Chapter 6भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 6

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कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 140 से 169

यह पन्ना किसलिए — किताब हाथ में लेकर पढ़ाते समय साथ रखने के लिए। हर कार्ड किताब के कुछ पन्नों का है: उन पन्नों की ज़रूरी पंक्तियाँ, उन्हें कक्षा में कैसे खोलें, और बच्चे कहाँ अटकते हैं। कार्ड के ऊपर लिखा है कि वह पाठ योजना के किस कालांश का है।

किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ हैं (2026-27 में छपी किताब)। जो बात किताब की नहीं, हमारी है, उसके आगे “हमारी ओर से” लिखा है। प्रश्नावली की कुंजी, परिभाषाएँ और आँकड़ों की तालिका शिक्षक संदर्शिका में हैं; यहाँ उनके लिंक हैं।

सामग्री के पन्ने

किताब के साथ, पन्ना-दर-पन्ना

पृष्ठ 140–142 — 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट

कालांश 1 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: शुरुआत · इंटरैक्टिव: 1. धार्मिक विश्वासों और आचरणों की गंगा–जमुनी बनावट

किताब कहाँ से शुरू करती है। अध्याय चार की याद से: पहली सहस्राब्दी के मध्य तक उपमहाद्वीप में स्तूप, विहार और मंदिर जैसी धार्मिक इमारतें दिखने लगी थीं (पृष्ठ 140)। फिर किताब इस अध्याय के नए स्रोत गिनाती है:

  • संत कवियों की रचनाएँ: क्षेत्रीय भाषाओं में, मौखिक, अधिकतर संगीतबद्ध; संतों की मृत्यु के बाद अनुयायियों ने संकलित कीं।
  • जीवनियाँ: अनुयायियों की लिखी; अक्षरश: सत्य नहीं, फिर भी बताती हैं कि अनुयायी अपने संतों को कैसे देखते थे।
  • चित्र 6.1: मणिक्वचक्कार की बारहवीं शताब्दी की कांस्य मूर्ति; वे शिव के अनुयायी थे और तमिल में भक्तिगान रचते थे।

किताब साफ़ कहती है कि “ये परंपराएँ प्रवाहमान थीं”, यानी पीढ़ियों के साथ संदेश बदलते भी रहे, और इसलिए “इन स्रोतों का मूल्यांकन इतिहासकारों के लिए एक चुनौती है।” फिर भाग 1 बताता है कि इस काल में विष्णु, शिव और देवी की उपासना फैली, और इतिहासकार इसे समझाने के लिए कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार, पौराणिक ग्रंथों के सरल संस्कृत छंदों से, “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे”; और ब्राह्मणों का स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे वर्गों के विश्वासों को स्वीकार करके नया रूप देना।

हमारी ओर से — दो खानों में छाँटिए। पहले बोर्ड पर दो खाने बनाइए: पौराणिक ग्रंथों से प्रचार, और स्थानीय विश्वास अपनाना। बच्चों को किताब की ये चार बातें सुनाइए:

  1. 1पुराण सरल संस्कृत छंदों में रचे गए;
  2. 2पुरी के एक स्थानीय देवता को बारहवीं शताब्दी तक जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया;
  3. 3स्थानीय देवियों को विष्णु की पत्नी लक्ष्मी या शिव की पत्नी पार्वती के रूप में मान्यता मिली;
  4. 4जगन्नाथ की प्रतिमा स्थानीय जनजातीय विशेषज्ञ लकड़ी से बनाते थे और आज भी बनाते हैं। अब पूछिए: हर बात किस खाने में जाएगी?

नमूना उत्तर — पहली बात पहले खाने में, बाक़ी तीन दूसरे में:

  • पहला खाना: (1), क्योंकि यहाँ ब्राह्मणीय विचार सरल भाषा के ज़रिए लोगों तक पहुँचाए जा रहे हैं।
  • दूसरा खाना: (2), (3) और (4), क्योंकि यहाँ पहले से पूजे जा रहे स्थानीय देवता और देवियाँ बड़ी परंपरा का हिस्सा बनाए गए।

किताब इस भाग का शीर्षक ‘पूजा प्रणालियों का समन्वय’ रखती है; बच्चे देखें कि किताब के अनुसार ये दोनों प्रक्रियाएँ इसी काल में साथ-साथ कार्यरत थीं।

भाग 1.2: टकराव कहाँ-कहाँ थे

वैदिक परंपरा के प्रशंसकनिंदा करते थेमंत्रों वाले यज्ञ से हटकर चलने वाले आचरणों की
तांत्रिक उपासकअवहेलना करते थेवैदिक सत्ता की
भक्तसर्वोच्च बताते थेअपने इष्ट विष्णु या शिव को
बौद्ध और जैन धर्म सेसंबंधअक्सर तनाव भरे, पर स्पष्ट द्वंद्व कम
NCERT, पृष्ठ 142

यहीं रुकिए। रेडफील्ड के शब्द “महान” और “लघु” किताब उद्धरण-चिह्नों में क्यों लिखती है?

नमूना उत्तर — क्योंकि इन शब्दों में ऊँच-नीच का भाव छिपा है:

  • शब्द किसके: बीसवीं शताब्दी के समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के, जो उन्होंने एक किसान समाज के बारे में कहे।
  • अर्थ: प्रभुत्वशाली वर्गों के अनुष्ठान “महान”, और किसानों के अपने लोकाचार “लघु”।

विद्वान इन शब्दों में छिपे ऊँच-नीच के भाव को नहीं मानते, इसलिए इन्हें उद्धरण-चिह्नों में लिखा जाता है (पृष्ठ 141)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। किताब कहती है कि “वैदिक देवकुल के अग्नि, इंद्र और सोम जैसे देवता पूरी तरह गौण हो गए”; यह पढ़कर बच्चे लिख देते हैं कि वेद छोड़ दिए गए। किताब उलटा कहती है: “किंतु इन असंगतियों के बावजूद वेदों को प्रामाणिक माना जाता रहा।” दूसरी अटक “हिंदू” शब्द पर है: किताब कहती है कि अगली सहस्राब्दी में इन सब परंपराओं को “हिंदू” के अंतर्गत रखा गया, और पृष्ठ 151 पर वह यह भी बताती है कि “हिंदू” और “मुसलमान” जैसे नामों का चलन बहुत समय तक नहीं था। तांत्रिक पद्धति पढ़ाते समय किताब की बात ही रखिए: इसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे और अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण का भेद नहीं माना जाता था।

इसी हिस्से में। प्रश्न 1 के मुख्य बिंदु · अध्याय का तर्क · मुख्य शब्द · फ़्लैशकार्ड 1–18; प्रश्न बैंक क1, घ1, घ2, च1।

पृष्ठ 143–146 — 2. उपासना की कविताएँ

कालांश 2 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 2. उपासना की कविताएँ

किताब कहाँ से शुरू करती है। इस बात से कि भक्ति उपासना की परंपरा इस काल से पहले ही लगभग एक हज़ार वर्ष पुरानी थी (पृष्ठ 143)। फिर तीन बातें:

  • दो तरह की भक्ति: सगुण (शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियाँ, मूर्त रूप में) और निर्गुण (अमूर्त, निराकार ईश्वर)।
  • शुरुआत: “प्रारंभिक भक्ति आंदोलन (लगभग छठी शताब्दी) अलवारों (विष्णु भक्ति में तन्मय) और नयनारों (शिवभक्त) के नेतृत्व में हुआ।”
  • फैलाव: संत घूमते हुए तमिल में भजन गाते थे; जिन जगहों को उन्होंने इष्ट का निवास बताया, वहाँ बाद में बड़े मंदिर बने।

इसके बाद किताब जाति, स्त्रियों और राज्य, तीनों पर इन संतों को परखती है। स्त्रियों पर उसका वाक्य है: “संभवत: इस परंपरा की सबसे बड़ी विशिष्टता इसमें स्त्रियों की उपस्थिति थी।” राज्य पर: चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने मंदिरों को भूमि–अनुदान दिए, और 945 ईसवी के एक अभिलेख के अनुसार परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं (पृष्ठ 145–146)।

हमारी ओर से — दो स्रोत आमने-सामने। पहले बोर्ड पर तीन खानों की तालिका बनाइए: कौन, किसके भक्त, ब्राह्मणों या शास्त्र के बारे में क्या कहते हैं। फिर स्रोत 1 और स्रोत 2 (पृष्ठ 144) दो बच्चों से ज़ोर से पढ़वाइए। जानकारी: स्रोत 1 ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि का है, स्रोत 2 नयनार अप्पार का। बच्चे तालिका भरें। फिर पूछिए: क्या दोनों एक ही बात कह रहे हैं?

नमूना उत्तर — बात मिलती-जुलती है, ढंग अलग है:

  • तोंदराडिप्पोडि: विष्णु उन चतुर्वेदियों से, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, अधिक उन “दासों” को पसंद करते हैं “जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।”
  • अप्पार: शास्त्र उद्धृत करने वालों से पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”

दोनों के लिए भक्ति जन्म और शास्त्र-ज्ञान से बड़ी है; अप्पार ज़्यादा तीखे हैं। किनारे के दोनों प्रश्नों (पृष्ठ 144) के पूरे उत्तर शिक्षक संदर्शिका में हैं।

चोल शासक और नयनार संत: किसने क्या दिया

चोल शासकों ने दियाभूमि–अनुदान; उनकी मदद से विशाल शिव मंदिर बनेचिदम्बरम, तंजावुर, गंगैकोंडचोलपुरम
चोल शासकों ने करवायातमिल शैव भजनों का गायनऔर उनका तवरम के रूप में संकलन
945 ईसवीपरांतक प्रथमअप्पार, संबंदर, सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ
शासकों ने भी प्रयास कियासंतों का समर्थन पाने काक्योंकि नयनार और अलवार संत वेल्लाल किसानों द्वारा सम्मानित थे
शासकों का दावादैवीय समर्थनभव्य मंदिर और मूर्तियाँ
NCERT, पृष्ठ 145–146

यहीं रुकिए। किताब यह क्यों कहती है कि अलवार–नयनार के जाति-विरोध वाला मत “कुछ हद तक” ही सत्य प्रतीत होता है?

नमूना उत्तर — क्योंकि तस्वीर मिली-जुली है:

  • एक ओर: संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और कुछ “अस्पृश्य” मानी गई जातियों से भी थे, और उनकी रचनाओं को तमिल वेद कहा गया।
  • दूसरी ओर (हमारी ओर से): संतों में ब्राह्मण भी थे, जैसे तोंदराडिप्पोडि (पृष्ठ 144); और पूरी भक्ति परंपरा के बारे में किताब कहती है कि बहुत सी भक्ति परंपराओं में ब्राह्मण, देवताओं और भक्तजन के बीच महत्त्वपूर्ण बिचौलिए बने रहे (पृष्ठ 143)।

इसलिए किताब पूरा दावा नहीं करती; बच्चों के उत्तर में भी “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है” बना रहे (पृष्ठ 143–144)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। स्रोत 3 (“एक राक्षसी?”, पृष्ठ 145) पर कुछ बच्चे हँसते हैं या इसे सचमुच की राक्षसी समझते हैं। बताइए कि इस कविता में कराइक्काल अम्मइयार स्वयं अपना वर्णन डरावने रूप में करती हैं, और किताब कहती है, “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।” दूसरी अटक: नयनारों के भजनों में बौद्ध और जैन धर्म का विरोध। इसे किताब के शब्दों में ही पढ़ाइए: इतिहासकारों का सुझाव है कि परस्पर विरोधी धार्मिक समुदायों में राजकीय अनुदान को लेकर प्रतिस्पर्धा थी; किसी धर्म को नीचा मत दिखाइए। और 945 को “ईसवी” ही बोलिए।

इसी हिस्से में। पृष्ठ 143 और 146 के चर्चा बॉक्स · किनारे के सवाल, पृष्ठ 144–145 · प्रश्न 4 के मुख्य बिंदु · फ़्लैशकार्ड 19–39; प्रश्न बैंक क2, क3, क4, ङ1, ङ3, छ1।

पृष्ठ 146–148 — 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा; 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान

कालांश 3 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 3. कर्नाटक की वीरशैव परंपरा · इंटरैक्टिव: 4. उत्तरी भारत में धार्मिक उफ़ान

किताब कहाँ से शुरू करती है। बारहवीं शताब्दी के कर्नाटक से: एक नया आंदोलन उभरा, जिसका नेतृत्व बासवन्ना (1106–68) नाम के एक ब्राह्मण ने किया, जो एक कलाचुरी राजा के दरबार में मंत्री थे (पृष्ठ 146)। उनके अनुयायी वीरशैव (शिव के वीर) और लिंगायत (लिंग धारण करने वाले) कहलाए।

  • मृत्यु पर विश्वास: मृत्यु के बाद भक्त शिव में लीन हो जाता है और इस संसार में नहीं लौटता; इसलिए वे श्राद्ध संस्कार नहीं करते और मृतकों को विधिपूर्वक दफ़नाते हैं।
  • जाति पर: जाति का, कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का और पुनर्जन्म के सिद्धांत का विरोध; वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह अपनाए।
  • स्रोत: “वीरशैव परंपरा की व्युत्पत्ति उन वचनों से है जो कन्नड़ भाषा में उन स्त्री पुरुषों द्वारा रचे गए जो इस आंदोलन में शामिल हुए।”

फिर भाग 4 उत्तरी भारत पर आता है। यहाँ विष्णु और शिव की उपासना शासकों की मदद से बने मंदिरों में होती थी, पर इतिहासकारों को चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलीं। इसी दौर में रूढ़िवादी ब्राह्मणीय ढाँचे से बाहर के नेता, नाथ, जोगी और सिद्ध, प्रभाव पा रहे थे; इनमें से कई शिल्पी समुदायों से थे, जिनमें जुलाहे भी थे। भाग का आख़िरी वाक्य अगले भागों की ओर इशारा करता है: “सूफ़ियों का आगमन (अनुभाग 6) इन परिवर्तनों का एक महत्त्वपूर्ण अंग था।”

हमारी ओर से — वचन के जोड़े। पहले स्रोत 4, “अनुष्ठान और यथार्थ संसार” (पृष्ठ 147), एक बच्चे से ज़ोर से पढ़वाइए। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: अनुष्ठान में लोग क्या करते हैं, और असली दुनिया में वही लोग क्या करते हैं। बच्चे वचन से दो जोड़े भरें। फिर पूछिए: बासवन्ना बात को जोड़ों में क्यों रखते हैं?

नमूना उत्तर — जोड़े उलटापन दिखाने के लिए हैं:

  • पहला जोड़ा: पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं; असली साँप आए तो “मारो–मारो” कहते हैं।
  • दूसरा जोड़ा: जो प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं; जो सेवक खा सकता है उसे भगा देते हैं।

दो जानी-पहचानी बातें आमने-सामने रखते ही श्रोता ख़ुद देख लेता है कि कर्मकांड और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते। किनारे के प्रश्न (पृष्ठ 147) का पूरा उत्तर शिक्षक संदर्शिका में है।

यहीं रुकिए। चौदहवीं शताब्दी तक उत्तर भारत से अलवार–नयनार जैसी रचनाएँ क्यों नहीं मिलतीं, इस पर कुछ इतिहासकार क्या कहते हैं?

नमूना उत्तर — यह कुछ इतिहासकारों का मत है, पक्की बात नहीं:

  • राजपूत राज्य: उत्तरी भारत में चौदहवीं शताब्दी तक का यह वह दौर था जब अनेक राजपूत राज्य उभरे।
  • ब्राह्मणों की जगह: इन राज्यों में ब्राह्मणों का महत्त्वपूर्ण स्थान था और वे ऐहिक और अनुष्ठान, दोनों तरह के काम करते थे।

इसलिए, इस मत के अनुसार, उनकी प्रभुता को सीधी चुनौती शायद ही किसी ने दी (पृष्ठ 147)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। बहुत से बच्चे मान लेते हैं कि जाति का विरोध करने वाले आंदोलन का नेता ब्राह्मण नहीं हो सकता; किताब साफ़ कहती है कि बासवन्ना ब्राह्मण थे। दूसरी बात: किताब बताती है कि लिंगायत समुदाय आज भी इस क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण है। इसलिए लिंग धारण करने और दफ़नाने की परंपरा किताब के शब्दों में, आदर से पढ़ाइए, और किसी बच्चे से मत पूछिए कि वह किस समुदाय का है। नाम की वर्तनी पर: भाग 3 में “बासवन्ना” छपा है, काल-रेखा में “बसवन्ना”; दोनों एक ही व्यक्ति हैं।

इसी हिस्से में। प्रश्न 4 के मुख्य बिंदु · किनारे का सवाल, पृष्ठ 147 · दस भूलें · फ़्लैशकार्ड 40–52; प्रश्न बैंक क5, क6, च2।

पृष्ठ 148–152 — 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ

कालांश 4 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 5. दुशाले के नए ताने-बाने : इस्लामी परंपराएँ

किताब कहाँ से शुरू करती है। पुराने संपर्कों से: प्रथम सहस्राब्दी ईसवी में अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते पश्चिमी भारत के बंदरगाहों तक आए, और मध्य एशिया से लोग उत्तर–पश्चिम प्रांतों में आकर बसे (पृष्ठ 148)। फिर शासन की बात:

  • 711 ईसवी: अरब सेनापति मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीतकर उसे खलीफ़ा के क्षेत्र में शामिल किया।
  • दिल्ली सल्तनत: लगभग तेरहवीं शताब्दी में तुर्क और अफगानों ने इसकी नींव रखी; बहुत से क्षेत्रों में इस्लाम शासकों का स्वीकृत धर्म रहा।
  • उलमा और शरिया: सिद्धांत में शासकों को उलमा के मार्गदर्शन पर चलना था, पर उपमहाद्वीप में स्थिति जटिल थी, क्योंकि बड़ी जनसंख्या इस्लाम मानने वाली नहीं थी।
  • ज़िम्मी: उद्घाटित धर्मग्रंथ मानने वाले, जैसे यहूदी और ईसाई, जो जज़िया चुकाकर संरक्षण के अधिकारी बनते थे; भारत में हिंदुओं को भी इसमें शामिल कर लिया गया।

इसके बाद किताब दिखाती है कि बदलाव शासकों तक सीमित नहीं रहे: वे किसान, शिल्पी, योद्धा और व्यापारी जैसे समुदायों के बीच फैले, और हर जगह स्थानीय रंग में ढले। खोजा इस्माइली जीनन गाते थे, मालाबार तट के अरब व्यापारियों ने मलयालम और स्थानीय आचार अपनाए, और मस्जिदों के बारे में किताब कहती है: “एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।” (पृष्ठ 151)

हमारी ओर से — शीर्षक का अर्थ। दुशाला ओढ़ने की चादर है, और ताना-बाना वे धागे हैं जिनसे कपड़ा बुना जाता है। बोर्ड पर लिखिए: पुराना दुशाला, नए धागे। बच्चों से पूछिए: इस भाग में नए धागे कौन-से हैं, और वे पुराने कपड़े में कहाँ बुने गए?

नमूना उत्तर — नए धागे इस्लामी परंपराएँ हैं, जो स्थानीय जीवन में बुन गईं:

  • भाषा में: खोजा इस्माइलियों के जीनन पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे।
  • आचार में: मालाबार तट के अरब मुसलमान व्यापारियों ने मलयालम और मातृगृहता जैसे स्थानीय आचार अपनाए।
  • इमारत में: मस्जिद की दिशा हर जगह मक्का की ओर, पर छत और सामान स्थानीय।

यानी कपड़ा एक नया पूरा कपड़ा नहीं बना, पुराने में नए धागे जुड़े।

हमारी ओर से — दो शाही पत्र। पहले जानकारी दीजिए: स्रोत 5 अकबर का 1598 का फ़रमान है, जिसमें खम्बायत में पादरियों को गिरजाघर बनाने देने की बात है (पृष्ठ 149); स्रोत 6 औरंगज़ेब का 1661–62 का पत्र है, जो जोगी गुरु आनंद नाथ को लिखा गया (पृष्ठ 150)। बोर्ड पर तालिका बनाइए: किसने, किसके लिए, क्या दिया या कहा। फिर पूछिए: इन दोनों से शासकों की नीति के बारे में क्या पता चलता है?

नमूना उत्तर — दोनों पत्र किताब की “लचीली नीति” वाली बात के उदाहरण हैं:

  • अकबर: फ़रमान कहता है कि “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ और उन्हें गिरजाघर की तामीर करने दें जिससे वे अपनी इबादत कर सकें।”
  • औरंगज़ेब: पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेजे, और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”

किताब के अनुसार बहुत से शासकों ने हिंदू, जैन, पारसी, ईसाई और यहूदी धर्मसंस्थाओं को भूमि अनुदान और कर की छूट दी, और ऐसे अनुदान अकबर और औरंगज़ेब समेत अनेक मुगल बादशाहों ने दिए (पृष्ठ 149)।

भाग 5.3: लोग किन नामों से पहचाने जाते थे

तुरुष्कतुर्की मुसलमान
ताजिकतजाकिस्तान से आए लोग
पारसीकफारस के लोग
शक, यवनपुराने नामनए आए तुर्क और अफ़गानों के लिए भी
म्लेच्छएक अधिक सामान्य शब्दवर्ण नियम न मानने वाले, संस्कृत से न निकली भाषाएँ बोलने वाले
NCERT, पृष्ठ 151

यहीं रुकिए। किताब कहती है कि आठवीं से चौदहवीं शताब्दी के संस्कृत ग्रंथों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं मिलता है। तब लोगों को किस आधार पर पहचाना जाता था?

नमूना उत्तर — जन्मस्थान के आधार पर:

  • उदाहरण: तुर्की मुसलमानों को तुरुष्क, तजाकिस्तान से आए लोगों को ताजिक और फारस के लोगों को पारसीक कहा गया।
  • पुराने नाम: तुर्क और अफ़गानों को शक और यवन भी कहा गया।

यानी धर्म के आधार पर बने पक्के समुदाय-नाम बहुत बाद के हैं (पृष्ठ 151)। “हिंदू” शब्द के अलग-अलग अर्थ पिछले अध्याय में आ चुके हैं; उसके रिवीजन नोट्स एक बार देख लीजिए।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। “म्लेच्छ” शब्द पर कक्षा में हँसी या चुटकी हो सकती है। किताब के शब्दों में ही पढ़ाइए: “ऐसे शब्दों में हीनभावना निहित थी”, पर इन्हें हिंदुओं के विरोधी किसी अलग मुसलमान समुदाय के लिए शायद ही इस्तेमाल किया गया; यह शब्द किसी के लिए बोलचाल में मत बरतने दीजिए। इस्लाम की पाँच मुख्य बातें (पृष्ठ 150) किताब की सूची की तरह पढ़ाइए; कक्षा में कोई आचार करके मत दिखवाइए। और ज़िम्मी को दूसरे दर्जे के लोग जैसे शब्दों में मत समझाइए; किताब का शब्द “संरक्षित श्रेणी” है।

इसी हिस्से में। प्रश्न 2 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 152 का चर्चा बॉक्स · किनारे के सवाल, पृष्ठ 149–150 · फ़्लैशकार्ड 53–73; प्रश्न बैंक क7, क8, क9, घ3, ङ4, छ2।

पृष्ठ 152–153 — 6. सूफ़ीमत का विकास

कालांश 5 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 6. सूफ़ीमत का विकास

किताब कहाँ से शुरू करती है। इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों से: कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। यह धार्मिक और राजनीतिक संस्था के रूप में ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था, और इन लोगों को सूफ़ी कहा जाने लगा (पृष्ठ 152)।

  • किसकी आलोचना की: रूढ़िवादी परिभाषाओं की, और धर्माचार्यों द्वारा की गई कुरान और सुन्ना (पैगम्बर के व्यवहार) की बौद्धिक व्याख्या की।
  • किस पर बल दिया: मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर; पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल मानकर उनके अनुसरण पर। कुरान की व्याख्या उन्होंने अपने निजी अनुभवों के आधार पर की।
  • शब्द पर बॉक्स: “सूफ़ीवाद” उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया एक अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में इसके लिए तसव्वुफ़ शब्द आता है।

फिर भाग 6.1 संगठन पर आता है। ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद अपने साहित्य वाला एक पूर्ण विकसित आंदोलन था। सूफ़ी एक संगठित समुदाय, ख़ानक़ाह, के आसपास रहते थे, जिसका नियंत्रण शेख, पीर अथवा मुर्शीद के हाथ में था, और लगभग बारहवीं शताब्दी से सिलसिले बनने लगे। भाग 6.2 उन रहस्यवादियों पर है जिन्होंने ख़ानक़ाह को ठुकरा दिया।

हमारी ओर से — ख़ानक़ाह के भीतर, ख़ानक़ाह के बाहर। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: ख़ानक़ाह के भीतर (भाग 6.1), और ख़ानक़ाह के बाहर (भाग 6.2)। फिर ये आठ बातें मिली-जुली लिखिए, सब किताब से:

  1. शेख अनुयायियों (मुरीदों) की भरती करते थे।
  2. वे फकीर की ज़िंदगी बिताते थे।
  3. शेख अपने वारिस (खलीफ़ा) की नियुक्ति करते थे।
  4. वे निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे।
  5. दीक्षित को सिर मुँड़ाकर थेगड़ी लगे वस्त्र पहनने पड़ते थे।
  6. उन्हें कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी जैसे नामों से जाना जाता था।
  7. शेख आध्यात्मिक व्यवहार के नियम तय करते थे।
  8. शरिया की अवहेलना के कारण उन्हें बे–शरिया कहा गया।

बच्चे हर बात को सही खाने में रखें।

नमूना उत्तर — छँटाई ऐसी बनेगी:

  • ख़ानक़ाह के भीतर: 1, 3, 5 और 7, यानी शेख, मुरीद, वारिस और दीक्षा का बँधा हुआ ढाँचा।
  • ख़ानक़ाह के बाहर: 2, 4, 6 और 8, यानी ख़ानक़ाह ठुकराकर जीने वाले रहस्यवादी।

भाग 6.2 का अंतर किताब के शब्दों में यही है: शरिया की अवहेलना करने वालों को बे–शरिया कहा गया, और इस तरह उन्हें शरिया का पालन करने वाले (बा–शरिया) सूफ़ियों से अलग करके देखा जाता था। प्रश्न 3 का उत्तर यहीं से शुरू होता है।

यहीं रुकिए। पीर की बरसी पर दरगाह की ज़ियारत को उर्स क्यों कहा गया?

नमूना उत्तर — लोगों के एक विश्वास के कारण:

  • विश्वास: लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत होकर उनके और करीब हो जाते हैं।
  • दरगाह: पीर की मृत्यु के बाद उनकी दरगाह (फारसी में अर्थ दरबार) मुरीदों के लिए भक्ति का स्थल बन जाती थी।
  • आशीर्वाद: लोग आध्यात्मिक और ऐहिक कामनाओं के लिए आशीर्वाद लेने जाते थे।

इस तरह शेख का वली के रूप में आदर शुरू हुआ (पृष्ठ 153)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। “खलीफ़ा” शब्द इस अध्याय में दो अर्थों में आता है: भाग 5 में 711 ईसवी में सिंध को खलीफ़ा के क्षेत्र में मिलाने की बात है, और यहाँ खलीफ़ा का अर्थ है शेख का वारिस। बोर्ड पर दोनों अर्थ अलग लिखिए। दूसरी भूल: बच्चे समझ लेते हैं कि सूफ़ी कुरान के विरोधी थे। किताब कहती है कि वे धर्माचार्यों की बौद्धिक व्याख्या के आलोचक थे और कुरान की व्याख्या अपने निजी अनुभवों से करते थे। सिलसिलों के नाम पर पृष्ठ 153 का बॉक्स भी पढ़वाइए: कादरी सिलसिला शेख अब्दुल कादिर जिलानी के नाम पर है, और चिश्ती नाम मध्य अफगानिस्तान के चिश्ती शहर से।

इसी हिस्से में। प्रश्न 3 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 6 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 153 का चर्चा बॉक्स · फ़्लैशकार्ड 74–88; प्रश्न बैंक क10, क11, क12, घ4, ङ2।

पृष्ठ 153–156 — 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला (7.1–7.2)

कालांश 6 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला

किताब कहाँ से शुरू करती है। एक कारण से: बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आए सूफ़ी समुदायों में चिश्ती सबसे प्रभावशाली रहे, क्योंकि उन्होंने अपने को स्थानीय परिवेश में अच्छी तरह ढाला और भारतीय भक्ति परंपरा की कई विशेषताएँ भी अपनाईं (पृष्ठ 153)। फिर एक ख़ानक़ाह का चित्र:

  • जगह: शेख निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह (चौदहवीं शताब्दी), उस समय के दिल्ली शहर की बाहरी सीमा पर, यमुना के किनारे ग़ियासपुर में; कई छोटे कमरे और एक बड़ा हाल (जमातख़ाना)।
  • लंगर: सामुदायिक रसोई फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलती थी।
  • स्थानीय परंपराएँ: शेख के सामने झुकना, मिलने वालों को पानी पिलाना, दीक्षितों का सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम।
  • फैलाव: शेख निज़ामुद्दीन ने कई आध्यात्मिक वारिस चुने और उन्हें उपमहाद्वीप के अलग-अलग भागों में ख़ानक़ाह बनाने के लिए नियुक्त किया।

भाग 7.2 ज़ियारत पर है। पाँच महान चिश्ती दरगाहों पर “पिछले सात सौ सालों से” अलग-अलग संप्रदायों, वर्गों और समुदायों के लोग आस्था प्रकट करते रहे हैं, और सबसे पूजनीय दरगाह ख़्वाजा मुइनुद्दीन की है, जिन्हें ‘ग़रीब नवाज़’ कहा जाता है। नाच और संगीत, ख़ास तौर पर कव्वालों का रहस्यवादी गुणगान, भी ज़ियारत का हिस्सा थे। सूफ़ी संत ज़िक्र (ईश्वर का नाम–जाप) या समा (आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल) के द्वारा उपासना में विश्वास रखते थे, और किताब उपासना के इस ढंग को इस बात की पुष्टि मानती है कि चिश्ती स्थानीय भक्ति परंपरा से जुड़े।

हमारी ओर से — अजमेर की दरगाह, घटनाएँ क्रम से। बोर्ड पर ये छह बातें मिली-जुली लिखिए, सब पृष्ठ 155–156 से:

  • अकबर ने तीर्थयात्रियों का खाना पकाने के लिए एक विशाल देग़ भेंट की (1568)।
  • दरगाह का सबसे पहला किताबी ज़िक्र (चौदहवीं शताब्दी)।
  • मज़ार पर सबसे पहली इमारत, जो मालवा के सुल्तान गियासुद्दीन खलजी ने बनवाई (पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध)।
  • शहज़ादी जहाँआरा की तीर्थयात्रा, स्रोत 7 (1643)।
  • मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51), यहाँ आने वाले पहले सुल्तान।
  • अकबर की यात्राओं की परंपरा, जो उन्होंने 1580 तक बनाए रखी।

बच्चे इन्हें समय के क्रम में लगाएँ, फिर बताएँ कि क्रम से दरगाह के बारे में क्या पता चलता है।

नमूना उत्तर — क्रम यह बनेगा:

  • चौदहवीं शताब्दी: पहला किताबी ज़िक्र; मुहम्मद बिन तुगलक (1324–51) आने वाले पहले सुल्तान।
  • पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्ध: मज़ार पर पहली इमारत, गियासुद्दीन खलजी की।
  • सोलहवीं शताब्दी: 1568 में अकबर की देग़; यात्राएँ 1580 तक।
  • सत्रहवीं शताब्दी: 1643 में जहाँआरा की तीर्थयात्रा।

क्रम दिखाता है कि दरगाह को राजसी मेहमानों का प्रश्रय लगातार मिलता रहा। किताब लोकप्रियता के तीन कारण गिनाती है: शेख की सदाचारिता और धर्मनिष्ठा, उनके आध्यात्मिक वारिसों की महानता, और राजसी मेहमानों का प्रश्रय; साथ ही दरगाह दिल्ली और गुजरात को जोड़ने वाले व्यापारिक मार्ग पर थी।

यहीं रुकिए। निज़ामुद्दीन औलिया की ख़ानक़ाह में कौन-कौन आते थे, और किसलिए?

नमूना उत्तर — किताब की सूची बहुत लंबी है:

  • कौन: सिपाही, गुलाम, गायक, व्यापारी, कवि, राहगीर, धनी और निर्धन, हिंदू जोगी और कलंदर।
  • किसलिए: अनुयायी बनने, इबादत करने, ताबीज़ लेने या मसलों पर शेख की मध्यस्थता के लिए।
  • लिखने वाले: अमीर हसन सिजज़ी और अमीर खुसरो जैसे कवि और दरबारी इतिहासकार ज़ियाउद्दीन बरनी; इन सबने शेख के बारे में लिखा।

सूची ख़ुद बताती है कि ख़ानक़ाह किसी एक वर्ग के लोगों की जगह नहीं थी (पृष्ठ 154)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। चिश्ती उपदेशकों की तालिका (पृष्ठ 154) में दो नामों के आगे मृत्यु का वर्ष 1235 है: शेख मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर) और ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी (दिल्ली); बच्चे इसे छपाई की भूल मान लेते हैं, जबकि किताब दोनों के आगे यही वर्ष देती है। दूसरी भूल: पहले आने वाले सुल्तान और पहली इमारत बनवाने वाले सुल्तान को एक मान लेना; आने वाले पहले सुल्तान मुहम्मद बिन तुगलक थे, पर पहली इमारत गियासुद्दीन खलजी ने बनवाई। पृष्ठ 154 के बॉक्स वाले दाता गंज बख्श (अबुल हसन अल हुजविरी) का नाम चिश्ती उपदेशकों की तालिका में नहीं है; वे 1039 ईसवी में लाहौर आए थे। स्रोत 7 और पृष्ठ 156 का बॉक्स (“हिंदू और मुसलमान एक ही भावना से आते हैं।”) पाठ की तरह ज़ोर से पढ़वाइए; किसी बच्चे से मत पूछिए कि उसका परिवार कहाँ ज़ियारत करता है।

इसी हिस्से में। प्रश्न 6 और 7 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 153 का चर्चा बॉक्स · किनारे के सवाल, पृष्ठ 155–156 · फ़्लैशकार्ड 89–105; प्रश्न बैंक क13, क14, घ5, ङ5, च3।

पृष्ठ 157–159 — 7.3 भाषा और संपर्क; 7.4 सूफ़ी और राज्य

कालांश 7 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 7. उपमहाद्वीप में चिश्ती सिलसिला

किताब कहाँ से शुरू करती है। भाषा से: चिश्तियों ने समा में स्थानीय भाषा अपनाई, और दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग हिंदवी में बातचीत करते थे (पृष्ठ 157)।

  • बाबा फरीद: क्षेत्रीय भाषा में काव्य रचा, जो गुरु ग्रंथ साहिब में संकलित है।
  • मसनवी: लंबी कविताएँ, जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया; मलिक मोहम्मद जायसी का प्रेमाख्यान पद्मावत पद्मिनी और चित्तौड़ के राजा रतनसेन की प्रेम कथा है।
  • दक्खनी कविताएँ: बीजापुर (कर्नाटक) के आसपास सत्रहवीं-अठारहवीं शताब्दियों में बसे चिश्ती संतों ने रचीं; कुछ लोरीनामा और शादीनामा के रूप में।
  • अमीर खुसरो (1253–1325): शेख निज़ामुद्दीन औलिया के अनुयायी; कौल का प्रचलन करके चिश्ती समा को एक विशिष्ट आकार दिया।

भाग 7.4 सत्ता के साथ रिश्ते पर है। चिश्ती सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे, पर सत्ताधारी वर्ग बिना माँगे अनुदान या भेंट देता, तो स्वीकार करते थे। सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी और दान संबंधी न्यास बनाए, और चिश्ती यह दान जोड़ने के बजाय पूरा खर्च कर देते थे। स्रोत 9 (1313) में एक स्थानीय शासक की भेंट का प्रसंग है। किताब के अंश में यहाँ ‘अपना हक कहते हैं’ छपा है; बात यह है कि शासक ने अपना सारा हक छोड़ दिया था, और आगे का सवाल शेख का है, जिन्होंने यह भेंट नहीं ली (अंश का शीर्षक भी ‘शाही भेंट अस्वीकार’ है)।

हमारी ओर से — चरखानामा: काम के साथ ज़िक्र। पहले स्रोत 8 (पृष्ठ 157) एक बच्चे से ज़ोर से पढ़वाइए। बोर्ड पर दो खाने बनाइए: चरखे पर क्या काम, और किस ज़िक्र का नाम। बच्चे गीत से तीन पंक्तियाँ भरें, फिर बताएँ कि ऐसे गीत किसके काम आते होंगे।

नमूना उत्तर — गीत काम के हर क़दम को ज़िक्र से जोड़ता है:

  • रुई लेते हुए: ज़िक्र–ए–जाली।
  • रुई धुनते हुए: ज़िक्र–ए–कल्बी।
  • धागा फिरकी पर लपेटते हुए: ज़िक्र–ए–आइनी।

गीत साँस के धागे “चौबीस हज़ार तक गिनें” कहता है, “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।” किताब के अनुसार दक्खनी की ऐसी कविताएँ संभवत: औरतें घर का काम करते हुए, चक्की पीसते और चरखा कातते समय, गाती थीं, और इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका। कक्षा में इसे पाठ की तरह पढ़िए; ज़िक्र करके मत दिखवाइए।

भाग 7.4: सुल्तान और चिश्ती शेख

सुल्तानों ने दियाकर मुक्त (इनाम) भूमिऔर दान संबंधी न्यास
चिश्तियों ने कियादान जोड़ा नहींखाने, कपड़े, रहने और समा की महफ़िलों पर खर्च
सुल्तानों को चाहिए थासूफ़ी संतों का सहाराउलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकराने के बाद
तनाव भी थासत्ता का दावाझुककर प्रणाम, कदम चूमना, आडंबरपूर्ण पदवियाँ
NCERT, पृष्ठ 158–159

यहीं रुकिए। सुल्तानों ने उलमा की शरिया लागू करने की माँग क्यों ठुकराई, और वे सूफ़ी संतों की ओर क्यों मुड़े?

नमूना उत्तर — किताब तीन बातें जोड़ती है:

  • प्रजा: सुल्तान जानते थे कि उनकी अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है।
  • सूफ़ियों की सत्ता: सूफ़ी संत अपनी आध्यात्मिक सत्ता अल्लाह से मानते थे और उलमा की शरिया व्याख्या पर निर्भर नहीं थे।
  • लोकप्रियता: संतों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और उनकी चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास उन्हें लोकप्रिय बनाता था।

किताब यह भी कहती है, “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।”

बच्चे यहाँ अटकते हैं। सत्ता से दूर रहने का अर्थ बच्चे शासक से कुछ भी न लेना समझ लेते हैं, जबकि किताब कहती है, “किंतु इसका मतलब यह नहीं था कि राजनीतिक सत्ता से अलगाव का भाव रखा जाए।” किताब के अनुसार चिश्ती बिना माँगे अनुदान स्वीकार करते थे; स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन जो कहानी सुनाते हैं, उसमें शेख फ़रीदुद्दीन ने धन दरवेशों में बाँटने के लिए ले लिया, पर ज़मीन के पट्टे के बारे में कहा, “उसे उन लोगों को दे दो जिन्हें उनकी कामना है…।” दूसरी बात: हर सिलसिला राज्य से एक ही तरह नहीं जुड़ा; पृष्ठ 158 का बॉक्स बताता है कि सुहरावर्दी और नक्शबंदी सूफ़ियों के जुड़ाव के तरीके चिश्तियों से अलग थे। और फतेहपुर सीकरी में शेख सलीम चिश्ती की दरगाह के चित्र 6.15 का शीर्षक पढ़वाइए: वह “चिश्तियों और मुग़ल राज्य के घनिष्ठ संबंधों का प्रतीक थी।”

इसी हिस्से में। प्रश्न 7 और 8 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 159 का चर्चा बॉक्स · किनारे के सवाल, पृष्ठ 157 और 159 · सावधानी · फ़्लैशकार्ड 106–129; प्रश्न बैंक क15, क16, च4, च6, छ3।

पृष्ठ 160–162 — 8. नवीन भक्ति पंथ; 8.1 दैवीय वस्त्र की बुनाई : कबीर

कालांश 8 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. नवीन भक्ति पंथ

किताब कहाँ से शुरू करती है। संवाद से: अनेक संत कवियों ने नई सामाजिक परिस्थितियों, विचारों और संस्थाओं के साथ स्पष्ट और सांकेतिक, दोनों तरह के संवाद कायम किए, और किताब यह तीन प्रमुख व्यक्तियों के ज़रिए दिखाती है (पृष्ठ 160)। पहले कबीर, और पहले यह सवाल कि हम उन्हें कैसे जानते हैं: उनके काव्य से और बाद में लिखी गई जीवनियों से।

  • बानी तीन परिपाटियों में: कबीर बीजक कबीर पंथियों ने वाराणसी और उत्तर प्रदेश के दूसरे स्थानों पर सँभाला; कबीर ग्रंथावली राजस्थान के दादू पंथियों से जुड़ी है; कई पद आदि ग्रंथ साहिब में संकलित हैं।
  • संकलन कब बने: लगभग सभी पांडुलिपि संकलन कबीर की मृत्यु के बहुत बाद बने; उन्नीसवीं शताब्दी में उनके पद संग्रह बंगाल, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे क्षेत्रों में छापे गए।
  • भाषा: कई भाषाएँ और बोलियाँ, कुछ रचनाएँ संत भाषा में; उलटबाँसी में रोज़ का अर्थ उलट दिया जाता है, जैसे “केवल ज फूल्या फूल बिन” और “समंदरि लागि आगि”।

फिर किताब कबीर के विचारों पर आती है: कुछ कविताएँ इस्लामी दर्शन के एकेश्वरवाद और मूर्तिभंजन का समर्थन करती हैं, दूसरी ज़िक्र और इश्क के सूफ़ी सिद्धांतों से ‘नाम सिमरन’ की हिंदू परंपरा को व्यक्त करती हैं। उनकी पहचान का प्रश्न उन संत जीवनियों में उभरता है जो सत्रहवीं शताब्दी से, यानी “उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद” से लिखी गईं।

हमारी ओर से — एक सत्य, कई नाम। पहले बताइए: किताब कहती है कि कबीर ने परम सत्य को बताने के लिए तीन परंपराओं के शब्द बरते: इस्लामी दर्शन, वेदांत दर्शन और योगी परंपरा। बोर्ड पर ये दस शब्द मिले-जुले लिखिए: अल्लाह, अलख, शब्द, खुदा, निराकार, शून्य, हज़रत, ब्रह्मन्, पीर, आत्मन्। बच्चे इन्हें तीन खानों में छाँटें, फिर बताएँ कि इससे कबीर के बारे में क्या पता चलता है।

नमूना उत्तर — छँटाई किताब की सूची से:

  • इस्लामी दर्शन से: अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर।
  • वेदांत दर्शन से: अलख (अदृश्य), निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्।
  • योगी परंपरा से: शब्द और शून्य।

कबीर एक ही परम सत्य के लिए सबके शब्द बरतते हैं। स्रोत 10 यही बात कहता है: “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।” ध्यान रहे, किताब इस पद के बारे में कहती है, “यह रचना कबीर की मानी जाती है”।

यहीं रुकिए। किताब कहती है कि कबीर और रामानंद को जोड़ने वाली परंपराएँ स्वीकार नहीं की जा सकतीं। क्यों, और फिर भी इनसे क्या पता चलता है?

नमूना उत्तर — दो कारण, और एक सीख:

  • पदों की गवाही: कबीर के पद गुरु और सतगुरु शब्द किसी ख़ास व्यक्ति के लिए नहीं बरतते।
  • समय की गवाही: इतिहासकार मानते हैं कि दोनों का समकालीन होना मुश्किल है, जब तक उन्हें बहुत लंबी आयु न दी जाए।

फिर भी ये परंपराएँ बताती हैं कि कबीर की विरासत बाद की पीढ़ियों के लिए कितनी महत्त्वपूर्ण थी (पृष्ठ 162)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। कबीर बीजक और कबीर ग्रंथावली अक्सर उलट जाते हैं; बोर्ड पर लिखिए: बीजक के साथ वाराणसी के कबीर पंथी, ग्रंथावली के साथ राजस्थान के दादू पंथी। दूसरी बात: कौन-से पद सचमुच कबीर के हैं, यह कहना मुश्किल है; विद्वान भाषा शैली और विषयवस्तु के आधार पर तय करने की कोशिश करते हैं। इसलिए उत्तर में कबीर की मानी जाने वाली रचना लिखना सही आदत है। कबीर हिंदू थे या मुसलमान, इसे कक्षा की बहस मत बनाइए; किताब का सवाल यह है कि यह दावा किन जीवनियों से आया और वे कब लिखी गईं। किताब इतना बताती है कि वैष्णव परंपरा की जीवनियों में उन्हें जन्म से हिंदू कबीरदास बताया गया, और उनका पालन एक गरीब मुसलमान परिवार में हुआ, जो जुलाहे थे।

इसी हिस्से में। प्रश्न 5 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 9 के मुख्य बिंदु · किनारे का सवाल, पृष्ठ 160 · फ़्लैशकार्ड 130–140; प्रश्न बैंक क17, घ6, च5, छ4।

पृष्ठ 162–164 — 8.2 बाबा गुरु नानक और पवित्र शब्द; 8.3 मीराबाई, भक्तिमय राजकुमारी

कालांश 9 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 8. नवीन भक्ति पंथ

किताब कहाँ से शुरू करती है। बाबा गुरु नानक (1469–1539) के जीवन से: उनका जन्म एक हिंदू व्यापारी परिवार में, मुख्यत: इस्लाम धर्मावलंबी पंजाब के ननकाना गाँव में हुआ, जो रावी नदी के पास था। उन्होंने फारसी पढ़ी, लेखाकार के काम का प्रशिक्षण लिया, और उनका ज़्यादा समय सूफ़ी और भक्त संतों के बीच बीता (पृष्ठ 162)।

  • संदेश: निर्गुण भक्ति; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप जैसे बाहरी आडंबरों को नकारा, हिंदू और मुसलमानों के धर्मग्रंथों को भी; उपासना का सरल उपाय निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
  • शबद: विचार पंजाबी भाषा में शबद के रूप में रखे और अलग–अलग रागों में गाए; सेवक मरदाना रबाब बजाकर साथ देता था।
  • संगत: अनुयायियों को एक समुदाय में संगठित किया और सामुदायिक उपासना के नियम बनाए; अनुयायी अंगद को अपने बाद गुरुपद दिया, और “इस परिपाटी का पालन 200 वर्षों तक होता रहा।”
  • ग्रंथ: पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने आदि ग्रंथ साहिब में बानी संकलित की; दसवें गुरु गोबिन्द सिंह जी ने नवें गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ जोड़ीं, और ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब कहलाया।

फिर मीराबाई (लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी), जिन्हें किताब संभवत: भक्ति परंपरा की सबसे सुप्रसिद्ध कवयित्री कहती है। वे मारवाड़ के मेड़ता जिले की राजपूत राजकुमारी थीं, उनका विवाह उनकी इच्छा के विरुद्ध मेवाड़ के सिसोदिया कुल में हुआ, और उन्होंने कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना। भाग के अंत में पृष्ठ 164 का बॉक्स असम के शंकरदेव पर है: पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में वैष्णव धर्म के मुख्य प्रचारक, जिनके उपदेश ‘भगवती धर्म’ कहलाते हैं।

हमारी ओर से — दो संत, बानी कैसे बची। बोर्ड पर तालिका बनाइए: कहाँ के, बात किस रूप में कही, रचनाएँ आगे कैसे पहुँचीं। एक पंक्ति बाबा गुरु नानक की, एक मीराबाई की। बच्चे अभी पढ़े गए पन्नों से भरें।

नमूना उत्तर — दोनों के रास्ते अलग थे:

  • बाबा गुरु नानक: पंजाब का ननकाना गाँव; पंजाबी में शबद, रागों में गाए गए; बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित हुई।
  • मीराबाई: मारवाड़ का मेड़ता; भजन और पद; भजन शताब्दियों तक मौखिक रूप से आगे बढ़ते रहे, और उनकी जीवनी भी इन्हीं भजनों के आधार पर बनी।

यह अंतर भाग 9 की बात से जुड़ता है: हर परिपाटी के साहित्यिक और मौखिक संदेशों में कुछ सुरक्षित रहे और बहुत से संप्रेषण के दौरान बदल गए।

यहीं रुकिए। क्या बाबा गुरु नानक कोई नया धर्म स्थापित करना चाहते थे? किताब के शब्द ध्यान से पढ़िए।

नमूना उत्तर — किताब सावधानी से कहती है:

  • किताब का वाक्य: “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे”।
  • बाद में: उनकी मृत्यु के बाद अनुयायियों ने अपने आचार–व्यवहार को सुगठित करके अपने को हिंदू और मुसलमान, दोनों से अलग पहचाना।
  • खालसा पंथ: गुरु गोबिन्द सिंह ने इसकी नींव डाली, और उनके नेतृत्व में समुदाय एक सामाजिक, धार्मिक और सैन्य बल के रूप में संगठित हुआ।

“ऐसा प्रतीत होता है” पर रुकिए: किताब यहाँ पक्का दावा नहीं करती, और बच्चे भी उत्तर में यही सावधानी रखें (पृष्ठ 163)।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। आदि ग्रंथ साहिब और गुरु ग्रंथ साहिब को बच्चे एक ही समय का संकलन मान लेते हैं; पहले का संकलन गुरु अर्जन देव जी ने किया, बाद में गुरु गोबिन्द सिंह जी ने गुरु तेग बहादुर की रचनाएँ जोड़ीं। मीरा के गुरु रैदास थे, यह “कुछ परंपराओं के अनुसार” है, पक्का तथ्य नहीं; किताब इससे यह निकालती है कि मीरा ने जातिवादी समाज की रूढ़ियाँ तोड़ीं। स्रोत 11 के पद, “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी,” और “म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।”, पाठ की तरह पढ़वाइए। खालसा के पाँच प्रतीक (बिना कटे केश, कृपाण, कच्छ, कंघा और लोहे का कड़ा) किताब की सूची की तरह पढ़ाइए; किसी बच्चे से अपने धर्म के प्रतीक दिखाने को मत कहिए। मीरा के पद गाने वालों के लिए किताब “नीच जाति” शब्द उद्धरण-चिह्नों में देती है, यानी यह बताती है कि उन्हें कैसा समझा जाता था; यह शब्द कक्षा में किसी के लिए मत बरतने दीजिए।

इसी हिस्से में। प्रश्न 5 के मुख्य बिंदु · पृष्ठ 164 का चर्चा बॉक्स · किनारे का सवाल, पृष्ठ 164 · फ़्लैशकार्ड 141–156; प्रश्न बैंक क18, क19, घ7, घ8, ङ6।

पृष्ठ 164–167 — 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण; काल-रेखा

कालांश 10 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: 9. धार्मिक परंपराओं के इतिहासों का पुनर्निर्माण · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

किताब कहाँ से शुरू करती है। स्रोतों से: इतिहासकार धार्मिक परंपरा का इतिहास जोड़ने के लिए मूर्तिकला, स्थापत्य, धर्मगुरुओं से जुड़ी कहानियाँ और दैवीय स्वरूप को समझने को उत्सुक स्त्रियों और पुरुषों की काव्य रचनाएँ बरतते हैं (पृष्ठ 164)।

  • मूर्ति और इमारत: इनका इस्तेमाल तभी हो सकता है जब हम उनका संदर्भ, यानी बनाने और बरतने वालों के विचार, आस्थाएँ और आचार, अच्छी तरह समझें।
  • साहित्यिक स्रोत: कुछ सरल, स्पष्ट भाषा में हैं, जैसे बासवन्ना के वचन; कुछ अलंकृत फ़ारसी में लिखे मुग़ल सम्राटों के फ़रमान। हर तरह के पाठ के लिए कई भाषाओं की जानकारी और हर विधा की शैली पहचानने की समझ चाहिए।
  • जो बचा, जो बदला: हर परिपाटी के अनेक साहित्यिक और मौखिक संदेशों में कुछ सुरक्षित रहे, बहुत से संप्रेषण के दौरान बदल गए, और कुछ हमेशा के लिए भुला दिए गए।

पृष्ठ 165 का बॉक्स ख़ानक़ाहों के आसपास लिखे चार तरह के ग्रंथ गिनाता है। फिर किताब एक चुनौती रखती है: लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं, पर ये लोगों के जीवन का हिस्सा हैं, इसलिए यह मानना आसान नहीं होता कि इनमें समय के साथ बदलाव आया होगा। अध्याय पृष्ठ 167 की काल-रेखा पर ख़त्म होता है, जिसके साथ किताब लिखती है, “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।”

हमारी ओर से — कौन-सा ग्रंथ किस सवाल का जवाब देगा। पहले बॉक्स से चारों तरह के ग्रंथ बोर्ड पर लिखिए: प्रबंध पुस्तिका (कश्फ–उल–महजुब), मुलफुज़ात यानी सूफ़ी संतों की बातचीत (फवाइद–अल–फुआद), मक्तुबात यानी लिखे हुए पत्रों का संकलन, और तज़किरा यानी सूफ़ी संतों की जीवनियों का स्मरण (सियार–उल–औलिया)। फिर ये चार सवाल लिखिए; बच्चे हर सवाल के आगे ग्रंथ का प्रकार लिखें।

  1. उपमहाद्वीप के बाहर की परंपराओं ने भारत में सूफ़ी चिंतन को कैसे प्रभावित किया?
  2. शेख निज़ामुद्दीन औलिया अपनी बातचीत में क्या कहते थे?
  3. एक शेख अपने अनुयायियों के लौकिक और आध्यात्मिक जीवन पर क्या टिप्पणी करते थे?
  4. अपने सिलसिले की प्रधानता और आध्यात्मिक वंशावली की महिमा किस तरह के ग्रंथों में बताई जाती थी?

नमूना उत्तर — बॉक्स के अनुसार:

  • सवाल 1: प्रबंध पुस्तिका, जैसे कश्फ–उल–महजुब।
  • सवाल 2: मुलफुज़ात, जैसे फवाइद–अल–फुआद; स्रोत 9 इसी से लिया गया है।
  • सवाल 3: मक्तुबात, जिनमें धार्मिक सत्य के अनुभव और अनुयायियों के जीवन पर टिप्पणी मिलती है।
  • सवाल 4: तज़किरा, जिनके लेखकों का उद्देश्य अपने सिलसिले की प्रधानता और आध्यात्मिक वंशावली की महिमा दिखाना था।

हर ग्रंथ अलग सवाल का जवाब देता है; इसीलिए इतिहासकार कई तरह के स्रोत साथ पढ़ते हैं। प्रश्न 9 का अभ्यास यहीं से जुड़ता है।

यहीं रुकिए। काल-रेखा की पहली पंक्ति में अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति के आगे वर्ष किस तरह छपे हैं, और उन्हें कैसे पढ़ें?

नमूना उत्तर — इसे किताब के अपने पाठ से मिलाकर पढ़िए:

  • क्या छपा है: पहली पंक्ति में वर्षों के साथ “ई.पू.” छपा है, जबकि बाक़ी हर पंक्ति ईसवी में है।
  • किताब का पाठ: पृष्ठ 143 शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है।
  • कैसे लिखें: लगभग 500–800 ईसवी।

किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) की पहली पंक्ति में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं। पूरी काल-रेखा शिक्षक संदर्शिका के आँकड़ों में है।

बच्चे यहाँ अटकते हैं। हुजविरी पृष्ठ 154 के बॉक्स में भी आते हैं और पृष्ठ 165 के बॉक्स में भी, और बच्चे पूछेंगे कि मृत्यु का वर्ष कौन-सा सही है। किताब में इनकी मृत्यु का वर्ष दो जगह अलग-अलग छपा है: पृष्ठ 154 पर 1073 और पृष्ठ 165 पर 1071। उत्तर में वर्ष की ज़रूरत न हो तो इसे छोड़ दीजिए। दूसरी भूल: तज़किरा को बच्चे बेकार मान लेते हैं, क्योंकि किताब कहती है कि उनके बहुत से वर्णन अद्भुत और अविश्वसनीय हैं; पर किताब यह भी कहती है कि फिर भी वे इतिहासकारों के लिए महत्त्वपूर्ण हैं। प्रश्न 10 का मानचित्र कार्य कालांश 10 में ही कराइए; उसके मुख्य बिंदु शिक्षक संदर्शिका में हैं।

इसी हिस्से में। प्रश्न 9 के मुख्य बिंदु · प्रश्न 10 का मानचित्र कार्य · अध्याय के आँकड़े और काल-रेखा · फ़्लैशकार्ड 157–182; प्रश्न बैंक क20।

पृष्ठ 168–169 — प्रश्नावली

कालांश 11 · पाठ योजना में यह कालांश · इंटरैक्टिव: सार और काल-रेखा

इनके उत्तर यहाँ दोहराए नहीं गए, ताकि दो पन्नों में दो अलग उत्तर न हों। सब शिक्षक संदर्शिका में हैं:

अभ्यास के लिए बच्चों को प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़ दीजिए।