कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 140 से 169
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
सामग्री के पन्ने
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
हमारी ओर से: यह अध्याय संतों की सूची नहीं है। किताब हर परंपरा से लगभग एक जैसे सवाल पूछती है: इसके संत किस भाषा में बोले, जाति और कर्मकांड के बारे में उन्होंने क्या कहा, स्त्रियों की जगह क्या थी, और शासकों से उनका रिश्ता कैसा रहा। काल है लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी तक (पृष्ठ 140)। किताब नौ भागों में चलती है:
- भाग 1 (पृष्ठ 141–142): विष्णु, शिव और देवी की उपासना। पूजा प्रणालियों का समन्वय, फिर भेद और संघर्ष।
- भाग 2 (पृष्ठ 143–146): उपासना की कविताएँ। तमिलनाडु के अलवार और नयनार, जाति के प्रति उनका दृष्टिकोण, स्त्री भक्त, और चोल शासकों से रिश्ता।
- भाग 3 और 4 (पृष्ठ 146–148): कर्नाटक की वीरशैव परंपरा; उत्तरी भारत में नाथ, जोगी और सिद्ध, और तुर्कों का आगमन।
- भाग 5 (पृष्ठ 148–152): इस्लामी परंपराएँ: शासक और शासित, लोक प्रचलन में इस्लाम, मस्जिदें, और समुदायों के नाम।
- भाग 6 और 7 (पृष्ठ 152–159): सूफ़ीमत का विकास; चिश्ती सिलसिला: ख़ानक़ाह, ज़ियारत, कव्वाली, भाषा, और सूफ़ी व राज्य।
- भाग 8 (पृष्ठ 160–164): नवीन भक्ति पंथ: कबीर, बाबा गुरु नानक, मीराबाई (और असम के शंकरदेव)।
- भाग 9 (पृष्ठ 164–167): इतिहासकार इन परंपराओं का इतिहास किन स्रोतों से जोड़ते हैं; सूफ़ी ग्रंथों का बॉक्स (पृष्ठ 165) और काल-रेखा (पृष्ठ 167)।
इतिहासकार किन चीज़ों से यह इतिहास जोड़ते हैं
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “इस काल के नूतन साहित्यिक स्रोतों में संत कवियों की रचनाएँ हैं जिनमें उन्होंने जनसाधारण की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपने को व्यक्त किया था।” (पृष्ठ 140)
- “हालाँकि यह जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं हैं तथापि इनसे यह ज्ञात होता है कि अनुयायी इन पथ–प्रदर्शक स्त्री पुरुषों के जीवन को किस तरह से देखते थे।” (पृष्ठ 140)
पहला वाक्य बताता है कि इस अध्याय के स्रोत नए क्यों हैं: वे जनसाधारण की क्षेत्रीय भाषाओं में हैं, और पहले मौखिक थे। दूसरा वाक्य हर जीवनी-कथा पर लागू होता है: कबीर के गुरु, मीराबाई का जीवन या किसी शेख की करामात पढ़ाते समय बच्चों को याद दिलाइए कि यह अनुयायियों की नज़र है, घटनाओं का पक्का ब्योरा नहीं।
हमारी ओर से — कक्षा के चार्ट के लिए: यह तालिका चार्ट पेपर पर बनाकर पूरे अध्याय में दीवार पर रखिए। हर कालांश के बाद एक पंक्ति भरिए। हर इलाक़े का पृष्ठ पंक्ति के आख़िरी खाने में है।
| परंपरा या संत | इलाक़ा | काल | पृष्ठ |
|---|---|---|---|
| अलवार और नयनार | तमिलनाडु | प्रारंभिक भक्ति आंदोलन, लगभग छठी शताब्दी | 143 |
| वीरशैव (बासवन्ना) | कर्नाटक | बारहवीं शताब्दी | 146 |
| चिश्ती सिलसिला | अजमेर, दिल्ली, अजोधन | बारहवीं शताब्दी के अंत में भारत आए | 153–154 |
| कबीर | उत्तर प्रदेश | लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी | 160, 167 |
| बाबा गुरु नानक | पंजाब | 1469–1539 | 162, 167 |
| मीराबाई | राजस्थान | लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी | 163, 167 |
| शंकरदेव | असम | पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध | 164 |
हमारी ओर से — अध्याय का पाठ कैसे खोलें: पहले शीर्षक बोर्ड पर लिखिए और उसके दो हिस्से अलग कीजिए: “भक्ति–सूफ़ी परंपराएँ” और “धार्मिक विश्वासों में बदलाव और श्रद्धा ग्रंथ”। बच्चों से पूछिए कि “श्रद्धा ग्रंथ” से वे क्या समझते हैं। फिर ऊपर का पहला वाक्य पढ़कर बताइए कि यही ग्रंथ, यानी संतों की रचनाएँ और उनकी जीवनियाँ, इस अध्याय के मुख्य स्रोत हैं। हर नई परंपरा पर वही चार सवाल दोहराइए: भाषा, जाति और कर्मकांड, स्त्रियाँ, शासक।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
काल-रेखा: भारतीय उपमहाद्वीप के कुछ मुख्य धार्मिक शिक्षक (पृष्ठ 167)
| लगभग काल | शिक्षक और इलाक़ा | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 500–800 ईसवी | तमिलनाडु में अप्पार, संबंदर, सुंदरमूर्ति | 167 |
| लगभग 800–900 ईसवी | तमिलनाडु में नम्मलवर, मणिक्वचक्कार, अंडाल, तोंदराडिप्पोडी | 167 |
| लगभग 1000–1100 ईसवी | पंजाब में अल हुजविरी, दाता गंज बक्श; तमिलनाडु में रामानुजाचार्य | 167 |
| लगभग 1100–1200 ईसवी | कर्नाटक में बसवन्ना | 167 |
| लगभग 1200–1300 ईसवी | महाराष्ट्र में ज्ञानदेव, मुक्ताबाई; राजस्थान में ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती; पंजाब में बहादुद्दीन जकारिया और फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर; दिल्ली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी | 167 |
| लगभग 1300–1400 ईसवी | कश्मीर में लाल देद; सिंध में लाल शाहबाज़ कलंदर; दिल्ली में निज़ामुद्दीन औलिया; उत्तर प्रदेश में रामानंद; महाराष्ट्र में चोखमेला; बिहार में शराफुद्दीन याह्या मनेरी | 167 |
| लगभग 1400–1500 ईसवी | उत्तर प्रदेश में कबीर, रैदास, सूरदास; पंजाब में बाबा गुरु नानक; गुजरात में बल्लभाचार्य; ग्वालियर में अबदुल्ला सत्तारी; गुजरात में मुहम्मद शाह आलम; गुलबर्गा में मीर सैयद मौहम्मद गेसू दराज़; असम में शंकरदेव; महाराष्ट्र में तुकाराम | 167 |
| लगभग 1500–1600 ईसवी | बंगाल में श्री चैतन्य; राजस्थान में मीराबाई; उत्तर प्रदेश में शेख अब्दुल कुद्दस गंगोही, मलिक मौहम्मद जायसी, तुलसीदास | 167 |
| लगभग 1600–1700 ईसवी | हरियाणा में शेख अहमद सरहिंदी; पंजाब में मियाँ मीर | 167 |
किताब काल-रेखा के नीचे ख़ुद कहती है: “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।” (पृष्ठ 167)
अध्याय के बीच के आँकड़े
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| बारहवीं शताब्दी तक | पुरी में मुख्य देवता को जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया | 141 |
| लगभग छठी शताब्दी | अलवार और नयनार संतों के नेतृत्व में प्रारंभिक भक्ति आंदोलन | 143 |
| दसवीं शताब्दी तक | बारह अलवारों की रचनाओं का संकलन नलयिरादिव्यप्रबंधम् | 144 |
| दसवीं शताब्दी | अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताएँ तवरम में | 144 |
| नवीं से तेरहवीं शताब्दी | चोल सम्राट: ब्राह्मणीय और भक्ति परंपरा का समर्थन, मंदिरों को भूमि–अनुदान | 145 |
| 945 ईसवी | परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं | 146 |
| बारहवीं शताब्दी; 1106–68 | कर्नाटक में वीरशैव आंदोलन; बासवन्ना | 146 |
| तेरहवीं शताब्दी | महाराष्ट्र में भक्ति का विकास | 147 |
| चौदहवीं शताब्दी तक | उत्तर भारत से अलवार और नयनार जैसी रचनाएँ नहीं मिलतीं | 147 |
| सातवीं शताब्दी | इस्लाम का उद्भव | 148 |
| 711 ईसवी | मुहम्मद बिन कासिम ने सिंध जीता | 148 |
| 1598 | अकबर का फ़रमान: खम्बायत में गिरजाघर (स्रोत 5) | 149 |
| 1661–62 | औरंगज़ेब का जोगी गुरु आनंद नाथ को पत्र (स्रोत 6) | 150 |
| आठवीं से चौदहवीं शताब्दी | संस्कृत ग्रंथों और अभिलेखों में “मुसलमान” शब्द शायद ही कहीं | 151 |
| 1609; 1395 | अतिया मस्जिद (मैमनसिंग); शाह हमदान मस्जिद (श्रीनगर) | 151–152 |
| उन्नीसवीं शताब्दी | “सूफ़ीवाद” शब्द गढ़ा गया | 152 |
| ग्यारहवीं शताब्दी तक | सूफ़ीवाद एक पूर्ण विकसित आंदोलन | 152 |
| लगभग बारहवीं शताब्दी | सिलसिलों का बनना | 153 |
| बारहवीं शताब्दी का अंत | चिश्ती भारत आए | 153 |
| 1039 | अल हुजविरी (दाता गंज बख्श) को तुर्की सेना के कैदी के रूप में सिंधु नदी पार करनी पड़ी; वे लाहौर में बस गए | 154 |
| 1235, 1235, 1265, 1325, 1356 | पाँच मुख्य चिश्ती उपदेशकों की मृत्यु के वर्ष, इसी क्रम में: शेख मुइनुद्दीन चिश्ती (अजमेर), ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी (दिल्ली), शेख फरीदुद्दीन गंज–ए–शकर (अजोधन), शेख निज़ामुद्दीन औलिया (दिल्ली), शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली (दिल्ली) | 154 |
| सात सौ साल | “पिछले सात सौ सालों से” पाँच महान चिश्ती दरगाहों पर आस्था | 154 |
| 1324–51 | मुहम्मद बिन तुगलक, अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान | 155 |
| चौदह बार | अकबर अजमेर में ख़्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह पर आया, कभी साल में दो–तीन बार | 155 |
| लगभग 1615 | मनोहर का चित्र 6.13 | 155 |
| 1568; 1580 तक | अकबर ने देग़ भेंट की; यात्राओं की परंपरा 1580 तक | 156 |
| 1643 | जहाँआरा की अजमेर यात्रा (स्रोत 7) | 156 |
| 1253–1325 | अमीर खुसरो | 157 |
| चौबीस हज़ार | चरखानामा में साँस के धागे गिनना (स्रोत 8) | 157 |
| 1313 | स्रोत 9 की घटना | 159 |
| चार गाँव | शेख फ़रीदुद्दीन को भेंट किया गया पट्टा | 159 |
| लगभग चौदहवीं–पंद्रहवीं शताब्दी | कबीर | 160 |
| 200 वर्ष | कबीर की जीवनियाँ “उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद” से लिखी गईं | 162 |
| 1469–1539 | बाबा गुरु नानक | 162 |
| 200 वर्ष | बाबा गुरु नानक के बाद गुरुपद की परिपाटी 200 वर्षों तक चली | 163 |
| लगभग पंद्रहवीं–सोलहवीं शताब्दी | मीराबाई | 163 |
| पंद्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध | असम में शंकरदेव | 164 |
| 1624; 1642 | शेख अहमद सरहिंदी की मृत्यु; अब्दुल हक मुहाद्दिस देहलवी की मृत्यु | 165 |
ध्यान दीजिए:
- काल-रेखा की पहली पंक्ति: किताब की काल-रेखा (पृष्ठ 167) में यहाँ ‘ई.पू.’ छपा है; किताब का अपना पाठ (पृष्ठ 143) शुरुआती भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है, यानी ये वर्ष ईसवी के हैं।
- हुजविरी (दाता गंज बख्श): किताब में इनकी मृत्यु का वर्ष दो जगह अलग-अलग छपा है: पृष्ठ 154 पर 1073 और पृष्ठ 165 पर 1071। उत्तर में इनमें से कोई एक वर्ष “सही” मत ठहराइए।
- नामों की वर्तनी: काल-रेखा में “बसवन्ना” और “दाता गंज बक्श” छपा है; भाग 3 में “बासवन्ना” (पृष्ठ 146) और पृष्ठ 154 के बॉक्स में “दाता गंज बख्श”। दोनों रूप एक ही व्यक्ति के हैं; बच्चे किसी भी रूप में लिखें, अंक मत काटिए।
- दो अलग “200 वर्ष”: एक, कबीर की जीवनियाँ उनकी मृत्यु के 200 वर्ष बाद से लिखी गईं (पृष्ठ 162); दूसरा, बाबा गुरु नानक के बाद गुरुपद की परिपाटी 200 वर्षों तक चली (पृष्ठ 163)। बच्चे इन्हें आपस में मिला देते हैं।
- पाँच चिश्ती उपदेशकों में दो का वर्ष एक है: शेख मुइनुद्दीन चिश्ती और ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, दोनों के आगे मृत्यु का वर्ष 1235 छपा है (पृष्ठ 154)। बच्चे इसे दोहराव समझकर एक वर्ष बदल देते हैं; ऐसा मत होने दीजिए।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| “महान” और “लघु” परंपरा | समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्द: पुरोहितों और राजाओं जैसे प्रभुत्वशाली वर्गों के अनुष्ठान (“महान”) और किसानों के अपने लोकाचार (“लघु”) | 141 |
| समन्वय | हमारी ओर से: मेल। किताब ‘पूजा प्रणालियों का समन्वय’ वाले भाग में दो प्रक्रियाएँ बताती है: पौराणिक ग्रंथों द्वारा ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार, और स्त्री, शूद्रों व अन्य सामाजिक वर्गों की आस्थाओं को ब्राह्मणों द्वारा स्वीकार कर नया रूप देना | 141 |
| तांत्रिक | देवी की उपासना की वह पद्धति जिसमें स्त्री और पुरुष दोनों शामिल हो सकते थे और अनुष्ठान में वर्ग और वर्ण का भेद नहीं माना जाता था | 142 |
| सगुण, निर्गुण | सगुण: विशेषण सहित, यानी शिव, विष्णु, उनके अवतार और देवियाँ, जिनकी मूर्त रूप में उपासना होती थी; निर्गुण: विशेषण विहीन, अमूर्त, निराकार ईश्वर की उपासना | 143 |
| अलवार, नयनार | तमिलनाडु के संत: अलवार विष्णु के भक्त, नयनार शिव के भक्त | 143 |
| नलयिरादिव्यप्रबंधम् | बारह अलवारों की रचनाओं का संकलन (“चार हज़ार पावन रचनाएँ”), जिसे तमिल वेद कहा गया | 144 |
| तवरम | अप्पार, संबंदर और सुंदरार की कविताओं का संकलन, संगीत के आधार पर बँटा हुआ | 144 |
| वीरशैव, लिंगायत | बासवन्ना के अनुयायी: वीरशैव यानी शिव के वीर, लिंगायत यानी लिंग धारण करने वाले | 146 |
| जंगम | यायावर (घूमते रहने वाले) भिक्षु, जिनका लिंगायत आदर करते हैं | 147 |
| वचन | वीरशैव स्त्री-पुरुषों की कन्नड़ भाषा में रची रचनाएँ | 147 |
| उलमा | आलिम का बहुवचन: इस्लाम धर्म के ज्ञाता, जो धार्मिक, कानूनी और अध्यापन की ज़िम्मेदारी निभाते थे | 148 |
| शरिया | मुसलमान समुदाय को राह दिखाने वाला कानून: कुरान शरीफ़, हदीस, क़ियास और इजमा पर आधारित | 149 |
| ज़िम्मी, जज़िया | ज़िम्मी: संरक्षित श्रेणी, यानी इस्लामी शासन में रहने वाले वे लोग जो उद्घटित धर्मग्रंथ मानते थे, जैसे यहूदी और ईसाई, भारत में हिंदू भी; जज़िया: वह कर जिसे चुकाकर ज़िम्मी संरक्षण के अधिकारी बनते थे | 149 |
| जीनन | खोजा इस्माइली समुदाय के राग में बँधे भक्ति गीत (शब्द संस्कृत के “ज्ञान” से बना) | 150 |
| मातृगृहता | विवाह के बाद स्त्री का अपनी संतान के साथ मायके में ही रहना, जहाँ पति आकर रह सकता है | 151 |
| मेहराब, मिम्बर | मस्जिद में प्रार्थना का आला और व्यासपीठ, जिनसे इमारत का मक्का की ओर होना पता चलता है | 151 |
| तसव्वुफ़ | इस्लामी ग्रंथों में सूफ़ीवाद के लिए आने वाला शब्द (“सूफ़ीवाद” उन्नीसवीं शताब्दी का अंग्रेज़ी शब्द है) | 152 |
| ख़ानक़ाह; शेख, पीर, मुर्शीद; मुरीद; खलीफ़ा | सूफ़ियों का संगठित समुदाय और उसकी जगह; उसका नियंत्रण करने वाले गुरु; गुरु के अनुयायी; शेख का नियुक्त किया हुआ वारिस | 152 |
| सिलसिला | शाब्दिक अर्थ जंज़ीर: शेख और मुरीद के बीच का निरंतर रिश्ता, जिसकी पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी है | 153 |
| दरगाह, ज़ियारत | दरगाह फारसी में दरबार: पीर की मृत्यु के बाद उनकी मज़ार; ज़ियारत: दरगाह पर श्रद्धा से जाना | 153 |
| उर्स | शाब्दिक अर्थ विवाह: पीर की बरसी, जब माना जाता है कि पीर की आत्मा ईश्वर से मिली | 153 |
| वली (बहुवचन औलिया) | ईश्वर का मित्र: वह सूफ़ी जो अल्लाह के नज़दीक होने का दावा करता था और उनसे मिली बरकत से करामात करने की शक्ति रखता था | 153 |
| बा–शरिया, बे–शरिया | शरिया का पालन करने वाले सूफ़ी, और शरिया की अवहेलना करने वाले रहस्यवादी | 153 |
| लंगर, फ़ुतूह | ख़ानक़ाह की सामुदायिक रसोई, जो फ़ुतूह यानी बिना माँगी खैर पर चलती थी | 154 |
| ज़िक्र, समा | ज़िक्र: ईश्वर का नाम-जाप; समा: शाब्दिक अर्थ श्रवण करना, यानी आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल | 156 |
| कौल | अरबी शब्द, अर्थ कहावत: कव्वाली के शुरू और आख़िर में गाया जाने वाला हिस्सा | 157 |
| हिंदवी, मसनवी | हिंदवी: वह भाषा जिसमें दिल्ली में चिश्ती सिलसिले के लोग बातचीत करते थे; मसनवी: लंबी कविताएँ, जिनमें ईश्वर के प्रति प्रेम मानवीय प्रेम के रूपक से कहा गया | 157 |
| इनाम | कर मुक्त भूमि, जो सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को दी | 158 |
| बानी, उलटबाँसी | बानी: कबीर की रचनाएँ, जो किताब के अनुसार तीन परिपाटियों में संकलित हैं (कबीर बीजक, कबीर ग्रंथावली, आदि ग्रंथ साहिब); उलटबाँसी: उलटी कही उक्तियाँ, जिनमें रोज़ का अर्थ उलट दिया जाता है | 160 |
| शबद, संगत, गुरबानी | शबद: बाबा गुरु नानक के पंजाबी भजन, जो वे अलग-अलग रागों में गाते थे; संगत: सामुदायिक उपासना; गुरबानी: आदि ग्रंथ साहिब में संकलित बानी | 163 |
| खालसा पंथ | पवित्रों की सेना: गुरु गोबिन्द सिंह ने इसकी नींव डाली | 163 |
| मुलफुज़ात, मक्तुबात, तज़किरा | सूफ़ी संतों की बातचीत के संग्रह; उनके लिखे पत्रों के संकलन; उनकी जीवनियों का स्मरण | 165 |
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- पिछले अध्याय से: किताब इस अध्याय की शुरुआत अध्याय चार की याद से करती है, जहाँ स्तूप, विहार और मंदिर पढ़े गए थे (पृष्ठ 140)। उस अध्याय के रिवीजन नोट्स बच्चों से एक बार दोहरवा लीजिए।
- भूगोल: प्रश्न 10 मानचित्र कार्य है। अजमेर, दिल्ली और पुरी जैसे स्थान भारत के राजनीतिक मानचित्र पर ढूँढ़ने का अभ्यास पहले से करा दीजिए।
- हिंदी: हमारी ओर से: अगर आपके विद्यालय की हिंदी की किताब में कबीर या मीराबाई के पद हैं, तो हिंदी के अध्यापक के साथ एक कालांश बाँट लीजिए। वहाँ पद का अर्थ पढ़ा जाता है; यहाँ यह कि ये पद किसने, कब और कैसे सँभाले।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
चर्चा कीजिए — पृष्ठ 143 से 164 तक के छह बॉक्स
ये बॉक्स प्रश्नावली में नहीं हैं, पर कक्षा की चर्चा इन्हीं से अच्छी चलती है। तीन बॉक्स (पृष्ठ 143, 152, 153) बच्चों से अपने इलाक़े की खोज करवाते हैं; उनके बारे में सावधानी ज़रूर पढ़िए।
पृष्ठ 143 — “अपने शहर या गाँव में पूजित देवी–देवताओं के नाम और उनके चित्रण पर विचार कीजिए। उनकी उपासना से जुड़े अनुष्ठानों की व्याख्या कीजिए।”
नमूना उत्तर — यह अपने इलाक़े की खोज है; बच्चे इसे ऐसे करें:
- नाम और रूप: तीन-चार देवी-देवताओं के नाम लिखें और देखें कि उनकी प्रतिमा किस रूप में है।
- किताब से मिलान: देवी की उपासना अधिकतर सिंदूर से पोते गए पत्थर के रूप में होती थी, और पुरी में जगन्नाथ की प्रतिमा लकड़ी की है (पृष्ठ 141–142)।
- समन्वय की खोज: क्या कोई स्थानीय देवी किसी बड़े देवता की पत्नी के रूप में भी पूजी जाती है?
हमारी ओर से: यह काम मोहल्ले या गाँव के सार्वजनिक स्थानों के बारे में हो, किसी बच्चे के अपने घर की पूजा के बारे में नहीं।
पृष्ठ 146 — “आपको क्यों लगता है कि शासक भक्तों से अपने संबंध को दर्शाने के लिए उत्सुक थे?”
नमूना उत्तर — किताब से तीन कारण मिलते हैं:
- जनता का समर्थन: नयनार और अलवार संतों का वेल्लाल किसान आदर करते थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया।
- दैवीय समर्थन का दावा: चोल शासक भव्य मंदिर बनवाकर और उनमें पत्थर और धातु की मूर्तियाँ लगवाकर दैवीय समर्थन जताते थे।
- दिखने वाला संबंध: परांतक प्रथम ने 945 ईसवी में संत कवियों की प्रतिमाएँ शिव मंदिर में लगवाईं, जिन्हें उत्सवों में जुलूस में निकाला जाता था।
बच्चे अपनी राय भी जोड़ें: संतों से जुड़कर शासक लोगों की श्रद्धा अपनी ओर खींच सकते थे (पृष्ठ 145–146)।
पृष्ठ 152 — “अपने गाँव अथवा शहर की मस्जिद की स्थापत्य कला के बारे में जानकारी हासिल कीजिए। इसे बनाने में किस तरह की सामग्री का इस्तेमाल हुआ है? क्या यह सामग्री स्थानीय स्तर पर मिलती है? क्या इसके कुछ विशिष्ट स्थापत्य लक्षण हैं?”
नमूना उत्तर — यह भी अपने इलाक़े की खोज है:
- दिशा: मेहराब और मिम्बर पहचानें; किताब के अनुसार मक्का की ओर अनुस्थापन हर जगह एक-सा है।
- सामान: छत का आकार और सामान (पत्थर, ईंट, लकड़ी) लिखें, और पता करें कि यह सामान आसपास मिलता है या नहीं।
- मिलान: केरल की शिखर जैसी छत, अतिया मस्जिद की ईंटें, शाह हमदान मस्जिद की कश्मीरी लकड़ी (पृष्ठ 151–152)।
यही बात प्रश्न 2 का उत्तर बन जाती है: दिशा सार्वभौमिक, सामान स्थानीय।
पृष्ठ 153 — “क्या आपके गाँव अथवा शहर में ख़ानक़ाह या दरगाह है? मालूम कीजिए इनकी स्थापना कब हुई थी तथा इनके संग कौन से क्रियाकलाप जुड़े हुए हैं? क्या ऐसे अन्य स्थान हैं जहाँ धार्मिक स्त्री और पुरुष मिलते और रहते हैं?”
नमूना उत्तर — अपने इलाक़े की खोज, तीन क़दमों में:
- जानकारी: दरगाह किसकी है, कब बनी, उर्स कब होता है।
- क्रियाकलाप: ज़ियारत, कव्वाली या समा, लंगर; किताब में ये सब चिश्ती परंपरा में आते हैं (पृष्ठ 153–157)।
- दूसरे स्थान: जहाँ धार्मिक लोग साथ रहते हैं, जैसे मठ; असम के सत्र (मठ) का उदाहरण पृष्ठ 164 पर है।
अगर पास में ऐसी जगह न हो, तो बच्चे किताब की अजमेर वाली दरगाह (पृष्ठ 155–156) पर यही तीन बातें लिखें।
पृष्ठ 159 — “धार्मिक और राजनीतिक नेताओं में टकराव के संभावित स्रोत क्या–क्या हैं?”
नमूना उत्तर — किताब से ये स्रोत मिलते हैं:
- सत्ता का दावा: अपनी सत्ता का दावा करने के लिए सुल्तान और सूफ़ी, दोनों ही झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे।
- पदवियाँ: शेखों को आडंबरपूर्ण पदवियाँ मिलती थीं, जैसे सुल्तान–उल–मशेख।
- भेंट और ज़मीन: शासक भेंट देकर संतों को जोड़ना चाहते थे, पर स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने शासक की भेंट नहीं ली।
- शरिया का प्रश्न: उलमा शरिया लागू करवाना चाहते थे, जबकि सुल्तानों ने यह माँग ठुकराई।
बच्चे अपनी राय भी जोड़ें: जनता की निष्ठा किसके साथ है, यह भी टकराव की जड़ बन सकता है (पृष्ठ 158–159)।
पृष्ठ 164 — “आपको क्यों लगता है कबीर, बाबा गुरु नानक और मीराबाई इक्कीसवीं शताब्दी में भी महत्त्वपूर्ण हैं?”
नमूना उत्तर — यह राय का प्रश्न है; किताब से ये बातें काम आएँगी:
- कबीर: ईश्वर एक है और समुदायों के झगड़े व्यर्थ हैं (स्रोत 10)।
- बाबा गुरु नानक: बाहरी आडंबर के बजाय नाम का स्मरण, और संगत में मिलकर उपासना; उनकी बानी गुरु ग्रंथ साहिब में है।
- मीराबाई: जातिवादी रूढ़ियाँ तोड़ीं; उनके पद आज भी गुजरात और राजस्थान में गाए जाते हैं।
- परंपराएँ जीवित हैं: किताब के अनुसार लगभग सभी धार्मिक परिपाटियाँ आज भी पनप रही हैं (पृष्ठ 166)।
बच्चे इनसे जोड़कर लिखें कि बराबरी और आपसी आदर की बात इन्हें आज भी प्रासंगिक बनाती है (पृष्ठ 160–166)।
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न लगभग 100 से 150 शब्दों में उत्तर माँगते हैं (पृष्ठ 168)। हर प्रश्न के नीचे पहले वे बिंदु हैं जो उत्तर में होने चाहिए, फिर जाँचने की एक बात, फिर एक नमूना उत्तर। यही उत्तर रिवीजन नोट्स में भी हैं, ताकि बच्चे और आप एक ही बात पढ़ें।
प्रश्न 1 — संप्रदायों का समन्वय (पृष्ठ 141–142)
- समन्वय यानी अलग-अलग पूजा प्रणालियों का आपस में मिलना; इतिहासकार कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं (पृष्ठ 141)।
- पहली: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार, सरल संस्कृत छंदों वाले पौराणिक ग्रंथों से (पृष्ठ 141)।
- दूसरी: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे वर्गों के विश्वास स्वीकार करके उन्हें नया रूप दिया (पृष्ठ 141)।
- उदाहरण: पुरी के जगन्नाथ; स्थानीय देवियाँ लक्ष्मी या पार्वती के रूप में (पृष्ठ 141–142)।
जाँचते समय: दो प्रक्रियाएँ और कम से कम एक उदाहरण हो। केवल यह लिखना कि सब धर्म आपस में मिल गए, अधूरा उत्तर है।
नमूना उत्तर — समन्वय का मतलब है अलग-अलग पूजा प्रणालियों का आपस में मिलना। इतिहासकार इसकी कम से कम दो प्रक्रियाएँ बताते हैं:
- पहली प्रक्रिया: ब्राह्मणीय विचारधारा का प्रचार। पौराणिक ग्रंथ सरल संस्कृत छंदों में रचे गए, “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे”।
- दूसरी प्रक्रिया: ब्राह्मणों ने स्त्रियों, शूद्रों और दूसरे वर्गों के विश्वासों और आचरणों को स्वीकार करके उन्हें नया रूप दिया।
- पुरी का उदाहरण: बारहवीं शताब्दी तक एक स्थानीय देवता को जगन्नाथ के रूप में, विष्णु के एक रूप में, प्रस्तुत किया गया।
- देवियों का उदाहरण: स्थानीय देवियों को विष्णु की पत्नी लक्ष्मी या शिव की पत्नी पार्वती के रूप में मान्यता मिली।
- “महान” और “लघु” परंपरा: समाजशास्त्री राबर्ट रेडफील्ड के शब्दों में, कई परंपराएँ इन दोनों के लगातार संवाद से बनीं।
बौद्ध देवी मारिची की मूर्ति (चित्र 6.3) भी इसी एकीकरण का उदाहरण है।
प्रश्न 2 — मस्जिदों का स्थापत्य: सार्वभौमिक और स्थानीय (पृष्ठ 151–152)
- किताब का अपना वाक्य: मस्जिदों की स्थापत्य कला सार्वभौमिक धर्म और स्थानीय आचारों के मिश्रण का सबसे अच्छा उदाहरण है (पृष्ठ 151)।
- सार्वभौमिक: मक्का की ओर अनुस्थापन, मेहराब और मिम्बर से पता चलता है (पृष्ठ 151)।
- स्थानीय: छत और निर्माण का सामान (पृष्ठ 151)।
- तीन उदाहरण: केरल (चित्र 6.9), मैमनसिंग की अतिया मस्जिद 1609 (चित्र 6.10), श्रीनगर की शाह हमदान मस्जिद 1395 (चित्र 6.11) (पृष्ठ 151–152)।
जाँचते समय: “किस हद तक” का जवाब चाहिए, यानी क्या एक जैसा था और क्या बदलता था, दोनों।
नमूना उत्तर — किताब कहती है, “एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।”
- सार्वभौमिक तत्व: हर मस्जिद का मक्का की ओर अनुस्थापन, जो मेहराब (प्रार्थना का आला) और मिम्बर (व्यासपीठ) से पता चलता है।
- स्थानीय तत्व: छत और निर्माण का सामान जगह के हिसाब से बदलता था।
- केरल (चित्र 6.9): तेरहवीं शताब्दी की मस्जिद, जिसकी छत शिखर के आकार की है।
- मैमनसिंग, बांग्लादेश (चित्र 6.10): 1609 की अतिया मस्जिद, ईंटों की बनी।
- श्रीनगर (चित्र 6.11): 1395 की शाह हमदान मस्जिद, कश्मीरी लकड़ी की स्थापत्य कला का नमूना।
यानी नमाज़ की दिशा हर जगह एक थी, पर दिखने में हर मस्जिद अपने इलाक़े की परिपाटी से बनी।
प्रश्न 3 — बा–शरिया और बे–शरिया: एकरूपता और अंतर (पृष्ठ 152–153)
- एकरूपता: बे–शरिया आंदोलनों की नींव भी कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर रखी (पृष्ठ 153)।
- बा–शरिया शरिया का पालन करते थे; किताब के अनुसार सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द, शेख की देखरेख में संगठित होते थे (पृष्ठ 152)।
- बे–शरिया ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे: कलंदर, मदारी, मलंग, हैदरी (पृष्ठ 153)।
- नाम का कारण: शरिया की अवहेलना (पृष्ठ 153)।
जाँचते समय: प्रश्न “एकरूपता” भी पूछता है। केवल अंतर लिखने वाले उत्तर अधूरे हैं।
नमूना उत्तर — दोनों सूफ़ी परंपरा से निकले, पर शरिया और ख़ानक़ाह के बारे में उनका रास्ता अलग था:
- एकरूपता: किताब के अनुसार बे–शरिया आंदोलनों की नींव भी कुछ रहस्यवादियों ने सूफ़ी सिद्धांतों की मौलिक व्याख्या के आधार पर ही रखी।
- बा–शरिया: ये शरिया का पालन करते थे। किताब के अनुसार सूफ़ी समुदाय ख़ानक़ाह के इर्द-गिर्द संगठित होते थे, जहाँ शेख, पीर या मुर्शीद की देखरेख होती थी।
- बे–शरिया: ये ख़ानक़ाह को ठुकराकर फकीर की ज़िंदगी बिताते थे, और निर्धनता और ब्रह्मचर्य को गौरव देते थे।
- नाम का कारण: शरिया की अवहेलना करने के कारण इन्हें बे–शरिया कहा गया।
इस तरह किताब इन्हें शरिया मानने वाले बा–शरिया सूफ़ियों से अलग रखती है।
प्रश्न 4 — अलवार, नयनार और वीरशैवों की जाति प्रथा की आलोचना (पृष्ठ 144–147)
- कुछ इतिहासकारों का मत: अलवार और नयनार ने जाति प्रथा और ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई; किताब इसे कुछ हद तक सत्य मानती है (पृष्ठ 144)।
- संत अलग-अलग समुदायों से थे; उनकी रचनाओं को तमिल वेद कहा गया (पृष्ठ 144)।
- स्रोत 1 और 2: तोंदराडिप्पोडि और अप्पार (पृष्ठ 144)।
- वीरशैव: जाति, “दूषित” मानने के विचार और पुनर्जन्म पर प्रश्न; वयस्क विवाह, विधवा पुनर्विवाह (पृष्ठ 146–147)।
जाँचते समय: अलवार–नयनार वाले हिस्से में किताब की सावधानी (“कुछ हद तक”) बनी रहे। यह लिखना ग़लत है कि सारे संत जाति के विरोधी थे।
नमूना उत्तर — तमिलनाडु के भक्त संतों और कर्नाटक के वीरशैवों ने भक्ति को जन्म और कुल से ऊपर रखा, पर दोनों के तरीक़े अलग थे:
- अलवार और नयनार: “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।” किताब के अनुसार यह बात कुछ हद तक सत्य प्रतीत होती है। संत ब्राह्मण, शिल्पकार, किसान और “अस्पृश्य” मानी गई जातियों से भी थे।
- रचनाएँ वेदों जितनी: नलयिरादिव्यप्रबंधम् को तमिल वेद कहा गया।
- स्रोत 1 और 2: तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु भक्त “दासों” को उन चतुर्वेदियों से अधिक पसंद करते हैं जो विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते; अप्पार पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?”
- वीरशैव (लिंगायत): इन्होंने जाति का और कुछ समुदायों को “दूषित” मानने के ब्राह्मणीय विचार का विरोध किया, पुनर्जन्म पर प्रश्न उठाए, और वयस्क विवाह और विधवा पुनर्विवाह अपनाए।
इसलिए ब्राह्मणीय व्यवस्था में नीचा स्थान पाने वाले समुदाय वीरशैवों के अनुयायी बने (पृष्ठ 146–147)।
प्रश्न 5 — कबीर अथवा बाबा गुरु नानक के उपदेश और उनका संप्रेषण (पृष्ठ 160–163)
- कबीर: एक ईश्वर; परम सत्य के कई नाम (स्रोत 10, पृष्ठ 160)।
- कबीर की बानी तीन परिपाटियों में सँभली (पृष्ठ 160)।
- बाबा गुरु नानक: निर्गुण भक्ति; कर्मकांड नकारे; नाम का जाप (पृष्ठ 162–163)।
- नानक का संप्रेषण: पंजाबी शबद, राग, संगत, आदि ग्रंथ साहिब (पृष्ठ 163)।
जाँचते समय: प्रश्न “अथवा” कहता है: एक संत पूरा लिखना काफ़ी है। दूसरा भाग, “इन उपदेशों का किस तरह संप्रेषण हुआ”, अकसर छूट जाता है।
नमूना उत्तर — यहाँ दोनों संत दिए हैं; बच्चे एक चुनें:
- कबीर, एक ईश्वर: स्रोत 10 में वे पूछते हैं कि “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?” यह कैसे हो सकता है; “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
- कबीर, परम सत्य के नाम: अल्लाह, खुदा, हज़रत, पीर; अलख, निराकार, ब्रह्मन्, आत्मन्; शब्द और शून्य।
- कबीर, संप्रेषण: बानी तीन परिपाटियों में सँभली: कबीर बीजक (कबीर पंथी, वाराणसी), कबीर ग्रंथावली (दादू पंथी, राजस्थान) और आदि ग्रंथ साहिब।
- बाबा गुरु नानक, उपदेश: निर्गुण भक्ति; यज्ञ, आनुष्ठानिक स्नान, मूर्ति पूजा और कठोर तप को नकारा; रब का कोई लिंग या आकार नहीं; निरंतर स्मरण और नाम का जाप।
- बाबा गुरु नानक, संप्रेषण: पंजाबी में शबद, जिन्हें वे रागों में गाते थे और मरदाना रबाब बजाता था; संगत में सामूहिक पाठ; अंगद को गुरुपद; अर्जन देव जी ने बानी आदि ग्रंथ साहिब में संकलित की।
दोनों के संदेश लोगों की अपनी भाषा में, गायन और बाद के संकलनों के ज़रिए आगे पहुँचे।
6 से 9 तक के प्रश्न — लघु निबंध के मुख्य बिंदु
ये लघु निबंध लगभग 250-300 शब्दों में माँगे गए हैं (पृष्ठ 168)। निबंध में भूमिका, तीन-चार हिस्से और निष्कर्ष हों; हर हिस्से में किताब का कम से कम एक उदाहरण।
प्रश्न 6 — सूफ़ी मत के मुख्य धार्मिक विश्वास और आचार (पृष्ठ 152–158)
जाँचते समय: “विश्वास” और “आचार” दोनों चाहिए। केवल ख़ानक़ाह का वर्णन करने वाला निबंध आधा है; ज़ियारत, उर्स, ज़िक्र और समा जैसे आचार भी आएँ।
नमूना उत्तर — भूमिका: इस्लाम की आरंभिक शताब्दियों में कुछ आध्यात्मिक लोग रहस्यवाद और वैराग्य की ओर झुके। यह ख़िलाफ़त की बढ़ती सांसारिकता (भौतिक चीज़ों की ओर झुकाव) के विरोध में था।
- विश्वास: उन्होंने रूढ़िवादी परिभाषाओं और धर्माचार्यों की कुरान और सुन्ना की बौद्धिक व्याख्या की आलोचना की। मुक्ति के लिए ईश्वर की भक्ति और उनके आदेशों के पालन पर बल दिया; पैगम्बर मोहम्मद को इंसान–ए–कामिल मानकर उनका अनुसरण सिखाया; कुरान की व्याख्या निजी अनुभव से की।
- ख़ानक़ाह और सिलसिला: ग्यारहवीं शताब्दी तक सूफ़ीवाद पूर्ण विकसित आंदोलन था। ख़ानक़ाह का नियंत्रण शेख, पीर या मुर्शीद के हाथ में था; वे मुरीद भरती करते और खलीफ़ा नियुक्त करते थे। सिलसिला (जंज़ीर) शेख और मुरीद का निरंतर रिश्ता था, जिसकी पहली कड़ी पैगम्बर मोहम्मद से जुड़ी थी।
- दरगाह, ज़ियारत और उर्स: पीर की मृत्यु के बाद दरगाह भक्ति का स्थल बनी। बरसी पर ज़ियारत को उर्स कहा गया। लोग बरकत (आध्यात्मिक आशीर्वाद) की कामना से आते थे।
- चिश्ती आचार: लंगर फ़ुतूह (बिना माँगी खैर) पर चलता था; ज़िक्र (नाम-जाप) और समा (आध्यात्मिक संगीत की महफ़िल); अमीर खुसरो ने कौल से समा को विशिष्ट आकार दिया। शेख के सामने झुकना, पानी पिलाना, सिर मुँड़ाना और यौगिक व्यायाम जैसी स्थानीय परंपराएँ अपनाई गईं।
- बे–शरिया: कुछ रहस्यवादी ख़ानक़ाह ठुकराकर फकीर बने और शरिया की अवहेलना की।
निष्कर्ष: सूफ़ी मत में ईश्वर से निजी प्रेम केंद्र में था, और उसके आचार स्थानीय परिवेश में ढलते गए।
प्रश्न 7 — शासकों ने नयनार और सूफ़ी संतों से संबंध क्यों और कैसे बनाए (पृष्ठ 145–146, 155–159)
जाँचते समय: प्रश्न के दो हिस्से हैं, “क्यों” और “किस तरह”, और दो समूह, नयनार और सूफ़ी। चारों खाने भरे हों। तनाव का एक उदाहरण अच्छे उत्तर को अलग करता है।
नमूना उत्तर — भूमिका: दक्षिण में चोल शासकों और उत्तर में सुल्तानों और मुगलों, दोनों ने लोकप्रिय संतों से नाता जोड़ा, पर कारण और तरीक़े अलग थे।
- चोल शासक और नयनार, कैसे: चोल सम्राटों (नवीं से तेरहवीं शताब्दी) ने विष्णु और शिव के मंदिरों को भूमि–अनुदान दिए; चिदम्बरम, तंजावुर और गंगैकोंडचोलपुरम के विशाल शिव मंदिर उन्हीं की मदद से बने; मंदिरों में तमिल शैव भजनों का गायन शुरू करवाया और उनका तवरम के रूप में संकलन करवाया। 945 ईसवी में परांतक प्रथम ने अप्पार, संबंदर और सुंदरार की धातु प्रतिमाएँ एक शिव मंदिर में स्थापित करवाईं।
- चोल शासक और नयनार, क्यों: नयनार और अलवार संतों का वेल्लाल किसान आदर करते थे, इसलिए शासकों ने भी उनका समर्थन पाने का प्रयास किया; चोल शासक दैवीय समर्थन का दावा करते थे।
- सुल्तान, मुगल और सूफ़ी, कैसे: सुल्तानों ने ख़ानक़ाहों को कर मुक्त (इनाम) भूमि दी। मुहम्मद बिन तुगलक अजमेर की दरगाह पर आने वाले पहले सुल्तान थे। “अकबर यहाँ चौदह बार आया”, और 1568 में उसने देग़ भेंट की।
- सुल्तान, मुगल और सूफ़ी, क्यों: सूफ़ियों की धर्मनिष्ठा, विद्वता और चमत्कारी शक्ति में लोगों का विश्वास उन्हें लोकप्रिय बनाता था। सुल्तान जानते थे कि अधिकांश प्रजा इस्लाम मानने वाली नहीं है, इसलिए उन्होंने उलमा की शरिया लागू करने की माँग ठुकराई। “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।”
- तनाव भी: अपनी सत्ता का दावा करने के लिए सुल्तान और सूफ़ी, दोनों ही झुककर प्रणाम और कदम चूमने जैसे आचारों पर बल देते थे। स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने ज़मीन की भेंट नहीं ली।
निष्कर्ष: दोनों जगह शासक लोकप्रिय संतों से जुड़कर उनका समर्थन पाना चाहते थे; चिश्ती बिना माँगे मिले अनुदान स्वीकार करते थे, पर सत्ता से दूर रहने पर बल देते थे।
प्रश्न 8 — भक्ति और सूफ़ी चिंतकों ने अलग-अलग भाषाएँ क्यों अपनाईं (पृष्ठ 140, 143, 147, 150, 154, 157–158, 160–163)
जाँचते समय: “उदाहरण सहित विश्लेषण” माँगा है। हर भाषा के साथ संत या ग्रंथ का नाम हो, और “क्यों” का उत्तर अलग से लिखा हो।
नमूना उत्तर — भूमिका: संत आम लोगों तक पहुँचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने लोगों की क्षेत्रीय भाषाओं में मौखिक रूप से अपनी बात कही (पृष्ठ 140)।
- दक्षिण के भक्त: अलवार और नयनार तमिल में भजन गाते थे; वीरशैवों के वचन कन्नड़ में रचे गए।
- उत्तर के संत: कबीर की रचनाएँ कई भाषाओं और बोलियों में हैं; बाबा गुरु नानक ने विचार पंजाबी में शबद के रूप में रखे।
- चिश्ती सूफ़ी: दिल्ली के चिश्ती हिंदवी में बात करते थे; बाबा फरीद का क्षेत्रीय भाषा का काव्य गुरु ग्रंथ साहिब में है; अमीर खुसरो की कव्वाली में फारसी, हिंदवी या उर्दू।
- मसनवी और दक्खनी: जायसी की पद्मावत जैसी मसनवी मानवीय प्रेम के रूपक से ईश्वर-प्रेम कहती थी; बीजापुर के आसपास दक्खनी में चक्की और चरखे के गीत, लोरीनामा और शादीनामा। किताब बताती है कि इस माध्यम से इस्लाम दक्कन के गाँवों में जगह पा सका।
- खोजा इस्माइली: इनके जीनन पंजाबी, मुल्तानी, सिंधी, कच्छी, हिंदी और गुजराती में गाए जाते थे।
निष्कर्ष: भाषा श्रोता के हिसाब से चुनी गई, ताकि संदेश घर, खेत और काम के बीच तक पहुँचे।
प्रश्न 9 — पाँच स्रोतों के सामाजिक और धार्मिक विचार (पृष्ठ 144–160)
किताब का प्रश्न ऐसे छपा है: “इस अध्याय में प्रयुक्त किन्हीं पाँच स्त्रोतों का अध्ययन कीजिए और उनमें निहित सामाजिक व धार्मिक विचारों पर चर्चा कीजिए।” (पृष्ठ 168)
जाँचते समय: हर स्रोत के साथ दो चीज़ें हों: स्रोत क्या कहता है, और उसमें कौन-सा विचार है। केवल स्रोतों के नाम गिनाने वाला उत्तर अधूरा है।
नमूना उत्तर — भूमिका: इस अध्याय के स्रोत संतों की अपनी आवाज़ और शासकों के पत्र, दोनों हैं। पाँच उदाहरण:
- स्रोत 1, पृष्ठ 144: ब्राह्मण अलवार तोंदराडिप्पोडि कहते हैं कि विष्णु उन चतुर्वेदियों से, जो अजनबी हैं और विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, अधिक उन “दासों” को पसंद करते हैं, “जो आपके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।” विचार: भक्ति जन्म से बड़ी है।
- स्रोत 4, पृष्ठ 147: बासवन्ना पत्थर के साँप को दूध चढ़ाने और असली साँप को “मारो–मारो” कहने वालों पर व्यंग्य करते हैं। विचार: खोखले कर्मकांड का विरोध।
- स्रोत 6, पृष्ठ 150: औरंगज़ेब ने जोगी गुरु आनंद नाथ को वस्त्र और पच्चीस रुपए भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।” विचार: शासक दूसरे पंथों के गुरुओं का आदर करते थे।
- स्रोत 9, पृष्ठ 159: एक स्थानीय शासक ने शेख निज़ामुद्दीन औलिया को दो बगीचे और ज़मीन का पट्टा भेंट किया। शेख ने कहा, “इस ज़मीन, खेत और बगीचे का मुझे क्या करना है?” विचार: चिश्ती सत्ता और संपत्ति से दूरी रखते थे।
- स्रोत 10, पृष्ठ 160: कबीर कहते हैं, “ईश्वर को अनेक नामों से पुकारा जाता है: जैसे अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि तथा हज़रत।” विचार: ईश्वर एक है, समुदायों के झगड़े व्यर्थ हैं।
निष्कर्ष: इन स्रोतों में भक्ति को जाति और कर्मकांड से ऊपर रखा गया, और धर्मों के बीच आदर और संवाद दिखता है।
10 से 12 तक के प्रश्न — मानचित्र और परियोजना
प्रश्न 10 — मानचित्र कार्य (पृष्ठ 168)
प्रश्न भारत के मानचित्र पर 3 सूफ़ी स्थल और मंदिरों से जुड़े 3 स्थल माँगता है: विष्णु, शिव और देवी से जुड़ा एक-एक मंदिर।
नमूना उत्तर — अध्याय में आए इन स्थानों में से चुनिए:
- सूफ़ी स्थल: अजमेर, राजस्थान (शेख मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह); दिल्ली (शेख निज़ामुद्दीन औलिया, ख़्वाजा कुतुबुद्दीन बख़्तियार काकी, शेख नसीरुद्दीन चिराग–ए–देहली); फतेहपुर सीकरी (शेख सलीम चिश्ती की दरगाह)।
- विष्णु से जुड़ा मंदिर: पुरी (जगन्नाथ, विष्णु का एक रूप) (पृष्ठ 141)।
- शिव से जुड़ा मंदिर: चिदम्बरम, तंजावुर या गंगैकोंडचोलपुरम (विशाल शिव मंदिर, जो चोल सम्राटों की मदद से बने) (पृष्ठ 146)।
- देवी से जुड़ा मंदिर: अध्याय के पाठ में किसी देवी मंदिर की जगह का नाम नहीं आता। इसके लिए एटलस या अपने अध्यापक की मदद लीजिए।
हमारी ओर से — जाँचते समय: अजोधन और मुल्तान भी अध्याय के सूफ़ी स्थल हैं, पर किताब इन्हें पाकिस्तान में बताती है (पृष्ठ 154, 169), और लाहौर भी आज पाकिस्तान में है; भारत के मानचित्र के लिए ऊपर वाले स्थल लीजिए। देवी मंदिर के लिए बच्चा जो भी जगह ले, उससे पूछिए कि उसने जानकारी कहाँ से ली।
प्रश्न 11 — दो धार्मिक उपदेशकों पर परियोजना (पृष्ठ 169)
हमारी ओर से — तरीक़ा:
- पृष्ठ 167 की काल-रेखा से दो नाम चुनवाइए, जैसे एक भक्त संत और एक सूफ़ी।
- हर एक के लिए चार खाने: समय, क्षेत्र, मुख्य विचार, और जानकारी के स्रोत।
- स्रोतों में देखें कि उनकी अपनी रचनाएँ, बाद में लिखी जीवनियाँ, मुलफुज़ात या तज़किरा में से क्या मिलता है (पृष्ठ 165)।
- प्रश्न का आख़िरी हिस्सा, “हमें इनके बारे में कैसे जानकारी मिलती है”, सबसे ज़रूरी है: याद दिलाइए कि जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं होतीं, पर बताती हैं कि अनुयायी उन्हें कैसे देखते थे (पृष्ठ 140)।
प्रश्न 12 — तीर्थयात्रा के आचारों पर परियोजना (पृष्ठ 169)
हमारी ओर से — तरीक़ा:
- एक सूफ़ी स्थल (जैसे अजमेर) और एक मंदिर (जैसे पुरी) चुनवाइए।
- शुरुआत अध्याय से: दरगाह पर ज़ियारत, उर्स, समा और कव्वाली (पृष्ठ 153–157); मंदिरों में संतों के भजनों का गायन (पृष्ठ 143, 146)।
- गतिविधियों की सूची: चढ़ावा, लंगर या भोजन, संगीत, मेले।
- तुलना: आज के आचार किताब के वर्णन से, जैसे जहाँआरा की यात्रा (स्रोत 7, पृष्ठ 156), कितने मिलते हैं।
- किसी बच्चे से उसके अपने धर्म या परिवार की धार्मिक यात्रा के बारे में बताने को मत कहिए। जानकारी छपी सामग्री से या स्थल के बारे में आम जानकारी से ली जाए; जो बच्चा अपनी इच्छा से कुछ बताए, उसे सुनिए।
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — दस भूलें जिनसे बचाना है
1. भूल: अप्पार, संबंदर और सुंदरमूर्ति ईसा पूर्व के संत थे। सही बात: ये लगभग 500–800 ईसवी के हैं; किताब का पाठ प्रारंभिक भक्ति आंदोलन को लगभग छठी शताब्दी का बताता है (पृष्ठ 143, 167)। काल-रेखा की पहली पंक्ति के बारे में ऊपर अध्याय के आँकड़े में लिखा है।
2. भूल: सारे अलवार और नयनार ब्राह्मणों और जाति के विरोधी थे। सही बात: यह कुछ इतिहासकारों का मत है, जो कुछ हद तक ही सत्य प्रतीत होता है; संतों में ब्राह्मण भी थे, जैसे तोंदराडिप्पोडि (पृष्ठ 144)।
3. भूल: “हिंदू” और “मुसलमान” नाम हमेशा से चलते आए हैं। सही बात: बहुत समय तक इनका चलन नहीं था; लोग जन्मस्थान से पहचाने जाते थे: तुरुष्क, ताजिक, पारसीक (पृष्ठ 151)।
4. भूल: मस्जिदें हर जगह एक जैसी बनीं। सही बात: मक्का की ओर अनुस्थापन सार्वभौमिक था; छत और निर्माण का सामान स्थानीय था (पृष्ठ 151)।
5. भूल: “सूफ़ीवाद” इस्लामी ग्रंथों का शब्द है। सही बात: यह उन्नीसवीं शताब्दी में गढ़ा गया अंग्रेज़ी शब्द है; इस्लामी ग्रंथों में तसव्वुफ़ आता है (पृष्ठ 152)।
6. भूल: उर्स पीर की मृत्यु का शोक है। सही बात: बरसी की ज़ियारत को उर्स इसलिए कहा गया कि लोग मानते थे कि मृत्यु के बाद पीर ईश्वर से एकीभूत होकर उनके और करीब हो जाते हैं (पृष्ठ 153)।
7. भूल: हर सिलसिले का नाम उसके संस्थापक पर है। सही बात: ज़्यादातर के नाम संस्थापक पर हैं (कादरी), पर कुछ के जन्मस्थान पर, जैसे चिश्ती, चिश्ती शहर से (पृष्ठ 153)।
8. भूल: चिश्ती हर अनुदान ठुकरा देते थे। सही बात: वे बिना माँगे अनुदान और भेंट स्वीकार करते थे, पर जोड़ते नहीं थे, खर्च कर देते थे (पृष्ठ 158)। स्रोत 9 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने शासक की भेंट नहीं ली (पृष्ठ 159)।
9. भूल: रामानंद कबीर के पक्के गुरु थे। सही बात: यह बात जीवनियों की है; इतिहासकार दोनों का समकालीन होना मुश्किल मानते हैं (पृष्ठ 162)।
10. भूल: बाबा गुरु नानक ने आदि ग्रंथ साहिब संकलित किया। सही बात: संकलन पाँचवें गुरु अर्जन देव जी ने किया; गुरु ग्रंथ साहिब नाम गुरु गोबिन्द सिंह जी के समय पड़ा (पृष्ठ 163)।
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
बच्चे इन्हें उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ के साथ लिखना सीखें। एक सही उद्धरण पूरे उत्तर को किताब से जोड़ देता है।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “हालाँकि यह जीवनियाँ अक्षरश: सत्य नहीं हैं तथापि इनसे यह ज्ञात होता है कि अनुयायी इन पथ–प्रदर्शक स्त्री पुरुषों के जीवन को किस तरह से देखते थे।” | 140 | प्रश्न 11; कबीर और मीराबाई की जीवनी-कथाएँ |
| “जो वैदिक विद्या से विहीन स्त्रियों और शूद्रों द्वारा भी ग्राह्य थे” | 141 | प्रश्न 1 |
| “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि अलवार और नयनार संतों ने जाति प्रथा व ब्राह्मणों की प्रभुता के विरोध में आवाज़ उठाई।” | 144 | प्रश्न 4 |
| “इन स्त्रियों की जीवन पद्धति और इनकी रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी।” | 144 | स्त्री भक्तों पर कोई भी प्रश्न |
| “एक सार्वभौमिक धर्म के स्थानीय आचारों के संग जटिल मिश्रण का सर्वोत्तम उदाहरण संभवत: मस्जिदों की स्थापत्य कला में दृष्टिगोचर होता है।” | 151 | प्रश्न 2 |
| “अकबर यहाँ चौदह बार आया” | 155 | प्रश्न 7 |
| “शायद इसलिए शासक अपनी कब्र सूफ़ी दरगाहों और ख़ानक़ाहों के नज़दीक बनाना चाहते थे।” | 158 | प्रश्न 7 |
| “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।” | 160 | प्रश्न 5, प्रश्न 9 |
| “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे” | 163 | प्रश्न 5 |
| “यह कालावधियाँ इन शिक्षकों के अनुमानित काल को इंगित करती हैं।” | 167 | काल-रेखा से जुड़ा कोई भी प्रश्न |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
ये तेरह सवाल किताब के पन्नों के किनारे छपे हैं। पढ़ाते समय बच्चे इन्हीं पर अटकते हैं, इसलिए हर एक का उत्तर यहाँ है, पृष्ठ के क्रम में।
पृष्ठ 144 — “क्या आपको लगता है कि तोंदराडिप्पोडि जाति व्यवस्था के विरोधी थे?”
नमूना उत्तर — पूरी तरह नहीं, पर वे भक्ति को वर्ण से ऊपर रखते थे:
- क्या कहते हैं: विष्णु उन चतुर्वेदियों से अधिक, जो विष्णु की सेवा के प्रति निष्ठा नहीं रखते, उन “दासों” को पसंद करते हैं जो उनके चरणों से प्रेम रखते हैं, चाहे वे वर्ण–व्यवस्था के परे हों।
- कौन कह रहा है: तोंदराडिप्पोडि ख़ुद ब्राह्मण अलवार थे।
इसलिए वे जन्म के आधार पर बड़प्पन को चुनौती देते हैं, जो किताब की इस बात से मेल खाता है कि जाति-विरोध वाला मत कुछ हद तक सत्य प्रतीत होता है।
पृष्ठ 144 — “क्या ब्राह्मणों के प्रति तोंदराडिप्पोडि और अप्पार के विचारों में समानता है अथवा नहीं?”
नमूना उत्तर — हाँ, दोनों भक्ति को शास्त्र-ज्ञान और कुल से बड़ा मानते हैं, पर कहने का ढंग अलग है:
- तोंदराडिप्पोडि: निष्ठा न रखने वाले चतुर्वेदियों की तुलना भक्त “दासों” से करते हैं।
- अप्पार: शास्त्र उद्धृत करने वालों को “हे धूर्तजन” कहकर पूछते हैं, “तुम्हारा गोत्र और कुल भला किस काम का?” और केवल मारपेरू के स्वामी (शिव) के आगे झुकने को कहते हैं।
अप्पार ज़्यादा तीखे हैं; दोनों के लिए इष्ट के प्रति प्रेम ही कसौटी है।
पृष्ठ 145 — “उन उपायों की सूची बनाइए जिन उपायों से कराइक्काल अम्मइयार अपने आप को प्रस्तुत करती हैं। किस भाँति यह उपाय स्त्री सौंदर्य की पारंपरिक अवधारणा से भिन्न हैं।”
नमूना उत्तर — स्रोत 3 (“एक राक्षसी?”) में वे अपने को सुंदर नहीं, डरावने रूप में दिखाती हैं:
- रूप: फूली नाड़ियाँ, बाहर निकली आँखें, लाल केश और आगे निकले दाँत।
- जगह: वन में चीखती और क्रंदन करती हुई, वह वन “जो हमारे पिता (शिव) का घर है”।
वे सुंदर दिखने के बजाय शिव की भक्ति को ही अपनी पहचान बनाती हैं; किताब के अनुसार ऐसी स्त्रियों की रचनाओं ने पितृसत्तात्मक आदर्शों को चुनौती दी (पृष्ठ 144–145)।
पृष्ठ 147 — “अनुष्ठानों के प्रति बासवन्ना के रवैये की व्याख्या कीजिए। वे किस तरह श्रोता को अपनी बात समझाने का प्रयत्न करते हैं।”
नमूना उत्तर — बासवन्ना दिखावटी अनुष्ठानों के विरोधी हैं:
- रवैया: लोग पत्थर के साँप पर दूध चढ़ाते हैं, पर असली साँप आए तो कहते हैं “मारो–मारो”; जो सेवक खा सकता है उसे कहते हैं “चले जाओ! चले जाओ।”, और जो प्रतिमा खा नहीं सकती उसे व्यंजन परोसते हैं।
- समझाने का ढंग: वे रोज़ की जानी-पहचानी बातों के जोड़े रखकर उलटापन दिखाते हैं, ताकि श्रोता ख़ुद देख ले कि कर्मकांड और असली दुनिया का व्यवहार मेल नहीं खाते।
स्रोत का शीर्षक, “अनुष्ठान और यथार्थ संसार”, भी यही बात कहता है।
पृष्ठ 149 — “वे कौन लोग थे जिनकी तरफ़ से अकबर को अपने फ़रमान की बेअदबी का अंदेशा था?”
नमूना उत्तर — खम्बायत (गुजरात) के प्रभावशाली लोग:
- फ़रमान के शब्द: “खम्बायत के महानुभाव किसी भी तरह उनके रास्ते में न आएँ”।
यानी अकबर को डर था कि शहर के बड़े लोग पादरियों को गिरजाघर बनाने से रोक सकते हैं।
पृष्ठ 150 — “जोगी द्वारा वंदनीय देवता की पहचान कीजिए। जोगी के प्रति बादशाह के रवैये का वर्णन कीजिए।”
नमूना उत्तर — देवता शिव हैं, और बादशाह का रवैया आदर का है:
- देवता: पत्र में “श्री शिव जियो की पनाह” लिखा है।
- रवैया: औरंगज़ेब ने पोशाक के लिए वस्त्र और पच्चीस रुपए भेंट में भेजे और लिखा, “आप हमें लिख सकते हैं जब भी हमारी मदद की ज़रूरत हो।”
यह पत्र बताता है कि शासक दूसरे पंथों के गुरुओं से भी संबंध रखते थे।
पृष्ठ 155 — “यह बताइए कि कलाकार शेख साहब और उनके शिष्य में कैसे फर्क डालता है?”
नमूना उत्तर — चित्र 6.12 में शेख निज़ामुद्दीन औलिया और उनके शिष्य अमीर खुसरो हैं:
- शेख: बैठे हैं, सिर के पीछे प्रभामंडल है और पास में किताब है।
- शिष्य: उनके सामने घुटनों के बल है और उसके हाथ में तार वाला वाद्य है।
कलाकार बैठने के ढंग, प्रभामंडल और हाथ की चीज़ से गुरु का ऊँचा दर्जा और शिष्य की विनम्रता दिखाता है; वाद्य याद दिलाता है कि अमीर खुसरो संगीतज्ञ थे (पृष्ठ 157)।
पृष्ठ 155 — “चित्र में कलाकार के हस्ताक्षर ढूँढ़िए।”
नमूना उत्तर — कैप्शन बताता है कि चित्र 6.13 मनोहर नाम के कलाकार का है (लगभग 1615):
- ढूँढ़ना: चित्र में फ़ारसी लिपि की लिखावट ढूँढ़िए: ऊपर दाएँ कोने में एक छोटी पंक्ति है।
हमारी ओर से: किताब की छपाई में यह पंक्ति बहुत छोटी है; इसके आख़िर में फ़ारसी में ‘जहाँगीर’ नाम पढ़ने में आता है, यानी यह शायद चित्र में दिखाए बादशाह का नाम है, कलाकार के हस्ताक्षर नहीं। कलाकार का नाम, मनोहर, किताब के कैप्शन में है (पृष्ठ 155)। बच्चों को बताइए कि नाम की पक्की जानकारी कैप्शन से मिलती है।
पृष्ठ 156 — “जहाँआरा कौन सी चेष्टाओं का ज़िक्र करती हैं जो शेख के प्रति उसकी भक्ति को दर्शाती हैं। दरगाह की खासियत को वह किस तरह दर्शाती है?”
नमूना उत्तर — स्रोत 7 में भक्ति रास्ते में भी दिखती है और दरगाह पर भी:
- रास्ते में: हर रोज़ दो बार की अख़्तियारी नमाज़; रात को बाघ के चमड़े पर नहीं सोईं; दरगाह की तरफ़ न पैर फैलाए, न पीठ की।
- दरगाह में: “अपने जर्द चेहरे को उसकी चौखट की धूल से” रगड़ा, नंगे पाँव ज़मीन चूमती हुई गईं, “मज़ार के चारों ओर सात फेरे” लिए, इतर छिड़का और गुलाबी दुपट्टा मज़ार पर रखा।
- दरगाह की खासियत: वे उसे बार–बार मुकद्दस (पवित्र) दरगाह कहती हैं, जो “चिराग और इतर में डूबे” थी और गुम्बद के भीतर “रोशनी से भरी” थी।
उनकी भक्ति शरीर के आचारों से दिखती है: चौखट और वहाँ की ज़मीन तक को वे आदर देती हैं।
पृष्ठ 157 — “इस गाने के विचार और अभिव्यक्ति के तरीके जहाँआरा की ज़ियारत (स्रोत 7) में वर्णित विचारों और अभिव्यक्ति के तरीकों से कैसे समान और भिन्न हैं?”
नमूना उत्तर — “इस गाने” से मतलब स्रोत 8, चरखानामा, है:
- समानता: दोनों में पीर या शेख के प्रति भक्ति है। चरखानामा कहता है, “और इसे तोहफे में अपने पीर को पेश करें।”; जहाँआरा मज़ार पर इतर और दुपट्टा चढ़ाती हैं।
- अंतर, कौन और कहाँ: चरखानामा चरखे के चलने की धुन पर आधारित गीत है (स्रोत 8), और किताब के अनुसार दक्खनी की ऐसी रचनाएँ संभवत: औरतें घर का काम करते हुए, जैसे चक्की पीसते और चरखा कातते हुए, गाती थीं (पृष्ठ 157); जहाँआरा की ज़ियारत एक शहज़ादी की लंबी तीर्थयात्रा है, जो उन्होंने शेख की जीवनी में लिखी।
- अंतर, तरीक़ा: गीत में रोज़ का काम ही ज़िक्र बन जाता है (ज़िक्र–ए–जाली, ज़िक्र–ए–कल्बी, ज़िक्र–ए–आइनी); जहाँआरा की भक्ति सात फेरे, ज़मीन चूमना और नंगे पाँव चलने जैसे आचारों से दिखती है।
यानी भाव एक है, पर एक में रोज़ का काम उपासना बनता है और दूसरे में यात्रा (पृष्ठ 156–157)।
पृष्ठ 159 — “सूफ़ियों और राज्य के बीच संबंध का कौन सा पहलू इस कहानी से स्पष्ट होता है? यह किस्सा हमें शेख और उनके अनुयायियों के बीच संपर्क के तरीकों के बारे में क्या बताता है?”
नमूना उत्तर — स्रोत 9 राज्य से दूरी भी दिखाता है और अनुयायियों से मिलने का ढंग भी:
- राज्य से संबंध: शासक शेखों को धन और ज़मीन भेंट करके उनसे जुड़ना चाहते थे, पर चिश्ती शेख दूरी बनाए रखते थे। शेख निज़ामुद्दीन औलिया ने बगीचे और ज़मीन नहीं ली। उन्होंने शेख फ़रीदुद्दीन का किस्सा सुनाया: शेख फ़रीदुद्दीन ने कहा कि धन उन्हें दे दिया जाए, वे उसे दरवेशों में बाँट देंगे, पर ज़मीन का पट्टा उन लोगों को दे दिया जाए जिन्हें उसकी कामना हो।
- संपर्क का तरीक़ा: अनुयायी शेख से मिलने आते थे; अमीर हसन सिजज़ी लिखते हैं कि वे शेख के कदम चूम सके। सीख बातचीत और किस्सों से दी जाती थी।
ऐसे मिलने वाले कवियों और इतिहासकारों ने शेख के बारे में लिखा भी (पृष्ठ 154, 159)।
पृष्ठ 160 — “विभिन्न समुदायों के ईश्वर के बीच पार्थक्य के खिलाफ़ कबीर किस तरह की दलील पेश करते हैं?”
नमूना उत्तर — कबीर तर्क और सवाल से बात रखते हैं:
- सवाल: “संसार के एक नहीं दो स्वामी हों?” यह कैसे हो सकता है।
- नाम अलग, ईश्वर एक: अल्लाह, राम, करीम, केशव, हरि और हज़रत एक ही ईश्वर के नाम हैं; “विभिन्नताएँ तो केवल शब्दों में हैं जिनका आविष्कार हम स्वयं करते हैं।”
- दोनों पर चोट: स्रोत 10 के अनुसार दोनों भुलावे में हैं; एक बकरे को मारता है, दूसरा गाय को, और दोनों पूरा जीवन विवादों में गँवा देते हैं।
कबीर किसी एक समुदाय का पक्ष नहीं लेते; उनकी चोट दोनों के झगड़े पर है।
पृष्ठ 164 — “यह उद्धरण राणा के प्रति मीराबाई के रुख के बारे में क्या बताता है?”
नमूना उत्तर — मीराबाई राणा से डरती नहीं हैं:
- पद: “राणों जी मेवाड़ो म्हारो काँई करसी, / म्हे तो गोबिंद रा गुण गास्याँ।” यानी राणा मेरा क्या कर लेंगे, मैं तो गोविंद के गुण गाऊँगी।
- भाव: उनके लिए राणा का रूठना छोटी बात है, हरि का रूठना बड़ी।
यह किताब में दिए उनके जीवन से मेल खाता है: उन्होंने कृष्ण को अपना एकमात्र पति माना और राजभवन छोड़ दिया (पृष्ठ 163–164)।
सावधानी
- धर्म और जाति, किताब के शब्दों में: किसी धर्म, पंथ, संत या जाति को दूसरे से ऊँचा या नीचा मत ठहराइए। किसी बच्चे से उसका धर्म या उसकी जाति मत पूछिए। जाति-विरोध वाली बात किताब की सावधानी के साथ पढ़ाइए: “कुछ इतिहासकारों का यह मानना है”, और यह मत “कुछ हद तक” ही सत्य प्रतीत होता है (पृष्ठ 144)।
- संघर्ष किताब के काल में: भेद और संघर्ष (भाग 1.2), उलमा की माँग, कबीर की दोनों समुदायों पर चोट, ये सब उस समय की बातें हैं; इन्हें किताब के शब्दों और भूतकाल में पढ़ाइए, आज की किसी घटना से मत जोड़िए।
- पढ़ना और सुनना ठीक है, पूजा नहीं: स्रोतों के अंश ज़ोर से पढ़ना, या कोई भजन या कव्वाली संगीत की तरह सुनना ठीक है। कक्षा में कोई पूजा, प्रार्थना या अनुष्ठान मत करवाइए।
- अपने इलाक़े की खोज (पृष्ठ 143, 152, 153): ये गतिविधियाँ सार्वजनिक स्थानों और इमारतों के बारे में हों। समूह मिले-जुले रखिए, और कोई बच्चा किसी स्थल पर जाना न चाहे तो वह किताब के उदाहरण से काम करे।
- बाबा गुरु नानक और नया धर्म: किताब का शब्द-चयन ही रखिए: “ऐसा प्रतीत होता है कि बाबा गुरु नानक किसी नवीन धर्म की संस्थापना नहीं करना चाहते थे” (पृष्ठ 163)। अपनी ओर से कोई निष्कर्ष मत जोड़िए।
- अनुमान वाली बातें: जीवनी-कथाओं के “लगभग”, “शायद”, “कुछ परंपराओं के अनुसार” बच्चों के उत्तर में भी बने रहें। मीराबाई कोई मंडली बनाने वाली संत नहीं थीं; उनके आसपास अनुयायियों का जमघट नहीं लगा (पृष्ठ 164)।
- स्रोत 9 की एक पंक्ति: किताब के अंश में यहाँ ‘अपना हक कहते हैं’ छपा है; बात यह है कि शासक ने अपना सारा हक छोड़ दिया था, और आगे का सवाल शेख का है, जिन्होंने यह भेंट नहीं ली (अंश का शीर्षक भी ‘शाही भेंट अस्वीकार’ है)। अंश ज़ोर से पढ़ते समय यह बात बच्चों को बता दीजिए।
- हमारी ओर से — बोर्ड और चार्ट: बोर्ड दूसरी कक्षाओं के साथ साझा है, इसलिए जो चीज़ पूरे अध्याय में चाहिए (परंपराओं की तालिका, काल-रेखा), उसे चार्ट पेपर पर बनाइए। प्रोजेक्टर न हो तो चित्र किताब में ही खुलवाइए।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- काल और स्रोत: लगभग आठवीं से अठारहवीं सदी; संत कवियों की क्षेत्रीय भाषाओं की रचनाएँ और उनकी जीवनियाँ (पृष्ठ 140)।
- समन्वय: इतिहासकारों की बताई दो प्रक्रियाएँ, और पुरी के जगन्नाथ का उदाहरण (पृष्ठ 141)।
- दक्षिण के भक्त: अलवार, नयनार और वीरशैवों ने जाति और कर्मकांड पर क्या कहा (पृष्ठ 144–147)।
- मस्जिद: मक्का की ओर दिशा सार्वभौमिक, छत और सामान स्थानीय (पृष्ठ 151)।
- सूफ़ी: ख़ानक़ाह, सिलसिला, दरगाह, उर्स; और चिश्तियों का राज्य से रिश्ता (पृष्ठ 152–159)।
- नवीन भक्ति पंथ: कबीर (ईश्वर एक), बाबा गुरु नानक (नाम का स्मरण, संगत), मीराबाई (कृष्ण की भक्ति, राजभवन छोड़ा) (पृष्ठ 160–164)।
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़।