Chapter 4विचारक, विश्वास और इमारतें

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कक्षा — 12 · विषय — इतिहास (भारतीय इतिहास के कुछ विषय, भाग 1) · पृष्ठ — 82 से 113

यह पन्ना किसलिए — किताब के तीन विषयों को और गहराई से समझाने के लिए: बुद्ध के बाद की सभाएँ (संगीतियाँ) और त्रिपिटक के लिखे जाने की कथा, जैन परंपरा के तीर्थंकर और श्वेतांबर-दिगंबर का भेद, और साँची का स्तूप कैसे दोबारा मिला, कैसे बिगड़ा और कैसे सँवारा गया। हर हिस्से में पहले यह है कि किताब कहाँ रुकती है, फिर उसके आगे की बातें, स्रोत के लिंक के साथ, और अंत में कक्षा में पूछने के सवाल, उनके उत्तर के साथ।

परीक्षा में बच्चे किताब वाली बातें ही लिखें। यहाँ की बातें किताब की बात को खोलकर समझाने के लिए हैं। पढ़ाने से पहले स्रोत का लिंक एक बार खोलकर देख लीजिए।

बौद्ध संगीतियाँ और त्रिपिटक

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “बुद्ध के किसी भी संभाषण को उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया।” उनकी मृत्यु के बाद शिष्यों ने “‘ज्येष्ठों’ या ज्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली (बिहार स्थित वैशाली का पालि भाषा में रूप) में बुलाई। वहाँ पर ही उनकी शिक्षाओं का संकलन किया गया।” (पृष्ठ 86) इन संग्रहों को त्रिपिटक कहा गया, जिसका शब्दार्थ किताब “भिन्न प्रकार के ग्रंथों को रखने के लिए ‘तीन टोकरियाँ’” देती है: “विनय पिटक में संघ या बौद्ध मठों में रहने वाले लोगों के लिए नियमों का संग्रह था। बुद्ध की शिक्षाएँ सुत्त पिटक में रखी गई और दर्शन से जुड़े विषय अभिधम्म पिटक में आए।” किताब यह भी बताती है कि ये संग्रह “पहले उन्हें मौखिक रूप से ही संप्रेषित किया जाता था”, कि बाद के युगों में बौद्ध विद्वानों ने इन पर टीकाएँ लिखीं, और कि बौद्ध धर्म श्रीलंका पहुँचा तो “दीपवंश (द्वीप का इतिहास) और महावंश (महान इतिहास)” जैसे इतिहास लिखे गए (पृष्ठ 86)। किताब यहीं रुकती है: बौद्ध परंपरा के अपने ग्रंथ कितनी सभाएँ गिनाते हैं, वे कहाँ और किस कारण हुईं, और त्रिपिटक पहली बार किन हालात में लिखा गया, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: पालि विनय पिटक के चुल्लवग्ग का टी.डब्ल्यू. रीस डेविड्स और हरमन ओल्डनबर्ग का अनुवाद (सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट, खंड 20), और श्रीलंका के इतिहास-ग्रंथ महावंश का विल्हेम गाइगर का अनुवाद, उनकी लंबी भूमिका के साथ।

राजगृह की सभा

  • चुल्लवग्ग का ग्यारहवाँ अध्याय राजगृह (पालि में राजगह) की सभा की कथा कहता है। कथा के अनुसार भिक्खु महाकस्सप (महाकश्यप) ने पाँच सौ में एक कम अर्हत चुने, और फिर आनंद को भी चुना। सभा के लिए राजगृह इसलिए चुना गया कि वहाँ भिक्षा भरपूर मिलती थी और ठहरने की जगहें भी बहुत थीं। विनय के इस पाठ को चुल्लवग्ग “पाँच सौ वालों का” पाठ कहता है। स्रोत: विनय पिटक, चुल्लवग्ग, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 20 (अंग्रेज़ी में)
  • महावंश के अनुवादक विल्हेम गाइगर ने अपनी भूमिका में पहली सभा की कथा को परखा है। उनकी राय में राजगृह में भिक्खुओं की वह सभा, उसे जो भी नाम दिया जाए, एक स्थापित तथ्य है। स्रोत: गाइगर, महावंश का अनुवाद (अंग्रेज़ी में)

वैशाली की सभा

  • चुल्लवग्ग का बारहवाँ अध्याय वैशाली (किताब में वेसली) की सभा की कथा है। चुल्लवग्ग के पाठ के अनुसार यह सभा बुद्ध की मृत्यु के एक सदी बाद हुई, और अनुवादकों की टिप्पणी बताती है कि इसकी वजह विनय के दस मुद्दे थे, जिन पर संघ में फूट पड़ी। इसमें ठीक सात सौ भिक्खु शामिल हुए, न एक ज़्यादा न एक कम, इसलिए विनय का यह पाठ “सात सौ वालों का” कहलाया। स्रोत: विनय पिटक, चुल्लवग्ग, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 20 (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब वेसली (वैशाली) की सभा को वह सभा बताती है जिसमें बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन हुआ। पालि विनय का चुल्लवग्ग दो सभाओं की कथा अलग-अलग अध्यायों में कहता है, पहले राजगृह की और फिर वैशाली की, जो उसके अनुसार बुद्ध की मृत्यु के एक सदी बाद विनय के दस मुद्दों पर हुई। इन सभाओं को पहली, दूसरी और तीसरी कहकर गिनने का क्रम महावंश में है (अध्याय 3, 4 और 5)। कक्षा में दोनों ब्योरे बताइए, और परीक्षा में किताब वाली बात लिखवाइए।

असोक के समय तीसरी सभा

  • महावंश के पाँचवें अध्याय में तीसरी सभा की कथा है, जो राजा असोक के संरक्षण में हुई। उसके अनुसार एक हज़ार भिक्खुओं ने यह सभा नौ महीनों में पूरी की, और राजा के राज्य के सत्रहवें साल में एक बड़े पवारणा समारोह के साथ सभा समाप्त हुई। गाइगर इसे पाटलिपुत्र की सभा कहते हैं। स्रोत: गाइगर, महावंश का अनुवाद (अंग्रेज़ी में)
  • गाइगर बताते हैं कि जिन ग़लत मतों के कारण तीसरी सभा बुलानी पड़ी, उनका खंडन करने के लिए मोग्गलिपुत्त तिस्स ने कथावत्थु नाम का ग्रंथ रचा, और यह ग्रंथ अभिधम्म पिटक का है। उनके शब्दों में, परंपरा की नज़र से इन सभाओं का महत्त्व यह था कि उनमें वे झुकाव छाँटकर बाहर किए गए जो धर्म से मेल नहीं खाते थे। स्रोत: गाइगर, महावंश का अनुवाद (अंग्रेज़ी में)
  • यहाँ इस अध्याय के तीसरे विषय, साँची, से एक कड़ी जुड़ती है। परंपरा के अनुसार असोक के समय तीसरी सभा की अध्यक्षता मोग्गलिपुत्त तिस्स ने की थी। गाइगर बताते हैं कि साँची के समूह के दूसरे स्तूप से मिली एक अस्थि-मंजूषा पर “सपुरिसस मोगलिपुतस” लिखा है, और इसमें कोई शक नहीं कि इससे मतलब श्रीलंका के इतिहास-ग्रंथों वाले मोग्गलिपुत्त तिस्स से है। यानी जिस भिक्खु का नाम महावंश लेता है, उसके नाम वाली मंजूषा साँची में मिली है, और गाइगर इसे उस नाम के सच्चे होने का सबूत मानते हैं। पर यह पहचान पक्की नहीं है: मार्शल के साँची वाले ग्रंथ में लिखा है कि कनिंघम और गाइगर ने मंजूषा के मोगलिपुत को मोग्गलिपुत्त तिस्स माना, और मजूमदार ठीक ही कहते हैं कि यह पहचान मुश्किल से टिकती है, क्योंकि ये मोगलिपुत गोतिपुत के शिष्य थे। स्रोत: गाइगर, महावंश का अनुवाद (अंग्रेज़ी में) · मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)

त्रिपिटक कब लिखा गया

  • महावंश के अनुसार तीनों पिटकों का पाठ और उन पर लिखी अट्ठकथा पहले के समय में भिक्खु मुँह-ज़बानी आगे बढ़ाते थे। जब उन्होंने देखा कि लोग धर्म से दूर हो रहे हैं, तो भिक्खु इकट्ठे हुए, और सच्चा धर्म बना रहे, इसके लिए इन्हें पुस्तकों में लिख दिया। महावंश यह बात श्रीलंका के राजा वट्टगामणि के राज के प्रसंग में कहता है। इस अंश में किसी जगह का नाम नहीं है। स्रोत: गाइगर, महावंश का अनुवाद (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब कहती है कि बाद के युगों में बौद्ध विद्वानों ने इन ग्रंथों पर टीकाएँ लिखीं (पृष्ठ 86)। महावंश जिस अट्ठकथा की बात करता है, वह पिटकों पर लिखी ऐसी ही टीका है, और उसके अनुसार पिटक और अट्ठकथा एक साथ पुस्तकों में उतारे गए। किताब जिन दो इतिहास-ग्रंथों का नाम लेती है, दीपवंश और महावंश, यह कथा उन्हीं में से एक में है। किताब त्रिपिटक के संग्रहों के बारे में कहती है कि पहले उन्हें “मौखिक रूप से ही संप्रेषित” किया जाता था।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि बुद्ध की शिक्षाओं का संकलन वेसली (वैशाली) की सभा में हुआ। पालि ग्रंथ पहली सभा कहाँ रखते हैं, और वे कुल कितनी सभाओं की बात करते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: महावंश तीन सभाएँ गिनाता है, और चुल्लवग्ग में पहली दो की कथा है:

  • राजगृह: पहली सभा (महावंश, अध्याय 3); महाकस्सप ने पाँच सौ में एक कम अर्हत चुने, फिर आनंद को; उपालि से विनय के बारे में सवाल पूछे गए (चुल्लवग्ग, अध्याय 11)।
  • वैशाली: दूसरी सभा (महावंश, अध्याय 4); चुल्लवग्ग के अनुसार बुद्ध की मृत्यु के एक सदी बाद, विनय के दस मुद्दों पर; सात सौ भिक्खु (चुल्लवग्ग, अध्याय 12)।
  • पाटलिपुत्र: तीसरी सभा, राजा असोक के संरक्षण में; एक हज़ार भिक्खु, नौ महीने (महावंश, अध्याय 5)।

हमारी ओर से: परीक्षा में किताब वाली बात लिखवाइए। कक्षा में यह दिखाइए कि एक ही घटना के ब्योरे अलग-अलग ग्रंथों में अलग हो सकते हैं, और इतिहासकार ऐसे में दोनों ब्योरे सामने रखकर देखता है कि कौन-सा ग्रंथ किस बारे में क्या कहता है।

सवाल: महावंश त्रिपिटक के लिखे जाने का क्या कारण बताता है, और उससे पहले यह पाठ कैसे बचा रहा?

उत्तर देखिए

उत्तर: महावंश और चुल्लवग्ग से यह तस्वीर बनती है:

  • मुँह-ज़बानी: पिटक और उन पर लिखी अट्ठकथा पहले भिक्खु मुँह-ज़बानी आगे बढ़ाते थे; किताब (पृष्ठ 86) त्रिपिटक के बारे में यही कहती है।
  • सभाओं में मिलकर पाठ: चुल्लवग्ग के अनुसार राजगृह और वैशाली की सभाओं में भिक्खुओं ने मिलकर विनय का पाठ दोहराया; विनय के पाठ “पाँच सौ वालों का” और “सात सौ वालों का” कहलाए।
  • लिखने की वजह: लोग धर्म से दूर हो रहे थे, इसलिए सच्चा धर्म बचाए रखने के लिए भिक्खुओं ने पिटक और अट्ठकथा पुस्तकों में लिखे; महावंश यह बात राजा वट्टगामणि के राज के प्रसंग में कहता है।

हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि बहुत-से लोग मिलकर एक पाठ याद रखें, तो उसमें गड़बड़ी कैसे पकड़ी जाती होगी। इससे समझ आता है कि उपालि से नियम के साथ उसका मौक़ा और उसका कारण भी क्यों पूछा गया।

जैन तीर्थंकर और दो संप्रदाय

किताब कहाँ रुकती है। किताब बताती है: “जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे। जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे, उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है : यानी कि वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।” (पृष्ठ 88) महावीर की शिक्षाओं का एक उदाहरण किताब “उत्तराध्ययन सूत्र नामक एक ग्रंथ से” लेती है, जिसमें महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास के लिए समझाती है (पृष्ठ 88)। मूर्तियों के बारे में किताब कहती है: “धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हुई सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थंकरों के उपासकों द्वारा बनवाई गई मूर्तियाँ भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में पाई गई हैं।” (पृष्ठ 89) किताब यहीं रुकती है: पहले और तेईसवें तीर्थंकर परंपरा में कौन थे, जैन परंपरा श्वेतांबर और दिगंबर, दो संप्रदायों में कैसे बँटी, और जैन ग्रंथ कब और कहाँ लिखे गए, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: जैन सूत्रों का हरमन याकोबी का अनुवाद, उनकी भूमिकाओं के साथ (सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट, खंड 22 और 45), और एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका का दिगंबर संप्रदाय पर लेख।

पहले तीर्थंकर ऋषभ

  • जैनों के कल्पसूत्र में तीर्थंकरों की जीवन-कथाओं के बीच पहले तीर्थंकर ऋषभ की कथा भी है। कल्पसूत्र उनके पाँच नाम गिनाता है, और उन्हें पहला राजा, पहला भिक्षु, पहला जिन और पहला तीर्थंकर कहता है। उन्हें “कोसल वाले” भी कहा गया है; याकोबी की टिप्पणी के अनुसार इसलिए कि उनका जन्म कोसल, यानी अयोध्या में हुआ था। स्रोत: याकोबी, जैन सूत्र, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 22 (अंग्रेज़ी में)

तेईसवें तीर्थंकर पार्श्व

  • पार्श्व और महावीर की राहों में दो बड़े फ़र्क़ बताए गए हैं। पहला, पार्श्व के धर्म में चार व्रत थे, और वर्धमान महावीर के धर्म में पाँच। दूसरा, पार्श्व के धर्म में भिक्षु एक नीचे का और एक ऊपर का वस्त्र पहन सकते थे, जबकि वर्धमान का धर्म वस्त्र की मनाही करता था। स्रोत: याकोबी, जैन सूत्र, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 45 (अंग्रेज़ी में)

केशी और गौतम: श्रावस्ती की मुलाक़ात

  • किताब जिस उत्तराध्ययन सूत्र से कमलावती की बात लेती है, उसका तेईसवाँ अध्याय पार्श्व और महावीर, दोनों के अनुयायियों की एक मुलाक़ात की कथा है। पार्श्व की परंपरा के युवा श्रमण केशी श्रावस्ती पहुँचकर तिंदुक नाम के उद्यान में ठहरे। उसी समय महावीर के प्रसिद्ध शिष्य गौतम भी, जो बारह अंग-ग्रंथ जानते थे, अपने शिष्यों के साथ श्रावस्ती आए और पास के दूसरे उद्यान में ठहरे। स्रोत: याकोबी, जैन सूत्र, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 45 (अंग्रेज़ी में)
  • दोनों के शिष्य सोचने लगे कि जब लक्ष्य एक है तो नियम अलग क्यों हैं। केशी और गौतम मिले, और केशी ने सवाल पूछे, गौतम ने उत्तर दिए। कथा के अंत में केशी ने गौतम के आगे सिर झुकाया और तिंदुक उद्यान में पाँच व्रतों वाला धर्म अपना लिया। याकोबी इस अध्याय को इस बात की कथा मानते हैं कि पुरानी और नई परंपरा आपस में कैसे मिलीं। स्रोत: याकोबी, जैन सूत्र, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 45 (अंग्रेज़ी में)

श्वेतांबर और दिगंबर

  • जैन धर्म के दो प्रमुख संप्रदाय हैं। दिगंबर संप्रदाय के मुनि कोई संपत्ति नहीं रखते और वस्त्र नहीं पहनते। श्वेतांबर नाम का अर्थ ही है सफ़ेद वस्त्र वाले, और इस संप्रदाय के साधु सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं। दोनों संप्रदायों के साधु स्नान नहीं करते, क्योंकि शरीर की सफ़ाई उस संसार की चीज़ मानी जाती है जिसे वे छोड़ चुके हैं, और इसलिए भी कि उनके विश्वास के अनुसार नहाने से पानी में रहने वाले जीव मरते हैं। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, दिगंबर (अंग्रेज़ी में)
  • दो संप्रदाय कैसे बने, इसकी एक कथा दिगंबर परंपरा सुनाती है। उसका सबसे पुराना लिखा रूप दसवीं सदी ईसवी का है। इस कथा के अनुसार चंद्रगुप्त मौर्य के राज में एक भारी अकाल पड़ा, और जैन मुनियों का एक दल गंगा के इलाक़े से (या उज्जैन से) दक्षिण में कर्नाटक चला गया। इस दल के अगुआ भद्रबाहु ने वस्त्र न पहनने के नियम पर ज़ोर दिया, जबकि उत्तर में रुक गए मुनियों के अगुआ स्थूलभद्र ने सफ़ेद वस्त्र पहनने की छूट दी। कथा दोनों संप्रदायों का बनना ईसा पूर्व चौथी सदी में रखती है। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, दिगंबर (अंग्रेज़ी में)
  • विद्वान इस कथा को इतिहास का पक्का ब्योरा नहीं मानते। ब्रिटैनिका के अनुसार दोनों संप्रदायों के ब्योरे पक्षपात भरे हैं, भरोसे लायक़ नहीं हैं, और घटनाओं के बहुत बाद लिखे गए, इसलिए यह बँटवारा कैसे शुरू हुआ, यह साफ़ नहीं है; ज़्यादा संभावना यह है कि दो संप्रदाय धीरे-धीरे बने। याकोबी भी यही कहते हैं: बँटवारे की शुरुआत पर दोनों संप्रदायों की कथाएँ आपस में मेल नहीं खातीं, और लगता है कि अचानक कोई टूट नहीं हुई। इससे पहले की बात, पार्श्व की पुरानी शाखा और महावीर की शाखा के बारे में, जिनके प्रतिनिधि केशी और गौतम थे, याकोबी कहते हैं कि उनमें कुछ दूरी तो थी, पर दुश्मनी नहीं; और उनकी राय में आगे का श्वेतांबर-दिगंबर बँटवारा इसी पुराने अंतर से समझ में आता है। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, दिगंबर (अंग्रेज़ी में) · याकोबी, जैन सूत्र, खंड 45 (अंग्रेज़ी में)
  • वस्त्र के अलावा कुछ और मान्यताएँ भी दिगंबरों को अलग करती हैं। दिगंबर मानते हैं कि केवल-ज्ञान पा चुके व्यक्ति को जीने के लिए भोजन की ज़रूरत नहीं रहती, कि महावीर ने विवाह नहीं किया था, और कि कोई स्त्री पुरुष के रूप में दोबारा जन्म लिए बिना मोक्ष नहीं पा सकती। दिगंबर परंपरा में हर तीर्थंकर की मूर्ति निर्वस्त्र, बिना गहनों के और झुकी आँखों वाली होती है। स्रोत: एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, दिगंबर (अंग्रेज़ी में)

जैन ग्रंथ कब लिखे गए

  • श्वेतांबर परंपरा एक स्वर में कहती है कि जैन ग्रंथों का वह संग्रह, जिसे सिद्धांत कहते हैं और जिसे श्वेतांबर मानते हैं, वलभी की सभा में देवर्द्धि की अध्यक्षता में तय हुआ। परंपरा के अनुसार, जिसे याकोबी दर्ज करते हैं, यह महावीर के निर्वाण के 980 (या 993) साल बाद हुआ, यानी 454 (या 467) ईसवी में; ब्रिटैनिका वलभी की सभा का समय 453 या 466 ईसवी देता है। परंपरा कहती है कि देवर्द्धि ने सिद्धांत को पुस्तकों में लिखवाया। याकोबी इसका मतलब यह लगाते हैं कि देवर्द्धि ने ग्रंथों का एक बड़ा संस्करण तैयार करवाया, ताकि हर शिक्षक के पास प्रतियाँ हों, क्योंकि यह मानना मुश्किल है कि जैन भिक्षुओं ने उससे पहले कभी अपने याद किए पाठ लिखने की कोशिश ही न की हो। स्रोत: याकोबी, जैन सूत्र, सेक्रेड बुक्स ऑफ़ द ईस्ट खंड 22 (अंग्रेज़ी में) · एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका, दिगंबर (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब बताती है कि महावीर की शिक्षाएँ उनके शिष्यों ने संकलित कीं, और अक्सर कहानियों के रूप में (पृष्ठ 88)। केशी और गौतम की कथा ऐसी ही एक कहानी है, और बच्चों को इसमें इतिहास का एक इशारा भी दिखाइए: महावीर से पहले भी एक जैन परंपरा थी, जिसके नियम कुछ अलग थे, और दोनों परंपराएँ धीरे-धीरे मिलीं। बौद्ध ग्रंथों की तरह यहाँ भी पाठ बहुत समय तक याद रखकर आगे बढ़ा। श्वेतांबर परंपरा के अनुसार वह वलभी की सभा में लिखवाया गया, पर याकोबी मानते हैं कि भिक्षु उससे पहले भी याद में मदद के लिए अपनी निजी प्रतियाँ रखते होंगे। यह भी बताइए कि दोनों संप्रदाय अपनी-अपनी कथा कहते हैं; कक्षा में दोनों का सम्मान से नाम लीजिए।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे। तेईसवें तीर्थंकर पार्श्व के धर्म और महावीर के धर्म में उत्तराध्ययन सूत्र कौन-से दो फ़र्क़ बताता है, और केशी-गौतम की कथा का अंत क्या है?

उत्तर देखिए

उत्तर: उत्तराध्ययन सूत्र के तेईसवें अध्याय से:

  • व्रत: पार्श्व के धर्म में चार व्रत थे, महावीर के धर्म में पाँच।
  • वस्त्र: पार्श्व के धर्म में भिक्षु एक नीचे का और एक ऊपर का वस्त्र पहन सकते थे; महावीर का धर्म वस्त्र की मनाही करता था।
  • कथा का अंत: श्रावस्ती में केशी ने गौतम से सवाल पूछे, और अंत में पाँच व्रतों वाला धर्म अपना लिया।

हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि एक ही धर्म के दो दल अपने नियमों का फ़र्क़ बातचीत से कैसे सुलझा सकते हैं। यह कथा उसी की मिसाल है।

सवाल: श्वेतांबर और दिगंबर संप्रदायों में मुख्य भेद क्या हैं, और उनके अलग होने के समय के बारे में हम पक्के तौर पर क्यों नहीं कह सकते?

उत्तर देखिए

उत्तर: भेद और उनकी शुरुआत के बारे में:

  • वस्त्र: दिगंबर मुनि वस्त्र नहीं पहनते; श्वेतांबर साधु सफ़ेद वस्त्र पहनते हैं।
  • मान्यताएँ: दिगंबर मानते हैं कि स्त्री पुरुष के रूप में दोबारा जन्म लिए बिना मोक्ष नहीं पा सकती, और महावीर ने विवाह नहीं किया था।
  • ग्रंथ: दिगंबर श्वेतांबरों का ग्रंथ-संग्रह नहीं मानते; उनके अनुसार शुरुआती ग्रंथ खो गए।
  • शुरुआत पक्की नहीं: दिगंबर कथा (भद्रबाहु, अकाल, कर्नाटक) का सबसे पुराना लिखा रूप दसवीं सदी ईसवी का है; दोनों ओर के ब्योरे आपस में मेल नहीं खाते और घटनाओं के बहुत बाद लिखे गए। विद्वानों की राय में दोनों संप्रदाय धीरे-धीरे बने।

हमारी ओर से: यहाँ बच्चे सीखते हैं कि घटना के सैकड़ों साल बाद लिखी कथा को इतिहासकार सावधानी से पढ़ता है, और “परंपरा कहती है” और “इतिहास बताता है” में फ़र्क़ करता है।

सवाल: जैन ग्रंथ पुस्तकों में कब और कहाँ लिखे गए, श्वेतांबर परंपरा के अनुसार? क्या याकोबी इसे पहली बार लिखा जाना मानते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: याकोबी की भूमिका से:

  • परंपरा: वलभी की सभा में, देवर्द्धि की अध्यक्षता में, महावीर के निर्वाण के 980 (या 993) साल बाद, यानी 454 (या 467) ईसवी में; ब्रिटैनिका इस सभा का समय 453 या 466 ईसवी देता है।
  • याकोबी की राय: देवर्द्धि ने शायद ग्रंथों का एक बड़ा संस्करण तैयार करवाया, ताकि हर शिक्षक के पास प्रतियाँ हों; यह मानना मुश्किल है कि उससे पहले किसी ने ग्रंथ लिखने की कोशिश न की हो।
  • एक और सभा: मथुरा में स्कंदिल की अध्यक्षता वाली एक सभा भी हुई, जो याकोबी को वलभी की प्रतिद्वंद्वी लगती है।

हमारी ओर से: बौद्ध त्रिपिटक की कथा से इसकी तुलना करवाइए। दोनों में ग्रंथ लंबे समय तक याद रखकर आगे बढ़ाए गए। महावंश के अनुसार श्रीलंका के भिक्खुओं ने धर्म बचाने के लिए पिटक लिखे; श्वेतांबर परंपरा के अनुसार जैन ग्रंथ वलभी की सभा में लिखवाए गए, जबकि याकोबी मानते हैं कि उससे पहले भी निजी प्रतियाँ रही होंगी।

साँची: खोज, नुक़सान और मरम्मत

किताब कहाँ रुकती है। किताब साँची की कहानी भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा से शुरू करती है: “भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत साँची कनखेड़ा की इमारतें हैं।” उसी अंश में बेगम बताती हैं कि मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम ने “इस इलाक़े में कई हफ़्तों तक रुक कर इन अवशेषों का निरीक्षण किया” और “गुंबदनुमा ढाँचे के बीचोंबीच खुदाई की” (पृष्ठ 82)। फिर किताब कहती है: “फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचे साँची के पूर्वी तोरणद्वार को फ्रांस के संग्रहालय में प्रदर्शित करने के लिए शाहजहाँ बेगम से फ्रांस ले जाने की इजाज़त माँगी। कुछ समय के लिए अंग्रेज़ों ने भी ऐसी ही कोशिश की। सौभाग्यवश फ्रांसिसी और अंग्रेज़ दोनों ही बड़ी सावधानी से बनाई प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए। इस प्रकार मूल कृति भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रही।” (पृष्ठ 83) बेगमों के अनुदान और जॉन मार्शल के ग्रंथों की बात के बाद किताब लिखती है: “आज यह जगह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का जीता जागता उदाहरण है।” (पृष्ठ 83) आगे एच.एच. कोल की राय आती है कि असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें, और “खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात को साँची के लिए मान लिया गया” (पृष्ठ 98-99)। किताब की समय-रेखा में 1854 के आगे लिखा है “अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी”, 1880 के आगे “एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया”, और 1914 के आगे “जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची पुस्तक का प्रकाशन” (पृष्ठ 110)। किताब यहीं रुकती है: साँची आधुनिक समय में कब सामने आया, उन्नीसवीं सदी की खुदाइयों ने स्तूपों को कितना नुक़सान पहुँचाया, प्लास्टर प्रतिकृतियाँ कब बनीं और कहाँ गईं, स्तूपों के भीतर क्या मिला, और मरम्मत में असल में क्या-क्या हुआ, यह बात उसमें नहीं आती।

नीचे की बातें इन स्रोतों से हैं, और सब अंग्रेज़ी में हैं: जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे का ग्रंथ द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची, और अलेक्ज़ैंडर कनिंघम की भिलसा टोप्स।

1818 और 1822: खोज, और फिर पहली दरार

  • मार्शल के अनुसार लगता है कि तेरहवीं सदी से साँची उजाड़ पड़ा रहा, और 1818 में जनरल टेलर ने इसे फिर से खोजा। ग्रंथ की विषय-सूची में इस हिस्से का नाम ही है: “1818 में फिर से खोज, और उसके बाद की बर्बादी”। मार्शल लिखते हैं कि उसके बाद वहाँ छिपे माने गए ख़ज़ाने की चाह में हुई खुदाइयों ने ज़्यादातर इमारतों को आधा ढहा दिया, और ऐसा नुक़सान किया जिसकी भरपाई नहीं हो सकती थी। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)
  • इसकी सबसे बड़ी मिसाल 1822 की है। भोपाल में सहायक पॉलिटिकल एजेंट कैप्टन जॉनसन ने महान स्तूप को एक तरफ़ से ऊपर से नीचे तक खोल डाला और उसमें एक बहुत बड़ी दरार छोड़ दी। मार्शल के अनुसार इसी दरार से आगे चलकर स्तूप के ढाँचे को बहुत नुक़सान हुआ। दूसरा और तीसरा स्तूप तब तक पूरी तरह ठीक हालत में थे; उनके आंशिक रूप से टूटने के लिए भी मार्शल इसी खुदाई को शायद ज़िम्मेदार मानते हैं। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)

1851: कनिंघम और मेसी की खुदाई

तीसरे स्तूप की दो मंजूषाएँ

  • कनिंघम ने तीसरे स्तूप के भीतर पाँच फ़ुट से लंबी एक पत्थर की पटिया पाई। उसे उठाने पर नीचे पत्थर की दो बड़ी पेटियाँ मिलीं, और हर पेटी के ढक्कन पर एक छोटा-सा अभिलेख था। दक्षिण वाली पेटी पर लिखा था “सारिपुतस”, यानी सारिपुत्र के (अवशेष); उत्तर वाली पर “महा मोगलानस”, यानी महामोग्गल्लान के (अवशेष)। हर पेटी का ढक्कन छह इंच मोटा था। सारिपुत्र वाली पेटी के भीतर सेलखड़ी (स्टिएटाइट) की एक बड़ी मंजूषा थी, छह इंच से ज़्यादा चौड़ी। स्रोत: कनिंघम, भिलसा टोप्स (अंग्रेज़ी में)

1869: पूर्वी तोरणद्वार की प्रतिकृतियाँ

  • मार्शल लिखते हैं कि इन बेजोड़ इमारतों की मरम्मत करके उन्हें आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाने का विचार तब तक शायद किसी के मन में आया ही नहीं था। फिर भी 1869 में, फ्रांस के नेपोलियन तृतीय के एक नक्काशीदार तोरणद्वार माँगने के अप्रत्यक्ष नतीजे के रूप में, पूर्वी तोरणद्वार की प्रतिकृतियाँ (कास्ट) बनाई गईं और यूरोप के कुछ प्रमुख राष्ट्रीय संग्रहालयों को दी गईं। इनमें साउथ केंसिंग्टन (लंदन), एडिनबरा, डबलिन, पेरिस और बर्लिन के नाम हैं। मार्शल इन्हें बस “कास्ट” (साँचे से ढली प्रतिकृतियाँ) कहते हैं; किताब जिन प्लास्टर प्रतिकृतियों की बात करती है, वे संभवतः यही हैं, पर मार्शल यह बात नहीं कहते। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)

1881: मेजर कोल की मरम्मत, और उसकी एक चूक

  • मार्शल के अनुसार 1881 में, जब आसपास के गाँव वालों और लगातार फैलते जंगल ने और भी तबाही मचा दी थी, तब सरकार को असली इमारतों को बचाने का ख़याल आया। उसी साल मेजर कोल ने, जो उस समय प्राचीन इमारतों के संग्रहाध्यक्ष थे, पहाड़ी की चोटी से झाड़-झंखाड़ साफ़ करवाया और जॉनसन की लगभग साठ साल पुरानी दरार भरवाई। अगले दो सालों में उन्होंने सरकार के ख़र्च पर दक्षिण और पश्चिम के गिरे हुए तोरणद्वार, और तीसरे स्तूप के सामने का छोटा तोरणद्वार फिर से खड़े करवाए। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)
  • मार्शल यह भी लिखते हैं कि कोल ने ढहती हुई बाक़ी इमारतों को बचाने, या मलबे के नीचे दबे विहारों और मंदिरों को निकालने की कोशिश नहीं की। और दरार भरने का तरीक़ा भी ठीक नहीं था: उसे बस बेतरतीब रोड़ों और मिट्टी से भर दिया गया, और लगता है कि उस भराव को बैठने दिए बिना ही ऊपर से चिनाई कर दी गई। नतीजा यह हुआ कि भीतर का भराव धँसा, गुंबद का ऊपरी हिस्सा अंदर की ओर बैठने लगा, और निचला हिस्सा दक्षिण-पश्चिमी चौथाई के चबूतरे समेत बाहर की ओर उभरने लगा। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)

1912 के बाद: मार्शल की खुदाई और मरम्मत

  • मार्शल 1912 में साँची आए। जाँच करके उन्हें भरोसा हुआ कि महान स्तूप के दक्षिण और पूर्व में जमा मलबे के ढेरों के नीचे अभी बहुत-सी इमारतें और प्राचीन वस्तुएँ दबी हो सकती हैं। भोपाल दरबार की, जिसका साँची और उसकी सारी धरोहर पर हक़ था, ख़ुशी से दी गई मंज़ूरी और सक्रिय मदद से उन्होंने अगले आठ सालों में यह खुदाई की। साथ ही उन्होंने वहीं एक संग्रहालय बनवाया, जिसमें सारी हटाई जा सकने वाली मूर्तियाँ और दूसरी वस्तुएँ रखी गईं। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)
  • मरम्मत के बड़े काम मार्शल ख़ुद गिनाते हैं:

    • महान स्तूप के पूरे दक्षिण-पश्चिमी चौथाई हिस्से को खोलकर फिर से बनाना।
    • मंदिर 18 के भारी खंभे ख़तरनाक ढंग से झुक गए थे; उन्हें सीधा करके पक्की नींव पर फिर से खड़ा करना।
    • मंदिर 45 की मरम्मत, जो टूटने की आख़िरी हालत में पहुँच चुका था।
    • तीसरे स्तूप का गुंबद, वेदिकाएँ और ऊपर की छत्री फिर से बनाना।
    • मंदिर 17, 31 और 32 की नई छत और आम मरम्मत।
    • महान स्तूप के आसपास पानी की ठीक निकासी, जिसके लिए पुराने टूटे-फूटे फ़र्श को फिर से बिछाया गया।

    स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)

  • यह काम अकेले मार्शल का नहीं था। अपनी भूमिका में वे अपने खुदाई-सहायक मुंशी ग़ुलाम क़ादिर को याद करते हैं, जो दस साल तक साँची में उनके दाहिने हाथ रहे और जिन्होंने स्मारकों की खुदाई और मरम्मत में बड़ी मेहनत की। ग्रंथ का समर्पण है: “भोपाल की दिवंगत शासक, हर हाइनेस नवाब सुल्तान जहान बेगम साहिबा की स्मृति में”। किताब इन्हीं को सुल्तानजहाँ बेगम कहती है। स्रोत: मार्शल और फूसे, द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची (अंग्रेज़ी में)

(हमारी ओर से) किताब कहती है कि साँची इसलिए बचा कि कुछ विवेकपूर्ण निर्णय लिए गए, और आज यह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण की सफल मरम्मत का उदाहरण है (पृष्ठ 83)। मार्शल का ब्योरा इसी बात का दूसरा पहलू दिखाता है: बचने से पहले साँची ने बहुत कुछ झेला, ख़ज़ाने की खोज में हुई खुदाइयाँ, 1822 की दरार, 1851 की जल्दबाज़ी, और 1881 की अधूरी मरम्मत भी। दोनों बातें सच हैं, और बच्चों के सामने दोनों रखिए। एक बात और: जिस खुदाई ने नुक़सान किया, उसी से सारिपुत्र और महामोग्गल्लान के नाम वाली मंजूषाएँ भी मिलीं। इतिहासकार अक्सर ऐसे ही उलझे हुए सबूतों से काम चलाता है।

कक्षा में कैसे पूछें

सवाल: किताब कहती है कि फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की “प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए” (पृष्ठ 83)। मार्शल के ग्रंथ में पूर्वी तोरणद्वार की जिन प्रतिकृतियों का ज़िक्र है, जो संभवतः यही थीं, उनके बारे में क्या पता चलता है?

उत्तर देखिए

उत्तर: मार्शल के ब्योरे से:

  • कब: 1869 में।
  • क्यों: फ्रांस के नेपोलियन तृतीय ने एक नक्काशीदार तोरणद्वार माँगा था; प्रतिकृतियाँ उसी का अप्रत्यक्ष नतीजा थीं।
  • किसकी: पूर्वी तोरणद्वार की।
  • कहाँ गईं: यूरोप के कुछ प्रमुख राष्ट्रीय संग्रहालयों में, जैसे साउथ केंसिंग्टन (लंदन), एडिनबरा, डबलिन, पेरिस और बर्लिन।

हमारी ओर से: बच्चों से पूछिए कि असली तोरणद्वार जगह पर रहे और संग्रहालयों को प्रतिकृति मिले, इसमें किसका फ़ायदा था। किताब के पृष्ठ 98-99 पर कोल की यही राय है।

सवाल: उन्नीसवीं सदी में साँची के स्तूपों को किन-किन वजहों से नुक़सान पहुँचा? पृष्ठ 98-99 पर अमरावती की कहानी से इसकी तुलना कीजिए।

उत्तर देखिए

उत्तर: मार्शल के ग्रंथ से:

  • ख़ज़ाने की खोज: छिपे माने गए ख़ज़ाने की चाह में हुई खुदाइयों ने ज़्यादातर इमारतों को आधा ढहा दिया।
  • 1822: कैप्टन जॉनसन ने महान स्तूप में एक तरफ़ ऊपर से नीचे तक बड़ी दरार छोड़ी; दूसरे और तीसरे स्तूप भी शायद तभी आंशिक रूप से टूटे।
  • 1851: कनिंघम और मेसी की जल्दबाज़ी की खुदाई।
  • गाँव और जंगल: आसपास के गाँव वालों और फैलते जंगल ने और तबाही की।
  • 1881 की चूक: दरार रोड़ों और मिट्टी से भरी गई, भराव धँसा और गुंबद बिगड़ने लगा।

हमारी ओर से: किताब के अनुसार अमरावती में कोल अधिकारियों को राज़ी नहीं कर पाए, पर साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई (पृष्ठ 99)। बच्चों से पूछिए कि दोनों जगहों का अंतर किस फ़ैसले से पैदा हुआ।

सवाल: साँची के तीसरे स्तूप की पेटियों पर किनके नाम लिखे मिले, और ये नाम बौद्ध ग्रंथों से कैसे जुड़ते हैं?

उत्तर देखिए

उत्तर: कनिंघम के ब्योरे से:

  • नाम: दक्षिण वाली पेटी पर “सारिपुतस” (सारिपुत्र के अवशेष), उत्तर वाली पर “महा मोगलानस” (महामोग्गल्लान के अवशेष)।
  • ग्रंथों में: कनिंघम सारिपुत्र को बुद्ध के ब्राह्मण शिष्यों में गिनाते हैं; विनय पिटक के चुल्लवग्ग में महामोग्गल्लान एक अर्हत के रूप में आते हैं।
  • दूसरा स्तूप: गाइगर के अनुसार वहाँ की एक मंजूषा का अभिलेख तीसरी सभा वाले मोग्गलिपुत्त तिस्स का नाम लेता है; पर मार्शल के ग्रंथ में मजूमदार इस पहचान को मुश्किल से टिकने लायक़ मानते हैं।

हमारी ओर से: यहाँ बच्चे देखते हैं कि पत्थर पर लिखा एक छोटा-सा नाम किसी ग्रंथ की बात की गवाही दे सकता है, और यह भी कि ऐसी पहचान पर विद्वान बहस करते हैं, क्योंकि एक ही नाम के दो लोग भी हो सकते हैं।