कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 170 से 195
यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।
किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।
सामग्री के पन्ने
किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना
पृष्ठ 170–171 — 1. हम्पी की खोज
कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. हम्पी की खोज
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक उजड़े शहर से। विजयनगर साम्राज्य चौदहवीं शताब्दी में स्थापित हुआ और अपने चरमोत्कर्ष पर उत्तर में कृष्णा नदी से प्रायद्वीप के सुदूर दक्षिण तक फैला था (पृष्ठ 170)। फिर किताब बताती है कि यह शहर हमें कैसे दोबारा मिला:
- उजड़ना: 1565 में राजधानी पर आक्रमण हुआ और उसे लूटा गया, और बाद में वह उजड़ गई; सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों तक यह पूरी तरह नष्ट हो गई।
- याद: फिर भी यह कृष्णा–तुंगभद्रा दोआब के लोगों की स्मृतियों में हम्पी के नाम से जीवित रहा; यह नाम स्थानीय मातृदेवी पम्पादेवी के नाम से बना।
- 1800 ई.: ईस्ट इण्डिया कंपनी में कार्यरत अभियंता और पुराविद कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने हम्पी के भग्नावशेष प्रकाश में लाए और इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया।
- 1836 से और 1856 ई. से: अभिलेखकर्ताओं ने कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए; छायाचित्रकारों ने भवनों के चित्र संकलित किए।
- चित्र 7.1: शहर को घेरने वाली पत्थर की दीवार का एक भाग।
किताब के अनुसार इतिहासकारों ने इन स्रोतों का विदेशी यात्रियों के वृत्तांतों और तेलुगु, कन्नड़, तमिल और संस्कृत में लिखे साहित्य से मिलान करके शहर और साम्राज्य का इतिहास जोड़ा।
हमारी ओर से — चार पर्चियाँ। चार बच्चों को एक-एक पर्ची दीजिए और उनसे पढ़वाइए:
- 1विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहित, जिनकी स्मृतियों पर मैकेन्ज़ी की शुरुआती जानकारी आधारित थी;
- 2मैकेन्ज़ी का 1800 का सर्वेक्षण मानचित्र;
- 31836 से इकट्ठे हुए कई दर्जन अभिलेख;
- 41856 ई. से संकलित भवनों के चित्र। अब पूछिए: इनमें से कौन-सी जानकारी काग़ज़ या पत्थर पर नहीं थी, लोगों की याद में थी?
नमूना उत्तर — पहली पर्ची:
- याद से: (1) पुरोहितों की स्मृतियाँ, यानी मौखिक जानकारी।
- लिखी या बनाई हुई: (2) मानचित्र, (3) अभिलेख और (4) छाया चित्र।
किताब मौखिक परंपराओं को भी उन स्रोतों में गिनती है जिनसे विद्वानों ने इस साम्राज्य को फिर से खोजा (पृष्ठ 170)।
यहीं रुकिए। स्रोत 1 के अनुसार मैकेन्ज़ी स्थानीय इतिहास और परंपराएँ क्यों इकट्ठी कर रहे थे?
नमूना उत्तर — किताब दो उद्देश्य बताती है, एक ही वाक्य में:
- अतीत: “भारत के अतीत को बेहतर ढंग से समझने” के लिए।
- शासन: “उपनिवेश के प्रशासन को आसान बनाने के लिए”।
बच्चे यह भी देखें कि मैकेन्ज़ी 1815 में भारत के पहले सर्वेयर जनरल बने और 1821 में अपनी मृत्यु तक इस पद पर रहे; उनके अनुसार “ब्रिटिश प्रशासन के सुप्रभाव में आने से पहले दक्षिण भारत खराब प्रबंधन की दुर्गति से लंबे समय तक जूझता रहा।” (पृष्ठ 171)
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि 1565 में शहर ख़त्म हो गया। किताब के अनुसार 1565 में शहर लूटा गया, कुछ ही वर्षों के भीतर वह पूरी तरह उजड़ गया (पृष्ठ 173), और सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियों तक पूरी तरह नष्ट हो गया (पृष्ठ 170)। दूसरी भूल: हम्पी की सारी जानकारी को मैकेन्ज़ी की अपनी खोज मान लेना; उनकी शुरुआती जानकारी पुरोहितों की स्मृतियों पर टिकी थी। चित्र 7.2 में भी उनके साथ उनके सहायक दिखते हैं: एक जैन पंडित और तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया।
इसी हिस्से में। प्रश्न 1 के मुख्य बिंदु · अध्याय का तर्क · फ़्लैशकार्ड 1–13; प्रश्न बैंक क2, क3, ख1, ख2, च2।
पृष्ठ 171–172 — 2.1 शासक और व्यापारी
कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. राय, नायक तथा सुलतान
किताब कहाँ से शुरू करती है। स्थापना से: “परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार” विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 में दो भाइयों, हरिहर और बुक्का ने की (पृष्ठ 171)। फिर भाग 2 और 2.1:
- लोग: साम्राज्य की सीमाएँ बदलती रहती थीं, और इसमें अलग-अलग भाषाएँ बोलने वाले और अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग रहते थे।
- होड़: विजयनगर के शासकों की होड़ दक्कन के सुलतानों और उड़ीसा के गजपति शासकों से थी, उर्वर नदी घाटियों और लाभकारी विदेशी व्यापार से मिलने वाली संपदा के लिए।
- सीखना: इन राज्यों से संपर्क में विचारों का आदान-प्रदान हुआ, “विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में”।
- पुरानी परंपराएँ: चोल और होयसाल शासकों ने तंजावुर के बृहदेश्वर मंदिर (चित्र 7.3) और बेलूर के चन्नकेशव मंदिर जैसे मंदिरों को संरक्षण दिया था; विजयनगर के शासक, जो अपने को राय कहते थे, इन परंपराओं को “नयी ऊँचाइयों तक पहुँचाया”।
- घोड़े और व्यापार: युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित थी, इसलिए अरब और मध्य एशिया से घोड़े आते थे; स्थानीय व्यापारी कुदिरई चेट्टी भी इस व्यापार में थे। 1498 ई. से पुर्तगाली पश्चिमी तट पर आने लगे। विजयनगर मसालों, वस्त्रों और रत्नों के बाज़ारों के लिए जाना जाता था।
हमारी ओर से — तीन स्वामी। बोर्ड पर पृष्ठ 172 के बॉक्स के तीन नाम लिखिए: गजपति, यानी हाथियों का स्वामी (पंद्रहवीं शताब्दी में उड़ीसा का एक शक्तिशाली वंश); अश्वपति, यानी घोड़ों के स्वामी (विजयनगर की लोक परंपराओं में दक्कन के सुल्तान); नरपति, यानी लोगों के स्वामी (राय)। अब पूछिए: इन नामों से उस समय की राजनीति के बारे में क्या पता चलता है?
नमूना उत्तर — हर नाम ताक़त के किसी एक आधार से जुड़ा है:
- हाथी और घोड़े: किताब कहती है कि इस काल में युद्धकला प्रभावशाली अश्वसेना पर आधारित होती थी, इसलिए घोड़ों का आयात बहुत महत्त्वपूर्ण था।
- लोग: विजयनगर की लोक प्रचलित परंपराओं में रायों को नरपति, यानी लोगों के स्वामी, कहा गया।
ये नाम विजयनगर की अपनी लोक परंपराओं के हैं, इसलिए ये बताते हैं कि विजयनगर के लोग अपने पड़ोसियों को कैसे देखते थे (पृष्ठ 172)।
यहीं रुकिए। विजयनगर के शासकों के लिए व्यापार केवल पैसे का मामला क्यों नहीं था?
नमूना उत्तर — किताब व्यापार के तीन काम गिनाती है:
- प्रतिष्ठा: व्यापार को प्रतिष्ठा का मानक माना जाता था।
- माँग: समृद्ध जनता मँहगी विदेशी वस्तुएँ, विशेषकर रत्न और आभूषण, चाहती थी।
- राजस्व: व्यापार से मिलने वाला राजस्व राज्य की समृद्धि बढ़ाता था।
इसी कारण अगले कालांश के स्रोत 2 में कृष्णदेव राय व्यापारियों को साथ रखने की सलाह देते हैं (पृष्ठ 172–173)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। “विजयनगर साम्राज्य” को बच्चे उस समय का नाम मान लेते हैं; पृष्ठ 171 का बॉक्स कहता है कि समकालीन लोगों ने उसे कर्नाटक साम्राज्यमु कहा। 1336 को पक्की तिथि मत लिखवाइए: काल-रेखा 1 में यह “1336?” छपी है (पृष्ठ 193)।
इसी हिस्से में। प्रश्न 8 के मुख्य बिंदु · मुख्य शब्द · फ़्लैशकार्ड 14–26; प्रश्न बैंक क1, क4, क5, क6, ख3, ख4, ख5, घ1, घ2।
पृष्ठ 173–175 — 2.2 राज्य का चरमोत्कर्ष तथा पतन; 2.3 राय तथा नायक
कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. राय, नायक तथा सुलतान
किताब कहाँ से शुरू करती है। सत्ता के दावेदारों से: शासक वंश के सदस्य और सैनिक कमांडर, दोनों (पृष्ठ 173)। फिर:
- राजवंश: संगम वंश का नियंत्रण 1485 तक रहा; सैनिक कमांडर सुलुवों ने उसे उखाड़ फेंका और 1503 तक शासन किया; फिर तुलुव आए; 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में चला गया।
- कृष्णदेव राय (तुलुव वंश, 1509–29): “विस्तार और दृढ़ीकरण” का शासन; 1512 में रायचूर दोआब, 1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन, 1520 में बीजापुर के सुल्तान की हार। राज्य “अतुलनीय शांति और समृद्धि की स्थितियों में फला–फूला”। उन्होंने अपनी माँ के नाम पर नगलपुरम् नामक उपनगर बसाया।
- 1565: प्रधानमंत्री रामराय के नेतृत्व में विजयनगर की सेना राक्षसी–तांगड़ी (तालीकोटा) के युद्ध में बीजापुर, अहमदनगर और गोलकुण्डा की संयुक्त सेनाओं से हारी; शहर लूटा गया। अराविदु वंश ने पेनुकोण्डा से और बाद में चन्द्रगिरी (तिरुपति के समीप) से शासन किया।
- नायक (पृष्ठ 175): सेना प्रमुख, जो आम तौर पर क़िलों पर नियंत्रण रखते थे और तेलुगु या कन्नड़ बोलते थे। “अमर–नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी।”
हमारी ओर से — राजा की सलाह, राजा के शब्दों में। पहले बताइए कि कृष्णदेव राय ने शासनकला पर तेलुगु में अमुक्तमल्यद लिखी (स्रोत 2)। फिर उसकी दो पंक्तियाँ बोर्ड पर लिखिए: “एक राजा को अपने बन्दरगाहों को सुधारना चाहिए और वाणिज्य को इस प्रकार प्रोत्साहित करना चाहिए कि घोड़ों, हाथियों, रत्नों, चंदन, मोती तथा अन्य वस्तुओं का खुले तौर पर आयात किया जा सके…” और “ऐसा करने पर ये वस्तुएँ कभी भी तुम्हारे दुश्मनों तक नहीं पहुँचेंगी।” अब पूछिए: राजा व्यापारियों को ख़ुश क्यों रखना चाहता है?
नमूना उत्तर — दो कारण, दोनों स्रोत में ही हैं:
- आयात: घोड़े, हाथी, रत्न, चंदन और मोती खुले तौर पर राज्य में आते रहें।
- दुश्मन: यही वस्तुएँ, ख़ासकर हाथी और अच्छे घोड़े, दुश्मनों तक न पहुँचें।
पिछले कालांश की बात यहाँ जोड़िए: युद्धकला अश्वसेना पर टिकी थी, इसलिए घोड़ों का व्यापार राज्य की सुरक्षा का मामला था (पृष्ठ 172–173)।
विजयनगर और दक्कन की सल्तनतें: टकराव भी, सहयोग भी
यहीं रुकिए। 1565 की हार को किताब किस बात से जोड़ती है?
नमूना उत्तर — रामराय की नीति से:
- किताब के शब्द: “यह रामराय की जोखिम भरी नीति थी”।
- नीति क्या थी: उन्होंने एक सुल्तान को दूसरे के विरुद्ध खड़ा करने की कोशिश की।
- नतीजा: सुल्तानों ने मिलकर उन्हें निर्णायक रूप से हराया।
किताब यह भी कहती है कि दोनों के संबंध “धार्मिक भिन्नताएँ होने पर भी हमेशा या अपरिहार्य रूप से शत्रुतापूर्ण नहीं रहते थे।” (पृष्ठ 174)
बच्चे यहाँ अटकते हैं। रामराय राजा नहीं, प्रधानमंत्री थे। सुलुव संगम वंश की शाखा नहीं, सैनिक कमांडर थे। इक्ता वाली बात किताब “ऐसा प्रतीत होता है” के साथ कहती है; उत्तर में भी यही रहे। मानचित्र 1 (पृष्ठ 174) पर इक्केरी किताब में “केरी” छपा है; पृष्ठ 175 के पाठ में इक्केरी है। अमर शब्द संस्कृत समर (लड़ाई या युद्ध) से बना माना जाता है (पृष्ठ 175 का बॉक्स)।
इसी हिस्से में। प्रश्न 3 के मुख्य बिंदु · चर्चा कीजिए: पृष्ठ 175 का बॉक्स · अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 27–56; प्रश्न बैंक क7–क13, ख6, ग1, ग2, घ3, च1, छ1।
पृष्ठ 176–177 — 3. विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश; 3.1 जल–संपदा
कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश
किताब कहाँ से शुरू करती है। एक यात्री की आँखों से। स्रोत 3 में डोमिंगो पेस कहता है: “वहाँ से मैंने जो देखा वह मुझे रोम जितना विशाल प्रतीत हुआ, और देखने में अत्यंत सुन्दर” (पृष्ठ 176)। फिर:
- चित्र 7.4: विजयनगर का नक्शा; उस पर तुंगभद्रा, अनेगंदी, हम्पी, “पवित्र केंद्र”, “शाही केंद्र” और “केंद्रीय भाग” लिखे हैं।
- पानी: भौगोलिक स्थिति की सबसे चौंकाने वाली बात है “तुंगभद्रा नदी द्वारा यहाँ निर्मित एक प्राकृतिक कुण्ड”; विजयनगर “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” में था (पृष्ठ 177)।
- स्रोत 4: पेस राजा के बनवाए एक जलाशय का वर्णन करता है: पानी “9 मील (लगभग 15 किमी) से भी अधिक की दूरी से पाइपों से” आता था, और वहाँ “पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी थे, चीटियों की तरह…”।
हमारी ओर से — यात्री कहाँ से आए। पृष्ठ 176 का बॉक्स चार्ट पेपर पर उतारिए। पंद्रहवीं शताब्दी: निकोलो दे कॉन्ती (इतालवी व्यापारी), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस के राजा का दूत), अफ़ानासी निकितिन (रूस का एक व्यापारी)। सोलहवीं शताब्दी: दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस और पुर्तगाल का फर्नाओ नूनिज़। अब पूछिए: पंद्रहवीं शताब्दी के तीन यात्रियों में कौन व्यापारी थे, और कौन किसी राजा का भेजा हुआ?
नमूना उत्तर — दो व्यापारी, एक दूत:
- व्यापारी: निकोलो दे कॉन्ती (इतालवी) और अफ़ानासी निकितिन (रूस से)।
- दूत: अब्दुर रज़्ज़ाक, फ़ारस के राजा का दूत।
यही चार्ट प्रश्न 10 के मानचित्र कार्य में काम आएगा, जिसमें इटली, पुर्तगाल, ईरान और रूस अंकित करने हैं (पृष्ठ 195)।
विजयनगर का पानी: नदी से खेतों और महलों तक
यहीं रुकिए। इतने बड़े जलाशय बनवाने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
नमूना उत्तर — किताब इसे शहर की जगह से जोड़ती है:
- सूखा इलाक़ा: विजयनगर “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” में था।
- इसलिए: पानी इकट्ठा करने और उसे शहर तक ले जाने के व्यापक प्रबंध ज़रूरी थे।
स्रोत 4 का जलाशय दो पहाड़ियों के मुहाने पर बना था, ताकि दोनों ओर का पानी वहीं इकट्ठा हो (पृष्ठ 177)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। “9 मील” पेस के जलाशय तक पाइपों से पानी आने की दूरी है, शहर की दीवार की लंबाई नहीं। हिरिया नहर के बनवाने वालों के आगे किताब “संभवत:” लगाती है। चित्र 7.4 के नक्शे के नाम (“शाही केंद्र”, “पवित्र केंद्र”) और पाठ के नाम (ज़्यादातर राजकीय केंद्र, धार्मिक केंद्र) अलग हैं; पृष्ठ 192 और अभ्यास का प्रश्न 6 भी “शाही केंद्र” कहते हैं। बच्चे जानें कि हर जोड़ी के दोनों नाम एक ही भाग के हैं।
इसी हिस्से में। प्रश्न 2 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 10 का मानचित्र कार्य · फ़्लैशकार्ड 57–70; प्रश्न बैंक क14, क15, ख7, ग3, ग4, ग5, ङ1, ङ3, च5, छ2, छ3।
पृष्ठ 177–179 — 3.2 क़िलेबंदियाँ तथा सड़कें; 3.3 शहरी केंद्र; 4. राजकीय केंद्र
कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. विजयनगर : राजधानी तथा उसके परिप्रदेश · इंटरैक्टिव: 4. राजकीय केंद्र
किताब कहाँ से शुरू करती है। दीवारों से: पंद्रहवीं शताब्दी में फ़ारस के शासक ने अब्दुर रज़्ज़ाक को कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा था; वह क़िलेबंदी से बहुत प्रभावित हुआ और उसने “दुर्गों की सात पंक्तियों” का उल्लेख किया (पृष्ठ 177)। फिर:
- खेत भी भीतर: अब्दुर रज़्ज़ाक लिखता है: “पहली, दूसरी और तीसरी दीवारों के बीच जुते हुए खेत, बग़ीचे तथा आवास हैं”। आम तौर पर शासक क़िलेबंद क्षेत्रों में विशाल अन्नागार बनवाते थे, पर विजयनगर के शासकों ने पूरे कृषि भूभाग को बचाने के लिए “एक अधिक मँहगी तथा व्यापक नीति” अपनाई।
- प्रवेशद्वार: मेहराब और गुंबद (चित्र 7.6); “कला–इतिहासकार इस शैली को इंडो–इस्लामिक (हिंद–इस्लामी) कहते हैं क्योंकि इसका विकास विभिन्न क्षेत्रों की स्थानीय स्थापत्य की परंपराओं के साथ संपर्क से हुआ।”
- सड़कें: आम तौर पर पहाड़ी भूभाग से बचकर घाटियों से होकर जाती थीं; सबसे महत्त्वपूर्ण सड़कों में से कई मन्दिरों के प्रवेशद्वारों से आगे बढ़ी हुई थीं, और उनके दोनों ओर बाज़ार थे।
- राजकीय केंद्र (पृष्ठ 179): बस्ती का दक्षिण-पश्चिमी भाग; इसमें “60 से भी अधिक मन्दिर” थे, और “लगभग तीस संरचनाओं” की पहचान महलों के रूप में हुई है।
हमारी ओर से — सबूत और अनुमान। शहरी केंद्र में सामान्य लोगों के आवासों के अपेक्षाकृत कम पुरातात्विक साक्ष्य मिले हैं, इसलिए किताब छोटे-छोटे सबूतों से अनुमान लगाती है। बोर्ड पर चार सबूत लिखिए:
- 1उत्तर-पूर्वी कोने से मिले परिष्कृत चीनी मिट्टी (चित्र 7.9);
- 2वहीं के मक़बरे और मस्ज़िदें (चित्र 7.10);
- 3क्षेत्र सर्वेक्षणों में मिले बहुत से पूजा स्थल और छोटे मन्दिर;
- 4कुएँ, बरसात के पानी वाले जलाशय और मन्दिरों के जलाशय। अब पूछिए: हर सबूत से क्या अनुमान लगाया गया?
नमूना उत्तर — किताब कहीं “हो सकता है” या “संभवत:” लगाती है, और कहीं पक्की बात कहती है:
- चीनी मिट्टी: हो सकता है वहाँ अमीर व्यापारी रहते हों।
- मक़बरे और मस्ज़िदें: “यह मुस्लिम रिहायशी मुहल्ला भी था।” इनका स्थापत्य हम्पी के मन्दिरों के मण्डपों से मिलता-जुलता है।
- पूजा स्थल: विविध संप्रदाय, “जो संभवत: विभिन्न समुदायों द्वारा संरक्षित थे”।
- कुएँ और जलाशय: संभवत: सामान्य नगर निवासियों के लिए पानी के स्रोत।
बच्चे देखें कि किताब कहाँ “हो सकता है” या “संभवत:” लगाती है और कहाँ नहीं; उत्तर में भी वही शब्द रहें (पृष्ठ 179)।
यहीं रुकिए। जब सामान्य लोगों के घरों के अवशेष कम मिले, तो उनके बारे में हमें कहाँ से पता चलता है?
नमूना उत्तर — एक यात्री के वर्णन से:
- बरबोसा: सोलहवीं शताब्दी का पुर्तगाली यात्री लिखता है: “लोगों के अन्य आवास छप्पर के हैं, पर फिर भी सुदृढ़ हैं, और व्यवसाय के आधार पर कई खुले स्थानों वाली लंबी गलियों में व्यवस्थित हैं।”
- पुरातत्त्व: साथ में पूजा स्थल, कुएँ और जलाशय, जो ऊपर के अनुमान देते हैं।
हमारी ओर से: यहाँ बच्चे देखें कि एक स्रोत की कमी दूसरा स्रोत कैसे पूरी करता है (पृष्ठ 179)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे खेतों को दीवारों के बाहर मान लेते हैं; किताब उलटा कहती है, और यही इस क़िलेबंदी की ख़ास बात है। दूसरी क़िलेबंदी नगरीय केंद्र के भीतरी भाग के चारों ओर थी, और तीसरी राजकीय केंद्र के चारों ओर (पृष्ठ 178)। “राजकीय केंद्र” नाम से बच्चे सोचते हैं कि वहाँ केवल महल थे; वहाँ 60 से भी अधिक मन्दिर थे। मुहल्ले वाली पंक्ति किताब के शब्दों में और भूतकाल में ही पढ़ाइए।
इसी हिस्से में। प्रश्न 3 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 6 और 9 के मुख्य बिंदु · चर्चा कीजिए: पृष्ठ 179 का बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 71–84; प्रश्न बैंक ख8, घ4, ङ2, ङ5।
पृष्ठ 180–183 — 4.1 महानवमी डिब्बा; 4.2 राजकीय केंद्र में स्थित अन्य भवन
कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. राजकीय केंद्र
किताब कहाँ से शुरू करती है। नामों से। कुछ संरचनाओं के नाम उनके आकार और काम के आधार पर रखे गए हैं। “राजा का भवन” घेरे की सबसे बड़ी संरचना है, पर इसके राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं है (पृष्ठ 180)। फिर:
- सभा मंडप: एक ऊँचा मंच, जिसमें लकड़ी के स्तंभों के लिए पास-पास और नियमित दूरी पर छेद हैं। स्तंभ इतने पास-पास थे कि खुली जगह बहुत कम बचती थी, इसलिए यह मंडप किस काम आता था, यह स्पष्ट नहीं है।
- महानवमी डिब्बा: “शहर के सबसे ऊँचे स्थानों में से एक पर स्थित “महानवमी डिब्बा” एक विशालकाय मंच है जो लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक जाता है।” इसका आधार उभारदार उत्कीर्णन से ढका है (चित्र 7.12)।
- त्योहार: इससे जुड़े अनुष्ठान संभवत: सितंबर और अक्टूबर के शरद मास में मनाए जाने वाले दस दिन के हिंदू त्योहार के महानवमी (महान नवाँ दिवस) के अवसर पर किए जाते थे। यही त्योहार उत्तर भारत में दशहरा, बंगाल में दुर्गा पूजा और प्रायद्वीपीय भारत में नवरात्री या महानवमी कहलाता है।
- कमल महल: यह नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों ने रखा। “कमल महल में नौ मीनारें थीं– बीच में एक ऊँची, तथा आठ उसकी भुजाओं के साथ–साथ।”
- हज़ार राम मन्दिर: “संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा ही किया जाता था।” इसकी भीतरी दीवारों के पटलों पर रामायण के दृश्यांश हैं (चित्र 7.18)।
हमारी ओर से — नाम और सबूत। बोर्ड पर चार नाम लिखिए और हर नाम के आगे किताब की बात:
- 1“राजा का भवन”: राजकीय आवास होने का कोई निश्चित साक्ष्य नहीं;
- 2सभा मंडप: किस काम आता था, स्पष्ट नहीं;
- 3कमल महल: नाम उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों का दिया हुआ, और इतिहासकार निश्चित नहीं कि भवन किस काम के लिए बना था;
- 4“हाथियों का अस्तबल”: कमल महल के पास का भवन, जिसका नाम किताब उद्धरण-चिह्नों में देती है। अब पूछिए: इनमें से किस नाम से इमारत का असली काम पक्का पता चलता है?
नमूना उत्तर — किसी से भी नहीं:
- “राजा का भवन”: नाम आकार से पड़ा; राजा के रहने का निश्चित साक्ष्य नहीं।
- सभा मंडप: स्तंभ इतने पास-पास थे कि उसका काम स्पष्ट नहीं।
- कमल महल: नाम बाद के यात्रियों का; मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिला सुझाव भर है कि यह परिषदीय सदन था, जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था।
- “हाथियों का अस्तबल”: नाम किताब उद्धरण-चिह्नों में देती है, और पूछती है: “क्या आपको लगता है कि ये वास्तव में हाथियों के अस्तबल थे?” (पृष्ठ 182)
इसीलिए महानवमी डिब्बा के बारे में किताब कहती है: “राजकीय केंद्र में स्थित कई और संरचनाओं की तरह यह भी एक पहेली बना हुआ है।” (पृष्ठ 181)
यहीं रुकिए। महानवमी के अवसर पर विजयनगर के शासक क्या दिखाना चाहते थे?
नमूना उत्तर — किताब के शब्दों में “अपने रुतबे, ताक़त तथा अधिराज्य का प्रदर्शन”:
- शोभायात्रा: साज़ लगे घोड़ों, हाथियों, रथों और सैनिकों की।
- भेंट: प्रमुख नायक और अधीनस्थ राजा, राजा और उसके अतिथियों को औपचारिक भेंट देते थे।
- अंतिम दिन: राजा खुले मैदान में अपनी और अपने नायकों की सेना का निरीक्षण करता था; नायक बड़ी मात्रा में भेंट और नियत कर भी लाते थे।
किताब कहती है: “इन उत्सवों के गहन सांकेतिक अर्थ थे।” बच्चे देखें कि हर काम में राजा और नायकों का रिश्ता सबके सामने दिखता था (पृष्ठ 181)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। “महानवमी डिब्बा” एक मंच का नाम है, त्योहार का नहीं; त्योहार से मेल वाली बात के आगे किताब “संभवत:” लगाती है। पेस सभा मंडप और महानवमी डिब्बा को मिलाकर “विजय का भवन” कहता है (पृष्ठ 180 का बॉक्स)। माप उलटिए मत: लगभग 11000 वर्ग फीट आधार है, 40 फीट ऊँचाई। “हाथियों का अस्तबल” भी एक दिया हुआ नाम है; प्रश्न 7 में बच्चे इसे पक्की बात की तरह न लिखें।
इसी हिस्से में। प्रश्न 4 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 6 और 7 के मुख्य बिंदु · चर्चा कीजिए: पृष्ठ 183 का बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 85–108; प्रश्न बैंक क16, क17, क18, ख9, ग6, ग8, ङ4, च3।
पृष्ठ 184–188 — 5. धार्मिक केंद्र; 5.1 राजधानी का चयन; 5.2 गोपुरम् और मण्डप
कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. धार्मिक केंद्र
किताब कहाँ से शुरू करती है। जगह से: धार्मिक केंद्र शहर का तुंगभद्रा नदी के किनारे वाला चट्टानी उत्तरी भाग है (पृष्ठ 184)। फिर:
- मान्यताएँ: स्थानीय मान्यताओं के अनुसार ये पहाड़ियाँ “रामायण में उल्लिखित बाली और सुग्रीव के वानर राज्य की रक्षा करती थीं”। अन्य मान्यताओं के अनुसार पम्पादेवी ने इन पहाड़ियों में विरुपाक्ष से विवाह के लिए तप किया था। इन पहाड़ियों में विजयनगर से पहले के जैन मन्दिर भी मिले हैं।
- पुरानी परंपरा: इस क्षेत्र में मन्दिर निर्माण का इतिहास पल्लव, चालुक्य, होयसाल और चोल वंशों तक जाता है। मन्दिर धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक केंद्र बन गए थे।
- विरुपाक्ष की ओर से: विजयनगर के शासक भगवान विरुपाक्ष की ओर से शासन करने का दावा करते थे; राजकीय आदेशों पर सामान्यतया कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष” अंकित होता था। शासक हिन्दू सूरतराणा उपाधि भी लेते थे।
- नई बात: राजकीय प्रतिकृति मूर्तियाँ मन्दिरों में प्रदर्शित होने लगीं, और राजा की मन्दिर यात्राएँ महत्त्वपूर्ण राजकीय अवसर बन गईं।
- विट्ठल मन्दिर: यहाँ के प्रमुख देवता विट्ठल हैं, विष्णु का एक रूप, जो सामान्यत: महाराष्ट्र में पूजे जाते हैं। इसमें रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर है (चित्र 7.24)।
हमारी ओर से — मन्दिर में शासक कहाँ दिखते हैं। पहले बताइए: विरुपाक्ष मन्दिर कई शताब्दियों में बना। अभिलेखों के अनुसार सबसे प्राचीन मन्दिर नवीं–दसवीं शताब्दियों का था। कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में मुख्य मन्दिर के सामने का मण्डप बनवाया, और पूर्वी गोपुरम् का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है। फिर नीचे का चित्र चार्ट पेपर पर बनाइए। अब पूछिए: पूरे परिसर में केंद्रीय देवालय छोटा क्यों दिखता है?
नमूना उत्तर — क्योंकि बाद के जोड़ उससे बड़े थे:
- गोपुरम्: राय गोपुरम् अक्सर केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना दिखा देते थे और दूर से ही मन्दिर का संकेत देते थे।
- मण्डप और गलियारे: देवस्थलों के चारों ओर लंबे, स्तंभों वाले गलियारे और मण्डप बने।
- नतीजा: इन जोड़ों के कारण केंद्रीय देवालय पूरे परिसर का एक छोटा भाग रह गया (चित्र 7.20)।
किताब के अनुसार ये गोपुरम् संभवत: शासकों की ताकत की याद भी दिलाते थे, जो इतनी ऊँची मीनारें बनाने के साधन, तकनीक और कौशल जुटा सकते थे (पृष्ठ 186)।
विजयनगर का मन्दिर परिसर: बाहर से भीतर तक
यहीं रुकिए। किताब के अनुसार विजयनगर की जगह किस बात से चुनी गई हो सकती है?
नमूना उत्तर — दो मन्दिरों से। किताब कहती है: “यह संभव है कि विजयनगर के स्थान का चयन वहाँ विरुपाक्ष तथा पम्पादेवी के मन्दिरों के अस्तित्व से प्रेरित था।”
- पम्पादेवी: स्थानीय मातृदेवी, जिनके नाम से हम्पी नाम बना।
- विरुपाक्ष: राज्य के संरक्षक देवता और शिव का एक रूप माने जाते हैं; इन्हीं की ओर से शासक शासन का दावा करते थे।
किताब यहाँ “यह संभव है” लिखती है; बच्चों के उत्तर में भी यही सावधानी रहे (पृष्ठ 184)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। विरुपाक्ष शिव का एक रूप माने जाते हैं और विट्ठल विष्णु का; बच्चे दोनों को मिला देते हैं। विट्ठल मन्दिर का रथ असली रथ नहीं, रथ के आकार का एक मन्दिर है। चित्र 7.25 का झूलता मण्डप जिंजी का है, और चित्र 7.26 का गोपुरम् मदुरई के नायकों का बनवाया हुआ। हिन्दू सूरतराणा अरबी शब्द सुल्तान का संस्कृत रूपांतरण है, शाब्दिक अर्थ हिंदू सुलतान। मान्यताएँ इतिहास की तरह पढ़ाइए: किसकी मान्यता थी और किताब उसे क्यों बताती है।
इसी हिस्से में। प्रश्न 5 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 8 के मुख्य बिंदु · चर्चा कीजिए: पृष्ठ 188 का बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 109–130; प्रश्न बैंक क19, क20, ग7, घ5, घ6, च4।
पृष्ठ 188–190 — 6. महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन
कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. महलों, मन्दिरों तथा बाज़ारों का अंकन
किताब कहाँ से शुरू करती है। साधनों से: विजयनगर के बारे में जानकारी छाया चित्रों, नक्शों, खड़े रेखाचित्रों और मूर्तिकला से मिलती है (पृष्ठ 188)। फिर:
- संरक्षण: बीसवीं शताब्दी में भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण और कर्नाटक पुरातात्विक एवं संग्रहालय विभाग ने इस स्थल का संरक्षण किया। 1976 में हम्पी को “राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल के रूप में” मान्यता मिली।
- बड़ी परियोजना: 1980 के दशक के आरंभ में भौतिक अवशेषों के विस्तृत प्रलेखन की परियोजना शुरू हुई; “लगभग बीस वर्षों” में दुनिया भर के दर्जनों विद्वानों ने यह जानकारी इकट्ठी और सुरक्षित की।
- 25 वर्ग: पूरा क्षेत्र 25 वर्गाकार भागों में बाँटा गया, और हर वर्ग को वर्णमाला के एक अक्षर से इंगित किया गया।
- क्या मिला: छोटे देवस्थलों और घरों से लेकर विशाल मन्दिरों तक हज़ारों संरचनाओं के अवशेष; सड़कों, रास्तों और बाज़ारों के अवशेष भी, जिनकी जगह स्तंभों के आधारों और मंचों से पहचानी गई।
हमारी ओर से — जो लकड़ी नहीं बची। बोर्ड पर वह सूची लिखिए जो इस स्थल पर वर्षों काम करने वाले जॉन एम. फ्रिट्ज़, जॉर्ज मिशेल और एम. एस. नागराज राव देते हैं: “विजयनगर के स्मारकों के अपने अध्ययन में हमें नष्ट हो चुकी लकड़ी की वस्तुओं–स्तंभ, टेक (ब्रेकेट), धरन, भीतरी छत, लटकते हुए छज्जों के अंदरूनी भाग तथा मीनारों–की एक पूरी श्रेणी की कल्पना करनी पड़ती है जो प्लास्टर से सजाए और संभवत: चटकीले रंगों से चित्रित थे।” (पृष्ठ 190) अब पूछिए: विद्वानों को “कल्पना” क्यों करनी पड़ती है, और यात्रियों के विवरण इसमें कैसे मदद करते हैं?
नमूना उत्तर — क्योंकि केवल पत्थर बचा:
- क्या खोया: लकड़ी की संरचनाएँ नष्ट हो गईं; बाज़ारों के बस स्तंभों के आधार और मंच बचे। किताब कहती है: “एक समय जो बाज़ार, जीवंत थे, उनका बस अब यही कुछ बचा है”।
- यात्रियों के विवरण: किताब के अनुसार ये “उस समय के स्पंदन से पूर्ण जीवन के कुछ आयामों को पुनर्निर्मित करने में सहायक होते हैं”।
अगले कालांश का स्रोत 5 यही करता है: वह बताता है कि इन बाज़ारों में क्या बिकता था (पृष्ठ 190–191)।
एक मन्दिर तक पहुँचने की चार सीढ़ियाँ
यहीं रुकिए। चित्र 7.30 के मन्दिर को पूरे स्थल के नक्शे (चित्र 7.27) में ढूँढना हो, तो किस क्रम में चलेंगे?
नमूना उत्तर — बड़े से छोटे की ओर:
- पहले: चित्र 7.27 में वर्ग N।
- फिर: चित्र 7.28 में उस वर्ग के भीतर का वर्ग NM।
- फिर: चित्र 7.29 में उस वर्ग का मन्दिर, जिसका नक्शा चित्र 7.30 है।
किताब के अनुसार पूरे क्षेत्र को पहले 25 भागों में, फिर छोटे वर्गों के समूहों में, और फिर और छोटी इकाइयों में बाँटा गया था (पृष्ठ 189)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। 1976 और 1986 को बच्चे मिला देते हैं: 1976 में हम्पी को राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल की मान्यता मिली (पृष्ठ 188), और 1986 में यूनेस्को ने उसे विश्व धरोहर स्थल घोषित किया (काल-रेखा 2, पृष्ठ 193)। “लगभग बीस वर्षों” में “लगभग” बना रहे। चित्र 7.29 पर अंकित संख्याएँ उत्तर में मत लिखवाइए; वर्गों के अक्षर ही काफ़ी हैं।
इसी हिस्से में। प्रश्न 1 के मुख्य बिंदु · बच्चे ये सवाल पूछेंगे: पृष्ठ 189 और 190 · फ़्लैशकार्ड 131–138; प्रश्न बैंक ख10, च2।
पृष्ठ 191–192 — 7. उत्तरों की खोज में प्रश्न
कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. उत्तरों की खोज में प्रश्न
किताब कहाँ से शुरू करती है। इमारतों की ताक़त से: “सुरक्षित भवन हमें उन तरीकों के विषय में बताते हैं जिनसे स्थानों को व्यवस्थित किया गया और उन्हें प्रयोग में लाया गया।” (पृष्ठ 191) फिर:
- सामग्री: इमारतें बताती हैं कि वे किस सामग्री और किन तकनीकों से बनीं।
- सुरक्षा: किसी शहर की क़िलेबंदी से उसकी रक्षा की ज़रूरतों और सैनिक तैयारी का पता चलता है।
- विचारों का फैलाव: दूसरी जगहों की इमारतों से तुलना करने पर विचारों के फैलाव और सांस्कृतिक प्रभावों का पता चलता है।
- प्रतीक: इमारतों के प्रतीक हम दूसरे स्रोतों, जैसे “साहित्य, अभिलेखों तथा लोकप्रचलित परंपराओं”, से मिली जानकारी जोड़कर समझते हैं।
हमारी ओर से — बाज़ार की सूची। स्रोत 5 की दो सूचियाँ बोर्ड पर लिखिए। पेस एक चौड़ी और सुंदर गली का वर्णन करता है, जहाँ “सभी प्रकार के माणिक्य, और हीरे, और पन्ने, और मोती, और छोटे मोती, और वस्त्र, और पृथ्वी पर होने वाली हर वस्तु” मिलती थी; वह विजयनगर को “विश्व के सबसे अच्छे संभरण वाले शहर” कहता है। नूनिज़ के अनुसार बाज़ार “प्रचुर मात्रा में फलों, अंगूरों और संतरों, नींबू, अनार, कटहल तथा आम से भरे रहते थे और सभी बहुत सस्ते।” अब पूछिए: इन सूचियों से बाज़ार के बारे में ऐसा क्या पता चलता है जो खंडहर नहीं बताते?
नमूना उत्तर — बाज़ार में क्या था और किसके लिए:
- क्या बिकता था: रत्न, मोती और वस्त्र भी, और रोज़ के फल भी।
- दाम: नूनिज़ के अनुसार फल बहुत सस्ते थे।
- रोज़ की चहल-पहल: पेस के अनुसार हर शाम वहाँ एक मेला लगता था।
खंडहरों में बाज़ार की केवल जगह बची है; उसमें क्या था, यह यात्रियों के वृत्तांत बताते हैं (पृष्ठ 191)।
यहीं रुकिए। किताब के अनुसार इमारतें किन प्रश्नों के उत्तर नहीं देतीं?
नमूना उत्तर — दो तरह के प्रश्न:
- देखने वाले: सामान्य स्त्री, पुरुष और बच्चे इन इमारतों के बारे में क्या सोचते थे; क्या वे शाही या धार्मिक केंद्र के किसी भी भाग में जा सकते थे।
- बनाने वाले: नक्शे किसने बनाए; राजगीर, पत्थर काटने वाले और मूर्तिकार कहाँ से आए; उन्हें कैसा वेतन मिलता था; कच्चा माल कहाँ से और कैसे लाया जाता था।
किताब ये प्रश्न खुले छोड़ती है: “संभवत: अन्य स्त्रोतों के प्रयोग से जारी शोध कुछ और संकेत दे सकें।” (पृष्ठ 192)
बच्चे यहाँ अटकते हैं। पृष्ठ 192 के बॉक्स में राजा की दो छवियाँ हैं, एक मूर्ति का चित्र और एक यात्री का शब्द-चित्र, और बच्चे दोनों को एक ही स्रोत मान लेते हैं। चिदम्बरम मन्दिर के गोपुरम् की मूर्ति (चित्र 7.31) के बारे में किताब कहती है: “स्वाभाविक है कि शासक इसी रूप में अपने आप को प्रस्तुत करना चाहता था।” पेस का वर्णन एक यात्री की आँख है: “मझला कद, गोरा रंग और अच्छी काठी, कुछ मोटा, राजा के चेहरे पर चेचक के दाग़ हैं।” दोनों को साथ रखकर पूछिए कि कौन-सा स्रोत किसकी नज़र दिखाता है।
इसी हिस्से में। प्रश्न 9 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 11 और 12 · अध्याय का तर्क · फ़्लैशकार्ड 139–151; प्रश्न बैंक च6, छ4।
पृष्ठ 193–194 — काल-रेखा 1 और 2
कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा
किताब कहाँ से शुरू करती है। दो काल-रेखाओं से, एक ही पन्ने पर (पृष्ठ 193): काल-रेखा 1 “महत्वपूर्ण राजनीतिक परिवर्तन” की है, और काल-रेखा 2 “विजयनगर की खोज व संरक्षण की मुख्य घटनाएँ” की। पूरी तालिकाएँ अध्याय के आँकड़े में हैं।
हमारी ओर से — दो रेखाएँ। चार्ट पेपर पर दो लंबी रेखाएँ खींचिए। आठ पर्चियाँ बनाइए: 1336? विजयनगर साम्राज्य की स्थापना; 1347 बहमनी राज्य की स्थापना; 1510 पुर्तगालियों द्वारा गोवा पर विजय; 1526 बाबर द्वारा मुगल साम्राज्य की स्थापना; 1800 कॉलिन मैकेन्ज़ी की विजयनगर यात्रा; 1856 अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ के पहले विस्तृत चित्र; 1876 जे.एफ. फ्लीट द्वारा अभिलेखों का प्रलेखन आरंभ; 1986 यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित। अब पूछिए: कौन-सी पर्ची किस रेखा पर जाएगी, और दोनों रेखाओं के बीच कौन-सा साल खड़ा है?
नमूना उत्तर — किताब की काल-रेखाओं के अनुसार:
- काल-रेखा 1: 1336?, 1347, 1510 और 1526।
- काल-रेखा 2: 1800, 1856, 1876 और 1986।
- बीच का साल: 1565, जब शहर पर आक्रमण हुआ और वह लूटा गया (पृष्ठ 170)।
पहली रेखा उस राजनीति की है जिसमें विजयनगर जीता; दूसरी उस काम की, जिससे उजड़ा शहर हमें फिर मिला।
यहीं रुकिए। काल-रेखा 1 के किन राज्यों से विजयनगर का इस अध्याय में सीधा सामना होता है?
नमूना उत्तर — तीन से:
- गजपति: उड़ीसा के गजपति राज्य की स्थापना (1435); 1514 में कृष्णदेव राय ने उड़ीसा के शासकों का दमन किया।
- दक्कन की सल्तनतें: अहमदनगर और बीजापुर (1490) और गोलकुण्डा (1518); 1565 में इन्हीं की संयुक्त सेनाओं से विजयनगर हारा।
- पुर्तगाली: 1498 से पश्चिमी तट पर; 1510 में गोवा पर विजय।
इस तरह काल-रेखा 1 अध्याय से अलग नहीं है; वह भाग 2 की घटनाओं का घेरा है (पृष्ठ 172–174, 193)।
बच्चे यहाँ अटकते हैं। 1336 के आगे काल-रेखा में प्रश्नचिह्न छपा है; उसे हटाकर मत लिखवाइए। काल-रेखा 1 के “काल” वाले खाने में साल नहीं, “लगभग 1200-1300 ईसवी” जैसे सौ-सौ साल के काल हैं। 1976 वाली राष्ट्रीय महत्त्व की मान्यता काल-रेखा 2 में नहीं, पृष्ठ 188 के पाठ में है। काल-रेखा की कुछ छपी बातों पर ध्यान दीजिए वाली टिप्पणी पढ़ लीजिए।
इसी हिस्से में। अध्याय के आँकड़े · समय कम हो तो · फ़्लैशकार्ड 152–164; प्रश्न बैंक क4।
पृष्ठ 194–195 — प्रश्नावली
कालांश 11 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा
इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:
- 1 से 5 तक के प्रश्न: उत्तर के मुख्य बिंदु (लगभग 100 से 150 शब्द)
- 6 से 9 तक के प्रश्न: लघु निबंध के मुख्य बिंदु (लगभग 250-300 शब्द)
- 10 से 12 तक के प्रश्न: मानचित्र और परियोजना
- चर्चा कीजिए: पृष्ठ 175 से 188 तक के चार बॉक्स
- किनारे के प्रश्न
अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।