कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 115 से 139
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
सामग्री के पन्ने
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
हमारी ओर से: यह अध्याय लगभग दसवीं से सत्रहवीं सदी तक उपमहाद्वीप में आए यात्रियों के वृत्तांतों से अतीत पढ़ने का है। किताब तीन यात्रियों पर टिकती है और हर एक को दो बार पढ़ती है: पहले यह कि वह कौन था, कैसे आया और उसने किसके लिए लिखा; फिर यह कि उसने यहाँ के समाज के बारे में क्या लिखा, और वह विवरण कितना भरोसे लायक है।
- भाग 1 (पृष्ठ 115–117): अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द: ख़्वारिज़्म से पंजाब तक, और अरबी में लिखा अस्सी अध्यायों का ग्रंथ।
- भाग 2 (पृष्ठ 118–121): इब्न बतूता का रिह्ला: मोरक्को से निकला एक आरंभिक विश्व-यात्री, और यात्रा की कठिनाइयाँ।
- भाग 3 (पृष्ठ 122–123): फ्रांस्वा बर्नियर, एक विशिष्ट चिकित्सक: “पूर्व” और “पश्चिम” की तुलना।
- भाग 4 (पृष्ठ 124–125): एक अपरिचित संसार की समझ: अल–बिरूनी के गिनाए अवरोध और उसकी जाति व्यवस्था की व्याख्या।
- भाग 5 (पृष्ठ 126–129): इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा: नारियल और पान, शहर, और डाक व्यवस्था।
- भाग 6 (पृष्ठ 130–134): बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व: भूमि स्वामित्व का प्रश्न (6.1), और एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई (6.3)।
- भाग 7 (पृष्ठ 135–136): महिलाएँ: दासियाँ, सती तथा श्रमिक।
- पृष्ठ 137: काल-रेखा, “कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े”।
हर यात्री दो बार
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।” (पृष्ठ 116)
- “लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।” (पृष्ठ 122)
पहला वाक्य बताता है कि यात्रियों के वृत्तांत क्यों काम के हैं: बाहर से आया व्यक्ति वे बातें लिख लेता है जो यहाँ के लोगों को इतनी सामान्य लगती थीं कि वे लिखते ही नहीं। दूसरा वाक्य बताता है कि उन्हें आँख मूँदकर क्यों नहीं पढ़ा जा सकता।
हमारी ओर से — कक्षा के चार्ट के लिए: यह तालिका चार्ट पेपर पर बनाकर पूरे अध्याय में टाँगे रखिए। हर यात्री का दूसरा भाग आए, तो उसकी पंक्ति का आख़िरी खाना भरिए।
| यात्री | कहाँ से, कब | क्या लिखा | किस नज़र से देखा | पृष्ठ |
|---|---|---|---|---|
| अल–बिरूनी | ख़्वारिज़्म (आज का उज़्बेकिस्तान); ग्यारहवीं शताब्दी | किताब–उल–हिन्द, अरबी में | संस्कृत ग्रंथों के सहारे; दूसरी संस्कृतियों से तुलना | 116–117, 124–125 |
| इब्न बतूता | मोरक्को; चौदहवीं शताब्दी | रिह्ला, अरबी में | किताबों से ज़्यादा अनुभव पर भरोसा; जो चीज़ें अपने अनूठेपन से उसे प्रभावित करें, उनका वर्णन | 118–121, 126–130 |
| फ्रांस्वा बर्नियर | फ्रांस; सत्रहवीं शताब्दी | वृत्तांत, जो फ्रांस में 1670–71 में छपे | हर चीज़ की यूरोप से तुलना; भारत को यूरोप का उलटा दिखाया | 122–123, 130–134 |
हमारी ओर से — अध्याय का पाठ कैसे खोलें: पहले दिन पृष्ठ 137 की काल-रेखा खोलिए और बच्चों से उसमें तीन नाम ढूँढ़वाइए: अल–बिरूनी, इब्न बतूता और फ्रांस्वा बर्नियर। फिर बोर्ड पर दो सवाल लिखिए: बाहर से आया व्यक्ति हमारे बारे में ऐसा क्या देख लेता है जो हम नहीं देखते? और उसकी बात पर हम कितना भरोसा करें? बताइए कि पूरा अध्याय इन्हीं दो सवालों का उत्तर तीन यात्रियों के सहारे देता है। आख़िरी कालांश में इन्हीं सवालों पर लौटिए।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
काल-रेखा: कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े (पृष्ठ 137)
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 973–1048 | अल–बिरूनी (उज़्बेकिस्तान से) | 137 |
| 1254–1323 | मार्को पोलो (इटली से) | 137 |
| 1304–77 | इब्न बतूता (मोरक्को से) | 137 |
| 1413–82 | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी (समरक़ंद से) | 137 |
| 1466–72 (भारत में बिताए वर्ष) | अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से) | 137 |
| 1518 (भारत की यात्रा) | दुआर्ते बरबोसा, मृत्यु 1521 (पुर्तगाल से) | 137 |
| 1562 (मृत्यु का वर्ष) | सयदी अली रेइस (तुर्की से) | 137 |
| 1536–1600 | अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से) | 137 |
| 1626–31 (भारत में बिताए वर्ष) | महमूद वली बल्खी (बल्ख़ से) | 137 |
| 1600–67 | पीटर मुंडी (इंग्लैंड से) | 137 |
| 1605–89 | ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से) | 137 |
| 1620–88 | फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से) | 137 |
नाम ऊपर अध्याय के मुख्य पाठ की वर्तनी में हैं। पृष्ठ 137 की काल-रेखा में कुछ नाम दूसरी वर्तनी में छपे हैं: “अब्द अल–रज़्ज़ाक कमाल अल–दिन इब्न इस्हाक़ अल–समरक़ंदी”, “दूरते बारबोसा”, “महमूद वली बलख़ी” और “फ्रांस्वा बर्नीयर”।
अध्याय के बीच के आँकड़े
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| सन् 973 | अल–बिरूनी का जन्म, ख़्वारिज़्म (आज का उज़्बेकिस्तान) में | 116 |
| 1017 ई. | सुल्तान महमूद के ख़्वारिज़्म पर आक्रमण के बाद अल–बिरूनी बंधक के रूप में ग़ज़नी आया | 116 |
| अस्सी | किताब–उल–हिन्द के अध्याय | 117 |
| बाईस वर्ष | तैंजियर से निकलते समय इब्न बतूता की उम्र | 118 |
| 1333 | इब्न बतूता मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा | 118 |
| 1342 ई. | इब्न बतूता को सुल्तान (मुहम्मद बिन तुग़लक) के दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया गया | 118 |
| 1354 | इब्न बतूता घर लौटा, यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद | 118 |
| चालीस, लगभग पचास, चालीस और दस दिन | इब्न बतूता के अनुसार मुल्तान से दिल्ली, सिंध से दिल्ली, दौलताबाद से दिल्ली और ग्वालियर से दिल्ली की यात्रा | 119 |
| 1440, 1620 और 1740 के दशक | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी, महमूद वली बल्खी और शेख़ अली हाज़िन की यात्राएँ | 121 |
| लगभग 1500 ई. | पुर्तगाली भारत आए | 122 |
| 1600 ई. के बाद | डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्रियों की संख्या बढ़ने लगी | 122 |
| 1656 से 1668 (बारह वर्ष) | फ्रांस्वा बर्नियर भारत में रहा | 122 |
| 1670–71 | बर्नियर के कार्य फ्रांस में छपे | 123 |
| 1800 से पहले | अरबी और फ़ारसी वृत्तांत सामान्यत: छपते नहीं थे | 123 |
| ग्यारह हाथ; अट्ठाईस द्वार | इब्न बतूता के अनुसार दिल्ली की प्राचीर की दीवार की चौड़ाई, और शहर के द्वार | 127 |
| दो | इब्न बतूता के अनुसार किसान वर्ष में इतनी फसलें उगाते थे | 128 |
| पचास दिन और पाँच दिन | सिंध से दिल्ली की यात्रा, और गुप्तचरों की ख़बरों का डाक से सुल्तान तक पहुँचना | 129 |
| हर चार मील; प्रति मील तीन अवस्थान | उलुक (अश्व डाक) के राजकीय घोड़े; दावा (पैदल डाक) | 129 |
| सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशक | डच यात्री पेलसर्ट उपमहाद्वीप आया | 130 |
| लगभग पंद्रह प्रतिशत | सत्रहवीं शताब्दी में नगरों में रहने वाली जनसंख्या; औसतन पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक | 134 |
| एक लाख टके और दो सौ दास | मुहम्मद बिन तुग़लक ने धर्मोपदेशक नसीरुद्दीन को दिए | 135 |
| बारह वर्ष से अधिक नहीं | लाहौर में बर्नियर की देखी सती बालिका की आयु, उसके विचार में | 135 |
ध्यान दीजिए:
- अल–बिरूनी की आयु, दो जगह: पृष्ठ 116 कहता है कि सत्तर वर्ष की आयु में मृत्यु तक वह ग़ज़नी में ही रहा। पृष्ठ 137 की काल-रेखा उसके वर्ष 973–1048 देती है, जिससे आयु लगभग 75 वर्ष बनती है। बच्चे दोनों में से कोई भी लिखें, पृष्ठ बताकर लिखें।
- काल-रेखा के कोष्ठक: जहाँ तिथि के साथ कोष्ठक में कुछ नहीं लिखा, वहाँ तिथियाँ जीवन काल हैं (पृष्ठ 137 का नोट)। निकितिन और बल्खी की तिथियाँ भारत में बिताए वर्ष हैं, बरबोसा की 1518 भारत की यात्रा, और रेइस की 1562 मृत्यु का वर्ष।
- पचास दिन, दो जगह: पृष्ठ 119 सिंध से दिल्ली की यात्रा में “लगभग पचास दिन” कहता है; पृष्ठ 129 पचास दिन कहता है। उत्तर में “लगभग” साथ रखिए।
- छपाई के साल: बर्नियर के कार्य 1670–71 में छप गए (पृष्ठ 123); 1800 से पहले सामान्यत: न छपने वाले वृत्तांत अरबी और फ़ारसी के थे। बच्चे दोनों बातें मिला देते हैं।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| किताब–उल–हिन्द | अल–बिरूनी की अरबी में लिखी कृति; धर्म, दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कानून जैसे विषयों पर अस्सी अध्याय | 117 |
| संस्कृतवादी परंपरा | संस्कृत में रचे ग्रंथों की ज्ञान–परंपरा; अल–बिरूनी के वर्णन इन्हीं ग्रंथों पर टिके रहे | 117, 124 |
| रिह्ला | इब्न बतूता का अरबी में लिखा यात्रा वृत्तांत | 118 |
| क़ाज़ी | न्यायाधीश; सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने इब्न बतूता को दिल्ली का क़ाज़ी बनाया | 118 |
| अवरोध | समझने के रास्ते की बाधा; अल–बिरूनी ने तीन गिनाए: भाषा, धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता, और अभिमान | 124 |
| अपवित्रता | जाति व्यवस्था में सन्निहित यह मान्यता कि कुछ लोग या वस्तुएँ अशुद्ध हैं; अल–बिरूनी ने इसे प्रकृति के नियमों के विरुद्ध माना | 124–125 |
| अंत्यज | शाब्दिक अर्थ “व्यवस्था से परे”; वर्ण व्यवस्था से बाहर मानी गई श्रेणियाँ | 125 |
| ताराबबाद | दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार | 128 |
| अश्व डाक (उलुक) और पैदल डाक (दावा) | उलुक: हर चार मील पर रखे राजकीय घोड़ों से चलने वाली अश्व डाक; दावा: दौड़ते संदेशवाहकों की पैदल डाक, प्रति मील तीन अवस्थान | 129 |
| निजी भूस्वामित्व | ज़मीन पर व्यक्तियों का अपना मालिकाना हक़; बर्नियर के अनुसार भारत में इसका अभाव था | 130 |
| राजत्व का पारिश्रमिक | अबुल फ़ज़्ल के शब्द: भूमि राजस्व, जो राजा प्रजा को सुरक्षा देने के बदले माँगता प्रतीत होता था | 132 |
| प्राच्य निरंकुशवाद | मॉन्टेस्क्यू का सिद्धांत: एशिया में शासक अपनी प्रजा पर निर्बाध प्रभुत्व रखते थे | 132 |
| एशियाई उत्पादन शैली | कार्ल मार्क्स का सिद्धांत: उपनिवेशवाद से पहले भारत (और अन्य एशियाई देशों) में अधिशेष राज्य ले लेता था | 132 |
| शिविर नगर | बर्नियर का शब्द: ऐसे नगर जो अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर थे | 134 |
| महाजन, सेठ, नगर सेठ | पश्चिमी भारत में व्यापारियों के समूह (महाजन), उनका मुखिया (सेठ), और अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का मुखिया (नगर सेठ) | 134 |
| कारखाना | शिल्पकारों की कार्यशाला; बर्नियर ने इनके बड़े कक्षों का वर्णन किया | 134 |
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- इसी किताब के दूसरे अध्याय: अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी का वृत्तांत विजयनगर शहर के बारे में है (पृष्ठ 115), और मुग़ल भूमि राजस्व की बात अबुल फ़ज़्ल के सहारे यहाँ पृष्ठ 132 पर आती है। हमारी ओर से: बच्चों से एक साम्राज्य की राजधानी: विजयनगर के रिवीजन नोट्स और किसान, ज़मींदार और राज्य के रिवीजन नोट्स साथ खुलवाइए।
- भूगोल: प्रश्न 10 विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर इब्न बतूता के देखे देश और उसके पार किए समुद्र माँगता है। हमारी ओर से: भूगोल की कक्षा का एटलस साथ रखिए।
- हिंदी: हमारी ओर से: यात्रा वृत्तांत एक साहित्यिक विधा भी है। बच्चों से अपनी किसी यात्रा का एक पन्ने का वृत्तांत लिखवाइए, और पूछिए कि उन्होंने क्या लिखा जो वहाँ रहने वाले शायद न लिखते। यह पृष्ठ 116 वाले वाक्य को अपने अनुभव से समझने का रास्ता है।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
चर्चा कीजिए — पृष्ठ 117 से 136 तक के सात बॉक्स
पृष्ठ 117 — “यदि अल–बिरूनी इक्कीसवीं शताब्दी में रहता, तो वही भाषाएँ जानने पर भी उसे विश्व के किन क्षेत्रों में आसानी से समझा जा सकता था?”
नमूना उत्तर — यह उत्तर एटलस से बनता है; किताब उसकी शुरुआत देती है:
- उसकी भाषाएँ: वह कई भाषाओं का ज्ञाता था, “जिनमें सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू तथा संस्कृत शामिल हैं” (पृष्ठ 116)। उसने किताब–उल–हिन्द अरबी में लिखी (पृष्ठ 117)।
- बच्चे क्या करें: हर भाषा के आगे लिखें कि आज वह, या उससे निकली भाषा, किन देशों में बोली या पढ़ी जाती है; फिर उन क्षेत्रों को विश्व के मानचित्र पर रंग दें।
- क्या दिखेगा: एक ही आदमी की भाषाएँ आज भी दूर-दूर के कई क्षेत्रों तक पहुँचती हैं।
देशों के नाम बच्चे एटलस से लें, अंदाज़े से नहीं। जिस भाषा का क्षेत्र न मिले, उसे खाली छोड़ना ठीक है।
पृष्ठ 121 — “आपके विचार में अल–बिरूनी और इब्न बतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान/भिन्न थे?”
नमूना उत्तर — दोनों ने उपमहाद्वीप के बारे में बाहर के पाठकों के लिए लिखा, पर एक समझाना चाहता था और दूसरा अपना देखा सुनाना:
- अल–बिरूनी: उसने अपने कार्य को “उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं” बताया (स्रोत 1, पृष्ठ 116)। इसके लिए उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए और संस्कृत सीखी (पृष्ठ 116)।
- इब्न बतूता: वह “पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था” (पृष्ठ 118)। लौटने पर शासक के निर्देश से उसका वृत्तांत लिखवाया गया, जिसने इब्न जुज़ाई के शब्दों में “मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी” (स्रोत 3, पृष्ठ 121)।
- समानता: दोनों बाहर से आए, और दोनों ने नई दुनिया को अपनी जानी-पहचानी दुनिया से मिलाकर समझा। किताब कहती है कि यात्रियों ने जो देखा, “सामान्यत: उसकी तुलना उन्होंने उन प्रथाओं से की जिनसे वे परिचित थे” (पृष्ठ 124)।
अच्छे उत्तर में दोनों के पाठक भी आएँगे: अल–बिरूनी के पाठक वे, जो हिंदुओं से चर्चा या संबंध चाहते थे; इब्न बतूता के वे, जो सुनकर आनंद और सीख चाहते थे।
पृष्ठ 123 — “भारतीय भाषाओं में बहुत प्रचुर यात्रा वृत्तांत साहित्य उपलब्ध है। आप अपने घर में बोली जाने वाली भाषा के यात्री–लेखकों के विषय में पता कीजिए। किसी एक ऐसे वृत्तांत को पढ़िए और यात्री द्वारा देखे गए क्षेत्रों, उसने जो देखा और उसके द्वारा वृत्तांत लिखे जाने के कारणों पर टिप्पणी लिखिए।”
नमूना उत्तर — यह खोज का काम है, इसलिए हर बच्चे का उत्तर अलग होगा। टिप्पणी का ढाँचा किताब के प्रश्न में ही है:
- क्षेत्र: यात्री कहाँ-कहाँ गया।
- क्या देखा: उसने किन जगहों, लोगों और रीतियों का वर्णन किया।
- क्यों लिखा: उसने वृत्तांत किस लिए और किसके लिए लिखा।
- हमारी ओर से — तुलना: क्या वह इब्न बतूता की तरह अनूठी चीज़ों पर रुकता है, या बर्नियर की तरह अपनी जगह से तुलना करता है?
टिप्पणी में वृत्तांत और लेखक का नाम ज़रूर हो। यात्री-लेखकों के नाम बच्चे पुस्तकालय, आप से या घर के बड़ों से पूछ सकते हैं।
पृष्ठ 125 — “एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान कितना आवश्यक है?”
नमूना उत्तर — बहुत आवश्यक; अल–बिरूनी का अपना अनुभव यही दिखाता है:
- पहला अवरोध: उसने समझ में बाधक कई अवरोध गिनाए, और किताब के अनुसार “इनमें से पहला अवरोध भाषा थी”। उसके अनुसार संस्कृत, अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों को एक भाषा से दूसरी में ले जाना आसान नहीं था (पृष्ठ 124)।
- भाषा की बारीकी: वह लिखता है कि संस्कृत में एक ही वस्तु के लिए कई शब्द होते हैं, और एक ही शब्द कई वस्तुओं के लिए आता है (पृष्ठ 124)। भाषा जाने बिना ऐसी बारीकियाँ छूट जाती हैं।
- भाषा सीखने का फल: संस्कृत सीखकर उसने कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, जिनमें पतंजलि का व्याकरण पर ग्रंथ भी था (पृष्ठ 116)।
बच्चे अपनी राय भी जोड़ें: जो यात्री स्थानीय भाषा नहीं जानता, वह दूसरों के बताए पर टिका रहता है।
पृष्ठ 129 — “इब्न बतूता लोगों के लिए ऐसी वस्तुओं और स्थितियों के वर्णन की समस्या को कैसे हल करता था, जिनसे वे अनभिज्ञ थे और जिन्हें उन्होंने अनुभव नहीं किया था?”
नमूना उत्तर — अध्याय में उसके तीन तरीके दिखते हैं:
- जानी-पहचानी चीज़ से तुलना: नारियल के वृक्ष “हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं”, और फल मानव सिर से मेल खाता है; पान अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है, और सुपारी जायफल जैसी होती है (पृष्ठ 126)।
- अनूठी बात पर रुकना: किताब के अनुसार उसने “हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया” (पृष्ठ 130)। जैसे लोहे की कीलों के बजाय नारियल के रेशे से सिले जहाज़ (पृष्ठ 126), या दौलताबाद के बाज़ार में झूले पर बैठी गायिका (पृष्ठ 128)।
- नाप और गिनती: दिल्ली की दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी (पृष्ठ 127); अश्व डाक के घोड़े हर चार मील पर, और गुप्तचरों की ख़बरें सिंध से दिल्ली मात्र पाँच दिनों में (पृष्ठ 129)।
इन तीनों से पाठक बिना देखे भी चीज़ की तस्वीर मन में बना लेता था।
पृष्ठ 134 — “आपके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की?”
नमूना उत्तर — किताब से तीन कारण निकलते हैं:
- जानी-पहचानी कसौटी: यात्री जो देखते थे, उसे अपनी परिचित प्रथाओं से मिलाते थे (पृष्ठ 124)। बर्नियर के लिए वह कसौटी “सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस” की स्थितियाँ थीं (पृष्ठ 130)।
- उसके पाठक: उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक को समर्पित की, और कई कार्य “प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों” को पत्रों के रूप में लिखे (पृष्ठ 122)। वह नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को उन निर्णयों की ओर ले जाना चाहता था जिन्हें वह सही मानता था (पृष्ठ 130)।
- यूरोप के विवाद: वह “राज्य और समाज से संबंधित यूरोप में प्रचलित तत्कालीन विवादों में भाग ले रहा था”, और चाहता था कि उसका विवरण निजी स्वामित्व की अच्छाइयों को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने (पृष्ठ 131)।
इसीलिए लगभग हर दृष्टांत में उसने भारत की स्थिति को यूरोप की तुलना में “दयनीय” बताया, हालाँकि किताब के अनुसार उसका आकलन “हमेशा सटीक नहीं था” (पृष्ठ 122)।
पृष्ठ 136 — “आपके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्न बतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा?”
नमूना उत्तर — किताब इसका सीधा उत्तर नहीं देती, पर अध्याय से तीन कारण समझे जा सकते हैं:
- लिखने वाले पुरुष थे: लिखित वृत्तांत छोड़ने वाले यात्री “सामान्यतया पुरुष थे”, और कभी-कभी वे सामाजिक पक्षपात को सामान्य स्थिति मान लेते थे (पृष्ठ 135)।
- उनकी नज़र कहाँ थी: यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव पूर्व और पश्चिम के बीच “भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक” माना जाता था, इसलिए बर्नियर ने विस्तृत विवरण के लिए सती प्रथा चुनी (पृष्ठ 135)।
- हमारी ओर से — रोज़ का काम: खेत और घर में रोज़ काम करती महिलाएँ उन्हें शायद इतनी साधारण लगीं कि लिखने लायक नहीं लगीं। यह हमारा अनुमान है, किताब का कथन नहीं।
फिर भी किताब बताती है कि महिलाओं का श्रम कृषि में भी महत्त्वपूर्ण था और कृषि के अलावा होने वाले उत्पादन में भी (पृष्ठ 135–136)।
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न लगभग 100 से 150 शब्दों में उत्तर माँगते हैं (पृष्ठ 138)। हर प्रश्न के नीचे पहले वे बिंदु हैं जो उत्तर में आने चाहिए, फिर जाँचने का ध्यान, फिर एक नमूना उत्तर।
प्रश्न 1 — किताब–उल–हिन्द पर एक लेख (पृष्ठ 116–117, 124–125)
- लेखक अल–बिरूनी: जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है (पृष्ठ 116)।
- अरबी में लिखा ग्रंथ, भाषा सरल और स्पष्ट; अस्सी अध्याय; विषयों की लंबी सूची (पृष्ठ 117)।
- बनावट: सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) प्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, फिर दूसरी संस्कृतियों से तुलना; “लगभग ज्यामितीय संरचना” (पृष्ठ 117)।
- आधार: वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियाँ और मनुस्मृति (पृष्ठ 124)।
- पाठक: संभवत: उपमहाद्वीप के सीमांत क्षेत्रों के लोग (पृष्ठ 117); उद्देश्य स्रोत 1 में (पृष्ठ 116)।
- सीमा: जाति का विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण वाले नियामक संस्कृत ग्रंथों पर टिका (पृष्ठ 125)।
जाँचते समय: अध्यायों की संख्या अस्सी है; बनावट के साथ “हमेशा नहीं” और पाठकों के साथ “संभवत:” रहे; सीमा वाला बिंदु हो तो उत्तर पूरा माना जाए।
नमूना उत्तर — किताब–उल–हिन्द अल–बिरूनी की अरबी कृति है, जो उपमहाद्वीप को बाहर के पाठकों के लिए समझाती है।
- भाषा और आकार: इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है; यह अस्सी अध्यायों में बँटा एक विस्तृत ग्रंथ है।
- विषय: धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल-विज्ञान, कीमिया, रीति-रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक-जीवन, भार-तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून और मापतंत्र विज्ञान।
- बनावट: सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) हर अध्याय एक प्रश्न से शुरू होता, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन आता, और अंत में दूसरी संस्कृतियों से तुलना। आज के कुछ विद्वान इस “लगभग ज्यामितीय संरचना” का एक मुख्य कारण उसके गणित की ओर झुकाव को मानते हैं।
- आधार: संस्कृत ग्रंथ, जिन्हें पढ़ने के लिए उसने संस्कृत सीखी: वेद, पुराण, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियाँ और मनुस्मृति।
- सीमा: जाति व्यवस्था का उसका विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे नियामक ग्रंथों पर टिका है, जबकि वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी।
इसलिए यह ग्रंथ उपमहाद्वीप के बारे में बहुत कुछ बताता है, पर इसे ग्रंथों की नज़र को ध्यान में रखकर पढ़ना होता है।
प्रश्न 2 — इब्न बतूता और बर्नियर के दृष्टिकोण: तुलना और अंतर (पृष्ठ 118–122, 126–130)
- दोनों बाहर से आए: इब्न बतूता मोरक्को से, 1333 में सिंध पहुँचा (पृष्ठ 118); बर्नियर फ्रांस से, 1656 से 1668 तक भारत में (पृष्ठ 122)।
- इब्न बतूता: पुस्तकों के स्थान पर यात्रा के अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था (पृष्ठ 118)।
- उसने अपने अनूठेपन से प्रभावित करने वाली हर चीज़ का वर्णन किया: नारियल, पान, दिल्ली, ताराबबाद, डाक (पृष्ठ 126–130)।
- उसका वृत्तांत शासक के निर्देश से इब्न जुज़ाई ने लिखा (पृष्ठ 120–121)।
- बर्नियर: भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा; यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस से तुलना; लगभग हर दृष्टांत में भारत “दयनीय” (पृष्ठ 122, 130)।
- द्वि-विपरीतता: भारत यूरोप का “विपरीत”; भिन्नताएँ पदानुक्रम में; नीति-निर्माताओं को प्रभावित करने का लक्ष्य (पृष्ठ 130)।
जाँचते समय: दोनों का अलग-अलग परिचय लिख देना काफ़ी नहीं, दृष्टिकोण का अंतर साफ़ दिखे। बर्नियर को सीधे “ग़लत” न लिखें; किताब कहती है कि उसका आकलन “हमेशा सटीक नहीं था” (पृष्ठ 122)।
नमूना उत्तर — दोनों बाहर से आए, पर चौदहवीं शताब्दी का इब्न बतूता नई चीज़ों को अचरज से दर्ज करता है, जबकि सत्रहवीं शताब्दी का बर्नियर हर चीज़ को यूरोप से तौलता है।
- इब्न बतूता: वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था। जिस चीज़ ने उसे अपने अनूठेपन से प्रभावित किया, उसका उसने वर्णन किया: नारियल, पान, दिल्ली की प्राचीर, गायकों का बाज़ार, डाक व्यवस्था।
- बर्नियर: वह भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था। वह भारत की तुलना यूरोप, ख़ासकर फ्रांस से करता, और लगभग हर दृष्टांत में भारत की स्थिति दयनीय बताता। उसके चित्रण में भारत यूरोप का “विपरीत” है, और भिन्नताएँ ऊँच-नीच के क्रम में रखी गई हैं।
- उद्देश्य: इब्न बतूता की कहानियाँ शासक के निर्देश पर लिखवाई गईं और पाठकों को आनंद और सीख देती थीं; बर्नियर नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवियों को प्रभावित करना चाहता था।
यानी एक देखी हुई दुनिया का वर्णन करता है, दूसरा उससे यूरोप के पक्ष में निष्कर्ष निकालता है।
प्रश्न 3 — बर्नियर के वृत्तांत में शहरी केंद्रों का चित्र (पृष्ठ 132–134)
- “शिविर नगर”: अपने अस्तित्व के लिए राजकीय शिविर पर निर्भर; दरबार के आने पर बसते, चले जाने पर तेज़ी से पतनोन्मुख; राजकीय प्रश्रय पर आश्रित (पृष्ठ 134)।
- उसके अनुसार मुग़ल साम्राज्य के शहर और नगर विनष्ट तथा “खराब हवा” से दूषित थे (पृष्ठ 132)।
- किताब: यह “अतिसरलीकृत चित्रण” है; सत्रहवीं शताब्दी के मुग़ल भारत में लगभग पंद्रह प्रतिशत जनसंख्या नगरों में, जो औसतन उसी समय के पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक थी (पृष्ठ 134)।
- हर तरह के नगर: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान (पृष्ठ 134)।
- शहरी समाज: महाजन, सेठ, नगर सेठ; चिकित्सक, अध्यापक, अधिवक्ता, चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक (पृष्ठ 134)।
- उसका अपना स्रोत 14: राजकीय कारखाने (पृष्ठ 134)।
जाँचते समय: उत्तर में बर्नियर का चित्र और किताब का आकलन, दोनों हों; “पंद्रह प्रतिशत” के साथ “लगभग” रहे; “शिविर नगर” का मतलब राजकीय शिविर पर टिका नगर है।
नमूना उत्तर — बर्नियर मुग़लकालीन शहरों को “शिविर नगर” कहता है, पर किताब के साक्ष्य, और उसके अपने कुछ विवरण, एक भरी-पूरी शहरी दुनिया दिखाते हैं।
- बर्नियर का चित्र: ऐसे नगर जो राजकीय शिविर पर टिके थे; दरबार के आने पर बसते और जाने पर तेज़ी से उजड़ते; जिनकी सामाजिक और आर्थिक नींव व्यवहार्य नहीं थी। उसके अनुसार शहर विनष्ट और “खराब हवा” से दूषित थे।
- किताब का आकलन: यह अतिसरलीकृत चित्रण है। सत्रहवीं शताब्दी के मुग़ल भारत में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोग नगरों में रहते थे, जो औसतन उसी समय के पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक था।
- हर तरह के नगर: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थान।
- शहरी समाज: पश्चिमी भारत में महाजन और उनके मुखिया सेठ, अहमदाबाद जैसे शहरों में नगर सेठ; चिकित्सक, अध्यापक, अधिवक्ता, चित्रकार, वास्तुविद, संगीतकार, सुलेखक; और बर्नियर के अपने बताए राजकीय कारखाने (स्रोत 14)।
इसलिए बर्नियर के वृत्तांत से शहरों का चित्र अधूरा उभरता है, जिसे दूसरे साक्ष्यों से जाँचना पड़ता है।
प्रश्न 4 — इब्न बतूता के दास प्रथा संबंधी साक्ष्य (पृष्ठ 135)
- दास बाज़ारों में किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बिकते थे और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे।
- तीन भेंटें: सुल्तान के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास”; मुल्तान के गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा”; सुल्तान की ओर से नसीरुद्दीन को “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास”।
- दासों में काफ़ी विभेद: संगीत और गायन में निपुण दासियाँ; अमीरों की मुखबिरी (स्रोत 15)।
- घरेलू श्रम, पालकी या डोले में लोगों को ले जाना; घरेलू दासियों की कीमत बहुत कम।
- अधिकांश दासियाँ हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त की जाती थीं।
जाँचते समय: तीनों भेंटों में किसने किसको दिया, यह अदला-बदली न हो; उद्धरण किताब के शब्दों में हों; केवल सूची नहीं, “विभेद” वाला निष्कर्ष भी आए।
नमूना उत्तर — इब्न बतूता के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में दास बाज़ारों में किसी भी दूसरी वस्तु की तरह खुले आम बिकते थे, और नियमित रूप से भेंट में दिए जाते थे।
- भेंट के रूप में: सिंध पहुँचकर उसने सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे; मुल्तान के गवर्नर को “किशमिश के बादाम के साथ एक दास और घोड़ा” दिया। सुल्तान ने धर्मोपदेशक नसीरुद्दीन को “एक लाख टके (मुद्रा) तथा दो सौ दास” दिए।
- दासों में विभेद: सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; कुछ दासियों से सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखवाता था (स्रोत 15)।
- घरेलू श्रम: दास सामान्यत: घरेलू काम करते थे, और पालकी या डोले में लोगों को ले जाते थे। घरेलू श्रम वाली दासियों की कीमत बहुत कम होती थी, इसलिए जो परिवार उन्हें रख सकते थे, उनमें से अधिकांश कम से कम एक या दो रखते थे।
- कहाँ से आती थीं: अधिकांश दासियाँ हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक लाई जाती थीं।
इन साक्ष्यों से पता चलता है कि दास प्रथा आम थी और दासों के बीच काफ़ी विभेद था।
प्रश्न 5 — सती प्रथा के तत्व, जिन्होंने बर्नियर का ध्यान खींचा (पृष्ठ 135)
- यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव पूर्व और पश्चिम की भिन्नता का “महत्त्वपूर्ण संकेतक” था, इसलिए उसने सती प्रथा चुनी।
- कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
- स्रोत 16: लाहौर की अल्पवयस्क विधवा, जिसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी।
- बच्ची की अनिच्छा और भय; ब्राह्मणों और एक बूढ़ी औरत द्वारा उसे जबरन ले जाना।
- बर्नियर की अपनी व्याकुलता; किताब इसे संभवत: उसके सबसे मार्मिक विवरणों में गिनती है।
जाँचते समय: उत्तर उन बातों पर रहे जिन्होंने बर्नियर का ध्यान खींचा; दृश्य का भयावह वर्णन दोहराने की ज़रूरत नहीं। आयु वाले बिंदु में यह रहे कि बारह वर्ष बर्नियर का अपना अनुमान है (“मेरे विचार में”, स्रोत 16)।
नमूना उत्तर — बर्नियर जैसे यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से बर्ताव पश्चिमी और पूर्वी समाजों की भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक था, इसलिए उसने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना।
- इच्छा या ज़बरदस्ती: उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर दूसरों को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।
- विधवा की कम आयु: लाहौर में उसने जिस विधवा की बलि देखी, उसकी आयु उसके विचार में बारह वर्ष से अधिक नहीं थी (स्रोत 16)।
- विवशता: बच्ची डर से काँप रही थी और रो रही थी, फिर भी तीन या चार ब्राह्मण, एक बूढ़ी औरत की मदद से, उसे जबरन ले गए।
- उसकी अपनी प्रतिक्रिया: बर्नियर लिखता है कि वह अपनी भावनाओं को दबा नहीं पा रहा था।
किताब इस अंश को “संभवत: बर्नियर के वृत्तांत के सबसे मार्मिक विवरणों में से एक” कहती है।
6 से 9 तक के प्रश्न — लघु निबंध के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न “लगभग 250-300 शब्दों में” लघु निबंध माँगते हैं (पृष्ठ 138)। नीचे हर निबंध का ढाँचा है: भूमिका, मुख्य बिंदु, और निष्कर्ष।
प्रश्न 6 — जाति व्यवस्था की अल–बिरूनी की व्याख्या (पृष्ठ 124–125)
जाँचते समय: निबंध में व्याख्या के तीनों रास्ते हों (दूसरे समाजों से तुलना, ग्रंथों के चार वर्ण, अपवित्रता से इनकार) और अंत में उसकी सीमा भी। वर्णों का क्रम किताब के शब्दों में आए; बच्चा अपनी ओर से किसी समुदाय पर ऊँच-नीच की टिप्पणी न जोड़े।
नमूना उत्तर — भूमिका: अल–बिरूनी ने जाति व्यवस्था को तीन तरह से समझाया: दूसरे समाजों में प्रतिरूप खोजकर, संस्कृत ग्रंथों के वर्ण-विवरण के सहारे, और अपवित्रता की मान्यता पर सवाल उठाकर।
- दूसरे समाजों से तुलना: उसने लिखा कि प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्गों को मान्यता थी: “घुड़सवार और शासक वर्ग, भिक्षु, आनुष्ठानिक पुरोहित तथा चिकित्सक, खगोल शास्त्री तथा अन्य वैज्ञानिक और अंत में कृषक तथा शिल्पकार”। इससे वह दिखाना चाहता था कि ऐसे सामाजिक वर्ग केवल भारत तक सीमित नहीं थे। साथ ही उसने बताया कि इस्लाम में सभी लोग समान माने जाते थे, और भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में थी (पृष्ठ 124)।
- ग्रंथों के चार वर्ण (स्रोत 5): हिंदुओं के ग्रंथों के अनुसार ब्राह्मण ब्रह्मन् के सिर से उत्पन्न हुए, और हिंदू उन्हें “मानव जाति में सबसे उत्तम” मानते थे; क्षत्रिय कंधों और हाथों से, जिनका दर्जा ब्राह्मणों से अधिक नीचे नहीं था; वैश्य जंघाओं से; शूद्र चरणों से। उसके अनुसार अंतिम दो वर्गों में अधिक अंतर नहीं था; लेकिन वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में, समान घरों और आवासों में मिल-जुलकर रहते थे (पृष्ठ 125)।
- अपवित्रता से इनकार: ब्राह्मणवादी व्याख्या मानते हुए भी उसने अपवित्रता की मान्यता अस्वीकार की। उसके अनुसार अपवित्र हुई हर वस्तु अपनी पवित्रता की मूल स्थिति फिर से पाने का प्रयास करती है और सफल होती है: सूर्य हवा को स्वच्छ करता है, और समुद्र में नमक पानी को गंदा होने से बचाता है। ऐसा न होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता; इसलिए उसके अनुसार जाति व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा “प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी” (पृष्ठ 124–125)।
- व्याख्या की सीमा: उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों के अध्ययन से गहराई से प्रभावित था, जिनमें ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से नियम लिखे गए थे। किताब कहती है: “लेकिन वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी।” अंत्यज (शाब्दिक अर्थ: व्यवस्था से परे) कहलाने वालों से सामान्यतया किसानों और ज़मींदारों के लिए सस्ता श्रम देने की अपेक्षा की जाती थी; वे अक्सर सामाजिक प्रताड़ना झेलते थे, फिर भी आर्थिक तंत्र में शामिल थे (पृष्ठ 125)।
निष्कर्ष: अल–बिरूनी की व्याख्या तुलना करने वाली थी, और अपवित्रता के सवाल पर आलोचनात्मक भी; पर संस्कृत ग्रंथों पर टिकी होने के कारण वह समाज के असली, कम कड़े जीवन को पूरी तरह नहीं दिखाती।
प्रश्न 7 — शहरी जीवन-शैली के लिए इब्न बतूता का वृत्तांत कितना सहायक (पृष्ठ 127–130, 136)
जाँचते समय: प्रश्न राय के साथ कारण माँगता है; अच्छे उत्तर में सहायक होने के कारण भी हों और सीमाएँ भी। दिल्ली के आँकड़े स्रोत 8 के ही हों (ग्यारह हाथ चौड़ी दीवार, अट्ठाईस द्वार)।
नमूना उत्तर — भूमिका: हाँ, काफ़ी हद तक। चौदहवीं शताब्दी के उपमहाद्वीप के शहरों, बाज़ारों और व्यापार के बारे में इब्न बतूता बहुत कुछ बताता है, पर उसकी सीमाएँ भी ध्यान में रखनी होती हैं।
- शहरों का आम चित्र: उसे उपमहाद्वीप के शहर उन लोगों के लिए व्यापक अवसरों से भरे लगे जिनके पास आवश्यक इच्छा, साधन और कौशल था। शहर घनी आबादी वाले और समृद्ध थे, सिवाय कभी-कभी युद्धों और अभियानों से होने वाले विध्वंस के; अधिकांश शहरों में भीड़-भाड़ वाली सड़कें और चमक-दमक वाले, रंगीन बाज़ार थे (पृष्ठ 127)।
- दिल्ली और दौलताबाद: वह दिल्ली को भारत में सबसे बड़ा शहर बताता है, और दौलताबाद आकार में दिल्ली को चुनौती देता था। स्रोत 8 में दिल्ली की प्राचीर ग्यारह हाथ चौड़ी है, उसके भीतर भंडारगृह हैं, और शहर के अट्ठाईस द्वार हैं, जैसे बदायूँ दरवाज़ा, मांडवी दरवाज़ा (भीतर अनाज मंडी) और गुल दरवाज़ा (बगल में फलों का बगीचा) (पृष्ठ 127)।
- बाज़ार, सामाजिक जीवन के केंद्र: अधिकांश बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के स्थान चिह्नित थे। दौलताबाद में पुरुष और महिला गायकों के बाज़ार ताराबबाद (स्रोत 9) के बारे में वह लिखता है कि हिंदू शासकों में से एक जब भी बाज़ार से गुज़रता, गुंबद में उतरकर गायिकाओं का गान सुनता था, और कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे (पृष्ठ 128)।
- शहरों के पीछे की अर्थव्यवस्था: उपजाऊ मिट्टी के कारण किसान वर्ष में दो फसलें उगा पाते थे; भारतीय माल की मध्य और दक्षिण-पूर्व एशिया में बहुत माँग थी, ख़ास कर कपड़ों की; लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह थे, और डाक प्रणाली से व्यापारी सूचना, उधार और माल भेज पाते थे (पृष्ठ 128–129)।
- सीमाएँ: किताब के अनुसार उसने “हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया” (पृष्ठ 130), यानी उसका चुनाव अनूठी बातों पर था। शहरों की समृद्धि का वर्णन करने में उसकी अधिक रुचि नहीं थी, फिर भी इतिहासकारों ने उसके वृत्तांत से यह तर्क दिया कि शहर अपनी संपत्ति का बड़ा भाग गाँवों से अधिशेष लेकर पाते थे (पृष्ठ 128)। और यात्री वृत्तांतों के बारे में किताब याद दिलाती है कि उनमें “सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या फिर एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं” (पृष्ठ 136)।
निष्कर्ष: इब्न बतूता का वृत्तांत शहरों के रूप, बाज़ारों और व्यापार की जीवंत जानकारी देता है, इसलिए सहायक है; पर पूरी तस्वीर के लिए उसे दूसरे साक्ष्यों के साथ पढ़ना चाहिए।
प्रश्न 8 — ग्रामीण समाज को समझने में बर्नियर का वृत्तांत कहाँ तक काम आता है (पृष्ठ 130–133)
जाँचते समय: “किस सीमा तक” का अर्थ है कि बच्चा बर्नियर का चित्र भी लिखे और उसकी जाँच भी: मुग़ल दस्तावेज़ क्या कहते हैं, और किताब असली ग्रामीण समाज कैसा बताती है। सिर्फ़ बर्नियर का चित्र दोहराने वाला उत्तर अधूरा है।
नमूना उत्तर — भूमिका: केवल सीमित हद तक। बर्नियर ग्रामीण समाज के बारे में बहुत कुछ कहता है, पर उसका चित्रण एक ख़ास तर्क साबित करने के लिए था, इसलिए उसे दूसरे साक्ष्यों से मिलाकर पढ़ना पड़ता है।
- बर्नियर का चित्र: उसे लगा कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था (पृष्ठ 130)। उसके तर्क के अनुसार भूधारक भूमि अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए उत्पादन बढ़ाने के लिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे; और इसी से, उसके अनुसार, कृषि का विनाश और किसानों का असीम उत्पीड़न हुआ (पृष्ठ 130–131)।
- स्रोत 11 के गाँव: रेतीली भूमि और बंजर पर्वत, श्रमिकों के अभाव में बिना खेती पड़ी भूमि, और निरंकुशता से हताश होकर गाँव छोड़ते किसान। स्रोत के बाद किताब बताती है कि इसी तर्क को आगे बढ़ाकर वह भारतीय समाज को दरिद्र लोगों का समरूप जनसमूह बताता है, जिस पर एक बहुत अमीर और शक्तिशाली, अल्पसंख्यक शासक वर्ग का अधिकार है, और बहुत विश्वास से कहता है: “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।” (पृष्ठ 131)
- यह चित्र एकतरफ़ा क्यों: बर्नियर “राज्य और समाज से संबंधित यूरोप में प्रचलित तत्कालीन विवादों में भाग ले रहा था”, और चाहता था कि उसका विवरण यूरोप में निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को न मानने वालों के लिए चेतावनी बने (पृष्ठ 131)।
- मुग़ल दस्तावेज़ क्या कहते हैं: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह नहीं बताता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था। अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है; किताब के अनुसार यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर था (पृष्ठ 132)।
- इस पर बने सिद्धांत: फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने उसके वृत्तांत से प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत विकसित किया; उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स ने इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया, जिसमें गाँवों को स्वायत्त, समतावादी समुदायों की एक निष्क्रिय प्रणाली माना गया (पृष्ठ 132)।
- असली ग्रामीण समाज: किताब कहती है कि ग्रामीण समाज का यह चित्रण “सच्चाई से बहुत दूर था”। सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर सामाजिक और आर्थिक विभेद था: एक ओर बड़े ज़मींदार, दूसरी ओर “अस्पृश्य” भूमिविहीन श्रमिक (बलाहार), और बीच में किराए का श्रम लगाने वाले बड़े किसान और मुश्किल से निर्वहन लायक उत्पादन करने वाले अपेक्षाकृत छोटे किसान (पृष्ठ 132–133)।
- बर्नियर का अपना दूसरा चित्र: स्रोत 13 में वह ख़ुद लिखता है कि देश के विस्तृत भू-भाग का अधिकांश भाग अत्यधिक उपजाऊ है, बंगाल मिस्र से कहीं आगे है, और कई भागों में जनसंख्या पर्याप्त है और खेती अच्छी होती है (पृष्ठ 133)।
निष्कर्ष: बर्नियर से कुछ सुराग मिलते हैं, जैसे भूमि राजस्व की अकसर बहुत ऊँची माँग और किसानों की कठिनाइयाँ, पर केवल उसके आधार पर ग्रामीण समाज का चित्र नहीं बनाया जा सकता; उसे मुग़ल दस्तावेज़ों और दूसरे साक्ष्यों के साथ पढ़ना होता है।
प्रश्न 9 — बर्नियर के अंश के शिल्प, और अध्याय के शिल्प (पृष्ठ 128, 133–134, 138)
बर्नियर का अंश पृष्ठ 138 पर है, और उसके नीचे काम यों छपा है: “उसके द्वारा अलिखित शिल्प कार्यों को सूचीबद्ध कीजिए तथा इसकी तुलना अध्याय में वर्णित शिल्प गतिविधियों से कीजिए।”
जाँचते समय: सूची अंश से ही बने (सुंदर शिल्पकारी, यूरोपीय वस्तुओं की नकल, बंदूकें, स्वर्णाभूषण, चित्र), और तुलना में अध्याय के कम से कम दो विवरण आएँ, जैसे स्रोत 13 और स्रोत 14।
नमूना उत्तर — किताब में ‘अलिखित’ छपा है, पर अंग्रेज़ी किताब में यहाँ ‘mentioned’ (बताए गए) है, इसलिए इसे ‘उल्लिखित’ पढ़िए, यानी इस अंश में बताए गए शिल्प।
भूमिका: इस अंश में बर्नियर भारतीय कारीगरों के कौशल की खुलकर तारीफ़ करता है।
- अंश के शिल्प: औज़ारों के अभाव में भी, और किसी निपुण कारीगर से सीखे बिना, बनी सुंदर शिल्पकारी; यूरोप में बनी वस्तुओं की ऐसी नकल कि असली और नकली में अंतर करना मुश्किल हो; बेहतरीन बंदूकें; सुंदर स्वर्णाभूषण; और सुंदर, मृदु और सूक्ष्म चित्र।
- स्रोत 13, बर्नियर (पृष्ठ 133): गलीचे, ज़री, कसीदाकारी कढ़ाई, सोने और चाँदी के वस्त्र, और तरह-तरह के रेशमी और सूती वस्त्र, जो देश में भी काम आते थे और विदेश भी भेजे जाते थे।
- स्रोत 14, राजकीय कारखाने (पृष्ठ 134): कसीदाकार, सुनार, चित्रकार, प्रलाक्षा रस का रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी, जूते बनाने वाले, और रेशम, ज़री और महीन मलमल का काम करने वाले।
- इब्न बतूता और चित्र (पृष्ठ 128, 133): सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन की बहुत माँग; चित्र 5.10 की इक़त बुनाई; और चित्र 5.12 का पन्ने और माणिक जड़ा सोने का चम्मच, जिसे किताब मुग़लकालीन शिल्पकारों की खास दक्षता का अच्छा उदाहरण कहती है।
- तुलना: अंश के स्वर्णाभूषण कारखाने के सुनारों से, और अंश के चित्र कारखाने के चित्रकारों से मेल खाते हैं; अंश में बंदूकें हैं, जबकि अध्याय के दूसरे विवरणों में कपड़ों का काम बार–बार आता है। पर स्रोत 13 में बर्नियर शिल्पकार को “मूल रूप से आलसी” कहता है; और किताब के अनुसार वह यह भी कहता है कि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था, इसलिए शिल्पकारों के पास अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, “इसलिए उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था” (पृष्ठ 133)।
निष्कर्ष: यह अंश दिखाता है कि बर्नियर के अपने विवरण कभी-कभी उसके “अपविकसित” पूर्व वाले तर्क से मेल नहीं खाते; किताब के शब्दों में वे “एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं” (पृष्ठ 133)।
10 से 12 तक के प्रश्न — मानचित्र और परियोजना
प्रश्न 10 — विश्व के मानचित्र पर इब्न बतूता के देश और समुद्र (पृष्ठ 118–120)
नमूना उत्तर — बच्चा वही जगहें चिह्नित करे जिनका नाम किताब लेती है; जहाँ किताब शहर, पुराना नाम या क्षेत्र देती है, वहाँ आज का देश एटलस में देखकर पहचाने:
- घर: मोरक्को, जन्म स्थान तैंजियर (पृष्ठ 118); किताब मोरक्को को उत्तर पश्चिमी अफ़्रीका में बताती है (पृष्ठ 120)। घर से निकलने के बाद की राह में ट्यूनिस शहर (पृष्ठ 119)।
- भारत आने से पहले: मक्का की तीर्थ यात्राएँ; सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान, और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाह (पृष्ठ 118)।
- उपमहाद्वीप तक: मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से सन् 1333 में सिंध; फिर मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली (पृष्ठ 118)। मानचित्र 1 में अफ़गानिस्तान, सिंध और पंजाब की वे जगहें हैं जहाँ वह गया (पृष्ठ 120)।
- चीन की ओर: मध्य भारत होकर मालाबार तट और मालद्वीप (दोनों जगह वह दो बार गया; मालद्वीप के बाद उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया, पर किताब वहाँ पहुँचने की बात नहीं लिखती); फिर बंगाल और असम; जहाज़ से सुमात्रा, और वहाँ से दूसरे जहाज़ से चीन का बंदरगाह नगर जायतुन (आज क्वानझू); चीन में वह बीजिंग तक गया (पृष्ठ 118–119)।
- किताब का सार: उत्तरी अफ़्रीका, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया के कुछ भाग, भारतीय उपमहाद्वीप और चीन। किताब कहती है “हो सकता है वह रूस भी गया हो”, इसलिए रूस पर निशान लगे तो उसके आगे प्रश्नचिह्न रहे (पृष्ठ 120)।
- समुद्री यात्राएँ जो किताब में हैं: जहाज़ से सुमात्रा, और वहाँ से दूसरे जहाज़ से जायतुन (पृष्ठ 118–119)। मालद्वीप द्वीप है, और वह वहाँ दो बार गया, इसलिए वहाँ भी वह समुद्र से गया होगा।
- हमारी ओर से — समुद्रों के नाम एटलस से: किताब समुद्रों के नाम नहीं देती; मानचित्र 1 पर केवल अरब सागर का नाम छपा है। एटलस में रास्ता देखने पर: मालाबार से मालद्वीप की ओर अरब सागर और हिंद महासागर; बंगाल से सुमात्रा की ओर बंगाल की खाड़ी; सुमात्रा से चीन की ओर दक्षिण चीन सागर। अगर वह पूर्वी अफ्रीका, यमन और ओमान के बंदरगाहों तक समुद्र से गया हो, तो लाल सागर और अरब सागर भी हो सकते हैं।
बच्चा रास्ते की रेखाएँ अपने मन से न खींचे, क्योंकि किताब पूरा रास्ता नहीं दिखाती: जगहों पर निशान लगें, और समुद्रों के लिए “होगा” वाली भाषा रहे। मानचित्र 1 बिना पैमाने का रेखाचित्र है, इसलिए उससे दूरी न नापी जाए (पृष्ठ 120)।
प्रश्न 11 — किसी बड़े संबंधी का साक्षात्कार (परियोजना) (पृष्ठ 139)
नमूना उत्तर — यह बच्चा स्वयं खोजकर करेगा। तरीका:
- पहले अनुमति: संबंधी से समय माँगना और बताना कि बातचीत स्कूल की रिपोर्ट के लिए है; रिपोर्ट में उनका नाम या फ़ोटो उनकी अनुमति से ही।
- प्रश्न: किताब के (क) से (ङ) तक के पाँच प्रश्न: वे कहाँ गए, कैसे गए, कितना समय लगा, क्यों गए, और क्या कोई कठिनाई आई। साल और जगहों के नाम बातचीत के समय ही लिखे जाएँ।
- तुलना की तालिका: तीन खाने: विषय, अपने रहने की जगह, यात्रा की जगह। पंक्तियाँ किताब की सूची से: भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतें, सड़कें, पुरुषों की जीवन-शैली, महिलाओं की जीवन-शैली।
- रिपोर्ट: परिचय, यात्रा का ब्योरा, तुलना की तालिका, और अंत में बच्चे की अपनी राय: क्या संबंधी ने भी इब्न बतूता या बर्नियर की तरह नई जगह को अपनी जगह से तौलकर देखा?
हमारी ओर से — जिस बच्चे के घर में किसी ने बाहर की यात्रा न की हो, उसे किसी पड़ोसी या शिक्षक का साक्षात्कार करने दीजिए, या प्रश्न 12 चुनने दीजिए; किताब दोनों में से “कोई एक” परियोजना माँगती है। किसी परिवार की यात्रा, कमाई या कठिनाई पर कक्षा में टिप्पणी न हो।
प्रश्न 12 — एक यात्री के जीवन, कृतियों और यात्राओं पर रिपोर्ट (परियोजना) (पृष्ठ 137, 139)
नमूना उत्तर — यह भी बच्चा स्वयं करेगा। तरीका:
- यात्री चुनना: अल–बिरूनी, इब्न बतूता या फ्रांस्वा बर्नियर, या पृष्ठ 137 की काल-रेखा का कोई और यात्री।
- पहले अध्याय से: उस यात्री के बारे में किताब जो कहती है (कहाँ से आया, कहाँ गया, कृति, किसके लिए लिखी) और उसके सारे स्रोत-अंश एक जगह।
- और जानकारी: स्कूल या ज़िले के पुस्तकालय की किताबों से, या शिक्षक के सुझाए भरोसेमंद स्रोतों से; हर नई बात के साथ लिखा हो कि वह कहाँ से ली।
- तुलना: उसने समाज के किन पहलुओं का वर्णन किया (जाति, शहर, गाँव, व्यापार, महिलाएँ), और नई जानकारी अध्याय के उद्धरणों से मेल खाती है या अलग है।
- रिपोर्ट का ढाँचा: परिचय, यात्राओं की सूची या नक्शा, समाज का उसका वर्णन, अध्याय के उद्धरणों से तुलना, और अंत में उसके नज़रिए की ताक़त और सीमा।
रिपोर्ट जाँचते समय देखिए कि बच्चा उस यात्री का नज़रिया भी परखे: किताब याद दिलाती है कि यात्री वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम “अनछुए रह जाते हैं, या फिर एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं” (पृष्ठ 136)।
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — दस भूलें जिनसे बचाना है
1. भूल: अल–बिरूनी उज़्बेकिस्तान आया था (पृष्ठ 115 पर यही छपा है)। सही बात: वह उज़्बेकिस्तान से आया था: उसका जन्म ख़्वारिज़्म में हुआ, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है (पृष्ठ 115, 116)
2. भूल: अल–बिरूनी यूनानी भाषा जानता था। सही बात: वह यूनानी भाषा का जानकार नहीं था; प्लेटो और दूसरे यूनानी दार्शनिकों के कार्य उसने अरबी अनुवादों के माध्यम से पढ़े थे (पृष्ठ 116)
3. भूल: किताब–उल–हिन्द संस्कृत या फ़ारसी में लिखी गई। सही बात: यह अरबी में है, इसकी भाषा सरल और स्पष्ट है, और यह अस्सी अध्यायों में बँटी है (पृष्ठ 117)
4. भूल: “हिंदू” शब्द शुरू से एक धर्म का नाम था। सही बात: यह सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए बरते जाने वाले एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला; किताब कहती है कि इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था, और धार्मिक संदर्भ में इसका प्रयोग बहुत बाद की बात है (पृष्ठ 117)
5. भूल: अल–बिरूनी ने अपवित्रता की मान्यता भी मान ली। सही बात: उसने जाति व्यवस्था की ब्राह्मणवादी व्याख्या मानी, पर अपवित्रता की मान्यता अस्वीकार की, क्योंकि उसके अनुसार वह प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी (पृष्ठ 124–125)
6. भूल: उलुक पैदल डाक है और दावा अश्व डाक। सही बात: उलुक अश्व डाक है, जो हर चार मील की दूरी पर रखे राजकीय घोड़ों से चलती है; दावा पैदल डाक है, जिसके प्रति मील तीन अवस्थान होते हैं (स्रोत 10, पृष्ठ 129)। उसी स्रोत में आगे “हर तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव” छपा है, जो एक–तिहाई मील वाली बात से मेल नहीं खाता; अंग्रेज़ी किताब में यहाँ गाँव हर एक–तिहाई मील पर है।
7. भूल: मुग़ल दस्तावेज़ बताते हैं कि राज्य ही सारी भूमि का स्वामी था। सही बात: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा नहीं बताता; अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है (पृष्ठ 132)
8. भूल: प्राच्य निरंकुशवाद का सिद्धांत कार्ल मार्क्स ने दिया। सही बात: बर्नियर के वृत्तांत से यह सिद्धांत फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू ने विकसित किया; मार्क्स ने उन्नीसवीं शताब्दी में इस विचार को एशियाई उत्पादन शैली के सिद्धांत के रूप में आगे बढ़ाया (पृष्ठ 132)
9. भूल: मुग़ल शहर सचमुच केवल “शिविर नगर” थे। सही बात: यह बर्नियर का कहना है, और किताब इसे अतिसरलीकृत चित्रण मानती है; उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान, सभी तरह के नगर थे (पृष्ठ 134)
10. भूल: बर्नियर के अनुसार सभी महिलाएँ अपनी इच्छा से सती होती थीं। सही बात: उसके अनुसार कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, पर अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था (पृष्ठ 135)
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
किताब की एक सटीक पंक्ति बच्चे की बात को सहारा देती है। नीचे की पंक्तियाँ ठीक वैसी हैं जैसी छपी हैं; बच्चे इन्हें उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ के साथ लिखें, और उतना ही अंश लें जितना उनकी बात के लिए ज़रूरी हो।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “इनमें से कोई भी शब्द लोगों की धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था।” | 117 | प्रश्न 1; “हिंदू” शब्द पर कोई भी प्रश्न |
| “इब्न बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं से अर्जित अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था” | 118 | प्रश्न 2 |
| “जाति व्यवस्था में सन्निहित अपवित्रता की अवधारणा प्रकृति के नियमों के विरुद्ध थी” | 125 | प्रश्न 6 |
| “लेकिन वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी।” | 125 | प्रश्न 6, अल–बिरूनी की सीमा |
| “हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया” | 130 | प्रश्न 2 और 7, इब्न बतूता का नज़रिया |
| “भारत में मध्य की स्थिति के लोग नहीं है।” | 131 | प्रश्न 8, बर्नियर का समाज-चित्र |
| “एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ यह इंगित नहीं करता कि राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था” | 132 | प्रश्न 8, भूमि स्वामित्व |
| “ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था” | 132 | प्रश्न 8 |
| “उसके विवरण कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं” | 133 | प्रश्न 3 और 9 |
| “भूस्वामित्व के प्रश्न की तरह ही बर्नियर एक अतिसरलीकृत चित्रण प्रस्तुत कर रहा था।” | 134 | प्रश्न 3, “शिविर नगर” |
| “उसने लिखा कि हालाँकि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।” | 135 | प्रश्न 5 |
| “अनछुए रह जाते हैं, या फिर एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं” | 136 | प्रश्न 7, 8 और 12, यात्री वृत्तांतों की सीमा |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
किताब के किनारे पर छपे सोलह सवाल, पन्नों के क्रम में। कई सवाल किसी चित्र या स्रोत के बगल में छपे हैं; उनका उत्तर उसी चित्र या स्रोत को साथ देखकर बनता है।
पृष्ठ 116 — “अल–बिरूनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत 5) तथा चर्चा कीजिए कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है।” (स्रोत 1)
नमूना उत्तर — काफ़ी हद तक, पर एक सीमा के साथ:
- उद्देश्य: स्रोत 1 में अल–बिरूनी अपनी कृति को “उन लोगों के लिए सहायक जो उनसे (हिंदुओं) धार्मिक विषयों पर चर्चा करना चाहते हैं और ऐसे लोगों के लिए एक सूचना का संग्रह जो उनके साथ संबद्ध होना चाहते हैं” बताता है (पृष्ठ 116)।
- जो पूरा होता है: स्रोत 5 बाहर के पाठक को चार वर्णों का क्रम, ग्रंथों के अनुसार उनकी उत्पत्ति, और यह बताता है कि वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुलकर रहते थे (पृष्ठ 125)।
- जो छूटता है: यह विवरण ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे नियामक संस्कृत ग्रंथों पर टिका है, जबकि किताब के अनुसार वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी कड़ी नहीं थी (पृष्ठ 125)।
बच्चे अपनी राय दें, पर उसका कारण स्रोत 5 की किसी बात से जोड़ें।
पृष्ठ 117 — “क्या ये कपड़े यूनानी हैं अथवा अरबी?” (चित्र 5.2)
नमूना उत्तर — यह चित्र को देखकर बनने वाला उत्तर है, इसलिए राय अलग-अलग हो सकती है:
- किताब चित्र के बारे में क्या कहती है: यह तेरहवीं शताब्दी की अरबी पांडुलिपि का एक चित्र है, जिसमें छठी शताब्दी ईसा पूर्व के एथेंस के राजनेता और कवि सोलोन विद्यार्थियों को संबोधित कर रहे हैं; नीचे लिखा है कि उनके कपड़ों को ध्यान से देखिए (पृष्ठ 117)।
- क्या देखें: सिर पर क्या है, कपड़ों की काट, रंग और किनारियाँ।
- हमारी ओर से — सोचने की बात: विषय यूनान का है, पर चित्र बनाने वाला अरबी संसार का था और सदियों बाद का। चित्रकार ने कपड़े शायद अपने आसपास देखे पहनावे जैसे बनाए हों।
उत्तर में बच्चा अपना निर्णय और चित्र से एक-दो कारण लिखे।
पृष्ठ 118 — “आप डाकुओं को यात्रियों से कैसे अलग करेंगे?” (चित्र 5.3)
नमूना उत्तर — चित्र 5.3 “डाकू यात्रियों पर हमला कर रहे हैं, सोलहवीं शताब्दी का मुग़ल चित्र” है (पृष्ठ 118)। पहचान चित्र से ही होगी:
- क्या देखें: कौन हमला करता दिख रहा है और कौन बचता या भागता; किसके हथियार उठे हैं; किसके साथ सामान, लदे जानवर या गठरियाँ हैं।
- किताब से जोड़ें: इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के समूहों के आक्रमण झेले, और मुल्तान से दिल्ली की यात्रा में उसके कारवाँ पर भी आक्रमण हुआ (पृष्ठ 120)।
जिन बातों से बच्चे ने डाकू और यात्री पहचाने, वही उसका उत्तर है।
पृष्ठ 119 — “आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं?” (चित्र 5.4)
नमूना उत्तर — चित्र 5.4 बंगाल के एक मंदिर की मृण मूर्तिकला है, जिसमें नाव में यात्री हैं (पृष्ठ 119)। किताब से दो कारण निकलते हैं:
- यात्रा जोखिम भरी थी: उस समय यात्रा करना आज की तुलना में “अधिक कठिन तथा जोखिम भरा कार्य था” (पृष्ठ 119)।
- कारवाँ भी सुरक्षित नहीं थे: इब्न बतूता साथियों के साथ कारवाँ में चलना पसंद करता था, फिर भी राजमार्गों के लुटेरे रुके नहीं (पृष्ठ 120)।
इसलिए यात्री शायद अपनी और अपने सामान की रक्षा के लिए हथियार साथ रखते थे।
पृष्ठ 123 — “बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौन सी वस्तुएँ हैं जो आज आप यात्रा में साथ ले जाएँगे?” (स्रोत 4)
नमूना उत्तर — यह बच्चे की अपनी पसंद है। पहले स्रोत 4 की सूची दोबारा पढ़िए:
- सामान: औसत आकार का एक तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के गोल मेज़पोश, अंगौछे, और खाना बनाने के सामान से भरे झोले।
- खाना: पाँच या छह दिनों के लिए बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का छोटा झोला (पृष्ठ 123)।
बच्चा जो भी चीज़ चुने, उसके साथ एक कारण लिखे कि आज की यात्रा में वह क्यों काम आएगी, और किसे आज छोड़ देगा।
पृष्ठ 125 — “अल-बिरूनी ने जो लिखा उसकी तुलना अध्याय 3 स्रोत 6 से कीजिए। क्या आप कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं? क्या आप को लगता है कि अल-बिरूनी भारतीय समाज के विषय में अपनी जानकारी और समझ के लिए केवल संस्कृत के ग्रंथों पर आश्रित रहा?” (स्रोत 5)
नमूना उत्तर — पहले भाग के लिए अध्याय 3 का स्रोत 6 खोलकर इस अध्याय के स्रोत 5 के साथ रखिए:
- तुलना कैसे करें: दोनों में वर्णों की गिनती, क्रम, उत्पत्ति की कथा और दर्जे की बातें आमने-सामने लिखें; जो मिलें वे समानताएँ, जो न मिलें वे भिन्नताएँ।
- ग्रंथों पर कितना आश्रित: काफ़ी हद तक। किताब के अनुसार वह “लगभग पूरी तरह से ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा”, और वेदों, पुराणों, भगवद्गीता, पतंजलि की कृतियों और मनुस्मृति से अंश उद्धृत करता था (पृष्ठ 124)।
- पर केवल ग्रंथ नहीं: उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए, और प्रतीत होता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा की थी (पृष्ठ 116)।
इसलिए उसकी समझ ज़्यादातर ग्रंथों से बनी, पर उसमें विद्वानों से बातचीत भी जुड़ी थी।
पृष्ठ 126 — “आपके विचार में इसने इब्न बतूता का ध्यान क्यों खींचा? क्या आप इस विवरण में कुछ और जोड़ना चाहेंगे?” (स्रोत 7, पान)
नमूना उत्तर — पान उसके पाठकों के लिए बिलकुल नई चीज़ था:
- ध्यान क्यों खींचा: किताब के अनुसार नारियल और पान ऐसी दो वानस्पतिक उपज थीं “जिनसे उसके पाठक पूरी तरह से अपरिचित थे” (पृष्ठ 126)। ऐसा पौधा, जिसका कोई फल नहीं होता, जो केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है, और जिसे सुपारी के टुकड़ों के साथ चबाया जाता है, उनके लिए अनोखी बात थी।
- उसका स्वभाव: किताब कहती है कि उसने “हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया” (पृष्ठ 130)।
- बच्चे क्या जोड़ें: अपने इलाक़े में पान कैसे उगता, बिकता और खाया जाता है, इसके बारे में जो उन्होंने ख़ुद देखा है।
पृष्ठ 126 — “किस तरह की तुलनाओं से इब्न बतूता अपने पाठकों को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नारियल देखने में कैसे होते हैं?” (स्रोत 6)
नमूना उत्तर — वह नारियल को उन चीज़ों से जोड़ता है जिन्हें उसके पाठक जानते थे:
- खजूर से: नारियल के वृक्ष “हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं”।
- मानव सिर से: फल में मानो दो आँखें और एक मुख है, अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा दिखता है, और उससे जुड़ा रेशा बालों जैसा।
- असाधारण कैसे दिखाया: रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय इसी से जहाज़ सिले जाते हैं (पृष्ठ 126)।
इसी पन्ने पर किताब आगे भी पूछती है कि क्या ये तुलनाएँ वाजिब हैं और वर्णन कितना सटीक है। कक्षा में एक नारियल हो तो बच्चे उसे देखकर ख़ुद परखें।
पृष्ठ 127 — “स्थापत्य के कौन से अभिलक्षणों पर इब्न बतूता ने ध्यान दिया? चित्र 5.8 तथा 5.9 से इस वर्णन की तुलना कीजिए।” (स्रोत 8)
नमूना उत्तर — स्रोत 8 में इब्न बतूता दिल्ली की प्राचीर, द्वारों और क़ब्रगाह को बारीकी से देखता है:
- प्राचीर: दीवार की चौड़ाई ग्यारह हाथ है, और किताब कोष्ठक में बताती है कि एक हाथ लगभग 20 इंच के बराबर है। दीवार के भीतर रात्रि के पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष हैं, सामान रखने के भंडारगृह हैं, और खिड़कियाँ शहर की ओर खुलती हैं।
- सामग्री और मीनारें: प्राचीर का निचला भाग पत्थर का है और ऊपरी भाग ईंटों का; इसमें पास-पास बनी कई मीनारें हैं।
- द्वार: शहर के अट्ठाईस द्वार हैं, जिन्हें दरवाज़ा कहा जाता है; इनमें बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल है।
- क़ब्रगाह: क़ब्रों के ऊपर गुंबद बने हैं, और जिन पर गुंबद नहीं है उन पर मेहराब है (पृष्ठ 127)।
- चित्रों से तुलना: चित्र 5.8 “तुग़लक़ाबाद, दिल्ली का एक मेहराब” है और चित्र 5.9 “बस्ती की किलेबंदी की दीवार का एक हिस्सा” (पृष्ठ 127)। इनमें देखिए कि दीवार कितनी मोटी लगती है, उस पर मीनार जैसे बुर्ज हैं या नहीं, और मेहराब का आकार कैसा है।
बच्चे दो सूचियाँ बनाएँ: जो बातें वर्णन और चित्र, दोनों में दिखती हैं, और जो केवल वर्णन में हैं।
पृष्ठ 128 — “अपने वर्णन में इब्न बतूता ने इन गतिविधियों को उजागर क्यों किया?” (स्रोत 9)
नमूना उत्तर — यह सवाल दौलताबाद के गायकों के बाज़ार ताराबबाद के बारे में है; यही सवाल स्रोत 9 के अंत में भी छपा है:
- बाज़ार में क्या होता था: हर दुकान के बीच में एक झूला था जिस पर गायिका बैठती थी, और हर गुरुवार सुबह की इबादत के बाद बाज़ार के बीच के गुंबद में गायिकाएँ गाती और नाचती थीं (पृष्ठ 128)।
- बाज़ार केवल लेन-देन की जगह नहीं: किताब कहती है कि बाज़ार “सामाजिक तथा आर्थिक गतिविधियों के केंद्र भी थे”; अधिकांश बाज़ारों में एक मस्जिद और एक मंदिर होता था, और कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए स्थान भी चिह्नित थे (पृष्ठ 128)।
- शासक भी आते थे: स्रोत 9 के अनुसार एक हिंदू शासक बाज़ार से गुज़रते समय गुंबद में उतरकर आता था और गायिकाएँ उसके सामने गाती थीं; कई मुस्लिम शासक भी ऐसा ही करते थे (पृष्ठ 128)।
- उसका स्वभाव: इब्न बतूता ने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया था जिसने उसे अपने अनूठेपन के कारण प्रभावित और उत्सुक किया (पृष्ठ 130)।
हमारी ओर से: गायकों का पूरा एक बाज़ार, जिसमें शासक भी रुकते थे, उसे शायद ऐसा ही अनूठा लगा, इसलिए उसने इसे विस्तार से लिखा।
पृष्ठ 129 — “क्या आपको लगता है कि पैदल डाक व्यवस्था पूरे उपमहाद्वीप में संचालित की जाती होगी?” (स्रोत 10)
नमूना उत्तर — किताब यह नहीं बताती कि यह व्यवस्था कहाँ-कहाँ चलती थी, इसलिए उत्तर अनुमान है और उसकी भाषा “होगा” वाली रहेगी:
- किताब क्या बताती है: पैदल डाक, यानी दावा, के प्रति मील तीन अवस्थान होते थे, जहाँ लोग तैयार बैठे रहते थे; हर धावक पत्र लेकर अगले दावा तक दौड़ता था। इसका प्रयोग अकसर खुरासान के फल लाने के लिए होता था (स्रोत 10, पृष्ठ 129)।
- किताब के मार्ग: सराय और विश्राम गृह लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर थे, और जहाँ सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे, वहीं गुप्तचरों की ख़बरें डाक से मात्र पाँच दिनों में सुलतान तक पहुँच जाती थीं (पृष्ठ 129)।
- हमारी ओर से — कितने लोग लगते: हर मील पर तीन अवस्थान और उन पर बैठे लोग; पूरे उपमहाद्वीप में ऐसा जाल बनाने के लिए बहुत बड़ी संख्या में लोग चाहिए होते।
इसलिए शायद यह व्यवस्था मुख्य मार्गों पर ही चलती होगी। जो बच्चा “हाँ” कहे, उससे भी कारण पूछिए; किताब की बातों से जुड़ा हर तर्क मान्य है।
पृष्ठ 131 — “बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?” (स्रोत 11)
नमूना उत्तर — पहले भाग का उत्तर स्रोत 11 में है, दूसरे का उसके नीचे छपे अनुच्छेद में:
- ज़मीन और आबादी: कई ग्रामीण अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत हैं; खेती अच्छी नहीं और आबादी कम है; श्रमिकों के अभाव में कृषियोग्य भूमि का बड़ा हिस्सा बिना खेती के रह जाता है।
- शासन का बर्ताव: कई श्रमिक गवर्नरों के बुरे व्यवहार से मर जाते हैं; लोभी स्वामियों की माँगें पूरी न कर पाने पर ग़रीबों से जीवन-निर्वहन के साधन छिन जाते हैं, और उनके बच्चों को दास बनाकर ले जाया जाता है।
- नतीजा: “इस अत्यंत निरंकुशता से हताश हो किसान गाँव छोड़कर चले जाते हैं” (पृष्ठ 131)।
- उसका पक्ष: बर्नियर भूमि पर राजकीय स्वामित्व को राज्य और उसके निवासियों, दोनों के लिए हानिकारक मानता था (पृष्ठ 130)। किताब कहती है कि वह चाहता था कि उसका विवरण यूरोप में निजी स्वामित्व की “अच्छाइयों” को न मानने वालों के लिए चेतावनी का कार्य करे (पृष्ठ 131)।
इस तरह का दुख भरा चित्र उसके पक्ष को सुदृढ़ करता। पर किताब यह भी कहती है कि “ग्रामीण समाज का यह चित्रण सच्चाई से बहुत दूर था” (पृष्ठ 132)।
पृष्ठ 132 — “बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है? जब आप अध्याय 8 तथा 9 पढ़ लें, तब आप इस विवरण पर फिर आइएगा और फिर इसका आकलन कीजिएगा।” (स्रोत 12)
नमूना उत्तर — स्रोत 12 यूरोप के शासकों के लिए चेतावनी है: अगर उन्होंने मुग़ल ढाँचे का अनुसरण किया, तो क्या होगा:
- राज्य: उनके राज्य इतने अच्छी तरह जुते, बसे और समृद्ध नहीं रह जाएँगे।
- राजा: वे जल्द ही “रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा बनकर रह जाएँगे”।
- शहर और खेत: बड़े शहर खराब हवा के कारण रहने योग्य नहीं रहेंगे, उनके जीर्णोद्धार की किसी को चिंता नहीं होगी, और खेत झाड़ियों और घातक दलदल से भर जाएँगे (पृष्ठ 132)।
यानी वह भविष्य का एक डरावना दृश्य खींचकर अपनी बात मनवाना चाहता है। दूसरा भाग अभी के लिए नहीं है: अध्याय 8 और 9 पढ़ने के बाद बच्चे इस पन्ने पर लौटें और वहाँ के साक्ष्य से इसे परखें।
पृष्ठ 133 — “इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?” (स्रोत 13)
नमूना उत्तर — दोनों उद्धरण बर्नियर के हैं, पर तस्वीरें लगभग उलटी हैं:
- भूमि: स्रोत 11 में रेतीली भूमि और बंजर पर्वत (पृष्ठ 131); स्रोत 13 में देश के विस्तृत भू-भाग का अधिकांश भाग अत्यधिक उपजाऊ, और बंगाल चावल, मकई और रेशम, कपास, नील जैसी वस्तुओं में मिस्र से भी आगे (पृष्ठ 133)।
- आबादी और खेती: स्रोत 11 में आबादी कम और भूमि बिना खेती के; स्रोत 13 में कई भाग ऐसे जहाँ जनसंख्या पर्याप्त है और खेती अच्छी होती है।
- शिल्प और धन: स्रोत 11 में गाँव छोड़ते किसान; स्रोत 13 में शिल्पकार गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने-चाँदी के वस्त्र और रेशमी-सूती कपड़े बनाते हैं जो विदेश भी जाते हैं, और सोना-चाँदी भारत में आकर “कुछ हद तक खो जाता है” (पृष्ठ 133)।
इसी अंतर के कारण किताब कहती है कि उसके विवरण “कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं” (पृष्ठ 133)।
पृष्ठ 134 — “बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालाँकि हर तरफ़ बहुत सक्रियता है पर उन्नति बहुत कम?” (स्रोत 14)
नमूना उत्तर — स्रोत 14 में वह राजकीय कारखानों की व्यस्तता और ठहराव, दोनों एक साथ दिखाता है:
- सक्रियता: अलग-अलग कक्षों में कसीदाकार एक मास्टर के निरीक्षण में, सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी, जूते बनाने वाले, और रेशम, जरी और महीन मलमल का काम करने वाले। शिल्पकार हर सुबह आते हैं और पूरे दिन काम करते हैं।
- उन्नति नहीं: शाम को सब घर चले जाते हैं, और “इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है”; कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार नहीं चाहता जिनमें वह पैदा हुआ था (पृष्ठ 134)।
- कारण, उसके अनुसार: शिल्पकारों के पास अपने उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था (पृष्ठ 133)।
यानी लंबी व्यस्त सूची के बाद “निश्चेष्ट” जैसा एक शब्द रखकर वह यह छाप छोड़ता है।
पृष्ठ 136 — “यहाँ यातायात के कौन–कौन से साधन अपनाए गए हैं?” (चित्र 5.13)
नमूना उत्तर — चित्र 5.13 “मथुरा से मूर्ति का एक नमूना जिसमें यात्री दर्शाए गए हैं” (पृष्ठ 136)। उत्तर चित्र को देखकर बनेगा:
- क्या देखें: कौन घोड़े पर सवार है, कौन हाथी पर, कौन पहियों वाली ढकी गाड़ी में बैठा है, और कौन पैदल।
- अध्याय से जोड़ें: अध्याय में कारवाँ, जहाज़ और नाव, अश्व डाक के घोड़े और पैदल धावक, सबका ज़िक्र है; देखिए इनमें से क्या मूर्ति में भी है।
बच्चे जो साधन पहचानें, उनकी सूची बनाएँ और हर एक के आगे लिखें कि वह चित्र में कहाँ दिखा।
सावधानी
- जाति किताब के शब्दों में: अल–बिरूनी का जाति का विवरण संस्कृत ग्रंथों से बना था, जिनमें “ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से” नियम लिखे गए थे, और किताब साथ ही कहती है: “लेकिन वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी।” (पृष्ठ 125)। किसी गतिविधि में जातियों को ऊँचा या नीचा मत लगवाइए, और किसी बच्चे से उसकी जाति मत पूछिए। तुलना स्रोतों की हो, कक्षा में बैठे लोगों की नहीं।
- दास प्रथा और सती (पृष्ठ 135): किताब के शब्दों से आगे मत जाइए। किताब बताती है कि बाज़ारों में दास “किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे और नियमित रूप से भेंटस्वरूप दिए जाते थे”, और बर्नियर ने लिखा कि “कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था।” दास की बिक्री या सती का अभिनय कभी मत करवाइए, और स्रोत 16 का दृश्य बच्चों से दोहरवाइए मत। चर्चा इस पर रखिए कि बर्नियर ने यह विषय क्यों चुना: यूरोपीय लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव “पश्चिमी तथा पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था”।
- पूर्व और पश्चिम: “अपविकसित” पूर्व बर्नियर की नज़र है, किताब का फ़ैसला नहीं। किताब उसके दावों को परखती है: एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ राज्य को भूमि का एकमात्र स्वामी नहीं बताता, ग्रामीण समाज का उसका चित्रण “सच्चाई से बहुत दूर था” (पृष्ठ 132), और शिविर नगर वाला चित्रण भी “अतिसरलीकृत” था (पृष्ठ 134)। कक्षा में पूर्व और पश्चिम को ऊँचा या नीचा मत ठहरवाइए। सवाल यह रखिए कि बर्नियर ने ऐसा क्यों देखा; किताब कारण देती है कि वह भारत में देखी हर बात की तुलना “सामान्य रूप से यूरोप और विशेष रूप से फ्रांस” की स्थितियों से करता था (पृष्ठ 130)।
- अल–बिरूनी कहाँ से आया: बच्चे पृष्ठ 115 की पंक्ति पढ़कर पूछेंगे। उत्तर पृष्ठ 116 से दीजिए: “अल–बिरूनी का जन्म आधुनिक उज़्बेकिस्तान में स्थित ख़्वारिज़्म में सन् 973 में हुआ था।” पूरी बात ऊपर भूल 1 में है।
- रज़्ज़ाक का मंदिर (पृष्ठ 129): रज़्ज़ाक के विवरण में मूर्ति की आँखों में माणिक हैं। हिंदी किताब में “काले रंग के माणिक” छपा है, जबकि अंग्रेज़ी किताब में यही माणिक लाल हैं। उत्तर में रंग ज़रूरी नहीं; बच्चा किताब का शब्द लिखे तो उसे ग़लत मत मानिए।
- मानचित्र 1 (पृष्ठ 120): मानचित्र पर ही लिखा है “पैमाना नहीं दिया गया है।” यह रास्ते का रेखाचित्र है, इसलिए इससे दूरियाँ मत नपवाइए।
- अनुमान वाली बातें: जहाँ किताब पक्का नहीं कहती, उत्तर में भी वही शब्द रहें: अल–बिरूनी की यात्राओं के लिए “प्रतीत होता है” (पृष्ठ 116), इब्न बतूता के लिए “हो सकता है वह रूस भी गया हो” (पृष्ठ 120), सिंध से दिल्ली “लगभग पचास दिन” (पृष्ठ 119), और बर्नियर के लिए “संभवत: बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है” (पृष्ठ 134)।
- हमारी ओर से — बोर्ड साझा है, इसलिए तीन यात्रियों वाला चार्ट और पृष्ठ 137 की काल-रेखा चार्ट पेपर पर बनाकर दीवार पर रखिए। प्रोजेक्टर न हो तो चित्र किताब में ही खुलवाइए; हर चित्र का नंबर बोर्ड पर लिख दीजिए।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- तीन यात्री: अल–बिरूनी (जन्म ख़्वारिज़्म में, सन् 973), इब्न बतूता (मोरक्को से; 1332–33 में भारत की ओर चला) और बर्नियर (फ्रांस से; 1656 से 1668 तक भारत में)। (पृष्ठ 116, 118, 122)
- अल–बिरूनी की किताब–उल–हिन्द अरबी में है और अस्सी अध्यायों में बँटी है; वह “लगभग पूरी तरह से ब्राह्मणों द्वारा रचित कृतियों पर आश्रित रहा”, फिर भी उसने अपवित्रता की मान्यता को अस्वीकार किया। (पृष्ठ 117, 124–125)
- इब्न बतूता पुस्तकों के स्थान पर यात्राओं के अनुभव को ज्ञान का अधिक महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था, और उसने हर उस चीज़ का वर्णन करने का निश्चय किया जिसने उसे “अपने अनूठेपन के कारण” प्रभावित किया, जैसे नारियल, पान, शहर, बाज़ार और डाक। (पृष्ठ 118, 126–130)
- बर्नियर को “यह लगा” कि मुग़ल साम्राज्य में सम्राट सारी भूमि का स्वामी था; पर एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा नहीं कहता, और ग्रामीण समाज का उसका चित्रण “सच्चाई से बहुत दूर था”। (पृष्ठ 130, 132)
- बर्नियर के विवरण “कभी–कभी एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं”, और “शिविर नगर” वाला उसका चित्रण अतिसरलीकृत था: वास्तव में सभी प्रकार के नगर अस्तित्व में थे। (पृष्ठ 133–134)
- महिलाएँ: बाज़ारों में दास खुले आम बेचे और भेंट में दिए जाते थे; सती के बारे में बर्नियर लिखता है कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगाती थीं और अन्य को बाध्य किया जाता था; महिलाओं का श्रम कृषि और उसके अलावा के उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था; और यात्री वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम “अनछुए रह जाते हैं”। (पृष्ठ 135–136)
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़।