Chapter 7एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर

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कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 170 से 195

यह पन्ना किसलिए — किताब कई बातों को छूकर आगे बढ़ जाती है। यह पन्ना उनमें से आठ को खोलता है: हम्पी की खोज 1800 से 1980 के दशक तक, चार राजवंश, कृष्णदेव राय का दरबार, नायक राज्य, छह विदेशी यात्री, पानी का इंतज़ाम, हम्पी के मुख्य स्मारक, और आज के नोट, जिनमें ₹50 के नोट पर हम्पी है। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर आगे की बात, और फिर कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।

परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। जहाँ किसी स्रोत का साल किताब से अलग है, वहाँ भी परीक्षा में किताब वाला साल लिखें। यहाँ की बातें किताब के पाठ को खोलकर समझाने के लिए हैं। सारे स्रोत अंग्रेज़ी में हैं; पुराने स्रोतों (1857, 1893, 1900, 1919, 1927) की बातें उनके अपने समय की हैं, इसलिए उनका साल साथ लिखा है।

मैकेन्ज़ी से विजयनगर अनुसंधान परियोजना तक

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि 1800 में ईस्ट इण्डिया कंपनी में कार्यरत अभियंता और पुराविद कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने हम्पी के भग्नावशेष प्रकाश में लाए और इस स्थान का पहला सर्वेक्षण मानचित्र बनाया; उनकी शुरुआती जानकारी विरुपाक्ष मंदिर और पम्पादेवी के पूजास्थल के पुरोहितों की स्मृतियों पर आधारित थी (पृष्ठ 170)। स्रोत 1 में किताब बताती है कि मैकेन्ज़ी 1754 में जन्मे, 1815 में “भारत का पहला सर्वेयर जनरल” बने और 1821 में अपनी मृत्यु तक इसी पद पर रहे (पृष्ठ 171)। फिर किताब काल-रेखा 2 में कुछ साल गिनाती है: 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ के पहले विस्तृत चित्र, 1876 में जे.एफ. फ्लीट का अभिलेखों का प्रलेखन, 1902 में जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण, और 1986 में विश्व धरोहर स्थल (पृष्ठ 193); और बताती है कि 1980 के दशक के आरंभ में एक बड़ी प्रलेखन परियोजना शुरू हुई (पृष्ठ 188)। किताब यहीं रुकती है: मैकेन्ज़ी का संग्रह कहाँ गया, ग्रीनलॉ के चित्रों का क्या हुआ, 1800 और 1980 के बीच और क्या-क्या हुआ, और 1980 के दशक की परियोजना किसने चलाई, यह उसमें नहीं आता।

मैकेन्ज़ी का काम और उनका संग्रह

  • दिसंबर 1799 या 1800: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) लिखते हैं कि विजयनगर की विद्वानी जाँच दिसंबर 1799 में कर्नल कॉलिन मैकेन्ज़ी ने शुरू की; किताब यह साल 1800 देती है (पृष्ठ 170), और परीक्षा में 1800 ही लिखिए। उनके अनुसार मैकेन्ज़ी विजयनगर की बसावट का वर्णन करने वाले पहले आधुनिक खोजकर्ता थे। उन्होंने खंडहर हो चुकी इमारतों को पहचानने में बहुत मेहनत की: अलग-अलग देवताओं के मन्दिर, सिंचाई के बड़े-बड़े काम और क़िलेबंदी की दीवारों की पंक्तियाँ दर्ज कीं। उनकी रिपोर्ट आज लंदन के इण्डिया ऑफ़िस लाइब्रेरी एंड रिकॉर्ड्स के संग्रह में है। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • हज़ारों रेखाचित्र और अभिलेखों की नकलें: ब्रिटिश लाइब्रेरी के रिकॉर्ड के अनुसार मैकेन्ज़ी अपनी तनख़्वाह से भारत और जावा के इतिहास और धर्म पर अपनी खोज का ख़र्च उठाते थे। दक्षिण भारत के सर्वेक्षणों में उन्होंने वहाँ के इतिहास, स्थापत्य, भाषा, जीवन और धर्म के हर पहलू की जानकारी इकट्ठी और दर्ज की, और इससे हज़ारों रेखाचित्र और अभिलेखों की नकलें बनीं। स्रोत: ब्रिटिश लाइब्रेरी (अंग्रेज़ी में)
  • संग्रह दो देशों में बँटा: 1893 के डिक्शनरी ऑफ़ नेशनल बायोग्राफ़ी के अनुसार मैकेन्ज़ी का संग्रह उनकी विधवा से मार्क्विस ऑफ़ हेस्टिंग्स ने 10,000 पाउंड में ख़रीदा। उनकी अपनी सूची होरेस विल्सन ने संपादित की, जो 1828 में छपी। संस्कृत, अरबी, फ़ारसी, जावा और बर्मा की किताबें, सिक्के और मूर्तियाँ 1823 और 1825 में तीन खेपों में ब्रिटेन भेजी गईं, और 1893 में ये दक्षिण केंसिंगटन के इण्डिया म्यूज़ियम में थीं। दक्षिण भारत से जुड़ी सारी पांडुलिपियाँ और अभिलेखों का संग्रह 1828 में मद्रास कॉलेज के पुस्तकालय में रखा गया; 1893 में ये मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज की सरकारी प्राच्य पांडुलिपि लाइब्रेरी में थे। स्रोत: डिक्शनरी ऑफ़ नेशनल बायोग्राफ़ी, 1893 (अंग्रेज़ी में)

हमारी ओर से: किताब मैकेन्ज़ी के जैन पंडित और तेलुगु ब्राह्मण कावलेरी वेन्तक लच्छमैया जैसे सहायकों की बात करती है (पृष्ठ 171)। मद्रास में रखी पांडुलिपियाँ और अभिलेखों की नकलें बच्चों को दिखाती हैं कि मैकेन्ज़ी का “स्थानीय इतिहास इकट्ठा करना” असल में कितना बड़ा काम था।

1836 से 1917: खंडहरों की पढ़ाई कैसे आगे बढ़ी

  • 1836, पहला वर्णन: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार 1836 तक इस स्थल का पहला वर्णन छप चुका था, मन्दिरों के अभिलेखों के अनुवाद के साथ। 1836 में ही फ़्रांसीसी एदुआर दे वारेन विजयनगर के लिए एक अभियान लेकर निकले, पर मलेरिया फैलने से वह बीच में ही रुक गया। किताब भी बताती है कि 1836 से अभिलेखकर्ताओं ने यहाँ से कई दर्जन अभिलेख इकट्ठे किए (पृष्ठ 170)। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • 1866, पहली छपी तस्वीरें: विजयनगर की पहली छपी तस्वीरें 1866 में “आर्किटेक्चर इन धारवाड़ ऐंड मैसूर” नाम की किताब में आईं। उनके परिचय-वाक्य (कैप्शन) स्थापत्य के इतिहासकार जेम्स फ़र्गुसन ने लिखे, जिन्हें इस बात का अफ़सोस था कि वे ख़ुद यह स्थल नहीं देख पाए। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • 1880, पहला स्थलाकृतिक नक्शा: 1880 में मद्रास सर्वे ने विजयनगर का पहला स्थलाकृतिक नक्शा निकाला, जिसमें स्मारकों के नाम लिखे थे। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • बीसवीं सदी की शुरुआत, कर्ज़न का अनुदान: फ़्रिट्ज़ और मिशेल लिखते हैं कि सदी के मोड़ पर वायसराय लॉर्ड कर्ज़न ने विजयनगर के स्मारकों के संरक्षण के लिए अनुदान दिया। तब नए बने पुरातत्व सर्वेक्षण के मद्रास दफ़्तर ने इमारतों से नागफनी और जमी मिट्टी हटानी शुरू की, और गिरती दीवारों और दरवाज़ों के ऊपर की पट्टियों को सहारा दिया। किताब की काल-रेखा में 1902 में जॉन मार्शल के अधीन संरक्षण कार्य का आरंभ दर्ज है (पृष्ठ 193)। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • 1917, “हम्पी रुइन्स”: संरक्षण के इस काम के पहले निदेशक ए. एच. लॉन्गहर्स्ट थे, और फ़्रिट्ज़ और मिशेल उन्हें विजयनगर में काम करने वाला पहला विशेषज्ञ पुरातत्वविद् कहते हैं। 1917 में उन्होंने “हम्पी रुइन्स” नाम की मार्गदर्शिका निकाली, जिसमें स्थल की उनकी अपनी जानकारी का सार था। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ के मोम लगे काग़ज़ के नेगेटिव

  • 1856 के चित्र: किताब बताती है कि 1856 में अलेक्ज़ैंडर ग्रीनलॉ ने हम्पी के पुरातात्विक अवशेषों के पहले विस्तृत चित्र लिए (पृष्ठ 193)। लंदन के विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम के रिकॉर्ड में ग्रीनलॉ एक शौक़िया ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़र हैं, “मद्रास स्टाफ़ कोर के कर्नल ए. जे. ग्रीनलॉ”, और चित्रों का समय 1855-56 लिखा है; परीक्षा में किताब वाला 1856 लिखिए। उन्होंने मोम लगे काग़ज़ के नेगेटिव बनाए थे। स्रोत: विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम (अंग्रेज़ी में)
  • सबसे पुराने बचे प्रिंट 1910 के: म्यूज़ियम के अनुसार ग्रीनलॉ ने 1856 में ही अपने प्रिंट प्रदर्शित किए थे, पर उस समय का कोई प्रिंट आज बचा हुआ नहीं मिलता। 1910 में ईस्ट शीन की श्रीमती आर्मिटेज ने मूल नेगेटिव संग्रहालय को उधार दिए, और उनसे संग्रहालय के लिए ख़ास प्रिंट बनाए गए; यही आज के सबसे पुराने बचे हुए फ़ोटो हैं। म्यूज़ियम के पास विजयनगर के 61 प्रिंट और 5 दूसरे प्रिंट हैं, और वह इसे भारत में किसी पुरातात्विक स्थल की सबसे पहली बड़े पैमाने की फ़ोटोग्राफ़ी मानता है। स्रोत: विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम (अंग्रेज़ी में)
  • 1980 में फिर मिले, 1983 में फिर खींचे गए: म्यूज़ियम बताता है कि ये नेगेटिव 1980 में एक निजी संग्रह में फिर से मिले। 1983 में विजयनगर अनुसंधान परियोजना के फ़ोटोग्राफ़र जॉन गोलिंग्स को ये नेगेटिव दिखाए गए, और उन्होंने ठीक उन्हीं साठ जगहों के फिर से फ़ोटो खींचे जहाँ ग्रीनलॉ गए थे, ताकि पता चले कि समय के साथ स्मारकों की हालत कितनी बदली। बाद में मूल नेगेटिव और 1910 के प्रिंट अल्काज़ी फ़ाउंडेशन ने ख़रीद लिए। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) इन्हें उन्नीसवीं सदी में इस स्थल का सबसे पूरा सर्वेक्षण कहते हैं, जिसमें इमारतों के ऐसे ब्योरे दर्ज हैं जो बहुत पहले मिट चुके। स्रोत: विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम (अंग्रेज़ी में) · फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

1980 से: विजयनगर अनुसंधान परियोजना

  • कर्नाटक का अपना काम, 1979 से: कर्नाटक के पुरातत्व एवं संग्रहालय निदेशालय ने “हम्पी का पुनरुत्थान” नाम की योजना में विजयनगर में बड़े पैमाने पर खुदाई, मरम्मत और शोध शुरू किया, जो 1979 से चल रहा था। स्रोत: विजयनगर: प्रोग्रेस ऑफ़ रिसर्च 1979-1983, कर्नाटक सरकार (अंग्रेज़ी में)
  • जनवरी 1980, मिशेल और फ़्रिट्ज़: विद्वानों और विद्यार्थियों की अंतरराष्ट्रीय टीम का काम जनवरी 1980 में जॉर्ज मिशेल के नेतृत्व में शुरू हुआ; 1981 से जॉन एम. फ़्रिट्ज़ भी साथ आए। टीम में ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, जर्मनी, अमेरिका और भारत के पुरातत्वविद्, वास्तुकार, कला-इतिहासकार और फ़ोटोग्राफ़र थे। शुरू में इन स्वयंसेवकों ने “मार्ग” पत्रिका के 1982 के एक अंक के लिए रेखाचित्र और फ़ोटो तैयार किए; फिर यही काम पूरे 1980 के दशक में चलने वाली बड़ी शोध परियोजना बन गया। 1980 के दशक के मध्य से बंगलौर की एक पेशेवर सर्वेक्षण टीम विजयनगर के बीच के भाग के विस्तृत स्थलाकृतिक नक्शे बना रही थी। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • साथ-साथ काम: कर्नाटक सरकार की रिपोर्ट बताती है कि स्मिथसोनियन संस्थान के अनुदान से फ़्रिट्ज़ के आने-जाने और रहने का ख़र्च और सर्वेक्षण टीम की तनख़्वाह चलती थी; दिल्ली, अहमदाबाद, बंगलौर और हासन के वास्तुकला विद्यालयों के विद्यार्थियों ने कई इमारतों के रेखाचित्र बनाए; और 1982 में “विजयनगर प्रिलिमिनरी मैप सीरीज़” नाम से शुरुआती नक्शों की शृंखला निकली। फ़्रिट्ज़ और मिशेल लिखते हैं कि राज्य की टीम के शोध के नतीजे “प्रोग्रेस ऑफ़ रिसर्च” के खंडों में छपते रहे। स्रोत: विजयनगर: प्रोग्रेस ऑफ़ रिसर्च 1979-1983 (अंग्रेज़ी में) · फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

हमारी ओर से: किताब पृष्ठ 188–189 पर जिस परियोजना और 25 वर्गों वाले नक्शे की बात करती है, उसे पढ़ाते समय ये नाम और साल काम आएँगे। परीक्षा में किताब की बात लिखिए: परियोजना 1980 के दशक के आरंभ में शुरू हुई और “लगभग बीस वर्षों” में दुनिया भर के दर्जनों विद्वानों ने जानकारी इकट्ठी की।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब की काल-रेखा 2 में 1800 के बाद सीधे 1856 आता है, फिर 1876 और 1902 (पृष्ठ 193)। बीच के इन सालों में हम्पी के बारे में क्या हुआ: 1836, 1866, 1880 और 1917?

उत्तर देखिए

उत्तर: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार:

  • 1836: स्थल का पहला छपा वर्णन, अभिलेखों के अनुवाद के साथ; एदुआर दे वारेन का अभियान मलेरिया से रुका।
  • 1866: “आर्किटेक्चर इन धारवाड़ ऐंड मैसूर” में पहली छपी तस्वीरें, जेम्स फ़र्गुसन के कैप्शन के साथ।
  • 1880: मद्रास सर्वे का पहला स्थलाकृतिक नक्शा, स्मारकों के नामों के साथ।
  • 1917: ए. एच. लॉन्गहर्स्ट की मार्गदर्शिका “हम्पी रुइन्स”।

परीक्षा के लिए किताब की काल-रेखा वाले साल ही याद रखने हैं।

सवाल: ग्रीनलॉ के फ़ोटो 1856 के हैं, तो उनके सबसे पुराने बचे प्रिंट 1910 के क्यों कहे जाते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम के अनुसार ग्रीनलॉ ने काग़ज़ के नेगेटिव बनाए थे और 1856 में प्रिंट प्रदर्शित भी किए थे, पर उस समय का कोई प्रिंट आज बचा हुआ नहीं मिलता। 1910 में मूल नेगेटिव से संग्रहालय के लिए नए प्रिंट बनाए गए; यही आज के सबसे पुराने बचे फ़ोटो हैं। बच्चों को यह फ़र्क़ समझाइए: चित्र खींचने का साल 1856 है (किताब, पृष्ठ 193), प्रिंट बनाने का साल 1910।

सवाल: 1983 में जॉन गोलिंग्स ने ठीक उन्हीं साठ जगहों के फ़ोटो फिर से क्यों खींचे जहाँ ग्रीनलॉ गए थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: विक्टोरिया ऐंड अल्बर्ट म्यूज़ियम के अनुसार यह देखने के लिए कि समय के साथ स्मारकों की हालत कितनी बदली। एक ही जगह के दो फ़ोटो, 1856 और 1983 के, साथ रखने से पता चलता है कि कौन-सा ब्योरा मिट गया और कौन-सा बचा है।

चार राजवंश और उनके प्रमुख शासक

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि “परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार” विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 में दो भाइयों, हरिहर और बुक्का ने की (पृष्ठ 171); काल-रेखा 1 में यह साल “1336?” छपा है (पृष्ठ 193)। फिर किताब चार वंश गिनाती है: संगम, जिनका नियंत्रण 1485 तक रहा; सुलुव, जो “सैनिक कमांडर थे” और 1503 तक सत्ता में रहे; तुलुव, जिनमें कृष्णदेव राय हुए; और अराविदु, जिनके हाथ में 1542 तक केंद्र का नियंत्रण आ गया, जो 1565 के बाद पेनुकोण्डा से और फिर चन्द्रगिरी से शासन करते रहे, और सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता में रहे (पृष्ठ 173)। किताब यहीं रुकती है: हरिहर, बुक्का, कृष्णदेव राय और रामराय के अलावा किसी शासक का नाम नहीं आता, स्थापना की अलग-अलग परंपराएँ नहीं आतीं, और 1565 के बाद अराविदु राजाओं का क्या हुआ, यह भी नहीं।

हरिहर और बुक्का: एक स्थापना, कई परंपराएँ

  • कम्पिल की सेवा में योद्धा: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार संगम भाई संभवतः कम्पिल की सेवा में योद्धा थे, जिसके पास दक्कन के बीच का एक कम आबादी वाला, दूर का इलाक़ा था। इसी इलाक़े में तुंगभद्रा के उत्तरी किनारे पर आनेगोंडी की क़िलेबंद बस्ती थी, और हम्पी का छोटा-सा पवित्र स्थल भी। हरिहर और बुक्का के शुरुआती कामों में हम्पी के देवस्थलों पर पूजा करना था, और इस पवित्र जगह के पास उन्होंने अपना मुख्यालय बनाकर उसका नाम विजयनगर, यानी “विजय का शहर”, रखा। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • विद्यारण्य: फ़्रिट्ज़ और मिशेल लिखते हैं कि शुरुआती विजयनगर राजाओं के सलाहकार विद्यारण्य थे, जो राजधानी के दक्षिण-पश्चिम में जंगल से ढकी पहाड़ियों में बसे शृंगेरी के प्रतिष्ठित शैव मठ के धर्मगुरु थे। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • परंपराएँ अलग-अलग: रॉबर्ट सेवेल ने 1900 में स्थापना की कई अलग-अलग परंपराएँ दर्ज कीं, और 1911 का ब्रिटैनिका विश्वकोश दोनों भाइयों के बारे में लिखता है कि उनके बारे में इससे थोड़ा ही ज़्यादा कहा जा सकता है कि वे कन्नड़ मूल के थे। वही विश्वकोश साम्राज्य का समय “लगभग 1336 से 1565 तक” बताता है। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में) · एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, 1911 (अंग्रेज़ी में)

संगम वंश: बुक्का प्रथम से देवराय द्वितीय तक

सुलुव और तुलुव: सेनापतियों के तख़्ता-पलट

  • लगातार तख़्ता-पलट: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार पंद्रहवीं शताब्दी के आख़िरी दो दशक और सोलहवीं का पहला दशक विजयनगर में सुलुव और तुलुव परिवारों के लगातार सैनिक तख़्ता-पलट के साल थे। यह किताब की इस बात से मेल खाता है कि सत्ता के दावेदारों में सैनिक कमांडर भी थे (पृष्ठ 173)। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • सुलुव नरसिंह कब राजा बने: किताब सुलुवों का समय 1485 से 1503 देती है (पृष्ठ 173)। सेवेल (1900) दो पुराने विद्वानों के साल गिनाते हैं: डॉ. बर्नेल नरसिंह के शासन की शुरुआत 1490 में रखते हैं और बिशप कॉल्डवेल 1487 में। सेवेल यह भी बताते हैं कि 1472-73 के एक अभिलेख में नरसिंह को बस एक “बड़ा सामंत” कहा गया है, जबकि 1495-96 के एक अभिलेख में उन्हें “महा-राय”, यानी राजा, कहा गया है। परीक्षा में किताब के साल लिखिए। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)
  • तुलुव शासक: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार तुलुव वंश के सबसे बड़े शासक कृष्णदेव राय और उनके सौतेले भाई अच्युतदेव राय (शासन 1529–42) थे; उनके बाद सदाशिव 1542 में गद्दी पर बैठे। सदाशिव के शासन में असली सत्ता सैनिक कमांडर रामराय के हाथ में आती गई; सदाशिव को कभी अपना राजकीय अधिकार नहीं जताने दिया गया, और आख़िर में रीजेंट (संरक्षक) रामराय ने युवा राजा को क़ैद में रखा। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

1565 के बाद अराविदु: पेनुकोण्डा, चन्द्रगिरी, वेल्लोर

  • 26 जनवरी 1565: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार 26 जनवरी 1565 को दोनों सेनाएँ राजधानी से कोई सौ किलोमीटर उत्तर-पश्चिम के एक मैदान में आमने-सामने हुईं, और रामराय लड़ाई शुरू होते ही मारे गए। रामराय के भाई तिरुमल के नेतृत्व में विजयनगर की सेना राजधानी लौटी, क़ैद राजा को छुड़ाया, शाही ख़ज़ाना और सिंहासन साथ लिया, और दो सौ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व के पेनुकोण्डा क़िले में चली गई। यूनेस्को के अनुसार तालीकोटा की लड़ाई (1565) से शहर के ढाँचे का भारी विनाश हुआ। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में) · यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • तिरुमल राजा कब बने: सेवेल (1900) लिखते हैं कि 1568 में, जैसा कहा जाता है, तिरुमल ने अपने राजा सदाशिव की हत्या करके गद्दी ले ली। हेनरी हेरास (1927) के अनुसार तिरुमल के राज्यारोहण और नए वंश की स्थापना का साल 1569 मानना चाहिए; और हेरास के अनुसार 1571 में तिरुमल को “पृथ्वी पर राज करते” कहा गया है। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में) · हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)
  • पेनुकोण्डा, 1567: हेरास यात्री फ़्रेडरिक का यह वाक्य उद्धृत करते हैं कि 1567 में राजा अपने दरबार के साथ “बेज़ेनेगर” (विजयनगर) से आठ दिन के रास्ते पर “पेनेगोंदे” (पेनुकोण्डा) के क़िले में रहने चला गया; हेरास का मत है कि यह बदलाव 1567 की शुरुआत में नहीं हुआ होगा। हेरास के अनुसार राजधानी का पेनुकोण्डा जाना ही विजयनगर के उजड़ने और नष्ट होने का कारण बना। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)
  • रंग प्रथम और वेंकट द्वितीय: हेरास के अनुसार तिरुमल 1572 की शुरुआत में चल बसे, और उनके बेटे श्रीरंग राय उसी साल की शुरुआत में गद्दी पर बैठे। रंग के 1584 और 1585 के अभिलेख उन्हें “पेनुकोण्डा से शासन करते” बताते हैं, और हेरास के अनुसार उनकी मृत्यु लगभग 1585 के पहले आधे भाग में हुई। हेरास यह भी लिखते हैं कि रंग के राजधानी को चन्द्रगिरी ले जाने की बात किसी समकालीन स्रोत पर टिकी नहीं है। वेंकट द्वितीय कई साल चन्द्रगिरी से राज करते रहे; हेरास के अनुसार जनवरी 1607 में जेसुइट पादरियों को वेल्लोर में, जो “हाल ही में बनी राजधानी” थी, नया निवास बनाने की अनुमति मिली; और वेंकट द्वितीय की मृत्यु अक्टूबर 1614 के मध्य के आसपास हुई, सबसे संभव है वेल्लोर के महल में। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)
  • चन्द्रगिरी और मद्रास: 1911 का ब्रिटैनिका विश्वकोश लिखता है कि राय दक्षिण में पेनुकोण्डा भागे और बाद में चन्द्रगिरी गए, जहाँ उनके एक वंशज ने अंग्रेज़ों को फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज, यानी मद्रास, की जगह दी। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, 1911 (अंग्रेज़ी में)
  • अंत कब हुआ: किताब बताती है कि अराविदु सत्रहवीं शताब्दी के अंत तक सत्ता में रहे (पृष्ठ 173)। हेरास की किताब की भूमिका में सर रिचर्ड कार्नैक टेम्पल चौथे और अंतिम वंश का समय 1542-1770 लिखते हैं। सेवेल (1900) के अनुसार शिवाजी ने 1673 तक पूरा कोंकण जीत लिया था, और उसके चार साल बाद कुर्नूल, जिंजी और वेल्लोर में विजयनगर की सत्ता के आख़िरी अवशेष भी ख़त्म कर दिए। परीक्षा में किताब की बात लिखिए। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में) · सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)

हमारी ओर से: सेवेल 1565 के बाद के वंश को “तीसरा” वंश कहते हैं, जबकि किताब और हेरास अराविदु को चौथा वंश गिनते हैं। बच्चे गिनती में न उलझें: परीक्षा में किताब का क्रम लिखिए, संगम, सुलुव, तुलुव, अराविदु।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में चला गया (पृष्ठ 173)। पर हेरास नए वंश की स्थापना 1569 में रखते हैं। दोनों बातें साथ-साथ कैसे ठीक बैठती हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: दोनों अलग-अलग चीज़ों की बात कर रहे हैं:

  • असली सत्ता: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार सदाशिव 1542 में गद्दी पर बैठे, पर सत्ता सैनिक कमांडर रामराय के हाथ में आती गई; यही किताब का “केंद्र पर नियंत्रण” है।
  • राजा की गद्दी: हेरास के अनुसार 1569 तिरुमल के राज्यारोहण और नए वंश की स्थापना का साल है; सेवेल (“कहा जाता है” कहकर) तिरुमल के गद्दी लेने का साल 1568 बताते हैं।

परीक्षा में किताब की बात लिखिए: 1542 तक केंद्र पर नियंत्रण अराविदु वंश के हाथ में चला गया।

सवाल: काल-रेखा 1 में 1336 के साथ प्रश्नचिह्न क्यों लगा है (पृष्ठ 193)?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब ख़ुद कहती है कि यह तिथि “परंपरा और अभिलेखीय साक्ष्यों के अनुसार” है (पृष्ठ 171)। स्थापना की कहानियाँ भी अलग-अलग हैं: सेवेल (1900) ने कई परंपराएँ दर्ज कीं, फ़्रिट्ज़ और मिशेल “संभवतः” शब्द के साथ बताते हैं कि संगम भाई कम्पिल की सेवा में योद्धा थे, और 1911 का ब्रिटैनिका “लगभग 1336” लिखता है। इसलिए 1336 को पक्की तिथि मत मानिए, पर परीक्षा में यही साल लिखिए।

सवाल: 1565 की हार के बाद तिरुमल पेनुकोण्डा क्या-क्या लेकर गए, और यह क्यों ज़रूरी था?

उत्तर देखिए

उत्तर: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार सेना ने क़ैद राजा को छुड़ाया और शाही ख़ज़ाना और सिंहासन साथ ले गई। राजा, ख़ज़ाना और सिंहासन साथ हों, तो राज्य चलता रहता है; इसीलिए किताब कहती है कि अराविदु वंश ने 1565 के बाद पेनुकोण्डा से और फिर चन्द्रगिरी से शासन किया (पृष्ठ 173)।

कृष्णदेव राय का दरबार औरअमुक्तमल्यद

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि कृष्णदेव राय तुलुव वंश के थे, उनका शासनकाल 1509–29 था और उनका शासन “विस्तार और दृढ़ीकरण” का था: 1512 में रायचूर दोआब हासिल हुआ, 1514 में उड़ीसा के शासकों का दमन हुआ, और 1520 में बीजापुर के सुल्तान को हराया गया। कुछ बेहतरीन मन्दिरों और कई दक्षिण भारतीय मन्दिरों के भव्य गोपुरमों का श्रेय उन्हें दिया जाता है (पृष्ठ 173)। स्रोत 2 में किताब बताती है कि उन्होंने शासनकला पर तेलुगु में अमुक्तमल्यद लिखी, और उसमें से बंदरगाहों और व्यापारियों वाला अंश देती है (पृष्ठ 173)। चिदम्बरम मन्दिर के गोपुरम् में रखी उनकी प्रतिमा भी किताब में है (पृष्ठ 192)। किताब यहीं रुकती है: अमुक्तमल्यद की कथा क्या है, उन्होंने और क्या लिखा, और उनके दरबार में कौन-से कवि थे, यह उसमें नहीं आता।

राज के साल: किताब, यूनेस्को और सेवेल

अमुक्तमल्यद: गोदा की कथा, तेलुगु में

  • कवि की अपनी भूमिका: ऐयंगार (1919) काव्य की भूमिका का सार देते हैं: देवता ने कृष्णदेव राय को दर्शन दिए, उनकी संस्कृत में लिखी पाँच रचनाएँ गिनाईं (जैसे मदालसा चरित्र और रसमंजरी), और उन्हें आज्ञा दी कि वे गोदा, यानी आण्डाल, की कथा तेलुगु में लिखें, जो विष्णुचित्त (पेरियाल्वार) की बेटी थीं। देवता के अनुसार तेलुगु देशभाषाओं में सबसे अच्छी थी, और दरबार में जुटे सब लोग केवल उसी को समझ सकते थे। देवता ने यह भी कहा कि यह काव्य भगवान वेंकटेश्वर को समर्पित हो। स्रोत: ऐयंगार, सोर्सेज़ ऑफ़ विजयनगर हिस्ट्री, 1919 (अंग्रेज़ी में)
  • कलिंग की जीत का स्तंभ: ऐयंगार के उसी अंश में काव्य कलिंग में उनके अभियानों का वर्णन करता है, और बताता है कि गजपति पर जीत की याद में पोटनूरु में अभिलेखों वाला एक ऊँचा स्तंभ खड़ा किया गया। किताब के 1514 के उड़ीसा अभियान (पृष्ठ 173) और “गजपति” वाले बॉक्स (पृष्ठ 172) से इसे जोड़िए। स्रोत: ऐयंगार, सोर्सेज़ ऑफ़ विजयनगर हिस्ट्री, 1919 (अंग्रेज़ी में)
  • दो रचनाएँ बचीं: ऐयंगार (1919) लिखते हैं कि कृष्णदेव राय साहित्य के बड़े संरक्षक थे और ख़ुद भी काफ़ी लिखते थे, पर उनकी केवल दो रचनाएँ हम तक पहुँचीं: तेलुगु में अमुक्तमल्यद और संस्कृत नाटक जाम्बवती कल्याणम्। स्रोत: ऐयंगार, सोर्सेज़ ऑफ़ विजयनगर हिस्ट्री, 1919 (अंग्रेज़ी में)

हमारी ओर से: किताब अमुक्तमल्यद को शासनकला की रचना के रूप में पढ़ाती है और उसी में से व्यापारियों वाला अंश देती है (पृष्ठ 173); ऐयंगार की भूमिका बताती है कि काव्य की कथा गोदा की है। बच्चों से कहिए कि परीक्षा में किताब की बात लिखें: अमुक्तमल्यद शासनकला पर तेलुगु में लिखी गई रचना है।

दरबार के कवि

  • अल्लसानि पेद्दन: ऐयंगार (1919) के अनुसार कृष्णदेव राय के दरबार के प्रसिद्ध कवि अल्लसानि पेद्दन ने अपनी रचना मनुचरित्रम् उन्हें समर्पित की। जब पेद्दन को यह दिखाने के लिए कविगंडपेंडेर नाम का नूपुर दिया गया कि वे दरबार के बाकी सब कवियों से बढ़कर हैं, तो राजा ने ख़ुद उसे कवि के पैर में पहनाया और कहा, “सबमें केवल आप इसके योग्य हैं”। राजा ने उन्हें कोकटमु गाँव भी दिया। स्रोत: ऐयंगार, सोर्सेज़ ऑफ़ विजयनगर हिस्ट्री, 1919 (अंग्रेज़ी में)
  • नंदि तिम्मय्य: ऐयंगार के अनुसार वे नंदि सिंगामात्य और तिम्मांबा के बेटे, मलयमारुत कवि के भतीजे और अघोर शिवाचार्य के शिष्य थे। पासों के खेल में उनकी कुशलता पर कृष्णदेव राय ने उन्हें एक अग्रहार (ब्राह्मणों का गाँव) दिया, और उनकी रचना पारिजातापहरणम् राजा को समर्पित है। स्रोत: ऐयंगार, सोर्सेज़ ऑफ़ विजयनगर हिस्ट्री, 1919 (अंग्रेज़ी में)
  • कृष्णरायविजयम् में दरबार: कुमार धूर्जटि की इस रचना का ऐयंगार जो सार देते हैं, उसमें राजा अपने मंत्री अप्पाजी, सेनापति अय्यमरुसु, कोंडमरुसु और बाचरुसु, और मुक्कु तिम्मन्न, अल्लसानि पेद्दन्न और मादयगारि मल्लन्न जैसे कवियों के साथ दरबार लगाते हैं; अभियान में साथ गए कवि उनकी प्रशंसा में पद रचते थे। स्रोत: ऐयंगार, सोर्सेज़ ऑफ़ विजयनगर हिस्ट्री, 1919 (अंग्रेज़ी में)

राय गोपुरम्

  • दक्षिण भारत की पहचान: किताब बताती है कि राय गोपुरम् अक्सर केंद्रीय देवालयों की मीनारों को बौना कर देते थे (पृष्ठ 185)। यूनेस्को लिखता है कि राय गोपुरम् सबसे पहले उन मन्दिरों में आए जिनका श्रेय कृष्णदेव राय को दिया जाता है, और आज ये पूरे दक्षिण भारत में एक पहचान बन गए हैं। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कृष्णदेव राय का शासनकाल 1509–29 बताती है, और यूनेस्को 1509–1530। कोई बच्चा पूछे कि सही कौन है, तो क्या कहें?

उत्तर देखिए

उत्तर: साल अलग-अलग स्रोतों में थोड़े बदलते हैं, क्योंकि ये अभिलेखों से निकाले जाते हैं:

  • सेवेल (1900): सेवेल के समय तक उनके शासन का आख़िरी ज्ञात अभिलेख अप्रैल 1529 का था, और अच्युत राय की सबसे पहली ज्ञात तिथि अगस्त 1530 की। सेवेल और ऐयंगार मृत्यु 1530 में बताते हैं।
  • फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991): 1510–29।

परीक्षा में किताब का साल लिखिए: 1509–29।

सवाल: अमुक्तमल्यद तेलुगु में क्यों लिखी गई? कवि ख़ुद भूमिका में क्या कारण देते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: ऐयंगार (1919) के सार के अनुसार भूमिका में देवता कहते हैं कि तेलुगु देशभाषाओं में सबसे अच्छी है, और दरबार में जुटे सब लोग केवल उसी को समझ सकते हैं। किताब बताती है कि यह रचना तेलुगु में है (पृष्ठ 173); यह कारण उसे कक्षा में खोलकर समझाने के लिए है।

सवाल: पेद्दन को नूपुर पहनाने की कहानी से कृष्णदेव राय के दरबार के बारे में क्या पता चलता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: ऐयंगार के अनुसार राजा ने ख़ुद कवि के पैर में नूपुर पहनाया और उन्हें गाँव दिया। इससे पता चलता है कि दरबार में कवियों का ऊँचा मान था और राजा उन्हें गाँव और अग्रहार जैसे दान देते थे। किताब भी बताती है कि शासकों के लिए मन्दिरों का निर्माण, मरम्मत और रखरखाव अपनी सत्ता, संपत्ति और निष्ठा के लिए समर्थन और मान्यता पाने के महत्त्वपूर्ण माध्यम थे (पृष्ठ 184)।

अमर–नायक और 1565 के बाद के नायक राज्य

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “अमर–नायक प्रणाली विजयनगर साम्राज्य की एक प्रमुख राजनीतिक खोज थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इस प्रणाली के कई तत्त्व दिल्ली सल्तनत की इक्ता प्रणाली से लिए गए थे।” अमर-नायक वर्ष में एक बार राजा को भेंट भेजते थे, और राजा कभी-कभी उनका एक जगह से दूसरी जगह तबादला करते थे; सत्रहवीं शताब्दी में कई नायकों ने अपने स्वतंत्र राज्य बना लिए (पृष्ठ 175)। “चर्चा कीजिए” में किताब चन्द्रगिरी, मदुरई, इक्केरी, तंजावुर और मैसूर को नायक शक्ति के केंद्र बताती है (पृष्ठ 175), और आगे लिखती है कि “कुछ सबसे दर्शनीय गोपुरमों का निर्माण भी स्थानीय नायकों द्वारा किया गया था”, और चित्र 7.26 में “मदुरई के नायकों द्वारा बनवाया गया एक गोपुरम्” दिखाती है (पृष्ठ 188)। किताब यहीं रुकती है: ये नायक राज्य किसने और कब शुरू किए, यह उसमें नहीं आता।

नायक दरबार में: तबादले और भेंट

  • राजधानी में रहना ज़रूरी: टोक्यो विश्वविद्यालय के ओटा नोबुहिरो सोलहवीं शताब्दी के पहले आधे भाग, यानी तुलुव काल, के बारे में लिखते हैं कि राजा नायकों को सैनिक सेवा और भेंट की शर्त पर कुछ इलाक़े (सीमे) जागीर (नायकतन) के रूप में देते थे। राजाओं का नायकों पर कड़ा नियंत्रण था: नायकों को राजधानी में रहना और रोज़ दरबार में हाज़िर होना पड़ता था, और उनकी जागीरें काफ़ी कम समय में एक जगह से दूसरी जगह बदल दी जाती थीं। ओटा के अनुसार नायकों का किसी एक प्रांत में अपना पक्का आधार नहीं था। स्रोत: ओटा नोबुहिरो, टोक्यो विश्वविद्यालय (अंग्रेज़ी में)
  • “अमर-नायकम्” एक दान के रूप में: हेरास (1927) लिखते हैं कि रामराय ने तिरुवनिदेश विश्वनाथ को “अमर-नायकम्” के रूप में दिया। यानी यह शब्द एक इलाक़े के दान के लिए भी लिखा मिलता है। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)

हमारी ओर से: ओटा की बात किताब की दो पंक्तियों को खोलती है: नायक भेंट लेकर दरबार में हाज़िर होते थे, और राजा उनका तबादला करके नियंत्रण जताते थे (पृष्ठ 175)।

मदुरई: विश्वनाथ नायक

  • अच्युत राय के समय: हेरास (1927) के अनुसार मदुरई के नायक राज्य की नींव सम्राट अच्युत राय ने अपने शासन के अंतिम दिनों में रखी, जब विश्वनाथ नायक “मदुरा राज्य के स्वामी” बन चुके थे। नेल्सन की “मदुरा मैनुअल” स्थापना का साल 1558-9 देती है; हेरास इसे नहीं मानते और लिखते हैं कि उनके विचार में नायकशाही अच्युत राय के शासन के आख़िरी साल से शुरू होती है। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)
  • 1535 का अभिलेख: वी. वृद्धगिरीशन लिखते हैं कि ज़िला गज़ेटियर ने नेल्सन के पीछे चलकर मदुरई नायकशाही की स्थापना 1559 में रखी, पर यह साल टिकता नहीं, क्योंकि अच्युत राय के एक अभिलेख में 1535 में ही अपने एजेंट विश्वनाथ नायक के पुण्य के लिए दिए दान का ज़िक्र है। स्रोत: वृद्धगिरीशन, द नायक्स ऑफ़ तंजोर (अंग्रेज़ी में)
  • भेंट और पालैयम: हेरास के अनुसार विजयनगर के अधीन रहने का मतलब असल में बस हर साल 30 से 45 लाख रुपये की भेंट देना था। मदुरई में पालैयम सैनिक सेवा की शर्त पर दिए जाते थे, और हर पालैयक्कारन (पॉलिगार) पर मदुरई क़िले के बहत्तर बुर्जों में से एक की रक्षा की ज़िम्मेदारी थी। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)

तंजावुर: सेवप्प नायक और तीन साल

जिंजी और केलदि-इक्केरी

  • जिंजी: हेरास (1927) लिखते हैं कि ऐसा लगता है कि तुबाकी कृष्णप्प नायक ने कृष्णदेव राय की जीत के ठीक बाद, विजयनगर के अधीन, जिंजी के नायकों का वंश शुरू किया, और उनका शासन 1521 तक चला। हेरास उन्हीं को, “लगता है” कहकर, राजगिरि की चोटी की क़िलेबंदी, निचले क़िले का अन्न-भंडार और कल्याण महल का श्रेय देते हैं। किताब जिंजी के झूलते मण्डप का चित्र देती है (पृष्ठ 187)। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)
  • केलदि, जो बाद में इक्केरी कहलाया: हेरास के अनुसार उस क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण अधीन राज्य केलदि था, और इसके नायकों की उत्पत्ति पर कई मत हैं। परिवार के इतिवृत्त के अनुसार किसान बसव के बेटे चौड को ज़मीन में गड़ा ख़ज़ाना मिला और वह मुखिया बना; उस समय के राजा ने, हेरास के अनुसार संभवतः कृष्णदेव राय ने, उसे पुल्ल-देश का राज्यपाल बनाकर “केलदि चौडप्प नायक” की उपाधि दी। चौडप्प के बेटे सदाशिव नायक रामराय की सेना में लड़े, और कहा जाता है कि भद्रप्प नायक राजधानी केलदि से इक्केरी ले गए। हेरास यहाँ स्थापना का साल नहीं देते। स्रोत: हेरास, द अराविडु डाइनेस्टी ऑफ़ विजयनगर, 1927 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि राजा अमर-नायकों का तबादला करके अपना नियंत्रण जताते थे (पृष्ठ 175)। ओटा नोबुहिरो का शोध इस बात को कैसे आगे ले जाता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: ओटा के अनुसार तुलुव काल में:

  • दरबार में हाज़िरी: नायकों को राजधानी में रहना और रोज़ दरबार में हाज़िर होना पड़ता था।
  • जल्दी तबादले: उनकी जागीरें काफ़ी कम समय में बदल दी जाती थीं, इसलिए किसी एक प्रांत में उनका पक्का आधार नहीं बन पाता था।

यानी तबादला राजा का एक बड़ा हथियार था। किताब की यह बात भी याद रखिए कि सत्रहवीं शताब्दी में कई नायकों ने स्वतंत्र राज्य बना लिए (पृष्ठ 175)।

सवाल: तंजावुर नायक राज्य कब बना? तीन स्रोत तीन साल क्यों देते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: स्रोतों में 1549 (तंजौर गज़ेटियर, 1906), 1541 (हेरास, 1927) और 1532 (वृद्धगिरीशन) मिलते हैं। हर विद्वान अलग अभिलेख और रचना को आधार बनाता है, इसलिए साल बदल जाता है। ये साल नायकशाही की शुरुआत के हैं, जब सेवप्प, वृद्धगिरीशन के अनुसार, अच्युत राय के सामंत थे। किताब कोई साल नहीं देती, बस इतना कहती है कि सत्रहवीं शताब्दी में कई नायकों ने स्वतंत्र राज्य बना लिए (पृष्ठ 175); परीक्षा में यही लिखिए।

सवाल: “चर्चा कीजिए” (पृष्ठ 175) के पाँच नायक केंद्रों में से किन-किन के बारे में हम ऊपर कुछ जान पाए?

उत्तर देखिए

उत्तर: इस पन्ने के स्रोतों से:

  • मदुरई: विश्वनाथ नायक, अच्युत राय के समय (हेरास; वृद्धगिरीशन के अनुसार 1535 का अभिलेख)।
  • तंजावुर: सेवप्प नायक, साल पर तीन मत।
  • इक्केरी: केलदि के नायक, जो राजधानी केलदि से इक्केरी ले गए (हेरास)।
  • चन्द्रगिरी: अराविदु राजाओं की राजधानी (किताब, पृष्ठ 173; हेरास के अनुसार वेंकट द्वितीय कई साल वहाँ से राज करते रहे)।

मैसूर के बारे में इस पन्ने के स्रोतों में कुछ नहीं है।

छह विदेशी यात्री और उनके रास्ते

किताब कहाँ रुकती है। किताब के बॉक्स में छह यात्री हैं: पंद्रहवीं शताब्दी में निकोलो दे कॉन्ती (इतालवी व्यापारी), अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस के राजा का दूत) और अफ़ानासी निकितिन (रूस का एक व्यापारी); सोलहवीं शताब्दी में दुआर्ते बरबोसा, डोमिंगो पेस और पुर्तगाल का फर्नाओ नूनिज़ (पृष्ठ 176)। किताब बताती है कि अब्दुर रज़्ज़ाक को फ़ारस के शासक ने कालीकट (कोज़ीकोड) भेजा था और उसने “दुर्गों की सात पंक्तियों” का उल्लेख किया (पृष्ठ 177); पेस के शहर, जलाशय और “विजय का भवन” वाले अंश भी किताब में हैं (पृष्ठ 176, 177, 180)। किताब यहीं रुकती है: ये यात्री कब आए, किस रास्ते से आए, किस भाषा में लिखा, और उनके वृत्तांत हम तक कैसे पहुँचे, यह उसमें नहीं आता। प्रश्नावली का प्रश्न 10 इटली, पुर्तगाल, ईरान और रूस को मानचित्र पर दिखाने और इन यात्रियों के रास्ते पहचानने को कहता है; नीचे के रास्ते उसमें काम आएँगे।

निकोलो दे कॉन्ती: वेनिस से “बिज़ेनेगालिया”

  • कौन थे: आर. एच. मेजर (1857) के अनुसार कॉन्ती वेनिस के एक कुलीन परिवार से थे, और जवानी में दमिश्क में व्यापारी के रूप में रहते थे; वहीं से वे पूरब की यात्रा पर निकले, पर किस साल, यह ठीक-ठीक पता नहीं। वे पच्चीस साल बाहर रहकर 1444 में वेनिस लौटे। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) विजयनगर में उनके आने का समय लगभग 1420 बताते हैं। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में) · फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • रास्ता: मेजर के अनुवाद के अनुसार कॉन्ती दमिश्क से एक कारवाँ के साथ अरब के रेगिस्तान पार करके फ़रात (यूफ़्रेटीज़) नदी तक गए। भारत में उनका पहला शहर कैम्बे था। वहाँ से बीस दिन समुद्र में चलकर वे तट के दो शहरों, पकामुरिया और हेली, पहुँचे, और फिर लगभग तीन सौ मील भीतर जाकर “बहुत खड़ी पहाड़ियों के पास बसे बड़े शहर बिज़ेनेगालिया” पहुँचे, जिसका घेरा साठ मील का था। मेजर बिज़ेनेगालिया को विजयनगर बताते हैं, “उस समय भारत के सबसे शक्तिशाली राज्य की राजधानी”। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)
  • लैटिन में लिखा गया: मेजर के अनुसार लौटने पर पोप यूजीन चतुर्थ ने कॉन्ती से प्रायश्चित के रूप में कहा कि वे अपनी यात्रा पोप के सचिव पोज्जो ब्राच्चोलिनी को सुनाएँ, और पोज्जो ने उसे लैटिन में लिखा (“हिस्टोरिया दे वारिएताते फ़ोर्तूने”, चौथी पुस्तक)। मेजर के 1857 के खंड में इसका पहला अंग्रेज़ी अनुवाद जे. विंटर जोन्स ने किया, जो ब्रिटिश संग्रहालय में छपी पुस्तकों के रक्षक थे। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)

अब्दुर रज़्ज़ाक: हेरात से कालीकट होकर विजयनगर

  • कौन थे: मेजर (1857) के अनुसार अब्दुर रज़्ज़ाक का जन्म हेरात में 1413 में हुआ। वे शाहरुख़ के राजदूत थे, और हिजरी 845 (ई. 1441) में उन्हें उस राजा के पास भेजा गया जिसकी राजधानी विजयनगर थी। इस दूतावास का वृत्तांत उन्होंने फ़ारसी में अपनी रचना मतला-अस-सादैन में लिखा। 1482 में उनकी मृत्यु हुई। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)
  • रास्ता: मेजर के अनुसार वे जनवरी 1442 में हेरात से चले, कोहिस्तान और किरमान होकर होरमुज़ पहुँचे, और वहाँ से समुद्र के रास्ते भारत के लिए निकले; बीच में उन्हें कई महीने मस्कट में रुकना पड़ा। वे कालीकट बंदरगाह पर उतरे, फिर मंगलोर होकर विजयनगर पहुँचे। 5 नवंबर 1443 को वे विजयनगर से चले, और 28 जनवरी 1444 को मंगलोर बंदरगाह से वापसी की यात्रा पर निकले। किताब का “कालीकट भेजा था” (पृष्ठ 177) इसी रास्ते का पहला पड़ाव है। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)
  • सात क़िलेबंदियाँ: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार वे देवराय द्वितीय (शासन 1424–46) के समय आए। सात घेरेदार क़िलेबंदियाँ पार करके वे राजा के सबसे भीतरी महल तक पहुँचे, जहाँ उन्होंने दरबार का सभागार, न्याय का सभागार, मुख्य मंत्री का सभागार और टकसाल देखी, और हाथियों के ऐसे अस्तबल भी, जिनमें हर हाथी का अलग कक्ष था। पर फ़्रिट्ज़ और मिशेल यह सावधानी भी रखते हैं कि अब्दुर रज़्ज़ाक ने इमारतों और उनकी जगहों का इतना ब्योरा नहीं दिया कि आज के खंडहरों से उनकी पक्की पहचान की जा सके। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • अनुवाद: मेजर के खंड में अब्दुर रज़्ज़ाक का वृत्तांत फ़ारसी से एम. कात्रमेयर के फ़्रांसीसी अनुवाद से अंग्रेज़ी में लाया गया, और यह अनुवाद मेजर ने ख़ुद किया। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)

अफ़ानासी निकितिन: त्वेर से बीदर

  • कौन थे: मेजर (1857) के अनुसार निकितिन रूस के त्वेर नगर के निवासी थे। मेजर के खंड के अनुसार वे 1468 में निकले और 1474 में रूस लौटे होंगे। रूसी इतिहासकार करमज़िन लिखते हैं कि निकितिन लगभग 1470 में व्यापार के लिए दक्कन और गोलकुंडा के राज्यों में गए। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)
  • रास्ता: मेजर के अनुसार वे त्वेर से वोल्गा नदी के रास्ते कैस्पियन सागर तक गए, अस्त्राख़ान के पास लूटे गए, फिर बाकू, फ़ारस और होरमुज़ होकर भारत के चौल बंदरगाह पर उतरे, जो बम्बई से थोड़ा दक्षिण में है। वहाँ से वे बीदर गए, जिसे वे “पूरे मुसलमानी हिंदुस्तान का प्रमुख शहर” कहते हैं, और लगभग चार साल बीदर और आस-पास के इलाक़ों में रहे। वापसी में वे दाबुल से होरमुज़ गए, और त्रेबिज़ोंद और काफ़ा होते हुए लौटे; स्मोलेंस्क पहुँचने से पहले उनकी मृत्यु हो गई। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)
  • विजयनगर का वर्णन: मेजर के अनुवाद में निकितिन लिखते हैं कि हिंदू सुल्तान बहुत शक्तिशाली है, उसकी सेना बड़ी है, और वह “बिचेनेगेर” (विजयनगर) में एक पहाड़ पर रहता है; “यह विशाल शहर तीन क़िलों से घिरा है और इसके बीच से एक नदी बहती है”। उनका वृत्तांत रूसी इतिवृत्तों में बचा रहा, रूसी भाषा में, बीच-बीच में रूसी अक्षरों में लिखे पूरबी शब्दों के साथ; मेजर के खंड में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद काउंट वेलहोर्स्की ने किया। स्रोत: मेजर (सं.), इंडिया इन द फ़िफ़्टीन्थ सेंचुरी, 1857 (अंग्रेज़ी में)

दुआर्ते बरबोसा: पुर्तगाली अधिकारी

  • कौन थे: एम. एल. डेम्स (1918) के अनुसार बरबोसा पुर्तगाल के एक अधिकारी थे, जो लगभग 1500 से लगभग 1516 या 1517 तक भारत में पुर्तगाली सरकार की सेवा में रहे, और कोचीन में अपने चाचा के साथ रहे थे। उनकी किताब में “द किंगडम ऑफ़ नरसिंगुआ” (नरसिंगुआ का राज्य) नाम का अध्याय है; डेम्स के नोट में लिखा है: “बिसनगा या विजयनगर, कर्नाट की राजधानी और केंद्र”। स्रोत: डेम्स (अनु.), द बुक ऑफ़ दुआर्ते बरबोसा, 1918 (अंग्रेज़ी में)
  • किताब कब पूरी हुई: किताब के पहले पन्ने पर लिखा है कि यह लगभग 1518 में पूरी हुई। डेम्स बताते हैं कि बरबोसा की भूमिका में 1516 लिखा है, पर वह भूमिका केवल रामूसियो के इतालवी संस्करण में मिलती है; डेम्स के विचार में किताब 1517-18 में पूरी हुई, या उसमें तब कुछ नोट जोड़े गए। स्रोत: डेम्स (अनु.), द बुक ऑफ़ दुआर्ते बरबोसा, 1918 (अंग्रेज़ी में)

डोमिंगो पेस और फर्नाओ नूनिज़: पेरिस की एक पांडुलिपि

  • एक जिल्द में दो वृत्तांत: सेवेल (1900) के अनुसार पेस और नूनिज़ के वृत्तांत पेरिस की बिब्लियोथेक नास्योनाल में चर्मपत्र की जिल्द वाले एक खंड में रखे हैं (“पोर्त. नं. 65”)। सेन्योर लोपेस ने इन्हें मूल पुर्तगाली में छापा, और इनका पहला अंग्रेज़ी अनुवाद सेवेल की किताब ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर (1900) में आया। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) सेवेल की इस किताब को उस समय तक ज्ञात सारे अभिलेखों और पांडुलिपियों का ऐतिहासिक सार कहते हैं। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में) · फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • कब लिखे गए: सेवेल के अनुसार दोनों वृत्तांत अलग-अलग सालों में विजयनगर में पुर्तगाली व्यापारियों या यात्रियों ने लिखे: एक 1520 के कुछ ही बाद, और दूसरा लगभग 1536 या 1537 के बाद नहीं। सेवेल पेस के वृत्तांत के शीर्षक में “संभवतः ई. 1520-22 में लिखा गया” लिखते हैं। फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार पेस लगभग 1520 से 1522 तक राजधानी में थे, और नूनिज़ अच्युतदेव राय के शासन के समय वहाँ थे। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में) · फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • घोड़ों का व्यापारी: सेवेल के अनुवाद में वृत्तांतों के साथ भेजे गए पत्र में लिखा है कि पेस “क्रिसनाराव” (कृष्णदेव राय) के समय “बिसनगा” (विजयनगर) में थे, और नूनिज़ वहाँ तीन साल घोड़ों का व्यापार करते रहे, जिसमें मुनाफ़ा नहीं हुआ। सेवेल का मत है कि पेस और नूनिज़, दोनों पक्का दिखाते हैं कि कृष्णदेव राय विजयनगर के सबसे महान राजा थे। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)

हमारी ओर से: नूनिज़ का घोड़ों का व्यापार किताब के भाग 2.1 से सीधा जुड़ता है: युद्धकला अश्वसेना पर टिकी थी, इसलिए अरब और मध्य एशिया से घोड़ों का आयात ज़रूरी था, और अमुक्तमल्यद भी घोड़े लाने वाले व्यापारियों का ध्यान रखने को कहती है (पृष्ठ 172–173)।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: प्रश्नावली के प्रश्न 10 के लिए बच्चे मानचित्र पर कॉन्ती, अब्दुर रज़्ज़ाक और निकितिन के रास्ते कैसे दिखाएँ?

उत्तर देखिए

उत्तर: मेजर (1857) के अनुवाद के अनुसार:

  • कॉन्ती (इटली): वेनिस के व्यापारी, दमिश्क से कारवाँ के साथ फ़रात नदी तक; भारत में कैम्बे, फिर तट के रास्ते पकामुरिया और हेली, और वहाँ से लगभग तीन सौ मील भीतर विजयनगर।
  • अब्दुर रज़्ज़ाक (फ़ारस): हेरात से कोहिस्तान और किरमान होकर होरमुज़, समुद्र से मस्कट होकर कालीकट, फिर मंगलोर होकर विजयनगर।
  • निकितिन (रूस): त्वेर से वोल्गा, कैस्पियन सागर, बाकू, फ़ारस और होरमुज़ होकर चौल, फिर बीदर।

पुर्तगाली यात्रियों के लिए पुर्तगाल से भारत के पश्चिमी तट तक का समुद्री रास्ता दिखाइए; किताब बताती है कि पुर्तगाली 1498 से पश्चिमी तट पर आने लगे थे (पृष्ठ 172)।

सवाल: पेस और नूनिज़ के वृत्तांत अंग्रेज़ी पढ़ने वालों तक कब और कैसे पहुँचे?

उत्तर देखिए

उत्तर: सेवेल (1900) के अनुसार दोनों पुर्तगाली वृत्तांत पेरिस की बिब्लियोथेक नास्योनाल की एक पांडुलिपि में हैं। सेन्योर लोपेस ने इन्हें मूल पुर्तगाली में छापा, और सेवेल ने 1900 में ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर में इनका पहला अंग्रेज़ी अनुवाद दिया। किताब के स्रोत 3 और स्रोत 4 (पृष्ठ 176–177) पेस के इन्हीं वृत्तांतों से हैं।

सवाल: अब्दुर रज़्ज़ाक ने हाथियों के अस्तबल देखे थे। क्या आज का “हाथियों का अस्तबल” वही इमारत है?

उत्तर देखिए

उत्तर: यह पक्का नहीं कहा जा सकता। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) लिखते हैं कि अब्दुर रज़्ज़ाक ने इमारतों और उनकी जगहों का इतना ब्योरा नहीं दिया कि उनकी पहचान पक्की मानी जाए। किताब भी इस नाम को उद्धरण-चिह्नों में लिखती है (पृष्ठ 182)।

पानी का इंतज़ाम: हौज़, नहरें और बाँध

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि विजयनगर “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” में था, इसलिए धाराओं पर बाँध बनाकर अलग-अलग आकार के हौज़ बनाए गए। “पंद्रहवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में” बने कमलपुरम् जलाशय से खेत सींचे जाते थे, और एक नहर से उसका पानी “राजकीय केंद्र” तक जाता था। हिरिया नहर तुंगभद्रा पर बने बाँध से पानी लाकर “धार्मिक केंद्र” को “शहरी केंद्र” से अलग करने वाली घाटी को सींचती थी, और इसे संभवत: संगम वंश के राजाओं ने बनवाया था। स्रोत 4 में पेस कृष्णदेव राय के बनवाए एक जलाशय का वर्णन करता है, जिसमें “पन्द्रह से बीस हज़ार आदमी” काम कर रहे थे (पृष्ठ 177)। किताब यहीं रुकती है: पेस का जलाशय कहाँ था, विजयनगर के कौन-से जल-साधन बाद में भी काम आते रहे, और राजकीय केंद्र के भीतर पानी कैसे पहुँचता था, यह उसमें नहीं आता।

घाटी की सिंचाई: छोटे बाँध, नहरें और टैंक

  • नदी से नहरें, बारिश से टैंक: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार विजयनगर के राजाओं ने घाटी की प्राकृतिक बनावट का लाभ उठाकर बड़े पैमाने पर सिंचाई योजनाएँ चलवाईं। छोटे बाँध तुंगभद्रा का पानी नहरों में मोड़ते थे, जो नदी से काफ़ी दूर के खेत सींचती थीं। बारिश का पानी रोकने के लिए मिट्टी की दीवारों वाले बड़े और छोटे जलाशय, जिन्हें टैंक कहते हैं, बनाए गए, और बड़े टैंकों से नहरें पानी को पूरे स्थल में ले जाती थीं। यूनेस्को भी उपनगरों (पुर) के साथ जुड़े टैंकों और उनकी अनूठी जल-तकनीकों का ज़िक्र करता है। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में) · यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • कमलपुरम् और मलपन्नगुडि के बाँध: फ़्रिट्ज़ और मिशेल लिखते हैं कि राजधानी के उपनगरों के साथ बड़े-बड़े टैंक जुड़े थे, जैसे शहरी केंद्र के दक्षिण-पूर्व में कमलपुरम् गाँव के पास, और उससे दूर दक्षिण-पश्चिम में मलपन्नगुडि गाँव के पास के बड़े बाँध। राजकीय केंद्र के दक्षिण-पूर्व में एक छोटी घाटी के आर-पार एक और विशाल दीवार, जो अब टूटी है, उनके अनुसार शहरी केंद्र का सबसे बड़ा जलाशय बनाती रही होगी। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • तुरुत्ता नहर: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार तुरुत्ता नहर सिंचित घाटी के दक्षिणी किनारे से होकर चलती है। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

पेस का जलाशय: होसपेट के पास

  • पेस के अपने शब्द: सेवेल (1900) के अनुवाद में पेस लिखता है कि राजा ने वहाँ एक जलाशय बनवाया, जो उसे “बाज़ की उड़ान जितना” चौड़ा लगा, और जो दो पहाड़ियों के मुहाने पर था। सेवेल लिखते हैं कि “वहाँ” का मतलब होसपेट के पास है, और अपनी टिप्पणी में नागलापुर को “आज का होसपेट” बताते हैं। किताब बताती है कि कृष्णदेव राय ने अपनी माँ के नाम पर विजयनगर के समीप नगलपुरम् नाम का उपनगर बसाया था (पृष्ठ 173)। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)
  • सेवेल की पहचान: सेवेल लिखते हैं कि उनके विचार में यह होसपेट के दक्षिण-पश्चिम में संडूर की पहाड़ियों में जाने वाली घाटी के उत्तर-पश्चिमी मुहाने पर दिखने वाली वह बड़ी झील है, जो 1900 में सूखी पड़ी थी। सेवेल के अनुसार यह जलाशय एक पुर्तगाली इंजीनियर, जोआओ दे ला पोंते, की मदद से बना, इसका काम शायद 1520 में शुरू हुआ, और 1900 तक यह विशाल काम पूरी तरह बेकार हो चुका था। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)
  • मिट्टी की एक दीवार: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार पेस ने कृष्णदेव राय के नए राजकीय उपनगर के बाहर एक विशाल जलाशय बनते देखा था, और उस अधूरी योजना का अब बस होसपेट के बाहरी हिस्से में एक घाटी के आर-पार बनी मिट्टी की विशाल दीवार बची है। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

नहरें जो 1900 और 1991 में भी चल रही थीं

  • 1900 में सेवेल: सेवेल लिखते हैं कि कृष्णदेव राय ने 1521 में कोर्रगल का बड़ा बाँध और नहर, और बसवण्णा नहर बनवाई, और 1900 में ये दोनों तब भी काम में थीं और इलाक़े के लिए बहुत उपयोगी थीं। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)
  • 1991 में फ़्रिट्ज़ और मिशेल: वे लिखते हैं कि उनके समय में घाटी को सींचने वाली व्यवस्था पुरानी व्यवस्था के कुछ हिस्सों को ही फिर से इस्तेमाल करती थी, और उस समय की कई नहरें और बाँध असल में विजयनगर काल के थे; विजयनगर काल की नहरों, बाँधों और पुलों की देखभाल वे किसान करते थे जिन्हें लगातार पानी चाहिए था। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

राजकीय केंद्र के भीतर पानी

  • नालियाँ और सीढ़ीदार टैंक: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार राजकीय केंद्र में एक जटिल जल-व्यवस्था के अवशेष बचे हैं: पलस्तर लगी पत्थर की नालियाँ, निकास नालियाँ और जलसेतु। यहाँ एक बड़ा चौकोर टैंक है जिसके चारों ओर सीढ़ियाँ हैं, और जो पूरा का पूरा दूर की खदानों से लाए गए स्लेटी-हरे क्लोराइट पत्थर से बना है। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • क्या नया बना है: वही स्रोत एक दूसरे टैंक के बारे में भी बताता है: एक विशाल आयताकार टैंक, जो बनाए गए तटबंध पर ऊँचा उठा है और जिसकी भीतरी ईंट की दीवारों पर पलस्तर है। स्रोत सावधान करता है कि इस टैंक के पश्चिम का मण्डप आधुनिक पुनर्निर्माण है, और आस-पास का जलसेतु, ऊँची नालियाँ और निकास नालियाँ भी फिर से बनाई गई हैं। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि विजयनगर “प्रायद्वीप के सबसे शुष्क क्षेत्रों में से एक” में था (पृष्ठ 177)। फिर वहाँ बगीचे और धान के खेत कैसे सींचे जाते थे?

उत्तर देखिए

उत्तर: दो तरह से:

  • नदी का पानी: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार छोटे बाँध तुंगभद्रा का पानी नहरों में मोड़ते थे, जो दूर के खेतों तक जाती थीं; किताब हिरिया नहर का उदाहरण देती है।
  • बारिश का पानी: मिट्टी की दीवारों वाले टैंक बारिश का पानी रोकते थे; किताब कमलपुरम् जलाशय का उदाहरण देती है, और पेस के जलाशय के पाइप बगीचों और धान के खेतों तक पानी ले जाते थे (पृष्ठ 177)।

सवाल: पेस ने जिस जलाशय को बनते देखा, वह आज कहाँ माना जाता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: सेवेल (1900) के विचार में वह होसपेट के दक्षिण-पश्चिम में संडूर की पहाड़ियों में जाने वाली घाटी के मुहाने पर वह बड़ी झील है, जो 1900 में सूखी पड़ी थी। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार उसका बस होसपेट के बाहरी हिस्से में मिट्टी की एक विशाल दीवार बची है। दोनों उसे होसपेट के पास रखते हैं।

सवाल: क्या विजयनगर की कोई नहर बाद में भी काम आती रही?

उत्तर देखिए

उत्तर: हाँ, स्रोत अपने-अपने समय की बात कहते हैं: सेवेल के अनुसार 1900 में कोर्रगल का बाँध और नहर और बसवण्णा नहर काम में थीं, और फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार 1991 में घाटी की कई नहरें और बाँध विजयनगर काल के थे, जिनकी देखभाल किसान करते थे। ध्यान रहे कि ये बातें 1900 और 1991 की हैं, आज की नहीं।

हम्पी के प्रमुख स्मारक, यूनेस्को के विवरण के साथ

किताब कहाँ रुकती है। किताब महानवमी डिब्बा को “लगभग 11000 वर्ग फीट के आधार से 40 फीट की ऊँचाई तक” जाने वाला मंच बताती है, जिस पर लकड़ी की एक संरचना के साक्ष्य मिले हैं (पृष्ठ 180); कमल महल की नौ मीनारें और “संभवत: इण्डो–इस्लामी तकनीकों से प्रभावित” मेहराबें (पृष्ठ 181), और पास का “हाथियों का अस्तबल” (पृष्ठ 182); हज़ार राम मन्दिर, जिसके बारे में किताब कहती है, “संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा ही किया जाता था” (पृष्ठ 183); विरुपाक्ष मन्दिर, जिसमें कृष्णदेव राय का मण्डप है (पृष्ठ 186); विट्ठल मन्दिर और रथ के आकार का अनूठा मन्दिर (पृष्ठ 187–188); 1976 में राष्ट्रीय महत्त्व के स्थल की मान्यता (पृष्ठ 188) और 1986 में विश्व धरोहर स्थल (पृष्ठ 193)। किताब यहीं रुकती है: यूनेस्को हम्पी के बारे में क्या कहता है, और विद्वान हर स्मारक को कब का मानते हैं, यह उसमें नहीं आता।

यूनेस्को की सूची में हम्पी

  • 1986, तीन कसौटियाँ: यूनेस्को ने हम्पी को 1986 में विश्व धरोहर सूची में शामिल किया, तीन कसौटियों, पहली, तीसरी और चौथी, पर। धरोहर स्थल का क्षेत्रफल 4,187.24 हेक्टेयर है और उसके चारों ओर का बफ़र क्षेत्र 19,453.62 हेक्टेयर; 2012 में इसकी सीमा में छोटा बदलाव हुआ। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • क्या-क्या है: यूनेस्को के अनुसार यह स्थल मुख्य रूप से विजयनगर साम्राज्य (चौदहवीं से सोलहवीं शताब्दी) की राजधानी के अवशेष हैं, जिसे वह “अंतिम महान हिंदू राज्य” कहता है; यह मध्य कर्नाटक के बेल्लारी ज़िले में तुंगभद्रा बेसिन में है। यहाँ 1600 से ज़्यादा बचे हुए अवशेष हैं: क़िले, नदी किनारे की संरचनाएँ, राजकीय और धार्मिक परिसर, मन्दिर, देवस्थल, स्तंभों वाले सभागार, मण्डप, स्मारक, प्रवेशद्वार, रक्षा चौकियाँ, अस्तबल और जल-संरचनाएँ। यूनेस्को के अनुसार यहाँ 200 साल तक निर्माण चलता रहा। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • तीनों कसौटियाँ, एक-एक वाक्य में: पहली: योजना से बसे और क़िलेबंद शहर, उसके मन्दिरों के स्थापत्य और शानदार प्राकृतिक परिवेश का मेल एक अनूठी कलात्मक रचना है; तीसरी: यह शहर विजयनगर की लुप्त सभ्यता का असाधारण साक्ष्य है, जो कृष्णदेव राय के समय अपने चरम पर पहुँची; चौथी: यह राजधानी उस ऐतिहासिक घटना का उदाहरण है जिसमें तालीकोटा की लड़ाई (1565) में विजयनगर राज्य नष्ट हुआ। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • आज भी पूजा, और 56 संरक्षित स्मारक: यूनेस्को लिखता है कि विरुपाक्ष मन्दिर में लगातार पूजा होती है, और यहाँ के छप्पन राष्ट्रीय संरक्षित स्मारकों की सुरक्षा और प्रबंधन भारत सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के ज़िम्मे है, बाक़ी क्षेत्र का कर्नाटक सरकार के। किताब बताती है कि विरुपाक्ष और पम्पादेवी का विवाह आज तक हर वर्ष विरुपाक्ष मन्दिर में मनाया जाता है (पृष्ठ 184)। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)

विट्ठल मन्दिर और पत्थर का रथ

  • यूनेस्को की नज़र में: यूनेस्को विट्ठल मन्दिर को स्थल की सबसे बारीक सजी इमारत और विजयनगर मन्दिर-स्थापत्य का शिखर कहता है। इसमें ग्रेनाइट के रथ के रूप में बना गरुड़ का देवस्थल है, और एक बड़ी बाज़ार-गली। परिसर में एक बड़ी पुष्करिणी (सीढ़ीदार कुंड) भी है, जिसके बीच में वसंतोत्सव मण्डप है, और कुएँ और नालियों का जाल भी। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • किसने बनवाया: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार इसके मूल संरक्षक और निर्माण का साल पता नहीं, पर इसकी नींव सबसे संभवतः सोलहवीं शताब्दी में पड़ी; 1513 से 1554 तक के कई अभिलेख दिखाते हैं कि कृष्णदेव राय, अच्युतदेव राय और सदाशिव के समय इसमें बड़े जोड़ हुए। सेवेल (1900) के अनुसार लगता है कि इसका निर्माण कृष्णदेव राय ने शुरू किया, अच्युत और सदाशिव के समय काम चलता रहा, और शायद 1565 में शहर के विनाश से ही रुका; सेवेल 12 अक्टूबर 1540 के एक दान और 1561 के एक दान के अभिलेख भी गिनाते हैं। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में) · सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)

हज़ार राम मन्दिर: दो मत

  • फ़्रिट्ज़ और मिशेल का मत: वे राजकीय केंद्र के इस मन्दिर को रामचन्द्र मन्दिर कहते हैं। उनके अनुसार मुख्य देवालय देवराय प्रथम (शासन 1406–22) के समय का है, जिनका नाम स्तंभों वाले मण्डप के पूर्वी मुख्य द्वार के दोनों ओर की कुर्सी की पट्टियों पर खुदा है; पास का एक अभिलेख, जो 1416-17 का माना जाता है, सोने की वस्तुओं के दान को दर्ज करता है, शायद देवराय की किसी रानी का। पूर्व का खुला बरामदा सोलहवीं शताब्दी में जोड़ा गया। बाहरी दीवारों पर हाथियों की कतारें, सेवकों के साथ घोड़े, करतब दिखाते सैनिक, और नाचती स्त्रियाँ और संगीतकार हैं; भीतरी दीवारों पर रामायण की कथा के दृश्य। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • सेवेल का मत: सेवेल (1900) के अनुसार कृष्णदेव राय ने 1513 में महल के पास “हज़ारा रामस्वामी” मन्दिर बनवाना शुरू किया, और उसके स्थापत्य से श्री री को लगता था कि यह बाद के किसी समय में पूरा हुआ। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)
  • “राजा का निजी मन्दिर”: कर्नाटक सरकार की “प्रोग्रेस ऑफ़ रिसर्च 1979-1983” में मिशेल, एम. एस. नागराज राव और फ़्रिट्ज़ के एक शोध-ग्रंथ का नाम “रामचन्द्र टेम्पल - द रॉयल चैपल” है, यानी रामचन्द्र मन्दिर: राजा का निजी पूजा-स्थल। यह किताब की इस पंक्ति से मेल खाता है कि इसका प्रयोग संभवत: केवल राजा और उनके परिवार द्वारा होता था (पृष्ठ 183)। स्रोत: विजयनगर: प्रोग्रेस ऑफ़ रिसर्च 1979-1983 (अंग्रेज़ी में)

महानवमी डिब्बा: चार चरणों में बना मंच

  • चार चरण: फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार यह मंच चार लगातार चरणों में बना। पहले दो चरण चौदहवीं शताब्दी के माने जा सकते हैं, जब राजकीय केंद्र पहली बार बसाया गया, और तुलुव काल में इसकी बड़ी मरम्मत हुई। यह राजकीय केंद्र के सबसे बड़े घेरे के उत्तर-पूर्वी कोने में है। उनके अनुसार परंपरा इसे महानवमी से जोड़ती है, जिसे संगम राजाओं ने हर साल के एक शानदार उत्सव का रूप दिया। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • लकड़ी की मीनार: किताब बताती है कि मंच पर लकड़ी की एक संरचना के साक्ष्य मिले हैं (पृष्ठ 180)। फ़्रिट्ज़ और मिशेल लिखते हैं कि ऊपर की किसी संरचना की नींव के निशान अब नहीं दिखते, पर मंच पर लकड़ी की एक मीनार शायद खड़ी की गई हो। परीक्षा में किताब की बात लिखिए। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • उत्कीर्णन में क्या है: हाथियों, ऊँटों और घोड़ों की शोभायात्राएँ, शिकार के दृश्य, घुड़सवार योद्धाओं की कतारें, संगीतकार, करतब दिखाने वाले, और नाचती-गाती स्त्रियाँ। पृष्ठ 180 के किनारे के प्रश्न में बच्चे इन्हीं दृश्यों को पहचानते हैं। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)

कमल महल, हाथियों का अस्तबल और “रानी का स्नानागार”

  • कमल महल किस काम का: किताब बताती है कि इतिहासकार निश्चित नहीं हैं कि यह भवन किस काम के लिए बना था, और मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिले एक सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था (पृष्ठ 181–182)। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) इसे “दो-मंज़िला मण्डप” कहते हैं और लिखते हैं कि यह शायद राजा या उनके सैनिक कमांडर का निवास था, क्योंकि यह हाथियों के अस्तबल के पास है। इसकी पत्थर की कुर्सी पर बेल-बूटे और ज्यामितीय आकृतियाँ इस्लामी शैली के चपटे उभार में खुदी हैं, और बाहर बड़ी-बड़ी नोकदार मेहराबें हैं। जिस घेरे में यह है, उसे अक्सर ज़नाना (स्त्रियों का भाग) कहा जाता है, पर उनके अनुसार इसका दरबार की स्त्रियों से शायद ही कोई लेना-देना था। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • हाथियों का अस्तबल: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार यह राजकीय केंद्र की सबसे बड़ी और भव्य दरबारी इमारत है, जिसमें ग्यारह चौकोर कक्ष हैं; दस कक्ष, जिन पर बारी-बारी से अलग-अलग डिज़ाइन के गुंबद और मेहराबी छतें हैं, बीच की मीनार के दोनों ओर बराबर-बराबर बने हैं। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • “रानी का स्नानागार”: फ़्रिट्ज़ और मिशेल लिखते हैं कि इस इमारत को अक्सर रानियों का स्नानागार कहा जाता है, पर यह राजा और दरबार के पुरुषों के नहाने की जगह भी रही होगी; इसके चारों ओर पानी की नाली है। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में)
  • इण्डो-इस्लामी तत्त्व: यूनेस्को के अनुसार विजयनगर का स्थापत्य धर्मेतर इमारतों में, जैसे रानी के स्नानागार और हाथियों के अस्तबल में, इण्डो-इस्लामी स्थापत्य के तत्त्व अपनाने के लिए भी जाना जाता है, जो उसके शब्दों में बहुत विकसित, कई धर्मों और कई समुदायों वाले समाज को दिखाता है। किताब भी कहती है कि पड़ोसी राज्यों से संपर्क में विचारों का आदान-प्रदान हुआ, “विशेष रूप से स्थापत्य के क्षेत्र में” (पृष्ठ 171)। स्रोत: यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)

कृष्ण मन्दिर और विरुपाक्ष

  • कृष्ण मन्दिर: यूनेस्को इसे हम्पी के प्रमुख परिसरों में गिनता है, पर किताब में यह नहीं है। सेवेल (1900) के अनुसार कृष्णदेव राय ने पूरब के सफल अभियान से लौटकर 1513 में इसे बनवाया। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार यह उनके शासन का पहला बड़ा स्मारक था, और एक विजयी सैनिक अभियान की याद में 1515 में पूरा हुआ; अभिलेख के अनुसार इसमें बालकृष्ण की एक मूर्ति थी जो उदयगिरि के क़िले से लाई गई थी। किताब के 1514 के उड़ीसा अभियान (पृष्ठ 173) से इसे जोड़िए। स्रोत: सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में) · फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में) · यूनेस्को विश्व धरोहर सूची (अंग्रेज़ी में)
  • विरुपाक्ष, राजघराने के रक्षक: फ़्रिट्ज़ और मिशेल के अनुसार संगम राजाओं के पहले अभिलेख भगवान विरुपाक्ष को राजघराने का रक्षक देवता कहते हैं; किताब भी बताती है कि राजकीय आदेशों पर कन्नड़ लिपि में “श्री विरुपाक्ष” अंकित होता था (पृष्ठ 184)। सेवेल (1900) हम्पी मन्दिर के प्रमुख से मिली जानकारी के आधार पर लिखते हैं कि कृष्णदेव राय ने अपने राज्यारोहण की ख़ुशी में मन्दिर के प्रवेश पर बड़ी मीनार बनवाई, और कुछ ही समय बाद उससे छोटी दूसरी। किताब के अनुसार मुख्य मन्दिर के सामने का मण्डप उन्होंने राज्यारोहण के उपलक्ष्य में बनवाया, और पूर्वी गोपुरम् का श्रेय भी उन्हें दिया जाता है (पृष्ठ 186); परीक्षा में किताब की बात लिखिए। स्रोत: फ़्रिट्ज़ और मिशेल, सिटी ऑफ़ विक्टरी, 1991 (अंग्रेज़ी में) · सेवेल, ए फ़ॉरगॉटन एम्पायर, 1900 (अंग्रेज़ी में)

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: यूनेस्को ने हम्पी को किन तीन कसौटियों पर विश्व धरोहर स्थल माना?

उत्तर देखिए

उत्तर: यूनेस्को के अनुसार:

  • पहली कसौटी: योजना से बसा, क़िलेबंद शहर, उसके मन्दिरों का स्थापत्य और शानदार प्राकृतिक परिवेश मिलकर एक अनूठी कलात्मक रचना हैं।
  • तीसरी कसौटी: शहर विजयनगर की लुप्त सभ्यता का असाधारण साक्ष्य है।
  • चौथी कसौटी: यह उस घटना का उदाहरण है जिसमें तालीकोटा की लड़ाई (1565) में विजयनगर राज्य नष्ट हुआ।

किताब के अनुसार हम्पी 1986 में विश्व धरोहर स्थल बना (पृष्ठ 193)।

सवाल: कमल महल किस काम आता था? किताब और फ़्रिट्ज़-मिशेल की राय में क्या फ़र्क़ है?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब कहती है कि इतिहासकार निश्चित नहीं हैं; मैकेन्ज़ी के मानचित्र से मिले सुझाव के अनुसार यह परिषदीय सदन था, जहाँ राजा अपने परामर्शदाताओं से मिलता था (पृष्ठ 181–182)। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) के अनुसार यह शायद राजा या उनके सैनिक कमांडर का निवास था, क्योंकि यह हाथियों के अस्तबल के पास है। दोनों ही राय “शायद” वाली हैं; “कमल महल” नाम भी उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेज़ यात्रियों का दिया हुआ है (पृष्ठ 181)। परीक्षा में किताब की बात लिखिए।

सवाल: हज़ार राम मन्दिर किसने बनवाया?

उत्तर देखिए

उत्तर: स्रोत अलग-अलग बात कहते हैं:

  • सेवेल (1900): कृष्णदेव राय ने 1513 में इसे शुरू करवाया।
  • फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991): वे इसे रामचन्द्र मन्दिर कहते हैं, और मुख्य देवालय को देवराय प्रथम (शासन 1406–22) के समय का मानते हैं, क्योंकि उनका नाम मण्डप के द्वार के पास की कुर्सी पर खुदा है; पूर्व का बरामदा सोलहवीं शताब्दी में जुड़ा।

किताब निर्माता का नाम नहीं देती; वह बस कहती है कि संभवत: इसका प्रयोग केवल राजा और उनके परिवार द्वारा होता था, और भीतरी दीवारों पर रामायण के दृश्यांश हैं (पृष्ठ 183)।

सवाल: महानवमी डिब्बा पर लकड़ी की संरचना थी या नहीं?

उत्तर देखिए

उत्तर: किताब बताती है कि इस पर लकड़ी की एक संरचना के साक्ष्य मिले हैं (पृष्ठ 180)। फ़्रिट्ज़ और मिशेल (1991) लिखते हैं कि ऊपर की संरचना की नींव के निशान अब नहीं दिखते, पर शायद लकड़ी की एक मीनार खड़ी की गई हो। दोनों लकड़ी की संरचना की संभावना मानते हैं। परीक्षा में किताब की बात लिखिए।

आज के नोट: महात्मा गांधी (नई) शृंखला

किताब कहाँ रुकती है। किताब पृष्ठ 188 पर विट्ठल मन्दिर में “रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर” का वर्णन करती है। किताब यहीं रुकती है: आज के भारतीय नोटों में से एक पर हम्पी छपा है, और बाक़ी नोटों के पीछे कौन-से चित्र हैं, यह उसमें नहीं आता।

नीचे की बातें भारतीय रिज़र्व बैंक के अपने पन्नों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: हर नोट का अलग पन्ना, और ₹2000 के नोट पर 19 मई 2023 की प्रेस विज्ञप्ति।

सात नोट और उनके पीछे के चित्र

  • एक शृंखला: रिज़र्व बैंक हर नोट के पन्ने पर उसे “महात्मा गांधी (नई) शृंखला” का नोट बताता है। ₹10 से ₹200 तक के पाँच नोटों के बारे में वह एक ही ढंग से लिखता है: नोट के पीछे की तरफ़ अमुक चित्र है, “जो देश की सांस्कृतिक धरोहर दिखाता है”। ₹500 और ₹2000 के बारे में उसके शब्द अलग हैं, जो तालिका के नीचे दिए हैं।
नोटपीछे की तरफ़ का चित्ररंगआकारस्रोत
₹10कोणार्क का सूर्य मन्दिरचॉकलेटी भूरा63 मिमी × 123 मिमी₹10 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹20एलोरा की गुफाएँहरापन लिए पीला63 मिमी × 129 मिमी₹20 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹50हम्पी, रथ के साथफ़्लोरोसेंट नीला66 मिमी × 135 मिमी₹50 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹100रानी की वावलैवेंडर66 मिमी × 142 मिमी₹100 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹200साँची स्तूपचटक पीला66 मिमी × 146 मिमी₹200 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹500भारतीय धरोहर स्थल लाल क़िला (रिज़र्व बैंक के शब्दों में नोट की मुख्य नई थीम)स्टोन ग्रे (पत्थर जैसा स्लेटी)66 मिमी × 150 मिमी₹500 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹2000मंगलयानमैजेंटा66 मिमी × 166 मिमी₹2000 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹10 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में कोणार्क के सूर्य मन्दिर का पहिया, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹10 का नोट, पीछे की तरफ़: कोणार्क का सूर्य मन्दिरImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.
₹20 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में एलोरा की गुफाओं का चित्र, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹20 का नोट, पीछे की तरफ़: एलोरा की गुफाएँImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.
₹100 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में रानी की वाव का चित्र, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹100 का नोट, पीछे की तरफ़: रानी की वावImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.
₹200 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में साँची स्तूप का चित्र, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹200 का नोट, पीछे की तरफ़: साँची स्तूपImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.
₹500 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में लाल क़िले का चित्र, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹500 का नोट, पीछे की तरफ़: लाल क़िलाImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.
₹2000 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में मंगलयान का चित्र, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹2000 का नोट, पीछे की तरफ़: मंगलयानImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.

₹50 का नोट और विजयनगर

  • “हम्पी, रथ के साथ”: रिज़र्व बैंक के अनुसार ₹50 के नोट के पीछे “हम्पी, रथ के साथ” का चित्र है, जो देश की सांस्कृतिक धरोहर दिखाता है। विजयनगर की राजधानी के जिन खंडहरों के बारे में यह अध्याय है, वे हम्पी में हैं, और किताब पृष्ठ 188 पर विट्ठल मन्दिर में “रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर” बताती है। रिज़र्व बैंक यह नहीं लिखता कि नोट पर हम्पी का कौन-सा रथ है। स्रोत: ₹50 का नोट, रिज़र्व बैंक (अंग्रेज़ी में)
₹50 के नोट का पिछला हिस्सा: बीच में रथ के साथ हम्पी का चित्र, और उसका नाम हिंदी और अंग्रेज़ी में छपा है।
₹50 का नोट, पीछे की तरफ़: हम्पी, रथ के साथImage: Reserve Bank of India, via Wikimedia Commons, GODL-India.

₹2000 का नोट: रिज़र्व बैंक का 2023 का फ़ैसला

हमारी ओर से: विजयनगर पढ़ाते समय बच्चों से ₹50 का नोट पलटकर देखने को कहिए: जिस शहर के खंडहर वे किताब में पढ़ रहे हैं, वह उनकी जेब के नोट पर भी है। फिर ऊपर की तालिका और तस्वीरों से बाक़ी नोट मिलवाइए।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: ₹50 के नोट के पीछे क्या छपा है, और उसका इस अध्याय से क्या संबंध है?

उत्तर देखिए

उत्तर: रिज़र्व बैंक के अनुसार ₹50 के नोट के पीछे “हम्पी, रथ के साथ” का चित्र है:

  • हम्पी: विजयनगर की राजधानी के खंडहर हम्पी में हैं, और यह अध्याय उन्हीं के बारे में है।
  • रथ: किताब पृष्ठ 188 पर विट्ठल मन्दिर में “रथ के आकार का एक अनूठा मन्दिर” बताती है।

रिज़र्व बैंक यह नहीं लिखता कि नोट पर कौन-सा रथ है, बच्चे नोट के रथ को किताब के चित्र 7.24 (विट्ठल मन्दिर का रथ) से मिलाकर ख़ुद देख सकते हैं।

सवाल: ₹2000 के नोट के बारे में रिज़र्व बैंक ने 19 मई 2023 को क्या बताया?

उत्तर देखिए

उत्तर: रिज़र्व बैंक की उस दिन की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार:

  • शुरुआत: यह नोट नवंबर 2016 में लाया गया था।
  • छपाई: 2018-19 में इसकी छपाई रोक दी गई।
  • फ़ैसला: रिज़र्व बैंक ने ₹2000 के नोट चलन से वापस लेने का फ़ैसला किया।
  • वैधता: विज्ञप्ति के अनुसार ये नोट वैध मुद्रा बने रहेंगे।