Chapter 4विचारक, विश्वास और इमारतें

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 4

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कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 82 से 113

यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।

सामग्री के पन्ने

किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना

पृष्ठ 82–83 — शुरुआत और साँची की एक झलक

कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. साँची की एक झलक

किताब कहाँ से शुरू करती है। उस युग के विचारकों और उनकी छोड़ी निशानियों से (पृष्ठ 82)। अध्याय ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक की बात करता है। उस समय के विचार समझने के लिए इतिहासकार बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के साथ इमारतें और अभिलेख जैसे भौतिक साक्ष्य भी पढ़ते हैं। इन साक्ष्यों में एक इमारत पूरे अध्याय में बार-बार लौटती है: “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।”

फिर किताब उन्नीसवीं सदी के भोपाल में ले जाती है।

  • भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) ने अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल में साँची का वर्णन किया; 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने इसका अनुवाद किया।
  • बेगम के शब्द हैं: “भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत साँची कनखेड़ा की इमारतें हैं।” यह गाँव भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की तरफ़ एक पहाड़ी की तलहटी में बसा है।
  • मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम कई हफ़्ते साँची में रुके: जगह के चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, गुंबदनुमा ढाँचे के बीचोंबीच खुदाई की।
  • फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचा पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस के संग्रहालय के लिए ले जाने की इजाज़त माँगी; कुछ समय अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की। दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
  • शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव के लिए धन दिया। सुल्तानजहाँ बेगम ने संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए अनुदान दिया; जॉन मार्शल ने अपने ग्रंथ उन्हें समर्पित किए।

किताब यह भी कहती है कि शायद यह सौभाग्य था कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी। आज साँची भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” है।

हमारी ओर से — किसने क्या किया। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: कौन, क्या किया, नतीजा। फिर ऊपर के बिंदु एक-एक कर पढ़िए और बच्चों से खाने भरवाइए। शुरुआत के लिए इतना बोर्ड पर लिख दीजिए: शाहजहाँ बेगम, सुल्तानजहाँ बेगम, कनिंघम, फ्रांसीसी और अंग्रेज़, जॉन मार्शल।

नमूना उत्तर — खाने कुछ ऐसे भरेंगे:

  • शाहजहाँ बेगम: आत्मकथा में साँची का वर्णन किया और रख-रखाव के लिए धन दिया।
  • सुल्तानजहाँ बेगम: संग्रहालय और अतिथिशाला के लिए अनुदान दिया; मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन में भी अनुदान दिया।
  • कनिंघम: चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, खुदाई की; 1854 में भिलसा टोप्स लिखी, जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है।
  • फ्रांसीसी और अंग्रेज़: तोरणद्वार ले जाना चाहते थे, पर प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए; मूल तोरणद्वार अपनी जगह रहा।
  • जॉन मार्शल: साँची पर अपने ग्रंथ वहीं रहकर लिखे।

खाना भर जाने पर बच्चे खुद देख लेंगे कि साँची एक व्यक्ति के कारण नहीं, कई लोगों के फ़ैसलों से बचा।

यहीं रुकिए। साँची का पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस क्यों नहीं गया?

नमूना उत्तर — क्योंकि माँगने वाले प्रतिकृति पर मान गए:

  • फ्रांसीसियों ने शाहजहाँ बेगम से तोरणद्वार ले जाने की इजाज़त माँगी थी, और कुछ समय अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की।
  • दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए, और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा।

किताब के शब्दों में, “इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।”

बच्चे यहाँ अटकते हैं। कई बच्चे लिख देते हैं कि तोरणद्वार फ्रांस ले जाया गया; किताब साफ़ कहती है कि मूल तोरणद्वार अपनी जगह रहा। दूसरी उलझन नाम की है: भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम का शासनकाल 1868-1901 है; उन्हें किसी और शाहजहाँ से मत मिलने दीजिए। अंत में किताब के अपने प्रश्न बोर्ड पर लिख दीजिए: यह टीला क्यों बनाया गया, इसके अंदर क्या था, इसके चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों बनाई गई, इसे किसने बनवाया या इसके लिए धन किसने दिया, और इसकी “खोज” कब की गई? (पृष्ठ 84) पूरे अध्याय में इन्हीं के उत्तर मिलेंगे।

इसी हिस्से में। अध्याय का तर्क · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 3) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 84) · फ़्लैशकार्ड 1–15; प्रश्न बैंक क1, क2, ङ1।

पृष्ठ 84–87 — यज्ञ, नए प्रश्न और वाद-विवाद

कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद

किताब कहाँ से शुरू करती है। विश्व इतिहास के एक मोड़ से (पृष्ठ 84)। ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु, और भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य चिंतक हुए। उसी समय गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे, और ये मनीषी बदलते हालात को भी समझना चाहते थे।

फिर किताब तीन कदम चलती है।

  • यज्ञ: पूर्व वैदिक परंपरा की जानकारी ऋग्वेद से मिलती है, जो 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित हुआ। यज्ञों में स्तुतियाँ पढ़ी जातीं और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य और लंबी आयु माँगते। शुरू में यज्ञ सामूहिक थे; बाद में (लगभग 1000 से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करने लगे। राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा ब्राह्मण पुरोहितों के सहारे करते थे।
  • नए प्रश्न: उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) में लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन और पुनर्जन्म पर सोचते दिखते हैं। छांदोग्य उपनिषद में बहता हुआ पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है”, यानी यज्ञ का अर्थ ही नए ढंग से सोचा जा रहा था।
  • वाद-विवाद: समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख है। शिक्षक घूम-घूमकर कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोंपड़ी) या उपवनों में बहस करते थे; जो प्रतिद्वंद्वी को तर्क से समझा लेता, प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता।

पृष्ठ 86 का बॉक्स यहीं पढ़वा लीजिए: बुद्ध का कोई संभाषण उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया; मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) वेसली में ‘ज्येष्ठों’ की सभा में उनकी शिक्षाओं का संकलन हुआ, और ये संग्रह त्रिपिटक कहलाए।

हमारी ओर से — कथन छाँटिए। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: उपनिषद, नियतिवादी, भौतिकवादी। फिर किताब के ये पाँच कथन एक-एक कर पढ़िए:

  1. बहता हुआ पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है”।
  2. मन के अंदर छुपी आत्मा धान या सरसों के बीज की गिरी से भी छोटी है, और सभी लोकों से बड़ी।
  3. “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।”
  4. “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।”
  5. “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”

बच्चे हर कथन को सही खाने में रखें और बताएँ कि किस शब्द से पहचाना।

नमूना उत्तर — कथन ऐसे बँटेंगे:

  • उपनिषद: कथन 1 और 2, दोनों छांदोग्य उपनिषद के।
  • नियतिवादी: कथन 3, मक्खलि गोसाल का; “पूर्व निर्धारित” शब्द पहचान है।
  • भौतिकवादी: कथन 4 और 5, अजीत केसकंबलिन् के; शरीर के तत्वों और मृत्यु के बाद कुछ न बचने की बात पहचान है।

इस तरह बच्चे देखेंगे कि एक ही समय में जीवन और मृत्यु पर कितने अलग उत्तर दिए जा रहे थे।

यहीं रुकिए। नियतिवादी और भौतिकवादी शिक्षकों के बारे में हम उनकी अपनी किताबों से क्यों नहीं जानते?

नमूना उत्तर — क्योंकि उनकी अपनी किताबें बचीं नहीं:

  • आजीविक और लोकायत, दोनों परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं।
  • उनकी बातें दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से मिलती हैं, जैसे सुत्त पिटक का वह दृष्टांत जिसमें मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल की बातें बताते हैं।
  • नियतिवादी और भौतिकवादी नाम भी उन्हें “अक्सर” और “सामान्यत:” दिए जाते हैं।

इसलिए उनकी तस्वीर शायद अधूरी है, और उत्तर में यह सावधानी लिखनी चाहिए।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। आजीविक और लोकायत उलट जाते हैं: आजीविक (मक्खलि गोसाल) नियतिवादी हैं, लोकायत (अजीत केसकंबलिन्) भौतिकवादी। बॉक्स में दो भूलें आम हैं: बच्चे मान लेते हैं कि प्रवचन बुद्ध के जीवन काल में लिखे गए, और कि विनय पिटक में शिक्षाएँ हैं। विनय पिटक में संघ के नियम हैं, शिक्षाएँ सुत्त पिटक में और दर्शन अभिधम्म पिटक में।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 1) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 87) · किनारे के सवाल (पृष्ठ 84, 87) · फ़्लैशकार्ड 16–35; प्रश्न बैंक क3–क8, घ2, घ4, च1, छ1।

पृष्ठ 88–90 — महावीर का संदेश, बुद्ध और ज्ञान की खोज

कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश · इंटरैक्टिव: 4. बुद्ध और ज्ञान की खोज

किताब कहाँ से शुरू करती है। महावीर से पहले की परंपरा से (पृष्ठ 88)। जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, जिन्हें तीर्थंकर कहा जाता है।

महावीर वाले हिस्से की बातें:

  • जैन दर्शन की सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”। पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
  • जीवों के प्रति अहिंसा जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है।
  • जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है; मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या ज़रूरी है, इसलिए विहारों में रहना एक अनिवार्य नियम बन गया।
  • जैन साधु और साध्वी पाँच व्रत करते थे: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना।
  • स्रोत 4 (उत्तराध्ययन सूत्र) में महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझाती हैं।

बुद्ध वाले हिस्से की बातें:

  • बुद्ध के संदेश उपमहाद्वीप से मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।
  • उनके जीवन की जानकारी चरित लेखन से मिली; इनमें से कई ग्रंथ उनके जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए।
  • सिद्धार्थ शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे। शहर में उन्होंने एक वृद्ध, एक बीमार और एक लाश देखी, फिर एक शांत संन्यासी; उन्होंने भी संन्यास का रास्ता चुना।
  • अतिवादी तपस्या छोड़कर कई दिन ध्यान करने के बाद उन्हें ज्ञान मिला, और वे बुद्ध कहलाए।

हमारी ओर से — हम कैसे जानते हैं। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: महावीर, बुद्ध। प्रश्न एक ही रखिए: किताब को इनकी जानकारी किन स्रोतों से मिली? बच्चे पृष्ठ 88 से 90 पलटकर हर खाने में स्रोत और चित्र लिखें। ध्यान रहे, तुलना स्रोतों की है, शिक्षाओं को ऊँचा-नीचा बताने की नहीं।

नमूना उत्तर — खाने कुछ ऐसे भरेंगे:

  • महावीर: शिष्यों के संकलित उपदेश, अक्सर कहानियों के रूप में (स्रोत 4, उत्तराध्ययन सूत्र); प्राकृत, संस्कृत और तमिल में जैन साहित्य, जिसकी पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में बचीं (चित्र 4.6, चौदहवीं सदी की पांडुलिपि); तीर्थंकरों की मूर्तियाँ (चित्र 4.5, मथुरा, लगभग तीसरी शताब्दी ई.)।
  • बुद्ध: बौद्ध ग्रंथों का संपादन, अनुवाद और विश्लेषण; चरित लेखन, जिसके कई ग्रंथ लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए; मूर्तियाँ (चित्र 4.7, अमरावती, लगभग 200 ईसवी)।

दोनों खानों में ग्रंथ भी हैं और मूर्तियाँ भी; यही बात आगे स्तूप और मूर्तिकला के कालांशों में काम आएगी।

यहीं रुकिए। किताब संतचरित्रों को तथ्य के रूप में पूरी तरह सही न मानते हुए भी महत्वपूर्ण क्यों मानती है?

नमूना उत्तर — क्योंकि वे विश्वास की गवाही हैं:

  • संतचरित्र किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी है, जो उसकी उपलब्धियों का गुणगान करती है; ये बातें तथ्य के रूप में पूरी तरह सही नहीं होतीं।
  • फिर भी ये बताते हैं कि उस परंपरा के अनुयायी क्या विश्वास करते थे।

इसलिए इतिहासकार इन्हें छोड़ते नहीं, बल्कि सावधानी से पढ़ते हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि जैन धर्म महावीर से शुरू हुआ; किताब कहती है कि मूल सिद्धांत उनके जन्म से पहले प्रचलित थे और उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे। पृष्ठ 89 का चर्चा बॉक्स “बीसवीं सदी” की बात पूछता है; बच्चों से आज की बात भी जुड़वाइए। उसका नमूना उत्तर संदर्शिका में है।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 2) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 89, 90) · किनारे के सवाल (पृष्ठ 88, 89) · फ़्लैशकार्ड 36–46, और सेट 4 (कार्ड 47–65) के बुद्ध वाले कार्ड; प्रश्न बैंक क9, क10, क11, घ3, च2।

पृष्ठ 91–94 — बुद्ध की शिक्षाएँ और उनके अनुयायी

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. बुद्ध की शिक्षाएँ · इंटरैक्टिव: 6. बुद्ध के अनुयायी

किताब कहाँ से शुरू करती है। सुत्त पिटक की कहानियों से (पृष्ठ 91)। कुछ कहानियों में अलौकिक शक्तियाँ हैं, पर दूसरी दिखाती हैं कि बुद्ध ने लोगों को विवेक और तर्क से समझाया। मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ आई तो बुद्ध ने बच्चे को जीवित करने के बजाय उसे मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई।

बौद्ध दर्शन के मूल विचार:

  • विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है; विश्व आत्माविहीन है, क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं।
  • इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है।
  • घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुखों से मुक्ति पा सकता है।
  • समाज का निर्माण इनसानों ने किया, ईश्वर ने नहीं; इसलिए बुद्ध ने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी।

फिर किताब संघ पर आती है (पृष्ठ 92–94)।

  • बुद्ध ने भिक्षुओं की संस्था, संघ, बनाई। श्रमण दान पर निर्भर थे, इसलिए भिक्खु कहलाए।
  • शुरू में सिर्फ़ पुरुष संघ में आ सकते थे; आनंद के समझाने पर महिलाओं को अनुमति मिली, और बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी पहली भिक्खुनी बनीं।
  • स्रोत 6, थेरीगाथा, भिक्खुनियों के रचे छंदों का संग्रह है और सुत्त पिटक का हिस्सा है।

संघ में आने पर

संघ से पहलेराजा, धनवान और गृहपति
संघ से पहलेसामान्य जनकर्मकार, दास, शिल्पी
संघ मेंसभी बराबर माने जाते थेभिक्खु और भिक्खुनी बनने पर पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी
फ़ैसलेबातचीत से एकमत, न हो तो मतदानसंचालन गणों और संघों की परंपरा पर आधारित
NCERT, पृष्ठ 92

हमारी ओर से — सिगल को दी गई सलाह। पहले स्रोत 5 की बात बच्चों को बता दीजिए। सुत्त पिटक में बुद्ध अमीर गृहपति सिगल से कहते हैं कि मालिक नौकरों और कर्मचारियों की पाँच तरह से देखभाल करे:

  • क्षमता के अनुसार काम देकर;
  • भोजन और मज़दूरी देकर;
  • बीमारी में परिचर्या करके;
  • सुस्वादु भोजन बाँटकर;
  • समय-समय पर छुट्टी देकर।

अब पूछिए: इस सलाह में बुद्ध की कौन-सी बात दिखती है, जो किताब पृष्ठ 92 पर लिखती है?

नमूना उत्तर — समाज को इनसान बदल सकते हैं, यह बात:

  • बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया, ईश्वर ने नहीं।
  • इसलिए वे राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह देते थे; सिगल नाम के अमीर गृहपति को दी गई सलाह (स्रोत 5) ऐसी ही सलाह है।
  • किताब के अनुसार माना जाता था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश बदला जा सकता है।

यानी सलाह किसी पूजा की नहीं, रोज़ के व्यवहार की है।

यहीं रुकिए। बुद्ध के लिए निर्वाण का क्या अर्थ था, और उसका रास्ता किसे खोजना था?

नमूना उत्तर — निर्वाण का अर्थ था “अहं और इच्छा का खत्म हो जाना”:

  • बुद्ध ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति के लिए व्यक्ति-केंद्रित प्रयास और सम्यक कर्म की बात की।
  • अहं और इच्छा खत्म होने से गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था।
  • बौद्ध परंपरा के अनुसार शिष्यों के लिए उनका अंतिम निर्देश था: “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”

इसलिए रास्ता हर व्यक्ति को खुद खोजना था।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि संघ में शुरू से महिलाएँ आ सकती थीं, और कि महाप्रजापति गोतमी बुद्ध की माँ थीं; वे उपमाता थीं। स्रोत 7 में भोजन “दो या तीन कटोरे” भर ही लेना है, और नया कंबल कम से कम छह वर्ष चलाना है; संख्याएँ ठीक लिखवाइए। प्रश्न 4 में “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी; धनवती हर हाल में बुद्धमिता की बहन की बेटी हैं, और “पाठ किससे सीखे” के उत्तर में बल या बुद्धमिता, दोनों ठीक हैं।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 4, 5) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 92, 94) · किनारे के सवाल (पृष्ठ 91, 93, 94) · फ़्लैशकार्ड 47–77; प्रश्न बैंक क13, ङ2, ङ3, ङ4, छ2, छ4।

पृष्ठ 95–97 — स्तूप

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. स्तूप

किताब कहाँ से शुरू करती है। पवित्र स्थलों से (पृष्ठ 95)। बहुत प्राचीन काल से लोग ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानों या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों को पवित्र मानते थे। पृष्ठ 95 चैत्य के बारे में दो बातें कहता है: मुख्य पाठ के अनुसार ऐसे कुछ स्थलों की छोटी वेदी को कभी-कभी चैत्य कहा जाता था, और बॉक्स के अनुसार शवदाह के बाद अवशेष रखे गए टीले चैत्य के रूप में जाने गए। चैत्य के बारे में इससे आगे कुछ मत जोड़िए।

स्तूप वाले हिस्से की बातें:

  • लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान) धीरे-धीरे पवित्र स्थल बने। बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद असोक ने लुम्बिनी में एक स्तंभ बनवाया।
  • बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे अस्थियाँ या उनके इस्तेमाल किए सामान, जिन टीलों में गाड़े गए, वे स्तूप कहलाए। स्तूप बनाने की परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी, पर वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई।
  • अशोकावदान के अनुसार असोक ने अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया। ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप बन चुके थे।
  • बनावट: गोलार्ध टीला (अंड), उसके ऊपर हर्मिका, उससे निकलती यष्टि और उस पर अक्सर छत्री; चारों ओर वेदिका, और साँची-भरहुत में चारों दिशाओं के नक्काशीदार तोरणद्वार।
  • उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों।”

मानचित्र 1 (पृष्ठ 95) में 14 बौद्ध स्थल हैं। बच्चों से इनमें से वे चार स्थल ढूँढ़वाइए जो बुद्ध के जीवन से जुड़े हैं: लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर।

हमारी ओर से — दान किसने दिया। पहले बता दीजिए कि स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेख दान देने वालों के बारे में बताते हैं (पृष्ठ 96–97):

  • कुछ दान राजाओं ने दिए, जैसे सातवाहन वंश के राजा।
  • कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों ने दिए; साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना।
  • सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने अपना नाम लिखवाया, कभी गाँव या शहर का नाम, कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी।
  • भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी दान दिया।

अब बच्चे एक काल्पनिक दानात्मक अभिलेख की रूपरेखा बनाएँ: उसमें कौन-कौन-सी बातें होंगी? नाम, गाँव, पेशा कुछ भी अपनी ओर से गढ़ें, पर ढाँचा किताब का रहे।

नमूना उत्तर — ढाँचा कुछ ऐसा होगा:

  • दान देने वाले का नाम, और वह स्त्री है या पुरुष;
  • उसका गाँव या शहर;
  • उसका पेशा, अगर लिखवाया;
  • रिश्तेदारों के नाम, अगर लिखवाए;
  • क्या दान दिया, जैसे वेदिका या तोरणद्वार का कोई हिस्सा।

इससे बच्चे समझेंगे कि स्तूप अकेले राजाओं के नहीं, बहुत-से साधारण लोगों के दान से बने और सजे।

यहीं रुकिए। स्रोत 8 में आनंद के पूछने पर बुद्ध अपने अवशेषों के बारे में क्या कहते हैं?

नमूना उत्तर — पहले मना करते हैं, फिर स्तूप की बात कहते हैं:

  • पहले बुद्ध कहते हैं कि अवशेषों को विशेष आदर देने में मत उलझो।
  • विशेष आग्रह करने पर कहते हैं कि चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए।
  • जो वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा, सिर नवाएगा या हृदय में शांति लाएगा, उसके लिए वह स्तूप चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।

किताब के अनुसार स्तूपों में ऐसे अवशेष रहते थे जिन्हें पवित्र समझा जाता था, इसलिए पूरा स्तूप बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया (पृष्ठ 96)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे स्तूप के हिस्सों का क्रम उलट देते हैं, ख़ासकर हर्मिका और यष्टि; नीचे से ऊपर एक बार बोर्ड पर बनवाइए: अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री। दूसरी उलझन: बच्चे लिख देते हैं कि स्तूप की परंपरा बुद्ध से शुरू हुई; किताब कहती है कि यह परंपरा बुद्ध से पहले की रही होगी।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 9) · मुख्य शब्द · किनारे के सवाल (पृष्ठ 96, 97) · पृष्ठ 97 का चर्चा बॉक्स नीचे की गतिविधि में · फ़्लैशकार्ड 78–92; प्रश्न बैंक क15, घ1, घ8, ङ5, च3, छ3।

पृष्ठ 98–99 — स्तूपों की ‘खोज’: अमरावती और साँची

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. स्तूपों की ‘खोज’

किताब कहाँ से शुरू करती है। दो इतिहासों से (पृष्ठ 98): हर स्तूप का एक इतिहास यह है कि वह कैसे बना, और दूसरा यह कि उसकी खोज कैसे हुई।

अमरावती की कहानी:

  • 1796 में मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले; उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया।
  • कुछ वर्षों बाद कॉलिन मेकेंज़ी ने कई मूर्तियाँ पाईं और उनका चित्रांकन किया, पर उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं।
  • 1854 में गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर मद्रास ले गए; ये एलियट संगमरमर कहलाते हैं।
  • 1850 के दशक में अमरावती के पत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक पहुँचे, और कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बागों में मूर्तियाँ सजीं।

पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल अलग सोचते थे: “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।” वे चाहते थे कि संग्रहालयों में प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रहें और असली कृतियाँ खोज की जगह पर।

साँची की 1818 में खोज हुई; तब उसके तीन तोरणद्वार खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला अच्छी हालत में था। किताब के अनुसार शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब तक विद्वान यह नहीं समझ पाए थे कि अवशेष खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना ज़रूरी है। आज अमरावती का महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।”

हमारी ओर से — खोज और संरक्षण की एक रेखा। चार्ट पेपर पर एक लंबी रेखा खींचिए; बोर्ड साझा है, और यह रेखा कालांश 10 में फिर काम आएगी। पहले ये साल बोर्ड पर बता दीजिए: 1796, 1818, 1850 का दशक, 1854, 1880, 1914, 1989। बच्चे पृष्ठ 98–99 और कालरेखा 2 (पृष्ठ 110) से हर साल के आगे घटना लिखें और साँची वाली घटनाओं पर एक रंग, अमरावती वाली पर दूसरा रंग लगाएँ।

नमूना उत्तर — रेखा कुछ ऐसी बनेगी:

  • 1796 (अमरावती): एक स्थानीय राजा को स्तूप के अवशेष मिले।
  • 1818 (साँची): खोज; तीन तोरणद्वार खड़े, चौथा वहीं गिरा हुआ।
  • 1850 का दशक (अमरावती): उत्कीर्ण पत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन तक पहुँचे।
  • 1854 (दोनों): गुंटूर के कमिश्नर अमरावती की मूर्तियाँ मद्रास ले गए; इसी साल कनिंघम ने साँची पर भिलसा टोप्स लिखी।
  • 1880: एच.एच. कोल प्राचीन इमारतों के संग्रहाध्यक्ष बनाए गए।
  • 1914 (साँची): जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की पुस्तक द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची छपी।
  • 1989 (साँची): साँची को विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया।

रेखा पर अमरावती की आख़िरी घटना 1854 की है, जबकि साँची की घटनाएँ 1914 और 1989 तक जाती हैं: अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर दूर ले जाए गए, और साँची का स्तूप अपनी जगह पर बचा रहा।

यहीं रुकिए। एच.एच. कोल क्या चाहते थे, और उनकी बात कहाँ मानी गई?

नमूना उत्तर — वे असली मूर्तियाँ अपनी जगह रखना चाहते थे:

  • वे प्राचीन कलाकृतियों की लूट को “आत्मघाती और असमर्थनीय नीति” मानते थे।
  • उनके हिसाब से संग्रहालयों में प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ और असली कृतियाँ खोज की जगह पर रहें।
  • कोल अधिकारियों को अमरावती के लिए राज़ी नहीं कर पाए, पर साँची के लिए खोज की जगह पर संरक्षण की बात मान ली गई।

साँची क्यों बचा और अमरावती क्यों नष्ट हुआ, इस पर किताब का अनुमान है: “शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी”, जब विद्वान खोज की जगह पर ही संरक्षण का महत्त्व नहीं समझ पाए थे (पृष्ठ 99)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। 1854 में दो अलग घटनाएँ हैं, और बच्चे इन्हें मिला देते हैं। 1854 के अधिकारी के लिए किताब के ही शब्द लिखवाइए: “गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर”, और मूर्तियों का नाम एलियट संगमरमर। साँची क्यों बचा, इसके उत्तर में “शायद” बना रहे, क्योंकि किताब ख़ुद अनुमान के रूप में कहती है।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 3) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 99) · अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 93–108; प्रश्न बैंक क16, ङ1।

पृष्ठ 99–102 — मूर्तिकला

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 9. मूर्तिकला

किताब कहाँ से शुरू करती है। चारणचित्र से (पृष्ठ 99)। घुमक्कड़ कथावाचक कपड़े या कागज़ पर बने चित्र लेकर घूमते हैं और कहानी कहते हुए उन्हें दिखाते हैं; साँची की मूर्तियाँ भी पत्थर में कहानियाँ कहती हैं। चित्र 4.13 (उत्तरी तोरणद्वार का एक हिस्सा) पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं: एक दानी राजकुमार की कहानी, जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया।

मूर्तिकला वाले हिस्से की बातें:

  • कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई। किताब कहती है, “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।”
  • पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री (चित्र 4.17) साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से संस्कृत में वर्णित शालभंजिका पहचानी गई; लोक परंपरा में माना जाता था कि इसके छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे।
  • साँची में हाथी, घोड़े, बंदर और गाय-बैल के सुंदर उत्कीर्णन हैं; हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।
  • कमल और हाथियों के बीच की महिला (चित्र 4.19) को कुछ इतिहासकार बुद्ध की माँ माया से, दूसरे गजलक्ष्मी से जोड़ते हैं; यह भी संभव है कि उपासक उसे दोनों से जोड़ते थे।
  • कई स्तंभों के सर्प भी शायद उन लोक परंपराओं से आए, जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था।
  • जेम्स फर्गुसन ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना, क्योंकि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था।

पृष्ठ 102 का बॉक्स चित्रकारी का है: अजंता (महाराष्ट्र) की गुफाओं के चित्र जातकों की कथाएँ दिखाते हैं, और कलाकारों ने त्रिविम रूप के लिए आभाभेद तकनीक का प्रयोग किया।

हमारी ओर से — प्रतीक मिलाइए। बोर्ड पर बाईं ओर चार प्रतीक लिखिए और दाईं ओर उनके अर्थ, उलटे क्रम में। पहले बता दीजिए कि किताब पृष्ठ 100 पर ये चार प्रतीक बताती है और तीन चित्रों में दिखाती है; चित्र 4.14 में बोधि वृक्ष और रिक्त स्थान, दोनों हैं। बच्चे किताब में चित्र 4.14, 4.15 और 4.16 देखकर रेखा खींचकर मिलाएँ।

  • प्रतीक: रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र, पेड़।
  • अर्थ: सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश; बुद्ध के ध्यान की दशा; बुद्ध के जीवन की एक घटना; महापरिनिब्बान।

नमूना उत्तर — सही जोड़े ये हैं:

  • रिक्त स्थान: बुद्ध के ध्यान की दशा (चित्र 4.14)।
  • स्तूप: महापरिनिब्बान (चित्र 4.15)।
  • चक्र: सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश (चित्र 4.16)।
  • पेड़: सिर्फ़ पेड़ नहीं, बुद्ध के जीवन की एक घटना (चित्र 4.14 का बोधि वृक्ष)।

जोड़े बनाने के बाद बच्चों से किताब की पंक्ति दोहरवाइए कि ऐसी मूर्तिकला अक्षरश: नहीं समझी जा सकती।

यहीं रुकिए। पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री की मूर्ति पर विद्वान असमंजस में क्यों थे, और उलझन कैसे सुलझी?

नमूना उत्तर — उलझन साहित्य पढ़कर सुलझी:

  • इस मूर्ति का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नहीं दिखता था, इसलिए विद्वान पहले असमंजस में थे।
  • साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से पता चला कि यह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका है, जिसके छूने से वृक्षों में फूल खिलने और फल लगने की बात लोक परंपरा में मानी जाती थी।
  • लगता है यह शुभ प्रतीक माना जाता था, इसलिए स्तूप के अलंकरण में आई।

किताब इससे यह निष्कर्ष निकालती है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि प्रारंभिक मूर्तियों में बुद्ध हमेशा मानव रूप में हैं। चित्र 4.13 को बच्चे बस गाँव का दृश्य कहकर छोड़ देते हैं; उन्हें वेसान्तर जातक तक ले जाइए। फर्गुसन वाली बात को भूल नहीं, सबक की तरह पढ़ाइए: ग्रंथ जाने बिना मूर्ति का अर्थ ग़लत निकल सकता है।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 6, 7) · बच्चे कहाँ भटकते हैं · प्रश्न 7 की गतिविधि नीचे · फ़्लैशकार्ड 109–123; प्रश्न बैंक क17, घ7, च4।

पृष्ठ 103–106 — नयी धार्मिक परंपराएँ

कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 10. नयी धार्मिक परंपराएँ

किताब कहाँ से शुरू करती है। बौद्ध मत में आए बदलाव से (पृष्ठ 103): “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) की एक पंक्ति महायान, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराओं को साथ रखकर “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे” लिखती है। ये दो अलग कथन हैं; दोनों अपनी-अपनी जगह से लिखवाइए।

इस हिस्से की बातें:

  • महायान: पहले निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को महत्त्व था और बुद्ध को एक मनुष्य समझा जाता था। धीरे-धीरे मुक्तिदाता की कल्पना उभरी; बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए, जो पुण्य से निब्बान पाने के बजाय दूसरों की सहायता करते थे। बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बनी।
  • नाम: नयी परंपरा महायान कहलाई; इसे अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा। पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को थेरवादी कहते थे।
  • वैष्णव और शैव: वैष्णव परंपरा में विष्णु और शैव परंपरा में शिव सबसे महत्वपूर्ण देवता हैं। भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना गया, जिसे भक्ति कहते हैं। वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना है।
  • मूर्तियाँ: देवताओं की पहचान शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों और बैठने की शैली से होती थी; शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में, और कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया।
  • मंदिर: शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे, गर्भगृह, के रूप में थे, जिसमें एक दरवाज़ा होता था; धीरे-धीरे ऊपर शिखर बनने लगा (चित्र 4.25, देवगढ़, पाँचवीं सदी)। शुरू के कुछ मंदिर पहाड़ियाँ काटकर कृत्रिम गुफाओं के रूप में बने, और यह परंपरा आठवीं सदी के कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा तक पहुँची (पृष्ठ 107)।

हमारी ओर से — कौन सुन सकता था। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: वैदिक छंद, पुराण। पहले किताब की ये बातें बता दीजिए:

  • ऋग्वेद के छंद वैदिक संस्कृत में रचे गए थे और पुरोहित परिवारों के लोगों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे (पृष्ठ 84)।
  • देवताओं की कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में मिलती हैं (पृष्ठ 104–105)।
  • पुराण सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में लिखे गए और ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, जिन्हें कोई भी सुन सकता था।
  • महिलाएँ और शूद्र, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराण सुन सकते थे।

बच्चे दोनों खानों में तीन बातें भरें: किस भाषा में, कैसे आगे बढ़े, कौन सुन सकता था।

नमूना उत्तर — खाने कुछ ऐसे भरेंगे:

  • भाषा: वैदिक छंद वैदिक संस्कृत में; पुराण सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में।
  • कैसे आगे बढ़े: वैदिक छंद पुरोहित परिवारों में मौखिक रूप से सिखाए गए; पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े गए।
  • कौन सुन सकता था: वैदिक साहित्य महिलाएँ और शूद्र पढ़-सुन नहीं सकते थे; पुराण वे सुन सकते थे।

किताब यह भी बताती है कि पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से बनीं, जैसे मथुरा इलाके के देवता वासुदेव-कृष्ण की पूजा कई शताब्दियों में दूसरे इलाकों में फैली।

यहीं रुकिए। महायान बौद्ध मत में पहले की तुलना में क्या बदला?

नमूना उत्तर — तीन बातें बदलीं:

  • पहले निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को महत्त्व था; अब मुक्तिदाता की कल्पना उभरी।
  • बोधिसत्त को ऐसे करुणामय जीव माना गया जो दूसरों की सहायता करते थे।
  • बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बनी।

समय के लिए पृष्ठ 103 की पंक्ति लिखिए; कालरेखा का प्रश्न हो तो पृष्ठ 110 की पंक्ति।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि हीनयान नाम पुरानी परंपरा ने ख़ुद रखा; यह नाम महायान अपनाने वालों ने दिया। दूसरी भूल गुफाओं की है: “सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।” (पृष्ठ 107), बौद्ध भिक्खुओं के लिए नहीं। महायान के दो कथनों को मिलाकर एक साल मत बनने दीजिए।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 8) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 103) · किनारे के सवाल (पृष्ठ 104, 105, 106) · फ़्लैशकार्ड 124–138; प्रश्न बैंक क12, क14, क18, क19, क20, घ5, घ6, च5, च6।

पृष्ठ 107–109 — क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 11. क्या हम सब कुछ देख–समझ सकते हैं?

किताब कहाँ से शुरू करती है। जो बचा है, उससे (पृष्ठ 107)। अतीत की दृश्य परंपराएँ ईंट और पत्थर के स्थापत्य, मूर्तिकला और चित्रकला के रूप में सामने आई हैं; बहुत कुछ नष्ट हो गया, पर जो बचा है वह कलाकारों, मूर्तिकारों, राजगीरों और वास्तुकारों की दृष्टि से परिचित कराता है। किताब पूछती है: क्या हम उनका संदेश बिना दुविधा के समझ सकते हैं?

इस हिस्से की बातें:

  • उन्नीसवीं सदी में यूरोप के विद्वानों को कई सिरों, कई हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूप मिलाकर बनी मूर्तियाँ विकृत लगती थीं।
  • समझने के लिए उन्होंने इनकी तुलना प्राचीन यूनान की कला से की, जिससे वे परिचित थे, और प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को उससे निम्न माना।
  • बुद्ध और बोधिसत्त की जो मूर्तियाँ ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिलीं, वे यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं, इसलिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ माना गया। इन इलाकों में “ईसा से दो सौ साल पहले” भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे।
  • बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार इमारतों, मूर्तियों या चित्रों के रूप में स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए, पर संभव है कि धार्मिक गतिविधियों और दार्शनिक मान्यताओं की उनकी सक्रिय परंपरा रही हो।

अध्याय का समापन किताब इस पंक्ति से करती है: अध्याय के शानदार उदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”

महाबलीपुरम की चट्टान: एक चित्र, दो पढ़त

पहली पढ़तगंगा नदी का स्वर्ग से अवतरणबीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है; कथा महाकाव्यों और पुराणों में है
दूसरी पढ़तअर्जुन की तपस्यामहाभारत में, दिव्यास्त्र पाने के लिए; मूर्तियों के बीच केंद्र में एक साधु
NCERT, पृष्ठ 108–109

हमारी ओर से — दो पढ़त, एक चित्र। पहले बता दीजिए कि महाबलीपुरम (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान (चित्र 4.30) पर किसी कथा का सजीव चित्रण है, और कला इतिहासकारों ने पुराणों में बहुत खोजबीन की, फिर भी मतभेद हैं। कक्षा को दो दलों में बाँटिए। दोनों किताब में चित्र 4.30 देखें; एक दल पहली पढ़त के सुराग ढूँढ़े, दूसरा दूसरी पढ़त के। सुराग किताब के शब्दों से ही मिलाए जाएँ।

नमूना उत्तर — दोनों दलों के सुराग किताब में हैं:

  • पहला दल: चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार, जो शायद नदी दिखाती है; गंगा के अवतरण की कथा महाकाव्यों और पुराणों में है।
  • दूसरा दल: मूर्तियों के बीच केंद्र में एक साधु, जिसे ये विद्वान महत्त्व देते हैं; अर्जुन की तपस्या की कथा महाभारत में है।

दोनों दलों के पास सुराग हैं, इसलिए किताब कोई फ़ैसला नहीं सुनाती; बच्चे भी यही सीखें कि लिखित और दृश्य का मेल हमेशा सीधा नहीं होता।

यहीं रुकिए। उन्नीसवीं सदी के यूरोप के विद्वान उत्तर-पश्चिम से मिली बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियों को सर्वश्रेष्ठ क्यों मानते थे?

नमूना उत्तर — क्योंकि वे उन्हें अपनी परिचित कला जैसी लगीं:

  • ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं और ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे नगरों में मिली थीं, जहाँ भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे।
  • वे यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं, और विद्वान प्राचीन यूनान की कला को पैमाना मानते थे।

किताब इसे परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का तरीका कहती है, जो हम सब अक्सर करते हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि जिस परंपरा की इमारत या मूर्ति नहीं बची, वह थी ही नहीं; किताब कहती है कि कई लोगों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत न लगी हो, फिर भी उनकी परंपरा सक्रिय रही हो। दूसरी उलझन: महाबलीपुरम के प्रश्न में बच्चे एक पढ़त को सही घोषित कर देते हैं; किताब दोनों मत रखती है।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 6) · 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 12) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 109) · फ़्लैशकार्ड 139–149; प्रश्न बैंक ङ6।

पृष्ठ 110 और 113 — दोनों कालरेखाएँ और मानचित्र कार्य

कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

किताब कहाँ से शुरू करती है। पृष्ठ 110 पर दो कालरेखाएँ हैं। कालरेखा 1 महत्वपूर्ण धार्मिक बदलावों की है, और उसके हर साल के आगे “लगभग” छपा है:

  • लगभग 1500-1000 ई. पू.: प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ।
  • लगभग 1000-500 ई. पू.: उत्तर वैदिक परंपराएँ।
  • लगभग छठी सदी ई. पू.: प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म।
  • लगभग तीसरी सदी ई. पू.: आरंभिक स्तूप।
  • लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे: महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ।
  • लगभग तीसरी सदी ईसवी: सबसे पुराने मंदिर।

कालरेखा 2 प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण के चरणों की है, 1814 में इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना से 1989 में साँची के विश्व कला दाय स्थान घोषित होने तक। उसकी पूरी तालिका संदर्शिका में है।

हमारी ओर से — दीवार की दूसरी रेखा। कालांश 6 की चार्ट-पेपर रेखा के ऊपर एक दूसरी रेखा बनाइए और उस पर कालरेखा 1 उतरवाइए। फिर बच्चे अध्याय से ये चार बातें सही जगह जोड़ें: ऋग्वेद का संकलन, असोक के आदेश से बनी सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ, भरहुत, साँची और सारनाथ के स्तूप, और कैलाशनाथ मंदिर।

नमूना उत्तर — बातें इन जगहों पर बैठेंगी:

  • ऋग्वेद का संकलन: 1500 से 1000 ईसा पूर्व, प्रारंभिक वैदिक परंपराओं वाले खाने में (पृष्ठ 84)।
  • सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ: ईसा पूर्व तीसरी सदी (पृष्ठ 107), आरंभिक स्तूपों वाले खाने के पास।
  • भरहुत, साँची और सारनाथ के स्तूप: ईसा पूर्व दूसरी सदी तक बन चुके थे (पृष्ठ 96)।
  • कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा: आठवीं सदी (पृष्ठ 107), सबसे पुराने मंदिरों से बहुत बाद।

नीचे की रेखा खोज और संरक्षण की है और ऊपर की धार्मिक बदलावों की; बच्चों को दोनों का फ़र्क दिख जाना चाहिए।

मानचित्र कार्य के लिए प्रश्न 10 (पृष्ठ 113) यहीं करवाइए। किताब बुद्ध के संदेश का रास्ता बताती है: उपमहाद्वीप से मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक (पृष्ठ 89)। बच्चे सिर्फ़ यही इलाके और रास्ते दिखाएँ।

यहीं रुकिए। कालरेखा 1 की महायान वाली पंक्ति और पृष्ठ 103 की पंक्ति में क्या फ़र्क है?

नमूना उत्तर — दोनों अलग बातें कहती हैं:

  • पृष्ठ 103: “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।”
  • कालरेखा 1 (पृष्ठ 110): महायान, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ एक साथ, “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे”।

इसलिए प्रश्न जिस हिस्से से हो, उत्तर में उसी हिस्से की पंक्ति लिखिए, और दोनों को मिलाकर नया साल मत बनाइए।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे कालरेखा 1 लिखते समय “लगभग” छोड़ देते हैं; उसे हर पंक्ति में रखवाइए। कालरेखा 2 में 1854 की भिलसा टोप्स और पृष्ठ 98 की 1854 वाली अमरावती की घटना अलग-अलग हैं।

इसी हिस्से में। अध्याय के आँकड़े · 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 10) · फ़्लैशकार्ड 139–149 के कालरेखा वाले कार्ड; प्रश्न बैंक क1।

कक्षा की गतिविधियाँ

पृष्ठ 97 की गतिविधि — मापचित्र और छायाचित्र

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. स्तूप

किताब पृष्ठ 97 पर पूछती है कि साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10 क) और छायाचित्र (चित्र 4.3) में क्या समानताएँ और फ़र्क हैं। पहले ये बातें बता दीजिए:

  • चित्र 4.10 (क) महास्तूप की योजना है, यानी इमारत का समतलीय परिप्रेक्ष्य; (ख) उसकी ऊँचाई है, यानी ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य।
  • चित्र 4.3 साँची का स्तूप समूह है, जिसमें एक विशाल गोलार्ध ढाँचा और कई दूसरी इमारतें हैं।
  • स्तूप के हिस्से: अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका और तोरणद्वार।

हमारी ओर से। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: दोनों में, सिर्फ़ मापचित्र में, सिर्फ़ छायाचित्र में। बच्चे जोड़ियों में किताब के दोनों चित्र साथ खोलकर स्तूप के हर हिस्से को सही खाने में रखें। प्रोजेक्टर न हो तो चित्र किताब में ही देखे जाएँ।

नमूना उत्तर — दोनों एक ही महास्तूप दिखाते हैं:

  • दोनों में: गोल टीला, उसके चारों ओर की वेदिका, तोरणद्वार और सीढ़ियाँ।
  • सिर्फ़ मापचित्र में: ऊपर से देखी गई योजना, जिसमें चारों दिशाओं के चारों तोरणद्वार एक साथ दिखते हैं; ऊँचाई नहीं।
  • सिर्फ़ छायाचित्र में: एक ओर से देखा गया असली स्तूप, गुंबद की ऊँचाई और ऊपर का ढाँचा; चारों द्वार एक साथ नहीं।

योजना से बनावट समझ आती है, छायाचित्र से इमारत का असली रूप। यही उत्तर संदर्शिका के चर्चा कीजिए वाले हिस्से में है।

पृष्ठ 112 की गतिविधि — दो परिदृश्य

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 9. मूर्तिकला

किताब प्रश्न 7 (पृष्ठ 112) में चित्र 4.32 और 4.33 के बारे में पूछती है कि वे ग्रामीण परिदृश्य हैं या शहरी। पहले बता दीजिए कि क्या-क्या देखना है:

  • वास्तुकला: झोंपड़ी है या इमारत, कितनी मंज़िल, खंभे, रेलिंग, खिड़कियाँ।
  • पेड़-पौधे: पेड़, पानी के पौधे।
  • जानवर: मवेशी, हाथी।
  • लोग: कितने, और क्या कर रहे हैं।

हमारी ओर से। बोर्ड पर चार पंक्तियों और दो स्तंभों की तालिका बनाइए: पंक्तियाँ वास्तुकला, पेड़-पौधे, जानवर, लोग; स्तंभ चित्र 4.32 और चित्र 4.33। बच्चे पहले तालिका भरें, उसके बाद ही ग्रामीण या शहरी लिखें। फिर चित्र 4.13 याद दिलाइए, जो पहली नज़र में ग्रामीण दृश्य लगता है।

नमूना उत्तर — चित्र 4.32 ग्रामीण परिदृश्य लगता है और चित्र 4.33 शहरी:

  • चित्र 4.32 में झोंपड़ियाँ, पेड़, पानी के पौधे और जानवर हैं।
  • चित्र 4.33 में खंभों वाली दो मंज़िला सजी हुई इमारत है, जिसमें बहुत-से लोग बैठे हैं।

पूरा बिंदुवार उत्तर संदर्शिका के 6 से 9 तक के प्रश्न वाले हिस्से में है; दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों, इसलिए यहाँ उसका सार भर है।

पृष्ठ 111–113 — प्रश्नावली

कालांश 11 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:

अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।