। (पृष्ठ 142) |
| 15 | वैदिक और पौराणिक परंपरा की तुलना करें तो वैदिक देवकुल के किन देवताओं का महत्त्व पूरी तरह गौण हो गया? | अग्नि, इंद्र और सोम जैसे देवता। साहित्य और मूर्तिकला दोनों में उनका निरूपण नहीं दिखता। फिर भी वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा। (पृष्ठ 142) |
| ★16 | वैदिक परिपाटी के प्रशंसक किन आचारों की निंदा करते थे, और तांत्रिक आराधना में लगे लोगों का रुख क्या था? | वैदिक परिपाटी के प्रशंसक उन सभी आचारों की निंदा करते थे जो ईश्वर की उपासना के लिए मंत्रों के उच्चारण के साथ यज्ञों के संपादन से परे थे। तांत्रिक आराधना में लगे लोग वैदिक सत्ता की अवहेलना करते थे, इसलिए कभी संघर्ष की स्थिति भी उत्पन्न हो जाती थी। (पृष्ठ 142) |
| 17 | भक्तों के इष्टदेव और बौद्ध-जैन परंपराओं के साथ संबंध के बारे में किताब क्या बताती है? | भक्त अपने इष्टदेव विष्णु या शिव को कई बार सर्वोच्च प्रक्षेपित करते थे। बौद्ध अथवा जैन धर्म से भी संबंध अकसर तनावपूर्ण हो जाते थे, यद्यपि स्पष्ट द्वंद्व कम दिखाई पड़ते थे। (पृष्ठ 142) |
| 18 | बिहार की लगभग दसवीं शताब्दी की मारिची की मूर्ति (चित्र 6.3) किसका उदाहरण है? | मारिची एक बौद्ध देवी हैं। किताब इस मूर्ति को विभिन्न धार्मिक विश्वासों और क्रियाकलापों के एकीकरण की प्रक्रिया का उदाहरण बताती है। (पृष्ठ 142) |
सेट 2 — तमिलनाडु के अलवार और नयनार (कार्ड 19–39)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★19 | धर्म के इतिहासकार भक्ति परंपरा को किन दो मुख्य वर्गों में बाँटते हैं, और हर वर्ग में किसकी उपासना आती है? | सगुण (विशेषण सहित): शिव, विष्णु तथा उनके अवतार व देवियों की आराधना, जिनकी मूर्त रूप में अवधारणा हुई। निर्गुण (विशेषण विहीन): अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना। (पृष्ठ 143) |
| 20 | विषय 6 जिस काल विशेष पर गौर करता है, उससे पहले भक्तिपूर्ण उपासना की परिपाटी कितनी पुरानी थी? | लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी। भक्ति के प्रदर्शन में मंदिरों में इष्टदेव की आराधना से लेकर उपासकों का प्रेमभाव में तल्लीन हो जाना दिखता है, और भक्ति रचनाओं का उच्चारण अथवा गाया जाना इस उपासना पद्धति का अंश था। (पृष्ठ 143) |
| ★21 | भक्ति परंपराओं में ब्राह्मणों की और स्त्रियों व “निम्न वर्णों” की क्या स्थिति थी? | बहुत सी भक्ति परंपराओं में ब्राह्मण देवताओं और भक्तजन के बीच महत्त्वपूर्ण बिचौलिए बने रहे। फिर भी इन परंपराओं ने स्त्रियों और “निम्न वर्णों” को भी स्वीकृति व स्थान दिया। भक्ति परंपरा की एक और विशेषता इसकी विविधता है। (पृष्ठ 143) |
| ★★22 | तमिलनाडु में प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) का नेतृत्व किसने किया, और वे अपने इष्ट की स्तुति कैसे करते थे? | अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) ने। वे एक स्थान से दूसरे स्थान पर भ्रमण करते हुए तमिल में अपने इष्ट की स्तुति में भजन गाते थे। (पृष्ठ 143) |
| ★23 | अलवार और नयनार संतों ने अपनी यात्राओं में कुछ पावन स्थलों को क्या घोषित किया, और बाद में उन स्थलों का क्या हुआ? | उन्होंने कुछ पावन स्थलों को अपने इष्ट का निवासस्थल घोषित किया। इन्हीं स्थलों पर बाद में विशाल मंदिर बने और वे तीर्थस्थल माने गए। संत-कवियों के भजन इन मंदिरों में अनुष्ठानों के समय गाए जाते थे, और संतों की प्रतिमा की भी पूजा की जाती थी। (पृष्ठ 143) |
| ★★24 | ! क्या यह कहना ठीक है कि सभी अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा और ब्राह्मणों की प्रभुता का विरोध किया? | पूरी तरह नहीं। यह कुछ इतिहासकारों का मानना है कि उन्होंने इसके विरोध में आवाज़ उठाई, और किताब के अनुसार यह बात कुछ हद तक ही सत्य प्रतीत होती है। भक्ति संत विविध समुदायों से थे: ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और कुछ ऐसी जातियों से जिन्हें “अस्पृश्य” माना जाता था। संतों में ब्राह्मण भी थे, जैसे अलवार तोंदराडिप्पोडि। (पृष्ठ 144) |
| ★25 | अलवार संतों के मुख्य काव्य संकलन को “तमिल वेद” क्यों कहा जाता था, और दसवीं शताब्दी तक उसमें कितने अलवारों की रचनाएँ संकलित हुईं? | उस संकलन का नाम नलयिरादिव्यप्रबंधम् (“चार हज़ार पावन रचनाएँ”) है। उसे तमिल वेद के रूप में बताकर इस परंपरा को सम्मानित किया गया, यानी उसका महत्त्व संस्कृत के चारों वेदों जितना बताया गया। दसवीं शताब्दी तक आते-आते बारह अलवारों की रचनाओं का यह संकलन कर लिया गया। (पृष्ठ 144) |
| ★26 | दसवीं शताब्दी में अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताएँ किस संकलन में रखी गईं, और उनका वर्गीकरण किस आधार पर हुआ? | तवरम नामक संकलन में। कविताओं का वर्गीकरण संगीत के आधार पर हुआ। (पृष्ठ 144) |
| ★27 | किताब के अनुसार संभवत: अलवार–नयनार भक्ति परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता क्या थी? | इसमें स्त्रियों की उपस्थिति। (पृष्ठ 144) |
| ★★28 | अंडाल कौन थीं, और वे अपनी प्रेमभावना को किस रूप में व्यक्त करती थीं? | अंडाल एक अलवार स्त्री थीं। उनके भक्ति गीत व्यापक स्तर पर गाए जाते थे (और आज भी गाए जाते हैं)। वे स्वयं को विष्णु की प्रेयसी मानकर अपनी प्रेमभावना को छंदों में व्यक्त करती थीं। (पृष्ठ 144) |
| ★29 | शिवभक्त कराइक्काल अम्मइयार ने अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए कौन-सा मार्ग अपनाया, और उनकी रचनाओं का क्या हुआ? | उन्होंने घोर तपस्या का मार्ग अपनाया। नयनार परंपरा में उनकी रचनाओं को सुरक्षित किया गया। (पृष्ठ 144) |
| ★30 | अंडाल और कराइक्काल अम्मइयार जैसी स्त्री भक्तों ने सामाजिक कर्तव्यों के साथ क्या किया, और उनकी जीवन पद्धति व रचनाओं ने किसे चुनौती दी? | इन स्त्रियों ने अपने सामाजिक कर्तव्यों का परित्याग किया, पर वे किसी वैकल्पिक व्यवस्था अथवा भिक्षुणी समुदाय की सदस्या नहीं बनीं। उनकी जीवन पद्धति और रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी। (पृष्ठ 144) |
| ★31 | ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि के काव्य (स्रोत 1) के अनुसार विष्णु किन्हें अधिक पसंद करते हैं? | चारों वेदों के ज्ञाता चतुर्वेदी ब्राह्मण, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, उनसे भी ज़्यादा विष्णु उन “दासों” को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण-व्यवस्था के परे हों। (पृष्ठ 144) |
| ★32 | नयनार संत अप्पार ने (स्रोत 2 में) शास्त्र को उद्धृत करने वाले “धूर्तजन” से क्या कहा? | उन्होंने पूछा: “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?” और कहा: “तुम केवल मारपेरू के स्वामी (शिव जो तमिलनाडु के तंजावुर जिले के मारपेरू में बसते हैं।) को अपना एकमात्र आश्रयदाता मानकर नतमस्तक हो।” (पृष्ठ 144) |
| ★33 | कराइक्काल अम्मइयार अपनी कविता (स्रोत 3) में अपना वर्णन किस रूप में करती हैं? | वे स्वयं को “राक्षसी” के रूप में प्रस्तुत करती हैं: फूली हुई नाड़ियों वाली, बाहर निकली आँखें, सफेद दाँत, भीतर धँसा उदर, लाल केश और आगे निकले दाँत। वे अलंकटु वन में विचरती हैं, जो उनके अनुसार “हमारे पिता (शिव) का घर” है। यह वर्णन सुंदर रूप का नहीं, डरावने रूप का है; किताब के अनुसार ऐसी स्त्रियों की रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी। (पृष्ठ 144, 145) |
| ★34 | तमिल क्षेत्र में छठी से नवीं शताब्दी ईसवी में कौन-से राज्य थे, और बौद्ध-जैन धर्म को उस दौर में कैसा संरक्षण मिलता था? | पल्लव और पांड्य राज्य। बौद्ध और जैन धर्म इस क्षेत्र में कई शताब्दियों से थे और उन्हें व्यापारी व शिल्पी वर्ग का प्रश्रय मिलता था। राजकीय संरक्षण और अनुदान उन्हें यदा-कदा ही मिलता था। (पृष्ठ 145) |
| ★35 | तमिल भक्ति रचनाओं, खासकर नयनार संतों की रचनाओं, की एक मुख्य विषयवस्तु क्या है, और इतिहासकार इसकी क्या व्याख्या करते हैं? | बौद्ध और जैन धर्म के प्रति विरोध। इतिहासकारों ने सुझाव दिया है कि परस्पर विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान को लेकर प्रतिस्पर्धा थी। (पृष्ठ 145) |
| ★★36 | नवीं से तेरहवीं शताब्दी के शक्तिशाली चोल सम्राटों ने भक्ति परंपरा को किस तरह समर्थन दिया? | उन्होंने ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा को समर्थन दिया तथा विष्णु और शिव के मंदिरों के निर्माण के लिए भूमि-अनुदान दिए। (पृष्ठ 145) |
| ★37 | चोल सम्राटों की मदद से कौन-से विशाल शिव मंदिर बने, और उनके दौर में कांस्य की किन प्रतिमाओं का निर्माण हुआ? | चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर। उनके दौर में कांस्य में ढाली गई शिव की प्रतिमाएँ भी बनीं; किताब के अनुसार नयनार संतों का दर्शन शिल्पकारों के लिए प्रेरणा बना। चोल सम्राटों ने इन शिव मंदिरों में तमिल भाषा के शैव भजनों का गायन प्रचलित किया और ऐसे भजनों को तवरम ग्रंथ के रूप में संकलित कराने का भी ज़िम्मा उठाया। (पृष्ठ 146) |
| ★38 | नयनार और अलवार संत किन कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे, और चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने के लिए क्या किया? | वे वेल्लाल कृषकों द्वारा सम्मानित होते थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया। चोल सम्राटों ने दैवीय समर्थन पाने का दावा किया और अपनी सत्ता के प्रदर्शन के लिए सुंदर मंदिर बनवाए, जिनमें पत्थर और धातु से बनी मूर्तियाँ सुसज्जित थीं। (पृष्ठ 146) |
| ★★39 | 945 ईसवी के अभिलेख से चोल सम्राट परांतक प्रथम के बारे में क्या पता चलता है? | उन्होंने संत कवि अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं। इन मूर्तियों को उत्सव में एक जुलूस में निकाला जाता था। (पृष्ठ 146) |
सेट 3 — कर्नाटक के वीरशैव और उत्तरी भारत (कार्ड 40–52)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★40 | बारहवीं शताब्दी में कर्नाटक में एक नवीन आंदोलन का नेतृत्व किसने किया, और उनके अनुयायी क्या कहलाए? | बासवन्ना (1106–68) ने, जो एक ब्राह्मण थे और कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे। उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) व लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए। (पृष्ठ 146) |
| ★41 | लिंगायत समुदाय शिव की आराधना किस रूप में करता है, और इस समुदाय के पुरुष क्या धारण करते हैं? | वे शिव की आराधना लिंग के रूप में करते हैं। पुरुष बाएँ कंधे (वाम स्कंध) पर चाँदी के एक पिटारे में एक लघु लिंग धारण करते हैं। लिंगायतों में जिन्हें श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है, उनमें जंगम, यानी यायावर भिक्षु, शामिल हैं। (पृष्ठ 146, 147) |
| ★42 | लिंगायतों का मृत्यु के बाद के जीवन के बारे में क्या विश्वास है, और वे अपने मृतकों का क्या करते हैं? | उनका विश्वास है कि मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाएँगे और इस संसार में पुनः नहीं लौटेंगे। धर्मशास्त्र में बताए गए श्राद्ध संस्कार का वे पालन नहीं करते और अपने मृतकों को विधिपूर्वक दफनाते हैं। (पृष्ठ 147) |
| ★★43 | लिंगायतों ने किन ब्राह्मणीय अवधारणाओं का विरोध किया, और इसका क्या परिणाम हुआ? | उन्होंने जाति की अवधारणा और कुछ समुदायों के “दूषित” होने की ब्राह्मणीय अवधारणा का विरोध किया, और पुनर्जन्म के सिद्धांत पर भी प्रश्नवाचक चिह्न लगाया। इन कारणों से ब्राह्मणीय सामाजिक व्यवस्था में जिन समुदायों को गौण स्थान मिला था, वे लिंगायतों के अनुयायी हो गए। (पृष्ठ 147) |
| ★44 | धर्मशास्त्रों में अस्वीकार किए गए कौन-से आचारों को लिंगायतों ने मान्यता दी? | किताब दो उदाहरण देती है: वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह। (पृष्ठ 147) |
| ★45 | किताब के अनुसार वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति किन रचनाओं से है, और उन्हें किसने किस भाषा में रचा? | वचनों से। वे कन्नड़ भाषा में उन स्त्री-पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए। (पृष्ठ 147) |
| ★46 | बासवन्ना के वचन (स्रोत 4, “अनुष्ठान और यथार्थ संसार”) में लोग पत्थर के सर्प और असली साँप के साथ, देवता के सेवक और ईश्वर की प्रतिमा के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, और इससे बासवन्ना अपनी बात कैसे समझाते हैं? | पत्थर से बने सर्प को देखकर लोग उस पर दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप आ जाए तो कहते हैं “मारो–मारो”। देवता के उस सेवक को, जो भोजन परसने पर खा सकता है, कहते हैं “चले जाओ! चले जाओ।” किंतु ईश्वर की प्रतिमा को, जो खा नहीं सकती, व्यंजन परोसते हैं। इन उलटे व्यवहारों को आमने-सामने रखकर बासवन्ना दिखाते हैं कि अनुष्ठान और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते; स्रोत का शीर्षक भी यही कहता है। (पृष्ठ 147) |
| ★47 | किताब के “नए धार्मिक विकास” वाले बॉक्स में मध्यवर्ती शताब्दियों के दो मुख्य विकास कौन-से हैं? | (1) तमिल भक्तों (खासतौर से वैष्णव) के विचारों को संस्कृत परंपरा में समाहित कर लिया गया, जिसका परिणाम सर्वाधिक प्रसिद्ध पुराणों में से एक भागवत पुराण की रचना थी। (2) तेरहवीं शताब्दी में भक्ति परंपरा का विकास महाराष्ट्र में हुआ। (पृष्ठ 147) |
| ★★48 | ! क्या चौदहवीं शताब्दी तक उत्तरी भारत से अलवार और नयनार संतों की रचनाओं जैसा कोई ग्रंथ मिलता है? | नहीं। उत्तरी भारत में विष्णु और शिव की उपासना शासकों की सहायता से बने मंदिरों में होती थी, फिर भी इतिहासकारों को अलवार और नयनार संतों की रचनाओं जैसा कोई ग्रंथ चौदहवीं शताब्दी तक वहाँ से प्राप्त नहीं हुआ। (पृष्ठ 147) |
| ★49 | कुछ इतिहासकार उत्तरी भारत में अलवार–नयनार जैसी रचनाओं के न मिलने की क्या वजह बताते हैं? | उनका मत है कि चौदहवीं शताब्दी तक के काल में उत्तरी भारत में अनेक राजपूत राज्यों का उद्भव हुआ। इन सभी राज्यों में ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था और वे ऐहिक तथा आनुष्ठानिक दोनों ही कार्य करते थे। उनकी प्रभुसत्ता को सीधे चुनौती देने का प्रयास शायद ही किसी ने किया। (पृष्ठ 147) |
| ★50 | उत्तरी भारत में रूढ़िवादी ब्राह्मणीय साँचे के बाहर के कौन-से धार्मिक नेता प्रभाव बढ़ा रहे थे, और उनका महत्त्व किसके साथ बढ़ रहा था? | नाथ, जोगी और सिद्ध। उनमें से बहुत से लोग शिल्पी समुदाय के थे, जिनमें जुलाहे शामिल थे। संयोजित दस्तकारी उत्पादन के विकास के साथ उनका महत्त्व बढ़ रहा था। नगरीय केंद्रों के विस्तार तथा मध्य व पश्चिमी एशिया के साथ व्यापार के प्रसार के साथ दस्तकारी की वस्तुओं की माँग भी बढ़ी। (पृष्ठ 147, 148) |
| ★51 | अनेक नवीन धार्मिक नेताओं ने वेदों और भाषा के बारे में क्या किया, और वे किसका प्रश्रय हासिल नहीं कर सके? | उन्होंने वेदों की सत्ता को चुनौती दी और अपने विचार आम लोगों की भाषा में सामने रखे; समय के साथ ये भाषाएँ उसी रूप में विकसित हुईं जिसमें आज भी प्रयोग में लाई जाती हैं। अपनी लोकप्रियता के बावजूद वे विशिष्ट शासक वर्ग का प्रश्रय हासिल करने की स्थिति में नहीं थे। (पृष्ठ 148) |
| ★★52 | तुर्कों के भारत आने की परिणति किसमें हुई, और उसका राजपूत राज्यों और ब्राह्मणों पर क्या असर पड़ा? | तुर्कों के आगमन की पराकाष्ठा दिल्ली सल्तनत (तेरहवीं शताब्दी) की स्थापना में हुई। सल्तनत की स्थापना से राजपूत राज्यों का और उनसे जुड़े ब्राह्मणों का पराभव हुआ। इन परिवर्तनों का प्रभाव संस्कृति और धर्म पर भी पड़ा, और सूफ़ियों का आगमन इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था। (पृष्ठ 148) |
सेट 4 — इस्लामी परंपराएँ: शासक, लोक प्रचलन, मस्जिदें और नाम (कार्ड 53–73)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★53 | प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी और मध्य एशिया के लोग उपमहाद्वीप में कहाँ आए, और सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उद्भव के बाद ये क्षेत्र किस संसार का हिस्सा बन गए? | अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए, और मध्य एशिया से लोग देश के उत्तर–पश्चिम प्रांतों में आकर बस गए। सातवीं शताब्दी में इस्लाम के उद्भव के बाद ये क्षेत्र उस संसार का हिस्सा बन गए जिसे अकसर इस्लामी विश्व कहा जाता है। (पृष्ठ 148) |
| ★★54 | 711 ईसवी में सिंध को किसने विजित किया, और उसे किसके क्षेत्र में शामिल कर लिया गया? | मुहम्मद बिन कासिम नाम के एक अरब सेनापति ने सिंध को विजित किया और उसे खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया। (पृष्ठ 148) |
| ★55 | दिल्ली सल्तनत की नींव किसने रखी, और मुगल सल्तनत की स्थापना किस शताब्दी में हुई? | लगभग तेरहवीं शताब्दी ईसवी में तुर्क और अफगानों ने दिल्ली सल्तनत की नींव रखी। सोलहवीं शताब्दी में मुगल सल्तनत की स्थापना हुई, और बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म बना रहा। अठारहवीं शताब्दी में उभरे क्षेत्रीय राज्यों में से कई के शासक भी इस्लाम धर्म को मानने वाले थे। (पृष्ठ 148) |
| ★56 | उलमा शब्द का क्या अर्थ है, और वे कौन-सी ज़िम्मेदारी निभाते थे? | उलमा आलिम का बहुवचन है। वे इस्लाम धर्म के ज्ञाता थे। इस परिपाटी के संरक्षक होने के नाते वे धार्मिक, कानूनी और अध्यापन संबंधी ज़िम्मेदारी निभाते थे। (पृष्ठ 148) |
| ★57 | सैद्धांतिक रूप से मुसलमान शासकों को किसके मार्गदर्शन पर चलना होता था, और उपमहाद्वीप में यह स्थिति जटिल क्यों थी? | उलमा के मार्गदर्शन पर। उलमा से अपेक्षा की जाती थी कि वे शासन में शरिया का अमल सुनिश्चित करवाएँगे। उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम धर्म को मानने वाली नहीं थी। (पृष्ठ 149) |
| ★★58 | शरिया क्या है, और वह किन पर आधारित है? | शरिया मुसलमान समुदाय को निर्देशित करने वाला कानून है। यह कुरान शरीफ़ और हदीस पर आधारित है। हदीस का अर्थ है पैगम्बर साहब से जुड़ी परंपराएँ, जिनके अंतर्गत उनके स्मृत शब्द और क्रियाकलाप भी आते हैं। (पृष्ठ 149) |
| ★59 | अरब क्षेत्र से बाहर इस्लाम का प्रसार हुआ तो कानून के स्रोत में क्या जुड़ा, और शरिया किन चार से उद्भूत हुआ? | जहाँ के आचार–व्यवहार भिन्न थे, वहाँ क़ियास (सदृशता के आधार पर तर्क) और इजमा (समुदाय की सहमति) को भी कानून का स्रोत माना जाने लगा। इस तरह शरिया कुरान, हदीस, क़ियास और इजमा से उद्भूत हुआ। (पृष्ठ 149) |
| ★★60 | ज़िम्मी किन्हें कहा जाता था, वे क्या चुकाते थे, और भारत में इस श्रेणी में किन्हें शामिल किया गया? | ज़िम्मी (व्युत्पत्ति अरबी शब्द ज़िम्मा से) का अर्थ है संरक्षित श्रेणी: वे लोग जो उद्घटित धर्मग्रंथ को मानते थे, जैसे इस्लामी शासकों के क्षेत्र में रहने वाले यहूदी और ईसाई। वे जज़िया नामक कर चुकाकर मुसलमान शासकों से संरक्षण के अधिकारी हो जाते थे। भारत में इसके अंतर्गत हिंदुओं को भी शामिल कर लिया गया। (पृष्ठ 149) |
| ★61 | किताब के अनुसार मुसलमान शासक शासितों के प्रति कैसी नीति अपनाते थे, और इसके उदाहरण क्या हैं? | शासक शासितों की तरफ़ काफ़ी लचीली नीति अपनाते थे। बहुत से शासकों ने भूमि अनुदान व कर की छूट हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को दी, और गैर–मुसलमान धार्मिक नेताओं के प्रति श्रद्धाभाव व्यक्त किया। ऐसे अनुदान अनेक मुगल बादशाहों ने दिए, जिनमें अकबर और औरंगज़ेब शामिल थे। (पृष्ठ 149) |
| ★62 | 1598 में अकबर के जारी किए फ़रमान (स्रोत 5) में खम्बायत (गुजरात) के बारे में क्या आदेश था, और उसमें किनसे कहा गया कि वे रास्ते में न आएँ? | यीशु की जमात के पादरी खम्बायत में इबादत के लिए गिरजाघर की इमारत बनाना चाहते थे। फ़रमान में कहा गया कि “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ” और उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें। इससे दिखता है कि फ़रमान की बेअदबी का अंदेशा खम्बायत के महानुभावों की ओर से था। (पृष्ठ 149) |
| ★63 | औरंगज़ेब ने 1661–62 में किस जोगी को पत्र लिखा (स्रोत 6), उसमें किस देवता का नाम आता है, और बादशाह का रवैया कैसा दिखता है? | पत्र जोगी गुरु आनंद नाथ को लिखा गया, और उसमें शिव का नाम आता है (श्री शिव जियो की पनाह)। औरंगज़ेब ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा कि जब भी मदद की ज़रूरत हो, जोगी उन्हें लिख सकते हैं। बादशाह का रवैया आदर और उदारता का है। (पृष्ठ 150) |
| ★64 | इस्लाम कबूल करने वालों ने सैद्धांतिक रूप से कौन-सी पाँच मुख्य बातें मानीं? | (1) अल्लाह एकमात्र ईश्वर है। (2) पैगम्बर मोहम्मद उनके दूत हैं। (3) दिन में पाँच बार नमाज़ पढ़ी जानी चाहिए। (4) खैरात (ज़कात) बाँटनी चाहिए। (5) रमज़ान के महीने में रोज़ा रखना चाहिए और हज के लिए मक्का जाना चाहिए। (पृष्ठ 150) |
| ★65 | खोजा इस्माइली (शिया) समुदाय के लोगों ने कुरान के विचारों की अभिव्यक्ति के लिए कौन-सी देशी साहित्यिक विधा अपनाई, और उसे किन भाषाओं में गाया जाता था? | जीनन (व्युत्पत्ति संस्कृत शब्द ज्ञान से) नाम के भक्ति गीत, जो राग में निबद्ध थे। वे पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में दैनिक प्रार्थना के दौरान गाए जाते थे। (पृष्ठ 150) |
| ★66 | खोजा समुदाय के भक्ति गीत जीनन खोजकी लिपि में लिखे जाने से पहले कैसे आगे पहुँचाए जाते थे, और खोजकी लिपि किस लिपि से निकली? | लिखे जाने से पहले जीनन का मौखिक प्रेषण होता था। खोजकी लिपि स्थानीय लंडा (व्यापारियों की संक्षिप्त लिपि) से निकली है। पंजाब, सिंध और गुजरात के खोजा लोग सभी लंडा का प्रयोग करते थे। (पृष्ठ 150) |
| ★67 | मालाबार तट (केरल) पर बसे अरब मुसलमान व्यापारियों ने स्थानीय भाषा और आचारों में क्या अपनाया, और मातृगृहता का क्या अर्थ है? | उन्होंने स्थानीय मलयालम भाषा अपनाई और स्थानीय आचार जैसे मातृकुलीयता (अध्याय 3) और मातृगृहता को भी अपनाया। मातृगृहता वह परिपाटी है जहाँ स्त्रियाँ विवाह के बाद अपने मायके में ही अपनी संतान के साथ रहती हैं और उनके पति उनके साथ आकर रह सकते हैं। (पृष्ठ 150, 151) |
| ★★68 | ! क्या मस्जिद के सारे स्थापत्य तत्व हर जगह एक जैसे होते थे? | नहीं। कुछ तत्व सार्वभौमिक थे: इमारत का मक्का की तरफ़ अनुस्थापन, जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिम्बर (व्यासपीठ) की स्थापना से लक्षित होता था। बहुत से तत्वों में भिन्नता देखने में आती है, जैसे छत और निर्माण का सामान। किताब के अनुसार एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दिखता है। (पृष्ठ 151) |
| ★69 | किताब में मस्जिदों के स्थानीय रूप दिखाने वाले तीन चित्र कौन-से हैं (केरल, मैमनसिंग और श्रीनगर)? | (1) केरल में तेरहवीं शताब्दी की एक मस्जिद, जिसकी शिखर के आकार की छत पर गौर करने को कहा गया है (चित्र 6.9)। (2) ईंटों की बनी अतिया मस्जिद, 1609, ज़िला मैमनसिंग, बांग्लादेश (चित्र 6.10)। (3) श्रीनगर में झेलम नदी के किनारे बनी शाह हमदान मस्जिद, 1395, कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण, जो ‘मुकुट का नगीना’ समझी जाती है और पेपरमैशी से सजाई गई है (चित्र 6.11)। (पृष्ठ 151, 152) |
| ★★70 | ! क्या हिंदू और मुसलमान शब्द हमेशा से धार्मिक समुदायों के निश्चित नाम के रूप में चलते थे? | नहीं। किताब कहती है कि इन शब्दों का बहुत समय तक कोई प्रचलन नहीं था। आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों का अध्ययन करने वाले इतिहासकार बताते हैं कि उनमें मुसलमान शब्द का शायद ही कहीं प्रयोग हुआ। इसके बजाय लोगों का वर्गीकरण उनके जन्मस्थान के आधार पर किया जाता था। (पृष्ठ 151) |
| ★71 | आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के मध्य के संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में तुर्की मुसलमानों, तजाकिस्तान से आए लोगों और फारस के लोगों को किन नामों से पुकारा गया? | तुर्की मुसलमानों को तुरुष्क, तजाकिस्तान से आए लोगों को ताजिक और फारस के लोगों को पारसीक कहा गया। (पृष्ठ 151) |
| ★72 | संस्कृत ग्रंथों में यदा-कदा पुराने नाम नए प्रवासियों के साथ भी जोड़े गए। इसका किताब कौन-सा उदाहरण देती है? | तुर्क और अफ़गानों को शक और यवन (ग्रीक लोगों के लिए प्रयुक्त) भी कहा गया। (पृष्ठ 151) |
| ★73 | तुर्क और अफ़गान जैसे प्रवासी समुदायों के लिए किताब किस एक अधिक सामान्य शब्द का ज़िक्र करती है, और वह किस ओर इंगित करता है? | म्लेच्छ। यह इस ओर इंगित करता है कि वे वर्ण नियमों का पालन नहीं करते थे और ऐसी भाषाएँ बोलते थे जो संस्कृत से नहीं उपजी थीं। ऐसे शब्दों में हीनभावना निहित थी, पर उन्हें किसी ऐसे विशिष्ट मुसलमान धार्मिक समुदाय के लिए, जो हिंदू समुदाय के विपक्ष में हो, शायद ही प्रयुक्त किया जाता था। (पृष्ठ 151, 152) |
सेट 5 — सूफ़ीमत: ख़ानक़ाह, सिलसिला, दरगाह और उर्स (कार्ड 74–88)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★74 | इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में किन लोगों को सूफ़ी कहा जाने लगा, और वे किसके विरुद्ध खड़े हुए थे? | खिलाफ़त (धार्मिक और राजनीतिक संस्था) की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरुद्ध कुछ आध्यात्मिक लोगों का झुकाव रहस्यवाद और वैराग्य की ओर बढ़ा। इन्हें सूफ़ी कहा जाने लगा। (पृष्ठ 152) |
| ★75 | सूफ़ियों ने धर्माचार्यों की किस चीज़ की आलोचना की, और मुक्ति के लिए किस पर बल दिया? | उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं तथा धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। मुक्ति के लिए उन्होंने ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया। पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल बताकर उनका अनुसरण करने की सीख दी, और कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों के आधार पर की। (पृष्ठ 152) |
| ★76 | ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीमत किस रूप में पहुँच चुका था, और संस्थागत दृष्टि से सूफ़ी अपने को किसके इर्द–गिर्द स्थापित करते थे? | ग्यारहवीं शताब्दी तक आते–आते सूफ़ीमत एक पूर्ण विकसित आंदोलन था, जिसका सूफ़ी और कुरान से जुड़ा अपना साहित्य था। संस्थागत दृष्टि से सूफ़ी अपने को एक संगठित समुदाय, यानी ख़ानक़ाह (फारसी) के इर्द–गिर्द स्थापित करते थे। (पृष्ठ 152) |
| ★★77 | ख़ानक़ाह का नियंत्रण किसके हाथ में होता था, और वह क्या-क्या करता था? | शेख (अरबी), पीर अथवा मुर्शीद (फारसी) के हाथ में। वे अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे और अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे। आध्यात्मिक व्यवहार के नियम निर्धारित करने के अलावा वे ख़ानक़ाह में रहने वालों के आपसी संबंध और शेख व जनसामान्य के बीच के रिश्तों की सीमा भी नियत करते थे। (पृष्ठ 152) |
| ★★78 | ! क्या सूफ़ीवाद इस्लामी ग्रंथों का अपना शब्द है? | किताब के अनुसार नहीं। सूफ़ीवाद उन्नीसवीं शताब्दी में मुद्रित एक अंग्रेज़ी शब्द है। इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए जिस शब्द का इस्तेमाल होता है, वह है तसव्वुफ़। (पृष्ठ 152) |
| 79 | तसव्वुफ़ शब्द की व्युत्पत्ति के बारे में किताब कौन-सी तीन बातें बताती है? | (1) कुछ विद्वानों के अनुसार यह सूफ़ से निकलता है, जिसका अर्थ ऊन है, यानी उस खुरदुरे ऊनी कपड़े की ओर इशारा जो सूफ़ी पहनते थे। (2) अन्य विद्वान इसे सफ़ा से मानते हैं, जिसका अर्थ साफ़ है। (3) यह भी संभव है कि यह शब्द सफ़ा से निकला हो, जो पैगम्बर की मस्जिद के बाहर एक चबूतरा था, जहाँ निकट अनुयायियों की मंडली धर्म के बारे में जानने के लिए इकट्ठी होती थी। (पृष्ठ 152) |
| ★★80 | बारहवीं शताब्दी के आसपास इस्लामी दुनिया में बनने लगे सूफ़ी सिलसिले का शाब्दिक अर्थ क्या है, और वह किस रिश्ते का द्योतक है? | सिलसिला का शाब्दिक अर्थ है जंज़ीर। यह शेख और मुरीद के बीच के निरंतर रिश्ते का द्योतक है, जिसकी पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है। इस कड़ी के द्वारा आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद मुरीदों तक पहुँचता था। (पृष्ठ 153) |
| ★81 | सूफ़ी सिलसिलों में दीक्षा के विशिष्ट अनुष्ठान में दीक्षित को क्या करना होता था? | दीक्षित को निष्ठा का वचन देना होता था, और सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र धारण करने पड़ते थे। (पृष्ठ 153) |
| ★★82 | पीर की मृत्यु के बाद उसकी दरगाह क्या बन जाती थी, और वहाँ जाने की कौन-सी परिपाटी चल निकली? | दरगाह (फारसी में इसका अर्थ दरबार) पीर के मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी। पीर की दरगाह पर ज़ियारत के लिए जाने की, खासतौर से उनकी बरसी के अवसर पर, परिपाटी चल निकली। (पृष्ठ 153) |
| ★★83 | ! पीर की बरसी पर दरगाह की ज़ियारत की परिपाटी को उर्स क्यों कहा जाता था? | उर्स का अर्थ है विवाह, मायने पीर की आत्मा का ईश्वर से मिलन। इसे उर्स इसलिए कहा जाता था कि लोगों का मानना था कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत हो जाते हैं और इस तरह पहले के बजाय उनके अधिक करीब हो जाते हैं। (पृष्ठ 153) |
| ★84 | लोग सूफ़ी पीर की दरगाह पर किसलिए जाते थे, और इससे शेख के प्रति कौन-सी परिपाटी शुरू हुई? | लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं की पूर्ति के लिए पीर का आशीर्वाद लेने जाते थे। इस तरह शेख का वली के रूप में आदर करने की परिपाटी शुरू हुई। (पृष्ठ 153) |
| ★85 | वली (बहुवचन औलिया) किसे कहा जाता था? | ईश्वर का मित्र: वह सूफ़ी जो अल्लाह के नज़दीक होने का दावा करता था और उनसे मिली बरकत से करामात करने की शक्ति रखता था। (पृष्ठ 153) |
| ★86 | ! क्या हर सूफ़ी सिलसिले का नाम उसे स्थापित करने वाले के नाम पर पड़ा? | नहीं। ज्यादातर सूफ़ी वंश उन्हें स्थापित करने वालों के नाम पर पड़े: उदाहरणत:, कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर पड़ा। कुछ अन्य सिलसिलों का नामकरण जन्मस्थान पर हुआ: चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से लिया गया। (पृष्ठ 153) |
| ★87 | कुछ रहस्यवादियों ने ख़ानक़ाह के बारे में क्या रुख़ अपनाया, और वे किन नामों से जाने जाते थे? | उन्होंने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर नवीन आंदोलनों की नींव रखी। उन्होंने ख़ानक़ाह का तिरस्कार किया, फकीर की ज़िंदगी बिताई, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव प्रदान किया। उन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी इत्यादि नामों से जाना जाता था। (पृष्ठ 153) |
| ★88 | बे–शरिया और बा–शरिया सूफ़ी किन्हें कहा जाता था? | जो रहस्यवादी शरिया की अवहेलना करते थे, उन्हें बे–शरिया कहा जाता था। उन्हें शरिया का पालन करने वाले सूफ़ियों से अलग करके देखा जाता था, और शरिया का पालन करने वाले सूफ़ी बा–शरिया कहलाए। (पृष्ठ 153) |
सेट 6 — चिश्ती सिलसिला: ख़ानक़ाह, उपदेशक और अजमेर की दरगाह (कार्ड 89–105)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★89 | बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफ़ी समुदायों में कौन-सा सबसे अधिक प्रभावशाली रहा, और किताब इसका क्या कारण बताती है? | चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे। कारण यह था कि उन्होंने न केवल अपने आपको स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला, अपितु भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशिष्टताओं को भी अपनाया। (पृष्ठ 153) |
| ★90 | शेख निज़ामुद्दीन औलिया (चौदहवीं शताब्दी) की ख़ानक़ाह दिल्ली में कहाँ थी, और उसमें कौन रहते थे? | उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना नदी के किनारे ग़ियासपुर में। वहाँ कई छोटे–छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना) था, जहाँ सहवासी और अतिथि रहते और उपासना करते थे। सहवासियों में शेख का अपना परिवार, सेवक और अनुयायी थे। (पृष्ठ 153) |
| ★91 | निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में शेख कहाँ रहते थे, और मंगोल आक्रमण के समय वहाँ क्या हुआ? | शेख एक छोटे कमरे में छत पर रहते थे, जहाँ वे मेहमानों से सुबह–शाम मिला करते थे। आँगन गलियारे से घिरा होता था और ख़ानक़ाह को चारों ओर से दीवार घेरे रहती थी। एक बार मंगोल आक्रमण के समय पड़ोसी क्षेत्र के लोगों ने ख़ानक़ाह में शरण ली। (पृष्ठ 154) |
| ★★92 | चिश्ती सिलसिला के पाँच मुख्य उपदेशक कौन थे, उनकी मृत्यु किस वर्ष हुई, और उनकी दरगाह कहाँ है? | (1) शेख मुइनुद्दीन चिश्ती, 1235, अजमेर (राजस्थान)। (2) ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, 1235, दिल्ली। (3) शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर, 1265, अजोधन (पाकिस्तान)। (4) शेख निज़ामुद्दीन औलिया, 1325, दिल्ली। (5) शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली, 1356, दिल्ली। (पृष्ठ 154) |
| ★★93 | निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में लंगर किस पर चलता था, और वहाँ कौन-कौन लोग आते थे? | सामुदायिक रसोई (लंगर) फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी। सुबह से देर रात तक सब तबके के लोग आते थे: सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर। वे अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज़ लेने अथवा विभिन्न मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए आते थे। (पृष्ठ 154) |
| ★94 | निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में आने वाले किन कवियों और किस दरबारी इतिहासकार का नाम किताब देती है, और उन्होंने क्या किया? | मिलने वालों में अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि तथा दरबारी इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी जैसे लोग शामिल थे। इन सभी लोगों ने शेख के बारे में लिखा। (पृष्ठ 154) |
| ★★95 | निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह के कौन-से व्यवहार दिखाते हैं कि स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करने का प्रयत्न किया गया? | शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों के सर का मुंडन तथा यौगिक व्यायाम आदि व्यवहार। किताब के अनुसार ये इस तथ्य के द्योतक हैं कि स्थानीय परंपराओं को आत्मसात करने का प्रयत्न किया गया। (पृष्ठ 154) |
| ★96 | शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने अपने आध्यात्मिक वारिसों के साथ क्या किया, और इसका क्या नतीजा निकला? | उन्होंने कई आध्यात्मिक वारिसों का चुनाव किया और उन्हें उपमहाद्वीप के विभिन्न भागों में ख़ानक़ाह स्थापित करने के लिए नियुक्त किया। इस वजह से चिश्तियों के उपदेश, व्यवहार और संस्थाएँ तथा शेख का यश चारों ओर फैल गया। उनकी तथा उनके आध्यात्मिक पूर्वजों की दरगाह पर अनेक तीर्थयात्री आने लगे। (पृष्ठ 154) |
| ★97 | सूफ़ी संतों की दरगाह पर की गई ज़ियारत में किसकी कामना की जाती है, और किताब के अनुसार पाँच महान चिश्ती संतों की दरगाह पर कितने समय से लोग आस्था प्रकट करते रहे हैं? | संत के आध्यात्मिक आशीर्वाद यानी बरकत की कामना की जाती है। किताब के अनुसार पिछले सात सौ सालों से अलग–अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग पाँच महान चिश्ती संतों की दरगाह पर अपनी आस्था प्रकट करते रहे हैं। (पृष्ठ 154) |
| ★98 | पाँच चिश्ती संतों की दरगाहों में सबसे अधिक पूजनीय दरगाह किसकी है, और उन्हें किस नाम से पुकारा जाता है? | ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह, जिन्हें “ग़रीब नवाज़” कहा जाता है। (पृष्ठ 154) |
| ★99 | अबुल हसन अल हुजविरी को 1039 ईसवी में किस हाल में सिंधु नदी पार करनी पड़ी, वे कहाँ बस गए, और उन्होंने फारसी में कौन-सी किताब लिखी? | हुजविरी अफगानिस्तान के शहर गज़नी के निकट हुजविर के रहने वाले थे। 1039 ईसवी में उन्हें तुर्की सेना के एक कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करनी पड़ी। वे लाहौर में बस गए और फारसी में उन्होंने कश्फ–उल–महजुब (परदे वाले की बेपर्दगी) लिखी, जिसमें तसव्वुफ़ के मायने और इसका पालन करने वाले सूफ़ियों के बारे में बताया गया था। (पृष्ठ 154) |
| ★100 | लाहौर में हुजविरी की दरगाह किसने बनवाई, और आज उन्हें और उनकी दरगाह को किन नामों से जाना जाता है? | उन्हें लाहौर में दफ़नाया गया और सुल्तान महमूद गज़नी के पोते ने उनकी मज़ार पर दरगाह बनवाई। आज भी हुजविरी दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं, और उनकी दरगाह को दाता दरबार, यानी देने वाले की दरगाह, कहा जाता है। (पृष्ठ 154) |
| ★★101 | अजमेर में ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह पर आने वाला पहला सुल्तान कौन था, और मज़ार पर सबसे पहली इमारत किसने बनवाई? | मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51) पहला सुल्तान था जो इस दरगाह पर आया। शेख की मज़ार पर सबसे पहली इमारत मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में बनवाई। दरगाह का सबसे पहला किताबी ज़िक्र चौदहवीं शताब्दी का है। (पृष्ठ 155) |
| ★102 | अजमेर की ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह किन कारणों से लोकप्रिय थी, और वहाँ अनेक यात्री क्यों आते थे? | किताब के अनुसार यह दरगाह शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा तथा उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता और राजसी मेहमानों द्वारा दिए गए प्रश्रय के कारण लोकप्रिय थी। यह दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी, अत: अनेक यात्री यहाँ आते थे। (पृष्ठ 155) |
| ★★103 | मुग़ल बादशाह अकबर अजमेर में ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह पर कितनी बार आया, किसने उसे वहाँ आने के लिए प्रेरित किया, और किन अवसरों पर? | सोलहवीं शताब्दी तक आते–आते यह दरगाह बहुत लोकप्रिय हो गई थी, और इसे जानने वाले तीर्थयात्रियों के भजनों ने ही अकबर को यहाँ आने के लिए प्रेरित किया। अकबर यहाँ चौदह बार आया: कभी साल में दो–तीन बार, कभी नयी जीत के लिए आशीर्वाद लेने अथवा संकल्प की पूर्ति पर, या फिर पुत्रों के जन्म पर। (पृष्ठ 155) |
| ★104 | चित्र 6.12 में कलाकार ने शेख निज़ामुद्दीन औलिया और उनके शिष्य अमीर खुसरो में फर्क कैसे दिखाया है? | यह सत्रहवीं शताब्दी का चित्र है। शेख बैठे हैं, उनके सिर के पीछे प्रभामंडल है और पास में किताब है। शिष्य उनके सामने घुटनों के बल है और उसके हाथ में तार वाला वाद्य है। बैठने के ढंग, प्रभामंडल और हाथ की चीज़ से लगता है कि कलाकार शेख का ऊँचा दर्जा और शिष्य की विनम्रता दिखाना चाहता है। (पृष्ठ 155) |
| ★105 | चित्र 6.13 किस घटना को दिखाता है, और उसे किस कलाकार ने कब बनाया? | अजमेर की तीर्थ यात्रा पर बादशाह जहाँगीर का स्वागत करते हुए शेख। यह मनोहर नामक कलाकार का चित्र है, जो लगभग 1615 का है। (पृष्ठ 155) |
सेट 7 — चिश्ती दरगाह की ज़ियारत, भाषा और संगीत (कार्ड 106–118)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★106 | अठारहवीं शताब्दी में दक्कन के दरगाह कुली खान ने दिल्ली में शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली की दरगाह के बारे में अपनी किताब मुरक्का–ए–देहली में क्या लिखा? | दरगाह कुली खान ने लिखा कि “शेख सिर्फ देहली के ही चिराग नहीं अपितु सारे मुल्क के चिराग हैं।” इतवार को खासतौर से लोगों का हुजूम आता था। दीवाली के महीने में दिल्ली की सारी आबादी दरगाह पर उमड़ आती थी और हौज़ के पास तम्बू गाड़कर कई दिनों तक रहती थी। लोग पुराने रोगों को ठीक करने के लिए वहाँ नहाते थे। उनके शब्दों में “हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं।” (पृष्ठ 156) |
| ★107 | मुग़ल शहज़ादी जहाँआरा ने 1643 में आगरा से अजमेर की यात्रा की। स्रोत 7 के अनुसार उन्होंने शेख मुइनुद्दीन चिश्ती के प्रति भक्ति कैसे दिखाई, और वे दरगाह की खासियत कैसे बताती हैं? | रास्ते में: हर रोज़ और हर मुकाम पर दो बार की अख़्तियारी नमाज़ अदा करने का वायदा; बहुत दिन तक रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; मुकद्दस दरगाह की तरफ़ न पैर फैलाए, न पीठ की; दिन पेड़ के नीचे गुज़ारे। दरगाह में: “अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से” रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लिए, सबसे उम्दा इतर छिड़का और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा। खासियत: वे बार–बार उसे मुकद्दस दरगाह कहती हैं, जो “चिराग और इतर में डूबे” थी और गुम्बद के भीतर “रोशनी से भरी” थी। (पृष्ठ 156) |
| ★108 | मुग़ल बादशाह अकबर ने अजमेर में ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह को 1568 में क्या भेंट किया, अहाते में क्या बनवाया, और अजमेर आने की परंपरा कब तक निभाई? | 1568 में तीर्थयात्रियों के खाना पकाने के लिए एक विशाल देग़ भेंट की और दरगाह के अहाते में एक मस्जिद बनवाई। अजमेर आने की यह परंपरा अकबर ने 1580 तक बनाए रखी। हर यात्रा पर बादशाह दान–भेंट देते थे, जिनके ब्योरे शाही दस्तावेज़ों में दर्ज हैं। (पृष्ठ 156) |
| ★★109 | सूफ़ी दरगाह की ज़ियारत में नाच और संगीत की क्या जगह थी, और सूफ़ी संत ईश्वर की उपासना किन दो तरीकों से करते थे? | नाच और संगीत भी ज़ियारत का हिस्सा थे, खासतौर से कव्वालों द्वारा प्रस्तुत रहस्यवादी गुणगान, जिससे परमानंद की भावना को उभारा जा सके। सूफ़ी संत ज़िक्र (ईश्वर का नाम–जाप) या फिर समा (श्रवण करना) यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल के द्वारा ईश्वर की उपासना में विश्वास रखते थे। (पृष्ठ 156) |
| ★110 | किताब के अनुसार चिश्ती उपासना पद्धति में समा का महत्त्व किस बात की पुष्टि करता है? | इस बात की कि चिश्ती स्थानीय भक्ति परंपरा से जुड़े थे। किताब के इस वाक्य में ‘सभा’ छपा है; उसी पृष्ठ पर इससे ठीक पहले इसे ‘समा (श्रवण करना)’, यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल बताया गया है। (पृष्ठ 156) |
| ★111 | दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग किस भाषा में बातचीत करते थे, और बाबा फरीद की क्षेत्रीय भाषा की कविता किस ग्रंथ में संकलित है? | हिंदवी में बातचीत करते थे। बाबा फरीद ने क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचना की, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है। चिश्तियों ने समा (आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल) में भी स्थानीय भाषा अपनाई। (पृष्ठ 156, 157) |
| ★112 | कुछ सूफ़ियों की लिखी मसनवी क्या होती है, और मलिक मोहम्मद जायसी का प्रेमाख्यान पद्मावत किस कथा के इर्द–गिर्द घूमता है? | मसनवी लंबी कविता है, जिसमें ईश्वर के प्रति प्रेम को मानवीय प्रेम के रूपक के द्वारा अभिव्यक्त किया जाता है। जायसी का पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा के इर्द–गिर्द घूमता है; किताब के अनुसार उनकी आज़माइश आत्मा की परमात्मा तक पहुँचने की यात्रा का प्रतीक है। अक्सर ख़ानक़ाहों में समा के दौरान ऐसे काव्यों का वाचन होता था। (पृष्ठ 157) |
| ★113 | बीजापुर (कर्नाटक) के आसपास सूफ़ी कविता की कौन-सी भिन्न विधा रची गई, किसने रची, और उन्हें कौन गाता था? | दक्खनी (उर्दू का रूप) में लिखी छोटी कविताएँ, जो सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों में उस क्षेत्र में बसने वाले चिश्ती संतों ने रचीं। किताब के अनुसार ये रचनाएँ संभवत: औरतों द्वारा चक्की पीसते और चरखा कातते हुए गाई जाती थीं। कुछ और रचनाएँ लोरीनामा और शादीनामा के रूप में लिखी गईं। किताब कहती है कि यह संभव है कि इस क्षेत्र के सूफ़ी वहाँ पहले से चलती आई भक्ति परंपरा से प्रभावित हुए। (पृष्ठ 157) |
| ★114 | दक्कन में सूफ़ियों पर किन रचनाओं का प्रभाव पड़ा, और इस माध्यम से इस्लाम को कहाँ जगह मिली? | लिंगायतों द्वारा लिखे गए कन्नड़ के वचन और पंढरपुर के संतों द्वारा लिखे मराठी के अभंगों ने उन पर अपना प्रभाव छोड़ा। किताब के अनुसार इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पाने में सफल हुआ। (पृष्ठ 158) |
| ★115 | स्रोत 8 (चरखानामा) में चरखे के काम के हर चरण के साथ कौन-सा ज़िक्र जोड़ा गया है, और स्वास के धागे कितने तक गिनने को कहा गया है? | रुई लेने के साथ ज़िक्र–ए–जाली, रुई धुनने के साथ ज़िक्र–ए–कल्बी, और धागे को फिरकी पर लपेटने के साथ ज़िक्र–ए–आइनी करने को कहा गया है। ज़िक्र पेट से छाती तक उच्चारित किया जाए। स्वास (साँस) के धागे एक–एक गिनें, चौबीस हज़ार तक, सुबह–शाम। गीत का अंत है: “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।” (पृष्ठ 157) |
| ★116 | किताब के हाशिये का प्रश्न: स्रोत 8 (चरखानामा) के गीत के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके स्रोत 7 में जहाँआरा की ज़ियारत से कैसे समान और भिन्न हैं? | समानता: दोनों में पीर या शेख के प्रति भक्ति है। चरखानामा के गीत का अंत है “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।”; जहाँआरा ने मज़ार पर इतर छिड़का और दुपट्टा रखा। अंतर (कौन, क्या): चरखानामा चरखे की धुन पर आधारित गीत है; स्रोत 7 मुग़ल शहज़ादी जहाँआरा की लिखी शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की जीवनी मुनिस–अल–अखाह का अंश है। अंतर (तरीका): गीत में चरखे के हर चरण के साथ ज़िक्र जुड़ा है; जहाँआरा की भक्ति शरीर के आचारों से दिखती है: सात फेरे, ज़मीन चूमना, नंगे पाँव चलना। (पृष्ठ 156, 157) |
| ★★117 | अमीर खुसरो (1253–1325) कौन थे, और उन्होंने चिश्ती समा को क्या दिया? | महान कवि, संगीतज्ञ तथा शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे। उन्होंने कौल (अरबी शब्द जिसका अर्थ है कहावत) का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया। (पृष्ठ 157) |
| ★118 | चित्र 6.14 किसकी दरगाह की कव्वाली दिखाता है, और कव्वाली में कौल कहाँ गाया जाता है? | चित्र निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह की कव्वाली का है। कौल को कव्वाली के शुरू और आखिर में गाया जाता था; इसके बाद सूफ़ी कविता का पाठ होता था, जो फारसी, हिंदवी अथवा उर्दू में होती थी और कभी–कभी इन तीनों ही भाषाओं के शब्द इसमें मौजूद होते थे। निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह पर गाने वाले कव्वाल अपने गायन की शुरुआत कौल से करते हैं। उपमहाद्वीप की सभी दरगाहों पर कव्वाली गाई जाती है। (पृष्ठ 157) |
सेट 8 — चिश्ती सूफ़ी और राज्य (कार्ड 119–129)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★119 | ! क्या चिश्ती सूफ़ी शासकों की ओर से दिया गया हर अनुदान या हर भेंट ठुकरा देते थे? | नहीं। चिश्ती संयम और सादगी का जीवन जीते थे और सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर किताब के अनुसार इसका मतलब राजनीतिक सत्ता से अलगाव का भाव रखना नहीं था। सत्ताधारी विशिष्ट वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता तो सूफ़ी संत उसे स्वीकार करते थे। सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि अनुदान में दी और दान संबंधी न्यास स्थापित किए। (पृष्ठ 158) |
| ★120 | चिश्ती संतों को जो दान धन और सामान के रूप में मिलता था, उसका वे क्या करते थे, और शासक उनका समर्थन क्यों चाहते थे? | धन और सामान स्वीकार करके वे उसे सँजोने के बजाय खाने, कपड़े, रहने की व्यवस्था और अनुष्ठानों (जैसे समा की महफ़िलों) पर पूरी तरह खर्च कर देते थे। इस तरह शेख के नैतिक अधिकार की पुष्टि होती थी और आम लोगों का उनकी ओर झुकाव बढ़ता था। संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और लोगों द्वारा उनकी चमत्कारी शक्ति में विश्वास उनकी लोकप्रियता का कारण था, और इन वजहों से शासक भी उनका समर्थन हासिल करना चाहते थे। (पृष्ठ 158) |
| ★★121 | जब तुर्कों ने दिल्ली सल्तनत की स्थापना की, तब उलमा की कौन-सी माँग को उन्होंने ठुकरा दिया, और सुल्तानों ने सूफ़ी संतों का सहारा क्यों लिया? | उलमा चाहते थे कि शरिया लागू किया जाए; तुर्कों ने यह माँग ठुकरा दी। सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम धर्म मानने वाली नहीं है। ऐसे में उन्होंने सूफ़ी संतों का सहारा लिया, जो अपनी आध्यात्मिक सत्ता को अल्लाह से उद्भूत मानते थे और उलमा द्वारा शरिया की व्याख्या पर निर्भर नहीं थे। (पृष्ठ 158) |
| ★122 | किताब के अनुसार औलिया को किस रूप में माना जाता था, और शासक अपनी कब्र के लिए सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक की जगह क्यों चाहते थे? | माना जाता था कि औलिया मध्यस्थ के रूप में ईश्वर से लोगों की ऐहिक और आध्यात्मिक दशा में सुधार लाने का काम करते हैं। किताब कहती है कि शायद इसी मान्यता के कारण शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे। (पृष्ठ 158) |
| ★★123 | सुल्तानों और सूफ़ियों के बीच तनाव के उदाहरणों में दोनों किन आचारों पर बल देते थे, और शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें किस पदवी से पुकारते थे? | अपनी सत्ता का दावा करने के लिए दोनों ही कुछ आचारों पर बल देते थे, जैसे झुक कर प्रणाम और कदम चूमना। कभी–कभी सूफ़ी शेखों को आडंबरपूर्ण पदवी से संबोधित किया जाता था: उदाहरण के लिए, निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान–उल–मशेख (अर्थात शेखों में सुल्तान) कहते थे। (पृष्ठ 158) |
| ★124 | दिल्ली सल्तनत के युग के सुहरावर्दी और मुग़ल युग के नक्शबंदी सूफ़ियों का राज्य से जुड़ाव कैसा था? | किताब के अनुसार ये सूफ़ी भी राज्य से जुड़े रहे, लेकिन उनके जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से भिन्न थे। कभी–कभी सूफ़ी दरबारी पद भी स्वीकार कर लेते थे। (पृष्ठ 158) |
| ★125 | स्रोत 9 (“शाही भेंट अस्वीकार”) में अमीर हसन सिजज़ी ने 1313 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह की किस घटना का वर्णन किया है, और शेख ने क्या कहा? | एक स्थानीय शासक ने शेख को दो बगीचे और बहुत सी ज़मीन का पट्टा भेजा, साथ में उनके रखरखाव के औज़ार और आवश्यक वस्तुएँ भी। शेख ने यह भेंट नहीं ली; अंश का शीर्षक ही “शाही भेंट अस्वीकार” है। अपने आध्यात्मिक गुरुओं का हवाला देकर शेख ने पूछा: “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?… हमारे कोई भी आध्यात्मिक गुरु ने इस तरह का काम नहीं किया।” (पृष्ठ 159) |
| ★126 | स्रोत 9 में निज़ामुद्दीन औलिया ने कौन-सी कहानी सुनाई, और सुल्तान ग़ियासुद्दीन (तब उलुग़ ख़ान) की भेंट पर शेख फ़रीदुद्दीन ने क्या जवाब दिया? | तब ग़ियासुद्दीन उलुग़ ख़ान के नाम से जाने जाते थे। वे शेख फ़रीदुद्दीन से मिलने आए और कुछ धनराशि तथा चार गाँवों का पट्टा भेंट किया; धन दरवेशों के लिए था और ज़मीन शेख के अपने इस्तेमाल के लिए। मुस्कुराते हुए शेख–अल–इस्लाम (फ़रीदुद्दीन) ने कहा: “मुझे धन दे दो मैं इसे दरवेशों में बाँट दूँगा, पर जहाँ तक ज़मीन के पट्टे का सवाल है उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।” (पृष्ठ 159) |
| ★127 | किताब के हाशिये का प्रश्न: स्रोत 9 की कहानी से सूफ़ियों और राज्य के संबंध का कौन-सा पहलू स्पष्ट होता है, और यह किस्सा शेख और उनके अनुयायियों के संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है? | राज्य से संबंध: शासक सूफ़ी संतों से संपर्क रखना और उनका समर्थन पाना चाहते थे। पर इस स्रोत में निज़ामुद्दीन औलिया ने बगीचे और ज़मीन की भेंट नहीं ली, और फ़रीदुद्दीन ने कहा कि धन दे दीजिए, वे उसे दरवेशों में बाँट देंगे, पर ज़मीन के पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।” संपर्क का तरीका: अनुयायी शेख से मिलने आते थे; अमीर हसन सिजज़ी ने लिखा कि उनकी अच्छी किस्मत थी कि वे शेख के कदम चूम सके। निज़ामुद्दीन औलिया ने एक उचित कहानी भी सुनाई। मिलने वाले कवियों और इतिहासकारों ने शेख के बारे में लिखा भी। (पृष्ठ 154, 159) |
| ★★128 | किताब के “चर्चा कीजिए” में पूछा गया है: धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के संभावित स्रोत क्या-क्या हैं? | पृष्ठ 158 और स्रोत 9 से चार स्रोत मिलते हैं। (1) सत्ता का दिखावा: सुल्तान और सूफ़ी दोनों झुक कर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे। (2) पदवियाँ: शेखों को आडंबरपूर्ण पदवी दी जाती थी, जैसे सुल्तान–उल–मशेख। (3) भेंट और ज़मीन: शासक भेंट देकर संतों का समर्थन पाना चाहते थे, पर स्रोत 9 में शेख ने ज़मीन का पट्टा नहीं लिया। (4) शरिया का प्रश्न: उलमा शरिया लागू करवाना चाहते थे, जबकि सुल्तानों ने यह माँग ठुकरा दी। (पृष्ठ 158, 159) |
| ★129 | चित्र 6.15 में फतेहपुर सीकरी की कौन-सी दरगाह दिखाई गई है, और किताब के अनुसार वह किसका प्रतीक थी? | अकबर की राजधानी फतेहपुर सीकरी में बाबा फरीद के वंशज शेख सलीम चिश्ती की दरगाह। किताब के अनुसार यह दरगाह चिश्तियों और मुग़ल राज्य के घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक थी। (पृष्ठ 159) |
सेट 9 — कबीर, नानक, मीरा और शंकरदेव (कार्ड 130–156)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★★130 | कबीर किस काल के संत कवि माने गए हैं, और इतिहासकार उनके जीवन और काल का अध्ययन किस आधार पर करते हैं? | लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी के। इतिहासकारों ने उनके जीवन और काल का अध्ययन उनके काव्य और बाद में लिखी गई जीवनियों के आधार पर किया है। किताब के अनुसार यह प्रक्रिया कई वजहों से चुनौतीपूर्ण रही है। (पृष्ठ 160) |
| ★131 | कबीर की बानी किन तीन संकलनों में मिलती है, और ये कहाँ संरक्षित हैं? | कबीर की बानी तीन विशिष्ट किंतु परस्पर व्याप्त परिपाटियों में संकलित है। कबीर बीजक कबीर पंथियों द्वारा वाराणसी तथा उत्तर प्रदेश के अन्य स्थानों पर संरक्षित है। कबीर ग्रंथावली का संबंध राजस्थान के दादू पंथियों से है। तीसरे, कबीर के कई पद आदि ग्रंथ साहिब में संकलित हैं। लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद में किए गए; उन्नीसवीं शताब्दी में उनके पद संग्रह बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में छापे गए। (पृष्ठ 160) |
| ★132 | कबीर की रचनाओं में संत भाषा और उलटबाँसी क्या हैं? | संत भाषा निर्गुण कवियों की खास बोली है, और कबीर की कुछ रचनाएँ इसमें हैं। उलटबाँसी (उलटी कही उक्तियाँ) ऐसी रचनाएँ हैं जो इस प्रकार लिखी गईं कि उनके रोज़मर्रा के अर्थ को उलट दिया गया। किताब के अनुसार इनका तात्पर्य परम सत्य के स्वरूप को समझने की मुश्किल दर्शाता है। “केवल ज फूल्या फूल बिन” और “समंदरि लागि आगि” जैसी अभिव्यंजनाएँ कबीर की रहस्यवादी अनुभूतियों को दर्शाती हैं। (पृष्ठ 160) |
| ★★133 | कबीर परम सत्य को वर्णित करने के लिए किन-किन परिपाटियों के शब्द इस्तेमाल करते हैं? | तीन परिपाटियों के: (1) इस्लामी दर्शन की तरह वे सत्य को अल्लाह, खुदा, हज़रत और पीर कहते हैं। (2) वेदांत दर्शन से प्रभावित वे उसे अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन् और आत्मन् कह कर भी संबोधित करते हैं। (3) शब्द और शून्य जैसी अभिव्यंजनाएँ योगी परंपरा से ली गई हैं। (पृष्ठ 160) |
| ★134 | स्रोत 10 (“एक ईश्वर”) में, जो रचना कबीर की मानी जाती है, ईश्वर को किन नामों से पुकारा गया है, और दो पक्षों के बारे में कबीर क्या कहते हैं? | रचना कहती है कि ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत। विभिन्नताएँ केवल शब्दों में हैं। कबीर कहते हैं कि “दोनों ही भुलावे में हैं”। एक बकरे को मारता है और दूसरा गाय को, और वे पूरा जीवन विवादों में ही गँवा देते हैं। (पृष्ठ 160) |
| ★★135 | किताब के हाशिये का प्रश्न: विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं? | स्रोत 10 में कबीर सवाल और तर्क से बात रखते हैं। (1) सवाल: “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?”, यानी यह कैसे हो सकता है। (2) नाम अलग, ईश्वर एक: अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि और हज़रत एक ही ईश्वर के नाम हैं, और “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।” (3) दोनों पर चोट: दोनों भुलावे में हैं; एक बकरे को मारता है, दूसरा गाय को, और वे पूरा जीवन विवादों में गँवा देते हैं। (पृष्ठ 160) |
| ★136 | कबीर के नाम से मिले पदों में कौन-से विविध और कभी-कभी विरोधात्मक विचार हैं, और क्या सभी पद कबीर के रचे हैं? | कुछ कविताएँ इस्लामी दर्शन के एकेश्वरवाद और मूर्तिभंजन का समर्थन करते हुए हिंदू धर्म के बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का खंडन करती हैं। अन्य कविताएँ ज़िक्र और इश्क के सूफ़ी सिद्धांतों का इस्तेमाल ‘नाम सिमरन’ की हिंदू परंपरा को व्यक्त करने के लिए करती हैं। किताब पूछती है कि क्या ये सभी कविताएँ कबीर द्वारा रची गईं, और कहती है, “यह कहना मुश्किल है।” विद्वान पदों की भाषा शैली और विषयवस्तु के आधार पर यह स्थापित करने की कोशिश करते हैं कि कौन-से पद कबीर के हैं। (पृष्ठ 161) |
| ★137 | चित्र 6.16 क्या दिखाता है, और किताब इससे संतों की रचनाओं के बारे में क्या संभावना बताती है? | सत्रहवीं शताब्दी का एक मुग़ल चित्र, जिसका शीर्षक है राह–चलते संगीतकार। किताब कहती है कि यह संभव है कि ऐसे गायक संतों की रचनाओं को गाते थे। (पृष्ठ 161) |
| ★138 | किताब के अनुसार कबीर आज भी किन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं, और उनके विचार किस परंपरा से संवाद और विवाद के माध्यम से घनीभूत हुए? | कबीर पहले और आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं जो सत्य की खोज में रूढ़िवादी, धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं, विचारों और व्यवहारों को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं। किताब के अनुसार कबीर के विचार संभवत: अवध प्रदेश (उत्तर प्रदेश) की सूफ़ी और योगी परंपरा के साथ हुए संवाद और विवाद के माध्यम से घनीभूत हुए। (पृष्ठ 161, 162) |
| ★139 | कबीर की विरासत पर किसने दावा किया, उनके धर्म को लेकर आज भी क्या विवाद है, और वैष्णव परंपरा की जीवनियाँ उनके बारे में क्या बताती हैं? | कबीर की विरासत पर उन अनेक गुटों ने दावा किया जो उन्हें याद करते थे। आज भी विवाद है कि वे जन्म से हिंदू थे अथवा मुसलमान। यह विवाद अनेक संत जीवनियों में उभरता है, जो सत्रहवीं शताब्दी यानी उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद से लिखी गईं। वैष्णव परंपरा की जीवनियों में कबीर (कबीर का अरबी में अर्थ है महान) को जन्म से हिंदू कबीरदास बताया गया है, पर उनका पालन गरीब मुसलमान परिवार में हुआ जो जुलाहे थे और कुछ समय पहले ही इस्लाम धर्म के अनुयायी बने थे। (पृष्ठ 162) |
| ★★140 | ! क्या रामानंद को कबीर का पक्का गुरु लिखना ठीक है? | नहीं। वैष्णव परंपरा की जीवनियों में कहा जाता है कि कबीर को भक्ति का मार्ग दिखाने वाले गुरु रामानंद थे। पर कबीर के पद गुरु और सतगुरु संबोधन का इस्तेमाल किसी विशेष व्यक्ति के संदर्भ में नहीं करते। इतिहासकारों का मानना है कि कबीर और रामानंद का समकालीन होना मुश्किल प्रतीत होता है, जब तक कि उन्हें बहुत ही लंबी आयु न दे दी जाए। इसलिए किताब के अनुसार वे परंपराएँ जो दोनों को जोड़ती हैं, “स्वीकार नहीं की जा सकतीं”। पर उनसे यह पता चलता है कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ी के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी। (पृष्ठ 162) |
| ★141 | बाबा गुरु नानक (1469–1539) का जन्म किस परिवार और किस स्थान पर हुआ, और उन्होंने क्या सीखा? | हिंदू व्यापारी परिवार में। उनका जन्मस्थल मुख्यत: इस्लाम धर्मावलंबी पंजाब का ननकाना गाँव था, जो रावी नदी के पास था। उन्होंने फारसी पढ़ी और लेखाकार के कार्य का प्रशिक्षण प्राप्त किया। छोटी आयु में उनका विवाह हो गया था, पर वे अपना अधिक समय सूफ़ी और भक्त संतों के बीच गुज़ारते थे। उन्होंने दूर–दराज़ की यात्राएँ भी कीं। (पृष्ठ 162) |
| ★★142 | बाबा गुरु नानक ने किस तरह की भक्ति का प्रचार किया, किन बाहरी आडंबरों को अस्वीकार किया, और परम पूर्ण रब के बारे में क्या माना? | उन्होंने निर्गुण भक्ति का प्रचार किया। धर्म के सभी बाहरी आडंबरों को उन्होंने अस्वीकार किया, जैसे यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा व कठोर तप; हिन्दू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी उन्होंने नकारा। उनके लिए परम पूर्ण रब का कोई लिंग या आकार नहीं था। रब की उपासना का उनका सरल उपाय था निरंतर स्मरण व नाम का जाप। (पृष्ठ 162, 163) |
| ★143 | बाबा गुरु नानक ने अपने विचार किस भाषा और किस माध्यम से रखे, और उनके सेवक मरदाना की क्या भूमिका थी? | अपने विचार पंजाबी भाषा में शबद के माध्यम से रखे। वे यह शबद अलग–अलग रागों में गाते थे, और उनका सेवक मरदाना रबाब बजाकर उनका साथ देता था। (पृष्ठ 163) |
| ★144 | बाबा गुरु नानक ने अपने अनुयायियों को कैसे संगठित किया, और अपने बाद गुरुपद पर किसे बैठाया? | अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया और सामुदायिक उपासना (संगत) के नियम निर्धारित किए, जहाँ सामूहिक रूप से पाठ होता था। अपने अनुयायी अंगद को अपने बाद गुरुपद पर आसीन किया। किताब के अनुसार इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा। (पृष्ठ 163) |
| ★★145 | ! क्या बाबा गुरु नानक एक नया धर्म स्थापित करना चाहते थे? | किताब कहती है, “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे”। उनकी मृत्यु के बाद उनके अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित कर अपने को हिंदू और मुसलमान दोनों से पृथक चिह्नित किया। (पृष्ठ 163) |
| ★★146 | ! क्या आदि ग्रंथ साहिब का संकलन बाबा गुरु नानक ने किया था, और ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब नाम कब मिला? | नहीं। संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया। उन्होंने बाबा गुरु नानक तथा उनके चार उत्तराधिकारियों, बाबा फरीद, रविदास और कबीर की बानी को आदि ग्रंथ साहिब में संकलित किया। इन को “गुरबानी” कहा जाता है और ये अनेक भाषाओं में रचे गए। सत्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाओं को भी इसमें शामिल किया और इस ग्रंथ को गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया। (पृष्ठ 163) |
| ★147 | दसवें गुरु गोबिन्द सिंह ने किस पंथ की नींव डाली, किन पाँच प्रतीकों का वर्णन किया, और उनके नेतृत्व में समुदाय किस रूप में सामने आया? | उन्होंने खालसा पंथ (पवित्रों की सेना) की नींव डाली और पाँच प्रतीकों का वर्णन किया: बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा। गुरु गोबिन्द सिंह के नेतृत्व में समुदाय एक सामाजिक, धार्मिक और सैन्य बल के रूप में संगठित होकर सामने आया। (पृष्ठ 163) |
| ★148 | मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी) कौन थीं, उनकी जीवनी किस आधार पर संकलित की गई है, और उनका विवाह किस कुल में हुआ? | किताब के अनुसार संभवत: भक्ति परंपरा की सबसे सुप्रसिद्ध कवयित्री। उनकी जीवनी उनके लिखे भजनों के आधार पर संकलित की गई है, जो शताब्दियों तक मौखिक रूप से संप्रेषित होते रहे। वे मारवाड़ के मेड़ता जिले की एक राजपूत राजकुमारी थीं, जिनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में कर दिया गया। (पृष्ठ 163) |
| ★★149 | मीराबाई ने पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्वों के बारे में क्या किया, किसे अपना पति माना, और राजभवन छोड़कर क्या बनीं? | अपने पति की आज्ञा की अवहेलना करते हुए उन्होंने पत्नी और माँ के परंपरागत दायित्व निभाने से इनकार किया और विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति स्वीकार किया। उनके ससुराल वालों ने उन्हें विष देने का प्रयत्न किया। किंतु वे राजभवन से निकल कर एक परिब्राजिका संत बन गईं। (पृष्ठ 163) |
| ★150 | चित्र 6.17 में कृष्ण को किस रूप में दिखाया गया है, यह मूर्ति कब की और कहाँ से मिली है, और मीराबाई का इससे क्या संबंध बताया गया है? | यह पंद्रहवीं शताब्दी की, तमिलनाडु से प्राप्त पत्थर की मूर्ति है, जिसमें कृष्ण को बाँसुरी बजाते दिखाया गया है। किताब के अनुसार मीराबाई कृष्ण के इसी रूप को पूजती थीं। (पृष्ठ 163) |
| ★151 | किताब के हाशिये का प्रश्न: स्रोत 11 (“कृष्ण के प्रति प्रेम”) का उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है? | मीराबाई राणा से डरती नहीं हैं। एक पद में वे कहती हैं, “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।”, यानी मेवाड़ के राणा मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी। पद की अंतिम पंक्ति में राणा और हरि दोनों के रूठने की बात है; भाव यह है: हरि रूठ जाएँ तो सब कुछ चला जाएगा, पर राणा क्या कर लेंगे। किताब के अनुसार मीराबाई ने अपने पति की आज्ञा की अवहेलना की थी और राजभवन से निकल कर परिब्राजिका संत बन गई थीं। (पृष्ठ 163, 164) |
| ★152 | कुछ परंपराओं के अनुसार मीराबाई के गुरु कौन थे, इससे किताब क्या नतीजा निकालती है, और उनके वस्त्रों के बारे में क्या माना जाता है? | कुछ परंपराओं के अनुसार मीरा के गुरु रैदास थे, जो एक चर्मकार थे (पृष्ठ 163 पर इन्हीं का नाम रविदास छपा है)। किताब के अनुसार इससे पता चलता है कि मीरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियों का उल्लंघन किया। ऐसा माना जाता है कि अपने पति के राजमहल के ऐश्वर्य को त्याग कर उन्होंने विधवा के सफ़ेद वस्त्र अथवा संन्यासिनी के जोगिया वस्त्र धारण किए। (पृष्ठ 164) |
| ★153 | ! क्या मीराबाई ने अपने आसपास अनुयायियों की कोई मंडली बनाई? | नहीं। किताब के अनुसार मीराबाई के आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा और उन्होंने “किसी निजी मंडली की नींव नहीं डाली”। फिर भी वे शताब्दियों से प्रेरणा का स्रोत रही हैं। उनके रचित पद आज भी स्त्रियों और पुरुषों द्वारा गाए जाते हैं, खासतौर से गुजरात व राजस्थान के गरीब लोगों द्वारा, जिन्हें “नीच जाति” का समझा जाता है। (पृष्ठ 164) |
| ★154 | किताब के “चर्चा कीजिए” में पूछा गया है: आपको क्यों लगता है कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई इक्कीसवीं शताब्दी में भी महत्त्वपूर्ण हैं? | यह अपनी राय का प्रश्न है; किताब के इन अंशों से तीन आधार मिलते हैं। (1) कबीर: आज भी उन लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं जो रूढ़िवादी, धार्मिक, सामाजिक संस्थाओं, विचारों और व्यवहारों को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखते हैं। (2) बाबा गुरु नानक: उन्होंने बाहरी आडंबरों को अस्वीकार किया और नाम के निरंतर स्मरण पर बल दिया; संगत में सामूहिक पाठ होता था, और उनकी बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित हुई, जिसे बाद में गुरु ग्रंथ साहिब कहा गया। (3) मीराबाई: कुछ परंपराओं के अनुसार उनके गुरु चर्मकार रैदास थे, और किताब के अनुसार उन्होंने जातिवादी समाज की रूढ़ियों का उल्लंघन किया; उनके पद शताब्दियों से प्रेरणा देते रहे हैं और आज भी स्त्रियों और पुरुषों द्वारा गाए जाते हैं। (पृष्ठ 161, 162, 163, 164) |
| ★155 | शंकरदेव कौन थे, उनके उपदेश किस नाम से जाने जाते हैं, और वे किन पर आधारित थे? | पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में असम में शंकरदेव वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में उभरे। उनके उपदेशों को ‘भगवती धर्म’ कह कर संबोधित किया जाता है, क्योंकि वे भगवद् गीता और भागवत पुराण पर आधारित थे। ये उपदेश सर्वोच्च देवता विष्णु के प्रति पूर्ण समर्पण भाव पर केंद्रित थे। (पृष्ठ 164) |
| ★156 | शंकरदेव ने भक्ति के लिए किस पर बल दिया, किन संस्थाओं की स्थापना को बढ़ावा दिया, और उनकी एक प्रमुख काव्य रचना कौन-सी है? | भक्ति के लिए नाम कीर्तन और श्रद्धावान भक्तों के सत्संग में ईश्वर के नाम उच्चारण पर बल दिया। आध्यात्मिक ज्ञान के प्रचार के लिए सत्र या मठ तथा नामघर जैसे प्रार्थनागृह की स्थापना को बढ़ावा दिया। किताब के अनुसार असम क्षेत्र में ये संस्थाएँ और आचार आज भी पनप रहे हैं। शंकरदेव की प्रमुख काव्य रचनाओं में कीर्तनघोष भी है। (पृष्ठ 164) |
सेट 10 — इतिहास का पुनर्निर्माण और काल-रेखा (कार्ड 157–182)
| # | प्रश्न | उत्तर |
|---|---|---|
| ★157 | “धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण” शीर्षक वाले हिस्से में किताब के अनुसार इतिहासकार किन स्रोतों का उपयोग करते हैं? | किताब के अनुसार इतिहासकार धार्मिक परंपरा के इतिहास के पुनर्निर्माण के लिए अनेक स्रोतों का उपयोग करते हैं, जैसे मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ और दैवीय स्वरूप को समझने को उत्सुक स्त्री-पुरुषों की लिखी काव्य रचनाएँ आदि। (पृष्ठ 164, 166) |
| ★★158 | किताब के अनुसार सूफ़ी ख़ानक़ाहों के आसपास रचे गए ग्रंथों में कौन-सी चार विधाएँ शामिल हैं, और हर एक का उदाहरण क्या है? | (1) प्रबंध पुस्तिका (सूफ़ी विचारों और आचारों पर): कश्फ–उल–महजुब। (2) मुलफुज़ात (सूफ़ी संतों की बातचीत): फवाइद–अल–फुआद। (3) मक्तुबात (लिखे हुए पत्रों का संकलन): मक्तुबात–ए–इमाम रब्बानी। (4) तज़किरा (सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण): सियार–उल–औलिया और अख्बार–उल–अखयार। (पृष्ठ 165) |
| ★159 | सूफ़ी विचारों और आचारों पर प्रबंध पुस्तिका कश्फ–उल–महजुब किसने लिखी, और इस विधा का साहित्य इतिहासकारों को क्या जानने में मदद करता है? | किताब के अनुसार यह पुस्तक अली बिन उस्मान हुजविरि ने लिखी। ऐसा साहित्य इतिहासकारों को यह जानने में मदद करता है कि उपमहाद्वीप के बाहर की परंपराओं ने भारत में सूफ़ी चिंतन को किस तरह प्रभावित किया। पृष्ठ 154 के बॉक्स के अनुसार हुजविरि लाहौर में बस गए और फ़ारसी में कश्फ–उल–महजुब लिखी; आज भी उन्हें दाता गंज बख्श के रूप में आदर मिलता है। (पृष्ठ 154, 165) |
| ★★160 | फवाइद–अल–फुआद किस विधा का ग्रंथ है, किसकी बातचीत पर आधारित है, उसका संकलन किसने किया, और स्रोत 9 से उसका क्या संबंध है? | यह मुलफुज़ात (सूफ़ी संतों की बातचीत) विधा का एक आरंभिक ग्रंथ है। यह शेख निज़ामुद्दीन औलिया की बातचीत पर आधारित संग्रह है, जिसका संकलन प्रसिद्ध फ़ारसी कवि अमीर हसन सिजज़ी देहलवी ने किया। फवाइद–अल–फुआद से लिया एक अंश स्रोत 9 (“शाही भेंट अस्वीकार”) में उद्धृत है। (पृष्ठ 159, 165) |
| 161 | मुलफुज़ात का संकलन किनकी अनुमति से हुआ, उनका उद्देश्य मुख्यत: क्या था, और ऐसे संकलन किन क्षेत्रों में मिलते हैं? | संकलन विभिन्न सूफ़ी सिलसिलों के शेखों की अनुमति से हुआ। उद्देश्य मुख्यत: उपदेशात्मक था। उपमहाद्वीप के अनेक भागों से, जिनमें दक्कन भी शामिल है, इस तरह के अनेक उदाहरण मिलते हैं, और कई शताब्दियों तक इनका संकलन होता रहा। (पृष्ठ 165) |
| ★162 | मक्तुबात किसे कहते हैं, ये पत्र किसने किन्हें लिखे, और इनमें क्या मिलता है? | मक्तुबात लिखे हुए पत्रों का संकलन है। ये पत्र सूफ़ी संतों ने अपने अनुयायियों और सहयोगियों को लिखे। इनमें धार्मिक सत्य के बारे में शेख के अनुभवों का वर्णन मिलता है, जिसे वे दूसरों के साथ बाँटना चाहते थे। शेख इन पत्रों में अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन, उनकी आकांक्षाओं और मुश्किलों पर भी टिप्पणी करते थे। (पृष्ठ 165) |
| ★163 | सत्रहवीं शताब्दी के नक्शबंदी सिलसिले के शेख अहमद सरहिंदी की कौन-सी रचना पर विद्वान बहुधा चर्चा करते हैं, और उनकी विचारधारा का तुलनात्मक अध्ययन किससे करते हैं? | रचना है मक्तुबात–ए–इमाम रब्बानी। विद्वान इस शेख की विचारधारा का तुलनात्मक अध्ययन बादशाह अकबर की उदारवादी और असांप्रदायिक विचारधारा से करते हैं। शेख अहमद सरहिंदी की मृत्यु 1624 में हुई थी। (पृष्ठ 165) |
| ★★164 | भारत में लिखा पहला सूफ़ी तज़किरा कौन-सा है, वह मुख्यत: किन संतों के बारे में था, और सबसे प्रसिद्ध तज़किरा कौन-सा है? | पहला तज़किरा मीर खुर्द किरमानी का सियार–उल–औलिया है, जो मुख्यत: चिश्ती संतों के बारे में था। सबसे प्रसिद्ध तज़किरा अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी (मृत्यु 1642) का अख्बार–उल–अखयार है। तज़किरा का मतलब है सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण। (पृष्ठ 165) |
| ★165 | तज़किरा के लेखकों का मुख्य उद्देश्य क्या था, और बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय होने पर भी किताब इन्हें इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण क्यों मानती है? | लेखकों का मुख्य उद्देश्य अपने सिलसिले की प्रधानता स्थापित करना और साथ ही अपनी आध्यात्मिक वंशावली की महिमा का बखान करना था। तज़किरे के बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं, फिर भी किताब के अनुसार वे इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे सूफ़ी परंपरा के स्वरूप को समझने में सहायक सिद्ध होते हैं। (पृष्ठ 165) |
| ★166 | इस अध्याय में बताई गई धार्मिक परिपाटियों से जुड़े साहित्यिक और मौखिक संदेशों के बारे में किताब क्या याद दिलाती है? | किताब याद दिलाती है कि अध्याय में जिस हर परिपाटी का ज़िक्र हुआ है, उससे अनेक साहित्यिक और मौखिक संदेश जुड़े हैं। उनमें से कुछ सुरक्षित किए गए। बहुत सी सूचनाओं में संप्रेषण के दौरान संशोधन हो गया, और कुछ संदेश हमेशा के लिए विस्मृत हो गए। (पृष्ठ 165) |
| ★167 | धार्मिक परंपरा के इतिहास के लिए इतिहासकार मूर्तिकला और स्थापत्यकला का उपयोग किस शर्त पर कर सकते हैं? | तभी, जब वे उसके संदर्भ को अच्छी तरह समझें, यानी इन आकृतियों और इमारतों को बनाने और उनका इस्तेमाल करने वालों के विचारों, आस्थाओं और आचारों की उन्हें समझ हो। किताब इसे अध्याय 1 और 4 में देखी हुई बात बताती है। (पृष्ठ 166) |
| ★168 | धार्मिक विश्वासों से जुड़े साहित्यिक स्रोतों की भाषा और शैली के बारे में किताब क्या कहती है, और वह कौन-से दो उदाहरण देती है? | इन स्रोतों में काफ़ी विविधता है; वे कई भाषाओं और शैलियों में लिखे गए हैं। कुछ स्रोत सरल, स्पष्ट भाषा में हैं, जैसे बासवन्ना के वचन, जबकि कुछ अन्य अलंकृत फ़ारसी में लिखे मुग़ल सम्राटों के फ़रमानों का रूप धारण कर लेते हैं। (पृष्ठ 166) |
| 169 | धार्मिक परंपराओं के साहित्यिक स्रोतों में हर किस्म के मूल-पाठ को समझने के लिए इतिहासकार को किस कौशल की ज़रूरत पड़ती है? | किताब कहती है कि हर किस्म के मूल-पाठ को समझने के लिए तरह-तरह का कौशल चाहिए: कई भाषाओं की जानकारी, और इसके अलावा इतिहासकार को हर विधि की शैली में सूक्ष्म अंतरों को भी पहचानना पड़ता है। (पृष्ठ 166) |
| ★170 | लगभग सभी धार्मिक परिपाटियों के आज भी पनपते रहने से इतिहासकारों को क्या लाभ होता है? | परिपाटी की यह निरंतरता लाभदायक है, क्योंकि इतिहासकार सामयिक आचार–व्यवहार की तुलना उस परिपाटी से कर सकते हैं जिसका वर्णन साहित्य और पुरानी चित्रकला में मिलता है। साथ ही वे उस परंपरा में आए परिवर्तनों की रूपरेखा भी तैयार कर सकते हैं। (पृष्ठ 166) |
| ★171 | किताब के अनुसार धार्मिक परंपराओं का इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों के लिए चुनौती क्या है? | चुनौती यह है कि इतिहासकार इस तथ्य के प्रति जागरूक हों कि धार्मिक परंपराएँ भी अन्य परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं। किताब यह भी कहती है कि ये परंपराएँ आज भी लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, और लोगों के लिए यह मानना आसान नहीं होता कि समय के साथ संभवत: इन परिपाटियों में बदलाव आया होगा। (पृष्ठ 166) |
| ★172 | पृष्ठ 167 की काल-रेखा “भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ मुख्य धार्मिक शिक्षक” के नोट में किताब अवधियों के बारे में क्या कहती है? | नोट कहता है: “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।” यानी ये समय-सीमाएँ अनुमान पर आधारित हैं; हर अवधि के आगे लगभग लिखा है। (पृष्ठ 167) |
| ★★173 | ! क्या अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति ईसा से पहले के संत हैं? | नहीं। तमिलनाडु के ये तीनों संत लगभग 500–800 ईसवी के शिक्षक हैं। किताब की काल-रेखा की पहली पंक्ति में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; पर किताब का अपना पाठ अलवारों और नयनारों के नेतृत्व में हुए प्रारंभिक भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं। (पृष्ठ 143, 167) |
| ★174 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 800–900 ईसवी के खाने में तमिलनाडु के कौन-से संत दर्ज हैं? | नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल और तोंदराडिप्पोडि। इनमें से अंडाल को किताब अलवार स्त्री बताती है और तोंदराडिप्पोडि को ब्राह्मण अलवार। (पृष्ठ 144, 167) |
| ★175 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 1000–1100 ईसवी के खाने में पंजाब और तमिलनाडु के कौन-से संत दर्ज हैं? | पंजाब में अल हुजविरि और दाता गंज बख्श; तमिलनाडु में रामानुजाचार्य। पृष्ठ 154 के बॉक्स के अनुसार हुजविरि ही आज दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय हैं: 1039 ईसवी में तुर्की सेना के कैदी के रूप में उन्हें सिंधु नदी पार करनी पड़ी और वे लाहौर में बस गए। (पृष्ठ 154, 167) |
| 176 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 1100–1200 ईसवी के खाने में कर्नाटक के किस संत का नाम है, और किताब में उनकी तिथियाँ क्या दी गई हैं? | काल-रेखा में नाम बसवन्ना छपा है (पृष्ठ 146 पर बासवन्ना)। पृष्ठ 146 के अनुसार उनकी तिथियाँ 1106–68 हैं; वे कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे और उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) व लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए। (पृष्ठ 146, 167) |
| ★177 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 1200–1300 ईसवी के खाने में किन क्षेत्रों के कौन-कौन से संत दर्ज हैं? | महाराष्ट्र में ज्ञानदेव और मुक्ताबाई; राजस्थान में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती; पंजाब में बहादुद्दीन जकारिया और फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर; दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी। पृष्ठ 154 की तालिका में मुइनुद्दीन चिश्ती और कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी की मृत्यु का वर्ष 1235 तथा फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर का 1265 दिया है। (पृष्ठ 154, 167) |
| ★178 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 1300–1400 ईसवी के खाने में किन क्षेत्रों के कौन-कौन से संत दर्ज हैं? | कश्मीर में लाल देद; सिंध में लाल शाहबाज़ कलंदर; दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया; उत्तर प्रदेश में रामानंद; महाराष्ट्र में चोखमेला; बिहार में शराफुद्दीन याह्या मनेरी। पृष्ठ 154 की तालिका में निज़ामुद्दीन औलिया की मृत्यु का वर्ष 1325 दिया है। (पृष्ठ 154, 167) |
| ★179 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 1400–1500 ईसवी के खाने में किन क्षेत्रों के कौन-कौन से संत दर्ज हैं? | उत्तर प्रदेश में कबीर, रैदास, सूरदास; पंजाब में बाबा गुरु नानक; गुजरात में बल्लभाचार्य और मुहम्मद शाह आलम; ग्वालियर में अबदुल्ला सत्तारी; गुलबर्गा में मीर सैयद मोहम्मद गेसू दराज़; असम में शंकरदेव; महाराष्ट्र में तुकाराम। (पृष्ठ 167) |
| 180 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में लगभग 1500–1600 और लगभग 1600–1700 ईसवी के खानों में कौन-से संत दर्ज हैं? | लगभग 1500–1600: बंगाल में श्री चैतन्य; राजस्थान में मीराबाई; उत्तर प्रदेश में शेख अब्दुल कुद्दस गंगोही, मलिक मोहम्मद जायसी और तुलसीदास। लगभग 1600–1700: हरियाणा में शेख अहमद सरहिंदी (मृत्यु 1624, पृष्ठ 165) और पंजाब में मियाँ मीर। (पृष्ठ 165, 167) |
| 181 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में महाराष्ट्र के कौन-से संत लगभग 1200–1300, 1300–1400 और 1400–1500 ईसवी के खानों में दर्ज हैं? | लगभग 1200–1300: ज्ञानदेव और मुक्ताबाई। लगभग 1300–1400: चोखमेला। लगभग 1400–1500: तुकाराम। पृष्ठ 147 के अनुसार महाराष्ट्र में भक्ति परंपरा का विकास तेरहवीं शताब्दी में हुआ। (पृष्ठ 147, 167) |
| 182 | काल-रेखा (पृष्ठ 167) में पंजाब के कौन-से संत लगभग 1000–1100, 1200–1300, 1400–1500 और 1600–1700 ईसवी के खानों में दर्ज हैं? | लगभग 1000–1100: अल हुजविरि (पृष्ठ 154 के अनुसार आज दाता गंज बख्श के रूप में आदरणीय)। लगभग 1200–1300: बहाउद्दीन ज़कारिया और फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर। लगभग 1400–1500: बाबा गुरु नानक। लगभग 1600–1700: मियाँ मीर। (पृष्ठ 154, 167) |
अंतिम पाँच मिनट — यही दोहराइए
स्रोत और समन्वय: संत कवियों की रचनाएँ उनके अनुयायियों ने उनकी मृत्यु के बाद संकलित कीं; पुरी में मुख्य देवता को बारहवीं शताब्दी तक आते-आते जगन्नाथ, यानी विष्णु के एक स्वरूप, के रूप में प्रस्तुत किया गया, और किताब इसे पूजा-प्रणालियों के समन्वय का सबसे विशिष्ट उदाहरण बताती है (पृष्ठ 140, 141)
अलवार और नयनार: अलवार विष्णु-भक्ति में तन्मय थे और नयनार शिवभक्त; प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग छठी शताब्दी का है; दसवीं शताब्दी तक बारह अलवारों की रचनाओं का संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् बन गया (पृष्ठ 143, 144)
बासवन्ना और वीरशैव: बारहवीं शताब्दी के कर्नाटक में बासवन्ना (1106–68), जो ब्राह्मण थे, कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे; उनके अनुयायी वीरशैव और लिंगायत कहलाए (पृष्ठ 146)
इस्लामी विश्व से संपर्क: सातवीं शताब्दी में इस्लाम का उद्भव हुआ; 711 ईसवी में अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीतकर उसे खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल कर लिया; दिल्ली सल्तनत की स्थापना तेरहवीं शताब्दी में हुई (पृष्ठ 148)
सूफ़ीमत और सिलसिले: ग्यारहवीं शताब्दी तक आते-आते सूफ़ीमत एक पूर्ण विकसित आंदोलन था; इस्लामी दुनिया में सूफ़ी सिलसिलों का गठन बारहवीं शताब्दी के आसपास होने लगा, और सिलसिले की पहली अटूट कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है (पृष्ठ 152, 153)
चिश्ती सिलसिला: बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आने वाले सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे अधिक प्रभावशाली रहे; शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर यमुना के किनारे ग़ियासपुर में थी; पिछले सात सौ सालों से अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग पाँच महान चिश्ती संतों की दरगाहों पर अपनी आस्था प्रकट करते रहे हैं (पृष्ठ 153, 154)
दरगाह, ज़िक्र और समा: अजमेर में ख़्वाजा मुइनुद्दीन की दरगाह पर अकबर चौदह बार आया; ज़िक्र ईश्वर का नाम-जाप है और समा श्रवण करना, यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल (पृष्ठ 155, 156)
चिश्ती और स्थानीय भाषा: दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे; अमीर खुसरो (1253–1325) कवि, संगीतज्ञ और शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी थे (पृष्ठ 157)
सूफ़ी और राज्य: चिश्ती संप्रदाय में सत्ता से दूर रहने पर बल दिया जाता था, पर राजनीतिक सत्ता से अलगाव का भाव नहीं था; सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट दे तो सूफ़ी संत उसे स्वीकार करते थे; निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी उन्हें सुल्तान–उल–मशेख कहते थे (पृष्ठ 158)
स्रोत 9: 1313 की घटना में शेख निज़ामुद्दीन औलिया एक स्थानीय शासक के भेजे दो बगीचों और बहुत सी ज़मीन के पट्टे की भेंट स्वीकार नहीं करते (पृष्ठ 159)
कबीर: लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी; उनकी बानी तीन परिपाटियों में संकलित है: कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली और आदि ग्रंथ साहिब के कई पद (पृष्ठ 160)
नानक और सिख परंपरा: बाबा गुरु नानक (1469–1539) का जन्मस्थल पंजाब का ननकाना गाँव था; ऐसा प्रतीत होता है कि वे किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे, पर उनकी मृत्यु के बाद अनुयायियों ने अपने को हिंदू और मुसलमान दोनों से पृथक चिह्नित किया (पृष्ठ 162, 163)
मीराबाई और शंकरदेव: मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी) मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी थीं और विष्णु के अवतार कृष्ण को अपना एकमात्र पति मानती थीं; पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में असम में शंकरदेव वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक के रूप में उभरे, उनकी प्रमुख काव्य रचनाओं में कीर्तनघोष भी है (पृष्ठ 163, 164)
सूफ़ी परंपरा के स्रोत: सूफ़ी ख़ानक़ाहों के आसपास रचे ग्रंथों की चार विधाएँ हैं: प्रबंध पुस्तिका (कश्फ–उल–महजुब), मुलफुज़ात (फवाइद–अल–फुआद), मक्तुबात, और तज़किरा, जिसमें भारत में लिखा पहला सूफ़ी तज़किरा मीर खुर्द किरमानी का सियार–उल–औलिया है (पृष्ठ 165)
इतिहासकार की चुनौती: लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं, और इतिहासकारों के लिए चुनौती यह है कि वे इस तथ्य की ओर जागरूक हों कि धार्मिक परंपराएँ भी अन्य परंपराओं की तरह परिवर्तनशील हैं (पृष्ठ 166)
काल-रेखा: तमिलनाडु में अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति लगभग 500–800 ईसवी के हैं (काल-रेखा की पहली पंक्ति में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है, पर किताब का अपना पाठ शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं); प्रारंभिक भक्ति आंदोलन लगभग छठी शताब्दी का है; काल-रेखा की कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं (पृष्ठ 143, 167)