कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 28 से 52 · कालांश — 11 (10 पढ़ाने के, 1 मूल्यांकन का), हर एक 40–45 मिनट
इस्तेमाल कैसे करें — हर कालांश की पूरी तैयारी उसके अपने कार्ड में है: किताब के पृष्ठ, स्लाइड, इंटरैक्टिव अध्याय, प्रश्न बैंक और फ़्लैशकार्ड। पहले “एक नज़र में” वाला चित्र और तालिका देखिए, फिर आज के कालांश का कार्ड खोलिए। कार्ड के हिस्से और शब्द, जैसे निकास-पर्ची, “तैयारी” वाली तालिका में समझाए गए हैं।
अध्याय का बड़ा विचार — यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक के राज्यों, किसानों और नगरों की कहानी है, और साथ में यह भी कि इतिहासकार यह कहानी किन स्रोतों से जोड़ते हैं: अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के और चित्र। किताब शुरू में ही मान लेती है: “इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है” (पृष्ठ 28)।
हमारी ओर से पूरे अध्याय के लिए एक सवाल: लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक के राजाओं, किसानों और नगरों के बारे में इतिहासकार कैसे जानते हैं, और क्या-क्या नहीं जान पाते? पहले दिन बच्चे इस पर दो पंक्तियाँ पर्ची पर लिखेंगे और पर्चियाँ आपके पास रहेंगी; कालांश 10 में, अभिलेखों की सीमाएँ पढ़ने के बाद, वही पर्चियाँ लौटाकर परखी जाएँगी।
एक नज़र में — ग्यारह कालांश और उनकी सामग्री
हर तीर पर लिखा है कि अगला कालांश पिछले से क्यों निकलता है।
ग्यारह कालांश, एक कहानी
सामग्री के पन्ने: स्लाइड का पाठ · स्लाइड शो · प्रश्न बैंक · फ़्लैशकार्ड · इंटरैक्टिव अध्याय · रिवीजन नोट्स · क्विज़
| कालांश और टॉपिक | पृष्ठ | स्लाइड | इंटरैक्टिव | प्रश्न बैंक | फ़्लैशकार्ड |
|---|---|---|---|---|---|
| 1 · शुरुआत और प्रिंसेप | 28 (और 29 का “अभिलेख” बॉक्स) | शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1 | शुरुआत, 1. प्रिंसेप और पियदस्सी | क1, क2 · ख1–ख3 · घ1 | 1–11 |
| 2 · सोलह महाजनपद और मगध | 29–31 | भाग 2 | 2. प्रारंभिक राज्य | क3–क5 · ख4 · घ2 · ङ1, ङ2 | 12–24 |
| 3 · मौर्य साम्राज्य | 32–35 | भाग 3 | 3. एक आरंभिक साम्राज्य | क6–क10 · ख5 · ग6 · घ4 · ङ3, ङ4 · छ1 · च1 | 25–41 |
| 4 · दक्षिण के सरदार, दैविक राजा | 35–37 | भाग 4 | 4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत | क11, क12 · ख6 · ग8 · घ5, घ6 · ङ7 · छ2 · च3 | 42–51 |
| 5 · राजा की छवि, उपज बढ़ाने के तरीके | 38–39 | भाग 5 का पहला हिस्सा | 5. बदलता हुआ देहात | क13 · ख7 · ग3 · घ8 · ङ5 · च4 | 52–60 |
| 6 · ग्रामीण समाज और भूमिदान | 39–41 | भाग 5 का दूसरा हिस्सा | 5. बदलता हुआ देहात | क14–क17 · ख8 · ग7 · घ7 · ङ6 · छ3 | 61–71 |
| 7 · नए नगर और नगरीय जनसंख्या | 41–43 | भाग 6 का पहला हिस्सा | 6. नगर एवं व्यापार | ख9 · ग5 · घ3, घ9, घ10 | 72–76 |
| 8 · व्यापार, सिक्के और राजा | 43–45 | भाग 6 का दूसरा हिस्सा | 6. नगर एवं व्यापार | क18, क19 · ख10 · च6 | 77–89 |
| 9 · ब्राह्मी और खरोष्ठी, अभिलेखों से साक्ष्य | 45–48 | भाग 7 | 7. मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं | क20 · ग1, ग2, ग4 · छ4 | 90–101 |
| 10 · अभिलेख साक्ष्य की सीमा, काल रेखा | 48–51 | भाग 8 | 8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा, सार और काल-रेखा | ङ8 · च2, च5 | 102–118 |
| 11 · मूल्यांकन | 51–52 | आख़िरी भाग | हर पड़ाव के अंत में उसके प्रश्न | तीन नमूना परीक्षा-पत्र | पूरा सेट |
प्रश्न बैंक के कोड ऐसे पढ़िए: क1 मतलब खण्ड क (वस्तुनिष्ठ प्रश्न) का प्रश्न 1। ख रिक्त स्थान है, ग सही/ग़लत, घ अति लघूत्तरीय (2 अंक), ङ लघूत्तरीय (3 अंक), च दीर्घ उत्तरीय (5 अंक) और छ स्रोत पर आधारित प्रश्न (4 अंक)। फ़्लैशकार्ड के अंक कार्ड के नंबर हैं।
पढ़ाने से पहले
तैयारी — कार्ड में क्या-क्या है और उसे कैसे तैयार करें
हर कालांश का कार्ड इसी क्रम में चलता है। पहली बार पढ़ा रहे हैं तो यह तालिका एक बार पढ़ लीजिए।
| हिस्सा या औज़ार | यह क्या है | कैसे तैयार करें |
|---|---|---|
| किताब | कालांश के पृष्ठ, भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 में | पढ़ाने से एक दिन पहले वे पृष्ठ ख़ुद पढ़िए, स्रोत वाले बॉक्स और किनारे के प्रश्न भी। |
| स्लाइड | स्लाइड शो का वह भाग जो इस कालांश का है | प्रोजेक्टर हो तो एक बार चलाकर देख लीजिए। न हो तो स्लाइड का पाठ हाथ में रखिए; हर स्लाइड की बात बोर्ड-कार्य में भी है। |
| इंटरैक्टिव अध्याय | अध्याय का वह पड़ाव जो बच्चे फ़ोन या कंप्यूटर पर ख़ुद पढ़ सकते हैं | कक्षा में पर्दे पर चलाना ज़रूरी नहीं। गृहकार्य के साथ बच्चों को उसका लिंक दीजिए। |
| लक्ष्य | कालांश के अंत तक हर बच्चा क्या कर पाएगा | निकास-पर्ची इसी लक्ष्य को जाँचती है, इसलिए पहले लक्ष्य पढ़िए, फिर पर्ची। |
| साथ ले जाइए | कक्षा में जो चीज़ हाथ में चाहिए | एक दिन पहले जुटा लीजिए: चार्ट पेपर, पर्चियाँ, मानचित्र। |
| 40 मिनट | कालांश के चरण, मिनट के हिसाब से | 45 मिनट का कालांश हो तो बचे पाँच मिनट चर्चा वाले चरण को दीजिए। समय कम पड़े तो किनारे का एक प्रश्न गृहकार्य में डाल दीजिए, निकास-पर्ची मत छोड़िए। |
| चित्र | बोर्ड पर बनाने लायक़ एक सादा आरेख | कक्षा से पहले कॉपी में एक बार बनाकर देखिए। बोर्ड पर उसे बच्चों के जवाबों के साथ-साथ बनाइए। |
| बोर्ड-कार्य | कालांश के अंत तक बोर्ड पर बनने वाली तालिका | बच्चे इसे कॉपी में उतारें; यही उनका दोहराने का पन्ना है। बोर्ड सबका है, इसलिए जो चीज़ कई दिन चाहिए, वह चार्ट पेपर पर बनाइए। |
| यहाँ बच्चे अटकेंगे | आम उलझनें और उनसे निकलने का तरीका | पढ़ाते समय इन जगहों पर रुककर एक सवाल पूछिए। |
| निकास-पर्ची | कालांश के आख़िरी चार मिनट में दो छोटे सवाल, पर्ची पर | पर्चियाँ इकट्ठी कीजिए। अगले कालांश के पहले पाँच मिनट उन्हीं की ग़लतियों पर। |
| प्रश्न बैंक | प्रश्न बैंक के कोड, जैसे क1 या घ3 | गृहकार्य यहीं से है। उत्तर उसी पन्ने पर खुलते हैं, इसलिए कॉपी जाँचते समय मिलाइए। |
| फ़्लैशकार्ड | फ़्लैशकार्ड के कार्ड नंबर | दोहराने के लिए। जोड़ियों में एक बच्चा पूछे, दूसरा बताए। |
हर कालांश से पहले:
- कार्ड के पृष्ठ किताब में पढ़िए, ख़ासकर स्रोत वाला बॉक्स।
- पिछली निकास-पर्चियाँ छाँटिए: कितनों ने सही लिखा, सबसे ज़्यादा कौन-सी भूल हुई।
- “चित्र” वाला आरेख कॉपी में एक बार बनाइए।
- गृहकार्य के कोड प्रश्न बैंक में खोलकर देख लीजिए कि उत्तर कितने लंबे हैं।
पढ़ाने का क्रम: पहले स्रोत, फिर कहानी
किताब इसी क्रम में चलती है: पहले बताती है कि जेम्स प्रिंसेप ने अभिलेख कैसे पढ़े, फिर उन्हीं अभिलेखों और ग्रंथों से राज्यों, गाँवों और नगरों की कहानी जोड़ती है, और आख़िर में बताती है कि अभिलेख कहाँ चुप रहते हैं। हर कालांश में बच्चे से एक ही सवाल पूछते रहिए: “यह बात किताब किस स्रोत से कह रही है?” मौर्य सेना के आँकड़े यूनानी स्रोत से हैं, गंदतिन्दु जातक एक कथा है, दंगुन गाँव का दान एक ताम्र पत्र जैसे अभिलेख से है। जब बच्चा स्रोत पहचानने लगे, तब कालांश 9 और 10 (लिपियाँ और अभिलेखों की सीमा) उसे जुड़ी हुई बात लगेंगे, अलग अध्याय नहीं।
इस क्रम को मत तोड़िए। कालांश 10 की बात (अभिलेख क्या नहीं बताते) पहले दिन के सवाल का जवाब है, इसलिए उसे सबसे आख़िर में ही रखिए।
सामग्री — यह जुटा लीजिए
| # | क्या | किस कालांश में |
|---|---|---|
| 1 | चार्ट पेपर पर काल रेखा 1 (पृष्ठ 50) का खाली ढाँचा: बाईं ओर साल, दाईं ओर ख़ाली जगह। हर कालांश में एक-दो पंक्ति भरिए | 1 से 10, दीवार पर |
| 2 | भारत का एक सादा रेखा-मानचित्र (बड़ा, चार्ट पेपर पर) | 2, 3, 7, 8 |
| 3 | पर्चियाँ (पुरानी कॉपियों के पन्ने काटकर भी चलेंगी) | हर कालांश |
| 4 | किताब के मानचित्र 1 (पृष्ठ 30), 2 (पृष्ठ 33) और 3 (पृष्ठ 43): बच्चों की अपनी किताबों में | 2, 3, 7, 9 |
| 5 | आज के कुछ सिक्के और नोट (प्रश्न 12 की परियोजना के लिए) | 8 |
| 6 | पहले दिन की पर्चियाँ (कालांश 1 में लिखी हुई), एक लिफ़ाफ़े में | 10 |
कक्षा-व्यवस्था
- चार-पाँच बच्चों के समूह बनाइए; पूरे अध्याय में वही समूह रहें। हर समूह के पास किताब की कम से कम दो प्रतियाँ खुली हों।
- काल रेखा का चार्ट दीवार पर ऐसी जगह लगाइए कि पीछे बैठा बच्चा भी पढ़ सके।
- बच्चों से कहिए कि कॉपी का पहला पन्ना “स्रोतों की सूची” के लिए छोड़ दें: स्रोत 1 से 11, हर एक का नाम और पृष्ठ। हर कालांश में दो-तीन नाम जुड़ेंगे।
- बोर्ड हर कालांश में नया बनता है। जो तालिका अगले दिन भी चाहिए, वह बच्चों की कॉपी में या चार्ट पेपर पर रहे।
अधिगम प्रतिफल
| # | प्रतिफल | कालांश | जाँच |
|---|---|---|---|
| 1 | अभिलेख, अभिलेखशास्त्र, पुरालिपि और प्राकृत का अर्थ बताता है, और प्रिंसेप की खोज का महत्व समझाता है | 1 | निकास-पर्ची 1, घ1 |
| 2 | राजा वाले राज्य और गण या संघ का अंतर बताता है, और मगध के उदय की दोनों व्याख्याएँ अलग करता है | 2 | निकास-पर्ची 2, ङ2 |
| 3 | मौर्य इतिहास के स्रोत गिनाता है और हर एक की सीमा बताता है; प्रशासन के मुख्य अंग बताता है | 3 | निकास-पर्ची 3, च1 |
| 4 | सरदार की भेंट और राजा के कर में भेद करता है; कुषाण और गुप्त शासकों के सत्ता जताने के तरीके बताता है | 4 | निकास-पर्ची 4, च3 |
| 5 | जातक कथा से प्रजा और राजा के संबंध का अनुमान लगाता है; उपज बढ़ाने के तीन तरीके और उनकी सीमा बताता है | 5 | निकास-पर्ची 5, च4 |
| 6 | गाँव के वर्ग पहचानता है; भूमिदान के बारे में इतिहासकारों के दोनों मत बताता है | 6 | निकास-पर्ची 6, ङ6 |
| 7 | आरंभिक नगरों के बारे में जानकारी के स्रोत बताता है, और हड़प्पा शहरों से अंतर समझाता है | 7 | निकास-पर्ची 7, घ9 |
| 8 | व्यापार के मार्ग, सामान और सिक्कों का क्रम बताता है | 8 | निकास-पर्ची 8, च6 |
| 9 | ब्राह्मी और खरोष्ठी के पढ़े जाने का तरीका और स्रोत 10 को असोक का मानने का तर्क बताता है | 9 | निकास-पर्ची 9, छ4 |
| 10 | अभिलेख साक्ष्य की सीमाएँ गिनाता है और किसी दावे को सत्य, संभव या अतिशयोक्ति में परखता है | 10 | निकास-पर्ची 10, ङ8, च2 |
कालांश-दर-कालांश
कालांश 1 — शुरुआत: 600 ई.पू. से 600 ई. तक; 1. प्रिंसेप और पियदस्सी
किताब — पृष्ठ 28, और पृष्ठ 29 का “अभिलेख” बॉक्स · स्लाइड — शुरू की तीन स्लाइड, फिर “1. प्रिंसेप और पियदस्सी” वाला भाग · इंटरैक्टिव — शुरुआत, 1. प्रिंसेप और पियदस्सी
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सकेगा कि अभिलेख क्या होता है, बिना तिथि वाले अभिलेख का काल पुरालिपि से कैसे तय होता है, और जेम्स प्रिंसेप की खोज से इतिहास के अध्ययन को नयी दिशा क्यों मिली।
साथ ले जाइए — हर बच्चे के लिए एक पर्ची, एक लिफ़ाफ़ा (पहले दिन की पर्चियों के लिए), काल रेखा का खाली चार्ट।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पहले दिन की पर्ची। बोर्ड पर अध्याय का बड़ा सवाल लिखिए: “लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक के राजाओं, किसानों और नगरों के बारे में इतिहासकार कैसे जानते हैं, और क्या-क्या नहीं जान पाते?” हर बच्चा अपने अनुमान से दो पंक्तियाँ लिखे और नाम डाले। कोई उत्तर ग़लत नहीं है। पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में रख लीजिए; ये कालांश 10 में खुलेंगी।
- 5–12 मिनट · अध्याय का काल। पृष्ठ 28 का शीर्षक पढ़वाइए: “लगभग 600 ई.पू. से 600 ई.”। फिर पहला अनुच्छेद। यह अनुच्छेद उससे पहले के समय की बात करता है: हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने ऋग्वेद की रचना की, कई क्षेत्रों में कृषक बस्तियाँ बनीं, और मध्य और दक्षिण भारत में महापाषाण नाम के पत्थरों के बड़े ढाँचे मिले हैं, जिनमें शवों के साथ लोहे के उपकरण और हथियार भी दफ़नाए गए। अध्याय की अपनी कहानी अगले अनुच्छेद से शुरू होती है: ईसा पूर्व छठी शताब्दी से आरंभिक राज्य, साम्राज्य और रजवाड़े बने, खेती की उपज संगठित करने के तरीके बदले और नए नगर उभरे।
- 12–17 मिनट · स्रोत कौन-से? तीसरा अनुच्छेद पढ़वाइए। बोर्ड पर चार शब्द लिखिए: अभिलेख, ग्रंथ, सिक्के, चित्र। किताब का वाक्य भी: “इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है”। बच्चे यह वाक्य कॉपी के पहले पन्ने पर, “स्रोतों की सूची” के ऊपर लिखें।
- 17–30 मिनट · प्रिंसेप और पियदस्सी। भाग 1 ज़ोर से पढ़वाइए और चरण 4 का चित्र साथ-साथ बनाइए। 1830 के दशक में ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला। ज़्यादातर अभिलेखों और सिक्कों पर पियदस्सी, यानी “मनोहर मुखाकृति वाले राजा”, का नाम मिला; कुछ पर राजा का नाम असोक भी लिखा है। इसके बाद भारतीय और यूरोपीय विद्वानों ने अभिलेखों और ग्रंथों से प्रमुख राजवंशों की वंशावलियाँ बनाईं, और बीसवीं सदी के आरंभिक दशकों तक राजनीतिक इतिहास का एक सामान्य चित्र तैयार हो गया।
- 30–36 मिनट · “अभिलेख” बॉक्स (पृष्ठ 29)। समूह बॉक्स पढ़ें और तीन सवालों के उत्तर ढूँढें: अभिलेख किस पर खुदे होते हैं? जिन पर तिथि नहीं, उनका काल कैसे तय होता है? सबसे पुराने अभिलेख किस भाषा में हैं? फिर बोर्ड-कार्य की तालिका भरवाइए।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) अभिलेख किसे कहते हैं? (2) बिना तिथि वाले अभिलेख का काल कैसे तय किया जाता है?
एक अभिलेख से इतिहास तक (चरण 4)
एक अभिलेख से इतिहास तक
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| शब्द | अर्थ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अभिलेख | पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदा लेख | 29 |
| अभिलेखशास्त्र | अभिलेखों का अध्ययन | 28 |
| पुरालिपि | लेखन शैली, जिससे बिना तिथि वाले अभिलेख का काल तय होता है | 29 |
| प्राकृत | जनसामान्य की भाषाएँ; प्राचीनतम अभिलेख इन्हीं में | 29 |
| पियदस्सी | “मनोहर मुखाकृति वाले राजा”; कुछ अभिलेखों पर नाम असोक भी | 28–29 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “ऋग्वेद इसी अध्याय के काल में बना।” नहीं। पृष्ठ 28 का पहला अनुच्छेद हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों की बात करता है, जब सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों ने ऋग्वेद की रचना की। अध्याय का अपना काल लगभग 600 ई.पू. से शुरू होता है। “रचना” शब्द ही बोलिए। हिंदी किताब में यहाँ ‘लेखन’ छपा है; अंग्रेज़ी संस्करण में ‘composed’ (रचना) है। वेद पहले रचे गए और मौखिक रूप से आगे बढ़े (कक्षा 6 के रिवीजन नोट्स)।
- ई.पू. की गिनती उलटी चलती है। बोर्ड पर एक रेखा खींचिए: बाईं ओर 600 ई.पू., बीच में ईसवी सन् का आरंभ, दाईं ओर 600 ई.। फिर पूछिए: 250 ई.पू. और 500 ई. में कौन-सा समय पहले आया? (250 ई.पू.)
- पियदस्सी नाम है या उपाधि? किताब पृष्ठ 28 पर इसे राजा का नाम कहती है और पृष्ठ 47 पर उपाधि। बच्चों से कहिए कि दोनों जगह बात एक ही राजा की है; यह गुत्थी कालांश 9 में सुलझेगी।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो शुरुआत खोलिए, और प्रिंसेप वाले पड़ाव से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए बोर्ड-कार्य के पाँच शब्द ही काफ़ी हैं। जोड़ी बनाकर एक शब्द बोले, दूसरा अर्थ।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: किसी अभिलेख पर तिथि न हो और उसमें किसी राजा का नाम भी न हो, तो इतिहासकार उसका समय कैसे अनुमान लगाएँगे? (अक्षरों की बनावट, यानी पुरालिपि, से।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदा लेख, जिसमें बनवाने वालों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे होते हैं। (2) पुरालिपि से, यानी अक्षरों की लेखन शैली देखकर।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क1, क2, ख1–ख3 और घ1। साथ में कॉपी के पहले पन्ने पर “स्रोतों की सूची” का शीर्षक बनाइए।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 1–11।
कालांश 2 — 2. प्रारंभिक राज्य: सोलह महाजनपद और मगध
किताब — पृष्ठ 29–31 · स्लाइड — “2. प्रारंभिक राज्य” वाला भाग · इंटरैक्टिव — 2. प्रारंभिक राज्य
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी राजा वाले राज्य और गण या संघ का अंतर बता सकेगा, महाजनपदों की तीन विशेषताएँ गिना सकेगा, और मगध के उदय की दो व्याख्याएँ अलग-अलग लिख सकेगा।
साथ ले जाइए — भारत का रेखा-मानचित्र (चार्ट पेपर पर), पिछली पर्चियाँ।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। दो-तीन पर्चियों के उत्तर पढ़कर सुनाइए। जिन्होंने “पुरालिपि” नहीं लिखा, उनके लिए ‘अ’ वाला उदाहरण एक बार दोहराइए।
- 5–15 मिनट · सोलह महाजनपद (2.1)। किताब छठी शताब्दी ई.पू. को “परिवर्तनकारी काल” कहती है: आरंभिक राज्य, नगर, लोहे का बढ़ता प्रयोग और सिक्के। बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में सोलह महाजनपदों का उल्लेख है; वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार और अवन्ति के नाम बार-बार आते हैं। बच्चे मानचित्र 1 (पृष्ठ 30) में ये नाम ढूँढें।
- 15–23 मिनट · राजा या समूह? ज़्यादातर महाजनपदों पर राजा का शासन था, पर गण और संघ में लोगों का समूह शासन करता था और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था। भगवान महावीर और भगवान बुद्ध गणों से थे। वज्जि संघ जैसे कुछ राज्यों में भूमि सहित कई संसाधनों पर सामूहिक नियंत्रण था। बोर्ड पर चरण 3 का चित्र बनाइए।
- 23–30 मिनट · राज्य कैसे चलता था? हर महाजनपद की एक राजधानी थी, प्राय: किलेबंद। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने संस्कृत में धर्मशास्त्र लिखे, जिनमें अपेक्षा थी कि शासक क्षत्रिय हों। शासक किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट लेते थे; पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन जुटाना भी वैध माना जाता था। कुछ राज्यों ने स्थायी सेना और नौकरशाही बनाई; बाकी सहायक-सेना पर निर्भर रहे, जिसके सैनिक प्राय: कृषक वर्ग से आते थे।
- 30–36 मिनट · मगध (2.2)। छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध (आधुनिक बिहार) सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना। दो स्तंभ बनवाइए: आधुनिक इतिहासकार (खेती की अच्छी उपज, आधुनिक झारखंड में लोहे की खदानें, जंगलों के हाथी, गंगा और उपनदियों से सस्ता आवागमन) और आरंभिक जैन व बौद्ध लेखक (बिंबिसार, अजातसत्तु, महापद्मनंद जैसे शासकों और उनके मंत्रियों की नीतियाँ)। राजधानी पहले राजगाह थी, जिसका अर्थ है “राजाओं का घर”; चौथी शताब्दी ई.पू. में पाटलिपुत्र (आज का पटना) राजधानी बना।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) गण या संघ में राजा कौन कहलाता था? (2) मगध के उदय के दो कारण लिखिए जो आधुनिक इतिहासकार देते हैं।
राजा वाला राज्य और गण (चरण 3)
राजा वाला राज्य और गण
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| महाजनपद | सोलह; बौद्ध और जैन धर्म के आरंभिक ग्रंथों में | 29 |
| गण और संघ | लोगों का समूह शासन करता, हर व्यक्ति राजा कहलाता | 29 |
| धर्मशास्त्र | ब्राह्मणों ने संस्कृत में लिखे; शासक क्षत्रिय हों | 30 |
| मगध का उदय | छठी से चौथी शताब्दी ई.पू.; दो व्याख्याएँ | 31 |
| राजधानी | राजगाह, फिर पाटलिपुत्र (चौथी शताब्दी ई.पू.) | 31 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “सोलह” पक्की सूची नहीं। किताब बताती है कि महाजनपदों की सूची ग्रंथों में एक जैसी नहीं, पर कुछ नाम बार-बार आते हैं। बच्चे सात नाम याद रखें, सोलह नहीं।
- “गण में कोई राजा नहीं था।” उलटा है: वहाँ समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।
- दो व्याख्याओं को मिला देना। पूछते रहिए: “यह कारण किसने दिया, पुराने लेखकों ने या आज के इतिहासकारों ने?”
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 2. प्रारंभिक राज्य खोलिए, और मगध वाले हिस्से से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए मगध वाले दो स्तंभ ही काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पड़ोसी पर आक्रमण से धन जुटाना वैध था, तो राजधानियों के किलेबंद होने से इसका क्या संबंध है? (हर राज्य को दूसरों के आक्रमण से बचना भी था।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) शासन करने वाले समूह का हर व्यक्ति। (2) इनमें से कोई दो: खेती की अच्छी उपज, लोहे की खदानें (आधुनिक झारखंड में), जंगलों के हाथी, गंगा और उपनदियों से सस्ता और सुलभ आवागमन।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क3–क5, ख4, घ2, ङ1 और ङ2; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 2 (महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण) कॉपी में।
- पृष्ठ 30–31 के सवालों के नमूना उत्तर —
- पृष्ठ 30 (राज्य और नगर कहाँ सबसे सघन थे?): मानचित्र 1 पर देखिए कि महाजनपदों के नाम और नगरों के बिंदु कहाँ सबसे पास-पास हैं। संकेत: काल रेखा 1 में लगभग 600–500 ई.पू. में गंगा घाटी में नगरीकरण लिखा है, और मगध के उदय के कारणों में गंगा और उपनदियों से आवागमन भी है। उत्तर: गंगा और उसकी उपनदियों की घाटी, यानी आज का उत्तर प्रदेश और बिहार।
- पृष्ठ 31 (राजगीर की दीवारें क्यों बनाई गईं?): किताब बताती है कि हर महाजनपद की राजधानी को प्राय: किले से घेरा जाता था (पृष्ठ 29), और संपत्ति जुटाने का एक वैध उपाय पड़ोसी राज्यों पर आक्रमण करके धन इकट्ठा करना भी माना जाता था (पृष्ठ 30)। हमारी ओर से: इसलिए दीवारें शायद राजधानी की सुरक्षा के लिए बनाई गईं।
- पृष्ठ 31, चर्चा कीजिए (मगध के उदय की व्याख्याएँ): आधुनिक इतिहासकार उपज, लोहे की खदानों, हाथियों और नदियों पर ज़ोर देते हैं; आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे शासकों और उनके मंत्रियों की नीतियों पर। भेद यह है कि एक व्याख्या भूगोल और संसाधनों की है, दूसरी व्यक्तियों की।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 12–24।
कालांश 3 — 3. एक आरंभिक साम्राज्य: मौर्य
किताब — पृष्ठ 32–35 · स्लाइड — “3. एक आरंभिक साम्राज्य: मौर्य” वाला भाग · इंटरैक्टिव — 3. एक आरंभिक साम्राज्य
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी मौर्य इतिहास के किताब में गिनाए गए स्रोत गिना सकेगा, हर एक की एक सीमा बता सकेगा, और साम्राज्य के पाँच राजनीतिक केंद्र और धम्म की मुख्य बातें लिख सकेगा।
साथ ले जाइए — भारत का रेखा-मानचित्र, काल रेखा का चार्ट, पिछली पर्चियाँ।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। जिन्होंने मगध के उदय के कारणों में बिंबिसार या अजातसत्तु लिखा, उनसे पूछिए: यह कारण किसने दिया? (आरंभिक जैन और बौद्ध लेखकों ने।)
- 5–10 मिनट · साम्राज्य की नींव। लगभग 321 ई.पू. में चंद्रगुप्त मौर्य ने शासन की नींव रखी, जो पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला। उनके पौत्र असोक ने कलिंग (आधुनिक उड़ीसा) पर विजय पाई। काल रेखा के चार्ट में तीन पंक्तियाँ भरवाइए: लगभग 321 ई.पू. (चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण), लगभग 272/268–231 ई.पू. (असोक का शासन), लगभग 185 ई.पू. (मौर्य साम्राज्य का अंत)।
- 10–20 मिनट · हम कैसे जानते हैं (3.1)। चरण 3 का चित्र बनाइए। हर स्रोत के साथ उसकी सीमा भी बोलिए। असोक पहले सम्राट थे जिन्होंने अपने संदेश प्राकृतिक पत्थरों और पॉलिश किए हुए स्तंभों पर लिखवाए। ज़्यादातर अभिलेख प्राकृत में और ब्राह्मी लिपि में हैं; पश्चिमोत्तर के कुछ खरोष्ठी में, और अफ़गानिस्तान के अरामेइक और यूनानी में।
- 20–30 मिनट · साम्राज्य का प्रशासन (3.2)। पाँच राजनीतिक केंद्र बोर्ड पर लिखिए और मानचित्र पर दिखाइए। किताब बताती है कि इतिहासकार अब इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि इतने विशाल साम्राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था एक जैसी होना संभव नहीं था, और यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो (पृष्ठ 32–33)। मेगस्थनीज़ ने सेना के संचालन के लिए “एक समिति और छ: उपसमितियों” का उल्लेख किया है। एक समूह स्रोत 1 (अधिकारियों के काम) पढ़े, दूसरा स्रोत 2 (अर्थशास्त्र में हाथी पकड़ना और यूनानी स्रोतों के सेना के आँकड़े)।
- 30–36 मिनट · धम्म और साम्राज्य का महत्व (3.3)। असोक ने साम्राज्य को अखंड बनाए रखने के लिए धम्म का प्रचार किया: बड़ों के प्रति आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार, और दूसरों के धर्मों और परंपराओं का आदर। इसके लिए धम्म महामात्त नाम के अधिकारी नियुक्त हुए। फिर दो नज़रें बोर्ड पर: उन्नीसवीं और आरंभिक बीसवीं सदी के भारतीय इतिहासकारों को ऐसे साम्राज्य की संभावना चुनौतीपूर्ण और उत्साहवर्धक लगी; दूसरी ओर, साम्राज्य “मात्र डेढ़ सौ साल” चला और हर जगह उसका नियंत्रण एकसमान नहीं था।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) असोक के अभिलेख किन लिपियों में मिलते हैं? (2) मेगस्थनीज़ का विवरण पढ़ते समय कौन-सी एक सावधानी ज़रूरी है?
मौर्यों के बारे में हम कैसे जानते हैं (चरण 3)
मौर्यों के बारे में हम कैसे जानते हैं
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| केंद्र | क्यों अहम | पृष्ठ |
|---|---|---|
| पाटलिपुत्र | राजधानी | 32 |
| तक्षशिला, उज्जयिनी | लंबी दूरी के व्यापार मार्ग पर | 33 |
| सुवर्णगिरि | “सोने के पहाड़”; कर्नाटक की सोने की खदानों के लिए उपयोगी | 33 |
| तोसलि | प्रांतीय केंद्र; पाँचों केंद्रों का उल्लेख असोक के अभिलेखों में | 32 |
| सेना | एक समिति और छ: उपसमितियाँ: नौसेना, यातायात और खान-पान, पैदल, अश्वारोही, रथारोही, हाथी | 34 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “मौर्य साम्राज्य में हर जगह एक जैसा शासन था।” नहीं। किताब के अनुसार साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था (पृष्ठ 35), और यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो (पृष्ठ 33)।
- सेना के आँकड़े पक्के मान लेना। स्रोत 2 के आँकड़े (“छ: लाख पैदल सैनिक, तीस हज़ार घुड़सवार तथा नौ हज़ार हाथी”) यूनानी स्रोतों के हैं, और “कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।”
- मेगस्थनीज़ का पूरा ग्रंथ मान लेना। आज इसके कुछ अंश ही मिलते हैं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 3. एक आरंभिक साम्राज्य खोलिए, और धम्म वाले हिस्से से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए पाँच केंद्रों के नाम और “असोक के अभिलेख सबसे मूल्यवान स्रोत” काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: अगर राजधानी से प्रांत तक पहुँचने में हफ़्ते लगते थे, तो असोक को एक जैसे संदेश दूर-दूर तक पत्थरों पर क्यों खुदवाने पड़े होंगे? (राजा का संदेश हर जगह पहुँचे और टिका रहे।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) ज़्यादातर ब्राह्मी में; पश्चिमोत्तर के कुछ खरोष्ठी में; अफ़गानिस्तान के अरामेइक और यूनानी में। (2) आज उसके कुछ अंश ही मिलते हैं, और सेना के आकार जैसे यूनानी आँकड़ों को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क6–क10, ख5, ग6, घ4, ङ3, ङ4 और छ1; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 6 (मौर्य प्रशासन, लघु निबंध) कॉपी में, दो दिन में।
- पृष्ठ 32–35 के सवालों के नमूना उत्तर —
- पृष्ठ 32 (सिंह शीर्ष आज महत्वपूर्ण क्यों?): भारत का राजकीय प्रतीक सारनाथ में मिले असोक के सिंह शीर्ष से लिया गया है, और यह भारत सरकार की आधिकारिक मुहर है (भारत सरकार: राजकीय प्रतीक)।
- पृष्ठ 33 (शासकों के अधीन न रहे क्षेत्रों में भी अभिलेख?): यह संभव है। अभिलेख कहीं मिल जाने भर से यह पक्का नहीं होता कि वह क्षेत्र शासक के पूरे नियंत्रण में था, क्योंकि किताब के अनुसार यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण राजधानी और उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो (पृष्ठ 33)।
- पृष्ठ 34 (व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए अधिकारी क्यों?): स्रोत 1 में यही अधिकारी कर भी वसूलते थे, और भूमि से जुड़े सभी व्यवसायों के साथ लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का भी निरीक्षण करते थे। हमारी ओर से: बच्चे सोचें कि कर वसूलने वाले अधिकारी के लिए इन कामों पर नज़र रखना क्यों काम का रहा होगा।
- पृष्ठ 34, चर्चा कीजिए (मेगस्थनीज़ और अर्थशास्त्र कितने उपयोगी?): उपयोगी, क्योंकि इनसे अधिकारियों के काम, सेना का संगठन और हाथी पकड़ने जैसी व्यवस्था का पता चलता है। सावधानी भी चाहिए: मेगस्थनीज़ के कुछ अंश ही बचे हैं, अर्थशास्त्र के भी संभवत: कुछ भाग ही कौटिल्य या चाणक्य के हैं, और यूनानी आँकड़ों को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं। इसलिए इन्हें असोक के अभिलेखों और पुरातत्व के साथ मिलाकर पढ़िए।
- पृष्ठ 35 (इतनी बड़ी सेना के लिए कौन-से संसाधन?): सैनिकों का भोजन, घोड़ों और हाथियों का चारा, बैलगाड़ियाँ, सेवक और शिल्पकार, जंगलों से पकड़े हाथी, और इन सबके लिए किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से वसूला गया कर।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 25–41।
कालांश 4 — 4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत: दक्षिण के राजा और सरदार, दैविक राजा
किताब — पृष्ठ 35–37 · स्लाइड — “4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत” वाला भाग · इंटरैक्टिव — 4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी सरदार की भेंट और राजा के कर का अंतर बता सकेगा, और कुषाण और गुप्त शासकों के ऊँचा दर्जा जताने के दो-दो तरीके लिख सकेगा।
साथ ले जाइए — पिछली पर्चियाँ, काल रेखा का चार्ट।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। मेगस्थनीज़ वाली सावधानी जिन्होंने नहीं लिखी, उनके लिए एक वाक्य दोहराइए: कुछ अंश ही बचे हैं।
- 5–15 मिनट · दक्षिण के सरदार (4.1)। तमिलकम में चोल, चेर और पाण्ड्य सरदारियाँ उभरीं। सरदार अनुष्ठान करता, युद्ध में नेतृत्व करता और विवादों में मध्यस्थ बनता था। वह अपने अधीन लोगों से भेंट लेता और उसे समर्थकों में बाँटता था; राजा कर वसूलते थे। सरदारी में सामान्यतया स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते थे। इसकी जानकारी तमिल संगम ग्रंथों से मिलती है। स्रोत 3 (सिलप्पादिकारम्) पढ़वाइए: लोग सेनगुत्तुवन के लिए नाचते-गाते पहाड़ों से उतरे, “ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं”, और हाथी दाँत, चंदन, हल्दी, इलायची जैसे उपहार और हाथी, बंदर, मोर जैसे जानवर लाए।
- 15–20 मिनट · व्यापार से राजस्व। सातवाहन (लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई.) और मध्य एशियाई मूल के शक शासक लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व जुटाते थे, और सत्ता में आने के बाद ऊँचे सामाजिक दर्जे का दावा करते थे।
- 20–28 मिनट · दैविक राजा (4.2)। कुषाणों (लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई.) ने मध्य एशिया से पश्चिमोत्तर भारत तक शासन किया। उनके राजधर्म का सबसे अच्छा प्रमाण उनके सिक्के और मूर्तियाँ हैं। मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर और अफ़गानिस्तान के एक देवस्थान पर उनकी विशालकाय मूर्तियाँ लगीं; कुछ इतिहासकारों के अनुसार वे स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे। कई कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ उपाधि ली, शायद चीनी शासकों से प्रेरित होकर, जो स्वयं को स्वर्गपुत्र कहते थे। चित्र 2.4 (कुषाण सिक्का) और 2.5 (मूर्ति) किताब में ही दिखाइए।
- 28–36 मिनट · सामंत और प्रशस्ति। चौथी शताब्दी ई. में गुप्त साम्राज्य सहित कई बड़े साम्राज्यों के साक्ष्य मिलते हैं, और इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे: सामंत स्थानीय संसाधनों से निर्वाह करते, शासक का आदर करते और सैनिक सहायता देते थे। शक्तिशाली सामंत राजा बन जाते, और दुर्बल राजा बड़े शासकों के अधीन हो जाते। फिर स्रोत 4: समुद्रगुप्त के राजकवि हरिषेण ने संस्कृत में प्रयाग प्रशस्ति (इलाहाबाद स्तंभ अभिलेख) रची। दो पंक्तियाँ बोर्ड पर: “धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।” और “वे अनेक सहस्र गायों के दाता हैं।” पूछिए: यह तथ्य है या प्रशंसा?
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) सरदार और राजा की आय में क्या अंतर था? (2) कुषाण शासकों ने ऊँचा दर्जा जताने के लिए क्या किया? दो बातें।
सत्ता जताने के तरीके (चरण 5)
सत्ता जताने के तरीके
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| शब्द या नाम | अर्थ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सरदार | अनुष्ठान, युद्ध में नेतृत्व, विवादों में मध्यस्थ; भेंट लेता, कर नहीं | 35 |
| देवपुत्र | कई कुषाण शासकों की उपाधि | 36 |
| सामंत | स्थानीय संसाधनों से निर्वाह, शासक का आदर, सैनिक सहायता | 36 |
| प्रशस्ति | राजा या स्वामी की प्रशंसा में कवि की रचना | 36–37 |
| प्रयाग प्रशस्ति | हरिषेण ने समुद्रगुप्त के लिए, संस्कृत में | 37 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “सरदार भी कर वसूलता था।” नहीं। सरदार भेंट लेता था; कर राजा वसूलते थे।
- प्रशस्ति को इतिहास की किताब मान लेना। किताब बताती है कि रचयिता इन्हें तथ्यात्मक विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे। इतिहासकार इनसे तथ्य सावधानी से निकालते हैं।
- सेनगुत्तुवन कौन थे? किताब स्रोत 3 के शीर्षक में उन्हें “पाण्ड्य सरदार” और प्रश्नावली के प्रश्न 4 में “पांड्य सरदार” लिखती है। सिलप्पादिकारम् और दूसरे तमिल स्रोतों में सेनगुत्तुवन चेर राजा हैं (रिवीजन नोट्स)। बच्चे पूछें तो यही बताइए; प्रश्न 4 का उत्तर वस्तुओं की तुलना पर है, नाम के लेबल पर नहीं।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 4. राजधर्म के नवीन सिद्धांत खोलिए, और कुषाणों वाले हिस्से से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए “भेंट और कर” का अंतर और ‘देवपुत्र’ उपाधि काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: जब शक्तिशाली सामंत राजा बन सकते थे, तब देवताओं से जुड़ने का दावा राजा के किस काम आता होगा? (उसे बाकी सबसे ऊपर दिखाने में।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
-
निकास-पर्ची (चरण 6): (1) सरदार भेंट लेता और समर्थकों में बाँटता था; राजा कर वसूलते थे। (2) ‘देवपुत्र’ उपाधि ली, और देवस्थानों पर अपनी विशालकाय मूर्तियाँ लगवाईं।
-
गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क11, क12, ख6, ग8, घ5, घ6, ङ7, छ2 और च3; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 8 (उत्तर-मौर्य काल के राजत्व के विचार) कॉपी में।
-
पृष्ठ 36–37 के सवालों के नमूना उत्तर —
-
पृष्ठ 36, पहला (लोग उपहार क्यों लाए, सरदार उनका क्या करते?): उपहार सरदार की सत्ता मानने और उसका आदर करने का तरीका थे।
- सरदार भेंट को अपने समर्थकों में बाँटता था।
- संगम कविताएँ भी बताती हैं कि सरदार संसाधनों का संकलन और वितरण कैसे करते थे।
-
पृष्ठ 36, दूसरा (चित्र 2.4 में राजा कैसे दर्शाया गया?): सिक्के के एक ओर राजा हैं, दूसरी ओर देवता।
राजा और देवता एक ही सिक्के पर हैं, और किताब कहती है कि कुषाणों ने देवी-देवताओं से जुड़कर ऊँची स्थिति पाने का उपाय अपनाया।
-
पृष्ठ 37 (मूर्ति राजा की क्यों लगती है?, चित्र 2.5): बच्चे चित्र देखकर विशेषताएँ ख़ुद गिनें:
- बड़ा आकार
- वस्त्र
- हाथ की वस्तुएँ
किताब के अनुसार माट के देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगी थीं।
-
पृष्ठ 37, चर्चा कीजिए (राजाओं ने दिव्य स्थिति का दावा क्यों किया?): ऊँची स्थिति पाने का एक साधन देवी-देवताओं से जुड़ना था:
- कुषाणों ने ‘देवपुत्र’ उपाधि ली और मूर्तियाँ लगवाईं।
- प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को देवताओं के तुल्य बताया गया।
-
-
दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 42–51।
कालांश 5 — 5. बदलता हुआ देहात: राजा की छवि और उपज बढ़ाने के तरीके (5.1-5.2)
किताब — पृष्ठ 38–39 · स्लाइड — “5. बदलता हुआ देहात” का पहला हिस्सा · इंटरैक्टिव — 5. बदलता हुआ देहात
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी गंदतिन्दु जातक से राजा और प्रजा के संबंध का अनुमान लिख सकेगा, उपज बढ़ाने के तीन तरीके और उनकी सीमा बता सकेगा, और सुदर्शन झील वाले अभिलेख की बात क्रम से कह सकेगा।
साथ ले जाइए — पिछली पर्चियाँ। गाँव के बच्चे हों तो उनसे पहले ही कह दीजिए कि घर से पूछकर आएँ: हमारे यहाँ खेत किससे जोतते हैं, सिंचाई कैसे होती है।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। “भेंट” और “कर” का अंतर एक बार फिर बोलवाइए।
- 5–15 मिनट · जनता में राजा की छवि (5.1)। साधारण लोगों ने राजाओं के बारे में अपने विचार कम ही लिखे, इसलिए इतिहासकार जातक और पंचतंत्र जैसी कथाएँ पढ़ते हैं। इतिहासकारों ने पता लगाया है कि इनमें से अनेक कथाओं के स्रोत मौखिक किस्से-कहानियाँ हैं, जिन्हें बाद में लिपिबद्ध किया गया होगा; जातक कथाएँ पहली सहस्राब्दि ई. के मध्य में पालि भाषा में लिखी गईं। गंदतिन्दु जातक ज़ोर से पढ़वाइए। बोर्ड पर प्रजा की शिकायत: “रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी”। बचने के लिए लोग गाँव छोड़कर जंगल में बस गए।
- 15–20 मिनट · इससे क्या पता चलता है? समूह दो मिनट सोचें, फिर किताब से मिलाएँ: राजा और ग्रामीण प्रजा के संबंध तनावपूर्ण रहते थे, क्योंकि शासक राजकोष भरने के लिए बड़े-बड़े कर माँगते थे। करों की बढ़ती माँग पूरी करने के लिए किसानों ने उपज बढ़ाने के नए तरीके खोजे।
- 20–30 मिनट · उपज बढ़ाने के तरीके (5.2)। बोर्ड-कार्य की तालिका पंक्ति-दर-पंक्ति भरवाइए: हल और लोहे का फाल (पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में उसकी जगह कुदाल), धान की रोपाई, सिंचाई। रोपाई का तरीका समझाइए: पहले बीज अंकुरित किए जाते हैं, फिर पानी से भरे खेतों में पौधे रोपे जाते हैं; ज़्यादा पौध बचती है, इसलिए उपज बढ़ती है, पर मेहनत कमरतोड़ होती है।
- 30–36 मिनट · स्रोत 5: सुदर्शन झील। चरण 5 का चित्र बनाइए। ध्यान दिलाइए कि यह जानकारी एक अभिलेख से है, जो रुद्रदमन की उपलब्धियाँ बताने के लिए बना था।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) गंदतिन्दु जातक से राजा और प्रजा के संबंध के बारे में क्या पता चलता है? (2) उपज बढ़ाने के दो तरीके लिखिए।
सुदर्शन झील: एक अभिलेख क्या बताता है (चरण 5)
सुदर्शन झील: एक अभिलेख क्या बताता है
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| तरीका | कहाँ | सीमा | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| हल, लोहे का फाल | छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियाँ; भारी वर्षा वाले क्षेत्र | फाल उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्से में; पंजाब और राजस्थान में बीसवीं सदी में; पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों के किसानों ने कुदाल का उपयोग किया, जो ऐसे इलाके के लिए कहीं अधिक उपयोगी था | 38–39 |
| धान की रोपाई | गंगा की घाटी | उपज में भारी वृद्धि, पर कमरतोड़ मेहनत | 38 |
| सिंचाई | कुएँ, तालाब, कहीं-कहीं नहरें | व्यक्तियों ने भी बनवाई और कृषक समुदायों ने मिलकर भी | 39 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “लोहे का फाल हर जगह फैल गया।” नहीं। इसका उपयोग कुछ ही हिस्सों में था; पंजाब और राजस्थान जैसे अर्धशुष्क क्षेत्रों में यह बीसवीं सदी में शुरू हुआ।
- कथा को घटना मान लेना। गंदतिन्दु जातक एक कथा है। इतिहासकार इससे यह अनुमान लगाते हैं कि प्रजा राजा को कैसे देखती रही होगी, किसी एक राजा का इतिहास नहीं।
- अभिलेख किसकी बात कहता है? सुदर्शन झील वाला अभिलेख रुद्रदमन की उपलब्धियाँ बताने के लिए बना था। इसलिए “अभिलेख के अनुसार रुद्रदमन ने मरम्मत करवाई” कहिए। यही बात कालांश 10 में अभिलेखों की सीमा बनकर लौटेगी।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 5. बदलता हुआ देहात खोलिए, और गाँव के वर्गों वाले हिस्से से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए तालिका की पहली दो पंक्तियाँ और जातक की शिकायत वाला वाक्य काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: कोई राजा अपनी बनवाई या सुधरवाई झील की बात पत्थर पर क्यों खुदवाता होगा? (यश के लिए; अभिलेख बनवाने वालों की उपलब्धियाँ ही बताते हैं।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) संबंध तनावपूर्ण थे: शासक बड़े-बड़े कर माँगते थे, और प्रजा डकैतों और कर वसूलने वाले अधिकारियों, दोनों से दुखी थी। (2) इनमें से कोई दो: लोहे के फाल वाला हल, धान की रोपाई, सिंचाई।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क13, ख7, ग3, घ8, ङ5 और च4; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 9 (कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन) कॉपी में।
- पृष्ठ 38 के सवाल का नमूना उत्तर — शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए? (स्रोत 5): करों की बढ़ती माँग के बीच उपज बढ़ाने के तरीके खोजे गए, और सिंचाई उनमें से एक थी: ज़्यादा उपज से खेती और राज्य की आय, दोनों को सहारा मिलता। किताब बताती है कि व्यक्तिगत तौर पर सिंचाई के साधन बनवाने वाले प्राय: राजा या प्रभावशाली लोग थे, जिन्होंने अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाया (पृष्ठ 39)।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 52–60।
कालांश 6 — 5. बदलता हुआ देहात: ग्रामीण समाज और भूमिदान (5.3-5.4)
किताब — पृष्ठ 39–41 · स्लाइड — “5. बदलता हुआ देहात” का दूसरा हिस्सा · इंटरैक्टिव — 5. बदलता हुआ देहात
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी गाँव के अलग-अलग वर्गों के नाम बता सकेगा, अग्रहार और भूमिदान का अर्थ समझा सकेगा, और भूमिदान के बारे में इतिहासकारों के दोनों मत लिख सकेगा।
साथ ले जाइए — पिछली पर्चियाँ, बच्चों की घर से लाई जानकारी (खेती और सिंचाई)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। फिर दो बच्चे बताएँ कि उनके गाँव में खेत किससे जोते जाते हैं और सिंचाई कैसे होती है।
- 5–13 मिनट · गाँव में भेद (5.3)। नई तकनीकों से उपज बढ़ी, पर लाभ सबको बराबर नहीं मिला। बौद्ध कथाओं में भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान और बड़े ज़मींदार मिलते हैं; पालि का गहपति शब्द छोटे किसानों और ज़मींदारों, दोनों के लिए आता है। बड़े ज़मींदार और ग्राम प्रधान शक्तिशाली थे; ग्राम प्रधान का पद प्राय: वंशानुगत होता था। तमिल संगम साहित्य के तीन शब्द बोर्ड पर: वेल्लालर (बड़े ज़मींदार), उल्वर (हलवाहा), अणिमई (दास)। किताब कहती है कि यह भेद शायद भूमि के स्वामित्व, श्रम और नयी प्रौद्योगिकी के उपयोग पर आधारित था।
- 13–18 मिनट · स्रोत 6 (मनुस्मृति)। आरंभिक भारत का सबसे प्रसिद्ध विधिग्रंथ, संस्कृत में दूसरी शताब्दी ई.पू. और दूसरी शताब्दी ई. के बीच लिखा गया। इसमें राजा को सलाह है कि सीमा पहचानने के लिए ऐसे गुप्त निशान ज़मीन में गाड़े जाएँ जो समय के साथ नष्ट न हों। पृष्ठ 39 का सवाल समूहों में।
- 18–30 मिनट · भूमिदान (5.4)। भूमिदान के प्रमाण ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से मिलते हैं; ज़्यादातर ताम्र पत्रों पर, जो शायद दान लेने वालों को प्रमाण के रूप में दिए जाते थे। प्रभावती गुप्त की कहानी चरण 4 के चित्र के साथ: संस्कृत धर्मशास्त्रों के अनुसार महिलाओं को भूमि पर स्वतंत्र अधिकार नहीं था, फिर भी अभिलेख बताता है कि वह भूमि की स्वामी थी और उसने दान भी किया। किताब दो कारण सुझाती है: वह रानी थी, इसलिए यह उदाहरण विरला हो सकता है; या धर्मशास्त्र हर स्थान पर समान रूप से लागू नहीं होते थे। फिर स्रोत 8 पढ़वाइए।
- 30–36 मिनट · बहस, और जो नियंत्रण से बाहर रहे। इतिहासकारों के दो मत बोर्ड पर: भूमिदान शासक वंश की रणनीति थी, ताकि खेती नए क्षेत्रों में फैले; या यह दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत था। फिर स्रोत 7 (हर्षचरित, बाणभट्ट): विंध्य क्षेत्र के जंगल के किनारे की बस्ती, जहाँ ज़्यादातर लोग कुदाल चलाते हैं। किताब याद दिलाती है कि पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे, शिल्पकार और घूम-घूमकर खेती करने वाले प्राय: अपने जीवन का विवरण नहीं रखते थे।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) अग्रहार क्या था? (2) भूमिदान के बारे में इतिहासकारों के दो मत लिखिए।
दंगुन गाँव का दान (चरण 4)
दंगुन गाँव का दान
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| शब्द | अर्थ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| गहपति | पालि शब्द; छोटे किसान और ज़मींदार, दोनों के लिए | 39 |
| वेल्लालर, उल्वर, अणिमई | बड़े ज़मींदार, हलवाहा, दास (तमिल संगम साहित्य) | 39 |
| ताम्र पत्र | ताँबे की प्लेट, जिस पर ज़्यादातर भूमिदान लिखे गए | 40 |
| अग्रहार | ब्राह्मणों को दान में दी गई भूमि | 41 |
| भूमिदान पर बहस | खेती फैलाने की रणनीति, या दुर्बल होते प्रभुत्व का संकेत | 40–41 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “प्रभावती गुप्त से पता चलता है कि उस समय सब महिलाओं के पास ज़मीन थी।” नहीं। किताब ख़ुद कहती है कि रानी होने के कारण यह उदाहरण विरला हो सकता है।
- छूट को उपहार मान लेना। स्रोत 8 में गाँव को अधिकारियों को कुछ चीज़ें देने से छूट मिली है। यानी पहले गाँव से ये चीज़ें माँगी जाती थीं।
- दो मतों में से एक को “सही” कहलवाना। किताब दोनों मत रखती है। बच्चे दोनों लिखें।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 5. बदलता हुआ देहात का भूमिदान वाला हिस्सा खोलिए, और स्रोत 7 से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए तालिका के गहपति और अग्रहार काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पशुपालक, शिकारी और मछुआरे अपना विवरण नहीं रखते थे, तो इतिहासकार उनके बारे में कहाँ से जानेंगे? (दूसरों के लिखे ग्रंथों से, जैसे हर्षचरित; और पुरावशेषों से।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
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निकास-पर्ची (चरण 6): (1) ब्राह्मणों को दान में दी गई भूमि। (2) एक मत: खेती को नए क्षेत्रों में फैलाने की रणनीति; दूसरा मत: दुर्बल होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत, जिसमें राजा दान से समर्थक जुटाते थे।
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गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क14–क17, ख8, ग7, घ7, ङ6 और छ3; साथ में प्रश्नावली के प्रश्न 4 (स्रोत 3 और स्रोत 8 की वस्तुओं की तुलना) और प्रश्न 3 (सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण) कॉपी में।
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पृष्ठ 39–41 के सवालों के नमूना उत्तर —
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पृष्ठ 39 (क्या सीमा चिह्न विवाद हल करने के लिए पर्याप्त रहे होंगे? स्रोत 6): यह सोचने का प्रश्न है।
- छिपे और टिकाऊ निशान विवाद के समय गवाही दे सकते थे।
- पर वे खोदने पर ही दिखते, कोई उन्हें हटा या बदल सकता था, और यह कोई लिखित रिकॉर्ड नहीं था।
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पृष्ठ 40 (स्रोत 7 के लोगों को व्यवसाय के आधार पर कैसे बाँटेंगे?): एक तरीका:
- खेती करने वाले (छोटे किसान, जो कुदाल चलाते हैं);
- जंगल की उपज जुटाने और ढोने वाले (छाल, फूल, अलसी, सन, शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी और घास के बोझ);
- और बेचने वाली ग्रामीण महिलाएँ, जो जंगल के फल बेचने जाती हैं।
दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब से कारण दे।
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पृष्ठ 41 (इस गाँव में कौन-सी वस्तुएँ पैदा होती थीं? स्रोत 8): घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध, क्योंकि इन्हीं को देने से छूट दी गई है।
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पृष्ठ 41, चर्चा कीजिए (आपके राज्य में हल, सिंचाई और धान की रोपाई): यह बच्चों की अपनी खोज है। किसानों से पूछें:
- खेत किससे जोते जाते हैं,
- सिंचाई कैसे होती है,
- रोपाई होती है या नहीं।
किताब से एक संकेत: पंजाब और राजस्थान में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ।
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दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 61–71।
कालांश 7 — 6. नगर एवं व्यापार: नए नगर और नगरीय जनसंख्या (6.1-6.2)
किताब — पृष्ठ 41–43 · स्लाइड — “6. नगर एवं व्यापार” का पहला हिस्सा · इंटरैक्टिव — 6. नगर एवं व्यापार
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सकेगा कि नए नगर कहाँ बसे, पाटलिपुत्र का इतिहास क्रम से कह सकेगा, और नगरों के लोगों के बारे में जानकारी के दो स्रोत (पुरावशेष और दानात्मक अभिलेख) बता सकेगा।
साथ ले जाइए — भारत का रेखा-मानचित्र, पिछली पर्चियाँ।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। अग्रहार का अर्थ एक बार सबसे बोलवाइए।
- 5–14 मिनट · नए नगर (6.1)। लगभग छठी शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के कई क्षेत्रों में नगर बने। ज़्यादातर नगर महाजनपदों की राजधानियाँ थे, और प्राय: सभी संचार मार्गों के किनारे बसे थे: पाटलिपुत्र नदीमार्ग पर, उज्जयिनी भूतल मार्ग पर, पुहार समुद्रतट पर। मथुरा जैसे शहर व्यावसायिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गतिविधियों के जीवंत केंद्र थे। मानचित्र पर तीनों तरह के उदाहरण दिखाइए।
- 14–20 मिनट · पाटलिपुत्र की कहानी। चरण 3 का चित्र बनाइए। बच्चे हर बॉक्स के साथ अपनी कॉपी में सदी लिखें।
- 20–30 मिनट · नगरों में कौन रहता था (6.2)? पहले यह कि खुदाई कठिन क्यों है: इन नगरों में आज भी लोग रहते हैं, इसलिए हड़प्पा शहरों की तरह बड़े पैमाने पर खुदाई संभव नहीं। फिर जो मिला है: उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (चमकदार कलई वाले उत्कृष्ट कटोरे और थालियाँ, जो शायद अमीर लोग इस्तेमाल करते थे), और सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन, साथ में सीप और पक्की मिट्टी की चीज़ें।
- 30–36 मिनट · दानात्मक अभिलेख और श्रेणी। द्वितीय शताब्दी ई.पू. तक कई नगरों में छोटे दानात्मक अभिलेख मिलते हैं, जिनमें दाता के नाम के साथ प्राय: उसका व्यवसाय लिखा होता है: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार, अधिकारी, धार्मिक गुरु, व्यापारी और राजा। चित्र 2.6 किताब में दिखाइए: मथुरा की यह मूर्ति स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया ने एक धार्मिक स्थल में स्थापित की थी। फिर श्रेणी: उत्पादकों और व्यापारियों के संघ, जो शायद कच्चा माल खरीदकर सामान बनाते और बेचते थे।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) आरंभिक नगरों में बड़े पैमाने पर खुदाई क्यों संभव नहीं? (2) दानात्मक अभिलेखों से नगर के लोगों के बारे में क्या पता चलता है?
पाटलिग्राम से खंडहर तक (चरण 3)
पाटलिग्राम से खंडहर तक
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| किससे जानते हैं | क्या मिला | पृष्ठ |
|---|---|---|
| पुरावशेष | उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र; धातु, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार, बर्तन | 42 |
| दानात्मक अभिलेख | दाता का नाम और व्यवसाय: धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार | 42–43 |
| चित्र 2.6 | नागपिया की भेंट, मथुरा | 42 |
| श्रेणी | उत्पादकों और व्यापारियों के संघ | 43 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “पाटलिपुत्र मौर्यों ने बसाया।” नहीं। वह पाटलिग्राम नाम के गाँव से बढ़ा; राजधानी लाने का निर्णय मगध के शासकों ने पाँचवीं सदी ई.पू. में किया।
- हड़प्पा से तुलना उलटी कर देना। किताब के अनुसार इन नगरों के अधिकांश स्थलों पर व्यापक रूप से खुदाई करना संभव नहीं है, क्योंकि आज भी इन क्षेत्रों में लोग रहते हैं; हड़प्पा के शहर इससे भिन्न हैं।
- “श्रेणी निश्चित रूप से सामान बनाती थी।” किताब “शायद” कहती है। यही शब्द बोलिए।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. नगर एवं व्यापार खोलिए, और व्यापार वाले हिस्से से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए पाटलिपुत्र के चार बॉक्स और “आज भी लोग रहते हैं” वाली बात काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: दानात्मक अभिलेखों में व्यवसायों की सूची से हमें शहर के किन लोगों का पता चलता है, और किनका शायद नहीं? (दान दे सकने वालों का; जो दान नहीं दे सके, उनका शायद नहीं।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) इन स्थलों पर आज भी लोग रहते हैं। (2) दाताओं के नाम और उनके व्यवसाय, जैसे धोबी, बुनकर, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार; यानी नगरों में तरह-तरह के कामगार रहते थे।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के ख9, ग5, घ3, घ9 और घ10; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 1 (नगरों में शिल्प उत्पादन के प्रमाण, हड़प्पा से तुलना) कॉपी में।
- पृष्ठ 43 के सवाल का नमूना उत्तर — तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली क्या वहाँ कोई नगर थे? (मानचित्र 3): बच्चे मानचित्र 3 को अध्याय 1 के हड़प्पा वाले मानचित्र के साथ रखें। मानचित्र 3 के नगर हैं: तक्षशिला, मथुरा, कन्नौज, श्रावस्ती, वैशाली, पाटलिपुत्र, वाराणसी, कौशाम्बी, राजगीर, महास्थान, विदिशा, उज्जयिनी, भरूकच्छ, चंद्रकेतुगढ़, शिशुपालगढ़, सोपारा, पैठन, धान्यकटक, कोडूमनाल और पुहार। इनमें से जो हड़प्पा के फैलाव वाले क्षेत्र में पड़ते हैं, उनकी सूची बनाएँ।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 72–76।
कालांश 8 — 6. नगर एवं व्यापार: व्यापार, सिक्के और राजा (6.3-6.4)
किताब — पृष्ठ 43–45 · स्लाइड — “6. नगर एवं व्यापार” का दूसरा हिस्सा · इंटरैक्टिव — 6. नगर एवं व्यापार
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी व्यापार के मार्ग और सामान बता सकेगा, और सिक्कों का क्रम (आहत सिक्के, हिंद-यूनानी, कुषाण, यौधेय, गुप्त) सदी के साथ लिख सकेगा।
साथ ले जाइए — आज के कुछ सिक्के और नोट, भारत का रेखा-मानचित्र, पिछली पर्चियाँ।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। “खुदाई कठिन क्यों” का उत्तर एक बच्चा बोले।
- 5–15 मिनट · व्यापार के मार्ग (6.3)। छठी शताब्दी ई.पू. से नदी मार्गों और भूमार्गों का जाल बिछ गया था। भू-मार्ग मध्य एशिया और उससे आगे तक; समुद्री मार्ग अरब सागर से उत्तरी अफ़्रीका और पश्चिम एशिया तक, और बंगाल की खाड़ी से चीन और दक्षिणपूर्व एशिया तक। शासक इन मार्गों पर नियंत्रण चाहते थे और शायद सुरक्षा के बदले व्यापारियों से धन लेते थे। मानचित्र पर बच्चे तीर बनाएँ।
- 15–22 मिनट · व्यापारी और सामान। पैदल फेरी वाले, बैलगाड़ी और घोड़े-खच्चरों के दल वाले, और समुद्री यात्री, जिनका रास्ता खतरनाक पर लाभदायक था। सफल व्यापारी तमिल में मसत्थुवन और प्राकृत में सत्थवाह और सेट्ठी कहलाते थे। नमक, अनाज, कपड़ा, धातु और धातु के उत्पाद, पत्थर, लकड़ी और जड़ी-बूटी एक जगह से दूसरी जगह जाते थे; रोमन साम्राज्य में काली मिर्च जैसे मसालों, कपड़ों और जड़ी-बूटियों की भारी माँग थी।
- 22–27 मिनट · स्रोत 9 (पेरिप्लस)। एक यूनानी समुद्र यात्री की रचना, लगभग प्रथम शताब्दी ई.। पेरिप्लस का अर्थ समुद्री यात्रा है और एरीथ्रियन यूनानी में लाल सागर को कहते हैं। मालाबार के बाज़ारों में सिक्के, पुखराज, सुरमा, मूँगे, कच्चा शीशा, ताँबा, टिन और सीसा आते थे, और काली मिर्च बाहर जाती थी।
- 27–36 मिनट · सिक्के और राजा (6.4)। चरण 5 का चित्र बनाइए और काल रेखा के चार्ट में “आहत सिक्के” और “सोने के सिक्के” भरवाइए। सिक्कों के अध्ययन को मुद्राशास्त्र कहते हैं। आज का एक सिक्का हाथ में लेकर पूछिए: इस पर क्या-क्या है? (यही प्रश्न 12 की परियोजना की शुरुआत है।)
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) शासक के नाम और प्रतिमा वाले सबसे पहले सिक्के किसने जारी किए? (2) दक्षिण भारत में रोमन सिक्के मिलने से क्या पता चलता है?
सिक्कों का सिलसिला (चरण 5)
सिक्कों का सिलसिला
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| बात | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| व्यापारी | तमिल में मसत्थुवन; प्राकृत में सत्थवाह और सेट्ठी | 44 |
| पेरिप्लस | यूनानी समुद्र यात्री की रचना; मालाबार से काली मिर्च | 44 |
| आहत सिक्के | चाँदी और ताँबे के, छठी शताब्दी ई.पू. | 44 |
| रोमन सिक्के | दक्षिण भारत के कई पुरास्थलों से; व्यापार राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था | 44–45 |
| मुद्राशास्त्र | सिक्कों का अध्ययन | 45 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “नाम और चित्र वाले पहले सिक्के कुषाणों के थे।” नहीं। ऐसे पहले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों के थे; कुषाणों ने बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के जारी किए।
- “आहत सिक्के सोने के थे।” नहीं। चाँदी और ताँबे के।
- सोने के सिक्के कम मिलने का एक ही कारण बताना। किताब दोनों मत देती है: कुछ कहते हैं रोमन साम्राज्य के पतन के बाद दूरवर्ती व्यापार घटा; दूसरे कहते हैं नए नगर और व्यापार के नए तंत्र उभरे, और हो सकता है सिक्के प्रचलन में रहने के कारण जमा ही न किए गए हों।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 6. नगर एवं व्यापार का सिक्कों वाला हिस्सा खोलिए, और गुप्त सिक्कों से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए चित्र के पहले तीन बॉक्स काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: कुषाणों के सोने के सिक्कों का आकार और वज़न रोमन और पार्थियन सिक्कों जैसा क्यों रखा गया होगा? (दूर के व्यापार में उन्हें आसानी से माना और बदला जा सके।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
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निकास-पर्ची (चरण 6): (1) हिंद-यूनानी शासकों ने, द्वितीय शताब्दी ई.पू. में। (2) व्यापार राजनीतिक सीमाओं से बँधा नहीं था; दक्षिण भारत रोमन साम्राज्य में न होते हुए भी व्यापार से उससे जुड़ा था।
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गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क18, क19, ख10 और च6। प्रश्नावली का प्रश्न 12 (आज के पाँच नोट और सिक्के) परियोजना के रूप में शुरू कराइए; रिपोर्ट कालांश 11 तक।
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पृष्ठ 44–45 के सवालों के नमूना उत्तर —
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पृष्ठ 44 (लेखक ने यह सूची क्यों बनाई? स्रोत 9): सूची बताती है कि मालाबार के बाज़ारों में क्या लाया जाता है और वहाँ से क्या ले जाया जा सकता है।
इसलिए संभव है कि यह समुद्री रास्ते से व्यापार करने वाले व्यापारियों और नाविकों के काम आने के लिए बनी हो।
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पृष्ठ 45, चर्चा कीजिए (विनिमय के साधन):
- सिक्के: चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के, कुषाणों और गुप्तों के सोने के सिक्के, यौधेय के ताँबे के सिक्के, और दक्षिण भारत में रोमन सिक्के।
- स्रोतों से मालाबार का व्यापार (स्रोत 9), सरदार को भेंट (स्रोत 3) और जंगल की उपज बेचना (स्रोत 7) पता चलता है।
पशुपालक, शिकारी, मछुआरे जैसे लोग अपना विवरण नहीं रखते थे, इसलिए उनके लेन-देन का ज्ञान स्रोतों से कम मिलता है।
-
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दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 77–89।
कालांश 9 — 7. मूल बातें: ब्राह्मी और खरोष्ठी कैसे पढ़ी गईं, अभिलेखों से साक्ष्य
किताब — पृष्ठ 45–48 · स्लाइड — “7. मूल बातें” वाला भाग · इंटरैक्टिव — 7. मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी बता सकेगा कि ब्राह्मी और खरोष्ठी किस तरीके से पढ़ी गईं, स्रोत 10 को असोक का अभिलेख मानने का तर्क दे सकेगा, और स्रोत 11 वाली उलझन समझा सकेगा।
साथ ले जाइए — पिछली पर्चियाँ; बच्चों की किताबों में मानचित्र 2 (पृष्ठ 33) खुला रहे।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। “पहले सिक्के किसके” वाली भूल हो तो एक बार फिर: हिंद-यूनानी।
- 5–14 मिनट · ब्राह्मी (7.1)। आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी है, और असोक के अभिलेख इसी में हैं। अट्ठारहवीं सदी से यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय पंडितों की सहायता से बंगाली और देवनागरी पांडुलिपियों के अक्षरों की तुलना पुराने अक्षरों से की। शुरू के विद्वान कई बार मान बैठे कि अभिलेख संस्कृत में हैं, जबकि प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में थे। कई दशकों के परिश्रम के बाद जेम्स प्रिंसेप ने 1838 ई. में असोककालीन ब्राह्मी का अर्थ निकाला। चित्र 2.11 बच्चे किताब में देखें और पृष्ठ 46 का सवाल करें।
- 14–20 मिनट · खरोष्ठी (7.2)। पश्चिमोत्तर के अभिलेखों की लिपि। इस क्षेत्र के हिंद-यूनानी राजाओं (लगभग द्वितीय–प्रथम शताब्दी ई.पू.) के सिक्कों पर राजाओं के नाम यूनानी और खरोष्ठी, दोनों में लिखे हैं। यूनानी पढ़ने वाले यूरोपीय विद्वानों ने दोनों के अक्षर मिलाए, जैसे अपोलोडोटस के नाम में। प्रिंसेप पहले ही खरोष्ठी अभिलेखों की भाषा प्राकृत पहचान चुके थे, इसलिए लंबे अभिलेख पढ़ना सरल हो गया।
- 20–30 मिनट · एक ही राजा के अभिलेख (7.3)। स्रोत 10 पढ़वाइए और चरण 4 का चित्र बनाइए। कालांश 1 की गुत्थी यहीं सुलझती है: स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं, केवल उपाधियाँ हैं, देवानांपिय (“देवताओं का प्रिय”) और पियदस्सी (“देखने में सुन्दर”)। फिर इतिहासकार की जाँच: असोक कहते हैं कि उनसे पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी। बच्चों से पूछिए: यह कथन सत्य है, संभव है या अतिशयोक्ति? किताब यही तीन खाने देती है।
- 30–36 मिनट · स्रोत 11: राजा की वेदना। शासन के आठ वर्ष पूरे होने पर कलिंग पर विजय: “डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए”। इसके बाद देवानांपिय धम्म में डूब गए। उलझन बोर्ड पर: असोक के अभिलेख आधुनिक उड़ीसा से मिले हैं, फिर भी वेदना वाला यह अभिलेख जीते गए उसी क्षेत्र में नहीं मिला। बच्चे दो मिनट सोचें कि ऐसा क्यों हुआ होगा; कोई एक पक्का उत्तर नहीं है।
- 36–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) खरोष्ठी पढ़ने में किन सिक्कों से मदद मिली? (2) स्रोत 10 में असोक का नाम नहीं है, फिर भी उसे असोक का क्यों माना गया?
एक ही राजा? अभिलेखशास्त्रियों का तर्क (चरण 4)
एक ही राजा? अभिलेखशास्त्रियों का तर्क
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक बोर्ड पर यह तालिका बने, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| लिपि या स्रोत | कैसे पढ़ा या समझा गया | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ब्राह्मी | पुरानी पांडुलिपियों के अक्षरों से तुलना; प्रिंसेप, 1838 ई. | 46 |
| खरोष्ठी | हिंद-यूनानी सिक्कों पर नाम यूनानी और खरोष्ठी में | 46–47 |
| स्रोत 10 | पतिवेदक हर समय लोगों के समाचार राजा तक पहुँचाएँ | 47 |
| स्रोत 11 | कलिंग विजय और राजा की वेदना; यह अभिलेख कलिंग में नहीं मिला | 48 |
| ब्रैकेट के शब्द | अर्थ साफ़ करने के लिए जोड़े जाते हैं, मूल अर्थ बदले बिना | 47 |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “स्रोत 10 में असोक का नाम लिखा है।” नहीं। केवल उपाधियाँ हैं; असोक नाम दूसरे अभिलेखों में मिलता है।
- ब्रैकेट वाले शब्दों को अभिलेख का हिस्सा मानना। ये अभिलेखशास्त्रियों के जोड़े हुए हैं।
- चित्र 2.11 के अक्षर रटवाना। ज़रूरत नहीं। बच्चे किताब में देखकर मिलते-जुलते और अलग अक्षर ख़ुद छाँटें।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 7. मूल बातें: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं खोलिए, और स्रोत 11 से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए दोनों लिपियों के पढ़े जाने का एक-एक वाक्य काफ़ी है।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: किताब पूछती है कि क्या राह चलते लोग रुककर अभिलेख पढ़ते थे, जबकि ज़्यादातर लोग पढ़े-लिखे नहीं थे। राजा का संदेश उन तक और किस तरह पहुँचा होगा? (सोचने का प्रश्न; जैसे कोई पढ़कर सुनाता हो।) यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
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निकास-पर्ची (चरण 6): (1) हिंद-यूनानी राजाओं के सिक्कों से, जिन पर नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में लिखे हैं। (2) असोक नाम दूसरे अभिलेखों में इन्हीं उपाधियों के साथ मिलता है, और विषय, शैली, भाषा और पुरालिपिविज्ञान में ये अभिलेख एक जैसे हैं।
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गृहकार्य: प्रश्न बैंक के क20, ग1, ग2, ग4 और छ4; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 5 (अभिलेखशास्त्रियों की समस्याएँ) और प्रश्न 10 (मानचित्र 1 और 2 की तुलना) कॉपी में।
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पृष्ठ 46–48 के सवालों के नमूना उत्तर —
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पृष्ठ 46 (क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? चित्र 2.11): बच्चे एक-एक अक्षर मिलाकर दो सूचियाँ बनाएँ: मिलते-जुलते और अलग।
संकेत: आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी है, इसलिए कुछ अक्षरों में समानता दिखनी चाहिए।
-
पृष्ठ 47 (आधुनिक संवाददाता और पतिवेदक में अंतर? स्रोत 10): पतिवेदक को लोगों के समाचार सीधे राजा तक पहुँचाने थे, हर समय, चाहे राजा खाना खा रहे हों या पालकी में हों।
हमारी ओर से: वह शासन के लिए सूचना देने वाला राजा का अधिकारी था, जबकि आज का संवाददाता समाचार अखबार, रेडियो या टीवी से आम जनता तक पहुँचाता है।
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पृष्ठ 48, चर्चा कीजिए (मानचित्र 2 में अभिलेखों के प्राप्ति स्थान): मानचित्र 2 में ये अलग चिह्नों से दिखाए गए हैं:
- महाशिलालेख (जैसे गिरनार, कलसी, शहबाज़गढ़ी)
- लघुशिलालेख (जैसे बैराट, मास्की, ब्रह्मगिरि)
- स्तंभ अभिलेख (जैसे सारनाथ, कौशाम्बी, साँची)
बच्चे देखें कि क्या वे राजधानी, प्रांतीय केंद्रों या व्यापार मार्गों के आसपास हैं, फिर तय करें कि कोई एक-सा प्रारूप दिखता है या नहीं।
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दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 90–101।
कालांश 10 — 8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा; काल रेखा 1-2
किताब — पृष्ठ 48–51 · स्लाइड — “8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा” वाला भाग · इंटरैक्टिव — 8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा, सार और काल-रेखा
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी किताब में दी गई अभिलेख साक्ष्य की सीमाएँ (तकनीकी सीमा, अधूरा भंडार और एक मौलिक समस्या) बता सकेगा, अध्याय से एक उदाहरण देकर बता सकेगा कि अभिलेख बनवाने वाले का दृष्टिकोण कैसे दिखाता है, और काल रेखा 1 पढ़ सकेगा।
साथ ले जाइए — पहले दिन की पर्चियों वाला लिफ़ाफ़ा, काल रेखा का चार्ट, पिछली पर्चियाँ।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ। स्रोत 10 वाला तर्क एक बच्चा तीन शब्दों में बोले: विषय, शैली, भाषा।
- 5–17 मिनट · अभिलेख साक्ष्य की सीमा (भाग 8)। चरण 2 का चित्र बनाइए। किताब तीन बातें कहती है: तकनीकी सीमा, अभिलेखों का अधूरा भंडार (यह नाम हमारी ओर से) और एक मौलिक समस्या। हर बात के साथ अध्याय का एक उदाहरण बच्चों से माँगिए: बनवाने वाले का दृष्टिकोण (रुद्रदमन का अभिलेख, प्रशस्ति), छूटे विषय (खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ), अधूरा भंडार (कई हज़ार अभिलेख, पर सबके अर्थ नहीं निकाले जा सके, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए)।
- 17–22 मिनट · अध्याय का सार। किताब का वाक्य बोर्ड पर: “राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है”। फिर इतिहासकारों की बदलती रुचि: उन्नीसवीं सदी के आखिरी दशकों और बीसवीं सदी के प्रारंभ में राजा; बीसवीं सदी के मध्य से आर्थिक परिवर्तन और सामाजिक समुदायों का उदय; हाल के दशकों में हाशिए पर रहे समुदाय।
- 22–32 मिनट · काल रेखा 1 और 2 (पृष्ठ 50–51)। दीवार के चार्ट की बची पंक्तियाँ भरवाइए (नीचे की तालिका)। लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति पर रुकिए और तालिका के नीचे वाली पंक्ति पढ़कर सुनाइए। कनिष्क के राज्यारोहण के आगे “तिथि निश्चित नहीं” ज़रूर लिखवाइए।
- 32–37 मिनट · पहले दिन की पर्चियाँ। लिफ़ाफ़ा खोलिए और पर्चियाँ लौटाइए। हर बच्चा अपनी पर्ची के नीचे एक पंक्ति जोड़े: “अब मैं जानता/जानती हूँ कि …”। दो-तीन बच्चे पढ़कर सुनाएँ।
- 37–40 मिनट · निकास-पर्ची। (1) अभिलेख साक्ष्य की कोई दो सीमाएँ लिखिए। (2) इस अध्याय का एक अभिलेख बताइए जिसमें बनवाने वाले का अपना दृष्टिकोण दिखता है।
अभिलेख कहाँ चुप रहते हैं (चरण 2)
अभिलेख कहाँ चुप रहते हैं
बोर्ड-कार्य
कालांश के अंत तक दीवार के चार्ट पर काल रेखा 1 पूरी हो, और बच्चे इसे कॉपी में उतारें।
| साल | क्या हुआ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 600–500 ई.पू. | धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के | 50 |
| लगभग 500–400 ई.पू. | मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़ | 50 |
| लगभग 327–325 ई.पू. | सिकंदर का आक्रमण | 50 |
| लगभग 321 ई.पू. | चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण | 50 |
| लगभग 272/268–231 ई.पू. | असोक का शासन | 50 |
| लगभग 185 ई.पू. | मौर्य साम्राज्य का अंत | 50 |
| लगभग 200–100 ई.पू. | पश्चिमोत्तर में हिंद-यूनानी शासन; दक्षिण भारत में चोल, चेर व पांड्य; दक्कन में सातवाहन | 50 |
| लगभग 100 ई.पू.–200 ई. तक | पश्चिमोत्तर के शक (मध्य एशिया के लोग) शासक; रोमन व्यापार; सोने के सिक्के | 50 |
| लगभग 78 ई. (तिथि निश्चित नहीं) | कनिष्क का राज्यारोहण | 50 |
| लगभग 100–200 ई. | सातवाहन और शक शासकों द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण | 50 |
| लगभग 320 ई. | गुप्त शासन का आरंभ | 50 |
| लगभग 335–375 ई. | समुद्रगुप्त | 50 |
| लगभग 375–415 ई. | चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक | 50 |
| लगभग 500–600 ई. | कर्नाटक में चालुक्यों और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय | 50 |
| लगभग 606–647 ई. | कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा | 50 |
| लगभग 712 | अरबों की सिंध पर विजय | 50 |
छपी किताब की काल रेखा 1 में लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति में ‘शक शासन’ छपा है; शक अगली पंक्ति के हैं, और किताब के पृष्ठ 44 के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर हिंद-यूनानी शासकों का नियंत्रण था।
काल रेखा 2 (पृष्ठ 51) बच्चे कॉपी में उतारें: 1784 में बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन; 1810 के दशक में कोलिन मैकेंज़ी ने संस्कृत और तमिल भाषा के 8,000 अभिलेख एकत्र किए; 1838 में प्रिंसेप ने असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ लगाया; 1877 में अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों का एक अंश प्रकाशित किया; 1886 में एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका और 1888 में एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक; 1965–66 में डी.सी. सरकार की इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी।
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- “अभिलेखों में जीवन की हर बात दर्ज है।” नहीं। खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़ के सुख-दुख प्राय: इनमें नहीं हैं।
- “सीमा है, तो अभिलेख बेकार हैं।” उलटा है। इस पूरे अध्याय की ज़्यादातर बातें अभिलेखों से ही आई हैं। सीमा जानकर उन्हें ग्रंथों, सिक्कों और पुरावशेषों के साथ पढ़ा जाता है।
- कनिष्क की तिथि रटना। लगभग 78 ई. के साथ “तिथि निश्चित नहीं” भी याद रहे।
- इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चला रहे हैं तो 8. अभिलेख साक्ष्य की सीमा खोलिए, और सार और काल-रेखा से पहले रुकिए।
- कमज़ोर विद्यार्थी के लिए किताब की तीन बातों में से दो, अपने शब्दों में, काफ़ी हैं।
- तेज़ विद्यार्थी से पूछिए: पहले दिन के सवाल का “क्या नहीं जान पाते” वाला हिस्सा अब तीन वाक्यों में लिखिए, अध्याय के उदाहरणों के साथ। यह सवाल हमारी ओर से है।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- निकास-पर्ची (चरण 6): (1) इनमें से कोई दो: अक्षर हलके खुदे होते हैं, या अभिलेख नष्ट होने से अक्षर लुप्त हो जाते हैं; कुछ शब्दों के अर्थ किसी खास स्थान या समय से जुड़े होते हैं; सबके अर्थ नहीं निकले, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए, और अनेक अभिलेख रहे होंगे जो सुरक्षित नहीं बचे; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़ के सुख-दुख नहीं मिलते; अभिलेख बनवाने वालों के ही विचार बताते हैं। (2) जैसे सुदर्शन झील वाला अभिलेख, जो रुद्रदमन की उपलब्धियाँ बताने के लिए बना था; या प्रयाग प्रशस्ति, जो समुद्रगुप्त की प्रशंसा में है।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के ङ8, च2 और च5; साथ में प्रश्नावली का प्रश्न 7 (डी.सी. सरकार का वक्तव्य) कॉपी में। प्रश्न 11 (अखबारों की परियोजना) चाहने वाले बच्चे प्रश्न 12 की जगह कर सकते हैं।
- दोहराने के लिए: फ़्लैशकार्ड 102–118, और क्विज़।
कालांश 11 — मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न
किताब — पृष्ठ 51–52 · स्लाइड — आख़िरी भाग, “मूल्यांकन” · इंटरैक्टिव — हर पड़ाव के अंत में उसी पड़ाव के प्रश्न हैं
लक्ष्य — कालांश के अंत तक हर विद्यार्थी 20 अंक की एक छोटी परख लिख चुका होगा, अपनी कॉपी के उत्तर प्रश्न बैंक से मिला चुका होगा, और जान चुका होगा कि उसे किन भागों को फिर से पढ़ना है।
साथ ले जाइए — प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1 (बोर्ड पर लिखने या पढ़कर बोलने के लिए), बच्चों की परियोजनाएँ (प्रश्न 11 या 12)।
40 मिनट
- 0–5 मिनट · पिछली पर्चियाँ और अध्याय का नक्शा। “एक नज़र में” वाला ग्यारह कालांशों का चित्र बोर्ड पर संक्षेप में बनाइए; बच्चे हर बॉक्स के आगे एक शब्द बोलें।
- 5–30 मिनट · लिखित परख। प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 1 (कुल 20 अंक) बच्चे अकेले लिखें। किताब बंद।
- 30–37 मिनट · उत्तर मिलाइए। कॉपियाँ पड़ोसी से बदलवाइए। वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के उत्तर आप पढ़िए; लंबे उत्तरों में बस यह देखा जाए कि मुख्य बातें और स्रोत का नाम आया या नहीं। “अंक कैसे कटेंगे” वाली तीन बातें फिर बोलिए।
- 37–40 मिनट · परियोजनाएँ और आख़िरी पर्ची। प्रश्न 11 या 12 की परियोजना जमा कीजिए। आख़िरी पर्ची: इस अध्याय का कौन-सा भाग मुझे फिर पढ़ना है, और क्यों?
बोर्ड-कार्य
बाक़ी प्रश्न गृहकार्य में बँटे हैं। कॉपियाँ जाँचते समय यह सूची काम आएगी; पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं।
| प्रश्न | कब दिया | उत्तर की मुख्य बात |
|---|---|---|
| 1. नगरों में शिल्प उत्पादन, हड़प्पा से भिन्नता | कालांश 7 | पुरावशेष और दानात्मक अभिलेख, श्रेणी; इन नगरों के अधिकांश स्थलों पर व्यापक खुदाई संभव नहीं, क्योंकि आज भी वहाँ लोग रहते हैं (हड़प्पा शहरों से भिन्न) (पृष्ठ 42–43); हड़प्पा में शिल्प उत्पादन की पहचान पुरावशेषों से होती है, और हड़प्पा लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है (अध्याय 1) |
| 2. महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण | कालांश 2 | राजा या गण; किलेबंद राजधानी; धर्मशास्त्र; कर और भेंट; सेना और नौकरशाही (पृष्ठ 29–30) |
| 3. सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण | कालांश 6 | कथाएँ, अभिलेख, ग्रंथ, खेती के प्रमाण; और सावधानी, क्योंकि कई लोग अपना विवरण नहीं रखते थे (पृष्ठ 38–42, 48–49) |
| 4. स्रोत 3 और स्रोत 8 की वस्तुओं की तुलना | कालांश 6 | दोनों में स्थानीय उपज; स्रोत 3 में सरदार को भेंट, स्रोत 8 में गाँव को अधिकारियों को चीज़ें देने से छूट (पृष्ठ 35–36, 41) |
| 5. अभिलेखशास्त्रियों की समस्याएँ | कालांश 9 | हलके खुदे अक्षर; नष्ट अभिलेखों में लुप्त अक्षर; ब्रैकेट में शब्द जोड़ते समय मूल अर्थ न बदले; स्थान या समय से जुड़े अर्थ और वैकल्पिक पाठ; सबके अर्थ नहीं निकले, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए; अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे, इसलिए उपलब्ध अभिलेख संभवत: कुल के अंश मात्र हैं; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ जैसे विषय दर्ज नहीं; बनवाने वालों का ही दृष्टिकोण; पहले ब्राह्मी और खरोष्ठी पढ़नी पड़ीं (पृष्ठ 46–49) |
| 6. मौर्य प्रशासन और असोक के अभिलेख | कालांश 3 | पाँच केंद्र, एकसमान नहीं, सेना की समितियाँ, अधिकारी, धम्म; अभिलेखों में केंद्र, फैलाव, धम्म, पतिवेदक (पृष्ठ 32–35, 47–48) |
| 7. डी.सी. सरकार का वक्तव्य | कालांश 10 | अभिलेख बहुत से पक्ष दिखाते हैं, पर किताब का निष्कर्ष है कि पूरा ज्ञान केवल अभिलेखों से नहीं मिलता (पृष्ठ 48–49) |
| 8. उत्तर-मौर्य काल के राजत्व के विचार | कालांश 4 | सरदार, व्यापार से राजस्व, ‘देवपुत्र’, सामंत, प्रशस्ति (पृष्ठ 35–37) |
| 9. कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन | कालांश 5 | हल, रोपाई, सिंचाई; परिवर्तन हर जगह नहीं; गाँव में बढ़ते भेद (पृष्ठ 38–41) |
| 10. मानचित्र 1 और 2 की तुलना | कालांश 9 | तरीका: मानचित्र 1 के महाजनपद (मोटे अक्षरों के 16 नाम, और अश्मक) मानचित्र 2 के अभिलेख-स्थलों और केंद्रों से मिलाइए; जो इस फैलाव के भीतर आते हैं, वे शामिल रहे होंगे। संकेत: मगध केंद्र था (राजधानी पाटलिपुत्र); तक्षशिला और उज्जयिनी प्रांतीय केंद्र थे, इसलिए जिन महाजनपदों में ये नगर हैं, उन्हें मानचित्र 1 पर देखकर सूची में रखें; साम्राज्य अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला था। दूसरा भाग: हाँ, जैसे कौशाम्बी (मानचित्र 1 पर नगर, मानचित्र 2 पर स्तंभ अभिलेख)। दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा मानचित्र से कारण दे। (पृष्ठ 30–33) |
| 11. अखबारों के वक्तव्यों की परियोजना | कालांश 10 | कतरनों की तालिका; सुदर्शन झील और असोक के अभिलेखों से तुलना (पृष्ठ 38, 47–49) |
| 12. आज के नोट और सिक्के | कालांश 8 | सामग्री, तकनीक, प्रतीक, लिपि और कार्य की तुलना (पृष्ठ 44–46) |
यहाँ बच्चे अटकेंगे
- लंबे उत्तर में स्रोत का नाम छोड़ देना। “स्रोत 5 के अनुसार” या “मेगस्थनीज़ के विवरण में” जैसे शब्द उत्तर को इतिहास का उत्तर बनाते हैं।
- किताब के “शायद” और “कुछ इतिहासकार” हटा देना। ये शब्द उत्तर में भी रहें।
- कमज़ोर विद्यार्थी को परख के बाद फ़्लैशकार्ड के “अंतिम पाँच मिनट” वाले हिस्से से दोहराने को कहिए।
- तेज़ विद्यार्थी को नमूना पत्र 2 और 3 घर के लिए दीजिए।
निकास-पर्ची और गृहकार्य
- आख़िरी पर्ची: हर बच्चे की पर्ची पढ़कर अगले अध्याय से पहले एक दोहराने का कालांश तय कीजिए।
- गृहकार्य: प्रश्न बैंक के नमूना पत्र 2 और 3, और क्विज़।
- दोहराने के लिए: पूरा फ़्लैशकार्ड सेट। अभिभावकों के लिए अभिभावकों का पन्ना भी है, और अपने को जाँचने के लिए परख।
पूरे अध्याय के लिए
अलग-अलग बच्चों के लिए
| किसके लिए | क्या कीजिए |
|---|---|
| जो बहुत पीछे हैं | हर कालांश का बोर्ड-कार्य ही उनकी पढ़ाई है। कॉपी के पहले पन्ने वाली “स्रोतों की सूची” (स्रोत 1 से 11) और दीवार की काल रेखा से रोज़ दो मिनट दोहराइए। |
| औसत बच्चे | हर कालांश के गृहकार्य वाले प्रश्न बैंक के कोड, और फ़्लैशकार्ड जोड़ियों में। |
| तेज़ बच्चे | हर कार्ड का “तेज़ विद्यार्थी” वाला सवाल, और प्रश्नावली के लघु निबंध (प्रश्न 6 से 9) पूरे 500 शब्दों में। |
| जो बोलने में झिझकते हैं | समूह में उन्हें “स्रोत पढ़ने वाले” की भूमिका दीजिए: स्रोत वाला बॉक्स वे ज़ोर से पढ़ें, बाकी उत्तर ढूँढें। |
सतत मूल्यांकन
| साधन | कब | क्या देखिए |
|---|---|---|
| निकास-पर्ची | हर कालांश के अंत में | लक्ष्य वाली बात आई या नहीं; अगले कालांश के पहले पाँच मिनट इसी पर |
| स्रोतों की सूची | कालांश 3, 6 और 9 के बाद कॉपी देखिए | हर स्रोत का नाम, विषय और पृष्ठ |
| काल रेखा का चार्ट | कालांश 10 | बच्चे साल से घटना और घटना से साल बता पाते हैं या नहीं |
| पहले दिन की पर्ची | कालांश 1 और 10 | “कैसे जानते हैं” और “क्या नहीं जान पाते” दोनों हिस्से कितने बदले |
| परियोजना | कालांश 11 | तालिका, तुलना और अपना निष्कर्ष |
लिखित मूल्यांकन
अपनी इकाई-परीक्षा के लिए एक सुझाया हुआ ढाँचा; अंक अपनी ज़रूरत के हिसाब से बदल लीजिए।
| प्रकार | अंक | क्या पूछें |
|---|---|---|
| वस्तुनिष्ठ | 1 × 5 | प्रश्न बैंक के खण्ड क से, अलग-अलग भागों के |
| अति लघूत्तरीय | 2 × 2 | जैसे घ1 (अभिलेख और पुरालिपि), घ8 (धान की रोपाई) |
| लघूत्तरीय | 3 × 2 | जैसे ङ3 (पाँच केंद्र), ङ6 (भूमिदान) |
| स्रोत पर आधारित | 4 × 1 | छ1 से छ4 में से एक |
| दीर्घ उत्तरीय | 5 × 1 | प्रश्नावली के प्रश्न 6 से 9 में से एक |
अंक कैसे कटेंगे, यह पहले ही बता दीजिए
- स्रोत का नाम न लिखना। “किताब कहती है” की जगह “स्रोत 2 के अनुसार” या “मेगस्थनीज़ के अनुसार” लिखिए।
- किताब के “शायद”, “लगभग” और “कुछ इतिहासकार” हटा देना। जैसे मौर्य सेना के आँकड़े यूनानी स्रोतों के हैं और कुछ इतिहासकार उन्हें अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं; यह बात उत्तर में छूटनी नहीं चाहिए।
- सदी या क्रम उलट देना। आहत सिक्के, फिर हिंद-यूनानी, फिर कुषाणों के सोने के सिक्के; राजगाह के बाद पाटलिपुत्र।
प्रोजेक्ट और गतिविधि
| # | प्रोजेक्ट | कैसे |
|---|---|---|
| 1 | प्रश्नावली का प्रश्न 12: आज के नोट और सिक्के | पाँच नोट या सिक्के; दोनों ओर का वर्णन; मूल्य, धातु या कागज़, प्रतीक, लिपियाँ और भाषाएँ की तालिका; अध्याय के सिक्कों से तुलना |
| 2 | प्रश्नावली का प्रश्न 11: अखबारों के वक्तव्य | एक महीने की कतरनें; हर कतरन के लिए कार्य, उद्देश्य, संसाधन, जारी करने वाला; सुदर्शन झील वाले अभिलेख से तुलना |
| 3 | कक्षा की “स्रोतों की दीवार” | हर समूह दो स्रोत ले: स्रोत का नाम, किसने लिखा या बनवाया, उससे क्या पता चलता है, उसकी एक सीमा। चार्ट पेपर पर, ताकि पूरे अध्याय में दीवार पर रहे |
शिक्षक के लिए पाँच सावधानियाँ
- कक्षा में किताब के आँकड़े ही बोलिए। मौर्य सेना के आँकड़े किताब के अनुसार यूनानी स्रोतों के हैं; हर बार यह भी कहिए कि कुछ इतिहासकार इन्हें अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
- किताब के चित्र और तस्वीरें किताब में ही दिखाइए। चित्र 2.4, 2.5, 2.6 और 2.11 बच्चे अपनी किताब में देखें। सिक्कों, अभिलेखों और स्तंभों की और तस्वीरें अतिरिक्त सामग्री में मिलेंगी।
- ऋग्वेद की “रचना” कहिए, और उसका समय ठीक बताइए। पृष्ठ 28 के अनुसार यह हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों की बात है, सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों की; इस अध्याय के 600 ई.पू. से 600 ई. वाले काल की नहीं।
- काल रेखा 1 की दो पंक्तियाँ ध्यान से। लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति हिंद-यूनानी शासन की है (बोर्ड-कार्य, कालांश 10), और कनिष्क के राज्यारोहण की तिथि निश्चित नहीं है।
- किताब के “शायद” और “कुछ इतिहासकारों के अनुसार” अपने बोलने में भी रखिए। श्रेणी “शायद” सामान बनाती थी, कुषाण “कुछ इतिहासकारों के अनुसार” स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे, और भूमिदान पर दो मत हैं। बच्चे यही सावधानी अपने उत्तरों में सीखते हैं।