कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 2) · पृष्ठ — 196 से 223
यह पन्ना किसलिए — पढ़ाने से पहले अध्याय पर अपनी पकड़ पक्की करने के लिए: अध्याय का तर्क, अध्याय के आँकड़े, किताब की परिभाषाएँ, प्रश्नावली के उत्तर, और वे जगहें जहाँ बच्चे अकसर भटकते हैं। कक्षा में किस कालांश में क्या करना है, वह पाठ योजना में है।
सारे पृष्ठ 2026-27 में छपी किताब के हैं। किताब की पंक्तियाँ उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ-संख्या के साथ दी गई हैं। जो बात किताब की नहीं, हमारी अपनी है, उसके साथ “हमारी ओर से” लिखा है।
सामग्री के पन्ने
अध्याय की पकड़
अध्याय का तर्क — किताब किस क्रम में सोचती है
हमारी ओर से: यह अध्याय बादशाहों की कहानी नहीं है। किताब मुग़ल काल के गाँव को नीचे से ऊपर की ओर पढ़ती है: पहले किसान और उसकी ज़मीन, फिर गाँव का समुदाय, फिर महिलाएँ, जंगल वासी और ज़मींदार, और आख़िर में मुग़ल राज्य, जो अपनी आमदनी का बहुत बड़ा हिस्सा कृषि उत्पादन से उगाहता था। साथ-साथ वह यह भी बताती है कि हर बात किस स्रोत से पता चली, क्योंकि किसान ख़ुद नहीं लिखते थे। काल है लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी (पृष्ठ 196)। किताब आठ भागों में चलती है:
- शुरुआत और भाग 1 (पृष्ठ 196–201): किसान और कृषि उत्पादन: स्रोतों की तलाश और आइन–ए–अकबरी; खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसान और उनकी ज़मीन; मानसून, सिंचाई और तकनीक; खरीफ़ और रबी, जिन्स–ए–कामिल और नयी फ़सलें।
- भाग 2 (पृष्ठ 201–206): ग्रामीण समुदाय: जाति और ग्रामीण माहौल; पंचायत, मुखिया और जाति पंचायत; गाँव के दस्तकार और जजमानी; और यह सवाल कि क्या गाँव एक “छोटा गणराज्य” था।
- भाग 3 (पृष्ठ 206–208): कृषि समाज में महिलाएँ: खेत और दस्तकारी में काम, उन पर काबू, और ज़मीन और ज़मींदारी पर उनका हक़।
- भाग 4 (पृष्ठ 208–211): जंगल और कबीले: “जंगली” शब्द का उस समय का अर्थ, राज्य की नज़र में जंगल, पेशकश और शिकार अभियान, और व्यापार का जंगलवासियों पर असर।
- भाग 5 (पृष्ठ 211–213): ज़मींदार: मिल्कियत, कर वसूली और सैनिक ताकत, ज़मींदारी कैसे बनी और पक्की हुई, और किसानों से ज़मींदारों के रिश्ते।
- भाग 6 (पृष्ठ 213–215): भू–राजस्व प्रणाली: जमा और हासिल, ज़मीन के चार वर्ग, वसूली के तरीक़े, औरंगज़ेब का हुक्म, साम्राज्य का फैलाव (मानचित्र 1) और मनसबदारी व्यवस्था।
- भाग 7 (पृष्ठ 215–217): चाँदी का बहाव: एशिया के बड़े साम्राज्य, ज़मीनी और समुद्री व्यापार, और निर्यात के बदले भारत आती चाँदी।
- भाग 8 (पृष्ठ 217–221): अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी: ग्रंथ कैसे बना, उसके पाँच भाग, सूचनाएँ कहाँ से आईं, और उसकी सीमाएँ। फिर काल रेखा (पृष्ठ 221)।
फ़सल पर किसका दावा था
किताब के दो वाक्य इस अध्याय की धुरी हैं:
- “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” (पृष्ठ 197)
- “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” (पृष्ठ 218)
पहला वाक्य बताता है कि किताब आइन के साथ दूसरे स्रोत क्यों रखती है: राजधानी से दूर लिखे गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़, बाबरनामा, चंडीमंगल और यात्रियों के ब्योरे (पृष्ठ 197)। दूसरा वाक्य, जो अध्याय के आख़िरी भाग में आइन के बारे में है, सीमा बताता है: आइन केंद्र का नज़रिया है, आम किसान का नहीं। हमारी ओर से: हर भाग के बाद बच्चों से यही दो सवाल पूछिए: यह बात किस स्रोत से पता चली, और वह स्रोत किसकी नज़र से लिखा गया।
हमारी ओर से — कक्षा के चार्ट के लिए: यह तालिका चार्ट पेपर पर बनाकर पूरे अध्याय में दीवार पर रखिए। भाग 1 से 6 पढ़ाते हुए हर पंक्ति भरिए: कौन था, और उसके बारे में हम किस स्रोत से जानते हैं। हर पंक्ति का पृष्ठ आख़िरी खाने में है।
| गाँव में कौन | किताब में यहाँ क्या है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| किसान | रैयत या मुज़रियान; खुद–काश्त और पाहि–काश्त | 197–198 |
| पंचायत और मुखिया | गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा; उसका सरदार मुक़द्दम या मंडल; हिसाब में पटवारी मदद करता था | 201–202 |
| दस्तकार | सेवा के बदले अदायगी (जजमानी); महाराष्ट्र में मीरास या वतन की ज़मीन | 204–205 |
| महिलाएँ | मर्दों के साथ खेतों में काम; सूत कातना और मिट्टी गूँधना जैसे दस्तकारी के काम | 206–207 |
| जंगल वासी | जंगल के उत्पाद, शिकार और स्थानांतरीय खेती से गुज़ारा; राज्य को पेशकश | 208–209 |
| ज़मींदार | खेती से कमाई, पर कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं; मिल्कियत, कर वसूली, सैनिक टुकड़ियाँ | 211–212 |
| मुग़ल राज्य | अमील–गुज़ार, दीवान और अमीन; जमा और हासिल | 213–214 |
हमारी ओर से — अध्याय का पाठ कैसे खोलें: पहले शीर्षक बोर्ड पर लिखिए: “किसान, ज़मींदार और राज्य”, और उसके नीचे किताब का उपशीर्षक: “कृषि समाज और मुग़ल साम्राज्य (लगभग सोलहवीं और सत्रहवीं सदी)” (पृष्ठ 196)। बच्चों को बताइए कि उस समय हिंदुस्तान के करीब–करीब 85 फ़ीसदी लोग गाँवों में रहते थे। फिर पूछिए: जो किसान ख़ुद कुछ नहीं लिखते थे, उनके बारे में हम आज कैसे जानते हैं? बच्चों के जवाब बोर्ड पर लिखिए और ऊपर बताए स्रोतों से मिलाइए। जो स्रोत छूट गए, वे अध्याय में आगे आएँगे।
अध्याय के आँकड़े — तथ्य एक नज़र में
काल रेखा: मुग़ल साम्राज्य के इतिहास के मुख्य पड़ाव (पृष्ठ 221)
| वर्ष | घटना | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1526 | दिल्ली के सुलतान, इब्राहिम लोदी को पानीपत में हराकर बाबर पहला मुग़ल बादशाह बनता है | 221 |
| 1530–40 | हुमायूँ के शासन का पहला चरण | 221 |
| 1540–55 | शेरशाह से हार कर हुमायूँ सफ़ावी दरबार में प्रवासी बन कर रहता है | 221 |
| 1555–56 | हुमायूँ खोये हुए राज्य को फिर से हासिल करता है | 221 |
| 1556–1605 | अकबर का शासन काल | 221 |
| 1605–27 | जहाँगीर का शासन काल | 221 |
| 1628–58 | शाहजहाँ का शासन काल | 221 |
| 1658–1707 | औरंगज़ेब का शासन काल | 221 |
| 1739 | नादिरशाह भारत पर आक्रमण करता है और दिल्ली को लूटता है | 221 |
| 1761 | अहमद शाह अब्दाली पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठों को हराता है | 221 |
| 1765 | बंगाल के दीवानी अधिकार ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिये जाते हैं | 221 |
| 1857 | अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र को अंग्रेज़ गद्दी से हटा देते हैं और देश निकाला देकर रंगून (आज का यांगोन, म्यांमार में) भेज देते हैं | 221 |
अध्याय के बीच के आँकड़े
| आँकड़ा | किसका | पृष्ठ |
|---|---|---|
| करीब–करीब 85 फ़ीसदी | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में हिंदुस्तान के इतने लोग गाँवों में रहते थे | 196 |
| करीब 6 एकड़ | गुजरात में इतनी ज़मीन वाले किसान समृद्ध माने जाते थे | 198 |
| 5 एकड़; 10 एकड़ | बंगाल में औसत किसान की ज़मीन की ऊपरी सीमा; इतनी ज़मीन वाला आसामी अमीर समझा जाता था | 198 |
| प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा | इतनी बारिश वाले इलाकों में कमोबेश चावल की खेती होती थी | 198 |
| 39; 43; 50 | आइन के अनुसार दोनों मौसम मिलाकर आगरा प्रांत में फ़सलों की किस्में; दिल्ली प्रांत में फ़सलें; बंगाल में सिर्फ़ चावल की किस्में | 200 |
| 1604 ई. | अकबर और उसके अभिजातों ने पहली बार तम्बाकू देखा | 200 |
| 1600 से 1800 के बीच | भारत की आबादी लगभग 5 करोड़ बढ़ी: 200 वर्षों में करीब 33 फ़ीसदी | 200 |
| 25 फ़ीसदी | कहीं–कहीं गाँव के कुल घरों में से इतने घर दस्तकारों के थे (अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती वर्षों के सर्वेक्षण और मराठाओं के दस्तावेज़) | 204 |
| करीब–करीब 40 फ़ीसदी | उस समय के स्रोतों के आधार पर अखिल भारतीय स्तर पर जंगलों का औसत | 208 |
| लगभग 1595 | अबुल फ़ज़्ल का अवध के पहाड़ी कबीलों और मैदानों के व्यापार का ब्योरा (स्रोत 4) | 210 |
| 6000; 7000 | सिंध इलाके की कबीलाई सेनाओं में घुड़सवार; पैदल सिपाही | 210 |
| 384,558; 4,277,057; 1,863; 4,260; 4,500 | आइन के अनुसार ज़मींदारों की मिली–जुली सैनिक शक्ति: घुड़सवार; पैदल; हाथी; तोप; नाव | 212 |
| 1665 ई. | औरंगज़ेब का हुक्म: पृष्ठ 213 के अनुसार हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब; स्रोत 7 के अनुसार हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) की जाँच के बाद जमा तय करना | 213, 215 |
| 1530; 1605; 1707 | मानचित्र 1 में मुग़ल साम्राज्य के फैलाव के तीन चरण: बाबर, अकबर और औरंगज़ेब का शासन | 214 |
| 4 वर्ग; 3 किस्में | अकबर के शासन में ज़मीन के वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर); पोलज और परौती की किस्में (अच्छी, मध्यम, खराब) | 214 |
| एक–तिहाई | पोलज और परौती के मध्यम उत्पाद का इतना हिस्सा शाही शुल्क माना जाता था | 214 |
| लगभग 1690 ई. | इटली का मुसाफ़िर जोवान्नी कारेरी भारत से होकर गुज़रा | 216 |
| सोलहवीं से अठारहवीं सदी | भारत में धातु मुद्रा, ख़ासकर चाँदी के रुपयों, की उपलब्धि में स्थिरता | 216 |
| 1598 ई. | अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष में, पाँच संशोधनों के बाद, आइन पूरी हुई | 217 |
| 3 जिल्दें; 5 दफ़्तर | अकबरनामा की जिल्दें (तीसरी आइन); आइन के भाग | 217–218 |
| 12; 8 | मुल्क–आबादी में “बारह प्रांतों का बयान”; सरकार की तालिकाओं के ख़ाने | 218 |
| 1873; 1891 और 1894 | आइन के अंग्रेज़ी अनुवाद: पहला खंड ब्लॉकमेन का; बाकी दो एच. एस. जैरेट के (सब कलकत्ता से) | 220 |
ध्यान दीजिए:
- पृष्ठ 200 का आबादी वाला बॉक्स: इस गाइड में 1600 से 1800 लिखा है। किताब में यहाँ ‘1600 से 1700’ छपा है, पर अगले ही वाक्य में ‘200 वर्षों’ लिखा है; अंग्रेज़ी संस्करण 1600 से 1800 बताता है। कोई बच्चा किताब में छपा ‘1600 से 1700’ लिखे, तो उसे ग़लत मत काटिए; 200 वर्षों वाली बात समझा दीजिए।
- एक–तिहाई किस पर: यह हिसाब पोलज और परौती ज़मीन का है। हर किस्म (अच्छी, मध्यम, खराब) का उत्पाद जोड़ा जाता, उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और उसका एक–तिहाई शाही शुल्क (पृष्ठ 214)। बच्चे इसे पूरी उपज का एक–तिहाई न लिखें।
- अंदाज़े के शब्द बने रहें: “करीब–करीब 85 फ़ीसदी”, “करीब–करीब 40 फ़ीसदी” (औसत, हर इलाके का नहीं), “कहीं–कहीं तो … 25 फ़ीसदी”, “लगभग 1595”, “लगभग 1690”। उत्तर में ये शब्द छोड़ने से बात ग़लत हो जाती है।
- 1665 का हुक्म किसका: यह औरंगज़ेब का हुक्म है (स्रोत 7, पृष्ठ 215); इसका ज़िक्र पृष्ठ 213 पर भी है। आइन अकबर के समय की है (1598)। उत्तर में दोनों को आपस में मत मिलाइए।
- पृष्ठ 212 के बॉक्स की संख्याएँ: किताब में हाथी और तोप की संख्याएँ बिना अल्पविराम के छपी हैं (1863, 4260); ये वही संख्याएँ हैं जो ऊपर 1,863 और 4,260 लिखी हैं।
मुख्य शब्द — किताब की परिभाषाएँ
| शब्द | किताब क्या कहती है | पृष्ठ |
|---|---|---|
| रैयत (बहुवचन रिआया), मुज़रियान | मुग़ल काल के भारतीय–फ़ारसी स्रोतों में किसान के लिए शब्द; किसान या आसामी भी कहा जाता था | 197 |
| खुद–काश्त | उन्हीं गाँवों में रहने वाले किसान जिनमें उनकी ज़मीन थी | 197–198 |
| पाहि–काश्त | दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आने वाले किसान | 197–198 |
| जिन्स–ए–कामिल | सर्वोत्तम फ़सलें, जैसे कपास और गन्ना, जिनसे राज्य को ज़्यादा कर मिलता था | 200 |
| मुक़द्दम या मंडल | गाँव का मुखिया, पंचायत का सरदार | 201–202 |
| पंचायत | गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा, आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले लोग | 202 |
| जाति पंचायत | गाँव में हर जाति की अपनी पंचायत; राजस्थान में ये दीवानी के झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं और देखती थीं कि शादियाँ जाति के नियमों के मुताबिक हो रही हैं या नहीं | 203 |
| मीरास या वतन | महाराष्ट्र में दस्तकारों को सेवा के बदले मिली ज़मीन, जिस पर उनका पुश्तैनी अधिकार होता था | 205 |
| जजमानी | दस्तकारों को उनकी सेवाओं के बदले अदायगी की व्यवस्था; अठारहवीं सदी के स्रोतों के अनुसार बंगाल में ज़मींदार लोहारों, बढ़ई और सुनारों तक को “रोज़ का भत्ता और खाने के लिए नकदी देते थे”; यह शब्द सोलहवीं व सत्रहवीं सदी में बहुत इस्तेमाल नहीं होता था | 205 |
| सराफ़ | मुद्रा की फेर–बदल करने वाले, जो बैंकर की तरह हवाला भुगतान भी करते थे | 206 |
| जंगली | वे लोग जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था | 208 |
| मवास | मुग़ल राज्य की नज़र में जंगल: बदमाशों को शरण देने वाला अड्डा | 208 |
| पेशकश | मुग़ल राज्य द्वारा ली जाने वाली एक तरह की भेंट | 209 |
| पायक | असम में अहोम राजाओं के वे लोग जिन्हें ज़मीन के बदले सैनिक सेवा देनी पड़ती थी | 210 |
| ज़मींदार | वे लोग जिनकी कमाई खेती से आती थी, पर जो कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे | 211 |
| मिल्कियत | ज़मींदार की व्यक्तिगत ज़मीन, जिसे वह बेच सकता था, किसी और के नाम कर सकता था या गिरवी रख सकता था | 211 |
| सनद | राज्यादेश, जिससे किसी ज़मींदारी के हक़ की पुष्टि होती थी | 212 |
| जमा / हासिल | जमा निर्धारित राजस्व की रक़म, हासिल सचमुच वसूली गई रक़म | 213 |
| अमील–गुज़ार | राजस्व वसूली करने वाला अधिकारी | 213 |
| दीवान | वह अधिकारी जिसके दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख की ज़िम्मेदारी थी | 213 |
| अमीन | एक मुलाज़िम, जिसकी ज़िम्मेदारी यह पक्का करना थी कि प्रांतों में राजकीय नियम–कानूनों का पालन हो | 214 |
| पोलज, परौती, चचर, बंजर | अकबर के समय ज़मीन के चार वर्ग: हर साल खेती; कुछ समय खेती रोकी गई; तीन–चार साल ख़ाली; पाँच या ज़्यादा साल से ख़ाली | 214 |
| मनसबदारी | मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर सैनिक–नौकरशाही तंत्र, जिस पर राज्य के सैनिक और नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी | 214 |
| कणकुत | कण यानी अनाज, कुत यानी अंदाज़ा: फ़सल का अंदाज़ा लगाकर राजस्व तय करना | 215 |
| बटाई (भाओली) | फ़सल काटकर सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा | 215 |
| सुयूरग़ाल | दान में दिया गया राजस्व अनुदान | 218 |
| दफ़्तर (आइन में) | आइन के पाँच भाग | 218 |
आगे की कक्षाओं और दूसरे विषयों से जोड़
- पिछले अध्यायों से: हमारी ओर से: पृष्ठ 201 का चर्चा बॉक्स भाग 1 के अध्याय 2 की खेती की तकनीकों से तुलना माँगता है। अध्याय “राजा, किसान और नगर” के रिवीजन नोट्स से लोहे का फाल, धान की रोपाई और कुएँ, तालाब और नहरें एक बार दोहरा लीजिए; उत्तर नीचे चर्चा बॉक्सों में है। पृष्ठ 199 का किनारे का सवाल बाबर के बताए सिंचाई के साधनों की तुलना विजयनगर से करवाता है; उसके लिए अध्याय “एक साम्राज्य की राजधानी : विजयनगर” के रिवीजन नोट्स काम आएँगे।
- इसी किताब से: हमारी ओर से: पृष्ठ 212–213 बताते हैं कि भक्ति संतों के गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था, ज़मींदार नहीं। अध्याय “भक्ति-सूफ़ी परंपराएँ” पढ़ा हो तो बच्चों को यह जोड़ दिखाइए; रिवीजन नोट्स।
- भूगोल: बारिश और फ़सल का रिश्ता किताब ख़ुद बताती है: प्रति वर्ष 40 इंच या ज़्यादा बारिश वाले इलाकों में कमोबेश चावल (पृष्ठ 198)। प्रश्न 10 में विश्व के मानचित्र पर वे इलाके दिखाने हैं जिनका मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क था, और उनके साथ यातायात-मार्ग भी (पृष्ठ 223); एटलस पर महाद्वीप और महासागर ढूँढ़ने का अभ्यास पहले करा दीजिए।
- गणित: हमारी ओर से: पृष्ठ 212 के बॉक्स की बड़ी संख्याएँ (384,558 घुड़सवार; 4,277,057 पैदल) बच्चों से शब्दों में पढ़वाइए, और पृष्ठ 214 का एक–तिहाई वाला हिसाब किसी मान ली गई उपज पर करके दिखाइए।
किताब की प्रश्नावली के उत्तर
चर्चा कीजिए — पृष्ठ 201 से 216 तक के सात बॉक्स
किताब ने अध्याय के बीच सात “चर्चा कीजिए” बॉक्स रखे हैं। ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर हर बॉक्स अपने भाग की बात बच्चों से दोबारा कहलवाता है, इसलिए हर एक के लिए कक्षा में पाँच-सात मिनट रखिए।
हमारी ओर से: चार बॉक्स (पृष्ठ 206, 207, 211 और 216) आज की बात भी पूछते हैं। उनमें किताब वाला हिस्सा किताब से पूरा करवाइए, और आज वाला हिस्सा पूरी कक्षा की आम चर्चा रखिए। किसी बच्चे से उसकी जाति, उसके परिवार की ज़मीन या उसके घर की महिलाओं के बारे में मत पूछिए।
पृष्ठ 201 — “इस अनुभाग में खेती संबंधी जिन क्रियाकलापों और तकनीकों की चर्चा हुई है उनमें से कौन–कौन सी अध्याय 2 में वर्णित तकनीकों और क्रियाकलापों से मिलती–जुलती हैं और कौन कौन सी भिन्न हैं?”
नमूना उत्तर — यहाँ “अध्याय 2” का मतलब भाग 1 का अध्याय 2 (राजा, किसान और नगर) है। बोर्ड पर तीन खाने बनाइए: मिलती-जुलती, भिन्न, और इस अध्याय में नया।
- मिलती-जुलती, हल: लोहे के फाल वाला हल। अध्याय 2 में यह छठी शताब्दी ई.पू. से गंगा और कावेरी की घाटियों में फैला; मुग़ल काल में लकड़ी का हलका हल था, जिसके एक छोर पर लोहे की नुकीली धार या फाल लगती थी।
- मिलती-जुलती, सिंचाई: अध्याय 2 में कुएँ, तालाब और कहीं-कहीं नहरें; यहाँ कुएँ, रहट और बालटी, और राज्य की खुदवाई नहरें, जैसे शाहजहाँ के समय पंजाब की शाह नहर।
- भिन्न, बुआई: अध्याय 2 में गंगा की घाटी की धान की रोपाई है, यानी बीज अंकुरित करके पानी भरे खेत में पौधे लगाना; यहाँ बीज ज़्यादातर हाथ से छिड़ककर बोए जाते थे।
- इस अध्याय में नया: बैलों के जोड़े से खींचा जाने वाला बरमा; गुड़ाई और निराई के लिए लकड़ी की मूठ वाले लोहे के पतले धार; खरीफ़ और रबी, कहीं साल में तीन फ़सलें; जिन्स–ए–कामिल; नयी फ़सलें, जैसे अफ्रीका और स्पेन के रास्ते आया मक्का, और नयी दुनिया से आए टमाटर, आलू और मिर्च।
भाग 1 के अध्याय 2 की खेती पर पूरी बात उस अध्याय के रिवीजन नोट्स में है। (पृष्ठ 198–201)
पृष्ठ 206 — “इस अनुभाग में जिन पंचायतों का ज़िक्र किया गया है, वे आपके मुताबिक किस तरह से आज की ग्राम पंचायतों से मिलती–जुलती थीं अथवा भिन्न थीं?”
नमूना उत्तर — पहले बोर्ड पर किताब की पंचायत की चार बातें लिखिए, फिर बच्चे आज की ग्राम पंचायत के बारे में वही चार बातें बताएँ:
- सदस्य: तब गाँव के बुज़ुर्ग, आम तौर पर पुश्तैनी संपत्ति वाले। किताब इसे “अल्पतंत्र” कहती है, जिसमें अकसर अलग-अलग जातियों की नुमाइंदगी होती थी, फिर भी “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए इसमें जगह की संभावना कम थी।
- मुखिया: मुक़द्दम या मंडल। कुछ स्रोतों से लगता है कि वह बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता और फिर ज़मींदार की मंज़ूरी लेता; बुज़ुर्गों का भरोसा न रहे तो वे उसे हटा सकते थे।
- काम: आम ख़ज़ाने से सामुदायिक काम, जाति की हदें बनाए रखना, जुर्माना और निष्कासन, और अर्ज़ियों की सुनवाई।
- आज के लिए पूछिए: सदस्य कैसे चुने जाते हैं, किन-किन लोगों को जगह मिलती है, पैसा कहाँ से आता है, और पंचायत कौन-से झगड़े सुलझाती है।
जो समान है उसे निरंतरता, और जो बदला है उसे परिवर्तन लिखवाइए। (पृष्ठ 202–204)
पृष्ठ 207 — “क्या आपके प्रांत में कृषि भूमि पर महिलाओं और मर्दों की पहुँच में कोई फ़र्क़ है?”
नमूना उत्तर — किताब उस समय की तसवीर देती है। पहले वही बोर्ड पर आए, फिर प्रांत की आज की बात आम चर्चा से:
- तब, हक़: भूमिहर भद्रजनों में महिलाओं को पुश्तैनी संपत्ति का हक़ मिला हुआ था। पंजाब से ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ महिलाएँ, विधवाएँ भी, ग्रामीण ज़मीन के बाज़ार में विक्रेता थीं।
- तब, ज़मींदारी: हिंदू और मुसलमान महिलाओं को ज़मींदारी उत्तराधिकार में मिलती थी, जिसे वे बेच या गिरवी रख सकती थीं; बंगाल में भी महिला ज़मींदार थीं, और अठारहवीं सदी में राजशाही की बड़ी ज़मींदारी की कर्ता–धर्ता एक स्त्री थी।
- तब की सीमा: पंचायत को अर्ज़ी देने वाली महिलाओं के नाम दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं होते थे; उनका हवाला घर के मर्द की माँ, बहन या पत्नी के रूप में होता था।
- आज, प्रांत के स्तर पर: बच्चे आम तौर पर जो देखते-सुनते हैं, वह बताएँ: खेत में कौन-कौन काम करता है, और ज़मीन बेचने-ख़रीदने का फ़ैसला आम तौर पर कौन करता है। बात प्रांत की रहे, किसी के घर की नहीं।
(पृष्ठ 206–207)
पृष्ठ 211 — “पता कीजिए कि आपके प्रांत में किन क्षेत्रों को आजकल जंगल वाले इलाके के रूप में पहचाना जाता है? क्या इन इलाकों में आज ज़िंदगियाँ बदल रही हैं? इन बदलावों की वजहें वही हैं जिनका ज़िक्र हमने इस अनुभाग में किया है या उनसे अलग?”
नमूना उत्तर — जंगल वाले इलाके एटलस या भूगोल की किताब के मानचित्र में ढूँढिए। फिर आज के बदलावों को इस अनुभाग की वजहों से मिलाइए। किताब की वजहें:
- राज्य की माँग: सेना के लिए हाथी, और पेशकश में हाथी।
- राज्य की पहुँच: शिकार अभियानों के बहाने बादशाह का दौरा।
- खेती का फैलाव: जंगल साफ़ करके बस्तियाँ और बाज़ार।
- व्यापार: शहद, मधुमोम और लाक की माँग; हाथियों का व्यापार।
- समाज और संस्कृति: कबीलाई सरदारों का ज़मींदार और राजा बनना; नए इलाकों में सूफ़ी संतों (पीर) का असर।
बोर्ड पर दो खाने बनाइए: “किताब की वजह” और “नयी वजह”। जो बदलाव किताब की किसी वजह में न बैठे, वह दूसरे खाने में जाए। (पृष्ठ 208–211)
पृष्ठ 213 — “आज़ादी के बाद भारत में ज़मींदारी व्यवस्था ख़त्म कर दी गई। इस अनुभाग को पढ़िए और उन कारणों की पहचान कीजिए जिनकी वजह से ऐसा किया गया।”
नमूना उत्तर — किताब कारणों की सूची नहीं देती; बच्चे उन्हें अनुभाग 5 की बातों से निकालें:
- बिना खेती की कमाई: ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; उनकी मिल्कियत पर अकसर दिहाड़ी या पराधीन मज़दूर काम करते थे।
- शोषण: किताब कहती है, “इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था”।
- राज्य और किसान के बीच: वे राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे।
- अपनी ताकत: उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं।
- जाति का विशेषाधिकार: उनकी ऊँची हैसियत का एक कारण उनकी जाति थी।
उत्तर एकतरफ़ा न हो, इसलिए उसी वाक्य का दूसरा हिस्सा भी लिखवाइए: किसानों से उनके रिश्तों में “पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था”। (पृष्ठ 211–212)
पृष्ठ 215 — “क्या आप मुग़लों की भू-राजस्व प्रणाली को एक लचीली व्यवस्था मानेंगे?”
नमूना उत्तर — बच्चा “हाँ” या “कुछ हद तक” लिखे, पर हर बात किताब के ब्योरे से साबित करे। लचीलेपन के पक्ष में:
- ज़मीन के हिसाब से: चार वर्ग और तीन किस्में, हर एक का अलग राजस्व।
- नक़द या फ़सल: अमील–गुज़ार को कहा गया कि वह सिर्फ़ नक़द की आदत न डाले, फ़सल लेने को भी तैयार रहे; कणकुत और बटाई के कई तरीक़े थे।
- जमा और हासिल: निर्धारित रक़म और सचमुच वसूली गई रक़म अलग–अलग दर्ज होती थीं।
- दोनों हितों का ध्यान: औरंगज़ेब के हुक्म में जमा तय करते समय सरकार के वित्तीय हित (किफ़ायत) और किसानों का कल्याण, दोनों देखने को कहा गया।
दूसरी ओर, लचीलेपन की सीमा: पोलज और परौती पर शाही शुल्क मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई तय था, और राज्य के नुमाइंदे चाहते थे कि कर समय पर मिल जाए। (पृष्ठ 213–215)
पृष्ठ 216 — “पता लगाइए कि वर्तमान में आपके राज्य में कृषि उत्पादन पर कर लगाए जाते हैं या नहीं। आज की राज्य सरकारों की राजकोषीय नीतियों और मुग़ल राजकोषीय नीतियों में समानताओं और भिन्नताओं को समझाइए।”
नमूना उत्तर — मुग़ल पक्ष किताब से आता है; आज का पक्ष आप राज्य सरकार के आधिकारिक स्रोत से कक्षा में बताइए, किसी अंदाज़े या ख़बर से नहीं। मुग़ल पक्ष:
- मुग़लों की आमदनी: ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।
- कितना: पोलज और परौती पर मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई शाही शुल्क।
- कैसे: नक़द या फ़सल में, नपाई और सर्वेक्षण के आधार पर; जिन्स–ए–कामिल से ज़्यादा कर।
- किसके ज़रिये: दीवान का दफ़्तर, अमील–गुज़ार, और कर वसूलने वाले ज़मींदार।
फिर बोर्ड पर एक तालिका बनाइए, जिसकी पंक्तियाँ हों: आमदनी का मुख्य स्रोत, खेती पर कर, कर कौन वसूलता है, और किसान को क्या राहत मिलती है; एक स्तंभ मुग़ल, एक आज। (पृष्ठ 200, 213–215)
1 से 5 तक के प्रश्न — उत्तर के मुख्य बिंदु
ये प्रश्न लगभग 100 से 150 शब्दों में उत्तर माँगते हैं (पृष्ठ 222)। हर प्रश्न के नीचे पहले वे बिंदु हैं जो उत्तर में होने चाहिए, फिर जाँचने की एक बात, फिर एक नमूना उत्तर। यही उत्तर रिवीजन नोट्स में भी हैं, ताकि बच्चे और आप एक ही बात पढ़ें।
प्रश्न 1 — आइन को स्रोत बनाने की समस्याएँ और इतिहासकारों का तरीक़ा (पृष्ठ 197, 218–220)
- अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी 1598 ई. में पूरी हुई और खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों का बहुत विस्तृत ब्योरा देती है (पृष्ठ 197, 217)।
- किसानों के बारे में उसका नज़रिया “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है” (पृष्ठ 197)।
- जोड़ में छोटी चूकें हैं, जो अंकगणित की भूल या नकल उतारने वालों की ग़लती से आईं और आम तौर पर मामूली हैं (पृष्ठ 220)।
- सब सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे, जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है; कीमतों और मज़दूरी की विस्तृत सूची सिर्फ़ आगरा और उसके आस–पास की है (पृष्ठ 220)।
- इतिहासकार आइन को दूसरे स्रोतों से मिलाते हैं: गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ (पृष्ठ 197)।
जाँचते समय: प्रश्न के दो हिस्से हैं: समस्याएँ क्या हैं, और इतिहासकार उनसे कैसे निपटते हैं। सिर्फ़ समस्याएँ गिनाने वाला उत्तर आधा है।
नमूना उत्तर — अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी (1598 ई. में पूरी) अकबर के साम्राज्य के खेतों, फ़सलों, राजस्व और ज़मींदारों की बहुत विस्तृत जानकारी देती है, पर उसकी सीमाएँ हैं।
- ऊपर से देखा नज़रिया: किताब के अनुसार किसानों के बारे में आइन से जो पता चलता है वह “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है”; यह समाज के शीर्ष से देखी तसवीर है। इसका उद्देश्य एक ऐसे साम्राज्य का खाका पेश करना था जहाँ मज़बूत सत्ताधारी वर्ग सामाजिक मेल–जोल बनाए रखता था।
- जोड़ की ग़लतियाँ: अंकगणित की छोटी चूक या नकल उतारने वाले सहयोगियों की भूल; ये आम तौर पर मामूली हैं।
- आँकड़ों में विषमता: सभी सूबों से आँकड़े एक शक्ल में नहीं जुटे; जैसे बंगाल और उड़ीसा के ज़मींदारों की जाति की सूचना नहीं है।
- कीमतें और मज़दूरी: सिर्फ़ राजधानी आगरा और उसके आस–पास की विस्तृत सूची है।
- इतिहासकार कैसे निपटते हैं: वे आइन को ध्यान से पढ़कर उसकी ग़लतियाँ पकड़ते हैं और उसे दूसरे स्रोतों से मिलाते हैं: सत्रहवीं–अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़, और पूर्वी भारत के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़। ये किसानों, ज़मींदारों और राज्य के झगड़े और किसानों की नज़र भी दर्ज करते हैं।
प्रश्न 2 — क्या खेती महज़ गुज़ारे के लिए थी (पृष्ठ 196, 198–201, 205–206)
- खेती का पहला उद्देश्य पेट भरना था: चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं (पृष्ठ 198)।
- मुग़ल राज्य जिन्स–ए–कामिल, जैसे कपास और गन्ना, को बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे ज़्यादा कर मिलता था (पृष्ठ 200)।
- आगरा प्रांत में 39 और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें; मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू (पृष्ठ 200–201)।
- एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे (पृष्ठ 200)।
- बिक्री की फ़सलों से व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों तक आए (पृष्ठ 196, 205–206)।
जाँचते समय: प्रश्न “किस हद तक” पूछता है, इसलिए उत्तर एक पक्ष चुने (“कुछ हद तक”) और दोनों ओर के कारण दे। सिर्फ़ फ़सलों की सूची उत्तर नहीं है।
नमूना उत्तर — सिर्फ़ कुछ हद तक। खेती का पहला उद्देश्य पेट भरना था, पर किताब कहती है कि एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक-दूसरे से जुड़े थे।
- गुज़ारे का पक्ष: चावल, गेहूँ, ज्वार जैसी रोज़ के खाने की फ़सलें सबसे ज़्यादा उगाई जाती थीं।
- जिन्स–ए–कामिल: कपास और गन्ना जैसी सर्वोत्तम फ़सलों की खेती को मुग़ल राज्य बढ़ावा देता था, क्योंकि इनसे ज़्यादा कर मिलता था; तिलहन और दलहन भी नकदी फ़सलें थीं।
- विविधता और नयी फ़सलें: आगरा प्रांत में 39 और दिल्ली प्रांत में 43 फ़सलें; मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें; सत्रहवीं सदी के अंत तक तम्बाकू पूरे भारत में खेती और व्यापार की मुख्य वस्तु।
- बाज़ार गाँव तक: बिक्री के लिए उगाई फ़सलों की वजह से व्यापार, मुद्रा और बाज़ार गाँवों में आए; कपास, रेशम या नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था।
प्रश्न 3 — खेती में महिलाओं की भूमिका (पृष्ठ 206–207)
- महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे (पृष्ठ 206)।
- मर्द जोतते और हल चलाते; महिलाएँ बुआई, निराई, कटाई और दाना निकालने का काम करती थीं (पृष्ठ 206)।
- घर–परिवार का श्रम ही उत्पादन का आधार था, इसलिए “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा बँटवारा मुमकिन नहीं था (पृष्ठ 206)।
- सूत कातना, मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, कढ़ाई: दस्तकारी महिलाओं के श्रम पर टिकी थी (पृष्ठ 206)।
- पाबंदियाँ: पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाएँ हल या कुम्हार का चाक नहीं छू सकती थीं; बंगाल में पान के बगान में नहीं जा सकती थीं (पृष्ठ 206)।
जाँचते समय: अच्छा उत्तर काम की सूची के साथ उस समय की पाबंदियाँ भी लिखता है, किताब के शब्दों में और भूतकाल में।
नमूना उत्तर — सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे।
- खेत में: मर्द खेत जोतते और हल चलाते थे; महिलाएँ बुआई, निराई और कटाई करती थीं, और पकी फ़सल का दाना निकालती थीं।
- घर ही उत्पादन की बुनियाद: किसान की व्यक्तिगत खेती में घर–परिवार का श्रम ही उत्पादन का आधार था, इसलिए “घर के लिए महिलाएँ और बाहर के लिए मर्द” जैसा बँटवारा मुमकिन नहीं था।
- दस्तकारी: सूत कातना, बरतन के लिए मिट्टी साफ़ करना और गूँधना, और कपड़ों पर कढ़ाई महिलाओं के श्रम पर टिके थे; वाणिज्यीकरण बढ़ने के साथ इस श्रम की माँग बढ़ी।
- बाहर भी काम: किसान और दस्तकार महिलाएँ ज़रूरत पड़ने पर नियोक्ताओं के घरों और बाज़ारों में भी काम करती थीं; फ़तेहपुर सीकरी के निर्माण में महिलाएँ पत्थर तोड़ती थीं।
- पाबंदियाँ: पश्चिमी भारत में राजस्वला महिलाएँ हल या कुम्हार का चाक नहीं छू सकती थीं; बंगाल में मासिक धर्म के समय पान के बगान में नहीं जा सकती थीं।
प्रश्न 4 — मौद्रिक कारोबार की अहमियत, उदाहरण के साथ (पृष्ठ 205–206, 212–213, 216–217)
- निर्यात के भुगतान में चाँदी भारी मात्रा में भारत आई, जबकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे (पृष्ठ 216)।
- लगभग 1690 ई. में भारत आए जोवान्नी कारेरी की गवाही, स्रोत 8 (पृष्ठ 217)।
- अकबर का अमील–गुज़ार को नक़द भुगतान की कोशिश का हुक्म (पृष्ठ 213)।
- गाँव में नकद: दस्तकारों और कपास, रेशम, नील उगाने वालों को नकद भुगतान; तैवर्नियर और सराफ़ (पृष्ठ 206)।
- ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त और ज़मींदारों के लगवाए हाट (पृष्ठ 212)।
जाँचते समय: प्रश्न “उदाहरण देकर” कहता है। हर बिंदु के साथ किताब का एक ठोस उदाहरण होना चाहिए: चाँदी, कारेरी, अकबर का हुक्म, सराफ़।
नमूना उत्तर — सोलहवीं–सत्रहवीं सदी में नकद का लेन–देन दरबार से गाँव तक फैल चुका था।
- चाँदी का बहाव: भारत के निर्यात का भुगतान करने के लिए चाँदी भारी मात्रा में भारत आई, जबकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे। सोलहवीं से अठारहवीं सदी तक चाँदी के रुपयों की उपलब्धि स्थिर रही, सिक्कों की ढलाई बढ़ी, और मुग़ल राज्य को नकदी में कर उगाहने में आसानी हुई।
- कारेरी की गवाही: लगभग 1690 ई. में भारत आए जोवान्नी कारेरी के अनुसार यूरोप जाने वाली सारी वस्तुएँ नकद में ख़रीदी जाती थीं और नकद भारत में ही रह जाता था।
- राजस्व में नकद: अकबर ने अमील–गुज़ार को हुक्म दिया कि वह खेतिहरों से नक़द भुगतान की कोशिश करे; मुग़लों के केंद्रीय इलाकों में कर की गणना और वसूली नकद में होती थी।
- गाँव में नकद: निर्यात के लिए काम करने वाले दस्तकारों और कपास, रेशम, नील उगाने वालों को नकद भुगतान होता था। फ़्रांसीसी यात्री तैवर्नियर के अनुसार वे गाँव बहुत छोटे माने जाते जिनमें सराफ़ न हों।
- ज़मींदार: ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ, और ज़मींदार हाट लगवाते थे।
प्रश्न 5 — भू–राजस्व मुग़ल राजकोष के लिए क्यों अहम था: सबूत (पृष्ठ 200, 213–215, 218)
- किताब का अपना वाक्य: ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था (पृष्ठ 213)।
- दीवान का दफ़्तर और राजस्व अधिकारियों का पूरा तंत्र (पृष्ठ 213)।
- ज़मीन की नपाई, आइन में हर प्रांत का जमा, और 1665 ई. का औरंगज़ेब का हुक्म (पृष्ठ 213, 215)।
- ज़मीन के चार वर्ग, पोलज और परौती पर एक–तिहाई शाही शुल्क, कणकुत और बटाई (पृष्ठ 214–215)।
- जिन्स–ए–कामिल को बढ़ावा, और राजस्व के आबंटन से मनसबदारों का वेतन (पृष्ठ 200, 214)।
जाँचते समय: प्रश्न “सबूतों की जाँच” माँगता है। हर बिंदु एक सबूत हो, और साथ में यह कि वह राजस्व की अहमियत कैसे दिखाता है।
नमूना उत्तर — किताब के अनुसार ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था। इसके सबूत:
- पूरा प्रशासनिक तंत्र: दीवान के दफ़्तर पर पूरे राज्य की वित्तीय व्यवस्था की देख–रेख थी; हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी कृषि संबंधों की निर्णायक ताकत बन गए।
- नपाई और आँकड़े: हर प्रांत में जुती और जोतने लायक ज़मीन नपवाई गई; आइन हर प्रांत की मापी गई ज़मीन और निर्धारित राजस्व (जमा) दर्ज करती है; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखने का निर्देश दिया (पृष्ठ 213); स्रोत 7 में यही हुक्म हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) की जाँच के बाद जमा तय करने की बात कहता है (पृष्ठ 215)।
- बारीक नियम: ज़मीन के चार वर्ग (पोलज, परौती, चचर, बंजर), पोलज और परौती पर मध्यम उत्पाद का एक–तिहाई शाही शुल्क, और कणकुत, बटाई जैसे वसूली के तरीक़े।
- फ़सलों पर नज़र: राज्य जिन्स–ए–कामिल को बढ़ावा देता था क्योंकि उनसे ज़्यादा कर मिलता था।
- मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था। मनसबदारी मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर एक सैनिक-नौकरशाही तंत्र था, जिस पर राज्य के सैनिक व नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी; कुछ मनसबदारों को नक़दी भुगतान होता था।
6 से 9 तक के प्रश्न — लघु निबंध के मुख्य बिंदु
ये लघु निबंध लगभग 250-300 शब्दों में माँगे गए हैं (पृष्ठ 222)। निबंध में भूमिका, तीन-चार हिस्से और निष्कर्ष हों; हर हिस्से में किताब का कम से कम एक उदाहरण।
प्रश्न 6 — कृषि समाज के रिश्तों में जाति कितना बड़ा कारक थी (पृष्ठ 201–205, 211–212)
जाँचते समय: प्रश्न “किस हद तक” पूछता है, इसलिए उत्तर एक पक्ष ले और दोनों ओर की बात लिखे: निचले तबकों में जाति की जकड़, और बीच के समूहों में ढील। जाति की बात किताब के शब्दों में और भूतकाल में हो; आज से तुलना या किसी पर दोष नहीं।
नमूना उत्तर — भूमिका: सोलहवीं–सत्रहवीं सदी के कृषि समाज में जाति एक बहुत बड़ा कारक थी, सबसे ज़्यादा निचले तबकों के लिए; पर बाज़ार और पैसे के साथ बीच के समूहों की हैसियत बदल भी सकती थी।
- काम और ग़रीबी: खेतिहर किसान जाति और जाति जैसे भेदभावों से कई समूहों में बँटे थे। खेती लायक ज़मीन की कमी नहीं थी, फिर भी कुछ जातियों को सिर्फ़ नीच समझे जाने वाले काम दिए जाते थे, इसलिए वे ग़रीब रहने को मजबूर थे। मुसलमान समुदायों में भी हलालख़ोरान गाँव की हदों के बाहर रहते थे, और बिहार के मल्लाहज़ादाओं की तुलना दासों से की जा सकती थी।
- बीच के समूहों में ढील: निचले तबकों में जाति, ग़रीबी और हैसियत का सीधा रिश्ता था, बीच के समूहों में नहीं। पशुपालन और बागबानी के मुनाफ़े से अहीर, गुज्जर और माली ऊपर उठे; पूर्व में सदगोप और कैवर्त किसानों जैसी स्थिति पाने लगे।
- पंचायत में जाति: पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें, और ज़रूरत पर जुर्माना या निष्कासन देती थी। राजस्थान में जाति पंचायतें दीवानी झगड़े और ज़मीन के दावे निपटाती थीं, और देखती थीं कि शादियाँ जातिगत मानदंडों के अनुसार हो रही हैं या नहीं। पंचायत में “नीच” काम करने वाले मज़दूरों के लिए जगह कम थी।
- ज़मींदारी में जाति: ज़मींदारों की ऊँची हैसियत का एक कारण जाति था; अबुल फ़ज़्ल इस ओर इशारा करता है कि “ऊँची जाति” के ब्राह्मण–राजपूत गठबंधन ने ग्रामीण समाज पर पहले ही ठोस नियंत्रण बना रखा था। पर ज़मींदारी धड़ल्ले से ख़रीदी-बेची जाती थी, इसलिए अपेक्षाकृत “निचली” जातियों के लोग भी ज़मींदार बन सकते थे।
निष्कर्ष: जाति काम, हैसियत, न्याय और ज़मीन पर पकड़ तय करती थी; फिर भी मुनाफ़ा, ज़मीन की ख़रीद–बिक्री और नकद के रिश्तों ने कुछ समूहों को ऊपर उठने का रास्ता दिया।
प्रश्न 7 — सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में जंगल वासियों की ज़िंदगी कैसे बदली (पृष्ठ 208–211)
जाँचते समय: निबंध “पहले” और “बाद” दोनों दिखाए, और बदलाव की कम से कम तीन वजहें दे: राज्य, खेती, व्यापार। “जंगली” शब्द आए तो उसी अर्थ में जो किताब पृष्ठ 208 पर बताती है।
नमूना उत्तर — भूमिका: इन दो सदियों में राज्य, खेती और व्यापार, तीनों जंगलों तक पहुँचे, और जंगल वासियों की ज़िंदगी बदलने लगी।
- पहले कैसा जीवन: अखिल भारतीय स्तर पर लगभग 40 फ़ीसदी इलाका जंगल था। “जंगली” उन लोगों को कहते थे जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था; इसका मतलब असभ्य नहीं था। भीलों जैसे कबीले मौसम के हिसाब से काम बदलते और एक जगह से दूसरी जगह घूमते रहते थे।
- राज्य की घुसपैठ: राज्य जंगल को बदमाशों का अड्डा (मवास) मानता था। सेना के लिए हाथी चाहिए थे, इसलिए पेशकश में अक्सर हाथी लिए जाते थे। दरबारी इतिहासकारों के अनुसार, शिकार अभियानों के बहाने बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता था।
- खेती का फैलाव: मुकुंदराम चक्रवर्ती के चंडीमंगल में नायक कालकेतु जंगल साफ़ करवाकर राज्य बसाता है, और दूर–दूर से लोग आकर बाज़ार बसाते हैं।
- व्यापार: शहद, मधुमोम और लाक की बहुत माँग थी; लाक समुद्र पार निर्यात की मुख्य वस्तु था। हाथी पकड़े और बेचे जाते थे; पंजाब का लोहानी कबीला भारत–अफ़ग़ानिस्तान के ज़मीनी व्यापार में लगा था।
- सरदार से राजा: कई कबीलाई सरदार ज़मींदार, कुछ राजा भी बने; सिंध की कबीलाई सेनाओं में 6000 घुड़सवार और 7000 पैदल थे; अहोम राजाओं के पायक थे; उत्तर–पूर्व में कोच राजाओं ने पड़ोसी कबीलों पर कब्ज़ा किया।
- नए सांस्कृतिक प्रभाव: कुछ इतिहासकारों के अनुसार नए बसे इलाकों में सूफ़ी संतों (पीर) ने इस्लाम के प्रसार में बड़ी भूमिका निभाई।
निष्कर्ष: घूमते रहने वाली, आत्मनिर्भर ज़िंदगी पर राज्य की माँगों, बसती खेती और बाज़ार का दबाव बढ़ा, और कबीलाई व्यवस्था राजतंत्र की ओर बढ़ी।
प्रश्न 8 — मुग़ल भारत में ज़मींदारों की भूमिका (पृष्ठ 211–213)
जाँचते समय: “जाँच” का मतलब है कई भूमिकाएँ और दोनों पहलू। शोषण भी लिखा हो और किताब का बताया संरक्षण भी; दोनों के साथ एक-एक उदाहरण।
नमूना उत्तर — भूमिका: ज़मींदार मुग़ल गाँवों के सामाजिक पिरामिड के संकरे शीर्ष पर थे: वे राज्य के सहायक भी थे, किसानों के शोषक भी, और कुछ हद तक संरक्षक भी।
- कौन थे: उनकी कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे। हैसियत के दो कारण थे: जाति, और राज्य को दी जाने वाली सेवाएँ (ख़िदमत)। उनकी व्यक्तिगत ज़मीन मिल्कियत कहलाती थी, जिसे वे बेच या गिरवी रख सकते थे।
- राज्य के लिए: वे अक्सर राज्य की ओर से कर वसूलते थे और बदले में वित्तीय मुआवज़ा पाते थे। उनके अपने किले और सैनिक टुकड़ियाँ थीं; आइन के अनुसार उनकी मिली–जुली शक्ति 384,558 घुड़सवार और 4,277,057 पैदल थी।
- ज़मींदारी कैसे बनती: जंग में जीत एक संभावित स्रोत थी, पर राज्य आम तौर पर सनद के बिना ऐसी इजाज़त नहीं देता था। ज़्यादातर ज़मींदारी धीमी प्रक्रिया से पक्की होती थी: नयी ज़मीनें बसाकर, अधिकारों के हस्तांतरण से, राज्य के आदेश से, या ख़रीदकर।
- गाँव की अर्थव्यवस्था में: उन्होंने खेती लायक ज़मीनें बसाने में अगुआई की, और खेतिहरों को साजो–सामान और उधार दिया। वे अपनी मिल्कियत की फ़सल बेचते और हाट लगवाते थे; ज़मींदारी की ख़रीद–फ़रोख़्त से गाँवों का मौद्रीकरण तेज़ हुआ।
- शोषक, पर संरक्षक भी: भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनका निशाना राज्य का राजस्व अधिकारी था। सत्रहवीं सदी के कृषि विद्रोहों में राज्य के ख़िलाफ़ ज़मींदारों को अक्सर किसानों का समर्थन मिला।
निष्कर्ष: ज़मींदार राज्य और किसान के बीच की कड़ी थे; उनके रिश्ते में शोषण के साथ पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था।
प्रश्न 9 — पंचायत और मुखिया गाँव का नियमन कैसे करते थे (पृष्ठ 202–204, 207)
जाँचते समय: प्रश्न में दो संस्थाएँ हैं, पंचायत और मुखिया; दोनों के काम अलग-अलग दिखें। “विवेचना” का मतलब है सीमाएँ भी: अल्पतंत्र, और मंडलों पर लगे आरोप।
नमूना उत्तर — भूमिका: मुग़ल काल के गाँव में पंचायत और उसका सरदार, मुखिया, मिलकर गाँव का हिसाब, जाति के नियम और झगड़े सँभालते थे।
- कौन: पंचायत गाँव के बुज़ुर्गों का जमावड़ा थी, आम तौर पर संपत्ति के पुश्तैनी अधिकार वाले लोग; उसका फ़ैसला सबको मानना पड़ता था। मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) कुछ स्रोतों के अनुसार बुज़ुर्गों की आम सहमति से चुना जाता और ज़मींदार उसे मंज़ूरी देता था; भरोसा न रहे तो उसे हटाया जा सकता था।
- हिसाब और आम ख़ज़ाना: मुखिया पटवारी की मदद से गाँव की आमदनी और खर्चे का हिसाब बनवाता था। आम ख़ज़ाने से कर अधिकारियों की ख़ातिरदारी, बाढ़ जैसी विपदाओं से निपटना, और छोटे बाँध या नहर जैसे सामुदायिक काम होते थे।
- जाति के नियम: पंचायत देखती थी कि लोग अपनी जाति की हदों में रहें; पूर्वी भारत में शादियाँ मंडल की मौजूदगी में होती थीं। वह जुर्माना लगा सकती थी, और सीमित समय के लिए समुदाय से निष्कासन भी कर सकती थी। हर जाति की अपनी जाति पंचायत भी थी; फ़ौजदारी मामलों को छोड़कर राज्य उसके फ़ैसले मानता था।
- शिकायतों की सुनवाई: सबसे निचले तबकों के लोग ज़बरन कर उगाही या बेगार के ख़िलाफ़ पंचायत को अर्ज़ियाँ देते थे; महिलाएँ भी न्याय और मुआवज़े के लिए दरख़्वास्त भेजती थीं। पंचायत अक्सर समझौते का सुझाव देती; न बने तो किसान गाँव छोड़कर भाग जाते थे।
- सीमाएँ: पंचायत “अल्पतंत्र” थी, जिसमें “नीच” काम करने वाले खेतिहर मज़दूरों के लिए जगह की संभावना कम थी। मंडलों पर आरोप था कि वे पटवारी से मिलकर हिसाब में हेरा-फेरी करते और कर का बोझ छोटे किसानों पर डाल देते थे।
निष्कर्ष: पंचायत और मुखिया गाँव में व्यवस्था रखते थे, पर उनका नियमन जाति की ऊँच–नीच और ताकतवर लोगों के हितों से बँधा था।
10 से 12 तक के प्रश्न — मानचित्र और परियोजना
प्रश्न 10 — मानचित्र कार्य (पृष्ठ 223)
प्रश्न विश्व के बहिर्रेखा वाले नक्शे पर वे इलाके दिखवाता है जिनका मुग़ल साम्राज्य से आर्थिक संपर्क था, और उनके साथ यातायात–मार्ग भी।
नमूना उत्तर — पहले एटलस की मदद से नीचे के इलाके अंकित कीजिए, फिर किताब में बताए रास्ते तीर से दिखाइए:
- ज़मीनी रास्ते: चीन से भूमध्य सागर तक का ज़मीनी व्यापार, मिंग, सफ़ावी और ऑटोमन साम्राज्यों से होकर; और भारत और अफ़ग़ानिस्तान के बीच का ज़मीनी व्यापार।
- चाँदी का रास्ता (स्रोत 8): अमेरिका से यूरोप के राज्यों होकर; थोड़ा तुर्की और थोड़ा स्मिरना होते हुए फ़ारस; फिर लाल सागर पर मोचा और फ़ारस की खाड़ी पर बसरा; वहाँ से जहाज़ों से भारत।
- कॉफ़ी: ओमान और अरबिया से तुर्की।
- भारतीय माल के समुद्री रास्ते: भारतीय जहाज़ों के अलावा डच, अंग्रेज़ी और पुर्तगाली जहाज़ भी भारत की वस्तुएँ पेगू, तानस्सेरी (म्यांमार), स्याम (थाइलैंड), सीलोन (श्रीलंका), मालदीव और मोज़ाम्बीक़ ले जाते और सोना–चाँदी लाते थे; जापान की खानों की चाँदी भी डचों के ज़रिये भारत आती थी।
- यूरोप: फ़्रांस, इंग्लैंड और पुर्तगाल, जहाँ भेजी जाने वाली भारतीय वस्तुएँ, जैसे यूरोपीय बाज़ार के लिए बने वस्त्र (चित्र 8.13), नकद में ख़रीदी जाती थीं।
हमारी ओर से — जाँचते समय: किताब इन रास्तों पर भारत के बंदरगाहों के नाम नहीं देती, इसलिए भारत की ओर के तीर के लिए बच्चे एटलस से बंदरगाह चुनें, और आप देख लीजिए कि वह तट पर ही है। तीरों की दिशा पर ध्यान दीजिए: वस्तुएँ भारत से बाहर, चाँदी भारत की ओर। मानचित्र पर एक छोटी कुंजी हो: ज़मीनी रास्ता, समुद्री रास्ता, चाँदी।
प्रश्न 11 — पड़ोस के एक गाँव का दौरा (पृष्ठ 223)
हमारी ओर से — तरीक़ा:
- बच्चे 11 और 12 में से कोई एक परियोजना करें; किताब यही कहती है।
- सुरक्षा पहले: कोई बच्चा अकेले न जाए। समूह में, किसी शिक्षक या अभिभावक के साथ जाइए, और पहले गाँव के बुज़ुर्गों से इजाज़त लीजिए।
- क्या लिखें: प्रश्न की छह बातें, गिनती और किस्मों में: कितने लोग रहते हैं, कौन-सी फ़सलें, कौन-से जानवर, कौन-से दस्तकार समूह, महिलाएँ ज़मीन की मालिक हैं या नहीं, और पंचायत किस तरह काम करती है। लोगों के नाम, उनकी जातियाँ या लोगों की तसवीरें नहीं।
- तालिका: चार ख़ाने: पहलू | सोलहवीं–सत्रहवीं सदी (किताब से) | आज का गाँव (दौरे से) | बदलाव या निरंतरता।
- किताब वाले ख़ाने के लिए: खरीफ़–रबी की फ़सलें और जिन्स–ए–कामिल; गाँवों में दस्तकार काफ़ी अच्छी तादाद में (अंग्रेज़ी शासन के शुरुआती सर्वेक्षणों और मराठा दस्तावेज़ों के अनुसार कहीं–कहीं तो 25 फ़ीसदी घर); पंजाब में ज़मीन बेचती महिलाएँ और ज़मींदारी पाने वाली महिलाएँ; बुज़ुर्गों की पंचायत, मुखिया, पटवारी और जाति पंचायत।
- व्याख्या: हर बदलाव की वजह लिखवाइए, और जो चीज़ें आज भी वैसी हैं, जैसे फ़सलों के मौसम, उन्हें निरंतरता के रूप में।
- आँकड़े वही लिखें जो गाँव में मिलें; अंदाज़ा हो तो उसे अंदाज़ा ही लिखें। (पृष्ठ 200–207)
प्रश्न 12 — आइन के एक अंश का अध्ययन (पृष्ठ 223)
हमारी ओर से — तरीक़ा:
- प्रश्न 10 से 12 पृष्ठ का अंश माँगता है। किताब आइन पढ़ने के लिए एक वेबसाइट का पता देती है; अंश की प्रति के लिए स्कूल का पुस्तकालय देखिए, या आप स्वयं अंश दीजिए। अंग्रेज़ी में पहले खंड का मानक अनुवाद ब्लॉकमेन का है, बाकी दो खंडों के एच. एस. जैरेट के (पृष्ठ 220)।
- अंश किस भाग से: पाँच भागों में से कौन-सा, जैसे मुल्क–आबादी, जिसमें सूबों, सरकारों और परगनों के आँकड़े हैं।
- क्या सूचना मिलती है: मापी गई ज़मीन, जमा, सुयूरग़ाल, ज़मींदारों की जातियाँ और फ़ौज, फ़सलें या रीति–रिवाज।
- किसका नज़रिया: केंद्र का, समाज के शीर्ष से देखा हुआ।
- सावधानी: जोड़ की ग़लतियाँ, सूबों के आँकड़ों में विषमता, और आगरा तक सीमित कीमतें–मज़दूरी।
- इतिहासकार का इस्तेमाल: इन आँकड़ों को गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के दस्तावेज़ों या ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ों से मिलाकर उस समय के समाज की तसवीर बनाना। (पृष्ठ 197, 217–220)
कक्षा में
बच्चे कहाँ भटकते हैं — दस भूलें जिनसे बचाना है
1. भूल: जमा और हासिल एक ही रक़म हैं। सही बात: जमा निर्धारित रक़म थी, और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म (पृष्ठ 213)।
2. भूल: खुद–काश्त दूसरे गाँवों से आकर खेती करते थे। सही बात: बात उलटी है। खुद–काश्त उन्हीं गाँवों में रहते थे जिनमें उनकी ज़मीन थी; पाहि–काश्त दूसरे गाँवों से ठेके पर खेती करने आते थे (पृष्ठ 197–198)।
3. भूल: परौती वह ज़मीन है जिस पर बरसों से खेती नहीं हुई। सही बात: परौती पर कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती थी, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके; पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से ख़ाली ज़मीन बंजर थी (पृष्ठ 214)।
4. भूल: “जंगली” का मतलब असभ्य है। सही बात: किताब कहती है, “लेकिन जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था”। उन दिनों यह शब्द उन लोगों के लिए था जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था (पृष्ठ 208)।
5. भूल: उस समय खेती सिर्फ़ गुज़ारे के लिए होती थी। सही बात: दैनिक आहार की खेती पर ज़्यादा ज़ोर था, पर एक औसत किसान की ज़मीन पर पेट भरने का उत्पादन और व्यापार का उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे (पृष्ठ 200)।
6. भूल: किताब के अनुसार भारतीय गाँव बराबरी वाले “छोटे गणराज्य” थे। सही बात: “छोटे गणराज्य” उन्नीसवीं सदी के कुछ अंग्रेज़ अफ़सरों की राय थी। किताब बताती है कि गाँव में संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत थी, और जाति और जेंडर के नाम पर गहरी विषमताएँ थीं (पृष्ठ 205)।
7. भूल: ज़मींदार ख़ुद खेती करते थे। सही बात: ज़मींदारों की कमाई खेती से आती थी, पर वे कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; उनकी मिल्कियत ज़मीन पर अकसर दिहाड़ी के मज़दूर या पराधीन मज़दूर काम करते थे (पृष्ठ 211)।
8. भूल: भक्ति संत ज़मींदारों के विरोधी थे। सही बात: भक्ति संतों ने ज़मींदारों को किसानों के शोषक के रूप में नहीं दिखाया; उनके गुस्से का निशाना आम तौर पर राज्य का राजस्व अधिकारी था (पृष्ठ 212–213)।
9. भूल: भारत की अपनी चाँदी की खानें थीं। सही बात: भारत में चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; चाँदी यहाँ से निर्यात होने वाली वस्तुओं के भुगतान के रूप में बाहर से आती थी (पृष्ठ 216)।
10. भूल: आइन आम किसान का नज़रिया बताती है। सही बात: आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” (पृष्ठ 218)।
किताब की पंक्तियाँ जो उत्तर में काम आती हैं
बच्चे इन्हें उद्धरण-चिह्नों में, पृष्ठ के साथ लिखना सीखें। एक सही उद्धरण पूरे उत्तर को किताब से जोड़ देता है।
| पंक्ति | पृष्ठ | कहाँ काम आती है |
|---|---|---|
| “किसानों के बारे में जो कुछ हमें आइन से पता चलता है वह सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया है।” | 197 | प्रश्न 1, प्रश्न 12 |
| “हिंदुस्तान में बस्तियाँ और गाँव, दरअसल शहर के शहर, एक लमहे में ही वीरान भी हो जाते हैं और बस भी जाते हैं।” | 198 | बाबर के बयान (स्रोत 1) पर कोई भी प्रश्न |
| “पेट भरने के लिए होने वाले उत्पादन और व्यापार के लिए किए जाने वाले उत्पादन एक दूसरे से जुड़े हुए थे।” | 200 | प्रश्न 2 |
| “खेतों की जुताई करने वालों में एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मज़दूरी करते थे।” | 201 | प्रश्न 6 |
| “गाँव छोड़कर भाग जाना खेतिहरों के हाथ में एक बड़ा प्रभावी हथियार था।” | 204 | प्रश्न 9 |
| “संपत्ति की व्यक्तिगत मिल्कियत होती थी, साथ ही जाति और जेंडर (सामाजिक लिंग) के नाम पर समाज में गहरी विषमताएँ थीं।” | 205 | प्रश्न 6, प्रश्न 9 |
| “महिलाएँ और मर्द कंधे से कंधा मिलाकर खेतों में काम करते थे।” | 206 | प्रश्न 3 |
| “लेकिन जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था” | 208 | प्रश्न 7 |
| “वाणिज्यिक खेती का असर, बाहरी कारक के रूप में, जंगलवासियों की ज़िंदगी पर भी पड़ता था।” | 210 | प्रश्न 7 |
| “हालाँकि इसमें कोई शक नहीं कि ज़मींदार शोषण करने वाला तबका था, लेकिन किसानों से उनके रिश्तों में पारस्परिकता, पैतृकवाद और संरक्षण का पुट था।” | 212 | प्रश्न 8 |
| “ज़मीन से मिलने वाला राजस्व मुग़ल साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद थी।” | 213 | प्रश्न 5 |
| “यह भारत के लिए अच्छा था क्योंकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे।” | 216 | प्रश्न 4 |
| “दुनिया भर में बिचरने वाला सारा सोना–चाँदी आखिरकार यहीं पहुँच जाता है।” | 217 | प्रश्न 4 (जोवान्नी कारेरी, स्रोत 8) |
| “आइन का नज़रिया क्षेत्रों के बारे में केंद्र का नज़रिया है, या यूँ कहें कि समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर।” | 218 | प्रश्न 1, प्रश्न 12 |
बच्चे ये सवाल पूछेंगे — किताब के अपने सवाल
ये तेरह सवाल किताब के पन्नों के किनारे छपे हैं। पढ़ाते समय बच्चे इन्हीं पर अटकते हैं, इसलिए हर एक का उत्तर यहाँ है, पृष्ठ के क्रम में।
पृष्ठ 198 — “कृषि जीवन के उन पहलुओं का विवरण दीजिए जो बाबर को उत्तर भारत के इलाके की ख़ासियत लगी।”
नमूना उत्तर — यह सवाल स्रोत 1, यानी बाबरनामा के अंश पर है। बाबर को सबसे ज़्यादा यह बात चौंकाती है कि हिंदुस्तान में बस्तियाँ बहुत जल्दी उजड़ती और बसती थीं:
- पल में उजड़ना: बरसों से बसे बड़े शहर के लोग भी चले जाएँ, तो डेढ़ दिन में उनका हर नामोनिशान मिट जाता था।
- बसने में आसानी: पानी के रास्ते खोदने की ज़रूरत नहीं होती थी, क्योंकि सारी फ़सलें बारिश के पानी में उगती थीं; लोग एक सरोवर या कुआँ बना लेते थे।
- न घर, न दीवार: खस की घास बहुत थी और जंगल अपार थे, इसलिए झोंपड़ियाँ बनाकर यकायक एक गाँव या शहर खड़ा हो जाता था।
- बेशुमार आबादी: आबादी इतनी थी कि लोग उमड़ते चले आते थे।
किताब भी कहती है कि ज़मीन की बहुतायत, मज़दूरों की मौजूदगी और किसानों की गतिशीलता की वजह से खेती लगातार फैलती रही। (पृष्ठ 198)
पृष्ठ 199 — “सिंचाई के जिन साधनों का ज़िक्र बाबर ने किया है उनकी तुलना विजयनगर की सिंचाई (अध्याय 7) व्यवस्था से कीजिए। सिंचाई की इन दोनों अलग–अलग प्रणालियों में किस–किस तरह के संसाधनों की ज़रूरत पड़ती होगी? इनमें से किन–किन प्रणालियों में कृषि तकनीक में सुधार के लिए किसानों की भागेदारी ज़रूरी होती होगी?”
नमूना उत्तर — बोर्ड पर दो खाने बनाइए: बाबर के साधन (स्रोत 2) और विजयनगर। बाबर कुओं से पानी उठाने के साधन बताता है, जबकि विजयनगर में बाँध, हौज़ और नहरें थीं:
- बाबर के साधन: लाहौर और दीपालपुर में रहट: रस्सी के फंदों पर लकड़ी के गुटके और घड़े, पहिये, और बैल से घूमने वाला दाँतों वाला पहिया; पानी एक संकरे नाले से खेत तक। आगरा, चाँदवर और बयाना में बालटी: लकड़ी के कन्ने, बेलन, रस्सी और बैल; एक आदमी बैल हाँकता, दूसरा बालटी से पानी निकालता।
- विजयनगर: धाराओं पर बाँध बनाकर हौज़; एक बड़े हौज़ (आज का कमलपुरम् जलाशय) से आस–पास के खेत सींचे जाते थे; तुंगभद्रा पर बने बाँध से हिरिया नहर पानी लाती थी।
- संसाधन: रहट और बालटी के लिए कुआँ, लकड़ी, रस्सी, घड़े, बैल और दो-एक आदमी काफ़ी थे; बाँध, बड़े हौज़ और नहरें बनाने में बहुत मज़दूर, सामान और शासकों की ताकत लगती होगी।
- किसानों की भागेदारी: रहट और बालटी एक कुएँ पर दो-एक आदमी और बैलों से चलते थे, इसलिए उनमें सुधार किसानों की भागेदारी से ही होता होगा; बड़ी नहरों और हौज़ों में शासकों की भूमिका बड़ी रही होगी, हालाँकि उनके पानी का इस्तेमाल किसान ही करते थे।
विजयनगर की सिंचाई पर पूरी बात उस अध्याय के रिवीजन नोट्स में है। (पृष्ठ 199–200)
पृष्ठ 201 — “चित्र में महिलाएँ और पुरुष क्या–क्या करते दिखाए गए हैं? गाँव की वास्तुकला का भी वर्णन कीजिए।”
नमूना उत्तर — चित्र 8.3 आरंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का है, और उसमें पंजाब का एक गाँव दिखाया गया है। बच्चे पहले वह लिखें जो चित्र में दिखता है, फिर उसे किताब की बात से जोड़ें:
- महिलाएँ: सूत कातती और अनाज कूटती दिखती हैं; किताब भी बताती है कि सूत कातना महिलाओं के श्रम पर टिका था।
- पुरुष: पगड़ी पहने एक आदमी भैंस के साथ है; आस–पास ऊँट, मवेशी और घड़े हैं।
- वास्तुकला: मिट्टी के घर, और उनके बीच किले जैसी एक मीनार।
(पृष्ठ 201, 206)
पृष्ठ 203 — “चित्रकार ने गाँव के बुज़ुर्गों और कर अधिकारियों में फ़र्क कैसे डाला है?”
नमूना उत्तर — चित्र 8.4 प्रारंभिक उन्नीसवीं शताब्दी का है; उसमें गाँव के बुज़ुर्ग कर अधिकारियों से मिल रहे हैं। बच्चे तीन चीज़ें देखें: कितने लोग, कैसा पहनावा, और पास में क्या:
- बुज़ुर्ग: बाईं ओर करीब चौदह आदमियों का झुंड, ज़्यादातर पगड़ी में, कई की दाढ़ी सफ़ेद; उम्र और संख्या से वे गाँव के बड़े–बूढ़े लगते हैं।
- अधिकारी: दाईं ओर सिर्फ़ दो आदमी: एक बही में लिख रहा है, दूसरा हरे कोट में है, और उनके पैरों के पास हिसाब की बहियाँ और कागज़ हैं; लिखा–पढ़ी और हिसाब उनकी पहचान है।
(पृष्ठ 203)
पृष्ठ 204 — “चित्र में दर्शाई गई गतिविधियों का वर्णन कीजिए।”
नमूना उत्तर — चित्र 8.5 कपड़ा उत्पादन को दर्शाती सत्रहवीं शताब्दी की एक चित्रकारी है। इसे ऊपर से नीचे पढ़वाइए:
- ऊपरी हिस्सा: चट्टानी पहाड़ी पर एक शासक बैठा है, साथ में सेवक और रंग–बिरंगे कपड़ों में लोग।
- निचला हिस्सा: घास–फूस के एक छप्पर के पास कारीगर कपड़ा बिछा रहे हैं, धो रहे हैं, और सूत कात रहे हैं या कपड़ा तैयार कर रहे हैं।
किताब बताती है कि गाँवों में बहुत से दस्तकार थे, और कई किसान खेती से फ़ुरसत के महीनों में रँगरेज़ी और कपड़े पर छपाई भी करते थे। (पृष्ठ 204)
पृष्ठ 208 — “आप इस चित्र में जो देखते हैं उसका वर्णन कीजिए। इसमें ऐसा कौन सा सांकेतिक तत्व है जो शिकार और एक आदर्श न्याय व्यवस्था को जोड़ता है?”
नमूना उत्तर — चित्र 8.9 बादशाहनामा से है, और उसमें शाहजहाँ नीलगाय का शिकार कर रहा है:
- दृश्य: पहाड़ी, जंगली इलाके में बादशाह (शाहजहाँ) बंदूक से नीलगाय का शिकार कर रहा है; उसके सिर के पीछे रोशनी का घेरा (प्रभामंडल) है; दाईं ओर दरबारी खड़े हैं।
- शिकार और न्याय: दरबारी इतिहासकारों के अनुसार, शिकार अभियान के नाम पर बादशाह साम्राज्य के कोने–कोने का दौरा करता और लोगों की समस्याओं और शिकायतों पर ख़ुद गौर करता था।
- सांकेतिक तत्व: किताब बताती है कि ऐसे चित्रों में चित्रकार “अकसर छोटा–सा एक ऐसा दृश्य डाल देते थे जो सद्भावनापूर्ण शासन का संकेत देता था”।
हमारी ओर से — जाँचते समय: किताब यह बात ऐसे चित्रों के बारे में आम तौर पर कहती है, इस चित्र का कोई एक दृश्य नहीं बताती। इसलिए बच्चा जो तत्व चुने, उसे चित्र में दिखाए और किताब की इस पंक्ति से जोड़े। (पृष्ठ 208–209)
पृष्ठ 209 — “यह पद्यांश जंगल में घुसपैठ के कौन से रूपों को उजागर करता है? इसके संदेश की तुलना चित्र 8.9 में दिये गए लघु चित्र से कीजिए। जंगल में रहने वाले लोगों के अनुसार पद्यांश में किन्हें “बिदेसी” बताया गया है?”
नमूना उत्तर — यह स्रोत 3 है: सोलहवीं सदी में मुकुंदराम चक्रवर्ती की लिखी बंगाली कविता चंडीमंगल का अंश, जिसमें नायक कालकेतु जंगल ख़ाली करवाकर एक साम्राज्य की स्थापना करता है:
- घुसपैठ के रूप: हर जगह से परदेसियों का आना; भारी भरकम चाकू, कुल्हाड़ी और भाले–बरछे बाँटना; उत्तर से आए दास “सैकड़ों उमड़ते हुए”, दक्खिन से एक उद्यमी के साथ पाँच सौ फ़सल कटाई वाले, और पश्चिम से ज़फ़र मियाँ के साथ बाईस हज़ार लोग; जंगल हटाकर बाज़ार बसाना; कुल्हाड़ियों की आवाज़ से शेरों का भाग जाना।
- चित्र से तुलना: चित्र 8.9 में राज्य बादशाह के शिकार के रूप में जंगल में आता है, और उसे अच्छे शासन की तरह दिखाया गया है; कविता में जंगल खेती, बस्ती और बाज़ार के लिए साफ़ होता है। दोनों में बाहरी ताकत जंगल तक पहुँचती है।
- “बिदेसी”: जंगल वासियों की नज़र में वे सब लोग जो बाहर से आकर बसे: दास, फ़सल काटने वाले, ज़फ़र मियाँ के साथ आए लोग और बाज़ार बसाने वाले।
हमारी ओर से: “सैकड़ों उमड़ते हुए” को कोई पक्की गिनती मत बनाइए; कविता में गिनती सिर्फ़ पाँच सौ और बाईस हज़ार की है। (पृष्ठ 208–209)
पृष्ठ 210 — “इस अनुच्छेद में परिवहन के कौन से तरीक़ों का ज़िक्र किया गया है? आपके मुताबिक, इनका इस्तेमाल क्यों किया जाता था? मैदानों से जो सामान पहाड़ ले जाए जाते थे, उनमें से हर एक वस्तु किस काम में लाई जाती होगी, इसका खुलासा कीजिए।”
नमूना उत्तर — यह स्रोत 4 है: लगभग 1595 के अवध सूबे के ब्योरे में अबुल फ़ज़्ल पहाड़ी कबीलों और मैदानों का लेन–देन बताता है:
- परिवहन: इंसानों, मोटे–मोटे घोड़ों और बकरों की पीठ पर सामान लादकर।
- क्यों: पहाड़ के संकरे और ऊबड़–खाबड़ रास्तों पर गाड़ियाँ नहीं चल पाती होंगी, जबकि आदमी, मज़बूत घोड़े और बकरे बोझ लेकर चढ़ सकते हैं।
- मैदानों से पहाड़ तक: सफ़ेद और रंगीन कपड़े (पहनने के लिए), कहरुबा (किताब के अनुसार इससे गहने बनाए जाते थे), नमक और हींग (खाने के लिए), गहने (सजने के लिए), और शीशे व मिट्टी के बरतन (घर के काम के लिए)।
(पृष्ठ 210)
पृष्ठ 214 — “अपने अधीन इलाक़ों में ज़मीन का वर्गीकरण करते वक़्त मुग़ल राज्य ने किन सिद्धांतों का पालन किया? राजस्व निर्धारण किस प्रकार किया जाता था?”
नमूना उत्तर — यह सवाल स्रोत 5 पर है। आइन के अनुसार अकबर ने ज़मीन को इस आधार पर बाँटा कि उस पर कितनी लगातार खेती होती है, और हर वर्ग का राजस्व अलग रखा:
- पोलज: हर साल खेती, ज़मीन कभी ख़ाली नहीं छोड़ी जाती।
- परौती: कुछ दिनों के लिए खेती रोकी जाती, ताकि वह खोई ताकत वापस पा सके।
- चचर: तीन या चार वर्षों तक ख़ाली।
- बंजर: पाँच या उससे ज़्यादा वर्षों से खेती नहीं हुई।
- राजस्व: पहले दो वर्गों की तीन किस्में थीं: अच्छी, मध्यम और खराब। तीनों का उत्पाद जोड़कर उसका तीसरा हिस्सा मध्यम उत्पाद माना जाता, और उसका एक–तिहाई शाही शुल्क।
(पृष्ठ 214)
पृष्ठ 214 — “भू-राजस्व की वसूली पर साम्राज्य के विस्तार का क्या प्रभाव पड़ा?”
नमूना उत्तर — साम्राज्य 1530, 1605 और 1707 तक के चरणों में फैलता गया, और इसके साथ राजस्व का तंत्र भी बढ़ा:
- बड़ा प्रशासनिक तंत्र: तेज़ी से फैलते साम्राज्य के तमाम इलाक़ों में राजस्व आकलन और वसूली के लिए राज्य को एक प्रशासनिक तंत्र खड़ा करना पड़ा, जिसमें दीवान का दफ़्तर शामिल था।
- नए लोग, नयी ताकत: हिसाब रखने वाले और राजस्व अधिकारी खेती की दुनिया में आए और कृषि संबंधों को शक्ल देने वाली एक निर्णायक ताकत बने।
- आँकड़े और जाँच: हर इलाके की ज़मीन और खेती की जानकारी जुटाई गई; 1665 ई. में औरंगज़ेब ने हर गाँव, हर किसान की जाँच के बाद जमा तय करने का हुक्म दिया।
- मनसबदारों का वेतन: ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था।
(पृष्ठ 213–215)
पृष्ठ 215 — “राजस्व निर्धारण व वसूली की हरेक प्रणाली में खेतिहरों पर क्या फ़र्क पड़ता होगा?”
नमूना उत्तर — यह सवाल स्रोत 6 पर है। आइन में नक़द और फ़सल, दोनों तरह की वसूली है, और हर एक का किसान पर असर अलग रहा होगा:
- नक़द: किसान को फ़सल बेचकर पैसा जुटाना पड़ता होगा, इसलिए बाज़ार के भाव का असर उस पर पड़ता होगा।
- कणकुत (अंदाज़े से): फ़सल का अंदाज़ा लगाया जाता; शक हो तो फ़सल अच्छी, मध्यम और बदतर के तीन पुलिंदों में काटी जाती। ग़लत अंदाज़े से किसान को नुक़सान भी हो सकता था।
- बटाई या भाओली: फ़सल काटकर, सभी पक्षों की मौजूदगी और रज़ामंदी से बँटवारा; पर इसमें कई समझदार निरीक्षक चाहिए थे, वरना धोखेबाज़ी का डर था।
- खेत बटाई: बुआई के बाद खेत ही बाँट लिए जाते, तो फ़सल अच्छी हो या ख़राब, दोनों का जोखिम बँट जाता होगा।
- लाँग बटाई: कटाई के बाद ढेर बाँटकर हर पक्ष अपना हिस्सा घर ले जाता और उससे मुनाफ़ा कमाता।
(पृष्ठ 215)
पृष्ठ 215 — “आपकी राय में बादशाह ने विस्तृत सर्वेक्षण पर क्यों ज़ोर दिया?”
नमूना उत्तर — यह सवाल स्रोत 7 पर है। 1665 ई. के अपने हुक्म में औरंगज़ेब हर गाँव, हर किसान (आसामीवार) के खेती के मौजूदा हालात (मौजूदात) जानना चाहता है:
- सही जमा: हर गाँव की ज़मीन और फ़सल अलग थी, इसलिए बारीक जाँच के बिना राजस्व ठीक से तय नहीं हो सकता था।
- दोनों हित: हुक्म कहता है कि जमा सरकार के वित्तीय हितों (किफ़ायत) और किसानों के कल्याण को ध्यान में रखकर तय हो।
- हर साल की गिनती: पृष्ठ 213 के अनुसार इसी हुक्म में हर गाँव में खेतिहरों की संख्या का सालाना हिसाब रखने को भी कहा गया; स्रोत 7 के अंश में यह बात नहीं है।
- बड़ी आमदनी: ज़मीन का राजस्व साम्राज्य की आर्थिक बुनियाद था।
(पृष्ठ 213, 215)
पृष्ठ 219 — “उन सभी स्रोतों की सूची बनाएँ जिनका इस्तेमाल अबुल फ़ज़्ल ने अपनी किताब पूरी करने के लिए किया। कृषि संबंधों को समझने के लिए इनमें से कौन से स्रोत सबसे उपयोगी होते? आपके मुताबिक किस हद तक अबुल फ़ज़्ल की किताब अकबर से उसके रिश्ते से प्रभावित हुई होगी?”
नमूना उत्तर — स्रोत 9 में अबुल फ़ज़्ल ख़ुद बताता है कि उसने सूचनाएँ कैसे जुटाईं:
- स्रोतों की सूची: बादशाह की गतिविधियों के सबूत और दस्तावेज़; राज्य के मुलाज़िमों और शाही परिवार के सदस्यों से पूछताछ; समझदार बुज़ुर्गों और जवानों के बयान, लिखकर दर्ज; सूबों के पुराने मुलाज़िमों के संस्मरण; इलाही संवत के उन्नीसवें साल से दस्तावेज़ दफ़्तर का इतिहासवृत्त; सूबों को भेजे सभी हुक्मों की मूल प्रति या नकल; ऊँचे अफ़सरों और मंत्रियों की रिपोर्टें; जानकार लोगों के कच्चे मसौदे और ज्ञापनपत्र।
- कृषि संबंधों के लिए: सूबों को भेजे हुक्म, अफ़सरों की रिपोर्टें और सूबों के संस्मरण सबसे काम के होते, क्योंकि उनमें ज़मीन, राजस्व और गाँवों की बातें होतीं।
- अकबर से रिश्ते का असर: किताब अकबर के हुक्म से लिखी गई; हुक्म था कि जुटाई सामग्री शाही मौजूदगी में पढ़कर सुनाई जाए; अबुल फ़ज़्ल अपनी किताब को “खुशकिस्मती के इस गुलाब बाग” कहता है। इसलिए आइन का नज़रिया केंद्र का नज़रिया है, “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर”।
जाँचते समय: “किस हद तक” का उत्तर एक राय ले, और उसके पक्ष में स्रोत 9 की कम से कम एक बात दे। (पृष्ठ 218–219)
सावधानी
- जाति, किताब के शब्दों में: किताब जाति को उस समय के इतिहास की तरह पढ़ाती है: खेतों की जुताई करने वालों में “एक बड़ी तादाद ऐसे लोगों की थी जो नीच समझे जाने वाले कामों में लगे थे, या फिर खेतों में मज़दूरी करते थे” (पृष्ठ 201)। इसे इन्हीं शब्दों और भूतकाल में पढ़ाइए। किसी जाति या समुदाय को दोषी मत ठहराइए, और आज की किसी जाति या घटना से तुलना मत कीजिए।
- “जंगली”, किताब के अर्थ में: किताब बताती है कि उन दिनों यह शब्द ऐसे लोगों के लिए इस्तेमाल होता था “जिनका गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था”, और “जंगली होने का मतलब सभ्यता का न होना बिलकुल नहीं था” (पृष्ठ 208)। बच्चे उत्तर में यह शब्द लिखें तो साथ में यही अर्थ भी लिखें।
- महिलाएँ, उस समय की तसवीर: भाग 3 बताता है कि महिलाएँ मर्दों के साथ खेतों में काम करती थीं, फिर भी उनकी जैव वैज्ञानिक क्रियाओं को लेकर लोगों के मन में पूर्वाग्रह बने रहे (पृष्ठ 206)। ये बातें किताब के उदाहरणों से और भूतकाल में पढ़ाइए, किसी समुदाय को दोषी ठहराए बिना।
- बच्चों के घर-परिवार पर सवाल नहीं: किसी बच्चे से उसकी जाति, उसके परिवार की ज़मीन या जायदाद, या उसके घर की महिलाओं के बारे में मत पूछिए। पृष्ठ 206, 207, 211 और 216 के चर्चा बॉक्स में आज वाला हिस्सा पूरी कक्षा की आम चर्चा रहे, प्रांत के स्तर पर। जाति या स्त्री–पुरुष की भूमिकाएँ निभाने वाली कोई गतिविधि मत करवाइए। प्रश्न 11 का गाँव-दौरा समूह में, शिक्षक या अभिभावक के साथ और गाँव के बुज़ुर्गों की इजाज़त लेकर हो; बच्चे गिनती और किस्में लिखें, लोगों के नाम, जातियाँ या तसवीरें नहीं (पृष्ठ 223)।
- अंदाज़े वाले शब्द: किताब के “लगभग”, “करीब–करीब”, “कहीं–कहीं” और “शायद” बच्चों के उत्तर में भी बने रहें। ज़मींदारों के बारे में किताब कहती है: “समसामयिक दस्तावेज़ों से ऐसा लगता है कि जंग में जीत ज़मींदारों की उत्पत्ति का संभावित स्रोत रहा होगा” (पृष्ठ 212)। मुखिया के चुनाव की बात भी किताब कुछ स्रोतों के हवाले से ही कहती है (पृष्ठ 202)।
- अंकों की छपाई: पृष्ठ 200 के आबादी वाले बॉक्स, एक–तिहाई शाही शुल्क किस ज़मीन पर था, 1665 का हुक्म किसका था, और पृष्ठ 212 के बॉक्स की संख्याओं के बारे में ऊपर अध्याय के आँकड़े में लिखा है। ये हिस्से पढ़ाने से पहले वह सूची देख लीजिए।
- मनसबदारी, यहीं समझाइए: पृष्ठ 214 का बॉक्स ही बताता है कि मनसबदारी मुग़ल प्रशासन के शीर्ष पर एक सैनिक-नौकरशाही तंत्र था, जिस पर राज्य के सैनिक व नागरिक मामलों की ज़िम्मेदारी थी, और ज़्यादातर मनसबदारों को साम्राज्य के अलग–अलग हिस्सों के राजस्व के आबंटन से भुगतान होता था। किताब पृष्ठ 197, 214 और 217 पर “अध्याय 9” का हवाला देती है, पर इस संस्करण का भाग 2 विषय 8 पर ख़त्म हो जाता है; इसलिए इसके लिए बच्चों को किसी दूसरे अध्याय में मत भेजिए; जो चाहिए, वह इसी बॉक्स में है।
- हमारी ओर से — बोर्ड और चार्ट: बोर्ड दूसरी कक्षाओं के साथ साझा है, इसलिए जो चीज़ पूरे अध्याय में चाहिए (ऊपर कक्षा के चार्ट वाली तालिका, ज़मीन के चार वर्ग, काल रेखा), उसे चार्ट पेपर पर बनाइए। प्रोजेक्टर न हो तो चित्र और नक्शा किताब में ही खुलवाइए: चित्र 8.3 से 8.5 (पृष्ठ 201–204), चित्र 8.9 (पृष्ठ 208) और मानचित्र 1 (पृष्ठ 214)।
समय कम हो तो — छह बातें जो हर बच्चे तक पहुँचें
- स्रोत: किसान अपने बारे में ख़ुद नहीं लिखते थे, इसलिए किताब आइन–ए–अकबरी के साथ राजधानी से दूर लिखे सत्रहवीं और अठारहवीं सदी के गुजरात, महाराष्ट्र और राजस्थान के दस्तावेज़ और ईस्ट इंडिया कंपनी के दस्तावेज़ भी पढ़ती है; आइन “सत्ता के ऊँचे गलियारों का नज़रिया” है (पृष्ठ 197)।
- किसान और खेती: खुद–काश्त और पाहि–काश्त किसान; मानसून और सिंचाई के कृत्रिम उपाय; खरीफ़ और रबी की फ़सलें; जिन्स–ए–कामिल (सर्वोत्तम फ़सलें) और मक्का, आलू, मिर्च जैसी नयी फ़सलें (पृष्ठ 197–201)।
- गाँव का समुदाय: जाति और जाति जैसे भेदभावों से कई समूहों में बँटे खेतिहर; बुज़ुर्गों की पंचायत, उसका मुखिया (मुक़द्दम या मंडल) और जाति पंचायत; और सेवा के बदले अदायगी पाने वाले दस्तकार (पृष्ठ 201–205)।
- महिलाएँ और जंगल: महिलाएँ और मर्द “कंधे से कंधा” मिलाकर खेतों में काम करते थे; जंगल वासियों का गुज़ारा जंगल के उत्पादों, शिकार और स्थानांतरीय खेती से होता था, और वे राज्य को पेशकश देते थे (पृष्ठ 206–209)।
- ज़मींदार और राजस्व: ज़मींदार खेती से कमाते थे, पर कृषि उत्पादन में सीधे हिस्सा नहीं लेते थे; जमा निर्धारित राजस्व की रक़म थी और हासिल सचमुच वसूली गई रक़म; अकबर के समय ज़मीन के चार वर्ग थे: पोलज, परौती, चचर और बंजर (पृष्ठ 211–214)।
- चाँदी और आइन: भारत से निर्यात होने वाली वस्तुओं के भुगतान के लिए एशिया में आई चाँदी का एक बड़ा हिस्सा भारत की तरफ़ खिंच गया, जबकि यहाँ चाँदी के प्राकृतिक संसाधन नहीं थे; अबुल फ़ज़्ल की आइन–ए–अकबरी अकबर के शासन के बयालीसवें वर्ष, 1598 ई. में पूरी हुई, और वह “समाज के शीर्ष से देखी हुई समाज की तसवीर” है (पृष्ठ 215–218)।
अभ्यास के लिए: प्रश्न बैंक, फ़्लैशकार्ड और क्विज़।