Chapter 8किसान, ज़मींदार और राज्य

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NCERT, भारतीय इतिहास के कुछ विषय भाग II (कक्षा 12), विषय 8

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अध्याय 8 — किसान, ज़मींदार और राज्य · भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2 · कक्षा 12

कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 196 से 223

यह पन्ना किसलिए — स्लाइड शो कक्षा में चलाने से पहले एक बार पढ़ लेने के लिए। यहाँ सारी स्लाइड एक के बाद एक लिखी हैं, हर एक के नीचे शिक्षक के लिए एक टिप्पणी के साथ। उद्धरण-चिह्न में सिर्फ़ किताब के शब्द हैं; जहाँ हमारी ओर से लिखा है, वह बात हमारी अपनी है। प्रोजेक्टर न हो तो यही पाठ पढ़कर, बोर्ड और चार्ट पेपर से कक्षा चल सकती है; हर कालांश का पूरा क्रम पाठ योजना में है।

बच्चों की आम भूलें शिक्षक संदर्शिका में हैं, और अध्याय की सारी तालिकाएँ रिवीजन नोट्स में। बच्चे ख़ुद पढ़ें, तो उन्हें इंटरैक्टिव अध्याय दीजिए।

कौन-सी स्लाइड किस कालांश में — पाठ योजना के हिसाब से:

  • कालांश 1 — शुरू की तीन स्लाइड, फिर भाग 1: शुरुआत; 1. किसान और कृषि उत्पादन: 1.1 स्रोतों की तलाश; 1.2 किसान और उनकी ज़मीन
  • कालांश 2 — भाग 2: 1.3 सिंचाई और तकनीक; 1.4 फ़सलों की भरमार
  • कालांश 3 — भाग 3: 2. ग्रामीण समुदाय: 2.1 जाति और ग्रामीण माहौल; 2.2 पंचायतें और मुखिया
  • कालांश 4 — भाग 4: 2.3 ग्रामीण दस्तकार; 2.4 एक “छोटा गणराज्य”?
  • कालांश 5 — भाग 5: 3. कृषि समाज में महिलाएँ
  • कालांश 6 — भाग 6: 4. जंगल और कबीले: 4.1 बसे हुए गाँवों के परे; 4.2 जंगलों में घुसपैठ
  • कालांश 7 — भाग 7: 5. ज़मींदार
  • कालांश 8 — भाग 8: 6. भू–राजस्व प्रणाली; मानचित्र 1 और मनसबदारी व्यवस्था
  • कालांश 9 — भाग 9: 7. चाँदी का बहाव
  • कालांश 10 — भाग 10: 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी; काल रेखा, मानचित्र कार्य, और पहले दिन की पर्चियाँ
  • कालांश 11 — आख़िरी भाग: मूल्यांकन, अभ्यास के 12 प्रश्न

पहले यह पढ़िए — खेत, गाँव और दरबार की नज़र

पृष्ठ 197

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हमारी ओर से: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं? यह सवाल पूरे अध्याय में साथ चलेगा।

किताब पृष्ठ 197 पर कहती है, “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” पहले दिन बच्चे इस सवाल पर अपनी समझ से दो पंक्तियाँ लिखेंगे; अभी किसी उत्तर को ग़लत मत कहिए।

सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं? पर्ची पर दो पंक्तियाँ लिखिए, और अपना नाम भी लिखिए।

अध्याय का नक्शा

पृष्ठ 196 से 223 · पढ़ाने का क्रम हमारी ओर से

  • पहले स्रोत और किसान: आइन–ए–अकबरी, दो किस्म के किसान, उनकी ज़मीन, सिंचाई, औज़ार और फ़सलें
  • फिर गाँव: जाति, पंचायत और मुखिया, दस्तकार, और “छोटा गणराज्य” का सवाल
  • फिर खेती में महिलाओं का श्रम, और जंगलों और कबीलों की दुनिया
  • फिर ज़मींदार, भू–राजस्व की व्यवस्था और मनसबदारी
  • आख़िर में चाँदी का बहाव, और यह कि आइन कैसे बनी, क्या बताती है और उसकी सीमाएँ क्या हैं; फिर काल रेखा

हमारी ओर से: पहले दिन की पर्चियाँ लिफ़ाफ़े में सँभालकर रखिए। कालांश 10 में, पूरा अध्याय पढ़ने के बाद, वे लौटाई जाएँगी।

1 | शुरुआत; 1. किसान और कृषि उत्पादन: 1.1 स्रोतों की तलाश; 1.2 किसान और उनकी ज़मीन

जो लोग ख़ुद कुछ लिखकर नहीं छोड़ गए, उनकी ज़िंदगी के बारे में सैकड़ों साल बाद हम कैसे जान सकते हैं?

गाँवों का देश

पृष्ठ 196

  • सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के दौरान हिंदुस्तान में करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे
  • छोटे खेतिहर और भूमिहर संभ्रांत, दोनों फ़सल के हिस्सों के दावेदार थे; उनके बीच सहयोग, प्रतियोगिता और संघर्ष के रिश्ते बने
  • गाँवों में दाखिल हुई बाहरी ताक़तों में सबसे महत्त्वपूर्ण मुग़ल राज्य था, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था
  • कई फ़सलें बिक्री के लिए उगाई जाती थीं, इसलिए व्यापार, मुद्रा और बाज़ार भी गाँवों तक आए

चित्र 8.1 दिखाइए: सत्रहवीं शताब्दी के एक मुग़ल चित्र का ब्योरा, एक ग्रामीण दृश्य। फिर बताइए कि खेतिहर समाज की बुनियादी इकाई गाँव था, पर हर जगह एक-सी खेती नहीं थी: सूखी ज़मीन और पहाड़ियों वाले इलाके थे, और भूखंड का बहुत बड़ा हिस्सा जंगलों से घिरा था। बोर्ड पर तीन शब्द लिखिए, किसान, ज़मींदार, राज्य, और कहिए कि पूरा अध्याय इन्हीं तीनों के रिश्ते की कहानी है।

स्रोतों की तलाश

पृष्ठ 197

  • किसान ख़ुद नहीं लिखते थे
  • इस काल के कृषि इतिहास के मुख्य स्रोत वे ग्रंथ और दस्तावेज़ हैं जो मुग़ल दरबार की निगरानी में लिखे गए
  • इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण ग्रंथों में एक आइन–ए–अकबरी है, जिसे अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़्ल ने लिखा
  • इसका मुख्य उद्देश्य अकबर के साम्राज्य का ऐसा खाका पेश करना था जहाँ एक मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल-जोल बनाकर रखता था

किताब का निष्कर्ष बोर्ड पर लिखिए: “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” फिर पूछिए: अगर किसान ख़ुद नहीं लिखते थे और आइन ऊपर की नज़र है, तो किसानों की अपनी बात हमें थोड़ी-बहुत किन स्रोतों से मिलती है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — मुग़लों की राजधानी से दूर लिखे गए दस्तावेज़ों से, जो पृष्ठ 197 पर गिनाए गए हैं।

  • दूर के इलाकों के दस्तावेज़: सत्रहवीं और अठारहवीं सदियों के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, जो सरकार की आमदनी की विस्तृत जानकारी देते हैं।
  • ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़: ये पूर्वी भारत के कृषि-संबंधों का उपयोगी खाका देते हैं।
  • इनमें क्या दर्ज है: किसानों, ज़मींदारों और राज्य के बीच के झगड़े, और यह कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से कैसे न्याय की उम्मीद रखते थे।

यही बात अभ्यास के प्रश्न 1 में पूछी गई है; उसका पूरा उत्तर कालांश 10 में बनेगा।

दो किस्म के किसान

पृष्ठ 197–198

खुद–काश्त

  • उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी

पाहि–काश्त

  • दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे
  • अपनी मर्ज़ी से: जब किसी दूसरे गाँव में करों की शर्तें बेहतर मिलें
  • मजबूरी में: जब अकाल या भुखमरी के बाद आर्थिक परेशानी हो

पहले नाम बोर्ड पर लिखिए: मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोत किसान के लिए रैयत (बहुवचन रिआया) या मुज़रियान शब्द इस्तेमाल करते थे; किसान या आसामी जैसे शब्द भी मिलते हैं। रिआया कोई अलग शब्द नहीं, रैयत का बहुवचन है। फिर यह दो खानों वाली स्लाइड दिखाइए। बच्चे अकसर पाहि–काश्त को बिना ज़मीन का मज़दूर समझ लेते हैं; किताब ऐसा नहीं कहती, वे दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले किसान थे।

ज़मीन: कितनी, और किसकी

पृष्ठ 198

  • उत्तर भारत के औसत किसान के पास शायद ही कभी एक जोड़ी बैल और दो हल से ज़्यादा कुछ होता था; ज़्यादातर के पास इससे भी कम
  • गुजरात में जिन किसानों के पास 6 एकड़ के करीब ज़मीन थी, वे समृद्ध माने जाते थे
  • बंगाल में एक औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा 5 एकड़ थी; 10 एकड़ वाला आसामी अमीर समझा जाता था
  • खेती व्यक्तिगत मिल्कियत के सिद्धांत पर टिकी थी; किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की

किताब उन्नीसवीं सदी के दिल्ली–आगरा इलाके का एक विवरण देती है, जो उसके अनुसार सत्रहवीं सदी पर भी उतना ही लागू होता है: “हल जोतने वाले खेतिहर किसान हर ज़मीन की हदों पर मिट्टी, ईंट और काँटों से पहचान के लिए निशान लगाते हैं, और ज़मीन के ऐसे हज़ारों टुकड़े किसी भी गाँव में देखे जा सकते हैं।” पूछिए: हर टुकड़े की हद पर निशान लगाना किसानों की ज़मीन के बारे में क्या बताता है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — कि हर टुकड़ा किसी एक का था, यानी ज़मीन व्यक्तिगत मिल्कियत थी।

  • हदें और निशान: मिट्टी, ईंट और काँटों के निशान बताते थे कि कौन-सा टुकड़ा किसका है।
  • ख़रीद-बिक्री: पृष्ठ 198 के अनुसार किसानों की ज़मीन उसी तरह ख़रीदी-बेची जाती थी जैसे दूसरे संपत्ति मालिकों की।

बंगाल के आँकड़े पर रुककर पूछिए: 10 एकड़ वाला आसामी अमीर क्यों कहलाता था? क्योंकि वहाँ औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा ही 5 एकड़ थी।

स्रोत 1: बाबर की नज़र में हिंदुस्तान के गाँव

“हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 198 (स्रोत 1)

यह बाबर के संस्मरण बाबरनामा से है। जोड़ियों में पूरा स्रोत 1 पढ़वाइए, फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगी।

नमूना उत्तर — बाबर को सबसे ज़्यादा यह बात चौंकाती है कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ बहुत जल्दी उजड़ती और बसती थीं।

  • पल में उजड़ना: बरसों से बसे बड़े शहर के लोग भी चले जाएँ तो डेढ़ दिन में उनका हर नामोनिशान मिट जाता था।
  • बसने में आसानी: पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी, क्योंकि सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं; लोग एक सरोवर या कुआँ बना लेते थे।
  • झोंपड़ियाँ: झोंपड़ियाँ बनाकर “यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता है!”

किताब भी पृष्ठ 198 पर कहती है कि ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से खेती लगातार फैलती रही।

2 | 1.3 सिंचाई और तकनीक; 1.4 फ़सलों की भरमार

अगर खेती बारिश पर टिकी हो, तो जिस फ़सल को बारिश से ज़्यादा पानी चाहिए, उसके लिए किसान क्या करता होगा?

खेती का फैलाव और मानसून

पृष्ठ 198

  • ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से कृषि का लगातार विस्तार हुआ
  • खेती का प्राथमिक उद्देश्य लोगों का पेट भरना था, इसलिए चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं
  • जहाँ प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिश होती थी, वहाँ कमोबेश चावल; कम बारिश में गेहूँ; और कम में ज्वार–बाजरा
  • मानसून भारतीय कृषि की रीढ़ था, पर कुछ फ़सलों को अतिरिक्त पानी चाहिए था, इसलिए सिंचाई के कृत्रिम उपाय बनाने पड़े

बारिश का नियम बोर्ड पर ऊपर से नीचे लिखवाइए: सबसे ज़्यादा बारिश, चावल; उससे कम, गेहूँ; सबसे कम, ज्वार–बाजरा। अगली स्लाइड में वे कृत्रिम उपाय आएँगे जो बाबर ने अपनी आँखों से देखे।

स्रोत 2: रहट और बालटी

पृष्ठ 199

रहट

  • लाहौर और दीपालपुर जैसी जगहों पर
  • रस्सी के फंदों पर लकड़ी के गुटके और घड़े, पहिये, और बैल से घूमने वाला दाँतों वाला पहिया
  • पानी एक संकरे नाले से खेत तक

बालटी

  • आगरा, चाँदवर और बयाना जैसे इलाकों में
  • लकड़ी के कन्ने, बेलन, रस्सी और बैल
  • एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा बालटी से पानी निकालता

चित्र 8.2 (रहट की संरचना) दिखाइए, और एटलस पर जगहें: लाहौर और दीपालपुर आज के पाकिस्तान में, आगरा और चाँदवर आज के उत्तर प्रदेश में, और बयाना आज के राजस्थान में (किताब तीनों को उत्तर प्रदेश में बताती है)। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई व्यवस्था से कीजिए; इनमें किस तरह के संसाधन लगते होंगे, और किनमें सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी?

नमूना उत्तर — बाबर कुओं से पानी उठाने के साधन बताता है, जबकि विजयनगर में बाँध, हौज़ और नहरें थीं।

  • विजयनगर (अध्याय 7): धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़; एक बड़े हौज़ (आज का कमलपुरम् जलाशय) से आस–पास के खेत सींचे जाते थे; तुंगभद्रा पर बने बाँध से हिरिया नहर पानी लाती थी।
  • संसाधन और भागेदारी: बाबर के ब्योरे में रहट और बालटी एक कुएँ पर बैलों से चलते हैं, और बालटी में दो आदमी काम करते हैं, इसलिए उनमें सुधार किसानों की अपनी भागेदारी से हो सकता होगा; बड़े बाँध, हौज़ और नहरें बनाने में बहुत मज़दूर, सामान और शासकों की ताक़त लगती होगी।

हर तर्क ठीक है, अगर वह स्रोत 2 या अध्याय 7 की किसी बात से जुड़ा हो।

राज्य की नहरें, किसान के औज़ार

पृष्ठ 200

  • उत्तर भारत में राज्य ने कई नयी नहरें और नाले खुदवाए और कई पुरानी नहरों की मरम्मत करवाई, जैसे शाहजहाँ के शासनकाल में पंजाब में शाह नहर
  • जुताई: लकड़ी का हलका हल, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल; यह गहरा नहीं खोदता था, इसलिए तेज़ गर्मी के महीनों में नमी बची रहती थी
  • बुआई: बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा; पर बीज हाथ से छिड़ककर बोने का रिवाज ज़्यादा प्रचलित था
  • गुड़ाई और निराई: लकड़ी के मूठ वाले लोहे के पतले धार

बताइए कि खेती मेहनत का काम थी, पर किसान अकसर पशुबल पर आधारित तकनीकें भी इस्तेमाल करते थे। पूछिए: हल गहरा नहीं खोदता था, फिर भी इससे किसान को क्या फ़ायदा था? (तेज़ गर्मी के महीनों में ज़मीन की नमी बची रहती थी।) यह सवाल हमारी ओर से है।

फ़सलों की भरमार

पृष्ठ 200

  • खेती दो मुख्य चक्रों में होती थी: खरीफ़ (पतझड़ में) और रबी (वसंत में)
  • सूखे इलाकों और बंजर ज़मीन को छोड़कर ज़्यादातर जगहों पर साल में कम से कम दो फ़सलें; जहाँ बारिश या सिंचाई के साधन हर वक़्त थे, वहाँ तीन भी
  • आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर मुग़ल प्रांत आगरा में 39 किस्म की और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें उगाई जाती थीं; बंगाल में सिर्फ़ चावल की 50 किस्में
  • मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें) की खेती को बढ़ावा देता था; कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे

खरीफ़ और रबी बोर्ड पर मौसम के साथ ही लिखवाइए; बच्चे दोनों उलट देते हैं। फिर पूछिए: मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल की खेती को बढ़ावा क्यों देता था? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — क्योंकि इनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था।

  • कौन-सी फ़सलें: कपास और गन्ना बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थे; ये बिक्री के लिए उगती थीं।
  • पेट भरना और व्यापार: किताब पृष्ठ 200 पर कहती है कि दैनिक आहार पर ज़्यादा ज़ोर था, पर एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।

यह दूसरी बात अभ्यास का प्रश्न 2 है; बच्चे इसे कॉपी में नोट कर लें।

नयी फ़सलें, तम्बाकू और आबादी

पृष्ठ 200–201

  • मक्का अफ़्रीका और स्पेन के रास्ते आया
  • टमाटर, आलू, मिर्च, अनानास और पपीता नयी दुनिया से आए
  • तम्बाकू पहले दक्कन पहुँचा, और सत्रहवीं सदी के शुरुआती वर्षों में उत्तर भारत लाया गया; अकबर और उसके अभिजातों ने 1604 ई. में पहली बार तम्बाकू देखा
  • जहाँगीर ने तम्बाकू पर पाबंदी लगाई, पर पाबंदी बेअसर रही; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती, व्यापार और उपयोग की मुख्य वस्तुओं में से एक था
  • आर्थिक इतिहासकारों की गणना के अनुसार 1600 से 1800 के बीच भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी की बढ़ोतरी

तम्बाकू और आबादी वाली बातें पृष्ठ 200 के किनारे के दो बॉक्स से हैं; इन्हें आप पढ़कर सुनाइए। (किताब में यहाँ “1600 से 1700” छपा है, पर अगले ही वाक्य में “200 वर्षों” लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है।) मक्का और नयी दुनिया की सब्ज़ियाँ बोर्ड पर अलग-अलग लिखवाइए, ताकि बच्चे दोनों के रास्ते न मिलाएँ। तेज़ बच्चों से पृष्ठ 201 का “चर्चा कीजिए” वाला प्रश्न करवाइए: इस अनुभाग की खेती की कौन-सी तकनीकें भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1 के अध्याय 2 में बताई तकनीकों से मिलती-जुलती हैं, और कौन-सी भिन्न?

नमूना उत्तर — कुछ तकनीकें पुरानी हैं, कुछ इस अध्याय में नयी दिखती हैं।

  • मिलती-जुलती: लोहे के फाल वाला हल, जो अध्याय 2 में छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में फैला; और कुओं, तालाबों और नहरों से सिंचाई।
  • भिन्न: अध्याय 2 में गंगा की घाटी की धान की रोपाई है, जबकि यहाँ बीज ज़्यादातर हाथ से छिड़ककर बोए जाते थे।
  • इस अध्याय में नया: बरमा, खरीफ़ और रबी, जिन्स–ए–कामिल और नयी दुनिया से आई फ़सलें।

3 | 2. ग्रामीण समुदाय: 2.1 जाति और ग्रामीण माहौल; 2.2 पंचायतें और मुखिया

चार सौ साल पहले गाँव में कोई झगड़ा होता, तो उसे कौन निपटाता होगा: राज्य का अफ़सर, या गाँव के लोग ख़ुद?

चित्र 8.3: पंजाब का एक गाँव

पृष्ठ 201

  • आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का पंजाब के एक गाँव का चित्र
  • किसान की अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था
  • इस समुदाय के तीन घटक: खेतिहर किसान, पंचायत, और गाँव का मुखिया (मुक़द्दम या मंडल)

बच्चे चित्र 8.3 अपनी किताब में देखें। किनारे का प्रश्न पूछिए: चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या-क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए।

नमूना उत्तर — चित्र में गाँव के रोज़ के काम और उसके घर दिखते हैं।

  • महिलाएँ: सूत कातती और अनाज कूटती दिखती हैं।
  • पुरुष: पगड़ी पहने एक आदमी भैंस के साथ है; आस-पास ऊँट, मवेशी और घड़े हैं।
  • वास्तुकला: मिट्टी के घर, और उनके बीच किले जैसी एक मीनार।

फिर तीन घटक बोर्ड पर लिखवाइए; इस कालांश में पहले दो, जाति और पंचायत, पर बात होगी।

जाति और ग्रामीण माहौल

पृष्ठ 201–202

  • जाति और जाति जैसे भेदभावों की वजह से खेतिहर किसान कई समूहों में बँटे थे
  • खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों के लोगों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे
  • मुसलमान समुदायों में हलालख़ोरान जैसे “नीच” कामों से जुड़े समूह गाँव की हदों के बाहर ही रह सकते थे; बिहार में मल्लाहज़ादाओं (शाब्दिक अर्थ, नाविकों के पुत्र) की तुलना दासों से की जा सकती थी
  • सत्रहवीं सदी में मारवाड़ में लिखी एक किताब राजपूतों की चर्चा किसानों के रूप में करती है, और जाटों को भी किसान बताती है, पर जाति व्यवस्था में उनकी जगह राजपूतों से नीची रखती है
  • पशुपालन और बागबानी में बढ़ते मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली जैसी जातियाँ सामाजिक सीढ़ी में ऊपर उठीं; पूर्वी इलाकों में सदगोप और कैवर्त जैसी पशुपालक और मछुआरी जातियाँ किसानों जैसी सामाजिक स्थिति पाने लगीं

यह हिस्सा आप ज़ोर से पढ़िए, किताब के शब्दों में। किसी बच्चे से उसकी अपनी जाति के बारे में मत पूछिए; बात किताब के उदाहरणों तक रखिए, सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव तक। फिर पूछिए: किताब के अनुसार निचले तबकों और बीच के समूहों में जाति और हैसियत का रिश्ता अलग कैसे था? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और सामाजिक हैसियत के बीच सीधा रिश्ता था; बीच के समूहों में ऐसा नहीं था।

  • निचले तबके: खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी उन्हें सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे।
  • बीच के समूह: मुनाफ़े और काम के बदलाव से उनकी हैसियत ऊपर उठ सकती थी, जैसे अहीर, गुज्जर और माली, या सदगोप और कैवर्त।

यह बात अभ्यास के प्रश्न 6 का पहला हिस्सा है।

पंचायत और मुखिया

पृष्ठ 202–203

  • पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, आम तौर पर वे लोग जिनके पास संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार थे; किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है
  • मुखिया, कुछ स्रोतों के अनुसार, बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता था और ज़मींदार उसे मंज़ूरी देता था; भरोसा न रहे तो उसे हटाया जा सकता था
  • पंचायत का पटवारी हिसाब-किताब में मुखिया की मदद करता था
  • पंचायत का आम ख़ज़ाना कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी प्राकृतिक विपदाओं से निपटने, और मिट्टी के छोटे-मोटे बाँध बनाने या नहर खोदने में लगता था

बच्चे सोचते हैं कि पंचायत में गाँव के सब लोग बैठते थे। ऐसा नहीं है: छोटे-मोटे और “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें जगह होने की संभावना कम थी। किताब पंचायत को ऐसा “अल्पतंत्र” कहती है जिसमें गाँव के अलग-अलग संप्रदायों और जातियों की नुमाइंदगी होती थी। पृष्ठ 202 का बॉक्स आप पढ़िए: मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब में हेरा-फेरी करते थे और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे। फिर पूछिए: आम ख़ज़ाने के कामों में से कौन-सा काम किसान अकेले नहीं कर सकते थे? (बाँध और नहर जैसे सामुदायिक काम।) यह सवाल हमारी ओर से है।

पंचायत के दंड, और जाति पंचायत

पृष्ठ 203

  • पंचायत जुर्माना लगा सकती थी, और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी; उतने समय दंडित व्यक्ति अपनी जाति और पेशे से हाथ धो बैठता था
  • ग्राम पंचायत के अलावा हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी होती थी
  • राजस्थान में जाति पंचायतें दीवानी झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं, देखती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हों, और तय करती थीं कि गाँव के आयोजन में किसे किसके ऊपर तरजीह मिलेगी
  • फ़ौजदारी न्याय को छोड़कर ज़्यादातर मामलों में राज्य जाति पंचायत के फ़ैसले मानता था

ग्राम पंचायत और जाति पंचायत बोर्ड पर दो अलग खानों में लिखवाइए; बच्चे दोनों को एक मान लेते हैं। “निष्कासन हमेशा के लिए” भी आम भूल है: किताब सीमित समय कहती है। इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चल रहा हो, तो 2. ग्रामीण समुदाय खोलकर पूछिए: पूर्वी भारत में शादियाँ किसकी मौजूदगी में होती थीं? (मंडल की।)

चित्र 8.4: गाँव के बुज़ुर्ग और कर अधिकारी

पृष्ठ 203

  • आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का चित्र
  • एक ओर गाँव के बुज़ुर्ग, दूसरी ओर कर अधिकारी

बच्चे चित्र किताब में देखें। किनारे का प्रश्न पूछिए: चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है?

नमूना उत्तर — दोनों को अलग-अलग ढंग से दिखाया गया है।

  • बुज़ुर्ग: बाईं ओर एक दर्जन से ज़्यादा आदमियों का झुंड, ज़्यादातर पगड़ी में, कई की दाढ़ी सफ़ेद; उम्र और संख्या से वे गाँव के बड़े-बूढ़े लगते हैं।
  • अधिकारी: दाईं ओर सिर्फ़ दो आदमी: एक बही में लिख रहा है, दूसरा हरे कोट में है, और उनके पैरों के पास हिसाब की बहियाँ और कागज़ हैं।

लिखा-पढ़ी और हिसाब कर अधिकारियों की पहचान है।

विरोध का आख़िरी रास्ता

“एक बड़ा प्रभावी हथियार”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 204

किताब गाँव छोड़कर भाग जाने को खेतिहरों के हाथ में यही कहती है। पहले पृष्ठ 203–204 पढ़िए: पश्चिम भारत, ख़ासकर राजस्थान और महाराष्ट्र, के दस्तावेज़ों में पंचायत को दी गई ऐसी कई अर्ज़ियाँ हैं जिनमें “ऊँची” जातियों या राज्य के अधिकारियों के ख़िलाफ़ ज़बरन कर उगाही या बेगार की शिकायत है। अत्यधिक कर की माँगों के मामले में पंचायत अकसर समझौते का सुझाव देती थी; जहाँ समझौते नहीं हो पाते थे, वहाँ किसान विरोध के ज़्यादा उग्र रास्ते अपनाते थे, जैसे कि गाँव छोड़कर भाग जाना। फिर पूछिए: किताब इसे “एक बड़ा प्रभावी हथियार” क्यों कहती है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — किताब ख़ुद इसकी वजह बताती है:

  • ज़मीन: जोतने लायक खाली ज़मीन अपेक्षाकृत आसानी से उपलब्ध थी।
  • श्रम: श्रम को लेकर प्रतियोगिता थी।

इसी के साथ बाबर का स्रोत 1 याद दिलाइए: बस्तियाँ जल्दी उजड़ती और बसती थीं।

4 | 2.3 ग्रामीण दस्तकार; 2.4 एक “छोटा गणराज्य”?

जिस गाँव में पैसा कम चलता हो, वहाँ नाई या लोहार को उसके काम का बदला कैसे मिलता होगा?

गाँव के दस्तकार

पृष्ठ 204–205

  • अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के गाँवों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़ बताते हैं कि गाँवों में दस्तकार काफ़ी तादाद में रहते थे; कहीं-कहीं कुल घरों के 25 फ़ीसदी घर दस्तकारों के थे
  • कई समूह खेती और दस्तकारी, दोनों करते थे: रँगरेज़ी, कपड़े पर छपाई, मिट्टी के बरतन पकाना, खेती के औज़ार बनाना या उनकी मरम्मत
  • यह काम बुआई और सुहाई के बीच या सुहाई और कटाई के बीच के फ़ुरसत के महीनों में होता था
  • कुम्हार, लोहार, बढ़ई, नाई, यहाँ तक कि सुनार भी गाँव के लोगों को अपनी सेवाएँ देते थे

चित्र 8.5 बच्चे किताब में देखें और किनारे का प्रश्न करें: चित्र में दर्शाई गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए।

नमूना उत्तर — यह कपड़ा उत्पादन दिखाने वाली सत्रहवीं शताब्दी की एक चित्रकारी है।

  • ऊपरी हिस्सा: चट्टानी पहाड़ी पर एक शासक बैठा है, साथ में सेवक और रंग-बिरंगे कपड़ों में लोग।
  • निचला हिस्सा: घास-फूस के एक छप्पर के पास कारीगर कपड़ा बिछा रहे हैं, धो रहे हैं, और सूत कात रहे हैं या कपड़ा तैयार कर रहे हैं।

चित्र पर लिखी पंक्तियाँ पढ़ने या उनका अर्थ बताने की ज़रूरत नहीं; बात चित्र में दिखते काम की है।

मेहनताना: फ़सल, ज़मीन, विनिमय, नकद

पृष्ठ 205

तरीक़ाकिताब क्या कहती है
फ़सल का हिस्साआम तौर पर या तो फ़सल का एक हिस्सा मिलता था, या फिर अगली पंक्ति वाला ज़मीन का टुकड़ा
ज़मीन का टुकड़ाशायद कोई ऐसी ज़मीन जो खेती लायक होने पर भी बेकार पड़ी थी; महाराष्ट्र में ऐसी ज़मीन दस्तकारों की मीरास या वतन बनी, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था
विनिमयकभी दस्तकार और हर खेतिहर परिवार आपस में बातचीत करके अदायगी तय करते थे; आम तौर पर वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय होता था
नकदअठारहवीं सदी के बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को उनकी सेवाओं के बदले “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे।”

बोर्ड पर लिखवाइए कि अदायगी की सूरत क्या होगी, यह शायद पंचायत ही तय करती थी; और यह कि इस व्यवस्था को जजमानी कहते थे, पर किताब के अनुसार यह शब्द सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था; बंगाल का उदाहरण अठारहवीं सदी का है। बच्चे यह भी मान लेते हैं कि गाँव में सब अदला-बदली थी; किताब के अनुसार नकद अदायगी का चलन भी बिलकुल नदारद नहीं था।

क्या गाँव “छोटा गणराज्य” था?

पृष्ठ 205

उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की छवि

  • भारतीय गाँव ऐसे “छोटे गणराज्य”, जहाँ लोग सामूहिक स्तर पर भाईचारे के साथ संसाधनों और श्रम का बँटवारा करते थे

किताब के प्रमाण

  • संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी
  • जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं
  • कुछ ताकतवर लोग गाँव के मसलों पर फ़ैसले लेते और कमज़ोर वर्गों का शोषण करते थे; न्याय करने का अधिकार भी उन्हीं के पास था
  • गाँव-शहर के व्यापार की वजह से गाँवों में नकद के रिश्ते फैल चुके थे

अनुभाग 2.4 के शीर्षक का ही सवाल पूछिए: क्या मुग़ल काल का गाँव “छोटा गणराज्य” था?

नमूना उत्तर — किताब के अनुसार नहीं; अंग्रेज़ अफ़सरों की यह छवि किताब के प्रमाणों से मेल नहीं खाती।

  • बराबरी नहीं: व्यक्तिगत मिल्कियत, और जाति और जेंडर की गहरी विषमताएँ।
  • ताक़त कुछ के हाथ में: फ़ैसले और न्याय ताकतवर लोगों के हाथ में थे।
  • बाहर से जुड़ा गाँव: गाँव-शहर के व्यापार से नकद के रिश्ते गाँवों तक फैल चुके थे।

जाति और जेंडर की विषमता वाली बात अभ्यास के प्रश्न 6 के उत्तर में भी काम आएगी; जाति पर बाक़ी बात कालांश 3 में आ चुकी है।

गाँव में नकद, औरसराफ़

पृष्ठ 205–206

  • मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी
  • निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को मज़दूरी या पूर्व भुगतान नकद मिलता था
  • कपास, रेशम या नील जैसी व्यापारिक फ़सलें पैदा करने वालों का भुगतान भी नकद होता था
  • सत्रहवीं सदी के फ़्रांसीसी यात्री ज्यां बैप्टिस्ट तैवर्नियर के अनुसार सराफ़ एक बैंकर की तरह हवाला भुगतान करते थे

पृष्ठ 206 का बॉक्स आप पढ़िए और चित्र 8.6 किताब में दिखाइए। तैवर्नियर को यह बात उल्लेखनीय लगी कि “भारत में वे गाँव बहुत ही छोटे कहे जाएँगे जिनमें मुद्रा की फेर बदल करने वाले, जिन्हें सराफ़ कहते हैं, न हों।” बच्चे सराफ़ को सुनार समझ लेते हैं; किताब में वे मुद्रा की फेर बदल करने वाले हैं, और सुनार दस्तकारों की सूची में अलग से आता है।

तेज़ बच्चों से पृष्ठ 206 के “चर्चा कीजिए” वाले प्रश्न की तैयारी करवाइए: इस अनुभाग की पंचायतों के बारे में किताब से चार बातें लिखिए: सदस्य, मुखिया, काम, और सीमाएँ। यह काम हमारी ओर से है; किताब का बॉक्स इन्हें आज की ग्राम पंचायतों से मिलाने को कहता है, वह मिलान कक्षा में मत करवाइए।

नमूना उत्तर — किताब के पृष्ठ 202–203 से:

  • सदस्य: गाँव के बुज़ुर्ग, आमतौर पर गाँव के महत्त्वपूर्ण लोग जिनके पास अपनी संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार होते थे; जिन गाँवों में कई जातियों के लोग रहते थे, वहाँ पंचायत में भी अकसर विविधता होती थी।

  • मुखिया: मुक़द्दम या मंडल। कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्ग आम सहमति से उसे चुनते थे और फिर इसकी मंज़ूरी ज़मींदार से लेनी पड़ती थी; बुज़ुर्गों का भरोसा न रहे तो वे उसे बर्ख़ास्त कर सकते थे। उसका मुख्य काम गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब–किताब अपनी निगरानी में बनवाना था, जिसमें पटवारी उसकी मदद करता था।

  • काम: आम ख़ज़ाने से कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी विपदाओं से निपटना, और मिट्टी के छोटे–मोटे बाँध बनाना या नहर खोदना; लोगों को अपनी जाति की हदों के अंदर रखना; जुर्माना लगाना और एक सीमित समय के लिए समुदाय से निकालना।

  • सीमाएँ: “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए पंचायत में जगह होने की संभावना कम थी; मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी के साथ मिलकर हिसाब–किताब में हेरा–फेरी करते थे और अपनी ज़मीन पर कर का आकलन कम करके अतिरिक्त बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।

  • सदस्य: पुश्तैनी संपत्ति वाले बुज़ुर्ग, एक “अल्पतंत्र”।

  • मुखिया: मुक़द्दम या मंडल, आम सहमति से चुना और ज़मींदार की मंज़ूरी से।

  • काम: आम ख़ज़ाने से सामुदायिक काम, जाति की हदें, जुर्माना और निष्कासन, अर्ज़ियों की सुनवाई।

  • सीमाएँ: “नीच” काम करने वालों की जगह कम, और मंडलों पर हेरा-फेरी के आरोप।

आज की पंचायतों से मिलान वाला हिस्सा कक्षा में मत करवाइए; बात किताब की तसवीर तक रखिए।

5 | 3. कृषि समाज में महिलाएँ

सोलहवीं सदी के किसी गाँव के खेत में खड़े होकर देखते, तो बुआई, निराई और कटाई करते कौन दिखते?

कंधे से कंधा मिलाकर

पृष्ठ 206

  • महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे
  • मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं
  • छोटी ग्रामीण इकाइयों और किसान की व्यक्तिगत खेती में घर-परिवार के संसाधन और श्रम ही उत्पादन की बुनियाद थे
  • इसलिए “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा फ़र्क मुमकिन नहीं था
  • सूत कातना, बरतन बनाने के लिए मिट्टी को साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर निर्भर थे

चित्र 8.7 (सूत कातती महिला) बच्चे किताब में देखें। बच्चे अकसर मान लेते हैं कि उस समय महिलाएँ सिर्फ़ घर का काम करती थीं; किताब के अनुसार वे खेत में, दस्तकारी में, और ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करती थीं।

चित्र 8.8: निर्माण-स्थल पर महिलाएँ

पृष्ठ 207

  • चित्र 8.8 (क): “फ़तेहपुर सीकरी का निर्माण। महिलाएँ पत्थर तोड़ रही हैं।”
  • चित्र 8.8 (ख): “बोझा ढोती महिलाएँ। आस–पास के दूसरे गाँवों से आने वाली महिलाएँ अकसर ऐसे निर्माण–स्थलों पर काम करती थीं।”
  • किताब के अनुसार (पृष्ठ 206) किसी वस्तु का जितना वाणिज्यीकरण होता था, उसके उत्पादन के लिए महिलाओं के श्रम की उतनी ही माँग होती थी

दोनों चित्र किताब में दिखाइए और शीर्षक पढ़वाइए। फिर पूछिए: इस अध्याय से एक उदाहरण दीजिए कि बाज़ार के लिए उत्पादन बढ़ने से महिलाओं के श्रम की माँग कैसे बढ़ती होगी। यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — कपड़ा इसका अच्छा उदाहरण है।

  • महिलाओं का काम: सूत कातना महिलाओं के श्रम पर निर्भर था।
  • बाज़ार: निर्यात के लिए उत्पादन करने वाले दस्तकारों को नकद मज़दूरी या पूर्व भुगतान मिलता था (पृष्ठ 205), और कपास बेहतरीन जिन्स–ए–कामिल थी (पृष्ठ 200)।

जितना कपड़ा बाज़ार के लिए बनता, उतने सूत की, और इसलिए महिलाओं के श्रम की, ज़रूरत बढ़ती। हर उदाहरण ठीक है, अगर वह किताब की किसी बात से जुड़ा हो।

संसाधन भी, काबू में भी

पृष्ठ 206–207

  • पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाओं को हल या कुम्हार का चाक छूने की इजाज़त नहीं थी; बंगाल में मासिक धर्म के समय महिलाएँ पान के बगान में नहीं जा सकती थीं
  • समाज श्रम पर निर्भर था, इसलिए बच्चे पैदा करने की क़ाबिलियत के कारण महिलाओं को महत्त्वपूर्ण संसाधन माना जाता था
  • कुपोषण, बार-बार माँ बनने और प्रसव के वक़्त मौत की वजह से महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, इसलिए शादीशुदा महिलाओं की कमी थी
  • कई ग्रामीण संप्रदायों में शादी के लिए “दुलहन की कीमत” अदा करनी होती थी, दहेज नहीं; तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ, दोनों कानूनन शादी कर सकती थीं
  • फिर भी घर का मुखिया मर्द होता था, और परिवार और समुदाय के मर्द महिला पर पुरज़ोर काबू रखते थे

यह हिस्सा आप पढ़िए, किताब के शब्दों में और बिना किसी टिप्पणी के। “दुलहन की कीमत” और दहेज को बच्चे उलट देते हैं; बोर्ड पर साफ़ लिखवाइए कि किताब के अनुसार इन संप्रदायों में दुलहन की कीमत अदा होती थी, दहेज नहीं। फिर पूछिए: शादीशुदा महिलाओं की कमी क्यों थी, और इसका शादी के रिवाजों पर क्या असर पड़ा? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — महिलाओं में मृत्युदर बहुत ज़्यादा थी, और इससे किसान और दस्तकार समाज के रिवाज संभ्रांत समूहों से अलग बने।

  • कारण: कुपोषण, बार-बार माँ बनना, और प्रसव के वक़्त मौत।
  • असर: कई ग्रामीण संप्रदायों में “दुलहन की कीमत”, दहेज नहीं; और तलाकशुदा महिलाएँ और विधवाएँ कानूनन शादी कर सकती थीं।

दरख़्वास्तें, और ज़मीन पर हक़

पृष्ठ 207

  • पश्चिमी भारत (राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र) के दस्तावेज़ों में महिलाओं की वे दरख़्वास्तें मिलती हैं जो उन्होंने न्याय और मुआवज़े की उम्मीद से ग्राम पंचायत को भेजीं
  • ज़्यादातर में महिला का नाम दर्ज नहीं होता था; उसे घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में लिखा जाता था
  • भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ था
  • पंजाब में महिलाएँ, विधवाएँ भी, पुश्तैनी संपत्ति बेचने वाली के रूप में ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में सक्रिय थीं
  • हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे बेचने या गिरवी रखने के लिए वे स्वतंत्र थीं; बंगाल में भी महिला ज़मींदार थीं

पूछिए: किताब बंगाल की किस ज़मींदारी का उदाहरण देती है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — राजशाही की ज़मींदारी।

  • कब: अठारहवीं सदी में।
  • कितनी बड़ी: उस सदी की सबसे बड़ी और मशहूर ज़मींदारियों में से एक।

उसकी कर्ता-धर्ता एक स्त्री थी।

पृष्ठ 207 के “चर्चा कीजिए” वाले बॉक्स का सवाल आज के प्रांत के बारे में है। किसी बच्चे से उसके घर की महिलाओं या परिवार की ज़मीन के बारे में मत पूछिए; उसकी जगह किताब की तसवीर पर यह सवाल कीजिए: सोलहवीं से अठारहवीं सदी में ज़मीन पर महिलाओं के कौन-से हक़ थे, और पंचायत के दस्तावेज़ उन्हें कैसे दर्ज करते थे? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — हक़ कई थे, पर दस्तावेज़ों में महिला अकसर बिना नाम के दिखती है।

  • हक़: भूमिहर भद्रजनों में पुश्तैनी संपत्ति; पंजाब में ज़मीन बेचने वाली के रूप में; और उत्तराधिकार में ज़मींदारी, जिसे वे बेच या गिरवी रख सकती थीं।
  • दस्तावेज़: ज़्यादातर दरख़्वास्तों में नाम दर्ज नहीं, सिर्फ़ घर के मर्द या मुखिया की माँ, बहन या पत्नी के रूप में हवाला।

अभ्यास के प्रश्न 3 के उत्तर में खेत और दस्तकारी का श्रम मुख्य है; ज़मीन पर ये हक़ उस उत्तर को पूरा करते हैं।

6 | 4. जंगल और कबीले: 4.1 बसे हुए गाँवों के परे; 4.2 जंगलों में घुसपैठ

जो लोग खेत से नहीं, जंगल के सहारे जीते थे, उनकी ज़िंदगी तक राज्य और बाज़ार किन रास्तों से पहुँचे होंगे?

बसे हुए गाँवों के परे

पृष्ठ 208

  • उत्तर और उत्तर–पश्चिमी भारत के गहरी खेती वाले प्रदेशों को छोड़ दें तो ज़मीन के विशाल हिस्से जंगल या झाड़ियों (खरबंदी) से घिरे थे
  • ऐसे इलाके: झारखंड सहित पूरा पूर्वी भारत, मध्य भारत, उत्तरी क्षेत्र (भारत–नेपाल सीमा की तराई सहित), दक्षिणी भारत का पश्चिमी घाट, और दक्कन के पठार
  • उस काल में अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों के फैलाव का औसत निकालना लगभग असंभव है; फिर भी समसामयिक स्रोतों के आधार पर अंदाज़ा है कि यह करीब–करीब 40 फ़ीसदी था
  • उस समय की रचनाएँ जंगल में रहने वालों के लिए “जंगली” शब्द इस्तेमाल करती हैं, पर इसका मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था
  • यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था

“जंगली” शब्द कक्षा में इसी अर्थ में, और किताब के हवाले से ही आए। फिर पूछिए: किताब भीलों के साल के बारे में क्या बताती है, और इससे जंगल के कबीलों की कौन-सी ख़ासियत पता चलती है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — भीलों के काम मौसम के हिसाब से बदलते थे।

  • बसंत: जंगल के उत्पाद इकट्ठा करना।
  • गर्मियाँ: मछली पकड़ना।
  • मानसून: खेती।
  • शरद और जाड़ा: शिकार।

यह सिलसिला लगातार गतिशीलता पर टिका था; एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहना जंगल के कबीलों की ख़ासियत थी।

बाबर की नज़र में जंगल

“जिसके पीछे परग़ना के लोग कड़े विद्रोही हो जाते थे और कर अदा करने से मुकर जाते थे।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 208

बाबर जंगल को ऐसा रक्षाकवच कहता है। राज्य के लिए जंगल उलट फेर वाला इलाका था, बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा (मवास)। बोर्ड पर दो शब्द लिखवाइए: परगना मुग़ल प्रांतों में एक प्रशासनिक प्रमंडल था, और पेशकश मुग़ल राज्य के द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट थी। फिर पूछिए: जंगलवासियों से ली जाने वाली पेशकश में अकसर हाथी क्यों होते थे? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — राज्य को सेना के लिए हाथियों की ज़रूरत होती थी, इसलिए पेशकश में अकसर हाथी भी होते थे। किताब के अनुसार जंगल में बाहरी ताक़तें कई तरह से घुसती थीं, और यह उनमें से एक था।

चित्र 8.9: नीलगाय का शिकार करता शाहजहाँ

पृष्ठ 208–209

  • बादशाहनामा का चित्र
  • मुग़ल राजनीतिक विचारधारा में शिकार अभियान ग़रीबों और अमीरों सहित सबके साथ राज्य के गहरे सरोकार का एक लक्षण था
  • दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था

बच्चे चित्र किताब में देखें। किनारे का प्रश्न पूछिए: “आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?”

नमूना उत्तर — चित्र में शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है।

  • दृश्य: पहाड़ी, जंगली इलाके में बादशाह (शाहजहाँ) बंदूक से नीलगाय का शिकार कर रहा है; उसके सिर के पीछे रोशनी का घेरा (प्रभामंडल) है; दाईं ओर दरबारी खड़े हैं।
  • शिकार और न्याय: दरबारी इतिहासकारों के अनुसार शिकार अभियान के नाम पर बादशाह लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद ध्यान देता था।
  • सांकेतिक तत्व: किताब बताती है कि दरबारी कलाकारों के शिकार वाले चित्रों में चित्रकार अकसर एक छोटा-सा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था।

जो बच्चा चित्र में दिखती चीज़ें ठीक-ठीक बता दे और शिकार को न्याय से किताब के तर्क से जोड़ दे, उसका उत्तर पूरा है।

स्रोत 3: कृषि बस्तियों के लिए जंगलों का सफ़ाया

“जंगलों को हटाने के बाद / उन्होंने बसाए बाज़ार।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 209 (स्रोत 3)

पहले कहानी बताइए, फिर पूरा स्रोत ज़ोर से पढ़वाइए। सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल का नायक कालकेतु जंगल खाली करवाकर एक साम्राज्य बसाता है। ख़बर मिलते ही तमाम जगहों से परदेसी आने लगे, और कालकेतु ने उन्हें चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे ख़रीदकर बाँटे। उत्तर से “दास / सैकड़ों उमड़ते हुए” आए, दक्खिन से फ़सल कटाई वाले “एक उद्यमी के साथ पाँच सौ”, और पश्चिम से ज़फ़र मियाँ “साथ में बाईस हज़ार लोग”। ये संख्याएँ कवि के शब्द हैं, आबादी के आँकड़े नहीं। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें “बिदेसी” बताया गया है?”

नमूना उत्तर — कविता जंगल को खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होते दिखाती है।

  • घुसपैठ के रूप: हर दिशा से परदेसियों का आना; चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे बाँटना; जंगल हटाकर बाज़ार बसाना; कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेरों का भाग जाना।
  • चित्र से तुलना: चित्र 8.9 में राज्य बादशाह के शिकार के रूप में जंगल में आता है, और उसे अच्छे शासन की तरह दिखाया गया है; कविता में जंगल खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होता है। दोनों में बाहरी ताक़त जंगल तक पहुँचती है।
  • “बिदेसी”: कविता में बाज़ार बसने के बाद “सैकड़ों सैकड़ों की तादाद में” आए बाहर के लोग, जो “जंगलों को (जैसे) खा लिए, और घुस आए वहाँ”; ऊपर कविता सब आने वालों को “परदेसी” कहती है। बच्चा कविता की पंक्तियों से जुड़ी दूसरी व्याख्या दे, तो वह भी ठीक है।

स्रोत 4: पहाड़ी कबीलों और मैदानों के बीच व्यापार

पृष्ठ 210 (स्रोत 4)

पहाड़ों से मैदान तक (कुछ वस्तुएँ)

  • सोना, ताँबा, कस्तूरी
  • शहद, अदरख, मोम
  • ऊनी कपड़े, लकड़ी के सामान

मैदानों से पहाड़ तक

  • सफ़ेद और रंगीन कपड़े
  • कहरुबा (जिससे गहने बनते थे), गहने
  • नमक, हींग, शीशे और मिट्टी के बरतन

अबुल फ़ज़्ल यह ब्योरा लगभग 1595 के अवध सूबे (आज के उत्तर प्रदेश का हिस्सा) के बारे में देता है। किनारे का प्रश्न पूछिए: “इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।”

नमूना उत्तर — सामान जानवरों और इंसानों की पीठ पर चलता था।

  • परिवहन: इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर सामान लादकर।
  • क्यों: पहाड़ के संकरे और ऊबड़–खाबड़ रास्तों पर गाड़ियाँ नहीं चल पाती होंगी, जबकि आदमी, मोटे–मोटे घोड़े और बकरे बोझ लेकर चढ़ सकते हैं।
  • मैदानों से पहाड़ तक: कपड़े पहनने के लिए; कहरुबा और गहने सजने के लिए; नमक और हींग खाने के लिए; शीशे और मिट्टी के बरतन घर के काम के लिए।

व्यापार, सरदार और पीर

पृष्ठ 210–211

  • शहद, मधुमोम और लाक जैसे जंगल के उत्पादों की बहुत माँग थी; लाक जैसी कुछ वस्तुएँ तो सत्रहवीं सदी में भारत से समुद्र पार होने वाले निर्यात की मुख्य वस्तुएँ थीं
  • हाथी पकड़े और बेचे जाते थे; पंजाब का लोहानी कबीला भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच के ज़मीनी व्यापार में लगा था
  • कबीलों के कई सरदार ज़मींदार बन गए, कुछ राजा भी; सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल सिपाही होते थे
  • असम में अहोम राजाओं के अपने पायक थे, जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी; सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध किए और उन पर कब्ज़ा जमा लिया
  • कुछ इतिहासकारों का सुझाव है कि नए बसे इलाकों के खेतिहर समुदायों ने जिस तरह धीरे–धीरे इस्लाम अपनाया, उसमें सूफ़ी संतों (पीर) की बड़ी भूमिका थी

पीर वाली बात “कुछ इतिहासकारों का सुझाव” है; उत्तर में यह शर्त बनी रहे। बच्चे अकसर मानते हैं कि जंगल के लोग बाहर की दुनिया से कटे हुए थे; किताब उलटी तसवीर देती है: पेशकश, बाज़ार, व्यापार और सेनाएँ। फिर पूछिए: किताब कहती है कि कबीलाई व्यवस्था से राजतांत्रिक प्रणाली की ओर संक्रमण बहुत पहले शुरू हो चुका था, पर ऐसा लगता है कि सोलहवीं सदी में आकर ही यह प्रक्रिया पूरी तरह विकसित हुई। पृष्ठ 210–211 से इसके उदाहरण दीजिए। यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — किताब तीन तरह के उदाहरण देती है।

  • सरदार: कई सरदार ज़मींदार बने, कुछ राजा भी, और सेना के लिए उन्होंने अपने खानदान के लोगों को भर्ती किया या भाई–बंधुओं से सैन्य सेवा माँगी।
  • अहोम: उनके अपने पायक थे, और उन्होंने जंगली हाथी पकड़ने पर अपना एकाधिकार घोषित कर रखा था।
  • कोच: उन्होंने पड़ोसी कबीलों से एक के बाद एक युद्ध करके उन पर कब्ज़ा जमा लिया।

पृष्ठ 211 का “चर्चा कीजिए” बॉक्स आज के जंगल वाले इलाकों के बारे में पूछता है; कक्षा में बात किताब के समय तक रखिए। अभ्यास का प्रश्न 7 पूछता है कि सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी किस तरह बदल गई; उसके उत्तर में पृष्ठ 208–211 की ये सब बातें काम आएँगी।

7 | 5. ज़मींदार

गाँव में एक तबका ऐसा था जिसकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था। वह कौन था, और उसकी ताक़त कहाँ से आती होगी?

ज़मींदार कौन थे

पृष्ठ 211

  • गाँवों में रहने वाला वह तबका, जिसकी कमाई तो खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेता था
  • वे अपनी ज़मीन के मालिक थे, और ऊँची हैसियत की वजह से उन्हें कुछ ख़ास सामाजिक और आर्थिक सुविधाएँ मिली हुई थीं
  • हैसियत के दो कारण: एक, जाति; दूसरा, वे राज्य को कुछ ख़ास किस्म की सेवाएँ (ख़िदमत) देते थे
  • समृद्धि की वजह उनकी विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी, जिसे मिल्कियत (यानी संपत्ति) कहते थे; उस पर ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए खेती होती थी
  • अकसर इन ज़मीनों पर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूर काम करते थे, और ज़मींदार इन्हें अपनी मर्ज़ी से बेच सकते थे, किसी और के नाम कर सकते थे या गिरवी रख सकते थे

बच्चे अकसर मान लेते हैं कि ज़मींदार ख़ुद हल चलाते थे। बोर्ड पर पहली पंक्ति साफ़ लिखवाइए: कमाई खेती से, पर कृषि उत्पादन में सीधा हिस्सा नहीं। फिर पूछिए: मिल्कियत पर खेती कौन करता था, और ज़मींदार उस ज़मीन के साथ क्या-क्या कर सकते थे? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — मिल्कियत ज़मींदार की विस्तृत व्यक्तिगत ज़मीन थी।

  • खेती कौन करता था: अकसर दिहाड़ी के मज़दूर या पराधीन मज़दूर, ज़मींदार के निजी इस्तेमाल के लिए।
  • ज़मींदार क्या कर सकते थे: अपनी मर्ज़ी से बेचना, किसी और के नाम करना, या गिरवी रखना।

कर वसूली, किले और सिपाही

पृष्ठ 211

  • ज़मींदार अकसर राज्य की ओर से कर वसूल कर सकते थे, और इसके बदले उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था
  • सैनिक संसाधन उनकी ताक़त का एक और ज़रिया था
  • ज़्यादातर ज़मींदारों के पास अपने किले भी थे और अपनी सैनिक टुकड़ियाँ भी, जिनमें घुड़सवारों, तोपखाने और पैदल सिपाहियों के जत्थे होते थे

यहाँ से अगली स्लाइड के आँकड़ों पर जाइए। बच्चों से पहले अंदाज़ा लगवाइए कि पूरे मुग़ल भारत के ज़मींदारों के पास मिलाकर कितने घुड़सवार रहे होंगे, फिर बॉक्स खोलिए।

एक समांतर सैनिक बल!

पृष्ठ 212 · आइन के अनुसार, मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति

क्याकितने
घुड़सवार384,558
पैदल4,277,057
हाथी1,863
तोप4,260
नाव4,500

आँकड़े बोर्ड पर भी लिखिए। फिर पूछिए: ये आँकड़े किस ग्रंथ से हैं, और इनसे ज़मींदारों के बारे में क्या पता चलता है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — ये आँकड़े आइन के हैं, और मुग़ल भारत में ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति बताते हैं।

  • कितनी बड़ी ताक़त: घुड़सवार, पैदल, हाथी, तोप और नाव, सब लाखों और हज़ारों में।
  • किताब की बात से मेल: पृष्ठ 211 कहता है कि सैनिक संसाधन ज़मींदारों की ताक़त का एक और ज़रिया था, और ज़्यादातर ज़मींदारों के अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।

ज़मींदार की ताक़त ज़मीन से भी आती थी और हथियारों से भी।

पिरामिड के संकरे शीर्ष पर

पृष्ठ 211–212

  • मुग़लकालीन गाँवों के सामाजिक संबंधों की कल्पना एक पिरामिड के रूप में करें, तो ज़मींदार उसके संकरे शीर्ष का हिस्सा थे
  • अबुल फ़ज़्ल इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन ने ग्रामीण समाज पर पहले ही अपना ठोस नियंत्रण बना रखा था
  • ज़मींदारों में तथाकथित मध्यम जातियों की भी ख़ासी नुमाइंदगी थी, और कई मुसलमान ज़मींदार भी थे

यह हिस्सा किताब के शब्दों में ही पढ़िए, और किसी बच्चे की जाति या उसके परिवार की ज़मीन से इसे मत जोड़िए। बच्चे अकसर लिख देते हैं कि सब ज़मींदार ऊँची जाति के थे; किताब के अनुसार ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन का ठोस नियंत्रण था, पर मध्यम जातियाँ और मुसलमान ज़मींदार भी थे, और अगली स्लाइड बताती है कि अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।

ज़मींदारी बनी कैसे

पृष्ठ 212

  • समसामयिक दस्तावेज़ों से ऐसा लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत रहा होगा; अकसर ज़मींदारी फैलाने का एक तरीक़ा था ताक़तवर सैनिक सरदारों का कमज़ोर लोगों को बेदख़ल करना
  • पर इसकी संभावना कम ही है कि राज्य किसी ज़मींदार को इतने आक्रामक रुख की इजाज़त देता, जब तक एक राज्यादेश (सनद) से इसकी पुष्टि पहले न हो चुकी हो
  • किताब के अनुसार इससे भी महत्त्वपूर्ण थी ज़मींदारी को पुख़्ता करने की धीमी प्रक्रिया, जिसके दस्तावेज़ स्रोतों में हैं
  • राजपूतों और जाटों ने उत्तर भारत में ज़मीन की बड़ी–बड़ी पट्टियों पर नियंत्रण पुख़्ता किया; मध्य और दक्षिण–पश्चिम बंगाल में किसान–पशुचारियों (जैसे सदगोप) ने ताक़तवर ज़मींदारियाँ खड़ी कीं

पूछिए: किताब के अनुसार अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार कैसे बन सकते थे? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — ज़मींदारी पुख़्ता करने की धीमी प्रक्रिया के तरीक़ों से।

  • नयी ज़मीनें बसाकर: जंगल–बारी।
  • अधिकारों के हस्तांतरण से, या राज्य के आदेश से।
  • ख़रीदकर: उस काल में ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी और बेची जाती थी।

इन्हीं प्रक्रियाओं से वे ज़मींदारों के दर्जे में दाख़िल हो सकते थे।

तेज़ विद्यार्थियों से पूछिए: किताब जंग में जीत को एक संभावित स्रोत मानती है, फिर भी धीमी प्रक्रिया को ज़्यादा महत्त्वपूर्ण क्यों बताती है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — जंग का रास्ता राज्य की मंज़ूरी पर टिका था, जबकि धीमी प्रक्रिया के कई रास्ते थे।

  • जंग: इसकी संभावना कम थी कि राज्य सनद से पुष्टि के बिना ऐसे आक्रामक रुख की इजाज़त देता।
  • धीमी प्रक्रिया: इसके दस्तावेज़ स्रोतों में हैं, और इसके कई तरीक़े थे: नयी ज़मीनें बसाना, अधिकारों का हस्तांतरण, राज्य का आदेश और ख़रीद।

गाँव में ज़मींदार

पृष्ठ 212

  • ज़मींदारों ने खेती लायक ज़मीनों को बसाने में अगुआई की
  • खेतिहरों को खेती का साजो–सामान और उधार देकर उन्हें वहाँ बसने में मदद की
  • ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया में तेज़ी आई
  • ज़मींदार अपनी मिल्कियत की ज़मीनों की फ़सल भी बेचते थे, और अकसर बाज़ार (हाट) स्थापित करते थे, जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे

पूछिए: ज़मींदार गाँव के बाज़ार से किन दो तरीक़ों से जुड़े थे? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — वे बेचने वाले भी थे और बाज़ार लगवाने वाले भी।

  • बेचने वाले: वे अपनी मिल्कियत की ज़मीनों की फ़सल बेचते थे।
  • बाज़ार लगवाने वाले: वे अकसर हाट स्थापित करते थे, जहाँ किसान भी अपनी फ़सलें बेचने आते थे।

शोषण भी, और संरक्षण का पुट भी

“हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, लेकिन किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 212

पूछिए: किताब कौन-से दो पहलू बताती है जो इस बात की पुष्टि करते हैं? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — किताब दो पहलू देती है।

  • भक्ति संत: उन्होंने जातिगत और दूसरी किस्मों के अत्याचारों की बड़ी बेबाकी से निंदा की, पर ज़मींदारों को (और, किताब के शब्दों में “दिलचस्प बात है”, साहूकारों को भी) किसानों के शोषक या उन पर अत्याचार करने वाले के रूप में नहीं दिखाया; आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी ही उनके गुस्से का निशाना बना।
  • कृषि विद्रोह: सत्रहवीं सदी में भारी संख्या में कृषि विद्रोह हुए, और उनमें राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अकसर किसानों का समर्थन मिला।

बच्चे यहाँ उलटा लिख देते हैं कि भक्ति संतों ने ज़मींदारों को शोषक बताया; किताब के अनुसार उनका निशाना राजस्व अधिकारी था।

चर्चा कीजिए: ज़मींदारी क्यों ख़त्म की गई

पृष्ठ 213

  • किताब का सवाल: “आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।”
  • उत्तर पृष्ठ 211–213 की बातों से बनाइए

किताब के बाहर का इतिहास मत जोड़िए; कारण इन्हीं पृष्ठों से निकलवाइए।

हमारी ओर से — पृष्ठ 211–213 से ये कारण समझ में आते हैं:

  • बिना खेती की कमाई: ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; उनकी मिल्कियत पर अकसर दिहाड़ी के या पराधीन मज़दूर काम करते थे।
  • शोषण: किताब कहती है कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था।
  • राज्य और किसान के बीच: वे राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे।
  • अपनी ताक़त: उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।
  • जाति का विशेषाधिकार: उनकी ऊँची हैसियत का एक कारण उनकी जाति थी।

साथ में यह भी याद रखिए कि किताब उनके रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट” भी बताती है। अभ्यास का प्रश्न 8, “मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका की जाँच कीजिए।”, पृष्ठ 211–213 की इन सब बातों से लिखा जाएगा।

8 | 6. भू–राजस्व प्रणाली

इतने बड़े साम्राज्य का ख़र्च कहाँ से चलता था, और राज्य कैसे तय करता था कि किस गाँव से कितना लेना है?

राजस्व: साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद

पृष्ठ 213

  • ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था
  • इसलिए कृषि उत्पादन पर नियंत्रण रखने, और तेज़ी से फैलते साम्राज्य के सभी इलाकों में राजस्व के आकलन और वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा
  • दीवान इस तंत्र में शामिल था; उसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी
  • इस तरह हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में दाख़िल हुए, और कृषि संबंधों को शक्ल देने में एक निर्णायक ताक़त बने

पूछिए: लोगों पर कर का बोझ तय करने से पहले मुग़ल राज्य ने क्या किया? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — राज्य ने पहले जानकारी जुटाने की कोशिश की।

  • सूचनाएँ: ज़मीन और उस पर होने वाले उत्पादन के बारे में ख़ास किस्म की सूचनाएँ इकट्ठा करने की कोशिश की।
  • नपाई: हर प्रांत में जुती हुई और जोतने लायक, दोनों तरह की ज़मीन की नपाई हुई।

जमा औरहासिल

पृष्ठ 213 · भू–राजस्व के इंतज़ाम के दो चरण

जमा

  • पहला चरण: कर निर्धारण
  • निर्धारित रक़म

हासिल

  • दूसरा चरण: वास्तविक वसूली
  • सचमुच वसूली गई रक़म

दोनों शब्द बोर्ड पर अलग-अलग लिखवाइए; बच्चे इन्हें एक ही मान लेते हैं। फिर बताइए कि दोनों अलग क्यों दर्ज होते थे: राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, मगर स्थानीय हालात की वजह से कभी–कभी सचमुच में इतनी वसूली कर पाना संभव नहीं हो पाता था।

अमील–गुज़ार यानी राजस्व वसूली करने वाला। उसके कामों की सूची में अकबर का हुक्म था कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें, पर फ़सलों में भुगतान का विकल्प भी खुला रहे। इसलिए “मुग़ल सिर्फ़ नक़द कर लेते थे” लिखना ग़लत है।

नपाई, औरअमीन

पृष्ठ 213–214

  • हर प्रांत में जुती हुई ज़मीन और जोतने लायक ज़मीन, दोनों की नपाई की गई; बाद के बादशाहों के शासनकाल में भी नपाई के प्रयास जारी रहे
  • मसलन, 1665 ई. में औरंगज़ेब ने अपने राजस्व कर्मचारियों को स्पष्ट निर्देश दिया कि हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखा जाए
  • इसके बावजूद सभी इलाक़ों की नपाई सफलतापूर्वक नहीं हुई; उपमहाद्वीप के कई बड़े हिस्से जंगलों से घिरे थे, और इनकी नपाई नहीं हुई
  • अमीन एक मुलाज़िम था, जिसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना था कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो रहा है (पृष्ठ 214, किनारे की टिप्पणी)

1665 वाली बात एक निर्देश है; किताब ख़ुद आगे कहती है कि सभी इलाक़ों की नपाई सफलतापूर्वक नहीं हुई। बच्चे यह न लिखें कि हर इलाके की नपाई हो गई। जंगलों वाली बात पृष्ठ 208 से जोड़िए।

स्रोत 5: अकबर के शासन में भूमि का वर्गीकरण

“अकबर बादशाह ने अपनी गहरी दूरदर्शिता के साथ ज़मींनों का वर्गीकरण किया और हरेक (वर्ग की ज़मीन) के लिए अलग-अलग राजस्व निर्धारित किया।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 214 (स्रोत 5)

स्रोत 5 बच्चों से किताब में पढ़वाइए, फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?”

नमूना उत्तर — आइन के अनुसार ज़मीन इस आधार पर बँटी थी कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है, और हर वर्ग का राजस्व अलग था।

  • पोलज: हर साल खेती, कभी ख़ाली नहीं छोड़ी जाती।
  • परौती: कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती, ताकि वह अपनी खोई ताक़त वापस पा सके।
  • चचर: तीन या चार वर्षों तक ख़ाली।
  • बंजर: पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं हुई।
  • राजस्व: पहले दो वर्गों की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और ख़राब। तीनों का उत्पाद जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और उसका एक–तिहाई शाही शुल्क।

एक–तिहाई वाला नियम किताब पोलज और परौती के लिए बताती है; बच्चे इसे चारों वर्गों पर न लगाएँ।

स्रोत 6: नक़द या जीन्स ?

“सिर्फ़ नक़द लेने की आदत न डाले बल्कि फ़सल भी लेने के लिए तैयार रहे।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 215 (स्रोत 6)

यह आइन का एक और अनुच्छेद है, और बात अमील-गुज़ार से कही गई है। फ़सल लेने के जो तरीक़े यह स्रोत गिनाता है, वे अगली स्लाइड पर हैं।

फ़सल में वसूली के तरीक़े, स्रोत 6 के अनुसार

पृष्ठ 215

तरीक़ाकैसे
कणकुतकण यानी अनाज, कुत यानी अंदाज़ा; शक हो तो फ़सल अच्छे, मध्यम और बदतर, तीन पुलिंदों में काटी जाए
बटाई या भाओलीफ़सल काटकर जमा की जाती, फिर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा
खेत बटाईबीज बोने के बाद खेत बाँट लिए जाते
लाँग बटाईफ़सल काटने के बाद उसका ढेर बनाकर बाँट लिया जाता, और हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता

किनारे का प्रश्न पूछिए: “राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?”

नमूना उत्तर — हर तरीक़े का किसान पर असर अलग रहा होगा।

  • नक़द: किसान को फ़सल बेचकर पैसा जुटाना पड़ता होगा, इसलिए बाज़ार के भाव का असर उस पर पड़ता होगा।
  • कणकुत: फ़सल का अंदाज़ा लगाया जाता; ग़लत अंदाज़े से किसान को नुक़सान भी हो सकता था।
  • बटाई या भाओली: सबके सामने और रज़ामंदी से बँटवारा होता; पर इसमें कई समझदार निरीक्षक चाहिए थे, वरना धोखेबाज़ी का डर था।
  • खेत बटाई: बुआई के बाद खेत ही बाँट लिए जाते, तो फ़सल अच्छी हो या ख़राब, दोनों का जोखिम बँट जाता होगा।
  • लाँग बटाई: कटाई के बाद ढेर बाँटकर हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता।

यह प्रश्न “क्या फ़र्क पड़ता होगा” पूछता है, इसलिए हर तर्क ठीक है, अगर वह तरीक़े के किताब में दिए ब्योरे से निकले।

स्रोत 7: जमा

“वे परगनाओं के अमीनों को निर्देश दें कि वे हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के बावत खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) पता करें, और बारीकी से उनकी जाँच करने के बाद सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) व किसानों के कल्याण को ध्यान में रखते हुए जमा निर्धारित करें।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 215 (स्रोत 7)

किताब इसे 1665 ई. में औरंगज़ेब के अपने राजस्व अधिकारी को दिए हुक्म का एक अंश बताती है। यह एक हुक्म है; बच्चों को बताइए कि हुक्म यह बताता है कि क्या करने को कहा गया, यह नहीं कि हर जगह वैसा हुआ। फिर किनारे का प्रश्न पूछिए: “आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?”

नमूना उत्तर — क्योंकि बारीक जानकारी के बिना जमा ठीक से तय नहीं हो सकता था।

  • हर गाँव अलग: हर गाँव की ज़मीन और फ़सल अलग थी, इसलिए हुक्म हर गाँव, हर किसान की जाँच माँगता है।
  • दो हितों का संतुलन: हुक्म कहता है कि जमा सरकार के वित्तीय हितों और किसानों के कल्याण, दोनों को ध्यान में रखकर तय हो।
  • राज्य की ज़रूरत: ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।

मानचित्र 1, और मनसबदार

पृष्ठ 214

  • मानचित्र 1 (मुग़ल साम्राज्य का विस्तार): साम्राज्य तीन चरणों में बढ़ा, 1530 में बाबर के शासन तक, 1605 में अकबर के शासन तक, और 1707 में औरंगज़ेब के शासन तक
  • मुग़ल प्रशासनिक व्यवस्था के शीर्ष पर एक सैनिक–नौकरशाही तंत्र (मनसबदारी) था, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी
  • कुछ मनसबदारों को नक़दी भुगतान होता था, पर ज़्यादातर को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों में राजस्व के आबंटन के ज़रिये भुगतान किया जाता था; समय–समय पर उनका तबादला होता था

बच्चों की किताब में मानचित्र 1 खुलवाइए और एटलस से मिलाइए। फिर पृष्ठ 214 का किनारे का प्रश्न पूछिए: “भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?”

नमूना उत्तर — साम्राज्य जितना फैला, राजस्व का तंत्र भी उतना बढ़ा।

  • बड़ा प्रशासनिक तंत्र: तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में राजस्व आकलन और वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, जिसमें दीवान का दफ़्तर शामिल था।
  • नए लोग, नयी ताक़त: हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में आए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताक़त बने।
  • आँकड़े और जाँच: ज़मीन और खेती की जानकारी जुटाई गई; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव, हर किसान की जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
  • मनसबदारों का भुगतान: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।

जो बच्चा फैलाव को तंत्र, आँकड़ों और मनसबदारों के भुगतान, तीनों से जोड़ दे, उसका उत्तर पूरा है।

क्या यह व्यवस्था लचीली थी?

पृष्ठ 215 · चर्चा कीजिए

  • किताब का सवाल: “क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?”
  • उत्तर पृष्ठ 213–215 की बातों से दीजिए: वर्ग, किस्में, नक़द या फ़सल, जमा और हासिल

यह सवाल तेज़ विद्यार्थियों के लिए अच्छा है; दोनों पक्ष लिखवाइए।

नमूना उत्तर — काफ़ी हद तक हाँ, पर एक सीमा के साथ।

  • लचीलापन: ज़मीन के चार वर्ग और पहले दो की तीन किस्में, हर एक का अलग राजस्व; नक़द या फ़सल, और फ़सल में कई तरीक़े; जमा और हासिल अलग दर्ज; औरंगज़ेब के हुक्म में किफ़ायत और किसानों का कल्याण, दोनों।
  • सीमा: राज्य अपना हिस्सा ज़्यादा से ज़्यादा रखने की कोशिश करता था, और पोलज और परौती पर शाही शुल्क मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई तय था।

अभ्यास का प्रश्न 5 कहता है: “उन सबूतों की जाँच कीजिए जो ये सुझाते हैं कि मुग़ल राजकोषीय व्यवस्था के लिए भू–राजस्व बहुत महत्त्वपूर्ण था।” पृष्ठ 213–215 की सब बातें, आर्थिक बुनियाद से लेकर मनसबदारों के भुगतान तक, उसी के सबूत हैं।

9 | 7. चाँदी का बहाव

भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, फिर भी सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच यहाँ चाँदी के रुपयों की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही। यह चाँदी कहाँ से आई?

साम्राज्यों की स्थिरता, और व्यापार का विस्तार

पृष्ठ 215

  • मुग़ल साम्राज्य एशिया के उन बड़े साम्राज्यों में एक था जो सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में सत्ता और संसाधनों पर अपनी पकड़ मज़बूत बनाने में कामयाब रहे
  • बाकी तीन थे मिंग (चीन में), सफ़ावी (ईरान में) और ऑटोमन (तुर्की में)
  • इन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता ने चीन से लेकर भूमध्य सागर तक ज़मीनी व्यापार का जीवंत जाल बिछाने में मदद की
  • खोजी यात्राओं से, और “नयी दुनिया” के खुलने से, यूरोप के साथ एशिया के, ख़ासकर भारत के, व्यापार में भारी विस्तार हुआ
  • भारत के समुद्र-पार व्यापार में भौगोलिक विविधता आई, और कई नयी वस्तुओं का व्यापार भी शुरू हुआ

एटलस या दुनिया के नक्शे पर चारों साम्राज्यों के इलाके दिखाइए। फिर पूछिए: किताब के अनुसार इस दौर में भारत का व्यापार किन दो रास्तों से बढ़ा? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — ज़मीन के रास्ते भी, और समुद्र के रास्ते भी।

  • ज़मीनी व्यापार: साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता से चीन से भूमध्य सागर तक व्यापार का जाल बिछा।
  • समुद्री व्यापार: खोजी यात्राओं और “नयी दुनिया” के खुलने से यूरोप के साथ व्यापार में भारी विस्तार हुआ।

चाँदी भारत की तरफ़ क्यों खिंची

पृष्ठ 215–216

  • लगातार बढ़ते व्यापार के साथ, भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं का भुगतान करने के लिए एशिया में भारी मात्रा में चाँदी आई
  • इस चाँदी का एक बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया
  • किताब के अनुसार यह भारत के लिए अच्छा था, क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे

बच्चों की किताब में पृष्ठ 215 का चित्र 8.11 (अकबर द्वारा जारी किए गए चाँदी के रुपये) और पृष्ठ 216 का चित्र 8.12 (औरंगज़ेब द्वारा जारी किया गया चाँदी का रुपया) दिखाइए। कोई बच्चा कहे कि चाँदी भारत की अपनी खानों से निकलती थी, तो किताब की यही पंक्ति पढ़वाइए: यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, चाँदी निर्यात के भुगतान के रूप में बाहर से आई।

चाँदी आने के नतीजे

पृष्ठ 216 · सोलहवीं से अठारहवीं सदी के बीच

किस परकिताब क्या कहती है
धातु मुद्राधातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही
अर्थव्यवस्थामुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ
मुग़ल राज्यनकदी में कर उगाहने में आसानी हुई

पूछिए: किताब चाँदी के इस बहाव को भारत के लिए अच्छा क्यों मानती है, और इसके क्या नतीजे हुए? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे, इसलिए बाहर से आई चाँदी यहाँ के लिए अच्छी थी।

  • स्थिर मुद्रा: चाँदी के रुपयों की उपलब्धि में अच्छी स्थिरता बनी रही।
  • मुद्रा का चलन: मुद्रा संचार और सिक्कों की ढलाई में अभूतपूर्व विस्तार हुआ।
  • कर वसूली: मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।

जो बच्चा “प्राकृतिक संसाधन नहीं थे” वाली बात और तीनों नतीजे लिख दे, उसका उत्तर पूरा है।

जोवान्नी कारेरी

पृष्ठ 216–217

  • इटली का एक मुसाफ़िर, जो लगभग 1690 ई. में भारत से होकर गुज़रा था
  • उसने इस बात का बड़ा सजीव चित्र पेश किया कि किस तरह चाँदी तमाम दुनिया से होकर भारत पहुँचती थी
  • उसी से यह भी पता चलता है कि सत्रहवीं सदी के भारत में “बड़ी अद्भुत मात्रा में नकद और वस्तुओं का आदान–प्रदान हो रहा था”
  • पृष्ठ 217 पर उसके लेख का जो अंश है, किताब के अनुसार वह बर्नियर के लेख पर आधारित है

बच्चे अकसर लिख देते हैं कि कारेरी ने ख़ुद हर रास्ता देखा था। किताब बताती है कि उसका यह लेख बर्नियर के लेख पर आधारित है, इसलिए उत्तर में “कारेरी के अनुसार” लिखवाइए।

तेज़ बच्चों से पूछिए: किताब के अनुसार कारेरी के ब्योरे से सत्रहवीं सदी के भारत के बारे में और क्या पता चलता है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — कि उस समय भारत में नकद और वस्तुओं का बहुत बड़ी मात्रा में आदान–प्रदान हो रहा था।

स्रोत 8: भारत में चाँदी कैसे आई?

“(मुग़ल) साम्राज्य की धन–संपत्ति का अंदाज़ा लगाने के लिए पाठक इस बात पर गौर करें कि दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 217 (स्रोत 8)

पूरा स्रोत 8 बच्चे जोड़ियों में किताब से पढ़ें। फिर पूछिए: कारेरी के अनुसार सोना–चाँदी किन रास्तों से हिंदुस्तान पहुँचता था? एटलस पर रास्ते उँगली से दिखवाइए। यह सवाल हमारी ओर से है; उत्तर अगली स्लाइड की तालिका में है।

स्रोत में “इन्दोस्तान” और “इंदोस्तान” किताब की छपी हुई वर्तनी है; बच्चे अपने उत्तर में हिंदुस्तान लिखें।

कारेरी के बताए रास्ते

पृष्ठ 217 (स्रोत 8) · कारेरी के अनुसार

कहाँ सेकैसे हिंदुस्तान पहुँचता
अमेरिकासोने–चाँदी का बहुत बड़ा हिस्सा यूरोप के कई राज्यों से होते हुए आता; थोड़ा तुर्की जाता, कई तरह की वस्तुओं के लिए, और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस, रेशम के लिए
तुर्की, फ़ारस, अरबियातुर्की के लोग ओमान और अरबिया से आने वाली कॉफ़ी के बिना नहीं रह सकते थे, और फ़ारस, अरबिया और तुर्की के लोग भारत की वस्तुओं के बिना; वे मुद्रा की विशाल मात्रा लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा भेजते, जहाँ से वह जहाज़ों से हिंदुस्तान भेज दी जाती
पेगू से मोज़ाम्बीक़ तकभारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार के हिस्से), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव के टापू, मोज़ाम्बीक़ और दूसरी जगहों पर ले जाते, और वहाँ से बहुत सारा सोना–चाँदी हिंदुस्तान पहुँचाते
जापानडच लोग जापान की खानों से जो कुछ हासिल करते, वह देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता

तालिका की आख़िरी बात भी बोर्ड पर लिखिए: कारेरी के अनुसार हिंदुस्तान से यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ, चाहे फ्रांस जाएँ या इंग्लैंड या पुर्तगाल, नकद में ख़रीदी जाती थीं, और वह नकद हिंदुस्तान में ही रह जाता था।

इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चल रहा हो, तो 7. चाँदी का बहाव खोलकर पूछिए: कारेरी के अनुसार डच लोग जापान की खानों से मिला सोना–चाँदी कहाँ ले जाते थे? (वह भी देर–सवेर हिंदुस्तान चला जाता था।)

नकद, दरबार से गाँव तक

पृष्ठ 206, 212–213, 216–217 · अभ्यास का प्रश्न 4

  • अभ्यास का प्रश्न 4: “विचाराधीन काल में मौद्रिक कारोबार की अहमियत की विवेचना उदाहरण देकर कीजिए।”
  • इसका हर बिंदु इस अध्याय के किसी पिछले भाग से आएगा: गाँव का सराफ़, ज़मींदारों के हाट, राजस्व में नक़द, और चाँदी का बहाव
उत्तर देखिए

उत्तर की रूपरेखा बच्चों से ही बुलवाइए, फिर बोर्ड पर लिखिए।

नमूना उत्तर — सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में नकद का लेन–देन दरबार से गाँव तक फैल चुका था।

  • चाँदी का बहाव: निर्यात के बदले चाँदी भारत आई; चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई (पृष्ठ 216)।
  • कारेरी की गवाही: लगभग 1690 ई. में यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं, और नकद भारत में ही रह जाता था (पृष्ठ 217)।
  • राजस्व में नक़द: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह कोशिश करे कि खेतिहर नक़द भुगतान करें (पृष्ठ 213)।
  • गाँव में नकद: फ़्रांसीसी यात्री तैवर्नियर के अनुसार भारत में वे गाँव बहुत छोटे कहे जाते जिनमें सराफ़ न हों (पृष्ठ 206)।
  • ज़मींदार: ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों के मौद्रीकरण की प्रक्रिया में तेज़ी आई, और ज़मींदार अकसर हाट स्थापित करते थे (पृष्ठ 212)।

पूरा उत्तर बच्चे घर पर लिखेंगे।

चर्चा कीजिए: मुग़लों की राजकोषीय नीति, तब

पृष्ठ 216 · चर्चा कीजिए

  • राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था (पृष्ठ 213)
  • चाँदी के बहाव से मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई

पृष्ठ 216 का “चर्चा कीजिए” बॉक्स आज के राज्य के करों से तुलना माँगता है; कक्षा में बात किताब के समय तक रखिए। उसकी जगह पूछिए: किताब के अनुसार मुग़ल राज्य के लिए भू–राजस्व क्यों ज़रूरी था, और चाँदी के बहाव से उसकी वसूली में क्या आसानी हुई? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — भू–राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।

  • ज़रूरत: ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था, इसलिए राज्य ने उसके आकलन और वसूली के लिए एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा किया (पृष्ठ 213)।
  • आसानी: चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई (पृष्ठ 216)।

10 | 8. अबुल फ़ज़्ल कीआइन–ए–अकबरी; काल रेखा, मानचित्र कार्य, और पहले दिन की पर्चियाँ

आइन एक बादशाह के हुक्म पर लिखी गई। ऐसी किताब से गाँव और किसानों के बारे में कितना पता चल सकता है, और कितना नहीं?

आइन कैसे बनी

पृष्ठ 217–218

  • आँकड़ों के वर्गीकरण की एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक और प्रशासनिक परियोजना का नतीजा; ज़िम्मा अकबर के हुक्म पर अबुल फ़ज़्ल ने उठाया
  • अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में, पाँच संशोधनों के बाद पूरी हुई
  • अकबरनामा तीन जिल्दों में: पहली दो में ऐतिहासिक दास्तान
  • तीसरी जिल्द आइन–ए–अकबरी: शाही नियम-कानून का सारांश और साम्राज्य का एक राजपत्र

बच्चे अपनी किताब में चित्र 8.14 देखें (पृष्ठ 218): “अबुल फ़ज़्ल अपने आश्रयदाता को अकबरनामा की पांडुलिपि पेश कर रहे हैं”। फिर पूछिए: आइन–ए–अकबरी और अकबरनामा में क्या रिश्ता है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — आइन–ए–अकबरी अलग किताब नहीं, अकबरनामा का हिस्सा है।

  • तीन जिल्दें: अकबरनामा तीन जिल्दों में रचा गया; पहली दो जिल्दों में ऐतिहासिक दास्तान है।
  • तीसरी जिल्द: आइन–ए–अकबरी, जिसे शाही नियम-कानून के सारांश और साम्राज्य के एक राजपत्र के रूप में संकलित किया गया (पृष्ठ 217)।

आइन के पाँच हिस्से

पृष्ठ 218

दफ़्तरकिस बारे में
1. मंज़िल–आबादीशाही घर-परिवार और उसका रख-रखाव
2. सिपह–आबादीसैनिक और नागरिक प्रशासन, नौकरों की व्यवस्था; मनसबदारों, विद्वानों, कवियों और कलाकारों की संक्षिप्त जीवनियाँ
3. मुल्क–आबादीवित्त, राजस्व की दरें, और “बारह प्रांतों का बयान”
4 और 5लोगों के मज़हबी, साहित्यिक और सांस्कृतिक रीति-रिवाज

पूछिए: किसानों, ज़मीन और राजस्व की सूचनाएँ आइन के किस दफ़्तर में मिलेंगी? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — तीसरे दफ़्तर, मुल्क–आबादी में।

  • क्या है उसमें: वित्त, राजस्व की दरें, और बारह प्रांतों का बयान।
  • सरकार की तालिकाएँ: सूबों के नीचे की इकाई सरकार की तालिकाएँ इसी में हैं; अगली स्लाइड देखिए (पृष्ठ 218)।
  • किताब के शब्दों में: मुल्क–आबादी उत्तर भारत के कृषि समाज का “विस्तृत, आकर्षक व पेचीदा चित्र” पेश करती है (पृष्ठ 218)।

सरकार की तालिका में आठ ख़ाने

पृष्ठ 218

ख़ानाक्या दर्ज है
1परगनात/महल
2क़िला
3अराज़ी और जमीन–ए–पाईमूद (मापे गए इलाके)
4नकदी (नक़द निर्धारित राजस्व)
5सुयूरग़ाल (दान में दिया गया राजस्व अनुदान)
6ज़मींदार
7 और 8ज़मींदारों की जातियाँ, और घुड़सवार, पैदल सिपाही (प्यादा) और हाथी (फ़ील) सहित उनकी फ़ौज

इंटरैक्टिव अध्याय पर्दे पर चल रहा हो तो 8. अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी खोलिए, और पूछिए: इनमें से कौन-सा ख़ाना दान में दिए गए राजस्व अनुदान का है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — पाँचवाँ ख़ाना, सुयूरग़ाल।

  • याद रखने का तरीक़ा: ख़ाना 4 में नक़द निर्धारित राजस्व (नकदी) है, और उसके ठीक बाद ख़ाना 5 में दान में दिया गया राजस्व अनुदान (सुयूरग़ाल)।

स्रोत 9: “खुशकिस्मती के गुलाब बाग की सिंचाई”

“शानदार घटनाओं और राज्य–क्षेत्र अधीन करने वाली हमारी फ़तहों की दास्तान ईमानदारी के कलम से लिखो”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 219 (स्रोत 9)

यह अकबर का हुक्म है, जिसे अबुल फ़ज़्ल ख़ुद अपने शब्दों में बताता है। इस अंश में आगे वह बताता है कि उसने सूचनाएँ कैसे और किनसे जुटाईं; अगली स्लाइड में उसकी सूची है। जोड़ियों में स्रोत पढ़वाइए, और हर जोड़ी अबुल फ़ज़्ल के तरीक़ों की सूची बनाए। स्रोत में दो हुक्म हैं; उन्हें हुक्म की तरह ही पढ़ाइए, घटना की तरह नहीं।

स्रोत 9: पूछताछ, संस्मरण और दस्तावेज़

पृष्ठ 219 · स्रोत 9

  • राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ; बुज़ुर्गों और जवानों के बयान, लिखकर दर्ज
  • सूबों को हुक्म: पुराने मुलाज़िम अपने संस्मरण लिखकर भेजें
  • इलाही संवत के उन्नीसवें साल से दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे हुक्मों की मूल प्रति या नकल
  • ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र
  • दूसरा हुक्म: जमा सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए, और बाद की बातें परिशिष्ट की शक्ल में जोड़ी जाएँ

किनारे का प्रश्न पूछिए: “उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?”

नमूना उत्तर — स्रोत 9 में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसने सूचनाएँ कैसे जुटाईं।

  • स्रोतों की सूची: बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; मुलाज़िमों और शाही परिवार से पूछताछ; बुज़ुर्गों और जवानों के लिखित बयान; सूबों के पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण; दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे हुक्मों की मूल प्रति या नकल; अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र।
  • कृषि संबंधों के लिए: सूबों को भेजे हुक्म, अफ़सरों की रिपोर्टें और सूबों के संस्मरण सबसे काम के होते, क्योंकि उनमें ज़मीन, राजस्व और गाँवों की बातें होतीं।
  • अकबर से रिश्ते का असर: किताब अकबर के हुक्म से लिखी गई; हुक्म था कि जुटाई सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए; अबुल फ़ज़्ल अपनी किताब को “खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग” कहता है। इसलिए आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”।

स्रोतों की सूची और अकबर के हुक्म की बातें स्रोत 9 में लिखी हैं; कौन-से स्रोत सबसे उपयोगी होते और आइन के नज़रिये पर क्या असर हुआ, ये तर्क की बातें हैं, जो बच्चे इन्हीं सबूतों से ख़ुद दें।

नकल से कहीं बढ़कर

पृष्ठ 220

  • लेखक ने पांडुलिपि पाँच बार संशोधित की
  • मौखिक बयानों को तथ्य मानने से पहले दूसरे स्रोतों से उनकी पुष्टि करने की कोशिश की जाती थी
  • सांख्यिकी वाले खंडों में सभी आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी लिखे गए

किताब के अनुसार यह किताब “आधिकारिक दस्तावेज़ों की महज नकल से कहीं बढ़ कर थी”। पूछिए: आँकड़े अंकों के साथ शब्दों में भी क्यों लिखे गए? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — ताकि बाद की प्रतियों में नकल की ग़लतियाँ कम से कम हों (पृष्ठ 220)।

  • कैसे मदद मिलती है: नकल उतारते समय अंकों में लिखी कोई संख्या बदल जाए, तो शब्दों में लिखी वही संख्या उस भूल को पकड़ने में मदद करती है। यह तर्क हमारी ओर से है; किताब सिर्फ़ ऊपर वाली वजह बताती है।

सीमाएँ, और फिर भी अनोखा

पृष्ठ 220–221

सीमाएँ

  • जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी-मोटी चूक, या नकल उतारते समय सहयोगियों की भूल; आम तौर पर मामूली
  • आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से एक शक्ल में नहीं जुटे; बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं
  • कीमतें और मज़दूरी: विस्तृत सूची सिर्फ़ राजधानी आगरा या उसके आस-पास के इलाकों की

फिर भी

  • “अपने समय के लिए एक असामान्य व अनोखा दस्तावेज़ है”
  • सत्रहवीं सदी के मुहाने पर भारत के अध्ययन के लिए एक संदर्भ बिंदु
  • कृषि संबंधों के लिए उसके सांख्यिकीय सबूतों की अहमियत

बच्चे अकसर सावधानी और सीमा को एक समझ लेते हैं। पाँच बार संशोधन और आँकड़े शब्दों में भी, ये अबुल फ़ज़्ल की सावधानी हैं; जोड़ की ग़लतियाँ, आँकड़ों की विषमता और आगरा तक सीमित कीमतें, ये आइन की सीमाएँ हैं। बोर्ड पर दोनों की अलग सूची बनवाइए।

प्रश्न 1:आइन को स्रोत की तरह कैसे पढ़ें

“कृषि इतिहास लिखने के लिए आइन को स्रोत के रूप में इस्तेमाल करने में कौन सी समस्याएँ हैं? इतिहासकार इन समस्याओं से कैसे निपटते हैं?”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 222 (अभ्यास, प्रश्न 1)

पूरी कक्षा मिलकर बोर्ड पर उत्तर की रूपरेखा बनाए, फिर हर बच्चा पूरा उत्तर कॉपी में लिखे।

नमूना उत्तर — आइन अकबर के साम्राज्य के खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसकी सीमाएँ हैं।

  • ऊपर से देखा नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में आइन से जो पता चलता है, वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है”; यह केंद्र की नज़र है, समाज के शीर्ष से देखी तसवीर।
  • जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी-मोटी चूक, या नकल उतारते समय अबुल फ़ज़्ल के सहयोगियों की भूल; ये आम तौर पर मामूली हैं।
  • आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे; जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है।
  • कीमतें और मज़दूरी: विस्तृत सूची सिर्फ़ राजधानी आगरा या उसके आस-पास के इलाकों की है, इसलिए बाकी देश के लिए उसकी प्रासंगिकता सीमित है।
  • इतिहासकार कैसे निपटते हैं: वे आइन को ध्यान से पढ़कर उसकी ग़लतियाँ पकड़ते हैं, और उसके साथ–साथ दूसरे स्रोतों का भी इस्तेमाल करते हैं: सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़, जो किसानों, ज़मींदारों और राज्य के झगड़े और किसानों की नज़र भी दर्ज करते हैं।

आइन ने पुरानी परंपरा कैसे छोड़ी

पृष्ठ 220–221

  • अबुल फ़ज़्ल से पहले के इतिहासकार ज़्यादातर राजनीतिक वारदातों के बारे में लिखते थे: जंग, फ़तह, सियासी साज़िशें, वंशीय उथल–पुथल
  • देश, लोग और उत्पाद गाहे बगाहे, “साज–सज्जा” के रूप में आते थे
  • आइन ने भारत के लोगों और मुग़ल साम्राज्य के बारे में विस्तृत सूचनाएँ दर्ज कीं

तेज़ विद्यार्थियों से पूछिए: अबुल फ़ज़्ल से पहले के इतिहासकार ज़्यादातर किस बारे में लिखते थे, और आइन उनसे अलग कैसे है? यह सवाल हमारी ओर से है।

नमूना उत्तर — पहले के इतिहास राजनीति पर टिके थे; आइन ने लोगों और साम्राज्य की व्यवस्था को दर्ज किया।

  • पहले: जंग, फ़तह, सियासी साज़िशें और वंशीय उथल–पुथल; देश, लोग और उत्पाद कभी-कभार “साज–सज्जा” के रूप में।
  • आइन: लोगों, उनके पेशों और साम्राज्य की व्यवस्था की विस्तृत सूचनाएँ, जिनकी मदद से इतिहासकार उस समय के सामाजिक ताने-बाने का इतिहास फिर से रचते हैं।

काल रेखा: मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव

पृष्ठ 221

वर्षघटना
1526दिल्ली के सुलतान इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बना
1530–40हुमायूँ के शासन का पहला चरण
1540–55शेरशाह से हारकर हुमायूँ सफ़ावी दरबार में प्रवासी बनकर रहा
1555–56हुमायूँ ने खोया हुआ राज्य फिर से हासिल किया
1556–1605अकबर का शासन काल
1605–27जहाँगीर का शासन काल
1628–58शाहजहाँ का शासन काल
1658–1707औरंगज़ेब का शासन काल
1739नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया और दिल्ली को लूटा
1761अहमद शाह अब्दाली ने पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को हराया
1765बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंपे गए
1857अंग्रेज़ों ने अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को गद्दी से हटाया और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार में) भेज दिया

जोड़ियों में काल रेखा पढ़वाइए, और पूछिए: इस अध्याय के तीन साल, 1598 (आइन पूरी हुई), 1665 (औरंगज़ेब का हुक्म) और लगभग 1690 (कारेरी भारत से होकर गुज़रा), काल रेखा पर किसके शासन काल में आते हैं? यह सवाल हमारी ओर से है। सार और काल रेखा भी खोल सकते हैं।

नमूना उत्तर — तीनों साल काल रेखा के दो शासन कालों में आते हैं।

  • 1598: अकबर का शासन काल, 1556–1605।
  • 1665 और लगभग 1690: औरंगज़ेब का शासन काल, 1658–1707।

मानचित्र कार्य (प्रश्न 10)

पृष्ठ 210, 215–217, 223

  • ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक, और भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच
  • चाँदी का रास्ता (स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप होकर तुर्की और फ़ारस; मोचा और बसरा से जहाज़ों से भारत
  • कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की
  • भारतीय माल: पेगू, तानस्सेरी, स्याम, सीलोन, मालदीव, मोज़ाम्बीक़; जापान की खानों से डचों का माल भी आख़िर भारत
  • यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड, पुर्तगाल

अभ्यास का प्रश्न 10 पढ़िए: विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर उन इलाकों को दिखाना है जिनका मुग़ल साम्राज्य के साथ आर्थिक संपर्क था, और इन इलाकों के साथ यातायात-मार्ग भी। हर बच्चे को विश्व का एक रेखा-मानचित्र दीजिए; बच्चे कक्षा में इलाके पेंसिल से अंकित करना शुरू करें, और मानचित्र घर पर पूरा करें।

नमूना उत्तर — पहले एटलस की मदद से इलाके अंकित कीजिए, फिर किताब में बताए रास्ते तीर से दिखाइए।

  • ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार, जिसे मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों की राजनीतिक स्थिरता से मदद मिली (पृष्ठ 215); और भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार, जिसमें कुछ कबीले लगे थे (पृष्ठ 210)।
  • चाँदी का रास्ता: अमेरिका से यूरोप के राज्यों होकर; थोड़ा तुर्की, और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से भारत (पृष्ठ 217)।
  • कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की (पृष्ठ 217)।
  • भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते और सोना-चाँदी लाते थे; डच लोग जापान की खानों से जो कुछ पाते थे, वह भी देर-सवेर भारत पहुँचता था (पृष्ठ 217)।
  • यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल, जहाँ जाने वाली भारतीय वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं (पृष्ठ 217)।

किताब में इन रास्तों का कोई नक्शा नहीं है, सिर्फ़ जगहों के नाम हैं, और स्रोत 8 भारत के किसी बंदरगाह का नाम नहीं देता; इसलिए तीर अंदाज़े से बनेंगे, और भारत की ओर का बंदरगाह बच्चे एटलस देखकर चुनें।

पूरा अध्याय, एक नज़र में

पृष्ठ 196 से 222 · सार हमारी ओर से

कालांशएक पंक्ति में
1किसानों के बारे में हम आइन जैसे ऊपर से लिखे स्रोतों और राजधानी से दूर के इलाक़ों के दस्तावेज़ों से जानते हैं
2मानसून, सिंचाई और औज़ार; खरीफ़ और रबी, जिन्स–ए–कामिल और नयी फ़सलें
3जाति और ग्रामीण समुदाय; पंचायत, मुखिया और जाति पंचायत
4गाँव के दस्तकार, सेवा के बदले मेहनताना, और “छोटा गणराज्य” का सवाल
5खेत में कंधे से कंधा मिलाकर काम करती महिलाएँ, और ज़मीन पर उनके हक़
6जंगल और कबीले: शिकार, पेशकश और व्यापार; जंगलों में घुसपैठ
7ज़मींदार: मिल्कियत, कर वसूली और सैनिक ताक़त; शोषण भी, संरक्षण का पुट भी
8भू–राजस्व: जमा और हासिल, नपाई, और पोलज से बंजर तक ज़मीन का वर्गीकरण
9चाँदी का बहाव: व्यापार बढ़ा, नकदी में कर, और कारेरी का वृत्तांत
10आइन–ए–अकबरी: कैसे बनी, पाँच दफ़्तर, सावधानी और सीमाएँ; काल रेखा

यह तालिका बोर्ड पर बनवाकर बच्चों से हर कालांश के आगे अपना एक शब्द जुड़वाइए।

और अब पहले दिन की पर्चियाँ

पृष्ठ 196 से 222

?

हमारी ओर से: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के गाँव में किसान, ज़मींदार और मुग़ल राज्य एक-दूसरे से कैसे जुड़े थे, और यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं?

लिफ़ाफ़े से पहले दिन की पर्चियाँ लौटाइए। पाँच-छह पर्चियाँ बिना नाम लिए पढ़कर सुनाइए, फिर हर बच्चा अपनी पर्ची के नीचे एक नई पंक्ति जोड़े: अब वह क्या जानता है।

नमूना उत्तर — किसान, ज़मींदार और राज्य, तीनों खेती की उपज और उससे मिलने वाले राजस्व से बँधे थे, और हम यह ज़्यादातर ऊपर से लिखे स्रोतों से जानते हैं।

  • किसान: अपनी ज़मीन पर व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, पर सामाजिक रूप से वह एक सामूहिक ग्रामीण समुदाय का हिस्सा था, जिसका नियमन पंचायत और मुखिया करते थे (कालांश 1–4)।
  • ज़मींदार: वे अकसर राज्य की ओर से कर वसूल करते थे, और बदले में उन्हें वित्तीय मुआवज़ा मिलता था (कालांश 7)।
  • राज्य: ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था; यह काम दीवान के दफ़्तर, अमील–गुज़ार और कर वसूलने वाले ज़मींदारों के ज़रिये होता था (कालांश 8), और चाँदी के बहाव से नकद में कर उगाहना आसान हुआ (कालांश 9)।
  • हम कैसे जानते हैं: आइन–ए–अकबरी से, जो समाज के शीर्ष से देखी तसवीर है; गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ों और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से; और बाबर, तैवर्नियर और कारेरी जैसे लेखकों के ब्योरों से।

पुरानी और नई पंक्तियों का अंतर ही बताता है कि बच्चों ने इस अध्याय से क्या सीखा।

मूल्यांकन: अभ्यास के 12 प्रश्न

इस अध्याय की कौन-सी एक बात आप अपने किसी साथी को दो वाक्यों में समझा सकते हैं?

अभ्यास के प्रश्न और उत्तर की मुख्य बात

पृष्ठ 222–223 · मुख्य बात हमारी ओर से

प्रश्नउत्तर की मुख्य बात
1. कृषि इतिहास के स्रोत के रूप में आइन की समस्याएँ, और इतिहासकार उनसे कैसे निपटते हैंऊपर से देखा नज़रिया; जोड़ की मामूली ग़लतियाँ; आँकड़ों में विषमता; कीमतें और मज़दूरी सिर्फ़ आगरा और आस-पास की; दूसरे इलाक़ों के दस्तावेज़ों से मिलान (कालांश 1 और 10)
2. कृषि उत्पादन किस हद तक महज़ गुज़ारे की खेतीसिर्फ़ कुछ हद तक; रोज़ के खाने की फ़सलें, पर जिन्स–ए–कामिल, ढेरों फ़सलें और नकद भुगतान भी (कालांश 2 और 11)
3. कृषि उत्पादन में महिलाओं की भूमिकाबुआई, निराई और कटाई; घर ही उत्पादन की बुनियाद; दस्तकारी; पाबंदियाँ भी (कालांश 5)
4. मौद्रिक कारोबार की अहमियतचाँदी का बहाव; कारेरी, लगभग 1690; राजस्व में नकद; गाँव में नकद और सराफ़; ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त (कालांश 9)
5. मुग़ल राजकोष के लिए भू–राजस्वसाम्राज्य की आर्थिक बुनियाद; दीवान का दफ़्तर; नपाई और आँकड़े; ज़मीन के चार वर्ग; मनसबदारों का वेतन (कालांश 8)
6. सामाजिक व आर्थिक संबंधों में जातिबहुत बड़ा कारक, सबसे ज़्यादा निचले तबकों के लिए; बीच के समूहों की हैसियत बदल भी सकती थी; पंचायत और ज़मींदारी में भी जाति (कालांश 3 और 4)
7. जंगल वासियों की ज़िंदगी का बदलनाराज्य की घुसपैठ; खेती का फैलाव; व्यापार; सरदार से राजा; नए सांस्कृतिक प्रभाव (कालांश 6)
8. ज़मींदारों की भूमिकाराज्य के सहायक, किसानों के शोषक, और कुछ हद तक संरक्षक भी (कालांश 7)
9. पंचायत और मुखिया से गाँव का नियमनगाँव का हिसाब, जाति के नियम, झगड़े और अर्ज़ियाँ; सीमाएँ भी (कालांश 3)
10. विश्व मानचित्र: मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क वाले इलाके और रास्तेकिताब में बताए इलाके एटलस से; रास्ते तीर से (कालांश 10)
11. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): पड़ोस के एक गाँव का दौरालोग, फ़सलें, जानवर, दस्तकार समूह, ज़मीन पर महिलाओं का हक़, पंचायत; किताब से तुलना, परिवर्तन और निरंतरता (घर पर)
12. परियोजना (11 और 12 में से कोई एक): आइन का एक छोटा-सा अंशअंश किस भाग से, क्या सूचना, किसका नज़रिया, सावधानी, इतिहासकार उसका कैसे इस्तेमाल करे (घर पर)

प्रश्न 1 से 5 के उत्तर लगभग 100 से 150 शब्दों में माँगे गए हैं, और प्रश्न 6 से 9 के लिए लगभग 250-300 शब्दों का लघु निबंध। पूरे नमूना उत्तर शिक्षक संदर्शिका और रिवीजन नोट्स में हैं। लिखित परख के लिए प्रश्न बैंक का नमूना पत्र 2 दीजिए।

गाँव का दौरा (प्रश्न 11) समूह में हो, किसी शिक्षक या अभिभावक के साथ, और गाँव के बुज़ुर्गों से अनुमति लेकर। बच्चे गिनती और किस्में लिखें (लोग, फ़सलें, जानवर, दस्तकार समूह, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं); किसी का नाम, जाति या लोगों की फ़ोटो नहीं।

अध्याय का बड़ा विचार

“किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।”

पाठ्यपुस्तक, पृष्ठ 197

हमारी ओर से: पहले दिन के सवाल का दूसरा हिस्सा यही था, कि यह सब हम किसकी लिखी बातों से जानते हैं। किताब इसी पृष्ठ पर आगे बताती है कि आइन के साथ-साथ वे स्रोत भी काम आते हैं जो मुग़लों की राजधानी से दूर के इलाक़ों में लिखे गए: सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और ईस्ट इंडिया कंपनी के बहुत सारे दस्तावेज़। ये स्रोत यह समझने में भी मदद करते हैं कि किसान राज्य को किस नज़रिये से देखते थे और राज्य से उन्हें कैसे न्याय की उम्मीद थी। इसलिए गाँव की पूरी तस्वीर एक ग्रंथ से नहीं, कई स्रोतों को साथ रखकर बनती है।