कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 53 से 81
यह पन्ना किसलिए — किताब के तीन विषयों को और गहराई से समझाने के लिए: पुणे में महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण कैसे बना, बी.बी. लाल की हस्तिनापुर की खुदाई में क्या-क्या मिला, और सातवाहन रानियों और उनके गोत्रों के बारे में अभिलेख ख़ुद क्या कहते हैं। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर उसके आगे की बातें, स्रोत के लिंक के साथ, और अंत में कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।
परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। यहाँ की बातें किताब की बात को खोलकर समझाने के लिए हैं। पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।
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महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण
किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “1919 में प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में एक अत्यंत महत्त्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत हुई।” (पृष्ठ 54) देश के अलग-अलग भागों से, अलग-अलग लिपियों में लिखी पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं। विद्वानों ने “उन श्लोकों का चयन किया जो लगभग सभी पांडुलिपियों में पाए गए थे और उनका प्रकाशन 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंडों में किया”, और “इस परियोजना को पूरा करने में सैंतालीस वर्ष लगे” (पृष्ठ 54)। क्षेत्रीय प्रभेद “पादटिप्पणियों और परिशिष्टों” में रखे गए, और “13,000 पृष्ठों में से आधे से भी अधिक इन प्रभेदों का ब्योरा देते हैं”। चित्र 3.2 में मोटे अक्षरों में मुख्य पाठ है और छोटे अक्षरों में पाठभेद। पृष्ठ 79 की समय-रेखा में “1919-66” लिखा है, और यह भी कि 1973 में जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने इस संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया, जो 1978 में उनकी मृत्यु के बाद अधूरा रह गया। किताब यहीं रुकती है: यह काम किस संस्थान में हुआ, कितनी पांडुलिपियाँ देखी गईं, किसी श्लोक को रखने या हटाने का फ़ैसला कैसे हुआ, और कौन-से जाने-माने प्रसंग मुख्य पाठ में नहीं रहे, यह बात उसमें नहीं आती।
नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: पुणे के भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट (BORI) की वेबसाइट पर संस्थान का इतिहास और महाभारत विभाग का परिचय; सुकथांकर की प्रोलेगोमेना, यानी आदिपर्व के खंड (1933) के साथ छपी उनकी लंबी भूमिका; और फ़्रैंकलिन एजर्टन का संपादित सभापर्व, जो इसी संस्करण का एक खंड है।
पुणे का संस्थान और पहला श्लोक
- 6 जुलाई 1915 को पुणे के आनंदाश्रम में प्राचीन भारतीय विद्या में रुचि रखने वालों की एक बैठक हुई। उसमें तय हुआ कि संस्कृत के विद्वान रामकृष्ण गोपाल भांडारकर के सम्मान में एक शोध संस्थान बने। दो साल बाद, 6 जुलाई 1917 को, भांडारकर के जन्मदिन पर भांडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट की स्थापना हुई। स्रोत: BORI, संस्थान का इतिहास (अंग्रेज़ी में)
- महाभारत का जाँचा-परखा पाठ तैयार करने की माँग पहले यूरोप के विद्वानों ने उठाई थी। प्रोलेगोमेना बताती है कि एम. विंटरनित्ज़ ने 1897 में पेरिस के और 1902 में हैम्बर्ग के प्राच्यविद सम्मेलन में यह बात ज़ोर देकर रखी। 1908 में एच. ल्यूडर्स ने लाइपज़िग से 18 पृष्ठों का एक नमूना छापा: आदिपर्व के पहले 67 श्लोक, और नीचे पादटिप्पणियों में उनके पाठभेद। यूरोप और अमेरिका की अकादमियों की यह योजना विश्वयुद्ध (1914-18) के कारण वहीं ख़त्म हो गई। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में)
- 6 जुलाई 1918 को संस्थान की आम सभा में औंध रियासत के प्रमुख, श्रीमंत बालासाहेब पंत प्रतिनिधि ने महाभारत का जाँचा-परखा और सचित्र संस्करण तैयार करने की बात रखी, और इसके लिए सालाना किस्तों में एक लाख रुपये देने का वचन दिया। इसी वचन के भरोसे संस्थान ने सरकारों, रियासतों और धनी लोगों से मदद माँगी। 1 अप्रैल 1919 को रामकृष्ण गोपाल भांडारकर ने काम का उद्घाटन किया, और मिलान की पहली शीट पर ख़ुद वह श्लोक लिखा जिसे आमतौर पर महाभारत का पहला श्लोक माना जाता है। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में) · BORI, संस्थान का इतिहास (अंग्रेज़ी में)
- संस्थान के रिकॉर्ड के अनुसार वी.एस. सुकथांकर 1 अगस्त 1925 को महाभारत के प्रधान संपादक बने, और संस्करण का पहला भाग 6 जुलाई 1927 को छपा। 21 जनवरी 1943 को सुकथांकर की मृत्यु हुई। 1 अप्रैल 1943 को एस.के. बेलवलकर प्रधान संपादक बने, और 1 अप्रैल 1961 को उनके सेवानिवृत्त होने पर पी.एल. वैद्य। स्रोत: BORI, संस्थान का इतिहास (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब इस परियोजना को सुकथांकर के नाम से जोड़ती है, और यह ठीक ही है: पांडुलिपियाँ किस तरह बाँटी और परखी जाएँ, यह तरीका उन्हीं की प्रोलेगोमेना में लिखा है। संस्थान के रिकॉर्ड में काम 1919 में शुरू होता है और सुकथांकर 1925 में प्रधान संपादक बनते हैं। कक्षा में दोनों बातें साथ बताइए: काम 1919 में शुरू हुआ, और 1925 से सुकथांकर ने उसे दिशा दी।
एक श्लोक कैसे परखा गया
- अकेले आदिपर्व की लगभग 235 पांडुलिपियों का पता था। इनमें से आधे से थोड़ी कम (107) देवनागरी में थीं, और बाक़ी बांग्ला (32), ग्रंथ (31), तेलुगु (28), मलयालम (26) और दूसरी लिपियों में। पूरे संस्करण के लिए, BORI के अनुसार, लगभग पाँच दशकों में 1,259 पांडुलिपियाँ देखी गईं। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में) · BORI, महाभारत विभाग (अंग्रेज़ी में)
- मिलान का तरीका सीधा, पर धीरज का था। बंबई में छपे एक संस्करण का हर श्लोक लकीरों वाली एक बड़ी शीट की सबसे ऊपर वाली पंक्ति में मोटे अक्षरों में लिखा जाता था। उसके नीचे हर पांडुलिपि के लिए एक पंक्ति होती थी, और मिलान करने वाला उसमें उस पांडुलिपि का पाठ अक्षर-अक्षर करके, ठीक उसी अक्षर के नीचे लिखता था। यह काम पुणे के अलावा बंगाल में रवींद्रनाथ टैगोर के विश्वभारती में और तंजौर के सरस्वती महल में भी चलता था। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में)
- सुकथांकर ने पांडुलिपियों को उनकी लिपि के हिसाब से बाँटा। भारत की लिपियाँ मोटे तौर पर दो तरह की हैं, उत्तरी और दक्षिणी, इसलिए महाभारत के भी दो मुख्य पाठ-रूप बने: उत्तरी और दक्षिणी। हर एक के भीतर प्रांतों की लिपियों के हिसाब से छोटे रूप थे, जैसे बांग्ला वाला रूप। उनका एक नियम यह था: जब बांग्ला पांडुलिपियाँ और दक्षिण की पांडुलिपियाँ एक ही पाठ देती हैं, तो उसे प्राथमिकता मिले, क्योंकि दूर-दूर की दो अलग परंपराएँ संयोग से एक जैसी नहीं हो जातीं। साथ ही उन्होंने यह सावधानी भी लिखी कि कुछ बांग्ला पांडुलिपियाँ दक्षिणी परंपरा के असर में थीं, इसलिए यह नियम आँख मूँदकर नहीं लगाया जा सकता। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में)
- किसी एक अच्छी पांडुलिपि को जैसी-की-तैसी छाप देना आसान रास्ता होता। सुकथांकर ने लिखा कि नियम बनाकर ऐसा करना “बुरी तरह नाकाम” तरीका है, और इसकी दो वजहें बताईं: हमारे पास जो पांडुलिपियाँ हैं, वे मुश्किल से पाँच सौ साल पुरानी हैं, और उनमें अलग-अलग पाठ-परंपराएँ लगातार आपस में मिलाई गई हैं। इसलिए हर ज़रूरी पाठभेद पन्ने के नीचे टिप्पणियों में दिया गया, और खंड के अंत में परिशिष्ट भी जोड़े गए। आदिपर्व के खंड में मुख्य पाठ और टिप्पणियाँ पृष्ठ 1 से 881 तक हैं, और पहला परिशिष्ट पृष्ठ 883 से 970 तक। किताब का चित्र 3.2 इसी बनावट का एक पन्ना है। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में)
दो प्रसिद्ध प्रसंग जो मुख्य पाठ में नहीं हैं
- गणेश ने व्यास के बोलने पर महाभारत लिखा, यह कहानी बहुत लोग जानते हैं। सुकथांकर के अनुसार यह कहानी कुछ बाद की, कम भरोसेमंद देवनागरी पांडुलिपियों में ही मिलती है, इसलिए यह मुख्य पाठ में नहीं रखी गई। उन्होंने लिखा कि महाकाव्य ख़ुद कहता है कि वह पहली बार एक बड़े यज्ञ-सत्र में सुनाया गया, और सुनाने वाले वैशंपायन थे, जो रचयिता के सीधे शिष्य थे। स्रोत: सुकथांकर, प्रोलेगोमेना, 1933 (अंग्रेज़ी में)
- सभापर्व में चीरहरण के समय द्रौपदी की एक लंबी प्रसिद्ध प्रार्थना है, जो बंबई वाले संस्करण में छपी थी। सभापर्व के संपादक फ़्रैंकलिन एजर्टन लिखते हैं कि पांडुलिपियों का साक्ष्य “पूरी तरह निर्णायक” है: यह प्रार्थना मूल पाठ का हिस्सा नहीं है। जाँचे हुए पाठ में बस इतना है कि दुःशासन जब-जब द्रौपदी का वस्त्र खींचता, उसी तरह का दूसरा वस्त्र बार-बार निकल आता; सारे राजा चकित होकर शोर करने लगे, और भीम ने अपनी प्रसिद्ध प्रतिज्ञा की। स्रोत: एजर्टन, सभापर्व (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब पृष्ठ 75 पर कहती है कि यह ग्रंथ “अपने प्रारंभिक रूप में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम रहा होगा”, और बढ़ते-बढ़ते “एक लाख श्लोकों वाला हो गया”। समालोचनात्मक संस्करण इस बढ़त को पकड़ने का औज़ार है: जो अंश सब इलाकों की पांडुलिपियों में नहीं मिलते, वे पन्ने के नीचे या परिशिष्ट में चले जाते हैं।
एक लाख श्लोक, या नवासी हज़ार?
- BORI के अनुसार पूरा संस्करण 18 पर्वों और 19 खंडों में है। जाँच-परख के बाद तय हुए मुख्य पाठ में 89,000 से ज़्यादा श्लोक हैं, और साथ में पाठभेदों का विस्तृत ब्योरा है। पृष्ठ “15000+” लिखे हैं। काम अप्रैल 1919 से सितंबर 1966 तक चला, और 22 सितंबर 1966 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने पूरा संस्करण जारी किया। स्रोत: BORI, महाभारत विभाग (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब पृष्ठ 53 पर कहती है कि महाभारत “अपने वर्तमान रूप में एक लाख श्लोकों से अधिक” है, और BORI मुख्य पाठ में 89,000 से ज़्यादा श्लोक गिनता है। दोनों अलग चीज़ें गिनते हैं: पहला आँकड़ा उस महाकाव्य का है जो आज प्रचलित है, दूसरा उस पाठ का जो सब पांडुलिपियों की तुलना के बाद मुख्य पाठ में रखा गया। पृष्ठों की गिनती में किताब 13,000 लिखती है और BORI “15000+”। परीक्षा में किताब वाली संख्या लिखिए। किताब के “1919-66” और “सैंतालीस वर्ष” BORI की तारीख़ों से मेल खाते हैं।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: चित्र 3.2 में कुछ पाठ मोटे अक्षरों में है और कुछ छोटे अक्षरों में। किसी श्लोक को मुख्य पाठ में रखने का फ़ैसला कैसे होता था?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह कई क़दमों में होता था:
- पांडुलिपियाँ जुटाना: देश भर से, अलग-अलग लिपियों में; अकेले आदिपर्व की लगभग 235।
- अक्षर-अक्षर मिलान: हर श्लोक शीट की सबसे ऊपर की पंक्ति में, और उसके नीचे हर पांडुलिपि का पाठ।
- लिपि के हिसाब से बाँटना: उत्तरी और दक्षिणी पाठ-रूप, और उनके भीतर प्रांतों की लिपियों वाले रूप।
- तौलना: जो पाठ दूर-दूर की परंपराओं में एक जैसा मिले, वह मुख्य पाठ में; बाक़ी पाठभेद पन्ने के नीचे या परिशिष्ट में।
हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि किसी एक पांडुलिपि को जैसा-का-तैसा छाप देने में क्या दिक़्क़त होती। इससे समझ आता है कि “सबसे पुराना पाठ” खोजने के लिए तुलना क्यों ज़रूरी थी।
सवाल: किताब महाभारत को “एक लाख श्लोकों से अधिक” बताती है, और BORI मुख्य पाठ में 89,000 से ज़्यादा श्लोक गिनता है। क्या इनमें से कोई एक ग़लत है?
उत्तर देखिए
उत्तर: नहीं, दोनों अलग चीज़ें गिनते हैं:
- एक लाख से अधिक: आज प्रचलित महाकाव्य, जिसमें सदियों में जुड़े अंश भी हैं (किताब, पृष्ठ 53 और 75)।
- 89,000 से ज़्यादा: वह पाठ जो सब इलाकों की पांडुलिपियों की तुलना के बाद मुख्य पाठ में रखा गया।
- उदाहरण: गणेश के लिखने की कहानी और चीरहरण के समय द्रौपदी की लंबी प्रार्थना, दोनों मुख्य पाठ में नहीं हैं।
हमारी ओर से: यह बताइए कि कोई प्रसंग मुख्य पाठ में न होने से “झूठा” नहीं हो जाता; इसका मतलब बस इतना है कि वह बाद में जुड़ा। इतिहासकार के लिए यही जानकारी काम की है, क्योंकि इससे पता चलता है कि ग्रंथ समय के साथ कैसे बढ़ा।
हस्तिनापुर की खुदाई
किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “1951-52 में पुरातत्ववेत्ता बी.बी. लाल ने मेरठ ज़िले (उ.प्र.) के हस्तिनापुर नामक एक गाँव में उत्खनन किया।” (पृष्ठ 75) किताब सावधान करती है कि “नामों की समानता मात्र एक संयोग हो सकता है”, पर गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था, इस पुरास्थल का होना बताता है कि यह कुरुओं की राजधानी हो सकती थी। लाल को “आबादी के पाँच स्तरों के साक्ष्य” मिले। दूसरे स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व) के घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, पर मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें और सरकंडे की छाप वाला पलस्तर मिला; तीसरे स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व) में कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, “शोषक–घट”, ईंटों के नाले और “वलय–कूप” मिले (पृष्ठ 75)। स्रोत 15 में आदिपर्व का हस्तिनापुर है: “सैकड़ों प्रासादों से संकुलित” नगर, जिसके सिंहद्वार, तोरण और कंगूरे बादलों की तरह थे (पृष्ठ 76)। किताब यहीं रुकती है: लाल की रिपोर्ट कहाँ छपी, बाक़ी स्तरों में क्या मिला, दूसरा स्तर ख़त्म कैसे हुआ, और लाल ने ख़ुद अपने निष्कर्षों को कितना पक्का माना, यह बात उसमें नहीं आती।
नीचे की बातें बी.बी. लाल की अपनी रिपोर्ट से हैं, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की पत्रिका “एंशिएंट इंडिया” के अंक 10 और 11 में छपी, और अंग्रेज़ी में है।
खुदाई कब, कहाँ और क्यों
- लाल पहली बार अक्टूबर 1949 में हस्तिनापुर के खंडहर देखने गए। यह जगह दिल्ली से लगभग 60 मील (लगभग 97 किलोमीटर) उत्तर-पूर्व में है, और सड़क से मेरठ और मवाना होकर पहुँचते हैं। लाल लिखते हैं कि महाभारत और पुराणों में, और जैन और बौद्ध ग्रंथों में भी, हस्तिनापुर को कौरव राजाओं की राजधानी कहा गया है, और आदिपर्व के अनुसार नगर का नाम राजा हस्तिन के नाम पर पड़ा। यहाँ के टीले कहीं-कहीं आसपास की ज़मीन से लगभग 60 फ़ुट ऊँचे हैं। स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
- रिपोर्ट के नाम में साल “1950-52” लिखे हैं। लाल के अनुसार पहला दौर नवंबर 1950 से मार्च 1951 तक चला, और काम उसी साल के अंत में फिर शुरू होकर मार्च 1952 में पूरा हुआ। किताब 1951-52 लिखती है; परीक्षा में वही लिखिए। स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
- लाल खुदाई का कारण बताते हैं। हड़प्पा सभ्यता के अंत और असोक के अभिलेखों के बीच लगभग बारह सदियों का समय पुरातत्व में लगभग ख़ाली था, और लाल के शब्दों में यह फ़ासला पाटना भारतीय पुरातत्व की “सबसे उलझी हुई समस्याओं” में से एक था। हस्तिनापुर जैसी जगह, जिसका नाम ग्रंथों में आता है, इस बीच के समय की परतें दिखा सकती थी। स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
पाँच काल, एक नज़र में
- पहला काल (1200 ईसा पूर्व से पहले): सबसे नीचे की परत। कोई इमारत या दूसरी चीज़ें नहीं मिलीं, बस बर्तनों के इक्के-दुक्के टुकड़े, जिनसे लगता है कि बस्ती छिटपुट थी।
- दूसरा काल (लगभग 1100 से 800 ईसा पूर्व): इस परत की पहचान चित्रित धूसर मृद्भांड (पेंटेड ग्रे वेयर) से होती है: स्लेटी रंग के बर्तन, जिन पर चित्रकारी है। घरों की पूरी योजना नहीं मिली; दीवारें मिट्टी और कच्ची ईंटों की थीं, और कुछ सरकंडों की, जिन पर मिट्टी का पलस्तर था। चावल के दाने और घोड़े की हड्डियाँ भी मिलीं।
- तीसरा काल (छठी सदी ईसा पूर्व की शुरुआत से तीसरी सदी ईसा पूर्व की शुरुआत तक): इस परत में उत्तरी काली पॉलिश वाले बर्तन (NBP) मिलते हैं। घर कच्ची और पकी ईंटों के, ईंटों से बनी नालियाँ, शोषक-घट और पकी मिट्टी के छल्लों से बने वलय-कूप।
- चौथा काल (दूसरी सदी ईसा पूर्व की शुरुआत से तीसरी सदी ईसवी के अंत तक): मथुरा के शासकों के सिक्के (दूसरी सदी ईसा पूर्व), यौधेयों के सिक्के (ईसवी सन् की शुरुआत के आसपास), और कुषाण राजा वासुदेव के सिक्कों की नक़लें। पकी मिट्टी की सुंदर साँचे में ढली मूर्तियाँ, और बोधिसत्व मैत्रेय की एक मूर्ति का धड़।
- पाँचवाँ काल (ग्यारहवीं सदी के अंत से पंद्रहवीं सदी की शुरुआत तक): दिल्ली के सुल्तान बलबन (1266-87) का एक सिक्का, और पार्वती और ऋषभदेव की मूर्तियाँ।
स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब दूसरे काल को लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ईसा पूर्व का बताती है, और लाल की रिपोर्ट लगभग 1100 से 800 ईसा पूर्व का। तीसरे काल के लिए दोनों लगभग एक ही बात कहते हैं। परीक्षा में किताब वाली तारीख़ लिखिए। कक्षा में बताइए कि पुरातत्व की तारीख़ें “लगभग” वाली होती हैं, और नई खोजों के साथ बदल भी सकती हैं।
बाढ़, और पुराणों का निचक्षु
- लाल लिखते हैं कि दूसरे काल की बस्ती की लगभग 6-7 फ़ुट मोटी परतें जम चुकी थीं, तब नदी में एक बड़ी बाढ़ आई, जो बस्ती का बड़ा हिस्सा काट ले गई। इसके बाद लोग यह जगह छोड़कर चले गए। स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
- लाल ने इस बाढ़ को पुराणों की एक बात से जोड़ा। पुराणों की राजाओं की सूची में अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित के बाद जनमेजय, शतानीक, अश्वमेधदत्त, अधिसीमकृष्ण और निचक्षु आते हैं। निचक्षु के समय गंगा की बाढ़ हस्तिनापुर का बड़ा हिस्सा बहा ले गई, और राजधानी कौशांबी चली गई। पुराण का श्लोक कहता है: “जब गंगा हस्तिनापुर नगर को बहा ले जाएगी, तब निचक्षु उसे छोड़कर कौशांबी में बसेगा।” लाल ने यह बात सवाल के रूप में रखी: क्या बाढ़ और राजधानी के कौशांबी जाने की कथा के पीछे कोई ऐतिहासिक आधार हो सकता है? स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
लाल ख़ुद कितने पक्के थे
- लाल और उनके साथियों ने महाभारत की कथा से जुड़ी तीस से ज़्यादा जगहें देखीं, और लगभग सबमें वही चित्रित धूसर मृद्भांड मिले। इनमें अहिच्छत्र, कांपिल, मथुरा, कुरुक्षेत्र, बागपत, पानीपत, तिलपत और इंद्रपत (दिल्ली का पुराना क़िला, जिसे इंद्रप्रस्थ माना जाता है) हैं, और मेरठ ज़िले का बरनावा, जिसे लाल कथा का वारणावत मानते हैं। लाल ने लिखा कि अगर ये सब मेल केवल संयोग हैं, तो सवाल वहीं ख़त्म हो जाता है; नहीं तो मानना पड़ेगा कि कथा की ये जगहें पहचानी जा सकती हैं। स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
- फिर भी लाल ने अपने निष्कर्षों को पक्का नहीं कहा। उन्होंने साफ़ लिखा कि यह सारा साक्ष्य “परिस्थितिजन्य” है, और जब तक लोगों के रहन-सहन (नृवंश-विज्ञान) और अभिलेखों से प्रमाण न मिलें, ये निष्कर्ष “अस्थायी” ही माने जाएँगे। महाभारत के युद्ध की तारीख़ पर भी विद्वान एकमत नहीं थे: लाल ने पार्जिटर की तारीख़ (लगभग 950 ईसा पूर्व) के साथ दूसरे विद्वानों की सुझाई तारीख़ें भी गिनाईं, जो 3102 ईसा पूर्व से लेकर नौवीं सदी ईसा पूर्व तक फैली हैं। स्रोत: बी.बी. लाल, हस्तिनापुर की खुदाई (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब और लाल, दोनों एक ही सावधानी बरतते हैं: किताब कहती है कि नामों की समानता “मात्र एक संयोग हो सकता है”, और लाल अपने निष्कर्षों को “अस्थायी” कहते हैं। बच्चों को यह फ़र्क़ दिखाइए: खुदाई बताती है कि वहाँ कब, कैसे लोग रहते थे; यह कि वही लोग महाकाव्य के कौरव थे, एक अनुमान है।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: किताब का किनारे का प्रश्न है: “क्या आपको लगता है कि लाल की खोज और महाकाव्य में वर्णित हस्तिनापुर में समानता है।” (पृष्ठ 76) बच्चे किन बातों के आधार पर उत्तर दें?
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों तरफ़ की बातें रखिए:
- मेल खाने वाली बातें: जगह गंगा के ऊपरी दोआब में है, जहाँ कुरु राज्य था; नाम वही है; कथा की कई जगहों पर एक ही तरह के बर्तन मिले; और पुराणों की बाढ़ वाली कथा जैसी एक बाढ़ खुदाई में भी दिखी।
- मेल न खाने वाली बातें: स्रोत 15 का नगर “सैकड़ों प्रासादों से संकुलित” है, जबकि दूसरे काल में घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली, और दीवारें मिट्टी, कच्ची ईंट और सरकंडे की थीं।
- लाल की अपनी राय: साक्ष्य परिस्थितिजन्य है, और निष्कर्ष अस्थायी।
हमारी ओर से: इसका कोई एक सही उत्तर नहीं है। अच्छा उत्तर वह है जिसमें बच्चा कारण दे। आप यह भी पूछ सकते हैं कि कवि अपनी राजधानी का वर्णन बढ़ा-चढ़ाकर क्यों करेगा।
सवाल: हस्तिनापुर का दूसरा काल ख़त्म कैसे हुआ, और पुराणों की कौन-सी बात इससे मेल खाती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: खुदाई और पुराण, दोनों एक बाढ़ की बात करते हैं:
- खुदाई में: दूसरे काल की बस्ती के बाद नदी की बड़ी बाढ़ के निशान हैं, जिसने बस्ती का बड़ा हिस्सा काट दिया, और फिर लोग वह जगह छोड़ गए।
- पुराणों में: राजा निचक्षु के समय गंगा हस्तिनापुर को बहा ले गई, और राजधानी कौशांबी चली गई।
हमारी ओर से: लाल ने इसे सवाल के रूप में रखा था, पक्की बात के रूप में नहीं। बच्चों से पूछिए कि किसी कथा को इतिहास मानने से पहले और कौन-से सबूत चाहिए होंगे (लाल ख़ुद अभिलेखों जैसे सीधे प्रमाण की बात करते हैं)।
सातवाहन रानियाँ और गोत्र
किताब कहाँ रुकती है। स्रोत 4 में अभिलेखों से मिले सातवाहन राजाओं के नाम हैं, और किताब समझाती है: “गोतमी–पुत्त का अर्थ है ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि स्त्रीवाची नाम हैं गौतम और वशिष्ठ के। ये दोनों वैदिक ऋषि थे जिनके नाम से गोत्र हैं।” (पृष्ठ 59) पृष्ठ 60 पर किताब बताती है कि रानियों ने विवाह के बाद भी “पिता का गोत्र नाम ही कायम रखा”, कुछ रानियाँ एक ही गोत्र से थीं, और राजाओं के माँ के नाम से जाने जाने पर भी “किसी भी निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले हमें बहुत सावधानी बरतनी होगी”, क्योंकि “सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था”। पृष्ठ 63 पर: “गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को अनूठा ब्राह्मण और साथ ही क्षत्रियों के दर्प का हनन करने वाला बताया था। उसने यह भी दावा किया कि चार वर्णों के बीच विवाह संबंध होने पर उसने रोक लगाई। किंतु फिर भी रुद्रदामन के परिवार से उसने विवाह संबंध स्थापित किए।” किताब यहीं रुकती है: ये बातें किन अभिलेखों में हैं, गोतमी कौन थीं, और रुद्रदामन के परिवार से रिश्ते का सबूत कहाँ मिलता है, यह बात उसमें नहीं आती।
नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: “आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया” के खंड 4 और 5, जिनमें नासिक, नानेघाट और कान्हेरी के अभिलेखों के पाठ और जी. बूलर के अनुवाद हैं; एच. ल्यूडर्स की ब्राह्मी अभिलेखों की सूची (एपिग्राफ़िया इंडिका, खंड 10); और NIOS (राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान) की इतिहास की पाठ्य-सामग्री का पाठ 6।
नासिक की गुफा: एक माँ का अभिलेख
- नासिक की एक बौद्ध गुफा में एक लंबा अभिलेख है, जो राजा वासिष्ठीपुत्र पुलुमायि के 19वें वर्ष में, गर्मी के मौसम के दूसरे पखवाड़े के 13वें दिन लिखा गया। (यह वही राजा है जो किताब के स्रोत 4 की दूसरी पंक्ति में “राजा वसिथि–पुत्त (सामि) सिरि–पुलुमायि” है।) अभिलेख रानी बलश्री का है, जो गौतम गोत्र की थीं और राजा सातकर्णि गोतमीपुत्र की माँ थीं। उन्होंने यह गुफा भदावनीय संघ के बौद्ध भिक्षुओं को दी। उसी अभिलेख में उनका पोता, दक्षिणापथ का स्वामी, तिरण्हु पर्वत के दक्षिण-पश्चिम में पिसाचिपदक नाम का गाँव दान करता है। बूलर लिखते हैं कि “बलश्री” रानी का अपना नाम है; “गोतमी” उनके गोत्र से बना नाम है। स्रोत: आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, खंड 4 (अंग्रेज़ी में) · ल्यूडर्स की सूची, एपिग्राफ़िया इंडिका खंड 10 (अंग्रेज़ी में)
- अभिलेख में माँ अपने बेटे की तारीफ़ करती है। बूलर के अनुवाद के अनुसार उसमें गोतमीपुत्र को क्षत्रियों का घमंड और अहंकार तोड़ने वाला, शकों, यवनों और पह्लवों को नष्ट करने वाला, सातवाहन वंश की कीर्ति लौटाने वाला, चार वर्णों के मेल को रोकने वाला, और माँ की बात कभी न टालने वाला कहा गया है। प्राकृत में उसे “एकबम्हण” (अकेला, अनूठा ब्राह्मण) और “खतियदपमानमदन” (क्षत्रियों के दर्प और मान को कुचलने वाला) कहा गया है। किताब के पृष्ठ 63 की बातें यहीं से हैं। स्रोत: आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, खंड 4 (अंग्रेज़ी में)
- माँ के गोत्र वाले ऐसे नामों को बूलर ने एक दूसरे राजवंश, वाकाटकों, के एक राजकुमार के उदाहरण से समझाया: उसका नाम “गौतमीपुत्र” बताता है कि वह राजा प्रवरसेन प्रथम की उस पत्नी का बेटा था जो गौतम गोत्र की थी। बूलर ने लिखा कि यह व्याख्या उन्होंने अपने समय के राजपूतों में चल रही प्रथा देखकर दी थी। उसी जगह उन्होंने यह भी लिखा कि श्रौतसूत्रों और गोत्रों के ग्रंथों के अनुसार राजपरिवार अपने पुरोहित के वैदिक गोत्र से जुड़ जाते थे। स्रोत: आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, खंड 4 (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब “चार वर्णों के बीच विवाह संबंध” पर रोक की बात कहती है; बूलर के अनुवाद में शब्द “चार वर्णों के मेल को रोकने वाला” है। दोनों एक ही दावे की बात करते हैं। ध्यान देने की बात यह है कि यह राजा का अपना दावा है, जो उसकी माँ के अभिलेख में लिखा है, किसी बाहर वाले की गवाही नहीं।
नानेघाट: रानी नायनिका
- नानेघाट वह दर्रा है जो कोंकण के तट से ऊपर, पुराने नगर जुन्नर की ओर जाता है। दर्रे के ऊपर एक बड़ी गुफा में सातवाहनों के अभिलेख हैं, जिन्हें बूलर पश्चिमी भारत के “सबसे पुराने ऐतिहासिक दस्तावेज़” कहते हैं। गुफा में मूर्तियों के ऊपर छोटे लेख हैं; उनमें एक में सिमुक सातवाहन का नाम है, और एक में “देवी नायनिका और राजा श्री सातकर्णि” का। बूलर के अनुसार “नायनिका” संस्कृत नाम “नागनिका” का रूप है, जो “नाग” (साँप) शब्द से बना है। स्रोत: आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, खंड 5 (अंग्रेज़ी में)
- गुफा की दीवार के बड़े अभिलेख में एक रानी है, जो अंगिय कुल के एक महारठी की बेटी और वेदिसिरि की माँ थी। इसमें शाही परिवार के किए वैदिक यज्ञों और उनकी दक्षिणा का ब्योरा है; एक यज्ञ की दक्षिणा में 1,700 गायें और 10 हाथी दिए गए। पत्थर घिस जाने से, बूलर के शब्दों में, “धर्मपरायण रानी का नाम खो गया है”। स्रोत: आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, खंड 5 (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब पृष्ठ 60 पर कहती है कि माँ के नाम से पहचान का मतलब यह नहीं कि गद्दी माँ से मिलती थी। नानेघाट दिखाता है कि रानियाँ फिर भी कितनी अहम थीं: एक रानी के नाम से वैदिक यज्ञों और बड़े दानों का अभिलेख है, और उसके पिता एक महारठी थे, जिसे बूलर एक सामंत की उपाधि बताते हैं, जिसका अर्थ “महासामंत” जैसा था।
कान्हेरी: रुद्रदामन की बेटी
- कान्हेरी की बौद्ध गुफाओं में पानी के एक कुंड पर छोटा अभिलेख है। यह कुंड मंत्री सतेरक ने बनवाया, और बूलर के अनुसार शायद रानी के कहने पर। रानी को वासिष्ठीपुत्र सातकर्णि की रानी, कार्दमक राजाओं के वंश की, और महाक्षत्रप “रु…” की बेटी कहा गया है। पत्थर पर “रु” ही बचा है; “रुद्र” बूलर का पूरा किया हुआ पाठ है। अभिलेख संस्कृत में है, और उसकी लिपि रुद्रदामन प्रथम के समय की पश्चिमी क्षत्रप लिपि जैसी है। स्रोत: आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ़ वेस्टर्न इंडिया, खंड 5 (अंग्रेज़ी में) · ल्यूडर्स की सूची, एपिग्राफ़िया इंडिका खंड 10 (अंग्रेज़ी में)
जूनागढ़: रुद्रदामन की ओर से
- दूसरी तरफ़ की गवाही रुद्रदामन के अपने अभिलेख में है। जूनागढ़ (गिरनार) की उसी चट्टान पर, जिस पर असोक के शिलालेख हैं, रुद्रदामन का 72वें वर्ष का अभिलेख है। ल्यूडर्स के सार के अनुसार उसमें लिखा है कि रुद्रदामन ने दक्षिणापथ के स्वामी सातकर्णि को दो बार हराया, पर निकट संबंध के कारण उसे नष्ट नहीं किया। अभिलेख यह नहीं बताता कि यह कौन-सा सातकर्णि था। स्रोत: ल्यूडर्स की सूची, एपिग्राफ़िया इंडिका खंड 10 (अंग्रेज़ी में), हुल्त्श, असोक के अभिलेख (अंग्रेज़ी में)
- NIOS के अनुसार रुद्रदामन दूसरी सदी ईसवी के मध्य में हुआ, और उसका जूनागढ़ अभिलेख प्रारंभिक भारत का पहला शाही अभिलेख है जो शुद्ध संस्कृत में लिखा गया। NIOS यह भी कहता है कि सातवाहन राजा ख़ुद को ब्राह्मण बताते थे। स्रोत: NIOS, इतिहास, पाठ 6 (अंग्रेज़ी में)
(हमारी ओर से) किताब पृष्ठ 63 पर यह रिश्ता गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि से जोड़ती है। कान्हेरी के अभिलेख में रानी के पति का नाम वासिष्ठीपुत्र सातकर्णि है, और जूनागढ़ का अभिलेख किसी सातकर्णि का नाम भर लेता है, उसके पिता या माँ का नहीं। परीक्षा में किताब वाली बात लिखिए। कक्षा में यह दिखाइए कि दोनों ओर के अभिलेख, सातवाहनों का कान्हेरी वाला और रुद्रदामन का जूनागढ़ वाला, एक ही बात मानते हैं: दोनों राजपरिवारों में शादी का रिश्ता था। गिरनार की चट्टान के बारे में अध्याय 2 का आगे की बातें वाला पन्ना भी देखिए।
कक्षा में कैसे पूछें
सवाल: स्रोत 4 के राजा माँ के नाम से जाने जाते थे। क्या इसका मतलब है कि राजगद्दी माँ की ओर से मिलती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: नहीं। किताब कहती है कि “सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक होता था” (पृष्ठ 60)। अभिलेख यह दिखाते हैं:
- नाम में गोत्र: “गोतमी” रानी बलश्री के गौतम गोत्र से बना नाम है; उनका अपना नाम बलश्री था (नासिक अभिलेख)।
- पहचान का कारण: बूलर के अनुसार ऐसा नाम बताता है कि बेटा राजा की उस पत्नी का है जो उस गोत्र की थी। यह उन्होंने वाकाटक राजकुमार गौतमीपुत्र के बारे में लिखा, अपने समय के राजपूतों की प्रथा देखकर।
- फिर भी माँ अहम: नासिक में माँ बेटे की कीर्ति लिखवाती है, और नानेघाट में एक रानी के नाम से यज्ञों और दानों का अभिलेख है।
हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि आज किसी को उसकी माँ के नाम से पुकारा जाए तो उससे क्या-क्या पता चलता है, और क्या नहीं। यही किताब की “बहुत सावधानी” है।
सवाल: गोतमी-पुत्त ख़ुद को “अनूठा ब्राह्मण” कहता है और वर्णों के मेल को रोकने का दावा करता है, फिर भी सातवाहन परिवार ने महाक्षत्रप रुद्रदामन के परिवार से रिश्ता जोड़ा। अभिलेख इस बारे में क्या दिखाते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: तीन अभिलेख मिलाकर देखिए:
- नासिक: माँ बलश्री के अभिलेख में बेटा “एकबम्हण” और क्षत्रियों का दर्प कुचलने वाला है, और चार वर्णों के मेल को रोकने वाला भी।
- कान्हेरी: वासिष्ठीपुत्र सातकर्णि की रानी महाक्षत्रप “रु(द्र)” की बेटी कही गई है।
- जूनागढ़: रुद्रदामन कहता है कि उसने सातकर्णि को दो बार हराया, पर निकट संबंध के कारण नष्ट नहीं किया।
हमारी ओर से: अभिलेख राजा जैसा दिखना चाहता था, वैसी तस्वीर देता है; राजनीति उसके अपने हिसाब से चलती थी। किताब का पृष्ठ 63 यही कहता है: नियम ग्रंथों और दावों में थे, और व्यवहार में रिश्ते ज़रूरत के हिसाब से बनते थे।