कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 82 से 113
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
सामग्री के पन्ने
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
हमारी ओर से: यह अध्याय ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के विचारों, विश्वासों और इमारतों का है। किताब दो धागे साथ चलाती है: उस युग के चिंतकों ने जीवन, मृत्यु, दुख और मुक्ति पर क्या पूछा, और ये विचार स्तूपों, मूर्तियों, मंदिरों और गुफाओं में कैसे दिखे। हर भाग में किताब यह भी दिखाती है कि इतिहासकार ग्रंथ और इमारत, दोनों को साथ रखकर कैसे पढ़ते हैं।
- भाग 1 (पृष्ठ 82–84): साँची से शुरुआत। भोपाल की बेगमों के फ़ैसलों और अनुदान से स्तूप अपनी जगह बचा रहा।
- भाग 2 (पृष्ठ 84–87): यज्ञ की परंपरा, उपनिषदों के नए प्रश्न, 64 संप्रदायों की बहस, नियतिवादी और भौतिकवादी।
- भाग 3 (पृष्ठ 88–89): महावीर का संदेश: संपूर्ण विश्व प्राणवान है, अहिंसा, कर्म से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या।
- भाग 4 से 6 (पृष्ठ 89–94): बुद्ध की जीवनी, उनकी शिक्षाएँ, संघ और उसमें आई स्त्रियाँ।
- भाग 7 और 8 (पृष्ठ 95–99): स्तूप क्यों और कैसे बने, और अमरावती और साँची की अलग-अलग नियति।
- भाग 9 (पृष्ठ 99–102): साँची की मूर्तियाँ: कथाएँ, उपासना के प्रतीक और लोक परंपराएँ।
- भाग 10 (पृष्ठ 103–107): महायान, वैष्णव और शैव परंपराएँ, मंदिर और कृत्रिम गुफाएँ।
- भाग 11 (पृष्ठ 107–109): क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं? मूर्ति पढ़ने की कठिनाई।
साँची की मूर्तियाँ किस कुंजी से खुलीं
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।” (पृष्ठ 82)
- “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” (पृष्ठ 100)
हमारी ओर से — कक्षा के चार्ट के लिए: यह तालिका चार्ट पेपर पर बनाकर पूरे अध्याय में टाँगे रखिए। हर नई परंपरा आए, तो एक पंक्ति भरिए।
| परंपरा | किताब के अनुसार मुख्य बात | जानकारी कहाँ से | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| उपनिषद | जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म पर प्रश्न | छांदोग्य उपनिषद (स्रोत 2) | 84–85 |
| आजीविक (नियतिवादी) | सब कुछ पूर्व निर्धारित है | सुत्त पिटक (स्रोत 3); अपने ग्रंथ नष्ट हो गए | 87 |
| लोकायत (भौतिकवादी) | मनुष्य चार तत्वों से बना है; मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता | सुत्त पिटक (स्रोत 3); अपने ग्रंथ नष्ट हो गए | 87 |
| जैन | संपूर्ण विश्व प्राणवान है; अहिंसा; त्याग और तपस्या से मुक्ति | उत्तराध्ययन सूत्र (स्रोत 4), पांडुलिपियाँ, मूर्तियाँ | 88–89 |
| प्रारंभिक बौद्ध | विश्व अनित्य और आत्माविहीन; दुख; मध्यम मार्ग | सुत्त पिटक (स्रोत 5, 6), विनय पिटक (स्रोत 7) | 91–94 |
| महायान | मुक्तिदाता की कल्पना, बोधिसत्त, मूर्तियों की पूजा | मूर्तियाँ (चित्र 4.22) | 103 |
| वैष्णव और शैव | भक्ति; विष्णु के अवतार; शिव का लिंग रूप | मूर्तियाँ, पुराण, मंदिर | 104–106 |
हमारी ओर से — अध्याय का पाठ कैसे खोलें: पहले दिन बच्चों को चित्र 4.3 (साँची का स्तूप) दिखाइए और किताब के अपने प्रश्न बोर्ड पर लिखिए: यह टीला क्यों बनाया गया, इसके अंदर क्या था, इसके चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों बनाई गई, इसे किसने बनवाया या इसके लिए धन किसने दिया, और इसकी “खोज” कब की गई? (पृष्ठ 84) फिर बताइए कि इनके उत्तर अध्याय के अंत तक ग्रंथों, मूर्तियों और अभिलेखों से मिलेंगे। आख़िरी कालांश में इन्हीं प्रश्नों पर लौटिए।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
कालरेखा 1: महत्वपूर्ण धार्मिक बदलाव
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 1500-1000 ई. पू. | प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ | 110 |
| लगभग 1000-500 ई. पू. | उत्तर वैदिक परंपराएँ | 110 |
| लगभग छठी सदी ई. पू. | प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म | 110 |
| लगभग तीसरी सदी ई. पू. | आरंभिक स्तूप | 110 |
| लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे | महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ | 110 |
| लगभग तीसरी सदी ईसवी | सबसे पुराने मंदिर | 110 |
कालरेखा 2: प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण के महत्वपूर्ण चरण
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1814 | इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना | 110 |
| 1834 | रामराजा लिखित एसेज़ ऑन द आर्किटैक्चर ऑफ़ द हिंदूज़ का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की | 110 |
| 1835-1842 | जेम्स फर्गुसन ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया | 110 |
| 1851 | गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास की स्थापना | 110 |
| 1854 | अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी, जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है | 110 |
| 1878 | राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक बुद्ध गया : द हेरिटेज़ ऑफ़ शाक्य मुनि का प्रकाशन | 110 |
| 1880 | एच.एच. कोल प्राचीन इमारतों के संग्रहाध्यक्ष बनाए गए | 110 |
| 1888 | ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट; सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी | 110 |
| 1914 | जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की पुस्तक द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची का प्रकाशन | 110 |
| 1923 | जॉन मार्शल की पुस्तक कंजर्वेशन मैनुअल का प्रकाशन | 110 |
| 1955 | प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी | 110 |
| 1989 | साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया | 110 |
अध्याय के बीच के आँकड़े
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक | अध्याय का काल | 82 |
| 1868-1901 | भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम का शासनकाल | 82 |
| बीस मील | भोपाल से साँची कनखेड़ा, उत्तर-पूर्व की ओर | 82 |
| 1500 से 1000 ईसा पूर्व | ऋग्वेद का संकलन | 84 |
| लगभग 1000 से 500 ईसा पूर्व | कुछ यज्ञ घरों के मालिक करने लगे | 84 |
| 64 | समकालीन बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित संप्रदाय या चिंतन परंपराएँ | 85 |
| पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू. | बुद्ध की मृत्यु के बाद वेसली में ज्येष्ठों की सभा | 86 |
| छठी सदी ईसा पूर्व | वर्धमान महावीर का जन्म; जैन मूल सिद्धांत उससे पहले से प्रचलित | 88 |
| 23 | महावीर से पहले के तीर्थंकर | 88 |
| लगभग सौ वर्ष बाद | बुद्ध के जीवन काल से इतने बाद उनके कई चरित लिखे गए | 89 |
| कम से कम छह वर्ष; दो या तीन कटोरे | विनय पिटक के नियम: नया कंबल या गलीचा; गृहस्थ के घर भोजन | 94 |
| 14 | मानचित्र 1 में बौद्ध स्थल | 95 |
| लगभग दो सौ वर्ष बाद | बुद्ध के समय से इतने बाद असोक ने लुम्बिनी में स्तंभ बनवाया | 96 |
| ईसा पूर्व दूसरी सदी तक | भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप बन चुके थे | 96 |
| 1796 | एक स्थानीय राजा को अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले | 98 |
| 1854 | गुंटूर के कमिश्नर अमरावती की मूर्तियाँ मद्रास ले गए | 98 |
| 1818 | साँची की खोज; तीन तोरणद्वार खड़े, चौथा वहीं गिरा हुआ | 99 |
| ईसा की प्रथम सदी के बाद | बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव | 103 |
| 10 | वैष्णव परंपरा में अवतारों की कल्पना | 104 |
| प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से | ब्राह्मणों के रचे पुराणों में देवताओं की कहानियाँ | 104–105 |
| ईसा पूर्व तीसरी सदी | सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ, असोक के आदेश से आजीविक संतों के लिए | 107 |
| आठवीं सदी | कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा | 107 |
ध्यान दीजिए:
- महायान के दो कथन, दो जगह: पृष्ठ 103 कहता है, “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) की एक पंक्ति महायान, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराओं को साथ रखकर “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे” लिखती है। दोनों को अपनी-अपनी जगह से लिखवाइए: भाग 10.1 का प्रश्न हो तो पृष्ठ 103 की पंक्ति, कालरेखा का प्रश्न हो तो पृष्ठ 110 की पंक्ति।
- 1854 दो बार: इसी साल गुंटूर के कमिश्नर अमरावती की मूर्तियाँ मद्रास ले गए (पृष्ठ 98), और इसी साल कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी (पृष्ठ 110)। बच्चे दोनों घटनाएँ मिला देते हैं।
- “लगभग” साथ रखिए: कालरेखा 1 के हर साल के आगे “लगभग” छपा है; उत्तर में भी रहे।
- साँची के साल: 1818 में खोज (पृष्ठ 99), 1989 में विश्व कला दाय स्थान (पृष्ठ 110)। शाहजहाँ बेगम का शासनकाल 1868-1901 है (पृष्ठ 82)।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| यज्ञ | वैदिक अनुष्ठान, जिनमें ऋग्वेद की स्तुतियाँ पढ़ी जाती थीं; पहले सामूहिक, बाद में कुछ घरों के मालिक करते थे | 84 |
| उपनिषद | छठी सदी ई.पू. से की विचारधाराएँ, जो जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म पर प्रश्न पूछती हैं | 84–85 |
| कुटागारशाला | नुकीली छत वाली झोपड़ी, जहाँ घुमक्कड़ शिक्षक बहस करते थे | 85 |
| नियतिवादी | जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है; आजीविक परंपरा | 87 |
| भौतिकवादी | लोकायत परंपरा, जैसे अजीत केसकंबलिन् | 87 |
| तीर्थंकर | “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।” | 88 |
| अहिंसा | जीवों के प्रति अहिंसा, खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना; जैन दर्शन का केंद्र | 88 |
| संतचरित्र | किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी, जो उसकी उपलब्धियों का गुणगान करती है | 89 |
| श्रमण | जिन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया है | 91 |
| मध्यम मार्ग | घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच का रास्ता | 91 |
| निर्वाण | “अहं और इच्छा का खत्म हो जाना” | 92 |
| संघ | बुद्ध की स्थापित भिक्षुओं की संस्था, जिसके सदस्य धम्म के शिक्षक बने | 92 |
| भिक्खु / भिक्खुनी | संघ के भिक्षु, जो दान पर निर्भर थे; संघ में आई स्त्री भिक्खुनी | 92 |
| थेरी | ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो | 92 |
| त्रिपिटक | ‘तीन टोकरियाँ’: विनय पिटक, सुत्त पिटक, अभिधम्म पिटक | 86 |
| चैत्य | पवित्र स्थल की छोटी वेदी; शवदाह के बाद अवशेष रखे गए टीले भी चैत्य कहलाए | 95 |
| स्तूप | बुद्ध से जुड़े अवशेषों, जैसे अस्थियाँ या उनके इस्तेमाल किए सामान, पर बना टीला; पालि रूप थूप | 96 |
| अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री | गोलार्ध टीला; उसके ऊपर छज्जे जैसा ढाँचा; उससे निकला मस्तूल; उस पर छतरी | 96 |
| वेदिका | टीले के चारों ओर का घेरा, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करता था | 97 |
| चारणचित्र | कपड़े या कागज़ पर बने चित्र, जिन्हें घुमक्कड़ कथावाचक कहानी कहते हुए दिखाते हैं | 99 |
| शालभंजिका | पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री की मूर्ति; लोक विश्वास में उसके छूने से वृक्षों में फूल और फल आते थे | 101 |
| गजलक्ष्मी | सौभाग्य लाने वाली लोकप्रिय देवी, जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है | 102 |
| आभाभेद | चित्रों को त्रिविम रूप देने की तकनीक, जो अजंता के कलाकारों ने अपनाई | 102 |
| बोधिसत्त | परम करुणामय जीव, जो सत्कार्यों से कमाया पुण्य दूसरों की सहायता में लगाते थे | 103 |
| महायान / हीनयान / थेरवाद | नयी परंपरा महायान; उसे अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा; पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को थेरवादी कहते थे | 103 |
| भक्ति | एक विशेष देवता की पूजा, जिसमें भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना जाता था | 104 |
| अवतार | विश्व की रक्षा के लिए भगवान के अलग-अलग रूप; वैष्णव परंपरा में दस अवतारों की कल्पना | 104 |
| आयुध | हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र | 104 |
| गर्भगृह / शिखर | शुरू के मंदिरों का चौकोर, एक दरवाज़े वाला कमरा; उसके ऊपर बना ऊँचा ढाँचा | 105 |
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- इसी किताब का अध्याय 2: पृष्ठ 92 का चर्चा बॉक्स ख़ुद बुद्ध की सिगल को दी सलाह की तुलना असोक की प्रजा को दी सलाह से माँगता है। बच्चों से राजा, किसान और नगर के रिवीजन नोट्स में असोक का धम्म पहले पढ़वा लीजिए।
- भूगोल: प्रश्न 10 विश्व के रेखांकित मानचित्र पर स्थल और जल मार्ग माँगता है। हमारी ओर से: भूगोल की कक्षा का एटलस साथ रखिए।
- चित्रकला: चित्र 4.10 एक ही स्तूप की योजना (समतलीय परिप्रेक्ष्य, यानी ऊपर से) और ऊँचाई (ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य, यानी सामने से) दिखाता है (पृष्ठ 97)। हमारी ओर से: अपने स्कूल भवन की ऐसी दो सादी आकृतियाँ बनवाना इसका अच्छा अभ्यास है।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
चर्चा कीजिए — पृष्ठ 84 से 109 तक के दस बॉक्स
पृष्ठ 84 — “शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वर्णन की तुलना चित्र 3 से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?”
नमूना उत्तर — यहाँ चित्र 3 का मतलब इसी अध्याय का चित्र 4.3 है। बेगम का वर्णन और चित्र 4.3 एक ही स्थल के हैं, पर अलग समय और अलग नज़र से:
- समानताएँ: दोनों में पहाड़ी, पत्थर का गुंबदनुमा ढाँचा और तोरणद्वार है।
- असमानताएँ: बेगम उन्नीसवीं सदी का हाल बताती हैं: पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ, एक प्राचीन तोरणद्वार, और कनिंघम की खुदाई। चित्र 4.3 आज का स्तूप दिखाता है।
किताब के अनुसार आज यह जगह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” है।
पृष्ठ 87 — जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा बच न पाई हो, तो विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में क्या समस्याएँ आती हैं?
नमूना उत्तर — इस अध्याय में ही इसके चार उदाहरण हैं:
- विरोधी स्रोतों पर निर्भरता: आजीविक और लोकायत परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके विचार दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से मिलते हैं, जो उन्हें अधूरा या अपने ढंग से बता सकते हैं।
- अनलिखी परंपराएँ: कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में लिखे ही नहीं गए (पृष्ठ 95)।
- मूर्ति पढ़ना कठिन: ग्रंथ न जानने से जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया।
- जो दर्ज़ नहीं हुआ: रोज़ के और ख़ास अवसरों के बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए (पृष्ठ 109)।
इसलिए इतिहासकार को हर बचे हुए साक्ष्य को सावधानी से और दूसरे साक्ष्यों से मिलाकर पढ़ना पड़ता है।
पृष्ठ 89 — “क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?”
नमूना उत्तर — हाँ, और आज भी। उत्तर में किताब की ये बातें जुड़ें:
- अहिंसा का अर्थ: जैन दर्शन में जीवों के प्रति अहिंसा, खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना; इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया (पृष्ठ 88)।
- प्रकृति का आदर: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”, यानी पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना गया; आज यह जल, जंगल और जीवों को बचाने की सीख बनता है।
- करुणा: बौद्ध शिक्षा में छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा का आदर्श है (पृष्ठ 94)।
फिर बच्चा अपने समय के उदाहरण दे, जैसे झगड़े बातचीत से सुलझाना या जानवरों के साथ दया, और बताए कि अहिंसा उनमें कैसे काम आती है।
पृष्ठ 90 — यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते, तो क्या मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?
नमूना उत्तर — शायद नहीं:
- चित्र 4.7: अमरावती (लगभग 200 ईसवी) की इस मूर्ति में सजा हुआ एक घोड़ा है जिस पर कोई सवार नहीं दिखता, और आसपास लोग हैं। बिना कहानी जाने यह कोई जुलूस लगेगा।
- कथा जानने पर: सिद्धार्थ के महल छोड़ने की कथा पता हो, तभी समझ आता है कि यह बुद्ध के महल से जाने का दृश्य है।
किताब भी कहती है कि ऐसी मूर्तियाँ समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन के बारे में समझ बनानी पड़ी (पृष्ठ 100)।
पृष्ठ 92 — बुद्ध की सिगल को दी गई सलाह की तुलना असोक की अपनी प्रजा को दी गई सलाह (अध्याय 2) से कीजिए।
नमूना उत्तर — दोनों में समानताएँ भी हैं और असमानताएँ भी:
- समानताएँ: बुद्ध सिगल से नौकरों और कर्मचारियों की देखभाल और श्रमणों और ब्राह्मणों की सेवा करने को कहते हैं; अध्याय 2 के अनुसार असोक का धम्म भी बड़ों के आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता और सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार की बात करता है।
- असमानताएँ: स्रोत 5 में बुद्ध की सलाह एक गृहपति के अपने लोगों के प्रति कर्तव्यों की है; असोक ने अपनी सलाह पूरी प्रजा के लिए अभिलेखों में लिखवाई, दूसरों के धर्मों और परंपराओं के आदर की बात जोड़ी, और धम्म के प्रचार के लिए अधिकारी नियुक्त किए।
दोनों का ज़ोर आचरण पर है, पर एक घर के मुखिया से बात करता है और दूसरा राज्य की ओर से।
पृष्ठ 94 — पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
नमूना उत्तर — पुन्ना की रचना (स्रोत 6) और किताब की बातों से ये कारण बनते हैं:
- कठिन जीवन: रचना में वह कहती है कि सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से उसे कितनी भी ठंड हो, पानी में उतरना ही है (पृष्ठ 93)।
- बराबरी: संघ में आने पर पुरानी पहचान छूट जाती थी और सब बराबर माने जाते थे (पृष्ठ 92)।
- आचरण का महत्त्व: बौद्ध शिक्षा जन्म से ज़्यादा अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व देती थी (पृष्ठ 94)।
- नया स्थान: संघ में आई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ और थेरी बन सकती थीं (पृष्ठ 92)।
इसलिए संघ उसे बराबरी, नया स्थान और दुख से मुक्ति का रास्ता देता था।
पृष्ठ 97 — साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10 क) और छायाचित्र (चित्र 4.3) में क्या समानताएँ और फ़र्क हैं?
नमूना उत्तर — दोनों एक ही महास्तूप दिखाते हैं:
- समानताएँ: गोल टीला, उसके चारों ओर की वेदिका, तोरणद्वार और सीढ़ियाँ दोनों में हैं।
- फ़र्क: मापचित्र ऊपर से देखी गई योजना है, जिसमें चारों दिशाओं के चारों तोरणद्वार एक साथ दिखते हैं, पर ऊँचाई नहीं। छायाचित्र में एक ओर से देखा गया असली स्तूप है: गुंबद की ऊँचाई, ऊपर हर्मिका और छत्री, पर चारों द्वार एक साथ नहीं।
योजना से बनावट समझ आती है, छायाचित्र से इमारत का असली रूप।
पृष्ठ 99 — खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया। (खंड एक यानी किताब का भाग 1, “साँची की एक झलक”, पृष्ठ 82–83।)
नमूना उत्तर — भाग 1 और भाग 8 मिलाकर ये कारण बनते हैं:
- प्रतिकृतियाँ: फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की जगह प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
- बेगमों का अनुदान: शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया; सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए भी अनुदान दिया।
- सौभाग्य: शायद किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र इस पर नहीं पड़ी।
- जगह पर संरक्षण: साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई; शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब यह समझ नहीं बनी थी।
किताब के शब्दों में, इसके पीछे “कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।” (पृष्ठ 83)
पृष्ठ 103 — मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्टी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।
नमूना उत्तर — यह बच्चे स्वयं पता करें:
- किससे पूछें: आसपास के कुम्हार, धातु का काम करने वाले कारीगर या किसी संग्रहालय से।
- क्या पूछें: मूर्ति किस चीज़ की है, कैसे बनती है (गढ़कर, साँचे में ढालकर, पकाकर), कितने समय टिकती है।
फिर सोचें कि पत्थर की मूर्तियाँ ज़्यादा क्यों बची हैं: किताब के अनुसार “पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक सुरक्षित बच जाती हैं” (पृष्ठ 102)।
पृष्ठ 109 — आपने कोई धार्मिक अनुष्ठान देखा हो तो उसका वर्णन कीजिए। क्या इसे किसी रूप में हमेशा के लिए दर्ज़ किया जाता है?
नमूना उत्तर — यह बच्चे के अपने अनुभव से लिखा जाएगा:
- वर्णन: अनुष्ठान कहाँ और कब हुआ, कौन लोग थे, क्या बोला, गाया या चढ़ाया गया।
- दर्ज़ होता है या नहीं: किसी ग्रंथ, चित्र, मूर्ति, इमारत, फ़ोटो या वीडियो में, या सिर्फ़ लोगों की याद और परंपरा में।
किताब याद दिलाती है कि दिन-प्रतिदिन और ख़ास अवसरों के बहुत-से रीति-रिवाज स्थायी रूप में दर्ज़ नहीं किए गए, पर संभव है कि उनकी सक्रिय परंपरा रही हो (पृष्ठ 109)।
हमारी ओर से — यह बॉक्स कक्षा में पढ़ाते समय बच्चे को अपना अनुभव लिखने दीजिए, पर उसे पढ़कर सुनाने के लिए मजबूर मत कीजिए, और किसी के अनुष्ठान की तुलना दूसरे से मत होने दीजिए।
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न लगभग 100-150 शब्दों में उत्तर माँगते हैं (पृष्ठ 111)। हर प्रश्न के नीचे पहले वे बिंदु हैं जो उत्तर में आने चाहिए, फिर जाँचने का ध्यान, फिर एक नमूना उत्तर।
प्रश्न 1 — क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे (पृष्ठ 84–87)
- उपनिषद (छठी सदी ई.पू. से): जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन, पुनर्जन्म और अतीत के कर्म पर प्रश्न।
- छांदोग्य उपनिषद: आत्मा बीज की गिरी से छोटी और सब लोकों से बड़ी; बहता पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है”।
- नियतिवादी (आजीविक, मक्खलि गोसाल): सब कुछ पूर्व निर्धारित।
- भौतिकवादी (लोकायत, अजीत केसकंबलिन्): मनुष्य चार तत्वों से बना, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।
- दोनों के अपने ग्रंथ नष्ट; जानकारी सुत्त पिटक से।
जाँचते समय: बच्चा सिर्फ़ तीनों की परिभाषा न लिखे, तुलना का तर्क दे; आजीविक और लोकायत की अदला-बदली पर अंक कटते हैं।
नमूना उत्तर — हाँ, तीनों एक ही युग की बहस का हिस्सा थे, पर जीवन, मृत्यु और कर्म पर उनके उत्तर अलग थे।
- उपनिषद: जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म पर प्रश्न पूछते थे; छांदोग्य उपनिषद आत्मा को बीज की गिरी से छोटी और सब लोकों से बड़ी बताता है।
- नियतिवादी: मक्खलि गोसाल के अनुसार “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।”; तपस्या या सद्गुण से कुछ नहीं बदलता।
- भौतिकवादी: अजीत केसकंबलिन् के अनुसार मनुष्य चार तत्वों से बना है, दान या यज्ञ जैसी कोई चीज़ नहीं, और “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”
- तर्क: उपनिषद आत्मा और मृत्यु के बाद के जीवन को खोजते हैं, भौतिकवादी उसे नकारते हैं; उपनिषद कर्म और पुनर्जन्म पर सोचते हैं, नियतिवादी मानते हैं कि कर्म से कुछ नहीं बदलता।
ध्यान रहे, नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचार सुत्त पिटक जैसी दूसरी परंपरा से ही पता चलते हैं।
प्रश्न 2 — जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाएँ (पृष्ठ 88–89)
- मूल सिद्धांत महावीर के जन्म (छठी सदी ईसा पूर्व) से पहले प्रचलित; उनसे पहले 23 तीर्थंकर।
- संपूर्ण विश्व प्राणवान है।
- अहिंसा जैन दर्शन का केंद्र।
- कर्म से तय जन्म-पुनर्जन्म का चक्र; मुक्ति त्याग और तपस्या से।
- पाँच व्रत।
जाँचते समय: जैन धर्म को महावीर से शुरू हुआ बताना ग़लत है; पाँचों व्रत पूरे गिनवाइए।
नमूना उत्तर — जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे, और जैन परंपरा के अनुसार उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे।
- प्राणवान विश्व: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”; पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
- अहिंसा: जीवों के प्रति अहिंसा, खासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना, जैन दर्शन का केंद्र है; इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया।
- कर्म और मुक्ति: जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है; मुक्ति त्याग और तपस्या से, यानी संसार के त्याग से, मिलती है, इसलिए विहारों में रहना अनिवार्य नियम बना।
- पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना।
धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैला, और जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी भाषाओं में बहुत साहित्य रचा।
प्रश्न 3 — साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका (पृष्ठ 82–83, 110)
- शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) और उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम।
- फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट; मूल पूर्वी तोरणद्वार अपनी जगह।
- रख-रखाव का धन; संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए अनुदान।
- जॉन मार्शल के ग्रंथ सुल्तानजहाँ को समर्पित; खंडों के प्रकाशन में अनुदान।
जाँचते समय: तोरणद्वार को फ्रांस ले जाया गया लिखना उत्तर को उलट देता है; दोनों बेगमों के नाम अलग-अलग हों।
नमूना उत्तर — साँची का स्तूप आज जिस हालत में है, उसमें भोपाल की दो शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम, के फ़ैसलों और अनुदान की बड़ी भूमिका है।
- तोरणद्वार अपनी जगह रहा: उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले जाने की इजाज़त शाहजहाँ बेगम से माँगी; अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की। दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
- रख-रखाव: दोनों बेगमों ने स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया।
- संग्रहालय और ग्रंथ: सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए अनुदान दिया; जॉन मार्शल ने वहीं रहकर लिखे ग्रंथ उन्हें समर्पित किए, और उनके खंडों के प्रकाशन में भी बेगम ने अनुदान दिया।
- लिखित वर्णन: शाहजहाँ बेगम ने अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल में साँची और कनिंघम के काम का वर्णन किया।
किताब के शब्दों में, स्तूप समूह बचा रहा तो “इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।” 1989 में साँची को विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया।
प्रश्न 4 — भिक्खुनी धनवती का अभिलेख (पृष्ठ 111)
किताब का अभिलेख: “महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता–पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।”
जाँचते समय: अभिलेख की बनावट पर ध्यान दीजिए। “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी, इसलिए दोनों पढ़ाइयाँ सही मानिए। हर हाल में धनवती बुद्धमिता की बहन की बेटी हैं, और भिक्खु बल रिश्तेदार नहीं हैं।
- (क) तारीख कैसे: शासक के राज्य वर्ष और ऋतु के महीने-दिन से: महाराजा हुविष्क के तैंतीसवें साल में, गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन।
- (ख) बोधिसत्त की मूर्ति क्यों: यह अनुमान है। महायान परंपरा में बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए और उनकी मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बन गई (पृष्ठ 103); भिक्खु-भिक्खुनियाँ भी धार्मिक इमारतों के लिए दान देते थे (पृष्ठ 96)। इसलिए धनवती ने शायद अपनी श्रद्धा दिखाने, उपासकों की पूजा और दान को याद रखवाने के लिए मूर्ति स्थापित की।
- (ग) रिश्तेदार: उनके माता-पिता, जिनके नाम अभिलेख नहीं देता, और बुद्धमिता, जिनकी बहन की बेटी वे हैं। भिक्खु बल रिश्तेदार नहीं, गुरु हैं (धनवती के या बुद्धमिता के: वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है)।
- (घ) कौन-से ग्रंथ: अभिलेख बल और बुद्धमिता को “त्रिपिटक जानने वाले” बताता है, इसलिए माना जा सकता है कि धनवती भी त्रिपिटक, यानी विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक, जानती थीं (पृष्ठ 86)।
- (ङ) किससे सीखे: भिक्खु बल से, या अपनी मौसी बुद्धमिता से। “भिक्खु बल की शिष्या” को धनवती के लिए पढ़ें तो उन्होंने बल से सीखा; बुद्धमिता के लिए पढ़ें तो शायद बुद्धमिता से। दोनों में से कोई भी नाम, कारण के साथ, पूरा उत्तर है।
(ङ) के उत्तर में “शायद” ज़रूर लिखवाइए।
प्रश्न 5 — स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे (पृष्ठ 85, 92–94)
- समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतोष, तेज़ सामाजिक बदलाव।
- जन्म की बजाय आचरण और मूल्यों का महत्त्व; करुणा।
- संघ में सब बराबर; निर्णय बातचीत या मतदान से।
- मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
- स्त्रियाँ उपदेशिकाएँ और थेरी बनीं।
जाँचते समय: “आपके अनुसार” वाला प्रश्न है, इसलिए बच्चा अपनी भाषा में तर्क दे, पर हर तर्क किताब की किसी बात पर टिका हो।
नमूना उत्तर — प्रश्न “आपके अनुसार” पूछता है, इसलिए कारण किताब की बातों से बनते हैं; वे धर्म, समाज और व्यक्ति, तीनों से जुड़े हैं।
- धार्मिक असंतोष: लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे, और तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझन में डाल रखा था। किताब इसे बौद्ध धर्म के तेज़ी से फैलने का कारण बताती है (पृष्ठ 94)।
- जन्म नहीं, आचरण: बौद्ध शिक्षाओं में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व था, इसलिए स्त्री-पुरुष इस धर्म की ओर आकर्षित हुए (पृष्ठ 94)।
- संघ में बराबरी: राजा, धनवान, गृहपति से लेकर कर्मकार, दास, शिल्पी तक संघ में आए; पुरानी पहचान छोड़ने पर सभी बराबर माने जाते थे।
- स्वयं मुक्ति का रास्ता: बुद्ध का अंतिम निर्देश था, “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”
- स्त्रियों के लिए नया स्थान: संघ में आई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और थेरी कहलाईं; थेरीगाथा में दासी पुन्ना भी अपनी बात कहती है।
इसलिए संघ बहुतों को सादा, बराबरी वाला और अर्थपूर्ण जीवन देता था।
6 से 9 तक के प्रश्न — लघु निबंध के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न “लगभग 500 शब्दों में” लघु निबंध माँगते हैं (पृष्ठ 112)। नीचे हर निबंध का ढाँचा है: भूमिका, मुख्य बिंदु, और निष्कर्ष।
प्रश्न 6 — साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य से कहाँ तक सहायता मिलती है (पृष्ठ 96, 99–103)
जाँचते समय: “कहाँ तक” का अर्थ है कि बच्चा सहायता और उसकी सीमा, दोनों लिखे। अध्याय के तर्क वाला ऊपर का चित्र इसी निबंध का ढाँचा है।
नमूना उत्तर — भूमिका: बौद्ध साहित्य साँची की बहुत-सी मूर्तियों की कुंजी है, पर हर मूर्ति उससे नहीं खुलती।
- जातक कथा: उत्तरी तोरणद्वार के एक हिस्से (चित्र 4.13) में पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य दिखता है, पर कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं।
- चरित और प्रतीक: रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा, स्तूप महापरिनिब्बान, चक्र सारनाथ का पहला उपदेश, और पेड़ बुद्ध के जीवन की एक घटना दिखाता है।
- स्तूप का अर्थ: महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) से स्तूप की पूजा के दृश्य समझ आते हैं।
- सीमा, लोक परंपराएँ: तोरणद्वार पर पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री को विद्वान साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से पहचान पाए: वह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका है। जानवर, कमल और हाथियों के बीच की महिला (माया या गजलक्ष्मी) और सर्प भी बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों और लोक परंपराओं से आए प्रतीक हैं।
- साहित्य न जानने का नतीजा: जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना, क्योंकि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था।
निष्कर्ष: बौद्ध साहित्य बहुत हद तक मदद करता है, पर किताब के अनुसार ऐसी मूर्तिकला को “अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।”; मूर्ति बनाने वालों की परंपराएँ और लोक विश्वास भी जानने पड़ते हैं।
प्रश्न 7 — चित्र 4.32 और 4.33: ग्रामीण या शहरी परिदृश्य (पृष्ठ 99, 112)
जाँचते समय: बच्चा वास्तुकला, पेड़-पौधे, जानवर और काम-धंधे, चारों को अलग-अलग देखकर निष्कर्ष तक पहुँचे; सिर्फ़ “ग्रामीण” या “शहरी” लिख देना अधूरा है।
नमूना उत्तर — भूमिका: चित्र 4.32 ग्रामीण परिदृश्य लगता है और चित्र 4.33 शहरी।
- चित्र 4.32, वास्तुकला: गुंबद जैसी छत वाली दो झोंपड़ियाँ, जिनमें लोग बैठे हैं; बड़ी इमारत कोई नहीं।
- चित्र 4.32, पेड़-पौधे और जानवर: पेड़, नीचे पानी के पौधे, मवेशी जैसे जानवर और एक हाथी।
- चित्र 4.32, लोग: स्त्री-पुरुषों की कतार और कंधे पर डंडे उठाए पुरुष, जैसे गाँव के रोज़ के काम।
- चित्र 4.33, वास्तुकला: खंभों वाली दो मंज़िला इमारत, खंभों के ऊपर जानवरों की छोटी आकृतियाँ, रेलिंग की पट्टी और मेहराब वाली जालीदार खिड़कियाँ।
- चित्र 4.33, लोग: दोनों मंज़िलों में भीड़ में बैठे बहुत-से लोग; खेत, झोंपड़ी या खुले जानवर नहीं।
निष्कर्ष: झोंपड़ी, पेड़, पानी और जानवर गाँव की पहचान हैं; बहुमंज़िला, सजी हुई इमारत और भीड़ नगर की। फिर भी याद रहे कि पहली नज़र का अनुमान अधूरा हो सकता है: चित्र 4.13 का ग्रामीण दिखता दृश्य कला इतिहासकार वेसान्तर जातक से जोड़ते हैं।
प्रश्न 8 — वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला (पृष्ठ 103–110)
जाँचते समय: निबंध में दोनों हिस्से हों, मूर्तिकला भी और वास्तुकला भी; साल “लगभग” के साथ लिखे जाएँ।
नमूना उत्तर — भूमिका: कालरेखा 1 के अनुसार लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ बढ़ीं, और लगभग तीसरी सदी ईसवी में सबसे पुराने मंदिर बने।
- भक्ति और अवतार: वैष्णव परंपरा में विष्णु और शैव परंपरा में शिव सबसे बड़े देवता; भक्ति इनका केंद्र; वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना, जिससे स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मानकर एकीकृत परंपरा बनी।
- मूर्तियाँ: एहोल (कर्नाटक) का वराह अवतार (लगभग छठी सदी), देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) में शेषनाग पर विष्णु (पाँचवीं सदी), महाबलीपुरम् में दुर्गा (छठी सदी); शिव लिंग रूप में और कई बार मनुष्य रूप में।
- पहचान के चिह्न: शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली; इनकी कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में।
- मंदिर: पहले चौकोर गर्भगृह, एक दरवाज़े वाला; फिर शिखर; बाद में सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण और जल आपूर्ति।
- चट्टान काटकर: कृत्रिम गुफाओं की परंपरा ईसा पूर्व तीसरी सदी की आजीविक गुफाओं से चली और आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा में सबसे विकसित हुई।
- पढ़ने की कठिनाई: उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों को कई सिरों और हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगीं; महाबलीपुरम की चट्टान पर गंगा का अवतरण है या अर्जुन की तपस्या, इस पर मतभेद है।
निष्कर्ष: भक्ति की इन परंपराओं से देवताओं की पहचान वाली मूर्तियाँ और गर्भगृह से शिखर और विशाल मंदिर तक की वास्तुकला विकसित हुई, जिन्हें पुराणों की कहानियों के साथ पढ़ना पड़ता है।
प्रश्न 9 — स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे (पृष्ठ 95–99)
जाँचते समय: “क्यों” और “कैसे” दोनों के अलग हिस्से हों; “कैसे” में दान और संरचना, दोनों आएँ।
नमूना उत्तर — भूमिका: स्तूप बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेषों पर बने टीले थे, जो बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक बन गए, और जिन्हें बहुत-से लोगों के दान से बनाया और सजाया गया।
- पवित्र स्थल: लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसी बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहें पवित्र स्थल बनीं।
- अवशेषों पर टीला: बुद्ध की अस्थियाँ या उनके इस्तेमाल किए सामान गाड़कर बने टीले स्तूप कहलाए; यह परंपरा शायद बुद्ध से पहले की थी, पर बौद्ध धर्म से जुड़ गई।
- बुद्ध का निर्देश: महापरिनिब्बान सुत्त में बुद्ध कहते हैं, “उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए।”
- असोक: अशोकावदान के अनुसार असोक ने अवशेष हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया; ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप बन चुके थे।
- दान: सातवाहन राजा, शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ, सैकड़ों स्त्री-पुरुष, और भिक्खु-भिक्खुनियाँ; साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वालों के दान से बना।
- संरचना: अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका और चारों दिशाओं में तोरणद्वार; उपासक पूर्वी तोरणद्वार से घुसकर दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे।
निष्कर्ष: स्तूप आस्था और समाज, दोनों के मेल से बने। साँची आज भी अपनी जगह खड़ा है, जबकि अमरावती का महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।”
10 से 12 तक के प्रश्न — मानचित्र और परियोजना
प्रश्न 10 — विश्व के मानचित्र पर बौद्ध धर्म का प्रसार (पृष्ठ 89, 95)
नमूना उत्तर — बच्चा सिर्फ़ वही इलाके और मार्ग दिखाए जिनका नाम किताब लेती है:
- उपमहाद्वीप: बुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले; चाहें तो मानचित्र 1 के कुछ स्थल छोटे बिंदुओं से दिखाइए।
- स्थल मार्ग: उपमहाद्वीप से मध्य एशिया होते हुए चीन तक ठोस रेखा, और चीन, कोरिया और जापान पर निशान।
- जल मार्ग: श्रीलंका पर निशान, और श्रीलंका से समुद्र पार म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक बिंदुदार रेखा।
- संकेत सूची: ठोस रेखा = स्थल मार्ग, बिंदुदार रेखा = जल मार्ग, छायांकित इलाका = प्रसार।
बच्चा मार्ग अपनी ओर से न गढ़े: ऊपर के इलाके और दोनों मार्ग ही दिखाए, और देशों की जगह एटलस में देखकर पहचाने।
प्रश्न 11 — आपके अड़ोस-पड़ोस की धार्मिक परंपरा (परियोजना)
नमूना उत्तर — यह बच्चा स्वयं खोजकर करेगा। तरीका:
- स्थल चुनना: अध्याय की परंपराओं में से किसी एक का आसपास का पूजा स्थल; वहाँ के लोगों से विनम्रता से अनुमति लेकर बात।
- ग्रंथ: कौन-से ग्रंथ पढ़े जाते हैं, किस भाषा में, कैसे आगे बढ़ते हैं; फिर किताब से तुलना: बौद्ध शिक्षाएँ पहले मौखिक रहीं, जैन पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में रखी गईं।
- मूर्तियाँ: मूर्ति है या प्रतीक; शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से पहचान; अध्याय के चित्रों से मिलान।
- इमारत: योजना का सरल रेखाचित्र, और साँची के स्तूप और शुरू के मंदिरों से एक तालिका में तुलना।
हमारी ओर से — बच्चे से उसका अपना धर्म मत पूछिए और रिपोर्टों में किसी परंपरा को बेहतर या कमतर मत लिखने दीजिए। तुलना इमारत, मूर्ति और ग्रंथ की हो, लोगों के विश्वास की नहीं।
प्रश्न 12 — पाँच तसवीरें, दो लोग, तुलना (परियोजना)
नमूना उत्तर — यह भी बच्चा स्वयं करेगा। तरीका:
- तसवीरें: अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच, जैसे मथुरा का तीर्थंकर (लगभग तीसरी शताब्दी ई.), साँची का कोई दृश्य, अजंता का कोई चित्र, एहोल का वराह और महाबलीपुरम् की दुर्गा; असली शीर्षक अलग पन्ने पर।
- दिखाना और पूछना: शीर्षक हटाकर हर तसवीर दो लोगों को; एक जैसे प्रश्न: क्या दिखता है, कौन हो सकता है, कहाँ और कब का लगता है।
- तुलना: तालिका: तसवीर, व्यक्ति 1 का वर्णन, व्यक्ति 2 का वर्णन, असली जानकारी।
- निष्कर्ष: लोग किन चीज़ों से पहचान पाए और कहाँ चूके; अध्याय से जोड़: परिचित के आधार पर अपरिचित को समझना (पृष्ठ 108), और फर्गुसन की भूल।
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — दस भूलें जिनसे बचाना है
1. भूल: साँची का पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले जाया गया। सही बात: फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए; मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह रहा। (पृष्ठ 83)
2. भूल: आजीविक भौतिकवादी थे। सही बात: आजीविक (मक्खलि गोसाल) नियतिवादी कहलाते हैं; लोकायत (अजीत केसकंबलिन्) भौतिकवादी। (पृष्ठ 87)
3. भूल: बुद्ध के प्रवचन उनके जीवन काल में लिखे गए। सही बात: कोई भी संभाषण जीवन काल में नहीं लिखा गया; मृत्यु के बाद वेसली की सभा में संकलन हुआ। (पृष्ठ 86)
4. भूल: विनय पिटक में बुद्ध की शिक्षाएँ हैं। सही बात: विनय पिटक में संघ के नियम हैं, शिक्षाएँ सुत्त पिटक में, दर्शन अभिधम्म पिटक में। (पृष्ठ 86)
5. भूल: जैन धर्म महावीर से शुरू हुआ। सही बात: जैन मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले प्रचलित थे; उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे। (पृष्ठ 88)
6. भूल: संघ में शुरू से महिलाएँ आ सकती थीं, और गोतमी बुद्ध की माँ थीं। सही बात: शुरू में सिर्फ़ पुरुष; आनंद के समझाने पर अनुमति मिली; महाप्रजापति गोतमी बुद्ध की उपमाता और पहली भिक्खुनी थीं। (पृष्ठ 92)
7. भूल: प्रारंभिक मूर्तियों में बुद्ध सदा मानव रूप में हैं। सही बात: कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र जैसे प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई। (पृष्ठ 100)
8. भूल: हीनयान नाम पुरानी परंपरा ने ख़ुद रखा। सही बात: यह नाम महायान अपनाने वालों ने दिया; पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को थेरवादी कहते थे। (पृष्ठ 103)
9. भूल: सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ बौद्ध भिक्खुओं के लिए बनीं। सही बात: ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए। (पृष्ठ 107)
10. भूल: प्रश्न 4 में भिक्खु बल को धनवती का रिश्तेदार मान लेना। सही बात: धनवती के रिश्तेदार उनके माता-पिता और मौसी बुद्धमिता हैं; भिक्खु बल गुरु हैं। “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी, इसलिए “पाठ किससे सीखे” का उत्तर बल या बुद्धमिता, दोनों ठीक हैं। (पृष्ठ 111)
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
ये पंक्तियाँ रटवाने के लिए नहीं हैं। पहले बात समझाइए, फिर उत्तर में यह पंक्ति लिखवाइए; किताब के अपने शब्द उत्तर को सधा हुआ बनाते हैं।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।” | 82 | प्रश्न 3 की भूमिका |
| “इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।” | 83 | प्रश्न 3 का निष्कर्ष |
| “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।” | 87 | प्रश्न 1, नियतिवादी |
| “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।” | 87 | प्रश्न 1, भौतिकवादी |
| “संपूर्ण विश्व प्राणवान है” | 88 | प्रश्न 2, अहिंसा का आधार |
| “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।” | 92 | प्रश्न 5, बुद्ध की शिक्षा |
| “उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए।” | 96 | प्रश्न 9, स्तूप क्यों |
| “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों।” | 97 | प्रश्न 9, परिक्रमा |
| “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” | 98 | अमरावती और साँची की नियति |
| “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” | 100 | प्रश्न 6 का निष्कर्ष |
| “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” | 103 | महायान का उदय |
| “सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।” | 107 | प्रश्न 8, चट्टान काटकर बने मंदिर |
| “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।” | 109 | अध्याय का समापन |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
किताब के किनारों पर छोटे सवाल छपे हैं। बच्चे इन्हें पढ़कर पूछेंगे; नीचे हर एक का छोटा उत्तर है।
पृष्ठ 84 — यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए। (स्रोत 1)
नमूना उत्तर — स्रोत 1 में: आहुति देवताओं तक पहुँचाना; खूब सारे खाद्य पदार्थ; प्रचुर धन; अद्भुत गाय; वंश आगे बढ़ाने वाला पुत्र। पृष्ठ 84 का मुख्य पाठ बताता है कि लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य और लंबी आयु के लिए भी प्रार्थना करते थे।
पृष्ठ 87 — क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है? (स्रोत 3)
नमूना उत्तर — उनकी बातों से नाम ठीक लगते हैं: गोसाल सब कुछ पूर्व निर्धारित मानते हैं, केसकंबलिन् मनुष्य को चार तत्वों से बना मानते हैं। पर किताब कहती है कि उन्हें ये नाम “अक्सर” और “सामान्यत:” दिए जाते हैं, और उनके अपने ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए पूरी तस्वीर शायद नहीं मिलती।
पृष्ठ 88 — महारानी के द्वारा दिया गया कौन-सा तर्क आपको सबसे ज़्यादा युक्तियुक्त लगता है? (स्रोत 4)
नमूना उत्तर — यह बच्चे की अपनी राय है; वह एक तर्क चुनकर कारण दे। जैसे: मृत्यु पर धन पीछे छूट जाएगा, तब सिर्फ़ धर्म रक्षा करेगा; यह तर्क मज़बूत लगता है क्योंकि धन सचमुच साथ नहीं जाता।
पृष्ठ 89 — क्या आप इसकी लिपि को पहचान सकते हैं? (चित्र 4.6)
नमूना उत्तर — बच्चा चौदहवीं सदी की जैन पांडुलिपि के अक्षरों की बनावट आज की देवनागरी से मिलाए और देखे कि कौन-से अक्षर पहचान में आते हैं; पुष्टि शिक्षक से या किसी संग्रहालय की जानकारी से करे।
पृष्ठ 91 — माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे? (स्रोत 5)
नमूना उत्तर — स्रोत 5 बस इतना बताता है कि ऐसे ही उपदेश दिए गए; निर्देश बच्चे को सोचने हैं। “पाँच तरह से” देखभाल के ढंग पर, जैसे माता-पिता का आदर और बुढ़ापे में देखभाल, शिक्षक का सम्मान और मन लगाकर सीखना। ये बच्चे के सुझाव हैं, ग्रंथ के शब्द नहीं।
पृष्ठ 93 — बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं? (स्रोत 6)
नमूना उत्तर — विवेक और तर्क (“वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे”), सम्यक कर्म (बुरे कर्म ही छोड़ना), हर व्यक्ति की मुक्ति (एक दासी भी धर्म पर बोलती है) और करुणा।
पृष्ठ 94 — क्या आप बता सकते हैं कि ये नियम क्यों बने? (स्रोत 7)
नमूना उत्तर — सादा जीवन और संग्रह से बचना (कंबल कम से कम छह वर्ष), दान पर जीने वालों में बाँटना और बराबरी (“यही सम्यक आचरण है।”), विहार का अनुशासन (बिस्तरा समेटना, विदा लेकर जाना), और नियम तोड़ने पर अपराध स्वीकार करना।
पृष्ठ 96 — चित्र 4.15 को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाज़ों को पहचान सकते हैं? (स्रोत 8)
नमूना उत्तर — स्रोत 8 में धूप या माला चढ़ाना, सिर नवाना और हृदय में शांति लाना है। चित्र 4.15 में स्तूप के नीचे उपासकों की भीड़ है; बच्चा किताब में देखे कि कौन माला जैसी चीज़ लिए है और कौन सिर झुकाए या हाथ जोड़े है।
पृष्ठ 97 — इस इमारत की कौन-सी विशेषताएँ नक्शे में और कौन-सी ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य में ज़्यादा स्पष्ट हैं? (चित्र 4.10)
नमूना उत्तर — योजना (क) में गोल आकार, एक के अंदर एक घेरे, सीढ़ियाँ और चारों दिशाओं के चार तोरणद्वार; ऊँचाई के चित्र (ख) में गुंबद की ऊँचाई, ऊपर हर्मिका और छत्री, वेदिका, सीढ़ी और नक्काशीदार तोरणद्वार।
पृष्ठ 104 — मूर्ति की आकृतियों के आपसी अनुपात में फ़र्क से क्या समझ आता है? (चित्र 4.23)
नमूना उत्तर — वराह अवतार की आकृति बहुत बड़ी है और पृथ्वी देवी छोटी; बड़ा आकार शायद देवता की शक्ति और महत्त्व दिखाता है, क्योंकि वे पृथ्वी को बचाने वाले हैं।
पृष्ठ 105 — कलाकारों ने गति कैसे दिखाई है? इस मूर्ति की कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए। (चित्र 4.24)
नमूना उत्तर — शरीरों का झुकाव, उठी हुई भुजाएँ और आयुध, शेर की मुद्रा और आकृतियों की भीड़ गति दिखाते हैं। कहानी बच्चा पुराणों पर आधारित किसी पुस्तक से या शिक्षक से जाने, क्योंकि किताब के अनुसार ऐसी मूर्तियाँ पुराणों की कहानियों से समझी जाती हैं।
पृष्ठ 106 — गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें। (चित्र 4.25)
नमूना उत्तर — देवगढ़ के मंदिर में सामने का दरवाज़ा गर्भगृह का प्रवेशद्वार है; उसके ऊपर का टूटा हुआ ऊँचा भाग शिखर के अवशेष हैं।
सावधानी
- धर्म किताब के शब्दों में: हर परंपरा वैसे ही पढ़ाइए जैसे किताब लिखती है। किसी परंपरा को ऊँचा या नीचा मत बताइए, किसी देवता, बुद्ध या महावीर का अभिनय मत करवाइए, और किसी जीवित धर्म के पक्ष या विपक्ष में बहस मत करवाइए। गतिविधियों में तुलना स्रोतों की हो, कक्षा में बैठे लोगों के विश्वास की नहीं।
- पृष्ठ 91, “आत्माविहीन (आत्मा)”: बच्चे कोष्ठक वाले शब्द पर अटकेंगे। अर्थ आत्माविहीन ही है, और किताब इसका कारण देती है: “क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।”
- महायान का समय: पृष्ठ 103 की पंक्ति और कालरेखा 1 की पंक्ति अलग-अलग लिखवाइए; दोनों को मिलाकर एक साल मत बनवाइए।
- चित्र 4.13: पहली नज़र में यह ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं। इसे “गाँव का दृश्य” कहकर मत छोड़िए।
- चैत्य: किताब दो बातें कहती है: पवित्र स्थलों की छोटी वेदी को कभी-कभी चैत्य कहा जाता था, और शवदाह के बाद अवशेष रखे गए टीले चैत्य के रूप में जाने गए (पृष्ठ 95)। इसके आगे कुछ मत जोड़िए।
- चित्र 4.9: यह साँची का एक दानात्मक अभिलेख है, और ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं (पृष्ठ 97)। इसके अक्षरों का अर्थ बच्चों से मत गढ़वाइए; चर्चा दान देने वालों पर रखिए (पृष्ठ 96)।
- अमरावती, 1854: किताब “गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर” लिखती है और मूर्तियों को “एलियट संगमरमर” कहती है; उत्तर में यही शब्द रखिए।
- अनुमान वाली बातें: साँची क्यों बचा, इस पर किताब “शायद” कहती है (पृष्ठ 83, 99), और स्तूप बनाने की परंपरा को “बुद्ध से पहले की रही होगी” (पृष्ठ 96); उत्तर में भी यही शब्द रहें।
- हमारी ओर से — बोर्ड साझा है, इसलिए परंपराओं वाला चार्ट और दोनों कालरेखाएँ चार्ट पेपर पर बनाकर दीवार पर रखिए। प्रोजेक्टर न हो तो चित्र किताब में ही खुलवाइए; हर चित्र का नंबर बोर्ड पर लिख दीजिए।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- साँची का स्तूप उस युग की बची इमारतों में सबसे सुरक्षित है; उसके बचे रहने में भोपाल की बेगमों के अनुदान समेत “कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका” रही। (पृष्ठ 82–83)
- उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादी जीवन, मृत्यु और कर्म पर अलग-अलग उत्तर देते थे। (पृष्ठ 84–87)
- महावीर: संपूर्ण विश्व प्राणवान है, अहिंसा, और पाँच व्रत। (पृष्ठ 88)
- बुद्ध: विश्व अनित्य है, दुख जीवन का हिस्सा है, मध्यम मार्ग; संघ में सब बराबर। (पृष्ठ 91–92)
- स्तूप अवशेषों पर बने, बहुत-से लोगों के दान से सजे; अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका, तोरणद्वार। (पृष्ठ 95–97)
- मूर्तियाँ “अक्षरश:” नहीं पढ़ी जातीं: ग्रंथ, लोक परंपरा और पुराण, तीनों जानने पड़ते हैं। (पृष्ठ 99–109)
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़।