कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 28 से 52
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
सामग्री के पन्ने
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
हमारी ओर से: यह अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ई. तक की कहानी है, पर किताब उसे एक स्रोत के सहारे खोलती और उसी स्रोत की सीमा पर बंद करती है।
- पहला भाग जेम्स प्रिंसेप का है, जिन्होंने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी का अर्थ निकाला (पृष्ठ 28)।
- आख़िरी भाग बताता है कि अभिलेख क्या नहीं बता सकते (पृष्ठ 48–49)।
- बीच के पाँच भाग शासकों से साधारण लोगों की ओर उतरते हैं: पहले महाजनपद और मगध, फिर मौर्य साम्राज्य, फिर राजत्व के नए विचार, फिर गाँव और किसान, और अंत में नगर, व्यापार और सिक्के।
भाग 7 फिर स्रोत पर लौटता है: लिपियाँ कैसे पढ़ी गईं और एक ही राजा के अभिलेख कैसे पहचाने गए।
दो धागे: क्या हुआ, और हमें कैसे पता चला
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है” (पृष्ठ 28)
- “राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है” (पृष्ठ 49)
हमारी ओर से — हर भाग में एक ही सवाल: यह बात हमें किस स्रोत से पता चली? मगध के उदय की दो व्याख्याएँ दो तरह के लेखकों से आती हैं (पृष्ठ 31), मौर्य प्रशासन मेगस्थनीज़, अर्थशास्त्र और असोक के अभिलेखों से (पृष्ठ 32–34), प्रजा की नज़र जातक से (पृष्ठ 38), भूमिदान ताम्र पत्रों से (पृष्ठ 40), और नगरों के शिल्पकार दानात्मक अभिलेखों से (पृष्ठ 42–43)। बच्चों से हर तथ्य के साथ उसका स्रोत बोलवाइए; प्रश्न 3, 5 और 7 में यही काम आता है।
हमारी ओर से — शासकों से साधारण लोगों तक: अध्याय का क्रम वही है जो पृष्ठ 49 पर इतिहास-लेखन के बदलाव का है: पहले इतिहासकारों की रुचि मुख्य रूप से राजाओं में थी, बीसवीं सदी के मध्य से आर्थिक परिवर्तन और सामाजिक समुदाय महत्वपूर्ण बने, और हाल के दशकों में हाशिए पर रहे समुदायों में रुचि बढ़ी। आख़िरी कालांश में यह जोड़ बच्चों को दिखाइए।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
काल रेखा 1: प्रमुख राजनीतिक और आर्थिक विकास (पृष्ठ 50)
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 600–500 ई.पू. | धान की रोपाई; गंगा घाटी में नगरीकरण; महाजनपद; आहत सिक्के | 50 |
| लगभग 500–400 ई.पू. | मगध के शासकों की सत्ता पर पकड़ | 50 |
| लगभग 327–325 ई.पू. | सिकंदर का आक्रमण | 50 |
| लगभग 321 ई.पू. | चंद्रगुप्त मौर्य का राज्यारोहण | 32, 50 |
| लगभग 272/268–231 ई.पू. | असोक का शासन | 50 |
| लगभग 185 ई.पू. | मौर्य साम्राज्य का अंत | 50 |
| लगभग 200–100 ई.पू. | पश्चिमोत्तर में शक शासन; दक्षिण भारत में चोल, चेर व पांड्य; दक्कन में सातवाहन | 50 |
| लगभग 100 ई.पू.–200 ई. तक | पश्चिमोत्तर के शक (मध्य एशिया के लोग) शासक; रोमन व्यापार; सोने के सिक्के | 50 |
| लगभग 78 ई. (तिथि निश्चित नहीं) | कनिष्क का राज्यारोहण | 50 |
| लगभग 100–200 ई. | सातवाहन और शक शासकों द्वारा भूमिदान के अभिलेखीय प्रमाण | 50 |
| लगभग 320 ई. | गुप्त शासन का आरंभ | 50 |
| लगभग 335–375 ई. | समुद्रगुप्त | 50 |
| लगभग 375–415 ई. | चंद्रगुप्त द्वितीय; दक्कन में वाकाटक | 40, 50 |
| लगभग 500–600 ई. | कर्नाटक में चालुक्यों का उदय और तमिलनाडु में पल्लवों का उदय | 50 |
| लगभग 606–647 ई. | कन्नौज के राजा हर्षवर्धन; चीनी यात्री श्वैन त्सांग की यात्रा | 50 |
| लगभग 712 | अरबों की सिंध पर विजय | 50 |
लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति के बारे में: पृष्ठ 44 के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर हिंद-यूनानी शासकों का नियंत्रण था, और शक अगली पंक्ति (लगभग 100 ई.पू.–200 ई.) में आते हैं।
काल रेखा 2: अभिलेखशास्त्र के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति (पृष्ठ 51)
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1784 | बंगाल एशियाटिक सोसाइटी का गठन | 51 |
| 1810 का दशक | कोलिन मैकेंज़ी ने संस्कृत और तमिल भाषा के 8,000 अभिलेख एकत्र किए | 51 |
| 1838 | जेम्स प्रिंसेप ने असोक के ब्राह्मी अभिलेखों का अर्थ लगाया | 46, 51 |
| 1877 | अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने असोक के अभिलेखों के एक अंश को प्रकाशित किया | 51 |
| 1886 | दक्षिण भारत के अभिलेखों के शोधपत्र एपिग्राफ़िआ कर्नाटिका का प्रथम अंक | 51 |
| 1888 | एपिग्राफ़िआ इंडिका का प्रथम अंक | 51 |
| 1965–66 | डी.सी. सरकार की इंडियन एपिग्राफ़ी एंड इंडियन एपिग्राफ़िकल ग्लोसरी | 51 |
अध्याय के बीच के आँकड़े
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| डेढ़ हज़ार वर्ष | हड़प्पा सभ्यता के बाद का लंबा अंतराल, जिसमें ऋग्वेद की रचना हुई | 28 |
| 1830 का दशक | जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों का अर्थ निकाला | 28 |
| सोलह | आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथों में गिनाए गए महाजनपद | 29 |
| लगभग 250 ई.पू. और 500 ई. | इन दो समयों में ‘अ’ अलग ढंग से लिखा जाता था | 29 |
| छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. | मगध सबसे शक्तिशाली महाजनपद बना | 31 |
| पाँचवीं सदी ई.पू. | मगध के शासकों ने राजधानी राजगाह से पाटलिपुत्र लाने का निर्णय किया | 42 |
| चौथी शताब्दी ई.पू. तक | पाटलिपुत्र मौर्य साम्राज्य की राजधानी | 31, 42 |
| पाँच | मौर्य साम्राज्य के प्रमुख राजनीतिक केंद्र | 32 |
| एक समिति और छ: उपसमितियाँ | सैनिक गतिविधियों के संचालन के लिए (मेगस्थनीज़) | 34 |
| छ: लाख, तीस हज़ार, नौ हज़ार | मौर्य सम्राट के पैदल सैनिक, घुड़सवार और हाथी (यूनानी स्रोत) | 35 |
| डेढ़ सौ साल | मौर्य साम्राज्य की अवधि | 35 |
| लगभग द्वितीय शताब्दी ई.पू. से द्वितीय शताब्दी ई. | सातवाहन | 35 |
| लगभग प्रथम शताब्दी ई.पू. से प्रथम शताब्दी ई. | कुषाण | 36 |
| लगभग दूसरी शताब्दी ई. | रुद्रदमन का सुदर्शन झील वाला अभिलेख | 38 |
| बीसवीं सदी | पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग शुरू हुआ | 39 |
| दूसरी शताब्दी ई.पू. और दूसरी शताब्दी ई. के बीच | मनुस्मृति लिखी गई | 39 |
| 13वाँ राज्य वर्ष | प्रभावती गुप्त का दंगुन गाँव वाला राज्यादेश | 41 |
| द्वितीय शताब्दी ई.पू. | हिंद-यूनानी शासकों के, शासक के नाम और चित्र वाले सिक्के | 44 |
| प्रथम शताब्दी ई. | कुषाणों के सोने के सिक्के; यौधेय के ताँबे के सिक्के | 44, 45 |
| छठी शताब्दी ई. से | सोने के सिक्के कम मिलने लगे | 45 |
| आठ वर्ष | असोक के शासन के, जब कलिंग जीता गया | 48 |
| डेढ़ लाख और एक लाख | कलिंग युद्ध में निष्कासित और मारे गए लोग; “और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई” (स्रोत 11) | 48 |
ध्यान दीजिए:
- प्रिंसेप की दो तारीखें हैं, और दोनों सही हैं: 1830 का दशक, जब दोनों लिपियों का अर्थ निकला (पृष्ठ 28), और 1838, जब असोककालीन ब्राह्मी पढ़ी गई (पृष्ठ 46, 51)।
- पाटलिपुत्र की भी दो तारीखें हैं: राजधानी वहाँ लाने का निर्णय पाँचवीं सदी ई.पू. में हुआ (पृष्ठ 42), और चौथी शताब्दी ई.पू. तक वह मौर्य साम्राज्य की राजधानी बन चुका था (पृष्ठ 31)।
- काल रेखा 1 की हर तिथि के आगे “लगभग” है। उत्तर में भी “लगभग” लिखवाइए; कनिष्क के आगे “तिथि निश्चित नहीं” भी।
- सेना का आँकड़ा यूनानी स्रोतों का है, और “कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।” (पृष्ठ 35)
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| अभिलेख | पत्थर, धातु या मिट्टी के बर्तन जैसी कठोर सतह पर खुदा लेख, जिसमें बनवाने वालों की उपलब्धियाँ, क्रियाकलाप या विचार लिखे होते हैं | 29 |
| अभिलेखशास्त्र | अभिलेखों का अध्ययन | 28 |
| पुरालिपि | लेखन शैली; जिस अभिलेख पर तिथि नहीं, उसका काल इसी से आँका जाता है | 29 |
| प्राकृत | जनसामान्य की भाषाएँ; प्राचीनतम अभिलेख इन्हीं में हैं | 29 |
| जनपद | ऐसा भूखंड जहाँ कोई जन (लोग, कुल या जनजाति) पाँव रखता है या बस जाता है | 29 |
| गण और संघ | ऐसे राज्य जहाँ लोगों का समूह शासन करता था; समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था | 29 |
| ओलीगार्की (समूहशासन) | जहाँ सत्ता पुरुषों के एक समूह के हाथ में होती है | 30 |
| धर्मशास्त्र | ब्राह्मणों के संस्कृत ग्रंथ (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से), जिनमें शासकों सहित सबके लिए नियम तय किए गए | 30 |
| धम्म | असोक के सिद्धांत: बड़ों का आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता, सेवकों और दासों से उदार व्यवहार, दूसरों के धर्मों और परंपराओं का आदर | 32, 34 |
| धम्म महामात्त | धम्म के प्रचार के लिए नियुक्त विशेष अधिकारी | 34 |
| सरदार | शक्तिशाली व्यक्ति, जिसका पद वंशानुगत हो भी सकता है और नहीं भी; भेंट लेकर समर्थकों में बाँटता है; सरदारी में आम तौर पर स्थायी सेना या अधिकारी नहीं होते | 35 |
| सामंत | चौथी शताब्दी ई. के बड़े साम्राज्यों में से कई इन पर निर्भर थे; ये भूमि पर नियंत्रण सहित स्थानीय संसाधनों से अपना निर्वाह करते थे, शासकों का आदर करते थे और उनकी सैनिक सहायता भी करते थे; जो सामंत शक्तिशाली होते थे वे राजा भी बन जाते थे | 36 |
| प्रशस्ति | कवियों द्वारा अपने राजा या स्वामी की प्रशंसा में लिखी रचना | 36–37 |
| गहपति | घर का मुखिया, जो घर में रहने वाली महिलाओं, बच्चों, नौकरों और दासों पर नियंत्रण करता था और घर से जुड़े भूमि, जानवर या अन्य सभी वस्तुओं का मालिक होता था; कभी-कभी इस शब्द का प्रयोग नगरों में रहने वाले संभ्रांत व्यक्तियों और व्यापारियों के लिए भी होता था; पालि भाषा में छोटे किसानों और ज़मींदारों के लिए भी | 39 |
| ताम्र पत्र | ताँबे की प्लेटें; ज़्यादातर भूमिदान इन्हीं पर लिखे गए | 40 |
| अग्रहार | ब्राह्मणों को दान में दी गई भूमि, जिस पर भूमिकर नहीं लगता था | 41 |
| श्रेणी | उत्पादकों और व्यापारियों का संघ | 43 |
| आहत सिक्के | चाँदी और ताँबे के सबसे पहले सिक्के, जिन पर प्रतीकों को आहत करके (ठोककर) बनाया जाता था | 44–45 |
| मुद्राशास्त्र | सिक्कों का अध्ययन: उन पर बने चित्र, लिपि, उनकी धातु और वे जिन संदर्भों में मिले | 45 |
| देवानांपिय | असोक की उपाधि: देवताओं का प्रिय | 47 |
| पियदस्सी | असोक की उपाधि: मनोहर मुखाकृति वाले राजा (पृष्ठ 28); देखने में सुन्दर (पृष्ठ 47) | 28, 47 |
| पतिवेदक | अभिलेखशास्त्रियों के अनुसार इसका अर्थ है संवाददाता | 47 |
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- पिछला अध्याय: प्रश्न 1 और पृष्ठ 43 का किनारे का प्रश्न हड़प्पा के नगरों से तुलना माँगते हैं। हड़प्पा वाले अध्याय के रिवीजन नोट्स साथ रखिए।
- कक्षा 6: पृष्ठ 28 पर ऋग्वेद की रचना की बात है। वेद लंबे समय तक बोलकर याद रखे गए, यह कक्षा 6 के भारत की सांस्कृतिक जड़ें वाले पाठ में है (हमारी ओर से)।
- राजनीति विज्ञान और नागरिक शास्त्र: भारत का राजकीय प्रतीक सारनाथ के सिंह शीर्ष से लिया गया है (भारत सरकार: राजकीय प्रतीक); पृष्ठ 32 के किनारे का प्रश्न यही पूछता है।
- अर्थशास्त्र: प्रश्न 12 आज के नोटों और सिक्कों की तुलना माँगता है। कक्षा 10 अर्थशास्त्र का मुद्रा और साख वाला पाठ साथ रखिए (हमारी ओर से)।
- अखबार और सार्वजनिक काम: प्रश्न 11 सरकारी वक्तव्यों की तुलना सुदर्शन झील जैसे अभिलेखों से करवाता है; यह आज के अखबार पढ़ने की आदत से जुड़ता है।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
चर्चा कीजिए — पृष्ठ 31, 34, 37, 41, 45 और 48
किताब हर कुछ पन्नों के बाद एक “चर्चा कीजिए” रखती है। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर प्रश्न 2, 6, 8, 9 और 12 की तैयारी इन्हीं से होती है।
पृष्ठ 31 — मगध की सत्ता के विकास के लिए आरंभिक और आधुनिक लेखकों ने क्या-क्या व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं? ये एक-दूसरे से कैसे भिन्न हैं।
नमूना उत्तर — दोनों व्याख्याएँ अलग चीज़ों पर ज़ोर देती हैं।
- आरंभिक जैन और बौद्ध लेखक: श्रेय बिंबिसार, अजातसत्तु और महापद्मनंद जैसे महत्वाकांक्षी शासकों और उनके मंत्रियों की नीतियों को देते हैं।
- आधुनिक इतिहासकार: उपजाऊ खेती, आधुनिक झारखंड की लोहे की खदानें (उपकरण और हथियार), जंगलों के हाथी (सेना का अंग), और गंगा व उपनदियों से सस्ता और सुलभ आवागमन।
भेद: आरंभिक व्याख्या व्यक्तियों पर टिकी है, आधुनिक व्याख्या भूगोल और संसाधनों पर (पृष्ठ 31)।
पृष्ठ 34 — मेगस्थनीज़ और अर्थशास्त्र से उद्धृत अंशों को पुन: पढ़िए। मौर्य शासन के इतिहास लेखन में ये ग्रंथ कितने उपयोगी हैं?
नमूना उत्तर — उपयोगी हैं, पर सावधानी के साथ।
- उपयोगी: मेगस्थनीज़ चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में आए यूनानी राजदूत थे, इसलिए उनका विवरण समकालीन है; उससे अधिकारियों के काम (स्रोत 1) और सेना की समिति-उपसमितियों का पता चलता है। अर्थशास्त्र से सेना के लिए हाथी पकड़ने की व्यवस्था (स्रोत 2) पता चलती है।
- सावधानी: मेगस्थनीज़ के विवरण के आज कुछ अंश ही उपलब्ध हैं; अर्थशास्त्र के संभवत: कुछ भाग ही कौटिल्य या चाणक्य ने रचे; और सेना के आकार के यूनानी आँकड़े को कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
इसलिए इन्हें असोक के अभिलेखों और पुरातात्विक प्रमाणों के साथ मिलाकर पढ़ना चाहिए (पृष्ठ 32, 34–35)।
पृष्ठ 37 — राजाओं ने दिव्य स्थिति का दावा क्यों किया?
नमूना उत्तर — किताब के अनुसार ऊँची स्थिति पाने का एक साधन देवी-देवताओं से जुड़ना था।
- मथुरा के पास माट के एक देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं, और कई कुषाण शासकों ने ‘देवपुत्र’ उपाधि ली (पृष्ठ 36)।
- प्रशस्ति में समुद्रगुप्त को कुबेर, वरुण, इंद्र और यम के तुल्य बताया गया (पृष्ठ 37)।
किताब यह भी बताती है कि चौथी शताब्दी ई. के कई बड़े साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे, और “जो सामंत शक्तिशाली होते थे वे राजा भी बन जाते थे” (पृष्ठ 36)।
पृष्ठ 41 — यह पता कीजिए कि क्या आपके राज्य में हल से खेती, सिंचाई, तथा धान की रोपाई की जाती है? और अगर नहीं तो क्या कोई वैकल्पिक व्यवस्थाएँ हैं।
नमूना उत्तर — यह बच्चों की अपनी खोज है; पूरा तरीका शिक्षण नोट्स की गतिविधि में है।
अच्छे उत्तर में:
- तीनों बातें हों: जुताई, सिंचाई और रोपाई।
- साथ में किताब की एक बात हो: किताब (पृष्ठ 39) बताती है कि पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ।
पृष्ठ 45 — व्यापार में विनिमय के लिए क्या-क्या प्रयोग होता था? उल्लिखित स्रोतों से किस प्रकार के विनिमय का पता चलता है। क्या कुछ विनिमय ऐसे भी हैं जिनका ज्ञान स्रोतों से नहीं हो पाता है?
नमूना उत्तर — सिक्के भी, और वस्तुएँ भी।
- विनिमय के साधन: चाँदी और ताँबे के आहत सिक्के; कुषाणों और गुप्तों के सोने के सिक्के; यौधेय के ताँबे के सिक्के; दक्षिण भारत में मिले रोमन सिक्के।
- स्रोतों में दिखते विनिमय: मालाबार में सिक्कों और कई वस्तुओं के बदले काली मिर्च जैसी उपज (स्रोत 9); सरदार को दी जाने वाली भेंट (स्रोत 3); जंगल की उपज का गाँवों में बिकना (स्रोत 7)।
- जो पता नहीं चलता: पशुपालक, संग्राहक, शिकारी, मछुआरे और शिल्पकार अपने जीवन और लेन-देन का विवरण प्राय: नहीं रखते थे।
इसलिए साधारण लोगों के आपसी विनिमय की जानकारी स्रोतों में कम है (पृष्ठ 36, 40–41, 44–45)।
पृष्ठ 48 — मानचित्र 2 देखिए और असोक के अभिलेख के प्राप्ति स्थान की चर्चा कीजिए। क्या उनमें कोई एक-सा प्रारूप दिखता है?
नमूना उत्तर — मानचित्र 2 में तीन तरह के प्राप्ति स्थान हैं:
- महाशिलालेख, जैसे गिरनार, कलसी, शहबाज़गढ़ी, मानसेहरा, जौगड़;
- लघुशिलालेख, जैसे बैराट, भाब्रू, मास्की, ब्रह्मगिरि;
- स्तंभ अभिलेख, जैसे सारनाथ, कौशाम्बी, टोपरा, मेरठ, रामपुरवा, साँची।
अच्छा उत्तर देखता है कि हर प्रकार के अभिलेख कहाँ हैं, क्या वे पाटलिपुत्र, तक्षशिला और उज्जयिनी जैसे केंद्रों के आसपास हैं, और क्या वे व्यापार मार्गों के पास हैं।
एक संकेत किताब देती है: कलिंग विजय की वेदना वाला अभिलेख उस जीते गए क्षेत्र में नहीं मिला (पृष्ठ 32–33, 48)।
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न “लगभग 100 से 150 शब्दों में” उत्तर माँगते हैं (पृष्ठ 51)।
प्रश्न 1 — आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में शिल्प के प्रमाण, और हड़प्पा से भिन्नता (पृष्ठ 42–43)
- पुरावशेष: उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र (चमकदार कलई वाले उत्कृष्ट कटोरे और थालियाँ, संभवत: अमीरों के लिए), और सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन, साथ में सीप और पक्की मिट्टी की वस्तुएँ।
- लिखे हुए प्रमाण: द्वितीय शताब्दी ई.पू. से दानात्मक अभिलेख, जिनमें दाता का व्यवसाय भी लिखा है (धोबी, बुनकर, लिपिक, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार, लौहकार); श्रेणी का उल्लेख; चित्र 2.6 में स्वर्णकार धर्मक की पत्नी नागपिया की भेंट।
- भिन्नता: हड़प्पा शहरों से भिन्न, इनमें से अधिकांश स्थलों पर व्यापक खुदाई संभव नहीं, क्योंकि आज भी इन क्षेत्रों में लोग रहते हैं। हड़प्पा के शहरों में शिल्प का पता पुरावशेषों से चलता है, और हड़प्पा लिपि अब तक पढ़ी नहीं जा सकी है (अध्याय 1); यहाँ शिल्पकारों के नाम और काम अभिलेखों में भी मिलते हैं।
जाँचते समय: दोनों तरह के प्रमाण हों, और भिन्नता में दोनों बातें आएँ: अभिलेखों से मिली जानकारी, और आज भी बसे शहरों में खुदाई की कठिनाई।
नमूना उत्तर — आरंभिक ऐतिहासिक नगरों से शिल्प के दो तरह के प्रमाण मिलते हैं।
- पहला, पुरावशेष: उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र जैसे चमकदार कलई वाले उत्कृष्ट बर्तन, जिनका उपयोग संभवत: अमीर लोग करते थे, और सोने, चाँदी, कांस्य, ताँबे, हाथी दाँत और शीशे के गहने, उपकरण, हथियार और बर्तन।
- दूसरा, दानात्मक अभिलेख, जिनमें दाता के नाम के साथ उसका व्यवसाय भी लिखा होता है, जैसे बुनकर, बढ़ई, कुम्हार, स्वर्णकार और लौहकार; इनसे उत्पादकों और व्यापारियों के संघ श्रेणी का भी पता चलता है।
हड़प्पा के शहरों में शिल्प का पता केवल पुरावशेषों से चलता है, क्योंकि उनकी लिपि पढ़ी नहीं जा सकी (अध्याय 1)। पर आरंभिक ऐतिहासिक नगरों में आज भी लोग रहते हैं, इसलिए उनकी बड़ी खुदाई संभव नहीं; यहाँ अभिलेख इस कमी को कुछ हद तक पूरा करते हैं।
प्रश्न 2 — महाजनपदों के विशिष्ट अभिलक्षण (पृष्ठ 29–30)
- आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथों में सोलह महाजनपदों का उल्लेख, जैसे वज्जि, मगध, कोशल, कुरु, पांचाल, गांधार, अवन्ति।
- ज़्यादातर पर राजा का शासन; गण और संघ में लोगों का समूह शासन करता था और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।
- हर महाजनपद की राजधानी, प्राय: किलेबंद।
- धर्मशास्त्र में अपेक्षा कि शासक क्षत्रिय हों।
- आय: किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट; पड़ोसी राज्यों पर धावा बोलकर धन जुटाना भी वैध।
- कुछ राज्यों में स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही; बाकी में सहायक-सेना, जिसके सैनिक प्राय: कृषक वर्ग से।
जाँचते समय: गण वाला बिंदु और आय वाला बिंदु ज़रूर हो; केवल सोलह नामों की सूची पूरा उत्तर नहीं है।
नमूना उत्तर — छठी शताब्दी ई.पू. को परिवर्तनकारी काल माना जाता है, और आरंभिक बौद्ध और जैन ग्रंथों में इसी समय के सोलह महाजनपदों का उल्लेख है।
- ज़्यादातर महाजनपदों पर राजा का शासन था, पर गण और संघ कहलाने वाले राज्यों में लोगों का समूह शासन करता था और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था।
- हर महाजनपद की एक राजधानी थी, जो प्राय: किलेबंद होती थी।
- ब्राह्मणों के धर्मशास्त्र अपेक्षा करते थे कि शासक क्षत्रिय हों।
- शासक किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से कर और भेंट लेते थे, और पड़ोसी राज्यों पर धावा बोलकर धन जुटाना भी वैध माना जाता था।
धीरे-धीरे कुछ राज्यों ने स्थायी सेनाएँ और नौकरशाही बना लीं, जबकि बाकी सहायक-सेना पर निर्भर रहे।
प्रश्न 3 — सामान्य लोगों के जीवन का पुनर्निर्माण (पृष्ठ 38–42, 48–49)
- कहानियाँ: जातक और पंचतंत्र; गंदतिन्दु जातक में प्रजा रात के डकैतों और दिन के कर इकट्ठा करने वाले अधिकारियों से बचने के लिए जंगल में बस जाती है।
- अभिलेख: सुदर्शन झील (स्रोत 5), भूमिदान (स्रोत 8), नगरों के दानात्मक अभिलेख।
- ग्रंथ: मनुस्मृति (स्रोत 6), हर्षचरित (स्रोत 7), संगम साहित्य के वेल्लालर, उल्वर और अणिमई।
- खेती और पुरावशेष: हल, लोहे का फाल, धान की रोपाई, सिंचाई; नगरों के बर्तन, गहने, उपकरण।
- सावधानी: अभिलेख प्राय: बड़े अवसर दर्ज करते हैं और बनवाने वालों का दृष्टिकोण बताते हैं; पशुपालक, शिकारी, मछुआरे जैसे लोग अपने विवरण नहीं रखते थे।
जाँचते समय: कम से कम तीन तरह के स्रोत, हर एक के साथ अध्याय का एक उदाहरण, और अंत में एक सीमा।
नमूना उत्तर — साधारण लोगों ने अपने बारे में कम लिखा, इसलिए इतिहासकार कई तरह के स्रोत जोड़ते हैं।
- जातक जैसी कथाएँ प्रजा की नज़र दिखाती हैं: गंदतिन्दु जातक में लोगों की शिकायत है कि “रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी”, और वे गाँव छोड़कर जंगल में बस जाते हैं (पृष्ठ 38)।
- सुदर्शन झील और प्रभावती गुप्त के भूमिदान जैसे अभिलेख सिंचाई और गाँव के दायित्वों के बारे में बताते हैं, और नगरों के दानात्मक अभिलेख शिल्पकारों के व्यवसाय।
- मनुस्मृति, हर्षचरित और संगम साहित्य ज़मीन, जंगल के किनारे की बस्तियों और गाँव के वर्गों (वेल्लालर, उल्वर, अणिमई) का चित्र देते हैं।
फिर भी इतिहासकार सावधान रहते हैं, क्योंकि अभिलेख बनवाने वालों का दृष्टिकोण बताते हैं और कई समुदाय अपने विवरण रखते ही नहीं थे।
प्रश्न 4 — स्रोत 3 और स्रोत 8 की वस्तुओं की तुलना (पृष्ठ 35–36, 41)
स्रोत 3 के शीर्षक में “पाण्ड्य सरदार” और इस प्रश्न में “पांड्य सरदार” छपा है, पर सिलप्पादिकारम् और दूसरे तमिल स्रोतों में सेनगुत्तुवन चेर राजा हैं।
- स्रोत 3 की वस्तुएँ: हाथी दाँत, सुगंधित लकड़ी, हिरणों के बाल से बने चँवर, मधु, चंदन, गेरू, सुरमा, हल्दी, इलायची, मिर्च, फल, और बाघों के बच्चे, हाथी, बंदर, बोलने वाले तोते जैसे जानवर।
- स्रोत 8 की वस्तुएँ: घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध, जिन्हें दौरे पर आए अधिकारियों को देने से गाँव को छूट मिली।
- समानता: दोनों सूचियाँ जंगल और गाँव की स्थानीय चीज़ों की हैं, पर स्रोत 3 में लोग ये चीज़ें शासक के पास लाते हैं, जबकि स्रोत 8 में गाँव को ऐसी चीज़ें देने से छूट मिलती है।
- असमानता: स्रोत 3 में लोग नाचते-गाते भेंट लाते हैं, “ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं”, और सरदार भेंट लेता है, कर नहीं; स्रोत 8 एक राजाज्ञा है, जो बताती है कि अब गाँव को ये चीज़ें अधिकारियों को नहीं देनी होंगी, और गाँव सभी करों सहित आचार्य चनालस्वामी को दान हो गया। स्रोत 3 की सूची में जीवित जानवर भी हैं; स्रोत 8 में नहीं।
जाँचते समय: बच्चा यह पहचाने कि स्रोत 3 भेंट की सूची है और स्रोत 8 छूट की।
नमूना उत्तर — दोनों स्रोतों में चीज़ों की लंबी सूचियाँ हैं।
- स्रोत 3 में पहाड़ों के लोग सेनगुत्तुवन के लिए हाथी दाँत, चंदन, मधु, हल्दी, इलायची, मिर्च जैसी चीज़ें और बाघों के बच्चे, हाथी और तोते जैसे जानवर लाते हैं।
- स्रोत 8 में दंगुन गाँव को घास, जानवरों की खाल, कोयला, खनिज-पदार्थ, खदिर वृक्ष के उत्पाद, फूल और दूध अधिकारियों को देने से छूट मिलती है।
समानता यह है कि दोनों सूचियाँ जंगल और गाँव की स्थानीय चीज़ों की हैं। अंतर यह है कि स्रोत 3 में लोग नाचते-गाते भेंट लाते हैं, जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं, जबकि स्रोत 8 एक राजाज्ञा है, जिसमें गाँव इन वस्तुओं को देने से मुक्त होकर एक नए स्वामी को सौंप दिया जाता है।
प्रश्न 5 — अभिलेखशास्त्रियों की समस्याएँ (पृष्ठ 46–49)
किताब (पृष्ठ 48–49) अभिलेखों की सीमा इन बातों में रखती है:
- तकनीकी सीमा: कुछ अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण होते हैं और पढ़ने में मुश्किल होते हैं; अभिलेख नष्ट भी हो सकते हैं, जिससे अक्षर लुप्त हो जाते हैं; और शब्दों का वास्तविक अर्थ जानना सदैव सरल नहीं होता, क्योंकि कुछ अर्थ किसी विशेष स्थान या समय से जुड़े होते हैं।
- कई हज़ार अभिलेख मिले हैं, पर सबके अर्थ नहीं निकाले जा सके हैं, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए हैं; और “अनेक अभिलेख रहे होंगे जो कालांतर में सुरक्षित नहीं बचे हैं”।
- एक और मौलिक समस्या: जिसे हम आज राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह अभिलेखों में अंकित हो। खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के सुख-दुख इनमें नहीं मिलते, क्योंकि प्राय: अभिलेख बड़े और विशेष अवसरों का वर्णन करते हैं; और अभिलेख हमेशा उन्हीं व्यक्तियों के विचार व्यक्त करते हैं जो उन्हें बनवाते थे।
जाँचते समय: सूची में पढ़ने की समस्या और दृष्टिकोण की समस्या, दोनों तरह की बातें हों।
नमूना उत्तर — अभिलेखशास्त्रियों की समस्याएँ तीन तरह की हैं।
- पहली, तकनीकी: कुछ अक्षर हलके ढंग से उत्कीर्ण होते हैं, और नष्ट अभिलेखों में अक्षर लुप्त हो जाते हैं; कुछ शब्दों के अर्थ किसी खास स्थान या समय से जुड़े होते हैं, और विद्वान पढ़ने के वैकल्पिक तरीकों पर चर्चा करते रहते हैं।
- दूसरी, कई हज़ार अभिलेख मिलने पर भी सबके अर्थ नहीं निकले, न सब प्रकाशित या अनूदित हुए, और अनेक अभिलेख रहे होंगे जो सुरक्षित नहीं बचे।
- तीसरी, एक मौलिक समस्या: जिसे हम आज राजनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण मानते हैं, ज़रूरी नहीं कि वह अभिलेखों में अंकित हो; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़ के सुख-दुख अभिलेखों में प्राय: नहीं मिलते, और अभिलेख बनवाने वालों का ही दृष्टिकोण बताते हैं, जैसे असोक का यह दावा कि पहले के शासकों ने रिपोर्ट एकत्र करने की व्यवस्था नहीं की थी।
इसलिए हर दावे को परखना पड़ता है।
6 से 9 तक के प्रश्न — लघु निबंध के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न “लगभग 500 शब्दों में” लघु निबंध माँगते हैं। नीचे हर निबंध का ढाँचा है: भूमिका, मुख्य बिंदु, और निष्कर्ष।
प्रश्न 6 — मौर्य प्रशासन, और असोक के अभिलेखों में उसके प्रमाण (पृष्ठ 32–35, 47–48)
- भूमिका: चंद्रगुप्त मौर्य (लगभग 321 ई.पू.), साम्राज्य अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक; स्रोत: पुरातात्विक प्रमाण, मेगस्थनीज़, अर्थशास्त्र, जैन, बौद्ध और पौराणिक ग्रंथ, और असोक के अभिलेख।
- पाँच राजनीतिक केंद्र: पाटलिपुत्र, तक्षशिला, उज्जयिनी, तोसलि, सुवर्णगिरि; तक्षशिला और उज्जयिनी लंबी दूरी के व्यापार मार्ग पर, सुवर्णगिरि कर्नाटक की सोने की खदानों के लिए उपयोगी।
- नियंत्रण एकसमान नहीं: साम्राज्य के इलाके बड़े विविध थे; किताब के अनुसार “यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो” (पृष्ठ 33), और “साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था” (पृष्ठ 35)।
- आवागमन: भूमि और नदी मार्ग ज़रूरी; राजधानी से प्रांतों तक कई सप्ताह या महीने, इसलिए खान-पान और सुरक्षा की व्यवस्था; सेना सुरक्षा का प्रमुख माध्यम।
- सेना: मेगस्थनीज़ के अनुसार एक समिति और छ: उपसमितियाँ (नौसेना, यातायात और खान-पान, पैदल सैनिक, अश्वारोही, रथारोही, हाथी)।
- अधिकारी (स्रोत 1): नदियों की देख-रेख, भूमि मापन, नहरों के मुखद्वारों का निरीक्षण, शिकारियों का संचालन, कर वसूली, और लकड़हारों, बढ़ई, लोहारों और खननकर्ताओं का निरीक्षण।
- धम्म और धम्म महामात्त।
- अभिलेखों में प्रमाण: पाँचों केंद्रों का उल्लेख; एक जैसे संदेश पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत से आंध्र प्रदेश, उड़ीसा और उत्तराखंड तक; धम्म के सिद्धांत; पतिवेदक से समाचार की व्यवस्था (स्रोत 10); कलिंग विजय (स्रोत 11)।
- जो दूसरे स्रोतों से आता है: सेना की उपसमितियाँ और अधिकारियों के काम मेगस्थनीज़ से; सेना का आकार यूनानी स्रोतों से, जिसे कुछ इतिहासकार अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।
जाँचते समय: निबंध के दो हिस्से अलग दिखें, प्रशासन की बातें और अभिलेखों के प्रमाण; जो बात मेगस्थनीज़ से आती है, उसे बच्चा अभिलेख का प्रमाण न बताए।
नमूना उत्तर — निबंध की शुरुआत इस तरह हो सकती है: मौर्य साम्राज्य की नींव चंद्रगुप्त मौर्य ने लगभग 321 ई.पू. में रखी, और यह पश्चिमोत्तर में अफ़गानिस्तान और बलूचिस्तान तक फैला। इसके प्रशासन के बारे में हम मेगस्थनीज़ के विवरण, अर्थशास्त्र और सबसे बढ़कर असोक के अभिलेखों से जानते हैं।
- फिर ऊपर के बिंदु 2 से 7 एक-एक अनुच्छेद में।
- बिंदु 8 और 9 एक अलग शीर्षक के नीचे।
- अंत में निष्कर्ष: मौर्य प्रशासन राजधानी और प्रांतीय केंद्रों, मार्गों, सेना और अधिकारियों पर टिका था, और असोक ने धम्म के ज़रिए साम्राज्य को जोड़े रखने का प्रयास किया।
अभिलेख केंद्रों, साम्राज्य के फैलाव, धम्म और समाचार की व्यवस्था की पुष्टि करते हैं, पर सेना और अधिकारियों का ब्योरा दूसरे स्रोतों से आता है।
प्रश्न 7 — डी.सी. सरकार का कथन: अभिलेखों में जीवन का हर पक्ष (पृष्ठ 32, 37–43, 47–49)
- कथन के पक्ष में: राजाओं के नाम और उपाधियाँ (देवानांपिय, पियदस्सी); युद्ध और विजय (स्रोत 11); राजा की प्रशंसा (प्रयाग प्रशस्ति, स्रोत 4); प्रशासन (पाँच केंद्र, पतिवेदक); धम्म; सिंचाई (सुदर्शन झील, स्रोत 5); भूमिदान और अग्रहार (स्रोत 8); नगरों के शिल्पकार और श्रेणी (दानात्मक अभिलेख); स्त्रियाँ (प्रभावती गुप्त, नागपिया); भाषा और लिपि।
- कथन की सीमाएँ: हलके या टूटे अक्षर; स्थान और समय से जुड़े अर्थ; सब अभिलेख पढ़े, प्रकाशित या अनूदित नहीं, अनेक अभिलेख बचे नहीं होंगे; खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़ के सुख-दुख प्राय: नहीं; केवल बनवाने वालों का दृष्टिकोण; पशुपालक, शिकारी, मछुआरे जैसे लोग अपने विवरण नहीं रखते थे।
- निष्कर्ष: पृष्ठ 49 की किताब की पंक्ति, “राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है”।
जाँचते समय: दोनों पक्ष हों; जो बच्चा केवल कथन के पक्ष में लिखे, उसका उत्तर अधूरा है, क्योंकि किताब का अपना निष्कर्ष सीमाओं वाला है।
नमूना उत्तर — भूमिका में कथन को किताब के उदाहरणों से जोड़िए: इस अध्याय के अभिलेख राजाओं की उपाधियों, युद्ध, प्रशासन, धम्म, सिंचाई, भूमिदान, नगरों के शिल्पकारों और प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियों तक के बारे में बताते हैं।
- फिर दूसरे हिस्से में किताब की सीमाएँ, ऊपर के बिंदु 2 के क्रम में।
- निष्कर्ष: अभिलेखों में जीवन के बहुत से पक्षों की झलक है, इसलिए डी.सी. सरकार के कथन में दम है। पर किताब के अनुसार राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान केवल अभिलेखशास्त्र से नहीं मिलता; अभिलेखों को ग्रंथों, सिक्कों और पुरावशेषों के साथ मिलाकर पढ़ना पड़ता है।
दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब से कारण दे।
प्रश्न 8 — उत्तर-मौर्य काल में राजत्व के विचार (पृष्ठ 35–38, 40)
- भूमिका: मौर्य साम्राज्य मात्र डेढ़ सौ साल चला; उसके बाद अलग-अलग क्षेत्रों में नए शासक।
- दक्षिण के सरदार: तमिलकम में चोल, चेर और पाण्ड्य; सरदार भेंट लेता और समर्थकों में बाँटता, राजा कर वसूलते; सरदारी में सामान्यतया स्थायी सेना या अधिकारी नहीं; संगम कविताएँ और स्रोत 3।
- सातवाहन और मध्य एशियाई मूल के शक: लंबी दूरी के व्यापार से राजस्व; सत्ता में आने के बाद ऊँचे सामाजिक दर्जे का दावा।
- दैविक राजा: कुषाणों की विशालकाय मूर्तियाँ (मथुरा के पास माट और अफ़गानिस्तान), ‘देवपुत्र’ उपाधि, शायद चीनी शासकों से प्रेरित; प्रमाण उनके सिक्के और मूर्तियाँ।
- सामंत: चौथी शताब्दी ई. में गुप्त सहित कई बड़े साम्राज्य; “इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे” (पृष्ठ 36); शक्तिशाली सामंत राजा बन जाते, दुर्बल राजा अधीन हो जाते।
- प्रशस्ति: प्रयाग प्रशस्ति (हरिषेण, समुद्रगुप्त के राजकवि); “धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।”; प्रशस्ति लिखने वाले इन्हें तथ्य का विवरण नहीं, काव्यात्मक ग्रंथ मानते थे।
- भूमिदान (पृष्ठ 40): कुछ इतिहासकार इसे खेती फैलाने की रणनीति मानते हैं, कुछ कमज़ोर होते राजनीतिक प्रभुत्व का संकेत।
जाँचते समय: सरदार और राजा का फ़र्क, दैविक राजा का कोई प्रमाण, और प्रशस्ति की सीमा, ये तीनों हों; कुषाण मूर्तियों वाली बात “कुछ इतिहासकारों का मानना है” से शुरू हो।
नमूना उत्तर — निष्कर्ष इस तरह लिखा जा सकता है: उत्तर-मौर्य काल में राजत्व के विचार कई रूपों में दिखे:
- दक्षिण में भेंट पर टिकी सरदारी;
- सातवाहनों और शकों का ऊँचे सामाजिक दर्जे का दावा;
- कुषाणों का देवताओं से जुड़ाव;
- और गुप्त शासकों की कवियों द्वारा प्रशंसा।
साथ ही चौथी शताब्दी ई. के कई बड़े साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे। भूमिका में डेढ़ सौ साल वाली बात, और बीच में बिंदु 2 से 7 एक-एक अनुच्छेद में।
प्रश्न 9 — कृषि के तौर-तरीकों में परिवर्तन किस हद तक (पृष्ठ 38–41)
- कारण: शासकों की करों की बढ़ती माँग; किसानों ने उपज बढ़ाने के तरीके खोजे।
- हल: छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों के उर्वर कछारी क्षेत्रों में; भारी वर्षा वाले क्षेत्रों में लोहे का फाल।
- धान की रोपाई: गंगा की घाटी में उपज में भारी वृद्धि, पर कमरतोड़ मेहनत।
- सिंचाई: कुएँ, तालाब, कहीं-कहीं नहरें; व्यक्तियों और कृषक समुदायों ने बनवाए; सुदर्शन झील (स्रोत 5)।
- सीमा: लोहे का फाल कुछ ही हिस्सों में; पंजाब और राजस्थान जैसे अर्धशुष्क क्षेत्रों में बीसवीं सदी में; पूर्वोत्तर और मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल; हर्षचरित (स्रोत 7) में भी ज़्यादातर लोग कुदाल चलाते हैं।
- समाज पर असर: लाभ सबको बराबर नहीं; भूमिहीन खेतिहर श्रमिक, छोटे किसान, बड़े ज़मींदार; गहपति; वेल्लालर, उल्वर, अणिमई; भूमि का स्वामित्व महत्वपूर्ण हुआ।
- भूमिदान: ईसवी की आरंभिक शताब्दियों से; इसके अर्थ पर इतिहासकारों में बहस।
जाँचते समय: “किस हद तक” का उत्तर दोनों ओर से हो: क्या बदला, और कहाँ नहीं बदला।
नमूना उत्तर — निष्कर्ष: खेती के तरीके गंगा और कावेरी की घाटियों जैसे उपजाऊ इलाकों में काफ़ी बदले:
- हल, लोहे का फाल, धान की रोपाई और सिंचाई से उपज बढ़ी।
- पर लोहे का फाल उपमहाद्वीप के कुछ ही हिस्सों तक पहुँचा, और पहाड़ी और जंगल के किनारे के इलाकों में कुदाल चलती रही।
- बढ़ी उपज का लाभ भी सबको बराबर नहीं मिला।
इसलिए परिवर्तन बड़ा था, पर हर जगह और हर व्यक्ति के लिए नहीं।
10 से 12 तक के प्रश्न — मानचित्र और परियोजना
प्रश्न 10 — मानचित्र 1 और 2 की तुलना (पृष्ठ 30–33)
करने का तरीका:
- मानचित्र 1 (पृष्ठ 30) पर मोटे अक्षरों में छपे राज्यों के नाम लिखिए: कंबोज, गांधार, शूरसेन, मत्स्य, कुरु, पांचाल, कोशल, काशी, मल्ल, वज्जि (वृजि), मगध, अंग, वंग, वत्स, चेदि, अवन्ति; अश्मक भी छपा है।
- मानचित्र 2 (पृष्ठ 33) पर असोक के अभिलेखों के प्राप्ति स्थान और राजधानी व प्रांतीय केंद्र देखिए। मानचित्र पर केंद्रों के तीन ही नाम छपे हैं: पाटलिपुत्र, तक्षशिला और उज्जयिनी। सुवर्णगिरि मानचित्र पर नहीं है; किताब इतना बताती है कि सुवर्णगिरि कर्नाटक में सोने की खदान के लिए उपयोगी था (पृष्ठ 33)। तोसलि की जगह किताब नहीं बताती, इसलिए उसे मानचित्र पर न रखिए।
- जिन महाजनपदों का क्षेत्र इन स्थानों और केंद्रों के फैलाव के भीतर आता है, वे साम्राज्य में शामिल रहे होंगे।
जाँचते समय:
- मगध सूची में हो (राजधानी पाटलिपुत्र वहीं थी), और जिन महाजनपदों में तक्षशिला और उज्जयिनी जैसे प्रांतीय केंद्र पड़ते हैं, वे भी।
- प्रश्न के दूसरे हिस्से का उत्तर “हाँ” है: उदाहरण के लिए, कौशाम्बी मानचित्र 1 पर एक नगर है और मानचित्र 2 पर वहाँ असोक का स्तंभ अभिलेख दिखाया गया है।
बाकी स्थान बच्चे दोनों मानचित्र साथ रखकर ख़ुद खोजें। दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब से कारण दे।
नमूना उत्तर — मानचित्र 1 और 2 की तुलना से लगता है कि ये मौर्य साम्राज्य में शामिल रहे होंगे:
- मगध, जहाँ राजधानी पाटलिपुत्र थी;
- और वे महाजनपद, जिनमें प्रांतीय केंद्र तक्षशिला और उज्जयिनी पड़ते हैं।
हाँ, इस क्षेत्र में असोक के अभिलेख मिले हैं, जैसे कौशाम्बी का स्तंभ अभिलेख। इसके साथ बच्चा मानचित्र से खोजे गए दूसरे नाम जोड़े।
प्रश्न 11 — अखबार के सरकारी वक्तव्य और अभिलेख (पृष्ठ 38, 47–49)
करने का तरीका:
- एक महीने तक सड़क, पुल, नहर, तालाब, स्कूल जैसे सार्वजनिक कार्यों पर सरकारी वक्तव्यों की कतरनें, हर एक पर तारीख और अखबार का नाम।
- हर कतरन के लिए तालिका: काम क्या है, उद्देश्य, संसाधन कहाँ से, वक्तव्य किसने जारी किया, किस माध्यम से फैलाया।
- तुलना: सुदर्शन झील का अभिलेख (स्रोत 5) बताता है कि झील किसने बनवाई, किसने मरम्मत कराई, और कि रुद्रदमन ने बिना कर लगाए अपने खर्च से मरम्मत कराई; असोक ने अपने संदेश प्रजा तक पहुँचाने के लिए पत्थरों और स्तंभों पर खुदवाए।
- समानताएँ और असमानताएँ दो स्तंभों में: काम करवाने वाले की प्रशंसा, किसका दृष्टिकोण, आम लोगों तक पहुँच, अखबार रोज़ बदलता है जबकि अभिलेख स्थायी था।
जाँचते समय: केवल कतरनों की फ़ाइल काफ़ी नहीं; तुलना वाला हिस्सा और अध्याय के कम से कम एक अभिलेख का नाम ज़रूरी।
नमूना उत्तर — यह बच्चे की अपनी परियोजना है, इसलिए उत्तर उसकी कतरनों पर निर्भर करेगा। एक अच्छा निष्कर्ष कुछ ऐसा हो सकता है:
- अखबार के वक्तव्य और रुद्रदमन का अभिलेख, दोनों काम करवाने वाले की ओर से लिखे गए हैं और उसका श्रेय बताते हैं।
- अंतर यह है कि अखबार रोज़ बदलता है और बहुत लोगों तक पहुँचता है, जबकि अभिलेख पत्थर पर स्थायी था, पर उस समय अधिकांश लोग प्राय: पढ़े-लिखे नहीं थे।
दूसरे तर्कसंगत निष्कर्ष भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा अपनी कतरनों और किताब से कारण दे।
प्रश्न 12 — आज के नोट और सिक्के, और अध्याय के सिक्के (पृष्ठ 36, 44–47)
करने का तरीका:
- पाँच अलग नोट या सिक्के; हर एक के दोनों ओर का चित्र या वर्णन।
- तालिका: मूल्य, धातु या कागज़, आकार और माप, चित्र और प्रतीक, लिपियाँ और भाषाएँ, जारी करने वाले का नाम।
- अध्याय से तुलना: आहत सिक्के चाँदी और ताँबे के (चित्र 2.7), जिन पर प्रतीक ठोककर बनाए जाते थे; कुषाणों (चित्र 2.4) और गुप्तों (चित्र 2.9) के सोने के सिक्के; यौधेय के ताँबे के सिक्के (चित्र 2.8); हिंद-यूनानी सिक्कों पर पहली बार शासक का नाम और चित्र (चित्र 2.12), नाम यूनानी और खरोष्ठी दोनों में; कुषाण सिक्के पर एक ओर राजा, दूसरी ओर देवता (चित्र 2.4)।
- कार्य: सिक्कों से विनिमय और लंबी दूरी का व्यापार आसान हुआ; यौधेय के हज़ारों ताँबे के सिक्के व्यापार में उनकी रुचि दिखाते हैं।
जाँचते समय: तुलना में सामग्री, तकनीक, प्रतीक और कार्य, चारों हों।
नमूना उत्तर — यह भी बच्चे की अपनी परियोजना है। रिपोर्ट का निष्कर्ष कुछ ऐसा हो सकता है:
- आज के और पुराने सिक्कों में जारी करने वाले की पहचान और प्रतीक, दोनों मिलते हैं।
- अलग यह है कि पुराने सिक्के चाँदी, ताँबे और सोने के थे और कुछ पर प्रतीक ठोककर बनाए जाते थे, जबकि आज के सिक्कों और नोटों की सामग्री, लिपियाँ और बनाने की तकनीक अलग हैं।
दूसरे तर्कसंगत निष्कर्ष भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा अपने नोटों-सिक्कों और किताब से कारण दे।
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — दस भूलें जिनसे बचाना है
1. भूल: सबसे पुराने अभिलेख संस्कृत में हैं। सही बात: प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत भाषाओं में लिखे जाते थे, जो जनसामान्य की भाषाएँ थीं (पृष्ठ 29)।
2. भूल: गण या संघ में एक ही राजा होता था। सही बात: वहाँ लोगों का समूह शासन करता था, और समूह का हर व्यक्ति राजा कहलाता था (पृष्ठ 29)।
3. भूल: मौर्य साम्राज्य के हर इलाके पर नियंत्रण एक जैसा था। सही बात: साम्राज्य के इलाके बड़े विविध थे; किताब के अनुसार “यह संभव है कि सबसे प्रबल प्रशासनिक नियंत्रण साम्राज्य की राजधानी तथा उसके आसपास के प्रांतीय केंद्रों पर रहा हो” (पृष्ठ 33), और “साम्राज्य की सीमा के अंतर्गत भी नियंत्रण एकसमान नहीं था” (पृष्ठ 35)।
4. भूल: मेगस्थनीज़ का पूरा विवरण आज मिलता है। सही बात: आज इसके कुछ अंश ही उपलब्ध हैं (पृष्ठ 32)।
5. भूल: सरदार भी राजा की तरह कर वसूलता था। सही बात: सरदार भेंट लेता था और उसे अपने समर्थकों में बाँटता था; कर राजा वसूलते थे (पृष्ठ 35)।
6. भूल: लोहे के फाल वाला हल हर जगह फैल गया। सही बात: इसका प्रयोग कुछ इलाकों तक सीमित रहा; पंजाब और राजस्थान जैसी अर्धशुष्क ज़मीन वाले क्षेत्रों में लोहे के फाल वाले हल का प्रयोग बीसवीं सदी में शुरू हुआ, और पूर्वोत्तर व मध्य पर्वतीय क्षेत्रों में कुदाल से खेती होती रही (पृष्ठ 38–39)।
7. भूल: शासक के नाम और चित्र वाले पहले सिक्के कुषाणों के थे। सही बात: ऐसे पहले सिक्के हिंद-यूनानी शासकों के थे; कुषाणों ने बड़े पैमाने पर सोने के सिक्के जारी किए (पृष्ठ 44)।
8. भूल: आहत सिक्के सोने के थे। सही बात: पहले आहत सिक्के चाँदी और ताँबे के थे (पृष्ठ 44)।
9. भूल: स्रोत 10 में असोक का नाम लिखा है। सही बात: उसमें केवल उपाधियाँ हैं, देवानांपिय और पियदस्सी; असोक नाम दूसरे अभिलेखों में मिलता है (पृष्ठ 47)।
10. भूल: अभिलेखों में जीवन की हर बात दर्ज है। सही बात: खेती की दैनिक प्रक्रियाएँ और रोज़ के सुख-दुख प्राय: इनमें नहीं हैं; अभिलेख बड़े और विशेष अवसर दर्ज करते हैं और बनवाने वालों का ही दृष्टिकोण बताते हैं (पृष्ठ 48–49)।
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
ये पंक्तियाँ रटवाने के लिए नहीं हैं। पहले बात समझाइए, फिर उत्तर में यह पंक्ति लिखवाइए; किताब के अपने शब्द उत्तर को सधा हुआ बनाते हैं।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “इन स्रोतों से विकास की पूरी कहानी नहीं मिल पाती है” | 28 | प्रश्न 3, 7 की भूमिका |
| “पत्थरों और स्तंभों पर मिले असोक के अभिलेख प्राय: सबसे मूल्यवान स्रोत माने जाते हैं।” | 32 | प्रश्न 6 की भूमिका |
| “कुछ इतिहासकार इस विवरण को अतिशयोक्तिपूर्ण मानते हैं।” | 35 | प्रश्न 6, सेना वाला बिंदु |
| “इनमें से कई साम्राज्य सामंतों पर निर्भर थे।” | 36 | प्रश्न 8, सामंत वाला बिंदु |
| “धरती पर उनका कोई प्रतिद्वंद्वी नहीं था।” | 37 | प्रश्न 8, प्रशस्ति वाला बिंदु |
| “रात में डकैत उन पर हमला करते हैं तो दिन में कर इकट्ठा करने वाले अधिकारी” | 38 | प्रश्न 3, 8 (प्रजा की नज़र) |
| “डेढ़ लाख पुरुषों को निष्कासित किया गया; एक लाख मारे गए और इससे भी ज़्यादा की मृत्यु हुई।” | 48 | प्रश्न 6, 7 (कलिंग विजय) |
| “राजनीतिक और आर्थिक इतिहास का पूर्ण ज्ञान मात्र अभिलेखशास्त्र से ही नहीं मिलता है” | 49 | प्रश्न 5, 7 का निष्कर्ष |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
किताब के किनारों पर छोटे सवाल छपे हैं। बच्चे इन्हें पढ़कर पूछेंगे; नीचे हर एक का छोटा उत्तर है।
पृष्ठ 30 — ऐसे कौन से क्षेत्र हैं जहाँ राज्य और नगर सर्वाधिक सघन रूप से बसे थे।
नमूना उत्तर — गंगा और उसकी उपनदियों की घाटी में, यानी आज के उत्तर प्रदेश और बिहार में। मानचित्र 1 पर कोशल, काशी, वत्स, मल्ल, वज्जि, मगध और अंग जैसे महाजनपद और श्रावस्ती, कौशाम्बी, वाराणसी, कुशीनगर, वैशाली, राजगीर और चंपा जैसे नगर इसी घाटी में हैं। किताब से जोड़िए: लगभग 600–500 ई.पू. में गंगा घाटी में नगरीकरण हुआ (काल रेखा 1), और गंगा और उसकी उपनदियों से आवागमन सस्ता और सुलभ था (पृष्ठ 30–31, 50)।
पृष्ठ 31 — इन दीवारों का निर्माण क्यों किया गया? (चित्र 2.2)
नमूना उत्तर — सुरक्षा के लिए। पड़ोसी राज्यों पर धावा बोलकर धन जुटाना वैध माना जाता था, महाजनपदों की राजधानियाँ प्राय: किलेबंद होती थीं, और राजगाह पहाड़ियों के बीच बसा किलेबंद शहर था (पृष्ठ 29–31)।
दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब से कारण दे।
पृष्ठ 32 — सिंह शीर्ष को आज महत्वपूर्ण क्यों माना जाता है? (चित्र 2.3)
नमूना उत्तर — भारत का राजकीय प्रतीक सारनाथ में मिले असोक के सिंह शीर्ष से लिया गया है, और यह भारत सरकार की आधिकारिक मुहर है (भारत सरकार: राजकीय प्रतीक)।
किताब से जोड़िए: इतिहासकारों के अनुसार प्रस्तर मूर्तियों सहित मौर्यकालीन पुरातत्व “एक अद्भुत कला के प्रमाण थे जो साम्राज्य की पहचान माने जाते हैं” (पृष्ठ 34)।
पृष्ठ 33 — क्या यह भी संभव है कि जो क्षेत्र शासकों के अधीन नहीं थे वहाँ भी उन्होंने अभिलेख उत्कीर्ण करवाए होंगे?
नमूना उत्तर — हाँ, यह संभव है; अभिलेख मिल जाने भर से यह पक्का नहीं होता कि वह क्षेत्र शासक के पूरे नियंत्रण में था। किताब के अनुसार साम्राज्य की सीमा के अंदर भी नियंत्रण एकसमान नहीं था (पृष्ठ 35)।
पृष्ठ 34 — विभिन्न व्यावसायिक समूहों के निरीक्षण के लिए इन अधिकारियों को क्यों नियुक्त किया जाता था? (स्रोत 1)
नमूना उत्तर — स्रोत 1 के यही अधिकारी कर वसूली भी करते थे, इसलिए इन व्यवसायों पर नज़र रखना राज्य की आय के लिए ज़रूरी था; लकड़हारे, बढ़ई, लोहार और खननकर्ता लकड़ी, औज़ार, हथियार और धातु देते थे, जिनकी सेना और यातायात को ज़रूरत थी (पृष्ठ 34)।
पृष्ठ 35 — यदि यूनानी विवरण सही है, तो बताइए कि इतनी बड़ी सेना के भरण-पोषण के लिए मौर्य शासकों को किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? (स्रोत 2)
नमूना उत्तर — सैनिकों का भोजन, घोड़ों और हाथियों का चारा, बैलगाड़ियाँ, सेवक और शिल्पकार (मेगस्थनीज़ की दूसरी उपसमिति के यही काम थे), हथियारों के लिए लोहा और लकड़ी, जंगलों से पकड़े हाथी (स्रोत 2), और इन सबके लिए किसानों, व्यापारियों और शिल्पकारों से वसूला गया कर (पृष्ठ 30, 34–35)।
पृष्ठ 36 — लोग यह उपहार क्यों लाए? सरदार इन उपहारों का उपयोग किसलिए करते होंगे? (स्रोत 3)
नमूना उत्तर — स्रोत 3 के अनुसार लोग “ठीक उसी तरह जैसे पराजित लोग विजयी का आदर करते हैं” भेंट लाए, यानी उपहार सरदार की सत्ता मानने का तरीका थे। सरदार भेंट को अपने समर्थकों में बाँटता था (पृष्ठ 35–36)।
पृष्ठ 36 — राजा को किस प्रकार दर्शाया गया है? (चित्र 2.4)
नमूना उत्तर — सिक्के के अग्र भाग पर कनिष्क खड़े हैं, लंबा वस्त्र पहने, हाथ में दंड लिए और एक छोटी वेदी पर कुछ अर्पित करते हुए; पृष्ठ भाग पर देवता हैं। राजा और देवता एक ही सिक्के के दो ओर हैं, और किताब के अनुसार कुषाणों के राजधर्म का सबसे अच्छा प्रमाण उनके सिक्के और मूर्तियाँ हैं (पृष्ठ 36)।
पृष्ठ 37 — इस मूर्ति में ऐसी क्या विशेषताएँ हैं जिनसे यह प्रतीत होता है कि यह एक राजा की मूर्ति है? (चित्र 2.5)
नमूना उत्तर — बच्चे चित्र देखकर ख़ुद गिनें:
- बलुआ पत्थर की बड़ी मूर्ति;
- लंबा कोट और जूते;
- एक ओर तलवार;
- सामने लंबी गदा जैसी वस्तु;
- और कोट के निचले किनारे पर खुदा अभिलेख।
किताब बताती है कि माट के देवस्थान पर कुषाण शासकों की विशालकाय मूर्तियाँ लगाई गई थीं, और कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इनके ज़रिए कुषाण स्वयं को देवतुल्य दिखाना चाहते थे (पृष्ठ 36–37)।
पृष्ठ 38 — शासकों ने सिंचाई के प्रबंध क्यों किए? (स्रोत 5)
नमूना उत्तर — करों की बढ़ती माँग के बीच उपज बढ़ाना ज़रूरी था, और सिंचाई उसका एक तरीका थी। जो राजा या प्रभावशाली लोग सिंचाई के साधन बनवाते थे, वे अपने इन कामों का उल्लेख अभिलेखों में भी करवाते थे; सुदर्शन झील वाले अभिलेख में बताया गया है कि रुद्रदमन ने झील की मरम्मत करवाई थी (पृष्ठ 38–39)।
पृष्ठ 39 — क्या ये सीमा चिह्न विवाद के हल के लिए पर्याप्त रहे होंगे? (स्रोत 6)
नमूना उत्तर — यह सोचने का प्रश्न है। मदद: ज़मीन में गाड़े टिकाऊ निशान विवाद के समय गवाही दे सकते थे। कमी: निशान खोदने पर ही दिखते, कोई उन्हें हटा या बदल सकता था, और यह लिखित रिकॉर्ड नहीं था। तुलना कीजिए: भूमिदान ताम्र पत्रों पर लिखे जाते थे (पृष्ठ 39–40)।
पृष्ठ 40 — इस अंश में वर्णित लोगों को व्यवसाय के आधार पर आप कैसे वर्गीकृत करेंगे? (स्रोत 7)
नमूना उत्तर — तीन समूह: खेती करने वाले छोटे किसान, जो कुदाल चलाते हैं; जंगल की उपज (छाल, फूल, अलसी, सन, शहद, मोरपंख, मोम, लकड़ी, घास) जुटाने और ढोने वाले; और जंगल के फल बेचने जाने वाली ग्रामीण महिलाएँ (पृष्ठ 40)।
दूसरे तर्कसंगत जवाब भी सही माने जाएँ, अगर बच्चा किताब से कारण दे।
पृष्ठ 41 — इस गाँव में कौन-कौन सी वस्तुएँ पैदा की जाती थीं? (स्रोत 8)
नमूना उत्तर — छूट की सूची से अनुमान लगता है कि गाँव में ये वस्तुएँ होती थीं:
- घास, जानवरों की खाल और कोयला;
- खनिज-पदार्थ और खदिर वृक्ष के उत्पाद;
- फूल और दूध।
यह अनुमान इसलिए, क्योंकि इन्हें अधिकारियों को देने से ही छूट दी गई है। स्रोत 8 यह भी कहता है कि गाँव “मदिरा खरीदने और नमक हेतु खुदाई करने के राजसी अधिकार को कार्यान्वित किए जाने से” भी मुक्त है (पृष्ठ 41)।
पृष्ठ 43 — तीसरी सहस्राब्दि ई.पू. में हड़प्पा सभ्यता जिस क्षेत्र में फैली क्या वहाँ कोई नगर थे? (मानचित्र 3)
नमूना उत्तर — मानचित्र 3 को अध्याय 1 के हड़प्पा वाले मानचित्र के साथ रखकर देखिए। मानचित्र 3 के नगरों (जैसे तक्षशिला, मथुरा, उज्जयिनी, भरूकच्छ) में से जो हड़प्पा सभ्यता के फैलाव वाले क्षेत्र में पड़ते हैं, उनकी सूची बच्चे ख़ुद बनाएँ (पृष्ठ 43)।
पृष्ठ 44 — लेखक ने यह सूची क्यों तैयार की थी? (स्रोत 9)
नमूना उत्तर — पेरिप्लस एक यूनानी समुद्र यात्री की रचना है, और पेरिप्लस का अर्थ ही समुद्री यात्रा है। सूची बताती है:
- मालाबार के बाज़ारों में क्या लाया जाता है;
- और वहाँ से क्या ले जाया जा सकता है।
इसलिए संभव है कि यह समुद्री व्यापार करने वाले व्यापारियों और नाविकों के काम आने के लिए बनी हो (पृष्ठ 44)।
पृष्ठ 46 — क्या कुछ देवनागरी अक्षर ब्राह्मी से मिलते-जुलते हैं? क्या कुछ भिन्न भी हैं? (चित्र 2.11)
नमूना उत्तर — बच्चे चित्र 2.11 के अक्षर एक-एक करके मिलाएँ और दो सूचियाँ बनाएँ: मिलते-जुलते और अलग। संकेत: आधुनिक भारतीय भाषाओं की लगभग सभी लिपियों का मूल ब्राह्मी है, इसलिए कुछ अक्षरों में समानता दिखनी चाहिए (पृष्ठ 46)।
पृष्ठ 47 — अभिलेखशास्त्रियों ने पतिवेदक शब्द का अर्थ संवाददाता बताया है। आधुनिक संवाददाता की तुलना में पतिवेदक के दायित्व कितने भिन्न रहे होंगे? (स्रोत 10)
नमूना उत्तर — पतिवेदक को लोगों के समाचार सीधे राजा तक पहुँचाने थे, हर समय, चाहे राजा खाना खा रहे हों या वाटिका में हों; वह राजा का अधिकारी था, जिसका काम शासन के लिए सूचना देना था। आज का संवाददाता समाचार अखबार, रेडियो या टीवी से आम जनता तक पहुँचाता है (पृष्ठ 47)।
सावधानी
- रचना, लेखन नहीं: पृष्ठ 28 पर ऋग्वेद के लिए “रचना” बोलिए, और काल पूरा बताइए: हड़प्पा सभ्यता के बाद के डेढ़ हज़ार वर्षों में, सिंधु नदी और इसकी उपनदियों के किनारे रहने वाले लोगों द्वारा। हिंदी किताब यहाँ “लेखन” छापती है, जबकि अंग्रेज़ी संस्करण में “रचना” वाला शब्द है; वेद पहले रचे गए और मौखिक रूप से आगे बढ़ाए गए।
- काल रेखा 1: लगभग 200–100 ई.पू. वाली पंक्ति में किताब (पृष्ठ 50) “पश्चिमोत्तर में शक शासन” छापती है; पृष्ठ 44 के अनुसार द्वितीय शताब्दी ई.पू. में उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर हिंद-यूनानी शासकों का नियंत्रण था, और शक अगली पंक्ति (लगभग 100 ई.पू.–200 ई.) में आते हैं। कनिष्क की तिथि भी निश्चित नहीं। इन दोनों पर कोई पक्का-तिथि वाला प्रश्न मत बनाइए।
- सेनगुत्तुवन: प्रश्न 4 में किताब के शब्द “पांड्य सरदार” रहने दीजिए।
- किताब के “शायद” और “कुछ इतिहासकार” उत्तर में भी रहें: कुषाण मूर्तियाँ और देवतुल्य होने का दावा, ‘देवपुत्र’ का चीनी स्रोत, उत्तरी कृष्ण मार्जित पात्र अमीरों के लिए, श्रेणी का कच्चा माल खरीदना, और मौर्य साम्राज्य में सबसे प्रबल नियंत्रण कहाँ था, इन सब पर किताब पक्की बात नहीं कहती।
- दोनों मत: मगध के उदय, भूमिदान के अर्थ, और छठी शताब्दी ई. के बाद सोने के सिक्के कम मिलने पर किताब दो-दो मत देती है। उत्तर में दोनों आएँ।
- चित्र 2.11 और मानचित्र 2: अक्षरों की सूची और अभिलेखों की गिनती बच्चे किताब के चित्र से ख़ुद बनाएँ।
- हमारी ओर से — बोर्ड साझा है। काल रेखा, सिक्कों का क्रम और पाँच मौर्य केंद्र चार्ट पेपर पर बनाकर टाँग दीजिए और बच्चों से अपनी कॉपी में भी उतरवाइए, ताकि अगले कालांशों में बार-बार काम आएँ।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- जेम्स प्रिंसेप ने 1830 के दशक में ब्राह्मी और खरोष्ठी का अर्थ निकाला, और 1838 में असोककालीन ब्राह्मी पढ़ी गई; प्राचीनतम अभिलेख प्राकृत में हैं (पृष्ठ 28–29, 46)।
- छठी शताब्दी ई.पू. में सोलह महाजनपद; गण और संघ में समूह का शासन; छठी से चौथी शताब्दी ई.पू. में मगध सबसे शक्तिशाली, और उसके कारणों की दो व्याख्याएँ (पृष्ठ 29–31)।
- मौर्य साम्राज्य के पाँच केंद्र, स्रोत (मेगस्थनीज़, अर्थशास्त्र, असोक के अभिलेख), और धम्म (पृष्ठ 32–34)।
- सरदार भेंट लेता, राजा कर; कुषाणों का ‘देवपुत्र’; सामंत; प्रयाग प्रशस्ति (पृष्ठ 35–37)।
- उपज बढ़ाने के तरीके और उनकी सीमा; गाँव के वर्ग; भूमिदान और अग्रहार (पृष्ठ 38–41)।
- सिक्कों का क्रम: आहत (चाँदी और ताँबा), हिंद-यूनानी (शासक का नाम और चित्र), कुषाण (सोना), गुप्त (भव्य सोना); और अभिलेख साक्ष्य की सीमाएँ (पृष्ठ 44–49)।
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़।