कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 3) · पृष्ठ — 258 से 285
यह पन्ना किसलिए — किताब के तीन विषयों को और गहराई से समझाने के लिए: 1857 में राजस्थान में, जो उस समय राजपूताना कहलाता था, क्या हुआ; लखनऊ की रेज़ीडेंसी की घेराबंदी और बेगम हज़रत महल; और 1857 को उसके अलग-अलग नाम कैसे मिले। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर उसके आगे की बातें, स्रोत के लिंक के साथ, और अंत में कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।
परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। यहाँ की बातें किताब की बात को खोलकर समझाने के लिए हैं। पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।
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1857 में राजस्थान
किताब कहाँ रुकती है। पृष्ठ 270 के एक बॉक्स में किताब बच्चों से कहती है: “पता लगाएँ कि क्या आपके राज्य के लोगों ने 1857 के विद्रोह में हिस्सा लिया था? अगर हाँ, तो उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा? अगर नहीं, तो उसकी व्याख्या कीजिए।” पृष्ठ 275 का मानचित्र 2 विद्रोह के प्रमुख केंद्र दिखाता है, और उस पर अजमेर का नाम है। किताब यहीं रुकती है: राजपूताना में विद्रोह कहाँ-कहाँ हुआ, किसने विद्रोहियों का साथ दिया और कौन अंग्रेज़ों के साथ रहा, यह अध्याय में नहीं आता। नीचे की बातें उस बॉक्स के सवाल पर कक्षा में बात करने के काम आएँगी।
नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: सुरेंद्रनाथ सेन की किताब “एटीन फ़िफ़्टी-सेवन” (भारत सरकार का प्रकाशन विभाग, 1957); ताराचंद की “हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया” का दूसरा खंड (प्रकाशन विभाग, 1967); इम्पीरियल गज़ेटियर ऑफ़ इंडिया का राजपूताना खंड (1908); और उस दौर के दो अंग्रेज़ लेखक: प्रिचर्ड, जिनकी किताब “द म्यूटिनीज़ इन राजपूताना” 1860 में छपी, और मैलेसन, जिनकी “हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी” के दूसरे और तीसरे खंड यहाँ काम आए हैं।
अजमेर और नसीराबाद
- सेन बताते हैं कि हेनरी लॉरेंस कभी राजपूताना में गवर्नर-जनरल के एजेंट रह चुके थे। जब उन्हें अवध सँभालने भेजा गया, तो उनकी जगह उनके बड़े भाई जॉर्ज सेंट पैट्रिक लॉरेंस आए, जो इससे पहले मेवाड़ में पॉलिटिकल एजेंट थे। विद्रोह शुरू हुआ तब जॉर्ज लॉरेंस गर्मियों में आबू में थे। ये वही हेनरी लॉरेंस हैं जिन्हें किताब पृष्ठ 278 पर लखनऊ के कमिश्नर के रूप में रेज़ीडेंसी में पनाह लेते दिखाती है। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- सेन के अनुसार अजमेर राजपूताना का शस्त्रागार था। उसकी रखवाली 15वीं नेटिव इन्फेंट्री की दो कंपनियाँ करती थीं, और यूरोपीय सैनिक डीसा से पहले कहीं नहीं थे। लेफ़्टिनेंट कार्नेल मेर बटालियन को लेकर 39 मील का तेज़ कूच करके अजमेर पहुँचे और शस्त्रागार अपने हाथ में ले लिया। 15वीं के सिपाही वापस नसीराबाद भेज दिए गए। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- नसीराबाद की छावनी में 15वीं और 30वीं नेटिव इन्फेंट्री, देसी तोपख़ाने की एक बैटरी और पहली बॉम्बे लांसर्स तैनात थीं। सेन के अनुसार विद्रोह 28 मई 1857 को शुरू हुआ, जैसे ही सिपाहियों ने सुना कि डीसा से फ़ौज आ रही है। दोनों पैदल रेजिमेंटों के ज़्यादातर सिपाही पहले चुप रहे। कुछ जवानों ने, जो कुल सत्ताईस से ज़्यादा नहीं थे, दौड़कर तोपें छीन लीं। बॉम्बे लांसर्स की वफ़ादारी पर किसी को शक नहीं था, इसलिए उन्हें विद्रोहियों पर भेजा गया, पर उन्होंने हमला करने का दिखावा भर किया, लड़े नहीं। ताराचंद भी लिखते हैं कि राजस्थान में पहला विद्रोह 28 मई को नसीराबाद में हुआ और उसके बाद 3 जून को नीमच में। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · ताराचंद, हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
- 12 जून को डीसा की फ़ौज नसीराबाद पहुँची: अंग्रेज़ी फ़ौज की 83वीं रेजिमेंट के चार सौ सैनिक, 12वीं बॉम्बे इन्फेंट्री और यूरोपीय घुड़सवार तोपख़ाने की एक टुकड़ी। सेन लिखते हैं कि तब तक विद्रोही छावनी छोड़ चुके थे, इसलिए उस पर बिना लड़ाई के फिर क़ब्ज़ा हो गया। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
नीमच
- नीमच में 3 जून की शाम अफ़वाह फैली कि फ़ौज आ रही है, और सेन लिखते हैं कि यह अफ़वाह बेबुनियाद नहीं थी। सिपाहियों ने हथियार उठा लिए और अफ़सर भागकर उदयपुर चले गए। विद्रोही दिल्ली की ओर निकल गए, और जल्दी ही मेवाड़, कोटा और बूँदी की टुकड़ियों ने नीमच पर क़ब्ज़ा कर लिया। इम्पीरियल गज़ेटियर के अनुसार हाड़ौती के तीन शासकों, कोटा, बूँदी और झालावाड़ के, ने अपने राज्य सँभाले रखे और फ़ौजें भेजीं, जिन्होंने लगभग छह हफ़्ते नीमच सँभाला। मेवाड़ के महाराणा ने नीमच से भागे कई यूरोपीय परिवारों को अपने यहाँ आसरा दिया। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · इम्पीरियल गज़ेटियर, राजपूताना, 1908 (अंग्रेज़ी में)
एरिनपुरा और आउवा
- आउवा जोधपुर राज के अधीन एक ठिकाना था। सेन बताते हैं कि जब विद्रोह शुरू हुआ, तब आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह अपने स्वामी, जोधपुर के महाराजा, के ख़िलाफ़ पहले से हथियार उठाए हुए थे। सेन के अनुसार ठाकुर की नज़र में यह उनके जागीरी अधिकारों में दख़ल का मामला था: ठाकुर के इलाक़े से कोई कारीगर या बँधा हुआ किसान बाहर नहीं जा सकता था, और अंग्रेज़ सरकार इस रीत को ठीक नहीं मानती थी। आसोप और गूलर के ठाकुर कुशाल सिंह के साथ थे। सेन यह भी समझाते हैं कि महाराजा को आम तौर पर अंग्रेज़ों का साथ मिलता था, इसलिए जागीरदार अक्सर दोनों को एक ही मान लेते थे, और महाराजा से लड़ाई कई बार अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह समझ ली जाती थी। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · ताराचंद, हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
- अगस्त 1857 में एरिनपुरा की छावनी में जोधपुर लीजन के सिपाही अंग्रेज़ों से टूटकर अलग हो गए। ताराचंद लिखते हैं कि जल्दी ही जागीरदार उनसे आ मिले, और आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने भी उनका साथ पकड़ लिया। सेन के अनुसार ठाकुर ने विद्रोही लीजन से बातचीत की और उसे अपने क़िले में जगह दी। जोधपुर की ओर से भरोसेमंद अफ़सर अनाड़ सिंह के साथ एक छोटी फ़ौज भेजी गई थी। 8 सितंबर को इन्होंने पाली में जोधपुर की छावनी पर हमला करके महाराजा की फ़ौज को भगा दिया। अनाड़ सिंह मारे गए, और उनकी तोपें और फ़ौजी सामान विद्रोहियों के हाथ लग गया। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · ताराचंद, हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खंड 2 (अंग्रेज़ी में) · इम्पीरियल गज़ेटियर, राजपूताना, 1908 (अंग्रेज़ी में)
- अब जॉर्ज लॉरेंस को लगा कि ठाकुर और उसके नए साथियों को यों ही छोड़ देने से अंग्रेज़ों की साख को बड़ा धक्का लगेगा, क्योंकि अंग्रेज़ जोधपुर के पक्ष से गहरे जुड़े माने जाते थे। मैलेसन के अनुसार वे 18 तारीख़ को आउवा के सामने पहुँचे, और क़िले की मज़बूती देखकर साढ़े तीन मील पीछे चुलावास गाँव में आ टिके। सेन लिखते हैं कि इतने मज़बूत क़िले को जीतने लायक फ़ौज उनके पास नहीं थी। उन्होंने पीछे हटने का दिखावा करके क़िले की फ़ौज को बाहर खुले में खींचना चाहा, पर वह बाहर नहीं आई। आख़िर लॉरेंस को सचमुच लौटना पड़ा, और लोगों ने इसे अंग्रेज़ों की हार समझा। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
- इसी चढ़ाई में जोधपुर के पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन मॉंक मेसन की जान गई, और उनकी मौत के ब्योरे स्रोतों में थोड़े अलग हैं। सेन के अनुसार मेसन जोधपुर से एजेंट की छावनी में शामिल होने आ रहे थे। छावनी से कुछ ही गज़ दूर थे कि बिगुल की आवाज़ से भ्रम में पड़कर विद्रोहियों की ओर चले गए और मार डाले गए। मैलेसन लिखते हैं कि दुश्मन के बिगुल ने मेसन को धोखे से अपनी ओर खींच लिया और उन्हें गोली मार दी गई। प्रिचर्ड लिखते हैं कि झाड़ियों के पीछे से उन पर गोली चली और सीने में घाव लगा, फिर घुड़सवारों के एक बड़े दल ने धावा बोलकर उन्हें मार डाला। प्रिचर्ड ख़ुद मानते हैं कि मौत से ठीक पहले क्या हुआ, इस पर काफ़ी रहस्य बना हुआ है। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में) · प्रिचर्ड, द म्यूटिनीज़ इन राजपूताना (अंग्रेज़ी में)
- मेसन के शव के बारे में भी दो बातें मिलती हैं। उस समय यह आरोप लगा था कि शव का सिर काटकर आउवा के फाटक पर दिखाया गया। सेन लिखते हैं कि बाद में मुक़दमे में यह आरोप साबित नहीं हुआ, और अगली सुबह शव मिलने पर ठाकुर ने उसे इज़्ज़त से दफ़नाया। प्रिचर्ड बताते हैं कि जोधपुर के महाराजा ने मेसन की पत्नी को संदेश भेजा कि जब तक आउवा के ठाकुर का सिर क़िले के फाटक पर न लटका दिया जाए, वे चैन से नहीं बैठेंगे। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · प्रिचर्ड, द म्यूटिनीज़ इन राजपूताना (अंग्रेज़ी में)
- आउवा और लीजन का साथ ज़्यादा दिन नहीं चला। सेन के अनुसार लीजन ठाकुर को अकेला छोड़कर दिल्ली की ओर चल पड़ा, और नवंबर में नारनौल में जेरार्ड की फ़ौज से बुरी तरह हारा। जनवरी 1858 में राजपूताना में नई अंग्रेज़ी फ़ौज आने लगी, और मैलेसन बताते हैं कि लॉरेंस ने कर्नल होम्स के साथ ग्यारह सौ सैनिक और तोपें आउवा भेजीं। होम्स ने 19 जनवरी को क़िला घेरा, और पाँच दिन की गोलाबारी से दीवार में रास्ता बन गया। अगली सुबह धावा होना था, पर क़िले वालों ने रुकना ठीक नहीं समझा: उस रात भयंकर तूफ़ान और घना अँधेरा था, और उसकी आड़ में वे क़िला छोड़कर निकल गए। क़िले में तेरह तोपें, तीन टन बारूद और गोलियों के तीन हज़ार कारतूस मिले। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
- ठाकुर कुशाल सिंह मेवाड़ में अपने मित्रों के यहाँ चले गए, और बाद में उन्होंने अंग्रेज़ों के सामने आत्मसमर्पण किया। सेन बताते हैं कि मेजर टेलर की अध्यक्षता वाले एक आयोग ने उन पर दो आरोपों में मुक़दमा चलाया: कैप्टन मॉंक मेसन के हत्यारों को शरण देना, और अगस्त 1857 से जनवरी 1858 तक अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोहियों का नेता बनना। पेश किए गए सबूत काफ़ी नहीं थे, इसलिए वे बरी हो गए। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
कोटा
- कोटा के पॉलिटिकल एजेंट मेजर बर्टन 15 अक्टूबर 1857 को मारे गए, और उनके साथ उनके दो बेटे भी। सेन के अनुसार मेहराब ख़ान और लाला जयदयाल की अगुवाई में विद्रोहियों ने पहले सैल्डर और सैवियल नाम के दो लोगों को मारा और फिर रेज़ीडेंसी पर धावा बोला। पहरे पर तैनात अफ़सर ने महाराव को महल से निकलने नहीं दिया। महाराव ने देवी लाल नाम के एक आदमी को सिपाहियों को समझाने भेजा कि एजेंट को न छेड़ें, पर वह नाकाम रहा और ग़ुस्साए विद्रोहियों ने उसे मार डाला। बर्टन और उनके दोनों बेटे, जिनका साथ देने वाला कोई नहीं था, जितनी देर लड़ सकते थे लड़े, और अंत में मारे गए। मैलेसन लिखते हैं कि बर्टन का सिर काटकर शहर में घुमाया गया। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
- महाराव का इसमें कितना हाथ था, इस पर स्रोत एक राय नहीं हैं। सेन बताते हैं कि मुलाक़ात में बर्टन ने महाराव से कुछ बेवफ़ा लोगों को सज़ा देने को कहा था। मैलेसन का आरोप है कि महाराव ने यह बात खोल दी और इसी से यह कांड हुआ, पर सेन लिखते हैं कि यह साबित नहीं हो सका। हत्या के बाद जयदयाल ने कोटा की सारी सत्ता अपने हाथ में ले ली और महाराव से एक काग़ज़ पर दस्तख़त करवाए कि जो कुछ हुआ उसका दोष उनका है। मैलेसन के अनुसार भारत सरकार ने बाद में माना कि महाराव को पहले से कुछ पता नहीं था, फिर भी उन्होंने अपना फ़र्ज़ पूरा नहीं निभाया, और उनकी तोपों की सलामी सत्रह से घटाकर तेरह कर दी गई। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
- ताराचंद कोटा को राजस्थान में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ सबसे क्रांतिकारी केंद्र कहते हैं। उनके अनुसार अफ़सरों में जयदयाल और उनके भाई हरदयाल आंदोलन के अगुवा थे, रेज़ीडेंसी घेर ली गई थी और महाराव लगभग क़ैदी जैसे हो गए थे, और यह हालत कई महीने रही। सेन बताते हैं कि जॉर्ज लॉरेंस उस समय कुछ नहीं कर सके; मार्च 1858 में मेजर जनरल एच. जी. रॉबर्ट्स के साथ बंबई से नई फ़ौज आई, तब जाकर कोटा पर चढ़ाई हुई। इस बीच महाराव ने अपनी बची हुई वफ़ादार फ़ौज और करौली के राजा की भेजी फ़ौज की मदद से महल के आसपास का इलाक़ा और राजधानी का कुछ हिस्सा विद्रोहियों से छुड़ा लिया था। बाक़ी शहर 30 मार्च को क़िला जीते जाने तक विद्रोहियों के हाथ में रहा। ताराचंद लिखते हैं कि जयदयाल को तोप के मुँह से बाँधकर उड़ा दिया गया। स्रोत: ताराचंद, हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खंड 2 (अंग्रेज़ी में) · सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
राजा, ठाकुर और सिपाही: किसने क्या किया
- इम्पीरियल गज़ेटियर अंग्रेज़ सरकार का अपना ब्योरा है, और उसमें लिखा है कि रियासतों को अपने ही भरोसे छोड़ दिया गया था, और उनका आचरण आम तौर पर बहुत अच्छा रहा: जयपुर में शांति बनी रही, बीकानेर के शासक लगातार मदद करते रहे, और जोधपुर के पश्चिमी हिस्से में ठाकुरों ने, ख़ासकर आउवा के ठाकुर ने, परेशानी खड़ी की। गज़ेटियर के अनुसार पूरे राजपूताना में देसी सिपाहियों की सिर्फ़ दो टुकड़ियाँ अपने अंग्रेज़ अफ़सरों के साथ डटी रहीं: मेरवाड़ा बटालियन और मेवाड़ भील कोर, जिनके ज़्यादातर सिपाही इसी इलाक़े के मेर और भील समुदायों से भर्ती होते थे। स्रोत: इम्पीरियल गज़ेटियर, राजपूताना, 1908 (अंग्रेज़ी में)
- सेन की राय है कि अगर राजपूत राजा धर्म की पुकार पर उठ खड़े होते, तो दिल्ली से गुजरात तक फैले रेगिस्तानी इलाक़े से अंग्रेज़ी राज मिट जाता। राजा तो साथ नहीं आए, पर कुछ ठाकुर अपने ही राजा से नाराज़ थे। सेन के अनुसार मेवाड़ में सलूंबर के सरदार केसरी सिंह को उदयपुर के महाराणा से शिकायत थी, जो परंपरा से चले आ रहे मान-सम्मान की एक बात पर टिकी थी, और कुशाल सिंह जोधपुर के महाराजा से लड़ रहे थे। ताराचंद लिखते हैं कि खुला विद्रोह कुचल दिए जाने के बाद भी बहुत-से राजपूत विद्रोहियों की मदद करते रहे: तात्या टोपे को राजस्थान में शरण मिली, और सलूंबर और कोठारिया के सरदारों ने भागते विद्रोहियों की मदद की। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · ताराचंद, हिस्ट्री ऑफ़ द फ़्रीडम मूवमेंट इन इंडिया, खंड 2 (अंग्रेज़ी में)
तात्या टोपे राजपूताना में
- जावरा-अलीपुर की हार के बाद तात्या टोपे और राव साहब राजपूताना की ओर बढ़े। सेन लिखते हैं कि तात्या ठीक समझ गए थे कि अब उनकी हिफ़ाज़त लोगों के साथ पर टिकी है, इसलिए राव साहब ने ऐलान किया कि फ़ौज की हर ज़रूरत की चीज़ ठीक दाम देकर ख़रीदी जाएगी। तात्या चंबल पार करके जयपुर की ओर मुड़े, पर जनरल रॉबर्ट्स ने वह रास्ता पहले ही रोक लिया, तो वे टोंक पहुँचे। वहाँ के नवाब कुछ वफ़ादार लोगों के साथ गढ़ में बंद हो गए, पर उनकी फ़ौज पूरी की पूरी विद्रोहियों से जा मिली। अगस्त में रॉबर्ट्स ने भीलवाड़ा के पास और फिर बनास नदी के किनारे तात्या को हराया। फिर भी तात्या ने हिम्मत नहीं हारी। सबको लगता था कि चंबल अब पार नहीं की जा सकती, पर वे उसे पार करके झालावाड़ की राजधानी झालरापाटन जा पहुँचे, जहाँ राजा की फ़ौज ख़ुशी-ख़ुशी विद्रोहियों से मिल गई। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- 14 जनवरी 1859 को ब्रिगेडियर शॉवर्स ने जयपुर और भरतपुर के बीच दौसा में तात्या की फ़ौज पर हमला किया। उनके साथ चल रहे लोगों में से हर दसवाँ आदमी मारा गया, पर तात्या और फ़ीरोज़ शाह फिर बच निकले। वे सीकर के छोटे-से क़स्बे में रुके, तो नसीराबाद से कर्नल होम्स चौबीस घंटे में पचास मील से ज़्यादा चलकर 21 जनवरी को उनके डेरे पर टूट पड़े। तात्या की फ़ौज फिर हारी, पर नेता हमेशा की तरह निकल गए। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- अप्रैल 1859 में नरवर के मान सिंह ने तात्या टोपे को धोखा देकर पकड़वा दिया। सेन बताते हैं कि मान सिंह की अंग्रेज़ों से कोई दुश्मनी नहीं थी; वे नरवर के राजपूत सरदार थे और अपने ऊपर के शासक के ख़िलाफ़ उठे थे। तात्या के पकड़े जाने की ख़बर कैप्टन मीड ने 8 अप्रैल को दी। उस समय तात्या के पास हथियार के नाम पर बस एक तलवार और एक खुखरी थी, और उनके शरीर पर सोने के तीन बाज़ूबंद और सोने के 118 सिक्के मिले। उन्हें सिप्री ले जाया गया, जहाँ 15 अप्रैल को फ़ौजी अदालत में उन पर मुक़दमा चला। आरोप था कि जनवरी 1857 से दिसंबर 1858 तक, ख़ासकर झाँसी और ग्वालियर में, उन्होंने अंग्रेज़ सरकार के ख़िलाफ़ विद्रोह किया और युद्ध छेड़ा। मैलेसन के अनुसार उन्हें फाँसी की सज़ा हुई, और 18 अप्रैल को सिप्री में फाँसी दे दी गई। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 3 (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) राजस्थान की इस कहानी में तीन तरह के लोग दिखते हैं, और बॉक्स के सवाल पर बात करते समय तीनों को अलग-अलग रखिए: छावनियों और रियासती फ़ौजों के सिपाही (नसीराबाद, नीमच, एरिनपुरा, कोटा), अपने राजा से नाराज़ ठाकुर (आउवा, आसोप, गूलर, सलूंबर), और रियासतों के राजा, जो ज़्यादातर अंग्रेज़ों के साथ रहे। बच्चों से पूछिए कि किसके पास लड़ने की क्या वजह थी, और किसके पास न लड़ने की।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: किताब पृष्ठ 270 पर पूछती है कि क्या आपके राज्य के लोगों ने 1857 के विद्रोह में हिस्सा लिया था। राजस्थान के लिए इसका उत्तर क्या होगा?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, पर सबने एक जैसा हिस्सा नहीं लिया:
- सिपाही: 28 मई 1857 को नसीराबाद में और 3 जून को नीमच में छावनियों के सिपाही उठे; अगस्त में एरिनपुरा में जोधपुर लीजन उठा, और 15 अक्टूबर को कोटा में पॉलिटिकल एजेंट मारे गए।
- ठाकुर: आउवा के ठाकुर कुशाल सिंह ने लीजन को अपने क़िले में जगह दी, और 8 सितंबर को पाली में जोधपुर की फ़ौज हारी; आसोप और गूलर के ठाकुर उनके साथ थे।
- राजा: ज़्यादातर राजा अंग्रेज़ों के साथ रहे: जयपुर में शांति रही, बीकानेर मदद करता रहा, और कोटा, बूँदी, झालावाड़ की फ़ौजों ने लगभग छह हफ़्ते नीमच सँभाला।
- क्यों: सेन के अनुसार आउवा के ठाकुर अपने जागीरी अधिकारों में दख़ल से नाराज़ थे, और जागीरदार अक्सर अपने राजा और अंग्रेज़ों को एक ही मान लेते थे।
हमारी ओर से: सवाल का दूसरा हिस्सा, “अगर नहीं, तो उसकी व्याख्या कीजिए”, राजाओं पर लागू होता है। बच्चों से पूछिए कि राजाओं के पास अंग्रेज़ों के साथ रहने की क्या वजहें रही होंगी। यह भी दिखाइए कि राजाओं के आचरण को “बहुत अच्छा” कहने वाला गज़ेटियर अंग्रेज़ सरकार की नज़र से लिखा गया है।
सवाल: कैप्टन मॉंक मेसन की मौत और उनके शव के बारे में स्रोत अलग-अलग बातें कहते हैं। कक्षा में यह बात कैसे रखें?
उत्तर देखिए
उत्तर: हर स्रोत का नाम लेकर उसकी बात रखिए:
- सेन: बिगुल की आवाज़ से भ्रम में पड़कर मेसन विद्रोहियों की ओर चले गए और मारे गए।
- मैलेसन: दुश्मन के बिगुल ने मेसन को धोखे से अपनी ओर खींच लिया, और उन्हें गोली मार दी गई।
- प्रिचर्ड: झाड़ियों के पीछे से गोली चली, फिर घुड़सवारों ने उन्हें मार डाला; प्रिचर्ड ख़ुद मानते हैं कि इस पर रहस्य बना हुआ है।
- शव: उस समय आरोप लगा कि सिर काटकर आउवा के फाटक पर दिखाया गया; सेन के अनुसार मुक़दमे में यह साबित नहीं हुआ, और ठाकुर ने शव को इज़्ज़त से दफ़नाया।
हमारी ओर से: बच्चों को दिखाइए कि लड़ाई के दिनों में अफ़वाहें कैसे फैलती हैं, और इतिहासकार उन्हें मुक़दमे के रिकॉर्ड जैसे काग़ज़ों से कैसे परखते हैं।
सवाल: कोटा के महाराव विद्रोहियों के साथ थे या अंग्रेज़ों के साथ?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोतों के हिसाब से उनकी हालत दोनों के बीच फँसे आदमी की थी:
- शक: मैलेसन का आरोप है कि उन्होंने बर्टन की बात खोल दी; सेन लिखते हैं कि यह साबित नहीं हुआ।
- मजबूरी: विद्रोह के दिन पहरे के अफ़सर ने उन्हें महल से निकलने नहीं दिया, और बाद में जयदयाल ने उनसे दोष मानने वाले काग़ज़ पर दस्तख़त करवाए; ताराचंद के अनुसार वे लगभग क़ैदी जैसे थे।
- अंग्रेज़ों का फ़ैसला: सरकार ने उन्हें पहले से जानकारी होने के आरोप से बरी माना, पर फ़र्ज़ न निभाने के लिए उनकी सलामी सत्रह से तेरह तोपों की कर दी।
हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि सलामी घटाने जैसी सज़ा से अंग्रेज़ रियासतों को क्या संदेश देना चाहते होंगे।
लखनऊ की रेज़ीडेंसी और बेगम हज़रत महल
किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है कि अवध पर क़ब्ज़े के बाद “नवाब वाजिद अली शाह को यह कहते हुए गद्दी से हटा कर कलकत्ता निष्कासित कर दिया गया था कि वह अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे” (पृष्ठ 266), और लखनऊ में लोगों ने “नवाब के युवा बेटे बिरजिस क़द्र को अपना नेता घोषित कर दिया था” (पृष्ठ 262)। फ़ैज़ाबाद जेल से छूटे मौलवी अहमदुल्ला शाह ने 22वीं नेटिव इन्फ़ेंट्री के विद्रोहियों के साथ “चिनहट के विख्यात संघर्ष में हिस्सा लिया जिसमें हेनरी लॉरेंस की अगुवाई वाली टुकड़ियों को मुँह की खानी पड़ी” (पृष्ठ 263)। बहुत से ताल्लुक़दार “लखनऊ जाकर बेगम हज़रत महल (नवाब की पत्नी) के खेमे में शामिल हो गए। उनमें से कुछ बेगम की पराजय के बाद भी उनके साथ डटे रहे” (पृष्ठ 269)। पृष्ठ 278 पर किताब कहती है कि “लखनऊ के कमिश्नर हेनरी लॉरेंस ने ईसाइयों को इकट्ठा किया और बेहद सुरक्षित रेज़ीडेंसी में पनाह ले ली”, लॉरेंस मारे गए, और “कर्नल इंगलिस के नेतृत्व में रेज़ीडेंसी सुरक्षित रहा”; फिर “25 सितंबर को जेम्स ऑट्रम और हेनरी हेवलॉक वहाँ पहुँचे”, और “20 दिन बाद भारत में ब्रिटिश टुकड़ियों का नया कमांडर कॉलिन कैम्पबेल भारी तादाद में सेना लेकर वहाँ पहुँचा और उसने ब्रिटिश रक्षकसेना को घेरे से छुड़ाया”। सिकंदर बाग़ की तस्वीर के नीचे लिखा है कि 1857 में उसकी रक्षा करने वाले “2000 से ज़्यादा विद्रोही सिपाहियों को कैम्पबेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सैनिकों ने मार डाला था” (पृष्ठ 276), और किताब मानती है कि “अवध में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ प्रतिरोध सबसे लंबा चला” (पृष्ठ 275)। किताब यहीं रुकती है: घेराबंदी किस दिन शुरू हुई, रेज़ीडेंसी के भीतर कितने लोग थे, लॉरेंस की मौत कैसे हुई, 25 सितंबर के बाद क्या हुआ, कैम्पबेल किस तारीख़ को पहुँचे और रेज़ीडेंसी कब खाली हुई, लखनऊ आख़िर कब हाथ से गया, और बेगम हज़रत महल ने हार के बाद क्या किया, यह बात उसमें नहीं आती।
नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: एल. ई. रुट्ज़ रीस की किताब “ए पर्सनल नैरेटिव ऑफ़ द सीज ऑफ़ लखनऊ” (लंदन, 1858), जिसके लेखक घेरे के भीतर थे; मार्टिन गबिन्स की “एन अकाउंट ऑफ़ द म्यूटिनीज़ इन अवध” (1858); सुरेंद्रनाथ सेन की “एटीन फ़िफ़्टी-सेवन” (1957); और मैलेसन की “हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी” का दूसरा खंड।
घेराबंदी कब शुरू हुई
- किताब की काल-रेखा में 30 जून के आगे लिखा है कि चिनहट के युद्ध में अंग्रेज़ों की हार हुई (पृष्ठ 284)। रीस के अनुसार लखनऊ की घेराबंदी इसी दिन, मंगलवार 30 जून 1857 को सुबह ग्यारह बजे से शुरू हुई मानी जा सकती है। वे लिखते हैं कि अगर चिनहट की वह बदक़िस्मत चढ़ाई न हुई होती, तो शायद घेराबंदी होती ही नहीं, या कम से कम इतनी लंबी न खिंचती। चिनहट में अंग्रेज़ों की ओर के 118 यूरोपीय अफ़सर और सैनिक मारे गए, और 182 हिंदुस्तानी सिपाही मारे गए या लापता हुए। सेन बताते हैं कि हेनरी लॉरेंस ने यह नहीं सोचा था कि अवध के तोपची पाला बदल लेंगे और देसी घुड़सवार डरकर पीछे हट जाएँगे। स्रोत: रीस, ए पर्सनल नैरेटिव ऑफ़ द सीज ऑफ़ लखनऊ (अंग्रेज़ी में) · सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
रेज़ीडेंसी के भीतर कौन था
- किताब कहती है कि लॉरेंस ने ईसाइयों को इकट्ठा करके रेज़ीडेंसी में पनाह ली। सेन बताते हैं कि भीतर घिरे लोग लगभग 3,000 थे: 1,720 लड़ने वाले और 1,280 ऐसे जो लड़ते नहीं थे। इनमें लगभग आधे हिंदुस्तानी थे, जिनमें 720 लड़ने वाले सिपाही थे और 680 दूसरे लोग। रेज़ीडेंसी की चार चौकियाँ पूरी तरह वफ़ादार हिंदुस्तानी सिपाहियों के हाथ में थीं। लॉरेंस की मौत के बाद इन सिपाहियों को शक की नज़र से देखा जाने लगा, पर सेन लिखते हैं कि रक्षा का भार जिन कर्नल इंगलिस पर आया, वे जानते थे कि लखनऊ बचाना है तो इन सिपाहियों के बिना काम नहीं चलेगा। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
हेनरी लॉरेंस की मौत
- रीस बताते हैं कि 2 जुलाई 1857 को हेनरी लॉरेंस रेज़ीडेंसी की दूसरी मंज़िल पर अपने कमरे में बिस्तर पर लेटे थे, तभी पास फटे एक गोले का टुकड़ा उन्हें लगा। वे 4 जुलाई की सुबह चल बसे, और रीस के अनुसार लगभग आख़िर तक होश में रहे। सेन लिखते हैं कि उनके बचने के बारे में डॉक्टर फ़ेयरर का अंदाज़ा था, “लगभग चालीस घंटे”, और लॉरेंस ने डॉक्टर फ़ेयरर के घर में 4 तारीख़ को दम तोड़ा। स्रोत: रीस, ए पर्सनल नैरेटिव ऑफ़ द सीज ऑफ़ लखनऊ (अंग्रेज़ी में) · सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
25 सितंबर: अंदर पहुँचे, पर घेरा नहीं टूटा
- किताब के अनुसार 25 सितंबर को ऑट्रम और हेवलॉक रेज़ीडेंसी पहुँचे (पृष्ठ 278)। सेन बताते हैं कि हेवलॉक 25 सितंबर की सुबह उस रास्ते से बढ़े जिसे ऑट्रम ने चुना था। 25 और 26 सितंबर की लड़ाई में उनकी फ़ौज के 31 अफ़सर और 504 सैनिक मारे गए या घायल हुए, और मरने वालों में नील भी थे। इतनी कुमुक पहुँचने पर भी विद्रोहियों का घेरा बना रहा: सेन 17 नवंबर तक रेज़ीडेंसी के लोगों को “घिरे हुए लोग” ही कहते हैं। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
कैम्पबेल की फ़ौज, और रेज़ीडेंसी ख़ाली हुई
- सेन बताते हैं कि 16 नवंबर 1857 को कॉलिन कैम्पबेल ने गोमती के पास नहर पार करके सिकंदर बाग़ पर हमला किया। वहाँ के सिपाहियों के पास तोपें नहीं थीं, पर दीवारें मज़बूत थीं, और वे आख़िरी दम तक लड़े। अगले दिन, 17 नवंबर को, घिरे हुए लोग बचाने आई फ़ौज से मिले। रीस, लेडी इंगलिस की डायरी से बताते हैं कि उसी शाम कैम्पबेल ने हुक्म दिया कि बीमार, घायल, औरतें और बच्चे रेज़ीडेंसी से निकालकर दिलकुशा बाग़ ले जाए जाएँ, और फ़ौज यह जगह पूरी तरह छोड़ दे। अगले दिन यह इंतज़ाम बदला गया, और केवल बीमारों को भेजा गया। रीस के अनुसार रेज़ीडेंसी ख़ाली करने के लिए 22 नवंबर का दिन तय हुआ, और उस रात बारह बजे बाक़ी लोग भी रेज़ीडेंसी छोड़ने निकले। किताब इन घटनाओं के लिए “20 दिन बाद” लिखती है (पृष्ठ 278); कक्षा में किताब का यह वाक्य और ऊपर की तारीख़ें, दोनों साथ रखिए। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · रीस, ए पर्सनल नैरेटिव ऑफ़ द सीज ऑफ़ लखनऊ (अंग्रेज़ी में)
मार्च 1858: लखनऊ हाथ से गया
- रेज़ीडेंसी ख़ाली होने के बाद भी ऑट्रम की फ़ौज लखनऊ के बाहर आलमबाग़ में डटी रही, और विद्रोही उस पर बार-बार हमले करते रहे। मैलेसन के अनुसार इनमें आख़िरी और सबसे जी-जान से लड़ा गया हमला 25 फ़रवरी 1858 को हुआ, और उस दिन पहली बार बेगम हज़रत महल ख़ुद हाथी पर सवार होकर हमला करने वालों के साथ निकलीं; प्रधानमंत्री और बड़े सरदार भी हाथियों पर उनके साथ थे। मार्च 1858 में अंग्रेज़ों ने शहर पर धावा बोला। सेन बताते हैं कि जब बेगम कोठी पर क़ब्ज़ा हुआ, तो उसके बीच वाले आँगन में ही 860 रक्षक मरे पड़े थे। उनके शब्दों में राजमाता ने हिम्मत कभी नहीं हारी, और वे अपने लोगों के बीच ऐसे जोश से घूमती रहीं जिसका नतीजा इससे बेहतर होना चाहिए था। 18 मार्च तक शहर की सारी मज़बूत जगहें अंग्रेज़ों के हाथ में आ गईं। स्रोत: मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में) · सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
बिरजिस क़द्र राजा थे या नवाब
- किताब बिरजिस क़द्र को “नवाब के युवा बेटे” कहती है (पृष्ठ 262)। उनके पद, तारीख़ और उम्र पर उस दौर के स्रोत एक बात नहीं कहते। सेन के अनुसार उन्हें 7 जुलाई 1857 को नवाब चुना गया, पर यह तारीख़ वे जनरल इन्स के हवाले से देते हैं और साथ में जोड़ते हैं, “अगर जनरल इन्स सही हैं”; सेन को यह भी पक्का नहीं कि बिरजिस क़द्र ने बादशाह की पदवी ली या नवाब की। 6 अगस्त को घेरने वालों ने रेज़ीडेंसी के लोगों को चिल्लाकर सुनाया कि उन्होंने अपने बादशाह की ताजपोशी कर दी है, और अब फ़िरंगियों का राज ख़त्म हुआ; रीस ने भी यह ललकार दर्ज की है। रीस ने सुना था कि उन्हें बादशाह कहा जाएगा, पर वे दिल्ली के बादशाह के अधीन रहेंगे; उनके पिता उस समय कलकत्ता में अंग्रेज़ों के क़ैदी थे; उम्र आठ या दस साल थी, और असली ताक़त एक मंत्री और राज-परिषद के हाथ में थी। गबिन्स ने उनकी उम्र ग्यारह या बारह साल सुनी थी, और यह कि उनकी माँ, बेगम, उनकी जगह राज चला रही थीं। सेन भी यही कहते हैं: नाबालिग़ वली की माँ बेगम हज़रत महल उनकी ओर से सारे अधिकार चलाती थीं। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में) · रीस, ए पर्सनल नैरेटिव ऑफ़ द सीज ऑफ़ लखनऊ (अंग्रेज़ी में) · गबिन्स, एन अकाउंट ऑफ़ द म्यूटिनीज़ इन अवध (अंग्रेज़ी में)
बेगम का जवाबी इश्तिहार
- 1858 के आख़िर में ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के नाम से एक इश्तिहार निकला, जिसमें भारत के लोगों से माफ़ी और भरोसे के वादे थे। सेन के शब्दों में उसकी सच्चाई को “एक दूसरी रानी”, अवध की बेगम हज़रत महल ने चुनौती दी, और फ़ौरन अपने बेटे के नाम से जवाबी इश्तिहार निकाला। इसका अंग्रेज़ी पाठ भारत की अंग्रेज़ी सरकार के विदेश विभाग के काग़ज़ों में बचा है, जिस पर 31 दिसंबर 1858 की तारीख़ है; सेन ने इसे अपनी किताब के पहले परिशिष्ट में छापा है। बेगम का इश्तिहार महारानी के इश्तिहार को “10 नवंबर 1858 का इश्तिहार” कहता है। उसमें लिखा है कि अंग्रेज़ों का यह पक्का रिवाज़ है कि वे कोई क़सूर, छोटा हो या बड़ा, कभी माफ़ नहीं करते; कि इस इश्तिहार के रहते कोई नहीं बच सकता, चाहे क़सूरवार हो या बेक़सूर; और यह कि “सब कुछ लिखा है, और फिर भी कुछ नहीं लिखा”। अंग्रेज़ों ने कहा था कि अवध के लोग वाजिद अली शाह से नाराज़ थे; बेगम पूछती हैं कि अगर ऐसा था तो वे हमसे संतुष्ट कैसे हैं। महारानी ने भरोसा दिलाया था कि उन्हें और इलाक़ा नहीं चाहिए; इस पर बेगम का सवाल है: जब हमारे लोग चाहते हैं, तो महारानी हमारा मुल्क हमें लौटा क्यों नहीं देतीं? स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
नेपाल की ओर
- नेपाल के जंग बहादुर 1858 में अपनी गोरखा फ़ौज के साथ लखनऊ पर अंग्रेज़ों की ओर से बढ़े थे, यह मैलेसन दर्ज करते हैं। हार के बाद बेगम और उनके साथी नेपाल की सरहद की ओर गए। सेन बताते हैं कि जंग बहादुर ने पहले बेगम को लिखा कि अगर वे उनके इलाक़े में रुकीं या वहाँ पनाह माँगी, तो संधि के मुताबिक़ गोरखा फ़ौज उन पर हमला करेगी। पर बाद में वे कुछ नरम पड़े: बिरजिस क़द्र की एक चिट्ठी के अनुसार उन्हें जंग बहादुर का एक पत्र मिला, जिस पर संवत 1915 की 8 माघ, यानी 26 जनवरी 1859 की तारीख़ थी। बेगम अपने बेटे और थोड़े से साथियों के साथ गोरखाओं के देश में ही रहीं। अंग्रेज़ों ने उन्हें उनके पति वाजिद अली शाह के भत्ते से अलग पेंशन और पूरे सम्मान का भरोसा दिया, पर वे भारत लौटने को राज़ी नहीं हुईं। सेन के अनुसार अंग्रेज़ी पेंशन लेने का मतलब होता अपने बेटे का हक़ चुपचाप छोड़ देना, और यह उन्हें मंज़ूर नहीं था। सेन, रसेल के हवाले से उन्हें बहुत ऊर्जा और क़ाबिलियत वाली औरत कहते हैं। स्रोत: मैलेसन, हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी, खंड 2 (अंग्रेज़ी में) · सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब कहती है कि विद्रोहियों की अपनी बात बहुत कम बची है, बस कुछ “घोषणाओं व इश्तहारों” के रूप में (पृष्ठ 270)। बेगम हज़रत महल का इश्तिहार ऐसा ही एक काग़ज़ है, और आज़मगढ़ घोषणा (स्रोत 5) के साथ पढ़ने लायक़ है। बच्चों से एक काल-रेखा बनवाइए: 30 जून 1857 से 22 नवंबर 1857 तक रेज़ीडेंसी, 25 फ़रवरी 1858 आलमबाग़, मार्च 1858 लखनऊ, 1858 के आख़िर में दो इश्तिहार, और 1859 की शुरुआत में नेपाल। इससे किताब का यह वाक्य कि अवध में प्रतिरोध सबसे लंबा चला, आँखों के सामने आ जाता है।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: किताब कहती है कि 25 सितंबर को ऑट्रम और हेवलॉक रेज़ीडेंसी पहुँच गए। फिर रेज़ीडेंसी के लोग नवंबर तक बाहर क्यों नहीं निकल पाए?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- अंदर पहुँचे, घेरा नहीं तोड़ा: 25 और 26 सितंबर की लड़ाई में उनकी फ़ौज के 31 अफ़सर और 504 सैनिक मारे गए या घायल हुए, और सेन 17 नवंबर तक भीतर के लोगों को घिरे हुए ही कहते हैं।
- कैम्पबेल की बड़ी फ़ौज: 16 नवंबर को सिकंदर बाग़ की लड़ाई हुई, 17 नवंबर को घिरे हुए लोग बचाने वाली फ़ौज से मिले।
- रेज़ीडेंसी ख़ाली: पहले बीमार, घायल, औरतें और बच्चे निकाले गए, और 22 नवंबर की आधी रात बाक़ी लोग भी निकल गए।
हमारी ओर से: किताब का “20 दिन बाद” वाला वाक्य और ये तारीख़ें बच्चों के सामने साथ रखिए, और उनसे पूछिए कि दोनों को मिलाकर घटनाओं का क्रम क्या बनता है।
सवाल: बिरजिस क़द्र राजा बनाए गए या नवाब, और उस समय उनकी उम्र कितनी थी?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- पदवी: रीस ने सुना कि उन्हें बादशाह कहा जाएगा, पर दिल्ली के बादशाह के अधीन; गबिन्स “बादशाह घोषित” लिखते हैं; सेन उन्हें नवाब चुना गया बताते हैं, पर पक्का नहीं मानते कि पदवी बादशाह की थी या नवाब की।
- तारीख़: सेन 7 जुलाई 1857 देते हैं, पर “अगर जनरल इन्स सही हैं” कहकर; ताजपोशी की ख़बर घेरने वालों ने 6 अगस्त को सुनाई।
- उम्र: रीस के अनुसार आठ या दस साल, गबिन्स के अनुसार ग्यारह या बारह।
- राज किसके हाथ में: गबिन्स और सेन, दोनों के अनुसार उनकी माँ बेगम हज़रत महल के हाथ में।
हमारी ओर से: घेरे के भीतर बैठे अंग्रेज़ लेखक शहर की ख़बरें सुनी-सुनाई बातों से लिखते थे, इसलिए उनकी बातें आपस में नहीं मिलतीं। बच्चों को यह दिखाने का अच्छा मौक़ा है कि इतिहासकार ऐसे में क्या करते हैं।
सवाल: बेगम हज़रत महल ने लोगों से महारानी के इश्तिहार पर भरोसा न करने को क्यों कहा?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- माफ़ी पर शक: इश्तिहार कहता है कि अंग्रेज़ कोई क़सूर, छोटा हो या बड़ा, कभी माफ़ नहीं करते, और महारानी के वादों में “सब कुछ लिखा है, और फिर भी कुछ नहीं लिखा”।
- अवध का सवाल: अगर लोग वाजिद अली शाह से नाराज़ थे, तो बेगम के राज से संतुष्ट कैसे हैं? और अगर महारानी को और इलाक़ा नहीं चाहिए, तो वे अवध लौटा क्यों नहीं देतीं?
हमारी ओर से: यह जवाब पढ़ने के बाद बच्चों से पूछिए कि किताब के पृष्ठ 266 वाला दावा, कि वाजिद अली शाह अच्छी तरह शासन नहीं चला रहे थे, बेगम के इश्तिहार में किस तरह लौटकर आता है।
1857 के नाम: म्यूटिनी, ग़दर, स्वतंत्रता संग्राम
किताब कहाँ रुकती है। अध्याय के नाम के ठीक नीचे लिखा है “1857 का आंदोलन और उसके व्याख्यान” (पृष्ठ 258), यानी किताब ख़ुद मानती है कि इस घटना को कई तरह से समझा और बताया गया। आख़िर में किताब कहती है: “बीसवीं सदी में राष्ट्रवादी आंदोलन को 1857 के घटनाक्रम से प्रेरणा मिल रही थी। इसको प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया जाता था जिसमें देश के हर तबके के लोगों ने साम्राज्यवादी शासन के ख़िलाफ़ मिलकर लड़ाई लड़ी थी।” वहीं लिखा है कि “इतिहास लेखन की तरह कला और साहित्य ने भी 1857 की स्मृति को जीवित रखने में योगदान दिया”, और सुभद्रा कुमारी चौहान की पंक्ति दी गई है: “खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी” (पृष्ठ 283)। किताब यहीं रुकती है: उस समय अंग्रेज़ और हिंदुस्तानी इसे क्या कहते थे, “स्वतंत्रता युद्ध” वाले नाम की किताब कब और किस रूप में आई, और 1957 में, सौ साल पूरे होने पर, इतिहासकार इस नाम पर एक राय क्यों नहीं थे, यह बात उसमें नहीं आती।
नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: 1909 में छपी किताब “द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस ऑफ़ 1857”; सुरेंद्रनाथ सेन की “एटीन फ़िफ़्टी-सेवन” (भारत सरकार का प्रकाशन विभाग, मई 1957), जिसकी भूमिका मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने लिखी; आर. सी. मजूमदार की “द सिपॉय म्यूटिनी ऐंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857” (पहला संस्करण अप्रैल 1957); और 1857 में लिखे कार्ल मार्क्स के लेख, जो मॉस्को से छपे संकलन “द फ़र्स्ट इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस 1857-1859” में हैं।
उस समय के नाम: “म्यूटिनी” और “ग़दर”
- मौलाना अबुल कलाम आज़ाद उस समय भारत सरकार में शिक्षा मंत्री थे। सेन की किताब की भूमिका में उन्होंने लिखा कि 1857 का बड़ा विद्रोह आम तौर पर “सिपॉय म्यूटिनी”, यानी सिपाहियों की बग़ावत, कहलाता है, और इस पर लिखी लगभग सारी किताबें एक ही नज़र से, अंग्रेज़ों की नज़र से, लिखी गई हैं। इसी पन्ने के अंग्रेज़ स्रोतों के नाम देखिए: मैलेसन की “हिस्ट्री ऑफ़ द इंडियन म्यूटिनी”, गबिन्स की “एन अकाउंट ऑफ़ द म्यूटिनीज़ इन अवध”, प्रिचर्ड की “द म्यूटिनीज़ इन राजपूताना”। आज़ाद ने इसे “तथाकथित म्यूटिनी” कहा और लिखा कि इसकी पहली गोलियाँ 10 मई 1857 को चलीं; किताब भी अध्याय इसी दिन से शुरू करती है, “10 मई 1857 की दोपहर बाद” मेरठ छावनी से (पृष्ठ 258)। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- उर्दू में लिखने वालों के यहाँ दूसरा नाम मिलता है। ज़हीर देहलवी की उर्दू किताब का नाम है “दास्तान-ए-ग़दर”, यानी ग़दर की कहानी; सेन की किताब-सूची में इसका दिल्ली का 1912 का संस्करण और लाहौर का एक बिना तारीख़ वाला संस्करण दर्ज है। अंग्रेज़ों के दोबारा क़ब्ज़े के बाद दिल्ली में हुई लूट और क़त्ल के बारे में सेन ने “दास्तान-ए-ग़दर” से ज़हीर देहलवी का बयान लिया है: कभी-कभी गुनहगारों के साथ बेगुनाह भी मारे जाते हैं, और ग़दर के बाद यही हुआ; अंग्रेज़ सिपाहियों को रास्ते में जो भी मिला, उसे वे गोली मारने लगे, और कूचा चेलान के सारे कुएँ लाशों से भर गए। उसके साथ सेन ने ग़ालिब की बात रखी है, जो उस समय दिल्ली में थे। ग़ालिब ने अपनी किताब “दस्तंबू” में लिखा कि दो-तीन मोहल्लों में अंग्रेज़ों ने माल भी लूटा और लोगों को मारा भी, और एक जगह यह भी लिखा कि उनके सामने ख़ून का एक समंदर है। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- उसी साल, 1857 में, लंदन में बैठे कार्ल मार्क्स अमेरिका के अख़बार “न्यू-यॉर्क डेली ट्रिब्यून” के लिए भारत पर लेख लिख रहे थे। 28 जुलाई 1857 के लेख “द इंडियन क्वेश्चन” में उन्होंने ब्रिटेन की टोरी पार्टी के एक नेता डिज़रायली के तीन घंटे के भाषण का हाल लिखा: डिज़रायली इस नतीजे पर पहुँचे कि भारत में जो हो रहा है, वह सैनिक बग़ावत नहीं, एक राष्ट्रीय विद्रोह है, और सिपाही उसके बस औज़ार हैं। तीन दिन बाद, 31 जुलाई के लेख “डिस्पैचेज़ फ़्रॉम इंडिया” में मार्क्स ने ख़ुद लिखा कि धीरे-धीरे ऐसे तथ्य सामने आएँगे जो इंग्लैंड को भी मनवा देंगे कि जिसे वह सैनिक बग़ावत समझता है, वह असल में एक राष्ट्रीय विद्रोह है। बाद में मॉस्को से छपे इन लेखों के संकलन के संपादकों ने लिखा कि मार्क्स और एंगेल्स ने इस आंदोलन को शुरू से ही राष्ट्रीय विद्रोह बताया। स्रोत: मार्क्स और एंगेल्स, द फ़र्स्ट इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस (अंग्रेज़ी में)
1909: एक किताब, जिसके मुखपृष्ठ पर लेखक का नाम नहीं
- 1909 में अंग्रेज़ी में एक किताब आई: “द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस ऑफ़ 1857”, यानी 1857 का भारतीय स्वतंत्रता युद्ध। उसके मुखपृष्ठ पर लेखक का नाम नहीं है, बस “एक भारतीय राष्ट्रवादी” लिखा है। प्रकाशकों की भूमिका बताती है कि किताब असल में एक भारतीय भाषा में लिखी गई थी (कौन सी, यह वहाँ नहीं लिखा), और भूमिका के नीचे “लंदन, 10 मई 1909” लिखा है, यानी 10 मई 1857 के ठीक 52 साल बाद का दिन। लेखक अपनी भूमिका में कहते हैं कि पचास साल बीत चुके हैं और दोनों ओर के बड़े किरदार अब नहीं रहे, इसलिए 1857 अब इतिहास का विषय है; और जब उन्होंने इतिहासकार की खोजी नज़र से इसे देखा, तो उन्हें बड़े अचरज के साथ “1857 की म्यूटिनी” में एक स्वतंत्रता युद्ध की चमक दिखाई दी। स्रोत: द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस ऑफ़ 1857 (अंग्रेज़ी में)
- 1957 में आर. सी. मजूमदार ने इसी नाम की किताब, “द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस, 1857”, वी. डी. सावरकर की बताई; उनकी किताब-सूची में इसका 1947 का बंबई संस्करण दर्ज है। उन्होंने सावरकर को एक प्रतिष्ठित भारतीय देशभक्त कहा, जिन्होंने बीसवीं सदी के स्वतंत्रता संघर्ष में बहुत बड़ी भूमिका निभाई और अंग्रेज़ सरकार के हाथों बहुत कष्ट सहे, और लिखा कि 1857 को स्वतंत्रता युद्ध मानने वाली राय इसी किताब से लोकप्रिय हुई। मजूमदार ख़ुद इस राय से सहमत नहीं थे; उनकी बात नीचे है। स्रोत: मजूमदार, द सिपॉय म्यूटिनी ऐंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857 (अंग्रेज़ी में)
1957: सौ साल पूरे होने पर दो किताबें
- आज़ाद ने भूमिका में लिखा कि लगभग पाँच साल पहले, इंडियन हिस्टॉरिकल रिकॉर्ड्स कमीशन की सालाना बैठक में, उन्होंने 1857 का नया इतिहास लिखे जाने की ज़रूरत बताई थी। 1954 की शरद ऋतु में उन्हें लगा कि विद्रोह के सौ साल पूरे होना एक नया और प्रामाणिक विवरण लाने का सही मौक़ा होगा, और इसके लिए 10 मई 1957 से अच्छा दिन नहीं हो सकता। यह काम उन्होंने जाने-माने भारतीय इतिहासकार डॉक्टर एस. एन. सेन को सौंपा; उनके शब्दों में ऐसा इतिहास तथ्यों पर, और केवल तथ्यों पर, टिका होना चाहिए और भावनाओं को भड़काने से बचना चाहिए। सेन अपनी प्रस्तावना में लिखते हैं कि भारत सरकार ने 1955 की शुरुआत में उन्हें यह किताब लिखने का काम दिया और छपाई के लिए पूरी प्रति 30 जून 1956 तक माँगी। साथ में वे यह भी लिखते हैं कि सरकार ने किताब छापी है, इससे यह न माना जाए कि सरकार उनकी हर राय से सहमत है; यह किसी भी अर्थ में “अधिकृत संस्करण” नहीं है। किताब मई 1957 में भारत सरकार के प्रकाशन विभाग से छपी। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- उसी भूमिका में आज़ाद ने बीसवीं सदी के शुरू के सालों में कुछ भारतीयों की लिखी किताबों के बारे में साफ़ कहा कि सच कहें तो वे इतिहास नहीं, केवल राजनीतिक प्रचार हैं। आज़ाद के अनुसार ये लेखक विद्रोह को देश के रईसों और सरदारों की सोची-समझी योजना से लड़ा गया स्वतंत्रता युद्ध दिखाना चाहते थे। भूमिका में किसी लेखक या किताब का नाम नहीं है। नाना साहब को पूरे विद्रोह का सूत्रधार बताने वाली बात को भी आज़ाद ने पक्का सबूत नहीं माना। क्या विद्रोह केवल राष्ट्रवादी उभार से हुआ? आज़ाद का जवाब था कि अगर राष्ट्रवाद को आज के अर्थ में लें, तो इसका जवाब बिना शर्त “हाँ” नहीं हो सकता। लड़ने वालों में देशप्रेम था, इसमें उन्हें कोई शक नहीं था, पर वह अकेले विद्रोह भड़काने के लिए काफ़ी नहीं था; लोग तब उठे जब देशप्रेम के साथ धार्मिक भावनाएँ भी जगाई गईं, और चर्बी वाले कारतूसों का प्रचार इसका बस एक उदाहरण है। साथ में आज़ाद यह भी लिखते हैं कि आज़ादी की इस लड़ाई में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- सेन की किताब का नतीजा दो हिस्सों में है। पहला: जो लड़ाई धर्म के लिए शुरू हुई थी, वह स्वतंत्रता युद्ध पर जाकर ख़त्म हुई, क्योंकि इसमें ज़रा भी शक नहीं कि विद्रोही विदेशी सरकार से छुटकारा पाकर पुरानी व्यवस्था लौटाना चाहते थे, जिसके सही प्रतिनिधि दिल्ली के बादशाह थे। दूसरा: अवध में विद्रोह ने राष्ट्रीय रूप लिया, पर “राष्ट्रीय” शब्द यहाँ सीमित अर्थ में ही लेना चाहिए, क्योंकि भारतीय राष्ट्रीयता का विचार तब बीज रूप में ही था; पंजाबी के लिए हिंदुस्तानी तब भी पराया था। इसी जगह सेन यह भी लिखते हैं कि अवध और शाहाबाद के बाहर ऐसी आम हमदर्दी का कोई सबूत नहीं मिलता जो इस विद्रोह को राष्ट्रीय युद्ध का दर्जा दे; पर इसे केवल फ़ौजी बग़ावत कहकर टाल देना भी ग़लत होगा। स्रोत: सेन, एटीन फ़िफ़्टी-सेवन (अंग्रेज़ी में)
- मजूमदार की किताब का पहला संस्करण 15 अप्रैल 1957 का है। प्रस्तावना में वे लिखते हैं कि किताब का नाम चुनना उन्हें बहुत मुश्किल लगा। “सिपॉय म्यूटिनी” और “वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस”, दोनों ही नाम ठीक न होते, क्योंकि दोनों पहले से वही बात मान लेते हैं जिसकी जाँच करना इस किताब का असली मक़सद है। इसलिए उन्होंने नाम रखा “द सिपॉय म्यूटिनी ऐंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857”, यानी सिपाहियों की बग़ावत और 1857 का विद्रोह, क्योंकि उनकी राय में यह नाम आंदोलन का असली स्वभाव ठीक बताता है, उसे कोई किसी भी नज़र से देखे। वे यह भी साफ़ करते हैं कि यहाँ “रिवोल्ट” का मतलब बस शासकों के प्रति वफ़ादारी छोड़ देना है, उसमें नापसंदगी या निंदा का कोई भाव नहीं। स्रोत: मजूमदार, द सिपॉय म्यूटिनी ऐंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857 (अंग्रेज़ी में)
- मजूमदार के अनुसार 1857-58 के आंदोलन में कई अलग-अलग धाराएँ थीं: सिपाहियों की बग़ावत, जगह-जगह भड़की आम अशांति, लुटेरे क़बीलों और गुंडा तत्वों के संगठित उपद्रव, और लोगों का विद्रोह, जो कहीं-कहीं जायज़ लड़ाई जैसा भी था। पर इनमें आपस में तालमेल नहीं था, हर एक का दायरा और मक़सद सीमित था, और कोई तय योजना, तरीक़ा या संगठन नहीं था; इसलिए वे इसे राष्ट्रीय उभार नहीं मानते, स्वतंत्रता युद्ध तो और भी कम, जिसका इसने कभी दावा भी नहीं किया। उनका तर्क था कि सच्चे अर्थ में राष्ट्रवाद या देशभक्ति भारत में बहुत बाद तक दिखाई नहीं देती, इसलिए 1857 को राष्ट्रीय या स्वतंत्रता युद्ध मानना उन्नीसवीं सदी के भारतीय लोगों के इतिहास की सही जानकारी न होना है। उनके शब्दों में 1857 स्वतंत्रता युद्ध का पहला चरण नहीं, बल्कि मुग़ल सत्ता के पतन के बाद से चले आ रहे “फ़्री लांस” वाले भारत का आख़िरी चरण था, यानी उस दौर का, जब केंद्र की सत्ता टूट जाने से अपने-अपने बल पर लड़ने वाले सरदार और लड़ाके आगे आ गए थे। स्रोत: मजूमदार, द सिपॉय म्यूटिनी ऐंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857 (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब का वाक्य ध्यान से पढ़िए: 1857 को “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया जाता था” (पृष्ठ 283)। यह इस बारे में है कि बीसवीं सदी का राष्ट्रीय आंदोलन 1857 को किस तरह याद करता था, और 1909 की वह किताब, जिसके लेखक ने ख़ुद को “एक भारतीय राष्ट्रवादी” लिखा, इसी याद का एक उदाहरण है। सेन, आज़ाद और मजूमदार का सवाल दूसरा था: 1857 में लड़ने वाले ख़ुद क्या चाहते थे, और वे कितने संगठित थे। इसलिए कक्षा में किताब का वाक्य और इतिहासकारों की बहस, दोनों साथ चल सकते हैं। एक बात तीनों में मिलती है: कोई नहीं कहता कि 1857 में आज जैसी राष्ट्रीयता बन चुकी थी। सेन उसे बीज रूप में मानते हैं, आज़ाद के अनुसार राष्ट्रवाद को आज के अर्थ में लें तो विद्रोह को बिना शर्त राष्ट्रवादी उभार नहीं कहा जा सकता, और मजूमदार उसे बहुत बाद की चीज़ बताते हैं। बहस इस पर है कि इसके बावजूद 1857 को स्वतंत्रता युद्ध कहा जाए या नहीं।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: 1857 के लिए कौन-कौन से नाम मिलते हैं, और हर नाम किसने दिया?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- सिपॉय म्यूटिनी (सिपाहियों की बग़ावत): अंग्रेज़ लेखकों का आम नाम; मैलेसन, गबिन्स और प्रिचर्ड की किताबों के नाम में भी “म्यूटिनी” है। आज़ाद ने इसे “तथाकथित म्यूटिनी” कहा।
- ग़दर: उर्दू में; ज़हीर देहलवी की किताब का नाम “दास्तान-ए-ग़दर” है।
- राष्ट्रीय विद्रोह: 1857 में ही डिज़रायली के भाषण में, और मार्क्स के 31 जुलाई 1857 के लेख में।
- स्वतंत्रता युद्ध: 1909 की किताब “द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस ऑफ़ 1857” (इसी नाम की किताब को मजूमदार वी. डी. सावरकर की बताते हैं); हमारी किताब (पृष्ठ 283) बताती है कि राष्ट्रीय आंदोलन 1857 को “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम” के रूप में याद करता था।
- सिपॉय म्यूटिनी ऐंड द रिवोल्ट ऑफ़ 1857: मजूमदार का 1957 का नाम, जो उनकी राय में आंदोलन का असली स्वभाव ठीक बताता है।
हमारी ओर से: नाम अपने आप में एक राय है। बच्चों से पूछिए कि “बग़ावत”, “विद्रोह” और “संग्राम”, इन तीनों में से हर शब्द 1857 के बारे में पहले से क्या मानकर चलता है।
सवाल: सेन और मजूमदार, दोनों की किताबें 1957 में आईं। वे किस बात पर सहमत हैं, और किस बात पर अलग हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- सहमति: दोनों मानते हैं कि उस समय भारतीय राष्ट्रीयता पूरी तरह बनी नहीं थी। सेन के शब्दों में वह बीज रूप में थी; मजूमदार के अनुसार सच्चे अर्थ का राष्ट्रवाद भारत में बहुत बाद तक नहीं दिखता।
- सेन: धर्म के लिए शुरू हुई लड़ाई स्वतंत्रता युद्ध पर ख़त्म हुई, क्योंकि विद्रोही विदेशी सरकार हटाकर दिल्ली के बादशाह वाली पुरानी व्यवस्था लौटाना चाहते थे; अवध में विद्रोह ने सीमित अर्थ में राष्ट्रीय रूप लिया, पर अवध और शाहाबाद के बाहर ऐसी आम हमदर्दी नहीं दिखती जो इसे राष्ट्रीय युद्ध बनाए।
- मजूमदार: यह न राष्ट्रीय उभार था, न स्वतंत्रता युद्ध; इसकी धाराओं में तालमेल और योजना नहीं थी, और यह मुग़ल सत्ता के पतन के बाद वाले दौर का आख़िरी चरण था।
हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि जब दो इतिहासकार एक ही साल, एक ही घटना पर लिखते हैं, तो उनके नतीजे किन बातों से अलग हो सकते हैं: “राष्ट्रीय” शब्द का क्या अर्थ लिया, किस इलाक़े को ज़्यादा देखा (सेन अवध को अलग गिनते हैं), और विद्रोहियों के किस मक़सद को असली माना।
सवाल: किताब कहती है कि 1857 को “प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में याद किया जाता था” (पृष्ठ 283)। इतिहासकारों की इस बहस के साथ यह वाक्य कक्षा में कैसे पढ़ाएँ?
उत्तर देखिए
उत्तर:
- किताब याद की बात करती है: वाक्य बताता है कि बीसवीं सदी का राष्ट्रीय आंदोलन 1857 को कैसे याद करता था। 1909 की किताब, जिसके लेखक ने ख़ुद को “एक भारतीय राष्ट्रवादी” लिखा, और सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता, दोनों इसी याद के हिस्से हैं।
- इतिहासकार घटना की बात करते हैं: सेन, आज़ाद और मजूमदार पूछते हैं कि 1857 में लड़ने वाले क्या चाहते थे और कितने संगठित थे।
- आज़ाद की दोनों बातें: उन्होंने बीसवीं सदी के शुरू की ऐसी किताबों को इतिहास नहीं, राजनीतिक प्रचार कहा, पर यह भी लिखा कि आज़ादी की इस लड़ाई में हिंदू और मुसलमान कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे।
हमारी ओर से: बच्चों से कहिए कि किसी भी बड़ी घटना के बारे में दो सवाल अलग-अलग पूछें: उस समय असल में क्या हुआ, और बाद के लोगों ने उसे कैसे याद रखा। 1857 के साथ दोनों सवालों के जवाब इस पन्ने पर हैं।