Chapter 3बंधुत्व, जाति तथा वर्ग

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग I (कक्षा 12), विषय 3

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कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 53 से 81

यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।

सामग्री के पन्ने

किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना

पृष्ठ 53–54 — शुरुआत और महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण

कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण

किताब कहाँ से शुरू करती है। आरंभिक समाज से (पृष्ठ 53)। अध्याय लगभग 600 ई.पू. से 600 ईसवी तक के समाज की बात करता है: परिवार और विवाह, वर्ण और जाति, संपत्ति और प्रतिष्ठा। किताब शुरू में ही हर ग्रंथ से तीन सवाल पूछना सिखाती है: उसे किसने लिखा, उसमें क्या लिखा गया, और किनके लिए उसकी रचना हुई।

पूरे अध्याय में दो बातें आमने-सामने चलती हैं:

  • संस्कृत के ब्राह्मणीय ग्रंथों (धर्मसूत्र, धर्मशास्त्र, मनुस्मृति) में तय किए गए मानदंड।
  • दूसरे साक्ष्य, जैसे अभिलेख, बौद्ध ग्रंथ, तमिल संगम कविताएँ, चीन से आए यात्रियों के विवरण और महाभारत की अपनी कहानियाँ, जो दिखाते हैं कि लोग असल में क्या करते थे।

भाग 1 एक बड़ी परियोजना की कहानी है।

  • 1919 में संस्कृत विद्वान वी.एस. सुकथांकर के नेतृत्व में अनेक विद्वानों ने महाभारत का समालोचनात्मक संस्करण तैयार करने का ज़िम्मा उठाया।
  • देश के विभिन्न भागों से विभिन्न लिपियों में लिखी संस्कृत पांडुलिपियाँ इकट्ठी की गईं, सबके श्लोकों की तुलना की गई, और वे श्लोक चुने गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले।
  • नतीजा 13,000 पृष्ठों में फैले अनेक ग्रंथ खंड थे, और काम पूरा होने में सैंतालीस वर्ष लगे।

इस काम से दो बातें उभरीं। उत्तर में कश्मीर और नेपाल से दक्षिण में केरल और तमिलनाडु तक की पांडुलिपियों के अनेक अंशों में समानता थी। साथ ही अनेक क्षेत्रीय प्रभेद भी मिले, जिन्हें मुख्य पाठ की पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में रखा गया; 13,000 में से आधे से अधिक पृष्ठ इन्हीं प्रभेदों के ब्योरे हैं। ये प्रभेद प्रभावशाली परंपराओं और लचीले स्थानीय विचार और आचरण के बीच संवाद दिखाते हैं, जिसमें “द्वंद्व और मतैक्य” दोनों हैं।

हमारी ओर से — पांडुलिपियों का मिलान। बोर्ड पर एक ही वाक्य के तीन रूप लिखिए, जिनमें दो-तीन शब्द अलग हों, और कहिए कि ये तीन अलग पांडुलिपियाँ हैं:

  • राजा ने नगर में बड़ा उत्सव किया।
  • राजा ने नगर में उत्सव किया।
  • राजा ने राजधानी में बड़ा उत्सव किया।

बच्चे वे शब्द छाँटें जो तीनों में हैं; यही मुख्य पाठ बनेगा। जो शब्द केवल एक या दो रूपों में हैं, उन्हें नीचे पादटिप्पणी में लिखें। फिर बताइए कि विद्वानों ने यही काम एक लाख से अधिक श्लोकों वाले ग्रंथ पर सैंतालीस वर्ष तक किया।

यहीं रुकिए। समालोचनात्मक संस्करण बनाते समय क्षेत्रीय पाठों का क्या हुआ?

नमूना उत्तर — वे हटाए नहीं गए:

  • मुख्य पाठ में वे श्लोक रखे गए जो लगभग सभी पांडुलिपियों में मिले।
  • क्षेत्रीय प्रभेद पादटिप्पणियों और परिशिष्टों में दर्ज किए गए, और 13,000 पृष्ठों में से आधे से अधिक इन्हीं के ब्योरे हैं।

इसलिए यह संस्करण दिखाता है कि ग्रंथ में पूरे देश की साझा बातें भी हैं और क्षेत्रों की अपनी बातें भी।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि महाभारत एक ही लेखक ने एक ही समय में लिखा। अभी इतना कह दीजिए कि यह ग्रंथ लगभग 500 ई.पू. से एक हज़ार वर्ष तक बनता रहा; इसके लेखकों और चरणों की पूरी बात आठवें कालांश में आएगी। दूसरी उलझन: “समालोचनात्मक” का मतलब आलोचना करना नहीं, पांडुलिपियों को परखकर और मिलाकर पाठ तैयार करना है।

इसी हिस्से में। अध्याय का तर्क · मुख्य शब्द · 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 6, 7) · फ़्लैशकार्ड 1–12; प्रश्न बैंक क1, क2, ग1, घ1।

पृष्ठ 55–57 — बंधुता एवं विवाह: परिवार और पितृवंशिक व्यवस्था

कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. बंधुता एवं विवाह

किताब कहाँ से शुरू करती है। परिवार से (पृष्ठ 55)। परिवार एक बड़े समूह का हिस्सा होते हैं जिन्हें हम संबंधी कहते हैं। पारिवारिक रिश्ते ‘नैसर्गिक’ और रक्त संबद्ध माने जाते हैं, पर इनकी परिभाषा हर समाज में अलग है: कुछ समाजों में चचेरे, मौसेरे भाई-बहन से खून का रिश्ता माना जाता है, कुछ में नहीं। सामान्य लोगों के पारिवारिक संबंधों को पुनर्निर्मित करना मुश्किल है, इसलिए इतिहासकार परिवार और बंधुता के विचारों का भी अध्ययन करते हैं।

पृष्ठ 55 के ये शब्द बोर्ड पर लिखवा दीजिए: कुल (परिवार), ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह), वंश (पीढ़ी-दर-पीढ़ी के पूर्वज), और पितृवंशिकता (पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र तक चलने वाली वंश परंपरा)। साथ में मातृवंशिकता, यानी माँ से जुड़ी वंश परंपरा। हिंदी किताब के बॉक्स में यहाँ ‘जाति’ छपा है; यह शब्द ज्ञाति (बांधवों का बड़ा समूह) है, वर्ण व्यवस्था वाली जाति नहीं।

फिर किताब महाभारत पर आती है।

  • एक स्तर पर महाभारत बंधुता के रिश्तों में बदलाव की कहानी है: कुरु वंश के बांधवों के दो दल, कौरव और पांडव, भूमि और सत्ता के लिए लड़े। पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया।
  • पितृवंशिकता महाकाव्य की रचना से पहले भी थी; महाभारत की मुख्य कथावस्तु ने इस आदर्श को और सुदृढ़ किया।
  • अधिकतर राजवंश (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे, पर इसमें विभिन्नता थी: पुत्र न होने पर कभी एक भाई दूसरे का उत्तराधिकारी बनता, कभी बंधु-बांधव सिंहासन पर अधिकार जमाते, और कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में प्रभावती गुप्त जैसी स्त्रियाँ सत्ता का उपभोग करती थीं।

यह झुकाव केवल शासक परिवारों का नहीं था। स्रोत 1, ऋग्वेद का एक मंत्र जो संभवत: लगभग 1000 ई.पू. में जोड़ा गया, विवाह संस्कार में पढ़ा जाता था; उसमें कामना है कि इंद्र के अनुग्रह से वधू के “उत्तम पुत्र हों”। स्रोत 2 (आदिपर्वन्) में दुर्योधन अपने पिता धृतराष्ट्र से कहता है कि पांडव विरासत पाएँगे तो उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र अधिकारी होंगे।

हमारी ओर से — बोर्ड पर कुरु वंश। बोर्ड पर एक छोटा वंश-वृक्ष बनाइए: ऊपर दो भाई, धृतराष्ट्र और पांडु; धृतराष्ट्र के नीचे कौरव (ज्येष्ठ: दुर्योधन), पांडु के नीचे पांडव। फिर स्रोत 2 पढ़वाइए। धृतराष्ट्र नेत्रहीन थे, इसलिए उनके अनुज पांडु सिंहासन पर बैठे; पांडु की मृत्यु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने, क्योंकि सब राजकुमार अल्पवयस्क थे। अब बच्चों से पूछिए कि पितृवंशिकता के हिसाब से गद्दी किस शाखा को जानी चाहिए, और दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क दें।

नमूना उत्तर — दोनों पक्षों के तर्क स्रोत 2 में ही मिल जाते हैं:

  • पांडवों की ओर से: पांडु हस्तिनापुर के सिंहासन पर आसीन हुए थे, इसलिए पितृवंशिकता के हिसाब से विरासत उनके पुत्रों की बनती है। नागरिक भी पांडवों को कौरवों के मुकाबले “अधिक योग्य और सदाचारी” मानते थे।
  • दुर्योधन की ओर से: पांडु के बाद धृतराष्ट्र राजा बने थे। दुर्योधन को डर था कि पांडव विरासत पाएँगे तो उनके बाद उनके पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र अधिकारी होंगे, और कौरव उत्तराधिकार से बेदखल हो जाएँगे।

किताब बताती है कि यह संघर्ष युद्ध में बदला, पांडव जीते, और उसके बाद पितृवंशिक उत्तराधिकार उद्घोषित किया गया।

यहीं रुकिए। पितृवंशिकता और मातृवंशिकता में क्या अंतर है?

नमूना उत्तर — दोनों वंश परंपराएँ हैं, पर चलती अलग रेखा से हैं:

  • पितृवंशिकता: वंश पिता से पुत्र, फिर पौत्र, प्रपौत्र आदि से चलता है; पिता की मृत्यु के बाद पुत्र उनके संसाधनों पर, और राजाओं के मामले में सिंहासन पर भी, अधिकार जमा सकते थे।
  • मातृवंशिकता: वंश परंपरा माँ से जुड़ी होती है।

इस काल के अधिकतर राजवंश पितृवंशिकता का अनुसरण करते थे।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे मान लेते हैं कि पितृवंशिकता महाभारत से शुरू हुई। नहीं: वह महाकाव्य से पहले भी थी, महाभारत ने उसे और सुदृढ़ किया। दूसरी उलझन: पितृवंशिकता का मतलब यह नहीं कि गद्दी हमेशा पुत्र को ही मिली; भाई, बंधु-बांधव और प्रभावती गुप्त के उदाहरण साथ में बताइए।

इसी हिस्से में। मुख्य शब्द · 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 1) · बच्चे ये सवाल पूछेंगे (पृष्ठ 56, 57) · फ़्लैशकार्ड 13–25; प्रश्न बैंक क3, ख1, ख2, घ2।

पृष्ठ 57–60 — बंधुता एवं विवाह: विवाह के नियम, स्त्री का गोत्र, माताएँ

कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. बंधुता एवं विवाह

किताब कहाँ से शुरू करती है। विवाह के नियमों से (पृष्ठ 57)। पितृवंश को आगे बढ़ाने के लिए पुत्र महत्वपूर्ण थे, और पुत्रियों का विवाह अपने गोत्र से बाहर करना अपेक्षित था; इसे बहिर्विवाह पद्धति कहते हैं। ऊँची प्रतिष्ठा वाले परिवारों की कम उम्र की कन्याओं और स्त्रियों का जीवन बहुत सावधानी से नियमित किया जाता था, और कन्यादान को पिता का महत्वपूर्ण धार्मिक कर्तव्य माना गया।

फिर किताब बताती है कि नियम किसने और क्यों बनाए।

  • नए नगरों के उद्भव से सामाजिक जीवन जटिल हुआ, और संभवत: इस वजह से आरंभिक विश्वासों और व्यवहारों पर प्रश्न उठे।
  • जवाब में ब्राह्मणों ने लगभग 500 ई.पू. से धर्मसूत्र और धर्मशास्त्र नाम के संस्कृत ग्रंथों में आचार संहिताएँ संकलित कीं; इनमें सबसे महत्वपूर्ण मनुस्मृति थी, जिसका संकलन लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच हुआ।
  • ब्राह्मण लेखक अपने दृष्टिकोण को सार्वभौमिक मानते थे, पर क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाओं के कारण उनका प्रभाव “सार्वभौमिक कदापि नहीं था”।
  • ये ग्रंथ विवाह के आठ प्रकारों को स्वीकृति देते हैं; पहले चार ‘उत्तम’ माने गए और बाकी निंदित। स्रोत 3 में मनुस्मृति की चार पद्धतियाँ हैं।

अब गोत्र। लगभग 1000 ई.पू. के बाद से लोगों को, खासतौर से ब्राह्मणों को, गोत्रों में बाँटने की ब्राह्मणीय पद्धति चली; हर गोत्र एक वैदिक ऋषि के नाम पर था। इसके दो नियम थे: विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी, और एक ही गोत्र के सदस्य आपस में विवाह नहीं कर सकते थे।

सातवाहन, जो लगभग दूसरी शताब्दी ई.पू. से दूसरी शताब्दी ईसवी तक पश्चिमी भारत और दक्कन के कुछ भागों के शासक थे, इन नियमों की परीक्षा बनते हैं।

  • स्रोत 4 में सातवाहन राजाओं के नाम मातृनाम हैं, जैसे गोतमी–पुत्त, यानी ‘गोतमी का पुत्र’। गोतमी और वसिथि, गौतम और वशिष्ठ के स्त्रीवाची नाम हैं, जो वैदिक ऋषि थे।
  • रानियों के नाम गौतम और वसिष्ठ गोत्रों से बने थे, जो उनके पिता के गोत्र थे; यानी विवाह के बाद भी उन्होंने पिता का गोत्र नाम रखा।
  • कुछ रानियाँ एक ही गोत्र की थीं, जो बहिर्विवाह के नियम के विरुद्ध था; यह अंतर्विवाह का उदाहरण है।

पृष्ठ 59 के किनारे का प्रश्न यही गिनती माँगता है: स्रोत 4 की सूची में गोतमी–पुत्त 3 हैं (पहली, तीसरी और सातवीं पंक्ति) और वसिथि/वसथि–पुत्त 2 (दूसरी और पाँचवीं पंक्ति)। छपी हिंदी किताब की सूची की पाँचवीं पंक्ति में ‘हरिति–पुत्त’ छपा है; किताब के अंग्रेज़ी संस्करण में यह राजा वसथि–पुत्त चत्तरपन–सातकनि है। हिंदी सूची से गिनें तो वसिथि–पुत्त एक ही आता है।

आख़िर में किताब पूछती है कि क्या माताएँ महत्वपूर्ण थीं। सातवाहन राजा मातृनाम से जाने जाते थे, पर उनके यहाँ सिंहासन का उत्तराधिकार पितृवंशिक था। स्रोत 5 में गांधारी अपने ज्येष्ठ पुत्र दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती करती है; दुर्योधन ने सलाह नहीं मानी, युद्ध लड़ा और हार गया।

हमारी ओर से — दो नियम, एक जाँच। बोर्ड पर बाईं ओर गोत्र के दो नियम लिखिए, दाईं ओर दो खाली खाने। बच्चे स्रोत 4 और पृष्ठ 60 का पाठ पढ़कर हर नियम के सामने लिखें कि सातवाहन रानियों ने उसे माना या नहीं, और किताब की कौन-सी पंक्ति यह बताती है। यह तालिका चार्ट पेपर पर बनाइए; प्रश्न 9 का निबंध लिखते समय यही काम आएगी।

यहीं रुकिए। किताब क्यों कहती है कि ब्राह्मणों का प्रभाव सार्वभौमिक नहीं था? एक उदाहरण दीजिए।

नमूना उत्तर — क्योंकि उनके बनाए नियम हर जगह नहीं माने गए:

  • ब्राह्मणीय नियम के अनुसार विवाह के बाद स्त्री पति के गोत्र की मानी जाती थी, पर सातवाहन रानियों ने पिता के गोत्र से बना नाम ही रखा।
  • एक ही गोत्र में विवाह वर्जित था, पर कुछ सातवाहन रानियाँ एक ही गोत्र की थीं।

किताब इसका कारण क्षेत्रीय विभिन्नता और संचार की बाधाएँ बताती है।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। सबसे बड़ी भूल: मातृनाम देखकर बच्चे मान लेते हैं कि सातवाहनों में उत्तराधिकार माँ से चलता था। नहीं, उत्तराधिकार पितृवंशिक था। दूसरी उलझन: बहिर्विवाह और अंतर्विवाह के अर्थ आपस में बदल जाते हैं; “बहि” यानी बाहर, गोत्र से बाहर विवाह।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 9) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 60) · बच्चे ये सवाल पूछेंगे (पृष्ठ 58, 59, 60) · फ़्लैशकार्ड 26–52; प्रश्न बैंक क4–क8, ख3–ख5, ग2, घ3, ङ1, छ1।

पृष्ठ 61–64 — सामाजिक विषमताएँ: ‘उचित’ जीविका, अक्षत्रिय राजा, जाति

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. सामाजिक विषमताएँ

किताब कहाँ से शुरू करती है। ‘उचित’ जीविका से (पृष्ठ 61)। धर्मसूत्रों और धर्मशास्त्रों में एक व्यवस्था का उल्लेख है, जिसमें वर्णों को उनकी योग्यता, कार्य और व्यवसाय, क्षमताओं और रुचियों के आधार पर निर्धारित किया गया था। ग्रंथों के अनुसार हर वर्ण की ‘जीविका’ यह थी:

  • ब्राह्मण: वेदों और अन्य शास्त्रों का अध्ययन और अध्यापन, यज्ञ करना और कराना, दान देना और ग्रहण करना।
  • क्षत्रिय: युद्ध करना, लोगों की रक्षा, न्याय संचालन; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ कराना, दान देना और सामाजिक व्यवस्था बनाए रखना।
  • वैश्य: कृषि, पशुपालन और व्यापार; साथ ही वेदों और शास्त्रों का अध्ययन, यज्ञ करना और कराना, दान देना।
  • शूद्र: समाज के सुचारु संचालन में बाकी तीन वर्णों की सहायता।

श्रीमद्भगवद् गीता जैसे ग्रंथ भी संकेत करते हैं कि चार वर्णों की व्यवस्था “गुण अथवा विशेषताएँ और कर्म अथवा कार्य” पर आधारित थी, जन्म से तय कोई कठोर व्यवस्था नहीं। ऐसे उल्लेख बौद्ध परंपराओं में भी मिलते हैं। स्रोत 6 प्रारम्भिक वैदिक समाज में व्यवसायों का लचीलापन दिखाता है: ऋग्वेद के एक सूक्त का वक्ता कहता है कि वह स्वयं कवि है, उसके पिता वैद्य हैं और माता अन्न पीसने का काम करती हैं।

समय के साथ बदलाव। बच्चे पूछें कि वर्ण जन्म से तय था या नहीं, तो यह क्रम बताइए: ऋग्वेद में चारों वर्णों के नाम एक साथ केवल पुरुषसूक्त में आते हैं, और यह सूक्त ऋग्वेद के सबसे बाद में रचे गए हिस्सों में से एक, दसवें मंडल, में है। उत्तर वैदिक काल में ब्राह्मण माने जाने के लिए जन्म ज़रूरी माना जाने लगा, पर ऐसा लगता है कि अकेला जन्म काफ़ी नहीं था: वैदिक कर्मकांड की परंपरा (श्रुति) का ज्ञान भी चाहिए था (IGNOU, इकाई 4)। ब्राह्मण स्वयं को “ब्रह्मा के मुख से जन्मे” और सबसे श्रेष्ठ बताते थे (स्रोत 13, पृष्ठ 70); लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से बौद्धों ने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया (पृष्ठ 69)।

स्रोत 7 एकलव्य की कथा है। ब्राह्मण द्रोण ने वनवासी निषाद एकलव्य को शिष्य बनाने से मना किया; एकलव्य ने मिट्टी की द्रोण-प्रतिमा को गुरु मानकर अभ्यास किया और सिद्धहस्त हो गया; अर्जुन को दिया वचन निभाने के लिए द्रोण ने गुरु दक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया।

फिर भाग 3.2: अक्षत्रिय राजा।

अक्षत्रिय राजा: शास्त्र और व्यवहार

शास्त्रों के अनुसारराजा कौन हो"केवल क्षत्रिय राजा हो सकते थे"
मौर्यउद्भव पर बहसबाद के बौद्ध ग्रंथ क्षत्रिय, ब्राह्मणीय शास्त्र 'निम्न' कुल का बताते हैं
शुंग और कण्वमौर्यों के उत्तराधिकारीये ब्राह्मण थे
शकब्राह्मणों की दृष्टि में मलेच्छरुद्रदामन ने सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार कराया
सातवाहनगोतमी-पुत्त सिरी-सातकनिस्वयं को "अनूठा ब्राह्मण" बताया
किताब का निष्कर्षसत्ता समर्थन और संसाधन सेराजत्व क्षत्रिय कुल में जन्म लेने पर "शायद ही निर्भर करता था"
NCERT, पृष्ठ 62–63

शक राजा रुद्रदामन लगभग दूसरी शताब्दी ईसवी के थे, और सुदर्शन सरोवर वाला उनका अभिलेख संस्कृत के संभवत: आरंभिक अभिलेखों में से एक है; इससे पता चलता है कि शक्तिशाली मलेच्छ संस्कृतीय परिपाटी से अवगत थे। गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने दावा किया कि उसने चार वर्णों के बीच विवाह संबंधों पर रोक लगाई, फिर भी उसने रुद्रदामन के परिवार से विवाह संबंध बनाए। किताब के शब्दों में जाति प्रथा के भीतर आत्मसात होना “बहुधा एक जटिल सामाजिक प्रक्रिया थी”।

भाग 3.3 जाति पर है। वर्ण केवल चार थे, पर जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं थी; नए समूहों और नए व्यवसायों से संपर्क के साथ जातियाँ बढ़ती रहीं, और एक ही जीविका वाली जातियाँ कभी-कभी श्रेणियों में संगठित होती थीं।

  • मंदसौर (मध्य प्रदेश) का अभिलेख, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी: रेशम के बुनकरों की एक श्रेणी, जो मूलतः लाट (गुजरात) की निवासी थी, अपने बच्चों और बांधवों के साथ मंदसौर गई, जिसे उस समय दशपुर कहा जाता था। श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य दूसरी जीविका भी अपना लेते थे। सबने मिलकर शिल्प से कमाया धन सूर्य देवता के सम्मान में मंदिर बनवाने पर खर्च किया। स्रोत 8 में इन लोगों के अलग-अलग काम गिनाए गए हैं: संगीत, जीवनियाँ और कथाएँ, धार्मिक व्याख्यान, धार्मिक अनुष्ठान, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध।
  • वणिक: शास्त्र व्यापार को वैश्यों की जीविका बताते हैं, पर शूद्रक के नाटक मृच्छकटिकम् (लगभग चौथी शताब्दी ईसवी) में नायक चारुदत्त ब्राह्मण–वणिक है, और पाँचवीं शताब्दी ईसवी के एक अभिलेख में मंदिर के लिए धन देने वाले दो भाई क्षत्रिय–वणिक कहे गए हैं।

हमारी ओर से — मंदसौर के बुनकर। बोर्ड पर भारत की एक मोटी रूपरेखा बनाइए और उसमें दो बिंदु लगाइए: लाट (गुजरात) और दशपुर (मंदसौर, मध्य प्रदेश)। तीर से दिखाइए कि रेशम के बुनकरों की श्रेणी अपने बच्चों और बांधवों के साथ लाट से दशपुर गई। फिर बच्चे स्रोत 8 पढ़कर उन कामों की सूची बनाएँ जो उसमें गिनाए गए हैं, और बताएँ कि क्या एक श्रेणी के सब लोग एक ही काम करते थे। तुलना स्रोतों की है; कक्षा में किसी बच्चे को किसी वर्ण या जाति की भूमिका में मत खड़ा कीजिए।

नमूना उत्तर — नहीं:

  • श्रेणी की सदस्यता शिल्प की विशेषज्ञता पर निर्भर थी, पर कुछ सदस्य दूसरी जीविका भी अपना लेते थे।
  • स्रोत 8 में संगीत, जीवनियाँ और कथाएँ, धार्मिक व्याख्यान, धार्मिक अनुष्ठान, (वैदिक) खगोल शास्त्र और युद्ध, इतने तरह के काम गिनाए गए हैं।

यानी एक श्रेणी के भीतर भी लोग अलग-अलग जीविकाएँ अपनाते थे।

यहीं रुकिए। क्या केवल क्षत्रिय ही राजा बने? किताब के उदाहरण दीजिए।

नमूना उत्तर — नहीं; शास्त्र यही कहते थे, पर व्यवहार अलग था:

  • मौर्यों के उद्भव पर बहस है; बाद के बौद्ध ग्रंथ उन्हें क्षत्रिय, और ब्राह्मणीय शास्त्र ‘निम्न’ कुल का बताते हैं।
  • मौर्यों के उत्तराधिकारी शुंग और कण्व ब्राह्मण थे।
  • ब्राह्मण जिन शकों को मलेच्छ मानते थे, उनके राजा रुद्रदामन ने सुदर्शन सरोवर का जीर्णोद्धार कराया।
  • सातवाहन शासक गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि ने स्वयं को “अनूठा ब्राह्मण” बताया।

किताब का निष्कर्ष है कि राजनीतिक सत्ता हर वह व्यक्ति पा सकता था जो समर्थन और संसाधन जुटा सके।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे वर्ण और जाति को एक मान लेते हैं, और सोचते हैं कि जातियाँ भी चार थीं। बोर्ड पर साफ़ लिखिए: वर्ण चार, जातियों की कोई निश्चित संख्या नहीं। दूसरी उलझन: बच्चे ग्रंथों के नियम को उस समय का पूरा सच मान लेते हैं। हर नियम के साथ “ग्रंथों के अनुसार” बोलिए, और उसी कालांश में वह साक्ष्य भी रखिए जो नियम से अलग है।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 2, 3) · 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 12) · बच्चे ये सवाल पूछेंगे (पृष्ठ 62, 64) · फ़्लैशकार्ड 53–80; प्रश्न बैंक क9–क13, ख6, ख7, ग3, ग4, घ4, घ5, ङ2।

पृष्ठ 64–67 — सामाजिक विषमताएँ: चार वर्णों के परे

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. सामाजिक विषमताएँ

किताब कहाँ से शुरू करती है। उन समुदायों से जिन पर ब्राह्मणीय विचारों का कोई प्रभाव नहीं पड़ा (पृष्ठ 64)। संस्कृत साहित्य उन्हें कई बार “विचित्र, असभ्य और पशुवत” चित्रित करता है। उदाहरण हैं वन में रहने वाले लोग, जिनके लिए शिकार और कंद-मूल संग्रह जीवन-निर्वाह का महत्वपूर्ण साधन था, जैसे निषाद। यायावर पशुपालकों को भी शंका से देखा जाता था, और कभी-कभी असंस्कृत भाषा बोलने वालों को मलेच्छ कहकर हेय दृष्टि से देखा जाता था। फिर भी इन लोगों के बीच विचारों का आदान-प्रदान होता था, जो महाभारत की कथाओं से पता चलता है।

स्रोत 9 हिडिम्बा की कथा है। नरभक्षी राक्षस की बहन हिडिम्बा ने भीम से विवाह का प्रस्ताव रखा; युधिष्ठिर इस शर्त पर माने कि भीम दिन भर उसके साथ रहें और रात को लौट आएँ; उनका पुत्र घटोत्कच हुआ। कुछ इतिहासकारों का मत है कि ‘राक्षस’ उन लोगों को कहा जाता था जिनके आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से भिन्न थे।

भाग 3.5 अधीनता और संघर्ष पर है। इसे किताब के शब्दों में, धीमे और गंभीर स्वर में पढ़ाइए।

  • कुछ लोगों को वर्ण व्यवस्था के बाहर माना गया और ‘अस्पृश्य’ के रूप में वर्गीकृत किया गया। अपने को पवित्र मानने वाले उनसे भोजन तक नहीं लेते थे।
  • शवों की अंत्येष्टि करने और मृत पशुओं को छूने वालों को चाण्डाल कहा गया और वर्ण व्यवस्था वाले समाज में सबसे निम्न कोटि में रखा गया।
  • मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची है: गाँव के बाहर रहना; फेंके हुए बर्तन, मरे हुए लोगों के वस्त्र और लोहे के आभूषण; रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना; संबंधियों से विहीन मृतकों की अंत्येष्टि और वधिक का काम।
  • चीन से आए बौद्ध भिक्षु फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजाकर अपने होने की सूचना देनी पड़ती थी; श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) के अनुसार वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर से बाहर रहते थे।

किताब बताती है कि अब्राह्मणीय ग्रंथों में चाण्डालों का चित्रण कभी ब्राह्मणीय ग्रंथों जैसा है, पर कभी एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का संकेत देता है। स्रोत 10, पालि की मातंग जातक कथा, इसका उदाहरण है: बोधिसत्त बनारस के बाहर एक चाण्डाल के पुत्र मातंग के रूप में जन्मे; पिटाई के बाद वे विरोध में दिथ्थ मांगलिक के घर के बाहर लेट गए; और भिक्षा माँगने आए मातंग को जब उनके पुत्र ने लौटा दिया, तो उनका उत्तर था: “जिन्हें अपने जन्म पर गर्व है पर अज्ञानी हैं वे भेंट के पात्र नहीं हैं।”

हमारी ओर से — किसने लिखा, किनके लिए। अध्याय की शुरुआत के तीन सवाल यहाँ फिर काम आते हैं। बोर्ड पर चार स्रोतों के नाम लिखिए: मनुस्मृति, फा-शिएन का विवरण, श्वैन-त्सांग का विवरण और मातंग जातक। बच्चे किताब से ढूँढकर हर एक के आगे लिखें कि वह किस तरह का स्रोत है और किसकी नज़र से लिखा गया। कथा को अभिनय में मत बदलिए, और इस विषय पर कोई मज़ाक न होने दीजिए।

नमूना उत्तर —

  • मनुस्मृति: संस्कृत का ब्राह्मणीय ग्रंथ, सबसे महत्वपूर्ण धर्मशास्त्र।
  • फा-शिएन: चीन से आए बौद्ध भिक्षु, लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी।
  • श्वैन-त्सांग: चीनी तीर्थयात्री, लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी।
  • मातंग जातक: पालि में लिखी कथा, जिसमें बोधिसत्त (पूर्वजन्म में बुद्ध) एक चाण्डाल के रूप में चित्रित हैं।

पहला स्रोत नियम बनाता है, दो यात्री अपने विवरण देते हैं, और जातक कथा एक अलग नज़रिया रखती है।

हमारी ओर से — अगर कोई बच्चा आज की जाति या अस्पृश्यता की बात छेड़े, तो साफ़ कहिए: भारत के संविधान का अनुच्छेद 17 अस्पृश्यता का अंत करता है और किसी भी रूप में उसके आचरण का निषेध करता है। फिर बात किताब के स्रोतों पर लौटाइए। कक्षा में आज की किसी जाति या समुदाय का नाम मत लीजिए।

यहीं रुकिए। चाण्डालों के बारे में मनुस्मृति और मातंग जातक में क्या अंतर दिखता है?

नमूना उत्तर — दोनों स्रोत अलग नज़रिए से लिखे गए हैं:

  • मनुस्मृति: यह चाण्डालों के ‘कर्तव्य’ तय करती है, जैसे गाँव के बाहर रहना और रात में गाँव और नगरों में चल-फिर न सकना।
  • मातंग जातक: इसमें बोधिसत्त स्वयं एक चाण्डाल के पुत्र मातंग के रूप में जन्म लेते हैं। पिटाई के विरोध में वे घर के बाहर लेट जाते हैं, और कथा की सीख उन्हीं के मुँह से आती है।

इसीलिए किताब कहती है कि अब्राह्मणीय ग्रंथ कभी एक भिन्न सामाजिक वास्तविकता का संकेत देते हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे ‘राक्षस’ को सचमुच का दानव समझ लेते हैं। किताब के इतिहासकारों वाले मत पर रुकिए: यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका आचार-व्यवहार ब्राह्मणीय ग्रंथों के मानदंडों से अलग था। दूसरी उलझन: फा-शिएन और श्वैन-त्सांग की बातें बच्चे पूरे उपमहाद्वीप पर लागू कर देते हैं; ये दो यात्रियों के अपने विवरण हैं।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 3) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 67) · बच्चे ये सवाल पूछेंगे (पृष्ठ 65, 67) · फ़्लैशकार्ड 81–97; प्रश्न बैंक क14, क15, ख8, घ6।

पृष्ठ 68–71 — जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 4. जन्म के परे: संसाधन और प्रतिष्ठा

किताब कहाँ से शुरू करती है। आर्थिक संसाधनों से (पृष्ठ 68)। दास, भूमिहीन खेतिहर मज़दूर, शिकारी, मछुआरे, पशुपालक, किसान, ग्राममुखिया, शिल्पकार, वणिक और राजा, सबका सामाजिक स्थान इस बात पर निर्भर करता था कि आर्थिक संसाधनों पर उनका कितना नियंत्रण है।

भाग 4.1 संपत्ति पर स्त्री और पुरुष के भिन्न अधिकारों की बात महाभारत के एक प्रसंग से शुरू करता है।

  • द्यूत का प्रकरण: दुर्योधन ने युधिष्ठिर को द्यूत क्रीड़ा के लिए बुलाया। धोखे के कारण युधिष्ठिर स्वर्ण, हस्ति, रथ, दास, सेना, कोष, राज्य, प्रजा की संपत्ति, अपने अनुज और फिर स्वयं को भी हार गए; फिर उन्होंने पांडवों की सहपत्नी द्रौपदी को दाँव पर लगाया और हार गए।
  • स्रोत 11, द्रौपदी के प्रश्न: माना जाता है कि द्रौपदी ने पूछा कि क्या युधिष्ठिर उसे दाँव पर लगाने से पहले स्वयं को हार चुके थे। दो मत सामने आए: एक यह कि “पत्नी पर पति का नियंत्रण सदैव रहता है”, दूसरा यह कि दासत्व स्वीकार कर चुका पुरुष किसी और को दाँव पर नहीं लगा सकता। कोई निष्कर्ष नहीं निकला; अंत में धृतराष्ट्र ने सभी पांडवों और द्रौपदी की निजी स्वतंत्रता लौटा दी।
  • पैतृक संपत्ति: स्मृति परंपरा के अनुसार माता-पिता की मृत्यु के बाद पैतृक संपत्ति संतानों में बराबर बाँटी जाती थी, और ज्येष्ठ पुत्र विशेष भाग का अधिकारी था।
  • स्त्रीधन: विवाह के समय मिले उपहारों पर स्त्री का स्वामित्व माना जाता था; उसकी संतान इसे विरासत में पा सकती थी और पति का इस पर कोई अधिकार नहीं था। फिर भी मनुस्मृति स्त्रियों को पति की आज्ञा के विरुद्ध पारिवारिक संपत्ति या अपने बहुमूल्य धन के गुप्त संचय के विरुद्ध चेतावनी भी देती है।
  • असल स्थिति: वाकाटक महिषी प्रभावती गुप्त धनाढ्य थीं, पर अधिकतर अभिलेखीय और साहित्यिक साक्ष्य बताते हैं कि सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था। किताब के शब्दों में इससे स्त्री और पुरुष के बीच सामाजिक हैसियत की भिन्नता “अधिक प्रखर हुई”।

भाग 4.2 वर्ण और संपत्ति पर है। ब्राह्मणीय ग्रंथों के अनुसार लिंग के अलावा वर्ण भी संपत्ति के अधिकार का एक आधार था: शूद्रों के लिए एकमात्र ‘जीविका’ ऐसी सेवा थी जिसमें हमेशा उनकी इच्छा शामिल नहीं होती थी, जबकि तीन उच्च वर्णों के पुरुषों के लिए कई जीविकाओं की संभावना थी। साहित्यिक परंपरा में राजा अधिकतर धनी और पुरोहित भी सामान्यत: धनी दिखाए जाते हैं, पर कभी-कभी निर्धन ब्राह्मण का चित्रण भी मिलता है।

वर्ण व्यवस्था की सबसे जानी-मानी आलोचनाएँ प्रारंभिक बौद्ध धर्म (लगभग छठी शताब्दी ई.पू. से) में विकसित हुईं। बौद्धों ने माना कि समाज में विषमता थी, पर यह भेद “न तो नैसर्गिक थे और न ही स्थायी”; उन्होंने जन्म के आधार पर सामाजिक प्रतिष्ठा को अस्वीकार किया। स्रोत 13 (पालि ग्रंथ मज्झिमनिकाय) में राजा अवन्तिपुत्र बुद्ध के अनुयायी कच्चन से ब्राह्मणों के इस दावे पर राय पूछते हैं कि वे सर्वश्रेष्ठ हैं और ब्रह्मा के मुख से जन्मे हैं।

भाग 4.3 एक दूसरी रूपरेखा दिखाता है। प्राचीन तमिलकम् में, जहाँ 2000 वर्ष पहले अनेक सरदारियाँ थीं, दानशील आदमी का सम्मान होता था, और कंजूस या अपने लिए संपत्ति जमा करने वाला घृणा का पात्र था। स्रोत 14 तमिल संगम साहित्य के संग्रह पुरनानूरु (लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) से है: एक चारण अपने निर्धन पर दानी आश्रयदाता के बारे में कहता है, “वह चारणों की क्षुधा का शत्रु है।” किताब में इस संग्रह का नाम ‘पुरुनारुरू’ छपा है; सही नाम पुरनानूरु है।

हमारी ओर से — स्रोत 12 की दो सूचियाँ। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: पुरुष: सात तरीके और स्त्री: छ: तरीके। बच्चे स्रोत 12 (मनुस्मृति, पृष्ठ 69) पढ़कर दोनों खाने भरें। फिर पूछिए: किस सूची में अपने काम या लेन-देन से कमाने के तरीके हैं, और किस सूची में केवल भेंट?

नमूना उत्तर —

  • पुरुष: विरासत, खोज, खरीद, विजित करके, निवेश, कार्य द्वारा, और सज्जनों से मिली भेंट स्वीकार करके।
  • स्त्री: वैवाहिक अग्नि के सामने और वधूगमन के समय मिली भेंट, स्नेह के प्रतीक के रूप में मिली भेंट, भ्राता, माता और पिता के उपहार, परवर्ती काल की भेंट, और “अनुरागी” पति से मिला सब कुछ।

पुरुषों की सूची में कमाने के कई रास्ते हैं; स्त्रियों की सूची के सभी तरीके भेंट या उपहार हैं।

यहीं रुकिए। स्रोत 13 में कच्चन ने अवन्तिपुत्र से क्या मनवाया?

नमूना उत्तर — कच्चन के प्रश्नों से बात संपत्ति पर आई:

  • अवन्तिपुत्र ने माना कि धनी शूद्र दूसरे शूद्र को, और क्षत्रिय, ब्राह्मण या वैश्य को भी, अपना सेवक बना सकता था।
  • इस पर कच्चन ने पूछा कि तब क्या चारों वर्ण एकदम समान नहीं हैं, और अवन्तिपुत्र ने स्वीकार किया कि इस आधार पर चारों वर्णों में कोई भेद नहीं है।

किताब कहती है कि यह कहानी अक्षरश: सत्य नहीं थी, पर बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दिखाती है।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। स्त्रीधन पढ़कर बच्चे मान लेते हैं कि संपत्ति पर स्त्री और पुरुष के अधिकार बराबर थे। किताब का निष्कर्ष उलटा है: सामान्यत: भूमि, पशु और धन पर पुरुषों का ही नियंत्रण था। दूसरी उलझन तमिल सरदार की है: वह धनी नहीं, फिर भी दान देने से मना नहीं करता। यही इस भाग की बात है कि वहाँ प्रतिष्ठा संपत्ति जमा करने से नहीं, बाँटने से थी।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 4) · 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 8) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 71) · बच्चे ये सवाल पूछेंगे (पृष्ठ 68, 69, 70, 71) · फ़्लैशकार्ड 98–119; प्रश्न बैंक क16, ग5, ग6, ग7, ङ3, च5, छ2, छ3।

पृष्ठ 72–73 — सामाजिक अनुबंध, और इतिहासकार ग्रंथ से क्या पूछते हैं

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. सामाजिक विषमताओं की व्याख्या · इंटरैक्टिव: 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल

किताब कहाँ से शुरू करती है। सुत्तपिटक के एक मिथक से (पृष्ठ 72)।

  • शुरू में मनुष्य और वनस्पति जगत पूरी तरह विकसित नहीं थे। सभी जीव शांति से रहते थे और प्रकृति से उतना ही लेते थे जितना एक समय के भोजन के लिए चाहिए।
  • यह व्यवस्था धीरे-धीरे बिगड़ी; मनुष्य अधिकाधिक लालची, प्रतिहिंसक और कपटी हो गए।
  • तब लोगों ने सोचा: “क्या हम एक ऐसे मनुष्य का चयन करें जो उचित बात पर क्रोधित हो, जिसकी प्रताड़ना की जानी चाहिए उसको प्रताड़ित करे और जिसे निष्कासित किया जाना हो उसे निष्कासित करे?” बदले में उसे चावल का अंश मिलेगा, और “सब लोगों द्वारा चुने जाने के कारण उसे महासम्मत्त की उपाधि प्राप्त होगी।”

किताब इससे तीन बातें निकालती है: राजा का पद लोगों द्वारा चुने जाने पर निर्भर था, और ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की इस सेवा के बदले देते थे; आर्थिक और सामाजिक संबंध बनाने में मनुष्य के अपने कर्म का बड़ा हाथ था; और यदि मनुष्य स्वयं किसी व्यवस्था को बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार थे, तो भविष्य में वे उसमें परिवर्तन भी ला सकते थे।

भाग 6 से अध्याय की दूसरी कड़ी शुरू होती है: इतिहासकार किसी ग्रंथ को इस्तेमाल करने से पहले उससे कुछ सवाल पूछते हैं।

  • भाषा: पालि, प्राकृत या तमिल, जो आम लोग बोलते थे, या संस्कृत, जो खासकर पुरोहितों और खास वर्ग के प्रयोग की भाषा थी।
  • प्रकार: ‘मंत्र’, जो अनुष्ठान करने वाले पढ़ते और बोलते थे, या ‘कथा’, जिसे लोग पढ़ और सुन सकते थे।
  • लेखक और श्रोता: लेखकों के दृष्टिकोण ने ग्रंथ को रूप दिया, और उन्होंने श्रोताओं की रुचि का भी ध्यान रखा होगा।
  • काल और स्थान: ग्रंथ का संभावित संकलन या रचना काल और उसकी रचनाभूमि।

भाग 6.1 यही सवाल महाभारत से पूछता है। इसकी संस्कृत वेदों या प्रशस्तियों की संस्कृत से कहीं अधिक सरल है, इसलिए संभव है कि इसे व्यापक स्तर पर समझा जाता था। विषयवस्तु के दो भाग हैं: आख्यान (कहानियों का संग्रह) और उपदेशात्मक (सामाजिक आचार-विचार के मानदंड)। किताब (पृष्ठ 73) कहती है: “अधिकतर इतिहासकार इस बात पर एकमत हैं कि महाभारत वस्तुत: एक भाग में नाटकीय कथानक था जिसमें उपदेशात्मक अंश बाद में जोड़े गए।” सबसे महत्वपूर्ण उपदेशात्मक अंश भगवद्गीता है (चित्र 3.8)। आरंभिक संस्कृत परंपरा में महाभारत को ‘इतिहास’ की श्रेणी में रखा गया, जिसका अर्थ है ‘ऐसा ही था’ (पृष्ठ 74)।

हमारी ओर से — एक ग्रंथ से चार सवाल। बोर्ड पर चार पंक्तियाँ लिखिए: भाषा, प्रकार, लेखक और श्रोता, काल और स्थान। बच्चे पिछले कालांश का स्रोत 13 (पृष्ठ 70) लें और हर पंक्ति के आगे किताब से उत्तर लिखें। जिस सवाल का उत्तर किताब में नहीं मिलता, उसके आगे साफ़ लिखें कि किताब में नहीं है; यह भी इतिहासकार का एक ज़रूरी उत्तर है।

नमूना उत्तर —

  • भाषा: पालि; यह पालि ग्रंथ मज्झिमनिकाय से है।
  • प्रकार: कथा, जिसमें राजा अवन्तिपुत्र और कच्चन का संवाद है।
  • लेखक और श्रोता: यह बौद्ध ग्रंथ है, और संवाद में एक पक्ष बुद्ध के अनुयायी कच्चन का है; किताब कहती है कि कहानी बौद्धों के वर्ण संबंधी रवैये को दिखाती है। किताब लेखक का नाम नहीं बताती, इसलिए यहाँ “पता नहीं” लिखिए।
  • काल और स्थान: किताब इस कहानी का काल या स्थान नहीं बताती। बच्चों को यह लिखना भी सिखाइए: जो बात स्रोत से पता नहीं चलती, उसके आगे “पता नहीं” लिखना भी इतिहासकार का ईमानदार काम है।

यहीं रुकिए। सुत्तपिटक के मिथक के अनुसार ‘कर’ क्या था, और इससे राजा के बारे में क्या पता चलता है?

नमूना उत्तर — ‘कर’ वह मूल्य था जो लोग राजा की सेवा के बदले देते थे:

  • राजा का काम था उचित बात पर क्रोधित होना, जिसे प्रताड़ित करना हो उसे प्रताड़ित करना और जिसे निष्कासित करना हो उसे निष्कासित करना; बदले में उसे चावल का अंश मिलता था।
  • राजा महासम्मत्त था, यानी सब लोगों द्वारा चुना गया।

इस मिथक के अनुसार राजा का पद लोगों के चयन पर निर्भर था, और व्यवस्था बनाने वाले मनुष्य उसे बदल भी सकते थे।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे महासम्मत्त की कथा को किसी सचमुच हुए चुनाव का विवरण समझ लेते हैं। किताब इसे मिथक के रूप में रखती है, जो बौद्धों की सोच दिखाता है। दूसरी उलझन: आख्यान और उपदेशात्मक भाग अलग-अलग खानों में बँटे नहीं हैं; उपदेशात्मक अंशों में भी कहानियाँ हैं, और बहुधा आख्यानों में समाज के लिए एक सबक होता है।

इसी हिस्से में। 1 से 5 तक के प्रश्न (प्रश्न 4, 5) · मुख्य शब्द · फ़्लैशकार्ड 113–126; प्रश्न बैंक क17, ख9, घ7, ङ4, ङ5।

पृष्ठ 74–76 — महाभारत के लेखक और तिथियाँ, हस्तिनापुर, द्रौपदी का विवाह

कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. साहित्यिक स्रोतों का इस्तेमाल

किताब कहाँ से शुरू करती है। इस सवाल से कि यह ग्रंथ किसने लिखा (पृष्ठ 74)। किताब कई चरण बताती है:

  • सूत: संभवत: मूल कथा के रचयिता भाट सारथी थे, जिन्हें ‘सूत’ कहा जाता था। वे क्षत्रिय योद्धाओं के साथ युद्धक्षेत्र में जाते और उनकी विजय और उपलब्धियों पर कविताएँ लिखते थे; ये रचनाएँ मौखिक रूप में आगे बढ़ीं।
  • ब्राह्मण: पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इस कथा परंपरा पर अधिकार कर लिया और इसे लिखा। उसी समय कुरु और पांचाल, जिनके इर्द-गिर्द कथा घूमती है, सरदारी से राजतंत्र बन रहे थे।
  • लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी: विष्णु की आराधना प्रभावी हो रही थी, और श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जा रहा था।
  • लगभग 200-400 ईसवी: मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जोड़े गए।

नतीजा: जो ग्रंथ शुरू में संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, वह बढ़कर एक लाख श्लोकों वाला हो गया। साहित्यिक परंपरा ऋषि व्यास को इसका रचयिता मानती है।

भाग 6.3 महाकाव्य को पुरातत्व से मिलाता है।

हस्तिनापुर: महाकाव्य और उत्खनन

स्रोत 15, आदिपर्वन्महाकाव्य का नगरसमुद्र की भाँति भरा, सैकड़ों प्रासाद, इंद्र की नगरी के समान
उत्खनन, 1951-52बी.बी. लाल, मेरठ ज़िला (उ.प्र.)गंगा के ऊपरी दोआब में, जहाँ कुरु राज्य था
दूसरा स्तरलगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें, सरकंडे की छाप वाला पलस्तर
तीसरा स्तरलगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.कच्ची और कुछ पक्की ईंटें, शोषक-घट, ईंटों के नाले, वलय-कूप
किताब का प्रश्नचित्रण बाद में जुड़ा या कवियों की कल्पना?यह पुरास्थल कुरुओं की राजधानी "हो सकती थी"
NCERT, पृष्ठ 75–76

लाल को आबादी के पाँच स्तरों के साक्ष्य मिले; किताब इनमें से दूसरे और तीसरे स्तर को अपने विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण मानती है। नामों की समानता संयोग हो सकती है, इसलिए किताब पक्का दावा नहीं करती।

फिर द्रौपदी का विवाह, जो बहुपति प्रथा का उदाहरण है। स्रोत 16 में इसके तीन स्पष्टीकरण हैं:

  • पांचाल नरेश द्रुपद के स्वयंवर में अर्जुन जीते; कुंती ने बिना देखे कहा कि लाई गई वस्तु आपस में बाँट लो, और उनकी आज्ञा टाली नहीं जा सकती थी।
  • ऋषि व्यास ने द्रुपद को बताया कि पांडव इंद्र के अवतार थे और उनकी पत्नी ने ही द्रौपदी के रूप में जन्म लिया था।
  • व्यास ने यह भी बताया कि एक युवा स्त्री ने शिव की आराधना में एक के बजाय पाँच बार पति का वर माँग लिया था, और उसी ने द्रौपदी के रूप में जन्म लिया।

इतिहासकारों के अनुसार संभवत: यह प्रथा शासकों के विशिष्ट वर्ग में मौजूद थी, पर अलग-अलग स्पष्टीकरण बताते हैं कि समय के साथ यह लोगों में अमान्य होती गई (पृष्ठ 77)। कुछ आरंभिक स्रोत बताते हैं कि बहुपति प्रथा न एकमात्र विवाह पद्धति थी, न सबसे अधिक प्रचलित। किताब याद दिलाती है: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

हमारी ओर से — कविता और खुदाई आमने-सामने। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: स्रोत 15 क्या कहता है और उत्खनन में क्या मिला। बच्चे दोनों खाने किताब से भरें। फिर पूछिए: क्या दूसरे स्तर का बसाव महाकाव्य के सैकड़ों प्रासादों वाले नगर से मेल खाता है? और तीसरे स्तर का?

नमूना उत्तर —

  • दूसरा स्तर (लगभग बारहवीं से सातवीं शताब्दी ई.पू.): जितने सीमित क्षेत्र की खुदाई हुई, वहाँ घरों की कोई निश्चित योजना नहीं मिली; मिट्टी की दीवारें, कच्ची ईंटें, और कुछ घरों में सरकंडों की दीवारें जिन पर मिट्टी का पलस्तर था। महाकाव्य के “सैकड़ों प्रासादों” से इसका मेल बैठाना कठिन है।
  • तीसरा स्तर (लगभग छठी से तीसरी शताब्दी ई.पू.): कच्ची और कुछ पक्की ईंटों के घर, गंदे पानी के लिए शोषक-घट और ईंटों के नाले, और वलय-कूप; यहाँ बसाव दूसरे स्तर से अधिक व्यवस्थित दिखता है।

इसीलिए किताब पूछती है कि क्या यह चित्रण बाद में, ईसा पूर्व छठी शताब्दी के पश्चात, जोड़ा गया जब इस क्षेत्र में नगर बने, या यह कवियों की कल्पना थी। किताब इसका पक्का उत्तर नहीं देती; बच्चे भी उत्तर में दोनों संभावनाएँ लिखें।

यहीं रुकिए। जो ग्रंथ संभवत: 10,000 श्लोकों से भी कम का था, वह एक लाख श्लोकों तक कैसे पहुँचा?

नमूना उत्तर — कई सदियों में, कई हाथों से:

  • मूल कथा संभवत: सूतों ने रची, और वह मौखिक रूप में आगे बढ़ी।
  • पाँचवीं शताब्दी ई.पू. से ब्राह्मणों ने इसे लिखा।
  • लगभग 200 ई.पू. से 200 ईसवी के बीच श्रीकृष्ण को विष्णु का रूप बताया जाने लगा।
  • लगभग 200-400 ईसवी में मनुस्मृति से मिलते-जुलते बड़े उपदेशात्मक प्रकरण जुड़े।

इसलिए परंपरा भले ही व्यास को रचयिता माने, किताब के चरण एक से अधिक रचयिताओं की ओर इशारा करते हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे लिख देते हैं कि बी.बी. लाल ने महाभारत वाला हस्तिनापुर खोज लिया। किताब इतना ही कहती है कि यह कुरुओं की राजधानी “हो सकती थी”। दूसरी उलझन: दूसरे और तीसरे स्तर की तिथियाँ आपस में बदल जाती हैं; बोर्ड पर दोनों पंक्तियाँ अलग रंग से लिखिए।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 7) · बच्चे ये सवाल पूछेंगे (पृष्ठ 76) · फ़्लैशकार्ड 127–150; प्रश्न बैंक क18, क19, ख10, ग8, घ8, च4, छ4।

पृष्ठ 77–78 — एक गतिशील ग्रंथ

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. एक गतिशील ग्रंथ

किताब कहाँ से शुरू करती है। इस बात से कि महाभारत का विकास संस्कृत पाठ के साथ खत्म नहीं हुआ (पृष्ठ 77)।

  • सदियों में इसके अनेक पाठान्तर भिन्न-भिन्न भाषाओं में लिखे गए।
  • किसी क्षेत्र में जन्मी कहानियाँ इसमें जुड़ती गईं, और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं।
  • इसके प्रसंग मूर्तिकला और चित्रों में दिखाए गए, और इसने नाटकों और नृत्य कलाओं को विषय-वस्तु दी।

किताब एक पुनर्व्याख्या विस्तार से देती है। समसामयिक बांग्ला लेखिका महाश्वेता देवी, जो शोषण के विरुद्ध आवाज़ उठाने के लिए प्रसिद्ध हैं, ने उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ मूक है।

  • संस्कृत पाठ में: दुर्योधन पांडवों को लाक्षागृह में जलाकर मारना चाहता है; पांडव सुरंग खोदकर निकल जाते हैं। कुंती के भोज में आई एक निषादी अपने पाँच पुत्रों के साथ वहीं सो जाती है और पांडवों की लगाई आग में भस्म हो जाती है; उनके शव देखकर लोग समझते हैं कि पांडव मर गए।
  • “कुंती ओ निषादी” में: कहानी वहाँ से शुरू होती है जहाँ यह प्रसंग खत्म होता है। युद्ध के बाद कुंती एक वनप्रांतर में रहती हैं और पृथ्वी से बातें करते हुए अपनी त्रुटियाँ स्वीकार करती हैं। एक निषादी, जिसकी सास उस आग में मरी थी, उनसे कहती है कि अपने अतीत पर सोचते समय उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी नहीं आई। आग की लपटें पास आती हैं; निषादी बच निकलती है, कुंती वहीं रह जाती है।

हमारी ओर से — एक प्रसंग, दो कथाएँ। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: संस्कृत पाठ और “कुंती ओ निषादी”। हर खाने में बच्चे लिखें कि उस कथा में कौन बोलता है, किसकी बात सुनी जाती है, और कहानी किस पर खत्म होती है। कहानी का अभिनय मत करवाइए; तुलना केवल दो पाठों की है।

नमूना उत्तर —

  • संस्कृत पाठ: कथा पांडवों के सुरंग से बच निकलने की है। निषादी और उसके पाँच पुत्रों के बारे में इतना ही आता है कि वे आग में भस्म हुए, और उनके जले शव देखकर लोगों ने समझा कि पांडव मर गए।
  • “कुंती ओ निषादी”: उस मरी हुई निषादी की बहू बोलती है, और कुंती से पूछती है कि क्या उन्हें उन छ: निर्दोष लोगों की याद एक बार भी आई। कहानी इस पर खत्म होती है कि निषादी आग से बच निकलती है और कुंती वहीं रह जाती हैं।

किताब के शब्दों में, महाश्वेता देवी ने “उन प्रश्नों की ओर ध्यान खींचा है जिन पर संस्कृत पाठ पूर्णतया मूक है”।

यहीं रुकिए। किताब महाभारत को एक गतिशील ग्रंथ क्यों कहती है?

नमूना उत्तर — क्योंकि इसका विकास संस्कृत पाठ पर नहीं रुका:

  • भिन्न-भिन्न भाषाओं में इसके अनेक पाठान्तर लिखे गए।
  • क्षेत्रों की कहानियाँ इसमें जुड़ीं, और मुख्य कथा की कई पुनर्व्याख्याएँ हुईं, जैसे महाश्वेता देवी की “कुंती ओ निषादी”।
  • इसके प्रसंग मूर्तिकला, चित्रों, नाटकों और नृत्य कलाओं में आए।

पहले कालांश के क्षेत्रीय प्रभेद भी इसी बात का एक रूप हैं।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे “कुंती ओ निषादी” को महाभारत का कोई पुराना अंश मान लेते हैं। यह समसामयिक लेखिका की कहानी है, जो पुराने प्रसंग को नए नज़रिए से पढ़ती है। दूसरी उलझन: बच्चे समालोचनात्मक संस्करण को ही सही महाभारत और बाकी सबको गलत मान लेते हैं। किताब बताती है कि महाभारत का विकास संस्कृत पाठ के साथ समाप्त नहीं हुआ; भिन्न भाषाओं के पाठान्तर और पुनर्व्याख्याएँ उसी विकास का हिस्सा हैं।

इसी हिस्से में। 6 से 9 तक के प्रश्न (प्रश्न 6) · 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 11) · चर्चा कीजिए (पृष्ठ 77) · फ़्लैशकार्ड 151–156; प्रश्न बैंक क20, ङ6।

पृष्ठ 79–80 — कालरेखा 1 और 2, और मानचित्र कार्य

कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा · इंटरैक्टिव: 2. बंधुता एवं विवाह

किताब कहाँ से शुरू करती है। कालरेखा 1, प्रमुख साहित्यिक परंपराओं से (पृष्ठ 79)। इसकी जिन पंक्तियों से यह अध्याय सीधे जुड़ता है:

  • लगभग 500-200 ई.पू.: प्रमुख धर्मसूत्र (संस्कृत में)।
  • लगभग 500-100 ई.पू.: आरंभिक बौद्ध ग्रंथ, त्रिपिटक सहित (पालि में)।
  • लगभग 500 ई.पू.-400 ईसवी: रामायण और महाभारत (संस्कृत में)।
  • लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवी: मनुस्मृति (संस्कृत में); तमिल संगम साहित्य की रचना और संकलन।
  • लगभग 300-600 ईसवी: अन्य धर्मशास्त्र (संस्कृत में)।

कालरेखा 2 बीसवीं शताब्दी में महाभारत के अध्ययन के प्रमुख कीर्तिमान दिखाती है:

  • 1919-66: महाभारत के समालोचनात्मक संस्करण की परिकल्पना और प्रकाशन।
  • 1973: जे.ए.बी. वैन बियुटेनेन ने समालोचनात्मक संस्करण का अंग्रेज़ी अनुवाद शुरू किया; 1979 में उनकी मृत्यु के बाद यह परियोजना अधूरी रह गई।

किताब की कालरेखा में उनकी मृत्यु का साल 1978 छपा है; सही साल 1979 है।

फिर मानचित्र कार्य, प्रश्न 10: इस अध्याय के मानचित्र 1, “कुरु पांचाल क्षेत्र और निकटवर्ती स्थान” (पृष्ठ 56), की तुलना अध्याय 2 के मानचित्र 1 से करनी है, और कुरु–पांचाल क्षेत्र के पास के महाजनपदों और नगरों की सूची बनानी है।

हमारी ओर से — दो मानचित्र साथ-साथ। बच्चे दोनों किताबें एक साथ खोलें। चार्ट पेपर पर चार खाने बनाइए: दोनों मानचित्रों पर, केवल इस अध्याय के मानचित्र पर, केवल अध्याय 2 के मानचित्र पर, और कुरु–पांचाल के पास। बच्चे हर नाम ख़ुद ढूँढकर सही खाने में लिखें। एक बात पहले बता दीजिए: इस अध्याय के मानचित्र पर पांचाल का अलग नाम नहीं, केवल शीर्षक में है, इसलिए पांचाल की जगह अध्याय 2 के मानचित्र पर देखनी होगी। पूरी सूची 10 से 12 तक के प्रश्न में है; बच्चों के खाने उसी से जाँचिए।

यहीं रुकिए। कालरेखा 1 में मनुस्मृति और तमिल संगम साहित्य किस काल में रखे गए हैं? इससे अध्याय की तुलना के बारे में क्या समझ आता है?

नमूना उत्तर — दोनों लगभग 200 ई.पू.-200 ईसवी में रखे गए हैं:

  • मनुस्मृति: संस्कृत का ग्रंथ, जो पुरुषों और स्त्रियों के लिए संपत्ति अर्जित करने के अलग-अलग तरीके गिनाता है; स्त्रियों के सभी तरीके भेंट या उपहार हैं (स्रोत 12)।
  • तमिल संगम साहित्य: इसका पुरनानूरु (स्रोत 14, लगभग प्रथम शताब्दी ईसवी) उस सरदार की प्रशंसा करता है जिसके पास रोज़ दूसरों पर खर्च करने को धन नहीं, फिर भी वह दान देने से मना नहीं करता।

यानी लगभग एक ही काल के दो ग्रंथ संपत्ति और प्रतिष्ठा को अलग-अलग ढंग से देखते हैं। किताब का भाग 4.3 तमिलकम् की इस सोच को “एक वैकल्पिक सामाजिक रूपरेखा” कहता है।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बच्चे 1919 को संस्करण के पूरे होने का साल लिख देते हैं। 1919 में काम शुरू हुआ, 1919-66 उसकी पूरी अवधि है, और यही वे सैंतालीस वर्ष हैं जो पृष्ठ 54 पर आए थे। दूसरी बात: कालरेखा की तिथियाँ “लगभग” वाली हैं; उत्तर में “लगभग” छोड़िए मत।

इसी हिस्से में। 10 से 12 तक के प्रश्न (प्रश्न 10) · अध्याय के आँकड़े · फ़्लैशकार्ड 157–162।

कक्षा की गतिविधियाँ

पृष्ठ 67 की गतिविधि — स्रोतों को दो खानों में रखिए

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. सामाजिक विषमताएँ

किताब पृष्ठ 67 पर पूछती है कि इस प्रकरण में कौन से स्रोत हैं जिनसे पता चलता है कि लोग ब्राह्मणों द्वारा बताई गई जीविका का अनुसरण करते थे, और कौन से स्रोत अलग संभावनाओं की जानकारी देते हैं। बच्चों को काम देने से पहले भाग 3 (पृष्ठ 61–67) के स्रोत बोर्ड पर एक-एक पंक्ति में रखिए:

  • स्रोत 6: ऋग्वेद के सूक्त का वक्ता स्वयं कवि है, पिता वैद्य हैं, माता अन्न पीसती हैं।
  • स्रोत 7: द्रोण ने निषाद एकलव्य से गुरु दक्षिणा में दाहिने हाथ का अँगूठा माँग लिया।
  • अक्षत्रिय राजा (भाग 3.2): शुंग और कण्व ब्राह्मण थे; शक रुद्रदामन; गोतमी-पुत्त सिरी-सातकनि।
  • स्रोत 8: मंदसौर के रेशम बुनकरों की श्रेणी के लोगों के अलग-अलग काम।
  • वणिक: ब्राह्मण–वणिक चारुदत्त, और क्षत्रिय–वणिक दो भाई।
  • स्रोत 9: हिडिम्बा और भीम का विवाह।
  • मनुस्मृति: चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची।
  • फा-शिएन और श्वैन-त्सांग: अस्पृश्यों और नगर से बाहर रहने वालों के विवरण।
  • स्रोत 10: मातंग जातक: चाण्डाल के पुत्र के रूप में जन्मे मातंग का दिथ्थ मांगलिक से विवाह, और उनके पुत्र माण्डव्यकुमार का तीन वेदों का अध्ययन।

हमारी ओर से। कक्षा को स्रोतों के हिसाब से छोटे दलों में बाँटिए, हर दल को दो-तीन स्रोत। हर दल अपने स्रोत चार्ट पेपर के दो खानों में से एक में रखे और साथ में किताब की वह पंक्ति लिखे जिसके आधार पर रखा। दल स्रोतों के बनाइए, बच्चों के वर्ण या जाति के हिसाब से कभी नहीं, और किसी बच्चे को किसी वर्ण की भूमिका न दीजिए।

नमूना उत्तर — दो खाने ऐसे भरेंगे:

  • नियम मानने के संकेत: स्रोत 7 (एकलव्य से अँगूठा माँगकर क्षत्रिय अर्जुन का स्थान बचाया गया); मनुस्मृति में चाण्डालों के ‘कर्तव्यों’ की सूची; फा-शिएन (लगभग पाँचवीं शताब्दी ईसवी) का वृत्तांत कि अस्पृश्यों को सड़क पर करताल बजानी पड़ती थी; और श्वैन-त्सांग (लगभग सातवीं शताब्दी ईसवी) का कि वधिक और सफ़ाई करने वाले नगर के बाहर रहते थे।
  • अलग संभावनाएँ: स्रोत 6; स्रोत 8; वणिकों वाले उदाहरण; भाग 3.2 के अक्षत्रिय राजा; स्रोत 9; स्रोत 10।

स्वयं ब्राह्मण द्रोण का धनुर्विद्या सिखाना भी दूसरे खाने में जाता है।

पृष्ठ 77 की गतिविधि — महाभारत के अंश फिर से पढ़िए

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. एक गतिशील ग्रंथ

किताब पृष्ठ 77 पर कहती है कि अध्याय में महाभारत से उद्धृत अंशों को फिर पढ़िए, हर एक के बारे में चर्चा कीजिए कि क्या वे वास्तव में सत्य थे, और वे महाकाव्य के रचयिताओं, पाठकों या श्रोताओं के बारे में क्या बताते हैं। पहले अंशों की सूची बोर्ड पर रखिए:

  • स्रोत 2: दुर्योधन का डर कि पांडवों के बाद उनके पुत्र, पौत्र और प्रपौत्र विरासत पाएँगे।
  • स्रोत 5: गांधारी ने दुर्योधन से युद्ध न करने की विनती की।
  • स्रोत 7: एकलव्य की कथा।
  • स्रोत 9: हिडिम्बा और भीम।
  • स्रोत 11: द्रौपदी के प्रश्न।
  • स्रोत 15: हस्तिनापुर का वर्णन।
  • स्रोत 16: द्रौपदी के विवाह के तीन स्पष्टीकरण।

हमारी ओर से। हर दल को एक-दो अंश दीजिए। दल हर अंश के लिए दो बातें लिखे: क्या इसकी पुष्टि किसी और साक्ष्य से होती है, और इससे लिखने वालों की सोच के बारे में क्या पता चलता है। सब दलों के उत्तर चार्ट पेपर की एक तालिका में भरिए।

नमूना उत्तर —

  • सत्य के बारे में: किताब कहती है कि ऐसे उद्धरण “अक्षरश: सत्य न भी हों” तो भी बताते हैं कि लिखने वाले क्या सोचते थे। कुछ इतिहासकार मुख्य कथानक को स्वजनों के बीच हुए युद्ध की स्मृति मानते हैं, जबकि अन्य कहते हैं कि युद्ध की पुष्टि किसी और साक्ष्य से नहीं होती। स्रोत 15 को बी.बी. लाल के उत्खनन से मिलाकर देखिए।
  • लेखकों और श्रोताओं के बारे में: स्रोत 2 पितृवंशिक उत्तराधिकार को महत्व देता है, स्रोत 7 वर्ण के नियम लागू करता है, स्रोत 9 बताता है कि ब्राह्मणीय मानदंडों से अलग लोगों को कैसे देखा जाता था, और स्रोत 16 बहुपति प्रथा के लिए तीन स्पष्टीकरण देता है।

साथ में किताब की यह बात याद रखिए: “सृजनात्मक साहित्य की अपनी कथा संबंधी ज़रूरतें होती हैं जो हमेशा समाज में मौजूद वास्तविकताओं को नहीं दर्शातीं।”

पृष्ठ 80–81 — प्रश्नावली

कालांश 11 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:

अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।