यह पन्ना परीक्षा से पहले दोहराने के लिए है। हर हिस्से की शुरुआत में किताब के पृष्ठ लिखे हैं, ताकि शक हो तो वहीं खोलकर देख लीजिए। पृष्ठ संख्याएँ 2026-27 में छपी किताब की हैं।
यह अध्याय ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक के विचारों, विश्वासों और इमारतों की यात्रा है। इसमें दो बातें साथ-साथ चलती हैं। पहली: उस युग के दार्शनिकों और चिंतकों ने जीवन, मृत्यु, दुख और मुक्ति पर क्या प्रश्न पूछे और कौन-से उत्तर दिए (यज्ञ की परंपरा, उपनिषद, नियतिवादी और भौतिकवादी, महावीर, बुद्ध, फिर महायान, वैष्णव और शैव परंपराएँ)। दूसरी: ये विचार इमारतों और मूर्तियों में कैसे दिखे (स्तूप, मूर्तिकला, मंदिर, गुफाएँ) और इतिहासकार उन्हें कैसे पढ़ते हैं। किताब बौद्ध धर्म पर ज़्यादा ठहरती है, पर याद रखिए कि बौद्ध परंपरा अकेली विकसित नहीं हुई: कई परंपराएँ एक-दूसरे से लगातार वाद-विवाद और संवाद कर रही थीं। उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित साँची का स्तूप है, जो भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व में है।
तारों का मतलब: ★★किताब की प्रश्नावली (पृष्ठ 111–113) में सीधे पूछा गया · ★उन उत्तरों में काम आता है · बिना तारे के: पृष्ठभूमि या किताब की गतिविधि।
1. अध्याय एक नज़र में
- काल: ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक।
- स्रोत: बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथ, और इमारतें और अभिलेख जैसे भौतिक साक्ष्य।
- केंद्र: साँची का स्तूप, जो उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है।
2. ज़रूरी शब्द★
| शब्द | मतलब (हमारे शब्दों में) | पृष्ठ |
|---|---|---|
| यज्ञ | वैदिक अनुष्ठान, जिसमें ऋग्वेद की स्तुतियाँ पढ़ी जाती थीं; पहले सामूहिक, बाद में कुछ घरों के मालिक करते थे; राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा | 84 |
| उपनिषद | इनमें (छठी सदी ई.पू. से) पाई गई विचारधाराएँ जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन, पुनर्जन्म और परम यथार्थ पर प्रश्न पूछती हैं | 84–85 |
| कुटागारशाला | नुकीली छत वाली झोपड़ी, जहाँ घुमक्कड़ शिक्षक बहस करते थे | 85 |
| नियतिवादी | जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है; आजीविक परंपरा, जैसे मक्खलि गोसाल | 87 |
| भौतिकवादी | लोकायत परंपरा, जैसे अजीत केसकंबलिन्: मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता | 87 |
| तीर्थंकर | जैन परंपरा के वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं; महावीर से पहले 23 हुए | 88 |
| अहिंसा | किसी भी जीव, यानी इनसान, जानवर, पेड़-पौधे या कीड़े-मकोड़े, को न मारना; जैन दर्शन का केंद्र | 88 |
| श्रमण | जिन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया है | 91 |
| संतचरित्र | किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी, जो उसकी उपलब्धियों का गुणगान करती है | 89 |
| धम्म | बुद्ध की शिक्षा, यानी धर्म या सम्यक जीवनयापन; संघ के भिक्षु धम्म के शिक्षक बने | 90, 92 |
| मध्यम मार्ग | घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच का रास्ता, जिससे दुखों से मुक्ति मिल सकती है | 91 |
| निर्वाण / निब्बान | अहं और इच्छा का खत्म हो जाना; किताब पृष्ठ 92 पर निर्वाण और पृष्ठ 96, 103 पर पालि रूप निब्बान लिखती है | 92, 96 |
| संघ | बुद्ध की स्थापित भिक्षुओं की संस्था, जिसके सदस्य धम्म के शिक्षक बने | 92 |
| भिक्खु | संघ का भिक्षु; दान पर निर्भर रहने के कारण यह नाम | 92 |
| भिक्खुनी | संघ में आई स्त्री; पहली भिक्खुनी महाप्रजापति गोतमी | 92 |
| थेरी | ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो | 92 |
| त्रिपिटक | ‘तीन टोकरियाँ’: विनय पिटक (संघ के नियम), सुत्त पिटक (बुद्ध की शिक्षाएँ), अभिधम्म पिटक (दर्शन) | 86 |
| थेरीगाथा | सुत्त पिटक का हिस्सा, जिसमें भिक्खुनियों के रचे छंद हैं | 93 |
| चैत्य | पवित्र स्थल की छोटी वेदी; किताब के बॉक्स के अनुसार शवदाह के बाद अवशेष रखे गए अंतिम संस्कार से जुड़े टीले भी चैत्य कहलाए | 95 |
| स्तूप | (संस्कृत अर्थ टीला) बुद्ध से जुड़े अवशेषों, जैसे अस्थियाँ या बुद्ध का इस्तेमाल किया सामान, पर बना टीला; पालि रूप थूप | 96 |
| अंड | स्तूप का गोलार्ध मिट्टी का टीला | 96 |
| हर्मिका | अंड के ऊपर छज्जे जैसा ढाँचा, देवताओं के घर का प्रतीक | 96 |
| यष्टि | हर्मिका से निकलने वाला मस्तूल | 96 |
| छत्री | यष्टि पर अक्सर लगी छतरी | 96 |
| वेदिका | टीले के चारों ओर का घेरा, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करता था | 97 |
| तोरणद्वार | स्तूप की वेदिका में चारों दिशाओं के नक्काशीदार द्वार; बाद के मंदिरों के साथ भी तोरण जुड़े | 97, 106 |
| दक्षिणावर्त परिक्रमा | टीले को दाईं ओर रखकर घूमना, मानो आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण | 97 |
| चारणचित्र | कपड़े या कागज़ पर बने चित्र, जिन्हें घुमक्कड़ कथावाचक कहानी कहते हुए दिखाते हैं | 99 |
| शालभंजिका | संस्कृत में वर्णित, पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री की मूर्ति; लोक विश्वास में उसके छूने से वृक्षों में फूल और फल आते थे | 101 |
| गजलक्ष्मी | सौभाग्य लाने वाली लोकप्रिय देवी, जिन्हें प्रायः हाथियों के साथ जोड़ा जाता है | 102 |
| आभाभेद | चित्रों को त्रिविम रूप देने की तकनीक, जो अजंता के कलाकारों ने अपनाई | 102 |
| बोधिसत्त | परम करुणामय जीव, जो सत्कार्यों से कमाया पुण्य दूसरों की सहायता में लगाते थे | 103 |
| महायान | बौद्ध चिंतन की नयी परंपरा, जो ईसा की प्रथम सदी के बाद आए बदलावों से उभरी: मुक्तिदाता की कल्पना, बोधिसत्त, बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा | 103 |
| हीनयान | महायान अपनाने वालों द्वारा पुरानी बौद्ध परंपरा को दिया गया नाम | 103 |
| थेरवाद | पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे: पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के रास्ते पर चलने वाले | 103 |
| भक्ति | एक विशेष देवता की पूजा, जिसमें भक्त और ईश्वर का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना जाता था | 104 |
| वैष्णव | वह हिंदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है | 104 |
| शैव | वह संकल्पना जिसमें शिव परमेश्वर हैं | 104 |
| अवतार | विश्व की रक्षा के लिए भगवान के अलग-अलग रूप; वैष्णव परंपरा में दस अवतारों की कल्पना | 104 |
| लिंग | शिव का प्रतीक, जिसके रूप में उन्हें बनाया जाता था | 104 |
| आयुध | हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र | 104 |
| पुराण | प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे, संस्कृत श्लोकों के ग्रंथ, जो ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे | 104–105 |
| गर्भगृह | शुरू के मंदिरों का चौकोर कमरा, एक दरवाज़े वाला, जिसमें मूर्ति रहती थी | 105 |
| शिखर | गर्भगृह के ऊपर बनाया जाने वाला ऊँचा ढाँचा | 105 |
| कृत्रिम गुफा | पहाड़ी काटकर, खोखला करके बनाई गई गुफा | 106–107 |
3. साँची: एक स्तूप जो अपनी जगह बचा रहा★★
किताब का भाग 1 (साँची की एक झलक), पृष्ठ 82–84 · प्रश्नावली में: प्रश्न 3
- सबसे सुरक्षित इमारत: किताब कहती है, “उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित है साँची का स्तूप।” इसलिए यह स्तूप पूरे अध्याय का एक प्रमुख केंद्र-बिंदु है।
- इतिहास के स्रोत: उस युग के विचारों को समझने के लिए इतिहासकार बौद्ध, जैन और ब्राह्मण ग्रंथों के साथ-साथ इमारतों और अभिलेखों जैसे भौतिक साक्ष्य भी पढ़ते हैं।
- शाहजहाँ बेगम का वर्णन: भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) ने अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल (भोपाल का इतिहास) में साँची का वर्णन किया। 1876 में एच.डी. बार्स्टो ने इसका अनुवाद किया।
- बेगम के शब्दों में “भोपाल राज्य के प्राचीन अवशेषों में सबसे अद्भुत साँची कनखेड़ा की इमारतें हैं।” यह गाँव भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व की तरफ़ एक पहाड़ी की तलहटी में बसा है।
- बेगम ने वहाँ पत्थर की वस्तुओं, बुद्ध की मूर्तियों और एक प्राचीन तोरणद्वार का निरीक्षण किया।
- कनिंघम का काम: बेगम के वर्णन के अनुसार मेजर अलेक्ज़ैंडर कनिंघम कई हफ़्तों तक साँची में रुके। उन्होंने जगह के चित्र बनाए, अभिलेख पढ़े, गुंबदनुमा ढाँचे के बीचोंबीच खुदाई की और निष्कर्ष एक अंग्रेज़ी पुस्तक में लिखे।
- यूरोप ले जाने की कोशिश: उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने सबसे अच्छी हालत में बचा साँची का पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस के संग्रहालय में दिखाने के लिए शाहजहाँ बेगम से ले जाने की इजाज़त माँगी। कुछ समय अंग्रेज़ों ने भी ऐसी कोशिश की। दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए, और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा।
- बेगमों का अनुदान: शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम ने स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया।
- सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनाने के लिए अनुदान दिया।
- जॉन मार्शल ने साँची पर अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ वहीं रहकर लिखे और उन्हें सुल्तानजहाँ को समर्पित किया। उन पुस्तकों के खंडों के प्रकाशन में भी सुल्तानजहाँ बेगम ने अनुदान दिया।
- भाग्य भी साथ रहा: किताब के अनुसार शायद यह भी सौभाग्य था कि इस स्तूप पर किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी।
- आज: साँची भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का “जीता जागता उदाहरण” है। स्तूप समूह में एक विशाल गोलार्ध ढाँचा और कई दूसरी इमारतें हैं, जिनमें पाँचवीं सदी में बना एक मंदिर भी है।
- किताब के प्रश्न: यह टीला क्यों बना, इसके अंदर क्या था, चारों ओर पत्थर की रेलिंग क्यों है, इसे किसने बनवाया या किसने धन दिया, इसकी “खोज” कब हुई? इनके उत्तर ग्रंथों, मूर्तियों, स्थापत्य कला और अभिलेखों के अध्ययन से मिलते हैं।
4. यज्ञ की परंपरा, नए प्रश्न और वाद-विवाद★★
किताब का भाग 2 (पृष्ठभूमि: यज्ञ और विवाद), पृष्ठ 84–87 · प्रश्नावली में: प्रश्न 1
- एक मोड़ का समय: ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि को विश्व इतिहास में एक महत्त्वपूर्ण मोड़ माना जाता है। इसी सहस्राब्दि में ईरान में जरथुस्त्र, चीन में खुंगत्सी, यूनान में सुकरात, प्लेटो और अरस्तु, और भारत में महावीर, बुद्ध और कई अन्य चिंतक हुए।
- ये चिंतक जीवन के रहस्य और इनसानों तथा विश्व व्यवस्था के रिश्ते को समझना चाहते थे।
- उसी समय गंगा घाटी में नए राज्य और शहर उभर रहे थे, और सामाजिक-आर्थिक जीवन बदल रहा था। ये मनीषी इन बदलते हालात को भी समझने की कोशिश कर रहे थे।
यज्ञों की परंपरा (भाग 2.1)
- ऋग्वेद: पूर्व वैदिक परंपरा की जानकारी ऋग्वेद से मिलती है, जो 1500 से 1000 ईसा पूर्व में संकलित हुआ। यह अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुतियों का संग्रह है।
- यज्ञ किसलिए: यज्ञों के समय ये स्तुतियाँ पढ़ी जाती थीं, और लोग मवेशी, बेटे, स्वास्थ्य, लंबी आयु आदि के लिए प्रार्थना करते थे।
- कौन करता था: शुरू-शुरू में यज्ञ सामूहिक रूप से होते थे। बाद में (लगभग 1000 ईसा पूर्व से 500 ईसा पूर्व) कुछ यज्ञ घरों के मालिक करते थे। राजसूय और अश्वमेध जैसे जटिल यज्ञ सरदार और राजा करते थे, और इनके लिए उन्हें ब्राह्मण पुरोहितों पर निर्भर रहना पड़ता था।
- स्रोत 1 (अग्नि की प्रार्थना): ऋग्वेद के दो छंदों में अग्निदेव से आहुति देवताओं तक ले जाने, खाद्य पदार्थ, प्रचुर धन, गाय और वंश आगे बढ़ाने वाला पुत्र देने की प्रार्थना है। ऐसे छंद वैदिक संस्कृत में रचे गए थे और पुरोहित परिवारों के लोगों को मौखिक रूप में सिखाए जाते थे।
नए प्रश्न (भाग 2.2)
- उपनिषद: उपनिषदों (छठी सदी ई.पू. से) की विचारधाराएँ दिखाती हैं कि लोग जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म के बारे में जानना चाहते थे। प्रश्न था: क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों के कारण होता है?
- परम यथार्थ: मनीषी परम यथार्थ की प्रकृति को समझने और कहने में लगे थे। वैदिक परंपरा से बाहर के कुछ दार्शनिक पूछ रहे थे कि सत्य एक होता है या अनेक। लोग यज्ञों के महत्त्व पर भी सोचने लगे।
- स्रोत 2 (छांदोग्य उपनिषद): संस्कृत में रचे, लगभग छठी सदी ईसा पूर्व के छांदोग्य उपनिषद के दो श्लोक:
- आत्मा की प्रकृति: मन के अंदर छुपी आत्मा धान, यव, सरसों या बाजरे के बीज की गिरी से भी छोटी है, और पृथ्वी, क्षितिज, स्वर्ग और सभी लोकों से भी बड़ी है।
- सच्चा यज्ञ: बहता हुआ पवन “निश्चय ही एक यज्ञ है”, क्योंकि बहते-बहते वह सबको पवित्र करता है। यानी यज्ञ का अर्थ ही नए ढंग से सोचा जा रहा था।
वाद-विवाद और चर्चाएँ (भाग 2.3)
- 64 संप्रदाय: समकालीन बौद्ध ग्रंथों में 64 संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख है। इससे उस समय की जीवंत चर्चाओं और विवादों की झाँकी मिलती है।
- बहस कहाँ और कैसे: शिक्षक जगह-जगह घूमकर एक-दूसरे से और आम लोगों से तर्क-वितर्क करते थे। ये चर्चाएँ कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में या उन उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे।
- जो शिक्षक अपने प्रतिद्वंद्वी को तर्कों से समझा लेता, वह प्रतिद्वंद्वी अपने अनुयायियों के साथ उसका शिष्य बन जाता। इसलिए किसी भी संप्रदाय का समर्थन समय के साथ बढ़ता-घटता रहता था।
- वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न: महावीर और बुद्ध समेत कई शिक्षकों ने वेदों के प्रभुत्व पर प्रश्न उठाए। उन्होंने माना कि जीवन के दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
- यह समझ ब्राह्मणवाद से बिलकुल भिन्न थी, जो मानता था कि किसी व्यक्ति का अस्तित्व उसकी जाति और लिंग से तय होता है।
नियतिवादी और भौतिकवादी (स्रोत 3, पृष्ठ 87)
- स्रोत: सुत्त पिटक के इस दृष्टांत में मगध के राजा अजातसत्तु बुद्ध को मक्खलि गोसाल नामक एक दूसरे शिक्षक की बातें बताते हैं; उसके बाद अजीत केसकंबलिन् नामक दार्शनिक का उपदेश आता है।
- मक्खलि गोसाल: उनके अनुसार बुद्धिमान और मूर्ख, कोई कुछ नहीं बदल सकता: “सुख और दुख मानो पूर्व निर्धारित मात्रा में माप कर दिए गए हैं।” जैसे फेंका गया धागे का गोला अपनी पूरी लंबाई तक खुलता जाता है, वैसे ही मूर्ख और विद्वान दोनों पहले से तय रास्ते से होकर ही दुखों का अंत करेंगे।
- अजीत केसकंबलिन्: उनके अनुसार दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती, और “मनुष्य चार तत्वों से बना होता है।” मरने पर हर अंश अपने तत्व में मिल जाता है: “मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता।”
- नाम: पहले उपदेशक आजीविक परंपरा के थे, जिन्हें अक्सर नियतिवादी कहा जाता है, यानी ऐसे लोग जो मानते थे कि सब कुछ पूर्व निर्धारित है। दूसरे लोकायत परंपरा के थे, जिन्हें सामान्यतः भौतिकवादी कहा जाता है।
- जानकारी कहाँ से: इन दोनों परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, इसलिए उनके बारे में हमें दूसरी परंपराओं के ग्रंथों से ही पता चलता है।
जीवन, मृत्यु और कर्म पर तीन तरह की सोच
- जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन, पुनर्जन्म पर प्रश्न
- आत्मा बीज की गिरी से छोटी, सब लोकों से बड़ी
- सब कुछ पूर्व निर्धारित
- सुख-दुख न बदले जा सकते, न बढ़ाए-घटाए
- मनुष्य चार तत्वों से बना
- दान, यज्ञ, चढ़ावा कुछ नहीं; मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता
बौद्ध ग्रंथ कैसे तैयार हुए और बचे (बॉक्स, पृष्ठ 86)
- मौखिक शिक्षा: बुद्ध, दूसरे शिक्षकों की तरह, चर्चा और बातचीत से मौखिक शिक्षा देते थे। महिलाएँ और पुरुष (शायद बच्चे भी) ये प्रवचन सुनते और उन पर चर्चा करते थे। बुद्ध का कोई भी संभाषण उनके जीवन काल में लिखा नहीं गया।
- वेसली की सभा: बुद्ध की मृत्यु के बाद (पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू.) उनके शिष्यों ने ‘ज्येष्ठों’, यानी ज़्यादा वरिष्ठ श्रमणों की एक सभा वेसली में बुलाई। वेसली बिहार की वैशाली का पालि भाषा में रूप है। वहीं उनकी शिक्षाओं का संकलन हुआ।
- त्रिपिटक: इन संग्रहों को ‘त्रिपिटक’ कहा गया, जिसका शब्दार्थ है ‘तीन टोकरियाँ’, अलग-अलग प्रकार के ग्रंथ रखने के लिए। पहले ये मौखिक रूप से आगे बढ़ाए गए, बाद में लिखकर विषय और लंबाई के अनुसार बाँटे गए। बाद के युगों में बौद्ध विद्वानों ने इन पर टीकाएँ लिखीं।
- श्रीलंका के इतिहास: बौद्ध धर्म श्रीलंका जैसे नए इलाकों में फैला तो दीपवंश (द्वीप का इतिहास) और महावंश (महान इतिहास) जैसे क्षेत्र-विशेष के बौद्ध इतिहास लिखे गए। इनमें से कई में बुद्ध की जीवनी भी है।
- भाषाएँ: ज़्यादातर पुराने बौद्ध ग्रंथ पालि में हैं; बाद के युगों में संस्कृत में ग्रंथ लिखे गए।
- पूर्व एशिया: फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए और पुस्तकें अपने देश ले गए, जहाँ उनका अनुवाद हुआ। भारत के बौद्ध शिक्षक भी पुस्तकें लेकर दूर-दराज़ के देशों में गए।
- आज के अनुवाद: कई सदियों तक ये पांडुलिपियाँ एशिया के अलग-अलग इलाकों के बौद्ध विहारों में सुरक्षित रहीं। पालि, संस्कृत, चीनी और तिब्बती भाषाओं के इन ग्रंथों से आधुनिक अनुवाद बने हैं।
त्रिपिटक: 'तीन टोकरियाँ'
5. महावीर का संदेश और जैन धर्म★★
किताब का भाग 3 (लौकिक सुखों से आगे: महावीर का संदेश), पृष्ठ 88–89 · प्रश्नावली में: प्रश्न 2
- महावीर से पहले भी: जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे।
- तीर्थंकर: जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 शिक्षक हो चुके थे। उन्हें तीर्थंकर कहा जाता है, यानी “वे महापुरुष जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं।”
- सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा: जैन दर्शन के अनुसार “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”। पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
- अहिंसा: जीवों के प्रति अहिंसा, ख़ासकर इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों को न मारना, जैन दर्शन का केंद्र बिंदु है। जैन अहिंसा के सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया है।
- कर्म और मुक्ति: जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है। कर्म के चक्र से मुक्ति के लिए त्याग और तपस्या ज़रूरी है, जो संसार के त्याग से ही संभव है। इसीलिए मुक्ति के लिए विहारों में रहना एक अनिवार्य नियम बन गया।
- पाँच व्रत: जैन साधु और साध्वी पाँच व्रत करते थे: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य का पालन करना और धन संग्रह न करना।
- स्रोत 4 (महल के बाहर की दुनिया): महावीर के शिष्यों ने भी उनके उपदेश संकलित किए, अक्सर कहानियों के रूप में, जो आम लोगों को आकर्षित करती थीं। उत्तराध्ययन सूत्र के इस अंश में महारानी कमलावती अपने पति को संन्यास लेने के लिए समझाती हैं:
- संपूर्ण विश्व के खज़ाने मिल जाएँ तब भी संतोष नहीं होगा, न वे बचा पाएँगे।
- मृत्यु पर सारा धन पीछे छूट जाएगा, तब सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा।
- जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से नफ़रत करती हैं; राज्य और इंद्रिय सुख छोड़कर तपस्या करने को कहती हैं।
जैन साधु और साध्वी के पाँच व्रत
जैन धर्म का विस्तार (भाग 3.1)
- फैलाव: धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैल गया।
- साहित्य: बौद्धों की तरह जैन विद्वानों ने भी प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी कई भाषाओं में बहुत साहित्य रचा। इन ग्रंथों की पांडुलिपियाँ सैकड़ों वर्षों से मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में सुरक्षित हैं (जैसे चौदहवीं सदी के एक जैन ग्रंथ की पांडुलिपि)।
- मूर्तियाँ: धार्मिक परंपराओं से जुड़ी सबसे प्राचीन मूर्तियों में जैन तीर्थंकरों के उपासकों की बनवाई मूर्तियाँ हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के कई हिस्सों में मिली हैं (जैसे मथुरा से मिली लगभग तीसरी शताब्दी ई. की तीर्थंकर की मूर्ति)।
6. बुद्ध और ज्ञान की खोज★
किताब का भाग 4, पृष्ठ 89–90 · प्रश्नावली में: प्रश्न 5, 10
- प्रभाव और प्रसार: बुद्ध उस युग के सबसे प्रभावशाली शिक्षकों में से एक थे। सैकड़ों वर्षों में उनके संदेश पूरे उपमहाद्वीप में, फिर मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान तक, और श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक फैले।
- हम कैसे जानते हैं: बुद्ध की शिक्षाएँ बौद्ध ग्रंथों के बहुत परिश्रम से किए गए संपादन, अनुवाद और विश्लेषण से फिर से जोड़ी गई हैं। उनके जीवन की जानकारी चरित लेखन से मिली; इनमें से कई ग्रंथ बुद्ध के जीवन काल से लगभग सौ वर्षों के बाद लिखे गए।
- संतचरित्र: किसी संत या धार्मिक नेता की जीवनी। ये संत की उपलब्धियों का गुणगान करते हैं, जो तथ्य के रूप में पूरी तरह सही नहीं होतीं; फिर भी ये उस परंपरा के अनुयायियों के विश्वास बताते हैं, इसलिए महत्वपूर्ण हैं।
- सिद्धार्थ: बुद्ध के बचपन का नाम सिद्धार्थ था। वे शाक्य कबीले के सरदार के बेटे थे और महल की चारदीवारी के अंदर सब सुखों के बीच, जीवन के कटु यथार्थों से दूर पाले गए।
- चार दृश्य: रथकार के साथ शहर घूमते हुए उन्होंने एक वृद्ध, एक बीमार और एक लाश देखी, और समझा कि मनुष्य के शरीर का क्षय और अंत निश्चित है। फिर उन्होंने एक गृहत्याग किए संन्यासी को देखा, जो बुढ़ापे, बीमारी और मृत्यु से परेशान नहीं था और शांत था। सिद्धार्थ ने भी संन्यास का रास्ता चुना और महल छोड़ दिया।
- ज्ञान: उन्होंने साधना के कई मार्ग आज़माए; शरीर को अधिक से अधिक कष्ट देने के चलते वे मरते-मरते बचे। इन अतिवादी तरीकों को छोड़कर कई दिन ध्यान करने के बाद उन्हें ज्ञान मिला। तब से वे बुद्ध अथवा ज्ञानी व्यक्ति कहलाए, और बाकी जीवन उन्होंने धर्म या सम्यक जीवनयापन की शिक्षा दी।
7. बुद्ध की शिक्षाएँ★
किताब का भाग 5, पृष्ठ 91–92 · प्रश्नावली में: प्रश्न 5, 6
- कहानियों से शिक्षा: बुद्ध की शिक्षाएँ सुत्त पिटक की कहानियों के आधार पर फिर से जोड़ी गई हैं। कुछ कहानियों में अलौकिक शक्तियाँ हैं, पर दूसरी कहानियाँ दिखाती हैं कि बुद्ध ने लोगों को विवेक और तर्क से समझाया।
- मरे हुए बच्चे की शोकमग्न माँ आई तो बुद्ध ने बच्चे को जीवित करने के बजाय उसे मृत्यु के अवश्यंभावी होने की बात समझाई।
- ये कथाएँ आम जनता की भाषा में रची गई थीं, ताकि आसानी से समझी जा सकें।
- बौद्ध दर्शन के मूल विचार:
- विश्व अनित्य है और लगातार बदल रहा है।
- विश्व आत्माविहीन है, क्योंकि यहाँ कुछ भी स्थायी या शाश्वत नहीं है।
- इस क्षणभंगुर दुनिया में दुख मनुष्य के जीवन का अंतर्निहित तत्व है।
- घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच मध्यम मार्ग अपनाकर मनुष्य दुनिया के दुखों से मुक्ति पा सकता है।
- बौद्ध धर्म की प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था।
छपी किताब में “आत्माविहीन” के आगे कोष्ठक में ‘आत्मा’ छपा है; अर्थ आत्माविहीन ही है।
- समाज इनसानों ने बनाया: बुद्ध मानते थे कि समाज का निर्माण इनसानों ने किया, ईश्वर ने नहीं। इसलिए उन्होंने राजाओं और गृहपतियों को दयावान और आचारवान होने की सलाह दी। माना जाता था कि व्यक्तिगत प्रयास से सामाजिक परिवेश बदला जा सकता है।
- निर्वाण: बुद्ध ने जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्ति, आत्म-ज्ञान और निर्वाण के लिए व्यक्ति-केंद्रित प्रयास और सम्यक कर्म की बात की। निर्वाण का मतलब था “अहं और इच्छा का खत्म हो जाना”, जिससे गृहत्याग करने वालों के दुख के चक्र का अंत हो सकता था।
- अंतिम निर्देश: बौद्ध परंपरा के अनुसार शिष्यों के लिए बुद्ध का अंतिम निर्देश था: “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो क्योंकि तुम्हें खुद ही अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ना है।”
- स्रोत 5 (व्यवहार में बौद्ध धर्म): सुत्त पिटक के इस अंश में बुद्ध सिगल नाम के एक अमीर गृहपति को सलाह देते हैं:
- मालिक नौकरों और कर्मचारियों की पाँच तरह से देखभाल करे: क्षमता के अनुसार काम देकर, भोजन और मज़दूरी देकर, बीमारी में परिचर्या करके, सुस्वादु भोजन बाँटकर और समय-समय पर छुट्टी देकर।
- कुल के लोग श्रमणों (जिन्होंने सांसारिक जीवन त्याग दिया है) और ब्राह्मणों की भी पाँच तरह से देखभाल करें, जैसे कर्म, वचन और मन से अनुराग, उनके स्वागत के लिए घर हमेशा खुले रखना और उनकी दिन-प्रतिदिन की ज़रूरतें पूरी करना।
- सिगल को माता-पिता, शिक्षक और पत्नी के साथ व्यवहार के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए।
8. बुद्ध के अनुयायी और संघ★★
किताब का भाग 6, पृष्ठ 92–94 · प्रश्नावली में: प्रश्न 4, 5
- संघ: शिष्यों का दल बढ़ा तो बुद्ध ने संघ की स्थापना की: ऐसे भिक्षुओं की संस्था, जो धम्म के शिक्षक बन गए।
- ये श्रमण सादा जीवन बिताते थे; जीवन के लिए बहुत ज़रूरी चीज़ों के अलावा उनके पास कुछ नहीं होता था, जैसे दिन में एक बार उपासकों से भोजन दान पाने के लिए एक कटोरा।
- वे दान पर निर्भर थे, इसलिए उन्हें भिक्खु कहा जाता था।
- महिलाएँ संघ में: शुरू-शुरू में सिर्फ़ पुरुष संघ में आ सकते थे, बाद में महिलाओं को भी अनुमति मिली। बौद्ध ग्रंथों के अनुसार बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाकर यह अनुमति पाई।
- बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी बनीं।
- संघ में आई कई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और आगे चलकर थेरी बनीं, यानी ऐसी महिलाएँ जिन्होंने निर्वाण प्राप्त कर लिया हो।
- हर वर्ग से अनुयायी: राजा, धनवान, गृहपति और सामान्य जन, जैसे कर्मकार, दास, शिल्पी, सभी बुद्ध के अनुयायी बने। संघ में आने पर सभी बराबर माने जाते थे, क्योंकि भिक्खु और भिक्खुनी बनने पर अपनी पुरानी पहचान छोड़नी पड़ती थी।
- संघ कैसे चलता था: संघ की संचालन पद्धति गणों और संघों की परंपरा पर आधारित थी। लोग बातचीत से एकमत होने की कोशिश करते थे; ऐसा न हो पाता तो मतदान से निर्णय होता था।
- स्रोत 6 (थेरीगाथा): यह अनूठा बौद्ध ग्रंथ सुत्त पिटक का हिस्सा है, जिसमें भिक्खुनियों के रचे छंद हैं। इससे महिलाओं के सामाजिक और आध्यात्मिक अनुभवों की झलक मिलती है।
- पुन्ना नाम की एक दासी रोज़ सुबह मालिक के घर के लिए नदी का पानी लाने जाती थी और वहाँ एक ब्राह्मण को स्नान कर्म करते देखती थी।
- पुन्ना कहती है कि वह सज़ा के डर से या ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों के डर से ठंडे पानी में उतरती है; वह ब्राह्मण से पूछती है कि उसे किसका डर है।
- ब्राह्मण कहता है कि जल में स्नान करके बुरा करने वाला मुक्त हो जाता है। पुन्ना का उत्तर: “वैसा हो तो सारे मेंढक और कछुए स्वर्ग जाएँगे”, इसलिए वे कर्म ही मत कीजिए जिनका डर पानी की ओर खींचता है।
- स्रोत 7 (विनय पिटक के नियम):
- नया कंबल या गलीचा बनाने पर भिक्खु को उसका प्रयोग कम से कम छह वर्षों तक करना होगा; उससे पहले बिना भिक्खुओं की अनुमति के नया बनवाने पर वह ले लिया जाएगा और अपराध स्वीकार करना होगा।
- गृहस्थ के घर टिकिया या पके अनाज का भोजन मिले तो वह दो से तीन कटोरा भर ही ले सकता है, और उसे दूसरे भिक्खुओं के साथ बाँटना होगा: “यही सम्यक आचरण है।”
- विहार से जाने से पहले बिछाया हुआ बिस्तरा न समेटने पर, या बिना विदाई लिए चले जाने पर, अपराध स्वीकार करना होगा।
- बौद्ध धर्म तेज़ी से क्यों फैला: बुद्ध के जीवनकाल में और उनकी मृत्यु के बाद भी बौद्ध धर्म तेज़ी से फैला।
- लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे, और तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझनों में बाँध रखा था।
- बौद्ध शिक्षाओं ने जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व दिया, इसलिए महिलाएँ और पुरुष आकर्षित हुए।
- ख़ुद से छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा के आदर्श बहुत लोगों को भाए।
9. स्तूप: क्यों और कैसे बने★★
किताब का भाग 7 (स्तूप), पृष्ठ 95–97 · प्रश्नावली में: प्रश्न 9
- संवाद से बने पवित्र स्थल: बौद्ध आदर्श और व्यवहार ब्राह्मण, जैन और कई अन्य परंपराओं के साथ संवाद और तर्क-वितर्क से उभरे। इनमें से कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में नहीं लिखे गए; यह मेलजोल पवित्र स्थलों के उभरने में भी दिखता है।
- चैत्य: बहुत प्राचीन काल से लोग ख़ास वनस्पति, अनूठी चट्टानों या विस्मयकारी प्राकृतिक सौंदर्य वाली जगहों को पवित्र मानते थे। कुछ ऐसे स्थलों पर एक छोटी-सी वेदी होती थी, जिसे कभी-कभी चैत्य कहा जाता था।
- किताब के बॉक्स के अनुसार शवदाह के बाद शरीर के कुछ अवशेष टीलों पर सुरक्षित रखे जाते थे, और अंतिम संस्कार से जुड़े ये टीले चैत्य के रूप में जाने गए।
- बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहें: बौद्ध साहित्य में कई चैत्यों की चर्चा है। लुम्बिनी (जन्म), बोधगया (ज्ञान), सारनाथ (प्रथम उपदेश) और कुशीनगर (निब्बान) धीरे-धीरे पवित्र स्थल बन गए। बुद्ध के समय से लगभग दो सौ वर्षों बाद असोक ने लुम्बिनी की अपनी यात्रा की याद में वहाँ एक स्तंभ बनवाया।
- प्रमुख बौद्ध स्थल (14): लुम्बिनी, श्रावस्ती, कुशीनगर, सारनाथ, बराबर, बोधगया, भरहुत, साँची, अजंता, नासिक, जुन्नार, कार्ले, नागार्जुनकोंडा और अमरावती।
स्तूप क्यों बनाए जाते थे (भाग 7.1)
- स्तूप क्या है: कुछ पवित्र जगहों पर बुद्ध से जुड़े अवशेष, जैसे उनकी अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान, गाड़ दिए गए थे। इन टीलों को स्तूप कहते थे।
- बौद्ध धर्म का प्रतीक: स्तूप बनाने की परंपरा शायद बुद्ध से पहले की रही होगी, पर वह बौद्ध धर्म से जुड़ गई। उनमें पवित्र माने जाने वाले अवशेष रहते थे, इसलिए पूरा स्तूप ही बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक माना गया।
- असोक और स्तूप: अशोकावदान नाम के बौद्ध ग्रंथ के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों के हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया।
- कब तक: ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ जैसी जगहों पर स्तूप बन चुके थे।
- स्रोत 8 (महापरिनिब्बान सुत्त): सुत्त पिटक के इस अंश में परिनिर्वाण से पहले आनंद पूछते हैं कि तथागत (बुद्ध का दूसरा नाम) के अवशेषों का क्या करें। पहले बुद्ध कहते हैं कि अवशेषों को विशेष आदर देने में मत उलझो; विशेष आग्रह पर कहते हैं: “उन्हें तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप (स्तूप का पालि रूप) बनाना चाहिए।”
- जो वहाँ धूप या माला चढ़ाएगा, सिर नवाएगा या हृदय में शांति लाएगा, उसके लिए वह स्तूप चिर काल तक सुख और आनंद का कारण बनेगा।
स्तूप कैसे बने (भाग 7.2)
- अभिलेखों से पता: स्तूपों की वेदिकाओं और स्तंभों पर मिले अभिलेख बताते हैं कि इन्हें बनाने और सजाने के लिए दान किसने दिया।
- कुछ दान राजाओं ने दिए, जैसे सातवाहन वंश के राजा।
- कुछ दान शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियों ने दिए; जैसे साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वाले शिल्पकारों के दान से बना।
- सैकड़ों महिलाओं और पुरुषों ने दान के अभिलेखों में अपना नाम लिखवाया, कभी गाँव या शहर का नाम, कभी अपना पेशा और रिश्तेदारों के नाम भी।
- भिक्खुओं और भिक्खुनियों ने भी इन इमारतों के लिए दान दिया।
- दानात्मक अभिलेख: साँची में दान के अभिलेख मिले हैं, और “ऐसे सैकड़ों अभिलेख भरहुत और अमरावती में भी मिले हैं।”
स्तूप की संरचना (भाग 7.3)
- अंड: स्तूप (संस्कृत अर्थ टीला) एक गोलार्ध मिट्टी के टीले से शुरू हुआ, जिसे बाद में अंड कहा गया। धीरे-धीरे इसकी संरचना जटिल हुई, जिसमें कई चौकोर और गोल आकारों का संतुलन बनाया गया।
- हर्मिका: अंड के ऊपर एक हर्मिका होती थी। यह छज्जे जैसा ढाँचा देवताओं के घर का प्रतीक था।
- यष्टि और छत्री: हर्मिका से एक मस्तूल निकलता था, जिसे यष्टि कहते थे; उस पर अक्सर एक छत्री लगी होती थी।
- वेदिका: टीले के चारों ओर एक वेदिका होती थी, जो पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी।
- साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप: ये बिना अलंकरण के हैं, सिवाय पत्थर की वेदिकाओं और तोरणद्वारों के। पत्थर की वेदिकाएँ बाँस या काठ के घेरे जैसी थीं, और चारों दिशाओं में खड़े तोरणद्वारों पर खूब नक्काशी थी।
- परिक्रमा: उपासक पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश करके, टीले को दाईं तरफ़ रखते हुए, दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे, “मानो वे आकाश में सूर्य के पथ का अनुकरण कर रहे हों।”
- बाद का अलंकरण: बाद में टीले पर भी अलंकरण और नक्काशी होने लगी। अमरावती में और पेशावर (पाकिस्तान) में शाह जी की ढेरी के स्तूपों में ताख और मूर्तियाँ उकेरने के बहुत उदाहरण मिलते हैं।
- इमारत को दो तरह से दिखाना (जैसे साँची का महास्तूप): योजना, यानी इमारत का समतलीय परिप्रेक्ष्य; और ऊँचाई, यानी ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य।
स्तूप के हिस्से: ऊपर से नीचे
10. अमरावती खो गया, साँची बचा★
किताब का भाग 8 (स्तूपों की ‘खोज’: अमरावती और साँची की नियति), पृष्ठ 98–99 · प्रश्नावली में: प्रश्न 3
- दो इतिहास: हर स्तूप का एक इतिहास यह है कि वह कैसे बना, और दूसरा यह कि उसकी खोज कैसे हुई।
- 1796, अमरावती: मंदिर बनाना चाहने वाले एक स्थानीय राजा को अचानक अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले। उन्होंने उसके पत्थर इस्तेमाल करने का निश्चय किया; उन्हें लगा कि इस छोटी-सी पहाड़ी में शायद कोई खज़ाना छुपा हो।
- कॉलिन मेकेंज़ी: कुछ वर्षों बाद यह अंग्रेज़ अधिकारी इस इलाके से गुज़रे। उन्होंने कई मूर्तियाँ पाईं और उनका विस्तृत चित्रांकन किया, पर उनकी रिपोर्टें कभी छपी नहीं।
- 1854: गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के कमिश्नर ने अमरावती की यात्रा की, कई मूर्तियाँ और उत्कीर्ण पत्थर जमा किए और उन्हें मद्रास ले गए। ये उनके नाम पर एलियट संगमरमर कहलाते हैं। उन्होंने पश्चिमी तोरणद्वार भी खोज निकाला और माना कि अमरावती का स्तूप बौद्धों का सबसे विशाल और शानदार स्तूप था।
- 1850 के दशक में बिखराव: अमरावती के उत्कीर्ण पत्थर कलकत्ता में एशियाटिक सोसायटी ऑफ़ बंगाल, मद्रास में इंडिया ऑफिस और लंदन तक पहुँचे। कई अंग्रेज़ अधिकारियों के बागों में अमरावती की मूर्तियाँ थीं; इलाके का हर नया अधिकारी यह कहकर कुछ मूर्तियाँ उठा ले जाता था कि उससे पहले के अधिकारियों ने भी ऐसा किया।
- एच.एच. कोल की आवाज़: पुरातत्ववेत्ता एच.एच. कोल उन मुट्ठी भर लोगों में थे जो अलग सोचते थे। उन्होंने लिखा: “इस देश की प्राचीन कलाकृतियों की लूट होने देना मुझे आत्मघाती और असमर्थनीय नीति लगती है।”
- वे मानते थे कि संग्रहालयों में मूर्तियों की प्लास्टर प्रतिकृतियाँ रखी जाएँ और असली कृतियाँ खोज की जगह पर ही रहें।
- कोल अधिकारियों को अमरावती के लिए राज़ी नहीं कर पाए, पर साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई।
- साँची क्यों बचा: शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब तक विद्वान यह नहीं समझ पाए थे कि अवशेष उठा ले जाने की बजाय खोज की जगह पर ही संरक्षित करना कितना ज़रूरी है।
- 1818 में जब साँची की खोज हुई, उसके तीन तोरणद्वार तब भी खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था और टीला अच्छी हालत में था।
- तब भी सुझाव आया कि तोरणद्वार पेरिस या लंदन भेज दिए जाएँ। अंत में कई कारणों से साँची का स्तूप वहीं बना रहा।
- भाग 1 के कारण भी याद रखिए: भोपाल की बेगमों का अनुदान, प्लास्टर प्रतिकृतियों से फ्रांसीसियों और अंग्रेज़ों का संतुष्ट हो जाना, और किसी रेल ठेकेदार की नज़र न पड़ना।
- आज: साँची का स्तूप आज भी बना हुआ है, जबकि अमरावती का महाचैत्य “अब सिर्फ एक छोटा सा टीला है जिसका सारा गौरव नष्ट हो चुका है।”
अमरावती खो गया, साँची बचा
- 1796: स्थानीय राजा ने पत्थर इस्तेमाल करने की सोची
- 1854: मूर्तियाँ मद्रास ले जाई गईं (एलियट संगमरमर)
- 1850 के दशक: पत्थर कलकत्ता, मद्रास, लंदन और बागों तक
- कोल की बात अमरावती के लिए नहीं मानी गई
- तीन तोरणद्वार खड़े, टीला अच्छी हालत में
- खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मानी गई
- भोपाल की बेगमों ने रख-रखाव के लिए धन दिया
11. मूर्तिकला: पत्थर में कथाएँ, प्रतीक और लोक परंपराएँ★★
किताब का भाग 9 (मूर्तिकला), पृष्ठ 99–103 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 7
- मूर्तियाँ यूरोप क्यों गईं: जिन लोगों ने स्तूपों की मूर्तियाँ देखीं, उन्हें वे खूबसूरत और मूल्यवान लगीं, इसलिए वे उन्हें अपने लिए रखना चाहते थे।
पत्थर में गढ़ी कथाएँ (भाग 9.1)
- चारणचित्र जैसा: घुमक्कड़ कथावाचक कपड़े या कागज़ पर बने चित्र (चारणचित्र) लेकर घूमते हैं और कहानी कहते हुए उन्हें दिखाते हैं। साँची की मूर्तियाँ भी पत्थर में कहानियाँ कहती हैं।
- उत्तरी तोरणद्वार का एक दृश्य: पहली नज़र में यह फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है। पर साँची की मूर्तिकला का गहराई से अध्ययन करने वाले कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं।
- यह कहानी एक दानी राजकुमार की है, जिसने अपना सब कुछ एक ब्राह्मण को सौंप दिया और अपनी पत्नी और बच्चों के साथ जंगल में रहने चला गया।
- तरीका: इतिहासकार अक्सर किसी मूर्ति की व्याख्या लिखित साक्ष्यों से तुलना करके करते हैं।
उपासना के प्रतीक (भाग 9.2)
- चरित लेखन की ज़रूरत: बौद्ध मूर्तिकला समझने के लिए कला इतिहासकारों को बुद्ध के चरित लेखन को समझना पड़ा। उसके अनुसार बुद्ध को एक वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान मिला।
- मानव रूप नहीं, प्रतीक: कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई:
| प्रतीक | किस बात का प्रतीक | चित्र (पृष्ठ 100) |
|---|---|---|
| रिक्त स्थान | बुद्ध के ध्यान की दशा | 4.14 बोधि वृक्ष की पूजा |
| स्तूप | महापरिनिब्बान | 4.15 स्तूप की पूजा |
| चक्र | सारनाथ में बुद्ध का पहला उपदेश | 4.16 धर्मचक्र प्रवर्तन |
| पेड़ | सिर्फ़ पेड़ नहीं, बुद्ध के जीवन की एक घटना | 4.14 |
- अक्षरशः नहीं: किताब कहती है, “ऐसी मूर्तिकला को अक्षरश: नहीं समझा जा सकता है।” ऐसे प्रतीक समझने के लिए इतिहासकारों को कलाकृतियाँ बनाने वालों की परंपराएँ जाननी पड़ती हैं।
लोक परंपराएँ (भाग 9.3)
- शालभंजिका: साँची की बहुत-सी मूर्तियाँ शायद बौद्ध मत से सीधी जुड़ी नहीं थीं, जैसे तोरणद्वार के किनारे पेड़ पकड़कर झूलती सुंदर स्त्री। इसका त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नहीं दिखता था, इसलिए विद्वान पहले असमंजस में थे।
- साहित्यिक परंपराओं के अध्ययन से पता चला कि यह संस्कृत में वर्णित शालभंजिका है। लोक परंपरा में माना जाता था कि इसके छूने से वृक्षों में फूल खिल उठते थे और फल लगने लगते थे।
- लगता है यह शुभ प्रतीक माना जाता था, इसलिए स्तूप के अलंकरण में आई। इससे पता चलता है कि बौद्ध धर्म में आए लोगों ने बुद्ध-पूर्व और बौद्ध धर्म से इतर विश्वासों, प्रथाओं और धारणाओं से बौद्ध धर्म को समृद्ध किया।
- जानवर: साँची में हाथी, घोड़े, बंदर और गाय-बैल के बहुत सुंदर उत्कीर्णन हैं। साँची में जातकों से ली गई जानवरों की कई कहानियाँ हैं, पर लगता है कि जानवर लोगों को आकर्षित करने के लिए भी उकेरे गए। जानवर मनुष्यों के गुणों के प्रतीक भी थे; जैसे हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक माने जाते थे।
- कमल और हाथियों के बीच महिला: हाथी उस पर जल छिड़क रहे हैं, जैसे अभिषेक कर रहे हों।
- कुछ इतिहासकार उसे बुद्ध की माँ माया से जोड़ते हैं, दूसरे उसे लोकप्रिय देवी गजलक्ष्मी मानते हैं, जो सौभाग्य लाने वाली देवी थीं और प्रायः हाथियों के साथ जोड़ी जाती हैं।
- यह भी संभव है कि इन मूर्तियों को देखने वाले उपासक उसे माया और गजलक्ष्मी दोनों से जोड़ते थे।
- सर्प: कई स्तंभों पर दिखाए गए सर्प भी शायद उन लोक परंपराओं से आए, जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था।
- जेम्स फर्गुसन का निष्कर्ष: कला पर लिखने वाले शुरुआती आधुनिक इतिहासकारों में से एक, जेम्स फर्गुसन, ने साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र माना। वे बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे, क्योंकि तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था; उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर निष्कर्ष निकाले।
अतीत से प्राप्त चित्र (बॉक्स, पृष्ठ 102)
- पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक बचती हैं, पर अतीत में चित्रकारी भी संप्रेषण का माध्यम थी। सबसे अच्छी हालत में गुफाओं की दीवारों के चित्र बचे हैं; इनमें अजंता (महाराष्ट्र) की चित्रकारी बहुत प्रसिद्ध है।
- अजंता के चित्र जातकों की कथाएँ दिखाते हैं: राज दरबार का जीवन, शोभा यात्राएँ, काम करते हुए स्त्री-पुरुष और त्यौहार।
- कलाकारों ने चित्रों को त्रिविम रूप देने के लिए आभाभेद तकनीक का प्रयोग किया; कुछ चित्र बिलकुल स्वाभाविक और सजीव लगते हैं।
12. नयी धार्मिक परंपराएँ: महायान, वैष्णव और शैव, मंदिर★★
किताब का भाग 10 (नयी धार्मिक परंपराएँ), पृष्ठ 103–107 · प्रश्नावली में: प्रश्न 8, 4
महायान बौद्ध मत का विकास (भाग 10.1)
- कब: “ईसा की प्रथम सदी के बाद बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव नज़र आते हैं।” कालरेखा 1 (पृष्ठ 110) की एक पंक्ति में महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ साथ रखी गई हैं: “लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे”।
- पहले क्या था: प्रारंभिक बौद्ध मत में निब्बान के लिए व्यक्तिगत प्रयास को विशेष महत्त्व था। बुद्ध को भी एक मनुष्य समझा जाता था, जिन्होंने व्यक्तिगत प्रयास से प्रबोधन और निब्बान पाया।
- मुक्तिदाता: धीरे-धीरे एक मुक्तिदाता की कल्पना उभरी, यानी यह विश्वास कि वे मुक्ति दिला सकते हैं।
- बोधिसत्त: बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए, जो सत्कार्यों से पुण्य कमाते थे, पर उस पुण्य से दुनिया को दुखों में छोड़कर निब्बान नहीं पाते थे, बल्कि दूसरों की सहायता करते थे।
- मूर्ति पूजा: बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का एक महत्वपूर्ण अंग बन गई (जैसे मथुरा की पहली सदी की बुद्ध मूर्ति)।
- नाम: चिंतन की इस नयी परंपरा को महायान कहा गया। इसे अपनाने वालों ने पुरानी परंपरा को हीनयान कहा।
- थेरवाद: पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे, यानी पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के बताए रास्ते पर चलने वाले।
पौराणिक हिंदू धर्म का उदय (भाग 10.2)
- मुक्तिदाता सिर्फ़ बौद्ध धर्म में नहीं: इसी तरह के विश्वास अलग ढंग से उन परंपराओं में भी विकसित हो रहे थे, जिन्हें आज हिंदू धर्म कहा जाता है।
- वैष्णव: वह हिंदू परंपरा जिसमें विष्णु को सबसे महत्वपूर्ण देवता माना जाता है।
- शैव: वह संकल्पना जिसमें शिव परमेश्वर हैं।
- भक्ति: इन परंपराओं में एक विशेष देवता की पूजा को ख़ास महत्त्व दिया जाता था, और भक्त और ईश्वर के बीच का रिश्ता प्रेम और समर्पण का माना जाता था। इसे भक्ति कहते हैं।
- दस अवतार: वैष्णववाद में कई अवतारों के आसपास पूजा पद्धतियाँ विकसित हुईं; इस परंपरा में दस अवतारों की कल्पना है। माना जाता था कि पापियों के बढ़ते प्रभाव से जब दुनिया में अव्यवस्था और नाश की स्थिति आती, तब विश्व की रक्षा के लिए भगवान अलग-अलग रूपों में अवतार लेते।
- शायद अलग-अलग अवतार देश के अलग-अलग हिस्सों में लोकप्रिय थे। इन सब स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एक एकीकृत धार्मिक परंपरा बनाने का महत्वपूर्ण तरीका था।
- मूर्तियाँ: कई अवतारों और दूसरे देवताओं की मूर्तियाँ बनीं। शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था, पर कई बार मनुष्य के रूप में भी दिखाया गया।
- देवताओं की खूबियाँ और प्रतीक उनके शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुधों (हथियार और हाथ में धारण किए गए अन्य शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दिखाए जाते थे।
- उदाहरण: एहोल (कर्नाटक) में विष्णु का वराह अवतार, पृथ्वी देवी को बचाते हुए (लगभग छठी सदी); महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की मूर्ति (छठी सदी)।
- पुराण: इन मूर्तियों का अर्थ समझने के लिए इतिहासकारों को इनकी कहानियाँ जाननी पड़ती हैं। कई कहानियाँ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों में मिलती हैं।
- पुराण सामान्यतः संस्कृत श्लोकों में लिखे गए और ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, ताकि कोई भी सुन सके।
- महिलाएँ और शूद्र, जिन्हें वैदिक साहित्य पढ़ने-सुनने की अनुमति नहीं थी, पुराण सुन सकते थे।
- पुराणों की ज़्यादातर कहानियाँ लोगों के आपसी मेल-मिलाप से बनीं: पुजारी, व्यापारी और आम स्त्री-पुरुष जगह-जगह आते-जाते अपने विश्वासों का आदान-प्रदान करते थे। जैसे, वासुदेव-कृष्ण मथुरा इलाके के महत्वपूर्ण देवता थे, और कई शताब्दियों में उनकी पूजा देश के दूसरे इलाकों में भी फैल गई।
मंदिरों का बनाया जाना (भाग 10.3)
- पहले मंदिर कब: जिस समय साँची जैसी जगहों पर स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखने के लिए सबसे पहले मंदिर भी बने।
- गर्भगृह: शुरू के मंदिर एक चौकोर कमरे के रूप में थे, जिसे गर्भगृह कहा जाता था। इसमें एक दरवाज़ा होता था, जिससे उपासक मूर्ति की पूजा के लिए भीतर जा सकता था।
- शिखर: धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर एक ऊँचा ढाँचा बनाया जाने लगा, जिसे शिखर कहा जाता था। मंदिर की दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उकेरे जाते थे (जैसे देवगढ़, उत्तर प्रदेश का पाँचवीं सदी का मंदिर)।
- बाद के मंदिर: बाद के युगों में मंदिरों के साथ विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें और तोरण भी जुड़ गए, और जल आपूर्ति का इंतज़ाम भी होने लगा।
- कृत्रिम गुफाएँ: शुरू के कुछ मंदिर पहाड़ियों को काटकर, खोखला करके कृत्रिम गुफाओं के रूप में बनाए गए थे। यह परंपरा बहुत पुरानी थी:
- “सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए बनाई गई थीं।” (जैसे बराबर, बिहार की गुफाएँ, लगभग तीसरी सदी ईसा पूर्व)
- यह परंपरा अलग-अलग चरणों में बढ़ती रही। इसका सबसे विकसित रूप आठवीं सदी का कैलाशनाथ (शिव का एक नाम) मंदिर है, जिसमें पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया (एलोरा, महाराष्ट्र)।
- एक ताम्रपत्र अभिलेख में एलोरा का प्रमुख तक्षक काम पूरा होने पर अपना आश्चर्य कहता है: “हे भगवान यह मैंने कैसे बनाया!”
शुरू के मंदिर से बड़े मंदिर तक
- विशाल सभास्थल
- ऊँची दीवारें और तोरण
- जल आपूर्ति का इंतज़ाम
कृत्रिम गुफाओं की परंपरा
13. क्या हम सब कुछ देख-समझ सकते हैं?★
किताब का भाग 11, पृष्ठ 107–109 · प्रश्नावली में: प्रश्न 6, 12
- जो बचा है: हमारे अतीत की दृश्य परंपराएँ ईंट और पत्थर के स्थापत्य, मूर्ति कला और चित्रकला के रूप में सामने आई हैं। समय के साथ बहुत कुछ नष्ट हो गया, पर जो बचा है वह इन्हें बनाने वाले कलाकारों, मूर्तिकारों, राजगीरों और वास्तुकारों की दृष्टि से परिचित कराता है।
- किताब का प्रश्न: क्या हम उनका संदेश बिना दुविधा के समझ सकते हैं? क्या हम पूरी तरह समझ पाएँगे कि इन्हें देखने और पूजने वाले लोगों के लिए इनका क्या महत्त्व था?
अनजाने को समझने की कोशिश (भाग 11.1)
- यूरोप के विद्वानों की उलझन: उन्नीसवीं सदी में यूरोप के विद्वानों ने देवी-देवताओं की मूर्तियाँ देखीं तो उनकी पृष्ठभूमि और महत्त्व नहीं समझ पाए। कई सिरों, कई हाथों वाली या मनुष्य और जानवर के रूप मिलाकर बनी मूर्तियाँ उन्हें विकृत लगती थीं।
- यूनान से तुलना: समझने के लिए उन्होंने इनकी तुलना उस परंपरा से की जिससे वे परिचित थे: प्राचीन यूनान की कला। वे प्रारंभिक भारतीय मूर्तिकला को यूनानी कला से निम्न मानते थे।
- बुद्ध और बोधिसत्त की मूर्तियों से उत्साह: ये मूर्तियाँ यूनानी प्रतिमानों से प्रभावित थीं और ज़्यादातर तक्षशिला और पेशावर जैसे उत्तर-पश्चिम के नगरों में मिली थीं। इन इलाकों में ईसा से दो सौ साल पहले (यानी ईसा पूर्व दूसरी सदी में) भारतीय-यूनानी शासकों ने राज्य बनाए थे। ये मूर्तियाँ यूनानी मूर्तियों से बहुत मिलती-जुलती थीं, इसलिए उन विद्वानों ने इन्हें भारतीय मूर्ति कला का सर्वश्रेष्ठ नमूना माना (जैसे गांधार का एक बोधिसत्त)।
- तरीका: परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित चीज़ों को समझने का पैमाना बनाना, जो हम सब अक्सर करते हैं।
यदि लिखित और दृश्य का मेल न हो (भाग 11.2)
- ग्रंथों से मदद, पर आसान नहीं: मूर्ति का महत्त्व और संदर्भ समझने के लिए कला इतिहासकार अक्सर लिखित ग्रंथों से जानकारी लेते हैं। यह यूनानी मूर्तियों से तुलना करने से बेहतर तरीका है, पर बहुत आसान नहीं।
- महाबलीपुरम (तमिलनाडु) की विशाल चट्टान: इस पर किसी कथा का सजीव चित्रण है, पर कौन-सी कथा? कला इतिहासकारों ने पुराणों के साहित्य में बहुत खोजबीन की है, फिर भी मतभेद हैं:
- कुछ मानते हैं कि इसमें गंगा नदी के स्वर्ग से अवतरण का चित्रण है; चट्टान की सतह के बीच की प्राकृतिक दरार शायद नदी दिखाती है। यह कथा महाकाव्यों और पुराणों में है।
- दूसरे विद्वान मानते हैं कि यहाँ महाभारत में वर्णित, दिव्यास्त्र पाने के लिए अर्जुन की तपस्या दिखाई गई है; वे मूर्तियों के बीच एक साधु के केंद्र में होने को महत्त्व देते हैं।
- जो दर्ज़ नहीं हुआ: बहुत से रीति-रिवाज, धार्मिक विश्वास और व्यवहार, जैसे रोज़ के और ख़ास अवसरों के रीति-रिवाज, इमारतों, मूर्तियों या चित्रों के रूप में स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए। कई लोगों और समुदायों को चिरस्थायी विवरण रखने की ज़रूरत न लगी हो, फिर भी उनकी धार्मिक और दार्शनिक परंपरा सक्रिय रही हो।
- किताब का निष्कर्ष: इस अध्याय के शानदार उदाहरण “एक विशाल ज्ञान राशि की मात्र ऊपरी परत हैं।”
14. आँकड़े और साल एक जगह★
अध्याय के साल और संख्याएँ
| साल या संख्या | क्या | पृष्ठ |
|---|---|---|
| ईसा पूर्व 600 से ईसा संवत् 600 तक | अध्याय का काल | 82 |
| 1868-1901 | भोपाल की नवाब शाहजहाँ बेगम का शासनकाल | 82 |
| 1876 | एच.डी. बार्स्टो ने शाहजहाँ बेगम की आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल का अनुवाद किया | 82 |
| बीस मील | भोपाल से साँची कनखेड़ा की दूरी, उत्तर-पूर्व की ओर | 82 |
| पाँचवीं सदी | साँची के स्तूप समूह में बना एक मंदिर | 83 |
| ईसा पूर्व प्रथम सहस्राब्दि | विश्व इतिहास का एक मोड़: जरथुस्त्र, खुंगत्सी, सुकरात, प्लेटो, अरस्तु, महावीर, बुद्ध | 84 |
| 1500 से 1000 ईसा पूर्व | ऋग्वेद का संकलन | 84 |
| लगभग 1000 से 500 ईसा पूर्व | कुछ यज्ञ घरों के मालिक करने लगे | 84 |
| छठी सदी ई.पू. से | उपनिषद (छांदोग्य उपनिषद: लगभग छठी सदी ईसा पूर्व) | 84–85 |
| 64 | समकालीन बौद्ध ग्रंथों में उल्लिखित संप्रदाय या चिंतन परंपराएँ | 85 |
| पाँचवीं-चौथी सदी ई.पू. | बुद्ध की मृत्यु के बाद वेसली में ज्येष्ठों की सभा, शिक्षाओं का संकलन | 86 |
| 3 | त्रिपिटक के पिटक: विनय, सुत्त, अभिधम्म | 86 |
| लगभग 12वीं शताब्दी | संस्कृत में लिखी एक बौद्ध पांडुलिपि | 86 |
| छठी सदी ईसा पूर्व | वर्धमान महावीर का जन्म; जैन मूल सिद्धांत उससे पहले से प्रचलित | 88 |
| 23 | महावीर से पहले के तीर्थंकर | 88 |
| 5 | जैन साधु और साध्वी के व्रत | 88 |
| लगभग तीसरी शताब्दी ई. | मथुरा से मिली तीर्थंकर की मूर्ति | 88 |
| चौदहवीं सदी | जैन ग्रंथ की पांडुलिपि का पन्ना | 89 |
| लगभग सौ वर्ष बाद | बुद्ध के जीवन काल से इतने समय बाद उनके कई चरित लिखे गए | 89 |
| लगभग 200 ईसवी | अमरावती (गुंटूर ज़िला, आंध्र प्रदेश) की मूर्ति, बुद्ध महल से जाते हुए | 90 |
| पाँच तरह | सिगल को सलाह: नौकरों की देखभाल, और श्रमणों-ब्राह्मणों की देखभाल | 91 |
| कम से कम छह वर्ष; दो से तीन कटोरे | विनय पिटक के नियम: नया कंबल या गलीचा; गृहस्थ के घर भोजन | 94 |
| 14 | प्रमुख बौद्ध स्थल | 95 |
| लगभग दो सौ वर्ष बाद | बुद्ध के समय से इतने बाद असोक ने लुम्बिनी में स्तंभ बनवाया | 96 |
| ईसा पूर्व दूसरी सदी तक | भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप बन चुके थे | 96 |
| 1796 | एक स्थानीय राजा को अमरावती के स्तूप के अवशेष मिले | 98 |
| 1854 | गुंटूर के कमिश्नर अमरावती की मूर्तियाँ मद्रास ले गए (एलियट संगमरमर) | 98 |
| 1850 के दशक | अमरावती के पत्थर कलकत्ता, मद्रास और लंदन पहुँचे | 98 |
| 1818 | साँची की खोज; तीन तोरणद्वार खड़े, चौथा गिरा हुआ | 99 |
| पहली सदी | मथुरा की बुद्ध मूर्ति | 103 |
| ईसा की प्रथम सदी के बाद | बौद्ध अवधारणाओं और व्यवहार में बदलाव (महायान) | 103 |
| 10 | वैष्णव परंपरा में अवतारों की कल्पना | 104 |
| लगभग छठी सदी | एहोल (कर्नाटक) का वराह अवतार | 104 |
| प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से | ब्राह्मणों के रचे पुराणों में देवताओं की कहानियाँ | 104–105 |
| छठी सदी | महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की मूर्ति | 105 |
| पाँचवीं सदी | देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) का मंदिर और शेषनाग पर विष्णु | 106 |
| ईसा पूर्व तीसरी सदी | सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ, असोक के आदेश से आजीविक संतों के लिए | 107 |
| आठवीं सदी | कैलाशनाथ मंदिर, एलोरा | 107 |
| ईसा से दो सौ साल पहले | उत्तर-पश्चिम में भारतीय-यूनानी शासकों के राज्य | 108 |
कालरेखा 1: महत्वपूर्ण धार्मिक बदलाव
| साल | क्या हुआ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| लगभग 1500-1000 ई. पू. | प्रारंभिक वैदिक परंपराएँ | 110 |
| लगभग 1000-500 ई. पू. | उत्तर वैदिक परंपराएँ | 110 |
| लगभग छठी सदी ई. पू. | प्रारंभिक उपनिषद, जैन धर्म, बौद्ध धर्म | 110 |
| लगभग तीसरी सदी ई. पू. | आरंभिक स्तूप | 110 |
| लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे | महायान बौद्ध मत का विकास, वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ | 110 |
| लगभग तीसरी सदी ईसवी | सबसे पुराने मंदिर | 110 |
कालरेखा 2: प्राचीन इमारतों और मूर्तियों की खोज और संरक्षण के महत्वपूर्ण चरण
| साल | क्या हुआ | पृष्ठ |
|---|---|---|
| 1814 | इंडियन म्यूज़ियम, कलकत्ता की स्थापना | 110 |
| 1834 | रामराजा लिखित एसेज़ ऑन द आर्किटैक्चर ऑफ़ द हिंदूज़ का प्रकाशन; कनिंघम ने सारनाथ के स्तूप की छानबीन की | 110 |
| 1835-1842 | जेम्स फर्गुसन ने महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थलों का सर्वेक्षण किया | 110 |
| 1851 | गवर्नमेंट म्यूज़ियम, मद्रास की स्थापना | 110 |
| 1854 | अलेक्जैंडर कनिंघम ने भिलसा टोप्स लिखी, जो साँची पर लिखी गई सबसे प्रारंभिक पुस्तकों में से एक है | 110 |
| 1878 | राजेंद्र लाल मित्र की पुस्तक बुद्ध गया : द हेरिटेज़ ऑफ़ शाक्य मुनि का प्रकाशन | 110 |
| 1880 | एच.एच. कोल को प्राचीन इमारतों का संग्रहाध्यक्ष बनाया गया | 110 |
| 1888 | ट्रेज़र–ट्रोव एक्ट बना; इसके अनुसार सरकार पुरातात्विक महत्त्व की किसी भी चीज़ को हस्तगत कर सकती थी | 110 |
| 1914 | जॉन मार्शल और अल्फ्रेड फूसे की पुस्तक द मॉन्युमेंट्स ऑफ़ साँची का प्रकाशन | 110 |
| 1923 | जॉन मार्शल की पुस्तक कंजर्वेशन मैनुअल का प्रकाशन | 110 |
| 1955 | प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने राष्ट्रीय संग्रहालय, नयी दिल्ली की नींव रखी | 110 |
| 1989 | साँची को एक विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया | 110 |
15. ये ग़लतियाँ मत कीजिएध्यान
| ग़लती | सही बात | पृष्ठ |
|---|---|---|
| साँची का पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले जाया गया | फ्रांसीसी और अंग्रेज़ प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए; मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह रहा | 83 |
| आजीविक भौतिकवादी थे | आजीविक (मक्खलि गोसाल) नियतिवादी कहलाते हैं; लोकायत (अजीत केसकंबलिन्) भौतिकवादी | 87 |
| नियतिवादियों और भौतिकवादियों के विचार उनके अपने ग्रंथों से पता हैं | उनके ग्रंथ नष्ट हो गए; जानकारी दूसरी परंपराओं से मिलती है, जैसे सुत्त पिटक | 87 |
| बुद्ध के प्रवचन उनके जीवन काल में लिखे गए | कोई भी संभाषण जीवन काल में नहीं लिखा गया; मृत्यु के बाद वेसली की सभा में संकलन हुआ | 86 |
| विनय पिटक में बुद्ध की शिक्षाएँ हैं | विनय पिटक में संघ के नियम; शिक्षाएँ सुत्त पिटक में; दर्शन अभिधम्म पिटक में | 86 |
| जैन धर्म महावीर से शुरू हुआ | जैन मूल सिद्धांत महावीर के जन्म से पहले प्रचलित थे; उनसे पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे | 88 |
| प्रारंभिक बौद्ध धर्म ईश्वर की पूजा पर टिका था | प्रारंभिक परंपराओं में भगवान का होना या न होना अप्रासंगिक था | 91 |
| संघ में शुरू से महिलाएँ आ सकती थीं; गोतमी बुद्ध की माँ थीं | शुरू में सिर्फ़ पुरुष; आनंद के समझाने पर अनुमति मिली; महाप्रजापति गोतमी बुद्ध की उपमाता और पहली भिक्खुनी थीं | 92 |
| स्तूप की परंपरा बौद्ध धर्म ने शुरू की | यह परंपरा शायद बुद्ध से पहले की थी, जो बाद में बौद्ध धर्म से जुड़ गई | 96 |
| हर्मिका और छत्री एक ही चीज़ हैं | हर्मिका अंड के ऊपर छज्जे जैसा ढाँचा (देवताओं के घर का प्रतीक) है; छत्री यष्टि पर लगती है | 96 |
| उपासक किसी भी द्वार से घुसकर किसी भी दिशा में घूमते थे | पूर्वी तोरणद्वार से प्रवेश, टीले को दाईं तरफ़ रखकर दक्षिणावर्त परिक्रमा | 97 |
| प्रारंभिक मूर्तियों में बुद्ध सदा मानव रूप में हैं | कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने रिक्त स्थान, स्तूप, चक्र जैसे प्रतीकों से उनकी उपस्थिति दिखाई | 100 |
| कमल और हाथियों के बीच की महिला निश्चित रूप से माया हैं | कुछ इतिहासकार माया, दूसरे गजलक्ष्मी मानते हैं; उपासक शायद दोनों से जोड़ते थे | 102–103 |
| हीनयान नाम पुरानी परंपरा ने ख़ुद रखा | यह नाम महायान अपनाने वालों ने दिया; पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को थेरवादी कहते थे | 103 |
| पुराण सिर्फ़ ब्राह्मण सुन सकते थे | पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे; महिलाएँ और शूद्र भी सुन सकते थे | 105 |
| सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ बौद्ध भिक्खुओं के लिए बनीं | ईसा पूर्व तीसरी सदी में असोक के आदेश से आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए | 107 |
| महाबलीपुरम की चट्टान पर निश्चित रूप से गंगा अवतरण है | मतभेद है: कुछ गंगा का अवतरण मानते हैं, दूसरे अर्जुन की तपस्या | 109 |
16. अपने को जाँचिए: किताब के प्रश्न और उत्तर★★
किताब की प्रश्नावली, पृष्ठ 111–113
उत्तर दीजिए (लगभग 100-150 शब्दों में)
प्रश्न 1. क्या उपनिषदों के दार्शनिकों के विचार नियतिवादियों और भौतिकवादियों से भिन्न थे? अपने जवाब के पक्ष में तर्क दीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, तीनों एक ही युग की बहस का हिस्सा थे, पर जीवन, मृत्यु और कर्म पर उनके उत्तर अलग थे।
उपनिषद (छठी सदी ई.पू. से): ये जीवन का अर्थ, मृत्यु के बाद जीवन की संभावना और पुनर्जन्म पर प्रश्न पूछते थे, जैसे क्या पुनर्जन्म अतीत के कर्मों से होता है। छांदोग्य उपनिषद आत्मा को बीज की गिरी से छोटी और सब लोकों से बड़ी बताता है, और बहते पवन को “सच्चा यज्ञ” कहकर यज्ञ को नया अर्थ देता है।
नियतिवादी (आजीविक, जैसे मक्खलि गोसाल): सब कुछ पूर्व निर्धारित है; सुख और दुख मानो माप कर दिए गए हैं, उन्हें बदला, बढ़ाया या घटाया नहीं जा सकता। यानी तपस्या या सद्गुण से कुछ नहीं बदलता।
भौतिकवादी (लोकायत, जैसे अजीत केसकंबलिन्): मनुष्य चार तत्वों से बना है, मृत्यु के बाद कोई नहीं बचता, और दान, यज्ञ या चढ़ावा जैसी कोई चीज़ नहीं होती।
तर्क: उपनिषद आत्मा और मृत्यु के बाद के जीवन को खोजते हैं, भौतिकवादी उसे नकारते हैं; उपनिषद कर्म और पुनर्जन्म पर सोचते हैं, नियतिवादी मानते हैं कि कर्म से कुछ नहीं बदलता।
ध्यान रहे, नियतिवादियों और भौतिकवादियों के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए; उनके विचार सुत्त पिटक जैसी दूसरी परंपराओं से पता चलते हैं। (पृष्ठ 84–87)
प्रश्न 2. जैन धर्म की महत्वपूर्ण शिक्षाओं को संक्षेप में लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: जैनों के मूल सिद्धांत छठी सदी ईसा पूर्व में वर्धमान महावीर के जन्म से पहले ही उत्तर भारत में प्रचलित थे; जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले 23 तीर्थंकर हो चुके थे। मुख्य शिक्षाएँ:
संपूर्ण विश्व प्राणवान है: पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन माना जाता है।
अहिंसा: इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों, किसी भी जीव को न मारना जैन दर्शन का केंद्र है। इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया।
कर्म और मुक्ति: जन्म और पुनर्जन्म का चक्र कर्म से तय होता है; इससे मुक्ति त्याग और तपस्या से, यानी संसार के त्याग से, मिलती है। इसलिए विहारों में रहना अनिवार्य नियम बना।
पाँच व्रत: हत्या न करना, चोरी न करना, झूठ न बोलना, ब्रह्मचर्य और धन संग्रह न करना।
धीरे-धीरे जैन धर्म भारत के कई हिस्सों में फैला, और जैन विद्वानों ने प्राकृत, संस्कृत, तमिल जैसी भाषाओं में बहुत साहित्य रचा। (पृष्ठ 88–89)
प्रश्न 3. साँची के स्तूप के संरक्षण में भोपाल की बेगमों की भूमिका की चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: साँची का स्तूप आज जिस हालत में है, उसमें भोपाल की दो शासकों, शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम, के फ़ैसलों और अनुदान की बड़ी भूमिका है।
तोरणद्वार अपनी जगह रहा: उन्नीसवीं सदी में फ्रांसीसियों ने पूर्वी तोरणद्वार फ्रांस ले जाने की इजाज़त शाहजहाँ बेगम से माँगी; अंग्रेज़ों ने भी कोशिश की। अंत में दोनों प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए और मूल तोरणद्वार भोपाल राज्य में अपनी जगह पर ही रहा।
रख-रखाव का धन: दोनों बेगमों ने इस प्राचीन स्थल के रख-रखाव के लिए धन दिया।
संग्रहालय और अतिथिशाला: सुल्तानजहाँ बेगम ने वहाँ एक संग्रहालय और अतिथिशाला बनवाने के लिए अनुदान दिया। जॉन मार्शल ने वहीं रहकर साँची पर अपने महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे और उन्हें सुल्तानजहाँ को समर्पित किया; उन ग्रंथों के खंडों के प्रकाशन के लिए भी बेगम ने अनुदान दिया।
लिखित वर्णन: शाहजहाँ बेगम (शासनकाल 1868-1901) ने अपनी आत्मकथा ताज–उल-इकबाल तारीख भोपाल में साँची के अवशेषों और कनिंघम के काम का वर्णन किया।
किताब के शब्दों में, स्तूप समूह बचा रहा तो “इसके पीछे कुछ विवेकपूर्ण निर्णयों की बड़ी भूमिका है।” आज यह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल संरक्षण का उदाहरण है, और 1989 में इसे विश्व कला दाय स्थान घोषित किया गया। (पृष्ठ 82–83, 110)
प्रश्न 4. निम्नलिखित संक्षिप्त अभिलेख को पढ़िए और जवाब दीजिए :
“महाराजा हुविष्क (एक कुषाण शासक) के तैंतीसवें साल में गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु बल की शिष्या, त्रिपिटक जानने वाली बुद्धमिता के बहन की बेटी भिक्खुनी धनवती ने अपने माता–पिता के साथ मधुवनक में बोधिसत्त की मूर्ति स्थापित की।”
(क) धनवती ने अपने अभिलेख की तारीख कैसे निश्चित की?
उत्तर देखिए
उत्तर: शासक के राज्य वर्ष और ऋतु के महीने-दिन से: कुषाण शासक महाराजा हुविष्क के तैंतीसवें साल में, गर्म मौसम के पहले महीने के आठवें दिन।
(ख) आपके अनुसार उन्होंने बोधिसत्त की मूर्ति क्यों स्थापित की?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह अभिलेख की बातों और किताब के आधार पर अनुमान है।
महायान की आस्था: महायान परंपरा में बोधिसत्त परम करुणामय जीव माने गए, जो अपने पुण्य से दूसरों की सहायता करते थे, और बुद्ध और बोधिसत्तों की मूर्तियों की पूजा इस परंपरा का महत्वपूर्ण अंग बन गई थी।
दान की परंपरा: स्तूपों के अभिलेख दिखाते हैं कि भिक्खु और भिक्खुनियाँ भी धार्मिक इमारतों के लिए दान देते थे, और सैकड़ों दानकर्ता अपना नाम और रिश्तेदारों के नाम लिखवाते थे।
इसलिए धनवती ने शायद अपनी श्रद्धा दिखाने के लिए, उपासकों की पूजा के लिए और दान को याद रखवाने के लिए मूर्ति स्थापित की। (पृष्ठ 96, 103)
(ग) वे अपने किन रिश्तेदारों का नाम लेती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: वे अपने माता-पिता का ज़िक्र करती हैं, जिनके साथ उन्होंने मूर्ति स्थापित की, और बुद्धमिता का, जिनकी बहन की बेटी वे हैं (यानी बुद्धमिता उनकी मौसी हैं)। भिक्खु बल रिश्तेदार नहीं हैं: वे त्रिपिटक जानने वाले भिक्खु हैं, और “भिक्खु बल की शिष्या” शब्द धनवती के लिए भी पढ़े जा सकते हैं और बुद्धमिता के लिए भी।
(घ) वे कौन-से बौद्ध ग्रंथों को जानती थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: अभिलेख भिक्खु बल को “त्रिपिटक जानने वाले” और बुद्धमिता को “त्रिपिटक जानने वाली” बताता है, इसलिए माना जा सकता है कि धनवती भी त्रिपिटक, यानी विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक, जानती थीं। (पृष्ठ 86)
(ड.) उन्होंने ये पाठ किससे सीखे थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: भिक्खु बल से, या अपनी मौसी बुद्धमिता से; अभिलेख का वाक्य दोनों तरह पढ़ा जा सकता है।
- पहली तरह: “भिक्खु बल की शिष्या” धनवती के लिए है। तब धनवती ने त्रिपिटक भिक्खु बल से सीखा।
- दूसरी तरह: “भिक्खु बल की शिष्या” बुद्धमिता के लिए है। तब धनवती ने शायद अपनी मौसी बुद्धमिता से सीखा, जो त्रिपिटक जानती थीं।
दोनों तरह पढ़ने पर उत्तर में यही दो नाम आते हैं: भिक्खु बल और भिक्खुनी बुद्धमिता। (पृष्ठ 111)
प्रश्न 5. आपके अनुसार स्त्री-पुरुष संघ में क्यों जाते थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब कई कारण देती है, जो धर्म, समाज और व्यक्ति, तीनों से जुड़े हैं।
धार्मिक असंतोष: लोग समकालीन धार्मिक प्रथाओं से असंतुष्ट थे, और तेज़ी से हो रहे सामाजिक बदलावों ने उन्हें उलझन में डाल रखा था।
जन्म नहीं, आचरण: बौद्ध शिक्षाओं में जन्म के आधार पर श्रेष्ठता की बजाय अच्छे आचरण और मूल्यों को महत्त्व था, और छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा का आदर्श था।
संघ में बराबरी: राजा, धनवान, गृहपति से लेकर कर्मकार, दास, शिल्पी तक संघ में आए; वहाँ पुरानी पहचान छोड़ने पर सभी बराबर माने जाते थे, और निर्णय बातचीत या मतदान से होते थे।
स्वयं मुक्ति का रास्ता: बुद्ध ने सिखाया कि दुखों से मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है: “तुम सब अपने लिए खुद ही ज्योति बनो”।
स्त्रियों के लिए नया स्थान: संघ में आई स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ बनीं और थेरी कहलाईं; थेरीगाथा में पुन्ना जैसी दासी भी अपनी बात कहती है।
इसलिए संघ बहुतों को सादा, बराबरी वाला और अर्थपूर्ण जीवन देता था। (पृष्ठ 85, 92–94)
निम्नलिखित पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए (लगभग 500 शब्दों में)
प्रश्न 6. साँची की मूर्तिकला को समझने में बौद्ध साहित्य के ज्ञान से कहाँ तक सहायता मिलती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: बौद्ध साहित्य साँची की बहुत-सी मूर्तियों की कुंजी है, पर हर मूर्ति उससे नहीं खुलती; कुछ के लिए लोक परंपराएँ और दूसरे साहित्य भी जानने पड़ते हैं।
1. जहाँ बौद्ध साहित्य से सीधी मदद मिली
जातक कथा: उत्तरी तोरणद्वार का एक दृश्य पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य लगता है, पर कला इतिहासकार इसे वेसान्तर जातक का दृश्य बताते हैं, जिसमें दानी राजकुमार सब कुछ एक ब्राह्मण को देकर पत्नी और बच्चों के साथ जंगल चला गया।
चरित लेखन और प्रतीक: बुद्ध के चरित के अनुसार उन्हें वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए ज्ञान मिला। कई प्रारंभिक मूर्तिकारों ने बुद्ध को मानव रूप में न दिखाकर प्रतीकों से दिखाया: रिक्त स्थान (ध्यान), स्तूप (महापरिनिब्बान), चक्र (सारनाथ का पहला उपदेश), और पेड़ (उनके जीवन की एक घटना)। चरित न जानने वाला इन्हें सिर्फ़ खाली आसन या पेड़ समझेगा।
स्तूप का अर्थ: महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) बताता है कि बुद्ध के अवशेषों पर थूप बनाया जाए और वहाँ माला चढ़ाने, सिर नवाने से सुख मिलेगा; इससे स्तूप की पूजा के दृश्य समझ आते हैं।
2. जहाँ बौद्ध साहित्य अकेला काफ़ी नहीं था
शालभंजिका: तोरणद्वार पर पेड़ पकड़कर झूलती स्त्री का त्याग और तपस्या से कोई रिश्ता नहीं दिखता था। संस्कृत साहित्य की परंपराओं से पता चला कि यह शालभंजिका है, जिसके छूने से वृक्षों में फूल और फल आते थे, यानी एक शुभ प्रतीक।
जानवर: हाथी, घोड़े, बंदर, गाय-बैल शायद लोगों को आकर्षित करने के लिए और मनुष्य के गुणों के प्रतीक के रूप में उकेरे गए; हाथी शक्ति और ज्ञान के प्रतीक थे।
माया या गजलक्ष्मी: कमल और हाथियों के बीच की महिला को कुछ इतिहासकार बुद्ध की माँ माया मानते हैं, दूसरे देवी गजलक्ष्मी; उपासक शायद दोनों से जोड़ते थे।
सर्प: स्तंभों के सर्प उन लोक परंपराओं से आए लगते हैं, जिनका ग्रंथों में हमेशा ज़िक्र नहीं होता था।
3. साहित्य न जानने का नतीजा
- जेम्स फर्गुसन बौद्ध साहित्य से अनभिज्ञ थे (तब तक ज़्यादातर बौद्ध ग्रंथों का अनुवाद नहीं हुआ था), इसलिए उन्होंने सिर्फ़ मूर्तियाँ देखकर साँची को वृक्ष और सर्प पूजा का केंद्र मान लिया।
निष्कर्ष: बौद्ध साहित्य बहुत हद तक मदद करता है, पर किताब के अनुसार ऐसी मूर्तिकला को “अक्षरश: नहीं समझा जा सकता”; इतिहासकार को मूर्तियाँ बनाने वालों की परंपराएँ, लोक विश्वास और दूसरे साहित्य भी जानने पड़ते हैं। (पृष्ठ 96, 99–103)
प्रश्न 7. चित्र 4.32 और 4.33 में साँची से लिए गए दो परिदृश्य दिए गए हैं। आपको इनमें क्या नज़र आता है? वास्तुकला, पेड़–पौधे, और जानवरों को ध्यान से देखकर तथा लोगों के काम–धंधों को पहचान कर यह बताइए कि इनमें से कौन से ग्रामीण और कौन से शहरी परिदृश्य हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: चित्र 4.32 ग्रामीण परिदृश्य लगता है और चित्र 4.33 शहरी। पहचान इन बातों से होती है:
चित्र 4.32 (ग्रामीण)
वास्तुकला: गुंबद जैसी छत वाली दो झोंपड़ियाँ, जिनमें लोग बैठे हैं; बड़ी इमारत कोई नहीं।
पेड़-पौधे और जानवर: पेड़, नीचे पानी के पौधे, बीच में मवेशी जैसे जानवर और एक हाथी।
लोग और काम: ऊपर खड़े स्त्री-पुरुषों की कतार, और कंधे पर डंडे उठाए खड़े पुरुष, जैसे गाँव के रोज़ के काम चल रहे हों।
चित्र 4.33 (शहरी)
वास्तुकला: खंभों वाली दो मंज़िला इमारत; खंभों के ऊपर छोटी-छोटी जानवरों की आकृतियाँ; बीच में रेलिंग की पट्टी; नीचे मेहराब वाली जालीदार तीन खिड़कियाँ।
लोग: दोनों मंज़िलों के खानों में बहुत-से लोग भीड़ में बैठे हैं।
पेड़-पौधे: खेत, झोंपड़ी या खुले जानवर नहीं दिखते।
निष्कर्ष: झोंपड़ी, पेड़, पानी और जानवर गाँव की पहचान हैं; बहुमंज़िला, सजी हुई, खंभों और खिड़कियों वाली इमारत और भीड़ नगर की। साँची के उत्तरी तोरणद्वार के एक दृश्य में भी पहली नज़र में फूस की झोंपड़ी और पेड़ों वाला ग्रामीण दृश्य दिखता है, हालाँकि कला इतिहासकार उसे वेसान्तर जातक का एक दृश्य मानते हैं। (पृष्ठ 99, 112)
प्रश्न 8. वैष्णववाद और शैववाद के उदय से जुड़ी वास्तुकला और मूर्तिकला के विकास की चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: कालरेखा 1 के अनुसार लगभग दूसरी सदी ईसा पूर्व से आगे वैष्णववाद, शैववाद और देवी पूजन परंपराएँ बढ़ीं, और लगभग तीसरी सदी ईसवी में सबसे पुराने मंदिर बने। इन परंपराओं ने मूर्ति और मंदिर दोनों को नया रूप दिया।
1. पृष्ठभूमि: भक्ति और अवतार
वैष्णव परंपरा में विष्णु और शैव परंपरा में शिव सबसे बड़े देवता माने गए। एक विशेष देवता की पूजा, और भक्त और ईश्वर के बीच प्रेम और समर्पण का रिश्ता, यानी भक्ति, इनका केंद्र था।
वैष्णववाद में दस अवतारों की कल्पना है; अलग-अलग इलाकों के स्थानीय देवताओं को विष्णु का रूप मान लेना एकीकृत धार्मिक परंपरा बनाने का तरीका था।
2. मूर्तिकला
अवतारों की मूर्तियाँ: कई अवतार मूर्तियों में दिखाए गए, जैसे एहोल (कर्नाटक) का वराह अवतार, जो पृथ्वी देवी को बचा रहे हैं (लगभग छठी सदी), और देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) में शेषनाग पर आराम करते विष्णु (पाँचवीं सदी)।
शिव: शिव को उनके प्रतीक लिंग के रूप में बनाया जाता था, पर कई बार मनुष्य के रूप में भी।
देवी: महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) में दुर्गा की मूर्ति (छठी सदी)।
पहचान के चिह्न: देवताओं की खूबियाँ शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध (हथियार और हाथ के शुभ अस्त्र) और बैठने की शैली से दिखाई जाती थीं।
कहानियाँ: इन मूर्तियों का अर्थ प्रथम सहस्राब्दि के मध्य से ब्राह्मणों के रचे पुराणों की कहानियों से समझ आता है; पुराण ऊँची आवाज़ में पढ़े जाते थे, जिन्हें महिलाएँ और शूद्र भी सुन सकते थे।
3. वास्तुकला: मंदिर
गर्भगृह: जब साँची जैसे स्तूप अपने विकसित रूप में आ गए थे, उसी समय देवी-देवताओं की मूर्तियाँ रखने के लिए पहले मंदिर बने: एक चौकोर कमरा, गर्भगृह, जिसमें एक दरवाज़ा होता था।
शिखर: धीरे-धीरे गर्भगृह के ऊपर ऊँचा ढाँचा, शिखर, बनने लगा; दीवारों पर अक्सर भित्ति चित्र उकेरे जाते थे (देवगढ़ का मंदिर, पाँचवीं सदी)।
बड़े मंदिर: बाद में विशाल सभास्थल, ऊँची दीवारें, तोरण और जल आपूर्ति का इंतज़ाम जुड़ा।
चट्टान काटकर बने मंदिर: कुछ शुरू के मंदिर पहाड़ी काटकर कृत्रिम गुफाओं के रूप में बने। यह परंपरा ईसा पूर्व तीसरी सदी की आजीविक गुफाओं से चली और आठवीं सदी के कैलाशनाथ (शिव) मंदिर, एलोरा में सबसे विकसित हुई, जहाँ पूरी पहाड़ी काटकर मंदिर बना दिया गया।
4. इन्हें पढ़ने की कठिनाई
- उन्नीसवीं सदी के यूरोपीय विद्वानों को कई सिरों और हाथों वाली मूर्तियाँ विकृत लगीं। महाबलीपुरम की विशाल चट्टान पर गंगा का अवतरण है या अर्जुन की तपस्या, इस पर आज भी मतभेद है।
निष्कर्ष: भक्ति की इन परंपराओं से देवताओं की पहचान वाली मूर्तियाँ और गर्भगृह से शिखर और विशाल मंदिर तक की वास्तुकला विकसित हुई, जिन्हें पुराणों की कहानियों के साथ पढ़ना पड़ता है। (पृष्ठ 104–109, 110)
प्रश्न 9. स्तूप क्यों और कैसे बनाए जाते थे? चर्चा कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्तूप बुद्ध से जुड़े पवित्र अवशेषों पर बने टीले थे, जो धीरे-धीरे बुद्ध और बौद्ध धर्म के प्रतीक बन गए; इन्हें बहुत-से लोगों के दान से बनाया और सजाया गया।
1. स्तूप क्यों बनाए जाते थे
पवित्र स्थल: बहुत प्राचीन काल से लोग कुछ जगहों को पवित्र मानते थे, जहाँ कभी-कभी छोटी वेदी (चैत्य) होती थी। लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ और कुशीनगर जैसी बुद्ध के जीवन से जुड़ी जगहें पवित्र स्थल बनीं।
अवशेषों पर टीला: कुछ जगहों पर बुद्ध की अस्थियाँ या उनका इस्तेमाल किया हुआ सामान गाड़ दिए गए; इन टीलों को स्तूप कहा गया। उनमें पवित्र अवशेष थे, इसलिए पूरा स्तूप बुद्ध और बौद्ध धर्म का प्रतीक बना। यह परंपरा शायद बुद्ध से पहले की थी, पर बौद्ध धर्म से जुड़ गई।
बुद्ध का निर्देश: महापरिनिब्बान सुत्त (स्रोत 8) के अनुसार बुद्ध ने कहा कि तथागत के लिए चार महापथों के चौक पर थूप बनाया जाए; वहाँ धूप, माला चढ़ाने, सिर नवाने या मन में शांति लाने वाले को चिर काल तक सुख मिलेगा।
असोक: अशोकावदान के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेष हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया। ईसा पूर्व दूसरी सदी तक भरहुत, साँची और सारनाथ में स्तूप बन चुके थे।
2. स्तूप कैसे बनाए जाते थे: दान से
- वेदिकाओं और स्तंभों के अभिलेख दानकर्ताओं के नाम बताते हैं: सातवाहन जैसे राजवंशों के राजा, शिल्पकारों और व्यापारियों की श्रेणियाँ (साँची के एक तोरणद्वार का हिस्सा हाथी दाँत का काम करने वालों के दान से बना), सैकड़ों स्त्री-पुरुष, और भिक्खु-भिक्खुनियाँ भी।
3. स्तूप कैसे बनाए जाते थे: संरचना
अंड: गोलार्ध मिट्टी का टीला, जिसकी संरचना बाद में चौकोर और गोल आकारों के संतुलन से जटिल हुई।
हर्मिका, यष्टि, छत्री: अंड के ऊपर छज्जे जैसी हर्मिका (देवताओं के घर का प्रतीक), उससे निकला मस्तूल यष्टि, और उस पर अक्सर छत्री।
वेदिका और तोरणद्वार: टीले के चारों ओर वेदिका पवित्र स्थल को सामान्य दुनिया से अलग करती थी। साँची और भरहुत के प्रारंभिक स्तूप सादे थे, बस पत्थर की वेदिकाएँ और चारों दिशाओं में नक्काशीदार तोरणद्वार थे।
परिक्रमा और अलंकरण: उपासक पूर्वी तोरणद्वार से घुसकर टीले को दाईं ओर रखते हुए दक्षिणावर्त परिक्रमा करते थे। बाद में टीले पर भी नक्काशी होने लगी, जैसे अमरावती और शाह जी की ढेरी (पेशावर, पाकिस्तान) में।
निष्कर्ष: स्तूप आस्था (अवशेषों की पूजा) और समाज (राजा से शिल्पी तक के दान) दोनों के मेल से बने। इनमें से साँची आज भी अपनी जगह खड़ा है, जबकि अमरावती का महाचैत्य अब एक छोटा-सा टीला रह गया है। (पृष्ठ 95–99)
मानचित्र कार्य
प्रश्न 10. विश्व के रेखांकित मानचित्र पर उन इलाकों पर निशान लगाइए जहाँ बौद्ध धर्म का प्रसार हुआ। उपमहाद्वीप से इन इलाकों को जोड़ने वाले जल और स्थल मार्गों को दिखाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब जिन इलाकों का नाम लेती है, सिर्फ़ उन्हीं पर निशान लगाइए, और मार्ग भी वही दिखाइए जो किताब बताती है।
उपमहाद्वीप: किताब के अनुसार बुद्ध के संदेश पहले पूरे उपमहाद्वीप में फैले। चाहें तो उपमहाद्वीप के कुछ प्रमुख बौद्ध स्थल, जैसे लुम्बिनी, बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर, साँची, छोटे बिंदुओं से दिखाइए।
स्थल मार्ग: उपमहाद्वीप से मध्य एशिया होते हुए चीन तक एक ठोस रेखा खींचिए, और चीन, कोरिया और जापान पर निशान लगाइए, क्योंकि किताब कहती है कि संदेश “मध्य एशिया होते हुए चीन, कोरिया और जापान” तक फैले। किताब के अनुसार फा-शिएन और श्वैन त्सांग जैसे तीर्थयात्री बौद्ध ग्रंथों की खोज में चीन से भारत आए थे।
जल मार्ग: श्रीलंका पर निशान लगाइए, और श्रीलंका से समुद्र पार करती बिंदुदार रेखा म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक खींचिए, क्योंकि किताब कहती है “श्रीलंका से समुद्र पार कर म्याँमार, थाइलैंड और इंडोनेशिया तक”।
संकेत सूची: मानचित्र के कोने में लिखिए: ठोस रेखा = स्थल मार्ग, बिंदुदार रेखा = जल मार्ग, छायांकित इलाका = बौद्ध धर्म का प्रसार।
चीन से कोरिया और जापान तक, और उपमहाद्वीप से श्रीलंका तक, रास्ता अपनी ओर से मत गढ़िए; एटलस में देखकर या शिक्षक से पूछकर ही जोड़िए। (पृष्ठ 86, 89)
परियोजना कार्य (कोई एक)
प्रश्न 11. इस अध्याय में चर्चित धार्मिक परंपराओं में से क्या कोई परंपरा आपके अड़ोस–पड़ोस में मानी जाती है? आज किन धार्मिक ग्रंथों का प्रयोग किया जाता है? उन्हें कैसे संरक्षित और संप्रेषित किया जाता है? क्या पूजा में मूर्तियों का प्रयोग होता है? यदि हाँ तो क्या ये मूर्तियाँ इस अध्याय में लिखी गई मूर्तियों से मिलती–जुलती हैं या अलग हैं? धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त इमारतों की तुलना प्रारंभिक स्तूपों और मंदिरों से कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
परंपरा चुनिए: अध्याय की परंपराओं (जैन, बौद्ध, वैष्णव, शैव, देवी पूजा) में से जो आपके आसपास मानी जाती है, उसका एक पूजा स्थल चुनिए और वहाँ के लोगों से विनम्रता से अनुमति लेकर बात कीजिए।
ग्रंथ: पूछिए कि कौन-से ग्रंथ पढ़े जाते हैं, वे किस भाषा में हैं, छपी किताब हैं या हाथ की लिखी पांडुलिपि, और कैसे आगे बढ़ते हैं: मौखिक पाठ, प्रवचन, कथा, या पुस्तकालय में संरक्षण। फिर तुलना कीजिए: किताब के अनुसार बौद्ध शिक्षाएँ पहले मौखिक रहीं, और जैन पांडुलिपियाँ मंदिरों से जुड़े पुस्तकालयों में रखी गईं।
मूर्तियाँ: देखिए कि मूर्ति है या प्रतीक, और उसकी पहचान शिरोवस्त्र, आभूषण, आयुध और बैठने की शैली से कैसे होती है; अध्याय के चित्रों (तीर्थंकर, बुद्ध, बोधिसत्त, वराह, दुर्गा) से मिलाइए।
इमारत: इमारत की योजना का सरल रेखाचित्र बनाइए: गर्भगृह, शिखर, सभास्थल, परिक्रमा का रास्ता, द्वार। इसकी तुलना साँची के स्तूप (अंड, हर्मिका, यष्टि, छत्री, वेदिका, तोरणद्वार, दक्षिणावर्त परिक्रमा) और शुरू के मंदिरों (चौकोर गर्भगृह, एक दरवाज़ा, शिखर) से एक तालिका में कीजिए।
रिपोर्ट: परिचय, जो देखा और सुना, तुलना की तालिका, और आपका निष्कर्ष लिखिए; जिनसे बात की, उनका ज़िक्र उनकी अनुमति से ही कीजिए।
प्रश्न 12. इस अध्याय में वर्णित धार्मिक परंपराओं से जुड़े अलग–अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच मूर्तियों और चित्रों की तसवीरें इकट्ठी कीजिए। उनके शीर्षक हटाकर प्रत्येक तसवीर दो लोगों को दिखाइए और उन्हें इसके बारे में बताने को कहिए। उनके वर्णनों की तुलना करते हुए अपनी खोज की रिपोर्ट लिखिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह परियोजना आपको स्वयं खोजकर करनी है। तरीका:
तसवीरें चुनिए: अलग-अलग काल और इलाकों की कम से कम पाँच तसवीरें लीजिए, जैसे मथुरा का तीर्थंकर (लगभग तीसरी शताब्दी ई.), साँची का कोई दृश्य, अजंता का कोई चित्र, एहोल का वराह (लगभग छठी सदी) और महाबलीपुरम् की दुर्गा (छठी सदी)। हर तसवीर का असली शीर्षक, जगह और काल अलग पन्ने पर लिख लीजिए।
दिखाइए और पूछिए: शीर्षक हटाकर हर तसवीर दो लोगों को दिखाइए और एक जैसे प्रश्न पूछिए: इसमें क्या दिखता है, यह कौन हो सकता है, कहाँ और कब का लगता है? उनके शब्द जैसे के तैसे लिखिए।
तुलना कीजिए: एक तालिका बनाइए: तसवीर, व्यक्ति 1 का वर्णन, व्यक्ति 2 का वर्णन, असली जानकारी।
निष्कर्ष: देखिए कि लोग किन चीज़ों से पहचान पाए और कहाँ चूके। अध्याय से जोड़िए: इतिहासकार भी परिचित चीज़ों के आधार पर अपरिचित को समझते हैं, और ग्रंथ न जानने पर जेम्स फर्गुसन जैसी ग़लत व्याख्या हो सकती है।
किताब की गतिविधियाँ
ये प्रश्नावली में नहीं हैं, पर अध्याय समझने में मदद करती हैं।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 84). शाहजहाँ बेगम द्वारा किए गए वर्णन की तुलना चित्र 3 से कीजिए। इनमें आप क्या समानताएँ और असमानताएँ पाते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: यहाँ चित्र 3 का मतलब साँची के स्तूप की आज की तसवीर है। बेगम का वर्णन और यह तसवीर एक ही स्थल के हैं, पर अलग समय और अलग नज़र से।
समानताएँ: दोनों में पहाड़ी, पत्थर का गुंबदनुमा ढाँचा और तोरणद्वार है।
असमानताएँ: बेगम उन्नीसवीं सदी का हाल बताती हैं: पत्थर की वस्तुएँ, बुद्ध की मूर्तियाँ, एक प्राचीन तोरणद्वार, और कनिंघम की खुदाई। तसवीर आज का स्तूप दिखाती है: ऊपर तक जाती पत्थर की सीढ़ी, गुंबद के नीचे रेलिंग, ऊपर हर्मिका और छत्र। किताब के अनुसार आज यह जगह भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के सफल मरम्मत और संरक्षण का उदाहरण है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 84). यज्ञ के उद्देश्यों की सूची बनाइए।
उत्तर देखिए
उत्तर: किताब और स्रोत 1 के अनुसार यज्ञ इन बातों के लिए होते थे:
आहुति देवताओं तक पहुँचाना;
खूब सारे खाद्य पदार्थ और प्रचुर धन पाना;
गाय और मवेशी पाना;
वंश आगे बढ़ाने वाले बेटे पाना;
स्वास्थ्य और लंबी आयु पाना।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 87). क्या इन लोगों को नियतिवादी या भौतिकवादी कहना आपको उचित लगता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: उनकी बातों से नाम ठीक लगते हैं: मक्खलि गोसाल कहते हैं कि सुख-दुख पहले से माप कर दिए गए हैं, यानी सब पूर्व निर्धारित (नियतिवाद); अजीत केसकंबलिन् कहते हैं कि मनुष्य चार तत्वों से बना है और मृत्यु के बाद कुछ नहीं बचता (भौतिकवाद)। पर याद रखिए कि किताब कहती है, उन्हें “अक्सर” और “सामान्यत:” ये नाम दिए जाते हैं; इन परंपराओं के अपने ग्रंथ नष्ट हो गए हैं, और उनके बारे में हमें अन्य परंपराओं से ही जानकारी मिलती है, इसलिए पूरी तस्वीर शायद नहीं मिलती।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 87). जब लिखित सामग्री उपलब्ध न हो अथवा किन्हीं वजहों से बच न पाई हो तो ऐसी स्थिति में विचारों और मान्यताओं के इतिहास का पुनर्निर्माण करने में क्या समस्याएँ सामने आती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: कई समस्याएँ आती हैं:
विरोधी स्रोतों पर निर्भरता: आजीविक और लोकायत परंपराओं के ग्रंथ नष्ट हो गए, इसलिए उनके विचार दूसरी परंपराओं से मिलते हैं, जो उन्हें अधूरा या अपने ढंग से बता सकती हैं।
अनलिखी परंपराएँ: किताब कहती है कि कई परंपराओं के विचार और आचार ग्रंथों में लिखे ही नहीं गए।
चित्र और इमारतें पढ़ना कठिन: मूर्तियाँ “अक्षरश:” नहीं समझी जा सकतीं; ग्रंथ के बिना जेम्स फर्गुसन ने साँची को ग़लत समझा।
जो दर्ज़ नहीं हुआ: रोज़ के और ख़ास अवसरों के बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप से दर्ज़ नहीं हुए।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 88). महारानी के द्वारा दिया गया कौन सा तर्क आपको सबसे ज़्यादा युक्तियुक्त लगता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपकी अपनी राय है; एक तर्क चुनिए और कारण दीजिए। स्रोत 4 में महारानी कमलावती के तर्क ये हैं: पूरे विश्व के खज़ाने भी संतोष नहीं देंगे और न बचा पाएँगे; मृत्यु पर धन पीछे छूट जाएगा, तब सिर्फ़ धर्म रक्षा करेगा; जैसे चिड़िया पिंजरे से नफ़रत करती है, वैसे ही वे संसार से; और सुख छोड़ने वाले पक्षियों की तरह स्वतंत्र घूमते हैं। उदाहरण के लिए, मृत्यु पर सिर्फ़ धर्म ही रक्षा करेगा, यह तर्क इसलिए मज़बूत लगता है कि धन सचमुच साथ नहीं जाता।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 89). क्या बीसवीं सदी में अहिंसा की कोई प्रासंगिकता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: हाँ, और आज भी। अपने उत्तर में किताब की ये बातें जोड़िए:
अहिंसा का अर्थ: जैन दर्शन में अहिंसा का अर्थ इनसानों, जानवरों, पेड़-पौधों और कीड़े-मकोड़ों, किसी भी जीव को न मारना है, और इस सिद्धांत ने संपूर्ण भारतीय चिंतन परंपरा को प्रभावित किया।
प्रकृति का आदर: “संपूर्ण विश्व प्राणवान है”, यानी पत्थर, चट्टान और जल में भी जीवन है; आज के समय में यह जल, जंगल और जीवों को बचाने की सीख बनता है।
करुणा: बौद्ध शिक्षा में छोटे और कमज़ोर लोगों के प्रति मित्रता और करुणा का आदर्श है।
फिर अपने समय के उदाहरण सोचिए, जैसे झगड़े बातचीत से सुलझाना या जानवरों के साथ दया, और बताइए कि अहिंसा उनमें कैसे काम आती है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 89). क्या आप इसकी लिपि को पहचान सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: लिपि आपको स्वयं पहचाननी है; किताब उसका नाम नहीं देती। चौदहवीं सदी के जैन ग्रंथ की पांडुलिपि के इस पन्ने के अक्षरों की बनावट आज की देवनागरी से मिलाइए और देखिए कि कौन-से अक्षर पहचान में आते हैं; फिर शिक्षक से या किसी संग्रहालय की जानकारी से पुष्टि कीजिए।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 90). यदि आप बुद्ध के जीवन के बारे में नहीं जानते तो क्या आप मूर्ति को देखकर समझ पाते कि उसमें क्या दिखाया गया है?
उत्तर देखिए
उत्तर: शायद नहीं। अमरावती की इस मूर्ति (लगभग 200 ईसवी) में सजा हुआ एक घोड़ा है जिस पर कोई सवार नहीं दिखता, ऊपर छत्र जैसा कुछ है और आसपास लोग हैं। बिना कहानी जाने यह कोई जुलूस लगेगा। सिद्धार्थ के महल छोड़ने की कथा पता हो, तभी समझ आता है कि खाली घोड़ा बुद्ध के जाने को दिखाता है। किताब भी कहती है कि ऐसी मूर्तिकला को अक्षरशः नहीं समझा जा सकता और इतिहासकारों को चरित लेखन जानना पड़ा।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 91). आप सुझाव दीजिए कि माता-पिता, शिक्षकों और पत्नी के लिए किस तरह के निर्देश दिए गए होंगे।
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 5 बस इतना बताता है कि सिगल को माता-पिता, शिक्षक और पत्नी के लिए भी ऐसे ही उपदेश दिए गए; निर्देश आपको स्वयं सोचने हैं। स्रोत 5 के ढंग से, यानी “पाँच तरह से” देखभाल वाले कर्तव्यों के रूप में, अपने सुझाव लिखिए। जैसे माता-पिता के लिए आदर और बुढ़ापे में देखभाल; शिक्षकों के लिए सम्मान और मन लगाकर सीखना; पत्नी के लिए सम्मान और घर की ज़रूरतों का ध्यान। ये आपके सुझाव हैं, बौद्ध ग्रंथ के शब्द नहीं।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 92). बुद्ध द्वारा सिगल को दी गई सलाह की तुलना असोक द्वारा उसकी प्रजा (अध्याय 2) को दी गई सलाह से कीजिए। क्या आपको कुछ समानताएँ और असमानताएँ नज़र आती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों में समानताएँ भी हैं और असमानताएँ भी:
समानताएँ: बुद्ध सिगल से नौकरों और कर्मचारियों की देखभाल और श्रमणों और ब्राह्मणों की सेवा करने को कहते हैं; अध्याय 2 के अनुसार असोक का धम्म भी बड़ों के आदर, संन्यासियों और ब्राह्मणों के प्रति उदारता और सेवकों और दासों के साथ उदार व्यवहार की बात करता है।
असमानताएँ: स्रोत 5 के इस अंश में बुद्ध की सलाह एक गृहपति के अपने लोगों के प्रति कर्तव्यों की है; असोक ने अपनी सलाह पूरी प्रजा के लिए अभिलेखों में लिखवाई, दूसरों के धर्मों और परंपराओं के आदर की बात भी जोड़ी, और धम्म के प्रचार के लिए अधिकारी नियुक्त किए।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 93). बुद्ध की कौन-सी शिक्षाएँ इस रचना में नज़र आती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: पुन्ना की रचना (स्रोत 6) में ये शिक्षाएँ दिखती हैं:
विवेक और तर्क: पानी में नहाने से बुराई से मुक्ति मिलती, तो मेंढक और कछुए भी स्वर्ग जाते; यानी कर्मकांड पर तर्क से प्रश्न।
सम्यक कर्म: बुराई से बचने का रास्ता वे कर्म छोड़ना है जिनका डर पानी की ओर खींचता है।
हर व्यक्ति की मुक्ति: एक दासी भी धर्म पर अपनी बात कह सकती है; मुक्ति का प्रयास हर व्यक्ति स्वयं कर सकता है।
करुणा: अंत में वह ब्राह्मण से अपने शरीर को ठंड से बचाने को कहती है।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 94). क्या आप बता सकते हैं कि ये नियम क्यों बने?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 7 के नियमों के पीछे संघ के जीवन की ये ज़रूरतें दिखती हैं:
सादा जीवन: भिक्खु के पास सिर्फ़ ज़रूरी चीज़ें होती थीं; कंबल या गलीचा कम से कम छह वर्ष चलाने का नियम लालच और संग्रह रोकता है।
दान पर निर्भरता: भिक्खु दान पर जीते थे; दो-तीन कटोरे से ज़्यादा न लेना और उसे बाँटना गृहस्थों पर बोझ कम करता है और बराबरी रखता है (“यही सम्यक आचरण है”)।
विहार का अनुशासन: बिस्तरा समेटना और विदा लेकर जाना साझा विहार को व्यवस्थित रखता है।
अपराध स्वीकार करना: नियम तोड़ने पर अपराध स्वीकार करने से संघ में अनुशासन बना रहता है।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 94). पुन्ना जैसी दासी संघ में क्यों जाना चाहती थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: पुन्ना की रचना में सज़ा और ऊँचे घरानों की स्त्रियों के कटु वाक्यों का डर है, जिसके कारण वह कड़ी ठंड में भी पानी में उतरती है। संघ में आने पर पुरानी पहचान छूट जाती थी और सब बराबर माने जाते थे; बौद्ध शिक्षा जन्म से ज़्यादा आचरण को महत्त्व देती थी; और स्त्रियाँ धम्म की उपदेशिकाएँ और थेरी बन सकती थीं। इसलिए संघ उसे आदर, बराबरी और दुख से मुक्ति का रास्ता देता था।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 96). चित्र 4.15 को देखकर क्या आप इनमें से कुछ रीति-रिवाज़ों को पहचान सकते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: स्रोत 8 में स्तूप पर धूप या माला चढ़ाने, सिर नवाने और हृदय में शांति लाने की बात है। स्तूप की पूजा वाले इस चित्र में स्तूप के नीचे उपासकों की भीड़ और ऊपर उड़ती आकृतियाँ हैं। पहचानने का तरीका:
- किसी उपासक के हाथ में माला जैसी चीज़ हो, तो वह माला चढ़ाने का रिवाज़ है।
- कोई सिर झुकाए या हाथ जोड़े खड़ा हो, तो वह सिर नवाने का रिवाज़ है।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 97). साँची के महास्तूप के मापचित्र (चित्र 4.10 क) और छायाचित्र (चित्र 4.3) में क्या समानताएँ और फ़र्क हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: दोनों एक ही महास्तूप दिखाते हैं।
समानताएँ: गोल टीला, उसके चारों ओर की वेदिका, तोरणद्वार और सीढ़ियाँ दोनों में हैं।
फ़र्क: मापचित्र ऊपर से देखी गई योजना है: उसमें गोल घेरे, बीच में छोटा चौकोर, एक तरफ़ सीढ़ियाँ और चारों दिशाओं के चारों तोरणद्वार एक साथ दिखते हैं, पर ऊँचाई नहीं। छायाचित्र में एक ओर से देखा गया असली स्तूप है: गुंबद की ऊँचाई, ऊपर हर्मिका और छत्र, पेड़ और ढलान, पर चारों द्वार एक साथ नहीं।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 97). इस इमारत की कौन-सी विशेषताएँ नक्शे में सबसे ज़्यादा स्पष्ट हैं? कौन-सी विशेषताएँ ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य से देखने पर ज़्यादा स्पष्ट होती हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: योजना और ऊँचाई का चित्र एक ही इमारत को दो तरह से दिखाते हैं।
नक्शे (योजना) में: स्तूप का गोल आकार, एक के अंदर एक घेरे (टीला, परिक्रमा का रास्ता, वेदिका), बीच का चौकोर, सीढ़ियाँ और चारों दिशाओं में निकले चार तोरणद्वार।
ऊर्ध्वस्थ परिप्रेक्ष्य में: गुंबद की ऊँचाई और आकार, ऊपर हर्मिका और तीन तल वाली छतरी, आधार के चारों ओर की वेदिका, सीढ़ी, नक्काशीदार तोरणद्वार और उसके सामने खड़ा स्तंभ।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 99). खंड एक को दुबारा पढ़िए। कारण बताइए कि साँची क्यों बच गया।
उत्तर देखिए
उत्तर: भाग 1 और भाग 8 मिलाकर ये कारण बनते हैं।
फ्रांसीसी और अंग्रेज़ पूर्वी तोरणद्वार की जगह प्लास्टर प्रतिकृतियों से संतुष्ट हो गए।
शाहजहाँ बेगम और सुल्तानजहाँ बेगम ने रख-रखाव, संग्रहालय, अतिथिशाला और जॉन मार्शल की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए अनुदान दिया।
शायद सौभाग्य से किसी रेल ठेकेदार या निर्माता की नज़र नहीं पड़ी, और यह यूरोप के संग्रहालयों में चीज़ें ले जाने वालों से भी बचा रहा।
भाग 8 के अनुसार साँची के लिए खोज की जगह पर ही संरक्षण की बात मान ली गई; शायद अमरावती की खोज थोड़ी पहले हो गई थी, जब यह समझ नहीं बनी थी।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 103). मूर्तिकला के लिए हड्डियों, मिट्टी और धातुओं का भी इस्तेमाल होता है। इनके विषय में पता कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपको स्वयं पता करना है। अपने आसपास के कुम्हार, धातु का काम करने वाले कारीगर या किसी संग्रहालय से पूछिए: मूर्ति किस चीज़ की है, कैसे बनती है (गढ़कर, साँचे में ढालकर, पकाकर), कितने समय टिकती है। फिर सोचिए कि पत्थर की मूर्तियाँ ज़्यादा क्यों बची हैं: किताब के अनुसार पत्थर की कलाकृतियाँ लंबे समय तक सुरक्षित बचती हैं।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 104). मूर्ति में दी गई आकृतियों के आपसी अनुपात में फ़र्क से क्या बात समझ में आती है?
उत्तर देखिए
उत्तर: एहोल (कर्नाटक) की इस मूर्ति (लगभग छठी सदी) में वराह अवतार की आकृति बहुत बड़ी है और उनकी बाँह पर पृथ्वी देवी छोटी दिखती हैं। बड़ा आकार शायद देवता की शक्ति और महत्त्व दिखाता है: वे पृथ्वी को बचाने वाले हैं, इसलिए सबसे बड़े बनाए गए।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 105). कलाकारों ने किस प्रकार गति को दिखाने की कोशिश की है? इस मूर्ति में बताई कहानी के बारे में जानकारी इकट्ठी कीजिए।
उत्तर देखिए
उत्तर: महाबलीपुरम् (तमिलनाडु) की इस मूर्ति (छठी सदी) में कई भुजाओं वाली दुर्गा शेर पर सवार हैं, और आसपास सहायकों की भीड़ है। गति देखने के लिए शरीरों का झुकाव, उठी हुई भुजाएँ और उनके आयुध, शेर की मुद्रा और आकृतियों की भीड़ पर ध्यान दीजिए। कहानी की जानकारी आपको स्वयं इकट्ठी करनी है: पुराणों पर आधारित किसी पुस्तक से या शिक्षक से पता कीजिए कि यह दृश्य किस कथा का है, क्योंकि किताब के अनुसार ऐसी मूर्तियाँ पुराणों की कहानियों से समझी जाती हैं।
किनारे का प्रश्न (पृष्ठ 106). गर्भगृह के प्रवेशद्वार और शिखर के अवशेषों को पहचानें।
उत्तर देखिए
उत्तर: देवगढ़ (उत्तर प्रदेश) के पाँचवीं सदी के इस मंदिर में सीढ़ीदार चबूतरे पर एक छोटा मंदिर है। सामने का दरवाज़ा गर्भगृह का प्रवेशद्वार है, जिससे उपासक मूर्ति तक जाता था; उसके ऊपर का टूटा हुआ ऊँचा भाग शिखर के अवशेष हैं।
चर्चा कीजिए (पृष्ठ 109). आपने कोई भी धार्मिक अनुष्ठान देखा हो तो उसका वर्णन कीजिए। क्या इसे किसी रूप में हमेशा के लिए दर्ज़ किया जाता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: यह आपके अपने अनुभव से लिखना है। वर्णन में बताइए: अनुष्ठान कहाँ और कब हुआ, कौन लोग थे, क्या बोला, गाया या चढ़ाया गया। फिर सोचिए कि वह कहीं दर्ज़ होता है या नहीं: किसी ग्रंथ, चित्र, मूर्ति, इमारत, फ़ोटो या वीडियो में, या सिर्फ़ लोगों की याद और परंपरा में। किताब याद दिलाती है कि रोज़ के और ख़ास अवसरों के बहुत-से रीति-रिवाज कभी स्थायी रूप में दर्ज़ नहीं हुए, फिर भी वे जीवित परंपरा रहे।
झटपट दोहराइए
1. उस युग की बची हुई इमारतों में सबसे सुरक्षित इमारत कौन-सी है, और वह भोपाल से कहाँ है?
उत्तर देखिए
उत्तर: साँची का स्तूप; साँची कनखेड़ा भोपाल से बीस मील उत्तर-पूर्व में एक पहाड़ी की तलहटी में है। (पृष्ठ 82)
2. साँची के संरक्षण के लिए धन देने वाली भोपाल की दो बेगमें कौन थीं, और जॉन मार्शल ने अपने ग्रंथ किसे समर्पित किए?
उत्तर देखिए
उत्तर: शाहजहाँ बेगम और उनकी उत्तराधिकारी सुल्तानजहाँ बेगम; मार्शल ने साँची पर अपने ग्रंथ सुल्तानजहाँ को समर्पित किए। (पृष्ठ 83)
3. ऋग्वेद कब संकलित हुआ, और उसमें किन देवताओं की स्तुति है?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1500 से 1000 ईसा पूर्व में; इसमें अग्नि, इंद्र, सोम आदि कई देवताओं की स्तुति है। (पृष्ठ 84)
4. समकालीन बौद्ध ग्रंथों में कितने संप्रदायों या चिंतन परंपराओं का उल्लेख है, और शिक्षकों की चर्चाएँ कहाँ होती थीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: 64 संप्रदायों का; चर्चाएँ कुटागारशालाओं (नुकीली छत वाली झोपड़ी) में या उन उपवनों में होती थीं जहाँ घुमक्कड़ मनीषी ठहरते थे। (पृष्ठ 85)
5. सुत्त पिटक के स्रोत 3 में आजीविक और लोकायत परंपराओं के उपदेशक कौन हैं, और उन्हें क्या कहा जाता है?
उत्तर देखिए
उत्तर: आजीविक मक्खलि गोसाल, जिन्हें नियतिवादी कहा जाता है; लोकायत अजीत केसकंबलिन्, जिन्हें भौतिकवादी कहा जाता है। (पृष्ठ 87)
6. बुद्ध की मृत्यु के बाद उनकी शिक्षाओं का संकलन कहाँ हुआ, और त्रिपिटक के तीन पिटकों में क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: वेसली (बिहार की वैशाली) में ज्येष्ठों की सभा में; विनय पिटक में संघ के नियम, सुत्त पिटक में बुद्ध की शिक्षाएँ, अभिधम्म पिटक में दर्शन। (पृष्ठ 86)
7. जैन परंपरा के अनुसार महावीर से पहले कितने तीर्थंकर हुए, और तीर्थंकर का अर्थ क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: 23; तीर्थंकर वे महापुरुष हैं जो पुरुषों और महिलाओं को जीवन की नदी के पार पहुँचाते हैं। (पृष्ठ 88)
8. बौद्ध दर्शन के अनुसार दुखों से मुक्ति का रास्ता क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: घोर तपस्या और विषयासक्ति के बीच का मध्यम मार्ग। (पृष्ठ 91)
9. बौद्ध संघ में आने वाली पहली भिक्खुनी कौन थीं, और किसने बुद्ध को स्त्रियों को अनुमति देने के लिए समझाया?
उत्तर देखिए
उत्तर: बुद्ध की उपमाता महाप्रजापति गोतमी; बुद्ध के प्रिय शिष्य आनंद ने बुद्ध को समझाया। (पृष्ठ 92)
10. थेरीगाथा क्या है?
उत्तर देखिए
उत्तर: सुत्त पिटक का हिस्सा, जिसमें भिक्खुनियों के रचे छंद हैं; इसमें दासी पुन्ना की रचना भी है। (पृष्ठ 93)
11. स्तूप के ऊपरी हिस्से नीचे से ऊपर किस क्रम में होते हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: अंड (गोलार्ध टीला), उसके ऊपर हर्मिका (देवताओं के घर का प्रतीक), हर्मिका से निकली यष्टि, और यष्टि पर छत्री; टीले के चारों ओर वेदिका। (पृष्ठ 96–97)
12. अशोकावदान के अनुसार असोक ने बुद्ध के अवशेषों का क्या किया?
उत्तर देखिए
उत्तर: उनके हिस्से हर महत्वपूर्ण शहर में बाँटकर उन पर स्तूप बनाने का आदेश दिया। (पृष्ठ 96)
13. साँची की खोज कब हुई, और तब उसकी हालत कैसी थी?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1818 में; तीन तोरणद्वार खड़े थे, चौथा वहीं गिरा हुआ था, और टीला अच्छी हालत में था। (पृष्ठ 99)
14. साँची की कई प्रारंभिक मूर्तियों में रिक्त स्थान, स्तूप और चक्र किन बातों के प्रतीक हैं?
उत्तर देखिए
उत्तर: रिक्त स्थान बुद्ध के ध्यान की दशा का, स्तूप महापरिनिब्बान का, और चक्र सारनाथ में दिए गए पहले उपदेश का। (पृष्ठ 100)
15. महायान अपनाने वाले पुरानी बौद्ध परंपरा को क्या कहते थे, और पुरानी परंपरा वाले ख़ुद को क्या कहते थे?
उत्तर देखिए
उत्तर: महायानी उसे हीनयान कहते थे; पुरानी परंपरा के अनुयायी ख़ुद को थेरवादी कहते थे, यानी पुराने, प्रतिष्ठित शिक्षकों (थेर) के रास्ते पर चलने वाले। (पृष्ठ 103)
16. सबसे प्राचीन कृत्रिम गुफाएँ कब, किसके आदेश से और किनके लिए बनीं?
उत्तर देखिए
उत्तर: ईसा पूर्व तीसरी सदी में, असोक के आदेश से, आजीविक संप्रदाय के संतों के लिए। (पृष्ठ 107)
17. साँची को विश्व कला दाय स्थान कब घोषित किया गया?
उत्तर देखिए
उत्तर: 1989 में। (पृष्ठ 110)