Chapter 2राजा, किसान और नगर

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 2

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प्रयोग: दाईं ओर हाथ रखकर पढ़िए, उत्तर बोलिए, फिर हाथ हटाइए। कुल 118 कार्ड। हर उत्तर के साथ किताब का पृष्ठ लिखा है; शक हो तो किताब का वही पृष्ठ खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ NCERT भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12) के 2026-27 में छपे संस्करण की हैं।

निशानों का मतलब: ★वाले कार्ड ज़्यादा ज़रूरी हैं · ★★सबसे ज़रूरी; समय कम हो तो पहले इन्हें दोहराइए · ! वाले कार्डों में अक्सर गलती होती है, इन्हें ध्यान से पढ़िए।


सेट 1 — अध्याय की शुरुआत, प्रिंसेप और अभिलेख (कार्ड 1–11)

#प्रश्नउत्तर
★1NCERT कक्षा 12 इतिहास के “राजा, किसान और नगर” (आरंभिक राज्य और अर्थव्यवस्थाएँ) में उपमहाद्वीप के किस काल का अध्ययन किया जाता है?लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक (पृष्ठ 28)
★★2हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने किस ग्रंथ की रचना की?ऋग्वेद की (पृष्ठ 28)। वेद बहुत समय तक बोलकर और सुनकर ही याद रखे गए थे; इसके लिए कक्षा 6 का पाठ भारत की सांस्कृतिक जड़ें देखिए
3ईसा पूर्व पहली सहस्राब्दि में मध्य और दक्षिण भारत में शवों के अंतिम संस्कार का कौन-सा नया तरीका सामने आया, और कई स्थानों पर शवों के साथ क्या दफ़नाया गया था?पत्थरों के बड़े-बड़े ढाँचे, जिन्हें महापाषाण कहते हैं; कई स्थानों पर शवों के साथ लोहे के उपकरण और हथियार भी दफ़नाए गए थे (पृष्ठ 28)
★4ईसा पूर्व छठी शताब्दी से उपमहाद्वीप में नए परिवर्तनों के प्रमाण मिलते हैं; किताब के अनुसार शायद इनमें सबसे मुखर कौन-सा परिवर्तन है?आरंभिक राज्यों, साम्राज्यों और रजवाड़ों का विकास; इसके साथ-साथ लगभग पूरे उपमहाद्वीप में नए नगरों का उदय हुआ (पृष्ठ 28)
5ईसा पूर्व छठी शताब्दी से हुए राज्यों, साम्राज्यों और नए नगरों के विकास का आकलन करने के लिए इतिहासकार किस तरह के स्रोतों का अध्ययन करते हैं?अभिलेखों, ग्रंथों, सिक्कों तथा चित्रों जैसे विभिन्न प्रकार के स्रोतों का (पृष्ठ 28)
★★6ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने 1830 के दशक में किन दो लिपियों का अर्थ निकाला?ब्राह्मी और खरोष्ठी का, जिनका उपयोग सबसे आरंभिक अभिलेखों और सिक्कों में किया गया है (पृष्ठ 28)
★★7जेम्स प्रिंसेप को अधिकांश अभिलेखों और सिक्कों पर किस राजा का नाम लिखा मिला, और कुछ अभिलेखों पर वही राजा किस और नाम से लिखा है?पियदस्सी (यानी मनोहर मुखाकृति वाला राजा); कुछ अभिलेखों पर राजा का नाम असोक भी लिखा है (पृष्ठ 28, 29)। आगे किताब बताती है कि पियदस्सी असोक की अपनाई हुई एक उपाधि थी (पृष्ठ 47)
★8पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदे लेखों को क्या कहते हैं, और इनके अध्ययन को क्या कहते हैं?खुदे लेख अभिलेख हैं; उनके अध्ययन को अभिलेखशास्त्र कहते हैं (पृष्ठ 28, 29)
9जिन अभिलेखों पर तिथि नहीं खुदी होती, उनका काल आमतौर पर किस आधार पर तय किया जाता है?पुरालिपि यानी लेखन शैली के आधार पर; जैसे लगभग 250 ई.पू. में अक्षर ‘अ’ एक ढंग से लिखा जाता था और 500 ई. में दूसरे ढंग से (पृष्ठ 29)
★10! सबसे प्राचीन अभिलेख किन भाषाओं में लिखे जाते थे, और इन भाषाओं को क्या कहा जाता था?प्राकृत भाषाओं में; प्राकृत उन भाषाओं को कहा जाता था जो जनसामान्य की भाषाएँ होती थीं (पृष्ठ 29)
11प्रिंसेप की खोज के बाद भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने अभिलेखों और ग्रंथों का उपयोग किसलिए किया, और बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक क्या तैयार हो गया?उपमहाद्वीप पर शासन करने वाले प्रमुख राजवंशों की वंशावलियों की पुनर्रचना के लिए; परिणामस्वरूप उपमहाद्वीप के राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्र तैयार हो गया (पृष्ठ 29)

सेट 2 — महाजनपद और मगध (कार्ड 12–24)

#प्रश्नउत्तर
★★12आरंभिक भारतीय इतिहास में किस शताब्दी को एक महत्वपूर्ण परिवर्तनकारी काल माना जाता है, और इसे प्रायः किन बातों से जोड़ा जाता है?छठी शताब्दी ई.पू. को; इसे प्रायः आरंभिक राज्यों, नगरों, लोहे के बढ़ते प्रयोग और सिक्कों के विकास से जोड़ा जाता है; छठी शताब्दी ई.पू. में ही बौद्ध तथा जैन सहित अनेक दार्शनिक विचारधाराओं का भी विकास हुआ (पृष्ठ 29)
★★13बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में किस नाम से कितने राज्यों का उल्लेख मिलता है?महाजनपद नाम से सोलह राज्यों का (पृष्ठ 29)
14महाजनपदों की सूची आरंभिक ग्रंथों में एकसमान नहीं है; फिर भी कौन-से नाम प्रायः मिलते हैं?वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति; इसलिए ये सबसे महत्वपूर्ण महाजनपदों में गिने जाते होंगे (पृष्ठ 29)
★★15! अधिकांश महाजनपदों पर राजा का शासन होता था, पर गण और संघ कहलाने वाले राज्यों में शासन कैसे चलता था?कई लोगों का समूह शासन करता था, और उस समूह का प्रत्येक व्यक्ति राजा कहलाता था (पृष्ठ 29)
16भगवान महावीर और भगवान बुद्ध महाजनपदों के किस तरह के राज्यों से संबंधित थे?गणों से, यानी उन राज्यों से जहाँ कई लोगों का समूह शासन करता था (पृष्ठ 29)
17वज्जि संघ की तरह कुछ गण-राज्यों में भूमि सहित आर्थिक स्रोतों पर किसका नियंत्रण था, और ऐसे कई राज्य कितने समय तक बने रहे?राजा गणों का सामूहिक नियंत्रण था; ऐसे कई राज्य लगभग एक हज़ार साल तक बने रहे (पृष्ठ 29)
★18लगभग छठी शताब्दी ईसा पूर्व से संस्कृत में ब्राह्मणों ने किस नाम के ग्रंथों की रचना शुरू की, और उनमें शासक के वर्ण की क्या अपेक्षा की गई?धर्मशास्त्र नामक ग्रंथों की; इनमें शासक सहित अन्य के लिए नियम तय किए गए और अपेक्षा थी कि शासक क्षत्रिय वर्ण से ही होंगे (पृष्ठ 30)
19छठी शताब्दी ई.पू. के सोलह महाजनपदों में से धीरे-धीरे कुछ राज्यों ने क्या तैयार कर लिया, और बाकी राज्य किस पर निर्भर रहे?कुछ राज्यों ने स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही तंत्र तैयार कर लिए; बाकी राज्य सहायक-सेना पर निर्भर थे, जिसे प्रायः कृषक वर्ग से नियुक्त किया जाता था (पृष्ठ 30)
★★20छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में कौन-सा महाजनपद सबसे शक्तिशाली बन गया, और वह आधुनिक किस राज्य में है?मगध, आधुनिक बिहार में (पृष्ठ 31)
★★21छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध (आधुनिक बिहार) के सबसे शक्तिशाली महाजनपद बनने के आधुनिक इतिहासकार क्या-क्या कारण बताते हैं?(1) खेती की उपज खास तौर पर अच्छी; (2) लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में) आसानी से उपलब्ध; (3) जंगली क्षेत्रों में हाथी, जो सेना के महत्वपूर्ण अंग थे; (4) गंगा और उसकी उपनदियों से सस्ता, सुलभ आवागमन (पृष्ठ 31)
★22आरंभिक जैन और बौद्ध लेखकों ने मगध की महत्ता का कारण क्या बताया?विभिन्न शासकों की नीतियाँ: उनके अनुसार बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे राजा अत्यंत महत्त्वाकांक्षी थे, और उनके मंत्री उनकी नीतियाँ लागू करते थे (पृष्ठ 31)
23मगध की आरंभिक राजधानी राजगाह का अर्थ क्या है, और वह कैसा शहर था?राजगाह (आधुनिक बिहार के राजगीर का प्राकृत नाम) का अर्थ है ‘राजाओं का घर’; वह पहाड़ियों के बीच बसा एक किलेबंद शहर था (पृष्ठ 31)
24मगध की राजधानी बाद में किस शहर को बनाया गया, जिसे अब किस नाम से जाना जाता है?पाटलिपुत्र को, जिसे अब पटना कहते हैं; गंगा के रास्ते आवागमन के मार्ग पर उसकी अवस्थिति महत्वपूर्ण थी (पृष्ठ 31)

सेट 3 — मौर्य साम्राज्य (कार्ड 25–41)

#प्रश्नउत्तर
★★25मौर्य साम्राज्य के संस्थापक कौन थे, किस समय के आसपास, और उनका शासन पश्चिमोत्तर में कहाँ तक फैला था?चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.); उनका शासन पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था (पृष्ठ 32)
★★26चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र कौन थे, जिन्हें आरंभिक भारत का सर्वप्रसिद्ध शासक माना जा सकता है, और उन्होंने किस क्षेत्र पर विजय प्राप्त की?असोक; उन्होंने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय प्राप्त की (पृष्ठ 32)
★27मौर्य साम्राज्य के इतिहास की रचना के लिए इतिहासकारों ने कौन-कौन से स्रोत उपयोग किए हैं?पुरातात्विक प्रमाण (विशेषकर मूर्तिकला); मेगस्थनीज़ का विवरण; अर्थशास्त्र; परवर्ती जैन, बौद्ध और पौराणिक ग्रंथ तथा संस्कृत वाङ्मय; और पत्थरों व स्तंभों पर मिले असोक के अभिलेख (पृष्ठ 32)
28! यूनानी राजदूत मेगस्थनीज़ किसके दरबार में आया था, और उसके विवरण के बारे में आज क्या स्थिति है?चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में; आज उसके विवरण के कुछ अंश ही उपलब्ध हैं (पृष्ठ 32)
★★29मौर्य इतिहास के अनेक स्रोतों में कौन-से स्रोत प्रायः सबसे मूल्यवान माने जाते हैं, और असोक किस बात में पहला सम्राट था?पत्थरों और स्तंभों पर मिले असोक के अभिलेख; असोक वह पहला सम्राट था जिसने अपने अधिकारियों और प्रजा के लिए संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए (पृष्ठ 32)
★★30असोक ने अपने अभिलेखों के माध्यम से किसका प्रचार किया, और उसमें कौन-सी बातें शामिल थीं?धम्म का: बड़ों के प्रति आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार, तथा दूसरे के धर्मों और परंपराओं का आदर (पृष्ठ 32)
★★31मौर्य साम्राज्य के पाँच प्रमुख राजनीतिक केंद्र कौन-से थे?राजधानी पाटलिपुत्र और चार प्रांतीय केंद्र: तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि और सुवर्णगिरि; इन सबका उल्लेख असोक के अभिलेखों में किया गया है (पृष्ठ 32)
32मौर्य साम्राज्य के प्रांतीय केंद्रों का चयन बड़े ध्यान से किया गया था; तक्षशिला, उज्जयिनी और सुवर्णगिरि की क्या विशेषता थी?तक्षशिला और उज्जयिनी लंबी दूरी वाले महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग पर स्थित थे; सुवर्णगिरि (अर्थात् सोने के पहाड़) कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी था (पृष्ठ 33)
33! असोक के अभिलेख पश्चिमोत्तर से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक हर जगह एक जैसे संदेश के साथ मिले हैं; क्या इतिहासकार मानते हैं कि इतने बड़े साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था समान रही होगी?नहीं; साम्राज्य में शामिल क्षेत्र बड़े विविध थे (अफ़गानिस्तान के पहाड़ी क्षेत्र से उड़ीसा के तटवर्ती क्षेत्र तक); संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो (पृष्ठ 32, 33)
★★34असोक के अधिकांश अभिलेख किस भाषा और किस लिपि में लिखे गए थे?प्राकृत भाषा में और ब्राह्मी लिपि में (पृष्ठ 32)
★35असोक के पश्चिमोत्तर से मिले अभिलेख किन भाषाओं में हैं, और उनमें कौन-सी लिपियाँ मिलती हैं?अरामेइक और यूनानी भाषा में; पश्चिमोत्तर के कुछ अभिलेख खरोष्ठी में लिखे गए थे, और अरामेइक व यूनानी लिपियों का प्रयोग अफ़गानिस्तान में मिले अभिलेखों में किया गया था (पृष्ठ 32)
36मौर्य साम्राज्य में सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए मेगस्थनीज़ ने कितनी समितियों का उल्लेख किया है, और उपसमितियाँ किन-किन का संचालन करती थीं?एक समिति और छह उपसमितियाँ: नौसेना; यातायात और खान-पान; पैदल सैनिक; अश्वारोही; रथारोही; हाथी (पृष्ठ 34)
★★37असोक ने धम्म के प्रचार के लिए किन विशेष अधिकारियों की नियुक्ति की?धम्म महामात्त नाम के अधिकारियों की (पृष्ठ 34)
38उन्नीसवीं सदी में भारत के आरंभिक इतिहास की रचना शुरू करने वाले इतिहासकारों को मौर्य साम्राज्य इतना महत्वपूर्ण क्यों लगा?तब भारत ब्रिटिश साम्राज्य के अधीन एक औपनिवेशिक देश था, इसलिए प्राचीन भारत में एक साम्राज्य की संभावना चुनौतीपूर्ण और उत्साहवर्धक लगी; मौर्यकालीन पुरातत्व (प्रस्तर मूर्तियों सहित) अद्भुत कला का प्रमाण माना गया (पृष्ठ 34)
39इतिहासकारों को असोक के अभिलेखों के संदेश अन्य शासकों के अभिलेखों से भिन्न क्यों लगे, और बीसवीं सदी के किन लोगों ने उन्हें प्रेरणा का स्रोत माना?उन्हें लगा कि अन्य राजाओं की अपेक्षा असोक शक्तिशाली और परिश्रमी थे, और अपने नाम के साथ बड़ी-बड़ी उपाधियाँ जोड़ने वाले बाद के राजाओं की अपेक्षा विनीत भी; बीसवीं सदी के राष्ट्रवादी नेताओं ने असोक को प्रेरणा का स्रोत माना (पृष्ठ 34)
★40मौर्य साम्राज्य कितने साल तक चल पाया, और उसकी सीमाओं के बारे में किताब क्या बताती है?मात्र डेढ़ सौ साल तक; वह उपमहाद्वीप के सभी क्षेत्रों में नहीं फैल पाया, और साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था; दूसरी शताब्दी ई.पू. आते-आते कई भागों में नए शासक और रजवाड़े स्थापित होने लगे (पृष्ठ 35)
41यूनानी स्रोतों के अनुसार मौर्य सम्राट के पास कितने पैदल सैनिक, घुड़सवार और हाथी थे, और कुछ इतिहासकार इस विवरण को कैसा मानते हैं?छह लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार घुड़सवार और नौ हज़ार हाथी; कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं (पृष्ठ 35)

सेट 4 — दक्षिण के सरदार, कुषाण और गुप्त (कार्ड 42–51)

#प्रश्नउत्तर
★★42उपमहाद्वीप के दक्कन और उससे दक्षिण के क्षेत्र में तमिलकम (तमिलनाडु एवं आंध्र प्रदेश और केरल के कुछ हिस्से) में किन सरदारियों का उदय हुआ?चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियों का; ये राज्य बहुत ही समृद्ध और स्थायी सिद्ध हुए (पृष्ठ 35)
★★43सरदार किसे कहते हैं, और उसके कार्य क्या होते थे?एक शक्तिशाली व्यक्ति, जिसका पद वंशानुगत भी हो सकता है और नहीं भी; उसके समर्थक उसके खानदान के लोग होते हैं। कार्य: विशेष अनुष्ठान का संचालन, युद्ध के समय नेतृत्व करना और विवादों को सुलझाने में मध्यस्थता करना (पृष्ठ 35)
★44! सरदार और राजा में क्या अंतर है: अपने अधीन लोगों से वे क्या लेते हैं, और स्थायी सेना या अधिकारियों का क्या हाल है?सरदार अपने अधीन लोगों से भेंट लेता है और उसे अपने समर्थकों में बाँट देता है (जबकि राजा कर वसूली करते हैं); सरदारी में सामान्यतया कोई स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते (पृष्ठ 35)
45लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाने वाले किन शासकों का नाम किताब देती है: मध्य और पश्चिम भारत में, और पश्चिमोत्तर तथा पश्चिम में?मध्य और पश्चिम भारत में सातवाहन (लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. तक); उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर और पश्चिम में मध्य एशियाई मूल के शक शासक (पृष्ठ 35)
★★46मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत तक शासन करने वाले कुषाण शासकों (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई. तक) ने उच्च स्थिति पाने के लिए कौन-सा उपाय अपनाया, और इसका सबसे अच्छा प्रमाण कहाँ से मिलता है?विभिन्न देवी-देवताओं के साथ जुड़ना; उनके राजधर्म का सर्वोत्तम प्रमाण उनके सिक्कों और मूर्तियों से मिलता है (पृष्ठ 36)
★47उत्तर प्रदेश में मथुरा के पास माट के देवस्थान पर कुषाण शासकों की क्या चीज़ें लगाई गई थीं, और कुछ इतिहासकार इसका क्या कारण मानते हैं?कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ (अफ़गानिस्तान के एक देवस्थान पर भी ऐसी मूर्तियाँ मिली हैं); कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इनके ज़रिए कुषाण स्वयं को देवतुल्य प्रस्तुत करना चाहते थे (पृष्ठ 36)
48कई कुषाण शासकों ने अपने नाम के आगे कौन-सी उपाधि लगाई, और वे संभवतः किनसे प्रेरित हुए होंगे?‘देवपुत्र’ की उपाधि; संभवतः उन चीनी शासकों से, जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे (पृष्ठ 36)
★49चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्य किन पर निर्भर थे, और वे शासकों के लिए क्या करते थे?सामंतों पर; सामंत अपना निर्वाह स्थानीय संसाधनों (भूमि पर नियंत्रण सहित) से करते थे, शासकों का आदर करते और उनकी सैनिक सहायता करते थे। शक्तिशाली सामंत राजा भी बन जाते थे और दुर्बल राजा बड़े शासकों के अधीन हो जाते थे (पृष्ठ 36)
50गुप्त शासकों का इतिहास किन स्रोतों की सहायता से लिखा गया है, और प्रशस्तियों के रचयिता उन्हें क्या मानते थे?साहित्य, सिक्कों और अभिलेखों की सहायता से, और कवियों द्वारा अपने राजा या स्वामी की प्रशंसा में लिखी प्रशस्तियों से भी; पर प्रशस्तियों के रचयिता उन्हें तथ्यात्मक विवरण की अपेक्षा काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे (पृष्ठ 36, 37)
★★51इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख के नाम से प्रसिद्ध प्रयाग प्रशस्ति की रचना किसने, किसके राजकवि के रूप में और किस भाषा में की थी?हरिषेण ने, जो गुप्त सम्राटों के संभवतः सबसे शक्तिशाली सम्राट समुद्रगुप्त के राजकवि थे; संस्कृत में (पृष्ठ 37)

सेट 5 — खेती और गाँव के वर्ग (कार्ड 52–64)

#प्रश्नउत्तर
★52जातक और पंचतंत्र जैसे ग्रंथों की कथाओं के स्रोत क्या थे, और जातक कथाएँ कब और किस भाषा में लिखी गईं?अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ थे, जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा; जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं (पृष्ठ 38)
★53गंदतिन्दु जातक में कुटिल राजा की प्रजा किन बातों से दुखी थी, और लोगों ने क्या किया?रात में डकैत उन पर हमला करते थे तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी; इससे बचने के लिए लोग अपने-अपने गाँव छोड़कर जंगल में बस गए (पृष्ठ 38)
54गंदतिन्दु जैसी जातक कथा से राजा और ग्रामीण प्रजा के संबंध के बारे में क्या पता चलता है, और किसानों ने करों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए क्या शुरू किया?संबंध तनावपूर्ण रहते थे, क्योंकि शासक राजकोष भरने के लिए बड़े-बड़े कर माँगते थे, जिससे किसान खासतौर पर त्रस्त रहते थे; किसानों ने उपज बढ़ाने के और उपाय ढूँढ़ने शुरू किए (पृष्ठ 38)
★★55छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्र में उपज बढ़ाने का कौन-सा तरीका फैला?हल का प्रचलन; जिन क्षेत्रों में भारी वर्षा होती थी वहाँ लोहे के फाल वाले हलों से उर्वर भूमि की जुताई की जाने लगी (पृष्ठ 38)
★★56गंगा की घाटी में उपज में भारी वृद्धि किस कारण होने लगी, और किसानों को इसके लिए क्या सहना पड़ता था?धान की रोपाई से; किसानों को इसके लिए कमरतोड़ मेहनत करनी पड़ती थी (पृष्ठ 38)
57धान की रोपाई कैसे की जाती है, और उससे उपज क्यों बढ़ती है?पहले धान के बीज अंकुरित किए जाते हैं, फिर पानी से भरे खेतों में पौधों की रोपाई की जाती है; ज़्यादा मात्रा में पौध बच जाती है, इसलिए उपज बढ़ जाती है। यह उन क्षेत्रों में होती है जहाँ पानी बहुतायत में हो (पृष्ठ 38)
★58! लोहे के फाल वाले हल का उपयोग उपमहाद्वीप के कितने हिस्से में हुआ, और पूर्वोत्तर तथा मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों ने खेती के लिए क्या अपनाया?उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में (पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन में तो बीसवीं सदी में शुरू हुआ); पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों ने कुदाल का उपयोग किया, जो ऐसे इलाके के लिए कहीं अधिक उपयोगी था (पृष्ठ 38, 39)
★59लोहे के फाल वाले हल और धान की रोपाई के अलावा, गाँवों में उपज बढ़ाने का एक और तरीका क्या था, और ऐसे साधन व्यक्तिगत तौर पर बनवाने वाले लोग प्रायः कौन होते थे?कुओं, तालाबों और कहीं-कहीं नहरों से सिंचाई; व्यक्तिगत तौर पर ऐसे साधन बनाने वाले प्रायः राजा या प्रभावशाली लोग थे, जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया; कृषक समुदायों ने भी मिलकर साधन बनाए (पृष्ठ 39)
★60गुजरात की सुदर्शन झील (स्रोत 5) का ज्ञान हमें किस अभिलेख से होता है, और वह किस शासक की उपलब्धियाँ बताता है?लगभग दूसरी शताब्दी ई. के संस्कृत के एक पाषाण अभिलेख से; वह शक शासक रुद्रदमन की उपलब्धियों का उल्लेख करने के लिए बनवाया गया था (पृष्ठ 38)
★★61खेती की नयी तकनीकों से उपज तो बढ़ी, पर ग्रामीण समाज में क्या हुआ, और बौद्ध कथाओं में किन तीन तरह के लोगों का उल्लेख मिलता है?इनके लाभ समान नहीं थे, खेती से जुड़े लोगों में उत्तरोत्तर भेद बढ़ता जा रहा था; बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिकों, छोटे किसानों और बड़े-बड़े ज़मींदारों का उल्लेख मिलता है (पृष्ठ 39)
★★62पालि भाषा में गहपति शब्द का प्रयोग किनके लिए किया जाता था, और गहपति घर में कैसी स्थिति रखता था?छोटे किसानों और ज़मींदारों के लिए; गहपति घर का मुखिया होता था, महिलाओं, बच्चों, नौकरों और दासों पर नियंत्रण करता था और घर से जुड़े भूमि, जानवर या अन्य सभी वस्तुओं का मालिक होता था; कभी-कभी यह शब्द नगरों के संभ्रांत व्यक्तियों और व्यापारियों के लिए भी इस्तेमाल होता था (पृष्ठ 39)
★63आरंभिक तमिल संगम साहित्य में गाँवों के किन तीन वर्गों का उल्लेख है?वेल्लालर (बड़े ज़मींदार); उल्वर (हलवाहा); अणिमई (दास) (पृष्ठ 39)
64गाँवों में वर्गों की विभिन्नता किन बातों पर आधारित हो सकती थी, और इसमें कौन-सी चीज़ महत्वपूर्ण हो गई?संभव है कि भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित हो; भूमि का स्वामित्व महत्वपूर्ण हो गया, जिसकी चर्चा प्रायः विधि ग्रंथों में की जाती थी (पृष्ठ 39)

सेट 6 — भूमिदान और अग्रहार (कार्ड 65–71)

#प्रश्नउत्तर
★★65ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से किस बात के प्रमाण मिलते हैं, ये प्रमाण प्रायः किन पर खुदे होते थे, और ये साधारण तौर पर किन्हें दिए गए थे?भूमिदान के प्रमाण; कुछ अभिलेख पत्थरों पर थे, पर अधिकांश ताम्र पत्रों पर खुदे होते थे, जो संभवतः भूमिदान लेने वालों को प्रमाण रूप में दिए जाते थे। दान साधारण तौर पर धार्मिक संस्थाओं या ब्राह्मणों को दिए गए (पृष्ठ 40)
★★66भूमिदान के अभिलेख में दर्ज प्रभावती गुप्त कौन थी: किसकी पुत्री, और किस परिवार में उसका विवाह हुआ था?चंद्रगुप्त द्वितीय (लगभग 375-415 ई.) की पुत्री; उसका विवाह दक्कन पठार के वाकाटक परिवार में हुआ था (पृष्ठ 40)
★67संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं का भूमि पर क्या अधिकार था, और प्रभावती गुप्त के अभिलेख से इसके विपरीत क्या पता चलता है?धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि जैसी संपत्ति पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था; पर अभिलेख से पता चलता है कि प्रभावती भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया था। एक कारण यह हो सकता है कि वह रानी थी और उसका उदाहरण विरला रहा हो; यह भी संभव है कि धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं किए जाते थे (पृष्ठ 40)
★★68ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से मिलने वाले भूमिदानों के प्रभाव को लेकर इतिहासकारों में क्या वाद-विवाद है?दो मत हैं। कुछ के अनुसार भूमिदान शासक वंश द्वारा कृषि को नए क्षेत्रों में प्रोत्साहित करने की रणनीति थी। कुछ के अनुसार इससे दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत मिलता है: सामंतों पर शासन दुर्बल पड़ा तो राजाओं ने भूमिदान से समर्थक जुटाए, और नियंत्रण ढीला होता जा रहा था, इसलिए वे अपनी शक्ति का आडंबर करना चाहते थे (पृष्ठ 40, 41)
★★69ब्राह्मणों को दान किए गए भूभाग को क्या कहते थे, और उस पर कर का क्या नियम था?अग्रहार; ब्राह्मणों से भूमिकर या अन्य प्रकार के कर नहीं वसूले जाते थे, और उन्हें स्वयं स्थानीय लोगों से कर वसूलने का अधिकार था (पृष्ठ 41)
70प्रभावती गुप्त के अभिलेख (स्रोत 8) में दंगुन गाँव किसे दान किया गया, और अग्रहार के लिए कौन-सी रियायतें दी गईं?आचार्य चनालस्वामी को। रियायतें: गाँव में पुलिस या सैनिक प्रवेश नहीं करेंगे; दौरे पर आने वाले शासकीय अधिकारियों को घास, जानवरों की खाल और कोयला देने से तथा मदिरा खरीदने और नमक के लिए खुदाई करने के राजसी अधिकार से मुक्ति; खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध देने से भी छूट; दान संपत्ति और सभी करों सहित (पृष्ठ 41)
★71भूमिदान से राज्य और किसानों के संबंध की झाँकी मिलती है; पर कौन-से लोग ऐसे थे जिन पर अधिकारियों या सामंतों का नियंत्रण नहीं था?पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार (घुमक्कड़ तथा लगभग एक ही स्थान पर रहने वाले) और जगह-जगह घूम कर खेती करने वाले लोग; सामान्यतः ऐसे लोग अपने जीवन और आदान-प्रदान के विवरण नहीं रखते थे (पृष्ठ 41)

सेट 7 — नगर, व्यापार और सिक्के (कार्ड 72–89)

#प्रश्नउत्तर
★★72लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप में विकसित हुए नए नगरों में से अधिकांश क्या थे, और वे कहाँ बसे थे?अधिकांश महाजनपदों की राजधानियाँ थे; प्रायः सभी संचार मार्गों के किनारे बसे थे: पाटलिपुत्र जैसे नदीमार्ग के किनारे, उज्जयिनी जैसे भूतल मार्गों के किनारे, और पुहार जैसे समुद्रतट पर, जहाँ से समुद्री मार्ग प्रारंभ हुए। मथुरा जैसे शहर व्यावसायिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र थे (पृष्ठ 41, 42)
★73पाटलिपुत्र का विकास किस गाँव से हुआ, और सातवीं सदी ई. में चीनी यात्री श्वैन त्सांग को यह नगर कैसा मिला?पाटलिग्राम नाम के गाँव से; पाँचवीं सदी ई.पू. में मगध शासकों ने राजधानी राजगाह से यहाँ लाने का निर्णय किया, और चौथी शताब्दी ई.पू. तक यह मौर्य साम्राज्य की राजधानी और एशिया के सबसे बड़े नगरों में से एक बन गया। सातवीं सदी ई. में श्वैन त्सांग को यह खंडहर में बदला मिला, जनसंख्या भी कम थी (पृष्ठ 42)
★74शासक वर्ग के किलेबंद नगरों की खुदाई में चमकदार कलई वाले उत्कृष्ट मिट्टी के कटोरे और थालियाँ मिली हैं; इन्हें क्या कहते हैं, और इनका उपयोग संभवतः कौन करता था?उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र; संभवतः अमीर लोग इनका उपयोग करते थे। साथ ही सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे जैसे पदार्थों के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन तथा सीप और पक्की मिट्टी की चीज़ें भी मिली हैं (पृष्ठ 42)
★75द्वितीय शताब्दी ई.पू. आते-आते कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख मिलते हैं; इनमें दाता के नाम के साथ प्रायः क्या लिखा होता है?दाता का व्यवसाय; इनमें धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी और राजाओं के बारे में विवरण लिखे होते हैं (पृष्ठ 42, 43)
★★76छठी शताब्दी ई.पू. के बाद उपमहाद्वीप के नए नगरों में उत्पादकों और व्यापारियों के संघ को क्या कहा गया है, और वे संभवतः क्या करते थे?श्रेणी; ये श्रेणियाँ संभवतः पहले कच्चा माल खरीदती थीं, फिर उससे सामान तैयार कर बाज़ार में बेच देती थीं (पृष्ठ 43)
★★77छठी शताब्दी ई.पू. से उपमहाद्वीप में व्यापार के कौन-से मार्ग फैल गए थे, और समुद्री जलमार्ग अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से कहाँ तक पहुँचे?नदी मार्गों और भूमार्गों का मानो जाल बिछ गया था; भू-मार्ग मध्य एशिया और उससे भी आगे तक थे। जलमार्ग अरब सागर से होते हुए उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया तक, और बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तक फैल गया था (पृष्ठ 43, 44)
★78तमिल भाषा में और प्राकृत में सफल व्यापारी किन नामों से प्रसिद्ध थे?तमिल में मसत्थुवन, प्राकृत में सत्थवाह और सेट्ठी; ऐसे सफल व्यापारी बड़े धनी हो जाते थे। समुद्री मार्ग की यात्रा खतरनाक तो थी, पर बहुत लाभदायक भी (पृष्ठ 44)
79व्यापार के मार्गों पर कौन-सा सामान पहुँचाया जाता था, और रोमन साम्राज्य में किसकी भारी माँग थी?नमक, अनाज, कपड़ा, धातु और उससे बने उत्पाद, पत्थर, लकड़ी, जड़ी-बूटी आदि; रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसालों तथा कपड़ों व जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी, जिन्हें अरब सागर के रास्ते भूमध्य क्षेत्र तक पहुँचाया जाता था (पृष्ठ 44)
80यूनानी समुद्र यात्री द्वारा रचित पेरिप्लस ऑफ़ एरीथ्रियन सी (लगभग प्रथम शताब्दी ई.) के अंश (स्रोत 9) के अनुसार मालाबार तट (आधुनिक केरल) के बाज़ारों से विदेशी व्यापारी क्या खरीदते थे, और वहाँ क्या-क्या आयात होता था?भारी मात्रा में काली मिर्च और दाल चीनी खरीदने के लिए जहाज़ भेजते थे। आयात में सिक्के, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चे शीशे, ताँबे, टिन और सीसे जैसी चीज़ें थीं (पृष्ठ 44)
★★81! उपमहाद्वीप में सबसे पहले ढाले गए और प्रयोग में आए सिक्के कौन-से थे, और वे किन धातुओं के और कब के थे?आहत सिक्के, चाँदी और ताँबे के (छठी शताब्दी ई.पू.); पूरे उपमहाद्वीप में खुदाई के दौरान ऐसे सिक्के मिले हैं (पृष्ठ 44)
82आहत सिक्कों पर बने प्रतीकों को राजवंशों के प्रतीकों से मिलाकर पहचानने पर क्या पता चला?कि इन सिक्कों को राजाओं ने जारी किया था; यह भी संभव है कि व्यापारियों, धनपतियों और नागरिकों ने भी इस प्रकार के कुछ सिक्के जारी किए हों (पृष्ठ 44)
★83सिक्कों के अध्ययन को क्या कहते हैं, और इसमें और क्या-क्या शामिल है?मुद्राशास्त्र; इसमें सिक्कों पर पाए जाने वाले चित्र, लिपि आदि तथा उनकी धातुओं का विश्लेषण और जिन संदर्भों में सिक्के पाए गए हैं, उनका अध्ययन भी शामिल है (पृष्ठ 45)
★★84! शासकों की प्रतिमा और नाम के साथ सबसे पहले सिक्के किसने जारी किए, और उन्होंने कब, किस क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था?हिंद-यूनानी शासकों ने, जिन्होंने द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित किया था (पृष्ठ 44)
★★85सोने के सिक्के बड़े पैमाने पर किसने और कब जारी किए, और उनके आकार-वज़न किनके सिक्कों के समान थे?प्रथम शताब्दी ईसवी में कुषाण राजाओं ने; उनके आकार और वज़न तत्कालीन रोमन सम्राटों तथा ईरान के पार्थियन शासकों के सिक्कों के बिलकुल समान थे। ऐसे सिक्के उत्तर और मध्य भारत के कई पुरास्थलों पर मिले हैं (पृष्ठ 44)
★86दक्षिण भारत के अनेक पुरास्थलों से बड़ी संख्या में रोमन सिक्के मिले हैं; इससे क्या स्पष्ट होता है?कि व्यापारिक तंत्र राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था; दक्षिण भारत रोमन साम्राज्य के अंतर्गत न होते हुए भी व्यापारिक दृष्टि से उससे संबंधित था (पृष्ठ 44, 45)
87पंजाब और हरियाणा जैसे क्षेत्रों के यौधेय कबायली गणराज्यों (प्रथम शताब्दी ई.) ने कैसे सिक्के जारी किए, और उनसे क्या पता चलता है?ताँबे के सिक्के, जो पुराविदों को हज़ारों की संख्या में मिले हैं; इनसे यौधेयों की व्यापार में रुचि और सहभागिता परिलक्षित होती है (पृष्ठ 45)
★88सोने के सबसे भव्य सिक्कों में से कुछ किसने जारी किए, और उनके आरंभिक सिक्कों की क्या खासियत थी?गुप्त शासकों ने; उनके आरंभिक सिक्कों में इस्तेमाल हुआ सोना अति उत्तम था; इन सिक्कों से दूर देशों से व्यापार-विनिमय में आसानी होती थी, जिससे शासकों को भी लाभ होता था (पृष्ठ 45)
★★89छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के मिलने कम हो गए; इसके बारे में इतिहासकारों में क्या मतभेद है?कुछ के अनुसार रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार घटा, जिससे उससे लाभ पाने वाले राज्यों, समुदायों और क्षेत्रों की संपन्नता पर असर पड़ा। अन्य के अनुसार उस दौर में नए नगरों और व्यापार के नवीन तंत्रों का उदय होने लगा था और अभिलेखों-ग्रंथों में सिक्के का उल्लेख होता रहा; शायद सिक्के प्रचलन में थे और किसी ने उनका संग्रह करके नहीं रखा (पृष्ठ 45)

सेट 8 — लिपियाँ, अभिलेख और उनकी सीमाएँ (कार्ड 90–105)

#प्रश्नउत्तर
★★90आधुनिक भारतीय भाषाओं में इस्तेमाल होने वाली लगभग सभी लिपियों का मूल कौन-सी लिपि है, और उसका प्रयोग किन अभिलेखों में हुआ है?ब्राह्मी लिपि; उसका प्रयोग असोक के अभिलेखों में किया गया है (पृष्ठ 46)
★91आरंभिक अभिलेखों का अध्ययन करने वाले विद्वानों ने कई बार क्या अनुमान लगाया, जबकि सच क्या था?उन्होंने अनुमान लगाया कि ये अभिलेख संस्कृत में लिखे हैं, जबकि प्राचीनतम अभिलेख वस्तुतः प्राकृत में थे (पृष्ठ 46)
★★92जेम्स प्रिंसेप ने असोककालीन ब्राह्मी लिपि का अर्थ कब निकाला?1838 ई. में, कई दशकों बाद अभिलेख वैज्ञानिकों के अथक परिश्रम के बाद (पृष्ठ 46)
★★93पश्चिमोत्तर के अभिलेखों में इस्तेमाल हुई खरोष्ठी लिपि को पढ़ने में किन सिक्कों से मदद मिली, और उन पर राजाओं के नाम किन लिपियों में लिखे थे?हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय-प्रथम शताब्दी ई.पू.) द्वारा बनवाए गए सिक्कों से; उन पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी में लिखे थे। यूनानी भाषा पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने अक्षरों का मेल किया; जैसे दोनों लिपियों में अपोलोडोटस का नाम लिखने में एक ही प्रतीक इस्तेमाल हुआ था (पृष्ठ 46)
94प्रिंसेप ने खरोष्ठी में लिखे अभिलेखों की भाषा की क्या पहचान की, और इससे क्या आसान हुआ?उन्होंने खरोष्ठी अभिलेखों की भाषा की पहचान प्राकृत के रूप में की, इसलिए लंबे अभिलेखों को पढ़ना सरल हो गया (पृष्ठ 46, 47)
★★95! असोक के एक अभिलेख (स्रोत 10) में असोक का अपना नाम नहीं लिखा है; उसमें कौन-सी उपाधियाँ इस्तेमाल हुई हैं?देवानांपिय, अर्थात् देवताओं का प्रिय, और पियदस्सी, यानी ‘देखने में सुन्दर’। असोक नाम अन्य अभिलेखों में मिलता है, जिनमें उनकी उपाधियाँ भी लिखी हैं (पृष्ठ 47)
96अभिलेखशास्त्री इस निष्कर्ष पर कैसे पहुँचे कि असोक के कई अभिलेख, जिनमें से कुछ पर नाम और कुछ पर केवल उपाधियाँ हैं, एक ही शासक ने बनवाए थे?उन्होंने इन अभिलेखों का परीक्षण किया और पाया कि उनके विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान सबमें समानता है (पृष्ठ 47)
★97असोक के अभिलेख (स्रोत 10) में पतिवेदक कौन थे, और असोक ने उनसे क्या चाहा?अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक का अर्थ संवाददाता बताया है; असोक ने कहा कि लोगों के समाचार उन तक पतिवेदक सदैव पहुँचाएँ, चाहे वे खाना खा रहे हों, अन्तःपुर, विश्राम कक्ष, गोशाले, पालकी या वाटिका में हों (पृष्ठ 47)
★98यातायात मार्गों के किनारे और नगरों के पास प्राकृतिक पत्थरों पर उत्कीर्ण राजा के आदेशों के बारे में इतिहासकार कौन-से प्रश्न उठाते हैं?क्या आने-जाने वाले लोग उन्हें पढ़ने के लिए रुकते थे (अधिकांश लोग प्रायः पढ़े-लिखे नहीं थे); क्या पाटलिपुत्र में चलने वाली प्राकृत उपमहाद्वीप में सभी स्थानों पर लोग समझते थे; क्या राजा के आदेशों का पालन किया जाता था। किताब कहती है कि इनके उत्तर पाना सदैव आसान नहीं है (पृष्ठ 47, 48)
★★99असोक के कलिंग-विजय वाले अभिलेख (स्रोत 11) के अनुसार देवानांपिय पियदस्सी ने शासन के कितने वर्ष पूरे करने पर कलिंग जीता, और कितने पुरुष निष्कासित हुए और मारे गए?शासन के आठ वर्ष पूरे करने पर; डेढ़ लाख पुरुष निष्कासित किए गए, एक लाख मारे गए और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई (पृष्ठ 48)
★100कलिंग विजय के बाद देवानांपिय पियदस्सी (असोक) ने अपने अभिलेख (स्रोत 11) में क्या भाव प्रकट किया, और वे किसमें डूब गए?कलिंग की विजय का पश्चाताप; उन्होंने इसे बहुत वेदनादायी और निंदनीय बताया, और वे धम्म के गहन अध्ययन, धम्म के स्नेह और धम्म के उपदेश में डूब गए (पृष्ठ 48)
★101! असोक की वेदना को दर्शाने वाला अभिलेख आधुनिक उड़ीसा में कहाँ नहीं मिला है, और किताब इस पर क्या सवाल उठाती है?वह अभिलेख उस क्षेत्र में नहीं मिला जिस पर विजय प्राप्त की गई थी (जबकि असोक के अन्य अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से मिले हैं); किताब पूछती है कि इसका क्या अर्थ लगाएँ, और क्या नव विजय की वेदना उस क्षेत्र के लिए इतनी दर्दनाक थी कि राजा इस मुद्दे पर कुछ कह न सका (पृष्ठ 48)
★★102इतिहास के स्रोत के रूप में अभिलेखों की तकनीकी सीमाएँ क्या हैं?अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण हों तो पढ़ना मुश्किल होता है; अभिलेख नष्ट हो सकते हैं और अक्षर लुप्त हो जाते हैं; शब्दों के वास्तविक अर्थ का पूर्ण ज्ञान सदैव सरल नहीं होता, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से संबंधित होते हैं। इसीलिए विद्वान पढ़ने की वैकल्पिक विधियों पर चर्चा करते रहते हैं (पृष्ठ 48)
★103कई हज़ार अभिलेख प्राप्त होने पर भी सभी अभिलेखों के बारे में क्या समस्या है, और जो उपलब्ध हैं उनके बारे में किताब क्या कहती है?सभी के अर्थ नहीं निकाले जा सके हैं, या प्रकाशित किए गए हैं, या उनके अनुवाद किए गए हैं; अनेक अभिलेख सुरक्षित नहीं बचे। इसलिए जो अभिलेख उपलब्ध हैं, वे संभवतः कुल अभिलेखों के अंश मात्र हैं (पृष्ठ 48)
★★104! खेती की दैनिक प्रक्रियाओं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख का उल्लेख अभिलेखों में प्रायः क्यों नहीं मिलता?क्योंकि प्रायः अभिलेख बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं; साथ ही अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे। इसलिए उनकी समीक्षा अन्य विचारों के परिप्रेक्ष्य में करनी होगी (पृष्ठ 48, 49)
105किताब के अनुसार राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान किससे नहीं मिलता, और इतिहासकारों की रुचि समय के साथ कैसे बदली?मात्र अभिलेखशास्त्र से नहीं मिलता। रुचि ऐसे बदली: उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों और बीसवीं सदी के प्रारंभ में राजाओं का इतिहास; बीसवीं सदी के मध्य से आर्थिक परिवर्तन और विभिन्न सामाजिक समुदायों का उदय; हाल के दशकों में सामाजिक हाशिए पर रहे समुदाय (पृष्ठ 49)

सेट 9 — काल रेखाएँ: किताब के पृष्ठ 50 और 51 (कार्ड 106–118)

#प्रश्नउत्तर
★★106काल रेखा 1 (प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक विकास) के अनुसार लगभग 600-500 ई.पू. में उपमहाद्वीप में कौन-से चार विकास दर्ज हैं?धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के (पृष्ठ 50)
107काल रेखा 1 के अनुसार लगभग 500-400 ई.पू. में और लगभग 327-325 ई.पू. में क्या हुआ?लगभग 500-400 ई.पू. में मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़ बनी; लगभग 327-325 ई.पू. में सिकंदर का आक्रमण हुआ (पृष्ठ 50)
★★108काल रेखा 1 के अनुसार मौर्य साम्राज्य से जुड़ी तीन तिथियाँ कौन-सी हैं: चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण, असोक का शासन और मौर्य साम्राज्य का अंत?चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण लगभग 321 ई.पू.; असोक का शासन लगभग 272/268-231 ई.पू.; मौर्य साम्राज्य का अंत लगभग 185 ई.पू. (पृष्ठ 50)
★109काल रेखा 1 के अनुसार लगभग 100 ई.पू. से 200 ई. तक उपमहाद्वीप के पश्चिमोत्तर में किनका शासन दर्ज है, और उसके साथ कौन-से आर्थिक विकास गिनाए गए हैं?पश्चिमोत्तर के शक (मध्य एशिया के लोग) शासक; साथ में रोमन व्यापार और सोने के सिक्के (पृष्ठ 50)
110काल रेखा 1 के अनुसार लगभग 100-200 ई. में किन शासकों द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण दर्ज हैं?सातवाहन और शक शासकों द्वारा (पृष्ठ 50)
★★111काल रेखा 1 के अनुसार गुप्त शासन का आरंभ लगभग कब हुआ, और समुद्रगुप्त तथा चंद्रगुप्त द्वितीय के शासन की तिथियाँ क्या दी गई हैं?गुप्त शासन का आरंभ लगभग 320 ई.; समुद्रगुप्त लगभग 335-375 ई.; चंद्रगुप्त द्वितीय लगभग 375-415 ई. (काल रेखा में दक्कन के वाकाटक भी उसी पंक्ति में दर्ज हैं) (पृष्ठ 50)
112काल रेखा 1 के अनुसार लगभग 500-600 ई. में दक्षिण के किन दो राजवंशों का उदय दर्ज है?कर्नाटक में चालुक्यों का उदय और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय (पृष्ठ 50)
★113काल रेखा 1 के अनुसार लगभग 606-647 ई. में कन्नौज का कौन-सा राजा था, किस चीनी यात्री की यात्रा हुई, और लगभग 712 में क्या घटना दर्ज है?कन्नौज के राजा हर्षवर्धन और चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा; लगभग 712 में अरबों की सिंध पर विजय (पृष्ठ 50)
114कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि के बारे में काल रेखा 1 का नोट क्या कहता है?कि कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि निश्चित नहीं है; तालिका में उसके सामने लगभग 78 ई. दिया गया है, पर उसे पक्की तिथि न मानिए (पृष्ठ 50)
★★115काल रेखा 2 (अभिलेखशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति) के अनुसार अट्ठारहवीं शताब्दी में 1784 में कौन-सी संस्था बनी?बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन हुआ (पृष्ठ 51)
116काल रेखा 2 के अनुसार 1877, 1886 और 1888 में अभिलेखशास्त्र से जुड़ी कौन-सी घटनाएँ दर्ज हैं?1877 में अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों के एक अंश को प्रकाशित किया; 1886 में दक्षिण भारत के अभिलेखों के शोधपत्र एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक निकला; 1888 में एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक निकला (पृष्ठ 51)
117काल रेखा 2 के अनुसार 1965-66 में बीसवीं शताब्दी की कौन-सी प्रगति दर्ज है?डी.सी. सरकार ने इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी प्रकाशित की (पृष्ठ 51)
★118बीसवीं शताब्दी के सुविख्यात अभिलेखशास्त्री डी.सी. सरकार के वक्तव्य (किताब के प्रश्न 7) में अभिलेखों के बारे में क्या दावा है, और अध्याय का कौन-सा बिंदु उसकी परख में काम आता है?दावा: भारतीयों के जीवन, संस्कृति और गतिविधियों का ऐसा कोई पक्ष नहीं है जिसका प्रतिबिंब अभिलेखों में न हो। परख: अभिलेखों में खेती की दैनिक प्रक्रियाओं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख का उल्लेख नहीं मिलता, और वे उन्हीं के विचार बताते हैं जो उन्हें बनवाते थे (पृष्ठ 48, 49, 52)

अंतिम पाँच मिनट — यही दोहराइए

अध्याय का काल: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. · ईसा पूर्व छठी शताब्दी से आरंभिक राज्य, साम्राज्य, रजवाड़े और नए नगर · ऋग्वेद की रचना हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में

लिपि और अभिलेख: प्रिंसेप ने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी का अर्थ निकाला; असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ 1838 ई. में · खरोष्ठी की कुंजी: हिंद-यूनानी राजाओं के सिक्के (नाम यूनानी और खरोष्ठी में) · अभिलेखों के अध्ययन को अभिलेखशास्त्र कहते हैं · प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में

महाजनपद: आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथों में सोलह (छठी शताब्दी ई.पू. के राज्य) · गण/संघ में समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था · छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध सबसे शक्तिशाली (पहले राजगाह, फिर पाटलिपुत्र)

मौर्य: चंद्रगुप्त मौर्य लगभग 321 ई.पू. · असोक का शासन लगभग 272/268-231 ई.पू. · अंत लगभग 185 ई.पू. · पाँच केंद्र: पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि, सुवर्णगिरि · धम्म और धम्म महामात्त · साम्राज्य मात्र डेढ़ सौ साल चला

असोक के अभिलेख: प्राकृत और ब्राह्मी; पश्चिमोत्तर में अरामेइक, यूनानी और खरोष्ठी · स्रोत 10 में नाम नहीं, उपाधियाँ देवानांपिय और पियदस्सी · स्रोत 11: आठ वर्ष, डेढ़ लाख निष्कासित, एक लाख मारे गए · वेदना वाला अभिलेख कलिंग में नहीं मिला

सरदार और नए राजा: चोल, चेर, पाण्ड्य सरदारियाँ: सरदार भेंट लेता है, राजा कर · सातवाहन (लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई.) और शक · कुषाण (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई.): कुछ इतिहासकारों के अनुसार स्वयं को देवतुल्य दिखाना, ‘देवपुत्र’ उपाधि · प्रयाग प्रशस्ति: हरिषेण, समुद्रगुप्त

गाँव: छठी शताब्दी ई.पू. से लोहे के फाल वाला हल (कुछ ही हिस्से में), गंगा घाटी में धान की रोपाई, सिंचाई · गहपति; वेल्लालर, उल्वर, अणिमई · भूमिदान, अग्रहार, प्रभावती गुप्त (चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री, वाकाटक परिवार में)

नगर, व्यापार और सिक्के: श्रेणी · उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र · सत्थवाह, सेट्ठी, मसत्थुवन · आहत सिक्के (चाँदी और ताँबे, छठी शताब्दी ई.पू.) · पहले प्रतिमा-नाम वाले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों के, सोने के बड़े पैमाने पर कुषाणों के · छठी शताब्दी ई. से सोने के सिक्के कम मिलते हैं (इतिहासकारों में मतभेद)

अभिलेखों की सीमा: हलके उत्कीर्ण अक्षर, नष्ट होना, अर्थ का संदर्भ · कई हज़ार अभिलेखों में से उपलब्ध संभवतः अंश मात्र · खेती और रोज़मर्रा के सुख-दुख का उल्लेख नहीं · अभिलेख बनवाने वालों के ही विचार बताते हैं