अध्याय 5 — यात्रियों के नज़रिए · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2 · कक्षा 12
कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 115 से 139
यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के बाद एक लिखी हैं, हर एक के नीचे शिक्षक के लिए एक टिप्पणी के साथ। उद्धरण-चिह्न में सिर्फ़ किताब के शब्द हैं; जहाँ हमारी ओर से लिखा है, वह बात हमारी अपनी है। प्रोजेक्टर न हो तो यही पाठ पढ़कर, बोर्ड और चार्ट पेपर से कक्षा चल सकती है; हर कालांश का पूरा क्रम पाठ योजना में है।
बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।
कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:
- कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1: शुरुआत; अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द
- कालांश 2 — भाग 2: इब्न बतूता का रिह्ला, मानचित्र 1
- कालांश 3 — भाग 3: फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक
- कालांश 4 — भाग 4: एक अपरिचित संसार की समझ
- कालांश 5 — भाग 5: इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा
- कालांश 6 — भाग 6: बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व; भूमि स्वामित्व का प्रश्न
- कालांश 7 — भाग 7: एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई
- कालांश 8 — भाग 8: महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक
- कालांश 9 — काल-रेखा वाला भाग: काल-रेखा, मानचित्र कार्य, और पहले दिन की पर्चियाँ
- कालांश 10 — आख़िरी भाग: मूल्यांकन, अभ्यास के 12 प्रश्न
पहले यह पढ़िए — बाहर की नज़र
पृष्ठ 115–116
हमारी ओर से: बाहर से आया यात्री किसी जगह के बारे में ऐसा क्या देख लेता है जो वहाँ रहने वाले नहीं देखते, और वह कहाँ ग़लत समझ सकता है? यह सवाल पूरे अध्याय में साथ चलेगा।
किताब पृष्ठ 116 पर बताती है कि बाहर से आए यात्री रोज़ की उन बातों पर ध्यान देते थे जिन्हें यहाँ के लेखक दर्ज करने लायक़ नहीं समझते थे। पहले दिन बच्चे इस सवाल पर अपनी समझ से दो पंक्तियाँ लिखेंगे।
बाहर से आया यात्री किसी जगह के बारे में ऐसा क्या देख लेता है जो वहाँ रहने वाले नहीं देखते, और वह कहाँ ग़लत समझ सकता है? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।
अध्याय का नक्शा
पृष्ठ 115 से 139 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से
- पहले तीन यात्री, एक-एक करके: अल–बिरूनी, इब्न बतूता और फ्रांस्वा बर्नियर; वे कौन थे और उनके वृत्तांत कैसे लिखे गए
- फिर वही तीनों दोबारा: उन्होंने जो देखा, उसे कैसे समझा
- अल–बिरूनी: भाषा, धर्म और अभिमान के अवरोध, और ग्रंथों से जाति व्यवस्था की समझ
- इब्न बतूता: नारियल, पान, शहर, बाज़ार और डाक
- बर्नियर: भूमि स्वामित्व पर उसकी राय, और उसी के विवरण में एक अधिक जटिल सच्चाई
- आख़िर में वृत्तांतों में महिलाएँ: दासियाँ, सती और श्रमिक
हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 9 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वे लौटाई जाएँगी।
1 | शुरुआत: यात्री और उनके वृत्तांत; 1. अल–बिरूनी तथा किताब–उल–हिन्द (1.1-1.2)
अपने घर की कौन-सी रोज़ की बातें आप कभी नहीं लिखेंगे, पर बाहर से आया मेहमान ज़रूर लिख लेगा?
दो तरह के लेखक
पृष्ठ 116
यहाँ के लेखक
- रोज़ के जीवन की बातें उन्हें सामान्य लगती थीं
- इसलिए उन्होंने उन्हें वृत्तांतों में दर्ज नहीं किया
बाहर से आए यात्री
- उन्होंने इन्हीं बातों पर ध्यान दिया
- और उन्हें अपने वृत्तांतों में दर्ज किया
किताब का वाक्य बोर्ड पर लिखिए: “देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।” पहले बच्चों से पूछिए कि घर का खाना या बाज़ार का दिन वे कभी लिखते हैं या नहीं।
तीन यात्री
पृष्ठ 115–116
| यात्री | कहाँ से | कब |
|---|---|---|
| अल–बिरूनी | ख़्वारिज़्म, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है | ग्यारहवीं शताब्दी |
| इब्न बतूता | मोरक्को | चौदहवीं शताब्दी |
| फ्रांस्वा बर्नियर | फ्रांस | सत्रहवीं शताब्दी |
यह तालिका चार्ट पेपर पर बनाइए और कक्षा में टाँग दीजिए। हर नए यात्री के साथ इसमें एक-एक बात जुड़ती जाएगी, जैसे ज्ञान का स्रोत और भारत में बिताया समय।
अल–बिरूनी: ख़्वारिज़्म से ग़ज़नी
पृष्ठ 116
- जन्म सन् 973 में ख़्वारिज़्म में, जो आज के उज़्बेकिस्तान में है
- सीरियाई, फ़ारसी, हिब्रू और संस्कृत समेत कई भाषाएँ जानता था; यूनानी नहीं जानता था, इसलिए प्लेटो जैसे दार्शनिकों की कृतियाँ अरबी अनुवादों में पढ़ीं
- 1017 ई. में सुल्तान महमूद ने ख़्वारिज़्म पर आक्रमण किया और अल–बिरूनी को बंधक बनाकर ग़ज़नी ले आया, जहाँ वह अपनी मृत्यु तक रहा
- ग़ज़नी में भारत में उसकी रुचि बढ़ी; उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताकर संस्कृत सीखी
अनुवाद दोनों दिशाओं में हुए: पतंजलि का व्याकरण उसने अरबी में अनूदित किया, और यूक्लिड के कार्य अपने ब्राह्मण मित्रों के लिए संस्कृत में। मानचित्र पर उज़्बेकिस्तान दिखाइए।
किताब–उल–हिन्द
पृष्ठ 116–117
| बात | किताब में |
|---|---|
| भाषा | अरबी; सरल और स्पष्ट |
| आकार | अस्सी अध्याय |
| विषय | धर्म और दर्शन, त्योहार, खगोल–विज्ञान, कीमिया, रीति–रिवाज और प्रथाएँ, सामाजिक–जीवन, भार–तौल और मापन विधियाँ, मूर्तिकला, कानून, मापतंत्र विज्ञान आदि |
| हर अध्याय की बनावट | “सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं)”: एक प्रश्न, फिर संस्कृतवादी परंपराओं पर आधारित वर्णन, फिर दूसरी संस्कृतियों से तुलना |
| “हिंदू” शब्द | लगभग छठी–पाँचवीं शताब्दी ईसा पूर्व के एक प्राचीन फ़ारसी शब्द से निकला, जो सिंधु नदी के पूर्व के क्षेत्र के लिए था; तब यह धार्मिक पहचान का द्योतक नहीं था |
पृष्ठ 116 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “अल–बिरूनी की कृति का अंश पढ़िए (स्रोत 5) तथा चर्चा कीजिए कि क्या यह कृति इन उद्देश्यों को पूरा करती है।”
नमूना उत्तर — काफ़ी हद तक, पर ग्रंथों की सीमा के साथ। स्रोत 1 में उसके दो उद्देश्य हैं: हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता, और उनसे जुड़ना चाहने वालों के लिए सूचना का संग्रह।
- जो पूरा होता है: स्रोत 5 चार वर्णों का क्रम, ग्रंथों के अनुसार उनकी उत्पत्ति, और यह बताता है कि वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुलकर रहते हैं। बाहर के पाठक के लिए यह काम की सूचना है।
- जो कमी रह जाती है: यह जानकारी ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे संस्कृत ग्रंथों पर टिकी है, इसलिए असल जीवन की तसवीर अधूरी रहती है। यह बात कालांश 4 में फिर आएगी।
2 | 2. इब्न बतूता का रिह्ला (2.1-2.2), मानचित्र 1
बाईस वर्ष का एक युवक बिना किसी साथी या कारवाँ के घर से निकल पड़े, तो रास्ते में उसे किन बातों का डर होगा?
इब्न बतूता कौन था
पृष्ठ 118
- मोरक्को के तैंजियर का एक सम्मानित और शिक्षित परिवार, जो इस्लामी कानून यानी शरिया की विशेषज्ञता के लिए प्रसिद्ध था
- वह पुस्तकों की जगह यात्राओं से मिले अनुभव को ज्ञान का ज़्यादा महत्त्वपूर्ण स्रोत मानता था
- भारत आने से पहले मक्का की तीर्थ यात्राएँ, और सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय बंदरगाहों की यात्राएँ
- 1333 में मध्य एशिया के रास्ते स्थलमार्ग से सिंध पहुँचा, फिर मुल्तान और उच्छ होकर दिल्ली
स्रोत 2 में तैंजियर से अपने निकलने के बारे में वह लिखता है: “उस समय मेरी उम्र बाईस वर्ष थी।” विश्व के मानचित्र पर यह क्रम उँगली से दिखाइए, और तीन यात्रियों वाले चार्ट में उसकी पंक्ति में जोड़िए: ज्ञान का स्रोत, यात्रा का अनुभव।
दिल्ली से चीन की ओर
पृष्ठ 118–119
| बात | किताब में |
|---|---|
| दिल्ली में | सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक ने उसे दिल्ली का क़ाज़ी या न्यायाधीश बनाया |
| कारागार | कई वर्ष बाद वह सुल्तान का विश्वास खो बैठा और कारागार में डाला गया |
| दूत | ग़लतफ़हमी दूर होने पर 1342 ई. में सुल्तान ने उसे अपने दूत के रूप में चीन के मंगोल शासक के पास जाने का आदेश दिया |
| मालद्वीप | रास्ते में अठारह महीने वहाँ क़ाज़ी रहा |
| घर वापसी | 1347 में लौटने का निश्चय; 1354 में घर पहुँचा, यात्रा आरंभ करने के लगभग तीस वर्ष बाद |
फिर किताब का मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) खोलिए और लाल रेखा पर जगहें क्रम से पढ़वाइए: लाहरी, ऊजा, मुल्तान, अजुदाहन, अबुहर, सरसती, हंसी, देहली। यह एक रेखाचित्र है और इस पर पैमाना नहीं दिया गया है, इसलिए इससे दूरी मत निकलवाइए।
रास्ते की मुश्किलें
पृष्ठ 119
| मुश्किल | किताब में |
|---|---|
| लंबे रास्ते | मुल्तान से दिल्ली चालीस दिन; सिंध से दिल्ली लगभग पचास दिन |
| डाकू | मुल्तान से दिल्ली के रास्ते कारवाँ पर हमला; कई साथी यात्री मारे गए, जो बचे वे बुरी तरह घायल हुए |
| बीमारी | पहले ज्वर, फिर कमज़ोरी; गिरने से बचने के लिए उसने पगड़ी का कपड़ा ज़ीन से बाँध लिया |
| अकेलापन | ट्यूनिस में किसी ने उसका अभिवादन नहीं किया; वह “बहुत रोया” |
पृष्ठ 119 का किनारे का प्रश्न पूछिए; बच्चे अपनी किताब में चित्र 5.4 देखें: “आपके मत में कुछ यात्रियों के हाथों में हथियार क्यों हैं?”
नमूना उत्तर — चित्र 5.4 बंगाल के एक मंदिर की मृण मूर्तिकला है (लगभग सत्रहवीं–अठारहवीं शताब्दियाँ), जिसमें नाव में यात्री हैं।
- रास्ते असुरक्षित थे: किताब के अनुसार यात्रा कठिन और जोखिम भरी थी, और इब्न बतूता ने कई बार डाकुओं के समूहों के हमले झेले।
- कारवाँ भी सुरक्षित नहीं था: साथियों के साथ कारवाँ में चलने पर भी मुल्तान से दिल्ली के रास्ते उसके कारवाँ पर हमला हुआ।
इसलिए शायद यात्री अपनी और अपने सामान की रक्षा के लिए हथियार साथ रखते थे।
रिह्ला कैसे लिखा गया
“जिसने मस्तिष्क को मनोरंजन तथा कान और आँख को प्रसन्नता दी।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 121 (स्रोत 3)
मोरक्को लौटने पर वहाँ के शासक ने निर्देश दिया कि उसकी कहानियाँ दर्ज की जाएँ, और इब्न जुज़ाई ने उसके बोले हुए वृत्तांत लिखे; यह वाक्य उसी कथानक के बारे में है। फिर पृष्ठ 121 की चर्चा पूछिए: “आपके विचार में अल–बिरूनी और इब्न बतूता के उद्देश्य किन मायनों में समान/भिन्न थे?”
नमूना उत्तर — दोनों ने उपमहाद्वीप के बारे में लिखा, पर दोनों के उद्देश्य और तरीक़े अलग थे।
- अल–बिरूनी: स्रोत 1 में उसका उद्देश्य हिंदुओं से धार्मिक विषयों पर चर्चा करने वालों की सहायता करना और सूचना का संग्रह देना है। इसके लिए उसने संस्कृत सीखी और ग्रंथ पढ़े।
- इब्न बतूता: वह पुस्तकों से ज़्यादा यात्रा के अनुभव को ज्ञान का स्रोत मानता था, और उसका वृत्तांत शासक के निर्देश पर सुनाने लायक़ कथानक के रूप में लिखा गया।
- समानता: दोनों बाहर से आए, और अपनी जानी-पहचानी दुनिया से तुलना करते हुए नई दुनिया का वर्णन करते रहे।
यानी एक का ज़ोर समझाने पर था, दूसरे का दिखाने और सुनाने पर।
3 | 3. फ्रांस्वा बर्नियर : एक विशिष्ट चिकित्सक (3.1)
अगर आप हर नई जगह को अपने गाँव से तौलें, तो उस जगह के बारे में आपकी राय कैसी बनेगी?
बर्नियर कौन था
पृष्ठ 122
- लगभग 1500 ई. में पुर्तगालियों के आने के बाद उनमें से कई ने भारतीय रीति-रिवाजों और धार्मिक प्रथाओं पर विस्तृत वृत्तांत लिखे; 1600 ई. के बाद डच, अंग्रेज़ और फ्रांसीसी यात्री बढ़े
- फ्रांस्वा बर्नियर फ्रांस का चिकित्सक, राजनीतिक दार्शनिक और इतिहासकार था, जो कई और लोगों की तरह मुग़ल साम्राज्य में अवसरों की तलाश में आया
- वह 1656 से 1668 तक, बारह वर्ष, भारत में रहा
- पहले सम्राट शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र दारा शिकोह का चिकित्सक रहा, बाद में मुग़ल दरबार के एक आर्मीनियाई अमीर दानिशमंद ख़ान के साथ एक बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक के रूप में
1600 ई. के बाद आए यूरोपीय यात्रियों में से दो और नाम बोर्ड पर लिखिए: फ्रांसीसी जौहरी ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर, जो कम से कम छह बार भारत आया, और इतालवी चिकित्सक मनूकी, जो यूरोप नहीं लौटा और भारत में ही बस गया।
बर्नियर की तुलना
“लगभग प्रत्येक दृष्टांत में बर्नियर ने भारत की स्थिति को यूरोप में हुए विकास की तुलना में दयनीय बताया।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 122
यह किताब बर्नियर की राय बता रही है, अपनी नहीं; किताब यहीं यह भी कहती है कि उसका आकलन हमेशा सटीक नहीं था। उसने अपनी प्रमुख कृति फ्रांस के शासक को समर्पित की, और उसके कई कार्य प्रभावशाली अधिकारियों और मंत्रियों को लिखे पत्रों के रूप में थे।
वृत्तांत कैसे फैले
पृष्ठ 123
| किसके वृत्तांत | कैसे फैले |
|---|---|
| बर्नियर | फ्रांस में 1670–71 में छपे; अगले पाँच वर्षों में अंग्रेज़ी, डच, जर्मन और इतालवी में अनूदित; 1670 और 1725 के बीच फ्रांसीसी में आठ बार और 1684 तक अंग्रेज़ी में तीन बार दोबारा छपे |
| अरबी और फ़ारसी के वृत्तांत | हस्तलिपियों के रूप में फैले; 1800 से पहले सामान्यत: छपे नहीं |
बच्चों से पूछिए कि छपी किताब और हाथ से लिखी प्रति में से कौन-सी ज़्यादा लोगों तक पहुँचेगी।
नमूना उत्तर — छपी किताब, क्योंकि उसकी बहुत-सी प्रतियाँ एक साथ बन जाती हैं। ऊपर की तालिका यही दिखाती है: बर्नियर का वृत्तांत बार-बार छपा, जबकि अरबी और फ़ारसी वृत्तांत 1800 से पहले सामान्यत: छपे नहीं।
स्रोत 4: मुग़ल सेना के साथ यात्रा
पृष्ठ 123 (स्रोत 4)
- कश्मीर कूच में देश की प्रथा के अनुसार उससे “दो अच्छे तुर्कमान घोड़े देखने” की अपेक्षा की जाती थी, यानी उसे ऐसे दो घोड़े रखने होते थे
- साथ में एक फ़ारसी ऊँट और उसका चालक, साईस, खानसामा, और पानी का पात्र लेकर आगे चलने वाला सेवक
- “इस देश में नींबू के शरबत और दही से अधिक ताज़गी भरी वस्तु कोई नहीं मानी जाती।”
स्रोत के साथ छपा प्रश्न पूछिए: “बर्नियर द्वारा दी गई सूची में कौन सी वस्तुएँ हैं जो आज आप यात्रा में साथ ले जाएँगे?”
नमूना उत्तर — उत्तर हर बच्चे की अपनी पसंद पर है, पर चुनाव स्रोत 4 की सूची में से हो।
- सामान: औसत आकार का तंबू, दरी, बेतों से बना छोटा बिस्तर, तकिया, बिछौना, चमड़े के मेज़पोश, खाना बनाने के सामान के झोले, और पानी का पात्र।
- खाना-पीना: बढ़िया चावल, सौंफ की सुगंध वाली मीठी रोटी, नींबू और चीनी, और दही टाँगने का झोला।
जो चीज़ें चुनें, उनके साथ एक-एक कारण लिखिए कि आज की यात्रा में वे क्यों काम आएँगी।
4 | 4. एक अपरिचित संसार की समझ (4.1-4.2)
जिस भाषा में एक ही चीज़ के कई शब्द हों और एक ही शब्द कई चीज़ों के लिए, उसे बाहर से आया व्यक्ति कैसे समझेगा?
अल–बिरूनी के तीन अवरोध
पृष्ठ 124
| अवरोध | किताब में |
|---|---|
| भाषा | संस्कृत अरबी और फ़ारसी से इतनी भिन्न थी कि विचारों का एक भाषा से दूसरी में अनुवाद आसान नहीं था |
| धर्म | धार्मिक अवस्था और प्रथा में भिन्नता |
| अभिमान | तीसरा अवरोध उसने अभिमान को बताया |
पृष्ठ 125 की चर्चा पूछिए: “एक अन्य क्षेत्र से आए यात्री के लिए स्थानीय क्षेत्र की भाषा का ज्ञान कितना आवश्यक है?”
नमूना उत्तर — बहुत आवश्यक, यह अल–बिरूनी के अनुभव से साफ़ है।
- पहला अवरोध भाषा: अल–बिरूनी ने समझने की बाधाओं में पहला अवरोध भाषा को माना।
- भाषा सीखने का फल: उसने संस्कृत सीखी, कई संस्कृत कृतियों का अरबी में अनुवाद किया, और किताब–उल–हिन्द लिख सका।
- भाषा की बारीकी: संस्कृत में एक ही वस्तु के कई शब्द, और एक शब्द के कई अर्थ होते हैं; भाषा जाने बिना ऐसी बारीकियाँ छूट जाती हैं।
भाषा न जानने वाला यात्री दूसरों के बताए पर निर्भर रहता है।
सुनी बात की जाँच
“ईश्वर ही जानता है!”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 124
पृष्ठ 124 के बॉक्स में अल–बिरूनी लकड़ी की एक मूर्ति की कहानी सुनाता है, जो कथित रूप से 216,432 वर्षों तक बची रही। वह पूछता है कि जहाँ हवा और मिट्टी काफ़ी आर्द्र हो, वहाँ लकड़ी इतने लंबे समय तक कैसे बची रही होगी। बच्चों से पूछिए कि उसने कहानी पर सवाल किस आधार पर उठाया।
नमूना उत्तर — तर्क के आधार पर: आर्द्र हवा और मिट्टी में लकड़ी इतने लंबे समय तक बची रहे, यह मानना कठिन है; इसलिए उसने सुनी हुई कहानी को आँख मूँदकर नहीं माना।
जाति व्यवस्था: तरीक़ा और सीमा
पृष्ठ 124–125
अल–बिरूनी ने कैसे समझाया
- दूसरे समुदायों में प्रतिरूप खोजे: प्राचीन फ़ारस में चार सामाजिक वर्ग थे
- इस्लाम में सब लोग समान माने जाते थे; भिन्नता केवल धार्मिकता के पालन में थी
- अपवित्रता की मान्यता को उसने प्रकृति के नियमों के विरुद्ध माना
उसकी सीमा
- वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा
- नियामक संस्कृत ग्रंथों में नियम ब्राह्मणों के दृष्टिकोण से लिखे गए थे
- वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था “इतनी भी कड़ी नहीं थी”
स्रोत 5 किताब से वैसा ही पढ़िए जैसा छपा है, और उसकी आख़िरी बात बोर्ड पर लिखिए: वर्गों में भिन्नता होने पर भी वे एक ही शहरों और गाँवों में मिल-जुलकर रहते हैं। फिर पृष्ठ 125 का किनारे का प्रश्न, जैसा छपा है: “अल-बिरूनी ने जो लिखा उसकी तुलना अध्याय 3 स्रोत 6 से कीजिए। क्या आप कुछ समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं? क्या आप को लगता है कि अल-बिरूनी भारतीय समाज के विषय में अपनी जानकारी और समझ के लिए केवल संस्कृत के ग्रंथों पर आश्रित रहा?”
नमूना उत्तर — काफ़ी हद तक ग्रंथों पर, पर केवल ग्रंथों पर नहीं।
- तुलना कैसे करें: अध्याय 3 का स्रोत 6 और इस अध्याय का स्रोत 5 साथ रखिए; दोनों में वर्णों की गिनती, उनकी उत्पत्ति की कथा और उनके बारे में कही बातें आमने-सामने लिखिए। जो मिलती हैं वे समानताएँ, जो नहीं मिलतीं वे भिन्नताएँ।
- ग्रंथों पर कितना आश्रित: किताब के अनुसार वह लगभग पूरी तरह ब्राह्मणों की रची कृतियों पर आश्रित रहा।
- पर केवल ग्रंथ नहीं: उसने ब्राह्मण पुरोहितों और विद्वानों के साथ कई वर्ष बिताए, और लगता है कि उसने पंजाब और उत्तर भारत के कई हिस्सों की यात्रा भी की।
इसलिए उसकी समझ ज़्यादातर ग्रंथों से बनी, पर उसमें विद्वानों से बातचीत और यात्रा का अनुभव भी जुड़ा था।
5 | 5. इब्न बतूता तथा अनजाने को जानने की उत्कंठा (5.1-5.3)
जिस चीज़ को आपके दोस्त ने कभी देखा ही न हो, जैसे नारियल, उसे आप सिर्फ़ शब्दों से कैसे समझाएँगे?
जो अपरिचित था
“जो भी कुछ अपरिचित था उसे विशेष रूप से रेखांकित किया जाता था।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 126
चौदहवीं शताब्दी तक पूरा उपमहाद्वीप एक ऐसे वैश्विक संचार तंत्र का हिस्सा था जो पूर्व में चीन से पश्चिम में उत्तर-पश्चिमी अफ़्रीका और यूरोप तक फैला था। किताब के अनुसार अपरिचित बातें इसलिए उभारी जाती थीं कि सुनने और पढ़ने वाले दूर के देशों के वृत्तांतों से पूरी तरह प्रभावित हों। इस भाग की हर स्लाइड इसी वाक्य से जुड़ती है।
नारियल और पान
पृष्ठ 126 (स्रोत 6 और 7)
नारियल (स्रोत 6)
- पेड़ “हू-बहू खजूर के वृक्ष जैसे दिखते हैं”
- फल मानव सिर जैसा: मानो दो आँखें और एक मुख, अंदर का भाग हरा होने पर मस्तिष्क जैसा, रेशा बालों जैसा
- रेशे से रस्सी बनती है, और लोहे की कीलों के बजाय जहाज़ सिले जाते हैं
पान (स्रोत 7)
- अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है
- कोई फल नहीं होता; केवल पत्तियों के लिए उगाया जाता है
- सुपारी जायफल जैसी; उसके छोटे टुकड़े चबाकर फिर पान की पत्तियों के साथ खाते हैं
किताब कहती है कि ये दोनों उपज इब्न बतूता के पाठकों के लिए “पूरी तरह से अपरिचित” थीं। नारियल और पान का पत्ता ला सकें, तो मेज़ पर रखिए। फिर पृष्ठ 126 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “किस तरह की तुलनाओं से इब्न बतूता अपने पाठकों को ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि नारियल देखने में कैसे होते हैं?”
नमूना उत्तर — वह दो तुलनाएँ करता है, और फिर उपयोग बताकर नारियल को असाधारण दिखाता है।
- पेड़ की तुलना: नारियल के पेड़ खजूर के पेड़ जैसे; अंतर बस इतना कि एक से काष्ठफल मिलता है और दूसरे से खजूर।
- फल की तुलना: फल मानव सिर से मेल खाता है: आँखें, मुख, मस्तिष्क और बाल, चारों की तुलना।
- असाधारण कैसे: रेशे से रस्सी बनती है, और उसी से जहाज़ सिले जाते हैं।
तुलना कितनी ठीक बैठती है, यह बच्चे असली नारियल देखकर ख़ुद जाँचें।
दिल्ली और बाज़ार
पृष्ठ 127–128 (स्रोत 8 और 9)
| बात | किताब में |
|---|---|
| शहर | घनी आबादी वाले और समृद्ध; बस कभी-कभी युद्धों और अभियानों से विध्वंस होता था |
| दिल्ली | इब्न बतूता के अनुसार भारत का सबसे बड़ा शहर; दौलताबाद (महाराष्ट्र में) आकार में दिल्ली को चुनौती देता था |
| दिल्ली की प्राचीर | दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी; निचला भाग पत्थर का, ऊपरी भाग ईंटों का; पास-पास बनी कई मीनारें |
| द्वार | अट्ठाईस द्वार, जिन्हें दरवाज़ा कहा जाता है; बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल |
| बाज़ार | ज़्यादातर में एक मस्जिद और एक मंदिर; कुछ में नर्तकों, संगीतकारों और गायकों के प्रदर्शन की जगह |
| दौलताबाद (स्रोत 9) | पुरुष और महिला गायकों का बाज़ार ताराबबाद; उसके बीच के गुंबद में हर गुरुवार सुबह की इबादत के बाद संगीतकारों के प्रमुख बैठते थे |
स्रोत 8 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “स्थापत्य के कौन से अभिलक्षणों पर इब्न बतूता ने ध्यान दिया?” बच्चे अपनी किताब में चित्र 5.8 और 5.9 से मिलाएँ।
नमूना उत्तर — शहर की प्राचीर, उसके द्वारों और क़ब्रगाह पर।
- प्राचीर: ग्यारह हाथ चौड़ी दीवार; भीतर पहरेदारों और द्वारपालों के कक्ष, और खाद्यसामग्री और हथियारों के भंडारगृह; निचला भाग पत्थर का और ऊपरी भाग ईंटों का; पास-पास बनी कई मीनारें।
- द्वार: अट्ठाईस द्वार; बदायूँ दरवाज़ा सबसे विशाल।
- क़ब्रगाह: क़ब्रों के ऊपर गुंबद, और जिन पर गुंबद नहीं, उन पर मेहराब।
किताब का प्रश्न आगे कहता है: “चित्र 5.8 तथा 5.9 से इस वर्णन की तुलना कीजिए।” चित्र 5.8 तुग़लक़ाबाद, दिल्ली का एक मेहराब है और चित्र 5.9 बस्ती की किलेबंदी की दीवार का एक हिस्सा। चित्रों में पत्थर का नुकीला मेहराबदार द्वार और गोल बुर्जों वाली लंबी किलेबंद दीवार दिखती है, जो वर्णन के प्राचीर, मीनारों और द्वारों से मेल खाती है; दीवार के भीतर के कक्ष और भंडारगृह, अट्ठाईस द्वार और ईंटों का ऊपरी भाग चित्रों में नहीं दिखते।
डाक की अनूठी प्रणाली
पृष्ठ 129 (स्रोत 10)
| बात | किताब में |
|---|---|
| सराय | लगभग सभी व्यापारिक मार्गों पर सराय और विश्राम गृह |
| डाक से क्या जाता था | दूर तक सूचना, उधार, और अल्प सूचना पर माल भी |
| उलुक | अश्व डाक: हर चार मील पर राजकीय घोड़े |
| दावा | पैदल डाक: प्रति मील तीन अवस्थान, यानी हर एक-तिहाई मील पर; यह अश्व डाक से अधिक तीव्र |
| कितनी तेज़ | “सिंध से दिल्ली की यात्रा में पचास दिन लगते थे”, पर गुप्तचरों की ख़बरें इस डाक से सुलतान तक मात्र पाँच दिनों में पहुँच जाती थीं |
बच्चे मानते हैं कि घोड़ा हमेशा तेज़ होगा; स्रोत 10 कहता है कि पैदल डाक ज़्यादा तेज़ थी। उसी स्रोत में आगे “हर तीन मील पर घनी आबादी वाला एक गाँव” भी छपा है, जो एक–तिहाई मील वाली बात से मेल नहीं खाता; अंग्रेज़ी किताब में यहाँ गाँव हर एक–तिहाई मील पर है। फिर पृष्ठ 129 की चर्चा पूछिए: “इब्न बतूता लोगों के लिए ऐसी वस्तुओं और स्थितियों के वर्णन की समस्या को कैसे हल करता था, जिनसे वे अनभिज्ञ थे और जिन्हें उन्होंने अनुभव नहीं किया था?”
नमूना उत्तर — अनजानी चीज़ को किसी जानी-पहचानी चीज़ से जोड़कर, और बारीक ब्योरे देकर।
- तुलना: नारियल का पेड़ खजूर जैसा, फल मानव सिर जैसा; पान अंगूर-लता की तरह उगाया जाता है, सुपारी जायफल जैसी।
- गिनती और माप: दिल्ली की दीवार ग्यारह हाथ चौड़ी, अट्ठाईस द्वार; घोड़ों की डाक हर चार मील पर।
- काम कैसे होता है: नारियल के रेशे से रस्सी; पान खाने का क्रम; घंटियों वाली छड़ लेकर एक दावा से अगले तक दौड़ता संदेशवाहक।
यानी उसने अनजाने को जाने-पहचाने से समझाया।
6 | 6. बर्नियर तथा “अपविकसित” पूर्व: 6.1 भूमि स्वामित्व का प्रश्न
अगर ज़मीन आपकी अपनी न हो और आप उसे अपने बच्चों को न दे सकें, तो क्या आप उस पर कुआँ खुदवाने में पैसा लगाएँगे?
बर्नियर की नज़र
पृष्ठ 130
- बर्नियर एक भिन्न बुद्धिजीवी परंपरा से था; भारत में जो देखता, उसकी तुलना यूरोप और ख़ास तौर पर फ्रांस से करता
- वह ख़ास तौर पर उन स्थितियों पर ध्यान देता जो उसे अवसादकारी लगीं
- उसका विचार नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करने का था
- उसके ग्रंथ ट्रैवल्स इन द मुग़ल एम्पायर में चित्रण द्वि-विपरीतता पर टिका है, जहाँ भारत यूरोप का “विपरीत” है
किताब के अनुसार उसने भिन्नताओं को पदानुक्रम में रखा, जिससे भारत पश्चिमी दुनिया को निम्न कोटि का लगे। इस भाग में बोर्ड पर हर बात के आगे बर्नियर के अनुसार लिखिए, ताकि बच्चे उसकी राय को किताब की बात न मान लें।
भूमि स्वामित्व: बर्नियर का तर्क
पृष्ठ 130–131 (स्रोत 11)
| कदम | बर्नियर के अनुसार |
|---|---|
| एक मूल भिन्नता | भारत में निजी भूस्वामित्व का अभाव; सम्राट सारी भूमि का स्वामी था और उसे अपने अमीरों में बाँटता था |
| इसलिए | भूधारक भूमि अपने बच्चों को नहीं दे सकते थे, इसलिए दूरगामी निवेश के प्रति उदासीन थे |
| इसलिए | “बेहतर” भूधारकों का वर्ग नहीं उभरा, जैसा पश्चिमी यूरोप में उभरा |
| नतीजा | कृषि का विनाश, किसानों का उत्पीड़न, और शासक वर्ग को छोड़ सबके जीवन स्तर में पतन |
किताब बताती है कि यह धारणा सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के अधिकांश यात्रियों में मिलती है। पृष्ठ 130 के बॉक्स का पेलसर्ट सत्रहवीं शताब्दी के आरंभिक दशकों में आया एक डच यात्री था, जो लोगों की व्यापक गरीबी देखकर बर्नियर की ही तरह अचंभित था। फिर स्रोत 11 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “बर्नियर के अनुसार उपमहाद्वीप में किसानों को किन-किन समस्याओं से जूझना पड़ता था? क्या आपको लगता है कि उसका विवरण उसके पक्ष को सुदृढ़ करने में सहायक होता?”
नमूना उत्तर — समस्याएँ कई थीं, और उसने उन्हें इस तरह चुना और जोड़ा कि उसका पक्ष मज़बूत हो।
- ज़मीन: कई ग्रामीण अंचल केवल रेतीली भूमि या बंजर पर्वत; खेती अच्छी नहीं, आबादी कम।
- श्रमिकों का अभाव: कृषियोग्य भूमि का बड़ा हिस्सा बिना खेती के रह जाता था; कई श्रमिक गवर्नरों के बुरे व्यवहार से मर जाते थे।
- लोभी स्वामी: माँग पूरी न कर पाने पर गरीबों से जीवन-निर्वहन के साधन छिन जाते थे, और उनके बच्चों को दास बनाकर ले जाया जाता था।
- नतीजा: इस निरंकुशता से हताश होकर किसान गाँव छोड़कर चले जाते थे।
हाँ, यह विवरण उसके पक्ष को मज़बूत करता, क्योंकि ज़्यादातर समस्याओं का कारण वह गवर्नरों और लोभी स्वामियों का बुरा व्यवहार बताता है, और अंत में इसे “अत्यंत निरंकुशता” कहता है; पर तसवीर एकतरफ़ा है, और उसी बर्नियर का बंगाल वाला वर्णन अगले कालांश में आएगा।
यूरोप को चेतावनी
“रेगिस्तान तथा निर्जन स्थानों के, भिखारियों तथा क्रूर लोगों के राजा”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 132 (स्रोत 12)
स्रोत 12 पढ़िए और उसका किनारे का प्रश्न पूछिए: “बर्नियर सर्वनाश के दृश्य का चित्रण किस प्रकार करता है? जब आप अध्याय 8 तथा 9 पढ़ लें, तब आप इस विवरण पर फिर आइएगा और फिर इसका आकलन कीजिएगा।”
नमूना उत्तर — यूरोप के शासकों को चेतावनी देकर: अगर उन्होंने मुग़ल ढाँचा अपनाया, तो उनके राज्यों का यही हाल होगा।
- राज्य अच्छी तरह जुते और बसे हुए, समृद्ध और फलते-फूलते नहीं रह जाएँगे।
- शासक ऊपर लिखे शब्दों वाले राजा बनकर रह जाएँगे।
- महान शहर “खराब हवा” के कारण रहने लायक़ नहीं रहेंगे और विनाश की स्थिति में होंगे; खेत झाड़ियों और “घातक दलदल” से भर जाएँगे।
पूरा आकलन अध्याय 8 और 9 के बाद कीजिए; अभी इतना कहिए कि यह बर्नियर की चेतावनी है, किसी जगह का देखा हुआ ब्योरा नहीं।
बर्नियर की बात और किताब की जाँच
पृष्ठ 132–133
बर्नियर से आगे बढ़ा विचार
- बर्नियर: मुग़ल साम्राज्य में सारी भूमि सम्राट की
- अठारहवीं शताब्दी में फ्रांसीसी दार्शनिक मॉन्टेस्क्यू: प्राच्य निरंकुशवाद
- उन्नीसवीं शताब्दी में कार्ल मार्क्स: एशियाई उत्पादन शैली
किताब की जाँच
- एक भी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ राज्य को भूमि का एकमात्र स्वामी नहीं बताता
- अकबर के काल का सरकारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल भूमि राजस्व को ‘राजत्व का पारिश्रमिक’ बताता है; किताब के अनुसार यह न लगान था, न भूमिकर, बल्कि उपज पर लगने वाला कर
- सोलहवीं और सत्रहवीं शताब्दी के असल ग्रामीण समाज में बड़े पैमाने पर विभेद था: बड़े ज़मींदार, बड़े और छोटे किसान, और भूमिविहीन श्रमिक
बायाँ खाना वह विचार है जो बर्नियर से शुरू होकर आगे बढ़ा; दायाँ खाना वह है जो किताब कहती है। लगान, भूमिकर और उपज पर कर का अंतर अध्याय 8 में विस्तार से आएगा।
7 | 6.3 एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई
एक ही लेखक एक पन्ने पर कहे कि सब कुछ गिर रहा है, और अगले पन्ने पर सोने-चाँदी के वस्त्र गिनाए, तो आप उसकी किस बात पर भरोसा करेंगे?
पतन की बात, समृद्धि के संकेत
पृष्ठ 133 (स्रोत 13)
पतन की बात
- शिल्पकारों के पास उत्पाद बेहतर बनाने का कोई प्रोत्साहन नहीं था, क्योंकि मुनाफ़ा राज्य ले लेता था
- इसलिए “उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था”
समृद्धि के संकेत
- पूरे विश्व से बहुमूल्य धातुएँ भारत आती थीं, क्योंकि उत्पादों का सोने और चाँदी के बदले निर्यात होता था
- लंबी दूरी के व्यापार से जुड़ा एक समृद्ध व्यापारिक समुदाय था
दोनों खाने बर्नियर के ही विवरण से हैं। फिर स्रोत 13 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “इस उद्धरण में दिया गया विवरण स्रोत 11 में दिए गए विवरण से किन मायनों में भिन्न है?”
नमूना उत्तर — स्रोत 11 उजाड़ की तसवीर है, जबकि स्रोत 13 उपजाऊपन, उत्पादन और व्यापार की।
- ज़मीन: स्रोत 11 में रेतीली भूमि और बंजर पर्वत; स्रोत 13 में देश के विस्तृत भू-भाग का अधिकांश भाग “अत्यधिक उपजाऊ” है, और बंगाल चावल, मकई, रेशम, कपास और नील में मिस्र से आगे है।
- लोग: स्रोत 11 में श्रमिकों का अभाव और गाँव छोड़ते किसान; स्रोत 13 में कई भाग जहाँ जनसंख्या पर्याप्त है और खेती अच्छी होती है।
- शिल्प और व्यापार: स्रोत 13 में गलीचे, ज़री, कसीदाकारी, सोने और चाँदी के वस्त्र, रेशम और सूती वस्त्र, जो देश में भी काम आते हैं और विदेश भी भेजे जाते हैं।
एक बात दोनों में एक-सी है: बर्नियर की अपनी राय। स्रोत 13 में भी वह शिल्पकार को “मूल रूप से आलसी” कहता है, जबकि उसी वाक्य में उसकी बनाई चीज़ें गिनाता है।
सत्रहवीं शताब्दी के शहर
पृष्ठ 134
| बात | किताब में |
|---|---|
| नगरों में आबादी | सत्रहवीं शताब्दी में लगभग पंद्रह प्रतिशत लोग नगरों में; यह औसतन उसी समय के पश्चिमी यूरोप के अनुपात से अधिक |
| बर्नियर की राय | “शिविर नगर”: राजकीय शिविर पर निर्भर नगर, जो दरबार के आने पर बनते और उसके चले जाने के बाद तेज़ी से पतनोन्मुख हो जाते |
| किताब की बात | यह भी एक अतिसरलीकृत चित्रण है; हर तरह के नगर थे: उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र, तीर्थ स्थान |
| व्यापारी | पश्चिमी भारत में समूह महाजन, उनका मुखिया सेठ; अहमदाबाद जैसे शहरों में सभी महाजनों का प्रतिनिधि नगर सेठ |
| व्यावसायिक वर्ग | कई राजकीय प्रश्रय पर, कई दूसरे संरक्षकों या भीड़भाड़ वाले बाज़ार में आम लोगों की सेवा से |
बच्चे अपनी किताब में चित्र 5.12 देखें: सोने का एक चम्मच जिसमें पन्ने और माणिक जड़े हैं, जिसे किताब मुग़लकालीन शिल्पकारों की खास दक्षता का अच्छा उदाहरण कहती है। पूछिए कि क्या यह चम्मच बर्नियर की इस बात से मेल खाता है कि “उत्पादन हर जगह पतनोन्मुख था”।
नमूना उत्तर — मेल नहीं खाता। इतनी बारीक कारीगरी दिखाती है कि कम से कम कुछ शिल्पकार ऊँचे दर्जे का काम कर रहे थे, और किताब भी कहती है कि बर्नियर के विवरण एक अधिक जटिल सामाजिक सच्चाई की ओर इशारा करते हैं।
राजकीय कारखाने
“इसी निश्चेष्ट नियमित ढंग से उनका समय बीतता जाता है”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 134 (स्रोत 14)
किताब कहती है कि संभवत: बर्नियर एकमात्र ऐसा इतिहासकार है जो राजकीय कारखानों की कार्यप्रणाली का विस्तृत विवरण देता है। स्रोत 14 पढ़िए और किनारे का प्रश्न पूछिए: “बर्नियर इस विचार को किस प्रकार प्रेषित करता है कि हालाँकि हर तरफ़ बहुत सक्रियता है पर उन्नति बहुत कम?”
नमूना उत्तर — पहले काम की भरमार दिखाकर, फिर उसे एक ठहरी हुई दिनचर्या बताकर।
- सक्रियता: कई जगह बड़े कक्ष, हर कक्ष में अलग काम: एक में कसीदाकार, जो एक मास्टर के निरीक्षण में काम करते हैं; फिर सुनार, चित्रकार, रोगन लगाने वाले, बढ़ई, खरादी, दर्जी और जूते बनाने वाले, और रेशम, जरी और महीन मलमल का काम करने वाले।
- उन्नति नहीं: शिल्पकार हर रोज़ सुबह आते, दिन भर काम करते और शाम को घर लौट जाते।
- उसका निष्कर्ष: “कोई भी जीवन की उन स्थितियों में सुधार करने का इच्छुक नहीं है जिनमें वह पैदा हुआ था।”
यह उसकी अपनी राय है, जो उसकी इस बात से जुड़ती है कि शिल्पकारों को कोई प्रोत्साहन नहीं था।
बर्नियर ने भारत की तुलना यूरोप से क्यों की
पृष्ठ 134 की चर्चा
- उसका उद्देश्य यूरोप के नीति-निर्माताओं और बुद्धिजीवी वर्ग को प्रभावित करना था
- वह यूरोप में राज्य और समाज पर चल रहे विवादों में भाग ले रहा था; भारत का विवरण वहाँ के पाठकों के लिए चेतावनी था
- यात्री सामान्यत: अनजानी चीज़ को अपनी जानी-पहचानी दुनिया से तौलते थे; अल–बिरूनी और इब्न बतूता भी तुलना करते थे
- पर उसकी तुलना बराबरी की नहीं थी: उसने भिन्नताओं को पदानुक्रम में रखा
पृष्ठ 134 की चर्चा पूछिए: “आपके विचार में बर्नियर जैसे विद्वानों ने भारत की यूरोप से तुलना क्यों की?” बच्चों के जवाब आने के बाद ही यह स्लाइड दिखाइए।
नमूना उत्तर — स्लाइड के चारों बिंदु। आख़िरी बिंदु सबसे ज़रूरी है: बर्नियर का विवरण पढ़ते समय यह पूछना चाहिए कि वह किसे क्या समझाना चाहता था।
8 | 7. महिलाएँ : दासियाँ, सती तथा श्रमिक
अगर किसी ज़माने के सारे विवरण सिर्फ़ पुरुषों ने लिखे हों, तो उनमें महिलाओं के जीवन की कौन-सी बातें छूट सकती हैं?
लिखने वाले कौन थे
पृष्ठ 135
- जिन यात्रियों ने वृत्तांत छोड़े, वे सामान्यतया पुरुष थे
- उन्हें महिलाओं की स्थिति का विषय रुचिकर और कभी-कभी जिज्ञासापूर्ण लगता था
- वे कभी-कभी सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” परिस्थिति मान लेते थे
यह सवाल बोर्ड पर लिखिए और पूरे कालांश में रहने दीजिए: किसने लिखा, और उसे क्या “सामान्य” लगा? इस कालांश में दास-बिक्री या सती का कोई अभिनय, नाटक या कल्पना वाला काम मत दीजिए; किताब के शब्द पढ़िए, और चर्चा इस पर रखिए कि लिखने वाले ने क्या चुना और क्यों।
दास और दासियाँ
पृष्ठ 135 (स्रोत 15)
| बात | किताब में |
|---|---|
| बाज़ार में | दास किसी भी अन्य वस्तु की तरह खुले आम बेचे जाते थे, और भेंट में दिए जाते थे |
| दासों में विभेद | सुल्तान की सेवा में कुछ दासियाँ संगीत और गायन में निपुण थीं; सुल्तान अपने अमीरों पर नज़र रखने के लिए भी दासियों को नियुक्त करता था |
| काम | सामान्यत: घरेलू श्रम; पालकी या डोले में लोगों को ले जाने में इब्न बतूता ने इनकी सेवाओं को विशेष रूप से अपरिहार्य पाया |
सिंध पहुँचकर इब्न बतूता ने ख़ुद सुल्तान मुहम्मद बिन तुग़लक के लिए भेंट के तौर पर “घोड़े, ऊँट तथा दास” खरीदे थे। स्रोत 15 किताब के ही शब्दों में पढ़िए, और उसकी आख़िरी पंक्ति बोर्ड पर लिखिए: “अधिकांश दासियों को हमलों और अभियानों के दौरान बलपूर्वक प्राप्त किया जाता था।”
बर्नियर और सती
पृष्ठ 135 (स्रोत 16)
- सभी समकालीन यूरोपीय यात्रियों और लेखकों के लिए महिलाओं से किया जाने वाला बर्ताव अक्सर पश्चिमी और पूर्वी समाजों के बीच भिन्नता का एक महत्त्वपूर्ण संकेतक माना जाता था
- इसलिए बर्नियर ने सती प्रथा को विस्तृत विवरण के लिए चुना
- उसने लिखा कि कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से मृत्यु को गले लगा लेती थीं, जबकि अन्य को मरने के लिए बाध्य किया जाता था
स्रोत 16 बच्चे चुपचाप ख़ुद पढ़ें; उसे ज़ोर से पढ़कर सुनाने या उसके ब्योरों पर बात करने की ज़रूरत नहीं। चर्चा इस पर रखिए कि बर्नियर ने यही विवरण क्यों चुना।
सती के अलावा
“लेकिन महिलाओं का जीवन सती प्रथा के अलावा कई और चीज़ों के चारों ओर घूमता था।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 135
किताब आगे बताती है कि महिलाओं का श्रम खेती और दूसरे उत्पादन, दोनों में महत्त्वपूर्ण था; व्यापारिक परिवारों की महिलाएँ व्यापार में हिस्सा लेती थीं, और कभी-कभी वाणिज्यिक विवाद अदालत तक ले जाती थीं। इसलिए किताब कहती है कि महिलाओं को घरों के खास स्थानों तक सीमित रखा जाना “असंभाव्य” लगता है। फिर पृष्ठ 136 की चर्चा पूछिए: “आपके विचार में सामान्य महिला श्रमिकों के जीवन ने इब्न बतूता और बर्नियर जैसे यात्रियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींचा?”
नमूना उत्तर — किताब की बातों से कुछ कारण निकलते हैं; बच्चे इनमें अपने कारण जोड़ सकते हैं।
- लिखने वाले सामान्यतया पुरुष थे, और कभी-कभी सामाजिक पक्षपात को “सामान्य” मान लेते थे।
- वृत्तांतों में अपरिचित बातें ख़ास तौर पर उभारी जाती थीं; खेत या घर में काम करती महिला उन्हें शायद अनोखी नहीं लगी।
- बर्नियर पूर्व और पश्चिम का अंतर दिखाना चाहता था, इसलिए उसने सती जैसी प्रथा चुनी, रोज़ का श्रम नहीं।
यानी जो उनकी नज़र में आम था, वह उनके वृत्तांतों से छूट गया।
काल-रेखा; मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)
इन बारह यात्रियों में से आप किसके साथ एक दिन बिताना चाहेंगे, और उससे सबसे पहले क्या पूछेंगे?
काल-रेखा
पृष्ठ 137
| कब | क्या |
|---|---|
| 973–1048 | अल–बिरूनी (उज़्बेकिस्तान से) |
| 1254–1323 | मार्को पोलो (इटली से) |
| 1304–77 | इब्न बतूता (मोरक्को से) |
| 1413–82 | अब्दुर रज़्ज़ाक समरकंदी (समरक़ंद से) |
| 1466–72 (भारत में बिताए वर्ष) | अफानासी निकितिच निकितिन (रूस से) |
| 1518 (भारत की यात्रा); मृत्यु 1521 | दुआर्ते बरबोसा (पुर्तगाल से) |
| 1562 (मृत्यु का वर्ष) | सयदी अली रेइस (तुर्की से) |
| 1536–1600 | अंतोनियो मानसेरेते (स्पेन से) |
| 1626–31 (भारत में बिताए वर्ष) | महमूद वली बल्खी (बल्ख़ से) |
| 1600–67 | पीटर मुंडी (इंग्लैंड से) |
| 1605–89 | ज्यौं बैप्टिस्ट तैवर्नियर (फ्रांस से) |
| 1620–88 | फ्रांस्वा बर्नियर (फ्रांस से) |
काल-रेखा का शीर्षक है “कुछ यात्री जिन्होंने वृत्तांत छोड़े”, और उसके नीचे छपा है: “जहाँ कोई अन्य संकेत नहीं है तिथियाँ यात्री के जीवन काल को बता रही हैं।” पंक्तियाँ किताब के क्रम में हैं, जो हर जगह तारीख का क्रम नहीं है। निकितिन, सयदी अली रेइस, मानसेरेते और मुंडी के नाम अध्याय के पाठ में नहीं आते; उनके बारे में किताब सिर्फ़ तारीख और देश देती है, इसलिए कक्षा भी इतना ही लिखे। नाम ऊपर अध्याय के मुख्य पाठ की वर्तनी में हैं। पृष्ठ 137 की काल-रेखा में कुछ नाम दूसरी वर्तनी में छपे हैं: “अब्द अल–रज़्ज़ाक कमाल अल–दिन इब्न इस्हाक़ अल–समरक़ंदी”, “दूरते बारबोसा”, “महमूद वली बलख़ी” और “फ्रांस्वा बर्नीयर”।
प्रश्न 10: मानचित्र कार्य
पृष्ठ 139 · जगहें पृष्ठ 118–120 से
| क्या दिखाइए | कैसे |
|---|---|
| घर और शुरुआत | मोरक्को, जहाँ तैंजियर में उसका जन्म हुआ; वहीं से बाईस वर्ष की उम्र में अकेला निकला (पृष्ठ 118); ट्यूनिस शहर पहुँचने का प्रसंग पृष्ठ 119 के बॉक्स में |
| भारत आने से पहले | मक्का; सीरिया, इराक, फारस, यमन, ओमान, और पूर्वी अफ्रीका के कई तटीय व्यापारिक बंदरगाह |
| उपमहाद्वीप में | मध्य एशिया के रास्ते सिंध, फिर मुल्तान, उच्छ और दिल्ली; बाद में मालाबार तट और मालद्वीप (दोनों जगह वह दो बार गया), फिर बंगाल और असम। मालद्वीप के बाद उसने श्रीलंका जाने का निश्चय किया, पर किताब वहाँ पहुँचने की बात नहीं लिखती, इसलिए श्रीलंका पर पक्का निशान नहीं |
| चीन की ओर | जहाज से सुमात्रा, फिर दूसरे जहाज से चीनी बंदरगाह नगर जायतुन (आज क्वानझू); चीन में बीजिंग तक |
| रूस | किताब कहती है “हो सकता है वह रूस भी गया हो”, इसलिए रूस पर पक्का निशान नहीं |
| समुद्र (हमारी ओर से) | सुमात्रा और जायतुन तक वह जहाज से गया, और मालद्वीप द्वीप है (वह दो बार गया); मानचित्र देखकर अरब सागर, हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और दक्षिण चीन सागर, “होगा” के साथ |
प्रश्न, जैसा छपा है: “विश्व के सीमारेखा मानचित्र पर उन देशों को चिह्नित कीजिए जिनकी यात्रा इब्न बतूता ने की थी। कौन–कौन से समुद्रों को उसने पार किया होगा?” प्रश्न जगहों पर निशान और समुद्रों के नाम माँगता है, रास्ते की रेखाएँ नहीं, इसलिए रेखाएँ अपने मन से मत खिंचवाइए। मानचित्र 1 (पृष्ठ 120) पर पैमाना नहीं है, इसलिए उससे कोई दूरी मत पढ़िए।
पूरा अध्याय, एक नज़र में
पृष्ठ 115 से 139 · सार हमारी ओर से
| कालांश | एक पंक्ति में |
|---|---|
| 1 | बाहर के यात्रियों ने वे बातें लिखीं जो यहाँ के लेखकों को सामान्य लगती थीं; अल–बिरूनी ने संस्कृत सीखकर किताब–उल–हिन्द लिखी |
| 2 | इब्न बतूता यात्रा के अनुभव को ज्ञान मानता था; मोरक्को से चीन तक घूमा, दिल्ली में क़ाज़ी रहा, और उसका रिह्ला लिखा गया |
| 3 | बर्नियर बारह वर्ष मुग़ल भारत में रहा, और लगभग हर बात में भारत को यूरोप से दयनीय बताता रहा |
| 4 | अल–बिरूनी के सामने भाषा, धर्म और अभिमान के अवरोध थे; जाति व्यवस्था का उसका विवरण नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित था |
| 5 | इब्न बतूता ने नारियल, पान, शहर, बाज़ार और डाक को जानी-पहचानी चीज़ों से जोड़कर समझाया |
| 6 | बर्नियर के अनुसार भारत में निजी भूस्वामित्व नहीं था; कोई सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ ऐसा नहीं कहता |
| 7 | उसी बर्नियर के विवरण में समृद्ध व्यापारिक समुदाय और बहुत-से शिल्प भी दिखते हैं, और किताब बताती है कि हर तरह के नगर थे |
| 8 | वृत्तांतों में दासियाँ और सती आईं; किताब याद दिलाती है कि महिलाओं का श्रम खेती और दूसरे उत्पादन में भी महत्त्वपूर्ण था |
| 9 | काल-रेखा के बारह यात्री, और इब्न बतूता की जगहें मानचित्र पर |
| 10 | अभ्यास के बारह प्रश्न, और नमूना पत्र 2 |
यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।
और अब पहले दिन की पर्चियाँ
पृष्ठ 115
हमारी ओर से: बाहर से आया यात्री किसी जगह के बारे में ऐसा क्या देख लेता है जो वहाँ रहने वाले नहीं देखते, और वह कहाँ ग़लत समझ सकता है?
लिफ़ाफ़ा खोलिए और हर बच्चे को उसकी पर्ची लौटाइए। बच्चे अपनी पुरानी पंक्तियों के नीचे अध्याय से दोनों हिस्सों का एक-एक उदाहरण जोड़ें।
नमूना उत्तर — अध्याय दोनों बातें दिखाता है।
- जो बाहर वाला देख लेता है: यहाँ के लेखकों को सामान्य लगने वाली रोज़ की बातें; इब्न बतूता के नारियल, पान, दिल्ली की दीवार और डाक (कालांश 1 और 5)।
- उसकी समझ की सीमा, अल–बिरूनी: जाति के बारे में उसकी समझ नियामक संस्कृत ग्रंथों से गहराई से प्रभावित थी, जबकि वास्तविक जीवन में यह व्यवस्था इतनी भी कड़ी नहीं थी (कालांश 4)।
- ग़लत कहाँ समझा, बर्नियर: राज्य ही भूमि का एकमात्र स्वामी था, यह बात किसी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ में नहीं मिलती; और वह मुग़ल शहरों को “शिविर नगर” कहता है, जबकि किताब हर तरह के नगर दिखाती है (कालांश 6 और 7)।
- जो छूट गया: लिखने वाले सामान्यतया पुरुष थे, और किताब कहती है कि इन वृत्तांतों में सामाजिक जीवन के कई आयाम अनछुए रह जाते हैं, या एक दृष्टिकोण विशेष से देखे जाते हैं; जैसे सती पर बहुत लिखा गया, जबकि महिलाओं का श्रम खेती और दूसरे उत्पादन में भी महत्त्वपूर्ण था (कालांश 8)।
पुरानी और नई पंक्तियों का अंतर ही बताता है कि बच्चों ने इस अध्याय से क्या सीखा।
मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न
इस अध्याय के तीन यात्रियों में से किसका वृत्तांत आपको इतिहास के लिए सबसे काम का लगा, और उसकी एक सीमा क्या है?
अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात
पृष्ठ 138–139 · मुख्य बात हमारी ओर से
| प्रश्न | उत्तर की मुख्य बात |
|---|---|
| 1. किताब–उल–हिन्द पर लेख | अरबी में, अस्सी अध्याय, कई विषय; अध्याय सामान्यत: (हालाँकि हमेशा नहीं) एक प्रश्न, फिर संस्कृत परंपराओं पर वर्णन, फिर दूसरी संस्कृतियों से तुलना |
| 2. इब्न बतूता और बर्नियर के दृष्टिकोण | इब्न बतूता नई चीज़ों को अचरज और बारीकी से दर्ज करता है; बर्नियर हर बात की तुलना यूरोप से करता है और भिन्नताओं को पदानुक्रम में रखता है |
| 3. बर्नियर के शहरी केंद्र | उसके लिए “शिविर नगर”, राजकीय शिविर पर निर्भर; किताब उत्पादन केंद्र, व्यापारिक नगर, बंदरगाह नगर, धार्मिक केंद्र और तीर्थ स्थान भी दिखाती है |
| 4. इब्न बतूता और दास प्रथा | दास बाज़ारों में खुले आम बिकते और भेंट में दिए जाते; दासों में विभेद; काम सामान्यत: घरेलू श्रम |
| 5. सती और बर्नियर | महिलाओं से बर्ताव को यूरोपीय यात्री पश्चिम और पूर्व की भिन्नता का संकेतक मानते थे; बर्नियर ने सती को विस्तृत विवरण के लिए चुना; उसके अनुसार कुछ महिलाएँ प्रसन्नता से, अन्य को बाध्य किया जाता था |
| 6. अल–बिरूनी और जाति व्यवस्था | दूसरे समुदायों में प्रतिरूप, जैसे प्राचीन फ़ारस; ब्राह्मणवादी व्याख्या मानी, पर अपवित्रता की मान्यता अस्वीकार की; सीमा: नियामक संस्कृत ग्रंथों से प्रभावित |
| 7. इब्न बतूता और शहरी जीवन | काफ़ी हद तक हाँ: घने और समृद्ध शहर, बाज़ार, दिल्ली की दीवार और द्वार, डाक; पर नज़र एक बाहरी यात्री की |
| 8. बर्नियर और ग्रामीण समाज | सीमित हद तक: भूमि पर राज्य के स्वामित्व की उसकी बात किसी सरकारी मुग़ल दस्तावेज़ में नहीं मिलती; ग्रामीण समाज में बड़े ज़मींदारों से भूमिविहीन श्रमिकों तक बहुत अंतर था |
| 9. बर्नियर का शिल्प वाला उद्धरण | किताब में ‘अलिखित’ छपा है, पर अंग्रेज़ी किताब में यहाँ ‘mentioned’ (बताए गए) है, इसलिए इसे ‘उल्लिखित’ पढ़िए, यानी इस अंश में बताए गए शिल्प। सूची: शिल्पकारीगरी, नकल, बंदूकें, स्वर्णाभूषण, चित्र; तुलना स्रोत 13 और 14 के शिल्प से, और पृष्ठ 128 के सूती कपड़े, महीन मलमल, रेशम, ज़री और साटन से |
| 10. मानचित्र कार्य | सिर्फ़ किताब में बताई जगहें; समुद्र “होगा” के साथ |
| 11. परियोजना: बड़े संबंधी का साक्षात्कार | (क) से (ङ) तक पाँच बातें; भाषा, पहनावा, खानपान, रीति-रिवाज, इमारतों, सड़कों और पुरुषों और महिलाओं की जीवन-शैली की समानताएँ और भिन्नताएँ; फिर रिपोर्ट |
| 12. परियोजना: एक यात्री पर रिपोर्ट | अध्याय के किसी एक यात्री के जीवन और कृतियों पर और जानकारी; उसने समाज का कैसा विवरण दिया; तुलना अध्याय के उद्धरणों से |
पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं।
अध्याय का बड़ा विचार
“देशज लेखकों के लिए ये सभी विषय सामान्य थे जो वृत्तांतों में दर्ज करने योग्य नहीं थे।”
पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 116
हमारी ओर से: किसी भी यात्री को पढ़ते समय दो सवाल साथ रखिए। उसने ऐसा क्या देखा जो यहाँ के लोग लिखते ही नहीं थे, और उसकी अपनी दुनिया ने उसकी नज़र को कहाँ मोड़ा? पहले दिन की पर्ची का सवाल यही था, और पूरा अध्याय इन्हीं दो सवालों का उत्तर है।